श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ० ११९] * दैत्यराज सिन्धुका पराजित होकर चिन्ताग्रस्त होना * ५५७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय दैत्यराज सिन्धुका पराजित होकर चिन्ताग्रस्त होना, उसके दो पुत्रों धर्म तथा अधर्मका पिताको आश्वस्त करना तथा युद्धके लिये आज्ञा माँगना, सेना लेकर दोनोंका युद्धार्थ प्रस्थान, वीरभद्र, कार्तिकेय, हिरण्यगर्भ तथा भूतराजकी सेनाओंका दैत्यसेनाके साथ भीषण संग्राम, कार्तिकेयका धर्म एवं अधर्मका वध करना तथा सम्पूर्ण समाचार शिव-पार्वतीको निवेदित करना
ब्रह्माजी बोले—कार्तिकेयके द्वारा पर्वतके प्रहारसे महान् असुर कलको मारे जाने तथा वीरभद्रके द्वारा अपनी हथेलीकी मारसे विकलको मार दिये जानेसे—इस प्रकार अपने दोनों सालों कल तथा विकल, जो देवसेनाका विनाश करनेवाले थे, उनकी मृत्युका समाचार सुनकर भद्रासनपर बैठा हुआ तथा अनेक वीरोंसे घिरा हुआ दैत्यराज सिन्धु महान् चिन्ताको प्राप्त हो गया। उस समय वह भगवान् शिवके पुत्र मयूरेशके विषयमें सोचने लगा कि क्या यह देव मयूरेश इसी प्रकारसे देवताओंके द्वेषी सभी असुरोंका विनाश कर डालेगा? ॥ १–३॥ इस प्रकार चिन्ता करते-करते दैत्यराज सिन्धुको महान् मूर्च्छा छा गयी। उसी समय दैत्यराज सिन्धुके धर्म तथा अधर्म नामक दो पुत्र वहाँ आ पहुँचे, वे दोनों महान् बलशाली थे, वे भद्रासनपर बैठे हुए अपने पितासे इस प्रकारसे कहने लगे—हे पिताजी! पार्वतीके उस छोटे- से बालकसे आप क्यों भय खाते हैं? ॥ ४-५॥ हे दैत्येन्द्र! आप हम दोनोंको आज्ञा प्रदान करें, हम लोग क्षणभरमें ही उसे मार डालेंगे। उसके समक्ष युद्ध करते हुए मृत्युको प्राप्त हमारे दोनों वीर मामा— कल तथा विकल स्वर्गको प्राप्त हो गये हैं ॥ ६॥ विविध वीरोंसे संरक्षित अनेक प्रकारकी सेनाका विनाश करके वे दोनों वीर कल तथा विकल अपने स्वामीका कार्य करते हुए महान् यशको प्राप्त करके तर गये हैं। हम दोनों भी युद्ध करेंगे और शत्रुको बलपूर्वक मारकर या तो वापस लौट आयेंगे अथवा अगर युद्धमें उस मयूरेशके द्वारा मारे जायेंगे तो मोक्षको प्राप्त करेंगे ॥ ७-८॥ हम दोनों जबतक जीवित हैं, तबतक आप कोई चिन्ता न करें। इस समय इन्द्र आदि देवता आपके कारागारमें बन्द हैं, जब आपने उनपर विजय प्राप्त की, तब क्या आपके कोई पिता आदि आपके साथ थे, हम लोग आपके शत्रुका मस्तक काटकर आपके पास लायेंगे, इसमें कोई संशय नहीं है। अन्यथा लोकमें हम कभी अपना मुख नहीं दिखलायेंगे ॥ ९–१०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—उन दोनों पुत्रों धर्म तथा अधर्मका इस प्रकारका वचन सुनकर दैत्यराज सिन्धुको बड़ा ही हर्ष प्राप्त हुआ। वह उन दोनोंसे बोला—तुम दोनों युद्ध करो और उत्तम यश प्राप्त करो। उस भयानक शत्रु मयूरेशको मारकर तुम लोग शीघ्र ही मेरे पास चले आओ ॥ ११-१२ ॥ दैत्यराजके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर युद्धकी लालसावाले वे दोनों धर्म तथा अधर्म पिताके चरणोंमें प्रणाम करके और माताका आशीर्वाद लेकर प्रत्येक दस-दस करोड़की सेनाके साथ शीघ्र ही निकल पड़े। वह चतुरंगिणी सेना रथ, घोड़े, हाथी और पैदल सैनिकोंसे समन्वित थी और वे सैनिक नाना प्रकारके शस्त्रोंको धारण किये हुए थे ॥ १३-१४॥ [सबसे आगे] सिन्दूर लगानेसे अरुणित वर्णके मस्तकवाले पैदल सैनिक प्रसन्नतापूर्वक जा रहे थे, उनके पीछे हाथी चल रहे थे, जो विविध प्रकारके पर्वतोंके समान थे, नाना प्रकारकी गैरिक आदि धातुओंसे चित्रित थे तथा नाना प्रकारके ध्वजोंसे सुशोभित थे ॥ १५ ॥ तदनन्तर अपने हाथोंमें नाना प्रकारके शस्त्रों तथा खड्गोंको धारण किये हुए अश्वारोही सैनिक अश्वोंपर आरूढ़ होकर चल रहे थे। वे मेघके समान गर्जनाके द्वारा दसों दिशाओंको गुंजायमान कर रहे थे ॥ १६ ॥ उस सेनाके मध्यमें वे दोनों धर्म तथा अधर्म नामक भाई सुशोभित हो रहे थे। वे अनेक प्रकारके अलंकारोंसे
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५५८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
अलंकृत थे और वे दोनों अनेकों आयुधोंको धारण किये हुए थे। वे दोनों महाबली अपने कानोंमें रत्न तथा सुवर्णसे मण्डित कुण्डलोंको धारण किये हुए थे तथा अत्यन्त तेजोमय मुकुटोंसे सुशोभित हो रहे थे। वे मोती तथा मणियोंसे बनी मालाओंको धारण किये हुए थे। इस प्रकारके वे दोनों युद्धोन्मत्त दैत्य विविध प्रकारके वाद्योंके घोषके साथ रणभूमिमें पहुँचे ॥ १७-१९॥
वीरभद्र आदिने उन दोनों दैत्यवीरों तथा उनकी सेनाको भी देखा। उन दोनोंको समीपमें आया देखकर देव मयूरेशसे प्रेरणा प्राप्तकर वीरभद्र, कार्तिकेय, क्रोधित हिरण्यगर्भ तथा विशाल नेत्रवाला भूतराज- ये चारों असंख्य सेनाको साथ लेकर युद्धभूमिके लिये निकल पड़े॥ २०-२१ १/२॥
तदनन्तर दोनों सेनाओंके सैनिकोंके बीच भीषण युद्ध हुआ। दोनों पक्षोंके वे वीर एक-दूसरेके सिर, पैर, बाहु, उदर एवं कन्धेपर वार कर रहे थे। धूलसे सूर्यके आच्छादित हो जानेके कारण मरे हुए वीरोंको पुनः मारा जा रहा था ॥ २२-२३ ॥
कुछ योद्धा चक्र छोड़ रहे थे तो कोई दूसरे भिन्दिपाल चला रहे थे। कुछ दूसरे बाणोंकी वर्षा कर रहे थे तो कुछ सैनिक विविध प्रकारके अस्त्रोंके द्वारा युद्ध कर रहे थे। वहाँपर सैनिक वीरोंका आपसमें मल्लयुद्ध होने लगा। इस प्रकार मयूरेशद्वारा रक्षित सेनाका दैत्यसेनाद्वारा संहार हुआ ॥ २४-२५ ॥
वहाँ जो सैनिक बच गये थे, वे विह्वल होकर दसों दिशाओंमें भाग गये। यह देखकर षडानन कार्तिकेय अत्यन्त क्रुद्ध हुए, उस समय वे अपने बारह हाथोंमें धारण किये गये बारह आयुधोंसे सुशोभित हो रहे थे ॥ २६ ॥
तदनन्तर उन्होंने दैत्यराज सिन्धुद्वारा रक्षित सेनाका उन आयुधोंके द्वारा शीघ्र ही विनाश कर दिया। कुछ वीरोंके बाहु कट गये थे। किन्हीं वीरोंके बीचसे दो टुकड़े हो गये थे। उस युद्धमें किसीके मस्तक कट गये थे, तो किसी सैनिकके पैर कट गये थे। इस प्रकार हाथी, घोड़े एवं रथोंसे भरी हुई वह सेना नाशको प्राप्त हो चुकी थी ॥ २७-२८ ॥
उनमेंसे कुछ वीरोंने स्वर्ग प्राप्त किया, कुछने षडाननके स्वरूपको प्राप्त किया। मारे जाते हुए जिन महान् बलशाली सैनिकोंने मयूरेशको देखते हुए अपने प्राणोंको छोड़ा था, वे उनकी कृपासे उनके निजधामको प्राप्त हुए। मयूरेशकी कृपादृष्टि पड़नेपर उनके सभी जन्मोंमें किये गये पाप विनष्ट हो गये थे ॥ २९-३० ॥
कार्तिकेयके पुच्छयुक्त बाणोंके द्वारा अपनी समस्त सेनाको विनष्ट हुआ देखकर दैत्यराज सिन्धुके अधर्म एवं धर्म नामक दोनों वीर पुत्रोंने अस्त्रों, शस्त्रों तथा बाणसमूहोंके द्वारा कार्तिकेयके साथ बहुत प्रकारसे युद्ध किया। तदनन्तर कुछ ही क्षणोंमें उन दोनोंने कार्तिकेयके साथ मल्लयुद्ध किया ॥ ३१-३२ ॥
उन दोनों दैत्योंका इस प्रकारका बल-पराक्रम देखकर छः बाहुओंवाले उन महान् बलशाली कार्तिकेयने अपने छहों हाथोंसे बलपूर्वक शीघ्र ही उन दैत्योंकी चोटीको पकड़ लिया और अनेक बार घुमाते हुए भूमिपर पटक दिया। भूमिपर गिरनेसे उन दोनोंके शरीरके सैकड़ों टुकड़े हो गये ॥ ३३-३४ ॥
भगवान् शिवके पुत्रद्वारा विजय प्राप्त कर लेनेपर चारों ओर वाद्य बजने लगे। सभी सैनिक 'हे मयूरेश! तुम्हारी जय हो' इस प्रकारसे कहने लगे ॥ ३५ ॥
तदनन्तर कार्तिकेय, वीरभद्र, भूतराज तथा हिरण्यगर्भ—ये चारों अपने स्वामी मयूरेशके पास गये। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मयूरेशका आलिंगन किया और वे आपसमें वार्तालाप करने लगे ॥ ३६ ॥
वे चारों पुनर्जन्म प्राप्त करनेके समान परस्पर आनन्दित हो उठे। उन्होंने युद्ध-सम्बन्धी सम्पूर्ण वृत्तान्त भगवान् शिव तथा माता पार्वतीको निवेदित किया और बताया कि दैत्यराज सिन्धुकी समस्त सेना मारी जा चुकी है और दैत्य सिन्धुके दोनों बलवान् पुत्र-धर्म तथा अधर्म भी मारे जा चुके हैं ॥ ३७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'धर्म, अधर्म और असुरसेनाके संहारका वर्णन' नामक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ११९ ॥
