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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

समर्पण भाव- जैसे सकल जल समृद्धि । लेके घुसती गंगा उदधि । या ब्रह्म-पदमें वेद-बुद्धि । करती प्रवेश ॥ ७१ ॥ था लपेटकर संपूर्ण जीवित । सर्वस्व गुण अवगुण सहित । करती है अपने सह अर्पित । पतिव्रता पतिको ॥ ७२ ॥ वैसे ही सर्वस्व अपना । गुरु-कुलको समर्पना । गुरु-भक्ति गृह बनाना । अपनेको ही ॥ ७३ ॥ गुरु-गृह वियोग- जो है गुरु-गृहका देश । उससे भरता मानस । विरहिणीका मानस । प्रियसे जैसे ॥ ७४ ॥ गुरु-गृहसे जो आता पवन । देख उसका करके सम्मान । सनम्र कहता कर नमन । घर पधारिये ॥ ७५ ॥ गुरु-गृहका पागलपन । भाता उस ओरका वचन । अमानत जो रखता प्राण । गुरु-गृहमें ही ॥ ७६ ॥ गुरु-आज्ञाने मानो पकड़ा । देहको गावमें है जकड़ा । पगहासे गोठेमें बछडा । उसी भांति ॥ ७७ ॥ कब यह बंधन हटेगा । गुरुका दर्शन कब होगा । उसको निमिष भी बनेगा । युगसे बडा ॥ ७८ ॥ मानो गुरु-ग्रामसे कोई आया । अथवा गुरुने ही भेज दिया । हतायुको आयुष्य मिल गया । ऐसा होता है ॥ ७९ ॥ या सूकता हुवा अंकुर । पा लेता है जलकी धार । या अल्पोदकसे सागर । आयी मछली ॥ ३८० ॥ या रंकने पाया निधान । या अंधेने पाये नयन । भिक्षुकने पाया महान । इंद्र-पद जैसे ॥ ८१ ॥ नाम सुन ऐसे गुरु-कुलका । महा-सुख बढ़ता उसका । मानो आलिंगन गगनका । लिया जैसे ॥ ८२ ॥ ४६१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

गुरुकुलमें ऐसी जिसकी । ममता देखता तू उसकी । सेवा करता ज्ञान सदाकी । जान तू पार्थ ॥८३॥ गुरुकी मानस पूजा— तथा जो हृदय-मध्यमें । डूबकर गुरु-प्रेममें । लीन होना उपासनामें । गुरुकी नित ॥ ८४ ॥ हृदय-शुद्धिका जो मंदिर । आराध्य जो वहां गुरुबर । सर्व-भावसे हे परिवार । बनता आप ॥ ८५ ॥ अथवा हे ज्ञानका मंदिर । उसमें आनंद पीठपर । ध्यानामृत-स्नान निरंतर । करता गुरु लिंगका ॥ ८६ ॥ उदय होते ही बोधार्क । बुद्धिके अक्षत सात्विक । भरके चढ़ाता त्रंबक- । पर लक्षावधि ॥ ८७ ॥ शुद्ध- त्रिकालमें निरंतर । जीव-दशा धूप जलाकर । जलाके ज्ञानारती कर्पूर । उतारता है ॥ ८८ ॥ सामरस्यका रस-पूर्ण । नैवेद्य कर समर्पण । आप बन पूजा-ब्राह्मण । गुरुको लिंग ॥ ८९ ॥ गुरुकी मधुरा-भक्ति— अथवा जीवकी शैया पर । गुरु-पतिका आश्रय कर । प्रेम-भोग लेता निरंतर । बुद्धिसे जो ॥ ३९० ॥ कभी किसी समयमें ऐसे । अनुराग भरे हृदयसे । गुरु-स्मरण होता है जिसे । कहे क्षीर-सागर ॥ ९१ ॥ जहां ध्येय-ध्यान अति सुख । शेष-शैया पर जो निर्दोष । पहुढा है जो उसको देख । माना है श्री गुरु ॥ ९२ ॥ गुरुकी सेव्य-सेवक तथा वात्सल्य-भक्ति— चरण-सेवामें वहां लीन । लक्ष्मीको अपना रूप मान । गरुड हो करता नमन । आप ही जो ॥ ९३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४६२

नाभीमें स्वयं जन्म लेता । गुरु-प्रेममें जो रमता । ध्यान-सुख अनुभवता । चितमें सदा ॥ ९४ ॥ कभी अपने भाव-बलसे । माता मान श्रीगुरुको जैसे । स्तन-पानके भावोन्मादसे । लेटता गोदमें ॥ ९५ ॥ या देख चैतन्य-तरुकी छाया । बनाके गुरु-कामधेनु गाय । बछडा बन आप पीछे गया । कल्पनामें गुरुके ॥ ९६ ॥ या मान गुरु-कृपा स्नेह-नीर । स्वयं बन उसमें जलचर । करता भक्ति-क्रीडा-विहार । कभी कल्पनासे ॥ ९७ ॥ होती गुरु-कृपा अमृत-वृष्टि । आप होता है सेवा-वृत्तिकी सृष्टि । इस प्रकारके संकल्पमें तुष्टि । पाता रहता वह ॥ ९८ ॥ बनता कुक्षि पक्ष बिन चेंदुवा । अपने मनमें वह है पांडव । उसके अथाह प्रेम-वैभव । इस भांतिके ॥ ९९ ॥ गुरुको पक्षिणी कर । चारा लेता चंचु पर । गुरुका जहाज कर । तरता आप ॥ ४०० ॥ गुरु-चिंतन, प्रसाद-सेवन -- जैसा भरा हुवा पूर्ण सागर । प्रसवता लहरपे लहर । वैसे ही ध्यानसे ध्यान-विचार । उमडते आते ॥ १ ॥ सदैव वह इस भांति । अंतरमें श्री गुरु-मूर्ति । भोगता अब बाह्यावर्ती । कैसे सुन तू ॥ २ ॥ करता मनमें निश्चय एक । करूंगा मैं गुरु-सेवा नेक । जिससे कहे गुरु स-कौतुक । कुछ मांग ले तू ॥ ३ ॥ देख ऐसी सबी उपासना । कहेंगे श्री गुरु हो प्रसन्न । तब करूंगा नम्र प्रार्थना । इस भांति मैं ॥ ४ ॥ कहूंगा श्री गुरुवर । मुझे देना ऐसा वर । बनूं सारा परिवार । मैं ही आपका ॥ ५ ॥ ४६३ क्षेत्र क्षेत्रज्ञयोग

