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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

द्वितीय उद्योतः २०१ ध्वन्यालोकः रसभावतदाभासतत्प्रशमलक्षणं मुख्यमर्थमनुवर्तमाना यत्र शब्दार्था- लङ्कारा गुणाश्च परस्परं ध्वन्यपेक्षया विभिन्नरूपा व्यवस्थितास्तत्र काव्ये ध्वनिरिति व्यपदेशः ॥ ४ ॥ प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे यत्राङ्गं तु रसादयः । काव्ये तस्मिन्नलङ्कारो रसादिरिति मे मतिः ॥ ५ ॥ यद्यपि रसवदलङ्कारस्यान्यैर्दर्शितो विषयस्तथापि यस्मिन् काव्ये जहाँ रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावप्रशम रूप मुख्य अर्थ का अनुगमन करते हुए शब्द, अर्थ और उनके अलङ्कार और गुण परस्पर ध्वनि की अपेक्षा भिन्न स्वरूप से व्यवस्थित होते हैं उस काव्य में 'ध्वनि' यह व्यपदेश (व्यवहार) होता है॥ अन्यत्र जहाँ वाक्यार्थ के प्रधान होने पर रस आदि अङ्ग हो जाते हैं उस काव्य में रसादि अलङ्कार हैं, यह मेरी मति (सिद्धान्त) है। यद्यपि रसवत् अलङ्कार का विषय दूसरों ने दिखाया है तथापि प्रधान रूप से लोचनम् प्रधानत्वे ध्वनिः, अन्यथा रसाद्यलङ्काराः । तदाह—मुख्यमर्थमिति । व्यवस्थिता इति । पूर्वोक्तयुक्तिभिर्विभागेन व्यवस्थापितत्वादिति भावः ॥ ४ ॥ अन्यत्रेति । रसस्वरूपे वस्तुमात्रेऽलङ्कारतायोग्ये वा । मे मतिरित्यन्यपक्षं दूष्यत्वेन हृदि निधायाभीष्टत्वात्स्वपक्षं पूर्वं दर्शयति—तथापीति । स हि पर- दर्शितो विषयो भाविनीत्या नोपपन्न इति भावः । यस्मिन् काव्ये इति स्पष्टत्वे- नासङ्गतं वाक्यमित्थं योजनीयम्-यस्मिन् काव्ये ते पूर्वोक्ता रसादयोऽङ्गभूता वाक्यार्थीभूतान्योऽर्थः, चशब्दस्तुशब्दस्यार्थे; तस्य काव्यस्य सम्बन्धिनो ये रसादयोऽङ्गभूतास्ते रसादेरलङ्कारस्य रसवदाद्यलङ्कारशब्दस्य विषयाः; स एवालङ्कारशब्दवाच्यो भवति योऽङ्गभूतः, न त्वन्य इति यावत् । अत्रोदाहरण- प्रधान रूप से हो अथवा अन्यथा (अप्रधान) रूप से। प्रधान होने पर 'ध्वनि' होगी; अन्यथा रसादि अलङ्कार । उसे कहते हैं—मुख्य अर्थ—। व्यवस्थित—। भाव यह कि पहले कही गई युक्तियों से विभाग के द्वारा व्यवस्थापित किए जा चुके हैं ॥ ४ ॥ अन्यत्र— । रसस्वरूप, वस्तुमात्र अथवा अलङ्कारता के योग्य वाक्यार्थ। मेरी मति— । इस कथन से दूसरे पक्ष को हृदय में दूषणीय मानकर, अभीष्ट होने के कारण अपने पक्ष को पहले दिखाते हैं—तथापि— । भाव यह कि वह परदर्शित विषय वक्ष्यमाण नीति के अनुसार उपपन्न नहीं है, जिस काव्य में यह स्पष्ट रूप से असङ्गत वाक्य इस प्रकार लगाना चाहिए—जिस काव्य में वे पूर्वोक्त रसादि अङ्गभूत हों और अन्य अर्थ वाक्यार्थीभूत (प्रधान अर्थ) हो, ('च' शब्द 'तु' शब्द के अर्थ में है); उस काव्य के सम्बन्धी जो रसादि अङ्गभूत हैं, वे रसादि अलङ्कार के—'रसवदादि- अलङ्कार' शब्द के—विषय हैं; वही 'अलङ्कार' शब्द का वाच्य होता है जो अङ्गभूत

२०२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः प्रधानतयाऽन्योऽर्थो वाक्यार्थीभूतस्तस्य चाङ्गभूता ये रसादयस्ते रसादेरलङ्कारस्य विषया इति मामकीनः पक्षः । तद्यथा चाटुषु प्रेयोऽ- लङ्कारस्य वाक्यार्थत्वेऽपि रसादयोऽङ्गभूता दृश्यन्ते । अन्य अर्थ जिस काव्य में वाक्यार्थ हो और उसके जो रसादि अङ्ग हों वे रसादि अलङ्कार के विषय हैं यह मेरा पक्ष है। वह जैसा कि चाटु के विषयों में प्रेयोऽलङ्कार के मुख्य वाक्यार्थ होने पर भी रसादि अङ्गभूत देखे जाते हैं। लोचनम् माह—तद्यथेति । तदित्यङ्गत्त्वम् । यथात्र वक्ष्यमाणोदाहरणे, तथान्यत्रापीत्यर्थः । भामहाभिप्रायेण चाटुषु प्रेयोऽलङ्कारस्य वाक्यार्थत्वेऽपि रसादयोऽङ्गभूता दृश्यन्त इतीदमेकं वाक्यम् । भामहेन हि गुरुदेवनृपतिपुत्रविषयप्रीतिवर्णनं प्रेयोऽलङ्कार इत्युक्तम् । तत्र प्रेयानलङ्कारो यत्र स प्रेयोऽलङ्कारोऽलङ्करणीय इहोक्तः । न त्वलङ्कारस्य वाक्यार्थत्वं युक्तम् । यदि वा वाक्यार्थत्वं प्रधानत्वम् । चमत्कार- होता है, न कि दूसरा । यहाँ उदाहरण कहते हैं—वह, जैसा कि— । 'वह' अर्थात् अङ्गत्व । अर्थात् जैसे यहाँ वक्ष्यमाण उदाहरण में, उसी प्रकार अन्यत्र भी । भामह¹ के अभिप्राय से 'चाटु के विषयों में प्रेयोऽलङ्कार के वाक्यार्थ होने पर भी रसादि अङ्गभूत देखे जाते हैं' यह एक वाक्य है। क्योंकि भामह ने कहा है कि गुरु, देवता, नृपति, पुत्र के विषय में प्रीति का वर्णन 'प्रेयोऽलङ्कार' है, यह कहा है। 'प्रेयान् (प्रियतम) जहाँ अलङ्कार है वह 'प्रेयोऽलङ्कार'² अलङ्करणीय यहाँ कहा गया है । क्योंकि 'अलङ्कार' का वाक्यार्थत्व ठीक नहीं। यदि वा वाक्यार्थत्व अर्थात् प्रधानत्व या चमत्कारकारिता । उद्भट² के मतानुयायी लोग (इस वाक्य को) टुकड़े करके व्याख्यान १. भामह के अभिप्राय से यह एक ही वाक्य है कि चाटु या प्रशंसाविषयक स्थलों में प्रेयो- लङ्कार की होती है अतः वहां रसादि अङ्गभूत हो जाते हैं। भामह के अनुसार गुरु, देवता, नृपति, पुत्र के सम्बन्ध में प्रीति का वर्ण 'प्रेयोऽलङ्कार' है। इसलिए भामह के अनुसार 'प्रेयोऽलङ्कार' का विग्रह होगा 'प्रेयान् अलङ्कारो यत्र' अर्थात् जहां अतिशय प्रिय प्राणी अलङ्कार या वर्णन का विषय हो वह 'प्रेयोऽलङ्कार' है। इसलिए प्रस्तुत में 'प्रेयोऽलङ्कार' वाक्यार्थ होने के कारण अलङ्कार नहीं बल्कि स्वयं अलङ्करणीय है। 'वाक्यार्थ' का दूसरा अर्थ प्रधानत्व है, अर्थात् चमत्कारकारी होना । २. इस व्याख्यान के विपरीत उद्भट के मतानुयायी लोग इसका वाक्यभेद करके व्याख्यान करते हैं। उनका कहना है कि पूर्व वाक्य में रसवदलङ्कार के विषय होने की चर्चा है, यहां उत्तर वाक्य में चाटुओ के वाक्यार्थ होने की स्थिति में प्रेयोऽलङ्कार का भी विषय है, यह बात कही गई है। यह तात्पर्य 'अपि' या 'भी' शब्द के वाक्य में प्रयोग से प्रतीत होता है, अर्थात् केवल रसवदलङ्कार का ही नहीं, अपितु प्रेयोऽलङ्कार का भी विषय है। उद्भट के मत में 'भावालङ्कार' (जिसमें रत्यादि भावों का वर्णन हो) ही प्रेयोऽलङ्कार है।

