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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

तभी है अग्नि और ज्वाल । दोनों ही हैं अग्नि केवल । उसी भांति मेरा है सकल । संबंध वैसा ॥ २२ ॥ निर्मित जगसे यदि मैं छिपता । तब जगत्वसे है कौन दीखता । मानव-तेजसे क्या छिपता । कभी माणिक्य ॥ २३ ॥ जब अलंकारका रूप लिया । तब क्या उसका स्वर्णत्व गया । या मानो कमल खिल गया । मिटा क्या कमलत्व ॥ २४ ॥ अभी कह यह तू पार्थ । अवयवसे आच्छादित । या उसीसे है प्रकटित । अवयवी यहां ॥ २५ ॥ अविमें बोया गया एक दाना । बढ़कर होता है बहुगुना । या व्यर्थ गया है वह अर्जुन । उसी प्रकार ॥ २६ ॥ तभी विश्वके उस पार । देखना पट कर दूर । तब सर्वत्र धनुर्धर । केवल मैं हूं ॥ २७ ॥ तू यह साक्षात्कार । सदा हृदयमें भर । दृढ़तासे तू आदर । जीवनमें इसे ॥ २८ ॥ जब मैं मुझमें प्रकाशता । देहमें भिन्न दीखता । तब मैं गुणोंसे बंधा जाता । दीखता ऐसे ॥ २९ ॥ स्वप्नमें आप ही कल्पनासे । आत्म-मरण जगाते जैसे । तथा आप ही भोगते जैसे । पांडुकुमार ॥ १३० ॥ कामलमें जैसे नयन । करके पीला प्रकाशन । देते हैं कामलका ज्ञान । उनको ही ॥ ३१ ॥ अथवा सूर्यका प्रकाश । कराता बादलका भास । लोपसे देता है प्रकाश । सूर्य ही तब ॥ ३२ ॥ आनेसे ही जन्म जिसका । छाया होती कारण भयका । किंतु अपनेसे है छायाका । सदा अभिन्नत्व ॥ ३३ ॥ वैसे करके प्रकाशन । अनेक देहमें समान । दिखाता गुणका बंधन । वह मैं ही ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४२

बंध क्यों नहीं बांधता । मुझे मैं सही जानता । अज्ञान कारण होता । बंधका वहां ॥ ३५ ॥ मुझको ये बंधन ऐसे । किन गुणसे दीखे वैसे । कहता हूं शांत चित्तसे । सुन तू इसको ॥ ३६ ॥ सत्व रज तम इन तीन गुणोंके कारण पुनर्जन्म होता है— कितने गुण है या धर्म । उसका क्या रूप औ' नाम । कहां हुए इसका मर्म । कहता हूं सुन ॥ ३७ ॥ सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥ सुन सत्व रज तम । यहां तीनोंके ये नाम । तथा प्रकृतिसे जन्म । पाते हैं ये ॥ ३८ ॥ यहां है सत्व उत्तम । तथा रज है मध्यम । तीनोंमें है यह तम । कनिष्ट सहज ॥ ३९ ॥ जैसे एक ही शरीरमें तीन । अवस्थायें होती हैं भासमान । एक अंतःकरणमें त्रिगुण । होते हैं भास ॥ १४० ॥ जैसे जैसे कस-हीन । होता सोनेमें मिलन । बढ़ स्वर्णका वजन । होता अवमूल्य ॥ ४१ ॥ सावधानता जैसे जैसे । दूर होती है आलससे । जकड़ती है निद्रा वैसे । दृढ मूल हो ॥ ४२ ॥ अज्ञान अंगीकार कर । उठती है वृत्ति ऊपर । वह है सत्व रज द्वारा । तममें भी जाती ॥ ४३ ॥ यह तू जान अर्जुन । इनका नाम है गुण । अब करना दर्शन । बद्धताका ॥ ४४ ॥ प्रकृतिसे बने हैं ये गुण सत्व रजस्तम । वे निर्विकार आत्माको जोतते मान देहमें ॥ ५ ॥ ५४३    गुण-निस्तारयोग

