भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥२३॥ पर स्वधर्म रत हूं कैसा । सकाम रत रहता वैसा । पार्थ उसका उद्देश्य ऐसा । एक ही है ॥ ६४ ॥ प्राणि मात्र यहां सकल । हमारे आधीन केवल । जिससे रहे वे सरल । स्वधर्ममें रत ॥ ६५ ॥ उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥२४॥ हम हैं पूर्ण काम होकर । आत्मस्थितिमें ही रह कर । करेगी कैसी प्रजा संसार । पार सकल ॥ ६६ ॥ हमारा ही आचरण देखना । उसीका अनुकरण करना । है यह प्रजा-जनका अपना । नियम जैसा ॥ ६७ ॥ इसीलिये जो हैं समर्थ । तथा सर्वज्ञतासे युक्त । कर्म त्याग नहीं उचित । उसको कभी ॥ ६८ ॥ सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत । कुर्याद्विद्वांस्तथाऽसक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥२५॥ अर्जुन फलकी आशासे । आचरता कामुक जैसे । कर्म रत रहता वैसे । निरिच्छ ही ॥ ६९ ॥ बड़ोंको सुन पार्थ । सकल लोक-संस्था । रक्षणीय है सर्वथा । इसीलिये ॥ १७० ॥ न रहूं मैं कर्म-लीन तजके यदि आलस । चलेंगे लोगभी ऐसे सर्वथा इस मार्गसे ॥ २३ ॥ छोडूंगा यदि मैं कर्म होगा विनाश लोकका । बनूंगा संकर द्वारा प्रजाका नाश-कारण ॥ २४ ॥ फंसके करता अज्ञ ज्ञानीको मुक्त भावसे । करना कर्म वैसे ही लोक-संग्रह हेतुसे ॥ २५ ॥ ९३ कर्मयोग

शास्त्रोचित ही बरतना । विश्वको सुपथ बताना । अलौकिक नहीं बनना । लोगोंमें कभी ॥ ७१ ॥ न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् । जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ॥ २६॥ आयाससे जो स्तन्य पीता । वह पक्वान्न कैसे खाता । शिशुको नहीं दिया जाता । कभी मिष्टान्न ॥ ७२ ॥ वैसे कर्ममें अयोग्यता । उससे कभी नैष्कर्म्यता । विनोदमें भी न कहता । अर्जुन कभी मैं ॥ ७३ ॥ लोक संग्रहार्थ कुशलता पूर्वक कर्म— उन्हे सत्कर्ममें लगाता । उनकी प्रशंसा करता । आचरण कर दिखाता । नैष्कर्म्यका ॥ ७४ ॥ सदा जो लोक संग्रहार्थ । रहता है कर्ममें रत । वह कर्म बंध रहित । रहता है ॥ ७५ ॥ बहुरूपियोंके राजारानीको जैसे । न चिपकता स्त्री पुरुष-भाव वैसे । लोक-संग्रहार्थ कर्म-रत होनेसे । नहीं है कर्म बंधन ॥ ७६ ॥ प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः । अहंकारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥ २७॥ अजी दूसरेका है भार । यदि अपने सिर पर । लिया तो उसका असर । न होगा क्या ॥ ७७ ॥ वैसे हैं शुभाशुभ कर्म । उपजाता प्रकृति-धर्म । उसको मूर्ख-मति-भ्रम । कहता "मैंने किया" ॥ ७८ ॥ अहंकार पर आरूढ । ऐसा जो संकुचित मूढ । उसको परमार्थ गूढ़ । कहना नहीं ॥ ७९ ॥ अबोध कर्म-निष्ठोंका बुद्धि भेद करो नहीं । जगावो कर्ममें चाव करके साम्य भावसे ॥ २६ ॥ होते हैं कर्म जो सारे प्रकृतिके स्वभावसे । अहंकारी बना मूढ मानता करता स्वयं ॥ २७ ॥ ज्ञानेश्वरी ९४

