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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

विश्वमें जो सकल समस्त । योगी है वह सुन तू पार्थ । कर्म करके भी जो आसक्त । फलमें नहीं होता ॥ ४३ ॥ भूमि जैसे उपजाती उद्बीज । बिना अहंभावके ही सहज । न करती कभी उसके बीज । अपेक्षा वह ॥ ४४ ॥ वैसे है कुल-धर्मका आधार । वर्ण धर्मानुसार है आचार । करता जो यहां स-अवसर । वही सभी ॥ ४५ ॥ करता रहता है उचित । किंतु कर्तव्य-भाव रहित । तथा फल विन्मुख हो चित । अन्तःकरणसे ॥ ४६ ॥ सुन तू अर्जुन मेरी बात । रहता ऐसा संन्यासी नित । मानो उस विश्वाससे नित । योगीश्वर ॥ ४७ ॥ तथा उचित कर्म प्रासंगिक । छोडते उसे कहके बहूक । किंतु तुरंत दूसरा ही एक । करते प्रारंभ ॥ ४८ ॥ जैसे एक लेप धोकर । लगाते दूसरा तन पर । वैसे आग्रहसे निरंतर । कष्टमें पडते ॥ ४९ ॥ अजी ! गृहस्थाश्रमका बोझ । आया जो सिरपर सहज । वहां संन्यासका रख साज । चलते आगे ॥ ५० ॥ तभी वे अग्नि सेवाको नहीं छोड़ते । कर्म-रेखाका उल्लंघन न करते । योग-सुखको हैं अनुभव करते । सहज भावसे ॥ ५१ ॥ उच्च स्थितिकी प्राप्तिकेलिये अष्टांग योगकी सीढ़ियां— यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पांडव । न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन ॥ २ ॥ योगी जो है वही संन्यासी । विश्वमें एक-वाक्यता-सी । ध्वज गाड़के कही जैसी । शास्त्रोंने सभी ॥ ५२ ॥ संन्यास जो कहा जाता उसीको योग जान तू । योगी होता नहीं कोयी बिना संकल्प त्यागके ॥ २ ॥ ज्ञानेश्वरी १५६

जहां संन्यस्तका संकल्प टूटता । वहीं योगका सार-तत्व मिलता । अनुभवसे ऐसा है जो घड़ता । वही योगी औ' संन्यासी ॥ ५३ ॥ आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते । योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ ३ ॥ योगाचलके जो शिखरपर । चढ़ना चाहे वह निरंतर । कर्म-पथ सोपान धनुर्धर । न छोड़ता कभी ॥ ५४ ॥ यम नियमकी है तरायीसे । आसनादिककी पगडंडीसे । प्राणायाम टेकडी लांघनेसे । पहुंचता है वहां ॥ ५५ ॥ टूटा पहाड़ खड़ा प्रत्याहारका । फिसलता वहांसे पैर बुद्धिका । टूटता वहां बंध प्रतिज्ञाका । योगीका भी ॥ ५६ ॥ वहां अभ्यासके बलसे । वैराग्यके कसे पंजोंसे । चिपकके प्रत्याहारसे । हौलेसे चढ़ना ॥ ५७ ॥ पवन वाहनसे ऐसे । धारणाके राज पथसे । ध्यानके शिखर पारसे । होना पार ॥ ५८ ॥ फिर उस पथकी है दौड़ । मिटेगी प्रवृत्तिकी जो होड़ । होगा साध्य साधनका गाढ़ । आलिंगनैक्य ॥ ५९ ॥ रुकती जहां भविष्यकी प्रवृत्ति । मिटती है वहां भूतकी भी स्मृति । इसी भूमिका पर है होती स्थिति । कहता हूं सुन ॥ ६० ॥ इन उपायोंसे जो योगारूढ । होके परिपूर्ण अखंड प्रौढ । हुए उसके लक्षण प्रौढ़ । कहता हूं सुन ॥ ६१ ॥ यदाहि नेंद्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥ ४ ॥ योगपे चढ़ जानेमें कर्म कारण है कहा । योगपे चढ़ जानेपे शम साधन है कहा ॥ ३ ॥ न लीप़ता कर्मसे जो विषयोंमें विरक्त है । संकल्प छूटते सारे योगारूढ हुआ जब ॥ ४ ॥ १५७ आत्म-संयमयोग