जब क्षेत्रज्ञ-दशा । आत्मा छू लेता जैसा । यह देह मैं ऐसा । कहने लगता ॥ ४५ ॥ जन्मसे मरण पर्यंत । देहके धर्ममें समस्त । यह जो ममत्वका है सूत । पिरोता है ॥ ४६ ॥ मीनके मुखमें जैसे । अमिष पहुंचनेसे । झटका देता कांटेसे । जल पारधी ॥ ४७ ॥ तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसंगेन बध्नाति ज्ञानसंगेन चानघ ॥ ६ ॥ गुणोंके लक्षण, सत्व गुण— तभी है जो लुब्धक । सुख-ज्ञानका पाश फेंक । खींचता है मृग-शावक । सुख-ज्ञानमें ॥ ४८ ॥ ज्ञानसे फिर तडपता । विद्वताके पैर झाडता । आत्म-सुखको है गंवाता । अपने ही हाथसे ॥ ४९ ॥ विद्या-मानसे तब तोषता । किसी लाभ-मात्रसे हर्षाता । स्व-संतोषमें धन्य मानता । अपने आप ॥ १५० ॥ कहता भाग्य है मेरा । नहीं है ऐसा दूसरा । विकाराष्टकसे भरा । फूलता वह ॥ ५१ ॥ मानो इतना नहीं पूरा । बंधन लगे दूसरा । विद्वत्ताका भूत संवार । चढता सिरपे ॥ ५२ ॥ मैं हूं स्वयं ज्ञान-स्वरूप । खोनेका दुःख ना अमाप । विषय-ज्ञान-लीन आप । चढा गगन ॥ ५३ ॥ जैसे राजा स्वप्नमें । रंक बन भिक्षामें । दाना पाके सुखमें । मानता इंद्र ॥ ५४ ॥ इनमें शुचि जो सत्व ज्ञान आरोग्य दायक । सुखी मैं और मैं ज्ञानी इससे बांधता नित ॥ ६ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४४

वैसे वह देहातीत । बनकर देहवंत । बहलता पांडुसुत । बाह्य-ज्ञानसे ॥ ५५ ॥ प्रवृत्ति-शास्त्र सूझता । यज्ञ-ज्ञान जूझता । स्वर्ग भी है दीखता । और क्या रहा ॥ ५६ ॥ मैं हूं महा-ज्ञानवान । मुझसे नहीं विद्वान । मेरा चित्त है गगन । या सूर्य-चंद्रका ॥ ५७ ॥ ऐसे ही सत्व-सुख-ज्ञानका । जीवमें लगे बागडोरका । बलसे देता जाता झटका । जुते हुये बैलकासा ॥ ५८ ॥ ऐसे ही यह रजो गुणसे । शरीरमें बंधा जाता कैसे । कहता हूं मैं तू सुन इसे । पांडुकुमार ॥ ५९ ॥ रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् ॥ ७ ॥ रजोगुणके लक्षण— तभी यह रज कहलाता । जीवनका रंजन जानता । यौवन नित बना रहता । अभिलाषाका ॥ १६० ॥ रजका जब स्पर्श होता । जीव काम-मदमें आता । हवा पर सवार होता । चिंतनके यह ॥ ६१ ॥ अग्नि-कुंडमें घृत सिंचन किया । विद्युताग्निने उसका साथ दिया कहो अधिक कम क्या रह गया । कहेंगे तब ॥ ६२ ॥ इच्छा दाह तब भडकता । क्लेश-सह मधुर लगता । इंद्रैश्वर्य भी ओछा लगता । ऐसे समय ॥ ६३ ॥ इच्छा दाह अब बढता । मेरु भी हाथमें लगता । फिर भी वह है चाहता । और भी बडा ॥ ६४ ॥ रज है वासना-रूप तृष्णा आसक्ति-वर्धक । आत्माको कर्मके साथ बांधता बल-पूर्वक ॥ ७ ॥ ५४५ गुण-निस्तारयोग (69)

खर्च किया आज ऐसा । कलका चलेगा कैसा । इससे बहु बडा-सा । करेगा उद्यम ॥ ६५ ॥ दमडी पर जीवन । दे करके बलिदान । कमाकर एक तृण । मानता धन्य ॥ ६६ ॥ कहता स्वर्गपे जाना । सोचता कहां क्या खाना । यज्ञानुष्ठान करना । इसीलिये ॥ ६७ ॥ सदा व्रत पर व्रत । करता इष्ट प्राप्त्यर्थ । कभी कामना रहित । न करता कुछ ॥ ६८ ॥ जैसा है ग्रीष्मका पवन । न ही जानता शांति-क्षण । रहता वह निशिदिन । ऊधमग्रस्त ॥ ६९ ॥ होता है चंचल मीन । या कामिनी कटाक्ष समान । या बिजलीकी गति मान । रहता प्रवृत्तिमें ॥ १७० ॥ चाहता इसी वेगसे । संसार स्वर्ग भी वैसे । क्रियाकी आगमें वैसे । घुसता वह ॥ ७१ ॥ देहमें या देहसे भिन्न । तृष्णा श्रृंखलाके बंधन । सदा उपद्रुव्याप विभिन्न । गलेमें व्यापारके ॥ ७२ ॥ रजो गुणका यह दारुण । देहमें देहीके है बंधन । सुन तू अब कथा अर्जुन । तमो गुणकी ॥ ७३ ॥ तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् । प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥ ८ ॥ तमोगुणके लक्षण- व्यवहारके जो नयन । बंद होते जिससे जान । मोह-रात्रीके हैं जो घन । काले अतिशय ॥ ७४ ॥ मोहता तम देहीको अज्ञानको बढाकर । निद्रा प्रमाद आलस्य इससे घेर बांधता ॥ ८ ॥ ज्ञानेश्वरी ५४६