यह है जो प्रस्तुत । कहा तुझसे हित । पार्थ दे कर चित्त । सुन सब ॥ १८० ॥ तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः । गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥२८॥ अजी है तत्त्वज्ञानियोंका चित्त । होता प्रकृतिसे अप्रभावित । इस प्रकृतिमैसे कर्म जात । होते उत्पन्न ॥ ८१ ॥ देहाभिमान वे तजकर । गुण कर्मको ही पारकर । रहते साक्षी रूप होकर । शरीरमें ही ॥ ८२ ॥ अजी शरीरधारी होकर भी । कर्म-बंधसे मुक्त होते तभी । जैसे लिप्त न होता सूर्य कभी । विश्वके कर्मसे ॥ ८३ ॥ प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्नविचालयेत् ॥२९॥ गुण संग्राममें जो घिरकर । तथा प्रकृतिके वश होकर । रत होता कार्यमें निरंतर । वही कर्म बद्ध ॥ ८४ ॥ इंद्रियां सदा गुणाधार । करती अपना व्यापार । पर कर्म अपने पर । लेते वे बद्ध ॥ ८५ ॥ मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा । निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥३०॥ गुण ये और ये कर्म इससे भिन्न मान मैं । रहे असंग तत्वज्ञ गुणमें गुण आचर ॥ २८ ॥ डूबे जो गुण कर्मोंमें प्रकृति गुणसे ठगे । ऐसे अल्पज्ञ मूढ़ोंको ज्ञानी भ्रांत करे नहीं ॥ २९ ॥ मुझे अध्यात्म बुद्धिसे कर सर्व समर्पण । फलाशा ममता सारी छोडके जूझ तू यहां ॥ ३० ॥ ९५ कर्मयोग

उठो, स्वधर्माचरणार्थ कर्म करो- उचित कर्म सभी कर । उन्हें मुझे अर्पण कर । चित्त वृत्तिको लीन कर । आत्मामें ही ॥ ८६ ॥ कर्म कर्तृत्वका भान । औ' उसका अभिमान । न कर कभी अर्जुन । मनमें भी ॥ ८७ ॥ शरीरासक्तिको छोड़ना । कामना सबको त्यजना । समयपे फिर भोगना । प्राप्त भोग ॥ ८८ ॥ कोदंड लेकर अब करमें । चढ़ कर बैठा अब रथमें । अलिङ्गन कर वीर वृत्तिमें । शांत भावसे ॥ ८९ ॥ विश्वमें कीर्तिको फैलाओ । स्वधर्मका मान बढ़ावो । पापके भारसे छुडावो । पृथ्वीको अब ॥ ९० ॥ अर्जुन ! संदेहको छोड़ दो । संग्राममें ही अब चित्त दो । अन्य कछु बोलना त्यज दो । अबसे फिर ॥ ९१ ॥ ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः । श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः ॥ ३१ ॥ : आत्म रत कर्मसे विकास, प्रकृति तंत्र कर्मसे विनाश- यह है मेरा मत यथार्थ । अत्यादरसे आचरणार्थ । निष्ठा पूर्वक अनुष्ठानार्थ । कहा अर्जुन ॥ ९२ ॥ सकल कर्ममें हो रत । ऐसा होना कर्म रहित । इसीलिये यह निश्चित । है करणीय ॥ ९३ ॥ ये त्वेतदभ्यसूयंतो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् । सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥ मेरा शासन जो नित्य मानते हैं निर्मत्सर । श्रद्धासे अज्ञ निष्पाप तोडते कर्म-बंधन ॥ ३१ ॥ किंतु मत्सर-बुद्धिसे मेरा शासन तोड़ते । वे ज्ञान-शून्य जो मूढ पाते हैं नाश निश्चित ॥ ३२ ॥ ज्ञानेश्वरी ९६

या प्रकृतिमें रत हो कर । इंद्रियोंको दुलारकर । मेरे मतको ठुकरा कर । बरतते हैं ॥ ९४ ॥ तथा इसको तुच्छ मानते । इसकी जो अवज्ञा करते । इसे बेकार बात मानते । वाचालतासे ॥ ९५ ॥ हैं ये मोह मदिरासे अमित । विषय बिषमें रत सतत । अज्ञान कीचमें पतित नित । निःसंशय ॥ ९६ ॥ शवके हाथमें दिया रत्न । जैसे व्यर्थ जाता है अर्जुन । जन्मांधको उदयास्त दिन । अनुपयुक्त ॥ ९७ ॥ या हे चंद्रका उदय जैसा । कागको अनुपयुक्त वैसा । मूर्खको है विवेक भी वैसा । अरुचिकर ॥ ९८ ॥ वैसे ही जान तू पार्थ । विमुख जो परमार्थ । उनसे बात सर्वथा । न की जाती ॥ ९९ ॥ तभी वे कछु न मानते । निंदा भी करने लगते । पतंग कैसे क्या सहते । कभी प्रकाश ? ॥ २०० ॥ दीपसे पतंगका आलिंगन । उनका वहां निश्चित मरण । ऐसा होता है विषयाचरण । आत्मघातसा ॥ १ ॥ सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि । प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति ॥ ३३ ॥ शरीर नाशवान है— तभी इंद्रियोंका दुलार । न करें कभी जानकर । मन रंजनके खातिर । त्याज्य मान ॥ २ ॥ अजी सापसे क्या खेल होगा । या बाघका साथ क्या निभेगा। या हलाहल कभी पचेगा । खाया तो ॥ ३ ॥ जैसी खेलमें आग लगती । न संभलते बढ़ती जाती । वैसी स्थिति इंद्रियोंकी होती । दुलारनेसे ॥ ४ ॥ ज्ञानीकी कर्म-चेष्टा भी चलती निज भावसे । स्वभाव वश हैं प्राणी बलात्कार निरर्थक ॥ ३३ ॥ ९७ कर्मयोग (13)