इंद्रियोंद्वारा सतत कर्म, अंतर्यामी नैष्कर्म्य— अजी ! इंद्रियोंके घरमें जिसके । आना जाना नहीं विषयोंके । तथा कक्षमें जो आत्मबोधके । सोता रहता है ॥ ६२ ॥ आघातोंके सुखदुःखसे । जगता नहीं मानस जिसके । स्पर्शसे भी विषयादिकोंके । न होता स्मरण ॥ ६३ ॥ इंद्रियां जिसकी कर्ममें । रत होती दिन रातमें । फलाशा अंतःकरणमें । न जगती कभी ॥ ६४ ॥ देहधारी वह रहकर । करता है ऐसा व्यवहार । जागृत रहकर सोकर । योगारूढ ॥ ६५ ॥ अर्जुन कहता है अनंत । सुनकर होता हूं वह चकित । कहां उसमें यह योग्यता । आती कहांसे ॥ ६६ ॥ उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ५ ॥ यह स्थिति स्वयं प्राप्त करनी होती है — स्मित कर कृष्णका कहना । अचरजका तेरा बोलना । किसको किसका लेना देना । अद्वैतमें यहां ॥ ६७ ॥ अविवेककी शैय्या पर । अविद्या निद्रामें सोकर । शिशु देखे स्वप्न भयंकर । जन्म मृत्युका ॥६८ ॥ होता है फिर अकस्मात् जागृत । तब होती है स्वप्नकी व्यर्थ बात । आता है यही अनुभव सतत । अपनेको ही ॥ ६९ ॥ इसीलिये आप ही है अपना । घात करते रहते अर्जुन । चित्त देकरके देहाभिमान । जो है निरर्थक ॥ ७० ॥ उभारना अपनी आत्मा न देना गिरने कभी । आप ही अपना बंधु आपही शत्रु आपका ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी १५८

बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः । अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥ ६ ॥ ऐसा सोचके अहम्‌को त्यागना । फिर वस्तुका दर्शन करना । इससे होगा कल्याण अपना । आपने किया ऐसा ॥ ७१ ॥ नहीं तो कोशकीटक जैसे । बने अपना वैरी आप जैसे । तन पर आत्म-भाव रखनेसे । बनते हैं नित ॥ ७२ ॥ प्राप्ति वेलामें दैव हीनकी । चाह होती है अंधत्वकी । तथा अपनी ही आंखोकी । मिटती दृष्टि ॥ ७३ ॥ कभी कोई कहता भ्रमसे । यह मैं नहीं चुराया ऐसे । अंतःकरणमें फंसे फंदसे । अपनी कल्पनाके ॥ ७४ ॥ देखें तो वह पहले जैसा । किंतु न जानती बुद्धि ऐसा । स्वप्नके घावसे कोई जैसा । मरता नहीं ॥ ७५ ॥ अंग भारसे झुकके जैसे । नलिका घूमती उलटके । शुक बैठे उसे पकडके । न उडता शंकासे ॥ ७६ ॥ व्यर्थ ही चहूं ओर देखता । संकोचसे नली पकडता । वही कसकर पकड़ता । पैरोंसे शुक ॥ ७७ ॥ अपनेको बंधनमें मानकर । भावनासे स्वयं जकड़कर । पैरोंसे पकड़ता है कसकर । मुक्त होकर भी ॥ ७८ ॥ कारणके बिन जकड़ा हुआ । किसीसे क्या वह बंधा हुआ । खींचने पर भी पकड़ा हुआ । रहता सतत ॥ ७९ ॥ ऐसा रिपु है अपने आप । जिसने बढ़ाये हैं संकल्प । न लेता मिथ्याभिमान आप । वह है बंधु अपना ॥ ८० ॥ जीतता अपने आप आपही अपना सखा । छोडा यदि उसे स्वैर अपना शत्रु है बना ॥ ६ ॥ १५९ आत्म-संयमयोग

जितात्मनः प्रशांतस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्ण सुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥ ७॥ आत्मज्ञका वर्णन — उस स्वांतःकरणजित । सकल कामनाविसे शांत । परमात्म उसके सतत । रहता सपीप ॥ ८१ ॥ जलानेसे सोना हीन कस । होता है जो विशुद्ध सरस । वैसा जीवका ब्रह्मत्व खास । मिले संकल्प लोपसे ॥ ८२ ॥ घटाकारके मिटनेपर जैसे । घटाकाश मिलनेमें आकाशसे । जाना नहीं लगता अन्यत्र जैसे । वैसे अर्जुन ॥ ८३ ॥ नाश हुआ देहाहंकारका । कारणोंके सहित मूलका । वास सर्वत्र परमात्माका । अनादि सिद्ध है ॥ ८४ ॥ शीत उष्ण आदिका द्वंद्व । औ' सुख दुःखका चुनाव । मानापमान अनुभव । नहीं वहां ॥ ८५ ॥ जिस दिशामें जाता है भास्कर । प्रकाश फैलाता है उसी ओर । जिसका स्वरूप है वही स्थिर । दीखता सतत ॥ ८६ ॥ मेघसे गिरी वर्षाकी धार । न चुभे जैसे कभी सागर । वैसे शुभाशुभ योगेश्वर । नहीं अनुभवता ॥ ८७ ॥ ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः । युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥ ८ ॥ जो है यह विज्ञानात्मक भव । सोचनेसे व्यर्थत्व अनुभव । फिर हुआ अपना अनुभाव । वही ज्ञान है ॥ ८८ ॥ हुवा शांत जितात्मा जो देखता ब्रह्म केवल । शीतोष्ण सुख औ' दुःख मानापमानमें नित ॥ ७ ॥ ज्ञान विज्ञानमें तृप्त स्थिर इंद्रिय जीतके । देखता सम जो योगी सोना पाषाण मृत्तिका ॥ ८ । ज्ञानेश्वरी १९०