उसकी प्रीति अज्ञानसे । केवल इसी कारणसे । भ्रमग्रस्त होकर जैसे । नाचता जीव ॥ ७५ ॥ अविवेक महा-मंत्र । मूढता मद्य-पात्र । इसका है मोहनास्त्र । जीवोंके लिये ॥ ७६ ॥ अर्जुन यह है तम । इसका है यह मर्म । बांधता देह ही आत्म । इस अज्ञानसे ॥ ७७ ॥ ऐसा ही है सब शरीर । मानता सब चराचर । तम बिन अन्य विचार । नहीं है जान ॥ ७८ ॥ सब इंद्रियोंमें जाड्य । मनमें भरा है मौढ्य । दोनोंमें हुवा है धाढर्य । आलस्यका ॥ ७९ ॥ अंगअंग मोडता रहता । किसी काममें नहीं आता । उबासियां लेता रहता । प्रति क्षण ॥ १८० ॥ खुले रख भी नयन । नहीं देखता अर्जुन । कोई बात भी न सुन । जी ! कह उठता ॥ ८१ ॥ पत्थरसा पडा ही रहता । हिलनेकी बात न करता । सदा कुंडली मार बैठता । उठता नहीं ॥ ८२ ॥ धरणी धंसती है पताल । गगन गिरता धरातल । किंतु उठना भी है केवल । उसको नहीं भाता ॥ ८३ ॥ यह उचित या अनुचित । प्रश्न नहीं करता है चित्त । पडा रहना मात्र सतत । जानती बुद्धि ॥ ८४ ॥ उठाके अपने करतल । उससे पकडकर गाल । घुटनोंमें सिकुड सकल । बैठा रहता ॥ ८५ ॥ सोनेमें करता है मन । नींदको स्वर्ग सुख मान । अन्य सब तुच्छ अर्जुन । कहता आप ॥ ८६ ॥ करके ब्रह्मायु प्राप्त । सोया रहता सतत । दूसरी कुछ भी बात । नहीं मनमें ॥ ८७ ॥ ५४७ गुण-निस्तारयोग

राह चलते भी यदि गिरता । वहींपे खर्राटे भरता । अमृत मिला तो भी नहीं पीता । जब आती नींद ॥ ८८ ॥ वैसे भी कभी क्रोशावेशमें । निकले कभी किसी व्यापारमें । निकलता जैसे अंधा क्रोधमें । उसी भांति ॥ ८९ ॥ कब कैसे बरतना । किससे कैसे बोलना । साध्य असाध्यका ज्ञान । न होता उसे ॥ १९० ॥ संपूर्ण अग्नि-तेज जैसे । पोंछने अपने पंखसे । उड़ता है पतंग वैसे । पांडुकुमार ॥ ९१ ॥ ऐसे ही काम उसे रुचता । जो न करना वही है भाता । वैसे वह करता रहता । प्रमाद-साहस ॥ ९२ ॥ एवं निद्रा-आलस्य-प्रमाद । तमके रूप हैं त्रिविध । निरुपाधिकके होते बंध । धनंजय ॥ ९३ ॥ आगसे जब घिरता काठ । तब दीखता आगसा काठ । या आकाशको घिरता घट । कहलाता घटाकाश ॥ ९४ ॥ पानीसे जब ताल भरता । चन्द्र-बिंब उसमें भासता । वैसे गुणमें भी भास होता । आत्म-तत्वका ॥ ९५ ॥ सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥ ९ ॥ रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत । रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥ १० ॥ सुखमें जोडता सत्त्व कर्ममें जोडता रज । ढकके ज्ञान संपूर्ण भ्रममें डालता तम ॥ ९ ॥ जीतके अन्य दोनोंको तीसरा करता बल । ऐसा कभी बढे सत्त्व कभी रज कभी तम ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी ५४८

तीनों गुण समय समय पर बदलते रहते हैं— पीछे कर कफ वात । आगे आता जब पित्त । होता है तब संतप्त । जिस भांति ॥ ९६ ॥ आतप वर्षाको जीतकर । प्रकट होता शीत-लहर । आकाश तब जिस प्रकार । होता है शीत ॥ ९७ ॥ अथवा नाना स्वप्न-जागृति । मिटके आती सुषुप्ति । क्षण भर चित्त-वृत्ति । होती जैसे ॥ ९८ ॥ वैसे रज-तमको पराजित । करके सत्व होता प्रकाशित । जीव कहता है हो प्रमुदित । सुखी हूं मैं ॥ ९९ ॥ वैसे ही जब सत्व और रज । मिटाकर होता तमका राज । प्रवृत्ति होती है तब सहज । प्रमादकी ॥ २०० ॥ उसी भांति पांडुकुमार । सत्व-तमको हटाकर । उठाता है अपना शिर । रजोगुण ॥ १ ॥ कर्मके बिन अन्य कहीं । सुंदर कुछ भी है नहीं । इस भांति मानता देही । शरीरस्थ ॥ २ ॥ त्रिगुण वृद्धिका निरूपण । किया हैं श्लोकोंमें यहां तीन । सत्वादि गुण-वृद्धि लक्षण । सुनो अब ॥ ३ ॥ सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥ ११ ॥ लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२ ॥ प्रज्ञाका इंद्रियों-द्वारा प्रकाश सब ओर जो । देहमें फैलता सारा जानना सत्व है बढ़ा ॥ ११ ॥ प्रवृत्ति लालसा लोभ कर्मारंभ अशांतता । फैलाव देहमें होता जानना तम है बढ़ा ॥ १२ ॥ ५४९ गुण-निस्तारयोग

