भारतकोश
संग्रह पर लौटें

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० ३० ]तृतीय स्कन्ध३९७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुनः प्राप्तं निजं स्थानं काले विपरिवर्तिते।<br>नहुषः पतितो भूमौ शापादजगराकृतिः॥ ५१<br><br>इन्द्राणीं कामयानस्तु ब्राह्मणानवमन्य च।<br>अगस्तिकोपात्सञ्जातः सर्पदेहो महीपतिः॥ ५२उन्होंने पुनः अपना पद प्राप्त कर लिया और नहुषको शापवश अजगरके रूपमें होकर पृथ्वीपर गिरना पड़ा। ब्राह्मणोंका अपमान करके इन्द्राणीको पानेकी इच्छाके कारण ही अगस्त्यमुनिके कोपपूर्वक शाप देनेसे राजा नहुष सर्पदेहवाले हो गये थे॥ ४९–५२॥
तस्माच्छोको न कर्तव्यो व्यसने सति राघव।<br>उद्यमे चित्तमास्थाय स्थातव्यं वै विपश्चिता॥ ५३अतः हे राघव! दुःख आनेपर शोक नहीं करना चाहिये। विज्ञ पुरुषको चाहिये कि ऐसी परिस्थितिमें मनको उद्यमशील बनाकर समयकी प्रतीक्षा करता रहे॥ ५३॥
सर्वज्ञोऽसि महाभाग समर्थोऽसि जगत्पते।<br>किं प्राकृत इवात्यर्थं कुरुषे शोकमात्मनि॥ ५४हे महाभाग! आप सर्वज्ञ हैं। हे जगत्पते! आप सर्वसमर्थ हैं; तब एक प्राकृत पुरुषकी भाँति आप अपने मनमें अत्यन्त शोक क्यों कर रहे हैं?॥ ५४॥
व्यास उवाच<br>इति लक्ष्मणवाक्येन बोधितो रघुनन्दनः।<br>त्यक्त्वा शोकं तथात्यर्थं बभूव विगतज्वरः॥ ५५व्यासजी बोले— इस प्रकार लक्ष्मणकी बातोंसे रघुनन्दन श्रीरामचन्द्रजीको सान्त्वना मिली और वे शोक त्यागकर बिलकुल निश्चिन्त हो गये॥ ५५॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे लक्ष्मणकृतरामशोकसान्त्वनं नामैकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥


अथ त्रिंशोऽध्यायः

श्रीराम और लक्ष्मणके पास नारदजीका आना और उन्हें नवरात्रव्रत करनेका परामर्श देना, श्रीरामके पूछनेपर नारदजीका उनसे देवीकी महिमा और नवरात्रव्रतकी विधि बतलाना, श्रीरामद्वारा देवीका पूजन और देवीद्वारा उन्हें विजयका वरदान देना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
एवं तौ संविदं कृत्वा यावत्तूष्णीं बभूवतुः।<br>आजगाम तदाकाशान्नारदो भगवानृषिः॥ १इस प्रकार राम और लक्ष्मण परस्परमें परामर्श करके ज्यों ही चुप हुए, त्यों ही आकाशमार्गसे देवर्षि नारद वहाँ आ गये॥ १॥
रणयन्महतीं वीणां स्वरग्रामविभूषिताम्।<br>गायन्बृहद्रथं साम तदा तमुपतस्थिवान्॥ २उस समय वे स्वर तथा ग्रामसे विभूषित अपनी महती नामक वीणा बजाते हुए तथा बृहद्रथन्तर सामका गायन करते हुए उनके समीप पहुँचे॥ २॥
दृष्ट्वा तं राम उत्थाय ददावथ वृषं शुभम्।<br>आसनं चार्घपाद्यञ्च कृतवानमितद्युतिः॥ ३उन्हें देखते ही अमित तेजवाले श्रीरामने उठकर उन्हें श्रेष्ठ पवित्र आसन प्रदान किया और तत्पश्चात् अर्घ्य तथा पाद्यसे उनकी पूजा की॥ ३॥
पूजां परमिकां कृत्वा कृताञ्जलिरुपस्थितः।<br>उपविष्टः समीपे तु कृताज्ञो मुनिना हरिः॥ ४भलीभाँति पूजा करनेके बाद भगवान् श्रीराम हाथ जोड़कर खड़े हो गये और फिर मुनिके आज्ञा देनेपर उनके पास ही बैठ गये॥ ४॥

३१८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० ---|--- उपविष्टं तदा रामं सानुजं दुःखमानसम्।<br>पप्रच्छ नारदः प्रीत्या कुशलं मुनिसत्तमः॥ ५ | तब अपने अनुज लक्ष्मणके साथ बैठे हुए खिन्न-मनस्क रामसे मुनीन्द्र नारदजी प्रेमपूर्वक कुशलक्षेम पूछने लगे॥ ५॥ कथं राघव शोकार्तो यथा वै प्राकृतो नरः।<br>हृतां सीतां च जानामि रावणेन दुरात्मना॥ ६<br><br>सुरसद्मगतश्चाहं श्रुत्वाञ्जनकात्मजाम्।<br>पौलस्त्येन हृतां मोहान्मरणं स्वमजानता॥ ७ | नारदजी बोले—हे राघव! आप इस समय साधारण मनुष्यके समान शोकाकुल क्यों हैं? मैं यह जानता हूँ कि दुष्ट रावण सीताको हर ले गया है। जब मैं देवलोकमें गया था, तभी मैंने वहाँ सुना कि अपनी मृत्युको न जाननेसे ही मोहके वशीभूत होकर रावणने जनकनन्दिनीका हरण कर लिया है॥ ६-७॥ तव जन्म च काकुत्स्थ पौलस्त्यनिधनाय वै।<br>मैथिलीहरणं जातमेतदर्थं नराधिप॥ ८ | हे काकुत्स्थ! आपका जन्म ही रावणके निधनके लिये हुआ है। हे नराधिप! इसी कार्यसिद्धिके लिये सीताका हरण हुआ है॥ ८॥ पूर्वजन्मनि वैदेही मुनिपुत्री तपस्विनी।<br>रावणेन वने दृष्टा तपस्यन्ती शुचिस्मिता॥ ९<br><br>प्रार्थिता रावणेनासौ भव भार्येति राघव।<br>तिरस्कृतस्तयासौ वै जग्राह कबरं बलात्॥ १० | पूर्वजन्ममें ये वैदेही एक मुनिकी तपस्विनी कन्या थीं। उस पवित्र मुसकानवाली कन्याको रावणने वनमें तप करते हुए देखा। हे राघव! तब रावणने उससे प्रार्थना की कि तुम मेरी पत्नी बन जाओ। इसपर उसके द्वारा तिरस्कृत किये गये रावणने बलपूर्वक उसके केश पकड़ लिये॥ ९-१०॥ शशाप तत्क्षणं राम रावणं तापसी भृशम्।<br>कुपिता त्यक्तुमिच्छन्ती देहं संस्पर्शदूषितम्॥ ११<br><br>दुरात्मंस्तव नाशार्थं भविष्यामि धरातले।<br>अयोनिजा वरा नारी त्यक्त्वा देहं जहावपि॥ १२ | हे राम! रावणके स्पर्शसे दूषित अपनी देहको त्यागनेकी आकांक्षा रखती हुई उस तापसी मुनिकन्याने अत्यन्त कुपित होकर उसे तत्काल यह घोर शाप दे दिया कि हे दुरात्मन्! तुम्हारे विनाशके लिये मैं भूतलपर गर्भसे जन्म न लेकर एक श्रेष्ठ स्त्रीके रूपमें प्रकट होऊँगी—ऐसा कहकर उस तापसीने अपना शरीर त्याग दिया॥ ११-१२॥ सेयं रंमांशसम्भूता गृहीता तेन रक्षसा।<br>विनाशार्थं कुलस्यैव व्याली स्रगिव सम्भ्रमात्॥ १३ | लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न यह सीता वही है; जिसे भ्रमवश माला समझकर नागिनको धारण करनेवाले व्यक्तिकी भाँति रावणने अपने ही वंशका नाश करनेके लिये हर लिया है॥ १३॥ तव जन्म च काकुत्स्थ तस्य नाशाय चामरैः।<br>प्रार्थितस्य हरेरंशादजवंशेऽप्यजन्मनः॥ १४ | हे काकुत्स्थ! आपका भी जन्म उसी रावणके नाशके लिये देवताओंके प्रार्थना करनेपर अनादि भगवान् विष्णुके अंशसे अजवंशमें हुआ है॥ १४॥ कुरु धैर्यं महाबाहो तत्र सा वर्ततेऽवशा।<br>सतीधर्मरता सीता त्वां ध्यायन्ती दिवानिशम्॥ १५ | हे महाबाहो! आप धैर्य धारण करें; वे किसी दूसरेके वशमें नहीं हो सकतीं! वे सतीधर्मपरायण सीता लंकामें दिन-रात आपका ध्यान करती हुई रह रही हैं॥ १५॥

| अ० ३० ] | तृतीय स्कन्ध | ३९९ | | :--- | :--- | | कामधेनुपयः पात्रे कृत्वा मघवता स्वयम्।<br>पानार्थं प्रेषितं तस्याः पीतं चैवामृतं तथा॥ १६<br>सुरभीदुग्धपानात्सा क्षुत्तृड्दुःखविवर्जिता।<br>जाता कमलपत्राक्षी वर्तते वीक्षिता मया॥ १७ | स्वयं इन्द्रने एक पात्रमें कामधेनुका दूध सीताको पीनेके लिये भेजा था, उस अमृततुल्य दूधको उन्होंने पी लिया है। वे कामधेनुके दुग्धपानसे भूख-प्यासके दुःखसे रहित हो गयी हैं। मैंने उन कमलनयनीको स्वयं देखा है॥ १६-१७॥ | | उपायं कथयाम्यद्य तस्य नाशाय राघव।<br>व्रतं कुरुष्व श्रद्धावानाश्विने मासि साम्प्रतम्॥ १८ | हे राघवेन्द्र! मैं उस रावणके नाशका उपाय बताता हूँ। अब आप इसी आश्विनमासमें श्रद्धापूर्वक नवरात्रव्रत कीजिये॥ १८॥ | | नवरात्रोपवासञ्च भगवत्याः प्रपूजनम्।<br>सर्वसिद्धिकरं राम जपहोमविधानतः॥ १९<br>मेध्यैश्च पशुभिर्देव्या बलिं दत्त्वा विशंसितैः।<br>दशांशं हवनं कृत्वा सुशक्तस्त्वं भविष्यसि॥ २० | हे राम! नवरात्रमें उपवास तथा जप-होमके विधानसे किया गया भगवती-पूजन समस्त सिद्धियोंको प्रदान करनेवाला है। देवीको पवित्र बलि देकर तथा दशांश हवन करके आप पूर्ण शक्तिशाली बन जायँगे॥ १९-२०॥ | | विष्णुना चरितं पूर्वं महादेवेन ब्रह्मणा।<br>तथा मघवता चीर्णं स्वर्गमध्यस्थितेन वै॥ २१ | पूर्वकालमें भगवान् विष्णु, शिव, ब्रह्मा तथा स्वर्ग-लोकमें विराजमान इन्द्रने भी इसका अनुष्ठान किया था॥ २१॥ | | सुखिना राम कर्तव्यं नवरात्रव्रतं शुभम्।<br>विशेषेण च कर्तव्यं पुंसा कष्टगतेन वै॥ २२ | हे राम! सुखी मनुष्यको इस व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये और कष्टमें पड़े हुए मनुष्यको तो यह व्रत विशेषरूपसे करना चाहिये॥ २२॥ | | विश्वामित्रेण काकुत्स्थ कृतमेतन्न संशयः।<br>भृगुणाथ वसिष्ठेन कश्यपेन तथैव च॥ २३<br>गुरुणा हृतदारेण कृतमेतन्महाव्रतम्।<br>तस्मात्त्वं कुरु राजेन्द्र रावणस्य वधाय च॥ २४<br>इन्द्रेण वृत्रनाशाय कृतं व्रतमनुत्तमम्।<br>त्रिपुरस्य विनाशाय शिवेनापि पुरा कृतम्॥ २५<br>हरिणा मधुनाशाय कृतं मेरौ महामते।<br>विधिवत्कुरु काकुत्स्थ व्रतमेतदतन्द्रितः॥ २६ | हे काकुत्स्थ! विश्वामित्र, भृगु, वसिष्ठ और कश्यप भी इस व्रतको कर चुके हैं; इसमें सन्देह नहीं है। इसी प्रकार हरण की गयी पत्नीवाले गुरु बृहस्पतिने भी इस व्रतको किया था। इसलिये हे राजेन्द्र! रावणके वध तथा सीताकी प्राप्तिके लिये आप इस व्रतको कीजिये। पूर्वकालमें इन्द्रने वृत्रासुरके वधके लिये तथा शिवने त्रिपुरदैत्यके वधके लिये यह सर्वश्रेष्ठ व्रत किया था। हे महामते! इसी प्रकार भगवान् विष्णुने भी मधुदैत्यके वधके लिये सुमेरुपर्वतपर यह व्रत किया था, अतः हे काकुत्स्थ! आप भी आलस्यरहित होकर विधिपूर्वक यह व्रत कीजिये॥ २३-२६॥ | | श्रीराम उवाच<br>का देवी किंप्रभावा सा कुतो जाता किमाह्वया।<br>व्रतं किं विधिवद् ब्रूहि सर्वज्ञोऽसि दयानिधे॥ २७ | श्रीराम बोले—हे दयानिधे! आप सर्वज्ञ हैं, अतः मुझे विधिपूर्वक बताइये कि वे कौन देवी हैं, उनका प्रभाव क्या है, वे कहाँसे उत्पन्न हुई हैं, उनका नाम क्या है तथा वह व्रत कौन-सा है?॥ २७॥ | | नारद उवाच<br>शृणु राम सदा नित्या शक्तिराद्या सनातनी।<br>सर्वकामप्रदा देवी पूजिता दुःखनाशिनी॥ २८ | नारदजी बोले—हे राम! सुनिये—वे देवी नित्य, सनातनी और आद्याशक्ति हैं, वे सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण कर देती हैं और अपनी आराधनासे सभी प्रकारके कष्ट दूर कर देती हैं॥ २८॥ |