तथा उपयोगी वस्तु आपके । उपकरण सभी यहांके । मेरे ही रूप बने उसके । आपकी कृपासे ॥ ६ ॥ ऐसा म मांगूंगा वर । हां कहेंगे गुरु वर । फिर वह परिवार । बनूंगा मैं ॥ ७ ॥ गुरु-जीवनमें संपूर्ण समरसता— उपकरण जात सकल । बन जाऊंगा मैं ही केवल । शुश्रूशा होगी तब सकल । वैभव-युक्त बन ॥ ८ ॥ गुरुवर माय अनेकोंकी । किंतु कर लूंगा मैं एककी । रज बनके पद-तलकी । उनकी कृपासे ॥ ९ ॥ पगलाऊंगा गुरु-अनुराग । लेंगे वे एक पत्नी-योग । मुझमें गुरु-अनुराग । लेगा क्षेत्र-संन्यास ॥ ४१० ॥ कितना ही बहे समीर । चार दिशाओंके अंदर । वैसे गुरु-कृपा-पंजर । बनूंगा मैं ॥ ११ ॥ अपने गुणोंका कर भूषण । गुरु-सेवा-स्वामिनीके चरण । सजाऊंगा बन मैं आच्छादन । भक्ति-पूर्वक ॥ १२ ॥ गुरु-स्नेहकी होगी वृष्टि । तले मैं पृथ्वी बन तुष्टि । पावुं ऐसी इच्छाकी सृष्टि । करता रहता ॥ १३ ॥ तथा श्रीगुरुका भवन । आप ही मैं सर्वस्व बन । करूंगा दास्य अनु दिन । वहांका सारा ॥ १४ ॥ आने जानेमें दातार । करेंगे देहरी पार । बनूंगा उसका द्वार । तथा द्वार-पाल ॥ १५ ॥ मैं गुरु-पादुका बनूंगा । उनको मैं ही चढ़ाऊंगा । छत्र-चामर भी बनूंगा । बारिबारिसे ॥ १६ ॥ बनूंगा मैं पथ-दर्शक । चंवर-धर हस्तक । औ' हाथमें ले दीपक । चलूंगा मैं ॥ १७ ॥ ज्ञानेश्वरी ४६४

उनकी झारी बनूंगा । कुल्लेका पानी भी दूंगा । कुल्ल-पडगा भी बनूंगा । बनूंगा सर्वस ॥ १८ ॥ बांधूंगा हडप मैं । झेलूंगा थूक भी मैं । करूंगा दासता मैं । स्नानादीकी ॥ १९ ॥ बनूंगा गुरुका आसन । अलंकारिक परिधान । उपचारार्थ मैं चंदन । बन जाऊंगा ॥ ४२० ॥ बनूंगा रसोईदार । वैसे ही मैं उपहार । आरती मैं बनकर । उतारूं श्री गुरुको ॥ २१ ॥ श्री गुरु करेंगे आरोगन । मै ही बनूंगा पंगत-जन । मैं दूंगा भोजनोत्तर पान । आगे बढकर ॥ २२ ॥ उठाऊंगा मैं जूठन । सेज पर बिछावन । तथा चरण-सेवन । करूंगा मैं ही ॥ २३ ॥ आप बनूंगा मैं सिंहासन । करेंगे श्री गुरु आरोहण । तब होगा पूर्णत्व ही जान । सेवा-धर्मका ॥ २४ ॥ तथा श्री गुरूका मन । करेगा किसीका ध्यान । विषय जो विलक्षण । बन जाऊं मैं ॥ २५ ॥ श्रवणांगणमें श्री गुरूके । बनूंगा शब्द लक्षके । स्पर्श होगा जहां अंगांगके । बनूंग मैं वह ॥ २६ ॥ तथा श्रीगुरुके नयन । स्नेह-पूर्ण अवलोकन । करेंगे जो रूप-दर्शन । बनूंगा मैं आप ॥ २७ ॥ उनकी रसनाको जो रुचेगा । सभी वे रस मैं बन जाऊंगा । सुगंध-रूपसे मैं ही करूंगा । घ्राण-सेवा ॥ २८ ॥ ऐसे ब्रह्म-मनोगत । श्रीगुरु-सेवा समस्त । बनकर वस्तु जात । करूंगा मैं ॥ २९ ॥ जब तक रहेगा यह शरीर । तब तक होगी सेवा भी सुंदर । देहांत पर होगा जो चमत्कार । सुनो बुध्दिका ॥ ४३० ॥ ४६५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (59)

