ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
इससे होगा सहज । अनुभव तुझे आज । यह होने पर तुझ । न होगा सायास ॥ ४८ ॥ इसीलिये शुद्ध-प्रज्ञासे कर । सिद्धांतकी रचना सुंदर । पाखंडकी पूरी खंडना कर । कहता फलितार्थ ॥ ४९ ॥ यावत्संजायते किंचित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् । क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥ २६ ॥ क्षेत्रज्ञ क्या यह समझाया । अपना रूप तुझे दिखाया । तथा क्षेत्र भी सब समझाया । संपूर्ण रूपसे ॥ १०५० ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका यह मिलन । करता भूत-मात्रको उत्पन्न । जैसे सलिल अनिल मिलन । रचते तरंग ॥ ५१ ॥ अथवा जब दिनकरके किरण । करते ऊसर भूमिका आलिंगन । होता है मृगजल-पूर-सा दर्शन । धनंजय ॥ ५२ ॥ अथवा वर्षाकी धारासे । भीगी हुयी धरणीमेंसे । अंकुर नाना प्रकारसे । निकलते अनेक ॥ ५३ ॥ वैसे चराचर संपूर्ण । जीव-जगतका निर्माण । करता उभय मिलन । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका ॥ ५४ ॥ इसीलिये हे अर्जुन । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञसे भिन्न । नहीं है कोई जान । साकार वस्तु ॥ ५५ ॥ समं सर्वेषुभूतेषु तिष्ठंतं परमेश्वरम् । विनश्यत्स्वविनश्यंतं यः पश्यति स पश्यति ॥ २७ ॥ विश्वमें उत्पन्न जो जो होते स्थावर जंगम । क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ संयोग यही कारण जान तू ॥ २६ ॥ समान सब भूतोंमें रहा है परमेश्वर । अनाशी नाशवंतोंमें जो देखे वह देखता ॥ २७ ॥ ५१९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
जैसे पटत्व नही है तंतु । किंतु पटका आधार तंतु । यह प्रज्ञा-दृष्टिसे जान तू । ऐक्य भाव ॥ ५६ ॥
सब भूतोंका आधार । एक ही है तत्व-सार । दीखते भिन्न आकार । देखनेमें ॥ ५७ ॥
इनके नाम अनेक । व्यवहार भी अनेक । तथा रूप भी अनेक । दीखते हैं ॥ ५८ ॥
देख कर यह अर्जुन । करेगा द्वैत-भाव मन । मुक्त होना अवश्य जान । जन्म-मरणसे ॥ ५९ ॥
जैसे अनेक कारणसे । लगते नाना आकारसे । लतामें अगणित जैसे । फल कुमडेके ॥ १०६० ॥
अथवा बेरकी जो लकडी । सरल हो अथवा हो टेढी । वस्तु एक है खडी या पडी । वैसे वह तत्व ॥ ६१ ॥
जैसे अग्निकण अनेक । उसकी दाहकता एक । वैसे जीव-राशि अनेक । एक परतत्व ॥ ६२ ॥
वर्षाधार गगन भर । उसमें एक ही है नीर । वैसे हे नाना भूताकार । सबमें ईश एक ॥ ६३ ॥
भूतग्राम सब विषम । सबमें वस्तु एक सम । घर घरमें होता व्योम । एकसा जैसे ॥ ६४ ॥
नाश होने पर भूताभास । आत्मा होता एक अविनाश । जैसे अलंकार है विशेष । उसमें एक स्वर्ण ॥ ६५ ॥
जैसे जीव-धर्म हीन । तथा जीवसे अभिन्न । देखता जो सु-नयन । ज्ञानियोंमें ॥ ६६ ॥
ज्ञान-दृष्टिमें अर्जुन । होता है जो सु-नयन । वही बडा भाग्यवान । नहीं यह बढा ॥ ६७ ॥
ज्ञानेश्वरी ५२०