वैसे तो सुन अर्जुन । शरीर है पराधीन । नाना भोग क्यों निर्माण । करें सब ॥ ५ ॥ आयास करके बहुत । सकल ही समृद्ध जात । इस देहको अनवरत । पाले क्यों ? ॥ ६ ॥ सर्वस्व तज कर । संपत्तिको पाकर । स्वधर्म छोड़कर । पालना देह ॥ ७ ॥ फिर है यह पंच मेलका । अनुसरेगा पंच तत्वका । तब अपने किये श्रमका । मूल्य क्या है ? ॥ ८ ॥ केवल शरीर पोषण । धोखा मान असाधारण । इस पर अतःकरण । न देना कभी ॥ ९ ॥ इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ । तयोर्न वशमागच्छेत् तो ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३४ ॥ इसलिये स्वधर्माचरण ही करना— वैसे इंद्रियोंके हितार्थ । विषय दिये नियमित । होगा संतोषित चित्त । यह है सच ॥ २१० ॥ किंतु जैसे सभ्य चोरका साथ । केवल समाजमें है विश्वस्थ । निश्चित ही है करता जो घात । एकांत आते ही ॥ ११ ॥ अजी विषकी है मधुरता । उपजाती चितमें ममता । परिणाममें भयंकरता । प्राणहारी ॥ १२ ॥ जैसे कंटियामें लगाया आमिष । भुलाता है मीनको दिखाके आस । वैसे भुलाते हैं विषय सुखाश । इंद्रियोंको ॥ १३ ॥ आमिषमें कांटिया होती । प्राणको वह हर लेती । आमिषमें वह छिपी होती । न जानता मीन ॥ १४ ॥ वैसे यहां अभिलाषामें होगा । यदि विषयकी आशा करेगा । अभिलाषासे है बलि जायेगा । क्रोधानलका ॥ १५ ॥ इंद्रियोंके स्व-अर्थोंमें रहते राग द्वेष हैं । उन्हें वश नहीं होना देहीके पथ-शत्रु वे ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ९८

शिकारी जैसे घेरकर। देखता है सु-अवसर । मारनेमें रहे तत्पर । मृगको सदा ॥ १६ ॥ यहां ऐसा ही होता है । संग उचित नहीं है । पार्थ काम औ' क्रोध है । अति घातुक ॥ १७॥ उसका आश्रय नहीं करना । मनमें स्मरण भी न धरना । ल्लान नष्ट नहीं होने देना । स्वधर्मकी ॥ १८ ॥ श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥ ३५ ॥ स्वधर्ममें मृत्यु भी श्रेष्ठ है— अजी ! स्वधर्म जो है अर्जुन । यदि आचरणमें कठिन । किंतु उसीका है अनुष्ठान । शुभदायक ॥ १९॥ यदि पराया आचार । देखनेमें है सुंदर । किंतु करना स्वीकार । अपना ही ॥ २२० ॥ शूद्रके घरके मिष्टान्न । खाये कैसे वह ब्राह्मण । हुआ भी है अति उद्विग्न । भूखसे ॥ २१ ॥ करना कैसे अनुचित । अनुचित इच्छाको प्राप्त । इच्छा हुई तो अनुचित । वह साधना क्या ? ॥ २२ ॥ दूसरोंका घर सुंदर । देखके अपना कुटीर । करें गिरानेका व्यापार । उचित क्या ? ॥ २३ ॥ अजी ! है अपनी सती । यदि कुरूप भी होती । संसारमें वही गति । वैसे ही यह ॥ २४ ॥ चाहे जैसे असुविधा-जनक । आचरणमें कष्ट-दायक । फिर भी स्वधर्म ही है तारक । इह परमें ॥ २५ ॥ अल्प भी अपना धर्म सु-सेव्य पर-धर्मसे । स्वधर्ममें भला मृत्यु पर-धर्म भयंकर ॥ ३५ ॥ ९९ कर्मयोग

