ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
करना सदैव ऐसा संग । सत्व-पोषणका हो अंग । तथा सत्व-वृद्धिका हो भाग । लेना ऐसा अन्न ॥ ११ ॥ साधकके लिये आहारका महत्व— जो है अति-स्वाभाविक । स्वभाव वृद्धि कारक । आहारसे नहीं नेक । साधन शक्त ॥ १२ ॥ प्रत्यक्ष देख तू यहां वीर । भला मनुष्य सुरा पीकर । करता कैसे मत्त होकर । उसी क्षणमें ॥ १३ ॥ अथवा जो मनमाने अन्न-सेवन । करता तब वात-पित्तके कारण । या नव-ज्वरमें दूध होता अर्जुन । दुःख-दायक ॥ १४ ॥ अथवा अमृत जैसे । टालता मरण वैसे । तथा है विष लेनेसे । आती मृत्यू ॥ १५ ॥ वैसे ही लेनेसे जो आहार । लेता है धातु वही आकार । धातु जैसे वैसे ही अंतर । करता भाव पुष्ठ ॥ १६ ॥ या तपनेसै जैसे बर्तन । तपता अंदर जल जान । वैसे धातु वश है अर्जुन । चित्त-वृत्ति ॥ १७ ॥ इसीलिये सात्विक सेवन । करनेसे होगा वृद्धि सत्व-गुण । तथा रज तम रसका सेवन । बढाता है वही ॥ १८ ॥ तमी कौन सात्विक आहार । रज तमका क्या क्या आकार । कहता हूं यह धनुर्धर । आदरसे सुन ॥ १९ ॥ आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः । यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥ ७ ॥ आहारका विविध रूप— उसी भांतिसे है आहार । हुए कैसे तीन प्रकार । तुझसे यह धनुर्धर । कहूंगा सुन ॥ १२० ॥ आहार भी सभीका है तीन भांति यथा रुचि । यज्ञ दान तपमें भी कहता भेद तू सुन ॥ ७ ॥ ज्ञानेश्वरी ६८०
रुचि है कैसे खानेवालेकी । निष्पत्ति होती वैसे अन्नकी । तथा रुचि होती है गुणोंकी । दासी जान ॥ २१ ॥ जीव जो है कर्त्ता औ, भोक्ता । गुणोंसे वह स्वभावता । प्राप्त करके त्रिविधता । बरतता है ॥ २२ ॥ इसीलिये त्रिविध आहार । यज्ञ करता तीन प्रकार । तप दान आदि भी व्यापार । त्रिविध जान ॥ २३ ॥ पहले आहार लक्षण । कहता हूं सुन अर्जुन । स्पष्टतासे कर वर्णन । इस समय ॥ २४ ॥ आयुःसत्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः । रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्विकप्रियाः ॥ ८ ॥ सात्विक आहारका विवेचन— सात्विक गुणकी ओर जब । दैवसे भोक्ता पढ़ता तब । उसका रस बढ़ता सब । मधुर रसमें ॥ २५ ॥ होते हैं जो रस-भरित । मधुर रसके पदार्थ । तथा मधुर स्निग्ध पार्थ । परिपक्व सहज ॥ २६ ॥ आकारमें होते सुंदर । स्पर्शमें भी होते मधुर । जीभको स्नेह मधुर । उसका स्पर्श ॥ २७ ॥ रससे जो भरित । द्रव-भावसे युक्त । अग्नि-स्पर्शसे मुक्त । ढीली छालका ॥ २८ ॥ अल्प-गात्र परिणाम महत्तर । होता जैसे गुरु-मुखका अक्षर । वैसे दीखता अल्प होता अपार । तृप्ति देनेमें ॥ २९ ॥ रुचिमें होता जैसे मधुर । स्वास्थ्यमें भी होता हितकर । ऐसा अन्न होता प्रियकर । सात्विकोंको ॥ १३० ॥ सत्व प्रीति सुख स्वास्थ्य आयुष्य बल-वर्धक । रसाल मधुर स्निग्ध स्थिर आहार सात्विक ॥ ८ ॥ ६८१ श्रद्धा-निरूपण-योग
ऐसे गुण लक्षण पूर्ण । होता है सात्विक भोजन । आयुष्यको देता है त्राण । नित्य-नया जो ॥ ३१ ॥ इस भांति है वह सात्विक रस । देहमें बरसता रात दिवस । जिससे आयुष्य नदी स-उल्लास । बढ़ती देहमें ॥ ३२ ॥ उनके सत्वका है पोषण । होता इसी अन्नके कारण । दिनके उन्नतिका साधन । भानु होता जैसे ॥ ३३ ॥ तथा शरीर और मन । समर्थ करता है अन्न । तब रोगका क्या कारण । रहता यहां ॥ ३४ ॥ होता जब सात्विक भोग्य । तब भोगते हैं आरोग्य । शरीरको मिला सौभाग्य । उदय होकर ॥ ३५ ॥ लेन देन होता सुखका । तथा उत्कर्ष भलाईका । बढ़ता स्नेह आनंदका । इससे सदैव ॥ ३६ ॥ ऐसा है सात्विक आहार । परिणाममें है मधुर । करता महा उपकार । अंतर्बाह्य ॥ ३७ ॥ राजसिक आहारका विवेचन— राजसकी जिसमें है प्रीति । जिस रसमें उसकी रति । करूंगा उसकी अभिव्यक्ति । प्रसंगसे अब ॥ ३८ ॥ कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः । आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९ ॥ कालकूट मृत्यु बिन । इतना कटु है मान । या चूनेसे भी अर्जुन । अधिक आम्ल ॥ ३९ ॥ आटेमें पानीके समान । कर नमकका मिलान । इसी भांति रसमें मान । डालते नमक ॥ १४० ॥ खारा सूखा कटू तीखा खट्टा अत्युष्ण दाहक । दुःख शोक तथा रोग देता आहार राजस ॥ ९ ॥ ज्ञानेश्वरी ६८२
होता जो ऐसे नमकीन । राजसका प्रिय भोजन । निगलता अग्नि समान । उष्ण अतिशय ॥ ४१ ॥ भाफके छोर पर जैसे । रसके बात लगानेसे । बल पायेंगे दीप वैसे । भोजन उष्ण ॥ ४२ ॥ आंधीको पीछे ढकेलेगा । या साबल चुभ जायेगा । ऐसा तीता वह खायेगा । घावके बिन चुभता जो ॥ ४३ ॥ राखसा जो होता रूक्ष । व्यंजन होता है रूक्ष । जिव्हा दंशसा जो रूक्ष । भाता है उसे ॥ ४४ ॥ परस्परमें दांत । टकरायेेंगे साथ । ऐसे वस्तुसे पार्थ । तोषता वह ॥ ४५ ॥ पहले ही जो चटपटा होता । उसमें सरसों आदि पड़ता । जब उसको मुखमें डालता । नाकमें जाती बाफ ॥ ४६ ॥ आगको भी जो चुप करता । ऐसे बनता जो रायता । राजसको प्राणसे भी भाता । ऐसे व्यंजन ॥ ४७ ॥ कम मान जीभकी चुभन । जीभका वह पागल बन । भरता वह आगसा अन्न । अपने उदरमें ॥ ४८ ॥ भड़कती इससे आग अंदर । चैन न आता भूमि या सेज पर । पानीका पात्र नहीं होता है दूर । मुखसे कभी ॥ ४९ ॥ नहीं खाया था वह आहार । सोया हुवा व्याधि अजगर । चेतानेमें डाला मद्यसार । उदरमें अपने ॥ १५० ॥ होडमें उमडता परस्पर । एक साथ रोगोंको दे आधार । फलता ऐसे राजस आहार । दुःख रूप केवल ॥ ५१ ॥ ऐसे राजस आहार । दिखाया है धनुर्धर । परिणामका विचार । सविस्तृत ॥ ५२ ॥ तामसिक आहारका विवेचन— अब तामस जिसे खाता । उसे कैसा आहार भाता । उसको अब मैं कहता । न कर तू घृणा ॥ ५३ ॥ ६८३ श्रद्धा-निरूपण-योग
सडा गला तथा झूठना उसमें न अहित माना । चरती जैसे भैंस जाना वैसे खाता ॥ ५४ ॥ यातयामं गतरसं पूतिपर्युषितं च यत् । उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥ १० ॥ सबेरेका पका हुवा अन्न । दोपहरका दूसरे दिन । ऐसे लेता है वह भोजन । प्रेमसे तामस ॥ ५५ ॥ या आधा ही पका हुवा । या संपूर्ण जला हुवा । रस हीन बना हुवा । ऐसा वह खाता ॥ ५६ ॥ हुई जब रस-निष्पत्ति । मिठासकी हो अभिव्यक्ति । वह अन्न ऐसी प्रतीति । नहीं करता तामस ॥ ५७ ॥ कभी किसी प्रसंगसे । अच्छा अन्न मिलनेसे । बैठता है व्याघ्र जैसे । सडने तक ॥ ५८ ॥ पक कर हुवा बहु दिन । हुवा है वह स्वादसे हीन । सूखा या सडा हुवा अन्न । खाता वह प्रीतिसे ॥ ५९ ॥ ऐसे सड़ा हुवा अन्न । कीचड़सा करता सान । सबके साथही भोजन । करता एकत्र ॥ १६० ॥ ऐसे घिनौना वह जो खाता । उसे सुख भोजन मानता । इससे भी संतुष्ट नहीं होता । वह पापी ॥ ६१ ॥ देख तू यह चमत्कार । शास्त्र-निषिद्ध देखकर । निषिद्ध ही एकेक कर । लेता कुपथ्य ॥ ६२ ॥ अपेयका वह पान । अभोज्यका भोजन । करनेमें है अर्जुन । होता उतावला ॥ ६३ ॥ ऐसे तामस अन्न युक्त । होता है ऐसी आशा-युक्त । इसका फल भी तुरंत । मिलता उसको ॥ ६४ ॥ रस हीन तथा ठंडा बासी दुर्गंध-युक्त जो निषिद्ध और उच्छिष्ट आहार तामस-प्रिय ॥ १० ॥ ज्ञानेश्वरी : ६८४
