श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१०८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
मुनि परम शान्तिको प्राप्त हो गये ॥ १९-२० ॥ हे परमेश्वर! षडक्षरमन्त्रके प्रभावसे मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने कृपा करके मुझे इस मन्त्रका उपदेश दिया था ॥ २१ ॥ उस समय ब्रह्माजीने मुझसे कहा था कि जब तुम इस मन्त्रका विस्मरण कर दोगे, तभी तुम अपने पदसे च्युत हो जाओगे और दुर्दशाको प्राप्त हो जाओगे ॥ २२ ॥ तब (विस्मृत हुए मन्त्रवाले) मुझ अत्यन्त लोलुपने दुर्भाग्यके वशीभूत होकर उन मुनिपत्नी अहल्याका सतीत्व नष्ट किया, इसलिये मैं दुर्गतिंको प्राप्त हो गया ॥ २३ ॥ हे देवेश! पुनः बृहस्पतिजीके द्वारा उपदिष्ट उस मन्त्रके जपके प्रभावसे मैं इस समय सहस्र नेत्रोंवाला होकर आपके स्वरूपका दर्शन कर रहा हूँ ॥ २४ ॥ मैं एक अन्य वरकी याचना करता हूँ; क्योंकि आप चिन्तित अर्थको देनेवाले (मनोकामना पूर्ण करनेवाले) हैं, इसलिये यह कदम्बनगर 'चिन्तामणिपुर' - इस नामसे प्रसिद्ध हो जाय ॥ २५ ॥ हे विघ्नराज ! इस समय अनुष्ठानके फलरूपमें मैंने आपके चरणकमलोंका दर्शन कर लिया। अब मैं जो वर माँग रहा हूँ, उसे मुझे दीजिये। हे देव! जिससे आपका कभी विस्मरण न हो; हे देव! वैसा करो। हे विभो! आपके चरणकमलोंमें मेरा मन सदैव रमण करता रहे ॥ २६-२७ ॥ हे गजानन ! आजसे इस लोकमें यह [विशाल] सरोवर 'चिन्तामणितीर्थ' के रूपमें प्रसिद्ध हो जाय ॥ २८ ॥ हे जगद्गुरु ! इस सरोवरमें स्नान करने, यहाँ दान देनेसे मनुष्योंको आपकी कृपासे धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष-सम्बन्धी सिद्धियाँ प्राप्त हों ॥ २९ ॥ मुनि बोले- इन्द्रके वचनोंको सुनकर जगत्पति विघ्नेश्वर गणेशजी मेघसदृश गम्भीर और मधुर स्वरमें बोले- ॥ ३० ॥ [विघ्न ] विनायक श्रीगणेशजी बोले - हे विभो! जिन-जिन वरदानोंके लिये तुमने प्रार्थना की, वे सब तो तुम्हें प्राप्त होंगे ही, एक अन्य वरदान भी मैं तुम्हें देता हूँ कि तुम अपने इन्द्रपदपर सदैव स्थिर रहो ॥ ३१ ॥ हे देवेन्द्र ! तुम्हें मेरी निरन्तर अविस्मृति रहे अर्थात् तुम मेरा स्मरण कभी न भूलो। हे वासव ! जब तुमपर कोई संकट आये तो मुझे स्मरण कर लेना ॥ ३२ ॥ मैं सदैव प्रकट होकर तुम्हारे सारे कार्योंको सम्पादित कर दूँगा। यह (कदम्बपुर) पृथ्वीपर चिन्तामणिपुर नामसे प्रसिद्ध होगा और मैं चिन्तामणि विनायकके रूपमें इच्छित मनोकामनाओंको प्रदान करूँगा ॥ ३३-३४ १/२ ॥ नारदजी बोले- तब इस प्रकार वर प्राप्त करके इन्द्रने स्वर्गस्थित गंगाजीके जलका आनयन किया और उसके द्वारा उन सर्वव्यापक महाभाग गणेशजीका उनके परिवार (पत्नियों- सिद्धि-बुद्धि और पुत्रों - क्षेम-लाभ)- सहित अभिषेक एवं पूजन किया ॥ ३५-३६ ॥ देवराज इन्द्रद्वारा पूजित होकर वे प्रभु गणेशजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तब शतक्रतु इन्द्रने भी स्फटिकसे निर्मित सर्वांगसुन्दर मंगलमयी दिव्य वैनायकी मूर्तिकी वहाँ आदरपूर्वक स्थापना की और सुवर्ण तथा रत्नोंसे जटिल विशाल मन्दिर बनवाया ॥ ३७-३८ ॥ उनकी प्रदक्षिणा और नमस्कार करके शतक्रतु इन्द्र अपने स्थानको चले गये। तबसे इस पृथ्वीपर वह महान् सरोवर चिन्तामणि [तीर्थ]-के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३९ ॥ आज भी पवित्र जलवाली गंगाजी शतक्रतु इन्द्रके आदेशसे उस मूर्तिको नित्य अभिषेक करके सदा अपने धामको चली जाती हैं ॥ ४० ॥ [नारदजी कहते हैं- हे राजन् !] इस प्रकार मैंने तुमसे अद्भुत दर्शनवाले इस क्षेत्रकी महिमा कह दी। [यह क्षेत्र] सभी दोषोंका हरण करनेवाला, ऐश्वर्यसम्पन्न, सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाला और मंगलमय है ॥ ४१ ॥ हे पृथ्वीपति ! तुम वहाँ जाकर विधिपूर्वक स्नान करो, इससे तुम सभी दोषोंसे मुक्त हो जाओगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ४२ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] तदनन्तर मुनि नारद उन राजा रुक्मांगदको आशीर्वादोंसे अभिनन्दितकर और आदरपूर्वक उनसे विदा लेकर शीघ्र ही चल दिये ॥ ४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'चिन्तामणितीर्थवर्णन' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_5_1_Back
पैंतीसवाँ अध्याय
उ०ख०-अ०३५] * चिन्तामणिक्षेत्रस्थ गणेशतीर्थमें स्नानसे राजा रुक्मांगदको दिव्य देहकी प्राप्ति * १०९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पैंतीसवाँ अध्याय चिन्तामणिक्षेत्रस्थ गणेशतीर्थमें स्नानसे राजा रुक्मांगदको दिव्य देहकी प्राप्ति तथा उनका माता-पितासहित विनायकलोकको जाना व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन्!] देवर्षि नारदके चले जानेपर उन राजा रुक्मांगदने तब क्या किया? आप मुझसे इस मनोरम कथाको कहिये॥ १॥ ब्रह्माजी बोले—हे पुत्र! जब इस प्रकारका अत्यन्त महान् उपदेशकर नारद नामवाले मुनि चले गये, तभी हर्षयुक्त राजा रुक्मांगदने अपनी उस चतुरंगिणी सेनाको देखा॥ २॥ उस सेनाने भी विकृत रूपमें उन राजाको देखा, जो पूर्वकालमें स्वर्णसदृश कान्तिवाले और रूपमें रतिपति कामदेवके समान थे। वे अब इस प्रकारके रूपवाले कैसे हो गये—ऐसा संशय करते हुए उन लोगों [सैनिकों]- ने राजासे इस विषयमें प्रश्न किया—॥ ३॥ सैनिकोंने कहा—हे राजेन्द्र! आपके दर्शनको अत्यन्त उत्सुक हम लोग भूखे-प्यासे पहाड़ों, जंगलों और नदियोंमें भटकते-भटकते यहाँतक आ गये॥ ४॥ स्थान-स्थानपर देखते-खोजते हुए हमने आपके चरणकमलोंको प्राप्त कर लिया, परंतु आपको इस अवस्थामें देखकर आपके दुःखसे हम लोग और अधिक दुखी हो गये हैं। हे नृपश्रेष्ठ! ऐसा किस कारणसे हो गया है, वह आप हमसे कहिये॥ ५१/२॥ राजा बोले—मैं तुम लोगोंसे आगे चला आया था। उस समय मैं भूख और प्याससे पीड़ित था। शीघ्र ही मैंने अपने सामने वाचकनविमुनिका आश्रमरूपी गृह देखा। वहाँ जाकर मैंने उनकी सुमुखी पत्नीको देखा॥ ६-७॥ उस सुन्दरीका नाम मुकुन्दा था। मैंने उससे जलकी याचना की। परंतु वह दुष्टा और स्वेच्छाचारिणी थी, उसने मुझसे अकल्याणकारी वचन कहे॥ ८॥ [उसने मुझसे कहा कि] तुम मेरे साथ रतिक्रीड़ा करो, अन्यथा मैं तुम्हें शाप दे दूँगी, परंतु मैंने शुद्ध- अन्तःकरणसे उसे बलपूर्वक निवारित कर दिया॥ ९॥ उसके पति जब स्नान करने चले गये थे, तभी उस दुष्टाने [अपने प्रस्तावमें असफल होकर] मुझे क्रोधित होकर शाप दे दिया। तब मैं दुखी होकर एक वृक्षके नीचे बैठ गया॥ १०॥ [उस समय] पूर्वजन्मके पुण्योंके प्रभावसे मुझे नारदमुनिके दर्शन हुए। उन्होंने मुझसे अरिष्टोंका नाश करनेवाली उत्तम विधि कही—चिन्तामणिक्षेत्रके अन्तर्गत गणेशतीर्थ स्थित है। नारदजीने विस्तारपूर्वक उसकी महिमाका वर्णन किया॥ ११-१२॥ उन दिव्यदृष्टिसम्पन्न मुनिने मुझे वहाँ स्नान करनेके लिये सम्यक् रूपसे कहा था, अतः मैं अपने दोषका निवारण करनेके लिये वहाँ स्नान करने जाऊँगा॥ १३॥ यदि इच्छा हो तो तुम लोग भी मेरे साथ स्नान करनेके लिये वहाँ चलो। वहाँ स्नानकर यथाशक्ति दान देकर और [भगवान् चिन्तामणि]-विनायकका सम्यक् प्रकारसे पूजन करके गणेशतीर्थ एवं भगवान् गणेशके प्रभावसे पवित्र होकर हम सब अपने नगरको जायँगे॥ १४१/२॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यास!] राजाका इस प्रकारका निश्चय जानकर वे सब भी उनके साथ चल दिये॥ १५॥ हे मुनीश्वर! गणेशतीर्थका दर्शनकर वे राजा रुक्मांगद पूर्वकी भाँति तपाये हुए सोनेके समान स्वर्णिम आभावाले दिव्य शरीरसे सुशोभित हो गये॥ १६॥ तब राजा रुक्मांगदने मान लिया कि नारदजीद्वारा कही गयी बात अमृतके समान [हितकारी] थी। तदनन्तर राजाने वहाँ स्नान करके परम प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दिये। [विघ्न] विनायक गणेशजीका पूजन करके उन्होंने ब्राह्मणों और सेवकोंसहित एक तेजोरशिका दर्शन किया, जो कि सूर्यसदृश प्रकाशमान विमान था। वह विनायकगणों, अप्सराओं और किन्नरोंसे युक्त था॥ १७–१९॥ राजाने उन्हें नमस्कारकर पूछा कि आप लोग कौन Kalyana Visheshank 2021_Section_5_2_Front
११० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हैं? कहाँसे आये हैं? आप किसके दूत हैं? यहाँ आनेका आपका क्या प्रयोजन है?—यह सब आप आदरपूर्वक कहिये॥ २०॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यास!] राजाद्वारा मधुर वाणीमें कही गयी बातोंको सुनकर विमानसे आये गणेशजीके दूतोंने कहा—हे नृपश्रेष्ठ! आप धन्य हो; जो आपने सर्वभावसे प्रभु चिन्तामणि [विनायक]-का ध्यान किया, सम्यक् प्रकारसे तीर्थयात्रा की, विधि-विधानपूर्वक दान दिया और चिन्तामणि गणेशजीका पूजन किया। अब आप कृतकृत्य हैं। चिन्तन की हुई कामनाओंको प्रदान करनेके कारण ही ये चिन्तामणि विनायक कहे जाते हैं॥ २१-२३॥ उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले हे नृपश्रेष्ठ! हम सब भी आपके दर्शनसे कृतकृत्य हो गये, हम आपकी भक्तिकी महिमाको नहीं जान सकते ॥ २४ ॥ आपने शरीर, वाणी और बुद्धिसे तथा जीवन समर्पित करके भी सर्वब्रह्माण्डनायक भगवान् [विघ्न] विनायक गणेशजीका आराधन किया है। हे राजन्! हम सब उन्हींके दूत हैं और उन्हींके द्वारा प्रेषित हैं। उन्होंने अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक हम सबसे कहा है कि मेरे भक्त रुक्मांगदको शीघ्र जाकर विमानसे मेरे पास ले आओ— यह सुनकर हम सब यहाँ आये हैं। हे देव! अब आप इस आकाशचारी विमानपर आरूढ़ हों और हमारे साथ [भगवान्] विनायक (गणेशजी)-के पास शीघ्रातिशीघ्र चलें॥ २५-२७१/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी!] उन दूतोंका इस प्रकारका वचन सुनकर राजा रुक्मांगदने कहा—हे दूतो! कहाँ मैं मन्दमति और कहाँ वे अखण्डित विग्रहवाले (पूर्ण ब्रह्म), प्रमेयों और तर्कोंसे परे, चैतन्य स्वरूपवाले, सर्वव्यापक, अविनाशी। जो सृजन-पालन और लयके कारणभूत और स्वयं कारणोंसे परे हैं, उन्होंने मुझे कैसे इतना आदर दिया—मैं नहीं जानता कि यह इस तीर्थमें [विहित] स्नानका फल है या कि मेरा पूर्वजन्मोंका उत्तम पुण्य फलित हुआ है, जिसके कारण मुझे आप लोगोंका दर्शन प्राप्त हुआ है और जिसके परिणामस्वरूप आगे [भी] अत्यन्त शुभकारी फल प्राप्त होगा॥ २८-३१॥ आप लोग मुझसे [अधिक] धन्य हैं, जिन्हें सर्वव्यापक [परमात्मा] गणेशजी दिन-रात प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं—ऐसा कहकर राजाने उनके कमलवत् चरणोंमें नमस्कारकर उनकी पूजा की॥ ३२॥ तदनन्तर राजा रुक्मांगदने उन दूतोंसे प्रार्थना की कि मेरे पिता नृपश्रेष्ठ भीम, जो कि ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी एवं भयंकर पराक्रमवाले हैं, उनके बिना मैं कैसे आऊँ? मेरी माता चारुहासिनीने भी देवाधिदेव भगवान् विनायककी आराधना की थी। जन्मसे ही उसने अन्य किसी देवताको अपना इष्टदेव नहीं माना था, [अतः उनको छोड़कर मैं कैसे आ सकता हूँ?] ॥ ३३-३४१/२॥ दूत बोला—यदि ऐसी बात है, तो आप उन दोनोंके उद्देश्यसे भी इस तीर्थमें स्नान कीजिये और उसका फल अपने माता-पिताको प्रदान कीजिये। तब हम लोग उन दोनोंको भी इस श्रेष्ठ विमानमें बैठाकर ले चलेंगे॥ ३५-३६॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यास!] उस दूतका इस प्रकारका वचन सुनकर राजा रुक्मांगदने [माता-पिताकी] कुशकी प्रतिकृति बनाकर 'तुम कुश हो, कुशपुत्र हो, पूर्वकालमें ब्रह्माजीने तुम्हारा निर्माण किया था; तुम्हारे स्नान कर लेनेसे उसका स्नान हो जायगा, जिसके लिये यह ग्रन्थिबन्धन किया गया है'—इस मन्त्रका सम्यक् प्रकारसे उच्चारणकर राजाने क्रमसे [माता-पितासहित] सभी ग्रामोंके सभी लोगोंके लिये चिन्तामणिक्षेत्रके अन्तर्गत स्थित गणेशतीर्थमें स्नान-विधि सम्पन्न कर दी॥ ३७-३९॥ तदनन्तर राजा रुक्मांगद दूतके कथनानुसार सेनासहित उस श्रेष्ठ विमानमें आरूढ़ होकर कौण्डिन्यपुरमें आये। उस विमानमें होनेवाली वाद्यध्वनि, वेदध्वनि, गन्धर्वों और अप्सराओंके गान एवं नृत्यकी ध्वनिसे गगनमण्डल और दशों दिशाएँ अनुनादित हो गयीं॥ ४०-४१॥ राजा रुक्मांगदने विनायक (गणेश)-तीर्थमें स्नानका पुण्यफल अपने माता-पिता और समस्त लोगोंको प्रदान Kalyana Visheshank 2021_Section_5_2_Back
उ०ख०-अ०३६ ] गृत्समदमुनिके जन्मकी कथा १११
उ०ख०-अ०३६ ] * गृत्समदमुनिके जन्मकी कथा * १११ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कर दिया ॥ ४२ ॥ कुशनिर्मित प्रतिकृतिके स्नानजन्य पुण्यफलको [अन्य लोगोंके निमित्त] देनेमात्रसे विनायक (गणेशजी)-की आज्ञासे वहाँ अन्य बहुत-से विमान आ गये ॥ ४३ ॥ उनमें-से प्रत्येक आकाशगामी विमानमें वे एक- एक करके बैठ गये। इस प्रकार [राजा] रुक्मांगद, [उनके पिता] भीम और उनकी माता चारुहासिनी तथा अन्य सभी लोग वहाँ पहुँच गये, जहाँ भगवान् विनायक थे। इस प्रकार उस नगरके बालकसे लेकर वृद्धतक तथा ब्राह्मणसे चाण्डालतक— सभी गणेशतीर्थके स्नानजनित पुण्यफलके प्रभावसे सद्गतिको प्राप्त हो गये ॥ ४४-४५ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार मैंने वह सब कुछ कह दिया, जो कुछ तुम्हारे द्वारा पूछा गया था। चिन्तामणिक्षेत्र* के अन्तर्गत स्थित गणेशतीर्थसे सम्बन्धित इस माहात्म्यको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह भी उस गतिको प्राप्त कर लेता है, जो उस तीर्थमें स्नानसे प्राप्त होती है ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कादम्बपुरवर्णन' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥ छत्तीसवाँ अध्याय गृत्समदमुनिके जन्मकी कथा व्यासजी बोले- हे कमलासन ब्रह्माजी! मैंने गणेशतीर्थके माहात्म्य, रुक्मांगद और कौण्डिन्यपुरवासियोंके चरितके विषयमें श्रवण किया, तथापि हे ब्रह्मन् ! आप मुकुन्दाके मनोहर चरितको मुझसे कहिये ॥ १ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे पुत्र ! राजा रुक्मांगदके चले जानेपर वह मुकुन्दा कामनारूपी अग्निमें उसी प्रकार जल उठी, जैसे ग्रीष्मकालमें दावाग्निसे महान् वनस्थली जल उठती है। मुकुन्दाको न शीतल वायुवाले वनमें, न लता- पुष्पमय कुंजमें, न चन्द्रमाकी चाँदनीमें और न चन्दनके आलेपनमें—कहीं शान्ति नहीं मिल रही थी। उसे हास्य, गीत, नृत्य और वस्त्राभूषणादि भी रुचिकर नहीं लग रहे थे ॥ २-४ ॥ हे मुनीश्वर ! उस कामविह्वला मुकुन्दाको अन्न और जल भी रुचिकर नहीं लगता था। भूख-प्यास और श्रमजनित थकानसे उसे क्षणभरमें नींद आ गयी ॥ ५ ॥ हे सुत ! उस एकान्त वनमें सोयी हुई मुकुन्दाको रुक्मांगदके विरहमें विह्वल जानकर देवराज इन्द्र रुक्मांगदका रूप धारणकर वहाँ आये। उन्हें देखकर मुकुन्दाको अत्यन्त हर्ष हुआ। इन्द्रने उस पुत्रार्थिनी नारीको अपने हृदयसे लगा लिया और अपने अनुग्रहसे मानो कृतकृत्य- सा करते हुए उसके साथ नानाविध शृंगारचेष्टाएँ कीं। उस पारस्परिक संयोगके फलस्वरूप मुकुन्दाने गर्भ धारण किया। तदुपरान्त मुकुन्दाको आश्वस्तकर इन्द्र अन्तर्धान हो गये और मुकुन्दा भी सलज्ज भावसे अपने आश्रमको चली आयी ॥ ६-१० ॥ मुकुन्दाने नवम मासमें, शुभ वेलामें शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्रको जन्म दिया, जो मनोहर, सर्वांगसुन्दर और रूपमें कामदेवसे भी बढ़कर था। उसके धरणीपर गिरते ही महान् शब्द हुआ, जिससे दसों दिशाएँ, आकाश, पृथ्वी और रसातल भी अनुनादित हो गये ॥ ११-१२ ॥ पक्षिगण उड़-उड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करने लगे। वाचक्नवि भी अपना नित्यकर्म छोड़कर वहाँ चले आये। मुकुन्दाके चरितका ज्ञान उन्हें कभी नहीं हो पाया। उन्होंने अत्यन्त हर्षपूर्वक [शिशुके] जातकर्मादि संस्कार किये ॥ १३-१४ ॥ उन्होंने [इस अवसरपर] ब्राह्मणोंको यथाशक्ति और यथायोग्य दान दिया। दस दिन बीत जानेपर उन मुनिने [शिशुका] नामकरण-संस्कार किया ॥ १५ ॥
- चिन्तामणिक्षेत्र महाराष्ट्र प्रान्तके कदम्बपुर, जिला- यवतमालमें स्थित है। मन्दिरके सामने ही 'चौमुखी गजानन' की मूर्ति है। इसकी विशेषता यह है कि एक ही पत्थरमें चारों ओर चार गणेश मूर्तियाँ खुदी हुई हैं। सामनेके गर्भगृहमें मुख्य चिन्तामणि-गणेशकी मूर्ति है। 'कलम्ब' नामसे इक्कीस गणपतिक्षेत्रमें इसकी गणना है।
