ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
गगनसे जो प्राचीन । परमाणुसे महीन ।
जिसका है सन्निधान । चलाता विश्व ॥ ८७ ॥
प्रसवता है जो सब । जीते हैं उससे सब ।
उटता तर्क भी सब । वह है अचिंत्य ॥ ८८ ॥
आगमें दीमक नहीं लगती । तेजमें जैसे रात नहीं आती ।
किंतु स्थूल-दृष्टि नहीं देखती । स्वरूप-तेज ॥ ८९ ॥
जो है सूर्यकणोंका निधान । ज्ञानियोंका नित्योदय जान ।
नहीं है जिसको अस्तमान । नाम-मात्र ॥ ९० ॥
प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ १० ॥
प्राप्त होते ही मरण-काल । स्थिर-चित्तसे है जो तत्काल ।
स्मरता परब्रह्म सकल । अव्यंग जान ॥ ९१ ॥
पद्मासनमें रख शरीर । उत्तराभिमुख बैठकर ।
हृदयमें सुख रखकर । सत्कर्मका ॥ ९२ ॥
अन्त: मिलनके मनो-धर्मसे । स्वरूप-प्राप्तिके अनुरागसे ।
आत्म मिलनके समारोहसे । मिलनेके लिये ॥ ९३ ॥
जो आकलन योगसे । सुषुम्ना-मध्यमार्गसे ।
निकले अग्नि-स्थानसे । ब्रह्मरंध्र ॥ ९४ ॥
वहां प्राण तथा चित्तका । भास होता है संबंधका ।
जहां है प्राण संचारछा । मूर्ध्याकाश ॥ ९५ ॥
मन-स्थिरतासे धरा हुआ । भक्ति-भावनासे भरा हुआ ।
योग-बलसे जो सधा हुआ । सज्ज होकर ॥ ९६ ॥
प्रयाण-काले स्थिर-चित्त होके
सद्भक्तिसे निश्चल योग-युक्त ।
भ्रू-मध्यमें प्राण जो है टिकाता
वह योगि पाता सु दिव्य-धाम ॥ १० ॥
२३१ सातत्ययोग
जड़ाजड़को घुलाता । भ्रूमध्यमें लय होता ।
घंटानाद लय होता। घंटा में ही वैसे ॥ ९७ ॥
अथवा ज्योति घटमें ढकी । न जाने क्या हुई है कबकी ।
ऐसी मृत्यू आती है उसकी । पांडुकुमार ॥ ९८ ॥
ऐसा होता है वह पर-ब्रह्म । परम-पुरुष जिसका नाम ।
ऐसा है वह मेरा निजधाम । स्वयं है वह होता ॥ ९९ ॥
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ ११ ॥
वेदोंको भी अगम्य ब्रह्म-पद प्राप्त करनेका साधना मार्ग-
सकल-ज्ञानका अंत है जो ज्ञान । उस ज्ञानकी एक-मात्र खान
अक्षर कहते उसे ज्ञानी-जन । धनुर्धर ॥ १०० ॥
आंधीमें न उड़ता जान । होता जैसे स्वयं-गगन ।
यदि हो वह जैसा घन । टिकता कैसे ॥ १ ॥
ज्ञानका विषय होनेसे । गुना गया जो ज्ञानसे ।
वृत्ति-ज्ञान लय होनेसे । कहा अक्षर सहज ॥ २ ॥
तभी वेद-विद् नर । कहते उसे अक्षर ।
प्रकृतिसे जो है पर । परमात्म-रूप ॥ ३ ॥
विषयोंको विष मानकर । इंद्रिय सबको शुद्ध कर ।
देह-वृक्ष सायाके अंदर । बैठे है शांत ॥ ४ ॥
इस भांतिसे जो विरक्त । देखते निरंतर पथ ।
निष्कामसे हैं अभिप्रेत । सर्वदा जो ॥ ५ ॥
गाते जिसे अक्षर वेद-वेत्ता
विरक्त जाके जिसमें समाते ।
जो ब्रह्मचारी पद चाहते हैं
तुझे कहूंगा वह तत्व-सार ॥ ११ ॥
ज्ञानेश्वरी २३२
उसके प्रेमसे साधक जन। साधते हैं ब्रह्मचर्य कठिन।
इंद्रियोंपर करके शासन। कठोर नित्य ॥ ६ ॥
ऐसा जो महत्पद। दुर्लभ औ' अगाध।
तट पर ही वेद। खडे अगम्य हो ॥ ७॥
ऐसा जिसका लय होता। वह स्वयं वह बनता।
कैसा यह तुझे कहता। मैं फिर एक बार ॥ ८ ॥
अर्जुन कहता नारायण। यही पूछता था मेरा मन।
सहज कृपा की सकरुण। कहिये जी ॥ ९॥
किंतु कहना अति ही सरल। बोले त्रिभुवन-दीप ये बोल।
जानते हैं तेरा मन निर्मल। कहूंगा संक्षेपमें ॥ १० ॥
मनकी लत होती बहिर्मुख। उसको तोड़कर स्वाभाविक।
करना है उसको अंतर्मुख। हृदय-तलमें ॥ ११ ॥
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च।
मूर्ध्न्याधायाऽत्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥१२॥
बहिर्मुख मनको अंतर्मुख करनेकी साधना—
किंतु तभी है यह घड़ता। जब संयमकी कड़ी लगाता।
सर्व-द्वारमें अनवरत। निग्रहसे ॥ १२ ॥
स्वभावसे ही संयत मन। घर करता अन्तःकरण।