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥ २८ ॥ गुणेंद्रियोंकी जो धोकटी । देह-धातुओंकी त्रिपुटी । पंच मेलकी यह पटी । दारुण है सब ॥ ६८ ॥ पांच डंकोंका है यह वृश्चिक । अथवा पंचाग्नि ताप-दायक । अथवा मृगकी मांद है एक । मिली वन-राजको ॥ ६९ ॥ शरीरमें रहकर ऐसे । नित्य-भावकी तलवारसे । अनित्यताका उदर कैसे । नहीं फाडता ॥ १०७० ॥ ज्ञानीका गंतव्य, जहां मोक्ष भी विश्रांति लेता है— किंतु इस देहमें रहकर । न करता अपने प्रहार । तथा अवसानपे धनुर्धर । मिलता मुझमें ॥ ७१ ॥ अनेक जन्मोंको पार कर । योग-ज्ञानका सहारा लेकर । योगी जन डुबकी लगाकर । बैठते यहां ॥ ७२ ॥ आकारका जो पैल तीर । नादका जो उस पार । तुर्यावस्थाका मध्य घर । पर-ब्रह्म जो ॥ ७३ ॥ मोक्ष सह सभी गति । लेती है यहां विश्रांति । गंगादि नदीकी गति । जैसे समुद्र ॥ ७४ ॥ वह सुख इसी देहमें । मिलता है विपुलतामें । न होती भूत-वैषम्यमें । विषय-बुद्धि ॥ ७५ ॥ सभी दीप-ज्योतिमें जैसे । रहता तेज एक जैसे । रहता है सर्वत्र वैसे । ईश एक ॥ ७६ ॥ ऐसी सम-दृष्टिसे पार्थ ! । सदा सर्वत्र जो देखता । कभी आधीन नहीं होता । जन्म मरणके ॥ ७७ ॥
जो देखे प्रभु सर्वत्र भरा है सम जो स्वयं । आत्माकी न करे हिंसा पाता है गति उत्तम ॥ २८ ॥ (66) ५२१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
इसीलिये वह भाग्यवान । ऐसे करते हम वर्णन । साम्य-सेज पर है नयन । लगे हैं उसके ॥ ७८ ॥ प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः यःपश्यति तथात्मानमकर्त्तारं सपश्यति ॥ २९ ॥ मन बुद्धि जिसमें प्रमुख । ज्ञान औ' कर्मेंद्रिय अशेष । करती है जो प्रकृति देख । जानता वह सत्व ॥ ७९ ॥ गृह-निवासी सभी करता । घर कुछ भी नहीं करता । बादल आकाशमें दौड़ता । आकाश रहता स्थिर ॥ १०८० ॥ वैसी ही प्रकृति आत्म-प्रभा । गुण-क्रीडासे विविधारंभ । आत्मा रहता है जैसे स्तंभ । यह न जानते ॥ ८१ ॥ ऐसा जो यह् निर्णय । जिसमें हुवा उदय । उसने जाना निश्चय । अकर्त्तापन ॥ ८२ ॥ यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति । तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥ ३० ॥ वैसे सहज अर्जुन । होगा ब्रह्मत्व संपन्न । भूताकृति है जो भिन्न । दीखेगी एकमें ॥ ८३ ॥ लहर जैसे सलील पर । परमाणु-कण स्थल पर । किरण-जाल आकाश पर । भास्करका ॥ ८४ ॥ या देहमें अवयव । मनमें संपूर्ण भाव । विस्फुलिंग सावयव । एक अग्निके ॥ ८५ ॥ करनेसे प्रकृतीके होते हैं कर्म जो सब । अकर्ता है स्वयं आत्मा यथार्थ यह देखना ॥ २९ ॥ जुड़ा एकत्वमें देखे भूतोंकी भिन्नता सब । उसीसे जान विस्तार पाता ब्रह्मत्व है तभी ॥ ३० ॥ ज्ञानेश्वरी ५२२
वैसे एकके भूताकार । दृष्टिगत होंगे साकार । ब्रह्म-संपत्ति भांडार । लगेगा हाथ ॥ ८६ ॥ सर्वत्र सब तुझे अर्जुन । होगा पर-ब्रह्मका दर्शन । तथा अभयादि समाधान । मिलेगा तब ॥ ८७ ॥ इस भांति यह जो पार्थ । प्रकृति-पुरुष व्यवस्था । करलें प्रतीति सतत । चाहे वैसे वे ॥ ८८ ॥ अब तू कर वह प्रतीति । चित्तमें स्थिरकर निश्चिति । अब नहीं तो सुभद्रापति । तो नंतर कुछ ॥ ८९ ॥ मिला है कुल्ला करने अमृत । अथवा भांडार हुवा लक्षित । ऐसा मिला यह लाभ निश्चित । ज्ञान-रहस्य ॥ १०९० ॥ कहूंगा अब दो बोल । अति-गूढ अनमोल । चित्त देकर सकल । सुन तू वे ॥ ९१ ॥ श्रीकृष्णका यह बोल । सुनता पार्थ निश्चल । इंद्रियां तब केवल । करके कान ॥ ९२ ॥ अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः । शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ ३१ ॥ आत्मा और शरीरकी तुलना तथा संबंध— अजी ! परमात्मा जो कहलाता । जलमें बिंबित हो न भीगता । जैसा सूर्य वैसा वह रहता । प्रकृतिमें निर्लेप ॥ ९३ ॥ जलके आदि और अंत । रहता है सूर्य सतत । केवल है वह बिंबित । अन्योंकी दृष्टिसे ॥ ९४ ॥ आत्मा वैसे देहमें होता कहां । रहता है वह जहांका तहां । कहा जाता है देहमें रहता वहां । नहीं है सत्य ॥ ९५ ॥ अव्ययी परमात्मा है तथा अनादि निर्गुण । देहमें रहके पार्थ करता लीपता नहीं ॥ ३१ ॥ ५२३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