रज कण बनाके मैं तन । एकत्र करुंग उसी स्थान । पड़ेंगे श्री गुरुके चरण । जिस स्थानपे ॥ ३१ ॥ मेरे श्री गुरु स-कौतुक । करेंगे स्पर्श जो उदक । वहां ले जाऊंगा मैं ठीक । प्रवाहमें आप ॥ ३२ ॥ श्री गुरुकी जहां होती आरती । या गुरु-गृहमें जली ज्योति । बनाऊंगा उन दीपोंकी दीप्ति । अपने तेजसे ॥ ३३ ॥ झलते हैं जहां उनपे चंवर । लय करुंग वहां मैं प्राण-सार । पाऊंगा ऐसा मैं सेवाका आधार । श्रीगुरु चरणका ॥ ३४॥ करेंगे जहां जहां भी गुरु वास । वहां लय करूं शून्यमें आकाश । शरीर-गत पंच-तत्व विशेष । ले जाऊं श्री चरणोंमें ॥ ३५॥ जीकर या मरकर सतत । करूं ऐसे श्री गुरु-सेवा-व्रत । नहीं छोडूंगा औरोंको निश्चित । कल्पांतमें भी ॥ ३६ ॥ ऐसा जो धैर्य-संपन्न । सेवा-निरत है मन । होता है सीमा-विहीन । वह अपार ॥ ३७ ॥ रात्र-दिवस न जानता । अल्प बहुत न कहता । गुरु-आज्ञासे है खिलता । अधिकाधिक वह ॥ ३८ ॥ कार्य जो उसके निमित्त । होता गगनसे विस्तृत । करता अकेला समस्त । एक ही समयमें ॥ ३९ ॥ हृदयसे आगे दौड़ता । शरीर काजमें लगता । मनसे ही दौड़ा करता । काम करनेमें ॥ ४४० ॥ कभी कभी किसी काल । सुन श्री गुरुके बोल । करें अपना सकल । न्योच्छावर ॥ ४१ ॥ गुरु-सेवामें जो कृश । गुरु-प्रेममें संतोष । गुरु आज्ञामें निवास । करता आप ॥ ४२ ॥ गुरु-कुलमें जो स्व-कुलीन । गुरु-बंधु सौजन्य-सुजन । गुरु-सेवा व्यसनमें लीन । निरंतर जो ॥ ४३ ॥ ज्ञानेश्वरी ४६६

गुरु-संप्रदाय है धर्म । वही उसका वर्णाश्रम । गुरु-सेवा ही नित्य-कर्म । उसके लिये ॥ ४४ ॥ गुरु-क्षेत्र गुरु-देवता । गुरु ही माता तथा पिता । इसके बिना न जानता । मार्ग अन्य ॥ ४५ ॥ श्री गुरुका ही है द्वार । उसका सर्वस्व-सार । गुरु-दास सहोदर । मानता प्रेमसे ॥ ४६ ॥ सदैव जिसका वक्त्र । गाता गुरु-नाम-मंत्र । गुरु-वाक्य बिन शास्त्र । न छूता जो ॥ ४७ ॥ श्री गुरुका पादोदक । जैसे भी हो जो उदक । सब तीर्थसे अधिक । मानता वह ॥ ४८ ॥ श्री गुरुका वह जूठन । सहसा पाकर प्रसन्न । होकर समाधि भी लीन । मानता वह ॥ ४९ ॥ गुरु-चरणके जो रज-कण । उडाता ज्यों सहज श्रीचरण । तदर्थ कैवल्य-सुख-दान । करता वह लीलासे ॥ ४५० ॥ अजी ! करना कितना विस्तार । गुरु-भक्तिका नहीं ओर-छोर । लहराया गुरु-भक्ति-सागर । कहा गया इतना ॥ ५१ ॥ जिसे प्रेम है इस भक्तिका । औत्सुक्य भी इस विषयका । रस न आता बिना सेवाका । चित्तमें अन्य ॥ ५२ ॥ तत्व-ज्ञानका वह आधार । ज्ञान लेता उससे आकार । ऐसा वह प्रत्यक्ष ईश्वर । ज्ञान उसका भक्त ॥ ५३ ॥ जान देता वहां साक्षात्कार । प्रत्यक्ष हो ज्ञान मुक्त-द्वार । विश्वमें वह अपरंपार । होता इस भांति ॥ ५४ ॥ गुरु-सेवामें मेरा आदर । अंतःकरणमें भर-पूर । इसलिये किया है विस्तार । इस विषयका ॥ ५५ ॥ वैसे मैं लूला हूं हाथोंसे । अंधा हूं भजन-ध्यानसे । लंगडा हूं गुरु-शुश्रूषासे । ऐसा मंद बुद्धि ॥ ५६ ॥ ४६७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