मैं अमर्याद या मर्यादित । इसकी चर्चा भी हुई व्यर्थ अनुभवमें न आता द्वैत । इसीलिये ॥ ८९ ॥ शरीर है किंतु कौतुक । परब्रह्म-धाम है नेक । जिन्होंने जीत लिया देख । इंद्रियोंको ॥ ९० ॥ जो है जितेंद्रिय सहज । वही योग-युक्त समझ । वहां छोटे मोटेका दूज । कभी नहीं ॥ ९१ ॥ सोनेका मेरु पर्वत । माटीका ढेर या पात । मानता समान नित । समदृष्टिसे ॥ ९२ ॥ पृथ्वीके मोलका प्रसिद्ध । रत्न पाता जो शुद्ध । तथा पत्थर भी असिद्ध । एक जैसा ॥ ९३ ॥ सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबंधुषु । साधुष्वपिच पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥ ९ सुहृद और शत्रु । उदास और मित्र । भेदाभेद विचित्र । कल्पना नहीं ॥ ९४ ॥ या बंधु है कौन उसका । द्वेष करे कौन किसका । मैं हूँ विश्व ऐसा जिसका । हुआ अनुभव ॥ ९५ ॥ कहो कैसे फिर उसकी दृष्टि । जाने अधम उत्तम किरीटी । दिखाये कैसे पारस कसौटी । सोना औ' लोहकी ॥ ९६ ॥ विवर्णको सुवर्ण करता पारस । वैसे चराचरसे होता समरस । बुद्धिमें समता रहती है सरस । निरंतर उसकी ॥ ९७ ॥ विश्वालंकारके प्रकार । अनेक रूपके आकार । मूलमें स्वर्ण है धनुर्धर । परब्रह्म रूप ॥ ९८ ॥ प्राप्त जिसे ऐसा उत्तम ज्ञान । नाना प्रकार देख असमान । नहीं फंसता वह बुद्धिमान । आकार-जालमें ॥ ९९ ॥ शत्रु मित्र उदासीन मध्यस्थ आप्त औ' पर । साधु या पातकीमें भी सम-बुद्धि विशिष्ट सो ॥ ९ ॥ १६१ आत्मसंयम योग (21)

डालनेसे वस्त्रपर दृष्टि । दीखती सभी सूतकी सृष्टि । वहां है नहीं दूसरी गोष्टि । सूतके बिना ॥ १०० ॥ ऐसा प्रतीत जो है करता । अनुभव ऐसा जहां होता । वही समबुद्धि कहलाता । नहीं अन्य ॥ १ ॥ होता है वह तीर्थ-राज समान । उसके दर्शनसे हो समाधान । होता संगसे ब्रह्मभावका ज्ञान । अनिच्छुको भी ॥ २ ॥ धर्मका सारथ्य करती है उसकी गोष्टि । महा-सिद्धिको जन्म देती उसकी दृष्टि । स्वर्गादि सुखकी करना है नव-सृष्टि । खेल है उसको ॥ ३ ॥ यदि कोई सहज स्मरता । देते हैं वे अपनी योग्यता । उनकी प्रशंसा स्वभावता । देती शुभ-लाभ ॥ ४ ॥ योगी युञ्जीत सततम् आत्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥ १० ॥ कभी अस्त न होगा ऐसे । देखा अद्वैत दिवससे । आप रहता है अपनेसे । अखंडित ॥ ५ ॥ इस दृष्टिसे वह विवेकी है । अर्जुन जो एकाकी रहता है । त्रिभुवनमें वही होनेसे है । सहज अपरिग्रही ॥ ६ ॥ ऐसे हैं जो असाधारण । प्राप्त पुरुषके लक्षण । सर्वज्ञताके ही कारण । श्री कृष्ण कहता ॥ ७ ॥ यह है ज्ञानियोंका बाप । सबकी दृष्टिका है दीप । उसका समर्थ संकल्प । रचता विश्वको ॥ ८ ॥ हाटमें है जो प्रणवके । वस्त्र बना शब्द-ब्रह्मके । लपेट न सका उसके । यशसे छोटा बड़ा ॥ ९ ॥ उसकी है अंगकी कांतिसे । प्रकाशते रवि-शशि ऐसे । विश्व क्या उसके प्रकाशसे । ओझल है पार्थ ॥ ११० ॥

इच्छा संग्रहको छोड़ चित्तको करके वश । आत्मामें ही सदा लीन रहा एकांत भावसे ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी १६२