४००श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३०

| कारणं सर्वजन्तूनां ब्रह्मादीनां रघूद्वह।<br>तस्याः शक्तिं विना कोऽपि स्पन्दितुं न क्षमो भवेत्॥ २९ | हे रघुनन्दन! वे ब्रह्मा आदि देवताओं तथा समस्त जीवोंकी कारणस्वरूपा हैं। उनसे शक्ति पाये बिना कोई हिल-डुल सकनेमें भी समर्थ नहीं है॥ २९॥ | | विष्णोः पालनशक्तिः सा कर्तृशक्तिः पितुर्मम।<br>रुद्रस्य नाशशक्तिः सा त्वन्या शक्तिः परा शिवा॥ ३० | वे ही मेरे पिता ब्रह्माकी सृष्टि-शक्ति हैं, विष्णुकी पालन-शक्ति हैं तथा शंकरकी संहार-शक्ति हैं। वे कल्याणमयी पराम्बा अन्य शक्तिरूपा भी हैं॥ ३०॥ | | यच्च किञ्चित्क्वचिद्वस्तु सदसद्भुवनत्रये।<br>तस्य सर्वस्य या शक्तिस्तदुत्पत्तिः कुतो भवेत्॥ ३१ | इन तीनों लोकोंमें जो कुछ भी कहीं भी सत् या असत् पदार्थ है, उसकी उत्पत्तिमें निमित्तकारण इस देवीके अतिरिक्त और कौन हो सकता है?॥ ३१॥ | | न ब्रह्मा न यदा विष्णुर्न रुद्रो न दिवाकरः।<br>न चेन्द्राद्याः सुराः सर्वे न धरा न धराधराः॥ ३२<br>तदा सा प्रकृतिः पूर्णा पुरुषेण परेण वै।<br>संयुता विहरत्येव युगादौ निर्गुणा शिवा॥ ३३ | इस सृष्टिके आरम्भमें जब ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, इन्द्रादि देवता, पृथ्वी और पर्वत आदि कुछ भी नहीं रहता, तब उस समय वे निर्गुणा, कल्याणमयी, परा प्रकृति ही परमपुरुषके साथ विहार करती हैं॥ ३२-३३॥ | | सा भूत्वा सगुणा पश्चात्करोति भुवनत्रयम्।<br>पूर्वं संसृज्य ब्रह्मादीन्दत्त्वा शक्तींश्च सर्वशः॥ ३४ | वे ही बादमें सगुणा शक्ति बनकर सर्वप्रथम ब्रह्मा आदिका सृजन करके और उन्हें शक्तियाँ प्रदानकर तीनों भुवनोंकी सम्यक् रचना करती हैं॥ ३४॥ | | तां ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात्।<br>सा विद्या परमा ज्ञेया वेदाद्या वेदकारिणी॥ ३५ | उन आदिशक्तिको जानकर प्राणी संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। विद्यास्वरूपा, वेदोंकी आदिकारण, वेदोंको प्रकट करनेवाली तथा परमा उन भगवतीको अवश्य जानना चाहिये॥ ३५॥ | | असंख्यातानि नामानि तस्या ब्रह्मादिभिः किल।<br>गुणकर्मविधानैस्तु कल्पितानि च किं ब्रुवे॥ ३६<br>अकारादिक्षकारान्तैः स्वरैर्वर्णैस्तु योजितैः।<br>असंख्येयानि नामानि भवन्ति रघुनन्दन॥ ३७ | ब्रह्मादि देवताओंने गुण-कर्मके विधानानुसार उनके असंख्य नाम कल्पित किये हैं, मैं कहाँतक बताऊँ? हे रघुनन्दन! ‘अ’ कारसे लेकर ‘क्ष’ पर्यन्त सभी स्वरों तथा वर्णोंके संयोगसे उनके असंख्य नाम बनते हैं॥ ३६-३७॥ | | श्रीराम उवाच<br>विधिं मे ब्रूहि विप्रर्षे व्रतस्यास्य समासतः।<br>करोम्यद्यैव श्रद्धावाञ्छ्रीदेव्याः पूजनं तथा॥ ३८ | श्रीराम बोले— हे देवर्षे! इस नवरात्रव्रतका विधान मुझे संक्षेपमें बताइये; मैं आज ही श्रद्धापूर्वक श्रीदेवीका विधिवत् पूजन करूँगा॥ ३८॥ | | नारद उवाच<br>पीठं कृत्वा समे स्थाने संस्थाप्य जगदम्बिकाम्।<br>उपवासान्नवैव त्वं कुरु राम विधानतः॥ ३९<br>आचार्योऽहं भविष्यामि कर्मण्यस्मिन्महीपते।<br>देवकार्यविधानार्थमुत्साहं प्रकरोम्यहम्॥ ४० | नारदजी बोले— हे राम! किसी समतल भूमिपर पीठासन बनाकर उसपर भगवती जगदम्बिकाकी स्थापना करके विधानपूर्वक नौ दिन उपवास कीजिये। हे राजन्! इस कार्यमें मैं आचार्य बनूँगा; क्योंकि देवताओंके कार्य करनेमें मैं अधिक उत्साह रखता हूँ॥ ३९-४०॥ |

अ० ३० ]तृतीय स्कन्ध४०१
व्यास उवाचव्यासजी बोले—
तच्छ्रुत्वा वचनं सत्यं मत्वा रामः प्रतापवान्।<br>कारयित्वा शुभं पीठं स्थापयित्वाम्बिकां शिवाम्॥ ४१<br><br>विधिवत्पूजनं तस्याश्चकार व्रतवान् हरिः।<br>सम्प्राप्ते चाश्विने मासि तस्मिन्गिरिवरे तदा॥ ४२<br><br>उपवासपरो रामः कृतवान्व्रतमुत्तमम्।<br>होमञ्च विधिवत्तत्र बलिदानञ्च पूजनम्॥ ४३<br><br>भ्रातरौ चक्रतुः प्रेम्णा व्रतं नारदसम्मतम्।<br>अष्टम्यां मध्यरात्रे तु देवी भगवती हि सा॥ ४४<br><br>सिंहारूढा ददौ तत्र दर्शनं प्रतिपूजिता।<br>गिरिशृङ्गे स्थितोवाच राघवं सानुजं गिरा॥ ४५<br><br>मेघगम्भीरया चेदं भक्तिभावेन तोषिता।नारदजीका वचन सुनकर प्रतापी श्रीरामने उसे सत्य मानकर तदनुसार एक सुन्दर पीठासन बनवाकर उसपर अम्बिकाकी स्थापना की। व्रतधारी भगवान् श्रीरामने आश्विनमास लगनेपर उस श्रेष्ठ पर्वतपर उन भगवतीका पूजन किया। उपवासपरायण श्रीरामने यह श्रेष्ठ व्रत करते हुए विधिवत् होम, बलिदान और पूजन किया। इस प्रकार दोनों भाइयोंने नारदजीके द्वारा बताये गये इस व्रतको प्रेमपूर्वक सम्पन्न किया। उनसे सम्यक् पूजित होकर अष्टमीकी मध्यरात्रिकी वेलामें भगवती दुर्गाने सिंहपर सवार होकर उन्हें साक्षात् दर्शन दिया। तदनन्तर भक्तिभावसे प्रसन्न उन भगवतीने पर्वतके शिखरपर स्थित होकर लक्ष्मणसहित रामसे मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा॥ ४१–४५ ½ ॥
देव्युवाचदेवी बोलीं—
राम राम महाबाहो तुष्टास्म्यद्य व्रतेन ते॥ ४६<br><br>प्रार्थयस्व वरं कामं यत्ते मनसि वर्तते।<br>नारायणांशसम्भूतस्त्वं वंशे मानवेऽनघे॥ ४७<br><br>रावणस्य वधायैव प्रार्थितस्त्वममरैरसि।<br>पुरा मत्स्यतनुं कृत्वा हत्वा घोरञ्च राक्षसम्॥ ४८<br><br>त्वया वै रक्षिता वेदाः सुराणां हितमिच्छता।<br>भूत्वा कच्छपरूपस्तु धृतवान्मन्दरं गिरिम्॥ ४९<br><br>अकूपारं प्रमन्थानं कृत्वा देवानपोषयः।<br>कोलरूपं परं कृत्वा दशनाग्रेण मेदिनीम्॥ ५०<br><br>धृतवानसि यद्राम हिरण्याक्षं जघान च।<br>नारसिंहीं तनुं कृत्वा हिरण्यकशिपुं पुरा॥ ५१<br><br>प्रह्लादं राम रक्षित्वा हतवानसि राघव।<br>वामनं वपुरास्थाय पुरा छलितवान्बलिम्॥ ५२<br><br>भूत्वेन्द्रस्यानुजः कामं देवकार्यप्रसाधकः।<br>जमदग्निसुतस्त्वं मे विष्णोरंशेन सङ्गतः॥ ५३हे राम! हे महाबाहो! इस समय मैं आपके व्रतसे सन्तुष्ट हूँ। आपके मनमें जो भी हो, उस अभिलषित वरको माँग लीजिये। आप पवित्र मनुवंशमें नारायणके अंशसे उत्पन्न हुए हैं। हे राम! देवताओंके प्रार्थना करनेपर रावणके वधके लिये आप अवतरित हुए हैं। पूर्वकालमें मत्स्यरूप धारणकर भयानक राक्षसका वध करके देवताओंके हितकी इच्छावाले आपने ही वेदोंकी रक्षा की थी। पुनः कच्छपके रूपमें अवतार लेकर मन्दराचलको अपनी पीठपर धारण किया, जिससे समुद्रका मन्थन करके [अमृतपान कराकर] देवताओंका पोषण किया था। हे राम! आपने वराहका रूप धारणकर अपने दाँतोंकी नोंकपर पृथ्वीको रख लिया और हिरण्याक्षका वध किया था। हे राघव! हे राम! पूर्वकालमें नरसिंहका रूप धारणकर प्रह्लादकी रक्षा करके आपने हिरण्यकशिपुका वध किया था। इसी प्रकार पूर्वकालमें वामनका रूप धारण करके आपने बलिको छला था। उस समय इन्द्रका लघु भ्राता बनकर आपने देवताओंका महान् कार्य सिद्ध किया था। पुनः भगवान् विष्णुके अंशसे जमदग्निके