जमी छूता अपवित्र । अन्नको उसका वस्त्र । तभी वह पाप-पात्र । बनता है ॥ ६५ ॥ फिर इसके उपरांत । खानेकी उसकी रीत । उदर-पूर्तिकी सतत । यातना मान ॥ ६६ ॥ शिर छेदनेसे क्या मिलता । अग्नि-प्रवेशसे जो बनता । उसको वह नित सहता । धनुर्धर ॥ ६७ ॥ इसीलिये जो तामस अन्न । उसके फलका क्या कथन । उसको खाना ही दुःख जान । कहता देव ॥ ६८ ॥ यज्ञके भी तीन प्रकार हैं— जैसे तामस आहार । वैसे हैं यज्ञके प्रकार । वे भी होते तीन प्रकार । कहता हूं सुन ॥ ६९ ॥ इन तीनोंमें प्रथम । सात्विक यज्ञका मर्म । सुन यह सुमहिम । शिरोमणि तू ॥ १७० ॥ अफलाकांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते । यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ ११ ॥ सात्विक यज्ञका विवेचन— जैसे है एक प्रियोत्तम । उसके बिन न हो काम । ऐसे जिसका मनोधर्म । पतिव्रताका ॥ ७१ ॥ गंगा सिंधुको छोड़कर । नहीं जाती है किसी ओर । तथा आत्माको देखकर । वेद होते मौन ॥ ७२ ॥ तथा स्व-हितमें जो होती । सदा निरत चित्त-वृत्ति । नहीं रहती अहंकृति । फल हेतु यहां ॥ ७३ ॥ पहुंच कर वृक्षका मूल । लौटना न चाहता जल । सूख जाता है वहीं केवल । उसी मूलमें ॥ ७४ ॥ तजके फलकी आशा मानके करणीय है । विधिसे मनसे जो है करते यज्ञ सात्विक ॥ ११ ॥ ६८५ श्रद्धा-निरूपण-योग
वैसे ही मन और तन । यजन निश्चयके स्थान । होकर सदैव विलीन । न चाहते कुछ ॥ ७५ ॥ फल अभिलाषा तजकर नित । स्वधर्म बिन अन्यमें हो विरक्त । करता है यज्ञ-कार्य अलंकृत । सर्वांग पूर्ण ॥ ७६ ॥ देखते हैं दर्पणमें जैसे । अपनी ही आंखोंकी ओरसे । या हथेली पर रत्न जैसे । दीपसे देखते ॥ ७७ ॥ या उदित होते ही दिवाकर । दीखते नाना पथ चहूं ओर । वैसे देखके वेदका निर्धार । चलता वह ॥ ७८ ॥ वह कुंड मंडप वेदी । अन्य भी साधन समृद्धि । पाता जैसी कहती विधि । वैसे वह सकल ॥ ७९ ॥ जैसे सब अलंकार यथा स्थान । शरीर पर करते हैं धारण । वैसे रखता वह स्वस्थान । योजन पूर्वक ॥ १८० ॥ करना क्या इसका वर्णन । देती यज्ञ विद्याही दर्शन । मूर्तिमंत हो आयी स्वस्थान । यज्ञ-हेतुसे ॥ ८१ ॥ वैसे सांगोपांग । होता है जो याग । अहंकृति भाग । डुबाकर ॥ ८२ ॥ कहते हैं उत्तम लक्षण । तुलसी वृक्षका क्षण क्षण । न रख कोई आशा अर्जुन । फल पुष्प छायाकी ॥ ८३ ॥ या होता है जो फलाशा बिन । योजना पूर्ण यज्ञ निर्माण । ऐसे यज्ञ करना जान । यज्ञ सात्विक ॥ ८४ ॥ अभिसंधाय तु फलं दंभार्थमपि चैव यत् । इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२ ॥ राजसिक यज्ञका विवेचन— कहना यह भी अर्जुन । यज्ञ वैसे ही सुलक्षण । जैसे राजाको निमंत्रण । श्राद्धमें जैसे ॥ ८५ ॥ फलका अनुसंधान रखके दंभपूर्वक । होता यजन लोगोंमें जान तू यज्ञ राजस ॥ १२ ॥ ज्ञानेश्वरी ६८६
राजा यदि घरमें आता । अन्य भी जो कार्य साधता । तथा है यश भी मिलता । होता है श्राद्ध ॥ ८६ ॥ करके ऐसा पूर्ण विचार । स्वर्ग मिलेगा मरने पर । तथा कीर्ति होगी यहां पर । यज्ञ दीक्षासे ॥ ८७ ॥ ऐसा फलाशासे केवल । किया यज्ञ-कर्म सकल । यश-कीर्ति जिसका मूल । यज्ञ है राजस ॥ ८८ ॥ विधिहीनमसृष्टान्नं मंत्रहीनमदक्षिणम् । श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ १३ ॥ तामसिक यज्ञका विवेचन— पशु-पक्षियोंके व्याहमें कमी कहीं । कामके बिना ज्योतिषीका काम नहीं । वैसे तामसीके यज्ञमें सर्वत्र ही । आग्रहही मूल ॥ ८९ ॥ पवन राह नहीं चाहता । मरण मुहूर्त देखता । निषिद्धसे नहीं है डरता । अग्नि जैसे ॥ १९० ॥ वैसे हैं तामसके आचार । न मानता विधि-व्यवहार । इसीलिये वह धनुर्धर । होता उच्छृंखल ॥ ९१ ॥ विधि-विधान वहां नहीं होता । मंत्र-तंत्रका स्पर्श न रहता । अन्न मात्र भी वह नहीं देता । भैंस भी जो खाये ॥ ९२ ॥ शत्रु-बोध है जहां ब्राह्मण । वहां आयेगी कैसे दक्षिणा । आंधीमें आग साथ अर्जुन । ऐसे है वहां ॥ ९३ ॥ ऐसे वहां सभी व्यर्थ होता । श्रद्धाका मुख नहीं दीखता । वह घर जैसे लूटा जाता । निपुत्रिकका ॥ ९४ ॥ इस भांति होता यज्ञाभास । उसका नाम यज्ञ तामस । कहता है यह श्रीनिवास । धनुर्धरसे यहां ॥ ९५ ॥ न है विधि न है मंत्र अन्नोत्पत्ति नहीं जहां । नहीं श्रद्धा नहीं त्याग वह है यज्ञ तामस ॥ १३ ॥ ३८७ श्रद्धा-निरूपण-योग
जैसे गंगाका ही उदक । ले जाते भिन्न मार्गसे देख । तब मल एक शुद्धि एक । आता जैसे ॥ ९६ ॥ तपका स्वरूप— तथा तीन गुणोंसे तप । हुवा है यहां तीन रूप । करनेसे एक है पाप । उद्धरता दूजा ॥ ९७ ॥ तपके यहां तीन प्रकार । हुए हैं जैसे पांडुकुमार । यह जाननेमें ही सुकर । जान तू तप क्या है ॥ ९८ ॥ कहते हैं यहां तप किसको । समझाता हूं मैं यह तुझको । फिर उसके तीन प्रकारको । कहूंगा मैं ॥ ९९ ॥ तप है यहां जो सम्यक । वह भी त्रिविध रूपक । शारीरिक औ' मानसिक । तथा वाचिक भी ॥ २०० ॥ अब त्रिविध-तपमें सुन । शारीरिक तपका लक्षण । जिसे जो प्रिय हो उसे मान । शंभु या श्रीहरि ॥ १ ॥ देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् । ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥ शारीरिक तप सात्विक— जिसको प्रिय देवालय । यात्रादि करनेमें समय । आठौ प्रहर जैसे हैं पाय । चले काल-चक्रसे ॥ २ ॥ देवांगणकी रखने स्वच्छता । पूजोपचारमें नित रहता । तत्पर हो वह सब करता । हाथकी शोभा जान ॥ ३ ॥ लिंग या मूर्ति है देखता । अष्टांग प्रणाम करता । जैसे स्वाभाविक गिरता । कोई वस्तु ॥ ४ ॥ तथा विधि-विधानसे सतत । रहते जो वृद्ध गुणी निरत । प्राज्ञ ब्राह्मण आदिकी जो नित । करता सेवा ॥ ५ ॥ गुरु-देवादिकी पूजा स्वच्छता वीर्य-संग्रह । अहिंसा ऋजुता जान देहका तप है कहा ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी ६८८
तथा प्रवास या पीडासे । थका मांदा जो मिला उसे । देता है वह शुश्रूषासे । सुख और शांति ॥ ६ ॥ सभी तीर्थका जो आधार । माता पिताका है शरीर । उनपर है निछावर । होता सेवामें ॥ ७ ॥ वैसे ही संसार जैसा दारुण । मिलते ही जो हरता थकान । ज्ञान-दानमें वह सकरुण । भजता गुरु ॥ ८ ॥ तथा अग्निमें जो स्वधर्मकी । मलिनता देह-अहंताकी । मिटाना पुट देके आवृत्तिकी । पुनः पुनः पार्थ ॥ ९ ॥ भूतजातमें वह वस्तुको जान । करता परोपकार औ' नमन । स्त्री-विषयमें करता क्षण क्षण । निग्रह मनका ॥ २१० ॥ जन्मके ही प्रसंग । स्पर्श हुवा स्त्री अंग । आगे है जन्म सांग । रखना शुद्ध ॥ ११ ॥ भूतजातमें एक । वस्तुको वह देख । नहीं जो तृण तक । करता भंग ॥ १२ ॥ इस भांतिका जब आचरण । करता रहता जिसका तन । तब उसमें खिला यह जान । शारीरिक तप ॥ १३ ॥ करना यह सब पार्थ । देहसे ही है विशेषता । तभी मैं उसको कहता । तप शारीरिक ॥ १४ ॥ एवं शारीरिक जो तप । दिखाया है उसका रूप । कहता हूं सुन निष्पाप । तप वाङ्मय ॥ १५ ॥ अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् । स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५॥ वाणीका तप सात्विक— लोहेका आकार तूक । न घटाकर कनक । करता कैसे है देख । पारस वैसे ॥ १६ ॥ हितार्थ बोलना सत्य प्रेमसे न खले कभी । स्वाध्याय करना नित्य वाणीका तप है कहा ॥ १५ ॥ ६८९ (३३) श्रद्धा-निरूपण-योग