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च । तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥ १३ ॥ यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥ १४ ॥ रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते । तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥ १५ ॥ सत्त्वस्थके स्वभाव-धर्म— रज-तम पर पा विजय । सत्व करता देहपे राज्य । तब जो लक्षण धनंजय । दीखते वह सुन ॥ ४ ॥ प्रतिभा मानो शरीरके अंदर । न समानेसे छलकती बाहर । सुगंध जैसे महकती बाहर । वसंतमें कमलसे ॥ ५ ॥ जैसे सभी इन्द्रियोंके अंगनमें । खडा होता विवेक दास रूपमें । उगती हैं आंखें कर-चरणमें । उसके पार्थ ॥ ६ ॥ राजहंसके सम्मुख । रखनेसे क्षीरोदक । उसकी चोंचकी नोक । करता न्याय ॥ ७ ॥ वैसे दोषादोष विवेक । करती हैं इन्द्रियां देख । बनके रहता सेवक । निग्रह वहां ॥ ८ ॥ सुनते नहीं अश्रव्य कान । न देखते कु-दृश्य नयन । न बोलती अवाच्य वचन । वाणी जैसे ॥ ९ ॥ प्रमाद मोह अंधार आलस्य सब ओरसे । फैलाव देहमें होता जानना तम है बढ़ा ॥ १३ ॥ तजता देहको देही बढता सत्व है जब । जन्मता शुभ लोगोंमें सज्जनोंके समाजमें ॥ १४ ॥ रजमें लीन होता जो जन्मता कर्म-किसमें । डूबता तममें सारा जन्मता मूढ-योनिमें ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५०

दीपकके सम्मुख अंधार । भागते जाता जैसे सत्वर । नहीं आते निषिद्ध आचार । इन्द्रियोंके सम्मुख ॥ २१० ॥ अजी ! वर्षा-ऋतुमें जैसे । नदियां उमड़ती वैसे । फैल जाती है बुद्धि वैसे । सब शास्त्रोंमें ॥ ११ ॥ जैसे पूर्णमासीका दिवस । चांदनीसे भरता आकाश । शास्त्रमें फैलती तत्सदृश । वृत्ति सदैव ॥ १२ ॥ एकत्र होती वासना । प्रवृत्तिका संयमन । विषयों परसे मन । हठ जाता है ॥ १३ ॥ जब सत्व बढता । यह चिन्ह दीखता । यदि निधन होता । ऐसे समय ॥ १४ ॥ जैसे है घरकी संपत्ति । वैसे औदार्य धैर्य-वृत्ति । तब इह परमें कीर्ति । क्यों न फैलेगी ॥ १५ ॥ अथवा आया है अति सुकाल । चला संतर्पण अति-मंगल । अतिथि आप्त आया उसी पल । कहना क्या तब ॥ १६ ॥ इससे क्या है तब सुंदर । वैसे सत्वमें जाना शरीर । सत्व-स्वभावको छोड और । जायेगा कहां ॥ १७ ॥ सत्व-गुणमें जो उद्भट । तज सत्व-गुण श्रेष्ठ । चलता है छोडके कोपट । भोग-क्षम जो ॥ १८ ॥ अकस्मात जो ऐसा मरता । सत्वका ही नया बनता । या ज्ञानियोंमें जन्म लेता । यह निश्चय ॥ १९ ॥ कह तू यह धनुर्धर । राजा राजत्वमें डोंगर । चढता है तब अधूरा । होता है क्या ॥ २२० ॥ अथवा यहांका जो दिया । पडोसके गांवमें गया । वहां पर क्या धनंजय । न रहता दीप ॥ २१ ॥ वैसी यह सत्व-शुद्धि । होती ज्ञान सह वृद्धि । तैरने लगती बुद्धि । विवेक पर ॥ २२ ॥ ५५१ गुण-निस्तारयोग