११२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- ज्योतिषशास्त्रमें पारंगत द्विजोंसे अनुज्ञा लेकर उन्होंने [उस शिशुका] गृत्समद - यह नाम रखा। तदनन्तर पाँचवें वर्षमें उसका व्रतबन्ध-संस्कार किया ॥ १६ ॥ उन्होंने उस बटुकके चार वेदव्रत संस्कार सम्पन्न किये। तेजसे सम्पन्न होनेके कारण वह एक बार बोलनेपर ही वेदमन्त्रोंको ग्रहण कर लेता था ॥ १७ ॥ इस प्रकार वह वेदशास्त्रका निधान और अपने कर्ममें भी कुशल हो गया। किसी समय शुभ मुहूर्तमें उसके पिता वाचक्नवीने उसे ऋग्वेदके महान् मन्त्र 'गणानां त्वा० २' का उपदेश दिया और कहा कि यह वैदिक महामन्त्र सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला है ॥ १८-१९ ॥ यह आगमोंमें कहे गये सम्पूर्ण मन्त्रोंमें श्रेष्ठ है। भगवान् गजानन गणेशजीका ध्यान करके तुम स्थिर चित्तसे इस मन्त्रका जप करो ॥ २० ॥ इससे तुम परम सिद्धिको प्राप्त कर लोगे और तुम्हारा यश संसारमें फैल जायगा। तब विप्र गृत्समद पिताके मुखसे मन्त्र प्राप्तकर अनुष्ठानपरायण होकर जप और ध्यानमें लग गये। इस प्रकार उन मुनिश्रेष्ठका बहुत समय व्यतीत हो गया ॥ २१-२२ ॥ उस समय मगध देशमें जो राजा थे, उनका भी नाम मगध ही था। वे सुन्दर रूपवाले, महान् स्वाभिमानी, दानवीर, शत्रुनाशक, अनेक प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित, महामूल्यवान् आसनपर स्थित, न्यायी, धैर्यवान्, दूसरे इन्द्रके समान, चतुरंगिणी सेनासे समन्वित, ज्ञानी और विद्वानोंका सम्मान करनेवाले थे। उनके दो मन्त्री थे, जो ज्ञाननिधान और गुणोंमें बृहस्पतिसे भी बढ़कर थे ॥ २३-२५ ॥ उन (राजा मगध)- की पत्नीका नाम अम्बिका था, जो मनोहर रूपवाली अत्यन्त गुणवती, पतिव्रता, महान् सौभाग्यशालिनी और शाप देने तथा अनुग्रह करनेमें सक्षम थी ॥ २६ ॥ [एक बार] उन राजाके यहाँ पितृश्राद्धमें राजाद्वारा आमन्त्रित वेदोंमें पारंगत वसिष्ठ, अत्रि आदि बहुत-से महर्षि आये थे ॥ २७ ॥ तपस्वी और पवित्र अन्तःकरणवाले गृत्समदको भी वहाँ बुलाया गया था। वहाँ किसी शास्त्रसम्बन्धी प्रसंगमें गृत्समदने गर्वपूर्ण बात कही ॥ २८ ॥ तब उन मुनियोंके बीचमें ही अत्रिजी इस प्रकार कहने लगे कि 'तुम्हें धिक्कार है ! धिक्कार है ! तुम इस बातपर विचार करो, चूँकि तुम तपस्वी हो, इसीलिये मान्य हो। तुम मुनि नहीं हो; क्योंकि तुम्हारा जन्म राजकुमार रुक्मांगदसे हुआ है। तुम हम सबके समक्ष पूजा पानेके योग्य नहीं हो, अतः अपने आश्रमको चले जाओ' ॥ २९-३० ॥ अत्रिके इस प्रकारके वचन सुनकर वे गृत्समद क्रोधसे अग्निके समान प्रदीप्त हो उठे। [उस समय] ऐसा लगता था, मानो वे त्रिलोकीको भस्म कर डालेंगे और उन मुनियोंको खा जायँगे ॥ ३१ ॥ उनको देखकर अन्य बहुत-से मुनि तो इस प्रकार पलायन कर गये, जैसे सिंहको देखकर हरिण भाग जाते हैं। उन्होंने वहाँ सभामें बैठे हुए वसिष्ठ आदि मुनियोंसे कहा- ॥ ३२ ॥ गृत्समद बोले- हे मुनीश्वरो ! यदि मैं रुक्मांगदका पुत्र न सिद्ध हुआ तो मैं अपनी शापाग्निसे तुम सबको भस्मावशेष कर दूँगा ॥ ३३ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यास !] उन सभी मुनियोंसे इस प्रकार कहकर वे अपनी माँके पास पहुँचे। गृत्समदने उससे पूछा- अरी दुष्टे! अत्यन्त कामाचारिणी मुकुन्दा! बता, मेरा पिता कौन है? अन्यथा तू भस्म हो जायगी। तब उनके इस प्रकारके वचन सुनकर मुकुन्दा अत्यन्त व्याकुल होकर उसी प्रकार काँपने लगी, जैसे आँधीके वेगसे पुष्पयुक्त कदलीवृक्ष ! वह असती हाथ जोड़कर अत्यन्त दीन वाणीमें बोली- ॥ ३४-३६ ॥ मुकुन्दा बोली- आखेटमें आसक्त चित्तवाले नृपश्रेष्ठ रुक्मांगद अपने साथवालोंसे बिछुड़कर यहाँ आ गये थे। १-चार वेदव्रत हैं- १. महानाम्नी व्रत, २. महाव्रत, ३. उपनिषद् व्रत तथा ४. गोदान। प्रथमं स्यान्महानाम्नी द्वितीयं स्यान्महाव्रतम् । तृतीयं स्यादुपनिषद् गोदानाख्यं ततः परम् ॥ (संस्कारमयूखमें आश्वलायनका वचन) २- गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् । ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥ (ऋक्० २।२३।१)
उ०ख०-अ०३७ ] * गृत्समदमुनिकी गणेशाराधना और वरप्राप्ति * ११३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
१९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
उनकी मुखमुद्रा प्रसन्न और क्रीडामयी थी, उनके मस्तकपर चन्द्रमा शोभा दे रहा था, उन्होंने कमल- पुष्पोंकी विशाल माला धारण कर रखी थी, कमल- नालसे समन्वित उनकी सूँड़ थी और उन जगत्के कारणरूप [भगवान् गणेश]-को उनके प्रेमी भक्तजन नमस्कार कर रहे थे ॥ ११ ॥ वे सिंहपर सवार थे, उनके दस भुजाएँ थीं तथा उन्होंने सर्पका यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। उनका श्रीविग्रह कुंकुम, अगुरु, कस्तूरी और सुन्दर [सुगन्धित] चन्दनसे आलेपित था ॥ १२ ॥ हे मुने! करोड़ों सूर्योंसे अधिक प्रकाशमान वे श्रीमान् सिद्धि और बुद्धिके साथ थे। यद्यपि उनका स्वरूप वाणीसे परे है, तथापि वे लीला करनेके लिये [उन गृत्समदमुनिके समक्ष] साकार रूपमें प्रकट हुए ॥ १३ ॥ उनके तेजसे उन महात्मा मुनिका तेज वैसे ही मन्द हो गया, जैसे सूर्यके तेजसे नक्षत्रों और चन्द्रमाका तेज मन्द पड़ जाता है ॥ १४ ॥ [उन्हें देखकर] गृत्समदने अपनी आँखें मूँद लीं और वे अत्यन्त भयाकुल होकर काँपने लगे। वे मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़े और उन्हें ध्यानादि मांगलिक कार्योंका विस्मरण हो गया ॥ १५ ॥ पुनः चेतन होनेपर वे मुनि अनामय गजानन गणेशजीका ध्यान करके मन-ही-मन यह सोचकर व्याकुल हो गये कि इस विघ्नका कारण क्या है? मेरे समक्ष क्षोभ उत्पन्न करनेवाला सहसा यह क्या उपस्थित हो गया है ? आजतक मैंने जो तप किया था, वह कैसे व्यर्थ चला गया ? ॥ १६-१७ ॥ [तदनन्तर वे मन-ही-मन गणेशजीका ध्यानकर कहने लगे—] हे देवेश! हे सर्वात्मन्! इस भयानक विघ्नसे मेरी रक्षा करो। आप जगदीश्वरको छोड़कर मैं अन्य किसकी शरणमें जाऊँ ? ॥ १८ ॥ हे देव! मुझे सदैव महान् दुःख प्राप्त होता रहा है। 'तुम हमारी पंक्तिमें बैठकर पूजा पानेयोग्य नहीं हो'— अत्रिकी यह बात मेरे मनको सदैव जलाया करती है ॥ १९ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] गृत्समदके इस प्रकारके वचन सुनकर उन विघ्नविनायक गणेशजीने कहा— ॥ १९१/२ ॥ गणेशजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ ! तुमपर अनुग्रह करनेके लिये उपस्थित हुए मुझे गणोंका स्वामी गणेश जानो। चिरकालतक नियममें स्थित रहनेवाले सनकादि [मुनियों]-के लिये भी मैं अप्राप्य हूँ। भयका त्याग करके तुम्हारी जो मनोकामना हो, वह मुझसे कहो। एक अँगुठेपर खड़े रहकर तुम्हारे द्वारा की गयी निरन्तर तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ ॥ २०–२११/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं—देवाधिदेव गणेशजीके ऐसे सुन्दर वचन सुनकर मुनि गृत्समदने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। उनका हृदय आनन्दसे भर गया, आँखोंसे आँसू बहाते हुए वे हर्षपूर्वक नृत्य करने लगे और उन वरदाता विनायकसे परम प्रेमपूर्वक बोले— ॥ २२–२३१/२ ॥ गृत्समद बोले—आज मेरा जन्म, तप और नियम सब सफल हो गये, जो मुझे चिदानन्दघन, अखण्ड आनन्दरूप, वेद-शास्त्रोंसे भी अगोचर, निराकार ब्रह्मका साक्षात् दर्शन हो गया। हे विभो ! अब मैं किस वस्तुके लिये प्रार्थना करूँ ? फिर भी आपने आज्ञा दी है तो हे गजानन ! मैं आपसे एक प्रार्थना करता हूँ—हे महाभाग ! चौरासी लाख योनियोंमें मनुष्ययोनि श्रेष्ठ कही गयी है। मनुष्योंमें वर्ण-धर्मका पालन करनेवाले श्रेष्ठतर कहे गये हैं। उनमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। उन ब्राह्मणोंमें भी ज्ञानी श्रेष्ठ हैं। उन ज्ञानियोंमें भी अनुष्ठानपरायण और उनमें भी ब्रह्मवेत्ता श्रेष्ठ हैं। इसलिये हे जगदीश्वर ! आप मुझे ब्रह्मज्ञान (वेदज्ञान) और अनुष्ठानसम्बन्धी ज्ञान प्रदान करें। साथ ही अपनी सतत स्मृति और अपनी सुदृढ़ भक्ति प्रदान करें ॥ २४–२९ ॥ हे गजानन ! आपके सभी भक्तोंमें मुझे श्रेष्ठता प्राप्त हो। हे कल्याणकर ! मैं एक अन्य वरकी भी याचना करता हूँ, उसे मुझे प्रदान करें ॥ ३० ॥ मैं आपकी भक्तिका एकमात्र निवास बन जाऊँ, मुझमें त्रैलोक्यको आकर्षित करनेकी क्षमता हो, मैं तीनों लोकोंमें विख्यात और देवताओं एवं मनुष्योंसे नमस्कृत हो जाऊँ। हे विघ्नराज ! हे अखिलार्थकृत् ! हे सुरेश्वर ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो यह पुष्पक वन [आपके] नामसे प्रख्यात हो जाय ॥ ३१-३२ ॥
उ०ख०-अ०३८ ] * गृत्समदकी छींकसे एक बालकका जन्म * १९५