द्वितीय उद्योतः २०३ ध्वन्यालोकः स च रसादिरलङ्कारः शुद्धः सङ्कीर्णो वा । तत्राद्यो यथा— किं हास्येन न मे प्रयास्यसि पुनः प्राप्तश्चिराद्दर्शनं केयं निष्करुण प्रवासरुचिता केनासि दूरीकृतः । वह रसादि-अलङ्कार शुद्ध अथवा सङ्कीर्ण (दो प्रकार का) होता है। उनमें पहला, जैसे— ‘मजाक से क्या लाभ ! बहुत देर के बाद दर्शन देकर फिर तुम मुझ से दूर नहीं जा सकते । हे निष्करुण, यह प्रवास में तेरी रुचि कैसी ? किसने तुम्हें दूर कर दिया ?’ लोचनम् कारितेति यावत् । उद्भटमतानुसारिणस्तु अङ्क्त्वा व्याचक्षते—चाटुषु चाटु- विषये वाक्यार्थत्वे चाटूनां वाक्यार्थत्वे प्रेयोऽलङ्कारस्यापि विषय इति पूर्वेण सम्बन्धः । उद्भटमते हि भावालङ्कार एव प्रेय इत्युक्तः, प्रेम्णा भावानामुपलक्ष- णात् । न केवलं रसवदलङ्कारस्य विषयः यावत्प्रेयःप्रभृतेरपीत्यपिशब्दार्थः । रसवच्छब्देन प्रेयःशब्देन च सर्व एव रसवदाद्यलङ्कारा उपलक्षिताः, तदेवाह— रसादयोऽङ्गभूता दृश्यन्त इति । उक्तविषय इति शेषः । शुद्ध इति । रसान्तरेणाङ्गभूतेनालङ्कारान्तरेण वा न मिश्रः, आमिश्रस्तु सङ्कीर्णः । स्वप्नस्थानुभूतसदृशत्वेन भवनमिति हसन्नेव प्रियतमः स्वप्नेऽवलो- कितः । न मे प्रयास्यसि पुनरिति । इदानीं त्वां विदितशठभावं बाहुपाशबन्धान्न करते हैं—चाटु अर्थात् चाटुविषय के वाक्यार्थ होने पर ‘प्रेयोऽलङ्कार’ का भी विषय है, यह पहले से सम्बन्ध (अन्वय) है । क्योंकि उद्भट के मत में भावालङ्कार ही ‘प्रेयस्’ कहा गया है, प्रेम से भाव का उपलक्षण है । ‘अपि’ (या ‘भी’) शब्द का अर्थ है कि न केवल रसवदलङ्कार का, अपितु प्रेयःप्रभृति अलङ्कार का भी विषय है । ‘रसवत्’ शब्द से और ‘प्रेयस्’ शब्द से सभी ‘रसवदादि-अलङ्कार उपलक्षित हैं, उसी को कहते हैं—‘रसादि अङ्गभूत देखे जाते हैं’ यह उक्त विषय है । शुद्ध—। अर्थात् अङ्गभूत किसी रस अथवा किसी अलङ्कार से न मिला हुआ; और जो मिला हुआ (आमिश्र) है वह ‘सङ्कीर्ण’ है । अनुभव किए हुए के सदृश ही स्वप्न होता है, अतः हंसता हुआ ही प्रियतम स्वप्न में देखा गया । फिर तुम मुझसे दूर नहीं जा सकते—। जब तुम्हारा शठभाव (छिपकर प्रतिकूल आचरण) जान लिया है, ऐसी स्थिति में बाहुपाश के बन्धन से नहीं छोड़ूंगी । अतएव रिक्तबाहु- १. जहां भी ‘रसादि’ शब्द का प्रयोग है उससे रस के साथ भाव, तदाभास (रसाभास और भावाभास) तथा भावशान्त्यादि (यहां ‘आदि’ पद से भावोदय, भावसन्धि और भावशबलता गृहीत हैं) गृहीत होते हैं। ये रसादि किसी के अङ्ग के रूप में होने पर क्रमशः रसवत्, प्रेय, ऊर्जस्वि और समाहित अलङ्कार के नाम से अभिहित होते हैं । अर्थात् रस, अङ्ग होने पर ‘रसवदलङ्कार’, भाव, अङ्ग होने पर ‘प्रेयोऽलङ्कार’, तदाभास (रसाभास और भावाभास) अङ्ग होने

२०४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः स्वप्नान्तेष्विति ते वदन् प्रियतमव्यासक्तकण्ठग्रहो बुद्ध्वा रोदिति रिक्तबाहुवलयस्तारं रिपुस्त्रीजनः ॥ इस प्रकार स्वप्न में प्रिय के कण्ठ में बाहें डाले कहती हुई तुम्हारी रिक्तबाहुवलय वाली रिपु-स्त्रियाँ जग कर जोर से रुदन करती हैं । लोचनम् मोद्यामि । अत एव रिक्तबाहुवलय इति । स्वीकृतस्य चोपालम्भो युक्त इत्याह- केयं निष्करुणेति । केनासीति । गोत्रस्खलनादावपि न मया कदाचित्खेदितोऽसि । स्वप्नान्तेषु । स्वप्नायितेषु सुप्तप्रलपितेषु पुनःपुनरुद्भूततया बहुष्विति वदन्त्युष्माकं सम्बन्धी रिपुस्त्रीजनः प्रियतमे विशेषेणासक्तः कण्ठग्रहो येन तादृश एव सन् बुद्ध्वा शून्यवलयाकारीकृतबाहुपाशः सन् तारं मुक्तकण्ठं रोदितीति । अत्र शोक- स्थायिभावेन स्वप्नदर्शनोद्दीपितेन करुणरसेन चर्व्यमाणेन सुन्दरीभूतो नरपति- प्रभावो भातीति करुणः शुद्ध एवालङ्कारः । न हि त्वया रिपवो हता इति यादृग- नलङ्कृतोऽयं वाक्यार्थस्तादृगयम्, अपि तु सुन्दरतरीभूतोऽत्र वाक्यार्थः, सौन्दर्यं च करुणरसकृतमेवेति । चन्द्रादिना वस्तुना यथा वस्त्वन्तरं वदनाद्यलङ्क्रियते तदुपमितत्वेन चारुतायावभासात् । तथा रसेनापि वस्तु वा रसान्तरं वोपस्कृतं सुन्दरं भाति इति रसस्यापि वस्तुन इवालङ्कारत्वे को विरोधः ? वलय— । अपने आदमी को उलहना उचित है, इसलिए कहते हैं—हे निष्करुण यह प्रवास में— । किस ने— । कभी मैंने गोत्रस्खलन ( अन्य प्रिय का नामग्रहण ) आदि द्वारा भी तुम्हें खिन्न नहीं किया है । स्वप्नान्त अर्थात् सपनाने की स्थिति के प्रलापों में, बार-बार उत्पन्न होने के कारण बहुत से, इस प्रकार प्रलाप करती हुई तुम्हारी रिपु-स्त्रियाँ, प्रियतम में विशेष रूप से आसक्त किया है कण्ठग्रह को जिन्होंने, ऐसी ही अवस्था में जग कर, वलय से शून्यता की स्थिति को प्राप्त बाहुपाश वाली वे अधिक स्वर में अर्थात् मुक्तकण्ठ, रुदन करती हैं । यहाँ शोक जिसका स्थायी भाव है, और जो स्वप्न-दर्शन से उद्दीपित है ऐसे चर्वित होते हुए करुणरस से सुन्दर बना राजा का प्रभाव शोभावान् होता है, इस प्रकार करुण शुद्ध अवस्था में ही अलङ्कार है । 'तुमने शत्रुओं को मार डाला है' यह जिस प्रकार का अलङ्कारहीन वाक्यार्थ है उस प्रकार का यह नहीं है, बल्कि यहाँ सुन्दरतर वाक्यार्थ बन पड़ा है, और सौन्दर्य करुणरस के द्वारा ही है । चन्द्रादि पदार्थों से उस प्रकार दूसरा पदार्थ मुख आदि अलङ्कृत होता है, क्योंकि चन्द्र द्वारा उपमित होने से वह चारुरूप से मालूम होने लगता है । उसी प्रकार रस से भी वस्तु अथवा रसान्तर उपस्कृत होकर सुन्दर हो जाता है, इस प्रकार रस का भी, वस्तु की भाँति, अलङ्कार होने में क्या विरोध है ? पर 'ऊर्जस्वि' और भावशान्त्यादि, अङ्ग होने पर 'समाहित' कहलाते हैं । इस प्रकार 'रसादि' और 'रसवदाद्यलङ्कार' को प्राधान्य और अप्राधान्य मूलक रूप में सर्वत्र समझना चाहिए ।

द्वितीय उद्योतः २०५ ध्वन्यालोकः इत्यत्र करुणरसस्य शुद्धस्याङ्गभावात्स्पष्टमेव रसवदलङ्कारत्वम् । एवमेवंविधे विषये रसान्तराणां स्पष्ट एवाङ्गभावः । यहाँ शुद्ध करुण रस के अङ्ग हो जाने के कारण स्पष्ट ही रसवदलङ्कारता है । इस प्रकार ऐसे विषय में दूसरे रसों का भी स्पष्ट ही अङ्गभाव है । लोचनम् ननु रसेन किं कुर्वता प्रकृतोऽर्थोऽलङ्क्रियते ! तर्हि उपमयापि किं कुर्वत्या- लङ्क्रियेत । ननु तयोपमीयते प्रस्तुतोऽर्थः । रसेनापि तर्हि सरसीक्रियते सोऽर्थ इति स्वसंवेद्यमेतत् । तेन यत्केचिच्चूचुदन्-‘अत्र रसेन विभावादीनां मध्ये किमलङ्क्रियते’ इति तदनभ्युपगमपराहतम्; प्रस्तुतार्थस्यालङ्कार्यत्वेना- भिधानात् । अस्यार्थस्य भूयसा लक्ष्ये सद्भाव इति दर्शयति-एवमिति । यत्र राजादेः प्रभावख्यापनं तादृश इत्यर्थः । शङ्का-क्या करता हुआ रस प्रकृत अर्थ को अलङ्कृत करता है ? ( समाधान में प्रश्न करते हैं कि ) क्या करती हुई उपमा अलङ्कृत करती है ? ( यदि कहिए कि ) प्रस्तुत अर्थ उसके द्वारा उपमित किया जाता है ! तब तो यह स्वयं ही समझा जा सकता है कि रस के द्वारा भी वह अर्थ सरस किया जाता है । इसलिए जो कि कुछ लोगों ने कहा है-‘यहाँ रस के द्वारा विभाव आदि के बीच किसे अलङ्कृत किया जाय ?’ वह अमान्य होने के कारण निराकृत है । क्योंकि प्रस्तुत¹ अर्थ को अलङ्कार्य कहा गया है । इस अर्थ का बहुत प्रकार से लक्ष्य में सद्भाव है, यह दिखाते हैं— इस प्रकार- । अर्थात् जहाँ राजा आदि के प्रभाव का ख्यापन हो वैसा । १. यहां ध्वनिकार के ‘रसवदलङ्कार’ को लेकर दो प्रकार के मतभेद उपस्थित हैं, जिनका संकेत कारिका में ‘मे मतिः’ ( मेरी मति या सिद्धान्त है ) तथा वृत्तिग्रन्थ में ‘रसवदलङ्कारस्यान्यै- र्दर्शितो विषयः’ ( अन्य लोगों ने रसवदलङ्कार का विषय दिखाया है ) विदित होता है । प्रथम मतभेद यह है कि तथाकथित ‘रसवदलङ्कार’ को अलङ्कार की कोटि में गणना तभी हो सकती है जब कि ‘अलङ्कार’ का सामान्य लक्षण उसमें संगत हो । जैसा कि अलङ्कार को कहा जाता है कि वह कटक-कुण्डलादि के समान हैं, जिस प्रकार कटक-कुण्डल आदि शरीर के साक्षात् उपकारक होते हुए परम्परया आत्मा के उपकारक हैं उसी प्रकार काव्य-क्षेत्र में वाच्य-वाचक के साक्षात् उपकारक और परम्परया रस के उपकारक को अलङ्कार कहते हैं । ‘काव्यप्रकाश’ में यही कहा है— उपकुर्वन्ति तं सन्तं येऽङ्गद्वारेण जातुचित् । हारादिवदलङ्कारास्तेऽनुप्रासोपमादयः ॥ २०१२ ॥ ‘अलङ्कार’ का यह लक्षण ‘रसवदलङ्कार’ में संगत नहीं होता, क्योंकि रसवदलङ्कार वाच्य- वाचक का उपकारक नहीं होता है बल्कि साक्षात् रस का उपकारक होता है, अतः उसकी गणना अलङ्कारों में न होकर ‘गुणीभूतव्यङ्ग्य’ के ‘अपराङ्ग’ नामक प्रभेद में है । तब प्रश्न उठता है कि जब ‘रसवदलङ्कार’ अलङ्कार नहीं है तो उसे ‘अलङ्कार’ क्यों कहा गया ? इसके समाधान में कुछ लोग कहते हैं कि जब प्राचीनों ने इसे अलङ्कार के रूप में व्यवहार