महदादिककी परंपरा । विचार कर तदनंतर । विलीन हो जाते स-विचार । उसके उदरमें ॥ २३ ॥ छत्तीसमें सैंतीसवां । चौबीसमें पच्चीसवां । तीनों पर स्वभाव । चौदह जिसका ॥ २४ ॥ ऐसा सर्व जो सर्वोत्तम । होता है जिसको सुगम । ऐसे कुलमें निरुपम । मिलता है देह ॥ २५ ॥ रजोगुणीका स्वभाव-धर्म- इसी भांति हे तू देख । सत्व तम अधोमुख । तथा होता ऊर्ध्व-मुख । जब रजोगुण ॥ २६ ॥ तब वह अपने कार्यका पार्थ । शरीर-ग्राममें है धूम मचाता । देहमें तब लक्षणोंका करता । उदय ऐसा ॥ २७ ॥ अजी ! फैला हुवा बवंडर । करता है वस्तुओंका ढेर । वैसे होता विषयोंका ठौर । वह देह ॥ २८ ॥ प्रसंग जैसे पर-दारादिकका । न सोचता शास्त्र-विरुद्ध होनेका । इंद्रियोंको देता चारा विषयोंका । भेडोंके समान ॥ २९ ॥ यहां तक होता इनका लोभ । स्वैर वृत्तिका रहता सदा रोभ । लूटनेमें अशक्य जो अलाभ । इन लोगोंका ॥ २३० ॥ आता जब उद्यमका प्रसंग । नहीं लेता है कभी पीछे पग । बढाती है प्रवृत्ति पग-पग । अपनी सदैव ॥ ३१ ॥ या खडा करना कोई प्रासाद । या करना है यज्ञ-अश्वमेध । ऐसे होते मनमें बडे छंद । उसके सदैव ॥ ३२ ॥ नगरोंको रचाना । जलाशय बांधना । महावन लगाना । नानाविध ॥ ३३ ॥ ऐसे ऐसे महान कर्म । समारोहोंका उपक्रम । इस परके सभी काम- । भोग करना मेरे ॥ ३४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५२

महा-सागर भी खायेगा मात । अग्नि भी होगा पूरा पराजित । बढती है इतनी असीमित । अभिलाषा उसकी ॥ ३५ ॥ आशा जो बढती जाती । मनके आगे दौडती । विश्वको भी जो गिनती । पद्-तलमें ॥ ३६ ॥ बढता है रज जब । दीखते ये चिन्ह सब । शरीर पडता तब । यदि इसका ॥ ३७ ॥ यह सब होते जहां । वह जन्मता है वहां । किंतु होती योनि वहां । मनुष्यकी ही ॥ ३८ ॥ यदि कोई एक भिक्षुक । राज-गृहमें बैठा देख । उससे वह राजा एक । बनेगा क्या ॥ ३९ ॥ बैलको जोतकर गाडीमें । ले गये धनीके बारातमें । इससे चूकेगा क्या गोठेमें । खाना घास ॥ २४० ॥ इसीलिये व्यापारमें दिन रात । जुते रहते जो अविश्रांत । ऐसे कुलमें उसे निश्चित । मिलता जन्म ॥ ४१ ॥ जन्मता है कर्म-जडोंमें । अथवा ऐसे ही देहमें । जहां रजोत्कर्ष-गर्तमें । डूबता वह ॥ ४२ ॥ तमो-गुणीका स्वभाव-धर्म— और अर्जुन उसी भांति । जहां रज-सत्वकी वृत्ति । निगलकर हो उन्नति । तमोगुणकी ॥ ४३ ॥ कहते हम लक्षण । अंतर्बाह्य तन-मन । कहता सुन अर्जुन । ध्यान देकर ॥ ४४ ॥ उसका होता ऐसा मन । जैसे सूर्य-चन्द्र विहीन । होता है रातका गगन । अमावसका ॥ ४५ ॥ ऐसा उसका अंतःकरण । सदैव स्फूर्ति-हीन विरान । विचारका स्पर्श भी अर्जुन । नहीं होता ॥ ४६ ॥ ५५३ गुण-निस्तारयोग (70)

पत्थरको हराती जड़ता । मृदुता वह नहीं जानता । स्मरण-शक्तिका अता-पता । नहीं होता उसको ॥ ४७ ॥ अविवेक उसका साज । अंतर्बाह्य मौढ्यका बाज । लेन-देन होता सहज । मूर्खताका ॥ ४८ ॥ आचार-हीनता अमंगल । दबोचती उसको प्रबल । मृत्यु-तक उसका चंगुल । कसता जाता ॥ ४९ ॥ कहता हूं और एक लक्षण । दुष्टतामें चित्त विलक्षण । जैसे काली रातमें सुलक्षण । देखता उल्लू ॥ २५० ॥ निषिद्ध-कर्मके नामसे । खिल जाता तन-मनसे । दौड़ती अनिर्बंध जैसे । इंद्रियां सारी ॥ ५१ ॥ बिन मदिराके वह झूमता । बिन सन्निपातके बकता । बिन प्रेमके वह भूलता । पागल जैसे ॥ ५२ ॥ रहता नहीं उसका चित्त । किंतु उन्नति नहीं निश्चित । भ्रम-वश हुवा है उन्मत्त । तमो-गुणी वह ॥ ५३ ॥ या इन गुणोंकी होती । जहां संपूर्ण प्रतीति । जानो तमकी उन्नति । हुई सांग ॥ ५४ ॥ और ऐसे ही प्रसंग । तजता है यदि अंग । लेके यही गुण संग । जन्मता वह ॥ ५५ ॥ राईपन अपने बीजमें । छोड़ जाती है राई अंतमें । अंकुरेगा राईके रूपमें । राईपन जैसे ॥ ५६ ॥ तज कर अग्नि जब दीप । बुझता यदि अपने आप । जैसे जहां लगा वह दीप । आग ही आग ॥ ५७ ॥ ऐसे तमो गुणके साथ । संकल्प बांधकर पार्थ । बुझती है जीवन जोत । जन्मती तम-रूप ॥ ५८ ॥ इससे अधिक क्या कहना । तम-वृद्धिमें देह तजना । पशु-पक्षी कृमि हो जन्मना । या उगना हो पेड ॥ ५९ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५४

कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६ ॥ तीनों गुणोंका परिणाम-- श्रुतिका यह निरूपण । बन जाता है सत्व-गुण । सुकृत-कर्मका कारण । धनुर्धर ॥ २६० ॥ इसीलिये है निर्मल । सुकृतका जो सरल । देता सुख ज्ञान फल । सात्विक ॥ ६१ ॥ फिर है जो रजकी प्रक्रिया । इंद्रवणिका फल पकाया । सुख चितार अंतमें दिया । दुःख अपार ॥ ६२ ॥ अथवा जैसे निंबोणीका फल । बाहर मृदु अंदर गरल । वैसे होते राजस-क्रिया-फल । यहां अर्जुन ॥ ६३ ॥ जैसे है विषका अंकुर । देता विष फल आखर । वैसे है रूप भयंकर । फलता तम ॥ ६४ ॥ सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७ ॥ इसीलिये हे अर्जुन । सत्वका हेतु है ज्ञान । जैसे मानो दिनमान । होता सूर्यका ॥ ६५ ॥ तथा वैसे ही यह जान । लोभका है रज कारण । जैसे स्वरूप विस्तारण । जीव-दशाका ॥ ६६ ॥ मोह अज्ञान प्रमाद । यहां है ये दोष-वृन्द । आगे जो बढता प्रबुद्ध । तमका मूल ॥ ६७ ॥ फल सात्विक कर्मोंका पुण्य निर्मल है कहा । रजका फल है दुःख तमका ज्ञान-शून्यता ॥ १६ ॥ सत्वसे फैलता ज्ञान रजसे जान लालसा । प्रमाद मोह अज्ञान होते हैं तमके गुण ॥ १७ ॥ ५५५ गुण-निस्तारयोग

ऐसे विचारोंके नयन । तीनों गुण करके भिन्न । दिखाते हैं जान अर्जुन । करतलामलकसा ॥ ६८ ॥ रज-तम हैं ये दोनों गुण । होते हैं पतनके कारण । सत्व बिन अन्य नहीं जान । पहुंचाते ज्ञानके पास ॥ ६९ ॥ इसीलिये सात्विक-वृत्ति । स्वीकार व्रत जन्म-वृत्ति । सर्व त्याग करके भक्ति । करते जान ॥ २७० ॥ ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः । जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥ १८ ॥ गुण-बद्धोंके स्थान— जिनमें होता सत्वका उत्कर्ष । जीते-मरते उसीमें सहर्ष । तन त्याग वे पाते सत्पुरुष । स्वर्गका राज ॥ ७१ ॥ ऐसे ही रजमें जो रहते । उसीमें जीते तथा मरते । वे मनुष्य होके जन्मते । मृत्यु-लोकमें ॥ ७२ ॥ सुख दुःखकी खिचडी जिसमें । खानी पड़ती एक ही थालीमें । फंसते हैं जो मरण-चक्रमें । कभी नहीं छूटते ॥ ७३ ॥ तथा तममें जो उसी भांति । जीते मरते हैं उसी स्थिति । पाते हैं नरक अधोगति । प्राप्ति-पत्र ॥ ७४ ॥ इस भांति जो वस्तु-सत्ता । त्रिगुणको कैसे प्रभावित । करती है कारण सहित । कहा मैंने ॥ ७५ ॥ वस्तु होती है वस्तुत्वमें । किंतु आप गुण-रूपमें । देख गुणके स्वभावमें । बरतती है ॥ ७६ ॥ राजा देखता जैसे स्वप्नमें । घिरा है राज-पर-चक्रमें । जीतता हारता अपनेमें । आप ही एक ॥ ७७ ॥ सत्वस्थ चढते ऊंच मध्यमें व्यक्ति राजस । अधःपतित होते हैं तामसी हीन वृत्तिके ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५६

