ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
न होना इसका रूप । व्याप्ति है इसकी अमाप । निद्रस्तके यह समीप । जगते ही दूर ॥ ८८॥ मैं सोता तब यह जगती । ब्रह्मांड उदरमें रखती । सत्ता-संभोगसे है बनती । गर्भवती यह ॥ ८९॥ प्रकृतिके आठ विकारोंकी सहायतासे अनेक ब्रह्मांड उत्पन्न होते हैं— इसी महद्ब्रह्मका उदर । प्रकृतिके आठ ही विकार । गर्भ अभिवृद्धि धनुर्धर । करता जगद्रूप ॥ ९० ॥ उभय संगसे प्रथम । बुद्धि तत्वका हुवा जन्म । रजस वह भरा सम । बनता मन ॥ ९१ ॥ ममता तरुणी तब भनकी । रचना करती अहंकारकी । उसने की पंच-महाभूतोंकी । अभिव्यक्ति ॥ ९२ ॥ विषयेंद्रिय जो स्वभावता । रहती भूतोंके अंतर्गत । जिससे वे भी भूतोंके साथ । लेते आकार ॥ ९३ ॥ बने हुए विचार-क्षोभसे । पीछे त्रिगुण खडे होनेसे । तब जीव वासना गर्भसे । जाता स्थान स्थानपे ॥ ९४ ॥ जैसे बीजका एक कण । पानीसे कर संघटण । वृक्षका रूप सुलक्षण । लेता अपनेमें ॥ ९५ ॥ वैसे मेरे ही संग । अविद्या नाना जग । नित ले आता डग । अंकुर रूप ॥ ९६ ॥ अजी ! फिर वह गर्भ-गोल । जैसे रूप ले आता सकल । वह तू सुन अब निर्मल । चित्त देकर ॥ ९७ ॥ मणिज स्वेदज । उद्बिज जारज । उगते सहज । अवयव ॥ ९८ ॥ व्योम वायु-वश । बढा गर्भ-रस । मणिज ले खास । अवयव ॥ ९९ ॥ ५३९ गुण-निस्तारयोग
पेटमें सोते तम-रज । उसमें आया आप-तेज उससे सहज स्वेदज । उत्पन्न होते ॥ १०० ॥ आप पृथ्वी उत्कट । तम-मात्र निकृष्ट । स्थिर होता प्रकट । उद्बीज रूप ॥ १ ॥ पांच ही जब एकत्र होते । मन-बुद्धि साथ पाते । जारजका हेतु बनते । तब ये पार्थ ॥ २ ॥ ब्रह्मांडका पूर्ण रूप— ऐसे ये चार सरल । कर चरण तल । महा-प्रकृति मूल । बनता शिर ॥ ३ ॥ प्रवृत्ति उसका पेट । निवृत्ति सरल पीट । सुर-योनि अंग आठ । उर्ध्व भागके ॥ ४ ॥ कंठ उल्हसित स्वर्ग । मृत्यु-लोक मध्य-अंग । पाताल है अधो-भाग । त्रिलोकका ॥ ५ ॥ ऐसा बालक एक । जन्म दिया है देख । जिसके तीनों लोक । है विकास ॥ ६ ॥ चौरासी लक्ष जो योनी । इसके जोडोंके मणी । बढता है क्षण-क्षण । यह बालक ॥ ७ ॥ शरीरके सभी अंग पर । डालती नामके अलंकार । बढाती मोह-स्तन्य देकर । नित्य-नवीन ॥ ८ ॥ नाना सृष्टि इस बालककी । उंगलियां कर-चरणकी । भिन्नाभिमान उंगुलियोंकी । मुंदरियां अनेक ॥ ९ ॥ इकलौता यह चराचर । अविचारित अति सुंदर । बालकको जो जन्म-देकर । बनी महान ॥ ११० ॥ ब्रह्मा इसका प्रातःकाल । विष्णु रहा मध्यान्ह काल । सदाशिव है सायंकाल । इस बालकका ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४०
महा-प्रलय शैय्यापर सोता । जब यह खेल करके आता । कल्पोदयमें यह है उठता । विषम-ज्ञानसे ॥ १२ ॥ इस प्रकार अर्जुन । मिथ्या दृष्टिका सदन । युगानुवृत्ति चरण । रखता स-कौतुक ॥ १३ ॥ संकल्प है इसका इष्ट । अहंकार साथी विनट । इसका अंत है निकट । आता ज्ञानसे ॥ १४ ॥ रहने दो बखान बहुत । यह विश्व है मायासे जात । मेरी सत्ता है आधारभूत । इस कार्यमें ॥ १५ ॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥ इस दृश्यमान विश्वमें भी मैं ओतप्रोत भरा हूं— इसीलिये मैं पिता । महद्ब्रह्म है माता । आपत्य पांडुसुता । जगडंबर ॥ १६ ॥ शरीर है सो अब बहुत । देखके चित्तमें न हो द्वैत । मन बुद्धि आदि जो हैं भूत । एक ही यहां ॥ १७ ॥ जैसे शरीरमें एक । अवयव होते अनेक । कैसे विचित्र विश्व देख । एक ही यहां ॥ १८ ॥ ऊंची नीची विविध प्रकार । होती डालियां विविध आकार । होता है उसका जो आधार । बीज एक ॥ १९ ॥ संबंध है वह भी कैसा । घट माटीका पुत्र जैसा । या कपासका पुत्र जैसा । वस्त्रत्व होता है ॥ १२० ॥ अनेक लहरोंकी परंपरा । सिंधु-संतति जिस प्रकार । सब चराचरका औ' हमारा । संबंध भी ऐसा ॥ २१ ॥ किसी भी योनिमें मूर्ति जन्मती है कहीं कभी । उन्हें प्रकृति है माता पिता मैं बीज रोपता ॥ ४ ॥ ५४१ गुण-निस्तारयोग
तभी है अग्नि और ज्वाल । दोनों ही हैं अग्नि केवल । उसी भांति मेरा है सकल । संबंध वैसा ॥ २२ ॥ निर्मित जगसे यदि मैं छिपता । तब जगत्वसे है कौन दीखता । मानव-तेजसे क्या छिपता । कभी माणिक्य ॥ २३ ॥ जब अलंकारका रूप लिया । तब क्या उसका स्वर्णत्व गया । या मानो कमल खिल गया । मिटा क्या कमलत्व ॥ २४ ॥ अभी कह यह तू पार्थ । अवयवसे आच्छादित । या उसीसे है प्रकटित । अवयवी यहां ॥ २५ ॥ अविमें बोया गया एक दाना । बढ़कर होता है बहुगुना । या व्यर्थ गया है वह अर्जुन । उसी प्रकार ॥ २६ ॥ तभी विश्वके उस पार । देखना पट कर दूर । तब सर्वत्र धनुर्धर । केवल मैं हूं ॥ २७ ॥ तू यह साक्षात्कार । सदा हृदयमें भर । दृढ़तासे तू आदर । जीवनमें इसे ॥ २८ ॥ जब मैं मुझमें प्रकाशता । देहमें भिन्न दीखता । तब मैं गुणोंसे बंधा जाता । दीखता ऐसे ॥ २९ ॥ स्वप्नमें आप ही कल्पनासे । आत्म-मरण जगाते जैसे । तथा आप ही भोगते जैसे । पांडुकुमार ॥ १३० ॥ कामलमें जैसे नयन । करके पीला प्रकाशन । देते हैं कामलका ज्ञान । उनको ही ॥ ३१ ॥ अथवा सूर्यका प्रकाश । कराता बादलका भास । लोपसे देता है प्रकाश । सूर्य ही तब ॥ ३२ ॥ आनेसे ही जन्म जिसका । छाया होती कारण भयका । किंतु अपनेसे है छायाका । सदा अभिन्नत्व ॥ ३३ ॥ वैसे करके प्रकाशन । अनेक देहमें समान । दिखाता गुणका बंधन । वह मैं ही ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४२
बंध क्यों नहीं बांधता । मुझे मैं सही जानता । अज्ञान कारण होता । बंधका वहां ॥ ३५ ॥ मुझको ये बंधन ऐसे । किन गुणसे दीखे वैसे । कहता हूं शांत चित्तसे । सुन तू इसको ॥ ३६ ॥ सत्व रज तम इन तीन गुणोंके कारण पुनर्जन्म होता है— कितने गुण है या धर्म । उसका क्या रूप औ' नाम । कहां हुए इसका मर्म । कहता हूं सुन ॥ ३७ ॥ सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥ सुन सत्व रज तम । यहां तीनोंके ये नाम । तथा प्रकृतिसे जन्म । पाते हैं ये ॥ ३८ ॥ यहां है सत्व उत्तम । तथा रज है मध्यम । तीनोंमें है यह तम । कनिष्ट सहज ॥ ३९ ॥ जैसे एक ही शरीरमें तीन । अवस्थायें होती हैं भासमान । एक अंतःकरणमें त्रिगुण । होते हैं भास ॥ १४० ॥ जैसे जैसे कस-हीन । होता सोनेमें मिलन । बढ़ स्वर्णका वजन । होता अवमूल्य ॥ ४१ ॥ सावधानता जैसे जैसे । दूर होती है आलससे । जकड़ती है निद्रा वैसे । दृढ मूल हो ॥ ४२ ॥ अज्ञान अंगीकार कर । उठती है वृत्ति ऊपर । वह है सत्व रज द्वारा । तममें भी जाती ॥ ४३ ॥ यह तू जान अर्जुन । इनका नाम है गुण । अब करना दर्शन । बद्धताका ॥ ४४ ॥ प्रकृतिसे बने हैं ये गुण सत्व रजस्तम । वे निर्विकार आत्माको जोतते मान देहमें ॥ ५ ॥ ५४३ गुण-निस्तारयोग