अजी ! शर्करा तथा दूध । रुचिकर अति प्रसिद्ध । है क्रिमिरोगमें निषिद्ध । कैसे सेव्य ॥ २६ ॥ जानकर भी किया सेवन । होगा ही वह दुःख कारण । कुपथ्यसे होता है जीवन । अति कष्टकर ॥ २७ ॥ तभी औरोंको जो उचित । अपनेको है अनुचित । जो अंतिम हितके हित । अनाचरणीय ॥ २८ ॥ करनेमें स्वधर्मानुष्ठान । नष्ट होता है यदि जीवन । तो भी भला है वह अर्जुन । दोनों अर्थसे ॥ २९ ॥ ज्ञान पूर्वक स्वधर्माचरण नहीं करते उनका क्या— ऐसा समस्त सुरशिरोमणि । बोले जहां श्रीशार्गपाणी । अर्जुन कहे वहां विनवणी । सुनो देव ॥ २३० ॥ यह है तेरा कहना । मैंने वह सारा सुना । किंतु अब कछु पूछना । मेरे मनकी ॥ ३१ ॥ अर्जुन उवाच अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः । अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥ ३६ ॥ तभी देव यह है कैसा । ज्ञानियोंका स्मृति-भ्रंश-सा । पथ-भ्रष्ट होके सहसा । चलते हैं ॥ ३२ ॥ सर्वज्ञ ही हैं वे होते । औ' उपाय भी जानते । अधर्ममें व्यभिचरते । वह किस गुणसे ॥ ३३ ॥ अजी ! बीज तथा है भूसा । अंध न जाने चुनना कैसा । क्षण भर चतुर भी वैसा । बहकता क्यों ? ॥ ३४ ॥ जो संसारका संग भी हैं छोड़ते । वे संग संसर्गसे गुप्त न होते । वनवास छोड़कर भी हैं आते । जन-पदमें ॥ ३५ ॥ अर्जुनने कहा मनुष्य करता पाप किसकी प्रेरणा लिये । जुता हुवा व्यर्थका-सा स्वेच्छाके प्रतिकूल भी ॥ ३६ ॥ ज्ञानेश्वरी १००

स्वयं पापसे हैं हटते । सर्वस्वसे अलिप्त होते । फिर उसीमें आ पचते । बलात्कारसे ॥ ३६ ॥ जिससे अरुचि है मनसे । वे ही आ चिपकते चितसे । टालना चाहें सतत जिसे । वही लिपटते हैं ॥ ३७ ॥ दीखता यहां बलात्कार । यहां चलता किसका जोर । जानना चाहूं चक्रधर । कहता पार्थ ॥ ३८ ॥ हृदय कमलका आराम । योगियोंका जो निष्काम । कहता है श्री पुरुषोत्तम । कहता हूं सुन ॥ ३९ ॥ भगवान उवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः । महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥ इसका मूल रजोगुण— अजी ! सुन ये कामक्रोध जो हैं । इनमें दयाका नाम नहीं है। ये कृतांत यमके ही सम हैं । मान ले तू ॥ ३४० ॥ ये हैं ज्ञान निधिके भुजंग । विषय काननके हैं बाघ । भजन मार्गके हैं ये मांग । अति घातुक ॥ ४१ ॥ ये हैं देह दुर्गके आधार । इंद्रिय ग्रामके सरदार । अविवेक करते गदर । विश्वमें सब ॥ ४२ ॥ रजो गुण है मनका । मूल है असुरताका । पोषण किया इनका । अविद्याने ॥ ४३ ॥ यदि हैं ये रजसे संपन्न । किंतु हैं तमसे भी अभिन्न । तभी उसने दिया आसन । प्रमाद मोहका ॥ ४४ ॥ मृत्यु नगरके भीतर । मान है इनका अपार । करते जीवनका वैर । इसीलिये ॥ ४५ ॥ श्री भगवानने कहा यह तो काम औ' क्रोध जो रजो-गुणसे बने । बडे खाऊ तथा पापी वैरी हैं जान तू इन्हे ॥ ३७ ॥ १०१ कर्मयोग

