देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
| अ० ६ ] | तृतीय स्कन्ध | २६७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यथाद्दीपस्तथोपाधेर्योगत्सञ्जायते द्विधा।<br>छायेवादर्शमध्ये वा प्रतिबिम्बं तथावयोः॥ ५ | जिस प्रकार एक ही दीपक उपाधिभेदसे दो प्रकारका दिखायी देता है अथवा दर्पणमें पड़ती हुई छाया दर्पणभेदसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होती है, उसी प्रकार मैं और ब्रह्म एक होते हुए भी उपाधिभेदसे अनेक हो जाते हैं॥ ५॥ |
| भेद उत्पत्तिकाले वै सर्गार्थं प्रभवत्यज।<br>दृश्यादृश्यविभेदोऽयं द्वैविध्ये सति सर्वथा॥ ६ | हे अज! जगत्का निर्माण करनेके लिये सृष्टिकालमें भेद दिखता ही है। तब दृश्यादृश्यकी प्रतीति होना अनिवार्य ही है; क्योंकि बिना दोके सृष्टि होना असम्भव है॥ ६॥ |
| नाहं स्त्री न पुमांश्चाहं न क्लीबं सर्गसंक्षये।<br>सर्गे सति विभेदः स्यात्कल्पितोऽयं धिया पुनः॥ ७ | सृष्टिके प्रलयकालमें मैं न स्त्री हूँ, न पुरुष हूँ और न ही नपुंसक हूँ। परंतु जब पुनः सृष्टि होने लगती है, तब पूर्ववत् यह भेद बुद्धिके द्वारा उत्पन्न हो जाता है॥ ७॥ |
| अहं बुद्धिरहं श्रीश्च धृतिः कीर्तिः स्मृतिस्तथा।<br>श्रद्धा मेधा दया लज्जा क्षुधा तृष्णा तथा क्षमा॥ ८<br><br>कान्तिः शान्तिः पिपासा च निद्रा तन्द्रा जराजरा।<br>विद्याविद्या स्पृहा वाञ्छा शक्तिश्चाशक्तिरेव च॥ ९<br><br>वसा मज्जा च त्वक्चाहं दृष्टिर्वागनृतानृता।<br>परा मध्या च पश्यन्ती नाड्योऽहं विविधाश्च याः॥ १० | मैं ही बुद्धि, श्री, धृति, कीर्ति, स्मृति, श्रद्धा, मेधा, दया, लज्जा, क्षुधा, तृष्णा, क्षमा, कान्ति, शान्ति, पिपासा, निद्रा, तन्द्रा, जरा, अजरा, विद्या, अविद्या, स्पृहा, वाञ्छा, शक्ति, अशक्ति, वसा, मज्जा, त्वचा, दृष्टि, सत्यासत्य वाणी, परा, मध्या, पश्यन्ती आदि वाणीके भेद और जो विभिन्न प्रकारकी नाड़ियाँ हैं—वह सब मैं ही हूँ॥ ८-१०॥ |
| किं नाहं पश्य संसारे मद्वियुक्तं किमस्ति हि।<br>सर्वमेवाहमित्येवं निश्चयं विद्धि पद्मज॥ ११ | हे पद्मयोने! आप यह देखिये कि इस संसारमें मैं क्या नहीं हूँ और मुझसे पृथक् कौन-सी वस्तु है? इसलिये आप यह निश्चितरूपसे जान लीजिये कि सब कुछ मैं ही हूँ॥ ११॥ |
| एतैर्मे निश्चितै रूपैर्विहीनं किं वदस्व मे।<br>तस्मादहं विधे चास्मिन्सर्गे वै वितताभवम्॥ १२ | हे विधे! मेरे इन निश्चित रूपोंके अतिरिक्त यदि कुछ हो तो मुझे बतायें, अतः इस सृष्टिमें सर्वत्र मैं ही व्याप्त हूँ॥ १२॥ |
| नूनं सर्वेषु देवेषु नानानामधरा ह्यहम्।<br>भवामि शक्तिरूपेण करोमि च पराक्रमम्॥ १३<br><br>गौरी ब्राह्मी तथा रौद्री वाराही वैष्णवी शिवा।<br>वारुणी चाथ कौबेरी नारसिंही च वासवी॥ १४<br><br>उत्पन्नेषु समस्तेषु कार्येषु प्रविशामि तान्।<br>करोमि सर्वकार्याणि निमित्तं तं विधाय वै॥ १५ | निश्चित ही मैं समस्त देवताओंमें भिन्न-भिन्न नामोंसे विराजती हूँ तथा शक्तिरूपसे प्रकट होती हूँ और पराक्रम करती हूँ। मैं ही गौरी, ब्राह्मी, रौद्री, वाराही, वैष्णवी, शिवा, वारुणी, कौबेरी, नारसिंही और वासवी शक्तिके रूपमें विद्यमान हूँ। सब कार्योंके उपस्थित होनेपर मैं उन देवताओंमें प्रविष्ट हो जाती हूँ और देवविशेषको निमित्त बनाकर सब कार्य सम्पन्न कर देती हूँ॥ १३-१५॥ |
| जले शीतं तथा वह्नावौष्ण्यं ज्योतिर्दिवाकरे।<br>निशानाथे हिमा कामं प्रभवामि यथा तथा॥ १६ | जलमें शीतलता, अग्निमें उष्णता, सूर्यमें प्रकाश और चन्द्रमामें ज्योत्स्नाके रूपमें मैं ही यथेच्छ प्रकट होती हूँ॥ १६॥ |
२६८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मया त्यक्तं विधे नूनं स्पन्दितुं न क्षमं भवेत्।<br>जीवजातं च संसारे निश्चयोऽयं ब्रुवे त्वयि॥ १७<br><br>अशक्तः शङ्करो हन्तुं दैत्यान्किल मयोज्झितः।<br>शक्तिहीनं नरं ब्रूते लोकश्चैवातिदुर्बलम्॥ १८ | हे विधे! इस संसारका कोई भी जीव मुझसे रहित होकर स्पन्दन भी करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। यह मेरा निश्चय है। इसे मैं आपको बता दे रही हूँ। इसी प्रकार यदि मैं शिवको छोड़ दूँ तो वे शक्तिहीन होकर दैत्योंका संहार करनेमें समर्थ नहीं हो सकते। इसीलिये तो संसारमें भी अत्यन्त दुर्बल पुरुषको लोग शक्तिहीन कहते हैं॥ १७-१८॥ |
| रुद्रहीनं विष्णुहीनं न वदन्ति जनाः किल।<br>शक्तिहीनं यथा सर्वे प्रवदन्ति नराधमम्॥ १९<br><br>पतितः स्खलितो भीतः शान्तः शत्रुवशं गतः।<br>अशक्तः प्रोच्यते लोके नारुद्रः कोऽपि कथ्यते॥ २० | लोग अधम मनुष्यको विष्णुहीन या रुद्रहीन नहीं कहते बल्कि उसे शक्तिहीन ही कहते हैं। जो गिर गया हो, स्खलित हो गया हो, भयभीत हो, निश्चेष्ट हो गया हो अथवा शत्रुके वशीभूत हो गया हो—वह संसारमें अरुद्र नहीं कहा जाता, अपितु अशक्त ही कहा जाता है॥ १९-२०॥ |
| तद्विद्धि कारणं शक्तिर्यथा त्वं च सिसृक्षसि।<br>भविता च यदा युक्तः शक्त्या कर्ता तदाखिलम्॥ २१ | [हे ब्रह्मन्!] आप ही जब सृष्टि करना चाहते हैं तब उसमें शक्ति ही कारण है, ऐसा जानिये। जब आप शक्तिसे युक्त होते हैं तभी सृष्टिकर्ता हो पाते हैं॥ २१॥ |
| तथा हरिस्तथा शम्भुस्तथेन्द्रोऽथ विभावसुः।<br>शशी सूर्यो यमस्त्वष्टा वरुणः पवनस्तथा॥ २२ | इसी प्रकार विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, यम, विश्वकर्मा, वरुण और वायुदेवता भी शक्ति-सम्पन्न होकर ही अपना-अपना कार्य सम्पादित करते हैं॥ २२॥ |
| धरा स्थिरा तदा धर्तुं शक्तियुक्ता यदा भवेत्।<br>अन्यथा चेदशक्ता स्यात्परमाणोश्च धारणे॥ २३<br><br>तथा शेषस्तथा कूर्मो येऽन्ये सर्वे च दिग्गजाः।<br>मद्युक्ता वै समर्थाश्च स्वानि कार्याणि साधितुम्॥ २४ | पृथ्वी भी जब शक्तिसे युक्त होती है, तब स्थिर होकर सबको धारण करनेमें समर्थ होती है। यदि वह शक्तिहीन हो जाय तो एक परमाणुको भी धारण करनेमें समर्थ न हो सकेगी। शेषनाग, कच्छप एवं दसों दिग्गज मेरी शक्ति पाकर ही अपने-अपने कार्य सम्पन्न करनेमें समर्थ हो पाते हैं॥ २३-२४॥ |
| जलं पिबामि सकलं संहरामि विभावसुम्।<br>पवनं स्तम्भयाम्यद्य यदिच्छामि तथाचरम्॥ २५ | यदि मैं चाहूँ तो सम्पूर्ण संसारका जल पी जाऊँ, अग्निको नष्ट कर दूँ और वायुकी गति रोक दूँ; मैं जैसा चाहती हूँ, वैसा करती हूँ॥ २५॥ |
| तत्त्वानां चैव सर्वेषां कदापि कमलोद्भव।<br>असतां भावसन्देहः कर्तव्यो न कदाचन॥ २६<br><br>कदाचित्प्रागभावः स्यात्प्रध्वंसाभाव एव वा।<br>मृत्पिण्डेषु कपालेषु घटाभावो यथा तथा॥ २७ | हे कमलोद्भव! सभी तत्त्वोंके अभावका सन्देह अब आप कभी न कीजिये; क्योंकि कभी-कभी किसी वस्तुविशेषका प्रागभाव (जिसका आदि न हो, पर अन्त हो) तथा प्रध्वंसाभाव (जिसका आदि हो, किंतु अन्त न हो) उसी प्रकार हो जाता है, जिस प्रकार मिट्टीके पिण्डोंमें और कपालोंमें घटाभाव प्रतीत होता है॥ २६-२७॥ |
अ० ६ ] तृतीय स्कन्ध २६९
अ० ६ ] तृतीय स्कन्ध २६९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अद्यात्र पृथिवी नास्ति क्व गतेति विचारणे।<br>सञ्जाता इति विज्ञेया अस्यास्तु परमाणवः॥ २८ | आज यहाँ पृथ्वी नहीं है, तब वह कहाँ चली गयी ? इसपर विचार करनेपर वह पृथ्वी परमाणुरूपसे विद्यमान तो है ही—ऐसा जानना चाहिये॥ २८॥ |
| शाश्वतं क्षणिकं शून्यं नित्यानित्यं सकर्तृकम्।<br>अहंकाराग्रिमञ्चैव सप्तभेदैर्विवक्षितम्॥ २९<br>गृहाणाज महत्तत्त्वमहङ्कारस्तदुद्भवः।<br>ततः सर्वाणि भूतानि रचयस्व यथा पुरा॥ ३० | शाश्वत, क्षणिक, शून्य, नित्य, अनित्य, सकर्तृक और अहंकार—इन सात भेदोंमें सृष्टिका वर्णन विवक्षित है। इसलिये हे अज! अब आप उस महत्तत्त्वको ग्रहण कीजिये, जिससे अहंकारकी उत्पत्ति होती है। तत्पश्चात् आप पूर्वकी भाँति समस्त प्राणियोंकी रचना कीजिये॥ २९-३०॥ |
| व्रजन्तु स्वानि धिष्ण्यानि विरच्य निवसन्तु वः।<br>स्वानि स्वानि च कार्याणि कुर्वन्तु दैवभाविताः॥ ३१ | अब आपलोग जाइये तथा अपने-अपने लोकोंकी रचना करके निवास कीजिये और दैवका चिन्तन करते हुए अपने-अपने कार्य कीजिये॥ ३१॥ |
| गृहाणेमां विधे शक्तिं सुरूपां चारुहासिनीम्।<br>महासरस्वतीं नाम्ना रजोगुणयुतां वराम्॥ ३२<br>श्वेताम्बरधरां दिव्यां दिव्यभूषणभूषिताम्।<br>वरासनसमारूढां क्रीडार्थं सहचारिणीम्॥ ३३ | हे विधे! सुन्दर रूपवाली, दिव्य हासवाली, रजोगुणसे युक्त, श्रेष्ठ श्वेत वस्त्र धारण करनेवाली, अलौकिक, दिव्याभूषणोंसे विभूषित, उत्तम आसनपर विराजमान इस महासरस्वती नामक शक्तिको क्रीडाविहारके लिये अपनी सहचरीके रूपमें स्वीकार कीजिये॥ ३२-३३॥ |