जिसके नामके ही सम्मुख । आकाश लगता बौना देख । उसका गुण तू एक एक । कैसा जानेगा ? ॥ ११ ॥ इसीलिये ऐसा वर्णन । न जाने किसके लक्षण । कहनेके बहाने मान । कहे हैं यहां ॥ १२ ॥ श्रीकृष्णका भक्त प्रेम -- सुनोजी द्वैतका म्यान मान । नष्ट करता है ब्रह्म-ज्ञान । उससे सख्य माधुरी जान । नष्ट होगी ॥ १३ ॥ इसीलिये हरिका यह बोलना । मानो हलकासा परदा रखना । मनके सख्य सुखको हे भोगना । द्वैत भावसे ॥ १४ ॥ जिसका सोऽहं भावका रोक । मोक्ष सुखार्थ बने जो रंक । उनकी दृष्टिका हे कलंक । लगेगा तेरे प्रेमको ॥ १५ ॥ इसका अहंभाव जायेगा । यदि यह मैं ही हो जायेगा। मैं अकेला ही कैसा रहूंगा । सोचता है हरि ॥ १६ ॥ दृष्टिसे देख कर सुखी होना । या सुखसे मनसोक्त बोलना । या प्रेमसे आलिंगन करना । किसको फिर ॥ १७ ॥ या अपने मनकी सुंदर । बात कहें किससे मधुर । हुआ यदि यह धनुर्धर । मुझमें समरसैक्य ॥ १८ ॥ द्वयनीय भावसे जनार्दन । अन्योपदेश रूपसे ही मान । बोलनेमें किया मनमोहन । आलिंगन पार्थका ॥ १९ ॥ सुननेमें यह किंचित्कठिण । फिर भी है यह स्पष्ट ही जान । श्रीकृष्ण रूपकी मूर्ति अर्जुन । है ढली हुई ॥ १२० ॥ अर्जुनकी प्रशंसा — जैसे ही आयूके अंतमें । पुत्रजन्म होता है बांझमें । फिर वह मोहत्रयमें । नाचने लगती है ॥ २१ ॥ ऐसा हुआ है अनंत । यह मैं नहीं कहता । यदि मैं नहीं देखता । प्रेमातिशय ॥ २२ ॥ १६३ आत्मसंयम-योग

देखो कैसा है यह अचरज । कहां उपदेश औ' कहां झुंज । परंतु यहां है प्रेमका भोज । नाचता जो ॥ २३ ॥ अजी ! लाज लज्जा है प्रेममें । तथा थकान है व्यसनमें । भ्रम नहीं जो पगलाईमें । यह होगा कैसे ॥ २४ ॥ इसका भावार्थ है ऐसा । पार्थ भक्तिका आश्रयसा । सुख श्रंगारके मानस-सा । दर्पण रूपमें ॥ २५ ॥ ऐसा है यह पुण्य पवित्र । विश्वमें भक्ति बीज सुक्षेत्र । तभी है श्रीकृष्ण-कृपा पात्र । त्रिभुवनमें ॥ २६ ॥ आत्म निवेदनकी नींवका । आधार पीठ है जो सख्यका । पार्थ है अधिष्ठान उसका । मुख्य देवता ॥ २७ ॥ पास ही है प्रभु उसका वर्णन । छोड़ करते हैं भक्त-गुणगान । भाता है ऐसा स्वभावका अर्जुन । श्रीहरिको सहज ॥ २८ ॥ भजती जैसे पतिको प्रीतिसे । पाती मान्यता प्रीतिकी पतिसे । वर्णन ऐसी सतीका पतिसे । होना स्वाभाविक ॥ २९ ॥ अर्जुनका ऐसा गुणगान । चाहता विशेष मेरा मन । त्रिभुवनका भाग्य महान् । पार्थमें बसता ॥ १३० ॥ जिसके प्रेमके कारण । निर्गुण हो आता सगुण । तथा सकल गुणपूर्ण । अनुभवता प्रेम-पीड़ा ॥ ३१ ॥ श्रोताओंकी ओरसे वक्ताका यशोगान-- कहते तब श्रोता हमारा भाग्य । कैसा बोलना यह सहज योग्य । शब्द शोभा आयी पाकर विजय । नाद-ब्रह्मपर ॥ ३२ ॥ आश्चर्यजी गगनमें देश-भाषाके । प्रकार प्रकटते साहित्य रंगके । खिल आयी हिंदी ऐसे अलंकारके । वैभवानंदमें ॥ ३३ ॥ छटकी है ज्ञान चांदनी कैसी । भावार्थ दे प्रिय शीतलतासी । खिली श्लोकार्थ कुमुदिनी ऐसी । सहज रूपसे ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी १६४