२०६ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः
सङ्कीर्णो रसादिरङ्गभूतो यथा—
क्षिप्तो हस्तावलग्नः प्रसभमभिहतोऽप्याददानोंऽशुकान्तं
गृह्णन् केशेष्वपास्तश्चरणनिपतितो नेक्षितः सम्भ्रमेण ।
आलिङ्गन् योऽवधूतस्त्रिपुरयुवतिभिः साश्रुनेत्रोत्पलाभिः
कामीवार्द्रापराधः स दहतु दुरितं शाम्भवो वः शराग्निः ॥
सङ्कीर्ण रसादि अङ्गभूत, जैसे—
आर्दापराध कामी की भांति वह भगवान् शङ्कर का बाणाग्नि आप के पाप का
दहन करे, जो सजलनेत्रकमलों वाली त्रिपुरयुवतियों द्वारा झटकने पर हाथ में लग
गया, जोर से पीटने पर कपड़े के अन्त-भाग को पकड़ने लगा, तिरस्कृत होकर बाल
पकड़ पड़ा, नहीं देखने पर चरणों पर धड़फड़ा कर पड़ गया, और आलिङ्गन करता
हुआ तिरस्कार पाया ।
लोचनम्
क्षिप्त इति । कामिपक्षेऽनादृतः, इतरत्र धुत‌ः । अवधूत इति न प्रतीप्सितः
प्रत्यालिङ्गनेन, इतरत्र सर्वाङ्गधूननेन विशरारूकृतः । साश्रुत्वमेकत्रेष्यया अन्यत्र
निष्प्रत्याशतया । कामीवेत्यनेनोपमानेन श्लेषानुगृहीतेनेर्ष्याविप्रलम्भो य
आकृष्टस्तस्य श्लेषोपमासहितस्याङ्गत्त्वम्, न केवलस्य । यद्यप्यत्र करुणो रसो
वास्तवोऽप्यस्ति तथापि स तच्चारुत्वप्रतीतौ न व्यापियत इत्यनेनाभिप्रायेण
श्लेषसहितस्येत्येतावदेवावोचत्, न तु करुणसहितस्येत्यपि । एतमर्थमपूर्वत्-
क्षिप्त— । कामी के पक्ष में अनादृत और अन्यत्र ( बाणाग्नि के पक्ष में ) झटका
गया । अवधूत, अर्थात् प्रत्यालिङ्गन द्वारा प्रत्यभिलषित न हुआ, अन्यत्र पक्ष में सभी
अङ्गों के झकझोरने से विशीर्ण किया गया । सजल नेत्र होना, एक जगह ईर्ष्या के
कारण और अन्यत्र प्रत्याशारहित होने के कारण । ‘कामी की भांति’ इस श्लेष
अलङ्कार-द्वारा अनुगृहीत उपमान से ईर्ष्याविप्रलम्भ, जो खिंचकर आता है, श्लेषोपमा
सहित वह ‘ईर्ष्याविप्रलम्भ’ यहाँ अङ्ग बन रहा है, अकेला नहीं। यद्यपि यहाँ करुणरस
भी वास्तव में है, लेकिन वह उस (विप्रलम्भ) के चारुत्व की प्रतीति के लिए, नहीं
लगता है, इस अभिप्राय से ‘श्लेषसहित’ इतना ही कहा है न कि ‘करुणसहित’ यह भी
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कर दिया है तब रसोपकारक होने मात्र से उसमें गौण ‘अलङ्कार’ का व्यवहार कथञ्चित्
मान लेना चाहिए ।
दूसरे लोग इसका समाधान यह देते हैं कि अलङ्कार का मुख्य लक्षण रसोपकारकत्व मात्र है
अतः रसवदलङ्कार में गौणरूप से ‘अलङ्कार’ का व्यवहार नहीं ।
‘काव्यप्रकाश’ में रसवदलङ्कारों को अलङ्कारों के प्रसंग में न रखकर गुणीभूतव्यङ्ग्य के प्रसंग
में निर्दिष्ट किया है ।
किन्तु ध्वनिकार और लोचनकार दोनों रसवदलङ्कारों को अलङ्कार के ही रूप में स्वीकार

द्वितीय उद्योतः २०७

ध्वन्यालोकः
इत्यत्र त्रिपुररिपुप्रभावातिशयस्य वाक्यार्थत्वे ईर्ष्याविप्रलम्भस्य
श्लेषसहितस्याङ्गभाव इति, एवंविध एव रसवदाद्यलङ्कारस्य न्याय्यो
यहाँ त्रिपुर-शत्रु (शिवजी) का अतिशय प्रभाव वाक्यार्थ (अङ्गी) है, और
श्लेषसहित ईर्ष्या विप्रलम्भ का अङ्गभाव है । इस प्रकार ही रसवद् आदि अलङ्कार का
लोचनम्
योत्प्रेक्षितं दृढीकर्तुमाह-एवंविध एवेति । अत एवेति । यतोऽत्र विप्रलम्भस्याल-
ङ्कारत्वं न तु वाक्यार्थता, अतो हेतोरित्यर्थः । न दोष इति । यदि ह्यन्यतरस्य
रसस्य प्राधान्यमभविष्यन्न द्वितीयो रसः समाविशेत् । रतिस्थायिभावत्वेन तु
सापेक्षभावो विप्रलम्भः, स च शोकस्थायिभावत्वेन निरपेक्षभावस्य करुणस्य
(कहा है)। अपूर्व ढंग से उत्प्रेक्षित इस बात को दृढ़ करने के लिए कहते हैं—इस
प्रकार ही— । इसी लिए— । अर्थात् जिस कारण यहाँ विप्रलम्भ का अलङ्कारत्व है,
न कि वाक्यार्थत्व है उस कारण । दोष नहीं है— । क्योंकि यदि दो में से किसी एक
रस का प्राधान्य होता तो दूसरा रस समावेश प्राप्त नहीं करता । ‘रति’ जिसका
स्थायिभाव है, इस कारण विप्रलम्भ सापेक्षभाव है और ‘शोक’ जिसका स्थायी है,
ऐसा करुण निरपेक्षभाव है, अतः करुण विप्रलम्भ से विरुद्ध ही है । इस प्रकार
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करते हैं। इन लोगों का पक्ष है कि ‘अलङ्कार’ का प्रधान कार्य है सुन्दरता का सम्पादन, ऐसी स्थिति
में रसादि को भी वस्तु की भाँति अलङ्कार मानने में कोई विरोध नहीं ।
फिर, ध्वनिकार की दृष्टि में गुणीभूतव्यङ्ग्य और रसवदादि के भेद के समन्वय के लिए यह
कहा जा सकता है कि रसादि ध्वनि के अपराङ्ग होने पर रसवत् और प्रेयोऽलङ्कार होंगे और वस्तु
या अलङ्कार ध्वनि के अपराङ्ग होने पर गुणीभूतव्यङ्ग्य होगा ।
द्वितीय मतभेद के अनुसार चेतन के वाक्यार्थीभूत होने पर रसादि-अलङ्कार का विषय और
अचेतन के वाक्यार्थीभाव में उपमादि अलङ्कार का विषय है। रसादि, चूँकि चित्तवृत्ति रूप होते
हैं, इसलिए अचेतन के वाक्यार्थीभाव की स्थिति में रसवदलङ्कार का विषय नहीं बन सकता। इस
मत के विरुद्ध ध्वनिकार ने आगे की पंक्तियों में स्वयं स्पष्ट कर दिया है ।
१. त्रिपुरदाह के वर्णन रूप प्रस्तुत पद्य में प्रधान रूप से शिवजी के प्रति कवि की भक्ति प्रकट
होती है, यद्यपि शिवजी का उत्साह त्रिपुरदाह के कार्य में प्रतीत होता है । किन्तु वह अनुभाव-
विभाव से परिपोष न प्राप्त करने के कारण ‘वीररस’ की स्थिति नहीं प्राप्त कर सका है। कामी
के उपमान से यहाँ श्लेषोपमा के साथ ईर्ष्याविप्रलम्भ रूप शृङ्गार की प्रतीति अङ्गरूप से होती है,
और साथ ही करुणरस भी प्रतीत होता है । ‘लोचन’ में ये सभी बातें स्पष्ट हो चुकी हैं । शृङ्गार
और करुण दोनों विरोधी रस हैं, अतः इनका एकत्र अवस्थान यद्यपि दोषपूर्ण माना गया है, परन्तु
प्रस्तुत में दोनों अङ्गरूप में अवस्थित हैं अतः यहाँ उनका विरोध अकिञ्चित्कर है । रसों के परस्पर
विरोध-अविरोध का विचार अन्यत्र ‘साहित्यदर्पण’ आदि ग्रन्थों से अवगत कर लेना चाहिए ।
शृङ्गार सर्वथा सापेक्ष-भाव है, क्योंकि इसका स्थायीभाव ‘रति’ दूसरे जन के विद्यमान रहने पर
ही हो सकती है और करुणरस का स्थायीभाव ‘शोक’ है उसमें प्रिय के विद्यमान रहने की अपेक्षा
नहीं, अतः निरपेक्ष-भाव है, अतएव दोनों का परस्पर विरोध माना जाता है । चूँकि स्वयं

