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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और सटीक देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

१४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


[बायाँ स्तम्भ]

रूपमें सर्पको धारण करनेवाले; २३४. सर्पग्रैवेय- **काङ्गदः—**सर्पके ही कण्ठहार और बाजूबंद पहननेवाले; **२३५. सर्पकक्ष्योदराबन्धः—**करधनीके रूपमें सर्पको ही धारण करनेवाले; **२३६. सर्पराजोत्तरीयकः—**नागराज वासुकिको उत्तरीयके रूपमें धारण करनेवाले ॥ ४२ ॥ **२३७. रक्तः—**रक्तवर्ण; २३८. रक्ताम्बरधरः— लाल वस्त्र धारण करनेवाले; २३९. रक्तमाल्य- **विभूषणः—**लाल रंगके ही हार और आभूषण धारण करनेवाले; **२४०. रक्तेक्षणः—**लाल नेत्रोंवाले; २४१. **रक्तकरः—**लाल हाथोंवाले; २४२. रक्तताल्वोष्ठ- **पल्लवः—**रक्तवर्णके तालु और ओष्ठपल्लव धारण करनेवाले ॥ ४३ ॥ २४३. श्वेतः—(विद्याकी कामना रखनेवाले साधकोंको भगवान् गणेशके श्वेत रूपका ध्यान करना चाहिये, इस दृष्टिसे श्वेत आदि पाँच नाम दिये जाते हैं—) श्वेतवर्ण; **२४४. श्वेताम्बरधरः—**श्वेत वस्त्रधारी; **२४५. श्वेतमाल्यविभूषणः—**श्वेत माला और आभूषण धारण करनेवाले; **२४६. श्वेतातपत्ररुचिरः—**श्वेतच्छत्र धारण करनेके कारण अत्यन्त सुन्दर दिखायी देनेवाले; **२४७. श्वेतचामरवीजितः—**श्वेत चँवर डुलाकर जिनकी सेवा की जाती है, वे ॥ ४४ ॥ २४८. सर्वावयवसम्पूर्णसर्वलक्षणलक्षितः— सम्पूर्ण अंगोंमें सामुद्रिक शास्त्रोक्त समस्त शुभ लक्षणोंसे परिपूर्ण दिखायी देनेवाले; २४९. सर्वाभरणशोभाढ्यः— सम्पूर्ण आभूषणोंकी शोभासे सम्पन्न; २५०. सर्वशोभा- **समन्वितः—**लावण्य नामक सम्पूर्ण अंगकान्तिसे शोभायमान ॥ ४५ ॥ **२५१. सर्वमङ्गलमङ्गल्यः—**समस्त मंगलोंके लिये भी मंगलकारी; **२५२. सर्वकारणकारणम्—**सम्पूर्ण कारणोंके भी कारण; **२५३. सर्वदैककरः—**जिनका एकमात्र कर (शुण्ड-दण्ड) सब कुछ देनेवाला है, वे; २५४. शार्ङ्गी— शृंगनिर्मित धनुष धारण करनेवाले; (यहाँ 'शार्ङ्गी' आदि नामोंसे उनके दस आयुधोंको लक्षित कराया जाता है); **२५५. बीजापूरी—**बिजौरा नीबू या अनार धारण करनेवाले; **२५६. गदाधरः—**गदाधारी ॥ ४६ ॥


[दायाँ स्तम्भ]

**२५७. इक्षुचापधरः—**गन्नेका धनुष धारण करनेवाले; **२५८. शूली—**शूलधारी; **२५९. चक्रपाणिः—**हाथमें चक्र धारण करनेवाले; **२६०. सरोजभृत्—**कमलधारी; २६१. **पाशी—**पाशधारी; **२६२. धृतोत्पलः—**उत्पल धारण करनेवाले; **२६३. शालीमञ्जरीभृत्—**धानकी बाल धारण करनेवाले; **२६४. स्वदन्तभृत्—**एक हाथमें अपने दाँतको लिये रहनेवाले ॥ ४७ ॥ **२६५. कल्पवल्लीधरः—**हाथमें कल्पलता ग्रहण करनेवाले; **२६६. विश्वाभयदैककरः—**जिनका मुख्य कर सम्पूर्ण विश्वसे अभयदान करनेवाला है; अथवा एक हाथमें 'अभय' नामक मुद्रा धारण करनेवाले; २६७. **वशी—**सम्पूर्ण विश्वको वशमें रखनेवाले; २६८. **अक्षमालाधरः—**अक्षमालाधारी; २६९. ज्ञानमुद्रावान्— ज्ञानकी मुद्रासे युक्त; **२७०. मुद्गरायुधः—**मुद्गर नामक शस्त्र धारण करनेवाले ॥ ४८ ॥ **२७१. पूर्णपात्री—**पूर्णपात्रयुक्त यज्ञस्वरूप; अथवा अमृतसे भरे पात्रवाले; **२७२. कम्बुधरः—**शंखधारी; **२७३. विधुतालिसमुद्गकः—**मदजलसे आर्द्र गण्ड- स्थलपर मँडराते हुए भ्रमरसमूहसे युक्त; २७४. **मातुलिङ्गधरः—**बिजौरा नीबू लिये रहनेवाले; **२७५. चूतकलिकामृत्—**आम्रमंजरी धारण करनेवाले; **२७६. कुठारवान्—**कुठारधारी ॥ ४९ ॥ २७७. पुष्करस्थस्वर्णघटीपूर्णरत्नाभिवर्षकः— शून्यमें गृहीत सुवर्णमय कलशसे पूर्ण रत्नोंकी वर्षा करनेवाले; **२७८. भारतीसुन्दरीनाथः—**सरस्वती, गौरी तथा लक्ष्मीके स्वामी ब्रह्मा, शिव और विष्णुरूप; २७९. **विनायकरतिप्रियः—**विनायक नामवाले अपने गणोंके साथ खेलनेमें रुचि रखनेवाले ॥ ५० ॥ **२८०. महालक्ष्मीप्रियतमः—**महालक्ष्मीके प्रियतम (ये महालक्ष्मी विष्णुपत्नी लक्ष्मीसे भिन्न हैं; ये गणेशकी अपनी प्रिया बुद्धिरूपा हैं। सिद्धलक्ष्मी इनकी दूसरी पत्नी हैं); **२८१. सिद्धलक्ष्मीमनोरमः—**सिद्धलक्ष्मीके हृदयवल्लभ; **२८२. रमारमेशपूर्वाङ्गः—**आवरण- देवताओंमें रमा और रमापति (लक्ष्मी तथा विष्णु) गणेशजीके पूर्वभागमें (सम्मुख) विराजमान होते हैं,


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उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

१४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] अजयासे घिरे हुए; ३१७. विजयाविजयावहः—विजयाको विजय देनेवाले ॥ ६० ॥ ३१८. अर्जिताचितपादाब्जः—अपराजिताशक्तिसे पूजित चरणारविन्दवाले; ३१९. नित्यानित्यावतंसितः— नित्याशक्तिने जिनके चरणोंको नित्य अपना शिरोभूषण बना रखा है, वे; ३२०. विलासिनीकृतोल्लासः— विलासिनीकी सेवासे उल्लसित होनेवाले; ३२१. शौण्डी- सौन्दर्यमण्डितः—शौण्डी नामक शक्तिके सौन्दर्यसे मण्डित ॥ ६१ ॥ ३२२. अनन्तानन्तसुखदः—अनन्ता नामक शक्तिको अनन्त सुख देनेवाले; ३२३. सुमङ्गलसुमङ्गलः—जिस पीठपर मंगला नामक शक्ति विद्यमान है, उसका नाम 'सुमंगल' है। ऐसा सुमंगल-पीठ जिनके कारण परम मंगलमय होता है, वे गणेशजी 'सुमंगलके सुमंगल' हैं; ३२४. इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिनिषेवितः— इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति तथा क्रियाशक्तिसे सेवित ॥ ६२ ॥ ३२५. सुभागासंश्रितपदः—सुभागादेवीके द्वारा सेवित चरणकमलवाले; ३२६. ललिताललिताश्रयः—ललिता- देवीके मनोरम आश्रय; ३२७. कामिनीकामनः— कामिनी या कामकला नामक शक्तिकी कामना रखनेवाले; ३२८. काममालिनीकेलिलालितः—कामेशी अथवा काममालिनी नामक शक्तिकी क्रीडाओंद्वारा प्रसन्न किये गये ॥ ६३ ॥ ३२९. सरस्वत्याश्रयः—सरस्वती (वाग्देवता)- के आश्रय; ३३०. गौरीनन्दनः—पार्वतीदेवीको आनन्द प्रदान करनेवाले; ३३१. श्रीनिकेतनः—लक्ष्मी या शोभाके आगार; ३३२. गुरुगुप्तपदः—गणक्रीड आदि गुरुओंद्वारा गोपित पदवाले; ३३३. वाचासिद्धः—जिनकी भक्तिसे वाक्-सिद्धि प्राप्त होती है, वे; ३३४. वागीश्वरीपतिः— वागीश्वरी अर्थात् नकुली नामक शक्तिके प्रियतम ॥ ६४ ॥ ३३५. नलिनीकामुकः—नलिनी अर्थात् सुरापगा नामक शक्तिके प्राणवल्लभ; ३३६. वामारामः—वामा नामक शक्ति जिनकी रामा अर्थात् प्रिया हैं, वे; ३३७. ज्येष्ठामनोरमः—ज्येष्ठा नामक शक्ति जिनकी मनोरमा हैं, वे; ३३८. रौद्रीमुद्रितपादाब्जः—रौद्री नामक शक्ति

[दायाँ स्तम्भ] जिनके चरणारविन्दोंको अपनी अंजलिमें बाँधे रखती हैं, वे; ३३९. हुम्बीजः—‘वक्रतुण्डाय हुम्’—इस षडक्षर मन्त्रका अन्तिम वर्ण जो ‘हुम्’ है, वही समस्त पुरुषार्थोंका बीज (कारण) है; अतएव भगवान् गणपति ‘हुं बीज’ नामसे प्रसिद्ध हैं; ३४०. तुङ्गशक्तिकः— उच्चशक्तिसे सम्पन्न; अथवा वक्रतुण्ड-मन्त्रमें जो ‘हुम्’ बीज है, यही उक्त गणेश-मन्त्रकी शक्ति है। इसलिये वे उक्त नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ६५ ॥ ३४१. विश्वादिजननत्राणः—विश्वके आदिभूत हिरण्यगर्भके जन्म और पालन जिनसे होते हैं, वे; ३४२. स्वाहाशक्तिः—‘स्वाहा’ जिनकी शक्ति है, वे; ३४३. सकीलकः—कीलकयुक्त; ३४४. अमृताब्धि- कृतावासः—सुधासिन्धुमें निवास करनेवाले; ३४५. मदघूर्णितलोचनः—सुधापानके मदसे अथवा गण्डस्थलसे झरते हुए मदसे घूमते हुए नेत्रवाले ॥ ६६ ॥ ३४६. उच्छिष्टगणः—उत्कृष्ट और शिष्ट गणोंके स्वामी; ३४७. उच्छिष्टगणेशः—(उच्छिष्टे नामरूपं च) इत्यादि अथर्ववेदीय मन्त्रोंके समूहसे प्रतिपाद्य ईश्वर; अथवा सतत मोदक-भक्षणके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध श्रीगणेश; ३४८. गणनायकः—जिनके गणोंकी गणना भक्तोंद्वारा होती रहती है, वे; ३४९. सार्वकालिक- संसिद्धिः—जिनकी सिद्धियाँ सब समय बनी रहती हैं, वे; ३५०. नित्यशैवः—सदा शिवका चिन्तन करनेवाले; ३५१. दिगम्बरः—दिशाओंको ही वस्त्र बनानेवाले ॥ ६७ ॥ ३५२. अनपायः—अविनाशी; ३५३. अनन्त- दृष्टिः—असीम ज्ञानशक्तिसे सम्पन्न; ३५४. अप्रमेयः— वाणी, मन एवं ज्ञानेन्द्रियोंसे अगम्य होनेके कारण प्रमाणातीत; ३५५. अजरामरः—जरा और मृत्युसे रहित; ३५६. अनाविलः—कालुष्यरहित; ३५७. अप्रतिरथः— प्रतिद्वन्द्वीसे शून्य; ३५८. अच्युतः—मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले; अथवा श्रीकृष्णसे अभिन्न; ३५९. अमृतम्— अमृत या मोक्षस्वरूप; ३६०. अक्षरम्—व्यापक अथवा अक्षय ॥ ६८ ॥ ३६१. अप्रतर्क्यः—जिसका वेदोंके द्वारा अनुमोदन न हो, ऐसे तर्कसे अगम्य; ३६२. अक्षयः—क्षय-