चाह होती इससे निरिच्छोंमें । मन होता वचन सुननेमें । तथा डुलते हैं अंतरंगमें । ज्ञान प्रकाशसे ॥ ३५ ॥ ज्ञानेश्वर कृत कृष्ण वर्णन- निवृत्तिशासने यह जाना । फिर कहा ध्यान सब देना । पांडव कुलमें कृष्ण दिन । हुआ उदय ॥ ३६ ॥ देवकीके उदरमें जन्म लिया । यशोदाने सायास पालन किया । पांडव कुलके वह काम आया । इस समय ॥ ३७ ॥ तभी सेवा करता बहु समय । अवसर देख करता विनय । पड़ा नहीं ऐसा प्रयास अवश्य । विषय जाननेमें ॥ ३८ ॥ अर्जुनकी उत्कट जिज्ञासा - जाने दो कहते संत जन । विषय कहो सत्वर महान । सन्त लक्षण मुझमें अर्जुन । कहता नहीं है ॥ ३९ ॥ किया तो संत लक्षणका विचार । “अयोग्य मैं” निःसंदेह “यह सारा” । किंतु तेरा उपदेश सुनकर । बनूंगा अवश्य ॥ १४० ॥ यदि तू मन करेगा । तब मैं ब्रह्म बनूंगा । जो कहो अभ्यास करूंगा । निःसंदेह ॥ ४१ ॥ न जानता देव यह किसका बखान । सुनकर करे अंतःकरण स्तब्ध । इन लक्षणसे पूर्ण जो संत महान । कैसे होंगे जी ॥ ४२ ॥ यह लक्षण मुझमें क्या आयेगा । इतना तू मुझे अपना पायेगा । श्रीकृष्ण कहता “अवश्य ही होगा” । रिमत करके ॥ ४३ ॥ जब तक संतोष नहीं मिलता । सुखका सर्वत्र अभाव रहता । जब वह समाधान है मिलता । सुखाभाव कहाँ ॥ ४४ ॥ जो है सर्वेश्वरका सेवक । वह होगा ब्रह्म सकौतुक । हुआ है यह फलकारक । दैवयोगसे ॥ ४५ ॥ सहस्र जन्मोंमें इंद्रादिकके । मिलन नहीं होता जिसके । आधीन वह कितना पार्थके । कथनमें अधीर ॥ ४६ ॥ १६५ आत्मसंयमयोग

पार्थका यह कहना । मुझको है ब्रह्म होना । श्रीकृष्णने यह सुना । पूर्ण रूपसे ॥ ४७ ॥ श्रीकृष्ण कहते तब अपनेमें । ब्रह्मत्वका दोहद हुआ इसमें । वैराग्य आया बुद्धिके उदरमें । बनके गर्भ ॥ ४८ ॥ किंतु दिन है अभी अपूर्ण । वैराग्य बसंतमें भरा पूर्ण । बौरा आया है भावका महान । सोऽहम्‌के ॥ ४९ ॥ प्राप्ति फल अब फलेगा । इसमें समय न लगेगा । पूर्ण हुआ इसका विराग । जाना श्रीहरिने ॥ १५० ॥ अब यह जो कर्म करेगा । इसको प्रारंभमें फलेगा । इसीलिये कहा हुआ होगा । अभ्यास इससे ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरका पंथराज— श्रीहरि ऐसा सोचकर । कहते हैं सु अवसर । : अर्जुन सुन तू सत्वर । पंथराज ॥ ५२ ॥ जडमें वहां प्रवृत्ति वृक्षके । फल लगे करोडों निवृत्तिके । पथिक हैं जहां इस पथके । महेश भी ॥ ५३ ॥ योगी-वृंदके अनुभव परसे । उस सूक्ष्म-पथ पर चलनेसे । मूर्ध्नि आकाश मार्ग इस कारणसे । हुआ सुलभ ॥ ५४ ॥ आत्म-बोधके सरल पथपर । गये सीधे वे सानंद दौडकर । अन्य सकल मार्ग छोड़कर । जो हैं अज्ञानके ॥ ५५ ॥ फिर ऐसे महर्षी आये । साधक थे सिद्ध भये । आत्मविद् हो महती पाये । इस पंथसे ॥ ५६ ॥ यह मार्ग जो देखता । भूख प्यास भी भूलता । रात दिन न जानता । चलनेमें यहां ॥ ५७ ॥ चलते चलते जहां पग पड़ता । वहां मोक्ष सुखका भांडार खुलता । कहीं यदि गलत पग भी पड़ता । वह है स्वर्ग सुखका ॥ ५८ ॥ पूर्वाभिमुख हो चलना । पश्चिमको जा पहुंचना । मनको स्थिर ही रखना । चलना यहां ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी १६६

