श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
क्री०ख०-अ०१२१ ] * राक्षसराज सिन्धुकी सेनाके साथ कार्तिकेय आदिका भयंकर संग्राम * ५६५
करके समस्त वीरोंका निरीक्षणकर बाणका एकाएक धनुषपर सन्धान किया॥४४१/२॥ उस अस्त्रसे सहसा उत्पन्न अग्नि देवसेनाको और साथ-ही-साथ वनों एवं पर्वतोंसहित समग्र पृथिवीको दग्ध करने लगी ॥ ४५१/२॥ उस अग्निके द्वारा जलाये जाते हुए उन देवसैनिकोंने उस अग्निसे उत्पन्न एक पुरुषको देखा, जो जटाएँ धारण किये हुए था, उसका तेज प्रदीप्त हो रहा था, उसकी जिह्वा विद्युत्के समान थी, उसका मुख बड़ा ही भयंकर था और वह देवसैनिकोंको निगलता जा रहा था। उसे देखकर कार्तिकेय आदि भयभीत हो गये और दसों दिशाओंमें भाग गये। युद्धमें वह जिस-जिसका भक्षण कर लेता था, वह-वह मयूरेशका स्मरण करता हुआ प्रसन्नतापूर्वक उन मयूरेशके निज धामको प्राप्त कर लेता था। इस प्रकारसे उस पुरुषने सम्पूर्ण देवसेनाका भक्षण कर लिया ॥ ४६-४८१/२ ॥ वह देवसेना जिधर-जिधर जाती थी, वहाँ-वहाँ उस पुरुषके मुखसे उत्पन्न अग्नि प्रलयाग्निके समान जलते हुए उस सेनाको दग्ध कर देती थी, इस प्रकार मयूरेशकी वह सेना अग्निके द्वारा दग्ध हो गयी ॥४९-५०॥ उस समय धुएँका महान् अन्धकार छा गया था, उस अन्धकारमें कुछ भी दिखायी नहीं पड़ता था। तदनन्तर सभी देववीर मयूरेशके पीछे छिप गये ॥ ५१ ॥ उस अग्निसे जलाये जाते हुए वे देवगण त्राहि- त्राहि इस प्रकारसे करुण पुकार करने लगे। उस निवारित किये न जा सकनेवाले महान् अस्त्रको देखकर देव मयूरेश तेजहीन-से हो गये और लोकमें अपमानित होनेके भयसे वे विचार करने लगे कि यदि इस समय भगवान् शिव कृपा करें, तभी यहाँ हमारी विजय हो सकती है ॥ ५२-५३॥ ऐसा कहनेके अनन्तर मयूरेशने हाथमें परशु धारण किया और उसे मन्त्रोंसे अभिमन्त्रितकर बलपूर्वक शत्रुसेनापर फेंका, अपने तेजसे सूर्यके तेजको भी जीत लेनेवाला वह अभिमन्त्रित परशु आकाश तथा दिशाओंको निनादित करते हुए तथा शत्रुसेनाको दग्ध करते हुए ऐसे जा रहा था, मानो कल्पान्तके समयकी प्रलयाग्नि जा रही हो ॥ ५४१/२ ॥ उस प्रज्वलित अग्निसदृश परशुसे भी एक महान् पुरुष प्रकट हुआ, जिसके मुखमें आकाशसहित सम्पूर्ण भूमण्डल भी प्रवेश करते हुए आकारमें छोटा पड़ जाय। तदनन्तर उस उत्पन्न पुरुषका सिन्धुदैत्यके पुरुष योद्धाके साथ और उस अस्त्र परशुका [सिन्धुके द्वारा प्रयुक्त] अस्त्रके साथ युद्ध होने लगा। तब उस युद्धको देखनेके लिये देवर्षिगण वहाँ उपस्थित हो गये। मयूरेशके उस यमराजतुल्य अस्त्र परशुने शीघ्र ही दैत्य सिन्धुके अस्त्रका भक्षण कर डाला ॥ ५५-५७॥ तदनन्तर ज्वालाओंकी मालासे युक्त अग्निदेवके सदृश वह आग्नेयास्त्र दैत्यकी सेनाको जलानेके लिये चल पड़ा। दैत्यराज सिन्धुने भी उस अस्त्रको आता हुआ देखकर बाणोंकी वृष्टि करनी शुरू कर दी ॥ ५८ ॥ उस सिन्धुके अभिमन्त्रित एक बाणसे अनन्त संख्यामें बाण प्रकट होने लगे। देवसेनाके अत्यन्त तीव्र गतिवाले योद्धा उस दैत्यकी बाणवृष्टिसे आच्छादित हो गये। तब क्रुद्ध होकर मयूरेशने उस समय नाना प्रकारके अस्त्रोंकी सृष्टि की। उन अस्त्रोंने दैत्यराज सिन्धुके सभी अस्त्रोंको निरस्त कर डाला ॥ ५९-६० ॥ तदनन्तर अस्त्र (परशु)-से उत्पन्न उस कालपुरुषने दैत्यसेनाका पुनः भक्षण कर डाला। वे दैत्य सैनिक भाग-भागकर जहाँ-जहाँ जाते थे, वहाँ-वहाँ वह कालपुरुष पहुँच जाता था ॥ ६१ ॥ तब चिन्ताग्रस्त हुआ वह दैत्य सिन्धु उस समय अब क्या करना चाहिये, यह निश्चित नहीं कर सका। क्या करणीय है, कहाँ जाना चाहिये और कहाँ ठहरना चाहिये-इस प्रकारसे वह चिन्ता करने लगा ॥ ६२ ॥ सूर्यके अस्त हो जानेपर वह अपने घरकी ओर लौट चला। उसके कुण्डल तथा अन्य आभूषण नष्ट हो चुके थे। वह भूमिपर गिरते-पड़ते हुए जा रहा था ॥ ६३ ॥ उसने अपने नगरमें प्रवेश किया, उस समय वह औघड़ शिवके समान अस्त-व्यस्त प्रतीत हो रहा था। वह वहाँ किसी गुप्त स्थानमें स्त्रियों तथा अनुचरोंकी