| एषा सहचरी नित्यं भविष्यति वराङ्गना।<br>मावमंस्था विभूतिं मे मत्वा पूज्यतमां प्रियाम्॥ ३४<br>गच्छ त्वमनया सार्धं सत्यलोकं बताशु वै।<br>बीजाच्चतुर्विधं सर्वं समुत्पादय साम्प्रतम्॥ ३५ | यह सुन्दरी सदा आपकी सहचरी बनकर रहेगी। इस पूज्यतम प्रेयसीको मेरी विभूति समझकर कभी भी इसका तिरस्कार न कीजियेगा। अब आप शीघ्र ही इसे साथ लेकर सत्यलोकमें प्रस्थान करें और तत्त्वबीजसे चार प्रकारकी समस्त सृष्टि करनेमें तत्पर हो जायँ॥ ३४-३५॥ |
| लिङ्गकोशाश्च जीवैस्तैः सहिताः कर्मभिस्तथा।<br>वर्तन्ते संस्थिताः काले तान्कुरु त्वं यथा पुरा॥ ३६<br>कालकर्मस्वभावाख्यैः कारणैः सकलं जगत्।<br>स्वभावस्वगुणैर्युक्तं पूर्ववत्सचराचरम्॥ ३७ | समस्त जीवों और कर्मोंके साथ जो लिंगकोश हैं, उन्हें पूर्वकी भाँति आप प्रतिष्ठित कर दें। काल, कर्म और स्वभाव नामवाले—इन कारणोंसे समस्त चराचर सृष्टिको पूर्वकी भाँति अपने-अपने स्वभाव और गुणोंसे युक्त कर दीजिये॥ ३६-३७॥ |
| माननीयस्त्वया विष्णुः पूजनीयश्च सर्वदा।<br>सत्त्वगुणप्रधानत्वादधिकः सर्वतः सदा॥ ३८ | विष्णु आपके सदा माननीय और पूजनीय हैं; क्योंकि सत्त्वगुणकी प्रधानताके कारण वे सर्वदा सब प्रकारसे श्रेष्ठ हैं॥ ३८॥ |
| यदा यदा हि कार्यं वो भविष्यति दुरत्ययम्।<br>करिष्यति पृथिव्यां वै अवतारं तदा हरिः॥ ३९ | जब-जब आपलोगोंका कोई कठिन कार्य उपस्थित होगा, उस समय भगवान् श्रीहरि पृथ्वीपर अवतार ग्रहण करेंगे॥ ३९॥ |
| तिर्यग्योनावथान्यात्र मानुषीं तनुमाश्रितः।<br>दानवानां विनाशं वै करिष्यति जनार्दनः॥ ४० | कहीं तिर्यक्-योनिमें तथा कहीं मानवयोनिमें शरीर धारण करके ये भगवान् जनार्दन दानवोंका अवश्य विनाश करेंगे॥ ४०॥ |
| २७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भवोऽयं ते सहायश्च भविष्यति महाबलः।<br>समुत्पाद्य सुरान्सर्वान्विहरस्व यथासुखम्॥ ४१ | ये महाबली शंकरजी भी आपकी सहायता करेंगे। अब आप समस्त देवताओंका सृजन करके स्वेच्छया सुखपूर्वक विहार कीजिये॥ ४१॥ |
| ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या नानायज्ञैः सदक्षिणैः।<br>यजिष्यन्ति विधानेन सर्वान्वः सुसमाहिताः॥ ४२ | ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यलोग दक्षिणायुक्त नानाविध यज्ञोंसे विधिपूर्वक पूर्ण मनोयोगके साथ आप सबकी पूजा करेंगे॥ ४२॥ |
| मन्नामोच्चारणात्सर्वे मखेषु सकलेषु च।<br>सदा तृप्ताश्च सन्तुष्टा भविष्यध्वं सुराः किल॥ ४३ | हे देवो! सभी यज्ञोंमें मेरे नामका उच्चारण करते ही आप सभी लोग निश्चितरूपसे सदैव तृप्त एवं सन्तुष्ट हो जायँगे॥ ४३॥ |
| शिवश्च माननीयो वै सर्वथा यत्ततोगुणः।<br>यज्ञकार्येषु सर्वेषु पूजनीयः प्रयत्नतः॥ ४४ | आपलोग तमोगुणसम्पन्न शंकरजीका सब प्रकारसे सम्मान कीजियेगा और सभी यज्ञकार्योंमें प्रयत्नपूर्वक उनकी पूजा कीजियेगा॥ ४४॥ |
| यदा पुनः सुराणां वै भयं दैत्याद्भविष्यति।<br>शक्तयो मे तदोत्पन्ना हरिष्यन्ति सुविग्रहाः॥ ४५<br><br>वाराही वैष्णवी गौरी नारसिंही सदाशिवा।<br>एताश्चान्याश्च कार्याणि कुरु त्वं कमलोद्भव॥ ४६ | जब कभी भी देवताओंके समक्ष दैत्योंसे भय उत्पन्न होगा, उस समय सुन्दर रूपोंवाली वाराही, वैष्णवी, गौरी, नारसिंही, सदाशिवा तथा अन्य देवियोंके रूपमें मेरी शक्तियाँ प्रकट होकर उनका भय दूर कर देंगी। अतः हे कमलोद्भव! अब आप अपने कार्य करें॥ ४५-४६॥ |
| नवाक्षरमिमं मन्त्रं बीजध्यानयुतं सदा।<br>जपन्सर्वाणि कार्याणि कुरु त्वं कमलोद्भव॥ ४७ | हे कमलोद्भव! बीज तथा ध्यानसे युक्त मेरे इस नवाक्षर मन्त्रका जप करते हुए आप समस्त कार्य कीजिये॥ ४७॥ |
| मन्त्राणामुत्तमोऽयं वै त्वं जानीहि महामते।<br>हृदये ते सदा धार्यः सर्वकामार्थसिद्धये॥ ४८ | हे महामते! आप इस मन्त्रको सभी मन्त्रोंसे श्रेष्ठ जानिये। सभी मनोरथोंकी सिद्धिके लिये आपको इस मन्त्रको सदा अपने हृदयमें धारण करना चाहिये॥ ४८॥ |
| इत्युक्त्वा मां जगन्माता हरिं प्राह शुचिस्मिता।<br>विष्णो व्रज गृहाणेमां महालक्ष्मीं मनोहराम्॥ ४९ | मुझसे ऐसा कहकर पवित्र मुसकानवाली जगज्जननीने भगवान् विष्णुसे कहा—हे विष्णो! अब आप इन मनोहर महालक्ष्मीको स्वीकार कीजिये और यहाँसे प्रस्थान कीजिये॥ ४९॥ |
| सदा वक्षःस्थले स्थाने भविता नात्र संशयः।<br>क्रीडार्थं ते मया दत्ता शक्तिः सर्वार्थदा शिवा॥ ५० | ये आपके वक्षःस्थलमें सदा निवास करेंगी, इसमें सन्देह नहीं है। आपके लीलाविनोदके लिये मैंने आपको यह सभी मनोरथ प्रदान करनेवाली कल्याणमयी शक्ति अर्पित की है॥ ५०॥ |
| त्वयेयं नावमन्तव्या माननीया च सर्वदा।<br>लक्ष्मीनारायणाख्योऽयं योगो वै विहितो मया॥ ५१ | आप इनका सर्वदा सम्मान करते रहियेगा और कभी भी तिरस्कार न कीजियेगा। लक्ष्मीनारायण नामक यह संयोग मेरे द्वारा ही रचा गया है॥ ५१॥ |
| अ० ६ ] | तृतीय स्कन्ध | २७१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| जीवनार्थं कृता यज्ञा देवानां सर्वथा मया।<br>अविरोधेन सङ्गेन वर्तितव्यं त्रिभिः सदा॥ ५२ | मैंने देवताओंकी जीविकाके लिये ही यज्ञोंकी रचना की है। आप तीनों विरोधभावनासे रहित होकर व्यवहार कीजिये॥ ५२॥ |
| त्वं च वेधाः शिवस्त्वेते देवा मद्गुणसम्भवाः।<br>मान्याः पूज्याश्च सर्वेषां भविष्यन्ति न संशयः॥ ५३ | आप (विष्णु), ब्रह्मा, शिव तथा ये सभी देवता मेरे ही प्रभावसे प्रादुर्भूत हुए हैं। अतएव निस्सन्देह आपलोग सभी प्राणियोंके मान्य एवं पूज्य होंगे॥ ५३॥ |
| ये विभेदं करिष्यन्ति मानवा मूढचेतसः।<br>निरयं ते गमिष्यन्ति विभेदान्नात्र संशयः॥ ५४ | जो अज्ञानी मनुष्य इनमें भेदभाव करेंगे, वे इस विभेदके कारण नरकमें पड़ेंगे। इसमें सन्देह नहीं है॥ ५४॥ |
| यो हरिः स शिवः साक्षाद्यः शिवः स स्वयं हरिः।<br>एतयोर्भेदमातिष्ठन्नरकाय भवेन्नरः॥ ५५ | जो विष्णु हैं, वे ही साक्षात् शिव हैं और जो शिव हैं, वे ही स्वयं विष्णु हैं। इन दोनोंमें भेद रखनेवाला मनुष्य नरकगामी होता है॥ ५५॥ |
| तथैव द्रुहिणो ज्ञेयो नात्र कार्या विचारणा।<br>अपरो गुणभेदोऽस्ति शृणु विष्णो ब्रवीमि ते॥ ५६ | ब्रह्माजीके सम्बन्धमें भी ऐसा ही जानिये; इसमें कोई सन्देह नहीं है। हे विष्णो! गुणोंके कारण इनमें जो भेद हैं; उन्हें आपको बता रही हूँ, आप सुनें॥ ५६॥ |
| मुख्यः सत्त्वगुणस्तेऽस्तु परमात्मविचिन्तने।<br>गौणत्वेऽपि परौ ख्यातौ रजोगुणतमोगुणौ॥ ५७<br><br>लक्ष्म्या सह विकारेषु नानाभेदेषु सर्वदा।<br>रजोगुणयुतो भूत्वा विहरस्वानया सह॥ ५८ | परमात्म-चिन्तनकी दृष्टिसे आपका मुख्य गुण सत्त्वगुण है। दूसरे रजोगुण तथा तमोगुण आपके लिये गौण हैं। अतएव विभिन्न भेदयुक्त विकारोंमें रजोगुणसे सम्पन्न होकर आप इन लक्ष्मीके साथ विहार कीजिये॥ ५७-५८॥ |
| वाग्बीजं कामराजं च मायाबीजं तृतीयकम्।<br>मन्त्रोऽयं त्वं रमाकान्त मद्दत्तः परमार्थदः॥ ५९<br><br>गृहीत्वा जप तं नित्यं विहरस्व यथासुखम्।<br>न ते मृत्युभयं विष्णो न कालप्रभवं भयम्॥ ६० | हे लक्ष्मीकान्त! मेरे द्वारा आपको दिया गया वाग्बीज (ऐं), कामराज (क्लीं) तथा तृतीय मायाबीज (ह्रीं) इनसे युक्त यह मन्त्र परमार्थ प्रदान करनेवाला है। आप इसे ग्रहण करके निरन्तर इसका जप कीजिये तथा सुखपूर्वक विहार कीजिये। हे विष्णो! ऐसा करनेसे आपको न तो मृत्युभय होगा और न कालजनित भय ही होगा॥ ५९-६०॥ |
| यावदेष विहारो मे भविष्यति सुनिश्चितः।<br>संहरिष्याम्यहं सर्वं यदा विश्वं चराचरम्॥ ६१<br><br>भवन्तोऽपि तदा नूनं मयि लीना भविष्यथ।<br>स्मर्तव्योऽयं सदा मन्त्रः कामदो मोक्षदस्तथा॥ ६२ | जबतक मैं विहार करती रहूँगी, तबतक यह सृष्टि निश्चितरूपसे रहेगी और जब मैं सम्पूर्ण चराचर जगत्का संहार कर दूँगी, उस समय आपलोग भी मुझमें समाहित हो जायँगे। आपलोग समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले तथा मोक्ष प्रदान करनेवाले इस मन्त्रका अनवरत स्मरण करते रहें॥ ६१-६२॥ |
| उद्गीथेन च संयुक्तः कर्तव्यः शुभमिच्छता।<br>कारयित्वाथ वैकुण्ठं वस्तव्यं पुरुषोत्तम॥ ६३<br><br>विहरस्व यथाकामं चिन्तयन्मां सनातनीम्। | अपना कल्याण चाहनेवाले व्यक्तिको इस मन्त्रके साथ 'ओंकार' जोड़कर चतुरक्षर मन्त्रका जप करना चाहिये। हे पुरुषोत्तम! अब आप वैकुण्ठका निर्माण कराकर उसीमें निवास कीजिये और मुझ सनातनीका सतत ध्यान करते हुए इच्छापूर्वक विहार कीजिये॥ ६३ ½ ॥ |