टूटे जिसके कर-चरण। घर न छोड़ता वैसे ॥ १३ ॥
जब होता चित्त ऐसा स्थिर। तब कर प्राणका ओंकार।
लाओ उसको मूर्ध्याकाशपर। सुषुम्ना मार्गसे ॥ १४॥
लय होता न होता आकाशमें। ऐसा धरना है उसे धारणामें।
होता है मात्रात्रय अर्ध-बिंदुमें। तब विलीन ॥ १५॥
तब तो वह समीर। गगनमें कर स्थिर।
ऐक्यमें जैसे ओंकार। लय कर बिंदुमें ॥ १६ ॥
रोकके इंद्रिय-द्वार जकड़े मन अंतर।
तालूमें रखके प्राण करते योग-धारणा ॥ १२ ॥
(30) २३३ सातत्ययोग
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥ १३ ॥
तब मिटता है ओं स्मरण । लय होता गगनमें प्राण ।
प्रणव अन्तमें पूर्ण घन । रहता तब ॥ १७ ॥
तभी प्रणवैक नाम । यह एकाक्षर ब्रह्म ।
वह मद्रूप परम । जपते हुए ॥ १८ ॥
जो छोड़ देता है तन । त्रिशुद्धि मुझमें लीन ।
नहीं उसे मेरे बिन । गति अन्य ॥ १९ ॥
मृत्यु समय असहाय स्थितिमें भगवत्स्मरण होगा क्या ?—
अंतकालका स्मरण । करना सच अर्जुन ।
यह विचारता मन । कैसा होगा ॥ १२० ॥
इंद्रियां शिथिल होकर । जीवन-सुख डूब कर ।
मृत्यु-चिन्ह अंतर्बाहर । दीखने लगे ॥ २१ ॥
तब बैठ कर भला कौन । करेगा निरोध औ' धारण ।
कैसा करेगा अंतःकरण । स्मरण प्राणका ॥ २२ ॥
यदि ऐसा हो तेरा मन । संदेहात्मका तो अर्जुन ।
नित्य सेव्य मैं सेवालीन । होता हूं अंतमें ॥ २३ ॥
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ १४ ॥
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥ १५ ॥
करें उंच ब्रह्म उच्चार मनमें स्मरते मुझे ।
ऐसे जो तनको त्यागे पाता है गति उत्तम ॥ १३ ॥
अनन्य चित्त जो नित्य सदैव सरता मुझे ।
लीन जो मुझमें योगी पाता है सुखसे मुझे ॥ १४ ॥
मुझमें मिलके पाये महात्मा मोक्ष-सिद्धि जो ।
दुःखका घर जो जन्म न पाते हैं अशाश्वत ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी २३४
जीवन भर जो मेरी सेवा करता है अंतकालमें मैं उसकी सेवामें आता हूँ—
विषयोंको तिलांजलि देकर । प्रवृत्तिका जो निरोधकर ।
हृदयमें मद्रूप निरंतर । अनुभवते हैं । ॥ २४ ॥
उस अनुभवका जो भोग । कराता क्षुधा-तृषाका त्याग ।
वहां चक्षु आदिकी मांग । रहती कहां ॥ २५ ॥
ऐसे एकात्म हुए निरंतर । हृदयमें मुझसे मिलकर ।
समाते जो समरस हो कर । उपासनामें ॥ २६ ॥
होता जब उनका देहावसान । उनको करना है मेरा स्मरण ।
तब होता यदि मेरा आगमन । तो भक्तिका मूल्य ही क्या ? ॥ २७ ॥
अंतकालमें कोई दीन । पुकार करता रूदन ।
तब क्या उसके कारण । दौड़ना पड़ता मुझे ॥ २८ ॥
भक्तोंकी भी यदि यही स्थिति । तब गावें क्यों भक्तिकी महति ।
न करे संदेह-ग्रस्त मति । ऐसी तू अर्जुन ॥ २९ ॥
जिस समय वह स्मरता । उस समय मैं पहुंचता ।
यह बोझ भी नहीं सहता । मन मेरा ॥ १३० ॥
मान यह अपना ऋण । भक्तोंके प्रति प्रतिक्षण ।
सेवा करना है लक्षण । अंतमें मेरा ॥ ३१ ॥
संभवता व्याकुलताका भाव । अनुभवेगा सुकुमार देह ।
मान मैं देता हूं उनको गेह । आत्म-बोधका ॥ ३२ ॥
फिर देता मेरे स्मरणकी । छाया घनी सुशीलताकी ।
तथा-दृढ बुध्दि नित्यताकी । उसको मैं ॥ ३३ ॥
अंतकालमें व्याकुल । न होते भक्त सकल ।
आते अति सकुशल । मम धाममें ॥ ३४ ॥
उतारकर देहकी केंचुली । झाडकर अहंकारकी धूली ।
भिझकर सद्वासना मैं भली । अपनमें समरस करता ॥ ३५ ॥
भक्तोंको भी देह-भाव नहीं । देहमें रहते हुए कहीं ।
इसलिए देह त्यागमें ही । नहीं वियोग ॥ ३६ ॥
२३५ सातत्ययोग
तथा मेरा आना मरण कालमें । उनके लिये करना अपनेमें ।
ऐसा नहीं है वे जीवन-कालमें । हुए हैं समरस ॥ ३७ ॥
जैसे शरीरके सलीलमें । प्रतिबिंब अस्तित्व रूपमें ।
दीखती किंतु जोस्ना साथमें । होती चंद्रके ॥ ३८ ॥