ऐसे जो नहीं दुखाता । जो सुनता सुख पाता । ऐसा ही वह बोलता । साधुतासे ॥ १७ ॥ पानी तो वृक्षको दिया जाता । किंतु पासका घास उगता । ऐसे है एकसे कहा जाता । होता सबका सुख ॥ १८ ॥ जैसे अमृतकी गंगा बहकर । करती है वह प्राणोंको अमर । स्नानसे पाप ताप विनाश कर । देती है शांति ॥ १९ ॥ वैसे है अविवेकको मिटाता । अपना अनादित्व दिलाता । पीयूषसा रुचि न विघडाता । सुननेवालेकी ॥ २२० ॥ जब कोई है पूछता । तब है ऐसा बोलता । या आवर्तन करता । नाम या निगम ॥ २१ ॥ ऋग्वेदादि जो है तीन । जा बसते वाग्भुवन । बनता जैसे वदन । ब्रह्मशाला ॥ २२ ॥ नहीं तो कोई भी नांव । शैव अथवा वैष्णव । बनाता वाचा वाग्भव । तप मानके ॥ २३ ॥ मानसिक तप, सात्विक— अब तप जो मानसिक । यह भी कहता हूं देख । कहे लोक-नाथ नायक । इस समय ॥ २४ ॥ मनःप्रसादःसौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥ सरोवरको यदि तरंग । तजते हैं आकाशको मेघ । या चंदन-वनको आग । उसी भांति ॥ २५ ॥ नाना कला-वैषम्य चंद्र । तजती चिंतायें नरेंद्र । अथवा है क्षीर समुद्र । मंदराचल ॥ २६ ॥ प्रसन्न वृत्ति सौम्यत्व आत्म-चिंतन संयम । भावना रखना शुद्ध मनका तप है कहा ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी ६९०
वैसे नाना विकल्प-जाल । छोड़कर जाते सकल । मन रहता है केवल । स्वरूपावस्थामें ॥ २७ ॥ उष्णताके बिन प्रकाश । जाड्य बिन अन्नमें रस । रिक्तता बिन अवकाश । होता जैसे ॥ २८ ॥ देखकर अपना विश्रांति-स्थान । अपना स्वभाव छोड़ता है मन । शीतसे कांपने न देता है तन । अपने ही शीतसे ॥ २९ ॥ जैसे अचल कलंक बिन । चंद्र-बिंब होता परिपूर्ण । वैसे सुशोभित स्वच्छ मन । होता है जो ॥ २३० ॥ मिट गये हैं वैराग्यके आघात । तथा पचा मनका अस्वास्थ्य पार्थ । बन गया है वहां उत्तम खेत । निज-बोधका ॥ ३१ ॥ तभी विचार करने शास्त्र । चलना चाहते जो एकत्र । वह है कभी वाचाका सूत्र । नहीं पकड़ता ॥ ३२ ॥ स्व-लाभका लाभ होते ही जब । मनका मनत्व मिटता तब । नीर-स्पर्शसे पिघलता सब । लवण जैसे ॥ ३३ ॥ जब वहां भाव ही नहीं उठता । इंद्रियोंके पीछे वह कैसे दौड़ता । तब यह कैसे कह तू पहुंचता । विषय-ग्राममें ॥ ३४ ॥ इसीलिये है मनमें ऐसे । भाव-शुद्धि होती है आपसे । रोम-शुद्धि हथेलीपे जैसे । होती है आप ॥ ३५ ॥ अधिक क्या कहें अर्जुन । यह दशा पाता है मन । तब मन-तपाभिधान । प्राप्त करता ॥ ३६ ॥ किंतु अब तू यह जान । मानस तपका लक्षण । श्रीकृष्ण कहता संपूर्ण । कहा मैने ॥ ३७ ॥ इसीलिये देह वाचा चित्त । करता जो विविधत्व प्राप्त । वह है सामान्य तप पार्थ । जाना तूने ॥ ३८ ॥ अब गुण-त्रयके संगसे । यही त्रिविध रूप लेनेसे । क्या होता यह प्रज्ञा बलसे । सुन तू अब ॥ ३९ ॥ ३९१ श्रद्धा-निरूपण-योग
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः । अफलाकांक्षिभिर्युक्तैः सात्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥ सात्विक तप— तभी यह तप है त्रिविध । कहा है तुझसे प्रबुद्ध । वह करें हो पूर्ण श्रद्ध । छोडके फलाशा ॥ २४० ॥ वह संपूर्ण सत्व-शुद्धि । करता हो आस्तिक बुद्धि । तब उसको है सुबुद्धि । कहते तप सात्विक ॥ ४१ ॥ राजसिक तप— सत्कारमानपूजार्थं तपो दंभेन चैव यत् । क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥ १८ ॥ या करने तपका स्थापन । जगमें द्वैत कर उत्पन्न । प्राप्त करने सर्वोच्च स्थान । लोगोंमें तब ॥ ४२ ॥ तथा त्रिभुवनका सन्मान । नहीं पाये कोई अन्य जन । पंगतमें सर्वोच्च आसन । पाने भोजनमें ॥ ४३ ॥ अथवा विश्वके स्तोत्र । बनना है आप मात्र । विश्व ही अपनी यात्रा । करने आये ॥ ४४ ॥ तथा लोगोंसे ले पूजा विविध । आश्रय बने आप यह साध । इससे भोग भोगें सर्व-विध । इस आशासे ॥ ४५ ॥ करके अंगांगका श्रृंगार । सजाता है तपसे शरीर । तडपती बेचने शरीर । वेश्या जैसे ॥ ४६ ॥ रखके धन-मानमें आस । तपते हैं करके आयास । तब ऐसा ही तप राजस । कहलाता है ॥ ४७ ॥ त्रिविध तप जो सारा श्रद्धा उत्कट जोडके । तजके फलकी आशा होता है वह सात्विक ॥ १७ ॥ चाहके मान सत्कार करते दंभ-पूर्वक । वह चंचल तू जान तप राजस अस्थिर ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ६९२
पहुरणी जब थन चूसता । गायके पास दूध न रहता । या जानवर खेतको चरता । न मिलती उपज ॥ ४८ ॥ तपका ऐसे प्रदर्शन । करनेसे वह अर्जुन । होता है फलसे विहीन । कष्टसे जो किया था ॥ ४९ ॥ देख कर ऐसे विफल । छोड़ता है तप सकल । तभी होता वह चंचल । तप राजस ॥ २५० ॥ जैसे अकालके बादल । भर देते नभ - मंडल । नहीं टिकते क्षण-काल । गरज कर भी ॥ ५१ ॥ राजस तप ऐसा होता । फलते निष्फल बनता । आचरणमें न टिकता । सिद्धि तक ॥ ५२ ॥ देख तू अब वही तप । किया जाता तामस रूप । इह-परमें परंतप । होता व्यर्थ ॥ ५३ ॥ मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः । परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥ तामसिक तप- केवल मूर्खताका संचार । जीवमें होकर धनुर्धर । माना जाता अपना शरीर । शत्रुरूप ॥ ५४ ॥ जहां पंचाग्निकी ज्वाल । जलाती देह सकल । मानो तन मन बल । बनाके समिधा ॥ ५५ ॥ मस्तकपे जलाते गुगूल । या पेटमें चुभाते हैं कील । या जलाते हैं अंग सकल । आगसे अपना ॥ ५६ ॥ तथा रोककर श्वासोच्छ्वास । करते व्यर्थ ही उपवास । या करते धूममें वास । हो अधोमुख ॥ ५७ ॥ हठसे जो किया जाता करके आत्म-पीडन । तथा जो पर-घातार्थ कहाता तप तामस ॥ १९ ॥ ६९३ श्रद्धा-निरूपण-योग
तथा हिमोदकमें आकंठ । नदीमें या पाषाणपे बैठ । जीते मांसके टुकडे काट । डालते हैं ॥ ५८ ॥ ऐसे भांति भांतिसे काया । जला घुलाके धनंजया । नाशार्थ तप कहलाया । दूसरोंके ॥ ५९ ॥ अंग-भारसे छूटा पाषाण । गिरके टूटता आप जान । आता है जो उसका हनन । करता राहमें ॥ २६० ॥ अपनेको देकर दुःख । पाते रहते हैं जो सुख । करने उन्हे अधोमुख । तप जो करते ॥ ६१ ॥ ऐसे दुःखका कर स्वीकार । करते हैं तप धनुर्धर । स्व-पर घातक हैं जो घोर । तप तामस ॥ ६२ ॥ ऐसे सत्त्वादिके कारण । होते तपके प्रकार तीन । उसको व्यक्त किया है जान । स्पष्ट रूपसे ॥ ६३ ॥ करनेमें अब कथन । सहज प्रसंग है जान । कहता दानका लक्षण । तीन प्रकारके ॥ ६४ ॥ इन्ही गुणके कारण । दान भी त्रिविध जान । वही तू पहले सुन । सात्विक कैसे ॥ ६५ ॥ दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे । देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥ २० ॥ सात्विक दान— करते स्वधर्माचरण । पाया है आप जो धन । उसको देना स-संमान । किसी समय ॥ ६६ ॥ मिलता सु-बीज प्रसंग । नहीं मिलता खेत चांग । ऐसा यह दानका योग । दीखता मुझे ॥ ६७ ॥ अनर्घ्य रत्न चढ़ता हाथ । तब स्वर्ण न मिलता पार्थ । दोनो मिलते हैं एक साथ । न आता ऐसा योग ॥ ६८ ॥ धर्मके भावसे देना उपकार न चाहके । देश काल तथा पात्र देखके दान सात्विक ॥ २० ॥ ज्ञानेश्वरी ६९४