| २७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्त्वा वासुदेवं सा त्रिगुणा प्रकृतिः परा ॥ ६४<br>निर्गुणा शङ्करं देवमवोचदमृतं वचः । | ब्रह्माजी बोले—[हे नारद!] विष्णुसे ऐसा कहकर उस त्रिगुणात्मिका तथा निर्गुणा परा प्रकृतिने देवाधिदेव शंकरसे अमृतमय वचन कहा ॥ ६४ १/२ ॥ |
| देव्युवाच<br>गृहाण हर गौरीं त्वं महाकालीं मनोहराम् ॥ ६५<br>कैलासं कारयित्वा च विहरस्व यथासुखम्।<br>मुख्यस्तमोगुणस्तेऽस्तु गौणौ सत्त्वरजोगुणौ ॥ ६६ | **देवी बोलीं—**हे हर ! आप इन मनोहरा महाकाली गौरीको अंगीकार कीजिये और कैलासशिखरकी रचना कराकर वहाँ सुखपूर्वक विहार कीजिये। तमोगुण आपमें प्रधानगुणके रूपमें विद्यमान रहेगा और सत्त्वगुण तथा रजोगुण आपमें गौणरूपसे व्याप्त रहेंगे ॥ ६५-६६ ॥ |
| विहरासुरनाशार्थं रजोगुणतमोगुणौ।<br>तपस्तप्तं तथा कर्तुं स्मरणं परमात्मनः ॥ ६७<br>शर्व सत्त्वगुणः शान्तो गृहीतव्यः सदानघ।<br>सर्वथा त्रिगुणा यूयं सृष्टिस्थित्यन्तकारकाः ॥ ६८ | रजोगुण और तमोगुणके द्वारा दैत्योंके विनाशके लिये आप वहाँ विहार करें और हे शर्व ! परमात्माका स्मरण-ध्यान करनेके लिये आप तप कर चुके हैं। आप शान्तिप्रधान सत्त्वगुणका अवलम्बन कीजिये। हे अनघ ! त्रिगुणात्मक आप तीनों देवता सृष्टि, पालन एवं संहार करनेवाले हैं ॥ ६७-६८ ॥ |
| एभिर्विहीनं संसारे वस्तु नैवात्र कुत्रचित्।<br>वस्तुमात्रं तु यद् दृश्यं संसारे त्रिगुणं हि तत् ॥ ६९ | संसारमें कहीं भी कोई भी वस्तु इन तीनों गुणोंसे रहित नहीं है। जगत्की जितनी भी दृश्य वस्तुएँ हैं, वे सब त्रिगुणात्मिका हैं ॥ ६९ ॥ |
| दृश्यं च निर्गुणं लोके न भूतं नो भविष्यति।<br>निर्गुणः परमात्मासौ न तु दृश्यः कदाचन ॥ ७० | इस संसारमें ऐसी कोई भी दृश्य वस्तु गुणरहित न तो हुई और न होगी। निर्गुण तो एकमात्र वह परमात्मा ही है और वह कभी दृष्टिगोचर नहीं होता ॥ ७० ॥ |
| सगुणा निर्गुणा चाहं समये शङ्करोत्तमा।<br>सदाहं कारणं शम्भो न च कार्यं कदाचन ॥ ७१ | हे शंकर ! समय आनेपर मैं श्रेष्ठरूपा ही वह सगुणा या निर्गुणा हो जाती हूँ। हे शम्भो ! मैं सर्वदा कारण हूँ, कार्य कभी नहीं ॥ ७१ ॥ |
| सगुणा कारणत्वाद्धै निर्गुणा पुरुषान्तिकै।<br>महत्तत्त्वमहङ्कारो गुणाः शब्दादयस्तथा ॥ ७२<br>कार्यकारणरूपेण संसरन्ते त्वहर्निशम्।<br>सदुद्भूतस्त्वहङ्कारस्तेनाहं कारणं शिवा ॥ ७३ | किसी कारणविशेषसे मैं सगुणा होती हूँ तो उस परमपुरुषके सांनिध्यमें निर्गुणा रहती हूँ। महत्तत्त्व, अहंकार, तीनों गुण और शब्द आदि विषय कार्यकारणभावसे निरन्तर गतिशील रहते हैं। सत्से अहंकार उत्पन्न होता है; इसीलिये मैं शिवा सबका कारण हूँ ॥ ७२-७३ ॥ |
| अहङ्कारश्च मे कार्यं त्रिगुणोऽसौ प्रतिष्ठितः।<br>अहङ्कारान्महत्तत्त्वं बुद्धिः सा परिकीर्तिता ॥ ७४ | अहंकार मेरा कार्य है और वह त्रिगुणात्मक रूपमें प्रतिष्ठित है। उस अहंकारसे महत्तत्त्व उत्पन्न होता है; उसीको बुद्धि कहा गया है ॥ ७४ ॥ |
| महत्तत्त्वं हि कार्यं स्यादहङ्कारो हि कारणम्।<br>तन्मात्राणि त्वहङ्कारादुत्पद्यन्ते सदैव हि ॥ ७५ | वह महत्तत्त्व कार्य है तथा अहंकार उसका कारण है। इसी अहंकारसे तन्मात्राओंकी सदा |
| अ० ६ ] | तृतीय स्कन्ध | २७३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कारणं पञ्चभूतानां तानि सर्वसमुद्भवे।<br>कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि च॥ ७६<br><br>महाभूतानि पञ्चैव मनः षोडशमेव च।<br>कार्यञ्च कारणञ्चैव गणोऽयं षोडशात्मकः॥ ७७ | उत्पत्ति होती है। वे तन्मात्राएँ [पृथ्वी, जल आदि] पंचमहाभूतोंका कारण हैं। सबके सृजनमें पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच महाभूत और सोलहवाँ मन—यह षोडशात्मक समूह कार्य और कारणरूप होता है॥ ७५–७७॥ |
| परमात्मा पुमानाद्यो न कार्यं न च कारणम्।<br>एवं समुद्भवः शम्भो सर्वेषामादिसम्भवे॥ ७८ | वह आदिपुरुष परमात्मा न कार्य है और न कारण। हे शिव! सबकी प्रारम्भिक सृष्टिके उत्पत्तिका यही क्रम है॥ ७८॥ |
| संक्षेपेण मया प्रोक्तस्तव तत्र समुद्भवः।<br>व्रजन्त्वद्य विमानेन कार्यार्थं मम सत्तमाः॥ ७९ | अभी मैंने आपलोगोंकी यह उत्पत्ति-परम्परा संक्षेपमें कही। इसलिये हे श्रेष्ठदेव! अब आपलोग मेरा कार्य सम्पन्न करनेके लिये इस विमानसे प्रस्थान करें॥ ७९॥ |
| स्मरणाद्दर्शनं तुभ्यं दास्येऽहं विषमे स्थिते।<br>स्मर्त्तव्याहं सदा देवाः परमात्मा सनातनः॥ ८०<br><br>उभयोः स्मरणादेव कार्यसिद्धिरसंशयम्। | जब आपलोगोंपर कोई संकट आयेगा, तब मैं स्मरणमात्रसे तत्काल आपलोगोंको दर्शन दूँगी। अतः हे देवो! आपलोग सर्वदा मेरा तथा सनातन परमात्माका स्मरण करते रहें। हम दोनोंके स्मरणसे ही निःसन्देह आपलोगोंकी कार्यसिद्धि होगी॥ ८० १/२॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>इत्युक्त्वा विससर्जास्मान्दत्त्वा शक्तीः सुसंस्कृताः॥ ८१<br>विष्णोवेऽथ महालक्ष्मीं महाकालीं शिवाय च।<br><br>महासरस्वतीं मह्यं स्थानात्तस्माद्विसर्जिताः॥ ८२ | ब्रह्माजी बोले—हे नारद! ऐसा कहकर भगवतीने अपनी अद्भुत शक्तियाँ प्रदानकर हमें विदा किया। विष्णुको महालक्ष्मी, शिवको महाकाली और मुझे महासरस्वती प्रदान करके उस स्थानसे विदा कर दिया॥ ८१-८२॥ |
| स्थलान्तरं समासाद्य ते जाताः पुरुषा वयम्।<br>चिन्तयन्तः स्वरूपं तत्प्रभावं परमाद्भुतम्॥ ८३ | उनके स्वरूप तथा अत्यन्त अद्भुत प्रभावका स्मरण करते हुए अन्य स्थानपर पहुँचकर हमलोग पुनः पुरुषरूपमें हो गये॥ ८३॥ |
| विमानं तत्समासाद्य संरूढास्तत्र वै त्रयः।<br>न द्वीपोऽसौ न सा देवी सुधासिन्धुस्तथैव च।<br>पुनर्दृष्टं विमानं वै तत्रास्माभिर्न चान्यथा॥ ८४ | तब लौटकर हम तीनों पुनः उसी विमानमें बैठ गये। [हमने देखा कि] वहाँ न तो वह मणिद्वीप है, न वे महामाया हैं और न वह सुधासागर है। उस समय वहाँ उस विमानके अतिरिक्त और कुछ दृष्टिगोचर नहीं होता था॥ ८४॥ |
| आसाद्य तस्मिन्वितते विमाने<br>प्राप्ता वयं पङ्कजसन्निधौ च।<br>महार्णवे यत्र हतौ दुरत्ययौ<br>मुरारिणा तौ मधुकैटभाख्यौ॥ ८५ | उस विशाल विमानमें बैठकर हम तीनों पुनः उसी महासागरमें विद्यमान उस कमलके निकट पहुँचे, जहाँ भगवान् विष्णुने मधु-कैटभ नामक दुर्धर्ष दैत्योंका वध किया था॥ ८५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
ब्रह्मणे श्रीदेव्या उपदेशवर्णनं नाम षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥
अथ सप्तमोऽध्यायः
| २७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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अथ सप्तमोऽध्यायः
ब्रह्माजीके द्वारा परमात्माके स्थूल और सूक्ष्म स्वरूपका वर्णन; सात्त्विक, राजस और तामस शक्तिका वर्णन; पंचतन्मात्राओं, ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों तथा पंचीकरण-क्रियाद्वारा सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन
| ब्रहोवाच<br>एवंप्रभावा सा देवी मया दृष्टाथ विष्णुना।<br>शिवेनापि महाभाग तास्ता देव्यः पृथक्पृथक् ॥ १ | ब्रह्माजी बोले—हे महाभाग! [नारद!] मैंने, विष्णु तथा शंकरने इस प्रकारके प्रभाववाली उन देवीको तथा अन्य सभी देवियोंको पृथक्-पृथक् देखा॥ १ ॥ |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>इत्याकर्ण्य पितुर्वाक्यं नारदो मुनिसत्तमः।<br>पप्रच्छ परमप्रीतः प्रजापतिमिदं वचः॥ २ | व्यासजी बोले—पिताका यह वचन सुनकर मुनिवर नारदने परम प्रसन्न होकर प्रजापति ब्रह्माजीसे यह बात पूछी॥ २ ॥ |
| नारद उवाच<br>पुमानाद्योऽविनाशी यो निर्गुणोऽच्युतिरव्ययः।<br>दृष्टश्चैवानुभूतश्च तद्वदस्व पितामह॥ ३ | नारदजी बोले—हे पितामह! आपने जिन आदि, अविनाशी, निर्गुण, अच्युत तथा अव्यय परमपुरुषका दर्शन तथा अनुभव किया, उनके विषयमें बताइये॥ ३ ॥ |
| त्रिगुणा वीक्षिता शक्तिर्निर्गुणा कीदृशी पितः।<br>तस्याः स्वरूपं मे ब्रूहि पुरुषस्य च पद्मज॥ ४ | हे पिताजी! आपने त्रिगुणसम्पन्ना देवीका दर्शन तो कर लिया है; निर्गुणा शक्ति कैसी होती हैं? हे कमलोद्भव! अब आप मुझे उन शक्तिका तथा परमपुरुषका स्वरूप बताइये॥ ४ ॥ |
| यदर्थञ्च मया तप्तं श्वेतद्वीपे महातपः।<br>दृष्टाः सिद्धा महात्मानस्तापसा गतमन्यवः॥ ५<br><br>परमात्मा न सम्प्राप्तो मयासौ दृष्टिगोचरः।<br>पुनः पुनस्तपस्तीव्रं कृतं तत्र प्रजापते॥ ६ | जिनके लिये मैंने श्वेतद्वीपमें महान् तपश्चर्या की और क्रोधशून्य सिद्धपुरुषों, महात्माओं तथा तपस्वियोंके दर्शन किये; वे परमात्मा मुझे दृष्टिगोचर नहीं हुए। हे प्रजापते! इसके बाद भी [उनके दर्शनार्थ] मैंने वहाँ बार-बार घोर तपस्या की॥ ५-६ ॥ |