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उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 रहित; ३६३. अजय्यः—जिनहें जीता न जा सके, ऐसे; | ३८६. इन्दीवरदलश्यामः—नीलकमलके समान ३६४. अनाधारः—स्वयं सबके आधार होनेके कारण | श्याम; ३८७. इन्दुमण्डलनिर्मलः—चन्द्रमण्डलके समान अपने लिये आधारसे रहित; ३६५. अनामयः—रोगरहित; | गौर कान्तिवाले; ३८८. इध्मप्रियः—अग्निरूपसे काष्ठ ३६६. अमलः—मलिनतासे शून्य; ३६७. अमोघ- | या ईंधनके प्रेमी; ३८९. इडाभागः—ऋत्विक् और सिद्धिः—अमोघ (अव्यर्थ) सिद्धिवाले; ३६८. अद्वैतम्— | यजमान आदिके रूपमें यज्ञकर्ममें भाग लेनेवाले; ३९०. द्वैत-प्रपंचसे रहित; ३६९. अघोरः—शिवरूप; ३७०. | इराधामा—पृथ्वीमें अन्तर्यामीरूपसे अवस्थित; ३९१. अप्रमिताननः—असंख्य मुखवाले ॥ ६९ ॥ | इन्दिराप्रियः—लक्ष्मीद्वारा पूज्य; अथवा विष्णुरूपसे लक्ष्मीके ३७१. अनाकारः—निराकार परमात्मा; ३७२. | प्रियतम ॥ ७३ ॥ अब्धिभूम्यग्निबलघ्नः—जलधि या जलकी शक्ति क्लेदन, | ३९२. इक्ष्वाकुविघ्नविध्वंसी—राजा इक्ष्वाकुके भूमिकी शक्ति स्तम्भन तथा अग्निकी शक्ति दहनका | विघ्नका नाश करनेवाले; ३९३. इतिकर्तव्यतेप्सितः— जिनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वे भूमि, जल और | इतिकर्तव्यता (क्रतुकी अंगभूत सामग्री)—की अपेक्षा अग्निकी शक्तिको प्रतिहत कर देनेवाले; ३७३. | रखकर यजमानकी मनोवांछा पूर्ण करनेवाले; ३९४. अव्यक्तलक्षणः—बहिर्मुख मानवोंकी बुद्धिमें जिनके | ईशानमौलिः—नरेश, भूतेश और सुरेश आदि ईशानों स्वरूप-लक्षण तथा तटस्थ-लक्षणकी अभिव्यक्ति नहीं | (ईश्वरों)—के शिरोमणि; ३९५. ईशानः—ईशानोंको जीवन होती, वे; ३७४. आधारपीठः—पृथ्वीसे लेकर शिवपर्यन्त | देनेवाले; ३९६. ईशानसुतः—ईश्वरपुत्र; ३९७. ईतिहा— छत्तीस आधारभूत तत्त्वोंके भी आश्रय; ३७५. आधारः— | अतिवृष्टि, अनावृष्टि, मूषकजनित उपद्रव, शलभ, शुक अ—विष्णु तथा आ—ब्रह्माको भी धारण करनेवाले; | आदि पक्षी, स्वमण्डल तथा परमण्डल—इन सबसे प्राप्त ३७६. आधाराधेयवर्जितः—आधार-आधेय-भावसे | होनेवाले भयको 'ईति-भीति' कहते हैं; उस 'ईति- रहित, अद्वैतस्वरूप ॥ ७० ॥ | भीति' के नाशक ॥ ७४ ॥ ३७७. आखुकेतनः—मूषकचिह्नसे युक्त ध्वज- | ३९८. ईषणात्रयकल्पान्तः—लोकैषणा, पुत्रैषणा वाले; ३७८. आशापूरकः—सर्वव्यापी होनेसे दिशाओंके | और वित्तैषणा—इन त्रिविध एषणाओंके लिये प्रलयंकर; पूरक अथवा सबकी आशा पूर्ण करनेवाले; ३७९. | अथवा वैराग्यदायक; ३९९. ईहामात्रविवर्जितः—चेष्टा- आखुमहार्थः—मूषकरूपी महान् रथ (वाहन)-से युक्त; | मात्रसे शून्य; चित्स्वरूप; ४००. उपेन्द्रः—कश्यप और ३८०. इक्षुसागरमध्यस्थः—ईखके रसके सागरमें | अदितिके यहाँ अवतीर्ण महोत्कट विनायक; अथवा विराजमान; ३८१. इक्षुभक्षणलालसः—ईख खानेकी | वामनसे अभिन्न; ४०१. उडुभृन्मौलिः—नक्षत्र-पालक इच्छा रखनेवाले ॥ ७१ ॥ | चन्द्रमाको भालदेशमें धारण करनेवाले; ४०२. उण्डेरक- ३८२. इक्षुचापातिरेकश्रीः—इक्षुधन्वा (कामदेव)- | बलिप्रियः—गोल-गोल मिष्टान्नके उपहारको प्रिय से भी अधिक सौन्दर्य-श्रीसे सम्पन्न; ३८३. इक्षुचाप- | माननेवाले ॥ ७५ ॥ निषेवितः—इक्षुमय चापकी अधिष्ठात्री देवी अथवा | ४०३. उन्नताननः—उत्कृष्ट ब्रह्मा आदि देवोंको कामदेवसे सेवित; ३८४. इन्द्रगोपसमानश्रीः—इन्द्रगोप | प्राणवान् करनेवाले; ४०४. उत्तुङ्गः—वराहरूपधारी (बीरबहूटी नामक कीट)-के समान अरुण कान्तिवाले; | भगवान्की दाढ़से तुंगा—नामवाली एक नदी प्रकट हुई, ३८५. इन्द्रनीलसमद्युतिः*—इन्द्रनीलमणिके समान श्याम | जिससे वे भगवान् 'उत्तुंग' कहलाये। उनसे अभिन्न कान्तिवाले ॥ ७२ ॥ | होनेके कारण गणेशजीका भी नाम 'उत्तुंग' है; ४०५.

  • कामनाभेदसे भिन्न रूप-रंगमें गणेशजीका ध्यान होता है। अथवा भिन्न-भिन्न युगोंमें अवतार लेकर वे अरुण एवं श्याम-कान्ति धारण करते हैं। (खद्योतभाष्य)

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१४४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उदारत्रिदशाग्रणीः—उदार देवताओंमें श्रेष्ठ; ४०६. ऊर्जस्वान्—तेजस्वी; ४०७. ऊष्मलमदः—गण्डस्थलसे गर्म-गर्म मदजल बहानेवाले; ४०८. ऊहापोहदुरासदः—ऊह (वितर्क) और अपोह (उसके बाध)-से दुष्प्राप्य ॥ ७६ ॥ ओजस्वान्—शौर्य और उत्कर्षके कारणभूत तेजसे सम्पन्न; ४२९. ओषधीपतिः—ओषधियोंके स्वामी चन्द्रमारूप; ४३०. औदार्यनिधिः—उदारताके सिन्धु; ४३१. औद्धत्यधुर्यः—अपने भक्तोंपर कृपा करनेके लिये उनके सामने अपना उत्कर्ष प्रकट करनेमें श्रेष्ठ; ४३२. औन्नत्यनिस्वनः—सबकी अपेक्षा उच्चस्वरसे गर्जना करनेवाले ॥ ८१ ॥ ४०९. ऋग्यजुस्सामसम्भूतिः—अपने निःश्वाससे ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदको प्रकट करनेवाले; ४१०. ऋद्धिसिद्धिप्रवर्तकः—राज्य-सम्पत्ति तथा अणिमा आदि सम्पत्तियोंको देनेवाले; ४११. ऋजुचित्तैकसुलभः—एकमात्र सरलचित्त—निर्मल मनसे ही सुलभ होनेवाले; ४१२. ऋणत्रयविमोचकः—देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण—इन तीनोंसे छुटकारा दिलानेवाले ॥ ७७ ॥ ४३३. सुरनागानामङ्कुशः—देवलोक, मर्त्यलोक और पाताललोक—तीनोंको अपने नियन्त्रणमें रखनेवाले; ४३४. सुरविद्विषामङ्कुशः—देवताओं और विद्वानोंके द्वेषियोंको दण्डित करनेवाले; ४३५. समस्तविसर्गान्तपदेषु परिकीर्तितः अः—'अ' से लेकर 'क्ष' पर्यन्त जो ५१ अक्षर हैं, उनके अन्तमें विसर्ग लगानेपर जिसका उच्चारण होता है, वह 'अः' गणेशजीका एक नाम है ॥ ८२ ॥ ४१३. स्वभक्तानां लुप्तविघ्नः—अपने भक्तजनोंका विघ्न नष्ट करनेवाले; ४१४. सुरद्विषां लुप्तशक्तिः—देवद्रोही दैत्योंकी शक्ति नष्ट करनेवाले; ४१५. विमुखार्चानां लुप्तश्रीः—अपनी पूजासे विमुख या विरुद्ध रहनेवालोंकी धन-सम्पत्तिका नाश करनेवाले; ४१६. लूतास्फोटनाशनः—मकड़ी और फोड़े-फुंसी आदि रोगोंका नाश करनेवाले ॥ ७८ ॥ ४३६. कमण्डलुधरः—कमण्डलु धारण करनेवाले; अथवा सूँड़से अमृतकलश धारण करनेवाले; ४३७. कल्पः—प्रलयकालस्वरूप; अथवा निर्माणमें समर्थ; ४३८. कपर्दी—कौड़ी अथवा जटाजूट धारण करनेवाले; ४३९. कलभाननः—नाद, कान्ति और प्राणशक्तिसे सम्पन्न; ४४०. कर्मसाक्षी—अदृष्ट कर्मोंके भी साक्षी; ४४१. कर्मकर्ता—कर्मठ पुरुषोंके अन्तःप्रेरक होनेके कारण स्वयं ही कर्म करनेवाले; ४४२. कर्माकर्मफलप्रदः—स्वर्ग और मोक्षरूप फल देनेवाले ॥ ८३ ॥ ४१७. एकारपीठमध्यस्थः—त्रिकोणचक्रके मध्य-भागमें विराजमान; ४१८. एकपादकृतासनः—काशीमें एक पैरसे खड़े रहनेवाले; ४१९. एजिताखिलदैत्यश्रीः—समस्त असुरोंकी राज्य-लक्ष्मीको कम्पित कर देनेवाले; ४२०. एधिताखिलसंश्रयः—अपनी शरण लेनेवाले भक्तोंकी श्रीवृद्धि करनेवाले ॥ ७९ ॥ ४४३. कदम्बगोलकाकारः—समस्त नाड़ियोंका जो उद्गम-स्थान है, वहाँ कदम्ब-पुष्पके समान गोल आकारका कोई देवता है, जो गणेशजीसे अभिन्न है; ४४४. कूष्माण्डगणनायकः—दुष्ट ग्रहोंके नायक अर्थात् उन्हें नियन्त्रणमें रखनेवाले; ४४५. कारुण्यदेहः—करुणामूर्ति; ४४६. कपिलः-कपिलमुनिस्वरूप; ४४७. कथकः—सम्प्रदायप्रवर्तक; ४४८. कटिसूत्रभृत्—कांची धारण करनेवाले ॥ ८४ ॥ ४२१. ऐश्वर्यनिधिः—ऐश्वर्यके आधार अथवा भक्तोंके यहाँ ऐश्वर्य स्थापित करनेवाले; ४२२. ऐश्वर्यम्—ईश्वरकोटिके पुरुषोंमें ऐश्वर्यरूपा अणिमा आदि विभूतिरूप; ४२३. ऐहिकामुष्मिकप्रदः—लौकिक और पारलौकिक सुख देनेवाले; ४२४. ऐरम्मदसमोन्मेषः—जिनकी दृष्टिका उन्मेष (खोलना) विद्युत्के समान प्रकाशमान है, वे; ४२५. ऐरावतनिभाननः—ऐरावत हाथीके समान मुखवाले ॥ ८० ॥ ४४९. खर्वः—वामनरूप; ४५०. खड्गप्रियः—खड्ग (तलवार या गैंडा) जिन्हें प्रिय है; ४५१. खड्गखान्तान्तस्थः—खड्ग-शब्दगत खकारसे परे जो डकार है, उससे परे जो गकार है, वह गणेशजीका ४२६. ओंकारवाच्यः—ओंकार अर्थात् प्रणवके वाच्यार्थरूप; ४२७. ओंकारः—ओंकार-नामवाले; ४२८.

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] बीजाक्षर है, उसमें विद्यमान; ४५२. खनिर्मलः- आकाशकी भाँति सर्वगत होते हुए निर्लिप्त; ४५३. खल्वाटशृङ्गनिलयः-वृक्षविहीन पर्वतके शिखरपर निवास करनेवाले; ४५४. खट्वाङ्गी-खट्वांग नामसे प्रसिद्ध अस्त्र धारण करनेवाले; ४५५. खदुरासदः-आकाशकी भाँति पकड़में न आ सकनेवाले ॥ ८५ ॥ ४५६. गुणाढ्यः-अनन्त कल्याणमय गुणगणसे सम्पन्न; ४५७. गहनः-जहाँ जाना या पहुँचना सम्भव न हो सके, वे; ४५८. गस्थः-अपने बीजस्वरूप गकारमें स्थित; ४५९. गद्यपद्यसुधार्णवः-गद्य-पद्यरूप काव्यरसामृतके सागर; ४६०. गद्यगानप्रियः-गद्य- सामगानके प्रेमी; ४६१. गर्जः-मेघगर्जनस्वरूप; ४६२. गीतगीर्वाणपूर्वजः-नादसे गीत आदि शब्द प्रकट हुए हैं और नादके अर्थसे देवता आदि; अतः नाद और नादार्थस्वरूप होनेके कारण गीत और देवताओंके पूर्वज ॥ ८६ ॥ ४६३. गुह्याचाररतः-हृदयगुहामें प्रविष्ट जीवात्मा और परमात्माके चिन्तनमें लगे हुए अन्तर्मुख साधकपर संतुष्ट रहनेवाले; ४६४. गुह्यः-एकान्तमें जाननेयोग्य; अथवा गुह-कार्तिकेयके हितकारी; ४६५. गुह्यागम- निरूपितः-गुह्य अर्थात् एकान्तवेद्य होनेके कारण 'गुह्यागमनिरूपित' के नामसे प्रसिद्ध; ४६६. गुहाशयः- हृदयगुहामें शयन करनेवाले अन्तर्यामी पुरुष; ४६७. गुहाब्धिस्थः-अव्याकृत आकाश गूढ़ और अगाध होनेके कारण गुहाब्धिके तुल्य है, उसमें विराजमान; ४६८. गुरुगम्यः-गुरुके बताये हुए योग या उपायसे प्राप्तव्य; ४६९. गुरोर्गुरुः-ब्रह्मा आदिको भी वेदका ज्ञान देनेवाले होनेके कारण गुरुके भी गुरु ॥ ८७ ॥ ४७०. घण्टाघर्घरिकामाली-घण्टाकी तरह मनोहर शब्द करनेवाली किंकिणीको 'घर्घरिका' कहते हैं। बालोचित क्रीड़ाके समय उसकी माला धारण करनेवाले; ४७१. घटकुम्भः-उलटे रखे हुए दो घड़ोंके समान दो कुम्भस्थलवाले; ४७२. घटोदरः-घटके समान विशाल उदरवाले; ४७३. चण्डः-प्रचण्ड पराक्रमी; ४७४. चण्डेश्वरसुहृत्-शिव-पार्षद चण्डेश्वरके सखा; ४७५.