दर्पणमें मुख जैसे । बिंबित है यह वैसे । रहता देहमें वैसे । आत्म-तत्त्व ॥ ९६ ॥ संबंध जो देह-आत्मका । सर्वथा निर्जीव बातका । होता क्या बात औ' रेतिका । संबंध पार्थ ॥ ९७ ॥ आग तथा पंखमें जैसे । नत्थी करना कहो कैसे । या पत्थरको आकाशसे । कैसे जोडना ॥ ९८ ॥ एक जाता पूर्वकी ओर । दूसरा पश्चिमकी ओर । भेंट होती कैसी आखर । दोनोंकी पार्थ ॥ ९९ ॥ प्रकाश और अंधार । निर्जीव सजीव नर । तथा आत्मा औ' शरीर । एक समान ॥ ११०० ॥ रात्र और दिवस । कनक औ' कपास । नाता कैसा है वैसा । इन दोनोंका ॥ १ ॥ देह यह है पांचोंका जाल । गुण-कर्मकी गांठ केवल । जन्म-मृत्यु चक्र पर डाल । घुमाई जाती है ॥ २ ॥ कुंडमें जैसे कालानलके । गोले पडे हैं नवनीतके । हिलनेमें ही पांव माखिके । जाते पिघल ॥ ३ ॥ पडनेसे यह आगमें । भस्म हो उडता क्षणमें । जानेसे श्वान उदरमें । होता है मल ॥ ४ ॥ इन दोनोंसे यदि चूकता । कृमियोंका पुंज बनता । इसका परिणाम है पार्थ । कल्मष ही है ॥ ५ ॥ इस देहकी यह दशा । तथा आत्मा है वह ऐसा । नित्य-शुद्ध-सिद्ध एकसा । अनादित्वसे ॥ ६ ॥ सकल नहीं है या यह निष्कल । न अक्रिय या यह क्रिया-शील । नहीं यह कृश अथवा स्थूल । निर्गुणत्वसे ॥ ७ ॥ आभास नहीं या निराभास । प्रकाश नहीं या अप्रकाश । न अल्प अथवा बहुवस । अरूपतासे ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ५२४
जो न रीता या भरित । न रहित या सहित । मूर्त नहीं या अमूर्त । शून्यत्वसे ॥ ९ ॥ जो न आनंद या निरानंद । न है एक अथवा विविध । न है जो मुक्त अथवा बद्ध । आत्मत्वसे ॥ ११० ॥ न वह इतना या उतना । न स्वत सिद्ध या न है बना । न है वक्ता अथवा मौन । अलक्षत्वसे ॥ ११ ॥ सृष्टि-साथ यह नहीं बनता । या प्रलयके साथ न नाशता । होने न होनेसे परे रहता । लय स्थान जो ॥ १२ ॥ अगणित अथवा अचर्चित । मिटता न होता वृद्धिगत । न घटता न होता विकृत । अव्यवत्वसे ॥ १३ ॥ इस भांति है यह आत्मा । देहमें कहते प्रियोत्तम । मवाकाशमें जैसे व्योम । नाम जिसका ॥ १४ ॥ ऐसे उस अखंड पर । बनते देहके आकार । वह न ले या तजकर । रहता सहज ॥ १५ ॥ आत्मा शरीरमें रहकर भी न कुछ करता न लीपता— जैसे प्रकाश और अंधकार । आते जाते आकाशपर । शरीर है आत्म-तत्व ˙पर । इसी भांति ॥ १६ ॥ इस देहमें न कुछ करता । अथवा वह न कुछ कराता । सहज व्यापारमें न गूंथता । कर्त्ता पनसे ॥ १७ ॥ इसीलिये वह स्वरूपसे । अल्पता अथवा पूर्णतासे । न लीपता है कभी देहसे । देहमें भी ॥ १८ ॥ यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥ ३२ ॥ आकाश ज्यों सर्व-व्यापी न लीपे सूक्ष्म होकर । व्याप्त सर्वत्र त्यों आत्मा देहमें लीपता नहीं ॥ ३२ ॥ ५२५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