| भवता सगुणा शक्तिर्दृष्टा तात मनोरमा।<br>निर्गुणा निर्गुणश्चैव कीदृशौ तौ वदस्व मे॥ ७ | हे तात! आपने मनोरमा सगुणा शक्तिका दर्शन किया है। आप मुझे बताइये कि निर्गुणा शक्ति और निर्गुण परमात्मा कैसे हैं?॥ ७ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति पृष्टः पिता तेन नारदेन प्रजापतिः।<br>उवाच वचनं तथ्यं स्मितपूर्वं पितामहः॥ ८ | व्यासजी बोले—नारदजीने अपने पिता प्रजापति ब्रह्मासे ऐसा पूछा, तब उन पितामहने मुसकराते हुए रहस्यपूर्ण वचन कहा॥ ८ ॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>निर्गुणस्य मुने रूपं न भवेद् दृष्टिगोचरम्।<br>दृश्यञ्च नश्वरं यस्मादरूपं दृश्यते कथम्॥ ९ | ब्रह्माजी बोले—हे मुने! निर्गुणतत्त्वका रूप दृष्टिगोचर नहीं हो सकता; क्योंकि जो दिखायी पड़ता है, वह तो नाशवान् होता है। जो रूपरहित है, वह दृष्टिगोचर कैसे हो सकता है?॥ ९ ॥ |
| अ० ७ ] | तृतीय स्कन्ध | २७५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निर्गुणा दुर्गमा शक्तिर्निर्गुणश्च तथा पुमान्।<br>ज्ञानगम्यौ मुनीनां तु भावनीयौ तथा पुनः॥ १० | निर्गुणा शक्तिको जान पाना अत्यन्त दुरूह है और उसी प्रकार निर्गुण परमपुरुषका साक्षात्कार भी अति दुष्कर है। ये दोनों केवल मुनिजनोंके द्वारा ज्ञानसे प्राप्त तथा अनुभूत किये जा सकते हैं॥ १०॥ |
| अनादिनिधनौ विद्धि सदा प्रकृतिपूरुषौ।<br>विश्वासेनाभिगम्यौ तौ नाविश्वासेन कर्हिचित्॥ ११ | आप प्रकृति तथा पुरुष दोनोंको आदि-अन्तसे सर्वदा रहित जानिये। ये दोनों विश्वाससे जाने जा सकते हैं; अविश्वाससे कभी नहीं॥ ११॥ |
| चैतन्यं सर्वभूतेषु यत्तद्विद्धि परात्मकम्।<br>तेजः सर्वत्रगं नित्यं नानाभावेषु नारद॥ १२ | हे नारद! सभी प्राणियोंमें जो चैतन्य विद्यमान है, उसे ही परमात्मस्वरूप जानो। तेजःस्वरूप वे परमात्मा सर्वत्र व्याप्त हैं तथा सदा विराजमान हैं॥ १२॥ |
| तञ्च ताञ्च महाभाग व्यापकौ विद्धि सर्वगौ।<br>ताभ्यां विहीनं संसारे न किञ्चिद्वस्तु विद्यते॥ १३ | हे महाभाग! उन परमपुरुष तथा प्रकृतिको सर्वव्यापी तथा सर्वगामी समझिये। इस संसारमें कोई भी पदार्थ उन दोनोंसे रहित नहीं है॥ १३॥ |
| तौ विचिन्त्यौ सदा देहे मिश्रीभूतौ सदाव्ययौ।<br>एकरूपौ चिदात्मानौ निर्गुणौ निर्मलावुभौ॥ १४ | सर्वदा अव्यय, एकरूप, चिदात्मा, निर्गुण तथा निर्मल—उन दोनों (प्रकृति-पुरुष)-को एक ही शरीरमें सम्मिश्रित मानकर सदा इनका चिन्तन करना चाहिये॥ १४॥ |
| या शक्तिः परमात्मासौ योऽसौ सा परमा मता।<br>अन्तरं नैतयोः कोऽपि सूक्ष्मं वेद च नारद॥ १५ | हे नारद! जो शक्ति हैं, वे ही परमात्मा हैं और जो परमात्मा हैं, वे ही परमशक्ति मानी गयी हैं। इन दोनोंमें विद्यमान सूक्ष्म अन्तरको कोई भी नहीं जान सकता॥ १५॥ |
| अधीत्य सर्वशास्त्राणि वेदान्साङ्गांश्च नारद।<br>न जानाति तयोः सूक्ष्ममन्तरं विरतिं विना॥ १६ | हे नारद! कोई भी व्यक्ति समस्त शास्त्रों तथा अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन करके भी विरक्तिके बिना उन दोनोंके सूक्ष्म अन्तरको नहीं जान पाता है॥ १६॥ |
| अहङ्कारकृतं सर्वं विश्वं स्थावरजङ्गमम्।<br>कथं तद्रहितं पुत्र भवेत्कल्पशतैरपि॥ १७ | हे पुत्र! जड-चेतनरूप यह सारा जगत् अहंकारसे निर्मित है; ऐसी स्थितिमें सैकड़ों कल्पोंमें भी यह अहंकारसे रहित कैसे हो सकता है?॥ १७॥ |
| निर्गुणं सगुणः पुत्र कथं पश्यति चक्षुषा।<br>सगुणं च महाबुद्धे चेतसा संविचारय॥ १८ | हे पुत्र! सगुण मनुष्य निर्गुणको नेत्रसे कैसे देख सकता है? अतः हे महाबुद्धे! उन परमात्माके सगुण रूपका मनसे सम्यक् ध्यान करते रहो॥ १८॥ |
| पित्तेनाच्छादिता जिह्वा चक्षुश्च मुनिसत्तम।<br>कटु पित्तं विजानाति रसं रूपं न तत्तथा॥ १९ | हे मुनिश्रेष्ठ! पित्तसे आच्छादित जिह्वा जिस प्रकार यथार्थ रसका अनुभव न करके केवल कटुरसका अनुभव करती है तथा पित्ताच्छादित नेत्र यथार्थ रूप न देखकर केवल पीले रंगको ही देखता है, उसी प्रकार |
| गुणैः समावृतं चेतः कथं जानाति निर्गुणम्।<br>अहङ्कारोद्भवं तच्च तद्विहीनं कथं भवेत्॥ २० | गुणोंसे आच्छादित मन उस निर्गुण परमात्माको कैसे जान पायेगा? क्योंकि मन भी तो अहंकारसे उत्पन्न हुआ है, तब वह मन अहंकारसे रहित कैसे |
| २७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यावन्न गुणविच्छेदस्तावत्तद्दर्शनं कुतः।<br>तं पश्यति तदा चित्ते यदाहङ्कारवर्जितः॥ २१ | हो सकता है ? जबतक अन्तःकरण गुणोंसे रहित नहीं होता तबतक परमात्माका दर्शन कैसे सम्भव है ? जब मनुष्य अहंकारविहीन हो जाता है, तब वह अपने हृदयमें उनका साक्षात्कार कर लेता है॥ १९—२१॥ |
| नारद उवाच<br>स्वरूपं देवदेवेश त्रयाणामेव विस्तरात्।<br>गुणानां यत्स्वरूपोऽस्ति ह्यहङ्कारस्त्रिरूपकः॥ २२<br>सात्त्विको राजसश्चैव तामसश्च तथापरः।<br>विभेदेन स्वरूपाणि वदस्व पुरुषोत्तम॥ २३<br>यज्ज्ञात्वा विप्रमुच्येऽहं ज्ञानं तद्वद मे प्रभो।<br>गुणानां लक्षणान्येव विततानि विभागशः॥ २४ | **नारदजी बोले—**हे देवदेवेश! तीनों गुणोंका जो स्वरूप है, उसका विस्तारपूर्वक विवेचन कीजिये और त्रिगुणात्मक अहंकारके स्वरूपका भी वर्णन कीजिये। हे पुरुषोत्तम! सात्त्विक, राजस तथा तीसरे तामस अहंकारके स्वरूप-भेदको बताइये। इस प्रकार गुणोंके विस्तृत लक्षणोंको विभागपूर्वक मुझको बताइये। हे प्रभो! मुझे ऐसा ज्ञान दीजिये जिसे जानकर मैं पूर्णरूपेण मुक्त हो जाऊँ॥ २२—२४॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>त्रयाणां शक्तयस्तिस्रस्तद् ब्रवीमि तवानघ।<br>ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिरर्थशक्तिस्तथापरा॥ २५ | **ब्रह्माजी बोले—**हे निष्पाप! इस त्रिविध अहंकारकी तीन शक्तियाँ हैं, मैं उन्हें बताता हूँ। वे हैं—ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति तथा तीसरी अर्थशक्ति॥ २५॥ |
| सात्त्विकस्य ज्ञानशक्ती राजसस्य क्रियात्मिका।<br>द्रव्यशक्तिस्तामसस्य तिस्रश्च कथितास्तव॥ २६ | उनमें सात्त्विक अहंकारकी ज्ञानशक्ति, राजसकी क्रियाशक्ति और तामसकी द्रव्यशक्ति—ये तीन शक्तियाँ आपको बता दीं॥ २६॥ |
| तेषां कार्याणि वक्ष्यामि शृणु नारद तत्त्वतः।<br>तामस्या द्रव्यशक्तेश्च शब्दस्पर्शसमुद्भवः॥ २७<br>रूपं रसश्च गन्धश्च तन्मात्राणि प्रचक्षते।<br>शब्दैकगुणमाकाशं वायुः स्पर्शगुणस्तथा॥ २८<br>सुरूपैकगुणोऽग्निश्च जलं रसगुणात्मकम्।<br>पृथ्वी गन्धगुणा ज्ञेया सूक्ष्माण्येतानि नारद॥ २९ | हे नारद! अब मैं उनके कार्योंको सम्यक् रूपसे बताऊँगा, सुनिये। तामसी द्रव्यशक्ति (अर्थशक्ति)-से उत्पन्न शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—ये तन्मात्राएँ कही गयी हैं। आकाशका एकमात्र गुण शब्द, वायुका गुण स्पर्श, अग्निका गुण रूप, जलका गुण रस तथा पृथ्वीका गुण गन्ध है—ऐसा जानना चाहिये। हे नारद! ये तन्मात्राएँ अत्यन्त सूक्ष्म हैं॥ २७—२९॥ |
| दशैतानि मिलित्वा तु द्रव्यशक्तियुतानि वै।<br>तामसाहङ्कारजः स्यात्सर्गस्तदनुवृत्तिकः॥ ३० | द्रव्यशक्तिसे युक्त इन दसों (पाँच तन्मात्राओं तथा उनके पाँच गुणों)-से मिलकर तामस अहंकारकी अनुवृत्तिसे सृष्टिकी रचना होती है॥ ३०॥ |
| राजस्याश्च क्रियाशक्तेरुत्पन्नानि शृणुष्व मे।<br>श्रोत्रं त्वग्रसना चक्षुर्घाणं चैव च पञ्चमम्॥ ३१<br>ज्ञानेन्द्रियाणि चैतानि तथा कर्मेन्द्रियाणि च।<br>वाक्पाणिपादपायुश्च गुह्यान्तानि च पञ्च वै॥ ३२<br>प्राणोऽपानश्च व्यानश्च समानोदानवायवः।<br>पञ्चदश मिलित्वैव राजसः सर्ग उच्यते॥ ३३<br>साधनानि किलैतानि क्रियाशक्तिमयानि च।<br>उपादानं किलैतेषां चिदनुवृत्तिरुच्यते॥ ३४ | अब राजसी क्रियाशक्तिसे उत्पन्न होनेवाली इन्द्रियोंके विषयमें मुझसे सुनिये। श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा वाणी, हाथ, पैर, गुदा और गुह्यांग—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ उससे उत्पन्न हैं। प्राण, अपान, व्यान, समान तथा उदान—ये पाँच वायु होती हैं। इन पन्द्रह (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच वायु)-से मिलकर होनेवाली सृष्टि राजसी सृष्टि कही जाती है। ये सभी साधन क्रियाशक्तिसे सदा युक्त रहते हैं और इनके उपादानकारणको चित्-अनुवृत्ति कहा जाता है॥ ३१—३४॥ |