ऐसा होता जो नित्य-युक्त । उसको मैं सुलभ नित ।
तभी देहांतमें निश्चित । मैं होता वह ॥ ३९ ॥
फिर क्लेश-तरुका झंझाड़ । तथा तापत्रयाग्निका कुंड ।
है मृत्यु-काकको दिया पिंड । उतारा हुआ ॥ १४० ॥
दुःखको जो है प्रसवता । महाभयको जो बढ़ाता ।
सकल दुःखका बनता । मूल-धन ॥ ४१ ॥
दुर्मतिका जो है मूल । तथा कु-कर्मका फल ।
व्यामोहका है केवल । स्वरूप ही ॥ ४२ ॥
संसारका है जो आसन । औ' विकारोंका महा-वन ।
सब व्याधियोंका है अन्न । परोसा हुआ ॥ ४३ ॥
जो है मृत्युका उच्छिष्ट । तृष्णा मानो मूर्तिमंत ।
जन्म-मरणका पथ । स्वभावसे ॥ ४४ ॥
भूलोंसे जो भरा हुआ । विकल्पका ढला हुआ ।
चौड़ है जो खुला हुआ । विच्छुओंका ॥ ४५ ॥
जो है व्याघ्रका क्षेत्र । पण्यांगनाका मैत्र ।
विषय-विज्ञान यंत्र । सुपूजित ॥ ४६ ॥
राक्षसकी करुणा-सा । शीतल विष-घूंट-सा ।
तस्करका विश्वास-सा । वह है दिखाऊ ॥ ४७ ॥
कोढ़ीका है जो आलिंगन । काल-सर्पका मृदुपन ।
तथा बहेलियाका गान । धनंजय ॥ ४८ ॥
शत्रु का अतिथि सत्कार । मानो दुर्जनका आदर ।
अथवा जो महा-सागर । अनर्थका ॥ ४९ ॥
स्वप्नका जो है देखा स्वप्न । मृगजल सिंचित वन ।
या धूम्रर-जका गगन । ढला हुआ ॥ १५० ॥
ज्ञानेश्वरी २३६
ऐसा है यह शरीर । जो मेरा रूप ले नर ।
हो गये हैं जो अपार । रूपमें मेरे ॥ ५१ ॥
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥ १६ ॥
ब्रह्म, इंद्रादि भी पुनर्जन्मसे मुक्त नहीं-
वैसे ब्रह्मपद प्राप्त कर भी । न चुकता पुनरावृत्त कभी ।
किंतु मरने पर जैसा कभी । न दुखता पेट ॥ ५२ ॥
अथवा जैसे जगनेपर । नहीं डुबाता स्वप्नका पूर ।
वैसे मुझमें मिलने पर । न होता संसार लिप्त ॥ ५३ ॥
जगदाकारका शीर्ष-स्थान । चिर-स्थायित्वका है प्रधान ।
शिखर-सम ब्रह्म-भुवन । लोकाचलका ॥ ५४ ॥
उस सत्यलोकका है एक प्रहर । अमरेंद्रकी आयु भरपूर ।
उठती है पंगत दिनमें निरंतर । चौदह इंद्रोंकी ॥ ५५ ॥
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिंयुगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥ १७ ॥
बदलती जब युग चौकडी हजार । तब होता ब्रह्मदेवका दिवस भर ।
सब उलटती ऐसी ही और हजार । तब होती है रात्र ॥ ५६ ॥
यह है वहांका दिन-रात । जो देखते हैं वे भाग्यवंत ।
देखते हैं यह वे स्वर्गस्थ । चिरंजीव ॥ ५७ ॥
सुरगणोंकी क्या बात । देख इंद्रकी ही गत ।
होते जाते दिनरात । चौदह इंद्र ॥ ५८ ॥
ब्रह्मादि लोक जो सारे भेजते फिर जन्ममें ।
पुनर्जन्म नहीं होता मुझसे मिलके फिर ॥ १६ ॥
सहस्र युगका होता ब्रह्मका दिन एक है ।
रात भी दिन जैसी ही कालोपासक मानते ॥ १७ ॥
२३७ सातत्ययोग
ब्रह्मके जो आठ पहर । देखते हैं आंखभर ।
कहलाते यहां पर । अहोरात्रविद् ॥ ५९ ॥
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥ १८ ॥
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥ १९ ॥
होता जब ब्रह्म-भुवनमें उदय । उसकी गणना होना अवश्यप्राय ।
ऐसे समय जो था अव्यक्तमें लय । होता व्यक्त विश्व ॥ १६० ॥
अंत होते ही दिनके चार प्रहर । सूखता है विश्वका आकार सागर ।
प्रातः समय होते ही वैसे ही फिर । उमड़ आता वह ॥ ६१ ॥
शरद्ऋतुके प्रवेशमें । समाते घन गगनमें ।
फिरसे आते ग्रीष्ममें । वही उमड़ ॥ ६२ ॥
वैसे उदयमें ब्रह्म-दिनके । उमड़ते ढेर भूत सृष्टिके ।
निमित्त हजार चौकड़ियोंके । मिटने तक ॥ ६३ ॥
जब रात्रीका समय आता । विश्व अव्यक्तमें लय होता ।
युग-सहस्रका तम जाता । होता विश्व उदय ॥ ६४ ॥
कही क्यों यह उपपत्ती । विश्व प्रलय औ' संभूती ।
ब्रह्म-भुवनमें जो होती । दिन-रातमें ॥ ६५ ॥