गुरु गुण-गानेमें मै हूं मूक । आलसी ऐसा उदर पोषक । मनमें गुरु-अनुराग नेक । रहा सदैव ॥ ५७ ॥ यही है एक कारण । यह शरीर पोषण । करना पड़ा रक्षण । कहता ज्ञानदेव ॥ ५८ ॥ करके यह विस्तार सहन । दिया सेवा अवसरका दान । अब करूंगा सार्थ कथन । केवल-मात्र ॥ ५९ ॥ अजी ! सुनो सुनो श्रीकृष्ण । वह भूत-भार-सहिष्णु । कहता है वह श्रीविष्णु । सुनता पार्थ ॥ ४६० ॥ ६ ज्ञानका लक्षण, पावित्र्य— अजी ! शुचित्व जो है ऐसा। जिसके पास दीखे ऐसा। तन मन बना हो जैसा । कर्पूरसे ही ॥ ६१॥ अथवा रत्नका है अंकुर । जैसे स्वच्छ अंदर बाहर । वैसे ही प्रकाशता भास्कर । अंतरबाह्य ॥ ६२ ॥ कर्मसे शरीर निर्मल । ज्ञानसे हृदय उज्ज्वल । अंतर्बाह्य ऐसा सोज्वल । परिशुद्ध ॥ ६३ ॥ मृत्तिका और जल । होता बाहर मेल । निर्मल होते बोल । वेदके जैसे ॥ ६४ ॥ चाहे जब बुद्धिका बल । करता दर्पण उज्ज्वल । सोंदणी करता उज्वल । कपडेका दाग ॥ ६५ ॥ इस भांति उसका शरीर । कर्मसे हुआ शुद्ध बाहर । तथा ज्ञान-दीप है अंतर । तभी परिशुद्ध ॥ ६६ ॥ वैसे सुन तू पांडु-सुता । अंदर जो शुद्ध न होता । बाहर जो कर्म करता । वह है उपहास ॥ ६७ ॥ जैसा लाश पर लादा आभूषण । या गर्दभको डाला प्रयाग-स्नान । कडुवी तुंबी पर मधु-लेपन । किया वैसे ॥ ६८ ॥ या उजाड-घरमें बंधनवार । अन्न लगाया भूखोंके पेट पर । अथवा बिंदी लगायी माथे पर । विधवाने जैसे ॥ ६९ ॥ ज्ञानेश्वरी ४६८

कलश चढाया कत्थीका पोला । ऊपर चमकता सोना-सा पीला । वैसे क्या कामका है चित्रका फल । अंदर है गोबर ॥ ४७० ॥ वैसे है कर्म बाहरका । हीन-वस्तु नहीं मोलका । गंगामें धोनेसे मलका । घडा न होता शुद्ध ॥ ७१ ॥ अजी ! अंतर होता ज्ञानसे उज्ज्वल । तभी बाहर होता है कर्म निर्मल । किंतु कहां होता ज्ञान-कर्मका मेल । ऐसे संभव ॥ ७२ ॥ इसीलिये बाह्य-भाग । धोया कर्मसे सर्वांग । ज्ञानसे मिटाया जंग । अंतरंगका ॥ ७३ ॥ इससे अंतर बाह्य गया । एक निर्मलत्व ही भया । अथवा मात्र रह गया । शुचित्व ही ॥ ७४ ॥ सद्-भाव जो जीवगत । बाहर होता है प्रकटित । स्फटिक सदनमें स्थित । दीपक जैसे ॥ ७५ ॥ जिससे विकल्प उपजते । व्यर्थके विकार भी उठते । कु-प्रवृत्ति-बीजमें फूटते । अंकुर अनेक ॥ ७६ ॥ बात ऐसी सुन या देखता । चितपे तरंग न उठता । जैसे आकाश नहीं मलता । बादलोंसे ॥ ७७ ॥ वैसे इंद्रियां भोग-लिप्त । विषय-रत हो सतत । किंतु विकार नहीं स्फूर्ते । होते वहां ॥ ७८ ॥ किसी पथ पर किसी दिन । हो भली बुरी स्त्रीका दर्शन । नहीं होते विकार उत्पन्न । उसी भांति ॥ ७९ ॥ या पति-पुत्रसे आलिंगन । करे एक ही तरुणांगना । पुत्र-भावमें वहां स्फुरण । होता नहीं कामका ॥ ४८० ॥ जिसका हृदय है वैसे निर्मल । संकल्प-विकल्प ज्ञानमें कुशल । कृत्य-अकृत्य जानता जो सकल । सभी प्रकारके ॥ ८१ ॥ पानीमें जैसे हीरा नहीं भीगता । उबालनेसे कंकड नहीं गलता । वैसे जिसका चित्त नहीं लीपर्ता । विकल्पसे कभी ॥ ८२ ॥ ४६९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

इसका नाम शुचिता । सार्थ है जान तू पार्थ । जहां देखो वहां बसता । निःशंक-ज्ञान ॥ ८३ ॥ ८ ज्ञानका लक्षण, स्थैर्य— तथा स्थैर्य जहां बसता । चित्तका घर बना लेता । वह पुरुष जान पार्थ । जीवन ज्ञानका ॥ ८४ ॥ लदा देह कार्य-रत । चलता अपना पथ । किंतु होता स्थिर-चित्त । अंतरंगमें ॥ ८५ ॥ बछडे परसे गायकी जैसे । न आती ममता वनमें वैसे । सती जानेमें पतिके भोगसे । प्रिय नहीं होते ॥ ८६ ॥ अथवा लोभी जाता है दूर । चित्त रहता गांठ ही पर । वैसे चलनेसे भी शरीर । चित्तसे वे अचल ॥ ८७ ॥ चलते रहते हैं बादल । रहता है आकाश निश्चल । भ्रमण-चक्रमें अचल । ध्रुव है जैसे ॥ ८८ ॥ पथिकोंका होता आवागमन । साथ पथ न चलता अर्जुन । वृक्ष भी नहीं छोडते स्वस्थान । वैसे जान तू ॥ ८९ ॥ वैसे ही चलन-वलनात्मक । शरीर है यह पंच भौतिक । पंच-भूतोर्मियोंमें वह एक । रहता है स्थिर ॥ ४९० ॥ जैसे बवंडरका कल्लोल । पृथ्वीको न करते चंचल । वैसे उपद्रवोंके उबाल । उसको डिगाते नहीं ॥ ९१ ॥ दैन्य-दुःखमें जो नहीं तपता । भय-शोकमें जो नहीं कांपता । शरीरके नाशमें नहीं ढलता । भयसे कभी ॥ ९२ ॥ आशा-आसक्तिके भारसे । वार्धक्य-व्याधिके विशेष भयसे । आगे औ' पीछे लगे रहनेसे । रहता जो निश्चल ॥ ९३ ॥ निंदा या तेजोवधसे अपमानित । काम-लोभादिकसे भी जो आच्छादित । किंतु अंतरंगमें रहता है शांत । रोम भी हिलता नहीं ॥ ९४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४७०