| अ० ७ ] | तृतीय स्कन्ध | २७७ |
|---|
| ज्ञानशक्तिसमायुक्ताः सात्त्विकाच्च समुद्भवाः ।<br>दिशो वायुश्च सूर्यश्च वरुणश्चाश्विनावपि ॥ ३५<br><br>ज्ञानेन्द्रियाणां पञ्चानां पञ्चाधिष्ठातृदेवताः ।<br>चन्द्रो ब्रह्मा तथा रुद्रः क्षेत्रज्ञश्च चतुर्थकः ॥ ३६<br><br>इत्यन्तःकरणाख्यस्य बुद्ध्यादेश्चाधिदैवतम् ।<br>चत्वार्यैव तथा प्रोक्ताः किलाधिष्ठातृदेवताः ॥ ३७<br><br>मनसा सह चैतानि नूनं पञ्चदशैव तु ।<br>सात्त्विकस्य तु सर्गोऽयं सात्त्विकाख्यः प्रकीर्तितः ॥ ३८ | दिशाएँ, वायु, सूर्य, वरुण और दोनों अश्विनीकुमार ज्ञानशक्तिसे युक्त हैं और ये सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्न हुए हैं। पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंके ये ही पाँच अधिष्ठातृदेवता हैं। इसी प्रकार बुद्धि आदि अन्तःकरणचतुष्टयके चन्द्रमा, ब्रह्मा, रुद्र तथा क्षेत्रज्ञ—ये अधिदेव हैं। ये चारों अधिष्ठातृदेवता कहे गये हैं। मनसहित ये सब पन्द्रह होते हैं। यह सात्त्विक अहंकारकी सृष्टि है और ‘सात्त्विकी सृष्टि’ कही गयी है॥ ३५–३८॥ | | स्थूलसूक्ष्मादिभेदेन द्वे रूपे परमात्मनः ।<br>ज्ञानरूपं निराकारं निदानं तत्प्रचक्षते ॥ ३९ | स्थूल और सूक्ष्मभेदसे परमात्माके दो रूप होते हैं, उनमें ज्ञानरूप निराकारस्वरूप सबका कारण कहा गया है॥ ३९॥ | | साधकस्य तु ध्यानादौ स्थूलरूपं प्रचक्षते ।<br>शरीरं सूक्ष्ममेवेदं पुरुषस्य प्रकीर्तितम् ॥ ४० | साधकके ध्यान आदि कार्योंके लिये परमात्माके स्थूल रूपकी उपासना कही गयी है। यह उस परमपुरुषका सूक्ष्म शरीर ही बताया गया है॥ ४०॥ | | मम चैव शरीरं वै सूत्रमित्यभिधीयते ।<br>स्थूलं शरीरं वक्ष्यामि ब्रह्मणः परमात्मनः ॥ ४१<br><br>शृणु नारद यत्नेन यच्छ्रुत्वा विप्रमुच्यते ।<br>तन्मात्राणि पुरोक्तानि भूतसूक्ष्माणि यानि वै ॥ ४२ | मेरा यह शरीर सूत्रसंज्ञक है। अब मैं उस परब्रह्म परमात्माके स्थूल विराट् स्वरूपका वर्णन करूँगा। हे नारद! आप उसे सुनें, जिसे सावधानीसे सुनकर मनुष्य मुक्त हो जाता है। इसके पहले मैंने गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द—इन पंच तन्मात्राओं तथा पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—इन सूक्ष्म पंच महाभूतोंका वर्णन विस्तारसे कर दिया है॥ ४१-४२॥ | | पञ्चीकृत्य तु तान्येव पञ्चभूतसमुद्भवः ।<br>पञ्चीकरणभेदोऽयं शृणु संवदतः किल ॥ ४३ | उन्हीं पाँचोंको मिलाकर पंचीकरणकी क्रियासे परमात्माने पंचभूतमय देहकी सृष्टि की है। अब मैं पंचीकरणका भेद बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनिये—॥ ४३॥ | | प्रथमं रसतन्मात्रामुपादाय मनस्यपि ।<br>कल्पयेच्च तथा तद्वै यथा भवति चोदकम् ॥ ४४ | सबसे पहले रसरूप तन्मात्राका मनमें निश्चय करके जिस स्थूल रूपमें जल होता है, वैसी ही उसकी दो अंशोंमें भावना करे॥ ४४॥ | | शिष्टानां चैव भूतानामंशान्कृत्वा पृथक्पृथक् ।<br>उदके मिश्रयेच्चांशान्कृते रसमये ततः ॥ ४५<br><br>तदा भूतविभागे च चैतन्ये च प्रकाशिते । | उसी प्रकार अवशिष्ट चार भूतोंके भी दो-दो भाग करके, उसमेंसे आधे भागको पृथक् कर ले। शेष आधे अंशको चार प्रकारसे अलग करके आधे भागसे रहित उन अंशोंमें मिला दे। रस तन्मात्राको आधे भाग जलमें मिलाकर अवशिष्टभूत तन्मात्राके आधेको चारों भागोंमें मिश्रित कर दे। ऐसा करनेसे जब रसमय स्थूल जल हो जाय तब अन्य चार भूतोंके पंचीकरणका विभाग करे। उन |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे तत्त्वनिरूपणवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
| २७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| चैतन्यस्य प्रवेशात्तु तदाहमिति संशयः ॥ ४६<br><br>प्रतीयमाने तेनैव विशेषेणाभिमानतः ।<br>आदिनारायणो देवो भगवानिति चोच्यते ॥ ४७ | पंचीकृत पंचभूतोंमें अधिष्ठानताके कारण उनके प्रतिबिम्बरूपसे जब चैतन्य प्रविष्ट हो जाता है, तब उस पंचभूतात्मक शरीरमें ‘अहम्’ भावरूप संशय उत्पन्न हो जाता है। वह संशय स्पष्टरूपसे जब भासित होने लगता है, तब उस स्थूल शरीरमें देहाभिमानके साथ चैतन्य जाग्रत् होने लगता है, वही दिव्य चैतन्य आदिनारायण भगवान्, परमात्मा आदि नामोंसे पुकारा जाता है॥ ४६-४७॥ |
| घनीभूतेऽथ भूतानां विभागे स्पष्टतां गते ।<br>वृद्धिं प्राप्य गुणैश्चेत्यमेकैकगुणवृद्धितः ॥ ४८ | इस प्रकार पंचीकरणसे सभी भूतोंका विभाग स्पष्ट हो जाने पर आकाश आदि सभी पंचभूत पूर्वोक्त तन्मात्राओंके कारण अपने-अपने विशेष गुणोंसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं और एक-एक गुणकी वृद्धिसे एक-एक भूत उत्पन्न हो जाता है॥ ४८॥ |
| आकाशस्य गुणश्चैकः शब्द एव न चापरः ।<br>शब्दस्पर्शौ च वायोश्च द्वौ गुणौ परिकीर्तितौ ॥ ४९<br><br>अग्नेः शब्दश्च स्पर्शश्च रूपमेते त्रयो गुणाः ।<br>शब्दस्पर्शरूपरसाश्चत्वारो वै जलस्य च ॥ ५०<br><br>स्पर्शशब्दरसा रूपं गन्धश्च पृथिवीगुणाः ।<br>एवं मिलितयोगैश्च ब्रह्माण्डोत्पत्तिरुच्यते ॥ ५१<br><br>सर्वे जीवा मिलित्वैव ब्रह्माण्डांशसमुद्भवाः ।<br>चतुरशीतिलक्षाश्च प्रोक्ता वै जीवजातयः ॥ ५२ | आकाशका केवल एकमात्र गुण शब्द है, दूसरा नहीं। वायुके शब्द और स्पर्श—ये दो गुण कहे गये हैं। शब्द, स्पर्श और रूप—ये तीन गुण अग्निके हैं। शब्द, स्पर्श, रूप और रस—ये चार गुण जलके हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये पाँच गुण पृथ्वीके हैं। इस प्रकार इन पंचीकृत महाभूतोंके योगसे ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति कही जाती है। ब्रह्माण्डके अंशसे उत्पन्न सभी जीवोंको मिलाकर चौरासी लाख जीव-योनियाँ कही गयी हैं॥ ४९-५२॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे तत्त्वनिरूपणवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
अथाष्टमोऽध्यायः
सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणका वर्णन
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माजी बोले— |
| सर्गोऽयं कथितस्तात यत्पृष्टोऽहं त्वयाधुना ।<br>गुणानां रूपसंस्थां वै शृणुष्वैकाग्रमानसः ॥ १ | हे तात! आपने जो मुझसे पूछा था, वह सृष्टिका वर्णन मैंने कर दिया। अब गुणोंका स्वरूप कहता हूँ, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो॥ १॥ |
| सत्त्वं प्रीत्यात्मकं ज्ञेयं सुखात्प्रीतिसमुद्भवः ।<br>आर्जवं च तथा सत्यं शौचं श्रद्धा क्षमा धृतिः ॥ २<br><br>अनुकम्पा तथा लज्जा शान्तिः सन्तोष एव च ।<br>एतैः सत्त्वप्रतीतिश्च जायते निश्चला सदा ॥ ३ | सत्त्वगुणको प्रीतिस्वरूप समझना चाहिये, वह प्रीति सुखसे उत्पन्न होती है। सरलता, सत्य, शौच, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, कृपा, लज्जा, शान्ति और सन्तोष—इन लक्षणोंसे सदैव निश्चल सत्त्वगुणकी प्रतीति होती है॥ २-३॥ |
| अ० ८ ] | तृतीय स्कन्ध | २७९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| श्वेतवर्णं तथा सत्त्वं धर्मे प्रीतिकरं सदा।<br>सच्छ्रद्धोत्पादकं नित्यमसच्छ्रद्धानिवारकम् ॥ ४ | सत्त्वगुणका वर्ण श्वेत है, यह सर्वदा धर्मके प्रति प्रीति उत्पन्न करता है, सत्-श्रद्धाका आविर्भाव करता है तथा असत्-श्रद्धाको समाप्त करता है ॥ ४ ॥ |
| सात्त्विकी राजसी चैव तामसी च तथापरा।<br>श्रद्धा तु त्रिविधा प्रोक्ता मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ ५ | तत्त्वदर्शी मुनियोंने तीन प्रकारकी श्रद्धा बतलायी है—सात्त्विकी, राजसी एवं तीसरी तामसी ॥ ५ ॥ |
| रक्तवर्णं रजः प्रोक्तमप्रीतिकरमद्भुतम्।<br>अप्रीतिर्दुःखयोगत्वाद्वर्तत्येव सुनिश्चिता ॥ ६ | रजोगुण रक्तवर्णवाला कहा गया है। यह आश्चर्य एवं अप्रीतिको उत्पन्न करता है। दुःखसे योगके कारण ही निश्चितरूपसे अप्रीति उत्पन्न होती है ॥ ६ ॥ |
| प्रद्वेषोऽथ तथा द्रोहो मत्सरः स्तम्भ एव च।<br>उत्कण्ठा च तथा निद्रा श्रद्धा तत्र च राजसी ॥ ७ | जहाँ ईर्ष्या, द्रोह, मत्सर, स्तम्भन, उत्कण्ठा एवं निद्रा होती है, वहाँ राजसी श्रद्धा रहती है ॥ ७ ॥ |
| मानो मदस्तथा गर्वो रजसा किल जायते।<br>प्रत्येतव्यं रजस्त्वैतैर्लक्षणैश्च विचक्षणैः ॥ ८ | अभिमान, मद और गर्व—ये सब भी राजसी श्रद्धासे ही उत्पन्न होते हैं। अतः विद्वान् मनुष्योंको चाहिये कि वे इन लक्षणोंद्वारा राजसी श्रद्धा समझ लें ॥ ८ ॥ |