यह आकाश नहीं कहां। कब वह न घुसता कहां । सर्वत्र रहता जहां तहां । किंतु निर्लिप्त ॥ १९ ॥ वैसा सदैव वह शरीरगत । रहता है आत्मा सर्वत्र सतत । किंतु नहीं होता वह कभी लिप्त । क्षेत्र दोषसे ॥ १२० ॥ लक्षण यह पुनः पुनः । जानना सदा सत्य मान । सर्वगत क्षेत्र-विहीन । क्षेत्रज्ञका तू ॥ २१ ॥ यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ ३३ ॥ लोहेको चुंबक हिलात । लोहा चुंबक नहीं होता । क्षेत्र क्षेत्रज्ञका होता । इस भांतिसे ॥ २२ ॥ दीप-ज्योति निरंतर । चलाती घरका व्यापार । इन दोनोंका है अंतर । अमर्याद ॥ २३ ॥ काठमें रहती है आग । किंतु काठ न होता आग । ऐसे दोनों होते अलग । देह और आत्मा ॥ २४ ॥ आकाश और बादल । सूर्य तथा मृगजल । ऐसा भेद तू निश्चल । यदि देखेगा ॥ २५ ॥ जैसा आकाशमें एक । रहता है वह अर्क । प्रकाशता तीन लोक । नित्य नित्य ॥ २६ ॥ ऐसा क्षेत्रज्ञ है एक । क्षेत्र पूर्ण प्रकाशक । न यह संवेद्य-जनक । न प्रक्षेप्यार्थ भी ॥ २७ ॥ क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यांति ते परम् ॥ ३४ ॥ जैसे है एक ही सूर्य उजळाता भुवनत्रय । वैसे प्रकाशता क्षेत्र क्षेत्रज्ञ पूर्ण रूपसे ॥ ३३ ॥ क्षेत्रक्षेत्रज्ञका भेद देखते ज्ञान-दृष्टिसे । पाते वे मोक्षका धाम भूत-प्रकृति लांघके ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५२६
आत्मानात्म-व्यवस्थाके राजहंस— शब्द-तत्व सारज्ञ । दीखता है जो प्राज्ञ । क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ । इनमें भेद ॥ २८ ॥ इन दोनोंका जो अंतर । देखता है वही चतुर । वे ज्ञानियोंका महा-द्वार । रहते नित्य ॥ २९ ॥ इसीलिये जो सुमति । जोड़ते शांति-संपत्ति । शास्त्रोंकी सदा दुभति । पालते घरमें ॥ ११३० ॥ भोगके आकाश पर । साहस युत संचार । करते जो धनुर्धर । इसी आशासे ॥ ३१ ॥ शरीरादि जो समस्त । मानकर तृणवत । लेते संत-सेवा व्रत । जीव-भावसे ॥ ३२ ॥ करके ऐसे प्रकार । अनेक सायास कर । होते हैं चितमें स्थिर । ज्ञान-भावसे ॥ ३३ ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका जो अंतर । देखते रहते निरंतर । करते हैं हम न्योच्छावर । अपना ज्ञान उनपे ॥ ३४ ॥ तथा महा-भूतादिक । प्रभेद लेके अनेक । फैली है अवास्तविक । प्रकृति है जो ॥ ३५ ॥ वह शुक-नलिका-न्यायसे । न चिपके ही चिपकी वैसे । मानता है जो जैसेको वैसे । यह धनुर्धर ॥ ३६ ॥ जैसे माल ही है माल । देखती आंखें निर्मल । सर्प-भ्रमको चंचल । दूर करके ॥ ३७ ॥ अथवा शुक्तिको शुक्ति । करता है सही प्रतीति । छोडकर रजत-भ्रांति । सहज भावसे ॥ ३८ ॥ आत्म-प्रकृतिकी जो है भिन्नता । उसको हृदयसे जो जानना । उसे मैं पर-ब्रह्म ही कहता । पांडुकुमार ॥ ३९ ॥ ५२७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग
आकाशसे भी जो महान । अव्यक्तका पैल-तीर मान । पाके उसे साम्या-साम्य-भान । नहीं रहता ॥ ११४० ॥ आकार वहां मिटता । जीवत्व सभी घुलता । द्वैत-नाम भी खो जाता । वह है अद्वय ॥ ४१ ॥ परम-तत्व वे पार्थ । होते हैं वहां सर्वथा । आत्म-अनात्म-व्यवस्था । उसके वे राजहंस ॥ ४२ ॥ तेरहवे अध्यायका उपसंहार— इस भांति यह संपूर्ण । पांडवको वह श्रीकृष्ण । देता ज्ञान हो स-करुण । जीवनका सब ॥ ४३ ॥ एक कलशमें रहता जो जल । दूसरेमें डालते जैसे सकल । वैसे श्रीकृष्णने दिया सकल । ज्ञान पार्थको ॥ ४४ ॥ तथा किसको देगा कौन । वह है नर-नारायण । फिर अर्जुनको श्रीकृष्ण । कहाता मैं यह ॥ ४५ ॥ रहने दो यह सकल । बिना प्रइनके बोल । अपना सर्वस सकल । दिया श्रीहरिने ॥ ४६ ॥ अगले अध्यायकी भूमिका— किंतु मनमें वह अर्जुन । अब तक तृप्ति नहीं मान । अधिकाधिक इच्छा महान । बढाते रहा ॥ ४७ ॥ स्नेहसे भरी ज्योति । जैसे बढते जाती । ऐसे श्रवण-भक्ति । बढी पार्थकी ॥ ४८ ॥ जहां सु-गृहिणी उदार । रसज्ञ औ' भोजनहार । मिले जब बढता कर । उसी भांति ॥ ४९ ॥ उभर आया श्रीकृष्णका मन । देखकर उल्हसित अर्जुन । उमड अया तब प्रवचन । छलकता हुवा ॥ ११५० ॥ सु-वायुसे मेघ उमड़ता । चंद्रमासे सिंधु उमड़ता । वक्तृतामें रस भर आता । श्रोताके आदरसे ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरी · ५२८
आनंदमय अब संपूर्ण । करेगा जगतको श्रीकृष्ण । राजन् ! करें उसको श्रवण । कहता संजय ॥ ५२ ॥ महाभारतमें इस प्रकार । श्रीव्यासने जो प्रतिभा-सागर । शांति-कथा गायी है जो अमर । भीष्म-पर्वमें ॥ ५३ ॥ वह कृष्णार्जुन संवाद । देश-भाषामें मैं विशद । कह दिखलाऊंगा प्रबंध । ओवी छंदमें ॥ ५४ ॥ केवल वह शांति-कथा । चलेगी शब्दका वाक्पथ । पग रख श्रृंगार माथा- । पर अबिरल ॥ ५५ ॥ देशीके बोल सुंदर । सजायेंगे अलंकार । लजायेंगे जो मधुर । अमृतको यहां ॥ ५६ ॥ उन शब्दोंका जो शांति-गुण । दिखाएगा चंद्रमा है उष्ण । करेगा रसना लुबुधन । नादका लोप ॥ ५७ ॥ इससे पिशाचका भी मन । बनेगा सात्विकताकी खान । श्रवण-मात्रसे है सुमन । पायेगा समाधि ॥ ५८ ॥ वाग्विलास बिस्तार कर । गीतार्थसे विश्वको भर । बांधेंगे विशाल मंदिर । इस जगतका ॥ ५९ ॥ मिटेगी न्यूनता विवेककी । सार्थकता हो कान-मनकी । खुलेगी खान ब्रह्म-विद्याकी । चाहे जिसको ॥ ११६० ॥ पर-तत्त्व देखें नयन । पाये सुख-वसंतोद्यान । आकंठ ब्रह्म रस पान । करे विश्व ॥ ६१ ॥ होगा सब यह साकार । ऐसा बोलूंगा मैं सुंदर । कृपासे किया है स्वीकार । मेरा श्रीगुरुने ॥ ६२ ॥ स्पष्ट शब्दार्थसे तब ऐसे । उपमादिके अधिकतासे । समझाऊं प्रति -पदमैसे । भावार्थ-सार ॥ ६३ ॥ मेरे गुरुवर श्रीमंत । पूर्ण-बोधसे विद्यावंत । किया मुझे हो कृपायुत । श्रीगुरुने ॥ ६४ ॥ ५२९ क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोग (67)
अबतक उस कृपासे । निकला जो मेरे मुखसे । मान्य हुवा आप सबसे । यहां गीतार्थ ॥ ६५ ॥ फिर आप संत चरण । देते हैं मुझको शरण । न रही है इसी कारण । कोई न्यूनता ॥ ६६ ॥ कभी क्या सरस्वर्तिका मूक । सहज भी होता है बालक । तथा न्यूनता क्या सामुद्रिक । महा-लक्ष्मीको ॥ ६७ ॥ ऐसे आप संतोंके पास । अज्ञानका कैसे वास । तभी मैं अब नव-रस । वर्षा करूंगा ॥ ६८ ॥ क्या कहूं अब गुरुवर । मुझे दे इक अवसर । ज्ञानदेव कहे सुंदर । कहूंगा गीतार्थ ॥ ६९ ॥ गीता श्लोक ३४ ज्ञानेश्वरी ओवी ११६९.
१४ गुणोत्कर्ष-गुण-निस्तारयोग आचार्य वंदना— जय जय आचार्य । समस्त गुरुवर्य । प्रज्ञा-प्रभात सूर्य । सुखोदय ॥ १ ॥ जय जय सर्व-विश्राम-स्थान । सोऽहं-भाव बोध-दाता महान । अनेक लोक-तरंग निदान । महा-समुद्र तू ॥ २ ॥ सुनिये आर्त-बंधू । सदा कारुण्य-सिंधू । विशद-विद्या- वधू । वल्लभाजी ॥ ३ ॥ जिनसे तू अदृश्य होता । उनको तू विश्व दिखाता । जिनसे तू प्रकट होता । तू ही सर्वस्व ॥ ४ ॥ कोई अन्योंकी दृष्टि चुराता । किंतु अपनेको है दीखता । तेरे लाघवकी कौतुकता । आपही अदृश्य ॥ ५ ॥ विश्वका सर्वस्व तू महान । किसे ज्ञान औ' किसे अज्ञान । ऐसा सहज लाघव-स्थान । नमन तुझको ॥ ६ ॥ विश्वमें जो सलिल द्रवित । तेरे द्रवसे है प्रवाहित । तुझसे ही सहन समर्थ । हुई पृथ्वी ॥ ७ ॥ रवि-चंद्रादि सिकता-कण । विश्वको दे प्रकाश-दान । तेरी ही दीप्तिके कारण । तेजका तेज तू ॥ ८ ॥ अनिलकी जो दृढ चल । उसकी नींव तेरा बल । गगनका जो चला खेल । तुझमें ही देव ॥ ९ ॥