जब क्षेत्रज्ञ-दशा । आत्मा छू लेता जैसा । यह देह मैं ऐसा । कहने लगता ॥ ४५ ॥ जन्मसे मरण पर्यंत । देहके धर्ममें समस्त । यह जो ममत्वका है सूत । पिरोता है ॥ ४६ ॥ मीनके मुखमें जैसे । अमिष पहुंचनेसे । झटका देता कांटेसे । जल पारधी ॥ ४७ ॥ तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ ॥ ६ ॥ गुणोंके लक्षण, सत्व गुण— तभी है जो लुब्धक । सुख-ज्ञानका पाश फेंक । खींचता है मृग-शावक । सुख-ज्ञानमें ॥ ४८ ॥ ज्ञानसे फिर तडपता । विद्वताके पैर झाडता । आत्म-सुखको है गंवाता । अपने ही हाथसे ॥ ४९ ॥ विद्या-मानसे तब तोषता । किसी लाभ-मात्रसे हर्षाता । स्व-संतोषमें धन्य मानता । अपने आप ॥ १५० ॥ कहता भाग्य है मेरा । नहीं है ऐसा दूसरा । विकाराष्टकसे भरा । फूलता वह ॥ ५१ ॥ मानो इतना नहीं पूरा । बंधन लगे दूसरा । विद्वत्ताका भूत संवार । चढता सिरपे ॥ ५२ ॥ मैं हूं स्वयं ज्ञान-स्वरूप । खोनेका दुःख ना अमाप । विषय-ज्ञान-लीन आप । चढा गगन ॥ ५३ ॥ जैसे राजा स्वप्नमें । रंक बन भिक्षामें । दाना पाके सुखमें । मानता इंद्र ॥ ५४ ॥ इनमें शुचि जो सत्व ज्ञान आरोग्य दायक । सुखी मैं और मैं ज्ञानी इससे बांधता नित ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४४
वैसे वह देहातीत । बनकर देहवंत । बहलता पांडुसुत । बाह्य-ज्ञानसे ॥ ५५ ॥ प्रवृत्ति-शास्त्र सूझता । यज्ञ-ज्ञान जूझता । स्वर्ग भी है दीखता । और क्या रहा ॥ ५६ ॥ मैं हूं महा-ज्ञानवान । मुझसे नहीं विद्वान । मेरा चित्त है गगन । या सूर्य-चंद्रका ॥ ५७ ॥ ऐसे ही सत्व-सुख-ज्ञानका । जीवमें लगे बागडोरका । बलसे देता जाता झटका । जुते हुये बैलकासा ॥ ५८ ॥ ऐसे ही यह रजो गुणसे । शरीरमें बंधा जाता कैसे । कहता हूं मैं तू सुन इसे । पांडुकुमार ॥ ५९ ॥ रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् ॥ ७ ॥ रजोगुणके लक्षण— तभी यह रज कहलाता । जीवनका रंजन जानता । यौवन नित बना रहता । अभिलाषाका ॥ १६० ॥ रजका जब स्पर्श होता । जीव काम-मदमें आता । हवा पर सवार होता । चिंतनके यह ॥ ६१ ॥ अग्नि-कुंडमें घृत सिंचन किया । विद्युताग्निने उसका साथ दिया कहो अधिक कम क्या रह गया । कहेंगे तब ॥ ६२ ॥ इच्छा दाह तब भडकता । क्लेश-सह मधुर लगता । इंद्रैश्वर्य भी ओछा लगता । ऐसे समय ॥ ६३ ॥ इच्छा दाह अब बढता । मेरु भी हाथमें लगता । फिर भी वह है चाहता । और भी बडा ॥ ६४ ॥ रज है वासना-रूप तृष्णा आसक्ति-वर्धक । आत्माको कर्मके साथ बांधता बल-पूर्वक ॥ ७ ॥ ५४५ गुण-निस्तारयोग (69)
खर्च किया आज ऐसा । कलका चलेगा कैसा । इससे बहु बडा-सा । करेगा उद्यम ॥ ६५ ॥ दमडी पर जीवन । दे करके बलिदान । कमाकर एक तृण । मानता धन्य ॥ ६६ ॥ कहता स्वर्गपे जाना । सोचता कहां क्या खाना । यज्ञानुष्ठान करना । इसीलिये ॥ ६७ ॥ सदा व्रत पर व्रत । करता इष्ट प्राप्त्यर्थ । कभी कामना रहित । न करता कुछ ॥ ६८ ॥ जैसा है ग्रीष्मका पवन । न ही जानता शांति-क्षण । रहता वह निशिदिन । ऊधमग्रस्त ॥ ६९ ॥ होता है चंचल मीन । या कामिनी कटाक्ष समान । या बिजलीकी गति मान । रहता प्रवृत्तिमें ॥ १७० ॥ चाहता इसी वेगसे । संसार स्वर्ग भी वैसे । क्रियाकी आगमें वैसे । घुसता वह ॥ ७१ ॥ देहमें या देहसे भिन्न । तृष्णा श्रृंखलाके बंधन । सदा उपद्रुव्याप विभिन्न । गलेमें व्यापारके ॥ ७२ ॥ रजो गुणका यह दारुण । देहमें देहीके है बंधन । सुन तू अब कथा अर्जुन । तमो गुणकी ॥ ७३ ॥ तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८ ॥ तमोगुणके लक्षण- व्यवहारके जो नयन । बंद होते जिससे जान । मोह-रात्रीके हैं जो घन । काले अतिशय ॥ ७४ ॥ मोहता तम देहीको अज्ञानको बढाकर । निद्रा प्रमाद आलस्य इससे घेर बांधता ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४६
उसकी प्रीति अज्ञानसे । केवल इसी कारणसे । भ्रमग्रस्त होकर जैसे । नाचता जीव ॥ ७५ ॥ अविवेक महा-मंत्र । मूढता मद्य-पात्र । इसका है मोहनास्त्र । जीवोंके लिये ॥ ७६ ॥ अर्जुन यह है तम । इसका है यह मर्म । बांधता देह ही आत्म । इस अज्ञानसे ॥ ७७ ॥ ऐसा ही है सब शरीर । मानता सब चराचर । तम बिन अन्य विचार । नहीं है जान ॥ ७८ ॥ सब इंद्रियोंमें जाड्य । मनमें भरा है मौढ्य । दोनोंमें हुवा है धाढर्य । आलस्यका ॥ ७९ ॥ अंगअंग मोडता रहता । किसी काममें नहीं आता । उबासियां लेता रहता । प्रति क्षण ॥ १८० ॥ खुले रख भी नयन । नहीं देखता अर्जुन । कोई बात भी न सुन । जी ! कह उठता ॥ ८१ ॥ पत्थरसा पडा ही रहता । हिलनेकी बात न करता । सदा कुंडली मार बैठता । उठता नहीं ॥ ८२ ॥ धरणी धंसती है पताल । गगन गिरता धरातल । किंतु उठना भी है केवल । उसको नहीं भाता ॥ ८३ ॥ यह उचित या अनुचित । प्रश्न नहीं करता है चित्त । पडा रहना मात्र सतत । जानती बुद्धि ॥ ८४ ॥ उठाके अपने करतल । उससे पकडकर गाल । घुटनोंमें सिकुड सकल । बैठा रहता ॥ ८५ ॥ सोनेमें करता है मन । नींदको स्वर्ग सुख मान । अन्य सब तुच्छ अर्जुन । कहता आप ॥ ८६ ॥ करके ब्रह्मायु प्राप्त । सोया रहता सतत । दूसरी कुछ भी बात । नहीं मनमें ॥ ८७ ॥ ५४७ गुण-निस्तारयोग
राह चलते भी यदि गिरता । वहींपे खर्राटे भरता । अमृत मिला तो भी नहीं पीता । जब आती नींद ॥ ८८ ॥ वैसे भी कभी क्रोशावेशमें । निकले कभी किसी व्यापारमें । निकलता जैसे अंधा क्रोधमें । उसी भांति ॥ ८९ ॥ कब कैसे बरतना । किससे कैसे बोलना । साध्य असाध्यका ज्ञान । न होता उसे ॥ १९० ॥ संपूर्ण अग्नि-तेज जैसे । पोंछने अपने पंखसे । उड़ता है पतंग वैसे । पांडुकुमार ॥ ९१ ॥ ऐसे ही काम उसे रुचता । जो न करना वही है भाता । वैसे वह करता रहता । प्रमाद-साहस ॥ ९२ ॥ एवं निद्रा-आलस्य-प्रमाद । तमके रूप हैं त्रिविध । निरुपाधिकके होते बंध । धनंजय ॥ ९३ ॥ आगसे जब घिरता काठ । तब दीखता आगसा काठ । या आकाशको घिरता घट । कहलाता घटाकाश ॥ ९४ ॥ पानीसे जब ताल भरता । चन्द्र-बिंब उसमें भासता । वैसे गुणमें भी भास होता । आत्म-तत्वका ॥ ९५ ॥ सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥ ९ ॥ रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १० ॥ सुखमें जोडता सत्त्व कर्ममें जोडता रज । ढकके ज्ञान संपूर्ण भ्रममें डालता तम ॥ ९ ॥ जीतके अन्य दोनोंको तीसरा करता बल । ऐसा कभी बढे सत्त्व कभी रज कभी तम ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ५४८