| ४०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० | | :--- | :--- |

| कृत्वान्तं क्षत्रियाणां तु दानं भूमेरदाद् द्विजे।<br>तथेदानीं तु काकुत्स्थ जातो दशरथात्मजः ॥ ५४<br><br>प्रार्थितस्तु सुरैः सर्वै रावणेनातिपीडितैः।<br>कपयस्ते सहाया वै देवांशा बलवत्तराः ॥ ५५ | पुत्र परशुरामके रूपमें अवतरित होकर क्षत्रियोंका अन्त करके आपने सारी पृथ्वी ब्राह्मणोंको दे दी थी। उसी प्रकार हे काकुत्स्थ! रावणके द्वारा अत्यधिक सताये गये सभी देवताओंके प्रार्थना करनेपर इस समय आप ही दशरथपुत्र श्रीरामके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं॥ ४६—५४ १/२ ॥ | | भविष्यन्ति नरव्याघ्र मच्छक्तिसंयुता ह्यमी।<br>शेषांशोऽप्यनुजस्तेऽयं रावणात्मजनाशकः ॥ ५६<br><br>भविष्यति न सन्देहः कर्तव्योऽत्र त्वयानघ।<br>वसन्ते सेवनं कार्यं त्वया तत्रातिश्रद्धया ॥ ५७ | हे नरोत्तम! देवताओंके अंशसे उत्पन्न ये परम बलशाली वानर मेरी शक्तिसे सम्पन्न होकर आपके सहायक होंगे। शेषनागके अंशस्वरूप आपके ये अनुज लक्ष्मण रावणके पुत्र मेघनादका वध करनेवाले होंगे। हे अनघ! इस विषयमें आपको सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ५५-५६ १/२ ॥ | | हत्वाथ रावणं पापं कुरु राज्यं यथासुखम्।<br>एकादशसहस्त्राणि वर्षाणि पृथिवीतले ॥ ५८<br><br>कृत्वा राज्यं रघुश्रेष्ठ गन्तासि त्रिदिवं पुनः। | वसन्त ऋतुके नवरात्रमें आप परम श्रद्धाके साथ [पुनः] मेरी पूजा कीजिये। तत्पश्चात् पापी रावणका वध करके आप सुखपूर्वक राज्य कीजिये। हे रघुश्रेष्ठ! इस प्रकार ग्यारह हजार वर्षोंतक भूतलपर राज्य करके पुनः आप देवलोकके लिये प्रस्थान करेंगे ॥ ५७-५८ १/२ ॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वान्तर्दधे देवी रामस्तु प्रीतमानसः ॥ ५९<br><br>समाप्य तद् व्रतं चक्रे प्रयाणं दशमीदिने।<br>विजयापूजनं कृत्वा दत्त्वा दानान्यनेकशः ॥ ६० | **व्यासजी बोले—**ऐसा कहकर भगवती दुर्गा वहीं अन्तर्धान हो गयीं और श्रीरामचन्द्रजीने प्रसन्न मनसे उस व्रतका समापन करके दशमी तिथिको विजयापूजन करके तथा अनेकविध दान देकर वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ ५९-६० ॥ | | कपिपतिबलयुक्तः सानुजः श्रीपतिश्च<br>प्रकटपरमशक्त्या प्रेरितः पूर्णकामः।<br>उदधितटगतोऽसौ सेतुबन्धं विधाया-<br>प्यहनदमरशत्रुं रावणं गीतकीर्तिः ॥ ६१ | वानरराज सुग्रीवकी सेनाके साथ अपने अनुजसहित विख्यात यशवाले तथा पूर्णकाम लक्ष्मीपति श्रीराम साक्षात् परमा शक्तिकी प्रेरणासे समुद्रतटपर पहुँचे। वहाँ सेतु-बन्धन करके उन्होंने देवशत्रु रावणका संहार किया ॥ ६१ ॥ | | यः शृणोति नरो भक्त्या देव्याश्चरितमुत्तमम्।<br>स भुक्त्वा विपुलाम्भोगाम्प्राप्नोति परमं पदम् ॥ ६२ | जो मनुष्य भक्तिपूर्वक देवीके उत्तम चरित्रका श्रवण करता है, वह अनेक सुखोंका उपभोग करके परमपद प्राप्त कर लेता है ॥ ६२ ॥ | | सन्त्यन्यानि पुराणानि विस्तराणि बहूनि च।<br>श्रीमद्द्भागवतस्यास्य न तुल्यानीति मे मतिः ॥ ६३ | यद्यपि अन्य बहुतसे विस्तृत पुराण हैं, किंतु वे इस श्रीमद्देवीभागवतमहापुराणके तुल्य नहीं हैं, ऐसी मेरी धारणा है ॥ ६३ ॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे रामाय देवीवरदानं नाम त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥


॥ तृतीयः स्कन्धः समाप्तः ॥

श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण

॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥

श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण

चतुर्थः स्कन्धः

अथ प्रथमोऽध्यायः

वसुदेव, देवकी आदिके कष्टोंके कारणके सम्बन्धमें जनमेजयका प्रश्न

जनमेजय उवाच
वासवेय मुनिश्रेष्ठ सर्वज्ञाननिधेऽनघ।<br>प्रष्टुमिच्छाम्यहं स्वामिन्नस्माकं कुलवर्धन॥ १जनमेजय बोले— हे वासवेय! हे मुनिवर! हे सर्वज्ञाननिधे! हे अनघ! हमारे कुलकी वृद्धि करनेवाले हे स्वामिन्! मैं [श्रीकृष्णके विषयमें] पूछना चाहता हूँ॥ १॥
शूरसेनसुतः श्रीमान्वसुदेवः प्रतापवान्।<br>श्रुतं मया हरैर्यस्य पुत्रभावमवाप्तवान्॥ २मैंने सुना है कि परम प्रतापी श्रीमान् वसुदेव राजा शूरसेनके पुत्र थे, जिनके पुत्ररूपमें साक्षात् भगवान् विष्णु अवतरित हुए थे॥ २॥
देवानापि पूज्योऽभून्नाम्ना चानकदुन्दुभिः।<br>कारागारे कथं बद्धः कंसस्य धर्मतत्परः॥ ३<br><br>देवक्या भार्यया सार्धं किमागः कृतवानसौ।<br>देवक्या बालषट्कस्य विनाशश्च कृतः पुनः॥ ४आनकदुन्दुभि नामसे विख्यात वे वसुदेव देवताओंके भी पूज्य थे। धर्मपरायण होते हुए भी वे कंसके कारागारमें क्यों बन्द हुए? उन्होंने अपनी भार्या देवकीसहित ऐसा क्या अपराध किया था, जिससे ययातिके कुलमें उत्पन्न कंसके द्वारा देवकीके छः पुत्रोंका वध कर दिया गया?॥ ३-४ १/२॥
तेन कंसेन कस्माद्वै ययातिकुलजेन च।<br>कारागारे कथं जन्म वासुदेवस्य वै हरेः॥ ५<br><br>गोकुले च कथं नीतो भगवान्सात्वतां पतिः।<br>गतो जन्मान्तरं कस्मात्पितरौ निगडे स्थितौ॥ ६<br><br>देवकी वसुदेवौ च कृष्णस्यामिततेजसः।<br>कथं न मोचितौ वृद्धौ पितरौ हरिणामुना॥ ७<br><br>जगत्कर्तुं समर्थेन स्थितेन जनकोदरे।<br>प्राक्तनं किं तयोः कर्म दुर्विज्ञेयं महात्मभिः॥ ८<br><br>जन्म वै वासुदेवस्य यत्रासीत्परमात्मनः।<br>के ते पुत्राश्च का बाला या कंसेन विपोथिता॥ ९<br>शिलायां निर्गता व्योम्नि जाता त्वष्टभुजा पुनः।साक्षात् भगवान् विष्णुने वसुदेवके पुत्ररूपमें कारागारमें जन्म क्यों ग्रहण किया? देवताओंके अधिपति भगवान् श्रीकृष्ण गोकुलमें किस प्रकार ले जाये गये और वे भगवान् होते हुए भी जन्मान्तरको क्यों प्राप्त हुए? अमित तेजस्वी श्रीकृष्णके माता-पिता वसुदेव और देवकीको बन्धनमें क्यों आना पड़ा? जगत्की सृष्टि करनेमें समर्थ उन भगवान् श्रीकृष्णने माता देवकीके गर्भमें स्थित रहते हुए ही अपने वृद्ध माता-पिताको बन्धनसे मुक्त क्यों नहीं कर दिया? उन वसुदेव तथा देवकीने महात्माओंद्वारा भी दुःसाध्य ऐसे कौन-से कर्म पूर्वजन्ममें किये थे, जिससे उनके यहाँ परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णका जन्म हुआ? वे छः पुत्र कौन थे, वह कन्या कौन थी, जिसे कंसने पत्थरपर पटक दिया था और वह हाथसे छूटकर आकाशमें चली गयी तथा पुनः अष्टभुजाके रूपमें प्रकट हुई?॥ ५-९ १/२॥

| ४०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गार्हस्थ्यञ्च हरेर्ब्रूहि बहुभार्यस्य चानघ॥ १०<br><br>कार्याणि तत्र तान्येव देहत्यागं च तस्य वै।<br>किंवदन्त्या श्रुतं यत्तन्मनो मोहयतीव मे॥ ११<br><br>चरितं वासुदेवस्य त्माख्याहि यथातथम्।<br>नरनारायणौ देवौ पुराणावृषिसत्तमौ॥ १२हे अनघ! बहुत-सी पत्नियोंवाले श्रीकृष्णके गृहस्थ-जीवन, उसमें उनके द्वारा किये गये कार्यों तथा अन्तमें उनके शरीर-त्यागके विषयमें बताइये। किंवदन्तीके आधारपर मैंने भगवान् श्रीकृष्णका जो चरित्र सुना है, उससे मेरा मन परम विस्मयमें पड़ गया है। अतः आप उनके चरित्रका सम्यक् रूपसे वर्णन कीजिये॥ १०-११ १/२॥
धर्मपुत्रौ महात्मानौ तपश्चेरतुरुत्तमम्।<br>यौ मुनी बहुवर्षाणि पुण्ये बदरिकाश्रमे॥ १३<br><br>निराहारौ जितात्मानौ निःस्पृहौ जितषड्गुणौ।<br>विष्णोरंशौ जगत्क्षेम्ने तपश्चेरतुरुत्तमम्॥ १४<br><br>तयोरंशावतारौ हि जिष्णुकृष्णौ महाबलौ।<br>प्रसिद्धौ मुनिभिः प्रोक्तौ सर्वज्ञैर्नारदादिभिः॥ १५<br><br>विद्यमानशरीरौ तौ कथं देहान्तरं गतौ।<br>नरनारायणौ देवौ पुनः कृष्णार्जुनौ कथम्॥ १६पुरातन, धर्मपुत्र, महात्मा तथा देवस्वरूप ऋषिश्रेष्ठ नर-नारायणने उत्तम तप किया था। जगत्के कल्याणार्थ निराहार, जितेन्द्रिय तथा स्पृहारहित रहते हुए काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद-मात्सर्य—इन छहोंपर पूर्ण नियन्त्रण रखकर साक्षात् भगवान् विष्णुके अंशस्वरूप जिन नर-नारायण मुनियोंने पुण्यक्षेत्र बदरिकाश्रममें बहुत वर्षोंतक श्रेष्ठ तपस्या की थी, नारद आदि सर्वज्ञ मुनियोंने प्रसिद्ध तथा महाबलसम्पन्न अर्जुन तथा श्रीकृष्णको उन्हीं दोनोंका अंशावतार बताया है। उन भगवान् नर-नारायणने एक शरीर धारण करते हुए भी दूसरा जन्म क्यों प्राप्त किया और पुनः वे कृष्ण तथा अर्जुन कैसे हुए?॥ १२—१६॥
यौ चक्रतुस्तपश्चोग्रं मुक्त्यर्थं मुनिसत्तमौ।<br>तौ कथं प्राप्तुर्देंहौ प्राप्तयोगौ महातपौ॥ १७जिन मुनिप्रवर नर-नारायणने मुक्तिहेतु कठोर तपस्या की थी; उन महातपस्वी तथा योगसिद्धिसम्पन्न दोनों देवोंने मानव-शरीर क्यों प्राप्त किया?॥ १७॥
शूद्रः स्वधर्मनिष्ठस्तु देहान्ते क्षत्रियस्तु सः।<br>शुभाचारो मृतो यो वै स शूद्रो ब्राह्मणो भवेत्॥ १८<br><br>ब्राह्मणो निःस्पृहः शान्तो भवरोगाद्विमुच्यते।<br>विपरीतमिदं भाति नरनारायणौ च तौ॥ १९<br><br>तपसा शोषितात्मानौ क्षत्रियौ तौ बभूवतुः।<br>केन तौ कर्मणा शान्तौ जातौ शापेन वा पुनः॥ २०<br><br>ब्राह्मणौ क्षत्रियौ जातौ कारणं तन्मुने वद।<br>यादवानां विनाशश्च ब्रह्मशापादिति श्रुतः॥ २१अपने धर्ममें निष्ठा रखनेवाला शूद्र अगले जन्ममें क्षत्रिय होता है और जो शूद्र वर्तमान जन्ममें पवित्र आचरण करता है, वह मृत्युके अनन्तर ब्राह्मण होता है। कामनाओंसे रहित शान्त-स्वभाव ब्राह्मण पुनर्जन्मरूपी रोगसे मुक्त हो जाता है, किंतु उनके विषयमें तो सर्वथा विपरीत स्थिति दिखायी देती है। उन नर-नारायणने तपस्यासे अपना शरीरतक सुखा दिया, फिर भी वे ब्राह्मणसे क्षत्रिय हो गये। शान्त-स्वभाव वे दोनों अपने किस कर्मसे अथवा किस शापसे ब्राह्मणसे क्षत्रिय हुए? हे मुने! वह कारण बताइये॥ १८—२० १/२॥
कृष्णास्यापि हि गान्धार्याः शापेनैव कुलक्षयः।<br>प्रद्युम्नहरणं चैव शम्बरेण कथं कृतम्॥ २२मैंने यह भी सुना है कि यादवोंका विनाश ब्राह्मणके शापसे हुआ था और गान्धारीके शापसे ही श्रीकृष्णके वंशका विनाश हुआ था। शम्बरासुरने
अ० १ ]चतुर्थ स्कन्ध४०५