२०८ सलोचन-ध्वन्यालोकः

ध्वन्यालोकः विषयः । अत एव चेर्ष्याविप्रलम्भकरणयोरङ्गत्वेन व्यवस्थानात्समा- वेशो न दोषः । यत्र हि रसस्य वाक्यार्थीभावस्तत्र कथमलङ्कारत्वम् ? अलङ्कारो हि चारुत्वहेतुः प्रसिद्धः; न त्वसावात्मैवात्मनश्चारुत्वहेतुः । तथा चायमत्र संक्षेपः— रसभावादितात्पर्यमाश्रित्य विनिवेशनम् । अलङ्कृतीनां सर्वासामलङ्कारत्वसाधनम् ॥ विषय उचित है। इसी लिए ईर्ष्या विप्रलम्भ और करुण के अङ्ग रूप से व्यवस्थित होने से कोई दोष नहीं है। क्योंकि जहाँ रस का वाक्यार्थीभाव ( प्राधान्य ) है वहाँ कैसे ( उसका ) अलङ्कारत्व होगा ? क्योंकि अलङ्कार चारुत्व के हेतु के रूप में प्रसिद्ध है, वह स्वयं अपने से अपने चारुत्व का हेतु नहीं है। और इस प्रकार यहाँ संक्षेप है— रस, भाव आदि के तात्पर्य का आश्रयण करके सभी अलङ्कारों का रखना उनके अलङ्कारत्व का साधन है।

लोचनम् विरुद्ध एव । एवमलङ्कारशब्दप्रसङ्गेन समावेशं प्रसाध्य एवंविध एवेति यदुक्तं तत्रैवकारस्याभिप्रायं व्याचष्टे—यत्र हीति । सर्वासामुपमादीनाम् । अयं भावः—उपमादीनामलङ्कारत्वे यादृशी वार्ता तादृश्येव रसादीनाम् । तदवश्यमन्येनालङ्कार्येण भवितव्यम् । तच्च यद्यपि वस्तुमात्रमपि भवति, तथापि तस्य पुनरपि विभावादिरूपतापर्यवसानाद्रसादितात्पर्यमेवेति सर्वत्र रसध्वनेरेवात्मभावः । तदुक्तं—रसभावादितात्पर्यमिति । तस्येति । प्रधानस्यात्म- 'अलङ्कार' शब्द के प्रसङ्ग से समावेश की बात तय करके 'इस प्रकार ही' यह जो कहा है उसके 'ही' कहने के अभिप्राय की व्याख्या करते हैं—क्योंकि जहाँ— । सभी उपमा आदि का । भाव यह है—उपमा आदि के अलङ्कार होने में जो बात है वही रसादि के ( अलङ्कार होने में है )। इस लिए अवश्य कोई अन्य अलङ्कार्य होना चाहिए। और वह ( अलङ्कार्य ) यद्यपि वस्तुमात्र भी हो सकता है, तथापि उसके पुनः भी विभावादि- रूपता में पर्यवसान होने के कारण, रसादि तात्पर्य ही सिद्ध होता है ऐसी स्थिति में सर्वत्र 'रसध्वनि' का ही आत्मत्व है। इसलिए कहा है—रस, भाव आदि के तात्पर्य० ।

ये दोनों प्रधान न होकर किसी तीसरे के अङ्ग हैं, अतः इनका विरोध एकत्र अवस्थान में भी नहीं है। यहाँ यह बात ध्यान में रखना चाहिए कि शृङ्गार या करुण यहाँ परिपुष्ट न होने के कारण परिपूर्ण रस की स्थिति में नहीं हैं, उनका यहाँ गौण व्यवहार है। यहाँ दोनों भावरूप हैं।

द्वितीय उद्योतः २०९ ध्वन्यालोकः तस्माद्यत्र रसादयो वाक्यार्थीभूताः स सर्वो न रसादेरलङ्कारस्य विषयः; स ध्वनेः प्रभेदः, तस्योपमादयोऽलङ्काराः । यत्र तु प्राधान्ये- नार्थान्तरस्य वाक्यार्थीभावे रसादिभिश्चारुत्वनिष्पत्तिः क्रियते, स रसा- देरलङ्कारताया विषयः । इस लिए जहाँ रसादि वाक्यार्थ हैं, वह रसादि अलङ्कार का विषय नहीं है, बल्कि वह 'ध्वनि' का प्रभेद है, उसके उपमादि अलङ्कार हैं । और जहाँ प्रधान रूप से अर्थान्तर के वाक्यार्थ हो जाने पर रसादि द्वारा चारुत्व की निष्पत्ति की जाती है, वह रसादि की अलङ्कारता का विषय है । लोचनम् भूतस्य । एतदुक्तं भवति-उपमया यद्यपि वाच्योऽर्थोऽलङ्क्रियते, तथापि तस्य तदेवालङ्करणं यद्व्यङ्ग्यार्थाभिव्यञ्जनसामर्थ्याधानमिति वस्तुतो ध्वन्यात्मैवा- लङ्कार्यः । कटककेयूरादिभिरपि हि शरीरसमवायिभिश्चेतन आत्मैव तत्तच्चित्त- वृत्तिविशेषौचित्यसूचनात्तयालङ्क्रियते । तथाहि-अचेतनं शवशरीरं कुण्ड- लाद्युपेतमपि न भाति, अलङ्कार्यस्याभावात् । यतिशरीरं कटकादियुक्तं हास्या- वहं भवति, अलङ्कार्यस्यानौचित्यात् । न हि देहस्य किञ्चिदनौचित्यमिति वस्तुत आत्मैवालङ्कार्यः, अहमलङ्कृत इत्यभिमानात् । रसादेरलङ्कारताया इति । व्यधिकरणषष्ठ्यौ, रसादेर्यालङ्कारता तस्याः स एव विषयः । एतदनुसारेणैव पूर्वत्रापि वाक्ये योज्यम्, रसादिकर्तृकस्यालङ्करणक्रियात्मनो विषय इति । उसका- । प्रधान, आत्मभूत का । बात यह कही गई-उपमा से यद्यपि वाच्य अर्थ अलङ्कृत होता है तथापि उस वाच्यार्थ का वही अलङ्करण है जो व्यङ्ग्य अर्थ के अभिव्यञ्जन-सामर्थ्य का आधान है, इस प्रकार वस्तुतः ध्वनि रूप ही अलङ्कार्य है ( वाच्यार्थ रूप नहीं ) । क्योंकि शरीर के साथ सम्बन्ध रखने वाले कटक, केयूर आदि अलङ्कार भी उस-उस विशेष चित्तवृत्ति के औचित्य के सूचक होने के कारण ( क्योंकि जैसे किसी युवक के शरीर के अलङ्कार उसके चित्त के रागी होने के औचित्य के सूचक होते हैं, इसी प्रकार किसी साधु के दण्ड-कमण्डल आदि उसके विराग के सूचक होते हैं ) चेतनस्वरूप आत्मा को ही अलंकृत करते हैं । जैसा कि-चेतनारहित शव-शरीर कुण्डल आदि अलङ्कारों से युक्त होकर भी नहीं शोभता, क्योंकि उसमें अलङ्कार्य ( आत्मा ) का अभाव है और साधु का शरीर कटक आदि अलङ्कारों से युक्त होकर खिल्ली का पात्र बनता है, क्योंकि अलङ्कार्य का वहाँ औचित्य नहीं है ( वहाँ तो दण्ड-कमण्डल का ही रहना उचित है ) । शरीर का कोई अनौचित्य नहीं । इस प्रकार वस्तुतः आत्मा ही अलङ्कार्य है, क्योंकि यह अभिमान होता है कि 'मैं अलङ्कृत हूँ' । 'रसादि की अलङ्कारता का' यहाँ व्यधिकरण षष्ठी विभक्ति है अर्थात् रसादि की जो अल- १४ ध्व०

२१० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः एवं ध्वनेरुपमादीनां रसवदलङ्कारस्य च विभक्तविषयता भवति । इस प्रकार ध्वनि, उपमा आदि और रसवद् अलङ्कारों का अलग-अलग विषय लोचनम् एवमिति । अस्मदुक्तेन विषयविभागेनेत्यर्थः । उपमादीनामिति । यत्र रसस्या- लङ्कार्यता रसान्तरं चाङ्गभूतं नास्ति तत्र शुद्धा एवोपमादयः । तेन संसृष्ट्या नोपमादीनां विषयापहार इति भावः । रसवदलङ्कारस्य चेति । अनेन भावाद्य- लङ्कारा अपि प्रेयस्वूर्जस्विसमाहिता गृह्यन्ते । तत्र भावालङ्कारस्य शुद्धस्यो- दाहरणं यथा— तव शतपत्रपत्रमृदुताम्रतलश्चरणश्चलकलहंसनूपुरकलध्वनिना मुखरः । महिषमहासुरस्य शिरसि प्रसभं निहितः कनकमहामहीध्रगुरुतां कथमम्ब गतः ॥ इत्यत्र देवीस्तोत्रे वाक्यार्थीभूते वितर्कविस्मयादिभावस्य चारुत्वहेतुतेति तस्याङ्गत्वान्द्भावालङ्कारस्य विषयः । रसाभासस्यालङ्कारता यथा ममैव स्तोत्रे— समस्तगुणसम्पदः सममलङ्क्रियाणां गणै- र्भवन्ति यदि भूषणं तव तथापि नो शोभसे । शिवं हृदयवल्लभं यदि यथा तथा रञ्जये- स्तदेव ननु वाणि ! ते भवति सर्वलोकोत्तरम् ॥ ङ्कारता वही विषय । इसी के अनुसार पहले वाक्य में भी योजना कर लेनी चाहिए— रसादिकर्तृक अलङ्करण क्रिया का विषय । इस प्रकार—अर्थात् जैसा कि हमने विषय-विभाग कहा है । उपमा आदि—। जहाँ रस की अलङ्कार्यता और रसान्तर अङ्गभूत नहीं होता उपमा आदि शुद्ध ही अलङ्कार हैं । इसलिए भाव यह कि संसृष्टि से उपमा आदि का विषयापहार ( उच्छेद ) नहीं । और रसवद् अलङ्कार का—। इससे प्रेयस्वि, ऊर्जस्वि, समाहित ( आदि ) भावालङ्कार भी गृहीत होते हैं। उनमें शुद्ध 'भावालङ्कार' का उदाहरण, जैसे— 'हे अम्ब, कमल के पत्र के समान कोमल एवं रक्त तलभाग वाला, चंचल कलहंस की भाँति नूपुर की आवाज से मुखर, तुम्हारा चरण महिषासुर के सिर पर बलात् रखा हुआ, कैसे सुमेरु महापर्वत की गुरुता को प्राप्त किया ? यहाँ देवी का स्तोत्र प्रधान वाक्यार्थ है और वितर्क, विस्मय आदि भाव उसके चारुत्व के हेतु हैं, इस प्रकार उस ( वाक्यार्थ रूप स्तोत्र ) के अङ्ग होने के कारण 'भावालङ्कार' का विषय है। 'रसाभास' की अलङ्कारता, जैसे मेरे ही ( रचे ) स्तोत्र में— हे वाणि, अलङ्कारों के साथ समस्त गुणों की सम्पत्तियाँ यदि तुम्हारा भूषण बनें तब भी तुम्हारी शोभा नहीं, यदि तुम जिस-किसी प्रकार मनभाये भगवान् शिव को प्रसन्न करो तभी तुम्हारा सब से लोकोत्तर भूषण हो ।