इस भाँतिसे है जाना । गंतव्य स्वयं हो जाना । इसे भला क्या कहना । जानेगा तू ॥ १६० ॥ “देव !” तब पार्थ कहता । “मुझे तू कब उभारता ।” आर्त सागरमें डूबता । हूं इस समय ॥ ६१ ॥ श्रीकृष्ण तब ऐसा कहता । उतावला हो क्यों बोलता । अपने आप मैं हूँ कहता । तब तू क्यों पूछता वही ॥ ६२ ॥ शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः । नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥ ११ ॥ योग साधनका स्थान ऐसा होना चाहिए— अब जो मैं एक विशेष कहूंगा । अनुभवसे वह काम आयेगा । उसके लिये योग्य ऐसा लगेगा । स्थान एक ॥ ६३ ॥ जहां होता सहज समाधान । न रहता उठनेका भी भान । वैराग्य होता जहां बलवान । देखते वह ॥ ६४ ॥ वह हो संतोंका वसतिस्थान । संतोषका हो आवास महान । जहां हो चित सदा धैर्यवान । तथा उत्साही भी ॥ ६५ ॥ अभ्यास होता सहज जहां । अनुभव होता आप वहां । ऐसी रम्यता वसती वहां । अखंडित ॥ ६६ ॥ वहां जानेसे ही पार्थ । नास्तिकको मनोरथ । तपस्यामें हो सु-स्वस्थ । अंतःकरण ॥ ॥ ६७ ॥ सहज ही वहां जानेसे । सहसा बैठ जानेसे । करें न मन उठनेसे । सकामका भी ॥ ६८ ॥ करता वह घुमक्कडको भी स्थिर । आनेसे सहज उस स्थान पर । जागृत करता वैराग्य सत्वर । थपकियां देके ॥ ६९ ॥ पवित्र देशके स्थान लगाना स्थिर आसन । दर्भ चर्म तथा वस्त्र ऊंचा नीचा न हो वह ॥ ११ ॥ १६७

राज्य सुखका त्याग करना । ऐसा कहे विलासीका भी मन । एकांतमें यहीं बैठा रहना । ऐसा ही लगे ॥ १७० ॥ स्थान वह ऐसा हो उत्तम । तथा अत्यंत पवित्रतम । प्रकटे अधिष्ठान परम । नयनोंमें वहां ॥ ७१ ॥ देखना औ एक विशेष लक्षण । होना वहां साधक-वसति-स्थान । न होना जन संचार प्रच्छन्न । अर्जुन वहां ॥ ७२ ॥ वहां अमृतके समान । पक्व फल वृक्ष अर्जुन । फलते रहे अनुदिन । सभी ओर ॥ ७३ ॥ पग पगमें बहे नीर । वर्षा ऋतुमें भी पवित्र । ऐसे जो सहज निर्झर । सुलभ हो वहां ॥ ७४ ॥ आतप भी हो कोमल । सौम्यता भासे शीतल । पवन अति निश्चल । मंदमंद हो ॥ ७५ ॥ अधिक तर हो निःशब्द । न करें आकुल श्वापद । शुक तथा न हो षट्पद । उस स्थानमें ॥ ७६ ॥ स्रोत समीप हो हंस । वैसे दो चार सारस । कूजन करें आस पास । कोयल कभी कभी ॥ ७७ ॥ किंतु जो निरंतर नहीं । आवे जावे कभी कहीं । मोरको अपनी ना नहीं । उस स्थानमें ॥ ७८ ॥ परंतु अवश्य ही अर्जुन । ऐसा ठाव खोजके रखना । वहां निगूढ़सा मठ होना । या शिवालय ॥ ७९ ॥ इन दोनोंमें एक । भाता है जो अधिक । एकांतमें अधिक । बैठा रहना ॥ १८० ॥ देखें कैसा है यह स्थान । स्थिर रहता है क्या मन । रहा तो लगाना आसन । इस भांति ॥ ८१ ॥ योग साधनामें आसन ऐसा होना चाहिये-- वहां शुद्ध मृगचर्म एक बिछाना । उसपे धौत वस्त्रकी तह डालना । उसके तलमें कोमलसे बिछाना । कुशांकुर ॥ ८२ ॥ १६८

परंतु अवश्य ही अर्जुन । ऐसा ठाव खोजके रखना । वही निगूढसा मठ होना । या शिवालय ॥ ज्ञा. ६-१७९

इस चित्र में कोई पाठ या सामग्री नहीं है (यह पूरी तरह से खाली/श्वेत पृष्ठ है)।

होना है वे स-कोमल समान । एकसे सहज रखना जान । रचना करें एकसी समान । भूमिपर ॥ ८३ ॥ थोड़ा भी यदि वह ऊंचा होगा । उससे शरीर अस्थिर होगा । थोड़ासा यदि वह नीचा होगा । आयेगा भूमि दोष ॥ ८४ ॥ इसीलिये ऐसा न करना । आसन सम भावका होना । ऐसा आसन तैयार करना । धनुर्धर ॥ ८५ ॥ तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥ योग-साधनाका प्रारंभ ऐसा करना— करना प्रारंभ अनुष्ठान । एकाग्र कर अंतःकरण । करके श्री गुरुका स्मरण । अनुभवसे ॥ ८६ ॥ ऐसे स्मरणके आदरसे । अहंकारके घुल जानेसे । भर जाता है सात्विकतासे । साधक वहां ॥ ८७ ॥ वासनाका विस्मरण होता । इंद्रियोंका चांचल्य मिटता । वैसेही तब स्थिरत्व आता । अंतःकरणमें ॥ ८८ ॥ संतुलन ऐसा स्वाभाविक । होने तक रुके क्षण एक । बैठो इस बोधमें क्षणिक । आसन पर ॥ ८९ ॥ अंग ही अंगको सचेत करता । जैसे पवनको पवन करता । वैसे अनुभवोंका उदय होता । ऐसे समय ॥ १९० ॥ प्रवृत्ति मुडती है पीछेको । समाधि उतरती आगेको । अभ्यास पहुंचे पूर्णताको । आसन पर ॥ ९१ ॥ मुद्राका महत्व है ऐसे । कहता हूँ उसीको कैसे । भिडाके रान औ' जांघसे । पलथी मारना ॥ ९२ ॥ करके मन एकाग्र रोक चित्तेंद्रिय क्रिया । करे आसन पे बैठ योजना आत्म-शुद्धिकी ॥ १२ ॥ (22) १६९ आत्म-संयमयोग