| वर्तमाने वासुदेवे देवदेवे जनार्दने।<br>पुत्रस्य सूतिकागेहाद्धरणं चातिदुर्घटम्॥ २३<br><br>द्वारकादुर्गमध्याद्वै हरिवेश्मादुरत्ययात्।<br>न ज्ञातं वासुदेवेन तत्कथं दिव्यचक्षुषा॥ २४<br><br>सन्देहोऽयं महान्ब्रह्मन्निःसन्देहं कुरु प्रभो।<br>यत्पत्न्यो वासुदेवस्य दस्युभिर्लुण्ठिता हृताः॥ २५ | कृष्ण-पुत्र प्रद्युम्नका अपहरण क्यों किया? देवाधिदेव जनार्दन वासुदेवके रहते सूतिकागृहसे पुत्रका हरण हो जाना एक अत्यन्त अद्भुत बात है। द्वारकाके किलेमें श्रीकृष्णके दुर्गम राजमहलसे पुत्रका हरण हो गया; किंतु भगवान् श्रीकृष्णने उसे अपनी दिव्य दृष्टिसे क्यों नहीं देख लिया? हे ब्रह्मन्! यह एक महान् शंका मेरे समक्ष उपस्थित है। हे प्रभो! आप मुझे सन्देह-मुक्त कर दीजिये॥ २१—२४ १/२॥ | | स्वर्गते देवदेवे तु तत्कथं मुनिसत्तम।<br>संशयो जायते ब्रह्मंश्चित्तान्दोलनकारकः॥ २६ | देवदेव श्रीकृष्णके स्वर्गगमनके अनन्तर उनकी पत्नियोंको लुटेरोंने लूट लिया; हे मुनिराज! वह कैसे हुआ? हे ब्रह्मन्! मनको आन्दोलित कर देनेवाला यह संदेह मुझे हो रहा है॥ २५-२६॥ | | विष्णोरंशः समुद्भूतः शौरिर्भूभारहारकृत्।<br>स कथं मथुराराज्यं भयात्त्यक्त्वा जनार्दनः॥ २७<br><br>द्वारवत्यां गतः साधो ससैन्यः ससुहृद्गणः।<br>अवतारो हरेः प्रोक्तो भूभारहरणाय वै॥ २८<br><br>पापात्मनां विनाशाय धर्मसंस्थापनाय च।<br>तत्कथं वासुदेवेन चौरास्ते न निपातिताः॥ २९<br><br>यैर्हृता वासुदेवस्य पत्न्यः संलुण्ठिताश्च ताः।<br>स्तेनास्ते किं न विज्ञाताः सर्वज्ञेन सता पुनः॥ ३० | श्रीकृष्ण भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुए थे और उन्होंने पृथ्वीका भार उतारा था। हे साधो! ऐसे वे जनार्दन जरासन्धके भयसे मथुराका राज्य छोड़कर अपनी सेना तथा बन्धु-बान्धवोंके सहित द्वारकापुरी क्यों चले गये? ऐसा कहा जाता है कि श्रीकृष्णका अवतार पृथ्वीको भारसे मुक्त करने, पापाचारियोंको विनष्ट करने तथा धर्मकी स्थापना करनेके लिये हुआ था, फिर भी वासुदेवने उन लुटेरोंको क्यों नहीं मार डाला, जिन लुटेरोंने श्रीकृष्णकी पत्नियोंको लूटा तथा उनका हरण किया? सर्वज्ञ होते हुए भी श्रीकृष्ण उन चोरोंको क्यों नहीं जान सके?॥ २७—३०॥ | | भीष्मद्रोणवधः कामं भूभारहरणे मतः।<br>अर्चिताश्च महात्मानः पाण्डवा धर्मतत्पराः॥ ३१<br><br>कृष्णभक्ताः सदाचारा युधिष्ठिरपुरोगमाः।<br>ते कृत्वा राजसूयञ्च यज्ञराजं विधानतः॥ ३२<br><br>दक्षिणा विविधा दत्त्वा ब्राह्मणेभ्योऽतिभावतः।<br>पाण्डुपुत्रास्तु देवांशा वासुदेवाश्रिता मुने॥ ३३<br><br>घोरं दुःखं कथं प्राप्ताः क्व गतं सुकृतञ्च तत्।<br>किं तत्पापं महद्रौद्रं येन ते पीडिताः सदा॥ ३४ | भीष्मपितामह तथा द्रोणाचार्यका वध पृथ्वीका भार-हरणस्वरूप कार्य कैसे माना गया? युधिष्ठिर आदि सदाचारवान्, महात्मा, धर्मपरायण, पूज्य तथा श्रीकृष्ण-भक्त उन पाण्डवोंने यज्ञोंके राजा कहे जानेवाले राजसूय-यज्ञका विधिपूर्वक अनुष्ठान करके उस यज्ञमें ब्राह्मणोंको श्रद्धापूर्वक अनेक प्रकारकी दक्षिणाएँ दीं। हे मुने! वे पाण्डु-पुत्र देवताओंके अंशसे प्रादुर्भूत थे तथा श्रीकृष्णके आश्रित थे, फिर भी उन्हें इतने महान् कष्ट क्यों भोगने पड़े? उस समय उनके पुण्य कार्य कहाँ चले गये थे? उन्होंने ऐसा कौन-सा महाभयानक पाप किया था, जिसके कारण वे सदा कष्ट पाते रहे?॥ ३१—३४॥ |

| ४०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ | | :--- | :--- |

| द्रौपदी च महाभागा वेदीमध्यात्समुत्थिता।<br>रमांशजा च साध्वी च कृष्णभक्तियुता तथा॥ ३५<br><br>सा कथं दुःखमतुलं प्राप घोरं पुनः पुनः।<br>दुःशासनेन सा केशे गृहीता पीडिता भृशम्॥ ३६<br><br>रजस्वला सभायां तु नीता भीतैकवाससा।<br>विराटनगरे दासी जाता मत्स्यस्य सा पुनः॥ ३७<br><br>धर्षिता कीचकेनाथ रुदती कुररी यथा।<br>हृता जयद्रथेनाथ क्रन्दमानातिदुःखिता॥ ३८<br><br>मोचिता पाण्डवैः पश्चाद् बलवद्भिर्महात्मभिः।<br>पूर्वजन्मकृतं पापं किं तद्येन च पीडिताः॥ ३९ | पुण्यात्मा द्रौपदी यज्ञकी वेदीके मध्यसे प्रकट हुई थी। वह लक्ष्मीके अंशसे उत्पन्न थी, साध्वी थी तथा सदा श्रीकृष्णकी भक्तिमें लीन रहती थी। उस द्रौपदीने भी बार-बार महाभीषण संकट क्यों प्राप्त किया? दुःशासनके द्वारा उसे बाल पकड़कर घसीटा गया तथा अत्यधिक प्रताड़ित किया गया। केवल एक वस्त्र धारण की हुई वह भयाकुल द्रौपदी रजस्वलावस्थामें ही कौरवोंकी सभामें ले जायी गयी। पुनः उसे विराटनगरमें मत्स्यनरेशकी दासी बनना पड़ा। कीचकके द्वारा अपमानित होनेपर वह कुररी पक्षीकी भाँति बहुत रोयी थी। पुनः जयद्रथने उसका अपहरण कर लिया, जिसपर वह करुणक्रन्दन करती हुई अत्यधिक दुःखित हुई थी। बादमें बलवान् महात्मा पाण्डवोंने उसे मुक्त कराया था। क्या यह उन सबके पूर्वजन्ममें किये गये पापकृत्यका फल था, जो वे इतने पीड़ित हुए?॥ ३५-३९॥ | | दुःखान्यनेकान्याप्तास्ते कथयाद्य महामते।<br>राजसूयं क्रतुवरं कृत्वा ते मम पूर्वजाः॥ ४०<br><br>दुःखं महत्तरं प्राप्ताः पूर्वजन्मकृतेन वै।<br>देवांशानां कथं तेषां संशयोऽयं महान्हि मे॥ ४१ | हे महामते! उन्हें नानाविध कष्ट प्राप्त हुए, मुझे इसका कारण बताइये। यज्ञोंमें श्रेष्ठ राजसूययज्ञ करनेपर भी मेरे उन पूर्वजोंने महान् कष्ट प्राप्त किया। लगता है पूर्वजन्ममें कृत कर्मोंका ही यह फल है। देवताओंके अंश होनेपर भी उन्हें कष्ट प्राप्त हुआ; मुझे यह महान् सन्देह है!॥ ४०-४१॥ | | सदाचारैस्तु कौन्तेयैर्भीष्मद्रोणादयो हताः।<br>छलेन धनलाभार्थं जानानैर्नश्वरं जगत्॥ ४२ | महान् सदाचारपरायण पाण्डवोंने जगत्को नाशवान् जाननेके बावजूद भी धनके लोभसे छद्मका आश्रय लेकर भीष्मपितामह तथा द्रोणाचार्य आदिका संहार किया॥ ४२॥ | | प्रेरिता वासुदेवेन पापे घोरे महात्मना।<br>कुलं क्षयितवन्तस्ते हरिणा परमात्मना॥ ४३ | महात्मा वासुदेवने उन्हें इस घोर पापकृत्यके लिये प्रेरित किया और उन्हीं परमात्मा श्रीकृष्णके द्वारा प्रेरित किये जानेपर उन पाण्डवोंने अपने कुलका विनाश कर डाला॥ ४३॥ | | वरं भिक्षाटनं साधोर्नीवारैर्जीवनं वरम्।<br>योधान् हत्वा लोभेन शिल्पेन जीवनं वरम्॥ ४४ | सज्जन पुरुषोंके लिये भिक्षा माँगकर अथवा नीवार आदि खाकर जीवन बिता लेना श्रेयस्कर होता है। लोभके वशीभूत होकर वीर पुरुषोंका वध न करके शिल्पकार्य आदिके माध्यमसे जीवन-यापन करना उत्तम होता है॥ ४४॥ |