द्वितीय उद्योतः २११ ध्वन्यालोकः यदि तु चेतनानां वाक्यार्थीभावो रसाद्यलङ्कारस्य विषय इत्युच्यते तर्ह्युपमादीनां प्रविरलविषयता निर्विषयता वाभिहिता स्यात् । यस्मा- दचेतनवस्तुवृत्ते वाक्यार्थीभूते पुनश्चेतनवस्तुवृत्तान्तयोजनया यथाकथ- सिद्ध होता है। अगर यदि चेतन पदार्थों का वाक्यार्थीभाव रसादि-अलङ्कार का विषय है, यह कहते हैं तो उपमा आदि अलङ्कार का जहाँ-कहीं ही (अर्थात् बहुत कम) विषय मिलेंगे, अथवा उनका कोई विषय ही न रह जायगा। क्योंकि जहाँ अचेतन वस्तु का वृत्तान्त मुख्य वाक्यार्थ है वहाँ (विभावादि की प्रक्रिया से) लोचनम् अत्र हि परमेशस्तुतिमात्रं वाचः परमोपादेयमिति वाक्यार्थे शृङ्गाराभासश्चा- रुत्वहेतुः श्लेषसहितः । न ह्ययं पूर्णः शृङ्गारो नायिकाया निर्गुणत्वे निरलङ्कारत्वे च भवति । ‘उत्तमयुवप्रकृतिरुज्ज्वलवेषात्मकः’ इति चाभिधानात् । भावाभा- साङ्गता यथा— स पातु वो यस्य हतावशेषास्तत्तुल्यवर्णाञ्जनरञ्जितेषु । लावण्ययुक्तेष्वपि वित्रसन्ति दैत्याः स्वकान्तानयनोत्पलेषु ॥ अत्र रौद्रप्रकृतीनामनुचितस्त्रासो भगवत्प्रभावकारणकृत इति भावाभासः । एवं तत्प्रशमस्याङ्गत्वमुदाहार्यम् । मे मतिरित्‍येनेन यत्परमतं सूचितं तद्दूषण- मुपन्यस्यति–यदीत्यादिना । परस्य चायमाशयः--अचेतनानां चित्तवृत्तिरूपर- साद्यसम्भवात्तद्वर्णने रसवदलङ्कारस्यानाशङ्क्यत्वात्तद्विभक्त एवोपमादीनां विषय इति । एतद् दूषयति–तर्हीति । तस्माद्वचनाद्धेतोरित्यर्थः । नन्वचेतन- यहाँ ‘परमेश्वर (शिव जी) की स्तुतिमात्र वाणी का परम उपादेय है’ इस वाक्यार्थ में श्लेष-सहित शृङ्गाराभास चारुत्व का हेतु है। नायिका के निर्गुण और निरलङ्कार होने पर शृङ्गारपूर्ण नहीं है, (अपितु आभासमात्र है), क्योंकि कहा है ‘उज्ज्वल वेषवाले उत्तम प्रकृति के युवति और युवक होते हैं’। ‘भावाभास’ की अङ्गता, जैसे— वह भगवान् कृष्ण आपकी रक्षा करें, जिसके द्वारा मारे जाने से बचे हुए दैत्य उन (कृष्ण) के सदृश कृष्ण वर्ण के अंजन से रञ्जित, अपनी पत्नियों के लावण्ययुक्त भी नेत्रकमलों से डरते रहते हैं। यहाँ रौद्र प्रकृति वाले दैत्यों का त्रास अनुचित है, (किन्तु) वह भगवान् के प्रभाव के कारण है, इस लिए ‘भावाभास’ है। इसी प्रकार ‘भावप्रशम’ का भी उदाहरण कर लेना चाहिए। ‘मेरी मति है’ इस कथन से जो परमत को सूचित किया है उसका दोष उपन्यस्त करते हैं—अगर—इत्यादि द्वारा। दूसरे का यह आशय है—‘अचेतन पदार्थों का चित्तवृत्ति रूप रसादि सम्भव न होने के कारण, उनके वर्णन में रसवद् अलङ्कार के अनाशङ्क्य होने से रसवद् अलङ्कार से अलग ही उपमादि अलङ्कारों का विषय है।’ इसमें दोष देते हैं—तो—। अर्थात् उस कथन के

२१२ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः श्चिद्भवितव्यम् । अथ सत्यामपि तस्यां यत्राचेतनानां वाक्यार्थीभावो नासौ रसवदलङ्कारस्य विषय इत्युच्यते । तत् महतः काव्यप्रबन्धस्य रसनिधानभूतस्य नीरसत्वमभिहितं स्यात् । यथा— तरङ्गभ्रूभङ्गा क्षुभितविहगश्रेणिरशना विकर्षन्ती फेनं वसनमिव संरम्भशिथिलम् । यथाविद्धं याति स्खलितमभिसन्धाय बहुशो नदीरूपेणेयं ध्रुवमसहना सा परिणता ॥ चेतन वस्तु-वृत्तान्त की योजना किसी प्रकार होनी चाहिए । अगर यदि उस ( चेतन- वृत्तान्त की योजना ) के होने पर भी जहाँ अचेतनों का वाक्यार्थीभाव है, वहाँ रसवदलङ्कार नहीं हो सकता, ऐसा कहते हैं तो बहुत बड़े एवं रस के निधान रूप काव्य-भाग की नीरसता अभिहित होती है । जैसे— तरंगें जिसकी भ्रूभङ्ग हैं, खलबल पक्षि-समुदाय ( की आवाज ) जिसकी काञ्ची है, रगड़ से ढीले पड़े वस्त्र की भाँति फेन को धारण करती हुई एवं बहुत बार स्खलन को प्राप्त कर कुटिल चाल से चलती हुई वह निश्चय ही नदी के रूप से ( मुझ पर ) कोपवती हो गई है । लोचनम् वर्णनं विषय इत्युक्तमित्याशङ्क्य हेतुमाह—यस्मादिति । यथाकथञ्चिदिति विभावादिरूपतया । तस्यामिति । चेतनवृत्तान्तयोजनायाम् । नीरसत्वमिति । यत्र हि रसस्तत्रावश्यं रसवदलङ्कार इति परमतम् । ततो न रसवदलङ्कारश्चेन्नूनं तत्र रसो नास्तीति परमताभिप्रायान्नीरसत्वमुक्तम् । न त्वस्माकं रसवदलङ्का- राभावे नीरसत्वम्, अपि तु ध्वन्यात्मभूतरसाभावे, तादृक्च रसोऽत्रास्त्येव । तरङ्गेति । तरङ्गा एव भ्रूभङ्गा यस्याः । विकर्षन्ती विलम्बमानं बलादाक्षि- कारण । ‘अचेतन का वर्णन विषय है’ यह आशङ्का करके हेतु कहते हैं—जिस कारण—। जिस किसी प्रकार अर्थात् विभावादि के प्रकार से । ‘उसमें’ अर्थात् चेतन पदार्थ के वृत्तान्त की योजना में । नीरसत्व—। दूसरे का यह मत है कि जहाँ रस है वहाँ अवश्य रसवद् अलङ्कार है । ऐसी स्थिति में जहाँ रसवद् अलङ्कार न हो वह रस नहीं है इस दूसरे के मत के अभिप्राय से ‘नीरसत्व’ कहा गया । लेकिन हमारे मत में रसवद् अलङ्कार के अभाव में ‘नीरसत्व’ नहीं है, अपितु ‘ध्वनि’ के आत्मा रूप रस के अभाव में ( नीरसत्व है ), उस प्रकार का रस यहाँ है ही । तरंगें—तरङ्ग ही हैं भ्रूभङ्ग जिसके । विकर्षण करती हुई फैले हुए को बल-