एक सौ बीसवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ० १२०] * दूतोंका धर्म एवं अधर्मकी मृत्युका समाचार दैत्यराज सिन्धुको देना * ५५९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 एक सौ बीसवाँ अध्याय दूतोंका धर्म एवं अधर्मकी मृत्युका समाचार दैत्यराज सिन्धुको देना, सिन्धुद्वारा शोक प्रकट करना, सखियोंद्वारा समाचार मिलनेपर सिन्धुपत्नी दुर्गाका राजसभामें उपस्थित हो पुत्रोंके लिये विलाप करना, सखियोंद्वारा उसे आश्वस्त करना, क्रुद्ध दैत्यराज सिन्धुका चतुरंगिणी सेना लेकर युद्धके लिये प्रस्थान, उसी समय पिता चक्रपाणिका प्रकट होकर पुत्र सिन्धुको मैत्रीका उपदेश देना, किंतु सिन्धुका उसे अस्वीकृत कर देना ब्रह्माजी बोले—मरनेसे बचे हुए कुछ वीर मुझे मृत्युलोकमें छोड़कर मेरे वे दोनों पुत्र स्वर्गलोक सैनिक; जिनके शरीरसे रक्त प्रवाहित हो रहा था और क्यों चले गये ? वे दोनों वीर देवसेनाको मार डालनेवाले जो अत्यन्त दुखित थे, दैत्यराज सिन्धुके पास आये और तथा यमराजका भी अन्त करनेवाले थे॥ ९ ॥ सभामें विराजमान सिन्धुसे अत्यन्त भयभीत होते हुए इस [हे पुत्रो!] 'यदि मैं शत्रुके सिरको काटकर यहाँ प्रकार कहने लगे— ॥ १ ॥ नहीं लाऊँगा तो मैं आपको अपना मुख नहीं दिखलाऊँगा'— वीर बोले—हे धनुर्धर ! आप इस अत्यन्त दुःख ऐसा तुमने युद्धके लिये प्रस्थान करते समय मुझसे कहा प्रदान करनेवाले वचनको सुनिये। आपके दोनों पुत्रों धर्म था, क्या तुमने उस वचनको सत्य कर दिया है ॥ १० ॥ और अधर्मने महान् युद्ध करके देवसेनाको मार-मारकर तदनन्तर अत्यन्त दुःखके कारण रोती हुई सखियोंने यमलोकमें पहुँचा दिया। तदनन्तर देवसेनामेंसे कोई महान् अन्तःपुरमें स्थित धर्म और अधर्मकी माता दुर्गासे सब वीर युद्ध करने आया, जिसके छह मुख थे॥ २-३॥ समाचार विस्तारसे बतलाया ॥ ११ ॥ उसे भी भीषण युद्धमें आपके पुत्रोंद्वारा जमीनपर सखियोंने कहा—हे सुन्दर भौंहोंवाली ! धर्म और पटक दिया गया, किंतु उसने उठकर उन दोनों वीरोंकी अधर्म नामक पुत्रोंके मारे जानेसे आपके स्वामी दैत्यराज शिखाके बालोंको पकड़ लिया और बहुत बार घुमाते सिन्धु अत्यन्त रुदन कर रहे हैं। यह सुनकर शय्यापर हुए जमीनपर गिरा दिया, जिस कारण उनकी देहके स्थित वह दुर्गा उसी प्रकार भूमिपर गिर पड़ी, जैसे कि सैकड़ों टुकड़े हो गये और वे दोनों उत्तम स्वर्गलोकको अत्यन्त कोमल और अरुणवर्णके पल्लवयुक्त केलेके चले गये ॥ ४-५ ॥ वृक्ष आँधीके द्वारा गिरा दिये जाते हैं ॥ १२ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार उनकी बात सुनकर सखियोंके अमांगलिक वचनोंसे उसका हृदय इस दैत्यश्रेष्ठ वह सिन्धु शोकसागरमें निमग्न हो गया और प्रकार विद्ध हो गया, मानो बाणोंसे बिंध गया हो। उसके उसी प्रकार भूमिपर गिर पड़ा, जैसे कि वज्रके प्रहारसे केश तथा आभूषण अस्त-व्यस्त हो गये। उस समय वह पर्वत गिर पड़ता है। उसी समय बन्धु-बान्धवों तथा भी बहुत रोने लगी ॥ १३ ॥ मित्रोंने दौड़ते हुए उसे शीघ्र ही बलपूर्वक उठा लिया, उसके वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये थे, जिसके मुहूर्तभरके अनन्तर उसकी चेतना लौट आयी, तब वह कारण बिल्वफलके सदृश शोभास्पद उसका वक्षःस्थल बहुत दुखित होता हुआ शोक करने लगा॥ ६-७॥ अनावृत-सा हो गया था। आँसुओंके गिरनेसे उसके सिन्धु बोला—जिन्होंने पूर्वकालमें युद्धमें इन्द्र कपोल श्यामल वर्णके प्रतीत हो रहे थे। शोकरूपी आदि लोकपालोंको भी जीत लिया था, उन महाबली अग्निसे उसकी प्रभा मलिन-सी हो गयी थी ॥ १४ ॥ धर्म और अधर्म नामक दोनों वीरोंको छः मुखवाले वह अपने दोनों हाथोंसे मुखपर प्रहार कर रही कार्तिकेयने कैसे मार दिया ? ॥ ८ ॥ थी, उसके दाँतोंसे निकलनेवाले रक्तसे भूमि सिक्त हो
५६० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- गयी थी, वह अपने शरीरकी भी सुध-बुध भूल गयी, वह अत्यन्त व्याकुल हो गयी और लज्जाका भी उसे भान नहीं रहा। वह उसी प्रकार गिरते-पड़ते राजसभाके प्रांगणमें पहुँची, जैसे कि कोई हठ करता हुआ बालक गिरता-पड़ता है। उसको देखकर उसके दुःखसे विवश हुए वे सभी सभामें बैठे हुए पुरुष भी रोने लगे। अपने नेत्रोंसे आँसू बहाती हुई वह राजपत्नी दुर्गी उन सभासदोंसे कहने लगी ॥ १५-१६ १/२ ॥ रानी बोली- सभी वीरोंके उपस्थित रहनेपर भी मेरे उन दोनों सुकुमार पुत्रोंको बिना मुझसे पूछे ही क्यों युद्धभूमिमें प्रेषित कर दिया गया ? यदि मैं आशीर्वाद देकर उन्हें भेजती तो निश्चित ही उनकी मृत्यु नहीं होती ॥ १७-१८ ॥ मेरे वचनोंको विधाता भी मिथ्या करना नहीं चाहते। जिन मेरे पुत्रोंके द्वारा देवगणोंको भी जीत लिया गया था, फिर वे कैसे मृत्युको प्राप्त हुए? ॥ १९॥ मैं उन दोनोंको अब कब देखूँगी, जिन्होंने कि अपनी सुन्दरतासे कामदेवको भी जीत लिया था और जो बुद्धिके समुद्र थे, वे दोनों मुझे छोड़कर क्यों चले गये ? उन दोनोंकी शोकाग्निमें दग्ध होकर आज ही मैं मृत्युको प्राप्त हो जाऊँगी। इस प्रकारसे कहकर वह दैत्यपत्नी दुर्गी अपने हृदयको बार-बार पीटती हुई भूमिपर गिर पड़ी ॥ २०-२१॥ तदनन्तर सखियों तथा नगरनिवासी जनोंने उसे शीघ्र ही समझाया और कहा - हे माता ! शोक करनेसे कोई भी जो मृत्युको प्राप्त हो गया हो, लौटकर वापस नहीं आता है ॥ २२ ॥ इस मृत्युलोकमें चिरकालतक जीवित रहनेवाला न कोई देखा गया है और न ऐसे किसी व्यक्तिके विषयमें सुना ही गया है। हनुमान्, शरद्वानके पुत्र कृपाचार्य, बलि, व्यास, परशुराम, विभीषण तथा द्रोणाचार्यके पुत्र अश्वत्थामा- इन सात चिरजीवियोंको छोड़कर चिरकाल- तक जीवित रहनेवाला न कोई हुआ है और न कोई आगे होगा ही ॥ २३-२४॥ जब ब्रह्मा आदि देवताओंकी भी मृत्यु होती है, तो फिर हमलोगोंकी क्या गणना ! रुदन तो उसीको करना चाहिये, जो यह समझे कि मेरी मृत्यु नहीं होगी ॥ २५ ॥ यह निश्चित है कि ऋणका बन्धन छूट जानेपर स्त्री, पुत्र, पशु भी इस संसारमें स्थिर नहीं रहते, अतः शोक करना व्यर्थ है। जिस प्रकार जलप्रवाहमें बहते हुए दो काष्ठ कभी जुड़ जाते हैं, तो कभी अलग हो जाते हैं, वैसे ही [प्रारब्धके कारण] विवश हुआ प्राणी [दूसरे प्राणीके साथ] कभी संयोग तो कभी वियोग प्राप्त करता है। जिस प्रकार बहुत-से पक्षीगण रात्रिमें एक वृक्षका आश्रय लेते हैं और प्रातःकाल दसों दिशाओंमें उड़ जाते हैं, उसी प्रकार संसारमें जीवोंका संयोग और वियोग होता रहता है, इसमें दुःख एवं विलाप करनेकी क्या आवश्यकता ? * ॥ २६-२८ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारसे दुर्गीको [सखियों तथा नागरिकोंने] समझाया, इसके अनन्तर [सभासद्] जनोंसे समन्वित वह सिन्धु बलपूर्वक शोकको रोककर अपने आसनमें बैठ गया ॥ २९ ॥ उन्होंने विचार किया कि यदि हम रोते रहेंगे तो शत्रुजन हमारा उपहास करेंगे। उस दुर्गीको सहारा देकर लोग बलपूर्वक अन्तःपुरमें ले गये ॥ ३० ॥ शोकसे अत्यन्त व्याकुल वह दुर्गी दीर्घ निःश्वास लेती हुई पलंगपर गिर पड़ी। दैत्यराज सिन्धुने अत्यन्त क्रुद्ध होते हुए शस्त्रोंके समूहोंको धारण किया ॥ ३१ ॥
- मृत्युलोके चिरं स्थाता नेक्षितो न श्रुतोऽपि च। विहाय हनुमन्तं च कृपं शारद्वतं बलिम् ॥ व्यासं परशुरामं च विभीषणमथापि च। द्रौणिं नान्यश्चिरं स्थायी न भूतो न भविष्यति ॥ ब्रह्मादीनां भवेन्मृत्युः का तत्र गणनात्मनः। रोदनं तेन कर्तव्यं न स्यान्मृत्युः कदास्य चेत् ॥ क्षीणे ऋणानुबन्धे च स्त्री पुत्रः पशुरेव च । न तिष्ठति ध्रुवं तत्र कृतः शोको वृथा भवेत् ॥ यथा काष्ठं काष्ठगतं पूरे स्याच्च वियुज्यते। तद्वज्जन्तुर्वियोगं च योगं च प्राप्नुतेऽवशः ॥ नानापक्षिगणा रात्रावेकवृक्षगता यथा। प्रातर्दशदिशो यान्ति तत्र का परिदेवना ॥ (श्रीगणेशपु०, क्रीडाखण्ड १२० । २३-२८)
क्री०ख०-अ० १२० ] * दूतोंका धर्म एवं अधर्मकी मृत्युका समाचार दैत्यराज सिन्धुको देना * ५६१ अपने दोनों पुत्रोंके वधका बदला लेनेके लिये वह अश्वपर आरूढ़ होकर युद्ध करने चल पड़ा। उसके प्रस्थान करते ही उसकी रणोन्मत्त विशाल चतुरंगिणी सेना भी निकल पड़ी। सबसे आगे पैदल सैनिक उछलते- उछलते हुए जा रहे थे। वे सभी नानावर्णके तथा समान स्वरूपवाले थे, उन्होंने अपने हाथोंमें विविध प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको धारण किया हुआ था॥ ३२-३३ ॥ पैदल सेनाके पीछे हाथियोंके झुण्ड चल रहे थे, वे गैरिक आदि अनेक धातुओंसे चित्रित किये गये थे, घण्टा तथा आभूषणोंसे सुसज्जित थे। उनके गण्डस्थलसे मदरूपी जलकी धारा प्रवाहित हो रही थी और वे चिंग्घाड़ रहे थे। वे हाथी अपनी चीत्कारसे शत्रुसेनाको भयभीत कर रहे थे और अत्यन्त भयंकर ध्वनि कर रहे थे। हाथियोंकी सेनाके अनन्तर घुड़सवारोंसहित घोड़े चल रहे थे। जो युद्धमें वायुके समान वेगवाले थे॥ ३४-३५ ॥ उन घोड़ोंके खुरोंके आघातसे भूतलपरसे अग्निकी चिनगारियाँ निकलकर गिर रही थीं। उन घोड़ोंके ऊपर हाथोंमें ढाल, भाले तथा खड्ग लिये हुए अश्वारोही सैनिक सुशोभित हो रहे थे। वे सैनिक शरीरमें चन्दन तथा अगरुका अनुलेप किये हुए थे। विविध प्रकारकी मालाओंसे विभूषित थे। सभीने शरीरकी रक्षा करनेवाले कवचको धारण कर रखा था और मस्तकपर मुकुट धारण करनेसे वे बहुत सुशोभित हो रहे थे॥ ३६-३७॥ वे मानो आकाशको निगलते हुए और दसों दिशाओंको निनादित करते हुए चल रहे थे। उस अश्वसेनाके पीछे रथ चल रहे थे, जिनपर महान् वीर योद्धा बैठे हुए थे॥ ३८ ॥ वे रथ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थे और उनमें धनुष एवं तरकस रखे हुए थे। उस सेनाके मध्यमें दैत्यराज सिन्धु सुशोभित हो रहा था, जो विशाल मुकुट तथा कुण्डलोंको धारण किये हुए था॥ ३९ ॥ वह अपने हाथोंमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र तथा धनुषको लिये हुए था और कन्धेमें धारण किये तरकससे सुशोभित हो रहा था। वह युद्धोचित उत्तम कंकणोंकी शोभासे समन्वित तथा करधनी और बाजूबन्दसे शोभायमान था ॥ ४० ॥ क्रुद्ध होनेसे उसके नेत्र ऐसे लाल-लाल हो रहे थे मानो वह तीनों लोकोंको खा जाना चाहता हो। उस समय सभी प्रकारके वाद्योंके बजते हुए और बन्दीजनोंद्वारा स्तुतिगान होते हुए जब राजा सिन्धु बड़े वेगसे चल रहा था, तभी एक दूत वहाँ आकर दैत्यराजसे बोला- हे दैत्यराज ! हे सुव्रत ! आपके पिता आ रहे हैं, आप उनकी प्रतीक्षा करें ॥ ४१-४२॥ जब सिन्धुने पीछे मुड़कर देखा तो उसने अपने पिताको समीपमें आया देखा। वे अश्वपर आरूढ़ थे। सिन्धुने अपने पिताको प्रणाम किया और पिताने भी उसे आशीर्वाद प्रदान किया ॥ ४३ ॥ तदनन्तर [वात्सल्यवश] सेनाके मध्यमें पुत्रको सुरक्षित करके उसके पिताने उसे इस लोक तथा परलोकमें सुख प्राप्त करनेके लिये उपदेश प्रदान किया ॥ ४४ ॥ चक्रपाणि बोले- हे पुत्र ! तुम अभिमानके वशीभूत हो बर्ताव कर रहे हो, ऐश्वर्यके मदमें उन्मत्त होकर तुम भला-बुरा कुछ भी जान नहीं पा रहे हो। जो अपने कल्याणकी कामना रखता हो, उसे अपने कार्यकी सिद्धिके लिये वृद्धजनोंसे पूछना चाहिये। जो भविष्यमें अपने कल्याणकी कामना रखता हो, उसे चाहिये कि वह वर्तमानमें अशुभ कर्म न करे। थोड़ेसे भी अशुभ कर्मके द्वारा महान् पुण्य विनष्ट हो जाता है ॥ ४५-४६॥ हे पुत्र ! जिस प्रकार अग्निकी एक चिनगारीमात्र सब कुछ जला डालती है, उसी प्रकार थोड़ा-सा भी दोष सम्पूर्ण संचित पुण्यको विनष्ट कर डालता है। हे पुत्र ! देवताओंको बन्दी बनाये रखनेमें तुम्हारा कहीं भी कोई भी लाभ दिखायी नहीं देता है ॥ ४७ ॥ वही पुत्र सत्पुत्र कहलाता है, जो सदा ही माता- पिताकी आज्ञाका पालन करता है, उनकी आज्ञाका उल्लंघन करनेपर पुण्य विनष्ट हो जाता है और हे पुत्र ! वह अनेकों नरकोंको प्रदान करनेवाले पापसमूहों तथा मोहके पाशमें ग्रस्त हो जाता है। अतः हे पुत्र ! तुम मेरा यह कल्याणकारी वचन सुनो-तुम शीघ्र ही देवताओंको मुक्त कर दो ॥ ४८-४९॥
५६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 देवताओंके बन्धनमुक्त हो जानेपर वह मयूरेश | हे तात! आप मूर्खोंकी भाँति बोल रहे हैं, अब तुम्हारा मित्र हो जायगा, वह सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण | आप अपना मुख काला करके यहाँसे चले जायें। हे करनेवाला है। इस पृथ्वीपर द्वेष रखते हुए कोई भी | पिता! जिसने मेरी परार्ध संख्यावाली सेनाको मार डाला किसी प्रकार सुख नहीं प्राप्त कर सकता*। द्वेष रखनेके | है, उसके साथ अब मैं कैसे अपयश प्रदान करनेवाली कारण ही देवताओंके द्वारा हिरण्याक्ष आदि असुरोंका | सन्धि कर सकता हूँ? हाथमें कुश एवं अक्षमालाको विनाश हुआ॥ ५०१/२॥ | धारण करना क्षत्रियधर्ममें शोभित नहीं होता ॥ ५३-५४ ॥ ब्रह्माजी बोले-पिताके इस प्रकारके वचनोंको | इसी कारण राजाको चाहिये कि वह शत्रुओंके साथ सुनकर पुत्र सिन्धु अत्यधिक कुपित हो उठा और वह | दयाका बर्ताव न करे। नीतिमें बताया गया है कि युद्ध- अपने पिताको धिक्कारते हुए उनसे कहने लगा-मुझे | स्थलमें शत्रुके प्रति निर्दयतापूर्ण व्यवहार ही करना चाहिये। अभीतक यह भ्रम बना हुआ था कि मेरे पिता आप बहुत | ऐसा कहनेके अनन्तर दैत्यराज सिन्धुने पिताको प्रणाम चतुर हैं, किंतु इस समय आपका वह सब चातुर्य | किया और उन्हें बलपूर्वक वापस लौटाकर वह युद्धकी भलीभाँति प्रकट हो गया है ॥ ५१-५२ ॥ | अभिलाषासे युद्धके लिये निकल पड़ा ॥ ५५-५६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'पिताके साथ सिन्धुदैत्यके संवादका वर्णन' नामक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२० ॥ एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय राक्षसराज सिन्धुकी सेनाके साथ कार्तिकेय, वीरभद्र आदि देववीरोंकी सेनाओंका भयंकर संग्राम, सिन्धुसेनाकी पराजय, दैत्यराज सिन्धुका स्वयं युद्धके लिये प्रस्थान, मयूरेशके परशुसे उत्पन्न कालपुरुषद्वारा दैत्य सैनिकोंका भक्षण किया जाना, चिन्तित होकर दैत्य सिन्धुका घरमें आकर छिपकर रहना ब्रह्माजी बोले-जब वीरभद्र आदि वीरोंके साथ | उठे और [युद्धहेतु] तैयार होकर उन्होंने उस सेनाको गणेश्वर सुखपूर्वक आसनपर बैठे हुए थे, उसी समय | देखा। तब उन्होंने उस सिन्धुको अपनेको मारनेके लिये भयभीत देवता हाँफते हुए बड़े वेगपूर्वक वहाँ आये ॥ १॥ | आया हुआ साक्षात् काल ही समझा ॥ २-३ ॥ उन्होंने गुणेश्वरको समाचार दिया कि युद्ध करनेके | तदनन्तर मयूरेशने अपने चारों हाथोंमें चार आयुधोंको लिये वह दैत्यराज सिन्धु अब स्वयं ही आ गया है। | धारण किया और वे बड़े ही आनन्दित होते हुए अपने सिन्धु (सागर)-के समान अपार सैन्य होनेके कारण | वाहन मयूरपर आरूढ़ हुए, उस समय उन्होंने भीषण उस दैत्यका 'सिन्धु' यह नाम [वास्तविक अर्थोंमें] | गर्जना की ॥ ४ ॥ प्रसिद्ध हुआ है। तब (यह समाचार पाकर) वे सभी वीर | वे मयूरेश भगवान् शिवको प्रणाम करके दसों
- चक्रपाणिरुवाच गर्वेण वर्तसे पुत्र श्रिया मत्तो न बुध्यसे। अर्थज्ञाने महावृद्धाः प्रष्टव्या भूतिमिच्छता ॥ अग्रे शुभेच्छया पूर्वमशुभं न समाचरेत्। अल्पेन कर्मणा नाशं पुण्यमेत्यशुभेन ह ॥ अगुरग्निर्दहेत्सर्वं पुण्यं दोषस्तथा सुत। न लाभो दृश्यते पुत्र बद्धेषु तेषु ते क्वचित् ॥ स एव पुत्रो यो मातृपितृवाक्यकरोऽनिशम्। तस्य चोल्लङ्घने पुण्यं नाशमेति च जायते ॥ दोषजालं मोहजालं नाना निरयदं सुत। अतः शृणु हितं वाक्यं मोचयाशु सुरान् सुत ॥ मुक्तेषु तु भवेन्मित्रं मयूरेशोऽखिलार्थदः। न चेह द्वेषतः कश्चित्सुखं प्राप्तो धरातले ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड १२०। ४५-५०)
क्री०ख०-अ०१२१] * राक्षसराज सिन्धुकी सेनाके साथ कार्तिकेय आदिका भयंकर संग्राम * ५६३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
दिशाओंको प्रकाशित करते हुए बड़े ही वेगपूर्वक निकल पड़े। उन्हें भगवान् शिवका आशीर्वादरूपी कवच प्राप्त था। वे वीरोंको साथ लेकर सेनासहित चल रहे थे ॥ ५ ॥ जब वे दैत्यराज सिन्धुको मारनेके लिये आगे जाने लगे तो उसी समय षडानन कार्तिकेयने उपस्थित होकर उनसे कहा—हे विघ्नराज! उस सिन्धुसे युद्ध करनेके लिये मैं जाता हूँ। बहुतसे वीरोंके रहते हुए आप क्यों युद्धके लिये जाते हैं ? पहले हम सभीका बल-पराक्रम देख लीजिये, फिर यदि हमारा पौरुष नष्ट हो जाय, तब आप युद्ध करें। ऐसा कहकर और उन मयूरेशको प्रणाम करके कार्तिकेय चतुरंगिणी सेना साथ लेकर युद्धके लिये निकल पड़े। फिर उन्होंने राक्षसराज सिन्धुकी सेनाका वध आरम्भ किया ॥ ६-८ ॥ उस सिन्धुने भी नाना प्रकारके शस्त्रों तथा बाणोंके जालसे उस देवसेनापर प्रहार किया। 'अरे ! आज सहन करो, मुझपर प्रहार करो, मैं तुम्हें मारता हूँ, आओ मेरे सम्मुख आओ' इस प्रकारसे उस युद्धमें युद्ध करनेवाले वीरोंका कोलाहल हो रहा था। कई वीर शस्त्रोंके द्वारा आहत हो गये थे, तो कई वीर बाणोंके समूहोंके प्रहारसे प्राणशून्य हो गये थे ॥ ९-१० ॥ तलवारों, भिन्दिपालों, भालों तथा मुद्गरोंके प्रहारसे कुछ वीरोंके अंग कट गये थे, कईके पैर कट गये थे, और किसी-किसीके बाहु, जाँघें और मस्तक कट चुके थे। शत्रुपक्षके युद्धोन्मत्त सैनिकोंको मारते हुए वे वीर उन्हीं सैनिकोंके समूहमें मिल जा रहे थे। उस समय वीरोंकी सिंहगर्जना, घोड़ोंकी हिनहिनाहटकी ध्वनि, हाथियोंके चिंघाड़ तथा रथोंके पहियोंकी धुरियों और वाद्योंकी ध्वनि-प्रतिध्वनियोंसे महान् कोलाहल हो रहा था। दोनों सेनाओंके बीच अनियन्त्रित युद्ध होने लगा ॥ ११-१३ ॥ वे वीर सैनिक अपनी-अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार दूसरे पक्षके वीरोंके मस्तक, मुख, नेत्रों, बाहुओं, उदर, नाभि, दोनों पैरों, दोनों गुल्फों तथा जानुओंपर आघात करने लगे। कोई वीर अपने हाथ, कोई पैरसे और कोई तलवारसे दूसरेको मार रहे थे। घनघोर अन्धकार छा जानेपर भी कोई-कोई वीर अपने शत्रुओंको तलवारके प्रहारसे मार रहे थे ॥ १४-१५ ॥ सूर्यके अस्त हो जानेपर वे वीर सैनिक एक- दूसरेको देखकर उससे भलीभाँति पूछकर, यदि वह शत्रुपक्षका होता तो उसे मार डाल रहे थे। असुर लोग जब यह जान ले रहे थे कि ये देवपक्षके हैं, तो उन्हें मार रहे थे और जब देवता लोग पहचान ले रहे थे कि ये असुरपक्षके हैं, तो उन्हें मार डाल रहे थे ॥ १६ ॥ उस भयंकर संग्राममें रक्तकी नदियाँ प्रवाहित होने लगीं, उनमें मृत सैनिक बह रहे थे। जिनमें कुछ प्राण शेष था, उनको दूसरे वीरोंने हुंकार करते हुए बलपूर्वक उस नदीसे बाहर निकाला और उनके शरीरोंमें लगे हुए बाणोंको निकाला। युद्धसन्नद्ध उन दोनों पक्षोंकी सेनाके सैनिकोंने पाँच दिनतक युद्ध करते हुए चिर विश्राम नहीं लिया ॥ १७-१८॥ इस प्रकारके उस युद्धमें देवताओंने दैत्यराज सिन्धुके करोड़ों पैदल सैनिकोंको मार डाला। इसके बाद उस दैत्य सिन्धुकी असंख्य मात्रामें शस्त्रोंसे सुसज्जित गजारोही सेना आयी। उन हाथियोंके ऊपर नाना प्रकारके युद्धकी कलाओंमें कुशल गजारोही वीर बैठे हुए थे। तब वीरभद्र आदि देवोंने कठिनाईसे जीती जा सकनेवाली दैत्य सिन्धुकी उस गजसेनाका संहार किया ॥ १९-२० ॥ उन वीरोंमेंसे किसीके मस्तक फट गये थे, तो किसीके हाथ और दाँत टूट गये थे। अग्निसम्बन्धी शस्त्रोंको धारण किये हुए कुछ देवोंने हाथियोंपर सवार वीरोंको गिरा डाला था ॥ २१ ॥ वीरभद्रने अत्यन्त बलपूर्वक एक हाथीको दूसरे हाथीसे टकरा डाला, उस आघातके कारण वे दोनों हाथी आठ टुकड़ोंमें होकर गिर पड़े ॥ २२ ॥ षडानन कार्तिकेय हाथियोंकी उस सेनाको मारते हुए अत्यन्त शोभा पा रहे थे। उन्होंने अपने छह धनुषोंसे छोड़े गये अनेकों बाणोंके द्वारा शक्तिपूर्वक दैत्य सिन्धुके वीर सैनिकोंसहित असंख्य मदोन्मत्त हाथियोंके समूहोंको मार गिराया। हिरण्यगर्भने भी अनेक वीरोंसे समन्वित उन हाथियोंको मार गिराया ॥ २३-२४ ॥ भूतराजने नाराचकी मारसे जीवित बचे हुए विविध