देख उसकी महानताका मान । है वही सृष्टि बीजका संकलन ।
पुनरावर्तनका अंतिम स्थान । दोनों ही आप ॥ ६६ ॥
त्रिभुवनमें जो धनुर्धर । उसीका है सब विस्तार ।
होता रचना चमत्कार । दिनोदयमें ॥ ६७ ॥
दिनमें व्यक्त होते हैं सभी भूत अव्यक्तसे ।
होते विलय रात्रीमें सभी अव्यक्तमें फिर ॥ १८ ॥
उठते मिटते सारे जीव संघ वही वही ।
दिनमें जन्म लेते हैं रातमें मरते वही ॥ १९ ॥
ज्ञानेश्वरी २३८
आते ही रात्रीका समय । होता है जो उसीमें लय ।
स्वभावसे ही स-समय । अपने आप ॥ ६८ ॥
वृक्ष जैसे लेते बीज रूप । मेघ लेते गगनका रूप ।
औ' अनेकत्व समाता आप । कहलाता जो साम्य ॥ ६९ ॥
परस्तस्मात्तुभावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ २० ॥
इन सबसे अक्षर चैतन्य भिन्न है और वह अक्षर चैतन्य
भक्तिसे प्राप्त होता है—
सम-विषम वहां न दीखता कहीं । इसीलिये भूत यह भाषा भी नहीं ।
जैसे दूध ही बन जाता है दही । नाम रूप रहित ॥ ७० ॥
आकारका होते ही अभाव । जगतका मिटता जगत्व ।
किंतु जिससे होता है तत्त्व । वह रहता ही है ॥ ७१ ॥
इसका नाम सहज अव्यक्त । आकारमें होता है वही व्यक्त ।
यह होता है सापेक्ष सूचित । किंतु है एक ही ॥ ७२ ॥
पिघलाया स्वर्ण होता घन । घनके होते नाना भूषण ।
तब न रहता रूप घन । जब हो अलंकार ॥ ७३ ॥
घन अथवा भूषण । उसका मूल है स्वर्ण ।
जो व्यक्ताव्यक्त कारण । स्थिर-रूपसे ॥ ७४ ॥
न वह व्यक्त या अव्यक्त । न है नित्य न नाशवंत ।
दोनों भावोंसे जो अतीत । अनादि-सिद्ध ॥ ७५ ॥
यह जो विश्व हो कर है बसता । विश्व-नाश होकर भी न नासता ।
जैसे अक्षर पोंछनेसे न मिटता । बोध वैसा ॥ ७६ ॥
जैसे तरंग उठता गिरता । किंतु उदक अखंड रहता ।
वैसे भूत मात्रमें न नाशता । वह अविनाशी तत्व ॥ ७७ ॥
अव्यक्त दूसरा तत्व उस अव्यक्तसे परे ।
नाशसे सब भूतोंके रहे शाश्वत नित्य जो ॥ २० ॥
२३९ सातत्ययोग
पिघलते हैं आभूषण । न गलता उसका स्वर्ण ।
वैसे जीवाकारमें पूर्ण । मर्त्यमें जो अमर ॥ ७८ ॥
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥२१॥
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥२२॥
उस चैतन्यकी व्यक्ताव्यक्तता —
अव्यक्त कहनेसे सकौतुक । स्तुति न होती उसकी सार्थक ।
न आता मन-बुद्धिमें सम्यक । इसी लिये ॥ ७९ ॥
आकारत्व आनेपर जिसका । निराकारत्व न जाता उसका ।
आकार लोपसे भी नित्यताका । न होता लोप ॥ १८० ॥
इसीलिये उसे कहते हैं अक्षर । जिससे बोध होता है सविस्तर ।
न दीखता विस्तार उसके पार । उसका नाम परमगति ॥ ८१ ॥
किंतु मैं देहपुरमें संपूर्ण । रहता हूं निद्रस्तके समान ।
नहीं करता चलन वलन । न करता इसीलिये ॥ ८२ ॥
वैसे शरीरके कोई व्यापार । नहीं रुकते हैं धनुर्धर ।
दस इंद्रियोंके हैं व्यवहार । चलते अव्याहत ॥ ८३ ॥
अंतःकरणके चौराहे पर । लग रहा है विषय-बाजार ।
मिले सुख-दुखका राज कर । मिलता जीवको ही ॥ ८४ ॥
जैसे राजा सुखसे जब सोता । उसका राज-काज न रुकता ।
प्रजा-जन करते सहजता । अपनी इच्छासे ॥ ८५ ॥
वैसे बुद्धिका जानना । मनका है लेना-देना ।
इंद्रियोंका भी करना । तथा स्फुरण वायुका ॥ ८६ ॥
कहा अक्षर अव्यक्त वही है गति अंतिम ।
वही मेरा परं-धाम वहांसे लौटता नहीं ॥ २१ ॥
मिले अनन्य भक्तीसे पार्थ परं-पुरुष जो ।
जिसमें रहते जीव जिससे व्याप्त है जग ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी २४०
वैसे ही सब शरीराचार । न चलते चलते सुंदर ।
जैसे रविके न चलाकर । चलता त्रिलोक ॥ ८७ ॥
अर्जुन ! यह है ऐसा । शरीरमें निद्रित-सा ।
इसीलिये हैं पुरुष । कहते इसको ॥ ८८ ॥