इनकी भूखकी अभिलाष । जो कहती विश्वं है एक ग्रास । इसकी प्रबंधक है आस । जो असीम ॥ ४६ ॥ लीलामें जब यह मुट्ठी कसती । चौदहों भुवनोंको ओछा मानती । इसकी भगिनी भ्रांति कहलाती । अति लाड़ली ॥ ४७ ॥ कौर बनाकर इक लोकत्रयका । खेल खेलती सहज निगलनेका । दासी-पनमें इठलाती है भ्रांतिका । तृष्णा वहां ॥ ४८ ॥ होता है वहां मोहका सम्मान । जिससे अहंका है लेन-देन । सर्वत्र करता तांडव महान । चातुर्यसे जो ॥ ४९ ॥ सत्यका जिसने सार निकाल कर । उसमें अकृत्यका भूसा भरकर । दंभ रूढ किया वह विश्वभर । इसने ही ॥२५० ॥ साध्वी शांतिको सुन नग्न किया । हत्यारी मायाका श्रृंगार किया । साधु समाजको भ्रष्ट कराया । उनसे यहां ॥ ५१ ॥ नींव मिटा दी विवेककी । खाल उतारी वैराग्यकी । गर्दन तोड़ दी निग्रहकी । जीते जी ॥ ५२ ॥ उजाड़ा संतोष वनको । गिराया धैर्यके दुर्गको । उखाड़ा आनंद गाछको । जग भरमें ॥ ५३ ॥ उखाड़ा बोध पौधको । पोंछा सुखकी लिपिको । हियमें जलायी आगको । तापत्रयकी ॥ ५४ ॥ देहके साथ ये पैदा हुए । जीवके साथ ये जुड़ गए । न मिलते बैठे छिपे हुए । ब्रह्मको भी ॥ ५५ ॥ रहते हैं चैतन्यके पडोसमें । बैठते हैं ज्ञानके ही पंगतमें । उठते हैं कुहराम मचानेमें । तब रुकते नहीं ॥ ५६ ॥ शस्त्रके बिन ये मारते । डोरके बिन हैं बांधते । ज्ञानियोंको तो मिटा देते । प्रतिज्ञापूर्वक ॥ ५७ ॥ जल बिन ये डुबोते हैं । आगके बिन जलाते हैं । मौन रह लपेटते हैं । प्राणिमात्रको ॥ ५८ ॥ ज्ञानेश्वरी १०२

बिन कीचडके ये गाड़ते । बिन पाशके भी हैं कसते । किसीके हाथमें न आते । काबू कभी ॥ ५९ ॥ धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च । यथोल्बेनाऽवृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥ ३८ ॥ चंदन वृक्षमें जैसे । लिपट रहता साप वैसे । या खोल रहता जैसे । गर्भ पर ॥ २६० ॥ या प्रभाके बिन भानु । हुताशन धूमके बिनु । या दर्पण मल हीन । कहीं न रहता ॥ ६१ ॥ ज्ञानके पास ये दुष्ट आ बसते हैं— इनके बिन ज्ञान नहीं । न देखा है हमने कहीं । भूसेके बिन बीज नहीं । उपजता जैसे ॥ ६२ ॥ आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा । कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥ ३९ ॥ वैसे ज्ञान है विशुद्ध । किंतु इनसे प्ररुद्ध । तभी है हुआ अगाध । पानेमें वह ॥ ६३ ॥ पहले इनको है जीतना । फिर ज्ञानको प्राप्त करना । इनका पराभव करना । कष्ट साध्य ॥ ६४ ॥ जब इनको जीतनेमें । घल लावे तब तनमें । ईंधन डालनेसे आगमें । जैसे बढती ॥ ६५ ॥ इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते । एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥ ४० ॥ ढका है धूमसे अग्नि जैसे दर्पण धूलसे । जेरीसे घिरता गर्भ वैसे है ज्ञान कामसे ॥ ३८ ॥ काम-रूप महा अग्नि न होता तृप्त जो कभी । ज्ञानीका तो नित्य-शत्रु उसने ज्ञानको ढका ॥ ३९ ॥ इंद्रियां मन औ'बुद्धि इनका आसरा लिये । छिपाके ज्ञान जीवोंका करता मोह-ग्रस्त जो ॥४०॥ १०३ कर्मयोग

जो जो साधन है करते । वे सब इन्हीको बढ़ाते । इसीलिये येही जीतते । हठयोगियोंको ॥ ६६ ॥ इंद्रिय दमन, इनको जीतनेका उपाय है— किंतु इन्हे जीतनेमें एक । उपाय है बडा ही नेक । करना हो तो करके देख । कहता हूं तुझे ॥ ६७ ॥ तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ । पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥ ४१ ॥ इंद्रिय इनका पहला आसन । वहांसे ही होते हैं कर्म उत्पन्न । करना है इंद्रियोका निर्दलन । सर्वथैव ॥ ६८ ॥ इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ ४२ ॥ दौड रुकेगी मनकी । औ' मुक्ति होगी बुध्दिकी । नींव हिलेगी इनकी । ये जो पापी ॥ ६९ ॥ मिटे जब ये अंतरंगसे । तभी गये ये जड मूलसे । न रहता मग जल जैसे । सूर्य किरण बिन ॥ २७० ॥ एवं बुद्धे परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना । जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ ४३ ॥ तभी जीवको ब्रह्म-स्वराज्य मिलेगा— ऐसे रागद्वेष जब मिटता । ब्रह्मात्मका तब स्वराज्य आता । फिर वह् आनंद है भोगता । अपने आप ॥ ७१ ॥ इनका पहला स्थान जीतके इंद्रियां सब । टाल तू इस पापीको ज्ञान विज्ञान नाशक ॥ ४१ ॥ इंद्रियोंको कहा श्रेष्ठ उससे श्रेष्ठ है मन । मनसे बुद्धि है श्रेष्ठ श्रेष्ठ है उससे प्रभु ॥ ४२ ॥ जान ऐसा प्रभु श्रेष्ठ निजको जीत आप ही । काम रूपी महा-शत्रु इसका नाश तू कर ॥ ४३ ॥ ज्ञानेश्वरी १०४