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प्रकारके उन हाथियोंको, जिनमें वीर दैत्य सैनिक बैठे हुए थे, अपने शस्त्रोंसे युद्धमें मार डाला ॥ २५ ॥ पुष्पदन्तने सिंहका रूप धारण करके उन हाथियोंको विदीर्ण कर डाला। नन्दीने तो स्वयं हाथीका रूप धारण करके उन बहुतसे हाथियोंको भग्न कर डाला ॥ २६ ॥ दूसरे देवगणोंने अपने बाणसमूहोंसे उन सभी हाथियोंको गिरा दिया। किसीने एक हाथीकी पूँछ पकड़कर घुमानेके अनन्तर दूसरे हाथीके ऊपर उसे फेंक दिया तो अत्यन्त सुदृढ़ आघातके कारण दोनों हाथी टकराकर चूर-चूर हो गये ॥ २७१/२ ॥ इस प्रकार हाथियोंकी सेनाके समाप्त हो जानेपर वे दैत्य वीर अश्वोंपर आरूढ़ होकर युद्ध करने लगे। उन्होंने उस युद्धमें उन असंख्य देवताओंको अपने आयुधोंके द्वारा मार गिराया, किंतु मूर्च्छित हुए वे देवता फिर सचेत हो गये ॥ २८-२९ ॥ तदनन्तर उन देवताओंने अत्यन्त क्रुद्ध होकर घोड़ोंपर आरूढ़ दैत्यवीरों तथा घोड़ोंको बाणोंसे विद्ध कर दिया। उधर घोड़ोंपर आरूढ़ उन महान् असुरोंने क्रोध करते हुए देवताओंपर प्रहार किया ॥ ३० ॥ उन्होंने अपने शस्त्रों, अस्त्रों तथा बाणोंकी वर्षासे उन देवताओंका अन्त कर डाला। तदनन्तर युद्धमें देवताओंके मारे जानेका समाचार सुनकर मयूरेशकी सेनाके छः वीर युद्धके लिये पुनः आये ॥ ३१ ॥ तब उन वीरोंने अश्वोंपर सवार उन दैत्योंपर पुनः प्रहार किया। उनमेंसे चार वीर चारों दिशाओंमें बड़ा भयंकर युद्ध करने लगे ॥ ३२ ॥ शेष बचे दो वीर देवगणोंसे समन्वित अपनी देवसेनाकी रक्षा करने लगे। देवसेनाके उन चारों वीरोंने अश्वों तथा अश्वोंपर सवार दैत्य वीरोंको मार गिराया ॥ ३३ ॥ उन्होंने पैदल चलकर ही शत्रुपक्षके बहुतसे वीरोंको मार डाला। बाणोंकी मारसे घायल करोड़ों करोड़की संख्यामें उस युद्धस्थलमें दैत्य सैनिक गिर पड़े ॥ ३४ ॥ नन्दी और भृंगीके द्वारा अश्वोंको मरा हुआ तथा घुड़सवार सैनिकोंको गिरा हुआ देखकर पुनः नन्दिकेश्वरने अपने पैरोंके आघातसे उनपर प्रहार किया ॥ ३५ ॥ वीरभद्रने भी असंख्य संख्यावाले उन अश्वारोही योद्धाओंको गिरा डाला। कार्तिकेय आदि चार वीरोंके द्वारा दैत्य सेनाके प्रधान-प्रधान योद्धाओंके मार दिये जानेपर अवशिष्ट असुरगण सभी दिशाओं-विदिशाओंमें भाग चले। तब वे कार्तिकेयादि चारों वीर असुरोंका पीछा करते हुए उनका संहार करने लगे। उस रणस्थलमें युद्धनिरत दैत्योंकी कल्पान्तकालीन प्रलय-जैसी स्थिति हो गयी। तदनन्तर कुछ दैत्य देवगणोंकी शरणमें चले गये ॥ ३६-३७ ॥ दैत्यसेनाके घुड़सवार सैनिकोंका वहाँ महान् कोलाहल होने लगा। इस प्रकारसे सम्पूर्ण दैत्यसेनाका वध करके कार्तिकेय आदि वे छः वीर अत्यन्त प्रसन्नताको प्राप्त हुए। उस समय सभी प्रकारके वाद्य बजने लगे। सभी वीर विजय-गर्जना करते हुए उन प्रभु मयूरेशकी स्तुति करने लगे। वे कहने लगे-मयूरेशके प्रभावसे, उनका स्मरण करनेसे तथा उनको प्रणाम करनेसे हमें विजय प्राप्त हुई है ॥ ३८-३९ ॥ तदनन्तर दैत्यराज सिन्धुने अपनी शरणमें आये हुए सैनिकोंके मुखसे अपनी सेनाके वधका वृत्तान्त जानकर गजारोही, अश्वारोही तथा रथारोही वीरों, अमात्यों और अन्य सभी वीरोंसे अपनी युद्धकी लालसाको प्रकट करते हुए कहा ॥ ४०१/२ ॥ सिन्धु बोला-जो-जो भी योद्धा युद्धके लिये जाते हैं, उन्हें शत्रुपक्षके द्वारा मारे जानेका ही समाचार मैं अभीतक सुनता आया हूँ, अब इस समय मैं स्वयं ही बलपूर्वक उस गुणेशको मारनेके लिये जाता हूँ ॥ ४११/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-ऐसा कहकर उसने अपनी गर्जनासे आकाश, दसों दिशाओं और तीनों लोकोंको इस प्रकार निनादित कर डाला, जैसे कि वह पृथ्वी तथा स्वर्ग- मण्डलको ग्रसनेके लिये जा रहा हो। तदनन्तर उसने धनुषमें बाणका संधान करके और कानतक उस धनुषकी प्रत्यंचा खींचकर बड़े ही वेगसे उस बाणको महान् बलशाली वीरभद्र आदि देवोंद्वारा संरक्षित देवसेनामें फेंका ॥ ४२-४३१/२ ॥ उस दैत्यराज सिन्धुने अस्त्रमन्त्रका सौ बार जप
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करके समस्त वीरोंका निरीक्षणकर बाणका एकाएक धनुषपर सन्धान किया॥४४१/२॥ उस अस्त्रसे सहसा उत्पन्न अग्नि देवसेनाको और साथ-ही-साथ वनों एवं पर्वतोंसहित समग्र पृथिवीको दग्ध करने लगी ॥ ४५१/२॥ उस अग्निके द्वारा जलाये जाते हुए उन देवसैनिकोंने उस अग्निसे उत्पन्न एक पुरुषको देखा, जो जटाएँ धारण किये हुए था, उसका तेज प्रदीप्त हो रहा था, उसकी जिह्वा विद्युत्के समान थी, उसका मुख बड़ा ही भयंकर था और वह देवसैनिकोंको निगलता जा रहा था। उसे देखकर कार्तिकेय आदि भयभीत हो गये और दसों दिशाओंमें भाग गये। युद्धमें वह जिस-जिसका भक्षण कर लेता था, वह-वह मयूरेशका स्मरण करता हुआ प्रसन्नतापूर्वक उन मयूरेशके निज धामको प्राप्त कर लेता था। इस प्रकारसे उस पुरुषने सम्पूर्ण देवसेनाका भक्षण कर लिया ॥ ४६-४८१/२ ॥ वह देवसेना जिधर-जिधर जाती थी, वहाँ-वहाँ उस पुरुषके मुखसे उत्पन्न अग्नि प्रलयाग्निके समान जलते हुए उस सेनाको दग्ध कर देती थी, इस प्रकार मयूरेशकी वह सेना अग्निके द्वारा दग्ध हो गयी ॥४९-५०॥ उस समय धुएँका महान् अन्धकार छा गया था, उस अन्धकारमें कुछ भी दिखायी नहीं पड़ता था। तदनन्तर सभी देववीर मयूरेशके पीछे छिप गये ॥ ५१ ॥ उस अग्निसे जलाये जाते हुए वे देवगण त्राहि- त्राहि इस प्रकारसे करुण पुकार करने लगे। उस निवारित किये न जा सकनेवाले महान् अस्त्रको देखकर देव मयूरेश तेजहीन-से हो गये और लोकमें अपमानित होनेके भयसे वे विचार करने लगे कि यदि इस समय भगवान् शिव कृपा करें, तभी यहाँ हमारी विजय हो सकती है ॥ ५२-५३॥ ऐसा कहनेके अनन्तर मयूरेशने हाथमें परशु धारण किया और उसे मन्त्रोंसे अभिमन्त्रितकर बलपूर्वक शत्रुसेनापर फेंका, अपने तेजसे सूर्यके तेजको भी जीत लेनेवाला वह अभिमन्त्रित परशु आकाश तथा दिशाओंको निनादित करते हुए तथा शत्रुसेनाको दग्ध करते हुए ऐसे जा रहा था, मानो कल्पान्तके समयकी प्रलयाग्नि जा रही हो ॥ ५४१/२ ॥ उस प्रज्वलित अग्निसदृश परशुसे भी एक महान् पुरुष प्रकट हुआ, जिसके मुखमें आकाशसहित सम्पूर्ण भूमण्डल भी प्रवेश करते हुए आकारमें छोटा पड़ जाय। तदनन्तर उस उत्पन्न पुरुषका सिन्धुदैत्यके पुरुष योद्धाके साथ और उस अस्त्र परशुका [सिन्धुके द्वारा प्रयुक्त] अस्त्रके साथ युद्ध होने लगा। तब उस युद्धको देखनेके लिये देवर्षिगण वहाँ उपस्थित हो गये। मयूरेशके उस यमराजतुल्य अस्त्र परशुने शीघ्र ही दैत्य सिन्धुके अस्त्रका भक्षण कर डाला ॥ ५५-५७॥ तदनन्तर ज्वालाओंकी मालासे युक्त अग्निदेवके सदृश वह आग्नेयास्त्र दैत्यकी सेनाको जलानेके लिये चल पड़ा। दैत्यराज सिन्धुने भी उस अस्त्रको आता हुआ देखकर बाणोंकी वृष्टि करनी शुरू कर दी ॥ ५८ ॥ उस सिन्धुके अभिमन्त्रित एक बाणसे अनन्त संख्यामें बाण प्रकट होने लगे। देवसेनाके अत्यन्त तीव्र गतिवाले योद्धा उस दैत्यकी बाणवृष्टिसे आच्छादित हो गये। तब क्रुद्ध होकर मयूरेशने उस समय नाना प्रकारके अस्त्रोंकी सृष्टि की। उन अस्त्रोंने दैत्यराज सिन्धुके सभी अस्त्रोंको निरस्त कर डाला ॥ ५९-६० ॥ तदनन्तर अस्त्र (परशु)-से उत्पन्न उस कालपुरुषने दैत्यसेनाका पुनः भक्षण कर डाला। वे दैत्य सैनिक भाग-भागकर जहाँ-जहाँ जाते थे, वहाँ-वहाँ वह कालपुरुष पहुँच जाता था ॥ ६१ ॥ तब चिन्ताग्रस्त हुआ वह दैत्य सिन्धु उस समय अब क्या करना चाहिये, यह निश्चित नहीं कर सका। क्या करणीय है, कहाँ जाना चाहिये और कहाँ ठहरना चाहिये-इस प्रकारसे वह चिन्ता करने लगा ॥ ६२ ॥ सूर्यके अस्त हो जानेपर वह अपने घरकी ओर लौट चला। उसके कुण्डल तथा अन्य आभूषण नष्ट हो चुके थे। वह भूमिपर गिरते-पड़ते हुए जा रहा था ॥ ६३ ॥ उसने अपने नगरमें प्रवेश किया, उस समय वह औघड़ शिवके समान अस्त-व्यस्त प्रतीत हो रहा था। वह वहाँ किसी गुप्त स्थानमें स्त्रियों तथा अनुचरोंकी
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क्री०ख०-अ०१२२] * गौतम तथा भगवान् शिवद्वारा मयूरेशके पराक्रमका वर्णन * ५६७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