तथा प्रकृति जो पतिव्रता । उसका है यह पत्नीव्रत ।
इसीलिये यह कहलाता । पुरुष है ॥ ८९ ॥
किंतु वेदोंका भी बहुश्रुतपन । देख न सकता इसका अंगन ।
होता यह गगनका आच्छादन । धनुर्धर ॥ ९० ॥
यह जानकर योगीश्वर । उसको कहते परम पर ।
जो है अनन्यगतिका घर । ढूंढकर आते हैं ॥ ९१ ॥
ऐसा यह अक्षर चैतन्य भक्तिसे प्रष्ट होता है—
जिनका तन मन वचन । नहीं सुनता अन्य कथन ।
पकता एक निष्ठाका धान । इस खेतमें ॥ ९२ ॥
यह त्रैलोक्य ही पुरुषोत्तम । ऐसा सच्चा जिनका मनोधर्म ।
वह सदा आस्तिकोंका आश्रम । है धनंजय ॥ ९३ ॥
जो निर्गर्वियोंका मान । गुणातीतका है ज्ञान ।
सुखका है उपवन । निरिच्छोंका ॥ ९४ ॥
संतोषका परोसा जो पक्वान्न । अचित अनाथोंका मातृ-स्थान ।
भक्ति-नगरका पथ महान । सरल सुलभ ॥ ९५ ॥
यह एकेक कह कर । खोयें क्यों काल धनुर्धर ।
वहां जानेसे वह ठौर । होता है स्वयं ॥ ९६ ॥
जैसे हिम-शीतकी लहर । शीतल करता तप्त नीर ।
या सूर्य सम्मुख आ अंधार । होता प्रकाश ॥ ९७ ॥
वैसे संसार भी अर्जुन । पहुंचकर संपूर्ण ।
बनता है मोक्ष स्थान । अनायास ॥ ९८ ॥
अग्नि-कुंडमें जैसे जो आया । वह ईंघन ही अग्नि भया ।
चुनकर भी हाथ न आया । काष्ठपन फिर ॥ ९९ ॥
२४१
(31) साधकसंदेश
जैसे डली जो गूहकी । रूप न लेती ईखकी ।
बुध्दिमंत ले बुध्दिकी । कितनी थाह ॥ २०० ॥
अथवा लोहका कनक भया । यह पारसने सहज किया ।
फिर उसका लोहपन आया । यह असंभव ॥ १ ॥
घृत बनकर एक बार । असंभव फिर होना क्षीर ।
वैसे ही वह धाम पाकर । नहीं पुनरावर्तन ॥ २ ॥
ऐसा वह मेरा परम । निजधाम सर्वोत्तम ।
अंतःकरणका मर्म । कहता तुझसे ॥ ३ ॥
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥ २३ ॥
मृत्यु समयकी दो स्थितियां-
इसको जाननेका प्रकार । अति सुलभ है इक और ।
देह त्यागके स-अवसर । पाते योगीजन ॥ ४ ॥
अकस्मात ऐसा भी घड़ता । अनवसर तन गिरता ।
तब है पुनः आना पड़ता । देहमें उन्हें ॥ ५ ॥
देह छोड़कर सकाल । ब्रह्म होते हैं वे तत्काल ।
देह छोड़कर अकाल । आते संसारमें ॥ ६ ॥
सायुज्य तथा पुनरावर्तन । वह है सब अवसराधीन ।
वह अवसर कहूं महान । तुझसे अब ॥ ७ ॥
अब तू सुन अर्जुन । मृत्यूके नशेमें जान ।
पांचों करते प्रयाण । अपनी राहसे ॥ ८ ॥
होता है प्रयाणकाल प्राप्त । न होती है बुद्धि भ्रम-ग्रस्त ।
तथा न होता सब विस्मृत । न डरता मन ॥ ९ ॥
किस काल गए। कैसे तजके देह साधक ।
आता है या न आता है कहता मैं सुनो अब ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी २४२
यह चेतन-वर्ग संपूर्ण । मरण कालमें भी नवीन ।
आकलनसे होता प्रसन्न । ब्रह्म बोधके ॥ २१० ॥
चैतन्य-वर्गका सचेतन । कालमें होता मरणासन्न ।
अग्नि-सहायतासे जान । संभव होता ॥ ११ ॥
हवा या पानीसे जब । बुझती है ज्योति तब ।
देखती क्यों दृष्टि कब । अपनी ही ॥ १२ ॥
वैसे देहावसानकी विषमतासे । देह भरता है अंतरबाह्य श्लेष्मसे ।
तेज बुझता तब अग्निका उससे । सहज धनुर्धर ॥ १३ ॥
न रहता जब प्राणका प्राण । न होता है चेतन्य अग्नि बिन ।
तब रहकर सतेज ज्ञान । क्या होगा शरीरमें ॥ १४ ॥
जब है शरीरका अग्नि जाता । केवल वह कीचड रहता ।
तनमें तब खोजता रहता । मृत्यु घटिका ॥ १५ ॥
पूर्व स्मरण जहां संपूर्ण । थाम लेता कालमें प्रयाण ।
शरीर त्यज ब्रह्म-निर्वाण । पाना स्वरूपमें ॥ १६ ॥
किंतु कीचमें देह श्लेष्मकी । फंसी तब शक्ति चेतनाकी ।
कैसी बात भूत-भविष्यकी । रहेगी स्मरण ॥ १७ ॥
अजी ! जीवन भरका अभ्यास । भूल गया अंतकालमें खास ।
जैसे थाथी देखते ही प्रकाश । बुझा हाथका ॥ १८ ॥
रहने दो यह सकल । ज्ञानको अग्नि ही है मूल ।