आप यहाँ स्थित होकर भक्तोंकी कामनाओंको | अजेय होगा ॥ ४०-४१॥ नित्य पूरा करें। हे गजानन! यह पुष्पकपुर सभी | वह मेरा भक्त होगा, उसके प्राण मुझमें स्थित होंगे, दिशाओंमें विशेष रूपसे 'गणेशपुर'—इस नामसे प्रसिद्ध | उसकी मुझमें निष्ठा होगी और वह मेरे ही परायण हो जाय ॥ ३३१/२ ॥ | होगा। हे विप्र ! यह नगर सत्ययुगमें 'पुष्पकपुर' नामसे, ब्रह्माजी कहते हैं—मुनि गृत्समदकी इस बातको | त्रेतायुगमें 'मणिपुर' नामसे, द्वापरयुगमें 'भानकपुर' नामसे सुनकर गजानन गणेशजीने कहा - ॥ ३४ ॥ | और कलियुगमें 'भद्रकपुर' नामसे संसारमें विख्यात गणेशजी बोले- हे महाबाहो ! तुम्हें साधुवाद | होगा। यहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य सभी है। हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे प्रसन्न होनेपर भक्तोंको तीनों | कामनाओंको प्राप्त करेगा ॥ ४२-४३१/२ ॥ लोकोंमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ३५ ॥ | ब्रह्माजी कहते हैं— [हे व्यासजी !] गृत्समदको हे विप्र ! तुम्हारे द्वारा जो भी प्रार्थना की गयी है, | इस प्रकारसे वर देकर सर्वव्यापक गणेशजी वहीं वह सब कुछ पूरी होगी। विप्रत्व दुर्लभतर है, प्रसन्न | अन्तर्धान हो गये। उनके अन्तर्हित हो जानेपर मुनिने वहाँ होकर यह मैंने तुम्हें प्रदान कर दिया ॥ ३६ ॥ | गणेशजीकी मूर्तिकी स्थापना की तथा उनका सुन्दर हे मुने ! क्योंकि तुमने 'गणानां त्वा०' इस वैदिक | मन्दिर बनवाया ॥ ४४-४५ ॥ मन्त्रका जप किया है, अतः तुम्हीं इसके ऋषि होगे ॥ ३७॥ | उन्होंने उस मूर्तिकी 'वरदविनायक' इस नामसे तुम ब्रह्मादि त्रिदेवों और [इन्द्रादि] देवताओं तथा | स्थापना की। गणेशजीकी कृपासे वहाँ सिद्धियोंका वसिष्ठादि मुनियोंमें भी परम श्रेष्ठताको प्राप्त करके | शाश्वत अवस्थान हुआ ॥ ४६ ॥ सर्वत्र ख्याति प्राप्त करोगे। जो लोग सभी कार्योंके | यहाँ सभीकी कामनाएँ पुष्ट होती हैं, इसलिये इस आरम्भमें पहले तुम्हारा और उसके बाद मेरा स्मरण | क्षेत्रको पुष्पकक्षेत्र कहा जाता है। मुनि गृत्समदने उस करेंगे, उनको कार्योंमें सिद्धि प्राप्त होगी ॥ ३८-३९ ॥ | मूर्तिका भक्तिभावपूर्वक पूजन किया ॥ ४७ ॥ [मन्त्रके] देवता, ऋषि और छन्दके ज्ञानके बिना | हे मुनीन्द्र ! श्रीविघ्नराज गणेशजीद्वारा वरदान प्रदान किये गये [जपादि] कर्म निष्फल होते हैं। तुम्हारा पुत्र | करनेका वर्णन करनेवाली इस कथाका जो श्रवण करता बलवान् और सभी देवताओंके लिये अत्यन्त भयंकर | है, वह समस्त कामनाओंकी प्राप्ति करता है और उसे होगा। वह तीनों लोकोंमें महान् ख्याति अर्जित करेगा। | संसार-सागरसे पार करनेवाली दृढ़ गणेशभक्तिकी प्राप्ति भगवान् रुद्रके अतिरिक्त वह सम्पूर्ण देवताओंके लिये | होती है ॥ ४८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'वरदाख्यान' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥
अड़तीसवाँ अध्याय गृत्समदकी छींकसे एक बालकका जन्म, उसके द्वारा गणेशाराधन, गणेशजीका प्रसन्न होकर त्रैलोक्य-विजयका वरदान और तीन पुर प्रदान करना
व्यासजी बोले- हे सुरेश्वर ! हे कमलजन्मा | भी श्रेष्ठ गृत्समदको आदरपूर्वक सम्मानित किया और ब्रह्माजी ! उसके बाद गृत्समदने क्या किया-वह सब | उन्हें नमस्कार किया ॥ २ ॥ मुझ श्रद्धालुको प्रयत्नपूर्वक बतलाइये ॥ १ ॥ | गणेशजीके वरदानके प्रभावसे [उन मुनियोंने] यज्ञ- ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! तदनन्तर (गणेशजीसे | कर्ममें उनका वरण किया तथा समस्त अनुष्ठानात्मक कर्मोंके वरदान प्राप्त करनेपर) सभी मुनिगणोंने श्रेष्ठ मुनियोंमें | प्रारम्भमें गणेश-पूजनसे पहले उनका स्मरण किया ॥ ३ ॥
१९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- इस प्रकार वे मुनि गृत्समद विख्यात हो गये। वे गणनायक गणेशजीके मन्त्रका सुस्थिर मनसे जप करते हुए उनमें परम भक्ति करने लगे ॥ ४ ॥ हे व्यासजी ! किसी समय उन मुनिने बहुत जोरसे छींका, जिससे सभी दिशाएँ, पृथ्वी और गिरि-कन्दराएँ अनुनादित हो उठीं ॥ ५ ॥ जब उन मुनिने अपने सामने देखा तो उन्हें एक भयंकर बालक दिखायी दिया, जो महान् नाद कर रहा था; उसका वर्ण जपाकुसुमके सदृश रक्तवर्णका था ॥ ६ ॥ वह बालक तेजका पुंजीभूत स्वरूप था और दृष्टिपथको चुराये-सा ले रहा था। वे मुनि उस बालकको देखकर भयसे विह्वल होकर काँपने लगे ॥ ७ ॥ वे मन-ही-मन तर्क-वितर्क करने लगे कि यह कौन-सा विघ्न आ गया? न जाने गणोंके स्वामी गणेशजीने मुझे यह अद्भुत पुत्र तो नहीं दे दिया ॥ ८ ॥ जब उन्होंने पुनः देखा तो वह बालक उन्हें सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रोंवाला दिखायी दिया। उसने सुवर्ण- निर्मित सुन्दर बाजूबन्द, सुन्दर मुकुट और सुन्दर नूपुर धारण कर रखे थे। उस पुत्रका कटिप्रदेश सुन्दर करधनीसे सुशोभित हो रहा था। तब मुनिने उससे पूछा कि तुम कौन हो? किसके पुत्र हो और क्या करना चाहते हो? हे तेजके निधान बालक ! बताओ, तुम्हारे माता-पिता कौन हैं और तुम्हारा निवास-स्थान कहाँ है?॥ ९-१०१/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यास !] उन मुनिके इस प्रकारके वचन सुनकर बालकने कहा- ॥ ११ ॥ बालक बोला- आप भूत, भविष्य और वर्तमानका ज्ञान रखनेवाले होकर भी मुझसे क्यों पूछ रहे हैं? फिर भी मैं आपके आज्ञानुसार बताता हूँ कि आपकी छींकसे मेरा जन्म हुआ है॥ १२ ॥ हे मुने ! आप ही मेरे पिता और माता हैं, मेरे ऊपर कृपा करें। हे पिता ! आप मेरा कुछ दिनतक पालन करें। तब मैं त्रैलोक्यपर आक्रमण करनेमें सक्षम हो जाऊँगा और देवराज इन्द्रको भी अपना वशवर्ती कर लूँगा। मेरी बातपर सन्देह न करें, मेरे पौरुषको आप देख लीजियेगा ॥ १३-१४ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यास !] उस बालकका इस प्रकारका वचन सुनकर भय और हर्षसे युक्त मुनि गृत्समदने स्नेह-सिक्त वाणीमें कहा- ॥ १५ ॥ यदि यह जन्म लेते ही त्रैलोक्यका अतिक्रमण करनेमें सक्षम है तो मैं अपने इस पुत्रको अपना मन्त्र [जिसका मैं जप करता हूँ] प्रदान करूँगा, जिससे जगत्के स्वामी विनायकदेव प्रसन्न होकर इसकी मनोकामनाको पूर्ण करेंगे और मेरी भी कीर्तिका विस्तार होगा ॥ १६-१७ ॥ मन-ही-मन ऐसा विचार करके उन्होंने अपने मन्त्र 'गणानां त्वा०' का उसे उपदेश दिया और कहा कि इसका आदरपूर्वक अनुष्ठान करो ॥ १८ ॥ मनको गजानन गणेशजीमें स्थापित करके इस वैदिक मन्त्रका जप करो। हे पुत्र ! जब वे सन्तुष्ट हो जायँगें, तो तुम्हें सभी कामनाओंको प्रदान करेंगे ॥ १९ ॥ इस प्रकार उस महामन्त्रको प्राप्तकर वह तपस्या करनेके लिये वनको चला गया और वहाँ इन्द्रियोंपर विजय प्राप्तकर निराहार रहते हुए एक अँगूठेपर खड़े होकर स्थिर मनसे भगवान् गजाननका ध्यान करते हुए पन्द्रह हजार वर्षोंतक उस मन्त्रका जप करता रहा। इससे उसके मुखसे दिशाओंको जलानेवाली अग्नि निकलने लगी। उससे देवताओं और पातालमें रहनेवाले दैत्योंको भय हो गया ॥ २०-२२ ॥ तदनन्तर उसके उस तपसे प्रसन्न होकर गजानन गणेशजी दिशाओंको अन्धकाररहित और सूर्यमण्डलको आच्छादित-सा करते हुए आविर्भूत हो गये ॥ २३ ॥ वे अपनी सुन्दर सूँड़को घुमा रहे थे। सुन्दर दाँतसे युक्त उनके मुखकी मुद्रा प्रसन्नतापूर्ण थी। उनके चिंघाड़की ध्वनि सुनकर विह्वल-से होते हुए उस बालकने नेत्र खोले तो अपने समक्ष भगवान् गणेशको देखा, जो चार भुजाओंसे युक्त, विशाल शरीरवाले और अनेक आभूषणोंसे विभूषित थे ॥ २४-२५ ॥
उ०ख०-अ०३८ ] * गृत्समदकी छींकसे एक बालकका जन्म * ११७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उनके हाथ परशु, कमल, माला और मोदकसे | और ईश (शिव) भी नहीं जानते हैं। यदि आप मुझे सुशोभित हो रहे थे। तब उस बालकने उनके तेजसे | वरदान देना चाहते हैं, तो मुझे तीनों लोकोंका अतिक्रमण पराभूत होकर धैर्य धारण करके उन प्रभुको हाथ जोड़कर | कर सकनेकी विशेष शक्ति प्रदान करें। हे विभो ! देवता, नमस्कार किया और उनकी प्रार्थना की ॥ २६१/२॥ | दानव, गन्धर्व, मनुष्य, सर्प, राक्षस, मुनि, किन्नर और चारण बालकने कहा—हे देव ! मुझ शरणागत भक्तको | सदा मेरे वशवर्ती हों। जिन-जिन कामनाओंका मैं मानसिक क्यो धर्षित कर रहे हैं? हे देव! आप सौम्य स्वरूप | चिन्तन करूँ, वे सब सदा सिद्ध हों ॥ ३६-३८ ॥ धारण करें और मेरी सम्पूर्ण मनोकामनाओंको प्रदान | इन्द्रादि लोकपाल सदा मेरी सेवा करें। [आप] करें ॥ २७१/२॥ | इहलोकमें अनेक प्रकारके भोग और अन्तमें मुझे मोक्ष ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] उसके इस | प्रदान करें ॥ ३९ ॥ प्रकारके वचनको सुनकर उन्होंने अपने तेजको समेट | आपसे एक अन्य वरकी भी मैं याचना करता हूँ, लिया और परम प्रसन्नतापूर्वक बोले—हे बालक ! | इस पुरमें, जहाँ मैंने उग्र तपस्या की थी, वह आपकी सावधान हो जाओ। जिसका तुम दिन-रात ध्यान करते | आज्ञासे 'गणेशपुर' इस नामसे विख्यात हो जाय और हो, वही मैं इस समय तुम्हें वर देनेके लिये आया | लोगोंको मनोवांछित फल देनेवाला हो ॥ ४०१/२॥ हूँ॥ २८-२९ ॥ | गणेशजी बोले—तुम तीनों लोकोंका अतिक्रमण मेरे इस स्वयंप्रकाशरूप जगन्मय परम रूपको | करोगे। तुम्हें सबसे अभय होगा। सभी तुम्हारे सदा ब्रह्मा, रुद्र आदि भी नहीं जानते तो मनुष्य इसे कैसे जान | वशवर्ती होंगे। मैं तुम्हें लोहे, सोने और चाँदीके तीन पुर सकते हैं ॥ ३०॥ | देता हूँ ॥ ४१-४२ ॥ देवता, मुनि, राजर्षि, असुर, सिद्ध, गन्धर्व, नाग | ये तीनों पुर तुम्हारी इच्छाके अनुसार गति करनेवाले और दानव भी मेरे इस स्वरूपको नहीं जान पाते ॥ ३१ ॥ | और भगवान् शंकरके अतिरिक्त सभी देवताओंके लिये वही मैं तुम्हारे तपरूपी बन्धनमें बँधकर यहाँ वर | अभेद्य होंगे। संसारमें 'त्रिपुर' नामसे तुम्हारी प्रसिद्धि देनेके लिये आया हूँ। तुम्हारे मनमें जो-जो अभिलाषा | होगी ॥ ४३ ॥ हो, वे वर मुझसे माँग लो ॥ ३२ ॥ | जब भगवान् शिव एक ही बाणसे तुम्हारे तीनों तब उस बालकने कहा—आपके दर्शनसे मैं धन्य | पुरोंको भेद देंगे, तभी तुम्हें मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी— हो गया हूँ, मुझसे अधिक मेरे पिता धन्य हैं; मेरा जन्म | इस विषयमें किसी प्रकारका विचार करनेकी आवश्यकता लेना और तप करना सार्थक हो गया है ॥ ३३ ॥ | नहीं है। मेरी कृपासे तुम्हें अन्य सभी वांछित प्राप्त हे सुरेश्वर ! बालभाव होनेके कारण मैं स्तुति करना | होंगे ॥ ४४ ॥ नहीं जानता हूँ, जबकि आप सम्पूर्ण जगत्के कर्ता, | ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] इस प्रकार पालक और संहारक हैं ॥ ३४॥ | उसको वरदान देकर वे सर्वव्यापक देव गणेश वहीं आपके ही प्रकाशसे सूर्य, अग्नि और चन्द्रमा | अन्तर्धान हो गये। उनके वियोगसे त्रिपुरासुर विषाद- प्रकाशित होते हैं। हे महामते ! आप अपनी महिमासे | ग्रस्त हो गया। साथ ही उसे मनोवांछित वरोंकी प्राप्तिसे स्थावर-जंगमरूप जगत्को चैतन्य प्रदान करते हैं ॥ ३५ ॥ | अत्यन्त हर्ष भी हुआ। तब वह बलपूर्वक त्रैलोक्य- हे गजानन ! आपकी महान् महिमाको ब्रह्मा, विष्णु | विजयमें संलग्न हो गया ॥ ४५-४६॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'वरप्रदान' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥
उनतालीसवाँ अध्याय
Here is the complete transcription of the text from the image, preserving the original Hindi and Sanskrit terms, layout, and line structure:
१९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उनतालीसवाँ अध्याय त्रिपुरासुरका इन्द्रपर आक्रमणकर अमरावतीपुरीपर अधिकार कर लेना व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन्! गणेशजीसे वरदान प्राप्त करनेके बाद वरप्राप्तिके अहंकारसे भरे त्रिपुरासुरने क्या किया? उसे आप बिना कुछ शेष रखे बताइये, उस विषयमें मुझे कौतूहल हो रहा है ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास!] तदनन्तर उस त्रिपुरासुरने काश्मीर देशमें उत्पन्न होनेवाले पत्थरसे एक गजानन गणेशजीकी मूर्तिक निर्माण कराया और मन्त्रविद् ब्राह्मणोंद्वारा उसकी विधिवत् स्थापना करायी ॥ २ ॥ उसने गणेशपुरके मध्यमें एक महान् और सुन्दर मन्दिरका निर्माण करवाया, जो स्वर्णनिर्मित और दिव्य मणि-मुक्ताओंसे विभूषित था ॥ ३ ॥ उसने षोडशोपचारोंसे उन प्रभुका पूजन किया और असंख्य बार नमस्कार, स्तुतियाँ और क्षमा-प्रार्थना करके उन देवाधिदेवकी आज्ञा लेकर वहाँसे बाहर आया और ब्राह्मणोंको यथायोग्य अनेक दान दिये ॥ ४-५ ॥ तबसे बंगालमें स्थित त्रिपुरका वह स्थान गणेशपुर नामसे विख्यात और सबको सब प्रकारकी सिद्धियाँ देनेवाला हो गया। तदनन्तर वह त्रिपुर दैत्य गणेशजीके वरदानसे मदोन्मत्त होकर मनुष्योंका पालन और देवताओंका अतिक्रमण करनेमें संलग्न हो गया ॥ ६-७ ॥ उसके पास दसों दिशाओंसे बलवान्से बलवान् पैदल, अश्वारोही, गजारोही और रथारोही सैनिक सेवाके लिये आ गये। जो राजा उसके अनुकूल थे, वे सेवक हो गये और जो असमर्थ होते हुए भी उसके प्रतिकूल थे, वे मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ ८-९ ॥ इस प्रकार भूमण्डलका अतिक्रमणकर उसने अमरावतीके लिये प्रस्थान किया। तब युद्ध-विद्यामें निष्णात अनेक देवगणोंसे घिरे हुए इन्द्रने भी कवचबद्ध हो तथा ऐरावतपर समारूढ़ हो युद्धके लिये प्रस्थान किया। उधर उस महाबली दैत्य त्रिपुरासुरने भी अपनी चतुरंगिणी- सेनाको तीन भागोंमें विभाजित किया ॥ १०-११ ॥ उसने महान् दैत्य भीमकायको एक भागका और वज्रदंष्ट्र नामक दानवको दूसरे भागका अधिपति बनाया। तदनन्तर उसने धनुर्युद्ध, गदायुद्ध, शस्त्रयुद्ध, अस्त्रयुद्ध और मल्लयुद्धमें निपुण दैत्यश्रेष्ठ भीमकायसे कहा- 'तुम मनुष्यलोकके अधिपति बनो' ॥ १२-१३ ॥ [इसके बाद] महाबली त्रिपुरासुरने वज्रदंष्ट्रसे कहा- 'तुम इस एक तिहाई सेनाको लेकर रसातलको जाओ और मेरी आज्ञासे शेषनाग आदि सभी प्रमुख नागोंको वशमें करो। मैं एक तिहाई सेना लेकर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंपर आक्रमण करूँगा' ॥ १४-१५ ॥ [तत्पश्चात्] भीमकाय और वज्रदंष्ट्रने आज्ञानुसार प्रस्थान किया और स्वयं त्रिपुरासुर चतुरंगिणी सेनासहित नन्दनवनमें जा पहुँचा ॥ १६ ॥ वहाँ उन योद्धाओंने [देव] सैनिकोंके रोकनेपर भी दिव्य वृक्षोंको तोड़ डाला। वहाँ स्थित होकर उस दैत्यराज त्रिपुरासुरने अपने दूतोंको यह कहकर भेजा कि तुम लोग इन्द्रको शीघ्र मेरे सामने ले आओ, मैं उसे देखना चाहता हूँ, अथवा उससे मेरा आदेश कहो कि तुम अभी मृत्युलोक (पृथ्वी)-को चले जाओ, वहाँ मैं तुम्हारा पालन करता रहूँगा, तुम शान्तिपूर्वक अमरावती मुझे दे दो और यदि तुम्हारी बुद्धिमें युद्ध करनेकी बात आ रही हो, तो शीघ्र ही मेरे पास आ जाओ ॥ १७-१९ ॥ उन दूतोंने इन्द्रके पास जाकर त्रिपुरासुरकी सारी चेष्टाओंका वर्णन किया। उनके वचनोंको सुनकर इन्द्रकी स्थिति वज्रसे आहत पर्वत-जैसी हो गयी ॥ २० ॥ जैसे वायुके वेगसे वृक्ष काँपने लगता है, वैसे ही पर्वतशत्रु इन्द्र काँपने लगे। 'यह क्या हो गया'-ऐसा विचार करते हुए वे चिन्तासे व्याकुल हो गये ॥ २१ ॥ वे क्रोधाग्निसे प्रज्वलित-से हो उठे थे, उनकी आँखें लाल हो गयीं। ऐसा लगता था कि वे सम्पूर्ण लोकोंको भस्म कर देंगे और समुद्रोंको सुखा डालेंगे ॥ २२ ॥ उन्होंने दूतोंसे कहा-'जाओ और युद्धके लिये शीघ्र आओ।' उनके उस वचनको सुनकर वे सब दूत जैसे आये थे, वैसे ही वापस लौट गये ॥ २३ ॥ [उस समय] देवताओंके शत्रुओंका हनन करनेवाले
उ०ख०-अ० ३९] * त्रिपुरासुरका इन्द्रपर आक्रमणकर अमरावतीपुरीपर अधिकार कर लेना * ११९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 साक्षात् इन्द्रने ऐरावतपर आरूढ़ होकर गर्जना की, उनके | करनेवाले योद्धा तथा बहुत-से पैदल सैनिक [उस [उस] महान् नादसे त्रिभुवन क्षुब्ध हो उठा ॥ २४ ॥ | युद्धभूमिमें] बिना शय्याके ही सो गये थे; उनमेंसे कुछके [अन्य] देवताओंने भी हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र धारण | पैर कट गये थे तथा दूसरे बहुत-से दैत्य उसी प्रकार दसों कर लिये और वे [युद्धके लिये] सुसज्जित हो गये। कुछ | दिशाओंमें पलायन कर गये, जैसे अचानक सिंहको [देवताओं]-ने हाथमें भिन्दिपाल, तो कुछने हाथमें शक्ति | देखकर जीवित रहनेकी इच्छा करनेवाले मृग भाग जाते और ऋष्टि [नामक शस्त्र] धारण कर रखे थे ॥ २५ ॥ | हैं ॥ ३४-३५ ॥ कुछने हाथोंमें मुद्गर और तलवार धारण कर रखी | तब देवशत्रु त्रिपुरासुरने उस भागती हुई अपनी थी तो अन्य [देवताओं]-ने धनुष-बाण धारण कर रखे | सेनाको रोका और स्वयं वह क्रोधाग्निकी महान् ज्वालामें थे। कुछके हाथोंमें गदा और खेट थे, तो कुछ दण्डपाणि | जलता हुआ तथा दूसरे मेघकी भाँति गर्जन करता हुआ अर्थात् हाथमें दण्ड लिये हुए थे ॥ २६ ॥ | इन्द्रके समीप आया। उस समय वह पृथ्वी और [तदनन्तर] ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्त्यन कराकर वज्रधारी | आकाशका भक्षण करता हुआ-सा प्रतीत हो रहा था। इन्द्र इस प्रकार देवताओंके साथ [अमरावतीपुरीसे] | उसने अपने खड्गसे वज्रधर इन्द्रके हाथपर तीव्र प्रहार बाहर आये। उस समय अनेक प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि | किया ॥ ३६-३७॥ हो रही थी ॥ २७ ॥ | [उस प्रहारसे] इन्द्रके हाथसे वज्र गिर पड़ा—यह त्रिपुरासुरने भी दूतकी बातसे उनके युद्ध-उद्यमको | एक अद्भुत घटना घटित हुई! वज्रको लेकर उस दैत्यने जानकर अपनी शक्तिशाली और हर्षसे भरी हुई चतुरंगिणी | उसीसे ऐरावत हाथीपर प्रहार किया ॥ ३८ ॥ सेनाको युद्धके लिये सुसज्जित किया। [तत्पश्चात्] | उस प्रहारसे [व्यथित होकर] ऐरावत पलायन कर अश्वारूढ़ होकर उसने असंख्य सैनिकोंवाली सेनाके | गया। तदनन्तर इन्द्रने घूँसेसे उस दैत्यश्रेष्ठ [त्रिपुरासुर]- साथ [युद्धके लिये] प्रस्थान किया। इस प्रकार वीर | पर प्रहार किया ॥ ३९ ॥ योद्धाओंसे सुसज्जित दोनों सेनाओंने एक-दूसरेको | उससे वह क्षणभरके लिये भूमिपर गिर पड़ा, देखा ॥ २८-२९ ॥ | तत्पश्चात् पुनः वेगपूर्वक उठकर उसने मुक्केसे प्रहारकर [उस समय] हाथियोंके चिंघाड़ने, घोड़ोंके हिनहिनाने, | इन्द्रको पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ४० ॥ योद्धाओंके युद्धनाद, रथोंके चलनेकी ध्वनि और अनेक | तत्पश्चात् उठकर इन्द्रने क्रोधपूर्ण वाणीमें दैत्य प्रकारके वाद्योंके घोषसे वहाँ महान् कोलाहल हो गया। | त्रिपुरसे कहा—हे असुरेश्वर! अब तुम मल्लयुद्धके लिये तब त्रिपुरासुरके द्वारा हुंकारमात्रसे प्रेरित किये उसके वीर | तैयार हो जाओ ॥ ४१ ॥ योद्धा देवताओंके साथ युद्ध करने लगे और इस प्रकार | तब उस बलगर्वित त्रिपुरासुरने आश्चर्यचकित महान् संग्राम प्रारम्भ हो गया ॥ ३०-३१ ॥ | होकर कहा—हे देवेश्वर! अपने प्राणोंके प्रति क्यों निर्दय इस युद्धमें सैनिकोंको अपने-परायेका ज्ञान न रहा | हो रहे हो? ॥ ४२ ॥ और वे परस्पर एक-दूसरेको मारने लगे। इस प्रकार उस | कृमि, कीट और पतंगोंको भी अपने प्राण अत्यन्त भयंकर युद्धमें बहुत-से दानव मारे गये ॥ ३२॥ | प्रिय होते हैं, हे देवराज! धरतीपर जाओ, वहाँ मैंने तुम्हें दैत्योंके शस्त्राघातसे अत्यन्त पीड़ित होकर बहुत- | सुन्दर स्थान दे रखा है ॥ ४३ ॥ से देवता भी उस युद्धभूमिमें गिर गये। वहाँ वे | ब्रह्माजी बोले—[हे व्यास!] उसके इस प्रकारके [रक्तरंजित] सैनिक पुष्पित पलाश वृक्षोंकी भाँति सुशोभित | वचन सुनकर बलासुर और वृत्रासुरका वध करनेवाले हो रहे थे ॥ ३३॥ | इन्द्रने कहा—रे अधम शत्रु! यदि मैं तुझे जीवित ऊँट, हाथी, रथ और घोड़ोंपर आरूढ़ होकर युद्ध | छोड़ूँगा, तब तेरी आज्ञाके वशमें होकर पृथ्वीपर जाऊँगा।
१२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
रे दुष्ट! तू ही आज भग्न सिरवाला होकर पृथ्वीपर | हिमालयपर्वतकी गुफाओंमें चले गये ॥ ५१ ॥ जायगा ॥ ४४-४५ ॥ | वे देव (इन्द्र) कहाँ गिरे हैं? उन विभुको हम कैसे जब देवेन्द्र ऐसा कह रहे थे, तभी उस दुष्ट | देखें ? - ऐसा चिन्तन करते और भ्रमण करते हुए उन्होंने दैत्यराजने मुष्टिकासे उनके हृदयदेशमें प्रहार किया, तब | उनको देख लिया ॥ ५२ ॥ उन दोनोंमें युद्ध होने लगा। एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा | तब उस देवसमूहने नीचेको मुख किये आते हुए रखनेवाले उन दोनोंका वह युद्ध चाणूर और कृष्णके | उन इन्द्रको प्रणाम किया। कुछ अन्य देवताओंने उनका युद्धकी भाँति था। वे दोनों परस्पर छाती-से-छाती और | आलिंगन किया। कुछ अन्य देवताओंने उनका पूजन हाथ-से-हाथपर प्रहार कर रहे थे ॥ ४६-४७ ॥ | किया और कुछने उनपर व्यजन डुलाये तथा कुछने वे दोनों घुटनों-से-घुटनोंमें, जाँघों-से-जाँघोंमें, | भक्तिपूर्वक उनके पैर दबाये ॥ ५३-५४ ॥ मस्तक-से-मस्तकमें, कुहनी-से-कुहनीमें, पीठ-से-पीठमें, | [ तदनन्तर ] वे सभी देवता गुप्त रूपसे वहीं रहने पैरों-से-पैरोंमें प्रहार कर रहे थे। तभी उस दैत्य त्रिपुरने | लगे। [उधर] वह दैत्य (त्रिपुरासुर) ऐरावतपर आरूढ़ इन्द्रके दोनों पैरोंको पकड़कर और उन्हें बार-बार घुमाकर | होकर अमरावतीपुरीको चला गया ॥ ५५ ॥ इतनी दूर फेंक दिया कि किसीको उनके विषयमें कोई | उसने देवताओंसे द्वेष रखनेवाले दैत्योंको सम्मानपूर्वक जानकारी ही न रही और स्वयं चार दाँतोंवाले गजराज | देवताओंके पद बाँट दिये और स्वयं इन्द्रासनको हस्तगत ऐरावतपर आरूढ़ हो गया ॥ ४८-५० ॥ | कर लिया अर्थात् इन्द्र बन बैठा। किन्नरगणोंसे सेवित [वह] तदनन्तर सभी देवगण उस दैत्य त्रिपुरासुरके | त्रिपुरासुर दिव्य वाद्योंकी ध्वनि और गन्धर्वोंके गानका श्रवण सन्त्रासरूपी अग्निसे पीड़ित होकर, इन्द्रको खोजते हुए | करते हुए अप्सराओंके साथ रमण करने लगा ॥ ५६-५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'इन्द्रपराजयवर्णन' नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३९ ॥ चालीसवाँ अध्याय ब्रह्मा, विष्णु और शिवका त्रिपुरासुरके भयसे अपने-अपने लोकोंसे पलायन, देवताओंद्वारा गणेशाराधन, गणेशजीका प्रकट होना, देवताओंद्वारा संकष्टनाशनस्तोत्रसे उनका स्तवन ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] देवलोकपर | आलिंगन कर लिया ॥ ४ ॥ अधिकार करके वह दैत्य ब्रह्मलोकको गया। ब्रह्माजीने | तत्पश्चात् वह महान् असुर युद्धोत्सुक होकर उस दैत्यके पराक्रमको देवताओंके मुखसे पहले ही | कैलासपर्वतपर चढ़ गया। उस दैत्यके इस पुरुषार्थसे सुन रखा था, अतः वे [विष्णुके] नाभिकमलमें छिप | महादेवजी प्रसन्न हो गये ॥ ५ ॥ गये और विष्णु [वैकुण्ठलोकको छोड़कर] क्षीरसागरमें | अपने भक्तोंको सुख प्रदान करनेवाले [वे उसे] वर चले गये ॥ १ १/२ ॥ | देनेके लिये [अपने भवनसे] बाहर आये और दैत्य उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-के दो मानस पुत्र थे- | त्रिपुरको देखा तथा उससे 'वर माँगो' - ऐसा कहा ॥ ६ ॥ प्रचण्ड और चण्ड। उसने स्वयं प्रचण्डको ब्रह्मलोकमें | उसने कहा कि यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो अधिनायकके रूपमें स्थापित किया और उसके बाद | [यह] कैलासपर्वत मुझे दे दीजिये, जबतक मेरी इच्छा चण्डको वैकुण्ठमें वहाँका स्वामी बनाया ॥ २-३ ॥ | हो, मैं यहाँ रहूँ और आप आज ही मन्दारपर्वतके तदनन्तर वह कैलास गया और उसे अपनी | शिखरपर चले जाइये ॥ ७ ॥ भुजाओंसे चलायमान कर दिया, जिससे भयभीत होकर | तब भगवान् शंकरने भी उस अत्यन्त अल्पजीवीको गिरिराजनन्दिनी पार्वतीने भगवान् शंकरका दृढ़तापूर्वक | कैलासपर्वत दे दिया और वे स्वयं गिरिशायी [महादेव]
उ०ख०-अ०४०] * ब्रह्मा, विष्णु और शिवका त्रिपुरासुरके भयसे अपने-अपने लोकोंसे पलायन * १२१ गणोंसे घिरे हुए मन्दराचलको चले गये। कैलासशिखरपर आरूढ़ होकर अर्थात् कैलासपर्वतका स्वामित्व प्राप्तकर त्रिपुरासुर अत्यन्त हर्षित हुआ। इस प्रकार देवताओंको वशमें करके वह पुनः रसातलको आया ॥ ८-९ ॥ बलवान् भीमकायने भी पृथ्वीपर जाकर बलपूर्वक राजाओं और ऋषियोंको अपने वशमें कर लिया और उन सबको बाँध लिया। [उसने] देवताओंको तृप्ति प्रदान करनेवाले सभी अग्निकुण्डों, आश्रमों तथा विशेष रूपसे तीर्थोंको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ॥ १०-११ ॥ उसने तपस्वियोंको पीड़ित किया और उन्हें कारागारमें डाल दिया। सब प्रकारसे अभिमानसे भरा हुआ वह (दैत्य भीमकाय) देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वषट्कार, वेदाध्ययन करनेवालों और सदाचारियोंनोंसे सदा द्वेष रखता था ॥ १२१/२ ॥ [उधर] वज्रदंष्ट्रने भी सातों पातालों*को अपने वशमें कर लिया। उसने शेष, वासुकि और तक्षक प्रभृति सभी नागों तथा विषहीन और विषैले सर्पोंको अपने वशमें कर लिया। वज्रदंष्ट्रने [वहाँसे प्राप्त] श्रेष्ठ रत्नोंका स्वयं भी भोग किया और [उन्हें] त्रिपुरासुरके लिये भी प्रेषित किया ॥ १३-१४ ॥ वह सदा मदोन्मत्त होकर अत्यन्त हर्ष और कौतूहलपूर्वक नागलोककी नारियोंसे रमण करता था। [इस प्रकार] वह अनेक प्रकारके भोगोंका भोगकर विविध रत्नोंको लेकर त्रिपुरासुरके पास आया ॥ १५ ॥ 'पातालको वशमें कर लिया है' यह बात बतानेपर उसने [त्रिपुरासुरसे] पहलेकी भी अपेक्षा अधिक सम्मान, बहुमूल्य वस्त्र, बहुत-से ग्राम और सेवक प्राप्त किये ॥ १६ ॥ इस प्रकार त्रैलोक्यको अपने वशमें करके वह दैत्य [त्रिपुरासुर] अत्यन्त आनन्दित हुआ और उधर सभी देवता गुफाओंमें रहते हुए नित्य चिन्तित रहते थे कि इस दैत्यका वध कैसे, किस समय और किसके द्वारा होगा? हम लोग यह भी नहीं जानते कि इसने कहाँसे यह वरदान प्राप्त कर लिया है ॥ १७-१८ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ (व्यासजी) ! [जब] देवता लोग इस प्रकारसे व्याकुल थे तो [उसी समय] अपनी इच्छासे त्रिलोकीमें विचरण करनेवाले नारदजी वहाँ आये ॥ १९ ॥ [वे] उन दीन दशावाले देवोंको देखकर आकाश- मार्गसे नीचे उतर आये। नारदजीको सहसा आया देखकर वे सब आदरपूर्वक उठकर खड़े हो गये ॥ २० ॥ अवस्थाके अनुसार उनमेंसे कुछने उनका आलिंगन किया, कुछने नमस्कार किया और कुछने उनका पूजन किया; तत्पश्चात् विश्रामके अनन्तर [उन्होंने उनसे] त्रिपुरके वरदान आदिके विषयमें पूछा ॥ २१ ॥ देवता बोले-त्रिपुरासुरने स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण प्राणियोंसहित त्रैलोक्यको अधीन कर लिया है। उसने हमारे स्थान छीन लिये हैं; ब्रह्मा, विष्णु और शंकरको भी उसने जीत लिया है ॥ २२ ॥ हे [मुने]! अब हम किसकी शरणमें जायँ? उसका वध कैसे हो ? इस त्रिपुरको किसने वरदान दिया है-यह हमें बतलाइये ॥ २३ ॥ नारदजी बोले- [हे देवताओ!] दैत्य त्रिपुरासुरद्वारा किये गये महान् प्रयासको मैं संक्षेपमें कहता हूँ, उसने दिव्य सहस्र वर्षोंतक परम तप किया था ॥ २४ ॥ उसने देवाधिदेव भगवान् गणेशको [अपनी तपस्यासे] प्रसन्न किया। उन्होंने उसे सबके लिये दुर्धर्ष और भयंकर वर प्रदान किये ॥ २५ ॥ [उन्होंने उसे] एकमात्र परमात्मा शंकरके अतिरिक्त देवताओं, ऋषियों, पितरों, भूतों, यक्षों, राक्षसों, पिशाचों और नागोंसे अभय होनेका वर प्रदान किया है ॥ २६ ॥ अतः [आप लोग] आदरपूर्वक देवताओंके स्वामी गजानन गणेशजीको प्रसन्न करें; सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले विघ्नेश्वरकी आप सभी लोग आराधना करें ॥ २७ ॥ देवता बोले-हे मुनिश्रेष्ठ! उन बुद्धिमान् देवाधिदेवका आराधन कैसे करना चाहिये, कृपया इसे हम सबसे कहिये ॥ २८ ॥ नारदजी बोले-मैं आप सबके प्रति [गणेशजीके] एकाक्षर मन्त्रका कथन करता हूँ, आप सब मेरे द्वारा प्रदत्त उस मन्त्रका स्थिर मनसे भक्तिपूर्वक तबतक अनुष्ठान करें, जबतक कि वे देव गणनायक प्रत्यक्ष प्रकट होकर दर्शन न दे दें ॥ २९-३० ॥ वे ही आप सबसे उसके वधका उपाय कहेंगे,
- अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल-ये पृथ्वीके नीचे स्थित सात लोक हैं; जिनकी सप्तपाताल संज्ञा है।
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शीर्षक (Header): १२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
बायाँ स्तम्भ (Left Column)
[इस विषयमें] मैं कोई अन्य उपाय नहीं देखता हूँ। इसलिये मेरे वचनका पालन करो ॥ ३१ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] नारदमुनिने ऐसा कहकर और उन सबको उस (एकाक्षर) मन्त्रका उपदेश देकर वीणापर [भगवन्नामका] गान करते हुए तत्क्षण वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ ३२ ॥ तदनन्तर वे सभी श्रेष्ठ देवता गणेशजीके ध्यानमें संलग्न हो गये। उनमेंसे कुछ एक पैरपर, कुछ पद्मासनमें और कुछ वीरासनमें स्थित थे; कुछने अपने नेत्र बन्द कर रखे थे। वे सब श्वासपर नियन्त्रण करके निराहार रहते हुए मुनिद्वारा उपदिष्ट मन्त्रका जप करने लगे ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर करुणासागर गजानन गणेशजी देवताओंके दीर्घकालसे चल रहे अनुष्ठानको
(मध्य में चित्र)
देखकर उनके समक्ष प्रकट हुए। उन वरदायक [गणेशजी]- के [सिरपर] स्वर्ण मुकुट और [कानोंमें] सुन्दर कुण्डल सुशोभित हो रहे थे ॥ ३५-३६ ॥ उन्होंने अपने हाथमें दाँत धारण कर रखा था, उनके शरीरपर श्रेष्ठ बाजूबन्द और कटिसूत्र शोभायमान हो रहे थे। उन्होंने अपनी भुजाओंमें पाश, अंकुश, परशु और कमल धारण कर रखे थे ॥ ३७ ॥ उनका [मस्तक] रक्तचन्दन, कस्तूरी, सिन्दूर और
दायाँ स्तम्भ (Right Column)
चन्द्रमासे विभूषित था। उनके श्रीविग्रहका तेज विद्युत्के समान और उनकी कान्ति करोड़ों सूर्योंकी प्रभाके समान थी ॥ ३८ ॥ सहसा अनामय देव विनायकको [अपने समक्ष] देखकर सभी देवता उनके तेजसे पराभूत हो गये। उनमेंसे कुछ भयभीत हो गये, कुछ देवता सहसा उन गजाननको प्रणाम करने लगे, कुछ अन्य देवताओंने हर्षसे गद्गद वाणीमें उनका पूजन किया ॥ ३९-४० ॥ संकटसे रक्षा करनेवाले और कृपा करनेके लिये उत्सुक उन सुन्दर मुखवाले भगवान् गणेशका कुछ देवताओंने अपने संकटके विनाशहेतु स्तवन* भी किया ॥ ४१ ॥ **देवता बोले—**हे परमार्थरूप! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप अखिल [सृष्टि]-के कारणरूप हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप सम्पूर्ण प्राणियोंको [इस भवसागरसे] तारनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप [सम्पूर्ण प्राणियोंकी] सभी इन्द्रियोंमें भी निवास करते हैं, आपको नमस्कार है ॥ ४२ ॥ आप सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे देवेश! आप भूत-सृष्टिके कर्ता हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप [सम्पूर्ण प्राणियोंकी] बुद्धिके प्रबोधरूप हैं, संसारकी उत्पत्ति और लय करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४३ ॥ हे अखिलेश! आप विश्वका भरण-पोषण करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप कारणोंके भी कारण हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप वेदके विद्वानोंके लिये भी अदृश्य हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप सबको वर प्रदान करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४४ ॥ हे वाणीसे अनिर्वचनीय [परमात्मन्]! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप विघ्नोंका निवारण करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप अभक्तके मनोरथका नाश करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे भक्तके मनोरथको जाननेवाले!
उ०ख०-अ०४०] * ब्रह्मा, विष्णु और शिवका त्रिपुरासुरके भयसे अपने-अपने लोकोंसे पलायन * १२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
इकतालीसवाँ अध्याय
१२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 इकतालीसवाँ अध्याय श्रीगणेशजीका कलाधर विप्रके रूपमें त्रिपुरासुरके पास आना और उसे स्वर्ण, रजत एवं लौहसे निर्मित तीन पुर प्रदान करना
व्यासजी बोले—हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! [सृजन, पालन और संहार आदि] सम्पूर्ण कार्योंको सम्पन्न करनेवाले वरदायक भगवान् गणेशजीने क्या किया—यह मुझ जिज्ञासुको बतलाइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी !] तदनन्तर गजानन गणेशजी ब्राह्मणका रूप धारणकर त्रिपुरासुरके पास गये। वहाँ उन ब्राह्मणश्रेष्ठने उसे महामूल्यवान् आसनपर विराजमान देखा ॥ २ ॥ उसने उठकर उन्हें नमस्कार करके अपने आसनपर बैठाया और सम्यक् रूपसे उनका पूजनकर पूछा कि 'हे द्विज ! आपका आगमन कहाँसे हुआ है ? ॥ ३ ॥ हे द्विज ! आपने किस विद्याका ज्ञान प्राप्त किया है ? आपका नाम क्या है ? आपके आनेका प्रयोजन क्या है ?—यह सब मुझ जिज्ञासुको बताइये, मैं शक्तिभर आपके कार्यको पूर्ण करूँगा' ॥ ४ ॥ द्विजरूपधारी गणेशजी बोले—हे दैत्य [राज] ! हम सर्वज्ञ और सब कुछ जाननेवाले हैं; परहितकी कामनासे इच्छानुसार लोकोंमें भ्रमण करते रहते हैं और जहाँ सायंकाल हो जाता है, वहीं रुक जाते हैं ॥ ५ ॥ मैं तीनों लोकोंमें 'कलाधर' नामसे प्रसिद्ध हूँ और आपके वैभवको देखनेकी इच्छासे आपके भवनमें आया हूँ। सम्प्रति आपकी सम्पूर्ण सम्पदाको देखकर हम तृप्त हो गये। इस प्रकारकी सम्पत्ति तो कैलास, वैकुण्ठ और ब्रह्मलोकमें भी नहीं है। इन्द्रलोकमें भी ऐसी सम्पत्ति नहीं है, जैसी आपके पास दिखायी देती है ॥ ६—७१/२ ॥ दैत्य (त्रिपुरासुर) बोला—हे द्विज ! आपका नाम ही कलाधर है या आप उसे जानते भी हैं ? ॥ ८ ॥ सम्पूर्ण लोकोंकी सम्पदाओंमें आप जो इस सम्पदाकी प्रशंसा कर रहे हैं तो यदि आप जानते हों तो मुझे उनमें जो सर्वश्रेष्ठ हो, उसे दिखायें ॥ ९ ॥ हे द्विज ! उसे देखकर मैं आपको आपका वांछित [अवश्य] प्रदान करूँगा, भले ही वह मेरा प्रिय प्राण ही क्यों न हो। हे मुने ! मुझे स्मरण नहीं है कि मैंने परिहासमें भी कभी असत्य बोला हो ॥ १० ॥ कलाधर बोले—हे देवशत्रु ! दूसरोंकी सम्पदाको देखकर तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा ? तुम्हारी विनम्रतासे मैं प्रसन्न हूँ और अपनी कलासे तुम्हें एक बाणपर स्थित स्वर्ण, रजत और लौहनिर्मित तीन पुर प्रदान करता हूँ। हे दैत्य ! तुम दीर्घकालतक वहाँ रहकर सुखपूर्वक रमण करो ॥ ११-१२ ॥ ये तीनों पुर देवताओं, गन्धर्वों, मनुष्यों और सर्पोंद्वारा अभेद्य, मनोवांछित पदार्थोंको देनेवाले, इच्छानुसार गमन करनेवाले, इच्छित भोगोंको प्रदान करनेवाले और मंगलमय हैं ॥ १३ ॥ हे दैत्य ! कुछ काल बीत जानेपर जब भगवान् शिव एक ही बाणसे उनका भेदन कर देंगे, तभी उनका नाश होगा ॥ १४ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] ऐसा कहकर [उन द्विजरूपधारी गणेशजीने] धनुष लेकर और उसपर बाणका संयोजनकर तीन पुरोंका निर्माण किया, जो तीन लोकोंके सदृश थे। वे [तीनों.पुर] विशेष रूपसे चित्रित भवनों, मनोरम दीर्घिकाओं (जलाशयों) और उद्यानोंसे युक्त थे; वहाँ अनेक प्रकारके पक्षिसमूह कलरव करते थे। वे तीनों पुर सभी प्रकारके भोगोंको प्रदान करनेवाले और आकाशमार्गसे गमन करनेवाले थे ॥ १५-१६ ॥ [गणेशजीकी] मायासे मोहित वह दैत्य त्रिपुरासुर वहाँ (उन पुरोंके मध्यमें) स्थित होकर अत्यन्त हर्षित हुआ। उस दैत्यने मेघसदृश गर्जन किया, जिससे तीनों लोक काँपने लगे। त्रैलोक्यको क्षुभित करके उसने 'मुझसे श्रेष्ठ कोई नहीं है'—इस प्रकार गर्व और दर्पसे युक्त होकर उन ब्राह्मण-देवता (द्विजरूपधारी गणेशजी)— से इस प्रकार कहा— ॥ १७-१८ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! आप दुर्लभ-से-दुर्लभ पदार्थ माँगिये, वह मैं आपको दूँगा। यह सुनकर उन द्विज (कलाधर)—