कि आप सर्वज्ञ हैं, तथापि इस प्रकारकी बातें कर रहे हैं। ये प्रभु मयूरेश तो इसी कार्यकी सिद्धिके लिये अपने निज धामसे इस पृथ्वीपर आये हुए हैं ॥ १३-१४॥ ये मयूरेश सम्पूर्ण कामनाओंसे परिपूर्ण हैं, सम्पूर्ण पदार्थोंको प्रदान करनेवाले हैं। ये गुणातीत हैं, गुणोंके ईश हैं और सत्त्व-रज तथा तम—इन तीनों गुणोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले हैं, इनके यथार्थ स्वरूपका निरूपण करनेमें ब्रह्मा आदि देव भी सर्वथा असमर्थ हैं, ये पृथ्वीके भारका हरण करनेके इच्छुक हैं, इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी अवध्य महाबलशाली असुरोंका वध करनेमें निरत हैं, ये अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंके नायक हैं, सम्पूर्ण जगत्के आत्मस्वरूप हैं और सभी लोकोंकी उत्पत्ति करनेवाले, पालन करनेवाले और फिर संहार करनेवाले भी ये ही हैं, क्या आप इन मयूरेशके स्वरूपको तथा इनके बल-पराक्रमको नहीं जानते ? ॥ १५-१७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—षडानन आदिकी इस प्रकारकी वाणी सुनकर देवर्षि नारदजी पुनः कहने लगे—जब मैं उस दैत्य सिन्धुको मरा हुआ देखूँगा और मुक्तिको प्राप्त हुआ देखूँगा, तभी मैं सभी वचनोंको सत्य मानूँगा, अन्यथा कभी नहीं ॥ १८-१९ ॥ नारदजीके इस प्रकारके वचनको सुनकर मयूरेश्वर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे। वे क्रोधसे उद्दीप्त हो उठे और तीनों लोकोंको निनादित करते हुए गरजे ॥ २० ॥ उस समय वे तीनों लोकोंको जलाते हुए-से और इस पृथिवीको चूर-चूर करते हुए-से मेघके समान गम्भीर वाणीमें उन मुनि नारदजीसे बोले ॥ २१ ॥ मयूरेश बोले—हे मुनीश्वर नारदजी ! आप ब्रह्माजीके पुत्र होनेके कारण और सर्वज्ञ होनेके कारण माननीय हैं, अतः मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपनी मर्यादाका पालन करें ॥ २२ ॥ मैं आपकी कृपासे क्षणभरमें ही इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा यमराजको भी निगल जाऊँगा। भूलोकको उलट डालूँगा और सभी सागरोंको सोख डालूँगा। हे मुने ! मैं अपनी निःश्वासवायुसे मेरुको हिला डालूँगा। हे नारदजी ! हे सर्वत्रगामी ! आप मेरी इस सत्य प्रतिज्ञाका इस समय श्रवण करें। मैं उस दैत्य सिन्धुको मार
[दायाँ स्तम्भ]
डालूँगा, इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है ॥ २३-२४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर वे विनायक मयूरेश मयूरपर आरूढ़ होकर युद्धके लिये चल पड़े। उसी समय नन्दी तथा भृंगी—दोनोंने उन विनायकसे कहा—हम दोनों युद्ध करेंगे, आप हमारे रणकौशलको देखें ॥ २५-२६ ॥ ऐसा कह करके वे दोनों वायुके समान वेगसे गण्डकीपुरीकी ओर चल पड़े। उन दोनोंके जानेका समाचार सुनकर वीरभद्र तथा भूतराज भी युद्धके लिये निकल पड़े। उस समय धरती काँपने लगी और शेषनाग व्याकुल हो उठे। तदनन्तर कार्तिकेय आदि चारोंने उस दैत्य सिन्धुका वह दुर्ग देखा, जो देवराज इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी दुर्गम था ॥ २७-२८ ॥ उस दुर्गके भीतर एक पलंगपर सुखपूर्वक बैठे हुए दैत्यराज सिन्धुको उसके गुप्तचरोंने बताया कि हे महान् असुर ! पर्वतके समान विशाल आकृतिवाले चार वीर दसों दिशाओंको गुंजायमान करते हुए आपकी नगरीमें चले आये हैं, फिर आप निश्चिन्त क्यों बैठे हुए हैं ? इस प्रकारके वचनोंको सुनकर दैत्यराज सिन्धु क्षणभरमें ही चिन्तासागरमें निमग्न हो गया ॥ २९-३० ॥ सिन्धुपत्नी दुर्गा भी चिन्तासे व्याकुल हो उठी। दैत्य सिन्धुके समान ही उसका मुख भी काला पड़ गया। दोनोंका मुख नीचेको झुक गया और वे उसी क्षण महान् दुःखको प्राप्त हो गये ॥ ३१ ॥ दुर्गा कहने लगी—हे महाराज ! मैंने आपसे जो कुछ कहा था, उसे आपने नहीं किया, उसीका यह सब फल है, अब इस समय चिन्ता करनेसे क्या लाभ ? ॥ ३२ ॥ दुर्गा इस प्रकार बोल ही रही थी कि वे चारों श्रेष्ठ वीर—नन्दी, भृंगी, वीरभद्र और भूतराज राजाके सभामण्डपमें प्रविष्ट हो गये। वह सभामण्डप अनेक प्रकारके आश्चर्योंसे समन्वित था, विविध प्रकारके रत्नों तथा स्वर्णसे उसका निर्माण हुआ था तथा वह अनेक शिखरोंवाला था। क्रुद्ध होकर एकाएक भृंगी उछलकर उस सभामण्डपके बीचमें खड़े हो गये, उन महाबली भृंगीने बलपूर्वक तत्काल उस मण्डपको तोड़ डाला। उस मण्डपके टुकड़े-टुकड़े वहाँ आँगनमें
५६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चारों ओर बिखर गये॥ ३३-३५॥ सिन्धुने सर्पास्त्रको छोड़ा। उन सर्पोंने तीनों योद्धाओंको तदनन्तर वे तीनों वीर-नन्दी, वीरभद्र और भूतराज लपेट लिया, तब भृंगीने उसी समय एकाएक गरुड़ास्त्रका भी उस भृंगीके पास चले गये। युद्धके लिये आविष्ट उन संधान किया। तदनन्तर दैत्य सिन्धुने आग्नेयास्त्र चलाया, सभीके मुख लालवर्णके हो गये थे और वे सेनासहित यह देखकर भृंगीने पर्जन्यास्त्रको छोड़ा ॥ ४५-४६॥ उस सिन्धुको निगल जानेकी इच्छा रखनेवाले थे ॥ ३६ ॥ तब सिन्धुदैत्यने वायव्यास्त्रका प्रयोग किया तो उन वीरोंका वैसा पराक्रमपूर्ण कर्म देख करके भृंगीने पर्वतास्त्रसे उसका निवारण किया। तदनन्तर नन्दी दैत्यराज सिन्धुकी सेना सामने आ गयी। वह सेना आदि वे चारों वीर उसके साथ बड़े ही मान-सम्मानके खड्ग, ढाल, धनुष-बाण, भाला तथा मुद्गर धारण की साथ क्रमशः मल्लयुद्ध करने लगे। नन्दीने दैत्य सिन्धुके हुई थी। 'मारो, इन चारों महान् वेगशाली वीरश्रेष्ठोंको मस्तकपर स्थित मुकुटको गिरा दिया, भृंगीने अत्यन्त रुष्ट मार डालो', ऐसा कहकर दैत्य सिन्धुके सैनिक उन होते हुए उस दैत्यकी पीठपर प्रहार किया ॥ ४७-४८ ॥ चारोंको मारनेके लिये आये ॥ ३७-३८ ॥ वीरभद्रने उस दैत्यके देखते-देखते उसकी भार्याके दैत्यराज सिन्धुके असंख्य सैनिक बड़े ही उत्साहसे बाल पकड़ लिये और भूतराजने वैरभावका स्मरण करके उन चारों वीरभद्रादिके साथ युद्ध करने लगे। 'मैं तुम्हें उस सिन्धुदैत्यको लातोंसे मारा। दैत्य सिन्धुकी पत्नी मारता हूँ, तुम मुझे मारो'-इस प्रकार कहते हुए दुर्गानि अपने नेत्र बन्द कर लिये, वह उस प्रकारकी [वीरोंका] वहाँ महान् कोलाहल व्याप्त हो गया ॥ ३९ ॥ दुर्गति को प्राप्त अपने पतिको वैसी स्थितिमें देख न सकी। तदनन्तर दैत्यसेनाका उन चारोंके साथ भीषण वह अपने पतिके कर्मोंकी निन्दा करती हुई अपने भवनके संग्राम होने लगा। उठनेवाली धूलिके कारण वहाँ लिये पलायित हो गयी ॥ ४९-५० ॥ अन्धकार छा गया था, उस अन्धकारमें वे योद्धागण दैत्य सिन्धु भी अत्यन्त आवेशमें आ गया। उसने शस्त्रोंके चमचमाते प्रकाशमें युद्ध कर रहे थे ॥ ४० ॥ वीरभद्रका पाँव पकड़ लिया। नन्दीको मुष्टिकाके प्रहारसे उस युद्धमें नन्दी आदि चारों वीरोंने सैकड़ों करोड़ मारा और भृंगीकी चोटी पकड़कर जमीनपर गिरा दिया। दैत्योंको मार डाला। उन्होंने अपने ओजसे असंख्य भूतराज मूर्च्छित हो गये। तब दैत्यराज सिन्धु पुनः मुकुट महावीर दैत्योंका पाँव पकड़कर उन्हें भूमिपर पटक धारणकर और गलेमें मोतियोंकी माला पहनकर एक उत्तम दिया। फिर उन दैत्योंको बार-बार घुमाकर आकाशमें घोड़ेपर सवार हुआ और शेष बचे हुए सैनिकोंको बुलाकर फेंक दिया। वहाँसे जमीनपर गिरकर उनके सौ-सौ उनसे बोला- 'आज मैं उस मयूरेशको मार डालूँगा', ऐसा टुकड़े हो गये ॥ ४१-४२ ॥ कहकर वह पुनः युद्धके लिये चल पड़ा ॥ ५१-५३ ॥ उस युद्धभूमिमें बाणोंसे, विविध अस्त्रोंसे, शस्त्रोंसे, दैत्य सिन्धुने दिशाओं तथा विदिशाओंको गुंजायमान पाँवके प्रहारसे और हाथकी चोटसे दैत्योंकी उस सम्पूर्ण करते हुए गर्जना की। उस समयतक नन्दी आदि चारों सेनाका उन्होंने विनाश कर दिया ॥ ४३ ॥ वीर गणनायक मयूरेशके पास जा चुके थे, उन्होंने तदनन्तर वीरभद्र आदि वे चारों वीर वेगपूर्वक बताया कि दैत्यसेनाके सभी वीरोंको उन्होंने नष्ट कर दैत्यराज सिन्धुके भवनमें जाकर पलंगपर बैठे हुए उस डाला है। हे गणेश्वर ! उस सिन्धु दैत्यको भी हम सिन्धु दैत्यके बाल पकड़कर उसे विजयके स्मारक रणभूमिमें ले आये हैं। वह थोड़ी-सी सेनाके साथ है। स्तम्भके रूपमें रणक्षेत्रमें ले आये ॥ ४४ ॥ आप उसे इस भवसागरसे मुक्त कर दें। हे विघ्नराज ! तदनन्तर दैत्यराज सिन्धुने अपने महान् अस्त्रोंके आपकी आज्ञा नहीं थी, नहीं तो हम ही उसे मार द्वारा उन नन्दी आदिके साथ युद्ध किया। दैत्यराज डालते ॥ ५४-५६॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुकी सेनाके संहारका वर्णन' नामक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२२ ॥
एक सौ तेईसवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०१२३ ] * देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम * ५६१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 एक सौ तेईसवाँ अध्याय देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम, मयूरेशका विराट्स्वरूप धारण करना, पुनः लघुस्वरूपमें होकर मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित परशुद्वारा सिन्धुका वध करना, शिव-पार्वती तथा देवोंका उपस्थित होना और मयूरेशस्तोत्रद्वारा स्तुति करना