अग्निका ही है पूर्ण बल । प्रयाण कालमें ॥ १९ ॥
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥ २४ ॥
अंदर अग्नि-ज्योतिका प्रकाश । बाहर शुक्ल पक्ष औ' दिवस ।
तथा षण्मासोंमें कोई भी मास । उत्तरायणका ॥ २२० ॥
अग्निसे दिन शुक्लार्ध जोडके उत्तरायण ।
जाता जो जुडता ब्रह्म अंतमें ब्रह्म जानके ॥ २४ ॥
२४३ वाक्यप्रबोध
मृत्युसमयकी पहली स्थिति-चैतन्यप्रधान, प्रकाश प्रधान—
ऐसे समय-योगमें नियत । होता है जिसका देहपात ।
जो ब्रह्म-विद करता प्राप्त । परमपद ॥ २१ ॥
सुन तू अब धनुर्धर । सामर्थ्य जो सु-अवसर ।
सरल मार्ग है स्वपुर । पहुंचनेका ॥ २२ ॥
अग्नि प्रथम पावरी । ज्योतिर्मयता दूसरी ।
तथा दिवस तीसरी । शुक्लपक्ष ॥ २३ ॥
तथा षण्मास उत्तरायण । वह है ऊपरका सोपान ।
पाते हैं सायुज्य-सिद्धिदिन । इससे योगी ॥ २४ ॥
उत्तम काल है बहुत । कहलाता अर्चिरा पथ ।
कहता हूं अकाल पार्थ । सुन तू अब ॥ २५ ॥
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥ २५ ॥
तम प्रधान मृत्यु समय—
समयमें जब प्रयाणके । उभार आवे वात-श्लेष्मके ।
आवरण हो अंधःकारके । अंतःकरणपे ॥ २६ ॥
इंद्रियां होती जैसे काष्ठ । स्मृति होती भ्रममें नष्ट ।
मन होता है पथ भ्रष्ट । तथा घुटता प्राण ॥ २७ ॥
मिटता अग्निका अग्निपन । रहता है धूम्र ही संपूर्ण ।
जिसमें चेतनाकी घुटन । होती शरीरमें ॥ २८ ॥
जैसे चंद्रपर बादल । आता है घना औ' सजल ।
तब ना घना या उज्ज्वल । रहता प्रकाश ॥ २९ ॥
न मरता वह न सावध । जीवितसह पडता स्तब्ध ।
ऐसी आयु-कालकी मर्याद- । प्रतीक्षामें रहता ॥ २३० ॥
धूमसे रात कृष्णार्ध जोड़के दक्षिणायन ।
जाता जो लौटता पीछे पहुंचे चंद्र-लोकको ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी २४४
जहां मन-बुद्धि-करण । डूबा धूम कुलावरण ।
वहां अनुभवका ज्ञान । डूबा जीवनका ॥ ३१ ॥
जहां हाथका भी जाता । वहां लाभकी क्या कथा ।
प्रयाणकाल अवस्था । होती ऐसे ॥ ३२ ॥
यहां देहमें ऐसी स्थिति । वहां कृष्ण पक्ष औ' रात ।
षण्मासमें घटिका आती । दक्षिणायनकी ॥ ३३ ॥
जब पुनरावर्तनका घर । प्रयाण समयमें जाता भर ।
तब स्वरूप-सिद्धि समाचार । सुने कौन ॥ ३४ ॥
ऐसा जिस योगीका शरीर पडता । योगी होनेसे चंद्रलोक ही मिलता ।
वहांसे फिर पुनरावर्तन होता । संसारमें ॥ ३५ ॥
कहा मैने अनाल अर्जुन । वह यही है इसको जान ।
धूम्रमार्ग पुनरावर्तन । यही है जो ॥ ३६ ॥
यहां वह अर्चिरामार्ग । चलता हुआ औ' सलग ।
सहज सुलभ सुभग । मोक्ष-दायक ॥ ३७ ॥
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥ २६ ॥
किंतु जो सद्रूप है वह किसी मार्गसे आय तो भी ब्रह्मपद पाता है -
ये दो ऐसे अनादि पथ । सरल तथा टेढा पार्थ ।
तभी बताये मैंने सार्थ । तुझको अब ॥ ३८ ॥
क्यों कि मार्ग अमार्ग देखना । सच्चा झूठा यह जान लेना ।
हित अहित समझलेना । अपने हितार्थ ॥ ३९ ॥
कोई भली नांव छोडकर । कूदेगा क्या नदीके भीतर ।
तथा सीधी राह जानकर । चलेगा क्या कुपथ ॥ २४० ॥
जानता जो विष औ' अमृत । छोडता है क्या वह अमृत ।
वैसा कोई छोड सीधा पथ । चलें क्यों टेढा ॥ ४१ ॥
प्रकाश और अंधार दोनों मार्ग अनादि हैं ।
निस्तार करता एक घेरेमें एक डालता ॥ २६ ॥
२४५ आत्मबोध
इसीलिये अर्जुन प्रथम । जानना उत्तम अधम ।
जाननेसे समयमें काम । होगा सब व्यर्थ ॥ ४२ ॥
वैसे देहांतमें बडा विषम । इन मार्गोंका है बडा संभ्रम ।
जीवन भर अभ्यासका काम । होगा सब व्यर्थ ॥ ४३ ॥
अर्चिरा मार्ग भूलकर । पडे तो धूम्र पथपर ।
पडेंगे संसार-सागर । भंवर-चक्रमैं ॥ ४४ ॥
देख कर ये बडे सायास । किस भांति मिटेंगे त्रास ।
सोचकर यह पथ खास । कहा जायेगा ॥ ४५ ॥