किंतु पर्व सुहृद् संपत्ति । इन तीनोंकी होती है युति । जब करता भाग्य उन्नति । अपना तब ॥ ६९ ॥ इस भांति होता हो तो दान । बने जो सत्वका संघटन । वहां है देश-काल भाजन । सब उगते हैं ॥ २७० ॥ करना पहला ऐसा प्रयास । होना कुरुक्षेत्र या काशीवास । नहीं हो तो ऐसा कोई देश । धनुर्धर ॥ ७१ ॥ तब हो रवि-चंद्र राहु मेल । होने पाये ऐसा ही पुण्य-काल । अथवा हो ऐसा कोई निर्मल । काल दूसर ॥ ७२ ॥ ऐसे ही स्थल-काल हो एकत्र । मिले ऐसे ही संपत्ति पात्र । जैसे मूर्त-रूप ही पवित्र । आया हो वहां ॥ ७३ ॥ सदाचारका हो सदन । चलता हो वहां वेद-दान । ऐसे द्विज-रत्न पावन । आया हो वहां ॥ ७४ ॥ उनके पद-तलमें पार्था । उत्सर्ग करना वित्त सत्ता । जैसे पतिके सम्मुख कांता । आती जैसे ॥ ७५ ॥ या पराई धरोहर । सांस लेते लौटाकर । या राजाको जो किंकर । देता है पान ॥ ७६ ॥ ऐसे हो निष्काम अंतःकरण । करना भूमि धनादि अर्पण । तथा उठने न देना अर्जुन । फलेच्छा कभी ॥ ७७ ॥ और जिसको देना है दान । पात्र वह ऐसे हो अर्जुन । न करे कभी उसका मन । लौटानेका नाम ॥ ७८ ॥ यदि कोई आकाशको पुकारता । आकाश उसका उत्तर न देता । या उलटे देखनेसे न दीखता । दर्पणमें जैसे ॥ ७९ ॥ गेंद जैसे पानी पर । मारनेसे भी दे जोर । न आता उछलकर । अपने हाथमें ॥ २८० ॥ अथवा सांडको दिया चारा । तथा कृतघ्नको माना प्यारा । न मानते वे उपकार । उसी भांति ॥ ८१ ॥ ६९५ श्रद्धा-निरूपण-योग
करता है जो दानका अंगीकार । न कर सके कभी प्रत्युपकार । वैसे रहता दाताको भूलकर । चितमें भी वह ॥ ८२ ॥ ऐसी परिस्थितिमें जो दान । सहज दिया गया अर्जुन । जान तू वही सात्विक दान । सबमें श्रेष्ठ ॥ ८३ ॥ वही है स्थल और काल । घटता पात्रका सुमेल । दान-भाग भी है निर्मल । होना न्यायगत ॥ ८४ ॥ यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः । दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥ राजसिक दान— दूधकी आशा मनमें रखकर । लाते हैं नित गायको चराकर । तथा उपजकी आशा रखकर । करते खेत जैसे ॥ ८५ ॥ या दृष्टि रख उपहार पर । बुलाते हैं आप्तोंको घर पर । या वायन भेजते घर पर । गोद भरनेवालोंके ॥ ८६ ॥ काटकर सूदका धन । देते हैं जैसे आप ऋण । या लेकर शुल्कका धन । औषध वैद्य ॥ ८७ ॥ जैसे जिसे दिया जो दान । काम आये वह स-साधन । ऐसी भावना रख अर्जुन । दिया जाता जो ॥ ८८ ॥ अथवा कोई राह चलता । जो है किसी काम नहीं आता । मिलता है तब पांडुसुत । द्विजोत्तम ऐसा ॥ ८९ ॥ एक भी कवडीके लिये । गोत्रजोंने जो पाप किये । सर्व प्रायश्चित्तके लिये । छोडता उदक ॥ २९० ॥ वैसे ही पारलौकिक । वांछना रख अनेक । दिया जाता वह एक । ग्रासमें भी न आता ॥ ९१ ॥ उपकार अपेक्षासे अथवा फल चाहके । क्लेश-पूर्वक जो देते जान तू दान राजस ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी ६९६
ले जाता ब्राह्मण जब दान । थकता बडी हानि मान । लुट लिया सारा ही धन । चोरोंने जैसे ॥ ९२ ॥ सुन इस मनोवृत्तिसे । दिया जाता जो दान उसे । कहाता त्रिलोकमें जैसे । राजस दान ॥ ९३ ॥ अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते । असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥ तामसिक दान— म्लेच्छोंका जो वसति-स्थान । धर्म-हीन स्थान या वन । या शिविर हो या कुस्थान । चौराहेका ॥ ९४ ॥ ऐसे स्थान पर धनंजय । सांझ हो या रातके समय । उदारतासे करता व्यय । चोरीका धन ॥ ९५ ॥ पात्र वहां ग्राम या नागरी । सामान्य स्त्रियां हो या जुआरी । मूर्तिमंत जो भूलसे पूरी । भूल-मात्र ॥ ९६ ॥ रूप नृत्यका जो प्रदर्शन । होता वहां आंखोंको दर्शन । तथा भाटोंका गीत-श्रवण । होता कर्ण जप ॥ ९७ ॥ अल्प-स्वल्प फिर जो मादक । पुष्प चंदनादि सुगंधिक । उसमें उतरता भ्रामक । वेताल तामस ॥ ९८ ॥ वहां लूटे हुए अनेक । भूषण स्वर्ण-रत्नादिक । डालता अन्न छत्र एक । वधिकोंको जैसे ॥ ९९ ॥ ऐसे जो जो है दिया जाता । उसे मैं तामस कहता । उसमें भी दैवसे होता । और सुयोग ॥ ३०० ॥ दैवयोगसे गुणाक्षर घडता । अथवा तालियोंमें काग फंसता । वैसे ही देशमें आ जुडता । तामसोंका पर्व ॥ १ ॥ धरके भावना तुच्छ देश काल न देखके । बिना आदर जो देते जान तू दान तामस ॥ २२ ॥ ६९७ श्रद्धा-निरूपण-योग