चरण तलको मोड़कर । आधार चक्रके तल पर । रखना ऐसे ही सटाकर । सुस्थिर हो बैठे ॥ ९३ ॥ दहिनेको नीचे रखना । उससे सीवन दबाना । उसपे सहज रखना । वामपाद ॥ ९४ ॥ गुद औ' शिश्नके मध्यमें । चार अंगुलके स्थानमें । डेढ़ औ' डेढ़ अंगुलमें । छोड़ करके ॥ ९५ ॥ रहता है स्थान अंगुल एक । उसे एडीके उत्तराग्रसे देख । दबाकर अंग उस पर रख । तौल करके ॥ ९६ ॥ उठाया या नहीं यह जाने नहीं । उतना ही पृष्ठांश उठावो कहीं । उठावो गुल्फद्वय भी वैसे ही । उसी समय ॥ ९७ ॥ तब शरीरका ढांचा पार्थ । पूर्ण रूपसे सुन सर्वथा । होता ऐडीसे लेकर माथा- । तक स्वयंभू जैसे ॥ ९८ ॥ यह तू जान अर्जुन । मूलबंधका लक्षण । वज्रासन भी है गौण । इसका नाम ॥ ९९ ॥ ऐसा आधार मूल पड़ता । उतरनेका मार्ग ढूंढता । तब है ऊर्ध्व गतिको पकड़ता । संकुचित अपान ॥ २०० ॥ समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥ १३ ॥ सहज कर संपुट । वाम चरणमें बैठ । बाहुमूल दीखें ऊठ । सहज रूपसे ॥ १ ॥ उभरे हुए भुज मूलमें । मस्तक रखना स्थिरतामें । किवाड जैसे नेत्र द्वारमें । चाहते लगने ॥ २ ॥ ऊपरके पलक मिटते । नीचेके पलक हैं फैलते । जिससे अर्धोन्मिलिन होते । नेत्रद्वय ॥ ३ ॥ शरीर सम-रेखामें रखना स्थिर निश्चल । रख नासाग्रमें दृष्टि कभी न देखना कहीं ॥ १३ ॥ ज्ञानेश्वरी १७०

दृष्टि रहती अंतरमें । पैर रखे तो बाहरमें । बैठती है नासिकाग्रमें । स्थिर होके ॥ ४ ॥ दृष्टि रहती अंदर ही अंदर । आती नहीं वह हठसे बाहर । होती तभी अर्ध दृष्टि है स्थिर । नासिकाग्रमें ॥ ५ ॥ दिशाओंका दर्शन करना । रूप राशीकी राह देखना । मिटे दृष्टिकी लत संपूर्ण । अपने आपमें ॥ ६ ॥ होगा फिर कंठनाल संकुचित । चिबुक छूता कंठ अरिक्तकागर्त । स्थिर होके फिर दबाती सतत । वक्ष स्थलमें ॥ ७ ॥ होता फिर कंठमणि लोप । उसपे हो बंधका आरोप । कहलाता जालंदर आप । पांडुकुमार ॥ ८ ॥ होता है जो नाभी पर पृष्ठ । उदर हो अंदर आकृष्ट । अंतरंगमें खिलता कोष्ठ । हृदय-कोषका ॥ ९ ॥ स्वाधिष्ठानके उत्तरानसे । नाभिस्थानके अधोभागसे । बढ़ता बंध जिस नामसे । वह उड्डियान ॥ २१० ॥ प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ॥ १४ ॥ इस योग-साधनका, विस्तार, परिणाम, अनुभव,— ऐसे शरीरके बाहर । पड़ा अभ्यासका पाखर । मनका चांचल्य भीतर । धीमा पडता ॥ ११ ॥ कल्पना है मिटती । प्रवृत्ति भी घटती । तन-मनको शांति । मिलती आप ॥ १२ ॥ क्षुधा गयी है कहां । निद्रा रहती कहां । न है स्मरण यहां । मनमें भी ॥ १३ ॥ शांत निर्भय मच्चित्त व्रतस्थ ब्रह्मचर्यमें । साधके मनको नित्य मुझमें ही लगा रहे ॥ १४ ॥ १७१ आत्म-संयमयोग