ब्रह्माजी बोले- दैत्यराज सिन्धु आ गया है, यह समाचार सुनकर वे मयूरेश आनन्दित हो गये और अपने वाहन मयूरपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही युद्धके लिये निकल पड़े। वे अपने हाथोंमें धारण किये हुए चार आयुधोंसे सभी दिशाओं-विदिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। उन्होंने प्रलयकालीन मेघोंकी गर्जनाके समान गर्जना करते हुए आकाशको निनादित कर डाला॥ १-२॥ उन्होंने देखा कि युद्ध करनेके निश्चयसे दैत्य सिन्धु आगे खड़ा है, वह दैत्य सिन्धु भी इन्हें युद्ध करनेके लिये रणभूमिमें उपस्थित देखकर बार-बार उसी प्रकार उन्हें देखने लगा, जैसे हाथी सिंहको देखता है, सर्प गरुड़को देखता है, मधु और कैटभ दैत्योंनै जैसे भगवान् विष्णुको देखा था, त्रिपुरासुरने जैसे पार्वतीपति भगवान् शंकरको देखा और जैसे शुम्भ तथा निशुम्भ राक्षसोंने महाबलशालिनी जगदम्बाको देखा था। तदनन्तर विविध प्रकारके शस्त्रोंसे उन दोनों मयूरेश और दैत्य सिन्धुमें परस्पर युद्ध हुआ॥ ३-५॥ उस समय उन दोनोंकी देह रक्तसे सनी होनेके कारण जपापुष्पके समान लाल रंगकी हो गयी। उन दोनोंके शस्त्रोंके परस्पर आघातसे उत्पन्न अग्निने पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीको जला डाला॥ ६॥ उस समय सागर, द्वीपों तथा पर्वतोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी। तदनन्तर दैत्य सिन्धुने एक बाण हाथमें लिया और उसे आग्नेयास्त्र मन्त्रसे अभिमन्त्रितकर रणांगणमें उपस्थित उन देव मयूरेशको जला डालनेके लिये छोड़ा। वह अग्निबाण उस देवसेनाको जलाते हुए दसों दिशाओंकी ओर चला॥ ७-८॥ तदनन्तर तीनों लोकोंको कम्पित करते हुए मयूरेशने अपने पाश नामक आयुधको मेघास्त्रसे संयोजितकर दैत्यसेनापर छोड़ा। उस मेघास्त्रने जलधाराओंकी वर्षा
करते हुए आग्नेयास्त्रसे उत्पन्न अग्निको शान्त कर डाला। तब अत्यधिक अन्धकारके द्वारा दसों दिशाएँ व्याप्त हो गयीं॥ ९-१०॥ उन वेगशाली जलधाराओंने पर्वतोंको चूर-चूर कर डाला, वृक्षोंके समूहके समूह टूट पड़े। क्या यह प्रलय हो गया ? इस प्रकारसे वह दैत्यराज सिन्धु सोचने लगा। तब दैत्य सिन्धुने पवनास्त्रका प्रयोग करके उन जलवृष्टि करनेवाले मेघोंको तितर-बितर कर दिया। उस वायुने आकाशमण्डल तथा दसों दिशाओंको कम्पित कर डाला॥ ११-१२॥ तदनन्तर देव मयूरेशने अपने हाथमें धारण किये हुए कमलको पर्वतास्त्र मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उसे उस महान् दैत्यके ऊपर छोड़ दिया॥ १३॥ उस पर्वतास्त्रने वृक्षोंको उखाड़ डाला और दसों दिशाओं तथा आकाशको उद्भासित कर दिया, फिर वह अस्त्र दैत्यसेनाके मध्यमें गया और उसने बहुत-से पर्वतोंको प्रकट कर डाला। उत्पन्न हुए असंख्य बड़े- बड़े पर्वतोंने सारी पृथ्वीको आच्छादित कर डाला। उस समय न कहीं ठहरनेके लिये स्थान रह गया था और न कहीं जानेके लिये ही मार्ग बच गया था॥ १४-१५॥ पवनास्त्रको निष्प्रभाव हुआ देखकर और सभी ओर पर्वतोंको व्याप्त देखकर दैत्य सिन्धुने वज्रास्त्रको प्रेरित किया, जिससे असंख्य वज्र निकल पड़े॥ १६॥ उन असंख्य वज्रोंने पर्वतोंको चूर-चूर कर डाला। यह देखकर देव मयूरेशने अपने आयुध अंकुशको वज्रास्त्र मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उन वज्रोंपर उसे चला दिया। तब दोनों ओरसे वज्रयुद्ध होने लगा। उन वज्रोंके टकरानेकी ध्वनिसे पृथ्वी कम्पित हो उठी और पाताल, सभी दिशाएँ तथा आकाश भी प्रकम्पित हो उठा॥ १७-१८॥
५७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
क्री०ख०-अ०१२३] * देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम * ५७१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
प्रसन्नताके साथ देव मयूरेशकी स्तुति करने लगे ॥ ३८ ॥ सभी बोले-जो परब्रह्मस्वरूप, चिदानन्दमय, सदानन्दरूप, देवेश्वर, परमेश्वर, गुणोंके सागर, गुणोंके स्वामी तथा गुणोंसे अतीत हैं, उन आदि ईश्वर मयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ३९ ॥ जो एकमात्र विश्ववन्द्य और एकमात्र परम ओंकारस्वरूप हैं, जो गुणोंके परम कारण एवं निर्विकल्प हैं, उन जगत्के पालक, संहारक एवं उद्धारक आदि- मयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं। जो महादेवजीके पुत्र, महान् दैत्योंके नाशक, महापुरुष, सदा विघ्नविनाशक तथा सदैव भक्तोंके पोषक हैं, उन परम ज्ञानके कोष आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४०-४१ ॥ जिनका कोई आदि नहीं है, जो समस्त गुणोंके आदिकारण तथा देवताओंके भी आदि-उद्भावक हैं, पार्वतीदेवीको महान् सन्तोष देनेवाले तथा सबके द्वारा सदा ही वन्दनीय हैं, उन दैत्यनाशक एवं भोग तथा मोक्षके प्रदाता आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४२ ॥ जो परम मायावी (मायाके अधिपति) और मायावियोंके लिये भी अगम्य हैं, महर्षिगण जिनका सदा ध्यान करते हैं, जो अनादि आकाशके तुल्य सर्वव्यापक हैं, जीवमात्रके स्वामी हैं तथा जिनके असंख्य अवतार हैं, उन आत्मतत्त्वविषयक अज्ञानके नाशक आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४३ ॥ जो अनेकानेक क्रियाओंके कारण हैं, जिनका स्वरूप श्रुतियोंके लिये भी अगम्य है, जो वेदबोधित अनेकानेक कर्मोंके आदिबीज हैं, समस्त कार्योंकी सिद्धिके हेतु हैं तथा देवेन्द्र आदि जिनकी सदा सेवा करते हैं, उन आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४४ ॥ जो महाकालस्वरूप हैं, लव-निमेष आदि भी जिनके ही स्वरूप हैं, जो कला और कल्पस्वरूप हैं तथा जिनका स्वरूप सदा ही अगम्य है, जो लोगोंके ज्ञानके हेतु तथा मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं, उन आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं। महेश्वर आदि देवता सदा जिनके चरणोंकी सेवा करते हैं, जो योगियोंके नित्य रक्षक, चित्स्वरूप, निरन्तर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और करुणाके सागर हैं, उन आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४५-४६ ॥ हे सुरश्रेष्ठ ! आप सदा भक्तजनोंके लिये हठात् परमानन्दमय सुख देनेवाले हैं; क्योंकि आप संसारके जीवोंपर शीघ्र परम करुणाका विस्तार करते हैं। हे प्रभो ! काम-क्रोधादि छः प्रकारकी ऊर्मियोंके वेगको शान्त कीजिये; क्योंकि आपके अनन्त सुखदायक भजनकी अपेक्षा मुक्ति भी स्पृहणीय नहीं है। हे गजानन ! क्या हम आपके योग्य कोई उत्तम या सुन्दर स्तवन कर सकते हैं ? आप समस्त गुणोंकी निधि और सम्पूर्ण जगत्के प्रेमपात्र हैं। आपके गुणसमूहोंका वर्णन करनेकी शक्ति हममें नहीं है। आपका जो यह जगत्की सृष्टि-रचनाका क्रम है, वह समुद्रके समान अपार है ॥ ४७-४८ ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार स्तुति करनेके अनन्तर वे सभी बड़े ही आदरपूर्वक उनसे निवेदन करने लगे- हे मयूरेश ! जो आपने कहा था, उस महान् वचनका आपने पालन किया ॥ ४९ ॥ सभी देवसमूहोंके लिये यह महादैत्य सिन्धु अवध्य था, उसे आज आपने मार गिराया है। उसी समय वहाँ पार्वती आयीं और वे बड़ी आनन्दित हुईं, उन्होंने उन मयूरेशका आलिंगन किया। भगवान् शिव भी वहाँ आये और उन्होंने मयूरेशका आलिंगनकर उनसे कहा-हे वत्स ! तुमने बहुत अच्छा कर्म किया है, अब सम्पूर्ण त्रिलोकी हर्षित हो गयी है ॥ ५०-५१ ॥ सभी देवताओंके लिये भी जो असाध्य था, उस दैत्य सिन्धुका तुमने वध किया है, फिर भी तुम्हें कोई श्रम मालूम नहीं हुआ, तुम महापराक्रमशाली हो, सभी लोगोंकी रक्षामें निरत रहते हो, चारों वेद भी तुम्हारे यथार्थ स्वरूपका निरूपण कर पानेमें असमर्थ हैं और तुम सभी विद्याओंके निधान हो। इस प्रकारसे कहनेके अनन्तर वे सभी सम्मानित होकर अपने स्थानोंको चले
५७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
गये। मयूरेशको प्रणाम करनेके अनन्तर जब वे सभी | विजय प्राप्त होती है। वह अत्यन्त दुर्लभ ऐश्वर्यको प्राप्त देवता जाने लगे तो देव मयूरेश उनसे बोले—जो इस | करता है, पुत्रवान् होता है, धन-सम्पत्ति प्राप्त करता है स्तोत्रका पाठ करता है, वह समस्त कामनाओंको प्राप्त | और सबको अपने वशमें कर लेता है॥ ५५-५६॥ कर लेता है॥ ५२-५४॥ ब्रह्माजी बोले—मयूरेशके द्वारा ऐसा कहे जानेपर इस स्तोत्रका एक हजार बार पाठ करनेसे कारागृहमें | देवगणोंने उनके कथनका 'साधु-साधु' ऐसा कहकर बन्द बन्दीजनको वहाँसे मुक्ति प्राप्त होती है। इस | समर्थन किया और मयूरेशसे जानेकी आज्ञा प्राप्त करके स्तोत्रका दस हजार बार पाठ करनेसे मनुष्य जो असाध्य | वे देवता चले गये और देव मयूरेशने भी अपने गणोंके भी है, उसे तत्क्षण ही सिद्ध कर लेता है। उसे सर्वत्र | सहित अपने धामको प्रस्थान किया॥ ५७॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुके वधका वर्णन' नामक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १२३॥
एक सौ चौबीसवाँ अध्याय सिन्धु-वधके अनन्तर माता-पिता तथा पत्नीका करुण विलाप, पत्नी दुर्गाका सती होना, पिता चक्रपाणिके द्वारा मयूरेशकी स्तुति और उनसे गण्डकीनगरमें चलनेके लिये प्रार्थना करना, शिव-पार्वती तथा गणों एवं मुनियोंसहित मयूरेशका गण्डकीनगरके लिये प्रस्थान