अथवा जो अन्यथा ज्ञान । उसकी ज्योति आप जान । करना आपका वर्णन । श्रुतिको भी असाध्य ॥ १० ॥ जब तक न होता तेरा दर्शन । तब तक ही है वेदका वर्णन । दर्शन होने पर होते हैं मौन । हम और वेद ॥ ११ ॥ अजी ! एकार्णव-सिंधू । न जानता एक बिंदु । तभी नदी जाने गंध- । उसका कैसे ॥ १२ ॥ या उदय होते ही भास्वत । बन जाता है चंद्र खद्योत । वैसे ही हम श्रुति-सहित । बनते हैं मौन ॥ १४ ॥ अथवा मिट जाता जहां द्वैत । होता है परा पश्यंतिका अंत । तब होगा किस भांति वर्णित । किस भाषासे ॥ १४ ॥ इसीलिए छोड स्तवन । नम्रतासे होकर मौन । चरणमें करें नमन । यही भला है ॥ १५ ॥ जैसे हैं वैसे श्री गुरुवर । चरणमें करूं नमस्कार । सफल होनेमें वे आधार । ग्रंथ निरूपणमें ॥ १६ ॥ खोलकर अब कृपा-भांडार । मेरी बुध्दिकी झोली भरकर । मुझको काव्य-ज्ञान भी देकर । करें कृतार्थ ॥ १७ ॥ तब मैं विवेक-कर्ण-भूषण । चढाऊंगा संतोंको सुलक्षण । संभाल कर मैं अपने प्राण । तब प्रसादसे ॥ १८ ॥ गीतार्थका जो विधान । निकालेगा मेरा मन । उसे गुरु-कृपांजन । देना स्वामी ॥ १९ ॥ यह शब्द-सृष्टि सकल । दृष्टि देखेगी एक काल । वैसे उदय हो निर्मल । गुरु-कारुण्य बिंब ॥ २० ॥ मेरी प्रज्ञा-लतामें विशाल । लगे सरस काव्य-सु-फळ । वैसे वसंत बन स्नेहळ- । शिरोमणि देव ॥ २१ ॥ मति-गंगा-प्रवाह गंभीर । लेकर बहे प्रमेय-पूर । ऐसे उदार बरसा कर । मेरे स्वामी ॥ २२ ॥ ज्ञानेश्वरी ५३२
अजी ! हे विश्वैक धाम । तेरा प्रसाद चंद्रमा । करें मुझको पूर्णिमा । उदय होके ॥ २३ ॥ करेंगे आप यदि अवलोकन । उन्मेष-सागरमें नित-नवीन । आयेगा रस-वृत्तिमें उफान । स्फूर्तिमय जो ॥ २४ ॥ श्री गुरु तब हो मुदित । तूने किया है स्तवनार्थ । विनीत भावसे है द्वैत । बोले ऐसे ॥ २५ ॥ छोड दे यह व्यर्थके बोल । गीतार्थ कह तू अनमोल । श्रोताओंकी इच्छा जो निर्मल । न कर व्यर्थ ॥ २६ ॥ अजी ! हां श्रीगुरुदेव । मेरा भी यही था भाव । श्रीमुखसे कहे देव । कहो ग्रंथ ॥ २७ ॥ दूर्वांकुरकी मूलिका । अमर जो स्वाभाविक । उस पर पीयूषका । आया पूर ॥ २८ ॥ अजी ! श्रीगुरु-प्रसादसे । वर्णूंगा अभी विस्तारसे । मूल शास्त्रको चातुर्यसे । आपके समक्ष ॥ २९ ॥ जिससे जीवके अंतर्गत । नांव जो है संशय-भरित । डूबकर वह सुनिश्चित । बढेगी श्रवणेच्छा ॥ ३० ॥ वाणीमें उतरे माधुर्य । गुरु-गृहका भिक्षा-चर्य । वास्तविक जो है सौंदर्य । गुरु-कृपासे ॥ ३१ ॥ त्रयोदशमें श्रीकृष्ण । बोले हैं यह वचन । सुन तू वह अर्जुन । ध्यान देकर ॥ ३२ ॥ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ संयोगसे । बनता है जगत जैसे । औ' होता है गुण-संगसे । आत्मा संसारी ॥ ३३ ॥ तथा यह प्रकृतिगत । सुखदुःख भोगके हित । अथवा रहा गुणातीत । होकर केवल ॥ ३४ ॥ हुवा है कैसे असंगको संग । कैसे यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-योग । अथवा कैसे सुख-दुख भोग । होता है उसे ॥ ३५ ॥ ५३३ गुण-निस्तारयोग