[दायाँ स्तम्भ] चण्डीशः-चण्डीनाथ शिव; ४७६. चण्डविक्रमः- अत्यन्त क्रोधशील दुष्टोंपर आक्रमण करके उन्हें वशमें करनेवाले ॥ ८८ ॥ ४७७. चराचरपतिः-स्थावर-जंगम जगत्के स्वामी; ४७८. चिन्तामणिचर्वणलालसः-अपनी अतिशय उदारताके कारण चिन्तामणि, कामधेनु और कल्पवृक्षके गर्वको चूर्ण करनेकी लालसावाले; ४७९. छन्दः-गायत्री आदि छन्दःस्वरूप; ४८०. छन्दोवपुः- छन्दोमय शरीरवाले; ४८१. छन्दोदुर्लक्ष्यः-वेदसे भी कठिनतापूर्वक लक्षित होनेवाले; ४८२. छन्दविग्रहः- अपनी इच्छाके अनुसार या भक्तोंकी भावनाके अनुकूल अवतार-शरीर धारण करनेवाले ॥ ८९ ॥ ४८३. जगद्योनिः-जगत्के कारण; ४८४. जगत्साक्षी-जगत्के साक्षी या द्रष्टा; ४८५. जगदीशः- जगत्के स्वामी या रक्षक; ४८६. जगन्मयः-जगत्स्वरूप या जगत्के अधिष्ठान; ४८७. जपः-जपकर्मरूप; ४८८. जपपरः-जपकर्ता; ४८९. जप्यः-जपनीय मन्त्ररूप; ४९०. जिह्वासिंहासनप्रभुः-जिनके नाम-कीर्तनके समय जो भक्तके जिह्वारूपी सिंहासनपर विराजमान रहते हैं, वे ॥ ९० ॥ ४९१. झलज्झलोल्लसद्दानझङ्कारिभ्रमराकुलः- कानोंके हिलानेसे उड़-उड़कर मदजलके आस-पास झंकार-रव करनेवाले भ्रमरोंसे व्याप्त; ४९२. टंकारस्फारसंरावः-काँसेकी घण्टी या थालीके बजनेसे होनेवाले रण-रणनात्मक रवके समान जिनके आभूषणकी झनकार होती है, वे; ४९३. टंकारिमणिनूपुरः-बजते हुए रत्नमय पादकटककी ध्वनि फैलानेवाले ॥ ९१ ॥ ४९४. ठद्वयीपल्लवान्तःस्थसर्वमन्त्रैकसिद्धिदः- सम्पूर्ण स्वाहान्त मन्त्रोंके एकमात्र सिद्धिदाता; ४९५. डिण्डिमुण्डः-उलटकर रखे हुए नगाड़ेके समान कुम्भ- स्थलवाले; ४९६. डाकिनीशः-योगिनियोंके ईश्वर; ४९७. डामरः-डामर नामक तन्त्रस्वरूप; ४९८. डिण्डिम- प्रियः-डिण्डिम-घोष या दुन्दुभिकी ध्वनिसे प्रसन्न होनेवाले ॥ ९२ ॥ ४९९. ढक्कानिनादमुदितः-पटहध्वनिसे प्रसन्न;

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१४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ५००. ढौकः—सर्वगत; अथवा सर्वज्ञ; ५०१. दुण्ढिविनायकः—विशिष्ट नायकके रूपमें अन्वेषणीय; ५०२. तत्त्वानां परमं तत्त्वम्—तत्त्वोंमें परम (छब्बीसवें) तत्त्वरूप; ५०३. तत्त्वंपदनिरूपितः—'तत्-पदार्थ' और 'त्वम्-पदार्थ' की एकताद्वारा निरूपित ॥ ९३ ॥ ५०४. तारकान्तरसंस्थानः—आँखकी पुतलीमें चिन्तन करनेयोग्य; ५०५. तारकः—प्रणवकी भाँति भवसागरसे पार करनेवाले; ५०६. तारकान्तकः— तारकासुरका संहार करनेवाले; ५०७. स्थाणुः—सुस्थिर; सर्वथा अकम्पित; ५०८. स्थाणुप्रियः—शिवके प्रिय पुत्र; ५०९. स्थाता—युद्धमें दृढ़तापूर्वक डटे रहनेवाले; ५१०. स्थावरं जङ्गमं जगत्—चराचर जगत्स्वरूप ॥ ९४ ॥ ५११. दक्षयज्ञप्रमथनः—दक्ष प्रजापतिके यज्ञका विध्वंस करनेवाले शिवरूप; ५१२. दाता—दानी अथवा शोधक*—पतितपावन; ५१३. दानवमोहनः—दानवोंको मोहित (तत्त्वविमुख) करनेवाले; ५१४. दयावान्— दयालु; ५१५. दिव्यविभवः—लक्ष्मीकी प्राप्ति करानेवाले; अथवा दिव्य वैभवसे सम्पन्न; ५१६. दण्डभृत्— दण्डनीतिके पालक; ५१७. दण्डनायकः—दण्डके प्रवर्तक ॥ ९५ ॥ ५१८. दन्तप्रभिन्नाभ्रमालः—सिर हिलानेमात्रसे दन्ताघातके द्वारा बादलोंकी पंक्तिको छिन्न-भिन्न कर देनेवाले; ५१९. दैत्यवारणदारणः—दैत्योंको रोकने और विदीर्ण करनेवाले; ५२०. दंष्ट्रालग्नद्विपघटः— जिनके दाढ़के एक देशमें भी शत्रुओंके हाथियोंका समुदाय संलग्न है, ऐसे; ५२१. देवार्थनृगजाकृतिः— देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मनुष्य और हाथीकी आकृति स्वीकार करनेवाले ॥ ९६ ॥ ५२२. धनधान्यपतिः—धन और धान्यके स्वामी तथा दाता; ५२३. धन्यः—धनसे सम्पन्न एवं पुण्यवान्; ५२४. धनदः—धनके दाता; अथवा कुबेरस्वरूप; ५२५. धरणीधरः—शेषनाग तथा आदिवराहके रूपमें पृथ्वीको धारण करनेवाले; ५२६. ध्यानैकप्रकटः—एकमात्र ध्यानमें ही प्रकट होनेवाले; ५२७. ध्येयः—ध्यानमें द्रष्टव्य; ५२८. ध्यानम्—ध्यानस्वरूप; ५२९. ध्यानपरायणः— ध्यानमें संलग्न रहनेवाले ॥ ९७ ॥ ५३०. नन्द्यः—आनन्दनीय; ५३१. नन्दिप्रियः— नन्दिकेश्वरके प्रिय; ५३२. नादः—नादानुसन्धानसे प्राप्त होनेवाले नादस्वरूप; ५३३. नादमध्यप्रतिष्ठितः— नादमें प्रतिष्ठित; ५३४. निष्कलः—अवयवरहित; ५३५. निर्मलः—दोषरहित; ५३६. नित्यः—नाशरहित; ५३७. नित्यानित्यः—आकाश और पृथ्वी आदि नित्य एवं अनित्य रूप धारण करनेवाले; ५३८. निरामयः— अविद्यारूपी महारोगसे शून्य ॥ ९८ ॥ ५३९. परं व्योम—अव्याकृत आकाश या नित्य धामस्वरूप; ५४०. परं धाम—ज्योतिके ज्योतिःस्वरूप; ५४१. परमात्मा—सम्पूर्ण जीवोंसे उत्कृष्ट आत्मा— पुरुषोत्तम; ५४२. परं पदम्—परमपदरूप; ५४३. परात्परः—परसे भी पर—ब्रह्मा, विष्णु और महेशसे भी उत्तम; ५४४. पशुपतिः—ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त समस्त जीवोंके पालक; ५४५. पशुपाशविमोचकः— पशुओं (जीवों)-को विविध पाशों (बन्धनों)-से छुटकारा दिलानेवाले ॥ ९९ ॥ ५४६. पूर्णानन्दः—क्रिया, कर्ता और कर्मके भेदसे रहित परिपूर्ण सुखस्वरूप; ५४७. परानन्दः— भूलोकसे लेकर शतगुणोत्तर बढ़े हुए ब्रह्मलोकपर्यन्तके सम्पूर्ण आनन्दोंको नीचा करके सबसे उत्कृष्ट परमानन्द— महासुखस्वरूप; ५४८. पुराणपुरुषोत्तमः—क्षर-अक्षरसे भी उत्तम एवं अनादि होनेके कारण पुराणपुरुषोत्तम; ५४९. पद्मप्रसन्ननयनः—प्रफुल्ल कमलके समान उल्लासयुक्त नेत्रवाले; ५५०. प्रणताज्ञानमोचनः— शरणागत सेवकोंको तत्त्वज्ञान देकर उनके अज्ञानका निवारण करनेवाले ॥ १०० ॥ ५५१. प्रमाणप्रत्ययातीतः—प्रमाणजनित प्रतीतियोंसे ऊपर उठे हुए नित्यज्ञानैकस्वरूप; ५५२. प्रणतार्ति- निवारणः—प्रणतजनोंकी पीड़ाको दूर कर देनेवाले; ५५३. फलहस्तः—भक्तजनोंको अविलम्ब फल देनेके कारण मानो समस्त फलोंको हाथमें ही लिये रहनेवाले;

  • शोधनार्थक 'दै' धातुसे 'दाता' बनता है।

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४७ ५५४. फणिपतिः—शेष और वासुकि नागके भी स्वामी; ५५५. फेत्कारः—फेत्कार-तन्त्रस्वरूप; ५५६. फाणितप्रियः—फाणित अर्थात् खाँडके प्रेमी ॥ १०१ ॥ ५५७. बाणार्चिताङ्घ्रियुगलः—बाणासुरसे पूजित युगल चरणवाले; ५५८. बालकेलिकुतूहली—बालोचित क्रीड़ाके लिये उत्सुक; ५५९. ब्रह्म—परब्रह्मस्वरूप; ५६०. ब्रह्मार्चितपदः—ब्रह्माजीसे पूजित चरणवाले; अथवा वेदपूजित पदवाले; ५६१. ब्रह्मचारी—ब्रह्मचर्यनिष्ठ; ५६२. बृहस्पतिः—देवगुरु बृहस्पतिरूप ॥ १०२ ॥ ५६३. बृहत्तमः—बड़ेसे भी बड़े; ५६४. ब्रह्मपरः— ब्रह्माजीसे भी श्रेष्ठ; अथवा एकमात्र वेदके ही अनुशीलनमें तत्पर; ५६५. ब्रह्मण्यः—ब्राह्मणोंको मान देनेवाले; अथवा उनके हितकारी; ५६६. ब्रह्मवित्प्रियः—ब्रह्म-वेत्ताओंके प्रिय; अथवा ब्रह्मवेत्ताओंको प्रिय माननेवाले; ५६७. बृहन्नादाग्रयचीत्कारः—मेघोंकी गर्जना और बिजलीकी गड़गड़ाहटसे भी अधिक उच्चस्वरसे चीत्कार या गर्जना करनेवाले; ५६८. ब्रह्माण्डावलिमेखलः—कटिसूत्रमें किंकिणीकी भाँति समस्त ब्रह्माण्डोंको ही गूँथ लेनेवाले; अथवा विराट्‌रूपधारी ॥ १०३ ॥ ५६९. भ्रूक्षेपदत्तलक्ष्मीकः—भक्तोंको भौंहोंके संकेतमात्रसे लक्ष्मी (धन-सम्पत्ति) प्रदान करनेवाले; ५७०. भर्गः—तेजःस्वरूप; ५७१. भद्रः—भद्रजातीय गजरूप; ५७२. भयापहः—भयके नाशक; ५७३. भगवान्— षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न; ५७४. भक्तिसुलभः— भक्तिके द्वारा ही सुगमतापूर्वक प्राप्य; ५७५. भूतिदः— अष्टसिद्धियोंके दाता; ५७६. भूतिभूषणः—भस्म धारण करनेवाले ॥ १०४ ॥ ५७७. भव्यः—कल्याणस्वरूप; ५७८. भूता- लयः—पंचभूतों, भूत-प्रेत आदिकों तथा समस्त भूत- प्राणियोंके अधिष्ठान; ५७९. भोगदाता—प्राणियोंके कर्मानुसार दुःख और सुखका अनुभव करानेवाले; ५८०. भ्रूमध्यगोचरः—भौंहोंके मध्यभागमें ध्येय; ५८१. मन्त्रः—विविध मन्त्रस्वरूप; ५८२. मन्त्रपतिः—मन्त्रणाके अधिकारी, पालक एवं प्रवर्तक; ५८३. मन्त्री— राज्यसंचालनोपयोगी मन्त्रशक्तिके अधिष्ठाता; ५८४. मदमत्तमनोरमः—समाधिजनित आनन्दसे मत्त हृदयमें ध्येयरूपसे रमण करनेवाले ॥ १०५ ॥ ५८५. मेखलावान्—करधनीसे विभूषित कटिप्रदेश- वाले; ५८६. मन्दगतिः—मन्द पुरुषोंके भी आश्रयदाता; ५८७. मतिमत्कमलेक्षणः—सद्बुद्धि देनेवाले कमलोपम नेत्रोंसे युक्त; ५८८. महाबलः—महाबलसे सम्पन्न; ५८९. महावीर्यः—महापराक्रमी; ५९०. महाप्राणः— महान् प्राणशक्तिसे सम्पन्न; ५९१. महामनाः—महा- मनस्वी ॥ १०६ ॥ ५९२. यज्ञः—यज्ञस्वरूप; ५९३. यज्ञपतिः— यज्ञोंके स्वामी; ५९४. यज्ञगोप्ता—यज्ञोंके संरक्षक; ५९५. यज्ञफलप्रदः—यज्ञफलके दाता; ५९६. यश- स्करः—सुयशका विस्तार करनेवाले; ५९७. योगगम्यः— योगसे प्राप्तव्य; ५९८. याज्ञिकः—यज्ञकर्ता; ५९९. याजकप्रियः—यज्ञ करानेवालोंके प्रेमी ॥ १०७ ॥ ६००. रसः—परमानन्दस्वरूप; ६०१. रसप्रियः— मधुर आदि रसोंमें प्रीति रखनेवाले; ६०२. रस्यः— आस्वादके विषय; ६०३. रञ्जकः—दूसरोंके मनका अनुरंजन करनेवाले; ६०४. रावणार्चितः—दशमुख रावणके द्वारा भी पूजित; ६०५. रक्षोरक्षाकरः— राक्षसोंको जलाकर राख कर देनेवाले; अथवा अपनी आराधना करनेवाले राक्षसोंके रक्षक; ६०६. रत्नगर्भः— पृथ्वीके आश्रय; ६०७. राजसुखप्रदः—राज-सम्बन्धी सुख देनेवाले ॥ १०८ ॥ ६०८. लक्ष्यम्—प्रणवरूपी धनुषके द्वारा चित्तरूपी बाणसे वेधनेयोग्य ब्रह्म; ६०९. लक्ष्यप्रदः—निर्विघ्नतापूर्वक लक्ष्यकी प्राप्ति करानेवाले; ६१०. लक्ष्यः—‘तत्त्वमसि’— इत्यादि महावाक्यगत पदोंद्वारा लक्षणाशक्तिसे बोध्य; ६११. लयस्थः—प्रलयकालमें भी स्थित रहनेवाले; अथवा चित्तलयकी स्थितिमें विद्यमान; ६१२. लड्डुक- प्रियः—लड्डूसे प्रसन्न रहनेवाले; ६१३. लानप्रियः— गजशालामें प्रीति रखनेवाले; ६१४. लास्यपरः— विलासयोग्य परमधामवाले; ६१५. लाभकृल्लोक- विश्रुतः—लाभकारी (भक्तोंको शीघ्र वरदान देनेवाले) लोगोंमें श्रेष्ठताके लिये विख्यात ॥ १०९ ॥