| कृष्णवर्णं तमः प्रोक्तं मोहनं च विषादकृत्।<br>आलस्यं च तथाज्ञानं निद्रा दैन्यं भयं तथा ॥ ९<br><br>विवादश्चैव कार्पण्यं कौटिल्यं रोष एव च।<br>वैषम्यं वातिनास्तिक्यं परदोषानुदर्शनम् ॥ १०<br><br>प्रत्येतव्यं तमस्त्वैतैर्लक्षणैः सर्वथा बुधैः।<br>तामस्या श्रद्धया युक्तं परतापोपपादकम् ॥ ११ | तमोगुणका वर्ण कृष्ण होता है। यह मोह और विषाद उत्पन्न करता है। आलस्य, अज्ञान, निद्रा, दीनता, भय, विवाद, कायरता, कुटिलता, क्रोध, विषमता, अत्यन्त नास्तिकता और दूसरोंके दोषको देखनेका स्वभाव—ये तामसिक श्रद्धाके लक्षण हैं। पण्डितजन इन लक्षणोंसे तामसी श्रद्धा जान लें; तामसी श्रद्धासे युक्त ये सभी लक्षण परपीड़ादायक हैं ॥ ९-११ ॥ |
| सत्त्वं प्रकाशयितव्यं नियन्तव्यं रजः सदा।<br>संहर्तव्यं तमः कामं जनेन शुभमिच्छता ॥ १२ | आत्मकल्याणकी इच्छा रखनेवालेको अपनेमें निरन्तर सत्त्वगुणका विकास करना चाहिये, रजोगुणपर नियन्त्रण रखना चाहिये तथा तमोगुणका नाश कर डालना चाहिये ॥ १२ ॥ |
| अन्योन्याभिभवाच्चैते विरुध्यन्ति परस्परम्।<br>तथान्योन्याश्रयाः सर्वे न तिष्ठन्ति निराश्रयाः ॥ १३ | ये तीनों गुण एक-दूसरेका उत्कर्ष होनेकी दशामें परस्पर विरोध करने लगते हैं। ये सब एक-दूसरेके आश्रित हैं, निराश्रय होकर नहीं रहते ॥ १३ ॥ |
| सत्त्वं न केवलं क्वापि न रजो न तमस्तथा।<br>मिलिताश्च सदा सर्वे तेनान्योन्याश्रयाः स्मृताः ॥ १४ | सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुणमेंसे कोई एक अकेला कभी नहीं रह सकता; ये सभी सदैव मिलकर रहते हैं, इसीलिये ये अन्योन्याश्रय सम्बन्धवाले कहे गये हैं ॥ १४ ॥ |
| अन्योन्यमिथुनाच्चैव विस्तारं कथयाम्यहम्।<br>शृणु नारद यज्ज्ञात्वा मुच्यते भवबन्धनात् ॥ १५ | हे नारद! ध्यानसे सुनिये, अब मैं इनके अन्योन्याश्रय-सम्बन्धसे होनेवाले विस्तारका वर्णन करता हूँ, जिसे जानकर मनुष्य भव-बन्धनसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है। इसमें आपको किसी प्रकारका |
| २८० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सन्देहोऽत्र न कर्तव्यो ज्ञात्वेत्युक्तं मया वचः।<br>ज्ञातं तदनुभूतं यत्परिज्ञातं फले सति॥ १६ | सन्देह नहीं करना चाहिये। सम्यक् प्रकारसे जानकर ही मैंने यह बात कही है। मैंने पहले इसे जाना, तत्पश्चात् इसका अनुभव किया और पुनः परिणाम देखकर इसका परिज्ञान प्राप्त किया है॥ १५-१६॥ |
| श्रवणाद्दर्शनाच्चैव सद्येव महामते।<br>संस्कारानुभवाच्चैव परिज्ञातं न जायते॥ १७ | हे महामते! मात्र देख लेने, सुन लेने अथवा संस्कारजनित अपने अनुभवसे ही किसी भी वस्तुका तत्काल परिज्ञान नहीं हो जाता ॥ १७॥ |
| श्रुतं तीर्थं पवित्रञ्च श्रद्धोत्पन्ना च राजसी।<br>निर्गतस्तत्र तीर्थे वै दृष्टं चैव यथाश्रुतम्॥ १८<br><br>स्नातस्तत्र कृतं कृत्यं दत्तं दानं च राजसम्।<br>स्थितस्तत्र कियत्कालं रजोगुणसमावृतः॥ १९<br><br>रागद्वेषान्न निर्मुक्तः कामक्रोधसमावृतः।<br>पुनरेव गृहं प्राप्तो यथापूर्वं तथास्थितः॥ २० | जैसे किसी पवित्र तीर्थके विषयमें सुनकर किसी व्यक्तिके हृदयमें राजसी श्रद्धा उत्पन्न हो गयी और वह उस तीर्थमें चला गया। वहाँ पहुँचकर उसने वही देखा जैसा पहले सुना था। उस तीर्थमें उसने स्नान करके तीर्थकृत्य किया और राजसी दान भी किया। रजोगुणसे युक्त रहकर उस व्यक्तिने कुछ समयतक वहाँ तीर्थवास भी किया। किंतु ऐसा करके भी वह राग-द्वेषसे मुक्त नहीं हो पाया और काम-क्रोध आदि विकारोंसे आच्छादित ही रहा। पुनः अपने घर लौट आया और वह पूर्वकी भाँति वैसे ही रहने लगा॥ १८-२०॥ |
| श्रुतं च नानुभूतं वै तेन तीर्थं मुनीश्वर।<br>न प्राप्तं च फलं यस्मादश्रुतं विद्धि नारद॥ २१ | हे मुनीश्वर! उस व्यक्तिने तीर्थकी महिमा तो सुनी थी, किंतु उसका सम्यक् अनुभव नहीं किया। इसी कारण उसे तीर्थयात्राका कोई फल नहीं प्राप्त हुआ। अतः हे नारद! उसका सुनना न सुननेके बराबर समझें॥ २१॥ |
| निष्पापत्वं फलं विद्धि तीर्थस्य मुनिसत्तम।<br>कृषेः फलं यथा लोके निष्पन्नान्नस्य भक्षणम्॥ २२ | हे मुनिश्रेष्ठ! आप यह जान लें कि तीर्थयात्राका फल पापसे छुटकारा प्राप्त करना है; यह वैसे ही है जैसे संसारमें कृषिका फल उत्पादित अन्नका भक्षण है॥ २२॥ |
| पापदेहविकारा ये कामक्रोधादयः परे।<br>लोभो मोहस्तथा तृष्णा द्वेषो रागस्तथा मदः॥ २३<br><br>असूयेर्ष्याक्षमाशान्तिः पापान्येतानि नारद।<br>न निर्गतानि देहात्तु तावत्पापयुतो नरः॥ २४ | जो काम, क्रोध, लोभ, मोह, तृष्णा, द्वेष, राग, मद, परदोषदर्शन, ईर्ष्या, सहनशीलताका अभाव और अशान्ति आदि हैं, वे पापमय शरीरके विकार हैं। हे नारद! जबतक ये पाप शरीरसे नहीं निकलते, तबतक मनुष्य पापी ही रहता है॥ २३-२४॥ |
| कृते तीर्थे यदैतानि देहान्न निर्गतानि चेत्।<br>निष्फलः श्रम एवैकः कर्षकस्य यथा तथा॥ २५ | तीर्थयात्रा करनेपर भी यदि ये पाप देहसे नहीं निकले तो तीर्थाटन करनेका वह परिश्रम उसी प्रकार व्यर्थ है, जैसे किसी किसानका। |
| श्रमेणापीडितं क्षेत्रं कृष्टा भूमिः सुदुर्घटा।<br>उप्तं बीजं महार्घं च हिता वृत्तिरुदाहृता॥ २६ | उस किसानने परिश्रमपूर्वक खेतको खोदा, अत्यन्त कठोर भूमिको जोता, उसमें महँगा बीज बोया और अन्य आवश्यक कार्य किये तथा फलप्राप्तिकी इच्छासे उसकी रक्षाके |
अ० ८ ] तृतीय स्कन्ध २८१
अ० ८ ] तृतीय स्कन्ध २८१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अहोरात्रं परिक्लिष्टो रक्षणार्थं फलोत्सुकः ।<br>काले सुप्तस्तु हेमन्ते वने व्याघ्रादिभिर्भृशम् ॥ २७<br><br>भक्षितं शलभैः सर्वं निराशश्च कृतः पुनः ।<br>तद्वत्तीर्थश्रमः पुत्र कष्टदो न फलप्रदः ॥ २८ | लिये दिन-रात अनेक कष्ट सहे, किंतु फल लगनेका समय हेमन्त-काल आनेपर वह सो गया, जिससे व्याघ्र आदि वन्य जन्तुओं तथा टिड्डियोंने उस फसलको खा लिया और अन्तमें वह किसान सर्वथा निराश हो गया। उसी प्रकार हे पुत्र! तीर्थमें किया गया वह श्रम भी कष्टदायक ही सिद्ध होता है, उसका कोई फल नहीं मिलता॥ २७-२८॥ |
| सत्त्वं समुत्कटं जातं प्रवृद्धं शास्त्रदर्शनात् ।<br>वैराग्यं तत्फलं जातं तामसार्थेषु नारद ॥ २९ | हे नारद! शास्त्रके अवलोकनसे सत्त्वगुण समुन्नत होता है तथा बड़ी तेजीसे बढ़ता है। उसका फल यह होता है कि तामस पदार्थोंके प्रति वैराग्य हो जाता है॥ २९॥ |
| प्रसह्माभिभवत्येव तद्रजस्तमसी उभे ।<br>रजः समुत्कटं जातं प्रवृत्तं लोभयोगतः ॥ ३०<br><br>तत्तथाभिभवत्येव तमःसत्त्वे तथा उभे ।<br>तमस्तथोत्कटं भूत्वा प्रवृद्धं मोहयोगतः ॥ ३१<br><br>तत्सत्त्वरजसी चोभे सङ्गम्याभिभवत्यपि ।<br>विस्तरं कथयाम्यद्य यथाभिभवतीति वै ॥ ३२ | वह सत्त्वगुण रज और तम—इन दोनोंको बलपूर्वक दबा देता है, लोभके कारण रजोगुण अत्यन्त तीव्र हो जाता है, वह बढ़ा हुआ रजोगुण सत्त्व तथा तम—इन दोनोंको दबा देता है। उसी प्रकार तमोगुण मोहके कारण तीव्रताको प्राप्त होकर सत्त्वगुण तथा रजोगुण—इन दोनोंको दबा देता है। ये गुण जिस प्रकार एक-दूसरेको दबाते हैं? उसे मैं यहाँपर विस्तारपूर्वक कह रहा हूँ॥ ३०-३२॥ |
| यदा सत्त्वं प्रवृद्धं वै मतिर्धर्मे स्थिता तदा ।<br>न चिन्तयति बाह्यार्थं रजस्तमःसमुद्भवम् ॥ ३३ | जब सत्त्वगुण बढ़ता है, उस समय बुद्धि धर्ममें स्थित रहती है। उस समय वह रजोगुण या तमोगुणसे उत्पन्न बाह्य विषयोंका चिन्तन नहीं करती है॥ ३३॥ |
| अर्थं सत्त्वसमुद्भूतं गृह्णाति च न चान्यथा ।<br>अनायासकृतं चार्थं धर्मं यज्ञं च वाञ्छति ॥ ३४<br><br>सात्त्विकेष्वेव भोगेषु कामं वै कुरुते तदा ।<br><br>राजसेषु न मोक्षार्थं तामसेषु पुनः कुतः ॥ ३५ | उस समय बुद्धि सत्त्वगुणसे उत्पन्न होनेवाले कार्यको अपनाती है; इसके अतिरिक्त वह अन्य कार्योंमें नहीं फँसती। बुद्धि बिना प्रयासके ही धर्म तथा यज्ञादि कर्ममें प्रवृत्त हो जाती है। मोक्षकी अभिलाषासे मनुष्य उस समय सात्त्विक पदार्थोंके भोगमें प्रवृत्त रहता है; वह राजसी भोगोंमें लिप्त नहीं होता, तब भला वह तमोगुणी कार्योंमें क्यों लगेगा?॥ ३४-३५॥ |
| एवं जित्वा रजः पूर्वं ततश्च तमसो जयः ।<br>सत्त्वं च केवलं पुत्र तदा भवति निर्मलम् ॥ ३६ | इस प्रकार पहले रजोगुणको जीत करके वह तमोगुणको पराजित करता है। हे तात! उस समय एकमात्र विशुद्ध सत्त्वगुण ही स्थित रहता है॥ ३६॥ |
| यदा रजः प्रवृद्धं वै त्यक्त्वा धर्मान् सनातनान् ।<br>अन्यथाकुरुते धर्माञ्छ्रद्धां प्राप्य तु राजसीम् ॥ ३७ | जब मनुष्यके मनमें रजोगुणकी वृद्धि होती है, तब वह सनातन धर्मोंको त्यागकर राजसी श्रद्धाके वशीभूत हो विपरीत धर्माचरण करने लगता है॥ ३७॥ |