तीनों गुण समय समय पर बदलते रहते हैं— पीछे कर कफ वात । आगे आता जब पित्त । होता है तब संतप्त । जिस भांति ॥ ९६ ॥ आतप वर्षाको जीतकर । प्रकट होता शीत-लहर । आकाश तब जिस प्रकार । होता है शीत ॥ ९७ ॥ अथवा नाना स्वप्न-जागृति । मिटके आती सुषुप्ति । क्षण भर चित्त-वृत्ति । होती जैसे ॥ ९८ ॥ वैसे रज-तमको पराजित । करके सत्व होता प्रकाशित । जीव कहता है हो प्रमुदित । सुखी हूं मैं ॥ ९९ ॥ वैसे ही जब सत्व और रज । मिटाकर होता तमका राज । प्रवृत्ति होती है तब सहज । प्रमादकी ॥ २०० ॥ उसी भांति पांडुकुमार । सत्व-तमको हटाकर । उठाता है अपना शिर । रजोगुण ॥ १ ॥ कर्मके बिन अन्य कहीं । सुंदर कुछ भी है नहीं । इस भांति मानता देही । शरीरस्थ ॥ २ ॥ त्रिगुण वृद्धिका निरूपण । किया हैं श्लोकोंमें यहां तीन । सत्वादि गुण-वृद्धि लक्षण । सुनो अब ॥ ३ ॥ सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥ लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥ प्रज्ञाका इंद्रियों-द्वारा प्रकाश सब ओर जो । देहमें फैलता सारा जानना सत्व है बढ़ा ॥ ११ ॥ प्रवृत्ति लालसा लोभ कर्मारंभ अशांतता । फैलाव देहमें होता जानना तम है बढ़ा ॥ १२ ॥ ५४९ गुण-निस्तारयोग
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥ यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥ रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥ सत्त्वस्थके स्वभाव-धर्म— रज-तम पर पा विजय । सत्व करता देहपे राज्य । तब जो लक्षण धनंजय । दीखते वह सुन ॥ ४ ॥ प्रतिभा मानो शरीरके अंदर । न समानेसे छलकती बाहर । सुगंध जैसे महकती बाहर । वसंतमें कमलसे ॥ ५ ॥ जैसे सभी इन्द्रियोंके अंगनमें । खडा होता विवेक दास रूपमें । उगती हैं आंखें कर-चरणमें । उसके पार्थ ॥ ६ ॥ राजहंसके सम्मुख । रखनेसे क्षीरोदक । उसकी चोंचकी नोक । करता न्याय ॥ ७ ॥ वैसे दोषादोष विवेक । करती हैं इन्द्रियां देख । बनके रहता सेवक । निग्रह वहां ॥ ८ ॥ सुनते नहीं अश्रव्य कान । न देखते कु-दृश्य नयन । न बोलती अवाच्य वचन । वाणी जैसे ॥ ९ ॥ प्रमाद मोह अंधार आलस्य सब ओरसे । फैलाव देहमें होता जानना तम है बढ़ा ॥ १३ ॥ तजता देहको देही बढता सत्व है जब । जन्मता शुभ लोगोंमें सज्जनोंके समाजमें ॥ १४ ॥ रजमें लीन होता जो जन्मता कर्म-किसमें । डूबता तममें सारा जन्मता मूढ-योनिमें ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५०
दीपकके सम्मुख अंधार । भागते जाता जैसे सत्वर । नहीं आते निषिद्ध आचार । इन्द्रियोंके सम्मुख ॥ २१० ॥ अजी ! वर्षा-ऋतुमें जैसे । नदियां उमड़ती वैसे । फैल जाती है बुद्धि वैसे । सब शास्त्रोंमें ॥ ११ ॥ जैसे पूर्णमासीका दिवस । चांदनीसे भरता आकाश । शास्त्रमें फैलती तत्सदृश । वृत्ति सदैव ॥ १२ ॥ एकत्र होती वासना । प्रवृत्तिका संयमन । विषयों परसे मन । हठ जाता है ॥ १३ ॥ जब सत्व बढता । यह चिन्ह दीखता । यदि निधन होता । ऐसे समय ॥ १४ ॥ जैसे है घरकी संपत्ति । वैसे औदार्य धैर्य-वृत्ति । तब इह परमें कीर्ति । क्यों न फैलेगी ॥ १५ ॥ अथवा आया है अति सुकाल । चला संतर्पण अति-मंगल । अतिथि आप्त आया उसी पल । कहना क्या तब ॥ १६ ॥ इससे क्या है तब सुंदर । वैसे सत्वमें जाना शरीर । सत्व-स्वभावको छोड और । जायेगा कहां ॥ १७ ॥ सत्व-गुणमें जो उद्भट । तज सत्व-गुण श्रेष्ठ । चलता है छोडके कोपट । भोग-क्षम जो ॥ १८ ॥ अकस्मात जो ऐसा मरता । सत्वका ही नया बनता । या ज्ञानियोंमें जन्म लेता । यह निश्चय ॥ १९ ॥ कह तू यह धनुर्धर । राजा राजत्वमें डोंगर । चढता है तब अधूरा । होता है क्या ॥ २२० ॥ अथवा यहांका जो दिया । पडोसके गांवमें गया । वहां पर क्या धनंजय । न रहता दीप ॥ २१ ॥ वैसी यह सत्व-शुद्धि । होती ज्ञान सह वृद्धि । तैरने लगती बुद्धि । विवेक पर ॥ २२ ॥ ५५१ गुण-निस्तारयोग