द्वितीय उद्योतः २१३ ध्वन्यालोकः यथा वा— तन्वी मेघजलार्द्रपल्लवतया धौताधरेवाश्रुभिः शून्येवाभरणैः स्वकालविरहाद्विश्रान्तपुष्पोद्गमा । चिन्ता मौनमिवाश्रिता मधुकृतां शब्दैर्विना लक्ष्यते चण्डी मामवधूय पादपतितं जातानुतापेव सा ॥ अथवा जैसे— कोपनशीला वह तन्वी (उर्वशी) पैरों पर गिरे हुए मुझे झटककर मानों उत्पन्न पश्चात्ताप के मारे मेघ के जल से गीले पल्लव के रूप में आँसुओं से धुले अधरवाली, अपने समय के विगत हो जाने पर फूलों का खिलना बन्द हो जाने के रूप में अपने आभरणों से शून्य की भाँति और भौरों के शब्दों के अभाव के रूप में चिन्ता के कारण मौनभाव को प्राप्त-जैसी (लता के समान) प्रतीत होती है। लोचनम् यन्ती । वसनमंशुकम् । प्रियतमावलम्बननिषेधायेति भावः । बहुशो यत्स्खलितं येऽपराधास्तानभिसन्धाय हृदयैनैकीकृत्यासहमाना मानिनीत्यर्थः । अथ च मद्वियोगपश्चात्तापासहिष्णुस्तापशान्तये नदीभावं गतेति । तन्वीति । वियोगकृशाप्यनुतप्ता चाभरणानि त्यजति । स्वकालो वसन्त- ग्रीष्मप्रायः । उपायचिन्तनार्थं मौनं, किमिति पादपतितमपि दयितमवधूतव- त्यहमिति च चिन्तया मौनम् । चण्डी कोपना । एतौ श्लोकौ नदीलतावर्णनपरौ तात्पर्येण पुरूरवस उन्मादाक्रान्तस्योक्तिरूपौ । पूर्वक धारण करती हुई । वसन अर्थात् अंशुक । प्रियतम के अवलम्बन के निषेध के लिए, यह भाव है । अर्थात् बहुत बार के जो स्खलित हैं, जो अपराध हैं, उन्हें अभिसन्धान करके—हृदय के साथ एक करके सहन न करती हुई मानिनी । और भी, यह कि मेरे वियोगजन्य पश्चात्ताप को न सहन कर पा रही वह ताप की शान्ति के लिए नदी के स्वरूप को प्राप्त हुई । तन्वी—। वियोग से कृश होने के कारण भी और पश्चात्ताप से पीड़ित होने के कारण, आभरणों को छोड़ देती है । अपना समय (स्वकाल) अर्थात् प्रायः वसन्त और ग्रीष्म । उपाय ढूँढ़ने की चिन्ता के लिए मौन, क्योंकर मैंने पैरों पर गिरे प्रिय को झटक दिया (तिरस्कृत किया), इस चिन्ता से मौन । चण्डी अर्थात् कोपना (कोपशीला) । ये दोनों नदी और लता के वर्णन के श्लोक तात्पर्य रूप से उन्माद से आक्रान्त पुरूरवस् की उक्तिरूप हैं ।

२१४ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः यथा वा— तेषां गोपवधूविलाससुहृदां राधारहःसाक्षिणां क्षेमं भद्र कलिन्दशैलतनयातीरे लतावेश्मनाम् । विच्छिन्ने स्मरतल्पकल्पनमृदुच्छेदोपयोगेऽधुना ते जाने जरठीभवन्ति विगलन्नीलत्विषः पल्लवाः ॥ अथवा, जैसे— हे भद्र, गोपियों के विलास-सुहृद् और राधा के एकान्त के साक्षी उन यमुना-तट के लतागृहों का कल्याण तो है ! अथवा, अब तो काम-शय्या के निर्माण के लिए कोमल किसलयों के तोड़ने का प्रयोजन न रहने के कारण वे पल्लव श्यामल कान्ति से रहित होकर झर हो जाते होंगे । लोचनम् तेषामिति । हे भद्र ! तेषामिति ये ममैव हृदये स्थितास्तेषाम् । गोपवधूनां गोपीनां ये विलाससुहृदो नर्मसचिवास्तेषाम् । प्रच्छन्नानुरागिणीनां हि नान्यो नर्मसुहृद्भवति । राधायाश्च सातिशयं प्रेमस्थानमित्याह—राधासम्भोगानां ये साक्षाद् द्रष्टारः, कलिन्दशैलतनया यमुना तस्यास्तीरे लतागृहाणां क्षेमं कुशल- मिति काका प्रश्नः । एवं तं पृष्ट्वा गोपदर्शनप्रबुद्धसंस्कार आलम्बनोद्दीपनविभा- वस्मरणात्प्रबुद्धरतिभावमात्मगतमौत्सुक्यगर्भमाह द्वारकागतो भगवान् कृष्णः— स्मरतल्पस्य मदनशय्यायाः कल्पनार्थं मृदु सुकुमारं कृत्वा यश्छेदस्त्रोटनं स एवोपयोगः साफल्यम् । अथ च स्मरतल्पे यत्कल्पनं कॢप्तिः स एव मृदुः सुकुमार उत्कृष्टश्छेदोपयोगस्त्रोटनफलं तस्मिन्र्विच्छिन्ने । मय्यनासीने का स्मरतल्पकल्पनेति भावः । अत एव परस्परानुरागनिश्चयगर्भमेवाह—ते जान हे भद्र—। उन (लतागृहों) का जो मेरे ही हृदय में स्थित हैं, उनका। गोप- बन्धुओं अर्थात् गोपियों के जो विलास-सुहृद् अर्थात् नर्मसचिव, उनका । प्रच्छन्न (लुक-छिप कर) अनुराग करने वालियों का नर्मसुहृद कोई दूसरा नहीं होता । राधा का प्रेम बढ़कर है, अतः कहते हैं—राधा के सम्भोगों को जो साक्षात् देखने वाले हैं, कलिन्दशैलतनया अर्थात् यमुना, उसके तीर पर लतागृहों का क्षेम या कुशल है, यह काकु द्वारा प्रश्न है। इस प्रकार उस (उद्धव) से पूछ कर द्वारका में पहुंचे एवं गोपों के देखने से प्रबुद्ध संस्कारवाले भगवान् कृष्ण ने आलम्बन और उद्दीपन विभाव के स्मरण से अपने में उत्पन्न औत्सुक्य से युक्त प्रबुद्ध रतिभाव को प्रकट करते हैं—स्मरतल्प अर्थात् मदनशय्या का जो कल्पन या निर्माण वही है मृदु या सुकुमार अर्थात् उत्कृष्ट छेदोपयोग अर्थात् तोड़ना रूप फल, उसके विच्छिन्न होने पर । भाव यह कि मेरे न रहते स्मरतल्प का निर्माण कैसा ? अतएव (अपने और

द्वितीय उद्योतः २१५ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः इत्येवमादौ विषयेऽचेतनानां वाक्यार्थीभावेऽपि चेतनवस्तुवृत्ता- न्तयोजनास्त्येव । अथ यत्र चेतनवस्तुवृत्तान्तयोजनास्ति तत्र रसादि- रलंकारः । तदेवं सत्युपमादयो निर्विषयाः प्रविरलविषया वा स्युः । यस्मान्नास्त्येवासावचेतनवस्तुवृत्तान्तो यत्र चेतनवस्तुवृत्तान्तयोजना नास्त्यन्ततो विभावत्वेन । तस्मादङ्गत्वेन च रसादीनामलङ्कारता । यः पुनरङ्गी रसो भावो वा सर्वाकारमलङ्कार्यः स ध्वनेरात्मेति ॥ ५ ॥ इत्यादि प्रकार के विषय में अचेतन पदार्थों के वाक्यार्थ (प्रधान) होने पर भी चेतन वस्तु या पदार्थ की योजना है ही। और जहाँ चेतन वस्तु के वृत्तान्त की योजना है वहाँ रसादि अलङ्कार है । ऐसी स्थिति में उपमा आदि अलङ्कारों का कहीं कोई विषय न रह जायगा, अथवा वे कहीं-कहीं पर ही होंगे (सर्वत्र नहीं) । क्योंकि कोई ऐसा अचेतन वस्तु का वृत्तान्त नहीं ही है जहाँ चेतन वस्तु के वृत्तान्त की योजना नहीं है, अन्ततः विभाव रूप में (उसकी योजना बन ही जायगी) । इस लिए अङ्ग होने के कारण रसादि का अलङ्कारत्व माना गया है। जो फिर अङ्गीरस अथवा भाव है, वह सब प्रकार अलङ्कार्य एवं 'ध्वनि' का आत्मा है ॥ ५ ॥ लोचनम् इति । वाक्यार्थस्यात्र कर्मत्वम् । अधुना जरठीभवन्तीति । मयि तु सन्निहितेऽन- वरतकथितोपयोगान्नेमे जराजीर्णताखिलीकारं कदाचिदवाप्नुवन्तीति भावः । विगलन्ती नीला त्विड्येषामित्यनेन कतिपयकालप्रोषितस्याप्यौत्सुक्यनिर्भरत्वं ध्वनितम् । एवमात्मगतेयमुक्तिर्यदि वा गोपं प्रत्येव संप्रधारणोक्तिः । बहुभिरु- दाहरणैर्महतो भूयसः प्रबन्धस्येति यदुक्तं तत्सूचितम् । अथेत्यादि । नीरसत्व- मत्र मा भूदित्यभिप्रायेणेति शेषः । ननु यत्र चेतनवृत्तस्य सर्वथा नानुप्रवेशः स उपमादेर्विषयो भविष्यतीत्याशङ्कयाह-यस्मादित्यादि । अन्तत इति । गोपियों के) परस्पर अनुराग के निश्चय से गर्भित इस प्रकार कहते हैं—वे मैं जानता हूँ—यहाँ वाक्यार्थ का कर्मत्व है। अब झूर हो गए होंगे—। भाव यह कि मेरे सन्निहित रहने पर निरन्तर कहे हुए (तोड़ने के पूर्वोक्त) उपयोग के कारण कभी भी ये पल्लव जर्जर होने से जीर्ण हो जाने की विद्रूपता को कभी भी प्राप्त नहीं करते हैं। विगलित या अपक्रान्त हो रही है नील कान्ति जिनकी, इससे कुछ ही समय से प्रोषित (बाहर गए) उन भगवान् का अतिशय औत्सुक्य ध्वनित होता है । इस प्रकार यह उक्ति अपने प्रति अथवा गोप के प्रति सम्प्रधारणोक्ति है। बहुत उदाहरणों से कि 'महान् या भूयान् प्रबन्ध का' यह कहा है, उसे सूचित किया है । और—इत्यादि । इस अभिप्राय से, कि यहाँ नीरसत्व न हो । यह आशङ्का करके कि जहाँ चेतन-वृत्तान्त का सर्वथा अनुप्रवेश नहीं वह उपमा आदि का विषय होगा, कहते हैं—क्योंकि— इत्यादि । अन्ततः—। जब कि अचेतन भी वर्ण्यभाव स्तम्भ, पुलक आदि अनुभाव के