वैसे मध्य ऊर्ध्व अध । ये जो गुण-वृत्ति भेद । दृष्टि तज दी तो शुद्ध । वस्तु आप ॥ ७८ ॥ नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९ ॥ गुण-निस्तारका विवेचन— रहने दे अब यह विषय । कहने दे पीछेका जो विषय । इसे विषयांतर धनंजय । नहीं मान तू ॥ ७९ ॥ मानो यह तीन जो गुण । अपने सामर्थ्यसे जान । होते जैसे देह अर्जुन । गुण ही आप ॥ ८० ॥ जैसे ईंधनका आधार । अग्नि होता है धनुर्धर । या उगता है तरुवर । भूमिका रस ॥ ८१ ॥ या दधि-घृतके रूपमें जैसे । होता है केवल दूध ही वैसे । या लेता है ईखका रस जैसे । गूडका रूप ॥ ८२ ॥ ऐसे हैं ये सांतःकरण । देह बनते तीन गुण । तभी होते बंध-कारण । धनंजय ॥ ८३ ॥ किंतु आश्चर्य धनुर्धर । यह बंधका जो गुब्बार । मुक्त दशामें संसार । कभी नहीं ॥ ८४ ॥ यदि गुण ये अपने धर्मानुसार । होते हैं शरीरके आगे पीछे स्वैर । आत्माके गुणातीतावस्थामें अंतर । नहीं आता ॥ ८५ ॥ ऐसी मुक्ति होती है सहज । तुझको कहता हूं मैं आज । स्वभावसे तू ज्ञान-पुंज । अमर अर्जुन ॥ ८६ ॥ चैतन्य होता है गुणमें । न होता गुणके पाशमें । कहा यह त्रयोदशमें । मैंने तुझको ॥ ८७ ॥ गुणोंको तजके कर्त्ता आत्मा जो उस पार है । देखता जानता ऐसा होता मेरा स्वरूप सो ॥ १९ ॥ ५५७ गुण-निस्तारयोग

जिस समय अंतःकरणमें । प्रतीत हो ज्ञान बोध-रूपमें । तब जैसे जागृत अवस्थामें । होता स्वप्न-भंग ॥ ८८ ॥ या जब तरंग उठते । उसे तटसे हैं देखते । बिंबके अंग-भंग होते । उसी प्रकार ॥ ८९ ॥ नट जैसे नहीं फंसता । अपने स्वांगको जानता । वैसे ही गुणोंको देखता । साक्षी-रूप ॥ २९० ॥ अथवा ऋतु-त्रयमें आकाश । ऋतुओंको देकर अवकाश । अलिप्तता रखता अविनाश । अपनी जैसे ॥ ९१ ॥ वैसे गुणमें गुणसे पर । अपने मूल-रूपमें स्थिर । होता अहंतापे अहंकार । उस समय ॥ ९२ ॥ वहांसे जब वह देखता । कहता मैं हूं साक्षी अकर्ता । क्रियाओंका नियोजन कर्ता । केवल हैं गुण ॥ ९३ ॥ तीन गुणोंका है जो प्रकार । दीखता कर्मका हो विस्तार । वह है गुणोंका विकार । धनंजय ॥ ९४ ॥ इसमें रहता हूं मैं ऐसा । वनमें वसंत ऋतु जैसा । वन-लक्ष्मीका विलास जैसा । कारण-रूप ॥ ९५ ॥ अथवा तारागणका लोपना । सूर्यकांतका उद्दीपन होना । तथा कमलोंका खिलना । या जाना तनका ॥ ९६ ॥ यहां किसी भी काममें कहीं । सविता उलझता नहीं । वैसे अकर्ता होता है देही । सत्ता-रूप ॥ ९७ ॥ गुण-प्रकाश कर गुण-दर्शन । होता है मुझमें गुणत्वका पोषण । गुणत्रयका होकर जो निरसन । रहता वह मैं हूं ॥ ९८ ॥ ऐसे विवेकका जो उदय । होता है जिसका धनंजय । उसे मिलता पथ विजय । गुणातीतका ॥ ९९ ॥ ज्ञानेश्वरी ५५८

अध्याय ११: विश्वरूपदर्शनयोग

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् । जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥ २० ॥ गुण-निस्तारसे मोक्ष प्राप्त होता है— निर्गुण ऐसा और जो पार्थ । रहता है उसको निश्चित । जानता वह उसमें नित । बसता ज्ञान ॥ ३०० ॥ अथवा मानो पांडुसुता । पाता है वह मेरी सत्ता । जिस भांति पाती सरिता । सिंधुत्व जैसे ॥ १ ॥ नळिका परसे उड़कर । बसता है शुक डालपर । वैसे वह मूल अहंकार । ओढता है सो ॥ २ ॥ अज्ञानकी नींद जो सोया था । जोरसे खुर्राटे भरता था । पाकर वह स्वरूपावस्था । उठता अर्जुन ॥ ३ ॥ बुद्धि-भेदका जब दर्पण । हाथसे छूटके गिरा जान । तब स्व-मुखाभास दर्शन । होगा कैसे ॥ ४ ॥ देहाभिमानका पवन जब रुकता । चित्तसिंधु पर तरंग नहीं उठता । तरंग-सिंधुका तब जैसे ऐक्य होता । वैसे जीवेशका ॥ ५ ॥ वर्षातमें गगनमें जैसे । लय होते हैं बादल वैसे । पूर्ण होता वह मद्भावसे । पांडुकुमार ॥ ६ ॥ ऐसे वह मद्रूप कर प्राप्त । शरीरमें रहता है सतत । नहीं होता है त्रिगुणमें लिप्त । देह-संभूत जो ॥ ७ ॥ अजी ! कांचका घर जो होता । प्रकाशको रोक न सकता । या वडवानल न बुझता । सिंधु-जलसे ॥ ८ ॥ वैसे ही आवागमन जो गुणोंका । बोध नहीं मिटा सकता उसका । जैसे चंद्र होता जलमें व्योमका । वैसे देहमें रहता वह ॥ ९ ॥ देह कारण ये तीन गुण जो तरता इन्हे । जन्म-मृत्यु जरा दुःख तरके मोक्ष जीतता ॥ २० ॥ ५५९ गुण-निस्तारयोग