महदादिककी परंपरा । विचार कर तदनंतर । विलीन हो जाते स-विचार । उसके उदरमें ॥ २३ ॥ छत्तीसमें सैंतीसवां । चौबीसमें पच्चीसवां । तीनों पर स्वभाव । चौदह जिसका ॥ २४ ॥ ऐसा सर्व जो सर्वोत्तम । होता है जिसको सुगम । ऐसे कुलमें निरुपम । मिलता है देह ॥ २५ ॥ रजोगुणीका स्वभाव-धर्म- इसी भांति हे तू देख । सत्व तम अधोमुख । तथा होता ऊर्ध्व-मुख । जब रजोगुण ॥ २६ ॥ तब वह अपने कार्यका पार्थ । शरीर-ग्राममें है धूम मचाता । देहमें तब लक्षणोंका करता । उदय ऐसा ॥ २७ ॥ अजी ! फैला हुवा बवंडर । करता है वस्तुओंका ढेर । वैसे होता विषयोंका ठौर । वह देह ॥ २८ ॥ प्रसंग जैसे पर-दारादिकका । न सोचता शास्त्र-विरुद्ध होनेका । इंद्रियोंको देता चारा विषयोंका । भेडोंके समान ॥ २९ ॥ यहां तक होता इनका लोभ । स्वैर वृत्तिका रहता सदा रोभ । लूटनेमें अशक्य जो अलाभ । इन लोगोंका ॥ २३० ॥ आता जब उद्यमका प्रसंग । नहीं लेता है कभी पीछे पग । बढाती है प्रवृत्ति पग-पग । अपनी सदैव ॥ ३१ ॥ या खडा करना कोई प्रासाद । या करना है यज्ञ-अश्वमेध । ऐसे होते मनमें बडे छंद । उसके सदैव ॥ ३२ ॥ नगरोंको रचाना । जलाशय बांधना । महावन लगाना । नानाविध ॥ ३३ ॥ ऐसे ऐसे महान कर्म । समारोहोंका उपक्रम । इस परके सभी काम- । भोग करना मेरे ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५२
महा-सागर भी खायेगा मात । अग्नि भी होगा पूरा पराजित । बढती है इतनी असीमित । अभिलाषा उसकी ॥ ३५ ॥ आशा जो बढती जाती । मनके आगे दौडती । विश्वको भी जो गिनती । पद्-तलमें ॥ ३६ ॥ बढता है रज जब । दीखते ये चिन्ह सब । शरीर पडता तब । यदि इसका ॥ ३७ ॥ यह सब होते जहां । वह जन्मता है वहां । किंतु होती योनि वहां । मनुष्यकी ही ॥ ३८ ॥ यदि कोई एक भिक्षुक । राज-गृहमें बैठा देख । उससे वह राजा एक । बनेगा क्या ॥ ३९ ॥ बैलको जोतकर गाडीमें । ले गये धनीके बारातमें । इससे चूकेगा क्या गोठेमें । खाना घास ॥ २४० ॥ इसीलिये व्यापारमें दिन रात । जुते रहते जो अविश्रांत । ऐसे कुलमें उसे निश्चित । मिलता जन्म ॥ ४१ ॥ जन्मता है कर्म-जडोंमें । अथवा ऐसे ही देहमें । जहां रजोत्कर्ष-गर्तमें । डूबता वह ॥ ४२ ॥ तमो-गुणीका स्वभाव-धर्म— और अर्जुन उसी भांति । जहां रज-सत्वकी वृत्ति । निगलकर हो उन्नति । तमोगुणकी ॥ ४३ ॥ कहते हम लक्षण । अंतर्बाह्य तन-मन । कहता सुन अर्जुन । ध्यान देकर ॥ ४४ ॥ उसका होता ऐसा मन । जैसे सूर्य-चन्द्र विहीन । होता है रातका गगन । अमावसका ॥ ४५ ॥ ऐसा उसका अंतःकरण । सदैव स्फूर्ति-हीन विरान । विचारका स्पर्श भी अर्जुन । नहीं होता ॥ ४६ ॥ ५५३ गुण-निस्तारयोग (70)