जब देख तमोगुणी संपन्न । भाग्यसे आया कोई लेने दान । तब वह फूलता साभिमान । नशामें उन्मत्तसा ॥ २ ॥ नहीं होती मन में श्रद्धा पार्थ । न झुकाता वह अपना माथ । आप नहीं करता या कराता । अर्घ्यादिक ॥ ३ ॥ नहीं देता अभ्यागतको आसन । वहां गंधाक्षतकी बात ही कौन । तामसमें कहां ये सब लक्षण । कह तू होंगे संभव ॥ ४ ॥ कुछ देकर जैसे लौटाते ऋणदाता । वैसे उसके हाथमें वह कुछ देता । तू तुकार कर बोलना उसका होता । स्वभाव सदैव ॥ ५ ॥ जिसको जो कुछ जब वह देता । उसीमें करता उसकी योग्यता । या उसका अपमान भी करता । कुवचनोंसे ॥ ६ ॥ होता है जो इस प्रकार । धन देता पांडुकुमार । उसे कहता चराचर । तामस दान ॥ ७ ॥ सत्वको स्पष्ट करनेके लिये रज तम दिखाया है— ऐसे हैं जिनके लक्षण । इन लक्षणोंके जो तीन । कहे हैं ये दान दे ध्यान । रज तम पर ॥ ८ ॥ यहां मैं यह जानता । मनमें है तू सोचता । तेरी यह कल्पकता । है विलक्षण ॥ ९ ॥ जो है भव-बंध मोचक । कहा गया कर्म सात्विक । तब क्यों कहता सदोष । कर्मका लक्षण ॥ ३१० ॥ जैसे पिशाचको नहीं हटाते । गढ़ा हुवा धन न पा सकते । या यदि धुंएको नहीं सहते । न लगता दीप ॥ ११ ॥ शुद्ध सत्व पर भी वैसे सतत । पट पडता रज-तमका पार्थ । उसको भेदनेकी यह जो बात । अस्वाभाविक क्या ? ॥ १२ ॥ श्रद्धा दानादि जो सभी पार्थ । हमने तुझको क्रियाजात । कहे हैं अब उसमें व्याप्त । तीनों ही गुण ॥ १३ ॥ वहां कहनेके ये जो तीन । उद्देश्य न रखता था मन । बतानेमें सत्वके लक्षण । कहे ये दो भी ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी ६९८
अध्याय १३: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
दोनोंमें जब तीसरा होता । दोनोंको तजनेसे मिलता । अहोरात्र त्यागसे मिलता । संध्यारूप जैसे ॥ १५ ॥ वैसे रज-तमका विनाश । डालता उत्तम प्रकाश । तब दीखता सत्व विशेष । स्पष्टरूपसे ॥ १६ ॥ एवं दिखानेमें सत्व तुझ । दिखाया है तम तथा रज । वह छोड़ सत्वसे तू काज । साध ले अपना ॥ १७ ॥ सत्वसे जो ऐसे निर्मल । कर तू यज्ञादि सकल । जिससे होगा करतल । सकल सिद्धि ॥ १८ ॥ सूर्य जब प्रकाशित करता । जगमें तब क्या न दीखता । वैसे ही सत्वसे नहीं मिलता । फल वह कौन ॥ १९ ॥ अजी ! जो मन भाया फल । प्राप्त करनेमें सकल । तथा मोक्षमें मी निश्चल । होता समर्थ ॥ ३२० ॥ इससे भिन्न है बात एक । उसका साथ मिलता नेक । तब पैठता वह सात्विक । मोक्ष-ग्राममें ॥ २१ ॥ होता है जब स्वर्ण शुद्ध । तथा राजाक्षरसे सिद्ध । चलन कहाता प्रसिद्ध । उसी भांति ॥ २२ ॥ स्वच्छ शीतल सुगंध । जल होता सुख-प्रद । किंतु पावित्र्य संबंध । आता तीर्थसे ॥ २३ ॥ नाला हो कितना ही अपार । जब गंगा करती स्वीकार । तब होता उसका सागर- । प्रवेश संभव ॥ २४ ॥ वैसा सात्विक कर्म अर्जुन । करने आता मोक्षालिंगन । न होता तब अधिक जान । भिन्न जो वह बात ॥ २५ ॥ सुन यह वचन धनुर्धर । कहता हृदय उमड़ कर । प्रभो ! कह वह कृपा कर । अति शीघ्र ॥ २६ ॥ तब वह कृपा-गुण-चक्रवर्ती । कहता सुन उसकी अभिव्यक्ती । दिखाता जो सात्विक कर्म मुक्ती- । दीप सदैव ॥ २७ ॥ ६९९ श्रद्धा-निरूपण-योग