| २८२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजसादर्थसंवृद्धिस्तथा भोगस्तु राजसः।<br>सत्त्वं विनिर्गतं तेन तमसश्चापि निग्रहः॥ ३८ | रजोगुण बढ़नेसे धनकी वृद्धि होती है और भोग भी राजसी हो जाता है। उस दशामें सत्त्वगुण दूर चला जाता है और उससे तमोगुण भी दब जाता है॥ ३८॥ |
| यदा तमो विवृद्धं स्यादुत्कटं सम्बभूव ह।<br>तदा वेदे न विश्वासो धर्मशास्त्रे तथैव च॥ ३९<br><br>श्रद्धां च तामसीं प्राप्य करोति च धनात्ययम्।<br>द्रोहं सर्वत्र कुरुते न शान्तिमधिगच्छति॥ ४०<br><br>जित्वा सत्त्वं रजश्चैव क्रोधनो दुर्मतिः शठः।<br>वर्तते कामचारेण भावेषु विततेषु च॥ ४१ | जब तमोगुणकी वृद्धि होती है और वह उत्कट हो जाता है, तब वेद तथा धर्मशास्त्रमें विश्वास नहीं रह जाता। उस समय मनुष्य तामसी श्रद्धा प्राप्त करके धनका दुरुपयोग करता है, सबसे द्रोह करने लगता है तथा उसे शान्ति नहीं मिलती। वह क्रोधी, दुर्बुद्धि तथा दुष्ट मनुष्य सत्त्व तथा रजोगुणको दबाकर अनेकविध तामसिक विचारोंमें लीन रहता हुआ मनमाना आचरण करने लगता है॥ ३९-४१॥ |
| एकं सत्त्वं न भवति रजश्चैकं तमस्तथा।<br>सहैवाश्रित्य वर्तन्ते गुणा मिथुनधर्मिणः॥ ४२ | किसी भी प्राणीमें सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण अकेले नहीं रहते; अपितु मिश्रित धर्मवाले वे तीनों गुण एक-दूसरेके आश्रयीभूत होकर रहते हैं॥ ४२॥ |
| रजो विना न सत्त्वं स्याद्रजः सत्त्वं विना क्वचित्।<br>तमो विना न चैवैते वर्तन्ते पुरुषर्षभ॥ ४३<br><br>तमस्ताभ्यां विहीनं तु केवलं न कदाचन।<br>सर्वे मिथुनधर्माणो गुणाः कार्यान्तरेषु वै॥ ४४ | हे पुरुषश्रेष्ठ! रजोगुणके बिना सत्त्वगुण और सत्त्वगुणके बिना रजोगुण कदापि रह नहीं सकते। इसी प्रकार तमोगुणके बिना ये दोनों गुण नहीं रह सकते। इस प्रकार ये गुण परस्पर स्थित रहते हैं। सत्त्वगुण तथा रजोगुणके बिना तमोगुण नहीं रहता; क्योंकि इन मिश्रित धर्मवाले सभी गुणोंकी स्थिति कार्य-कारण-भावसे विभिन्न प्रकारकी होती है॥ ४३-४४॥ |
| अन्योन्यसंश्रिताः सर्वे तिष्ठन्ति न वियोजिताः।<br>अन्योन्यजनकाश्चैव यतः प्रसवधर्मिणः॥ ४५ | ये सभी गुण अन्योन्याश्रयभावसे विद्यमान रहते हैं, अलग-अलग भावसे नहीं। प्रसवधर्मी होनेके कारण ये एक-दूसरेके उत्पादक भी होते हैं॥ ४५॥ |
| सत्त्वं कदाचिच्च रजस्तमसी जनयत्युत।<br>कदाचित्तु रजः सत्त्वतमसी जनयत्यपि॥ ४६<br><br>कदाचित्तु तमः सत्त्वरजसी जनयत्युभे।<br>जनयन्त्येवमन्योन्यं मृत्पिण्डश्च घटं यथा॥ ४७ | सत्त्वगुण कभी रजोगुणको और कभी तमोगुणको उत्पन्न करता है; इसी तरह रजोगुण कभी सत्त्वगुणको तथा कभी तमोगुणको उत्पन्न करता है। इसी प्रकार तमोगुण कभी सत्त्वगुणको एवं कभी रजोगुणको भी उत्पन्न करता है। ये तीनों गुण आपसमें एक-दूसरेको उसी प्रकार उत्पन्न कर देते हैं, जिस प्रकार मिट्टीका लोंदा घड़ेको उत्पन्न कर देता है॥ ४६-४७॥ |
| बुद्धिस्थास्ते गुणाः कामान्बोधयन्ति परस्परम्।<br>देवदत्तविष्णुमित्रयज्ञदत्तादयो यथा॥ ४८ | मनुष्योंकी बुद्धिमें स्थित ये तीनों गुण परस्पर कामनाओंको उसी प्रकार जाग्रत् करते हैं; जैसे देवदत्त, विष्णुमित्र और यज्ञदत्त आदि मिलकर काम करते हैं॥ ४८॥ |
अ० ९ ] तृतीय स्कन्ध २८३
अ० ९ ] तृतीय स्कन्ध २८३
| यथा स्त्रीपुरुषश्चैव मिथुनौ च परस्परम्।<br>तथा गुणाः समायान्ति युग्मभावं परस्परम्॥ ४९ | जिस प्रकार स्त्री और पुरुष आपसमें मिथुन-भावको प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार ये तीनों गुण परस्पर युग्म-भावको प्राप्त रहते हैं॥ ४९॥ |
| रजसो मिथुने सत्त्वं सत्त्वस्य मिथुने रजः।<br>उभे ते सत्त्वरजसी तमसो मिथुने विदुः॥ ५० | रजोगुणका युग्म-भाव होनेपर सत्त्वगुण, सत्त्वगुणका युग्म-भाव होनेपर रजोगुण और तमोगुणके युग्म-भावसे सत्त्वगुण तथा रजोगुण—ये दोनों उत्पन्न होते हैं—ऐसा कहा गया है॥ ५०॥ |
| नारद उवाच<br>इत्येतत्कथितं पित्रा गुणरूपमनुत्तमम्।<br>श्रुत्वाप्येतत्स एवाहं ततोऽपृच्छं पितामहम्॥ ५१ | नारदजी बोले—इस प्रकार पिताजीने तीनों गुणोंके अत्युत्तम स्वरूपका वर्णन किया। इसे सुननेके पश्चात् मैंने पुनः पितामह ब्रह्माजीसे पूछा॥ ५१॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे<br>गुणानां रूपसंस्थानादिवर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
अथ नवमोऽध्यायः
गुणोंके परस्पर मिश्रीभावका वर्णन, देवीके बीजमन्त्रकी महिमा
| नारद उवाच<br>गुणानां लक्षणं तात भवता कथितं किल।<br>न तृप्तोऽस्मि पिबन्मिष्टं त्वन्मुखात्प्रच्युतं रसम्॥ १ | नारदजी बोले—हे तात! आपने गुणोंके लक्षणोंका वर्णन किया, किंतु आपके मुखसे निःसृत वाणीरूपी मधुर रसका पान करता हुआ मैं अभी भी तृप्त नहीं हुआ हूँ॥ १॥ |
| गुणानां तु परिज्ञानं यथावदनुवर्णय।<br>येनाहं परमां शान्तिमधिगच्छामि चेतसि॥ २ | अतएव अब आप इन गुणोंके सूक्ष्म ज्ञानका यथावत् वर्णन कीजिये, जिससे मैं अपने हृदयमें परम शान्तिका अनुभव कर सकूँ॥ २॥ |
| व्यास उवाच<br>इति पृष्टस्तु पुत्रेण नारदेन महात्मना।<br>उवाच च जगत्कर्ता रजोगुणसमुद्भवः॥ ३ | व्यासजी बोले—अपने पुत्र महात्मा नारदके इस प्रकार पूछनेपर रजोगुणसे आविर्भूत सृष्टि-निर्माता ब्रह्माजीने कहा॥ ३॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>शृणु नारद वक्ष्यामि गुणानां परिवर्णनम्।<br>सम्यङ् नाहं विजानामि यथामति वदामि ते॥ ४ | ब्रह्माजी बोले—हे नारद! सुनिये, अब मैं गुणोंका विस्तृत वर्णन करूँगा; यद्यपि मैं इस विषयमें सम्यक् ज्ञान नहीं रखता फिर भी अपनी बुद्धिके अनुसार आपसे वर्णन कर रहा हूँ॥ ४॥ |
| सत्त्वं तु केवलं नैव कुत्रापि परिलक्ष्यते।<br>मिश्रीभावस्तु तेषां वै मिश्रत्वं प्रतिभाति वै॥ ५ | केवल सत्त्वगुण कहीं भी परिलक्षित नहीं होता है। गुणोंका परस्पर मिश्रीभाव होनेके कारण वह सत्त्वगुण भी मिश्रित दिखायी देता है॥ ५॥ |
| यथा काचिद्वरा नारी सर्वभूषणभूषिता।<br>हावभावयुता कामं भर्तुः प्रीतिकरी भवेत्॥ ६ | जिस प्रकार सब भूषणोंसे विभूषित तथा हाव-भावसे युक्त कोई सुन्दरी स्त्री अपने पतिको विशेष प्रिय होती है तथा माता-पिता एवं बन्धु-बान्धवोंके |
| २८४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मातापित्रोस्तथा सैव बन्धुवर्गस्य प्रीतिदा।<br>दुःखं मोहं सपत्नीषु जनयत्यपि सैव हि॥ ७<br><br>एवं सत्त्वेन तेनैव स्त्रीत्वमापादितेन च।<br>रजस्तमसश्चैव जनिता वृत्तिरन्यथा॥ ८<br><br>रजसा स्त्रीकृतेनैव तमसा च तथा पुनः।<br>अन्योन्यस्य समायोगादन्यथा प्रतिभाति वै॥ ९ | लिये भी प्रीतिकर होती है, किंतु वही स्त्री अपनी सौतोंके मनमें दुःख और मोह उत्पन्न करती है। इसी प्रकार सत्त्वगुणके स्त्रीभावापन्न होनेपर रजोगुण और तमोगुणसे मिलनेपर भिन्न वृत्ति उत्पन्न होती है। ऐसे ही रजोगुण तथा तमोगुणके स्त्रीभावापन्न होनेपर एक-दूसरेके परस्पर संयोगके कारण विपरीत भावना प्रतीत होती है॥ ६-९॥ |
| अवस्थानात्स्वभावेषु न वै जात्यन्तराणि च।<br>लक्ष्यन्ते विपरीतानि योगान्नारद कुत्रचित्॥ १० | हे नारद! यदि ये तीनों गुण परस्पर मिश्रित न होते तो उनके स्वभावमें एक-सी ही प्रवृत्ति रहती, किंतु तीनों गुणोंमें मिश्रण होनेके कारण ही विभिन्नताएँ दिखायी देती हैं॥ १०॥ |
| यथा रूपवती नारी यौवनेन विभूषिता।<br>लज्जामाधुर्ययुक्ता च तथा विनयसंयुता॥ ११<br><br>कामशास्त्रविधिज्ञा च धर्मशास्त्रेऽपि सम्मता।<br>भर्तुः प्रीतिकरी भूत्वा सपत्नीनां च दुःखदा॥ १२ | जैसे कोई रूपवती स्त्री यौवन, लज्जा, माधुर्य तथा विनयसे युक्त हो, साथ ही वह धर्मशास्त्रके अनुकूल हो तथा कामशास्त्रको जाननेवाली हो, तो वह अपने पतिके लिये प्रीतिकर होती है; किंतु सौतोंके लिये कष्ट देनेवाली होती है॥ ११-१२॥ |
| मोहदुःखस्वभावस्था सत्त्वस्थेत्युच्यते जनैः।<br>तथा सत्त्वं विकुर्वाणमन्यभावं विभाति वै॥ १३ | [सौतोंके लिये] मोह तथा दुःख देनेवाली होनेपर भी कुछ लोगोंके द्वारा वह सत्त्वगुणी कही जाती है और सत्त्वगुणके अनेक शुभ कार्य करनेपर भी वह सौतोंको विपरीत भाववाली प्रतीत होती है॥ १३॥ |
| चौरैरुपद्रुतानां हि साधूनां सुखदा भवेत्।<br>दुःखा मूढा च दस्यूनां सैव सेना तथागुणा॥ १४ | जैसे राजाकी सेना चोरोंसे पीड़ित सज्जनोंके लिये सुख देनेवाली होती है, किंतु वही सेना चोरोंके लिये दुःखदायिनी, मूढ़ तथा गुणहीन होती है॥ १४॥ |