१४८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ६१६. वरेण्यः—गणपतिभक्त राजा वरेण्यसे अभिन्न; | करनेवाले ॥ ११४॥ ६१७. वह्निवदनः—अग्निरूप मुखवाले; ६१८. वन्द्यः— | ६४६. साक्षी—विश्वको साक्षात् देखनेवाले; ६४७. वन्दनीय; ६१९. वेदान्तगोचरः—उपनिषद्गम्य; ६२०. | समुद्रमथनः—समुद्रमन्थनकालमें देवताओंद्वारा सर्वप्रथम विकर्ता—छः भावविकारोंके प्रवर्तक; ६२१. | पूजित; ६४८. स्वसंवेद्यः—स्वयंज्योतिःस्वरूप; ६४९. विश्वतश्चक्षुः—सब ओर नेत्रवाले; ६२२. विधाता— | स्वदक्षिणः—स्वयं समर्थ; ६५०. स्वतन्त्रः—अपराधीन; स्रष्टा; ६२३. विश्वतोमुखः—सब ओर मुखवाले ॥ ११० ॥ | ६५१. सत्यसंकल्पः—कभी व्यर्थ न जानेवाले संकल्पसे ६२४. वामदेवः—सुन्दर देवता; अथवा शिवस्वरूप; | युक्त; ६५२. सामगानरतः—साममन्त्रोंके गानमें संलग्न; ६२५. विश्वनेता—जगत्के नायक; ६२६. वज्रिवज्र- | ६५३. सुखी—सुखका अनुभव करनेवाले ॥ ११५ ॥ निवारणः—इन्द्रके वज्रको स्तम्भित कर देनेवाले; ६२७. | ६५४. हंसः—यति-विशेषरूप; अथवा सूर्यरूप; विश्वबन्धनविष्कम्भाधारः—विश्वकी सृष्टिके लिये | ६५५. हस्तिपिशाचीशः—हस्तिपिशाचीश नामक पर्याप्त देशको 'विष्कम्भ' कहते हैं। उसके भी आधार; | नवाक्षरमन्त्रके देवता; ६५६. हवनम्—आहुतिस्वरूप; ६२८. विश्वेश्वरप्रभुः—सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों और उनके | ६५७. हव्यकव्यभुक्—हव्य-कव्यके भोक्ता देवता- अधीश्वरोंके भी ईश्वर ॥ १११ ॥ | पितृस्वरूप; ६५८. हव्यः—हविष्यरूप; ६५९. हुतप्रियः— ६२९. शब्दब्रह्म—परावाणीसे अतीत नादरूपधारी; | आहुतिमें दिये गये द्रव्यके प्रेमी; ६६०. हर्षः— ६३०. शमप्राप्यः—मनोनिग्रहसे प्राप्तव्य; ६३१. | आनन्दस्वरूप; ६६१. हल्लेखामन्त्रमध्यगः—हल्लेखा- शम्भुशक्तिगणेश्वरः—शैवों और शाक्तोंके समुदायके | मन्त्रके मध्यवर्ती—ह्रींकारवाच्य ॥ ११६ ॥ ईश्वर; ६३२. शास्ता—'शास्ता' नामसे प्रसिद्ध केरलदेशीय | ६६२. क्षेत्राधिपः—प्रयाग आदि क्षेत्रों अथवा देवतास्वरूप; अथवा बुद्धरूप; ६३३. शिखाग्रनिलयः— | शरीर आदिके स्वामी; ६६३. क्ष्माभर्ता—पृथ्वी अथवा शास्ताके शिखाग्रभागमें निवास करनेवाले; ६३४. | क्षमाको धारण करनेवाले; ६६४. क्षमापरपरायणः— शरण्यः—रक्षक; ६३५. शिखरीश्वरः—हिमालय- | क्षमाशील मुनियोंके प्राप्य; ६६५. क्षिप्रक्षेमकरः—शीघ्र स्वरूप ॥ ११२ ॥ | सिद्धि प्रदान करनेवाले; ६६६. क्षेमानन्दः—क्षेम और ६३६. षडृतुकुसुमस्त्रग्वी—छहों ऋतुओंमें | आनन्दस्वरूप; ६६७. क्षोणीसुरद्रुमः—भूतलपर खिलनेवाले पुष्पोंकी मालासे अलंकृत; ६३७. षडाधारः— | कल्पवृक्षके समान समस्त मनोरथोंके दाता ॥ ११७ ॥ छहों चक्रोंके आधारभूत मूलाधार-चक्रस्वरूप; ६३८. | ६६८. धर्मप्रदः—धर्म प्रदान करनेवाले, ६६९. षडक्षरः—छः अक्षरोंवाले वक्रतुण्ड-मन्त्रस्वरूप; ६३९. | अर्थदः—धन देनेवाले; ६७०. कामदाता—कामप्रद; संसारवैद्यः—भवरोगका नाश करनेवाले; ६४०. सर्वज्ञः— | ६७१. सौभाग्यवर्धनः—स्त्रियोंको सौभाग्यवृद्धिका वर सब कुछ जाननेवाले; अथवा बुद्धस्वरूप; ६४१. सर्वभेषज- | देनेवाले; ६७२. विद्याप्रदः—ज्ञानदाता; ६७३. विभवदः— भेषजम्—समस्त रोगोंकी दवा दिव्य अमृतके भी | सम्पत्तिदाता; ६७४. भुक्तिमुक्तिफलप्रदः—भोग और दोषनिवारक ॥ ११३ ॥ | मोक्षरूप फल देनेवाले ॥ ११८ ॥ ६४२. सृष्टिस्थितिलयक्रीडः—जगत्की सृष्टि, | ६७५. आभिरूप्यकरः—विद्वत्ता एवं सुन्दरता पालन और संहार जिनकी लीलाएँ हैं, वे; ६४३. | प्राप्त करानेवाले; ६७६. वीरश्रीप्रदः—नामस्मरण करनेवाले सुरकुञ्जरभेदनः—दानवसे पूजित होकर देवश्रेष्ठोंमें | भक्तोंको वीरोचित लक्ष्मी प्रदान करनेवाले; ६७७. भेद उत्पन्न करनेवाले; अथवा देवराजके भेदक; ६४४. | विजयप्रदः—विजय देनेवाले; ६७८. सर्ववश्यकरः— सिन्दूरितमहाकुम्भः—सिन्दूरसे अरुण मस्तकवाले; ६४५. | सबको भक्तके वशमें कर देनेवाले; ६७९. गर्भदोषहा— सदसद्व्यक्तिदायकः—अपने भक्तोंको सदसद्विवेक प्रदान | गर्भस्राव या गर्भपात आदि बीजदोषोंको नष्ट करनेवाले;

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ६८०. पुत्रपौत्रदः—पुत्र और पौत्र प्रदान करनेवाले ॥ ११९ ॥ | ७०९. राशिः—मेष आदि द्वादश राशिरूप; ७१०. ६८१. मेधादः—धारणावती बुद्धि प्रदान करनेवाले; | तारा—कृत्तिका आदि नक्षत्ररूप; ७११. तिथिः—चन्द्रमाकी ६८२. कीर्तिदः—लोकमें कीर्ति देनेवाले; ६८३. | पन्द्रह कलाओंमेंसे एक; ७१२. योगः—अमृतसिद्धि एवं शोकहारी—ज्ञानदान करके शोक-मोहको हर लेनेवाले; | आनन्द आदि योगरूप; ७१३. वारः—रविवार आदि ६८४. दौर्भाग्यनाशनः—स्त्रियोंके विधवापन आदि | सप्तदिनस्वरूप; ७१४. करणम्—'बव' आदि करणरूप; दुर्भाग्यसूचक दोषोंको नष्ट करनेवाले; ६८५. प्रतिवादि- | ७१५. अंशकम्—अंशस्वरूप; ७१६. लग्नम्—मेष आदि मुखस्तम्भः—प्रतिकूल बोलनेवाले दुष्टोंका मुख बन्द | राशियोंका उदय; ७१७. होरा—अर्धलग्न; ७१८. काल- कर देनेवाले; ६८६. रुष्टचित्तप्रसादनः—कुपित हुए राजा | चक्रम्—शिशुमारचक्रस्वरूप; ७१९. मेरुः—सुवर्णमय आदिके चित्तको प्रसन्न (स्नेहयुक्त) करनेवाले ॥ १२० ॥ | पर्वतरूप; ७२०. सप्तर्षयः—कश्यप आदि सात ऋषिरूप; ६८७. पराभिचारशमनः—दूसरोंके द्वारा किये | ७२१. ध्रुवः—उत्तानपादके पुत्ररूप ॥ १२३ ॥ गये मारण आदि उपायोंको शान्त करनेवाले; ६८८. | ७२२. राहुः—राहु नामक ग्रह; ७२३. मन्दः— दुःखभञ्जनकारकः—सब दुःखोंको दूर कर देनेवाले; | शनैश्चर; ७२४. कविः—शुक्र; ७२५. जीवः—बृहस्पति; ६८९. लवः—लवस्वरूप; ६९०. त्रुटिः—सहस्रलव- | ७२६. बुधः—बुध; ७२७. भौमः—मंगल; ७२८. शशी— जनित काल; (यहाँ यह परिभाषा समझ लेनी चाहिये— | सोम; ७२९. रविः—सूर्य; ७३०. कालः—जगत्का संहार सौ त्रुटियोंका एक तत्पर होता है, तीस तत्परोंका एक | करनेवाले; ७३१. सृष्टिः—सृष्टिक्रियारूप; ७३२. स्थितिः— निमेष होता है, अठारह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है | पालनकर्मरूप; ७३३. स्थावरं जङ्गमं विश्वम्—चराचर और तीस काष्ठाओंकी एक कला होती है।) ६९१. | जगत्-रूप ॥ १२४ ॥ कला—तीस काष्ठाका समय; ६९२. काष्ठा—अठारह | ७३४. भूः—पृथ्वीरूप; ७३५. आपः—जलरूप; निमेषका समय; ६९३. निमेषः—तीस तत्परका काल; | ७३६. अग्निः—तेजःस्वरूप; ७३७. मरुत्—वायुरूप; ६९४. तत्परः—सौ त्रुटियोंका काल; ६९५. क्षणः— | ७३८. व्योम—आकाशरूप; ७३९. अहङ्कृतिः— तीस कलाओंका समय; ॥ १२१ ॥ | अहंकाररूप; ७४०. प्रकृतिः—जगत्का मूलकारण ६९६. घटी—छः क्षणका समय; ६९७. मुहूर्तम्— | अव्यक्त प्रकृतिरूप; ७४१. पुमान्—पुरुषरूप; ७४२. दो घटीका समय; ६९८. प्रहरः—चार मुहूर्तका समय; | ब्रह्मा—सृष्टिकर्ता; ७४३. विष्णुः—पालनकर्ता; ७४४. ६९९. दिवा—दिन (चार पहरका समय); ७००. | शिवः—शिव; ७४५. रुद्रः—संहारकर्ता; ७४६. ईशः— नक्तम्—रात्रि—चार पहरका समय; ७०१. अहर्निशम्— | ईशान; ७४७. शक्तिः—कामेश्वरी; ७४८. सदाशिवः— दिन-रात—आठ पहरका समय; ७०२. पक्षः—पन्द्रह | कामेश्वर शिव ॥ १२५ ॥ दिन-रातका समय; ७०३. मासः—दो पक्षोंका समय; | ७४९. त्रिदशाः—देवसमुदायरूप; ७५०. पितरः— ७०४. अयनम्—छः मासका समय; ७०५. वर्षम्—दो | पितृसमूह; ७५१. सिद्धाः—सिद्धसमुदाय; ७५२. यक्षाः— अयनोंका मानव वर्ष (तीन सौ साठ मानव वर्षका एक | यक्षवृन्द; ७५३. रक्षांसि—राक्षससमूह; ७५४. किन्नराः— दिव्य वर्ष होता है); ७०६. युगम्—बारह हजार दिव्य | किंनरवर्ग; ७५५. साध्याः—साध्यगण; ७५६. विद्याधराः— वर्षोंका चतुर्युग; ७०७. कल्पः—सहस्र चतुर्युगका एक | विद्याधरगण; ७५७. भूताः—भूतगण; ७५८. मनुष्याः— कल्प (जो ब्रह्माका एक दिन है); ७०८. महालयः— | मनुष्यगण; ७५९. पशवः—पशुगण; ७६०. खगाः— बहत्तर हजार कल्पोंका एक महाप्रलय होता है (जिसमें | पक्षिगण ॥ १२६ ॥ ब्रह्माका भी लय हो जाता है।) * ॥ १२२ ॥ | ७६१. समुद्राः—विभिन्न समुद्र; ७६२. सरितः—