ब्रह्माजी बोले—युद्धभूमिमें दैत्यराज सिन्धुके गिर | हमलोग रो रहे हैं। देवताओंको मरा हुआ देखकर जानेपर जो बचे हुए योद्धा थे, वे वापस गण्डकीनगरमें | पार्वतीका पुत्र वह मयूरेश अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्धस्थलमें चले आये और यहाँ उन्होंने देखा कि दैत्य सिन्धुकी | आया, उसने अपने अस्त्रोंके द्वारा दैत्यराज सिन्धुके माता उग्रा, पत्नी दुर्गा तथा उसके पिता चक्रपाणि | अस्त्रोंको रोककर तीक्ष्ण परशुको छोड़ा॥ ६-७॥ अत्यन्त चिन्तामग्न तथा बहुत व्याकुल होकर पड़े हुए | उस परशुके आघातसे सिन्धु मृत्युको प्राप्त होकर थे, उस समय उन लोगोंको अनेक प्रकारके अपशकुन | भूमिपर गिर पड़े। वहाँ उन दैत्य सिन्धुके सभी सैनिक भी दिखायी देने लगे॥ १-२॥ | तथा नगरनिवासीजन भी मूर्च्छित हो गये॥ ८॥ उन्होंने देखा कि कोई व्यक्ति अशुभकी सूचना देता | दूतोंके मुखसे इस प्रकारकी बात सुनकर वे सभी हुआ उत्तरकी ओर सिर करके सोया हुआ है। कोई अपने | रोने लगे। दैत्य सिन्धुकी पत्नी दुर्गा अत्यन्त विलाप करने दोनों घुटनोंके बीच सिर रखकर बैठा था और बिना कुछ | लगी और जोर-जोरसे सिर पीटने लगी॥ ९॥ बोले चुपचाप हिलता हुआ-सा प्रतीत हो रहा था॥ ३॥ | उसके केश बिखर गये, वह अपने मुखको बार- कोई स्त्री खिन्न-सी होकर अपनी ठुड्डीमें हथेलीको | बार पीटने लगी, उसके आभूषण गिर गये थे। उस समय टिकाकर बैठी हुई है, उसी समय यमदूतोंके समान कुछ | सिन्धुदैत्यकी माता उग्रा, पिता चक्रपाणि तथा समस्त दूत वहाँ आये, उन दूतोंका मुख अत्यन्त मुरझाया हुआ | पुरवासी रो-रोकर अपने हाथसे मुख पीटने लगे। वे था, उनकी स्थिति दयनीय थी, वे कुछ बोल नहीं रहे | अपना सिर जमीनपर पटक-पटककर जोर-जोरसे चिल्लाते थे, मौन थे। उनसे पूछे जानेपर उनमेंसे कुछ दूसरे दूतोंने | हुए भूमिपर लोटने लगे॥ १०-११॥ युद्धमें जो हुआ, वह समाचार बताते हुए कहा॥ ४-५॥ | कोई-कोई दुखी होकर धूलको अपने मुखपर तथा दूत बोले—असंख्य महान् वीरोंका वध करनेके | सिरपर उछालने लगा, कोई अपनी हथेलीके पृष्ठभागोंको अनन्तर दैत्यराज सिन्धु हम बालकोंको असहाय छोड़कर | दाँतसे काटने लगा और उनसे जमीन पीटने लगा। स्त्रियाँ स्वर्गको प्राप्त हो गये हैं, इसी कारण उनके विरहमें | अपनी अँगुलियोंको तोड़-मरोड़कर गिरिजाके पुत्र उस
क्री०ख०-अ०१२४ ] * सिन्धु-वधके अनन्तर माता-पिता तथा पत्नीका करुण विलाप * ५७३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मयूरेशको शाप देने लगीं ॥ १२ ॥ उग्रा बोली—[हे वत्स !] मैंने विविध प्रकारके प्रयत्नों, कठोर तपस्या, भगवान् सूर्यकी प्रसन्नता, उन्हें नमन करने, उनकी स्तुति करने, विविध प्रकारके उपवासों तथा सभी प्रकारके दानोंको देनेके अनन्तर बहुत समयके बाद किसी प्रकार तुम्हें प्राप्त किया है, अरे शूर ! अरे मानी ! इस समय तुम्हें कौन ले गया है ? ॥ १३ ॥ तुम्हारे तीनों लोकोंके नायक होनेसे मैं भी तीनों लोकोंमें प्रशंसनीय थी, लेकिन अब इस समय लोग मुझे 'तुम भाग्यहीन हो' इस प्रकार कहकर उलाहना देंगे ॥ १४ ॥ पूर्वकालमें तुमने यमराजको जीत लिया था, फिर आज कैसे उनसे मिलना हो गया है ? हे पुत्र ! आज पुनः तुमने उसको कैसे नहीं जीत लिया ? ॥ १५ ॥ हे पुत्र ! तुम्हारे स्वर्गलोक चले जानेपर पार्वतीके पुत्र उस मयूरेशकी इच्छा पूर्ण हो गयी है। मुझसे बिना पूछे ही तुम सुख देनेवाले उस स्वर्गलोकको क्यों चले गये हो ? हे पुत्र ! मुझे दुखी देखकर तुम किस प्रकार सन्तोष प्राप्त कर सकोगे ? हे पुत्र ! जब तुम गर्जना करते थे तो भयभीत होकर मेघ गरजना छोड़ देते थे, किंतु हे पुत्र ! वही आज तुम रणांगणमें कैसे शान्त होकर गिरे पड़े हो ? ॥ १६-१७१/२ ॥ दुर्गा बोली—वेदोंके विधानके अनुसार विधाताने हम दम्पतीका शरीर दो होनेपर भी एक तो बनाया है, किंतु उस मूढ़बुद्धि ब्रह्माने प्राणोंकी एकता क्यों नहीं बनायी ? सौभाग्यके अभिमानसे गर्वित होकर मैं अपने सामने शची तथा सावित्रीको भी कुछ नहीं गिनती थी, फिर वही आज मैं विधवा कैसे हो गयी हूँ ? [हे स्वामिन् !] आप जब अपने हाथसे मेरे अंगोंमें कस्तूरी तथा चन्दनका लेप लगाते थे, तभी मेरे अंग शीतल होते थे, किंतु इस समय शोकाग्निके द्वारा वे सभी अंग दग्ध हो रहे हैं, उन्हें आप शीतलता प्रदान करें ॥ १८-२१ ॥ पहले तो आप मेरे बिना अणुमात्र विषका भी सेवन नहीं करते थे, फिर आप आज मेरे बिना स्वर्गके उस सुखका कैसे भोग कर रहे हैं ? ॥ २२ ॥ जो सज्जन होते हैं, सबके साथ समान व्यवहार करनेवाले होते हैं, वे बिना अपराधके अपने सेवककी उपेक्षा नहीं करते हैं, फिर आप क्यों मेरी उपेक्षा कर रहे हैं ? देवताओंका भी अन्त करनेवाले हे स्वामिन् ! आपने पूर्वकालमें बिना गुणोंकी अपेक्षा रखते हुए मुझसे विविध प्रकारका निश्छल प्रेम किया है, फिर इस समय उस अवर्णनीय प्रेमका परित्यागकर आप क्यों चले गये हैं ? ॥ २३-२४ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर तपोवृद्ध तथा ज्ञानवृद्ध-जन यह कठोर वचन कहकर उनको समझाने लगे कि धर्मशास्त्रको जाननेवाले विद्वान् मृत्युके अनन्तर रोनेकी प्रशंसा इसलिये नहीं करते हैं कि मित्र तथा सम्बन्धीजनोंके जो आँसू निकलते हैं, वे निश्चित ही प्रेतके मुखमें पड़ते हैं, अतः उस मृत व्यक्तिका हित करनेवाले दयावान्को चाहिये कि उस प्रेतके लिये जो हितकारी कर्म है, उसे सम्पन्न करे* ॥ २५-२६ ॥ विचार करनेपर यह सुनिश्चित होता है कि उन कृपालु, निर्गुण, चिदानन्दघन, ब्रह्मस्वरूप मयूरेशने दैत्य सिन्धुको भी मोक्ष ही प्रदान किया है। संसारका कल्याण करनेवाले उन मयूरेशने जीवोंपर दया करनेके लिये ही शरीर धारण किया है और उन्होंने युद्धमें सम्मुख उस सिन्धुका वध करके उसे मोक्ष प्रदान किया है ॥ २७-२८ ॥ आत्मा अनादि है, निर्गुण है और नित्य है, इसलिये उसकी न तो मृत्यु होती है और न कभी उसका जन्म ही होता है, ऐसा वेदमें निश्चित किया गया है ॥ २९ ॥ व्यक्ति अपने स्वार्थवश ही मृत व्यक्तिके लिये रोता है, वह उसका हित नहीं चाहता। असंख्य प्राणियोंके भारको वहन करनेवाली पृथिवी, कूर्म, वराह तथा पृथ्वीको
- ब्रह्मोवाच तपोवृद्धा ज्ञानवृद्धाः प्राब्रुवन्निष्ठुरं वचः । न रोदनं प्रशंसन्ति धर्मशास्त्रविदो जनाः ॥ यदश्रु सुहृदामास्ये प्रेतस्य तत्पतेद् ध्रुवम् । तस्मात्तस्य हितं यत्स्यात्तत्कर्तव्यं दयावता ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड १२४ । २५-२६)
५७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
धारण करनेवाले शेषनाग—ये सब प्रेतका भार सहन नहीं कर पाते। वृद्धजनोंद्वारा इस प्रकारसे कहा जानेपर वे लोग तब शोकमुक्त हुए ॥ ३०-३१ ॥ तदनन्तर दैत्य सिन्धुकी माता उग्रा, पिता चक्रपाणि, अपनी सखियोंके साथ भार्या दुर्गा तथा गण्डकीनगरके निवासी जन—ये सभी शोक करते हुए युद्धस्थलमें गये। वहाँ उन्होंने रणभूमिमें पड़े हुए सिन्धुको देखा, जिसे सेवक पंखा झल रहे थे, उसका मुखरूपी कमल फैला हुआ था और उसके नेत्र सफेद हो चुके थे ॥ ३२-३३ ॥ उसके शरीरसे रक्त प्रवाहित हो रहा था और दुर्गन्ध भी आ रही थी। वहाँ मांसभक्षी पक्षी तथा हिंसक पशु भरे हुए थे। उसके माता-पिता, पत्नी तथा वे सभी नगरनिवासी उसे चारों ओरसे घेरकर बैठ गये, वे अत्यन्त दुखी तथा शोकसे व्याकुल थे ॥ ३४ ॥ अपने स्वामी दैत्य सिन्धुका सिर अपनी गोदमें रख करके उसकी भार्या दुर्गा बड़े जोरसे चिल्लाती हुई शोक मनाने लगी। हे नाथ ! पहले मैं अपने दोनों हाथोंसे आपके पैर दबाया करती थी, किंतु यहाँ लोगोंके सामने ऐसा करना सम्भव नहीं है, अतः हे प्राणनायक ! हे वीर ! आप उठें, शत्रुके जिन्दा रहते आप कैसे निद्रामें सो गये हैं ? ॥ ३५-३६ ॥ तदनन्तर अपने पतिके मुखमें अपना मुख रखकर वह विलाप करते हुए हाहाकार करने लगी। तब वृद्धजनों एवं ज्ञानीजनोंने उसे ऐसा करनेसे रोका। तत्पश्चात् दैत्य सिन्धुकी माता उग्रा तथा पिता चक्रपाणि—दोनों उसके मुखको धोने लगे और फिर उससे बोले—अरे वत्स ! उठो, शत्रुगणोंके जीवित रहते, क्यों सो रहे हो ? ॥ ३७-३८ ॥ वज्र धारण करनेवाले देवराज इन्द्रके वज्रसे आहत हुएके समान तुम भूमिपर गिरे पड़े हो। इस समय उस छोटे-से बालक मयूरेशके साथ युद्ध करनेपर तुम कैसे भूमिपर गिर पड़े ? ॥ ३९ ॥ तुमने तो अपनी भौंहोंके इशारेमात्रसे यमराजको भी जीत लिया था, फिर तुम आज कैसे उस यमके वशमें आ गये ? हे विभो ! हमारे हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले कुछ वचनोंको तो तुम बोलो ॥ ४० ॥ हे अनघ ! पूर्वकालमें जिसके शब्दसे तीनों लोक भी काँप उठते थे, फिर आज हे अमन्द पराक्रमवाले वही तुम वह शब्द क्यों नहीं बोल रहे हो ? ॥ ४१ ॥ हम लोगोंने तुम्हारा कोई ऐसा अपराध भी नहीं किया है कि जिस कारण तुम मौन हो गये हो। लगता है कि तुम क्रोधके कारण ही अपनी समस्त सेनाके साथ हमसे कुछ नहीं बोल रहे हो ॥ ४२ ॥ जिसने अपनी कान्तिसे कामदेवको भी जीत लिया था, वही तुम आज किस प्रकार विह्वलताको प्राप्त हो रहे हो ? तदनन्तर विद्वज्जनों तथा वृद्धजनोंने अनेक प्रकारके उदाहरणोंद्वारा रोते हुए उन उग्रा तथा चक्रपाणि आदिको आश्वस्त किया और धीरज बँधाया। साथ ही यह भी कहा कि जो मर गया है, उसके पीछे स्वयं मर जाना ठीक नहीं है, क्या दशरथके पुत्र श्रीराम परलोकमें नहीं गये ? क्या अपने पराक्रमके बलपर शत्रुओंको जीतनेके अनन्तर रघुश्रेष्ठ श्रीराम परलोक नहीं गये। अन्य और भी सैकड़ों राजा उनके लिये युद्धभूमिमें मृत्युको प्राप्त हुए और अब वे अनेक प्रकारकी अपनी कीर्तिको स्थापित करके स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक स्थित हैं ॥ ४३-४५ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर उन सभीने विल्व तथा चन्दनकी लकड़ीसे उसका दाहसंस्कार किया। पतिव्रताके गुणोंसे सम्पन्न उसकी भार्या दुर्गा उसीके साथ सती हो गयी। तदनन्तर दैत्य सिन्धुके पिता चक्रपाणि नगरनिवासियोंके साथ मयूरेशके समीपमें गये, उन्होंने उन्हें नमस्कार किया और फिर हाथ जोड़कर वे धीरे- धीरे उनकी स्तुति करने लगे ॥ ४६-४७ ॥ राजा बोले—हे विभो ! आप निर्गुण हैं, परमात्मा हैं, सम्पूर्ण चर एवं अचर जगत्की गति हैं, आप वेदत्रयीके द्वारा गम्य नहीं हैं, सत्त्वादि तीनों गुणोंके स्वामी हैं, निर्मल स्वरूपवाले हैं और सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं। आपकी मायाके कारण ही मोहित देवता आपको भलीभाँति नहीं जान पाते हैं। हे प्रभो ! आज आपके दर्शनसे मैं धन्य हो गया हूँ और ये सभी गण्डकी- नगरमें निवास करनेवाले भी धन्य हो गये हैं ॥ ४८-४९ ॥