आकाश भी है यदि टूटता । भूमिका मध्य-बिंदु ढलता । तो भी परावृत्त नहीं होता । चित्तसे वह ॥ ९५ ॥ हाथी पे किया फूलसे प्रहार । उसको नहीं लगता है मार । वैसे तीखे दुर्वचन प्रहार । उसको न करें अशांत ॥ ९६ ॥ जैसे क्षीरार्णव-कल्लोल । न कंपाता मंदराचल । या प्रचंड अग्निका ज्वाल । नहीं जलाता आकाश ॥ ९७ ॥ आती जाती है मानो लहर । किंतु चित्त न होता अस्थिर । क्षमा-धैर्यका वह आधार । कल्पांतमें भी ॥ ९८ ॥ स्थैर्यकी यह परि-भाषा । कही है मैंने सविशेष । देख यह लक्षण-दशा । अति स्पष्ट ॥ ९९ ॥ पराक्रम-पूर्ण यह स्थिरता । अपनेमें जो अंतर्बाह्य पाता । ज्ञानका सागर ही बनता । अपने आप ॥ ५०० ॥ ९ ज्ञानका लक्षण, इंद्रिय-निग्रह— सांप जैसे शत्रु का घर । सैनिक अपना हत्यार । लोभी अपना भंडार । नहीं भूलते ॥ १ ॥ अथवा इकलौता बालक । माताका सर्वस होता नेक । मधुपे जैसे मधु-मक्षिका । लोभिन होती ॥ २ ॥ इस भांति जो अर्जुन । करता स्वचित्त जतन । उन्हे न देता कभी स्थान । इन्द्रिय-द्वारमें ॥ ३ ॥ कहुता काम-भकाऊ सुनेगी । या आशाकी चुडैल देखेगी । अंतःकरणकी स्थिति जानेगी । इससे डरता हूं ॥ ४ ॥ बाहरकी ढीलको जैसे । साहसी पुरुष भी वैसे । मुट्ठीमें ही रखता वैसे । अपनी वृत्तिको ॥ ५ ॥ रखता है संयममें नित । अंतरको रखके सचेत । रखता तनको नियमित । आजीवन ॥ ६ ॥ ४७१ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

मनके महाद्वार पर । प्रत्याहारके थाने पर । यम-दमके चौकीदार । बिठाता सदैव ॥ ७॥ आधार-नाभि-कंठमें । बंध-त्रयके घरमें । चन्द्र-सूर्य संपुटमें । सुलाता नित ॥ ८ ॥ समाधि-शैयाके पास पार्थ । लांघ रखता ध्यान सतत । तथा चित्त-चैतन्यमें रत । रखता उमगसे ॥ ९ ॥ यह जो चित्तकी स्थिति है । कहाता चित्त-निग्रह है । यही सदैव विजय है । ज्ञानका ही ॥ ५१० ॥ जिसकी आज्ञा सदैव अर्जुन । झेलता रहता अंतःकरण। उसको मनुष्याकारमें जान । आज्ञा-स्वयं ॥ ११ ॥ इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥ ८ ॥ १० ज्ञानका लक्षण, वैराग्य— विषयोंके विषयमें । सदा वैराग्य मनमें । भर आता उमंगमें । जिसके है ॥ १२ ॥ वमन किया हुवा अन्न । न चाहता रसना-मन । न होती इच्छा-अलिंगन । करने की प्रेतसे ॥ १३ ॥ जैसे विष भोजन नहीं भाता । जलते घरमें न जाया जाता । व्याघ्र-गव्हहरमें नहीं करता । वसति-स्थान ॥ १४ ॥ तप्त लोह-रसमें जैसे । कूदा नहीं जाता है वैसे । तकिया न करता जैसे । अजगरका कोई ॥ १५ ॥ इस भांति जिसको अर्जुन । विषय-वार्ता न भाती जान । इन्द्रिय-सुखमें विषयान्न । नहीं जाने देता ॥ १६ ॥ चित्तमें निरहंकार विषयोंमें विरक्तता । जन्म-मृत्यु-जरा रोग दुःख दोष विवेचना ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ४७२