  • 'लव' से लेकर 'महालय' तक सभी कालभेद महाकालस्वरूप गणपतिके अवयव हैं।

१५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- नदीसमुदाय; ७६३. शैलाः—पर्वतगण; ७६४.भूतम्— | ८०५. सत्यम्—त्रिकालमें अबाधित; ८०६. अणुः— अतीतकाल; ७६५. भव्यम्—भविष्यकाल; ७६६. | मन-इन्द्रियोंके अगोचर; ८०७. महान्—जिससे बढ़कर भवोद्भवः—जगत्की उत्पत्तिके कारण; ७६७. | कोई आनन्द नहीं है, तादृश भूमा; ८०८. स्वस्ति— साङ्ख्यम्—कपिलमुनिद्वारा प्रतिपादित शास्त्र; ७६८. | सम्यक् सत्तावान्; ८०९ हुम्—अपनेसे इतरका बाध पातञ्जलम्—पतंजलिप्रोक्त योगसूत्र; ७६९. योगः— | करनेके कारण हुम्-स्वरूप ब्रह्म; ८१०. फट्—इतर नागराज शेषद्वारा प्रतिपादित; ७७०. पुराणानि—'ब्राह्म' | सत्ताके भ्रमका नाश करनेवाले; ८११. स्वधा—श्राद्धरूप; आदि पुराणसमुदाय; ७७१. श्रुतिः—ऋग्वेद आदि; | ८१२. स्वाहा—यज्ञकर्मरूप; ८१३. श्रौषट्—श्रौषट्- ७७२. स्मृतिः—मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्र ॥ १२७ ॥ | कारोपलक्षित कर्मरूप; ८१४. वौषट्—वौषट्कारोपलक्षित ७७३. वेदाङ्गानि—व्याकरणादि छः वेदांगसमूह; | कर्मरूप; ८१५. वषट्—वषट्कारोपलक्षित कर्मरूप; ८१६. ७७४. सदाचारः—सदाचार-संग्रहात्मक ग्रन्थ; ७७५. | नमः—नमस्कारस्वरूप ॥ १३१ ॥ मीमांसा—सोलह अध्यायोंमें वर्णित कर्ममीमांसा— | ८१७. ज्ञानम्—मोक्षविषयक ज्ञानस्वरूप; ८१८. जैमिनिसूत्र तथा चार अध्यायोंमें कथित ब्रह्ममीमांसा; | विज्ञानम्—विज्ञानस्वरूप; ८१९. आनन्दः—आत्मानन्द- ७७६. न्यायविस्तरः—कणाद और गौतम मुनियोंके | स्वरूप; ८२०. बोधः—अन्तर्बोधरूप; ८२१. संवित्— द्वारा प्रतिपादित न्यायशास्त्र; ७७७. आयुर्वेदः— | बाह्य वृत्तियोंको निरस्त करनेवाला अन्तर्बोध; ८२२. शमः— धन्वन्तरिप्रोक्त उपवेद; ७७८. धनुर्वेदः—अस्त्रविद्या; | मनोनिग्रह; ८२३. यमः—इन्द्रियसंयम; ८२४. एकः— ७७९. गान्धर्वम्—संगीतशास्त्र; ७८०. काव्यनाटकम्— | एकमात्र अद्वितीय; ८२५. एकाक्षराधारः—एक अक्षर श्रव्य काव्य और दृश्य नाटक ॥ १२८ ॥ | 'ग'बीजमात्रमें स्थित रहनेवाले; ८२६. एकाक्षरपरायणः— ७८१. वैखानसम्—विष्णुप्रोक्त वैखानस-तन्त्र; | ॐ—इस एकाक्षरमात्रमें स्थित ॥ १३२ ॥ ७८२. भागवतम्—वैष्णवशास्त्र; ७८३. सात्त्वतम्— | ८२७. एकाग्रधीः—अपने-आपमें एकाग्र रहनेवाले सात्त्वततन्त्र; ७८४. पाञ्चरात्रकम्—पांचरात्र आगम | बुद्धिरूप; ८२८. एकवीरः—अद्वितीय वीर; ८२९. (ये चारों वैष्णवतन्त्र हैं); ७८५. शैवम्—शैवसन्त्र; | एकानेकस्वरूपधृक्—एक होते हुए भी अनेक रूप ७८६. पाशुपतम्—पाशुपतशास्त्र; ७८७. कालामुखम्— | धारण करनेवाले; ८३०. द्विरूपः—'पर' और 'अपर' कालामुखनामसे प्रसिद्ध तन्त्र; ७८८. भैरवशासनम्— | ब्रह्मरूपसे दो रूपवाले; ८३१. द्विभुजः—दो बाँहोंवाले; भैरवकथित शास्त्र (ये चारों शैवतन्त्र हैं) ॥ १२९ ॥ | ८३२. द्व्यक्षः—दो नेत्रोंवाले; ८३३. द्विरदः—दो दाँतोंवाले, ७८९. शाक्तम्—शक्तितन्त्र; ७९०. वैनायकम्— | गजरूप; ८३४. द्वीपरक्षकः—सप्तद्वीपाधिपतित्व प्रदान विनायकतन्त्र; ७९१. सौरम्—सूर्यप्रोक्त तन्त्र; ७९२. | करनेके कारण द्वीपके रक्षक ॥ १३३ ॥ जैनम्—जैनशास्त्र; ७९३. आर्हतसंहिता—आर्हतशास्त्र; | ८३५. द्वैमातुरः—उमा और गंगा—दो माताओंके ७९४. सत्—कारणरूपमें स्थित; ७९५. असत्—कार्यरूपमें | पुत्र; ८३६. द्विवदनः—अग्निरूप मुख तथा गजमुख स्थित; ७९६. व्यक्तम्—सर्वकार्यरूप; ७९७. अव्यक्तम्— | दोनोंसे युक्त होनेके कारण दो मुखवाले; ८३७. द्वन्द्वातीतः— कारणरूप; ७९८. सचेतनम्—सचेतन प्राणिमात्र; | सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्व-दुःखोंसे ऊपर उठे हुए; ८३८. ७९९. अचेतनम्—अचेतन आकाश आदि ॥ १३० ॥ | द्वयातिगः—रजोगुण और तमोगुण—दोनोंको लाँघ करके ८००. बन्धः—आत्मामें अनात्माका और अनात्मामें | विराजमान; ८३९. त्रिधामा—सूर्य, चन्द्र और अग्नि— आत्माका जो भ्रम है, तादृश भ्रमात्मक बन्धनरूप; ८०१. | इन त्रिविध तेजोंसे युक्त मूर्तिवाले; ८४०. त्रिकरः—तीनों मोक्षः—अज्ञाननाशरूप; ८०२. सुखम्—विशुद्धानन्द; | लोकोंके कर्ता; ८४१. त्रेतात्रिवर्गफलदायकः—त्रिविध ८०३. भोगः—अनुभव; ८०४. अयोगः—अनासक्त; | अग्निके चयनसे प्राप्त होनेवाले धर्म, काम और अर्थरूपी

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १५१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

१५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ८८०. षड्‌तर्कदूरः—छः दर्शनोंमें कथित तर्कोंके | आठ अंगोंसे युक्त योगके चित्तवृत्तिनिरोधरूप फल अगोचर—वाणीसे अतीत; ८८१. षट्कर्मनिरतः—यजन, | देनेवाले; ८९९. अष्टपत्राम्बुजासनः—अष्टदलकमलपर याजन, अध्ययन, अध्यापन, दान और प्रतिग्रह—इन छः | आसीन होनेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध; ९००. कर्मोंमें तत्पर रहनेवाले; ८८२. षड्रसाश्रयः—मधुर, | अष्टशक्तिसमृद्धश्रीः—आठ दलोंमें निवास करनेवाली अम्ल, लवण, कटु, कषाय और तिक्त—इन छः रसोंके | तीव्रा आदि आठ शक्तियोंसे सेवित होनेके कारण बढ़ी आधार; ८८३. सप्तपातालचरणः—तल, अतल, वितल, | हुई श्रीसे सम्पन्न; ९०१. अष्टैश्वर्यप्रदायकः—अणिमा सुतल, रसातल, महातल और पाताल—ये नीचेके सात | आदि आठ सिद्धियोंके दाता ॥ १४६ ॥ लोक जिनके चरणोंके आश्रित हैं, वे; ८८४. | ९०२. अष्टपीठोपपीठश्रीः—आठ महापीठ और सप्तद्वीपोरुमण्डलः—जम्बू आदि सात द्वीप जिनके | उपपीठोंकी श्री—सम्पत्तिसे युक्त; ९०३. अष्टमातृ- ऊरुमण्डलके आश्रित हैं, वे ॥ १४२ ॥ | समावृतः—ब्राह्मी आदि सात मातृकाओंके साथ जो ८८५. सप्तस्वर्लोकमुकुटः—भुवर्लोकसे लेकर | आठवीं महालक्ष्मी हैं, वे आठों आवरणदेवताके रूपमें गोलोकपर्यन्त सात स्वर्लोक जिनके मुकुट हैं, वे; ८८६. | जिन्हें घेरे रहती हैं, वे; ९०४. अष्टभैरवसेव्यः—बटुक सप्तसप्तिवरप्रदः—सूर्यको वर देनेवाले; ८८७. | आदि आठ भैरवोंसे सेव्य; ९०५. अष्टवसुवन्द्यः— सप्ताङ्गराज्यसुखदः—स्वामी, अमात्य, राष्ट्र, दुर्ग, कोष, | धरसे लेकर प्रभासतक आठ वसुओंसे वन्दनीय; ९०६. सेना और सुहृद्—इन सातों अंगोंसे युक्त राज्यका सुख | अष्टमूर्तिभृत्—अष्टमूर्तिधारी ॥ १४७ ॥ देनेवाले; ८८८. सप्तर्षिगणमण्डितः—कश्यप आदि सात | ९०७. अष्टचक्रस्फुरन्मूर्तिः—अष्टचक्रवाले यन्त्रमें ऋषियों तथा गण-देवताओंसे सेवित एवं सुशोभित ॥ १४३ ॥ | प्रकाशमान मूर्तिवाले; ९०८. अष्टद्रव्यहविःप्रियः— ८८९. सप्तच्छन्दोनिधिः—गायत्रीसे लेकर जगती- | ईख, सत्तू, चिउड़ा, कदली, मोदक, तिल, नारियल और पर्यन्त सात छन्दोंके आश्रय; ८९०. सप्तहोता—होतासे | घृतपक्व आदि पदार्थ—इन आठ द्रव्योंके हविष्यसे लेकर उद्गाता-पर्यन्त सात होता जिनके स्वरूप हैं, वे; | प्रसन्न होनेवाले; ९०९. नवनागासनाध्यासी—कर्कौटक ८९१. सप्तस्वराश्रयः—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, | आदि नौ नागोंके आसनपर बैठनेवाले; ९१०. नवनिध्यनु- पंचम, धैवत और निषाद—इन सात स्वरोंके आश्रय; | शासिता—नौ निधियोंपर अनुशासन रखनेवाले ॥ १४८ ॥ ८९२. सप्ताब्धिकेलिकासारः—सातों समुद्र जिनके | ९११. नवद्वारपुराधारः—नौ द्वारोंवाले पुर—शरीरको क्रीड़ा-सरोवर हैं, वे; ८९३. सप्तमातृनिषेवितः— | जीवात्मारूपसे धारण करनेवाले; ९१२. नवाधार- ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि सात मातृकाओंसे सेवित ॥ १४४ ॥ | निकेतनः—कुलाकुल, सहस्रार, मूलाधार, स्वाधिष्ठान, ८९४. सप्तच्छन्दोमोदमदः—पथ्यसंज्ञक सात | मणिपूर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और लम्बिका—इन छन्दोंके मोदजनक मदसे युक्त; ८९५. सप्तच्छन्दो- | नौ आधारोंमें निवास करनेवाले; ९१३. नवनारायण- मखप्रभुः—सप्त छन्दोंके यज्ञके स्वामी; ८९६. | स्तुत्यः—धर्मनारायण, आदिनारायण, अनन्तनारायण, अष्टमूर्तिध्येयमूर्तिः—अष्टमूर्ति-शिवसे ध्येय मूर्तिवाले; | बदरीनारायण, रूपनारायण, शंकरनारायण, सुन्दरनारायण, अर्थात् भगवान् शिव भी अपने हृदयमें जिनके स्वरूपका | लक्ष्मीनारायण और साध्यनारायण—इन नौ नारायणोंसे चिन्तन करते हैं, वे; ८९७. अष्टप्रकृतिकारणम्— | स्तुत्य; ९१४. नवदुर्गांनिषेवितः—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और | चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, अहंकार—इन आठ प्रकृतियोंकी उत्पत्तिके कारण ॥ १४५ ॥ | महागौरी और सिद्धिदात्री—इन नौ दुर्गाओंसे सेवित ॥ १४९ ॥ ८९८. अष्टाङ्गयोगफलभूः—यम, नियम, आसन, | ९१५. नवनाथमहानाथः—ज्ञान, प्रकाश, सत्य, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि—इन | आनन्द, विमर्श, स्वभाव, सुभग, प्रतिभ और पूर्ण—इन