ऐसे ब्रह्मपद महान । दूसरेसे पुनरावर्तन ।
वैसे अंतकालका क्षण । जैसा हो वैसा मिलेगा ॥ ४६ ॥
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥ २७ ॥
तब कहे देव यह नहीं ऐसा । कब क्या मिलेगा जाने कोन कैसा ।
देह-पातसे ब्रह्म बनता जैसा । रहा मार्गसे ही ॥ ४७ ॥
तब रहे या जाये यह तन । हम वह ब्रह्म है यह जान ।
डोरीपे सर्पत्वका आरोपण । मिथ्या है इसलिये ॥ ४८ ॥
मुझे तरलपन है या नहीं । भासता क्या यह पानीको कहीं ।
पानी जो है पानी ही कभी कहीं । वैसे ही पार्थ ॥ ४९ ॥
तरंगाकारसे न जन्मता । तरंग लोपसे न मरता ।
देहमें रहते ब्रह्म होता । देहसे जो ॥ २५० ॥
शरीरत्व नहीं रहा खास । अब उन तत्वज्ञोंके पास ।
भला होगा क्या किसका नाश । इसमें क्या रहा ॥ ५१ ॥
देशकालादि यदि संपूर्ण । भये आपही जब तत्क्षण ।
फिर पथका अनुसंधान । रहा किसके लिये ॥ ५२ ॥
ऐसे जो जानके मार्ग योगी होता न मोहित ।
तभी तू सर्वदा पार्थ योगसे युक्त हो रह ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी २४६
अजी ! जब यह घंट फूटता । घटाकाश है राहमें लगता ।
वह महदाकाशमें मिलता । या रहता वहीं ॥ ५३ ॥
यहां है ऐसा प्रकार । मिटता मात्र आकार ।
गगन है एकाकार । सदा सर्वत्र ॥ ५४ ॥
होता है जब यह बोध । न रहता मार्गका द्वैध ।
बनने पर सोऽहं सिद्ध । योगियोंको ॥ ५५ ॥
इसका कारण पांडुसुत । तुम्हे बनना योग-युक्त ।
जिससे सर्वदा समता । रहगी अपनेमें ॥ ५६ ॥
तबहो कुछ भी कभी । देह बंध हो न हो तभी ।
अखंड ब्रह्म बोध कभी । न बिगडेगा ॥ ५७॥
सभी प्रकारके मोहसे मुक्त मनुष्य—
वह कल्पारंभमें न जनमता । कल्पांतमें भी वह नहीं मरता ।
स्वर्ग संसारादिमें नहीं फंसता । सृष्टि-कालमें ॥ ५८ ॥
जिस बोधसे वह योगी बनता । उसकी सरलता अनुभवता ।
अन्य भोगोंको तौलकर तजता । स्वरूपावस्थामें ॥ ५९ ॥
अर्जुन इंद्रादि देव । मानते अपना सर्वस्व ।
वह राज्य-भोग वैभव । मानता तुच्छ ॥ २६० ॥
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव
दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा
योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८ ॥
जो वेदका यज्ञ तथा तपोंका
दानादिका पुण्य कहा गया है ।
जो लांघता सर्व हि जानके तो
योगी चढे आद्य महान धाम ॥ २८ ॥
२४५ शांतत्ययोग
यदि पुण्य वेदाध्ययनका । तथा बहार यज्ञ-फलका ।
प्राप्त सर्वस्व तप दानका । धनंजय ॥ ६१ ॥
मिलकर सब पुण्यका खेत । बहर पकने पर भी पार्थ ।
ब्रह्मानंदकी तुलनामें व्यर्थ । जो नित्य निर्मल ॥ ६२ ॥
तुलनामें जो नित्यानंदके । तुलामें डाले तो उपमाके ।
थोड़ा नहीं है उस सुखके । साधन यज्ञादि हैं ॥ ६३ ॥
न नासता जो न खूटता । भोगीको सदा तृप्ति देता ।
भावी महा-सुखका होता । बंधुही यह ॥ ६४ ॥
ऐसे जिस दृश्य सुखका । अधिष्ठान हैं संसारका ।
प्राप्तव्य है शत-मखका । न मिलता कभी ॥ ६५ ॥
उस अलौकिकको योगीश्वर । तोलता है हथेली पर ।
स-कौतुक अनुमान कर । कहता हलका ॥ ६६ ॥
फिर जिस सुखका अर्जुन । रचकर भलासा सोपान ।
प्राप्त करता है सिंहासन । ब्रह्म-सुखका ॥ ६७ ॥
ज्ञानेश्वरका उपसंहार—
ऐसा जो चराचरैक्य भाग्य । ब्रह्मेशके आराधना योग्य ।
योगी जनके महायोग्य । योग धन जो ॥ ६८ ॥
वह सकल कलाकी कला । परमानंदका है पुतला ।
जीवोंका परम जिव्हाला । विश्वके जो ॥ ६९ ॥
सर्वज्ञताका है जो जीवन । यादव कुलदीप पावन ।
बोला धनंजयसे श्रीकृष्ण । इस भांति ॥ २७० ॥
कुरु क्षेत्रकी ऐसी कथा । संजय राजासे कहता ।
उसीको है आगे सुनाता । ज्ञानदेव निवृत्तिदास ॥ २७१ ॥
गीता श्लोक २८
ज्ञानेश्वरी ओवी २७१.