२१६ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः किञ्च— तमर्थमवलम्बन्ते येऽङ्गिनं ते गुणाः स्मृताः । अङ्गाश्रितास्त्वलङ्कारा मन्तव्याः कटकादिवत् ॥ ६ ॥ ये तमर्थं रसादिलक्षणमङ्गिनं सन्तमवलम्बन्ते ते गुणाः शौर्यादि- और भी, जो उस अङ्गीरूप अर्थ को अवलम्बन करते हैं, वह 'गुण' कहलाते हैं और कटक आदि की भाँति अङ्गों पर आश्रित रहनेवालों को 'अलङ्कार' मानना चाहिए। जो रसादि रूप उस अङ्गी अर्थ को अवलम्बन करते हैं शौर्य आदि की भाँति वे लोचनम् स्तम्भपुलकाद्यचेतनमपि वर्ण्यमानमनुभावत्वाच्चेतनमाक्षिप्रत्येव तावत्, किमत्रोच्यते । अतिजडोऽपि चन्द्रोद्यानप्रभृतिः स्वविश्रान्तोऽपि वर्ण्यमानोऽ- वश्यं चित्तवृत्तिविभावतां त्यक्त्वा काव्येऽनाख्येय एव स्यात्; शास्त्रेतिहासयो- रपि वा । एवं परमतं दूषयित्वा स्वमतमेव प्रत्याम्नायेनोपसंहरति—तस्मा- दिति । यतः परोक्तो विषयविभागो न युक्त इत्यर्थः । भावो वेति वाग्रहणात्तदा- भासतत्प्रशमादयः । सर्वाकारमिति क्रियाविशेषणम् । तेन सर्वप्रकारमित्यर्थः । अलङ्कार्य इति । अत एव नालङ्कार इति भावः ॥ ५ ॥ अलङ्कार्यव्यतिरिक्तश्चालङ्कारोऽभ्युपगन्तव्यः, लोके तथा सिद्धत्वात्, यथा गुणिद्व्यतिरिक्तो गुणः । गुणालङ्कारव्यवहारश्च गुणिन्यलङ्कार्ये च सति युक्तः । स चास्मत्पक्ष एवोपपन्न इत्यभिप्रायद्वयेनाह—किञ्चेत्यादि । न केवलमेतावद्- युक्तिजातं रसस्याङ्गित्त्वे, यावदन्यदपीति समुच्चयार्थः । कारिकाप्यभिप्रायद्वयेनैव होने के कारण चेतन का आक्षेप कर लेंगे, ऐसी स्थिति में आप क्या उत्तर देंगे ? चन्द्र, उद्यान प्रभृति अत्यन्त जड़ होकर एवं अपने आप में पर्यवसित होकर भी चित्तवृत्ति के विभाव ( उद्दीपक विभाव ) के वैशिष्ट्य को छोड़ कर काव्य में कहने योग्य नहीं ही होगा, शास्त्र और इतिहास में भी यही स्थिति है। इस प्रकार परमत में दोष देकर स्वमत का ही पुनरुक्ति द्वारा उपसंहार करते हैं—इसलिए—। अर्थात् जो कि दूसरे लोगों ने विषय-विभाग किया है, वह ठीक नहीं। अथवा भाव 'अथवा' के ग्रहण से भावाभास, भावप्रशम आदि संगृहीत हैं। 'सर्वाकार' ( सब प्रकार ) यह क्रिया विशेषण है। अर्थात् सब प्रकार । अलङ्कार्य—। भाव यह कि अलङ्कार नहीं ॥ ५ ॥ अलङ्कार को अलङ्कार्य से पृथक् मानना चाहिए, क्योंकि लोक में उस प्रकार सिद्ध है, जैसे गुणी से पृथक् गुण को माना जाता है। गुण और अलङ्कार का व्यवहार भी गुणी अलङ्कार्य के रहने पर ही ठीक है। और वह ( बात ) हमारे पक्ष में ही उपपन्न होती है, इन दोनों अभिप्रायों से कहते हैं—और भी—। ये ही युक्तियां केवल रस के अङ्गी होने में ही नहीं; बल्कि और दूसरी भी सम्भव है; यह समुच्चयार्थ है। कारिका को भी इन दोनों अभिप्रायों से लगाना चाहिए। केवल पहले अभिप्राय में प्रथम

द्वितीय उद्योतः २१७ ध्वन्यालोकः वत्। वाच्यवाचकलक्षणान्यङ्गानि ये पुनस्तदाश्रितास्तेऽलङ्कारा मन्तव्याः कटकादिवत् ॥ ६ ॥ तथा च— शृङ्गार एव मधुरः परः प्रह्लादनो रसः। तन्मयं काव्यमाश्रित्य माधुर्यं प्रतितिष्ठति ॥ ७ ॥ ‘गुण’ हैं। और जो वाच्य-वाचक रूप अङ्गों पर आश्रित होते हैं, वे कटक आदि की भाँति ‘अलङ्कार’ माने जाने चाहिए। और उस प्रकार—शृङ्गार ही मधुर एवं परम आह्लादकारी रस है, तन्मय (शृङ्गारमय) काव्य को आश्रयण करके 'माधुर्य' प्रतिष्ठित होता है ॥ ७ ॥ लोचनम् योज्या। केवलं प्रथमाभिप्राये प्रथमं कारिकार्धं दृष्टान्ताभिप्रायेण व्याख्येयम्। एवं वृत्तिग्रन्थोऽपि योज्यः ॥ ६ ॥ ननु शब्दार्थयोर्माधुर्यादयो गुणाः, तत्कथमुक्तं रसादिकमङ्गिनं गुणा आश्रिता इत्याशङ्क्याह—तथा चेत्यादि। तेन वक्ष्यमाणेन बुद्धिस्थेन परिहार- प्रकारेणोपपद्यते चैतदित्यर्थः। शृङ्गार एवेति। मधुर इत्यत्र हेतुमाह—परः प्रह्लादन इति। रतौ हि समस्तदेवतिर्यङ्नरादिजातिष्वविच्छिन्नैव वासनास्त इति न कश्चित्तत्र तादृग्यो न हृदयसंवादमयः, यतेरपि हि तच्चमत्कारोऽस्त्येव। अत एव मधुर इत्युक्तम्। मधुरो हि शर्करादिरसो विवेकिनोऽविवेकिनो वा स्वस्थस्यातुरस्य वा झटिति रसनानिपतितस्तावदभिलषणीय एव भवति। तन्मयमिति। स शृङ्गार आत्मत्वेन प्रकृतो यत्र व्यङ्ग्यतया। काव्यमिति कारिकार्ध भाग को दृष्टान्त के अभिप्राय से व्याख्या करनी चाहिए। इसी प्रकार वृत्तिग्रन्थ को भी लगाना चाहिए ॥ ६ ॥ जब कि माधुर्य आदि गुण शब्द और अर्थ दोनों के हैं, तब कैसे कहा कि अङ्गी रसादि पर गुण आश्रित होते हैं ? यह आशङ्का करके कहते हैं—और उस प्रकार—। अर्थात् अभी जो बुद्धि में स्थित परिहार का प्रकार कहने वाले हैं, उससे यह उपपन्न हो जायगा। शृङ्गार ही—। 'मधुर' होने का कारण कहते हैं—परम आह्लादकारी—। क्योंकि रति ( शृङ्गार रस का स्थायी भाव) के सम्बन्ध में सारे देवता, पक्षी, मनुष्य आदि जातियों में वासना अविच्छिन्न रूप से विद्यमान रहती है; इस प्रकार कोई वैसा नहीं जो हृदयसंवाद धारण नहीं करता, क्योंकि यति (साधु-संन्यासी) को भी उस (रति) में चमत्कार (हृदयसंवाद) होता ही है। इसीलिए 'मधुर' यह कहा है। शक्कर आदि का मधुर रस विवेकी अथवा अविवेकी, स्वस्थ और रोगी की जीभ पर पड़ते ही अभिलषणीय हो जाता है। तन्मय—। वह 'शृङ्गार' व्यंग्य होने से आत्मा

२१८ सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः शृङ्गार एव रसान्तरापेक्षया मधुरः प्रह्लादहेतुत्वात् । तत्प्रकाशन- परशब्दार्थतया काव्यस्य स माधुर्यलक्षणो गुणः । श्रव्यत्वं पुनरोज- सोऽपि साधारणमिति ॥ ७ ॥ शृङ्गारे विप्रलम्भाख्ये करुणे च प्रकर्षवत् । माधुर्यमार्द्रतां याति यतस्तत्राधिकं मनः ॥ ८ ॥ शृङ्गार ही दूसरे रसों की अपेक्षा आह्लादक होने के कारण मधुर है । शब्द और अर्थ शृङ्गाररस के प्रकाशन में तत्पर होते हैं अतः (शब्दार्थमय) काव्य का वह 'माधुर्य' रूप गुण है । श्रव्यत्व ओजस् का भी साधारण लक्षण है ॥ ७ ॥ विप्रलम्भ नाम के शृङ्गार में और करुण में माधुर्य प्रकर्षयुक्त होता है, क्योंकि वहाँ मन अधिक आर्द्रभाव प्राप्त करता है ॥ ८ ॥ लोचनम् शब्दार्थावित्यर्थः । प्रतितिष्ठतीति । प्रतिष्ठां गच्छतीति यावत् । एतदुक्तं भवति—वस्तुतो माधुर्यं नाम शृङ्गारादे रसस्यैव गुणः । तन्मधुररसाभिव्यञ्ज- कयोः शब्दार्थयोरुपचरितं मधुरशृङ्गाररसाभिव्यक्तिसामर्थ्यता शब्दार्थयोर्माधुर्य- मिति हि लक्षणम् । तस्माद्युक्तमुक्तं 'तमर्थमि'त्यादि । कारिकार्थं वृत्त्याह— शृङ्गार इति । ननु 'श्रव्यं नातिसमस्तार्थशब्दं मधुरमिष्यते' इति माधुर्यस्य लक्षणम् । नेत्याह—श्रव्यत्वमिति । सर्वं लक्षणमुपलक्षितम् । ओजसोऽपीति । 'यो यः शस्त्रम्' इत्यत्र हि श्रव्यत्वमसमस्तत्वं चास्त्येवेति भावः ॥ ७ ॥ सम्भोगशृङ्गारान्मधुरतरो विप्रलम्भः, ततोऽपि मधुरतमः करुण इति तदभिव्यञ्जनकौशलं शब्दार्थयोर्मधुरतरत्वं मधुरतमत्वं चेत्यभिप्रायेणाह— रूप से जहाँ हो रहा हो । काव्य अर्थात् शब्द और अर्थ । प्रतिष्ठित होता है—प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है । बात यह कही गई—वास्तव में 'माधुर्य' शृङ्गार आदि रस का ही गुण है । वह (माधुर्य) मधुररस के अभिव्यञ्जक शब्द और अर्थ में उपचरित (आरोपित) होता है, फलतः 'शब्द और अर्थ की जो मधुर शृङ्गाररस की अभि- व्यक्ति की सामर्थ्य है, वही माधुर्य है' यह लक्षण है । इसलिए ठीक कहा है 'उस अर्थ को०' इत्यादि । कारिका के अर्थ को वृत्ति से कहते हैं—शृङ्गार—। शङ्का— जैसा कि (भामह ने) 'माधुर्य' का लक्षण किया है 'श्रवणीय और जिसमें शब्द अधिक समासयुक्त अर्थ वाले न हों, वह मधुर' कहलाता है'; यह 'नहीं' यह कहते हैं— श्रव्यत्व—। (इतने से 'मधुर' का) पूरा लक्षण उपलक्षित कर लिया है । ओजस् का भी—। भाव यह है कि 'यो यः शस्त्रं बिभर्ति०' इस (ओजस् के) स्थल में श्रव्यत्व और असमस्तत्व दोनों ही हैं ॥ ७ ॥ सम्भोग शृङ्गार से मधुरतर विप्रलम्भ शृङ्गार है, उससे भी मधुरतम करुण है, उस रस के अभिव्यञ्जन का कौशल शब्द-अर्थ का मधुरतरत्व और दूसरे का मधुरतमत्व