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १५३ नौ नाथोंके महानाथ; ९१६. नवनागविभूषणः-कर्कोटक आदि नौ नागोंको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले; ९१७. नवरत्नविचित्राङ्गः-हीरा, मोती आदि नौ रत्नोंकी शोभासे विचित्र अंगोंवाले; ९१८. नवशक्तिशिरोधृतः- तीव्रा आदि नौ शक्तियोंद्वारा सिरपर धारित अर्थात् वन्दित ॥ १५० ॥ ९१९. दशात्मकः-दसों दिशाओंमें व्यापक; ९२०. दशभुजः-दस भुजाओंसे युक्त; ९२१. दशदिक्पति- वन्दितः-इन्द्र आदि दस दिक्पालोंसे स्तुत्य; ९२२. दशाध्यायः-चार वेद और छः अंगोंके अध्येता; ९२३. दशप्राणः- प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय-इन दस प्राणोंसे युक्त; ९२४. दशेन्द्रियनियामकः-पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले ॥ १५१ ॥ ९२५. दशाक्षरमहामन्त्रः-दस अक्षरवाले महा- मन्त्रस्वरूप; ९२६. दशाशाव्यापिविग्रहः-दसों दिशाओंमें व्याप्त शरीरवाले; ९२७. एकादशादिभी रुद्रैः स्तुतः- ग्यारहसे लेकर एक सहस्रतक रुद्र होते हैं, उन सबके द्वारा स्तुत; ९२८. एकादशाक्षरः-एकादश अक्षरवाले मन्त्रस्वरूप ॥ १५२ ॥ ९२९. द्वादशोद्दण्डदोर्दण्डः-बारह उद्दण्ड (ऊपर उठे हुए) बाहुदण्डोंसे युक्त; ९३०. द्वादशान्तनिकेतनः- ललाटसे ऊपर ब्रह्मरन्ध्रतकके स्थानको 'द्वादशान्त' कहते हैं, उसमें निवास करनेवाले; ९३१. त्रयोदशभिदाभिन्नविश्वे- देवाधिदैवतम्-तेरह विश्वेदेवोंके अधिदेवता ॥ १५३ ॥ ९३२. चतुर्दशेन्द्रवरदः- चौदह इन्द्रोंको वर देनेवाले; ९३३. चतुर्दशमनुप्रभुः- चौदह मनुओंके अधिपति; ९३४. चतुर्दशादिविद्याढ्यः - चार (आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति), दस (चार वेद और छः वेदांग) आदि विद्याओंसे सम्पन्न; ९३५. चतुर्दशजगत्प्रभुः- चौदह भुवनोंके स्वामी ॥ १५४ ॥ ९३६. सामपञ्चदशः-पन्द्रह स्तोममन्त्रोंके साथ, जो चार आज्यस्तोत्र-सम्बन्धी मन्त्र हैं, वे सामयुक्त होकर गणपति के स्वरूप हैं, अतः वे उक्त नामसे प्रसिद्ध हैं; ९३७. पञ्चदशीशीतांशुनिर्मलः - पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान स्वच्छ; ९३८. षोडशाधारनिलयः- षड्दल, नवदल एवं षोडशदल आदि चक्रोंमें निवास करनेवाले; ९३९. षोडशस्वरमातृकः-सोलह स्वर-अक्षररूप ॥ १५५॥ ९४०. षोडशान्तपदावासः - ब्रह्मरन्ध्रके अन्तर्गत कमलकी कर्णिकासे लेकर ऊपरके भागको 'षोडशान्त' कहते हैं। उसमें निवास करनेवाले अर्थात् उन्मनीसे परे विराजमान; ९४१. षोडशेन्दुकलात्मकः- अमृता और मानिनी आदि षोडशचन्द्रकलास्वरूप; ९४२. कला- सप्तदशी- 'त्रिपुरागम' में प्रसिद्ध 'सप्तदशी' नामक कलास्वरूप; ९४३. सप्तदशः- सामयुक्त सप्तदशस्तोम- स्वरूप; ९४४. सप्तदशाक्षरः - वषट् (२), ओश्रावय (४), यज (२), अस्तु श्रौषट् (४), ये यजामहे (५) - इस प्रकार सत्रह अक्षरोंवाले मन्त्रोंसे यज्ञमें आहुति ग्रहण करनेवाले ॥ १५६ ॥ ९४५. अष्टादशद्वीपपतिः- 'जम्बू' आदि सात द्वीपों और 'सिंहल' आदि ग्यारह उपद्वीपोंके अधीश्वर; ९४६. अष्टादशपुराणकृत्- अठारह पुराणोंके कर्ता व्यासरूप; ९४७. अष्टादशौषधीसृष्टिः- बारह मुख्य धान्य और छः उपधान्य- इन अठारह ओषधियों (अन्नों)- की सृष्टि करनेवाले; ९४८. अष्टादशविधिः- अठारह विधिस্বরূপ; (अपूर्व विधि, नियम-विधि और परिसंख्या- विधि-ये प्रयोग और विनियोग आदिके भेदसे नौ प्रकारकी होती हैं। फिर गौणी और मुख्य भेदसे इनके अठारह प्रकार होते हैं।) ॥ १५७॥ ९४९. अष्टादशलिपिव्यष्टिसमष्टिज्ञानकोविदः -नागरी, द्राविड़ी और आन्ध्री आदिके भेदसे भूतलपर विभिन्न अठारह लिपियाँ हैं। उन भाषाओंको तथा उनके अवान्तर-भेदोंको भी पृथक्-पृथक् एवं समष्टिरूपसे जाननेमें कुशल; ९५०. एकविंशः पुमान् - पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच विषय और पाँच भूत-इन बीस तत्त्वोंसे परे इक्कीसवाँ तत्त्व आत्मा; ९५१. एकविंशत्यङ्गुलिपल्लवः- दस हाथकी अंगुलियाँ, दस पैरोंकी अंगुलियाँ और एक शुण्डदण्ड- इस प्रकार इक्कीस अंगुलिपल्लवोंसे युक्त ॥ १५८ ॥ ९५२. चतुर्विंशतितत्त्वात्मा- प्रकृति, महत्तत्त्व,

१५४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अहंकार, ग्यारह इन्द्रियाँ, पाँच विषय और पाँच भूत— | निर्णायक; ९६८. चतुःषष्टिकलानिधिः—चौंसठ कलाओंके इस प्रकार चौबीस तत्त्व हैं; चौबीस तत्त्वस्वरूप; ९५३. | आधार; ९६९. चतुःषष्टिमहासिद्धियोगिनीवृन्दवन्दितः— पञ्चविंशाख्यपूरुषः—चौबीस तत्त्वोंसे परे विद्यमान, | अक्षोभ्य आदि चौंसठ महासिद्धों और उतनी ही योगिनियोंके पचीसवें तत्त्वस्वरूप पुरुष; ९५४. सप्तविंशतितारेशः— | समुदायसे वन्दित ॥ १६३ ॥ अश्विनी आदि सत्ताईस नक्षत्रोंके स्वामी; ९५५. | ९७०. अष्टषष्टिमहातीर्थक्षेत्रभैरवभावनः— सप्तविंशतियोगकृत्—सत्ताईस योगोंके कर्ता ॥ १५९ ॥ | काशीखण्ड और पद्मपुराणमें शिव-सम्बन्धी अड़सठ ९५६. द्वात्रिंशद्भैरवाधीशः—बत्तीस भैरवोंके स्वामी | महातीर्थ बताये गये हैं। उन सभी तीर्थक्षेत्रोंमें भैरव (असितांग आदि चार भैरव हैं, जो आठ-आठके | शिवकी भावना करनेवाले; ९७१. चतुर्नवतिमन्त्रात्मा— समुदाय हैं। इस तरह कुल बत्तीस भैरव हैं); ९५७. | अड़तीस कलामन्त्र और पचास मातृका कलाएँ—ये चतुस्त्रिंशन्महाह्रदः—पुष्कर आदि जो देवताओंद्वारा | अठासी मन्त्र हुए। इनके अतिरिक्त हंस, शुचि, प्रतद्विष्णु, खोदे गये विशाल सरोवर हैं, वे पवित्र 'महाह्रद' | विष्णु, योनि और त्र्यम्बक—ये छः विष्णुकी मूलविद्याएँ कहलाते हैं। उनकी संख्या चौंतीस बतलायी गयी है। ये | हैं। इन सबका योग चौरानबे हुआ। इस प्रकार चौरानबे चौंतीस महाह्रद जिनके स्वरूप हैं, वे; ९५८. | मन्त्रस्वरूप; ९७२. षण्णवत्यधिकप्रभुः—तन्त्रराजमें षट्त्रिंशत्तत्त्वसम्भूतिः—शैव-तन्त्रोक्त जो शिव आदि | श्रीचक्रके छियानबे देवता बताये गये हैं। विद्या और पृथ्वीपर्यन्त छत्तीस तत्त्व हैं, उनकी उत्पत्तिके कारण; | गणेशके योगसे अधिक देवता हो जाते हैं। इस प्रकार ९५९. अष्टात्रिंशत्कलातनुः—अग्निकी दस, सूर्यकी | छियानबेसे अधिक देवताओंके अधिपति ॥ १६४ ॥ बारह और चन्द्रमाकी सोलह कलाएँ—कुल अड़तीस | ९७३. शतानन्दः—मानुषादि शतगुणोत्तर आनन्द- कलाएँ होती हैं। ये सब जिनके शरीर हैं, वे गणपति ॥ १६० ॥ | स्वरूप; ९७४. शतधृतिः—अनन्त ब्रह्माण्डोंको धारण ९६०. नमदेकोनपञ्चाशन्मरुद्गणनिरर्गलः— | करनेवाले; ९७५. शतपत्रायतेक्षणः—प्रफुल्ल कमलके उनचास मरुद्गणोंसे नमस्कृत एवं अप्रतिहत गतिवाले; | समान विशाल नेत्रवाले; ९७६. शतानीकः—बहुसंख्यक ९६१. पञ्चाशदक्षरश्रेणी—पचास अक्षरोंके मालारूप; | सैन्यशक्तिसे सम्पन्न; ९७७. शतमखः—सौ यज्ञोंका ९६२. पञ्चाशद्रुद्रविग्रहः—श्रीकण्ठ आदि पचास शिव- | अनुष्ठान करनेवाले इन्द्रस्वरूप; ९७८. शतधारावरायुधः— स्वरूप ॥ १६१ ॥ | सौ धारों अथवा अरोंसे युक्त 'वज्र' नामक श्रेष्ठ आयुध ९६३. पञ्चाशद्विष्णुशक्तीशः—केशव आदि | धारण करनेवाले ॥ १६५ ॥ विष्णुरूप और कीर्ति आदि उनकी शक्तियाँ—ये सब पचासकी | ९७९. सहस्रपत्रनिलयः—ब्रह्मरन्ध्रगत सहस्र- संख्यामें हैं; इन सबके स्वामी; ९६४. पञ्चाशत्- | दलकमलमें विराजमान; ९८०. सहस्रफणभूषणः— मातृकालयः—पचास मातृका-वर्णोंके आलय अथवा | सहस्रफणधारी सर्पोंसे विभूषित; ९८१. सहस्रशीर्षा लयस्थान नादस्वरूप; ९६५. द्विपञ्चाशद्वपुःश्रेणी— | पुरुषः—असंख्य मस्तकवाले परमात्मा; ९८२. लिंगपुराणमें वर्णित जो बावन पाश हैं, वे नूतन शरीर प्रदान | सहस्राक्षः—सहस्रों नेत्रोंवाले ९८३. सहस्रपात्—सहस्रों करनेवाले हैं, अतः बावन शरीरपङ्क्तिस्वरूप; ९६६. | पैरोंवाले ॥ १६६ ॥ त्रिषष्ट्यक्षरसंश्रयः—तिरसठ अक्षरोंके आधार* ॥ १६२ ॥ | ९८४. सहस्रनामसंस्तुत्यः—सहस्रनामोंद्वारा ९६७. चतुःषष्ट्यर्णनिर्णोता—चौंसठ अक्षरोंके | स्तवनीय; ९८५. सहस्राक्षबलापहः—इन्द्रके बलको

  • वर्णोंकी संख्या तिरसठ अथवा चौंसठ मानी गयी है। इनमें इक्कीस स्वर, पचीस स्पर्श, आठ यादि एवं चार यम कहे गये हैं। अनुस्वार, विसर्ग, दो पराश्रित वर्ण—जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय (क और प) और दुःस्पृष्ट लकार—ये तिरसठ वर्ण हैं। इनमें प्लुत लकारको और गिन लिया जाय तो वर्णोंकी संख्या चौंसठ हो जाती है।