गुरु शिष्योंके संवादमें । पद-पिंडके एकत्वमें । स्थिर रह नित्य-रूपमें । न उठो कभी ॥ ७२ ॥ अगले अध्यायकी भूमिका— सिद्ध है जो सकल सिद्धोंका । रमण है श्रीरमादेवीका । स्वामी सकल देवादिकोंका । कहने लगा ॥ ७३ ॥ अब पुन वह अनंत । कहेगा आदीकी जो बात । जब उनसे पांडुसुत । प्रश्न करेगा ॥ ७४॥ उसके बोल होंगे सरस । उसमें अनुभवेंगे रस । श्रोताओंमें उमडेगा उन्मेष । श्रवण सुखका ॥ ७५ ॥ ज्ञानदेव कहे निवृत्तिका । जागृत करके विवेकका । आप सुनिये हरि-पार्थका । संवाद सब ॥ ७६ ॥ गीता श्लोक ४३ ज्ञानेश्वरी ओवी २७६ ॐ (14)

४ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग श्रोताओंको ज्ञानेश्वर महाराजका उद्बोधन- सुकाल हुआ श्रवणेंद्रियोंका । दर्शन हुआ गीता-निधानका । अजी ! साकार ही हुआ स्वप्नका । उनको यहां ॥ १ ॥ मूलमें है विवेककी गोष्ठि । कहनेवाला श्रीकृष्ण श्रेष्ठी । भक्तराज जो स्वयं किरीटी । सुनते हैं ॥ २ ॥ पंचमालाप है सुगंध । तथा परिमल सुस्वाद । वहां है भलासा विनोद । कथानकका ॥ ३ ॥ श्री हरिकी कृपा हुई । अमृतकी गंगा बही । तपस्या सफल हुई । श्रोताओंकी ॥ ४ ॥ इंद्रियोंको अब संपूर्ण । बनकर स्वयं श्रवण । अनुभवना गीताख्यान । संवाद सुखका ॥ ५ ॥ अब यह अप्रासंगिक । विस्तार छोडके अधिक । कहो कृष्णार्जुन हो एक । बोले क्या हैं ॥ ६ ॥ तब संजय बोले राजासे । सुदैव जुड़ा है अर्जुनसे । तभी अति प्रीति है उनसे । नारायणकी ॥ ७ ॥ जो न कहा पिता वसुदेवसे । औ' न जो कहा माता देवकीसे । या न कहा गुह्य बलभद्रसे । कहा वह पार्थसे ॥ ८ ॥

देवी लक्ष्मी इतनी नजदीक । वह भी न जानती यह सुख । कृष्ण प्रेमका फल जो अधिक । मिला अर्जुनको ॥ ९ ॥ थी सनकादिकोंकी जो आस । सुननेकी यह उपदेश । किंतु उनको भी ऐसा यश । मिला नहीं ॥ १० ॥ जगदीश्वरका है प्रेम । दीखता यहां निरुपम । पार्थने ऐसा सर्वोत्तम । किया पुण्य ॥ ११ ॥ अजी ! जिसकी अति प्रीति । अमूर्तको बनाती व्यक्ति । : उसकी है एकात्म स्थिति । जंचती बहु ॥ १२ ॥ योगियोंको जो नहीं मिलता । वेदार्थमें भी जो नहीं आता । ध्यानस्थका नहीं पहुंचता । ध्यान चक्षुभी ॥ १३ ॥ ऐसा यह निज स्वरूप । अनादि तथा औ' निष्कंप । किंतु कैसा हुआ सरूप । इस भांतिसे ॥ १४ ॥ यह त्रिलोक पटका थान । जो है आकारके परे जान । प्रेमसे करमें है अर्जुन । कर लिया है ॥ १५ ॥ भगवान उवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥१॥ इस योगकी प्राचीनता— कहता है देव पांडुसुत । हमसे यह है विवस्वत । सुनी है योगकी गुह्य बात । बहुत पहले ॥ १६ ॥ बोले फिर वह भास्कर । योग स्थिति यह सुंदर । पूर्ण रूपसे सुअवसर । मनुसे तब ॥ १७ ॥ मनुने इसका अनुष्ठान । कर दिया ज्ञानोपदेश दान । इक्ष्वाकुको, ऐसी है महान । आदि परंपरा ॥ १८ ॥ पहले सूर्यसे मैंने कहा था योग अव्यय । मनुसे वह बोला था वह इक्ष्वाकुसे फिर ॥ १ ॥ १०७ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग

एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥२॥ कितने ही इस योगसे और । हुए हैं राजऋषि जानकार । किंतु इस युगमें पृथ्वो पर । कोई न जानता ॥ १९ ॥ जिन प्राणियोंका आधार । देह तथा कामना पर । जिससे विस्मृति अपार । आत्म बोधकी ॥ २० ॥ अजी ! बदल गयी आस्था बुध्दि । विषय सुखकी परमावधि । इससे जीव हुवा है उपाधि । उन्हे भाता यही ॥ २१ ॥ गांवमें सुनो नग्न लोगोंके । काम क्या महीन कपडोंके । तथा जन्मांधोंमें सूरजके । कहो मुझे ॥ २२ ॥ या बहिरोंकी सभामें । गावें गीत सु-रागोंमें । सियारको चांदनीमें । होगी क्या चाह ? ॥ २३ ॥ अथवा पहले चंद्रोदयके । चक्षु होते हैं व्यर्थ जिनके । चंद्रोदयसे उन कागोंके । लाभ क्या हुआ ॥ २४ ॥ जैसे वैराग्यकी सीमा न जानते । विवेककी भाषा नहीं है सुनते । वैसे मूर्ख कहो कैसे जानते । मुझ ईश्वरको ॥ २५ ॥ मोहके बहुत बढनेसे । काल बहुत बीत जानेसे । लोप हुआ है योग इससे । इस लोकमें ॥ २६ ॥ स एवायं मयातेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥३॥ वही योग तुझसे अर्जुन । कहा है मैंने इसी क्षण । उसको तू तत्वता जान । न करके भ्रांति ॥ २७ ॥ ऐसी परंपरासे जो मिला राजर्षि-वृंदको । आगे समय जानेसे विश्वमें लोप होगया ॥२॥ वही आज तुझे मैंने कहा योग पुरातन । कहा है गुह्य जो सार भक्त है तू सखा मम ॥ ३ ॥ ज्ञानेश्वरी १०८

मेरे जीवनका यह गुपित । तुझसे छिपाना नहीं उचित । तू है मेरा आत्मीय बहुत । इसीलिये ॥ २८॥ प्रेमका तू पुतला । भक्तिका है जिव्हाला । मित्रताकी चित्कला । धनुर्धर ॥ २९॥ मेरा निकट तू अर्जुन । कैसे करूं तेरी वंचना । रण सज्ज हुए समान । हम दोनों ॥ ३० ॥ अन्य सब अब रहने देना । कोलाहलका विचार न करना । अज्ञान सब तेरा दूर करना । इसी समय ॥ ३१॥ अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः । कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४॥ आजके तूने विवस्वतसे कैसे कहा ?— अर्जुन कहता है तब श्रीधर । माता प्रेम करती संतान पर । इसमें विस्मय क्या है चक्रधर । कृपानिधि ॥ ३२ ॥ संसार भ्रांतोंकी ह छाया । अनाथ जीवोंकी तू माय । हमने जो जन्म है पाया । तव कृपासे ही ॥ ३३ ॥ जन्म देकर पंगुको माता । कष्ट उठाती है स-ममता । ऐसी देव कैसे कहें वार्ता । तेरी तुझसे ही ॥ ३४॥ अब पूछूंगा देव एक बात । उस पर देना भला स्व-चित्त । प्रश्न पर क्रोध तू न किंचित । करो देव ॥ ३५॥ पिछली जो वह बात । तूने कही थी अनंत । न मानता मेरा चित्त । क्षण भी देव ॥ ३६॥ अजी ! वह विवस्वत नामका । अ-परिचित है बाप-दादाका । कैसा किया है तूने उनका । उपदेश देव ॥ ३७॥ अर्जुनने कहा अभीका जन्म है तेरा पूर्वका उस सूर्यका । पहले ही कहा तूने कैसे मैं वह मान लूं ॥ ४ ॥ १०९ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग

वह है देव किस कालका । तू भीहरि है इस कालका । तभी दीखता तेरी बातका । असंगत पन ॥ ३८ ॥ किंतु तेरा चरित्र वैसे । हम उसको जाने कैसे । तभी वह असत्य ऐसे । नहीं कहता ॥ ३९ ॥ यह बात संपूर्ण ऐसे । कहना मैं समझूं वैसे । तूने उस सूर्यको कैसे । किया उपदेश ॥ ४० ॥ भगवान उवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन । तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ॥५॥ तेरे मेरे अनेक जन्म मैं जानता हूं— कृष्ण कहे तब पांडुसुत । जब था वह विवस्वत । तब मैं नहीं था ऐसा चित्त- । भ्रम है तेरा ॥ ४१ ॥ अजी ! तू नहीं जानता सब । जन्म हमारे तुम्हारे अब । बीते हैं कितने कैसे कब । यह तू भूला है ॥ ४२ ॥ मैं जिस जिस अवसरमें । अवतरा हूं जिस रूपमें । वह सब अपने मनमें । स्मरता पार्थ ॥ ४३ ॥ अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ॥६॥ धर्म रक्षणके लिये मेरा अवतार-- इसीलिये मुझे संपूर्ण । बीतेका होता है स्मरण । रहित मैं जन्म मरण । जन्मता प्रकृति योगसे ॥ ४४ ॥ श्रीभगवानने कहा बीते मेरे कयी जन्म तेरे भी बहु अर्जुन । जानता मैं सभी बातें तू उन्हे जानता नहीं ॥ ५ ॥ होते हुये अजन्मा मैं निर्विकार जगत्प्रभु । जन्मता हूं स्वमायासे प्रकृति ओढके निज ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ११०

अव्ययत्व मेरा नहीं मिटता । किंतु जन्म मरण हे दीखता । यह सब प्रकृतिसे भासता । मुझमें नहीं ॥ ४५ ॥ मिटती नहीं मेरी स्वतंत्रता । दीखती मुझमें कर्माधीनता । यह हे भ्रम-बुद्धिसे घड़ता । अन्यथा नहीं ॥ ४६ ॥ एक ही दीखता दूसरा । जो दर्पणका ले आधार । किंतु वहां वस्तु विचार । एक मात्र ॥ ४७ ॥ निराकार हूं मैं धनुर्धर । लेकर प्रकृतिका आधार । नटता हूं लेकर आकार । कार्यके लिये ॥ ४८ ॥ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥ धर्ममात्र जो संपूर्ण । युगयुगमें रक्षण । करना मेरा लक्षण । आदिकालसे ॥ ४९ ॥ भूलता हूं तब अजत्व । छोड़ता हूं निराकारत्व । गिरता जब धर्म तत्त्व । अधर्मसे ॥ ५० ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥८॥ हितार्थ अपने भक्तोंके । आता हूं अवतार लेके । मिटाता तब अज्ञानके । अंधकारको ॥ ५१ ॥ अधर्मकी सीमा तोड़ता । पापकी सनद फाड़ता । सुखका ध्वज उभारता । सज्जनोंसे ॥ ५२ ॥ दैत्य कुलका संहार करता । साधु जनोंका सम्मान करता । धर्म नीतिका मेल बिठाता । धनुर्धर ॥ ५३ ॥ जब है गिरता धर्म जगमें तब अर्जुन ! अधर्म उठता भारी लेता हूं जन्म मैं स्वयं ॥ ७ ॥ रक्षण कर संतोंका दुष्टोंका नाश करने । स्थापना करने धर्म जन्मता मैं पुनः पुनः ॥ ८ ॥ १११ ज्ञान-कर्म-संन्यासयोग

मिटाकर अविवेकका काजल । करता हूं विवेक दीप उज्ज्वल । जिससे योगियोंकी दीपमाळ । जले निरंतर ॥ ५४ ॥ आत्म-सुखसे विश्व खिलता । जगतमें धर्म ही रहता । सात्विकताका वसंत आता । भक्त जनोंमें ॥ ५५ ॥ पापका जहां पहाड टूटता । पुण्यका है प्रभात प्रकटता । मेरा रूप जब प्रकट होता । धनंजय ॥ ५६ ॥ ऐसे कार्यार्थ जगतमें । जनमता हूं युगयुगमें । जानता जो यह विश्वमें । विवेकी वही ॥ ५७ ॥ जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥९॥ जो मेरा रूप जानते हैं वे मद्रूप होते हैं— मैं जो अजत्वमें ही जनमता । अक्रियतामें सक्रिय रहता । अविकारत्व यह जो जानता । पाता वह मोक्ष ॥ ५८ ॥ संगमें वह असंग रहता । देहमें निर्देह अनुभवता । पंचतत्वमें जब मिल जाता । मेरे ही रूपमें ॥ ५९ ॥ वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः । बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥१०॥ वे अपना पराया न सोचते । सदा कामना शून्य हो रहते । कभी वे राह भी नहीं देखते । क्रोधकी ॥ ६० ॥ सदा वे मद्भावमें ही रहते । मेरी सेवामें ही रत रहते । आत्म-बोधमें ही मगन होते । वीत राग हो ॥ ६१ ॥ मेरे जन्म तथा कर्म दिव्य जो जानता सही । तजके देह पुनर्जन्म न पाता मिलके मुझे ॥ ९ ॥ नहीं तृष्णा भय क्रोध जो मेरे कार्यमें रत । हुये ज्ञान तपोपूत तथा मद्भावमें कयी ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ११२