शरीरमें करते हैं तीनों गुण । अपने सामर्थ्यका घोर नर्तन न भेजता वह करने दर्शन । अपनी अहंताको ॥ ३१० ॥ हृदयमें ऐसा वह धनंजय । रहता है करके दृढ निश्चय । शरीरमें करते क्या गुण-त्रय । यह न जानता वह ॥ ११ ॥ तज कर अंगका खोल । सर्प घुस बैठा पाताल । त्वचाका करेगा संभाल । कौन बाहर ॥ १२ ॥ अथवा पक्व सौरभ जैसा । लय होता आकाशमें वैसा । न आता कभी कमल-कोश । लौटकर जो ॥ १३ ॥ हुवा स्व-रूप समरससे । उसकी जीव-दशा भी वैसे । रहा शरीर-धर्म भी कैसे । जानता नहीं ॥ १४ ॥ तभी जन्म जरा मरण । इत्यादि जो छ हैं लक्षण । रहे ये देहके कारण । इसकी वार्ता नहीं ॥ १५ ॥ घट ही जब टूट गया । खपरा भी है फेंका गया । महदाकाशमें हो लिया । घटाकाश ॥ १६ ॥ देहका भाव जब मिटता । निजका ही स्मरण रहता । तब कहो अन्य क्या रहता । उसके बिन ॥ १७ ॥ ऐसा जो श्रेष्ठ बोध-युक्त । देहमें रहता सतत । तभी मैं उसे गुणातीत । कहता अर्जुन ॥ १८ ॥ श्रीकृष्णके सुन ये बोल । तुष्ट हुवा पार्थ निर्मल । गरजने पर बादल । मोर होता जैसे ॥ १९ ॥ अर्जुन उवाच कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो । किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ॥ २१ ॥ अर्जुनने कहा त्रिगुणातीतके देव कह लक्षण तू मुझे । आचार उसके कैसे कैसे निस्तारता गुण ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी ५६०

अर्जुनकी जिज्ञासा, गुणातीत कैसे होता है ?-- उसी तोषसे पूछता अर्जुन । दीखते उसके क्या लक्षण । जिसमें बसता है ऐसा ज्ञान । कह तू श्रीहरि ॥ २० ॥ उसका होता कैसा आचरण । करता कैसे गुण-निस्तरण । कृपाका तू नैहर श्रीकृष्ण । यह कह कृपाकर ॥ २१ ॥ अर्जुनका सुन यह प्रश्न । षड्गुणैश्वर्य-युत श्रीकृष्ण । उत्तर देता है कृपा-पूर्ण । सुनिये अब ॥ २२ ॥ विचित्र है तेरी यह बात । पूछता तू प्रश्न विसंगत । यह सत्य कैसे असत् पार्थ । ऐसा यह प्रश्न ॥ २३ ॥ जिसका नाम गुणातीत । नहीं होता गुण-संयुत । होता भी यदि गुण-युत । मुक्त रहता वह ॥ २४ ॥ कृष्ण प्रश्नका वास्तविक रूप समझाता है -- किंतु गुणमें है उलझता । तब गुणाधीन वह होता । अथवा गुण-मुक्त रहता । जानना कैसे ॥ २५ ॥ ऐसा है यदि तेरा प्रश्न । पूछ तू सुखसे अर्जुन । करता हूं समाधान । तेरे संदेहका ॥ २६ ॥ भगवान् उवाच प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव । न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥ २२ ॥ गुणोंके कल्लोलमें वह निर्लिप्त रहता है- जब रजोगुणका मद । देहमें लाता कर्म साध । प्रवृत्ति लेती है उसे बांध । कर्मांकुरसे ॥ २७ ॥ श्री भगवानने कहा प्रकाश मोह उद्योग गुण-कार्य स्वभाविक । पानेसे न करे खेद न धरे चाह लोपसे ॥ २२ ॥ (71) ५६१ गुण-निस्तारयोग