उ०ख०-अ० ४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १५५ भी विध्वस्त कर देनेवाले; ९८६. दशसाहस्रफण- भृत्फणिराजकृतासनः — दस हजार फण धारण करनेवाले नागराजके ऊपर आसीन ॥ १६७ ॥ ९८७. अष्टाशीतिसहस्राद्यमहर्षिस्तोत्रयन्त्रितः — अट्ठासी हजारकी संख्यावाले आदि महर्षियोंके द्वारा किये गये स्तोत्रके द्वारा वशीभूत; ९८८. लक्षाधीश- प्रियाधारः — लखपतियोंके प्रिय आधार; ९८९. लक्षा- धारमनोमयः — लक्ष (लक्ष्य)-पर एकाग्र किये गये चित्तवाले; अथवा एकाग्रचित्त सत्पुरुषस्वरूप ॥ १६८ ॥ ९९०. चतुर्लक्षजपप्रीतः — चार लाख मन्त्रके जपसे प्रसन्न होनेवाले; ९९१. चतुर्लक्षप्रकाशितः — अठारह पुराणोंके चार लाख श्लोकोंद्वारा प्रकाशित रूपवाले; ९९२. चतुरशीतिलक्षाणां जीवानां देहसंस्थितः — चौरासी लाख जीवोंके शरीरमें विराजमान ॥ १६९ ॥ ९९३. कोटिसूर्यप्रतीकाशः — करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी; ९९४. कोटिचन्द्रांशुनिर्मलः — करोड़ों चन्द्रमाओंकी किरणोंके समान निर्मल; ९९५. शिवा- भवाध्युष्टकोटिविनायकधुरन्धरः — पार्वती और शिवके अधीनस्थ करोड़ों विनायकोंके संचालनका भार ढोनेवाले ॥ १७० ॥ ९९६. सप्तकोटिमहामन्त्रमन्त्रितावयवद्युतिः — सात करोड़ महामन्त्रोंसे मन्त्रित अवयवोंकी कान्तिसे प्रकाशमान; ९९७. त्रयस्त्रिंशत्कोटिसुरश्रेणीप्रणत- पादुकः — जिनकी चरणपादुकाओंमें तैंतीस करोड़ देवताओंकी पंक्ति प्रणाम करती है, वे ॥ १७१ ॥ ९९८. अनन्तनामा — अनन्त नामवाले; ९९९. अनन्तश्रीः — अनन्त विद्या, सम्पत्ति और कीर्तिवाले; १०००. अनन्तानन्तसौख्यदः — अनन्तानन्त सौख्य प्रदान करनेवाले। इस प्रकार गणेशजीके ये सहस्र नाम बताये गये ॥ १७२॥ जो मनुष्य प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्तमें इन नामोंका पाठ करता है, उसके हाथमें लौकिक और पारलौकिक सारे सुख आ जाते हैं। इसके एक बार जप करनेसे आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धैर्य, शौर्य, बल, यश, धारणावती बुद्धि, प्रज्ञा, धृति, कान्ति, सौभाग्य, अतिशय रूप-सौन्दर्य, सत्य, दया, क्षमा, शान्ति, दाक्षिण्य, धर्मशीलता, जगद्वशीकरण, सबकी अनुकूलता, शास्त्रार्थमें पटुता, सभापाण्डित्य, उदारता, गम्भीरता, ब्रह्मतेज, उन्नति, उत्तम कुल, शील, प्रताप, वीर्य, आर्यत्व, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिक्य, स्थिरता, विश्वमें उत्कर्ष और धन-धान्यकी वृद्धि — ये सभी उत्तम फल प्राप्त होते हैं ॥ १७३-१७७ ॥ इस मन्त्रके जपसे मनुष्योंके लिये चार प्रकारका वशीकरण सिद्ध होता है — राजाका, राजाके अन्तःपुरका, राजकुमारका तथा राज्यमन्त्रीका। जिसको वशमें करनेके लिये इस सहस्रनामका जप किया जाता है, वह उस प्रयोग करनेवालेका दास हो जाता है। इस सहस्रनामके द्वारा बिना किसी प्रयासके धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धि होती है ॥ १७८-१७९ ॥ यह स्तोत्र शाकिनी, डाकिनी, राक्षस, यक्ष और सर्पके भयका नाश करनेवाला है। यह साम्राज्यका सुख देनेवाला तथा समस्त शत्रुओंका मर्दन करनेवाला है ॥ १८० ॥ इस सहस्रनामसे सब प्रकारके कलह-क्लेशका नाश होता है, इससे जले हुए बीजमें भी अंकुर निकल आते हैं। यह बुरे स्वप्नोंके कुफलको मिटाता है और रोषमें भरे हुए स्वामीके चित्तको प्रसन्न करनेवाला है ॥ १८१ ॥ यह सहस्रनाम मोहन-आकर्षण आदि छः कर्म, आठ महासिद्धि तथा त्रिकालज्ञानका साधन करनेवाला है। शत्रुओंद्वारा अपने ऊपर प्रेरित कृत्याको शान्त करनेवाला तथा शत्रु-मण्डलका मर्दन करनेवाला है। संग्रामकी रंगभूमिमें यह अकेला ही सबको विजय दिलानेवाला, वन्ध्यापन- सम्बन्धी सम्पूर्ण दोषोंका नाशक और गर्भकी रक्षाका मुख्य साधन है ॥ १८२-१८३ ॥ जहाँ प्रतिदिन गणपतिके इस स्तोत्रका पाठ किया जाता है, उस देशमें दुर्भिक्ष, ईतिभय और दुराचार नहीं होते ॥ १८४ ॥ जहाँ इस स्तोत्रका पाठ होता है, उस घरको लक्ष्मी कभी नहीं छोड़ती हैं। क्षय, कोढ़, प्रमेह, बवासीर, भगंदर, विषूचिका (हैजा), गुल्म, प्लीहा, पथरी, अतिसार, उदर-वृद्धि, खाँसी, दमा, ऊपरकी डकार उठना, शूल, शोथ आदि, शिरोरोग, वमन, हिचकी, गण्डमाला

१५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

[बायाँ स्तम्भ] (गलसुआ), अरुचि, वात-पित्त-कफजनित द्वन्द्व, त्रिदोषजनित ज्वर, आगन्तुक ज्वर, विषमज्वर, शीतज्वर, उष्णज्वर, एकाहिक आदि ज्वर, यहाँ कथित या अकथित दोषादि-सम्भव रोग—इन सबका इस स्तोत्रके एक बार पाठसे शीघ्र शमन हो जाता है। यह सहस्रनाम एक बारके पाठसे ही सिद्ध हो जाता है। स्त्री, शूद्र और पतितोंको भी शुभकी प्राप्तिके लिये इस सहस्रनाम-स्तोत्रका जप (पाठ) करना चाहिये॥ १८५-१८९१/२॥ महागणपतिके इस स्तोत्रका सकामभावसे जप करनेवाला पुरुष इहलोकमें पृथ्वीपर सुलभ समस्त मनोवांछित भोगोंको भोगकर मनोरथ-फलोंकी प्राप्तिपूर्वक दिव्य एवं मनोरम व्योम-विमानोंपर बैठकर चन्द्र, इन्द्र, सूर्य, विष्णु, ब्रह्मा और शिव आदिके लोकोंमें इच्छानुसार रूप धारण करके विचरता है; जहाँ-जहाँ इच्छा होती है, वहाँ-वहाँ पहुँचता है; अपने बन्धुजनोंके साथ अभीष्ट भोगोंको भोगता है; महागणपतिका प्रिय अनुचर होता है और नन्दीश्वर आदिके साथ आनन्दित हो सकल शिवगणोंद्वारा अभिनन्दित होता है। पार्वती और शिव—ये दोनों पुत्रकी भाँति उसका लाड-प्यार करते हैं। वह शिवभक्त तथा पूर्णकाम होता है। फिर गणेशजीके वरदानसे इहलोकमें धर्मपरायण सार्वभौम सम्राट् होता है और उसे पूर्वजन्मकी बातें स्मरण रहती हैं॥ १९०-१९५॥ जो भक्तिभावसे गणेशजीके भजनमें तत्पर हो निष्काम भावसे इस स्तोत्रका नित्य पाठ करता है, वह योगजनित परम सिद्धिको पा लेता है और ज्ञान- वैराग्यनिष्ठ हो जहाँ निरन्तर आनन्दका उदय होता है, जो परमानन्द संवित्स्वरूप, लोकातीत, पुनरावृत्तिरहित तथा परम पाररूप है, उस गणपतिधाममें नित्यलीन एवं परमानन्दनिमग्न हो रमता रहता है॥ १९६-१९७१/२॥ जो मनुष्य इन सहस्रनामोंद्वारा हवन, अर्चन और पूजन करता है, राजालोग उसके वशमें होते हैं और शत्रु दासवत् हो जाते हैं। उसके सारे मन्त्र सिद्ध होते हैं और उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ सुलभ होती हैं॥ १९८-१९९॥ [गणेशजी कहते हैं— ] मूलमन्त्रकी अपेक्षा भी यह स्तोत्र मुझे अधिक प्रिय है। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी

[दायाँ स्तम्भ] चतुर्थी-तिथिको मेरे जन्म-दिवसपर इन सहस्रनामोंद्वारा दूर्वार्पण करते हुए विधिवत् मेरा पूजन एवं तर्पण करे। विशेषतः अष्टगन्ध-द्रव्योंद्वारा भक्तिपूर्वक हवन करे। जो ऐसा करता है, उसके सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरथ सिद्ध होते हैं; इसमें संशय नहीं है। इसके जप, पठन-पाठन, सुनना-सुनाना, व्याख्यान, चर्चा, ध्यान, विचार और अभिनन्दन—ये इहलोक और परलोकमें सबके लिये सम्पूर्ण ऐश्वर्यको देनेवाले हैं॥ २००-२०३॥ जो इस स्तोत्रको धारण करता है, वह स्वच्छन्दतापूर्वक कहीं भी क्यों न विचरता रहे, भगवान् शिवके करोड़ों गण उसकी रक्षा करते रहते हैं॥ २०४॥ जिस घरमें इस स्तोत्रको पुस्तकरूपमें लिखकर कोई इसका पूजन करता है, वहाँ सर्वोत्कृष्ट लक्ष्मी निरन्तर निवास करती हैं॥ २०५॥ श्रीगणेशसहस्रनामका स्मरण (जप) करके मनुष्य जिस फलको तत्काल प्राप्त कर लेता है, उसे सब प्रकारके दान, व्रत, तीर्थसेवन और यज्ञोंके अनुष्ठानद्वारा भी नहीं पा सकता। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदयके समय, मध्याह्नकालमें या सायंकालमें अथवा तीनों समय या सदा ही इन सहस्र नामोंका पाठ करता है, वह सत्पुरुषोंमें ऐश्वर्यशाली होता है, अपनी कीर्तिका अतिशय विस्तार करता है, विघ्नोंको नष्ट कर देता है, संसारको वशमें कर लेता है तथा वह पुत्र-पौत्रोंके साथ सुदीर्घकालतक निरन्तर वृद्धिशील होता है॥ २०६-२०७॥ जिसके पास कुछ नहीं है, जो दरिद्र है, वह मेरी प्राप्तिके उद्देश्यसे नियमित (शास्त्रसम्मत) आहार करके मुझ गणेशके पूजनमें तत्पर रहकर चार मासतक इस स्तोत्रका जप करे। ऐसा करनेसे वह सात जन्मोंसे चली आनेवाली दरिद्रताका भी उन्मूलन करके महती लक्ष्मीको प्राप्त कर लेता है, यह मुझ परमेश्वरकी आज्ञा है। आयु, आरोग्य, निर्मल कुल, पीड़ितोंको दी जा सकनेवाली सम्पत्ति, नित्य उज्ज्वल कीर्ति, नयी- नयी सूक्ति, रोगहीनताके साथ भव्य कान्ति, सत्पुत्र, मनोऽनुकूल गुणवती स्त्री और सत्यसंकल्पता—ये सारी वस्तुएँ, जो गणपतिके इस स्तोत्रका नित्य पाठ करता

उ०ख०-अ०४७ ] * त्रिपुरदाह एवं त्रिपुरासुरका वध * १५७ है, उसके हाथमें आ जाती हैं॥ २०८-२१० ॥ | गणेशको नमस्कार है, नमस्कार है। अनुपम मंगलस्वरूप १. गणंजय, २. गणपति, ३. हेरम्ब, ४. धरणीधर, | गणपतिको बारम्बार नमस्कार है। एकमात्र जिनसे ५. महागणपति, ६. लक्षप्रद, ७. क्षिप्रप्रसादन, ८. | विपुलपद-परमधामकी सिद्धि होती है, उन गणाधीशको अमोघसिद्धि, ९. अमित, १०. मन्त्र, ११. चिन्तामणि, | बारम्बार नमस्कार है। हे प्रभो! गजशावकके समान १२. निधि, १३. सुमंगल, १४. बीज, १५. आशापूरक, | मुखवाले आपको बारम्बार नमस्कार है॥ २१५ ॥ १६. वरद, १७. शिव, १८. काश्यप, १९. नन्दन, | हे गणपति! हे अज! हे ईश! हे हेरम्ब! हे २०. वाचासिद्ध तथा २१. ढुंढिविनायक-ये इक्कीस | द्वैमातुर! हे गजानन! हे भालेन्दु! हे धूम्रकेतु! हे नाम-मोदक हैं। जो पुरुष इन मोदकस्वरूप इक्कीस | लम्बोदर! हे विनायक! हे ब्रह्मन्! हे एकदन्त! हे नामोंद्वारा (मुझे भक्तिपूर्वक उपहार अर्पित करता है; | विघ्नेश्वर! हे विष्णो! हे कपिल! हे निर्गुण! हे काल! मेरा प्रसाद चाहता है और अभीष्ट-सिद्धिके लिये | हे आद्य! हे सिद्धिदाता! हे अनन्त! इस संसारसागरसे एक वर्षतक मुझ विघ्नराजके इस यथार्थ स्तोत्रका | मेरा परित्राण कीजिये॥ २१६-२१७॥ पाठ करता है;) मुझमें मन लगाकर, मेरी आराधनामें | जिनके सुन्दर चरणोंमें बँधी हुई किंकिणियाँ ध्वनित तत्पर रहकर मेरा स्तवन करता है, उसके द्वारा | हो रही हैं, जिन्होंने अपने अमेया लीलाचरित्रोंको स्वयं सहस्रनामस्तोत्रसे मेरी स्तुति हो जाती है, इसमें संशय | प्रकट किया है, जिनका सुन्दर कपोल मदजलकी नहीं है॥ २११-२१४॥ | लहरोंसे युक्त है, वे गणोंके अधिपति गणेशजी मनुष्योंके ब्रह्माजी बोले- श्रेष्ठ देवताओंद्वारा पूजित चरणवाले | पापोंका शमन करें॥ २१८॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'ईश्वर-गणेश-संवादान्तर्गत गणेशसहस्रनाम- स्तोत्रकथन' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४६॥