द्वितीय उद्योतः २१९ ध्वन्यालोकः विप्रलम्भशृङ्गारकरुणयोस्तु माधुर्यमेव प्रकर्षवत् । सहृदयहृदया- वर्जनातिशयनिमित्तत्वादिति ॥ ८ ॥ रौद्रादयो रसा दीप्त्या लक्ष्यन्ते काव्यवर्तिनः । तद्व्यक्तिहेतू शब्दार्थावाश्रित्यौजो व्यवस्थितम् ॥ ९ ॥ रौद्रादयो हि रसाः परां दीप्तिमुज्ज्वलतां जनयन्तीति लक्षणया विप्रलम्भ शृङ्गार और करुण में माधुर्य ही प्रकर्षयुक्त होता है, क्योंकि ( वह माधुर्य ) सहृदय के हृदय को खींचने का अतिशय ( उत्कृष्ट ) निमित्त है ॥ ८ ॥ काव्य में रहनेवाले रौद्र आदि रस दीप्ति के कारण लक्षित होते हैं, उस दीप्ति के व्यञ्जक शब्द और अर्थ को आश्रयण करके ओजस् गुण व्यवस्थित है ॥ ९ ॥ रौद्र आदि रस अत्यन्त दीप्ति या उज्ज्वलता को उत्पन्न करते हैं, इसलिए लोचनम् शृङ्गार इत्यादि । करुणे चेति चशब्दः क्रममाह । प्रकर्षवदिति । उत्तरोत्तरं तरतमयोगेनेति भावः । आर्द्रतामिति । सहृदयस्य चेतः स्वाभाविकमनाविष्ट- त्वात्मकं काठिन्यं क्रोधादिदीप्तरूपत्वं विस्मयहासादिरागित्वं च त्यजतीत्यर्थः । अधिकमिति । क्रमेणेत्याशयः । तेन करुणेऽपि सर्वथैव चित्तं द्रवतीत्युक्तं भवति । ननु करुणेऽपि यदि मधुरिमास्ति, तर्हि पूर्वकारिकायां शृङ्गार एवे- त्येवकारः किमर्थः । उच्यते—नानेन रसान्तरं व्यवच्छिद्यते; अपि त्वात्म- भूतस्य रसस्यैव परमार्थतो गुणा माधुर्यादयः, उपचारेण तु शब्दार्थयोरित्येव- कारेण द्योत्यते । वृत्त्यार्थमाह—विप्रलम्भेति ॥ ८ ॥ रौद्रेत्यादि । आदिशब्दः प्रकारे । तेन वीराद्भुतयोरपि ग्रहणम् । दीप्तिः है, इस अभिप्राय से कहते हैं—विप्रलम्भ शृङ्गार०—इत्यादि । और करुण में यहाँ 'और' शब्द क्रम को बताता है । प्रकर्षयुक्त--। भाव यह कि उत्तरोत्तर ज्यादा और ज्यादातर के होने से । आर्द्रभाव--। अर्थात् सहृदय का चित्त स्वाभाविक अनावेश- युक्तता रूप काठिन्य को, क्रोध आदि के कारण दीप्तरूपता को और विस्मय और हास के कारण विक्षेप की स्थिति को छोड़ देता है । अधिक--। 'क्रम से' यह आशय है । इससे यह कहा गया कि करुण में भी सर्वथा ही चित्त पिघल पड़ता है । ( शङ्का करते हैं कि ) यदि करुण में भी मधुरिमा है, तो पहली कारिका में 'शृङ्गार ही' यह 'एव' ( 'ही' ) का प्रयोग किस लिए ? उत्तर में कहते हैं—इस 'एव' के प्रयोग से दूसरे रस का व्यवच्छेद या निराकरण नहीं किया गया है, बल्कि 'एव'कार से द्योतित होता है कि 'माधुर्य' आदि परमार्थ रूप से आत्मभूत रस के ही गुण हैं, केवल उपचार ( आरोप ) से शब्द और अर्थ के भी गुण हो जाते हैं । वृत्ति से अर्थ कहते हैं— विप्रलम्भ० ॥ ८ ॥ रौद्र०—इत्यादि । 'आदि' शब्द 'प्रकार' ( सादृश्य ) के अर्थ में है । इससे वीर

२२० सलोचन-ध्वन्यालोकः ध्वन्यालोकः त एव दीप्तिरित्युच्यते । तत्प्रकाशनपरः शब्दो दीर्घसमासरचनाल- ङ्कृतं वाक्यम् । यथा— लक्षणा से उन्हें ही 'दीप्ति' कही जाती है । उसका प्रकाशन करनेवाला शब्द दीर्घ समास की रचना से अलङ्कृत वाक्य है । जैसे— लोचनम् प्रतिपत्तृहृदये विकासविस्तारप्रज्वलनस्वभावा । सा च मुख्यतया ओजश्शब्द- वाच्या । तदास्वादमया रौद्राद्याः, तया दीप्त्या आस्वादविशेषात्मिकया कार्य- रूपया लक्ष्यन्ते रसान्तरात्पृथक्तया । तेन कारणे कार्योपचाराद्रौद्रादिरेवौजः- शब्दवाच्यः । ततो लक्षितलक्षणया तत्प्रकाशनपरः शब्दो दीर्घसमासरचन- वाक्यरूपोऽपि दीप्तिरित्युच्यते । यथा 'चञ्चदि'त्यादि । तत्प्रकाशनपरश्चार्थः प्रसन्नैर्गमकैर्वाचकैरभिधीयमानः समासानपेक्ष्यपि दीप्तिरित्युच्यते । यथा— और १अद्भुत का भी ग्रहण है । दीप्ति प्रतिपत्ता या सहृदय के हृदय में विकास, विस्तार और प्रज्वलन की अवस्था को आहित करती है। वह मुख्य रूप से 'ओजस्' शब्द से कही जाती है। रौद्र आदि उस दीप्ति के आस्वाद से युक्त हैं । आस्वाद विशेष एवं कार्य रूप उस दीप्ति से ( वे रौद्र आदि रस ) अन्य रसों से पृथक् रूप में लक्षित होते हैं । इस लिए कारण में कार्य के उपचार से 'रौद्र' आदि ही 'ओजस्' शब्द के वाच्य हैं । इस लिए 'लक्षित लक्षणा' के द्वारा रौद्र आदि का प्रकाशक शब्द दीर्घसमास की रचना का वाक्य रूप होकर भी 'दीप्ति' कहलाता है । जैसे— १. 'रौद्र आदि' में 'आदि' पद को लोचनकार ने प्रकार या सादृश्य के अर्थ में माना है और इससे 'वीर और अद्भुत का भी ग्रहण' किया है। अर्थात् रौद्र के सदृश रस वीर आदि दीप्ति से लक्षित होते हैं। यहाँ 'बालप्रिया' में यह शङ्का उठाई गई है कि जब कि स्वयं लोचनकार क्रोधादि को दीप्ति का जनक लिख कर इसी क्रम में और विस्मय, हास आदि को रागित्व या विक्षेप का जनक बताते हैं, ऐसी स्थिति में दीप्ति के जनक होने के कारण क्रोधादि के 'आदि' शब्द से अद्भुत या विस्मय का ग्रहण हो ही जाता है फिर 'विस्मय' का रागित्व या विक्षेप के जनक के रूप में पुनः उल्लेख करने की आवश्यकता क्या थी ? इससे तो यहीं विदित होता है कि 'क्रोधादि' से 'वीर' को ही ग्रहण किया जा सकता है 'अद्भुत' को नहीं। इस प्रकार प्रस्तुत में भी जब 'लोचन' में 'रौद्रादि' से वीर और अद्भुत के ग्रहण का उल्लेख है तो पूर्व ग्रन्थ से इस ग्रन्थ का विरोध स्पष्ट है, ऐसी स्थिति में प्रस्तुत 'अद्भुत' पद के स्थान में 'बीभत्स' यह पाठ होना चाहिए । किन्तु यहाँ 'दिव्याञ्जना' में मेरे गुरु जी का कहना है कि यहाँ 'अद्भुत' से वीर के विभाव से उत्पन्न 'अद्भुत' के ग्रहण करने पर कोई शङ्का उदित नहीं होगी। २. लक्षितलक्षणा अर्थात् लक्षित में लक्षणा । कुछ लोगों ने लक्षित अर्थ से लक्षणा को 'लक्षित- लक्षणा' माना और कुछ ने शक्यार्थ के परम्परा सम्बन्ध को लक्षितलक्षणा माना है। अस्तु, यहाँ 'ओजस्' शब्द का मुख्य अर्थ है दीप्ति । रौद्रादि से दीप्ति उत्पन्न होती है, इस लिए रौद्र आदि भी 'ओजस्' शब्द से लक्षित होते हैं और इस प्रकार दीर्घ समास की रचना से अलंकृत वाक्य रौद्रादि का