अ० २ ]चतुर्थ स्कन्ध४०७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विच्छिन्नस्तु त्वया वंशो रक्षितो मुनिसत्तम।<br>समुत्पाद्य सुतानाशु गोलकाञ्छत्रुनाशनान्॥ ४५हे मुनिसत्तम! आपने वंशके समाप्त हो जानेपर शत्रुओंका विनाश करनेमें समर्थ गोलक पुत्रोंको [नियोगद्वारा] उत्पन्न करके शीघ्र ही वंशकी रक्षा की थी॥ ४५॥
सोऽल्पेनैव तु कालेन विराटतनयासुतः।<br>तापसस्य गले सर्पं न्यस्तवान्कथमद्भुतम्॥ ४६कुछ ही समयके पश्चात् विराटपुत्री उत्तराके पुत्र महाराज परीक्षित्‌ने एक तपस्वीके गलेमें मृत सर्प डाल दिया। यह अद्भुत घटना कैसे घटित हो गयी?॥ ४६॥
न कोऽपि ब्राह्मणं द्वेष्टि क्षत्रियस्य कुलोद्भवः।<br>तापसं मौनसंयुक्तं पित्रा किं तत्कृतं मुने॥ ४७क्षत्रिय-कुलमें उत्पन्न कोई भी व्यक्ति ब्राह्मणसे द्वेष नहीं करता है। हे मुने! मेरे पिताने मौनव्रत धारण किये हुए उन तपस्वीके साथ ऐसा क्यों किया?॥ ४७॥
एतैरन्यैश्च सन्देहैर्र्विकलं मे मनोऽधुना।<br>स्थिरं कुरु पितः साधो सर्वज्ञोऽसि दयानिधे॥ ४८इन तथा अन्य कई प्रकारकी शंकाओंसे मेरा मन इस समय आकुलित हो रहा है। हे तात! हे साधो! हे दयानिधे! आप तो सर्वज्ञ हैं, अतएव [सन्देहोंको दूर करके] मेरे मनको शान्त कीजिये॥ ४८॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे जनमेजयप्रश्नो नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥


अथ द्वितीयोऽध्यायः

व्यासजीका जनमेजयको कर्मकी प्रधानता समझाना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>एवं पृष्टः पुराणज्ञो व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>परीक्षितसुतं शान्तं ततो वै जनमेजयम्॥ १<br>उवाच संशयच्छेत्तृ वाक्यं वाक्यविशारदः।**सूतजी बोले—**हे मुनियो! ऐसा पूछे जानेपर पुराणवेत्ता, वाणीविशारद सत्यवती-पुत्र महर्षि व्यासने शान्त स्वभाववाले परीक्षित्-पुत्र जनमेजयसे उनके सन्देहोंको दूर करनेवाले वचन कहे— ॥ १ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>राजन् किमेतद्वक्तव्यं कर्मणां गहना गतिः॥ २<br><br>दुर्ज्ञेया किल देवानां मानवानां च का कथा।<br>यदा समुत्थितं चैतद् ब्रह्माण्डं त्रिगुणात्मकम्॥ ३<br><br>कर्मणैव समुत्पत्तिः सर्वेषां नात्र संशयः।<br>अनादिनिधना जीवाः कर्मबीजसमुद्भवाः॥ ४<br><br>नानायोनिषु जायन्ते म्रियन्ते च पुनः पुनः।<br>कर्मणा रहितो देहसंयोगो न कदाचन॥ ५**व्यासजी बोले—**हे राजन्! इस विषयमें क्या कहा जाय। कर्मोंकी बड़ी गहन गति होती है। कर्मकी गति जाननेमें देवता भी समर्थ नहीं हैं, मानवोंकी क्या बात! जब इस त्रिगुणात्मक ब्रह्माण्डका आविर्भाव हुआ, उसी समयसे कर्मके द्वारा सभीकी उत्पत्ति होती आ रही है, इस विषयमें सन्देह नहीं है। आदि तथा अन्तसे रहित होते हुए भी समस्त जीव कर्मरूपी बीजसे उत्पन्न होते हैं। वे जीव नानाविध योनियोंमें बार-बार पैदा होते हैं और मरते हैं। कर्मसे रहित जीवका देह-संयोग कदापि सम्भव नहीं है॥ २–५॥
४०८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २

| शुभाशुभैस्तथा मिश्रैः कर्मभिर्वेष्टितं त्विदम्।<br>त्रिविधानि हि तान्याहुर्बुधास्तत्त्वविदश्च ये॥ ६<br><br>सञ्चितानि भविष्यन्ति प्रारब्धानि तथा पुनः।<br>वर्तमानानि देहेऽस्मिंस्त्रैविध्यं कर्मणां किल॥ ७ | शुभ, अशुभ तथा मिश्र—इन कर्मोंसे यह जगत् सदा व्याप्त रहता है। तत्त्वोंके ज्ञाता जो विद्वान् हैं; उन्होंने संचित, प्रारब्ध तथा वर्तमान—ये तीन प्रकारके कर्म बताये हैं। कर्मोंका त्रैविध्य इस शरीरमें अवश्य विद्यमान रहता है॥ ६-७॥ | | ब्रह्मादीनां च सर्वेषां तद्वशत्वं नराधिप।<br>सुखं दुःखं जरामृत्युहर्षशोकादयस्तथा॥ ८<br><br>कामक्रोधौ च लोभश्च सर्वे देहगता गुणाः।<br>दैवाधीनाश्च सर्वेषां प्रभवन्ति नराधिप॥ ९ | हे राजन्! ब्रह्मा आदि सभी देवता भी उस कर्मके वशवर्ती होते हैं। सुख, दुःख, वृद्धावस्था, मृत्यु, हर्ष, शोक, काम, क्रोध, लोभ आदि—ये सभी देहगत गुण हैं। हे राजेन्द्र! ये दैवके अधीन होकर सभी जीवोंको प्राप्त होते हैं॥ ८-९॥ | | रागद्वेषादयो भावाः स्वर्गेऽपि प्रभवन्ति हि।<br>देवानां मानवानाञ्च तिरश्चां च तथा पुनः॥ १० | राग, द्वेष आदि भाव स्वर्गमें भी होते हैं और इस प्रकार ये भाव देवताओं, मनुष्यों तथा पशु-पक्षियोंमें भी विद्यमान रहते हैं॥ १०॥ | | विकाराः सर्व एवैते देहेन सह सङ्गताः।<br>पूर्ववैरानुयोगेन स्नेहयोगेन वै पुनः॥ ११ | पूर्वजन्मके किये हुए वैर तथा स्नेहके कारण ये समस्त विकार शरीरके साथ सदा ही संलग्न रहते हैं॥ ११॥ | | उत्पत्तिः सर्वजन्तूनां विना कर्म न विद्यते।<br>कर्मणा भ्रमते सूर्यः शशाङ्कः क्षयरोगवान्॥ १२ | समस्त जीवोंकी उत्पत्ति कर्मके बिना हो ही नहीं सकती है। कर्मसे ही सूर्य नियमित रूपसे परिभ्रमण करता है और चन्द्रमा क्षयरोगसे ग्रस्त रहता है॥ १२॥ | | कपाली च तथा रुद्रः कर्मणैव न संशयः।<br>अनादिनिधनं चैतत्कारणं कर्म विद्यते॥ १३ | अपने कर्मके प्रभावसे ही रुद्रको मुण्डोंकी माला धारण करनी पड़ती है; इसमें कोई सन्देह नहीं है। आदि-अन्तरहित यह कर्म ही जगत्का कारण है॥ १३॥ | | तेनेह शाश्वतं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्।<br>नित्यानित्यविचारेऽत्र निमग्ना मुनयः सदा॥ १४<br><br>न जानन्ति किमेतद्वै नित्यं वानित्यमेव च।<br>मायायां विद्यमानायां जगन्नित्यं प्रतीयते॥ १५ | स्थावर-जंगमात्मक यह समग्र शाश्वत विश्व उसी कर्मके प्रभावसे नियन्त्रित है। सभी मुनिगण इस कर्ममय जगत्की नित्यता तथा अनित्यताके विचारमें सदा डूबे रहते हैं। फिर भी वे नहीं जान पाते कि यह जगत् नित्य है अथवा अनित्य। जबतक माया विद्यमान रहती है, तबतक यह जगत् नित्य प्रतीत होता है॥ १४-१५॥ | | कार्याभावः कथं वाच्यः कारणे सति सर्वथा।<br>माया नित्या कारणञ्च सर्वेषां सर्वदा किल॥ १६ | कारणकी सर्वथा सत्ता रहनेपर कार्यका अभाव कैसे कहा जा सकता है? माया नित्य है और वही सर्वदा सबका कारण है॥ १६॥ | | कर्मबीजं ततोऽनित्यं चिन्तनीयं सदा बुधैः।<br>भ्रमत्येव जगत्सर्वं राजन्कर्मनियन्त्रितम्॥ १७ | अतएव कर्मबीजकी अनित्यतापर बुद्धिमान् पुरुषोंको सदा चिन्तन करना चाहिये। हे राजन्! सम्पूर्ण जगत् कर्मके द्वारा नियन्त्रित होकर सदा परिवर्तित होता रहता है॥ १७॥ |

अ० २ ]चतुर्थ स्कन्ध४०९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नानायोनिषु राजेन्द्र नानाधर्ममयेषु च।<br>इच्छया च भवेज्जन्म विष्णोरमिततेजसः॥ १८<br><br>युगे युगेष्वनेकासु नीचयोनिषु तत्कथम्।<br>त्यक्त्वा वैकुण्ठसंवासं सुखभोगाननेकquery/शः॥ १९<br><br>विण्मूत्रमन्दिरे वासं संत्रस्तः कोऽभिवाञ्छति।<br>पुष्पावचयलीलां च जलकेलिं सुखासनम्॥ २०<br><br>त्यक्त्वा गर्भगृहे वासं कोऽभिवाञ्छति बुद्धिमान्।<br>तूलिकां मृदुसंयुक्तां दिव्यां शय्यां विनिर्मिताम्॥ २१<br><br>त्यक्त्वाधोमुखवासं च कोऽभिवाञ्छति पण्डितः।<br>गीतं नृत्यञ्च वाद्यञ्च नानाभावसमन्वितम्॥ २२<br><br>मुक्त्वा को नरके वासं मनसापि विचिन्तयेत्।<br>सिन्धुजाद्भुतभावानां रसं त्यक्त्वा सुदुस्त्यजम्॥ २३<br><br>विण्मूत्ररसपानञ्च क इच्छेन्मतिमान्नरः।<br>गर्भवासात्परो नास्ति नरको भुवनत्रये॥ २४<br><br>तद्भीताश्च प्रकुर्वन्ति मुनयो दुस्तरं तपः।<br>हित्वा भोगञ्च राज्यञ्च वने यान्ति मनस्विनः॥ २५<br><br>यद्भीतास्तु विमूढात्मा कस्तं सेवितुमिच्छति।<br>गर्भे तुदन्ति कृमयो जठराग्निस्तपत्यधः॥ २६<br><br>वपासंवेष्टनं क्रूरं किं सुखं तत्र भूपते।<br>वरं कारागृहे वासो बन्धनं निगडैर्वरम्॥ २७<br><br>अल्पमात्रं क्षणं नैव गर्भवासः क्वचिच्छुभः।<br>गर्भवासे महद्दुःखं दशमासनिवासने॥ २८हे राजेन्द्र ! यदि अमित तेजवाले भगवान् विष्णु अपनी इच्छासे जन्म लेनेके लिये स्वतन्त्र होते तो वे नानाविध योनियोंमें, नानाविध धर्म-कर्मानुरूप युगोंमें तथा अनेक प्रकारकी निम्न योनियोंमें जन्म क्यों लेते ? अनेक प्रकारके सुखभोगों और वैकुण्ठपुरीका निवास छोड़कर मल-मूत्रवाले स्थान (उदर)-में भयभीत होकर भला कौन रहना चाहेगा ? फूल चुननेकी क्रीड़ा, जल-विहार तथा सुखदायक आसनका परित्यागकर कौन बुद्धिमान् गर्भगृहमें वास करना चाहेगा ? कोमल रूईसे निर्मित गद्दे तथा दिव्य शय्याको छोड़कर गर्भमें औंधे मुँह पड़े रहना भला कौन विद्वान् पुरुष पसन्द कर सकता है ? अनेक प्रकारके भावोंसे युक्त गीत, वाद्य तथा नृत्यका परित्याग करके गर्भरूपी नरकमें रहनेका मनमें विचारतक भला कौन कर सकता है ? ऐसा कौन बुद्धिमान् व्यक्ति होगा जो लक्ष्मीके अद्भुत भावोंके अत्यन्त कठिनाईसे त्याग करनेयोग्य रसको छोड़कर मल-मूत्रका रस पीनेकी इच्छा करेगा ? अतएव तीनों लोकोंमें गर्भवाससे बढ़कर नरकस्वरूप अन्य कोई स्थल नहीं है। गर्भवाससे भयभीत होकर मुनिलोग कठिन तपस्या करते हैं। बड़े-बड़े मनस्वी पुरुष जिस गर्भवाससे डरकर राज्य तथा सुखका परित्याग करके वनमें चले जाते हैं, ऐसा कौन मूर्ख होगा, जो उसके सेवनकी इच्छा करेगा? ॥ १८-२५ १/२ ॥<br><br>गर्भमें कीड़े काटते हैं और नीचेसे जठराग्नि तपाती रहती है। हे राजन्! उस समय शरीरमें अतिशय दुर्गन्धयुक्त मज्जा लगी रहती है; तो फिर वहाँ कौन-सा सुख है ? कारागारमें रहना और बेड़ियोंमें बँधे रहना अच्छा है, किंतु एक क्षणके अल्पांश कालतक भी गर्भमें रहना कदापि शुभ नहीं होता। गर्भवासमें जीवको अत्यधिक पीड़ा होती है; वहाँ दस महीनेतक रहना पड़ता है। इसके अतिरिक्त अत्यन्त दारुण योनि-यन्त्रसे बाहर आनेमें महान् कष्ट प्राप्त होता है। बाल्यावस्थामें भी अज्ञानता तथा न बोल पानेके कारण बहुत कष्ट मिलता है। परतन्त्र तथा अत्यन्त भयभीत बालक भूख तथा प्यासकी पीड़ाके कारण अशक्त रहता है। भूखे बालकको रोता हुआ देखकर माता [रोनेका कारण जाननेके लिये]