गुण हैं कितने औ' कैसे । बांधते है उनको कैसे । या वह गुणातीत कैसे । उसके लक्षण क्या ? ॥ ३६ ॥ करने इसका स्पष्टीकरण । इस चतुर्दशका है कथन । कहता है सविस्तर श्रीकृष्ण । अर्जुनसे यहां ॥ ३७ ॥ अब यहां यह ऐसा । प्रस्तुत करेगा कैसा । साभिप्राय जो विश्वेश । बैकुंठका ॥ ३८ ॥ कहता है वह अर्जुन । अवधानकी सर्व सेना । लाकर है अब भिड़ाना । ज्ञानसे यहां ॥ ३९ ॥ कहा तुझे कई प्रकारसे । करके युक्ति-वाद जिससे । किंतु तू उस प्रतीतिसे । भरा नहीं ॥ ४० ॥ भगवानुवाच परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् । यज्ज्ञात्वामुनयः सर्वे परां सिद्धिमितोगताः ॥ १ ॥ इस समयमें अर्जुन । तुझसे कहता हूं सुन । कहा है जो महान-ज्ञान । श्रुतिने सर्वत्र ॥ ४१ ॥ ज्ञान मनुष्यके हृदयमें ही होता है— वैसे ज्ञान है रूप अपना । पर उसका है जो फैलना । भव स्वर्गादिक जब जाना । इससे हुवा पराया ॥ ४२ ॥ अजी ! केवल इसी कारण । अन्य ज्ञान सब मानो तृण । शेष है यह अग्नि-समान । कहता हूं मैं ॥ ४३ ॥ भव स्वर्गको जो जानते । यज्ञको ही भला कहते । तथा द्वैतको है मानते । भली भांति ॥ ४४ ॥ श्री भगवानने कहा जो सभी ज्ञानमें श्रेष्ठ ज्ञान मैं कहता तुझे । इसको जानके मोक्ष पाये हैं सब ही मुनि ॥ १ ॥ ज्ञानेश्वरी ५३४
इससे वे सभी ज्ञान । किये हैं स्वप्न-समान । वातोर्मियोंको गगन । निगलता जैसे ॥ ४५ ॥ अथवा उदित रश्मि-राज । छिपाता है चंद्रबिका तेज । अथवा नाना प्रलयांबुज । नदी नदादिको ॥ ४५ ॥ वैसे इसके होते ही उदय । अन्य सभी ज्ञान होते हैं लय । इसीलिये कहा है धनंजय । मैंने यह उत्तम ॥ ४७ ॥ अनादिसे जो मुक्त । स्थिति है पांडुसुत । होती है हस्तगत । इसी ज्ञानसे ॥ ४८ ॥ अंतर्मुख दृष्टिसे वह ज्ञान प्राप्त होता है-- जिसको कर प्रतीत । विचार-वीर समस्त । संसारको हैं सतत । दबाते जो ॥ ४९ ॥ मनसे पीछे हटाके मन । लेता है जहां विश्रांति तन । तब अनुभवता तन । तन-भाव ऐसा ॥ ५० ॥ फिर कर वे देह पार । दोनों ही जो एक ही बार । वे तोलमें पांडुकुमार । होते मेरे सम ॥ ५१ ॥ इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २ ॥ इस ज्ञानसे मेरे समान होते हैं - जो है मेरी नित्यता । उसीको वह पाता । परि-पूर्ण पूर्णता । मेरी उसको ॥ ५२ ॥ जैसे मैं आनंदानंद । सत्य-सिंधु हूं अगाध । नहीं है हममें भेद । रहा कोई ॥ ५३ ॥ हुए वे मुझ जैसे ही इसी ज्ञान-प्रतीतिसे । आना जाना उन्हे एक वे अभंग सदा सम ॥ २ ॥ ५३५ गुण-निस्तारयोग
क्योंकि मैं हूं जैसा जितना । वह भी है वैसा उतना । घट-संगसे है गगन । होता घटाकाश जैसे ॥ ५४ ॥ नहीं हो तो दीप-मूल है एक । उसमें मिली शाखायें अनेक । किंतु वास्तवमें है वह एक । इसी प्रकार ॥ ५५ ॥ इसी प्रकार हे अर्जुन । द्वैत अनुभवके बिन । नामार्थ रूपमें हो लीन । हुए एक ॥ ५६ ॥ यही है जो एक कारण । होती जब सृष्टि निर्माण । तब भी है जन्म-धारण । नहीं उसको ॥ ५७ ॥ होती है जब सृष्टि निर्माण । तब न जिसे देह-धारण । आया उसको कहां मरण । प्रलय-कालमें ॥ ५८ ॥ इसीलिये जन्म-क्षय । अतीत है वे धनंजय । मद्रूप हुये निश्चय । मेरे ज्ञानसे ॥ ५९ ॥ ऐसा जो महत्व ज्ञानका । प्रिय विषय श्रीकृष्णका । बढाने रस अर्जुनका । बखानता है ॥ ६० ॥ स्वरूप-विस्मरण ही अज्ञान है-- तब मानो वह अर्जुन । बना लेता सर्वांग कान । अथवा होता अवधान- । मूर्ति केवल ॥ ६१ ॥ तब श्रीकृष्णका व्याख्यान । कर सका है आकलन । तथा वह हुवा निरूपण । गगनसे विशाल ॥ ६२ ॥ तब कहता है हे प्रज्ञा-कांत । उजली है आज जो वक्तृता उसके समान ही जो श्रोता । मिला आज ॥ ६४ ॥ अजी ! यदि मैं हूं एक । देह-पाशमें अनेक । पकडा जाता हूं देख । गुणोंसे कैसे ॥ ६४ ॥ कैसा क्षेत्रका संग करता । कैसे जगतको मैं प्रसवता । इसीको मैं तुझसे कहता । सुन तू अब ॥ ६५ ॥ ज्ञानेश्वरी ५३६
तभी यह क्षेत्र कहलाता । इसमें मत्संगसे पकता । नाना प्राणि लेके विचित्रता । पांडुकुमार ॥ ६६ ॥ मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् । संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ ३ ॥ वैसे है यह महद्ब्रह्म । तभी यह इसका नाम । महदादिका जो विश्राम- । धाम है यह ॥ ६७ ॥ बढाता है यह बहु विचार । इसीलिये है पांडुकुमार । कहते हैं इसे सरासर । महद्ब्रह्म ॥ ६८ ॥ अव्यक्त वादका मत । कहता इसे अव्यक्त । सांख्य करते प्रतीत । प्रकृति है यह ॥ ६९ ॥ वेदांति इसको माया । कहते हैं प्रज्ञा-राया । वैसे ही इसे बताया । यह है अज्ञान ॥ ७० ॥ अपनेको है अपना । रहता है विस्मरण । यही रूप है अर्जुन । इस अज्ञानका ॥ ७१ ॥ अज्ञानका रूप विवेचन— इसका होता है एक ऐसा । विचारमें न दीखता जैसा । दीपकके प्रकाशमें जैसा । रहता अंधःकार ॥ ७२ ॥ अथवा हिलता है जब क्षीर । न दीखती मलाई किसी ओर । किंतु जब होता है दूध स्थिर । तब वह दीखती ॥ ७३ ॥ अथवा न जागृति न स्वप्न । नहीं है स्वरूप अवस्थान । अथवा सुषुप्ति है जो घन । वैसी होती ॥ ७४ ॥ जब वायुको न प्रसवता । आकाश बांझ होता है रीता । वैसी होती है वह अवस्था । अज्ञानकी ॥ ७५ ॥ प्रकृति क्षेत्र है मेरा देता हूं बीज मैं उसे । उसमेंसे सभी भूत होते उत्पन्न भारत ॥ ३ ॥ ५३७ · गुण-निस्तारयोग (68)
यह खंभा है या मनुष्य । नहीं होता एक निश्चय । होता एक भास अवश्य । वैसे ही पार्थ ॥ ७६ ॥ ऐसी वस्तु होती है वैसे । वैसी नहीं दीखती जैसे । किंतु विपरीत भी वैसे । नहीं दीखती ॥ ७७ ॥ न होती रात या तेज । वह संधि जैसे सांझ । वैसे विरुद्ध ना निज । है यह अज्ञान-रूप ॥ ७८ ॥ अज्ञानावृत प्रकाश ही क्षेत्रज्ञ है-- ऐसी वस्तु होती है एक दशा । उसको कहते अज्ञान ऐसा । उससे लपेट लिया प्रकाश । वह है क्षेत्रज्ञ ॥ ७९ ॥ अज्ञानको महत्व देना । अपनेको ही न जानना । उसी रूपको है जानना । क्षेत्रज्ञका ही ॥ ८० ॥ यह है दोनोंका संयोग । जान तू इसको चांग । यह है सत्ता निसर्ग- । स्वभाव जान ॥ ८१ ॥ आप ही अज्ञानत्वसे । वस्तु दीखती है वैसे । किंतु अनेक रूपसे । जानते नहीं ॥ ८२ ॥ जैसा कोई भ्रमता एक । हुवा अब मैं राजा देख । या कहे पाया-स्वर्ग-लोक । कोई भ्रमिष्ठ ॥ ८३ ॥ जब दृष्टि है दृढ जाती । तब जो जो कुछ देखती । तभी हुई है कहलाती । सृष्टि-प्रसूती मुझसे ॥ ८४ ॥ मनुष्य जैसे स्वप्न मोहमें । अपनेको देख नग्न-रूपमें । वैसे आत्म-स्फुरण अभावमें । दीखता सर्व ॥ ८५ ॥ यही मैं दूसरा प्रकार । कहता सुन धनुर्धर । स्वप्न-सा मिथ्या मानकर । दृढ अनुभवसे ॥ ८६ ॥ मेरी यह गृहिणी । अनादि है तरुणी । अनिर्वचन गुणी । है अविद्या ॥ ८७ ॥ ज्ञानेश्वरी ५३८