मूलबंधमें रहा हुआ अपान । ऊर्ध्व आया पाकरके आकुंचन । पा करके अध ऊर्ध्व आकुंचन । फूल उठता वह ॥ १४ ॥ क्षुभित हो खौलके उन्मत्त । घेरेमें गरजता सतत । मणिपूरकको करे आघात । रह रह कर ॥ १५ ॥ फिर वह अपानका बवंडर । शोधन करता संपूर्ण शरीर । बालपनका सडा गला जहर । बाहर करता ॥ १६ ॥ अंदर कहीं नहीं मुड सकता । फिर उदरमें संचार करता । वहां वह नाम भी नहीं रखता । कफ पित्तका ॥ १७ ॥ धातुके सागर उलटता । मेदके पर्वतोंको तोडता । अंदरकी मज्जा निचोडता । अस्थिगत भी ॥ १८ ॥ नसोंको खुल करता । गात्रोंको ढील करता । साधकको भी डराता । डरना नहीं ॥ १९ ॥ रोगोंको उठाकर दिखाता । किंतु उनको मिटा भी देता । आप औ' पृथ्वीको सान देता । एक जीव-सा ॥ २२० ॥ एक ओर जब यह होता । वहां जो आसनकी उष्णता । करती है शक्तिको जागृत । कुंडलिनीकी ॥ २१ ॥ नागका पिल्ला हो जैसे । स्नान कर कुंकुमसे । मुडकर आया जैसे । सेज पर ॥ २२ ॥ ऐसी वह कुंडलिनी । साडेतीन घुमावनी । अधोमुख सर्पिनी । सोती रहती जो ॥ २३ ॥ जागृत कुंडलिनी शक्तिका कार्य विवेचन-- कडी जैसी वह विद्युल्लताकी । तह जैसी अग्निकी ज्वालाओंकी । सांखलसी चमकीली स्वर्णकी । रहती है पार्थ ॥ २४ ॥ सुव्यवस्थित जो सिकुडी हुई । संकुचित स्थानमें सोई हुई । वज्रासनके चिमटेमें फंसी हुई । होती है सावध ॥ २५ ॥ गिरा वहां मानो नक्षत्र टूटकर । या आया स्थानच्युत हो स्वयं भास्कर । अथवा तेज बीजमें फूटा अंकुर । प्रकाश रूप ॥ २६ ॥ ज्ञानेश्वरी १०२

अपनें कुंडल खोलकर । लीलसे ही अंग मोडकर । कुंडलिनी नाभिकंद पर । टूट पडती ॥ २७ ॥ बहुत दिनकी रहती भूखी । छेडनेसे होती है अति तीखी । आवेशसे होकर ऊर्ध्वमुखी । उठती है जो ॥ २८ ॥ वहां हृदय-कोशके निम्न । भागमें रहता जो पवन । उसे पकडकर अर्जुन । निगलती वह ॥ २९ ॥ अर्जुन ! मुखकी ज्वालाओंसे । निगलती ऊपर नीचेसे । मांस खंड संपूर्ण-रूपसे । शरीरके ॥ २३० ॥ जो जो स्थान हैं समांस । वहांका भरती ग्रास । लेती है दो चार ग्रास । हृदयका भी ॥ ३१ ॥ करती फिर तलुओंका शोधन । तथा ऊर्ध्व खंडका भी है भेदन । चाटती अंगका प्रत्येक स्थान । वह धनंजय ॥ ३२ ॥ न छोडे अपना आश्रय । नामका भी रक्त संचय । रखे शुद्ध चर्मवलय । अस्थिपंजरपे ॥ ३३ ॥ अस्थि-नलियोंको सोखती । शिराओंको भी चूस लेती । बाह्य वृद्धिको जलादेती । रोमकूपके ॥ ३४ ॥ सप्त-धातुके जो सागर । प्यारसे घोंट भर कर । रखती सब ,सुखाकर । ग्रीष्म कालसा ॥ ३५ ॥ नासापुटिका जों श्वास । जाता अंगुल द्वादश । बीचमें धर अशेष । खींचती भीतर ॥ ३६ ॥ अधो-भागसे होता तब आकुंचित । ऊर्ध्व-भागसे होता खींचाव सतत । उस भेंटमें केवल चक्रके दांत । रहते बचकर ॥ ३७ ॥ ऐसे होता इन दोनोंका मिलन । किंतु मध्य कुंडलिनी क्षोभ पूर्ण । पूछती है उनसे "तुम हो कौन ? । चलो यहां से" ॥ ३८ ॥ पार्थिव धातु वह अशेष । निगलती वह रख शेष । आपको भी वैसे ही अशेष । पी जाती है ॥ ३९ ॥ दोनों भूतोंको निगल कर । देती है जो तृप्तिकी डकार ! तब वह संतुष्ट होकर । रहती सुषुम्नाके पास ॥ २४० ॥ १७३ आत्म-संयमयो