विषयोंमें जो आलस्य । शरीरमें सदा काश्यं । शम-दममें स्वारस्य । रहता जिसका ॥ १७ ॥ तप-व्रतोंका सम्मिलन । होता है उसका जीवन । मानता युगांत समान । जनमें आनेको ॥ १८ ॥ योगाभ्यासमें आस । विजनोंमें उल्हास । जन-संगकी त्रास । भाती नहीं ॥ १९ ॥ शर-शैयापे शयन । पूय-पंकमें लुंटन । वैसे ही भोगता मान । विषय भोग ॥ ५२० ॥ तथा स्वर्ग-प्राप्तिकी बात । सुननेमें भी घृणा पार्थ । मानो वह श्वान-पिशित । सडा हुवा जो ॥ २१ ॥ यह है विषय-वैराग्य । आत्म-लाभका जो सौभाग्य । इससे ब्रह्मानंद-योग्य । होता जीव ॥ २२ ॥ उभय भोगमें जो त्रास । पाता है जिसका मानस । वहां जान करता वास । ज्ञान सदैव ॥ २३ ॥ ११ ज्ञानका लक्षण, अनहंकार— करता जो निष्ठा पूर्वक । सत्कार्य नित्य नैमित्तिक । कर्तृत्व-भावसे अलीक । रहता अलिप्त ॥ २४ ॥ वर्णाश्रमके पोषक । कर्म नित्य-नैमित्तिक । करें नियम-पूर्वक । अखंडित ॥ २५ ॥ किंतु यह सब मैंने किया । या यह मुझसे सिध्द भया । स्मरणमें भी न रखा गया । कभी किंचित ॥ २६ ॥ सहसा जैसा पांडुकुमार । वायुका होता सर्व-संचार । या उदय होता है भास्कर । निराभिमानसे ॥ २७ ॥ या श्रुतिके स्वाभाविक बोल । या गंगाकी निरुद्देश्य चाल । उसके व्यवहार सकल । ऐसे अहंकार शून्य ॥ २८ ॥ ४७३ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग (60)

उचित-समय जैसे वृक्ष फलते । हम फले या नहीं यह न जानते । ऐसी वृक्ष-वृत्तिसे जो हैं रहते । कर्म रत सदैव ॥ २९ ॥ ऐसे मन कर्म-वचन । अहंकार रहित जीवन । मणि-मालाका खींचा जान । बीचका सूत्र ॥ ५३० ॥ संबंध बिन जैसे बादल । आकाशमें चलते हैं चाल । ऐसे कर्म उसके सरल । तनसे होते हैं ॥ ३१ ॥ शराबीके तनपे वस्त्र । या चित्रके हाथमें शस्त्र । बैल पर लादा है शास्त्र । वैसे ही अर्जुन ॥ ३२ ॥ उसको जैसे इस शरीरमें । मैं हूं इसका भान न हो मनमें । निरहंकारिता है सहजमें । कहते इसको ॥ ३३ ॥ संपूर्ण जहां यह दीखता । वहीं है ज्ञान घर करता । नहीं है यहां आवश्यकता । संदेहकी कोई ॥ ३४ ॥ १२ ज्ञानका लक्षण, गुणदोष-दर्शन— जन्म मृत्यु जरा दुःख । व्याधि वार्धक्य कलुष । सावध रहता देख । दूरसे जो ॥ ३५ ॥ मांत्रिक जैसे पिशाचका । तथा योगी उपसर्गका । राजा आगे पीछे होनेका । देखता पहलेसे ही ॥ ३६ ॥ जैसे वैर जन्मांतरका । साप न जाने भूलनेका । वैसे वह पूर्व जन्मका । धोता दोष ॥ ३७ ॥ आंखमें कंकर न घुलता । घावमें बरछा न सहता । वैसा वह दुःख न भूलता । जन्म-जन्मका ॥ ३८ ॥ पूय-गर्तमें मैं गया । मूत्र-रंध्रमें निभाया । सहज ही स्वाद लिया । कुच-स्वेदका ॥ ३९ ॥ सदैव वह इस प्रकार । करता है जन्मका विचार । जिससे हो जन्म बार बार । ऐसा न करता कुछ ॥ ५४० ॥ ज्ञानेश्वरी ४७४

जैसे दांव हारा हुवा जुवारी । जीतनेमें करता फुरहरी । अथवा जैसे बापका वैरी । मारता पुत्र ॥ ४१ ॥ हत्याके बाद अपनोंका नेक । बदला लेता है अंग-रक्षक । ऐसे यह जन्मका है देख । पीछा करता ॥ ४२ ॥ किंतु जन्मकी जो लाज । न छोडता अपनी निज । संभावित जैसे निस्तेज । सहता नहीं ॥ ४३ ॥ तथा मृत्यु आगे आयेगी । कल्पांतमें जा जकडेगी । किंतु उसकी आज होगी । तत्परता जागृत ॥ ४४ ॥ मध्य-प्रवाह अथाह सुनकर । तैरनेवाला जैसे किनारे पर । सावधान हो कमर बांधकर । होता है सिद्ध ॥ ४५ ॥ या रणमें जानेसे पूर्व अर्जुन । संभालकर होता है सावधान । घाव लगनेसे पूर्व ही ओढन । आगे करता जैसे ॥ ४६ ॥ या जानके आगेका पथ-वध । पथिक होता पहले सावध । अथवा मृत्युसे पूर्व औषध । करते जैसे ॥ ४७ ॥ नही तो सदैव ऐसा होता । जलते घरमें है फंसता । तब कुंआं खोदने जो लगता । व्यर्थ होता जान ॥ ४८ ॥ अथाह गर्तमें डूबे·जैसे पत्थर । संसार सागरमें वैसे धनुर्धर । डूब गये हैं कई चीख चीखकर । ऐसा करेगा कौन ॥ ४९ ॥ जिसका रहता समर्थसे वैर । तब वह जैसा आठ ही पहर । रहता है बांधकर तलवार । सावधान हो ॥ ५५० ॥ बाप मानता कन्या उपवर । या सन्यासी रहता मरने तैयार । वैसे वह सदैव मृत्युका विचार । करता रहता है ॥ ५१ ॥ ऐसे जन्मसे जन्म-निवारण । औ' मृत्युसे कर मृत्यु-हरण । स्वयं रहता करके धारण । अपना निज-रुप ॥ ५२ ॥ उसके घरमें ज्ञानका । अभाव न रहा जिसका । गया दुःख जन्म-मृत्युका । धनंजय ॥ ५३ ॥ ४७५ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