उ०ख०-अ०४२ ] * भगवान् शंकर और त्रिपुरासुरका युद्ध * १२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ने उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-से किसी वस्तुकी स्पृहा न होते हुए भी कहा— ॥ १९ ॥ द्विजरूपधारी गणेशजी बोले—मैं कैलासपर्वतपर गया था, वहाँ मैंने शिवजीद्वारा सम्यक् रूपसे पूजित उत्तम गणेशमूर्तिका दर्शन किया, जो समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली थी। हे असुरेश्वर! यदि आपमें शक्ति है, तो उसे लाकर मुझे दीजिये; क्योंकि तीनों लोकोंमें विचरण करते हुए मैंने वैसी मूर्ति कहीं नहीं देखी ॥ २०-२१॥ अतः हे दैत्यश्रेष्ठ! उसमें मेरा मन आसक्त हो गया है, हे असुरेश्वर! उसे प्राप्तकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा। मैं चराचरसहित तीनों लोकोंमें आपकी कीर्तिका विस्तार करूँगा कि 'त्रिपुरासुरसे श्रेष्ठ कोई दाता नहीं है, जो वांछित वस्तुको प्रदान करता है' ॥ २२-२३॥ दैत्य [त्रिपुरासुर] बोला—हे द्विजश्रेष्ठ ! मैं शंकरको अपना किंकर (सेवक) मानता हूँ, अन्य देवताओंकी तो मैं कोई गणना ही नहीं करता। मैं उस मूर्तिको लाकर आपको प्रदान करूँगा ॥ २४॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी!] ऐसा कहकर [उस दैत्यने] उन [द्विजश्रेष्ठ] कलाधरका आदरपूर्वक पूजन किया। उसने उन्हें दस ग्राम, गौएँ, वस्त्र, आभूषण, मोती, मूँगे तथा अन्य बहुत-से रत्न एवं रंकु मृगके रोमसे बने हुए कम्बल और अनेक प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित सैकड़ों दास-दासियाँ प्रदान किये। उस असुरने श्रेष्ठ अश्वोंसे युक्त एवं चाँदीसे निर्मित बहुत-से रथ भी उन्हें प्रदान किये, जो रथकी रक्षा करनेवाले कवच और सोनेके धुरोंसे युक्त थे ॥ २५-२७ ॥ उस (त्रिपुरासुर)-के द्वारा आग्रहपूर्वक दी गयी सम्पूर्ण दान-सामग्रियों आदिको ग्रहणकर वे [द्विजश्रेष्ठ] कलाधर अपने आश्रमको प्रस्थान कर गये। [उन्हें देखकर] उनकी पत्नी और सम्पूर्ण आश्रमवासी हर्षित हो गये ॥ २८ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] इस प्रकार इस सम्पूर्ण वृत्तान्तको नारदजीने देवताओंसे कहा। वे देवता भी उचित समयकी प्रतीक्षा करते हुए दिन व्यतीत करने लगे ॥ २९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'नारदागमन' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१॥ बयालीसवाँ अध्याय भगवान् शंकर और त्रिपुरासुरका युद्ध व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन् !] उन [द्विजश्रेष्ठ] कलाधरके चले जानेके बाद उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-ने क्या किया? उस मंगलमयी चिन्तामणि [गणेशजीकी] मूर्तिको उसने कैसे लाकर उन कलाधरको प्रदान किया? हे चतुरानन ब्रह्माजी! यह सब मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये; क्योंकि गजानन गणेशजीकी लीलाओंको संक्षेपमें सुनकर मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ ! उन [द्विजश्रेष्ठ कलाधर]-के चले जानेके बाद उस दैत्य त्रिपुरासुरने जो कुछ किया, वह सब मैं कहूँगा; हे मुने! उसे सावधान होकर श्रवण करो ॥ ३ ॥ [तदनन्तर] उसने मन्दराचलपर स्थित शिवके पास दो दूतोंको भेजा। उसने उन्हें यह सिखाया कि शिवके पास जाकर आदरपूर्वक मेरी बात उनसे कहो कि तुम्हारे भवनमें जो सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थोंको प्रदान करनेवाली चिन्तामणि-निर्मित मंगलमयी [गणेश] मूर्ति है, हे पार्वतीपते! उसे शान्तिपूर्वक दैत्यराज (त्रिपुरासुर)-को दे दीजिये ॥ ४-५॥ पाताल, स्वर्गलोक या मर्त्यलोकमें जो भी अद्भुत वस्तुएँ हैं, उन सबको वह दैत्य [राज] बलपूर्वक अपने घरमें लाया है, अतः हे देव ! उसे आप शीघ्र लाइये, उसे लेकर हम दोनों शीघ्र ही महाबली दैत्य त्रिपुरासुरके पास जायँ। यदि आप उसे शान्तिपूर्वक नहीं देंगे, तब वह पराक्रमी दैत्य उस मूर्तिको आपसे बलपूर्वक ले लेगा, तब आपको दुःखकी प्राप्ति होगी-उस दैत्यके इस प्रकारके वचन सुनकर वे दोनों दूत शिवके पास गये ॥ ६–८॥
१२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
उ०ख०-अ०४३] * त्रिपुरासुरके साथ युद्धमें भगवान् शंकरकी पराजय * १२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 धूलके शान्त हो जानेपर वीर योद्धा [शत्रुपक्ष]- | भाँति बह रहे थे। वह वीरोंके मनमें सन्तोष उत्पन्न के दूसरे योद्धाओंसे युद्ध करने लगे। उनमेंसे कुछ | करनेवाली और गृध्रों एवं शृगालोंके लिये प्रसन्नताका भालोंसे, कुछ खड्गोंसे, कुछ पत्थरपर घिसकर तेज | कारण थी ॥ ३२ ॥ किये गये बाणोंसे, कुछ ऋष्टि (दुधारी तलवार)-से, | उस नदीको देखकर गिरिशायी बलवान् भगवान् कुछ मुष्टिकासे, कुछ परशुसे, तो कुछ तोमरोंसे युद्ध कर | शंकर दैत्य त्रिपुरासुरके निकट गये, [तब] वह दैत्य भी रहे थे॥ २९ १/२ ॥ | त्रिपुरमें आरूढ़ होकर सेनाके साथ उनके सामने वहाँ मारे गये वीरों, घोड़ों और पैदल सैनिकोंके | आया ॥ ३३ ॥ रक्तसे एक रक्तकी नदी उत्पन्न हो गयी, जिसमें | तब दोनों नायकोंको युद्धोद्यत देखकर भगवान् शैवालकी भाँति केश प्रवाहित हो रहे थे। [उस नदीमें] | शंकर और त्रिपुरासुरके सैनिक बिना व्याकुल हुए परस्पर ढालें कछुओंकी भाँति, तलवारें मत्स्योंकी तरह और | द्वन्द्व-युद्ध करने लगे ॥ ३४ ॥ [योद्धाओंके कटे] सिर कमलसदृश प्रतीत हो रहे | उस समय वे अनेक प्रकारके आयुधों, दिव्य थे ॥ ३०-३१ ॥ | अस्त्र-शस्त्रों और वृक्षोंसे प्रहार कर रहे थे। उन भयंकरसे भी भयंकर प्रतीत होनेवाली उस नदीमें | योद्धाओंके नामों और युद्धविषयक चेष्टाओंको मैं छत्र आवर्त (भँवर)-की भाँति और कबन्ध वृक्षकी | [आगे] संक्षेपमें कहूँगा ॥ ३५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'युद्धका वर्णन' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥ तैंतालीसवाँ अध्याय त्रिपुरासुरके साथ युद्धमें भगवान् शंकरकी पराजय ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] उस द्वन्द्व-युद्धमें | गजारोहियोंके साथ, अश्वारोही अपने सदृश अश्वारोहियोंके गिरिशायी भगवान् शंकर असुर सेनानायक त्रिपुरासुरसे, | साथ और पैदल सैनिक पैदल सैनिकोंके साथ युद्ध करने षडानन भगवान् स्कन्द प्रचण्डसे और नन्दी चण्डसे युद्ध | लगे। उस भयंकर संग्राममें अनेक प्रकारके वाद्योंके घोष, करने लगे ॥ १ ॥ | हाथियोंकी चिंघाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, वीरोंके बलवान् पुष्पदन्त भी भीमकायसे तथा भुशुण्डी | सिंहनाद और रथोंके धुरोंके घर्षणसे उत्पन्न ध्वनिसे [वह विषके सदृश प्राणहारी कालकूटसे युद्ध करने लगे ॥ २ ॥ | रणभूमि] अत्यन्त कोलाहलयुक्त हो गयी थी ॥ ६-७ ॥ वज्रदंष्ट्र और वीरभद्र-दोनों महान् बलशाली | उस युद्धमें कुछ वीर शस्त्रोंका त्याग करके विविध [परस्पर] युद्ध करने लगे। वहाँ [उस संग्राममें] | प्रकारसे मल्लयुद्ध करने लगे। वे अपने अंगोंसे दूसरेके बलवान् इन्द्रने भी दैत्य (त्रिपुरासुर)-के अमात्यसे युद्ध | अंगोंपर प्रहार कर रहे थे ॥ ८ ॥ किया। दैत्यपुत्र बलिके साथ रणदुर्मद [इन्द्रपुत्र] जयन्तने | तभी प्रचण्डने धनुषको कानतक खींचकर पत्थरपर और [दैत्यगुरु] शुक्राचार्यके साथ अस्त्रोंके ज्ञाता देवताओंके | घिसकर तेज किये गये नौ दृढ़ बाणोंसे षडानन आचार्य बृहस्पतिने युद्ध किया ॥ ३-४ ॥ | कार्तिकेयजीपर प्रहार किया ॥ ९ ॥ इस प्रकार देवताओं और दैत्योंके अनेक जोड़ोंमें | तब भगवान् कार्तिकेयने उन्हें अपनेतक पहुँचनेके युद्ध हुआ, जिसका वर्णन करनेमें मैं सैकड़ों वर्षोंमें भी | पहले ही झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे काटकर पाँच समर्थ नहीं हूँ ॥ ५ ॥ | बाणोंसे उसपर प्रहार किया। इससे भ्रान्तचित्त प्रचण्ड उस युद्धमें रथी रथियोंके साथ, गजारोही | मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ा ॥ १० १/२ ॥