| विपरीतप्रतीतिं वै जनयन्ति स्वभावतः।<br>यथा च दुर्दिनं जातं महामेघघनावृतम्॥ १५<br><br>विद्युत्स्तनितसंयुक्तं तिमिरेणावगुण्ठितम्।<br>सिञ्चद्भूमिं प्रवर्षद्वै तमोरूपमुदाहृतम्॥ १६<br><br>यदेतत्कर्षकाणां वै तदेवातीव दुर्दिनम्।<br>बीजोपस्करयुक्तानां सुखदं प्रभवत्युत॥ १७<br><br>अप्रच्छन्नगृहाणाञ्च दुर्भागानां विशेषतः।<br>तृणकाष्ठगृहीतानां दुःखदं गृहमेधिनाम्॥ १८ | इससे प्रकट होता है कि स्वाभाविक गुण भी विपरीत लक्षणोंवाले दीख पड़ते हैं। जैसे किसी दिन जब चारों ओर काले-काले मेघ घिर आये हों, बिजली चमक रही हो, मेघ गरज रहे हों, अन्धकारसे आच्छादित हो और घनघोर वर्षाके कारण सूखी भूमि सिंच रही हो, तब भी लोग उसे तमोरूप गाढ़ान्धकारसे व्याप्त दुर्दिन नामसे ही पुकारते हैं। एक ओर वही दुर्दिन किसानोंको खेत जोतने तथा बीज बोनेकी सुविधा देनेके कारण सुखदायी प्रतीत होता है, किंतु दूसरी ओर वही दुर्दिन उन अभागे गृहस्थोंके लिये दुःखदायी हो जाता है, जिनके घर अभी छाये नहीं जा सके हैं और जो तृण, काष्ठ आदिके संग्रहमें व्यस्त हैं। साथ ही वही दुर्दिन उन स्त्रियोंके हृदयमें शोक उत्पन्न करता है, जिनके पति परदेश गये हों। |
| अ० ९ ] | तृतीय स्कन्ध | २८५ |
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| प्रोषितभर्तृकाणां वै मोहदं प्रवदन्त्यपि।<br>स्वभावस्था गुणाः सर्वे विपरीता विभान्ति वै॥ १९ | उसी प्रकार ये सत्त्वादि गुण अपनी स्वाभाविक परिस्थितिमें रहते हुए भी अन्य गुणोंसे मिलनेपर विपरीत दृष्टिगोचर होते हैं॥ १५—१९॥ | | लक्षणानि पुनस्तेषां शृणु पुत्र ब्रवीम्यहम्।<br>लघुप्रकाशकं सत्त्वं निर्मलं विशदं सदा॥ २० | हे पुत्र! अब मैं उन गुणोंके लक्षण पुनः बता रहा हूँ; सुनो। सत्त्वगुण सूक्ष्म, प्रकाशक, स्वच्छ, निर्मल एवं व्यापक होता है। जब मानवके सम्पूर्ण अंग और नेत्र आदि इन्द्रियाँ हल्के हों, मन निर्मल हो तथा वह उन राजस एवं तामस विषयोंको न ग्रहण करता हो, तब यह समझ लेना चाहिये कि शरीरमें अब सत्त्वगुण प्रधानरूपसे विद्यमान है। जब जिस किसीकी देहमें रजोगुण प्रधानरूपसे विद्यमान रहता है तब यह बार-बार जम्हाई, स्तम्भन, तन्द्रा तथा चंचलता उत्पन्न करता है। इसी प्रकार जब अत्यन्त कलह करनेका मन चाहता हो, अन्यत्र जानेकी इच्छा हो, चित्त चंचल हो और वाद-विवादमें उलझनेकी प्रवृत्ति हो, मनमें काम-भावनाका गहरा परदा पड़ जाय, तब यह समझ ले कि शरीरमें तमोगुणकी प्रधानता है। उस समय शरीरके अंग भारी हो जाते हैं, इन्द्रियाँ तामसिक भावोंके वशीभूत रहती हैं, चित्त विमूढ़ रहता है और वह निद्राकी इच्छा नहीं करता। हे नारद! इस प्रकार सभी गुणोंके लक्षण समझना चाहिये॥ २०—२५ १/२॥ | | यदाङ्गानि लघून्येव नेत्रादीनीन्द्रियाणि च।<br>निर्मलं च तथा चेतो गृह्णाति विषयान्न तान्॥ २१ | | | तदा सत्त्वं शरीरे वै मन्तव्यञ्च समुत्कटम्।<br>जृम्भां स्तम्भं च तन्द्रां च चलञ्चैव रजः पुनः॥ २२ | | | यदा तदुत्कटं जातं देहे यस्य च कस्यचित्।<br>कलिं मृगयते कर्तुं गन्तुं ग्रामान्तरं तथा॥ २३ | | | चलचित्तश्च सोऽत्यर्थं विवादे चोद्यतस्तथा।<br>गुरुमावरणं कामं तमो भवति तद्यदा॥ २४ | | | तदाङ्गानि गुरूण्याशु प्रभवन्त्यावृतानि च।<br>इन्द्रियाणि मनः शून्यं निद्रां नैवाभिवाञ्छति॥ २५ | | | गुणानां लक्षणान्येवं विज्ञेयानीह नारद। | | | नारद उवाच<br>विभिन्नलक्षणाः प्रोक्ताः पितामह गुणास्त्रयः॥ २६<br><br>कथमेकत्र संस्थाने कार्यं कुर्वन्ति शाश्वतम्।<br>परस्परं मिलित्वा हि विभिन्नाः शत्रवः किल॥ २७<br><br>एकत्रस्थाः कथं कार्यं कुर्वन्तीति वदस्व मे। | **नारदजी बोले—**हे पितामह! आपने तीनों गुणोंको भिन्न-भिन्न लक्षणोंवाला बताया, तो फिर ये एक स्थानमें होकर निरन्तर कार्य कैसे करते हैं? विपरीत होते हुए भी शत्रुरूप ये गुण एकत्र होकर परस्पर मिल करके किस प्रकार कार्य करते हैं; यह मुझे बताइये॥ २६—२७ १/२॥ | | ब्रह्मोवाच<br>शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि गुणास्ते दीपवृत्तयः॥ २८<br><br>प्रदीपश्च यथा कार्यं प्रकरोत्यर्थदर्शनम्।<br>वर्तिस्तैलं यथार्चिश्च विरुद्धाश्च परस्परम्॥ २९<br><br>विरुद्धं हि तथा तैलमग्निना सह सङ्गतम्।<br>तैलं वर्तिविरोध्येव पावकोऽपि परस्परम्॥ ३०<br>एकत्रस्थाः पदार्थानां प्रकुर्वन्ति प्रदर्शनम्। | **ब्रह्माजी बोले—**हे पुत्र! सुनो, मैं बताता हूँ। उन तीनों गुणोंका स्वभाव दीपकके समान है। जैसे दीपकमें तेल, बत्ती और अग्निशिखा तीनों परस्पर विरोधी धर्मवाले हैं, परंतु तीनोंके सहयोगसे ही दीपक वस्तुओं आदिका दर्शन कराता है। यद्यपि आगके साथ मिला हुआ तेल आगका विरोधी है और तेल बत्ती तथा अग्निका विरोधी है तथापि वे एकत्र होकर वस्तुओंका दर्शन कराते हैं॥ २८—३० १/२॥ |
| २८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ | | :--- | :--- | | नारद उवाच<br>एवं प्रकृतिजाः प्रोक्ता गुणाः सत्यवतीसुत ॥ ३१<br>विश्वस्य कारणं ते वै मया पूर्वं यथाश्रुतम् ।<br><br>व्यास उवाच<br>इत्युक्तं नारदेनाथ मम सर्वं सविस्तरम् ॥ ३२<br>गुणानां लक्षणं सर्वं कार्यं चैव विभागशः ।<br>आराध्या परमा शक्तिर्यया सर्वमिदं ततम् ॥ ३३<br>सगुणा निर्गुणा चैव कार्यभेदे सदैव हि ।<br>अकर्ता पुरुषः पूर्णो निरीहः परमोऽव्ययः ॥ ३४<br>करोत्येषा महामाया विश्वं सदसदात्मकम् ।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रः सूर्यश्चन्द्रः शचीपतिः ॥ ३५<br>अश्विनौ वसवस्त्वष्टा कुबेरो यादसां पतिः ।<br>वह्निवायुस्तथा पूषा सेनानीश्च विनायकः ॥ ३६<br>सर्वे शक्तियुताः शक्ताः कर्तुं कार्याणि स्वानि च ।<br>अन्यथा तेऽप्यशक्ता वै प्रस्पन्दितुमनीश्वराः ॥ ३७ | **नारदजी बोले—**हे सत्यवतीसुत व्यासजी! ये सत्त्वादि तीनों गुण भी प्रकृतिसे उत्पन्न कहे गये हैं और ये जगत्के कारण हैं, जैसा मैंने पहले भी सुना है॥ ३१ १/२ ॥<br><br>व्यासजी बोले—[हे राजन्!] इस प्रकार नारदजीने विस्तारपूर्वक गुणोंके लक्षण और उनके विभागोंके सहित कार्योंको भी मुझे बतलाया है। सर्वदा उन्हीं परमशक्तिकी आराधना करनी चाहिये, जिनसे यह समस्त संसार व्याप्त है। वे भगवती कार्यभेदसे सगुणा और निर्गुणा दोनों हैं। वह परमपुरुष तो अकर्ता, पूर्ण, निःस्पृह तथा परम अविनाशी है; ये महामाया ही सत् और असद्रूप जगत्की रचना करती हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार, आठों वसु, विश्वकर्मा, कुबेर, वरुण, अग्नि, वायु, पूषा, कुमार कार्तिकेय और गणपति—ये सभी देवता उन्हीं महामायाकी शक्तिसे युक्त होकर अपने-अपने कार्य करनेमें समर्थ होते हैं। हे मुनीश्वरो! यदि ऐसा न हो तो वे हिलने-डुलनेमें भी समर्थ नहीं हो सकते॥ ३२—३७॥ | | सा चैव कारणं राजन् जगतः परमेश्वरी ।<br>समाराधय तां भूप कुरु यज्ञं जनाधिप ॥ ३८<br>पूजनं परया भक्त्या तस्या एव विधानतः ।<br>महालक्ष्मीर्महाकाली तथा महासरस्वती ॥ ३९<br>ईश्वरी सर्वभूतानां सर्वकारणकारणम् ।<br>सर्वकामार्थदा शान्ता सुखसेव्या दयान्विता ॥ ४० | हे राजन्! वे परमेश्वरी ही इस जगत्की परम कारण हैं, अतः हे नरपते! अब आप उन्हींकी आराधना करें, उन्हींका यज्ञ करें और परम भक्तिके साथ विधिवत् उन्हींका पूजन करें। वे ही महालक्ष्मी, महाकाली एवं महासरस्वती हैं। वे सब जीवोंकी अधीश्वरी, समस्त कारणोंकी एकमात्र कारण, सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली, शान्तस्वरूपिणी, सुखपूर्वक सेवनीय तथा दयासे परिपूर्ण हैं॥ ३८—४०॥ | | नामोच्चारणमात्रेण वाञ्छितार्थफलप्रदा ।<br>देवैराराधिता पूर्वं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ॥ ४१<br>मोक्षकामैश्च विविधैस्तापसैर्विजितात्मभिः ।<br>अस्पष्टमपि यन्नाम प्रसङ्गेनापि भाषितम् ॥ ४२ | ये भगवती नामोच्चारणमात्रसे ही मनोवांछित फल देनेवाली हैं। पूर्वकालमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवताओं तथा मोक्षकी कामना करनेवाले अनेक जितेन्द्रिय तपस्वियोंने उनकी आराधना की थी। किसी प्रसंगवश अस्पष्टरूपसे ही उच्चारित किया गया उनका नाम सर्वथा दुर्लभ मनोरथोंको भी पूर्ण कर देता है॥ ४१—४२ १/२ ॥ | | ददाति वाञ्छितानर्थान्दुर्लभानपि सर्वथा ।<br>ऐ ऐ इति भयार्तेन दृष्ट्वा व्याघ्रादिकं वने ॥ ४३ | हे नृपश्रेष्ठ! इस सम्बन्धमें एक दृष्टान्त है—सत्यव्रत नामके एक मुनिने वनमें व्याघ्रादि हिंसक पशुओंको देखकर भयसे पीड़ित होकर ‘ऐ-ऐ’ |