न छूता उसका शरीर । वार्धक्य अभी धनुर्धर । तभी करता है विचार । तारुण्यमें वृद्धत्वके ॥ ५४ ॥ कहे आज इस अवसर । बडा हुवा है यह शरीर । होगा सूखा पातसा आखर । कल निश्चित ॥ ५५ ॥ जैसे दैव-हीनके व्यवसाय । मंत्री-हीन राजाके राज-कार्य । वैसे ही होंगे मेरे हाथ पाय । बल-हीन ॥ ५६ ॥ लेनेमें पुष्पोंकी गंध । नाक बनेगी निगंध । जैसे बधिर एकाध । ऊन्टकी टांग ॥ ५७ ॥ जैसे वोढर-पशुके खुर । सढते हैं कीचडमें भर । वैसे ही होगा मेरा शरीर । वार्धक्यसे ॥ ५८ ॥ ईर्शासे जो पद्म-दलसे । लडते नयन ये जैसे । होंगे सडे परवलसे । रूप-हीन ॥ ५९ ॥ भिवयोंके पलक जैसे । झूलेंगे जो गली-छालसे । गिरेंगे आंसू भी उनसे । सडेगा उर ॥ ५६० ॥ गिरगिट कीकरपे दौडता । और कर्तारसे गजबजाता । उसी भांति है लारसे बनता । मुख मेरा ॥ ६१ ॥ रसोई-घरकी नालीमें । बुदबुदाते मांड-सांडमें । वैसे ही सब नाकमें । लथपतायेगा ॥ ६२ ॥ तांबूलसे होंठ सजाकर । हंस हंस दांत दिखाकर । बोलसे मैं सदा स-नागर । दिखाता अकड ॥ ६३ ॥ उन्हीं होंठ पर कल । आयेगी लार उबल । दांत दाढ भी निकल । जायेगी सब ॥ ६४ ॥ अथवा ऋणसे डूब जाता कृषक । वर्षा-झडी में पशु लगाते बैठक । वैसे उठ नहीं सकेगी यकायक । यही जीभ ॥ ६५ ॥ जैसे सूखे हुये तिनके । हवा में उडते घासके । वैसे ही डाढ़ीके बालोंके । होंगे हाल ॥ ६६ ॥ ज्ञानेश्वरी ४७६

तथा झडीसे आषाढ़की । झरनी खाई पहाड़की । वैसे मुखसे लारकी । बहेगी धार ॥ ६७ ॥ बोल तुतला घिघियायेंगे । कान तुतुने बधिरायेंगे । पिंड जकड कुम्हलायेगा । मानो बानर-सा ॥ ६८ ॥ खेतोंमें हौवा जैसे घासका । कांपता खाके झोंका हवाका । वैसे हाल होगा सर्वांग शरीरका । उस समय ॥ ६९ ॥ पैरमें पैर अटकेंगे । हाथ कांप सकुचायेंगे । शरीर-कर्म उपहासेंगे । अपने आपको ॥ ७० ॥ होंगे मलमूत्रादिके द्वार । जैसे टूटे घडेके खापर । और मेरे निधनमें इतर । करेंगे मनौतियां ॥ ७१ ॥ यह देखके कोसेगा जग । होगा तब मृत्युका वियोग । आप्त-जन करेंगे उबग । तब मेरा ॥ ७२ ॥ स्त्रियां कहेंगी मुझको भूत । सुन होंगे बालक मूर्छित । इससे बनूंगा मैं सतत । घृणा-पात्र ॥ ७३ ॥ रातमें खांसीका उबाल । सोये हुये सुन सकल । “कितनोंको खायेगा काल” । कहेंगे “न जाने यह” ॥ ७४ ॥ वार्धक्यका ऐसा विज्ञापन । देख होता वह सावधान । तारुण्यमें ही उसका मन । होता उपशम ॥ ७५ ॥ कहता यह कल आयेगा । आजका भोगमें बीतेगा । आत्म-हितमें क्या रहेगा । अपने पास ॥ ७६ ॥ आनेसे पहले बधिरता । सुनने-योग्य सब सुनता । जब तक पंगु नहीं होता । करता देशाटन ॥ ७७ ॥ जब तक दृष्टि रहती । देखने योग्य देख लेती । जब तक वाचा रहती । गाता मंगल-गान ॥ ७८ ॥ हाथ होंगे ये तब बधिर । जान करता अब अधीर । सत्कर्मको वह निरंतर । दानादिक ॥ ७९ ॥ ४७७ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