राज-विद्या = समर्पणयोग
९
पित्र-रूपमें गुरु-वंदन—
अजी ! ध्यानसे चित दीजिये । सब सुखका पात्र बनिये ।
प्रतिज्ञोत्तर यह सुनिये । प्रकट बात ॥ १ ॥
प्रौढ़तासे यह नहीं बोलता । आप सर्वज्ञोंसे स-ममता ।
ध्यान दें यह विनय करता । सर्वज्ञ-समाजसे ॥ २ ॥
लाड़लेके सब लाड़ पूर्ण होते । सब ही मनोरथ संपन्न होते ।
मातापिता जब हैं श्रीमंत होते । आपके समान ॥ ३ ॥
आपकी कृपा-दृष्टिके रससे । प्रसन्नताका बाग खिलनेसे ।
उसकी छायामें सोता, सुखसे । शांत जो मैं ॥ ४ ॥
प्रभु आप हैं सुखामृतके सागर । हम पाते शीतलता इच्छानुसार ।
यहां पर भी स्नेहार्थ सकुचाकर । कहां पायें शांति ॥ ५ ॥
यों तो बालक तुतलाता । टेढ़ा मेढ़ा पग रखता ।
उससे स-कौतुक माता । रीझती सदा ॥ ६ ॥
वैसा आप सन्तोंका प्रेम । चाहते जिसे सदा हम ।
इसीलिये करते प्रेम । श्री चरणोंमें ॥ ७ ॥
बोलनेमें क्या है मेरी योग्यता । जहां सर्वज्ञ भावा-दृश श्रोता ।
सरस्वती सुत है क्या सीखता । देकर पाठ ॥ ८ ॥
कितना ही बड़ा क्यों न हो ज्योतिरिंगण । नहीं प्रकाशता भानुबिंबके समान ।
नहीं मिलता अमृत थाळ सम पकवान्न । उसका उपाय क्या ? ॥ ९ ॥
(32)
हिमकरको पंखा झलना । नाद-ब्रह्मको गाना सुनाना ।
अथवा भूषणको सजाना । होता क्या ऐसा ? ॥ १० ॥
कहिए सुगंधको क्या सूंघना । सागरको कहां स्नान कराना ।
आकाशको जिसमें समाना । क्या लावें ऐसा ॥ ११ ॥
आप सब जिससे तृप्त होंगे । जिसको सु-प्रवचन कहेंगे ।
सुनके मनमें प्रसन्न होंगे । ऐसा वक्तृत्व कहां ? ॥ १२ ॥
किंतु प्रकट होते ही गभस्ति । न उतारते क्या हाथ आरती ।
न देते क्या अर्ध्यांजलि स-भक्ति । महा-सागरको ॥ १३ ॥
आप हैं स्वामी महेशकी मूर्ति । दुबला मैं पूजता हूँ स-भक्ति ।
तभी बिल्व छोड़ दूं गंगावती । स्वीकार करेंगे ॥ १४ ॥
पिताकी थालमें हाथ डाल कर । खिलाता शिशु जब पिताको कौर ।
प्रेम-भरसे तब पिता सत्वर । झुकके खोलता मुख ॥ १५ ॥
वैसा मैं करता हूँ आपसे । तुतलाता हूँ बाल-मतिसे ।
तथा सुनते आप मोदसे । यह है प्रेम-भाव ॥ १६ ॥
ऐसी आत्मीयतासे मोहित । सन्त-समूह है अति-ग्रस्त ।
नहीं होगा स्नेहका किंचित् । भार आपको ॥ १७ ॥
आघात करता जब शिशुका मुख । प्रेमार्द्र-माता स्तन्य देती अधिक ।
रोषसे बढ़ता सदा प्रेम अधिक । प्रिय-वस्तुके ॥ १८ ॥
मुझ बालकका यह वचन । आपका निद्रस्त कृपालूपन ।
जागृत करेगा यह मैं जान । बोला हूँ आपसे ॥ १९ ॥
कार्यकी और गुरु-कृपाकी महत्ता—
पकाते क्या कभी पालमें चांदनीको । पंखेसे गति देते हैं क्या पवनको ।
खोल चढ़ाते कैसे कहो गगनको । मुझसे आप ॥ २० ॥
तरल नहीं करना पड़ता पानी । नवनीतमें नहीं पैठती मथनी ।
लज्जित हो अभिव्यक्त न होती वाणी । आपके सम्मुख ॥ २१ ॥
शब्द-ब्रह्म जिस खटौले पर । सोता है शब्द कुंठित हो कर ।
देश-भाषामें यह गीता-सार । कहनेकी योग्यता क्या ? ॥ २२ ॥
ज्ञानेश्वरी २५०