| ४१० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ | | :--- | :--- |

श्लोकअर्थ
तथा निःसरणे दुःखं योनियन्त्रेऽतिदारुणे।<br>बालभावे तदा दुःखं मूकाङ्गभावसंयुक्तम्॥ २९<br>क्षुत्तृष्णावेदनायुक्तः परतन्त्रोऽतिकातरः।<br>क्षुधिते रुदिते बाले माता चिन्तातुरा तदा॥ ३०<br>भेषजं पातुमिच्छन्ती ज्ञात्वा व्याधिव्यथां दृढाम्।<br>नानाविधानि दुःखानि बालभावे भवन्ति वै॥ ३१चिन्ताग्रस्त हो उठती है और पुनः किसी बड़े रोगजनित कष्टका अनुमान करके उसे दवा पिलानेकी इच्छा करने लगती है। इस प्रकार बाल्यावस्थामें अनेक प्रकारके कष्ट होते हैं, तब विवेकी पुरुष किस सुखको देखकर स्वयं जन्म लेनेकी इच्छा करते हैं!॥ २६–३१ ½॥
किं सुखं विबुधा दृष्ट्वा जन्म वाञ्छन्ति चेच्छया।<br>संग्रामममरैः सार्धं सुखं त्यक्त्वा निरन्तरम्॥ ३२<br>कर्तुमिच्छेच्च को मूढः श्रमदं सुखनाशनम्।<br>सर्वथैव नृपश्रेष्ठ सर्वे ब्रह्मादयः सुराः॥ ३३<br>कृतकर्मविपाकेन प्राप्नुवन्ति सुखासुखे।<br>अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।<br>देहवद्भिर्नृभिर्देवैस्तिर्यग्भिश्च नृपोत्तम॥ ३४कौन ऐसा मूर्ख होगा, जो देवताओंके साथ रहते हुए निरन्तर सुख-भोगका त्याग करके श्रमपूर्ण तथा सुखनाशक युद्ध करनेकी इच्छा रखेगा; हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्मादि सभी देवता भी अपने किये कर्मोंके फलस्वरूप सुख-दुःख प्राप्त करते हैं। हे नृपोत्तम! सभी देहधारी जीव चाहे मनुष्य, देवता या पशु-पक्षी हों, अपने-अपने किये कर्मका शुभाशुभ फल पाते हैं॥ ३२–३४॥
तपसा दानयज्ञैश्च मानवश्चेन्द्रतां व्रजेत्।<br>क्षीणे पुण्येऽथ शक्रोऽपि पतत्येव न संशयः॥ ३५मनुष्य तप, यज्ञ तथा दानके द्वारा इन्द्रत्वको प्राप्त हो जाता है और पुण्य क्षीण होनेपर इन्द्र भी च्युत हो जाता है; इसमें सन्देह नहीं॥ ३५॥
रामावतारयोगेन देवा वानरतां गताः।<br>तथा कृष्णसहायार्थं देवा यादवतां गताः॥ ३६रामावतारके समय देवता कर्मबन्धनके कारण वानर बने थे और कृष्णावतारमें भी कृष्णकी सहायताके लिये देवता यादव बने थे॥ ३६॥
एवं युगे युगे विष्णुरवताराननेकणः।<br>करोति धर्मरक्षार्थं ब्रह्मणा प्रेरितो भृशम्॥ ३७इस प्रकार प्रत्येक युगमें धर्मकी रक्षाके लिये भगवान् विष्णु ब्रह्माजीसे अत्यन्त प्रेरित होकर अनेक अवतार धारण करते हैं॥ ३७॥
पुनः पुनर्हरेरेवं नानायोनिषु पार्थिव।<br>अवतारा भवन्त्यन्ये रथचक्रवदद्भुताः॥ ३८हे राजन्! इस प्रकार रथचक्रकी भाँति विविध प्रकारकी योनियोंमें भगवान् विष्णुके अद्भुत अवतार बार-बार होते रहते हैं॥ ३८॥
दैत्यानां हननं कर्म कर्तव्यं हरिणा स्वयम्।<br>अंशांशेन पृथिव्यां वै कृत्वा जन्म महात्मना॥ ३९<br>तदहं संप्रवक्ष्यामि कृष्णजन्मकथां शुभाम्।<br>स एव भगवान्विष्णुरवतीर्णो यदोः कुले॥ ४०महात्मा भगवान् विष्णु अपने अंशांशसे पृथ्वीपर अवतार लेकर दैत्योंका वधरूपी कार्य सम्पन्न करते हैं। इसलिये अब मैं यहाँ श्रीकृष्णके जन्मकी पवित्र कथा कह रहा हूँ। वे साक्षात् भगवान् विष्णु ही यदुवंशमें अवतरित हुए थे॥ ३९-४०॥
कश्यपस्य मुनेरंशो वसुदेवः प्रतापवान्।<br>गोवृत्तिरभवद्राजन् पूर्वशापानुभावतः॥ ४१हे राजन्! कश्यपमुनिके अंशसे प्रतापी वसुदेवजी उत्पन्न हुए थे, जो पूर्वजन्मके शापवश इस जन्ममें गोपालनका काम करते थे॥ ४१॥
कश्यपस्य च द्वे पत्न्यौ शापादत्र महीपते।<br>अदितिः सुरसा चैवमासतुः पृथिवीपते॥ ४२हे महाराज! हे पृथ्वीपते! उन्हीं कश्यपमुनिकी दो पत्नियाँ—अदिति और सुरसाने भी शापवश पृथ्वीपर अवतार ग्रहण किया था। हे भरतश्रेष्ठ! उन
अ० २ ]चतुर्थ स्कन्ध४११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
देवकी रोहिणी चोभे भगिन्यौ भरतर्षभ।<br>वरुणेन महाच्छापो दत्तः कोपादिति श्रुतम्॥ ४३<br><br>राजोवाच<br>किं कृतं कश्यपेनागो येन शप्तो महर्षिः।<br>सभार्यः स कथं जातस्तद्वदस्व महामते॥ ४४दोनोंने देवकी और रोहिणी नामक बहनोंके रूपमें जन्म लिया था। मैंने यह सुना है कि क्रुद्ध होकर वरुणने उन्हें महान् शाप दिया था॥ ४२-४३॥<br><br>राजा बोले—हे महामते! महर्षि कश्यपने कौन-सा ऐसा अपराध किया था, जिसके कारण उन्हें स्त्रियोंसहित शाप मिला; इसे मुझे बताइये॥ ४४॥
कथञ्च भगवान्विष्णुस्तत्र जातोऽस्ति गोकुले।<br>वासी वैकुण्ठनिलये रमापतिरखण्डितः॥ ४५वैकुण्ठवासी, अविनाशी, रमापति भगवान् विष्णुको गोकुलमें जन्म क्यों लेना पड़ा?॥ ४५॥
निदेशात्कस्य भगवान्वर्तते प्रभुरव्ययः।<br>नारायणः सुरश्रेष्ठो युगादिः सर्वधारकः॥ ४६<br>स कथं सदनं त्यक्त्वा कर्मवानिव मानुषे।<br>करोति जननं कस्मादत्र मे संशयो महान्॥ ४७सबके स्वामी, अविनाशी, देवश्रेष्ठ, युगके आदि तथा सबको धारण करनेवाले साक्षात् भगवान् नारायण किसके आदेशसे व्यवहार करते हैं और वे अपने स्थानको छोड़कर मानव-योनिमें जन्म लेकर मनुष्योंकी भाँति सब काम क्यों करते हैं; इस विषयमें मुझे महान् सन्देह है॥ ४६-४७॥
प्राप्य मानुषदेहं तु करोति च विडम्बनम्।<br>भावान्नानाविधांस्तत्र मानुषे दुष्टजन्मनि॥ ४८भगवान् विष्णु स्वयं मानव-शरीर धारण करके हीन मनुष्य-जन्ममें अनेकविध लीलाएँ दिखाते हुए प्रपंच क्यों करते हैं?॥ ४८॥
कामः क्रोधोऽमर्षशोकौ वैरं प्रीतिश्च कर्हिचित्।<br>सुखं दुःखं भयं नृणां दैन्यमार्जवमेव च॥ ४९<br>दुष्कृतं सुकृतं चैव वचनं हननं तथा।<br>पोषणं चलनं तापो विमर्शश्च विकत्थनम्॥ ५०<br>लोभो दम्भस्तथा मोहः कपटः शोचनं तथा।<br>एते चान्ये तथा भावा मानुष्ये सम्भवन्ति हि॥ ५१काम, क्रोध, अमर्ष, शोक, वैर, प्रेम, सुख, दुःख, भय, दीनता, सरलता, पाप, पुण्य, वचन, मारण, पोषण, चलन, ताप, विमर्श, आत्मश्लाघा, लोभ, दम्भ, मोह, कपट और चिन्ता—ये तथा अन्य भी नाना प्रकारके भाव मनुष्य-जन्ममें विद्यमान रहते हैं॥ ४९—५१॥
स कथं भगवान्विष्णुस्त्यक्त्वा सुखमनश्वरम्।<br>करोति मानुषं जन्म भावैस्तैस्तैरभिद्रुतम्॥ ५२<br>किं सुखं मानुषं प्राप्य भुवि जन्म मुनीश्वर।<br>किं निमित्तं हरिः साक्षाद् गर्भवासं करोति वै॥ ५३वे भगवान् विष्णु शाश्वत सुखका त्याग करके इन भावोंसे ग्रस्त मनुष्य-जन्म किसलिये धारण करते हैं? हे मुनीश्वर! इस पृथ्वीपर मानव-जन्म पाकर कौन-सा सुख मिल जाता है? वे साक्षात् भगवान् विष्णु किस कारणसे गर्भवास करते हैं?॥ ५२-५३॥
गर्भदुःखं जन्मदुःखं बालभावे तथा पुनः।<br>यौवने कामजं दुःखं गार्हस्थ्येऽतिमहत्तरम्॥ ५४गर्भवासमें दुःख, जन्मग्रहणमें दुःख, बाल्यावस्थामें दुःख, यौवनावस्थामें कामजनित दुःख एवं गार्हस्थ्य जीवनमें तो बहुत बड़ा दुःख होता है॥ ५४॥
दुःखान्येतान्यवाप्नोति मानुषे द्विजसत्तम।<br>कथं स भगवान्विष्णुरवतारान्युनः पुनः॥ ५५हे विप्रवर! ये अनेक कष्ट मानव-जीवनमें प्राप्त होते हैं, तो फिर वे भगवान् विष्णु अवतार क्यों लेते हैं?॥ ५५॥
प्राप्य रामावतारं हि हरिणा ब्रह्मयोनिना।<br>दुःखं महत्तरं प्राप्तं वनवासेऽतिदारुणे॥ ५६ब्रह्मयोनि भगवान् विष्णुको रामावतार ग्रहण करके अत्यन्त दारुण वनवासकालमें घोर कष्ट प्राप्त हुआ था। उन्हें सीता-वियोगसे उत्पन्न महान् दुःख प्राप्त हुआ
४१२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ३
सीताविरहजं दुःखं संग्रामश्च पुनः पुनः।<br>कान्त्यागोऽप्यनेनैवमनुभूतो महात्मना ॥ ५७तथा अनेक बार राक्षसोंसे युद्ध करना पड़ा। अन्तमें महान् आत्मावाले इन श्रीरामको पत्नी-परित्यागकी असीम वेदना भी सहनी पड़ी ॥ ५६-५७ ॥
तथा कृष्णावतारेऽपि जन्म रक्षागृहे पुनः।<br>गोकुले गमनं चैव गवां चारणमित्युत ॥ ५८उसी प्रकार कृष्णावतारमें भी बन्दीगृहमें जन्म, गोकुल-गमन, गोचारण, कंसका वध और पुनः कष्टपूर्वक द्वारकाके लिये प्रस्थान—इन अनेकविध सांसारिक दुःखोंको भगवान् कृष्णने क्यों भोगा? ॥ ५८-५९ ॥
कंसस्य हननं कष्टाद् द्वारकागमनं पुनः।<br>नानासंसारदुःखानि भुक्तवान्भगवान् कथम् ॥ ५९
स्वेच्छया कः प्रतीक्षेत मुक्तो दुःखानि ज्ञानवान्।<br>संशयं छिन्धि सर्वज्ञ मम चित्तप्रशान्तये ॥ ६०ऐसा कौन ज्ञानी व्यक्ति होगा जो मुक्त होता हुआ भी स्वेच्छासे इन दुःखोंकी प्रतीक्षा करेगा? हे सर्वज्ञ! मेरे मनकी शान्तिके लिये सन्देहका निवारण कीजिये ॥ ६० ॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे कर्मणो जन्मादिकारणत्वनिरूपणं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥


अथ तृतीयोऽध्यायः

वसुदेव और देवकीके पूर्वजन्मकी कथा

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
कारणानि बहून्यत्राप्यवतारे हरेः किल।<br>सर्वेषां चैव देवानांमशावतरणेष्वपि ॥ १[हे राजन्!] भगवान् विष्णुके विभिन्न अवतार ग्रहण करने तथा इसी प्रकार सभी देवताओंके भी अंशावतार ग्रहण करनेके बहुतसे कारण हैं ॥ १ ॥
वसुदेवावतारस्य कारणं शृणु तत्त्वतः।<br>देवक्याश्चैव रोहिण्या अवतारस्य कारणम् ॥ २अब वसुदेव, देवकी तथा रोहिणीके अवतारोंका कारण यथार्थ रूपसे सुनिये ॥ २ ॥
एकदा कश्यपः श्रीमान्यज्ञार्थं धेनुमाहरत्।<br>याचितोऽयं बहुविधं न ददौ धेनुमुत्तमाम् ॥ ३एक बार महर्षि कश्यप यज्ञकार्यके लिये वरुणदेवकी गौ ले आये। [यज्ञ-कार्यकी समाप्तिके पश्चात्] वरुणदेवके बहुत याचना करनेपर भी उन्होंने वह उत्तम धेनु वापस नहीं दी ॥ ३ ॥
वरुणस्तु ततो गत्वा ब्रह्माणं जगतः प्रभुम्।<br>प्रणम्योवाच दीनात्मा स्वदुःखं विनयान्वितः ॥ ४तत्पश्चात् उदास मनवाले वरुणदेवने जगत्के स्वामी ब्रह्माके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक उनसे अपना दुःख कहा ॥ ४ ॥
किं करोमि महाभाग मत्तोऽसौ न ददाति गाम्।<br>शापो मया विसृष्टोऽस्मै गोपालो भव मानुषे ॥ ५हे महाभाग! मैं क्या करूँ? वह अभिमानी कश्यप मेरी गाय नहीं लौटा रहा है। अतएव मैंने उसे शाप दे दिया कि मानवयोनिमें जन्म लेकर तुम गोपालक हो जाओ और तुम्हारी दोनों भार्याएँ भी मानवयोनिमें उत्पन्न होकर अत्यधिक दुःखी रहें। मेरी गायके बछड़े मातासे वियुक्त होकर अति दुःखित हैं और रो रहे हैं, अतएव पृथ्वीलोकमें जन्म लेनेपर यह अदिति भी मृतवत्सा होगी। इसे कारागारमें रहना पड़ेगा, उससे भी उसे महान् कष्ट भोगना होगा ॥ ५–७ ॥
भार्ये द्वे अपि तत्रैव भवेतां चातिदुःखिते।<br>यतो वत्सा रुदन्त्यत्र मातृहीनाः सुदुःखिताः ॥ ६
मृतवत्सादितिस्तस्माद्भविष्यति धरातले।<br>कारागारनिवासा च तेनापि बहुदुःखिता ॥ ७
अ० ३ ]चतुर्थ स्कन्ध४१३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य यादोनाथस्य पद्मभूः।<br>समाहूय मुनिं तत्र तमुवाच प्रजापतिः॥ ८<br><br>कस्मात्त्वया महाभाग लोकपालस्य धेनवः।<br>हृताः पुनर्न दत्ताश्च किमन्यायं करोषि च॥ ९व्यासजी बोले— जल-जन्तुओंके स्वामी वरुणका यह वचन सुनकर प्रजापति ब्रह्माने मुनि कश्यपको वहाँ बुलाकर उनसे कहा—हे महाभाग! आपने लोकपाल वरुणकी गायोंका हरण क्यों किया; और फिर आपने उन्हें लौटाया भी नहीं। आप ऐसा अन्याय क्यों कर रहे हैं?॥ ८-९॥
जानन् न्यायं महाभाग परवित्तापहारणम्।<br>कृतवान्कथमन्यायं सर्वज्ञोऽसि महामते॥ १०हे महाभाग! न्यायको जानते हुए भी आपने दूसरेके धनका हरण किया। हे महामते! आप तो सर्वज्ञ हैं; तो फिर आपने यह अन्याय क्यों किया?॥ १०॥
अहो लोभस्य महिमा महतोऽपि न मुञ्चति।<br>लोभं नरकदं नूनं पापाकरमसम्मतम्॥ ११अहो! लोभकी ऐसी महिमा है कि वह महान्-से-महान् लोगोंको भी नहीं छोड़ता है। लोभ तो निश्चय ही पापोंकी खान, नरककी प्राप्ति करानेवाला और सर्वथा अनुचित है॥ ११॥
कश्यपोऽपि न तं त्यक्तुं समर्थः किं करोम्यहम्।<br>सर्वदैवाधिकस्तस्माल्लोभो वै कलितो मया॥ १२महर्षि कश्यप भी उस लोभका परित्याग कर सकनेमें समर्थ नहीं हुए तो मैं क्या कर सकता हूँ। अन्ततः मैंने यही निष्कर्ष निकाला कि लोभ सदासे सबसे प्रबल है॥ १२॥
धन्यास्ते मुनयः शान्ता जितो यैर्लोभ एव च।<br>वैखानसैः शमपरैः प्रतिग्रहपराङ्मुखैः॥ १३शान्त स्वभाववाले, जितेन्द्रिय, प्रतिग्रहसे पराङ्मुख तथा वानप्रस्थ-आश्रम स्वीकार किये हुए वे मुनिलोग धन्य हैं, जिन्होंने लोभपर विजय प्राप्त कर ली है॥ १३॥
संसारे बलवाञ्छत्रुर्लोभोऽमेध्योऽवरः सदा।<br>कश्यपोऽपि दुराचारः कृतस्नेहो दुरात्मना॥ १४संसारमें लोभसे बढ़कर अपवित्र तथा निन्दित अन्य कोई चीज नहीं है; यह सबसे बलवान् शत्रु है। महर्षि कश्यप भी इस नीच लोभसे स्नेह करनेके कारण दुराचारमें लिप्त हो गये॥ १४॥
ब्रह्मापि तं शशापाथ कश्यपं मुनिसत्तमम्।<br>मर्यादारक्षणार्थं हि पौत्रं परमवल्लभम्॥ १५<br><br>अंशेन त्वं पृथिव्यां वै प्राप्य जन्म यदोः कुले।<br>भार्याभ्यां संयुतस्तत्र गोपालत्वं करिष्यसि॥ १६अतएव मर्यादाकी रक्षाके लिये ब्रह्माजीने भी अपने परमप्रिय पौत्र मुनिश्रेष्ठ कश्यपको शाप दे दिया कि तुम अपने अंशसे पृथ्वीपर यदुवंशमें जन्म लेकर वहाँ अपनी दोनों पत्नियोंके साथ गोपालनका कार्य करोगे॥ १५-१६॥
व्यास उवाच<br>एवं शप्तः कश्यपोऽसौ वरुणेन च ब्रह्मणा।<br>अंशावतरणार्थाय भूभारहरणाय च॥ १७व्यासजी बोले— इस प्रकार अंशावतार लेने तथा पृथ्वीका बोझ उतारनेके लिये वरुणदेव तथा ब्रह्माजीने उन महर्षि कश्यपको शाप दे दिया था॥ १७॥
तथा दित्यादितिः शप्ता शोकसन्तप्तया भृशम्।<br>जाता जाता विनश्येरंस्तव पुत्रास्तु सप्त वै॥ १८उधर कश्यपकी भार्या दितिने भी अत्यधिक शोकसन्तप्त होकर अदितिको शाप दे दिया कि क्रमसे तुम्हारे सातों पुत्र उत्पन्न होते ही मृत्युको प्राप्त हो जायँ॥ १८॥

| ४१४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ | | :--- | :--- |

| जनमेजय उवाच<br>कस्मादित्या च भगिनी शप्तेन्द्रजननी मुने।<br>कारणं वद शापे च शोकस्तु मुनिसत्तम॥ १९ | जनमेजय बोले— हे मुने! दितिके द्वारा उसकी अपनी बहन तथा इन्द्रकी माता अदिति क्यों शापित की गयी? हे मुनिवर! आप दितिके शोक तथा उसके द्वारा प्रदत्त शापका कारण मुझे बताइये॥ १९॥ | | सूत उवाच<br>पारीक्षितेन पृष्टस्तु व्यासः सत्यवतीसुतः।<br>राजानं प्रत्युवाचेदं कारणं सुसमाहितः॥ २० | सूतजी बोले— परीक्षित्-पुत्र राजा जनमेजयके पूछनेपर सत्यवती-पुत्र व्यासजी पूर्ण सावधान होकर राजाको शापका कारण बतलाने लगे॥ २०॥ | | व्यास उवाच<br>राजन् दक्षसुते द्वे तु दितिश्चादितिरुत्तमे।<br>कश्यपस्य प्रिये भार्ये बभूवतुरुरुक्रमे॥ २१ | व्यासजी बोले— हे राजन्! दक्षप्रजापतिकी दिति और अदिति नामक दो सुन्दर कन्याएँ थीं। दोनों ही कश्यपमुनिकी प्रिय तथा गौरवशालिनी पत्नियाँ बनीं॥ २१॥ | | अदित्यां मधवा पुत्रो यदाभूदतिवीर्यवान्।<br>तदा तु तादृशं पुत्रं चकमे दितिरोजसा॥ २२ | जब अदितिके अत्यन्त तेजस्वी पुत्र इन्द्र हुए, तब वैसे ही ओजस्वी पुत्रके लिये दितिके भी मनमें इच्छा जाग्रत् हुई॥ २२॥ | | पतिमाहासितापाङ्गी पुत्रं मे देहि मानद।<br>इन्द्रतुल्यबलं वीरं धर्मिष्ठं वीर्यवत्तमम्॥ २३ | उस समय सुन्दरी दितिने कश्यपजीसे प्रार्थना की—हे मानद! इन्द्रके ही समान बलशाली, वीर, धर्मात्मा तथा परम शक्तिसम्पन्न पुत्र मुझे भी देनेकी कृपा करें॥ २३॥ | | तामुवाच मुनिः कान्ते स्वस्था भव मयोदिते।<br>व्रतान्ते भविता तुभ्यं शतक्रतुसमः सुतः॥ २४ | तब मुनि कश्यपने उनसे कहा—प्रिये! धैर्य धारण करो, मेरे द्वारा बताये गये व्रतको पूर्ण करनेके अनन्तर इन्द्रके समान पुत्र तुम्हें अवश्य प्राप्त होगा॥ २४॥ | | सा तथेति प्रतिश्रुत्य चकार व्रतमुत्तमम्।<br>निषिक्तं मुनिना गर्भं बिभ्राणा सुमनोहरम्॥ २५ | कश्यपमुनिकी बात स्वीकार करके दिति उस उत्तम व्रतके पालनमें तत्पर हो गयी। उनके ओजसे सुन्दर गर्भ धारण करती हुई वह सुन्दरी दिति | | भूमौ चकार शयनं पयोव्रतपरायणा।<br>पवित्रा धारणाद्युक्ता बभूव वरवर्णिनी॥ २६ | पयोव्रतमें स्थित रहकर भूमिपर सोती थी और पवित्रताका सदा ध्यान रखती थी। इस प्रकार क्रमशः | | एवं जातः सुसम्पूर्णो यदा गर्भोऽतिवीर्यवान्।<br>शुभ्रांशुमतिदीप्ताङ्गीं दितिं दृष्ट्वा तु दुःखिता॥ २७ | जब वह महान् तेजस्वी गर्भ पूर्ण हो गया, तब शुभ्र ज्योतियुक्त तथा दीप्तिमान् अंगोंवाली दितिको देखकर अदिति दुःखित हुई॥ २५–२७॥ | | मधवत्सदृशः पुत्रो भविष्यति महाबलः।<br>दित्यास्तदा मम सुतस्तेजोहीनो भवेत्किल॥ २८ | [उसने अपने मनमें सोचा—] यदि दितिके गर्भसे इन्द्रतुल्य महाबली पुत्र उत्पन्न होगा तो निश्चय ही मेरा पुत्र निस्तेज हो जायगा॥ २८॥ | | इति चिन्तापरा पुत्रमिन्द्रं चोवाच मानिनी।<br>शत्रुस्तेऽद्य समुत्पन्नो दितिगर्भेऽतिवीर्यवान्॥ २९ | इस प्रकार चिन्ता करती हुई मानिनी अदितिने अपने पुत्र इन्द्रसे कहा—प्रिय पुत्र! इस समय दितिके गर्भमें तुम्हारा अत्यन्त पराक्रमशाली शत्रु विद्यमान है। | | उपायं कुरु नाशाय शत्रोरद्य विचिन्त्य च।<br>उत्पत्तिरेव हन्तव्या दित्या गर्भस्य शोभन॥ ३० | हे शोभन! तुम सम्यक् विचार करके उस शत्रुके नाशका प्रयत्न करो, जिससे दितिकी गर्भोत्पत्ति ही विनष्ट हो जाय॥ २९–३०॥ |