क्री०ख०-अ०१२५ ] * कारागारसे मुक्त हुए देवताओंका मयूरेशकी महिमाका गान करना * ५७५ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार राजाके द्वारा स्तुत किये गये, सभी शास्त्रोंके तत्त्वार्थको जाननेवाले एवं कृपासिन्धु देव मयूरेश अत्यन्त प्रसन्नताके साथ बोले ॥ ५० ॥ देव बोले—हे चक्रपाणे! आपका पुत्र मृत्युको प्राप्त हो गया है, आप मुझसे वर माँग लें ॥ ५० १/२ ॥ राजा बोले—हे देवेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो आप हमलोगोंके घरमें पधारिये और इस गण्डकीनगरीको पवित्र कीजिये ॥ ५१ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—राजाका इस प्रकारका वचन सुनकर मयूरेशने मोरपर आरूढ़ होकर चक्रपाणिके नगर गण्डकीको प्रस्थान किया। उनके पीछे-पीछे भगवान् शंकर तथा माता पार्वती भी गये। उन सभीके आगे-आगे वे सभी गण तथा मुनिगण प्रसन्नमन होकर चल रहे थे। समस्त वाद्योंकी ध्वनिके साथ वे सभी उस गण्डकीनगरकी ओर गये, जो विविध प्रकारकी ध्वजाओं और पताकाओंसे सुसज्जित था और जहाँके मार्ग जल आदिके छिड़कावसे स्वच्छ किये गये थे ॥ ५२-५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'मयूरेशका गण्डकीनगरीके लिये प्रस्थानका वर्णन' नामक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२४ ॥ एक सौ पच्चीसवाँ अध्याय कारागारसे मुक्त हुए देवताओंका मयूरेशकी महिमाका गान करना, चक्रपाणिद्वारा मयूरेशकी प्रथम पूजा करनेसे इन्द्रका रुष्ट होना, महान् ध्वनिके साथ मयूरेशका प्रकट होना और पुनः पंचदेवोंके रूपमें अवतरित होना, ब्रह्माजीद्वारा सिद्धि-बुद्धि नामक कन्याओंका मयूरेशके साथ विवाह करना ब्रह्माजी बोले—अपने नगरमें सबसे आगे पहुँचकर चक्रपाणिने अत्यन्त मूल्यवान् चादरों तथा वस्त्रोंके द्वारा और पताकाओं, ध्वजों एवं चामरोंके द्वारा अपनी राजसभाको सुसज्जित करवाया। उस सभामें भूमिमें स्थित स्तम्भोंमें नाना प्रकारके रत्नोंकी आभा प्रकाशमान हो रही थी, जिसमें गये मनुष्योंके प्रतिबिम्ब अनन्त प्रकारके दिखायी दे रहे थे ॥ १-२ ॥ देवेश्वर मयूरेशने विविध प्रकारके ध्वजोंसे सुशोभित उस गण्डकीपुरीको देखा। उस पुरीके ऊँचे-ऊँचे भवनोंके शिखरोंपर चढ़ी हुई स्त्रियाँ उन मयूरेशको देख रही थीं ॥ ३॥ बन्धनमें डाले गये वे देवता चक्रपाणिद्वारा मुक्त होनेपर मयूरेशके समक्ष आये। उनमें विष्णु, इन्द्र, अग्नि, कुबेर, मरुद्गण, सूर्य तथा इन्द्राणी आदि सभी थे। वे विविध वाद्योंकी ध्वनि करते हुए शीघ्र ही वहाँ आये। वे सभी देवता अपने-अपने वाहनोंसे उतरे और उन सभीने मयूरेश्वरको प्रणाम किया ॥ ४-५ ॥ देवताओंने तथा पुरवासियोंने बड़े ही आदरके साथ मयूरेशका आलिंगन किया। मयूरेशका दर्शनकर भगवान् विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। विष्णु आदि सभी देवताओंने दैत्यराज सिन्धुका वध कर दिये जानेके कारण मयूरेशकी अत्यन्त प्रशंसा की ॥ ६ १/२ ॥ देवता बोले—जिसने स्वर्ग आदि सभी लोकोंको भी भयभीतकर अपने अधीन बना डाला था, ऐसे दैत्य सिन्धुका क्षणभरमें आपने वध कर डाला और शीघ्र ही देवताओंको अपना-अपना पद प्रदान कर दिया, ऐसा दूसरा कोई देवता न देखा गया है और न कभी सुना ही गया है ॥ ७ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—वहाँ जो-जो भी वैष्णव, शैव, शाक्त तथा सूर्योपासक सौर थे, उन्होंने मयूरेशका अपने- अपने इष्टदेवके रूपमें अर्थात् विष्णु, शिव, दुर्गा तथा सूर्यके रूपमें दर्शनकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उनका पूजन किया। मयूरेशकी जय हो, यह ध्वनि सुनकर सभीको बड़ा ही आश्चर्य हुआ ॥ ८-९ ॥ उस समय बालकों, युवावस्थाको प्राप्त मुग्धा युवतियों, प्रौढा स्त्रियों, वृद्धजनों तथा युवावस्थावाले पुरुषोंने देव मयूरेशका मानसिक पूजन किया ॥ १० ॥
५७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
हे मुनि व्यासजी ! चक्रपाणिके भवनमें पहुँचकर देवेश्वर मयूरेश वहाँ मध्यमें स्थित एक शुभ सिंहासनपर आसीन हो गये और उनके चारों ओर देवता, मुनि और सात करोड़की संख्यावाले सभी गण स्थित हो गये। तदनन्तर वन्दीजनोंने स्तुतिगान किया और वैसे ही सफलमनोरथ देवताओं तथा राजाओंने भी स्तवन किया ॥ ११-१२ ॥ उस समय अप्सराओंके समूह नृत्य करने लगे। नारद आदि ऋषिगण गान करने लगे। तदनन्तर राजा चक्रपाणिने विधि-विधानके साथ सबका पूजन किया और पूजनके अनन्तर वे सभाके मध्यमें स्थित होकर कहने लगे— आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरे कर्म सफल हो गये, जो कि इन्द्र आदि लोकपाल मेरी सभामें उपस्थित हुए हैं। अपने सौ जन्मोंके अर्जित पुण्यफलोंके द्वारा आज मुझे मयूरेशके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त हुआ है ॥ १३–१४ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- मयूरेशकी सबसे पहले हुई पूजाको देखकर इन्द्र अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे, वे जगदीश्वरकी मायासे मोहित होकर एकाएक बोल उठे ॥ १५ १/२ ॥ इन्द्र बोले- हे चक्रपाणि ! जगत्का निर्माण करनेवाले चतुर्मुख ब्रह्मा तथा लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके यहाँ उपस्थित होनेपर भी तुम बड़े मूर्ख ही हो, जो कि तुमने एक बालकका सर्वप्रथम पूजन किया है। हम सभीको अपमानित करके मोहवश तुमने एक बालकका पूजन किया है ॥ १६-१७ ॥ तुमने सभी लोकोंकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा, संहार करनेवाले भगवान् शिव, सृष्टि-पालन तथा अन्त करनेवाली तीनों लोकोंकी माता जगदम्बा तथा तीनों लोकोंके स्वामी एवं वैदिक कर्मोंका प्रवर्तन करनेवाले भगवान् सूर्यको छोड़कर एक बालकका पूजन किया है, यह तुमने ठीक नहीं किया ॥ १८-१९ ॥ ब्रह्माजी बोले- देवराज इन्द्रके इस प्रकार कहनेपर राजा चक्रपाणि बोले- इस बालकमें रुद्र, सूर्य, कुबेर, इन्द्र, मरुद्गण तथा अग्नि आदि देवोंसे अधिक पराक्रम देखा गया है, जो कि इन्होंने दैत्यराज सिन्धुका वध कर दिया और इन गुणेश्वर मयूरेशने ही दैत्य सिन्धुके कारागारसे सभी देवताओंको मुक्त कराया है ॥ २०-२१ ॥ पृथ्वीके भारका हरण करनेके लिये ये भगवान् शिवके घरमें अवतीर्ण हुए हैं। ये परमात्मा हैं, अनन्त शक्तियोंसे सम्पन्न हैं और अनेकों दैत्योंका वध करनेवाले हैं ॥ २२ ॥ ब्रह्माजी बोले- राजा चक्रपाणि जब इस प्रकारसे बोल रहे थे कि उसी समय देवोंको एक महान् ध्वनि सुनायी पड़ी। उस ध्वनिसे ब्रह्माण्डमें विस्फोट होनेकी आशंकासे कुछ देवता मूर्च्छित होकर गिर पड़े ॥ २३ ॥ सम्पूर्ण पृथ्वी काँप उठी। उस समय कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा था। करोड़ों सूर्योंके प्रकाशसे सहसा जगत् आच्छादित हो गया ॥ २४ ॥ तदनन्तर उन देवताओंने वहाँपर एक अत्यन्त सुन्दर देवको देखा। वह नाना प्रकारके अलंकारोंको धारण किये हुए था, उसकी दस भुजाएँ थीं और उसका मुख हाथीके समान था ॥ २५ ॥ इस प्रकारके स्वरूपको देखकर वे सभी देवता उस समय आश्चर्यचकित हो उठे। उसी क्षण उन्होंने पुनः उस देवको पाँचस्वरूपधारी ईश्वरके रूपमें देखा ॥ २६ ॥ वह मध्यमें पद्मासनमें स्थित वक्रतुण्डके रूपमें, आग्नेयकोणमें शिवरूपमें, नैर्ऋत्यकोणमें सूर्यरूपमें, वायव्यकोणमें पार्वतीके रूपमें और ईशानकोणमें विष्णुरूपमें दिखायी पड़ा। यह देखकर वे सभी देवता अत्यन्त भ्रममें पड़ गये। तभी उन्हें आकाशवाणी सुनायी दी, जो उन सभीके भ्रमका निवारण करनेवाली थी ॥ २७-२८ ॥ उस आकाशवाणीने कहा- ये देव सभी लोगोंके लिये आराधनीय हैं। एक होनेपर भी ये पाँच रूपोंमें प्रकट हुए हैं। ये देव आदि और अन्तसे रहित हैं। सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त रहनेवाले हैं और ये गजानन नामवाले हैं ॥ २९ ॥ ये देव देवताओं, मनुष्यों, यक्षों, नागों तथा राक्षसोंके द्वारा सदैव ही पूजनीय हैं और सभी विघ्नोंका विनाश करनेवाले हैं। इनका पूजन हो जानेसे पंचदेवों-गणेश, विष्णु, शिव, दुर्गा तथा सूर्यका पूजन हो जाता है। इन देवके विषयमें कोई शंका नहीं करनी चाहिये, ऐसा करनेपर वह नरकप्राप्तिका कारण बनेगी ॥ ३०-३१ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारकी आकाशवाणीको सुननेके अनन्तर इन्द्र आदि उन प्रधान देवताओंने सूँड़से