पत्थरको हराती जड़ता । मृदुता वह नहीं जानता । स्मरण-शक्तिका अता-पता । नहीं होता उसको ॥ ४७ ॥ अविवेक उसका साज । अंतर्बाह्य मौढ्यका बाज । लेन-देन होता सहज । मूर्खताका ॥ ४८ ॥ आचार-हीनता अमंगल । दबोचती उसको प्रबल । मृत्यु-तक उसका चंगुल । कसता जाता ॥ ४९ ॥ कहता हूं और एक लक्षण । दुष्टतामें चित्त विलक्षण । जैसे काली रातमें सुलक्षण । देखता उल्लू ॥ २५० ॥ निषिद्ध-कर्मके नामसे । खिल जाता तन-मनसे । दौड़ती अनिर्बंध जैसे । इंद्रियां सारी ॥ ५१ ॥ बिन मदिराके वह झूमता । बिन सन्निपातके बकता । बिन प्रेमके वह भूलता । पागल जैसे ॥ ५२ ॥ रहता नहीं उसका चित्त । किंतु उन्नति नहीं निश्चित । भ्रम-वश हुवा है उन्मत्त । तमो-गुणी वह ॥ ५३ ॥ या इन गुणोंकी होती । जहां संपूर्ण प्रतीति । जानो तमकी उन्नति । हुई सांग ॥ ५४ ॥ और ऐसे ही प्रसंग । तजता है यदि अंग । लेके यही गुण संग । जन्मता वह ॥ ५५ ॥ राईपन अपने बीजमें । छोड़ जाती है राई अंतमें । अंकुरेगा राईके रूपमें । राईपन जैसे ॥ ५६ ॥ तज कर अग्नि जब दीप । बुझता यदि अपने आप । जैसे जहां लगा वह दीप । आग ही आग ॥ ५७ ॥ ऐसे तमो गुणके साथ । संकल्प बांधकर पार्थ । बुझती है जीवन जोत । जन्मती तम-रूप ॥ ५८ ॥ इससे अधिक क्या कहना । तम-वृद्धिमें देह तजना । पशु-पक्षी कृमि हो जन्मना । या उगना हो पेड ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५४
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥ तीनों गुणोंका परिणाम-- श्रुतिका यह निरूपण । बन जाता है सत्व-गुण । सुकृत-कर्मका कारण । धनुर्धर ॥ २६० ॥ इसीलिये है निर्मल । सुकृतका जो सरल । देता सुख ज्ञान फल । सात्विक ॥ ६१ ॥ फिर है जो रजकी प्रक्रिया । इंद्रवणिका फल पकाया । सुख चितार अंतमें दिया । दुःख अपार ॥ ६२ ॥ अथवा जैसे निंबोणीका फल । बाहर मृदु अंदर गरल । वैसे होते राजस-क्रिया-फल । यहां अर्जुन ॥ ६३ ॥ जैसे है विषका अंकुर । देता विष फल आखर । वैसे है रूप भयंकर । फलता तम ॥ ६४ ॥ सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥ इसीलिये हे अर्जुन । सत्वका हेतु है ज्ञान । जैसे मानो दिनमान । होता सूर्यका ॥ ६५ ॥ तथा वैसे ही यह जान । लोभका है रज कारण । जैसे स्वरूप विस्तारण । जीव-दशाका ॥ ६६ ॥ मोह अज्ञान प्रमाद । यहां है ये दोष-वृन्द । आगे जो बढता प्रबुद्ध । तमका मूल ॥ ६७ ॥ फल सात्विक कर्मोंका पुण्य निर्मल है कहा । रजका फल है दुःख तमका ज्ञान-शून्यता ॥ १६ ॥ सत्वसे फैलता ज्ञान रजसे जान लालसा । प्रमाद मोह अज्ञान होते हैं तमके गुण ॥ १७ ॥ ५५५ गुण-निस्तारयोग
ऐसे विचारोंके नयन । तीनों गुण करके भिन्न । दिखाते हैं जान अर्जुन । करतलामलकसा ॥ ६८ ॥ रज-तम हैं ये दोनों गुण । होते हैं पतनके कारण । सत्व बिन अन्य नहीं जान । पहुंचाते ज्ञानके पास ॥ ६९ ॥ इसीलिये सात्विक-वृत्ति । स्वीकार व्रत जन्म-वृत्ति । सर्व त्याग करके भक्ति । करते जान ॥ २७० ॥ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥ गुण-बद्धोंके स्थान— जिनमें होता सत्वका उत्कर्ष । जीते-मरते उसीमें सहर्ष । तन त्याग वे पाते सत्पुरुष । स्वर्गका राज ॥ ७१ ॥ ऐसे ही रजमें जो रहते । उसीमें जीते तथा मरते । वे मनुष्य होके जन्मते । मृत्यु-लोकमें ॥ ७२ ॥ सुख दुःखकी खिचडी जिसमें । खानी पड़ती एक ही थालीमें । फंसते हैं जो मरण-चक्रमें । कभी नहीं छूटते ॥ ७३ ॥ तथा तममें जो उसी भांति । जीते मरते हैं उसी स्थिति । पाते हैं नरक अधोगति । प्राप्ति-पत्र ॥ ७४ ॥ इस भांति जो वस्तु-सत्ता । त्रिगुणको कैसे प्रभावित । करती है कारण सहित । कहा मैंने ॥ ७५ ॥ वस्तु होती है वस्तुत्वमें । किंतु आप गुण-रूपमें । देख गुणके स्वभावमें । बरतती है ॥ ७६ ॥ राजा देखता जैसे स्वप्नमें । घिरा है राज-पर-चक्रमें । जीतता हारता अपनेमें । आप ही एक ॥ ७७ ॥ सत्वस्थ चढते ऊंच मध्यमें व्यक्ति राजस । अधःपतित होते हैं तामसी हीन वृत्तिके ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५६
वैसे मध्य ऊर्ध्व अध । ये जो गुण-वृत्ति भेद । दृष्टि तज दी तो शुद्ध । वस्तु आप ॥ ७८ ॥ नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥ गुण-निस्तारका विवेचन— रहने दे अब यह विषय । कहने दे पीछेका जो विषय । इसे विषयांतर धनंजय । नहीं मान तू ॥ ७९ ॥ मानो यह तीन जो गुण । अपने सामर्थ्यसे जान । होते जैसे देह अर्जुन । गुण ही आप ॥ ८० ॥ जैसे ईंधनका आधार । अग्नि होता है धनुर्धर । या उगता है तरुवर । भूमिका रस ॥ ८१ ॥ या दधि-घृतके रूपमें जैसे । होता है केवल दूध ही वैसे । या लेता है ईखका रस जैसे । गूडका रूप ॥ ८२ ॥ ऐसे हैं ये सांतःकरण । देह बनते तीन गुण । तभी होते बंध-कारण । धनंजय ॥ ८३ ॥ किंतु आश्चर्य धनुर्धर । यह बंधका जो गुब्बार । मुक्त दशामें संसार । कभी नहीं ॥ ८४ ॥ यदि गुण ये अपने धर्मानुसार । होते हैं शरीरके आगे पीछे स्वैर । आत्माके गुणातीतावस्थामें अंतर । नहीं आता ॥ ८५ ॥ ऐसी मुक्ति होती है सहज । तुझको कहता हूं मैं आज । स्वभावसे तू ज्ञान-पुंज । अमर अर्जुन ॥ ८६ ॥ चैतन्य होता है गुणमें । न होता गुणके पाशमें । कहा यह त्रयोदशमें । मैंने तुझको ॥ ८७ ॥ गुणोंको तजके कर्त्ता आत्मा जो उस पार है । देखता जानता ऐसा होता मेरा स्वरूप सो ॥ १९ ॥ ५५७ गुण-निस्तारयोग
जिस समय अंतःकरणमें । प्रतीत हो ज्ञान बोध-रूपमें । तब जैसे जागृत अवस्थामें । होता स्वप्न-भंग ॥ ८८ ॥ या जब तरंग उठते । उसे तटसे हैं देखते । बिंबके अंग-भंग होते । उसी प्रकार ॥ ८९ ॥ नट जैसे नहीं फंसता । अपने स्वांगको जानता । वैसे ही गुणोंको देखता । साक्षी-रूप ॥ २९० ॥ अथवा ऋतु-त्रयमें आकाश । ऋतुओंको देकर अवकाश । अलिप्तता रखता अविनाश । अपनी जैसे ॥ ९१ ॥ वैसे गुणमें गुणसे पर । अपने मूल-रूपमें स्थिर । होता अहंतापे अहंकार । उस समय ॥ ९२ ॥ वहांसे जब वह देखता । कहता मैं हूं साक्षी अकर्ता । क्रियाओंका नियोजन कर्ता । केवल हैं गुण ॥ ९३ ॥ तीन गुणोंका है जो प्रकार । दीखता कर्मका हो विस्तार । वह है गुणोंका विकार । धनंजय ॥ ९४ ॥ इसमें रहता हूं मैं ऐसा । वनमें वसंत ऋतु जैसा । वन-लक्ष्मीका विलास जैसा । कारण-रूप ॥ ९५ ॥ अथवा तारागणका लोपना । सूर्यकांतका उद्दीपन होना । तथा कमलोंका खिलना । या जाना तनका ॥ ९६ ॥ यहां किसी भी काममें कहीं । सविता उलझता नहीं । वैसे अकर्ता होता है देही । सत्ता-रूप ॥ ९७ ॥ गुण-प्रकाश कर गुण-दर्शन । होता है मुझमें गुणत्वका पोषण । गुणत्रयका होकर जो निरसन । रहता वह मैं हूं ॥ ९८ ॥ ऐसे विवेकका जो उदय । होता है जिसका धनंजय । उसे मिलता पथ विजय । गुणातीतका ॥ ९९ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५८