अ० ३ ]चतुर्थ स्कन्ध४१५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वीक्ष्य तामसितापाङ्गीं सपत्नीभावमास्थिताम्।<br>दुनोति हृदये चिन्ता सुखमर्मविनाशिनी ॥ ३१मुझसे सपत्नीभाव रखनेवाली उस सुन्दरी दितिको देखकर सुखका नाश कर देनेवाली चिन्ता मेरे मनको सताने लगती है॥ ३१॥
राजयक्ष्मेव संवृद्धो नष्टो नैव भवेद्रिपुः।<br>तस्मादङ्कुरितं हन्याद् बुद्धिमानहितं किल॥ ३२जब शत्रु बढ़ जाता है तब राजयक्ष्मा रोगकी भाँति वह नष्ट नहीं हो पाता है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्यका कर्तव्य है कि वह ऐसे शत्रुको अंकुरित होते ही नष्ट कर डाले॥ ३२॥
लोहशङ्कुरिव क्षिप्तो गर्भो वै हृदये मम।<br>येन केनाप्युपायेन पातयाद्य शतक्रतो ॥ ३३<br><br>सामदानबलेनापि हिंसनीयस्त्वया सुतः।<br>दित्या गर्भो महाभाग मम चेदिच्छसि प्रियम्॥ ३४हे देवेन्द्र! दितिका वह गर्भ मेरे हृदयमें लोहेकी कीलके समान चुभ रहा है, अतः जिस किसी भी उपायसे तुम उसे नष्ट कर दो। हे महाभाग! यदि तुम मेरा हित करना चाहते हो तो साम, दान आदिके बलसे दितिके गर्भस्थ शिशुका संहार कर डालो॥ ३३-३४॥
व्यास उवाच<br>श्रुत्वा मातृवचः शक्रो विचिन्त्य मनसा ततः।<br>जगामापरमातुः स समीपममराधिपः॥ ३५<br><br>ववन्दे विनयात्पादौ दित्याः पापमतिर्नृप।<br>प्रोवाच विनयेनासौ मधुरं विषगर्भितम्॥ ३६**व्यासजी बोले—**हे राजन्! तब अपनी माताकी वाणी सुनकर देवराज इन्द्र मन-ही-मन उपाय सोचकर अपनी विमाता दितिके पास गये। उस पापबुद्धि इन्द्रने विनयपूर्वक दितिके चरणोंमें प्रणाम किया और ऊपरसे मधुर किंतु भीतरसे विषभरी वाणीमें विनम्रतापूर्वक उससे कहा—॥ ३५-३६॥
इन्द्र उवाच<br>मातस्त्वं व्रतयुक्तासि क्षीणदेहातिदुर्बला।<br>सेवार्थमिह सम्प्राप्तः किं कर्तव्यं वदस्व मे॥ ३७<br><br>पादसंवाहनं तेऽहं करिष्यामि पतिव्रते।<br>गुरुशुश्रूषणात्पुण्यं लभते गतिमक्षयाम् ॥ ३८**इन्द्र बोले—**हे माता! आप व्रतपरायण हैं, और अत्यन्त दुर्बल तथा कृशकाय हो गयी हैं। अतः मैं आपकी सेवा करनेके लिये आया हूँ। मुझे बताइये, मैं क्या करूँ ? हे पतिव्रते! मैं आपके चरण दबाऊँगा; क्योंकि बड़ोंकी सेवासे मनुष्य पुण्य तथा अक्षय गति प्राप्त कर लेता है॥ ३७-३८॥
न मे किमपि भेदोऽस्ति तथादित्या शपे किल।<br>इत्युक्त्वा चरणौ स्पृष्ट्वा संवाहनपरोऽभवत् ॥ ३९मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि मेरे लिये माता अदिति तथा आपमें कुछ भी भेद नहीं है। ऐसा कहकर इन्द्र उनके दोनों चरण पकड़कर दबाने लगे॥ ३९॥
संवाहनसुखं प्राप्य निद्रामाप सुलोचना।<br>श्रान्ता व्रतकृशा सुप्ता विश्वस्ता परमा सती ॥ ४०पादसंवाहनका सुख पाकर सुन्दर नेत्रोंवाली उस दितिको नींद आने लगी। वह परम सती दिति थकी हुई थी, व्रतके कारण दुर्बल हो गयी थी और उसे इन्द्रपर विश्वास था, अतः वह सो गयी॥ ४०॥
तां निद्रावशमापन्नां विलोक्य प्राविशत्तनुम्।<br>रूपं कृत्वातिसूक्ष्मञ्च शस्त्रपाणिः समाहितः॥ ४१दितिको नींदके वशीभूत देखकर इन्द्र अपना अत्यन्त सूक्ष्म रूप बनाकर हाथमें शस्त्र लेकर बड़ी सावधानीके साथ दितिके शरीरमें प्रवेश कर गये॥ ४१॥

| ४१६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उदरं प्रविवेशाशु तस्या योगबलेन वै।<br>गर्भं चकर्त वज्रेण सप्तधा पविनायकः॥ ४२इस प्रकार योगबलद्वारा दितिके उदरमें शीघ्र ही प्रविष्ट होकर इन्द्रने वज्रसे उस गर्भके सात टुकड़े कर डाले॥ ४२॥
रुरोद च तदा बालो वज्रेणाभिहतस्तथा।<br>मा रुदेति शनैर्वाक्यमुवाच मघवानमुम्॥ ४३उस समय वज्राघातसे दुःखित हो गर्भस्थ शिशु रुदन करने लगा। तब धीरेसे इन्द्रने उससे 'मा रुद' 'मत रोओ'—ऐसा कहा॥ ४३॥
शकलानि पुनः सप्त सप्तधा कर्तितानि च।<br>तदा चैकोनपञ्चाशन्मरुतश्चाभवन्नृप॥ ४४तत्पश्चात् इन्द्रने पुनः उन सातों टुकड़ोंके सात-सात खण्ड कर डाले। हे राजन्! वे ही टुकड़े उनचास मरुद्गणके रूपमें प्रकट हो गये॥ ४४॥
तदा प्रबुद्धा सुदती ज्ञात्वा गर्भं तथाकृतम्।<br>इन्द्रेण छलरूपेण चुकोप भृशदुःखिता॥ ४५उस छली इन्द्रद्वारा अपने गर्भको वैसा (विकृत) किया गया जानकर सुन्दर दाँतोंवाली वह दिति जाग गयी और अत्यन्त दुःखी होकर क्रोध करने लगी॥ ४५॥
भगिनीकृतं तु सा बुद्ध्वा शशाप कुपिता तदा।<br>अदितिं मघवन्तञ्च सत्यव्रतपरायणा॥ ४६<br>यथा मे कर्तितो गर्भस्तव पुत्रेण छद्मना।<br>तथा तन्नाशमायातु राज्यं त्रिभुवनस्य तु॥ ४७<br>यथा गुप्तेन पापेन मम गर्भो निपातितः।<br>अदित्या पापचारिण्या यथा मे घातितः सुतः॥ ४८<br>तस्याः पुत्रास्तु नश्यन्तु जाता जाताः पुनः पुनः।<br>कारागारे वसत्वेषा पुत्रशोकातुरा भृशम्॥ ४९<br>अन्यजन्मनि चाप्येव मृतापत्या भविष्यति।यह सब बहन अदितिद्वारा किया गया है—ऐसा जानकर सत्यव्रतपरायण दितिने कुपित होकर अदिति और इन्द्र दोनोंको शाप दे दिया कि जिस प्रकार तुम्हारे पुत्र इन्द्रने छलपूर्वक मेरा गर्भ छिन्न-भिन्न कर डाला है, उसी प्रकार उसका त्रिभुवनका राज्य शीघ्र ही नष्ट हो जाय। जिस प्रकार पापिनी अदितिने गुप्त पापके द्वारा मेरा गर्भ गिराया है और मेरे गर्भको नष्ट करवा डाला है, उसी प्रकार उसके पुत्र भी क्रमशः उत्पन्न होते ही नष्ट हो जायेंगे और वह पुत्र-शोकसे अत्यन्त चिन्तित होकर कारागारमें रहेगी। अन्य जन्ममें भी इसकी सन्तानें मर जाया करेंगी॥ ४६—४९ १/२॥
व्यास उवाच<br>इत्युत्सृष्टं तदा श्रुत्वा शापं मरीचिनन्दनः॥ ५०<br>उवाच प्रणयोपेतो वचनं शमयन्निव।<br>मा कोपं कुरु कल्याणि पुत्रास्ते बलवत्तराः॥ ५१<br>भविष्यन्ति सुराः सर्वे मरुतो मघवत्सखाः।<br>शापोऽयं तव वामोरु त्वष्टाविंशेऽथ द्वापरे॥ ५२<br>अंशेन मानुषं जन्म प्राप्य भोक्ष्यति भामिनी।<br>वरुणेनापि दत्तोऽस्ति शापः सन्तापितेन च॥ ५३<br>उभयोः शापयोगेन मानुषीयं भविष्यति।व्यासजी बोले—इस प्रकार मरीचिपुत्र कश्यपने दितिप्रदत्त शापको सुनकर उसे सान्त्वना देते हुए प्रेमपूर्वक यह वचन कहा—हे कल्याणि! तुम क्रोध मत करो, तुम्हारे पुत्र बड़े बलवान् होंगे। वे सब उनचास मरुद् देवता होंगे, जो इन्द्रके मित्र बनेंगे। हे सुन्दरि! अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें तुम्हारा शाप सफल होगा। उस समय अदिति मनुष्ययोनिमें जन्म लेकर अपने किये कर्मका फल भोगेगी। इसी प्रकार दुःखित वरुणने भी उसे शाप दिया है। इन दोनों शापोंके संयोगसे यह अदिति मनुष्ययोनिमें उत्पन्न होगी॥ ५०—५३ १/२॥
व्यास उवाच<br>पतिनाश्वासिता देवी सन्तुष्टा साभवत्तदा॥ ५४व्यासजी बोले—इस प्रकार पति कश्यपके आश्वासन देनेपर दिति सन्तुष्ट हो गयी और वह