ऐसा होगा तब सकल । मन होगा जान पागल । ध्यान-मग्न होता निश्चल । आत्म-ज्ञानमें ॥ ५८० ॥ चोर आयेंगे दिनमें जो जानता । तभी संपत्तीकी व्यवस्था करता । दीप बुझनेसे पहले लगाता । वस्तु सुचारु रूपसे ॥ ८१ ॥ वैसे वार्धक्य कल आयेगा । यह सब ही व्यर्थ जायेगा । तारुण्यमें ही कर रखेगा । सभी व्यवस्था ॥ ८२ ॥ अति दुर्गम-पथ यह जान । संध्याकाल कर अवलोकन । आप मात्र निकला जो अर्जुन । क्या करेंगे चोर ॥ ८३ ॥ ऐसी जराकी आहट पाकर । जो व्यर्थ न हो यह जानकर । बैठा है शत-वृद्ध बनकर । उसको डरना क्या ? ॥ ८४ ॥ फटकी बालोंको फटकना । उससे न निकलना दाना । या राखको ही फिर जलाना । इससे होगा क्या ? ॥ ८५ ॥ करके वार्धक्यका विचार । किया उसका प्रभाव दूर । उसके पास ज्ञान अपार । रहता सदैव ॥ ८६ ॥ वैसे ही नहीं जब अनेक रोग । जिसके नहीं व्यापते सभी अंग । तभी वह आरोग्यका उपयोग । करता सदैव ॥ ८७ ॥ अजी ! सांपके मुखसे । गिरा हुवा कौर जैसे । तज देता सदा वैसे । बुध्दिमान ॥ ८८ ॥ जिसके वियोगसे दुःख । बढ़ते विपत्ति औ' शोक । तजके वैसे स्नेह-सुख । रहता उदासीन ॥ ८९ ॥ अजी ! दोष स्पर्शेंगे कैसे । न करता कर्म जो वैसे । नियमित कर्मेंद्रियोंसे । रोकके रहता ॥ ५९० ॥ ऐसे अनेक युक्तिसे । रहता है दक्षतासे । ज्ञान-संपत्तिका उसे । मानो स्वामी ॥ ९१ ॥ अब और ही एक । लक्षण अलौकिक । कहता सुन नेक । धनंजय ॥ ९२ ॥ ज्ञानेश्वरी ४७८

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु । नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥ ९ ॥

१३ ज्ञानके लक्षण, अनासक्ति -

वह अपने शरीर पर । उदास होता इस प्रकार । पथिक पराये वस्तु पर । बैठा हो रक्षक ॥ ९३ ॥

या जैसे है साया वृक्षकी । क्षण भर मिली राहकी । घर पर नहीं उसकी । ममता उतनी भी ॥ ९४ ॥

सायाकी भांति रहता है जैसे । रह कर भी न जानता वैसे । रहता है अलोलुप भावसे । पत्नीमें नित ॥ ९५ ॥

वैसे ही संतानके विषयमें । रहता जैसे पंथी पड़ावमें । अथवा गोरु वृक्षकी सायामें । बैठ जाते हैं ॥ ९६ ॥

यदि वह रहता श्रीमंत । ऐसे रहता है पांडुसुत । जैसे रहा कोई साक्षीभूत । किसीके धनका ॥ ९७ ॥

या तोता जैसे पिंजडेमें । रहना स्वामीकी आज्ञामें । ऐसे वह वेद-आज्ञामें । रहता हो विधेय ॥ ९८ ॥

वैसे ही गृह-दारा-पुत्र- । बना नहीं रखते मित्र । उसको तू जान पवित्र । नींव-ज्ञानकी ॥ ९९ ॥

१४ ज्ञानके लक्षण, अखंड सम-चित्तता—

तथा महा-सिंधु जैसे । ग्रीष्म-वर्षा में एकसे । इष्ट अनिष्ट भी वैसे । जानता नहीं ॥ ६०० ॥

या तीन कालमें नहीं होता । तीन प्रकारका सविता । वैसे सुखदुःखमें रहता । समचित्त वह ॥ १ ॥


निःसंग वृत्ति कर्मोंमें पुत्रादिमें अलिप्तता । प्रिय अप्रिय लाभोंमें अखंड समचित्तता ॥ ९ ॥

४७९ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञयोग

जहां आकाशकी भांति । साम्यमें खामी न आती । जान तू सुभद्रापति । वहां है ज्ञान ॥२॥ मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥ १० ॥ १५ ज्ञानका लक्षण, निष्काम एकनिष्ठ भक्ति— वैसे ही बिना मेरे कहीं । श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं । ऐसा दृढ निश्चय सही । जिसने किया ॥ ३ ॥ काया-वाचा तथा मनसे । कृत-निश्चय किया ऐसे । मेरे बिना दूसरा ऐसे । नहीं देखते ॥ ४ ॥ या जिसने अपना मन । किया पूर्ण मुझमें लीन । एकत्वमें शय्या-समान । कर लिया है ॥ ५॥ चितामें जाते समय सती । अन्य न सोचती बिना-पति । ऐसे उसकी केवल गति । एकमात्र मैं हूं ॥ ६॥ मिल कर भी जो मिलता रहता । सागरसे नित प्रवाह सरिता । मैं बन कर भी मुझको भजता । वैसे वह सदैव ॥ ७ ॥ जैसे सूर्यके साथ उदय होता । वैसे उसके साथ अस्त होता । यह पारतंत्र्य ही जैसे शोभता । प्रभाको सदैव ॥ ८ ॥ पानीकी सतह पर । उठता है पानी सुंदर । उसे कहते लहर । वैसे वह पानी ही ॥ ९ ॥ अनन्य जो इस प्रकार । हुवा है नित मुझपर । मूर्तिमंत है धनुर्धर । ज्ञान-रूप जो ॥ ६१० ॥ १६ ज्ञानका लक्षण, सदा एकांतमें प्रीति— होती सदा चाह उसकी । तीर्थ-क्षेत्रोंमें रहनेकी । वन-गुहामें एकांतकी । धनंजय ॥ ११ ॥ मुझमें हो अनन्यत्व भक्ति निष्काम निश्चल । एकांतमें रहे प्रीति अरुचि जन-संगमें ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ४८०