सैंतालीसवाँ अध्याय त्रिपुरदाह एवं त्रिपुरासुरका वध व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन्! गजानन गणेशजीके | किन्नरों आदि सभीने भगवान् शिवको नमस्कारकर प्रसन्न होने तथा उनसे सहस्र नामोंको प्राप्त कर लेनेके | उनकी स्तुति की- ॥ ४॥ अनन्तर शिवजीने क्या किया; यह सब मुझसे कहिये॥ १॥ | देवता बोले- हे महादेव! हे जगन्नाथ! हे ब्रह्माजी बोले-[हे व्यास!] गणेशजीके द्वारा | जगत्को आनन्द देनेवाले! [उस] महादैत्य (त्रिपुरासुर)- वरदान तथा सहस्रनामका उपदेश प्राप्तकर भगवान् | को आपके द्वारा मारा गया हम कब देखेंगे? उस शंकर अत्यन्त प्रसन्न होकर नाचने लगे और उन्होंने | विश्वविघातीने हम सबको स्थानभ्रष्ट (अपने अधिकारोंसे महान् ध्वनिके साथ गर्जना की॥ २॥ | वंचित) कर रखा है॥ ५ १/२ ॥ उन्होंने अपने गणोंको बुलाया और देवताओंको | ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास!] देवताओंके ऐसे आदेश दिया कि 'युद्धका अवसर आ गया है।' तब वे | वचन सुनकर पिनाक धनुषको धारण करनेवाले भगवान् देवता भी महान् हर्षके साथ शिवके निकट गये॥ ३॥ | महादेवने मन-ही-मन गणेशजीका ध्यानकर और युद्ध [उस समय] ब्रह्मा, कुबेर, इन्द्र, अग्नि, वायु, | करनेका निश्चय करके प्रसन्नतापूर्वक [वहाँसे] प्रस्थान चन्द्रमा, वरुण, अर्यमा* और गन्धर्वों, यक्षों, ग्रहों, | किया और देवताओं एवं गन्धर्वोंसहित अपने निवासस्थलपर

  • द्वादश आदित्योंमें-से एक।

१५८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

जा पहुँचे ॥ ६-७ ॥ उधर गुप्तचरोंने उस दैत्य त्रिपुरासुरसे सारा वृत्तान्त निवेदित किया कि देवताओंकी सेनाके साथ गिरिजापति महादेवजी युद्धके लिये आ गये हैं ॥ ८ ॥ तब उसकी भी सेना शस्त्रास्त्रों और कवचोंसे सुसज्जित हो गयी और उस दैत्यने भी युद्धके लिये आभूषणरूप [शस्त्रास्त्र एवं कवच आदि]-से विभूषित हो भयंकर गर्जन किया ॥ ९ ॥ उसने वस्त्र, माला आभूषण और धनसे वीरोंको आनन्दित किया। उसके योद्धागण अनेक प्रकारके वाहनोंमें सवार हो गये और वह महादैत्य त्रिपुरासुर दिशाओं और विदिशाओंको अपने नादसे पूरित करता हुआ स्वयं [सुवर्ण, रजत और लौहनिर्मित] त्रिपुरमें आरूढ़ हुआ। तदनन्तर दोनों सेनाओंके मध्य महान् युद्ध प्रारम्भ हो गया ॥ १०-११ ॥ अनेक प्रकारके शस्त्रों तथा मर्मवेधी लौहबाणोंके प्रहारसे [सैनिकोंके शरीरसे निकलनेवाले रुधिरसे] मार्गका अवरोधन करनेवाली रक्तकी नदी प्रवाहित होने लगी ॥ १२ ॥ [उस समय] शस्त्रोंसे घायल हुए योद्धा खिले हुए पलाश-पुष्पके वृक्षोंकी भाँति शोभित हो रहे थे। कुछ सैनिक शत्रुसैनिकोंको दृढ़ वैर होनेके कारण जीवित पकड़कर मार दे रहे थे ॥ १३ ॥ कुछ सैनिक शत्रुसैनिकोंके सिरके बाल बलपूर्वक पकड़कर उनके सिर काट दे रहे थे। दौड़ते हुए रथों, पैदल वीरों, घोड़ों और हाथियोंके पैरोंसे उठी हुई धूल क्षणभरमें पृथ्वीसे लेकर अन्तरिक्षतक व्याप्त हो गयी। उस समय घोर-से भी घोर अन्धकार हो जानेसे कुछ भी समझमें नहीं आ रहा था ॥ १४-१५ ॥ योद्धागण उस समय भी अनेक प्रकारसे भयंकर युद्ध कर रहे थे, उन्होंने जीवनकी आशा छोड़ दी थी और मरनेका निश्चय कर लिया था ॥ १६ ॥ वायुके द्वारा धूल उड़ा दिये जानेपर [युद्धभूमिमें] बहुत-से देवता मरे पड़े दिखायी दिये। [यह देखकर] देवताओंकी सेना पलायन कर गयी, जिससे दैत्यसेना अत्यन्त हर्षित हुई ॥ १७ ॥

उस समय हाथमें वज्र धारण किये, युद्धकी इच्छावाले देवराज इन्द्र वहाँ आये। [उनके हाथमें] तीक्ष्ण धारवाले वज्रको देखकर दैत्य और दानव भागने लगे। उन वज्रधारी इन्द्रने अपने वज्रके प्रहारसे असुरोंको चूर-चूर कर डाला। उस प्रचण्ड वज्रके प्रहारसे उन्होंने अपने प्राण छोड़ दिये ॥ १८-१९ ॥ उनमेंसे कुछके पैर टूट गये, कुछकी गर्दन टूट गयी, कुछके पेट फट गये और कुछ अन्य [असुरों]-की भुजाएँ कन्धोंसे कटकर अलग हो गयीं ॥ २० ॥ कुछ (दैत्य, दानवों और असुरों)-की जाँघें कट गयीं, कुछ अन्यका ऊरुभाग टूट गया। कुछ अन्य [दैत्यों]-के गुल्फ (टखने) कट गये और वे गिर पड़े तथा कुछ अन्य इस व्याजसे अर्थात् ऐसी दुर्दशाके कारण भयवश गिर पड़े ॥ २१ ॥ योद्धाओं, घोड़ों और हाथियोंके अंगोंके कटनेसे तथा मरे हुए सैनिकोंके शरीरसे बहनेवाले रक्तके कारण बहुत-सी नदियाँ उत्पन्न हो गयीं। वे विजयकी इच्छा रखनेवाले वीरोंका उत्साहवर्धन करनेवाली थीं ॥ २२१/२ ॥ तब इन्द्रद्वारा बहुत-सी सेना मारी गयी देखकर गर्जन करता हुआ त्रिपुरासुर धीरे-धीरे इन्द्रके पास युद्ध करनेके लिये आया ॥ २३१/२ ॥ उसने इन्द्रको देखकर कहा- क्यों मरनेकी इच्छा करते हो? हे वासव ! जीवित रहते हुए युद्धसे दूर हट जाओ, मैं पीठपर वार नहीं करता। हे शचीपते ! तुममें मुझसे युद्ध करनेकी क्या सामर्थ्य है ? मुझे बताओ कि क्या बकरा भी सिंहके साथ युद्ध कर सकेगा ! शक्ति हो तो [मुझसे] युद्ध करो, अन्यथा सुखपूर्वक [यहाँसे] चले जाओ ॥ २४-२६ ॥ इस प्रकार कहनेपर भी जब इन्द्र वहाँ स्थित रहे तो दैत्य [राज] त्रिपुरासुरने धनुषको सुसज्जितकर (प्रत्यंचा चढ़ाकर) बहुत-से बाणोंकी वर्षा की और देवताओंकी सेनापर प्रहार किया ॥ २७ ॥ मन्त्रसे अभिमन्त्रित उसके एक बाणसे असंख्य बाण निकलते थे। इस प्रकार उसने देवताओं और गन्धर्वोंका मर्दनकर पृथ्वी और अन्तरिक्षको बाणोंसे

उ०ख०-अ०४७ ] * त्रिपुरादाह एवं त्रिपुरासुरका वध * १५९

परिपूरित कर दिया ॥ २८ ॥ निरन्तर बाण-समूहोंकी वर्षासे पुनः अन्धकार हो गया। उन बाणोंसे वे देवता भी अंग-भंग होकर भूतलपर गिर पड़े ॥ २९ ॥ उन प्रचण्ड प्रहारोंसे पीड़ित होकर बलासुरका वध करनेवाले इन्द्र भी भूमिपर गिर पड़े। तब सभी श्रेष्ठ देवताओंके मूर्च्छित हो जानेपर महेश्वर शिव उस आत्मप्रशंसा, गर्जन और युद्ध कर रहे त्रिपुरासुरको सहन न कर सके, फिर भी उन्होंने मन-ही-मन उस दैत्यके पुरुषार्थकी प्रशंसा की ॥ ३०-३१ ॥ इसी बीच वहाँ नारदजी युद्ध देखनेकी इच्छासे आये और भगवान् शम्भुके द्वारा पूजित होनेपर बोले— हे नीललोहित! सुनो ॥ ३२ ॥ नारदजी बोले—हे महेश्वर! त्रिपुरासुरके वधके विषयमें आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये; मैं उसके वधका उपाय कहता हूँ, उसे कीजिये ॥ ३३ ॥ उसने (त्रिपुरासुरने) पूर्वकालमें ऐसा तप किया था, जो ब्रह्माजीके लिये भी दुष्कर है; उसने गणेशजीकी आराधना की थी और उन्होंने उसे सभी वांछित वर दिये थे। जो-जो वर उसने माँगे, भगवान् गणेशने उसे बिना विचार किये ही दे दिये। उन्होंने उसे एक बाणपर स्थित और इच्छानुसार गति करनेवाले तीन महान् पुर प्रदान किये, जो बिना वायुके गति करनेवाले और सम्पूर्ण देवताओंसे अभेद्य थे ॥ ३४-३५ १/२ ॥ उन्होंने उससे यह गुप्त बात भी कही थी कि जो एक ही बाणसे तुम्हारे तीनों पुरोंका भेदन कर देगा, उसके द्वारा ही तुम्हें मृत्यु प्राप्त होगी। प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाले शिवजीने मुनिश्रेष्ठ नारदजीके इस प्रकार कहकर चले जानेपर मूर्च्छित देवताओंको सचेत किया और नारदजीके द्वारा स्मरण कराये गये गजानन गणेशजीके कथनका स्मरण किया ॥ ३६-३८ ॥ वे प्रभु [यद्यपि] अपने संकल्पमात्रसे सबका नाश करनेमें समर्थ हैं, [तथापि] उन्होंने उस दैत्यराज त्रिपुरासुरके वधके लिये स्वेच्छानुरूप महान् प्रयत्न आरम्भ किया ॥ ३९ ॥ उन शिवजीने पृथ्वीको अपना रथ बनाया, चन्द्रमा और सूर्य उसके पहिये थे। उन्होंने पद्मयोनि ब्रह्माजीको अपना सारथि, गिरिराज हिमालयको धनुष, अपनी महिमासे च्युत (स्खलित) न होनेवाले भगवान् विष्णुको बाण बनाया और दोनों अश्विनीकुमारोंको [उस रथकी] दोनों धुरियोंके रूपमें संयोजित किया ॥ ४० ॥ तदनन्तर उन्होंने आचमन करके मन-ही-मन गणेशजीका चिन्तनकर उनके द्वारा उपदिष्ट सहस्र नामोंका जप किया और एकाक्षर मन्त्रसे प्रचण्ड पिनाक धनुषको अभिमन्त्रित किया ॥ ४१ ॥ जब शिवजीने विष्णुरूप महाबाणको अभिमन्त्रित किया तो उस समय शेषनाग, पृथ्वी, वन और पर्वत भी काँपने लगे। पक्षिसमूह [दिग्भ्रमित-से] भ्रमण करने और चीत्कार करते हुए महान् कोलाहल करने लगे। आजगव धनुषके शब्द (टंकार)-से देवता और मनुष्य भी व्याकुल हो गये ॥ ४२-४३ ॥ उन शिवजीने जब उस बाणको छोड़ा तो नभतल दग्ध हो उठा और तत्क्षण पातालसहित भूमण्डल ज्वाला-समूहोंसे व्याप्त हो गया ॥ ४४ ॥ उस बाणको देखकर पुरमें आश्रय लिया हुआ दैत्यराज वहाँसे सेनासहित भागा, परंतु वेगपूर्वक आये उस बाणने [स्वर्ण, रजत तथा लौहनिर्मित] उन तीनों