५६६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दृष्टिसे ओझल होकर रहने लगा ॥ ६४ ॥ उस दैत्यराज सिन्धुके इस प्रकारके सम्पूर्ण वृत्तान्तको शीघ्र ही जानकर देव मयूरेशने अपने गणोंसहित उच्च स्वरसे गर्जना की। उस नादने सहसा तीनों लोकोंको निनादित कर डाला ॥ ६५ ॥ तदनन्तर मयूरेशने अपने द्वारा प्रकट किये गये कृतान्तास्त्रको उसी प्रकार समेट लिया, जैसे कि मन्त्रको जाननेवाला सर्पको वापस अपने पास बुला लेता है। इसके पश्चात् वे मयूरेश अपने गणोंको साथ लेकर शीघ्र ही अपने भवनको चले गये ॥ ६६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुदैत्यका अपमान' नामक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२१ ॥ एक सौ बाईसवाँ अध्याय गौतम आदि महर्षियों तथा भगवान् शिवद्वारा मयूरेशकी महिमा एवं पराक्रमका वर्णन, षडानन आदिका देवर्षि नारदके साथ संवाद, देव मयूरेशका दैत्य सिन्धुसे युद्धके लिये सन्नद्ध होना, किंतु नन्दी, भृंगी आदिका उन्हें रोककर स्वयं युद्धके लिये प्रस्थान करना, वीरभद्र तथा भूतराजका भी साथमें जाना, दैत्य सिन्धुके साथ उनका युद्ध और दैत्यसेनाका पराजित होना ब्रह्माजी बोले-जब देव मयूरेश सिंहासनपर बैठे हुए थे और चारों ओरसे अपने गणोंसे घिरे हुए थे, उस समय गौतम आदि महर्षियोंने वहाँ आकर उन गुणेश्वरकी महिमाका गान किया ॥ १ ॥ ऋषिगण बोले-जिस दैत्यराज सिन्धुने देवराज इन्द्रपर विजय प्राप्त की तथा नागोंसहित पातालमें स्थित शेषनागको जीत लिया, फिर उसके समक्ष अन्य किसी औरकी क्या गणना ! ऐसे सिन्धुदैत्यको भी आपने जीत लिया। हे सुरेश्वर ! आपने उस दुष्ट सिन्धु दैत्यसे बहुतोंकी रक्षा की है, यदि आप ऐसा नहीं करते, तो गणोंका तथा अन्य सभी लोगोंका जीवन कैसे बच पाता ! ॥ २-३ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारसे जब ऋषिगण उन गुणेश्वरकी कीर्तिका गान कर रहे थे कि उसी समय देवी गिरिजा वहाँ आयीं और अपने पुत्र गुणेशका आलिंगन करके उनसे बोलीं-युद्धकी लालसा रखनेवाले तुम अत्यन्त थक गये हो ॥ ४ ॥ उसी समय शीघ्र ही भगवान् शिव भी वहाँ आये और उन्होंने उन मयूरेशका आलिंगनकर उनसे कहा- जो कार्य देवराज इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी असाध्य था, वह कार्य आपने करके दिखाया है। आप साक्षात् परब्रह्मस्वरूप हैं, सम्पूर्ण चराचर जगत्के गुरु हैं, सब कुछ जाननेवाले हैं और पृथिवीके भारको हलका करनेमें सदा निरत रहते हैं, आपकी महिमाको, आपके यथार्थ स्वरूपको ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं जानते हैं और न गौतम आदि मुनि ही भलीभाँति जानते हैं तो उसे जाननेकी सामर्थ्य हममें कैसे हो सकती है ? ॥ ५-७ ॥ ब्रह्माजी बोले-जब देवेश्वर भगवान् शिव इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय मुनिश्रेष्ठ नारदजी माता पार्वतीसे कहने लगे- हे माता ! आप मेरी बात सुनें ॥ ८ ॥ हे शिवे ! इस स्थानपर रहते हुए बहुत दिन व्यतीत हो गये हैं, हे अनघे ! वह अत्यन्त दुष्ट दैत्यराज सिन्धु कब मुक्तिको प्राप्त करेगा ? जिस दैत्य सिन्धुने इन्द्र आदि देवताओंको भी जीत लिया है, उसका विनाश कैसे होगा ? हे सुव्रते ! मयूरेशका विवाह कब होगा ? ॥ ९-१० ॥ हमें आप आज्ञा दीजिये, हम लोग जायँगे, पुनः शीघ्र ही लौट भी आयेंगे। दैत्यराज सिन्धुके बन्धनसे वे देवता कब मुक्त होंगे ? हे माता ! उस दैत्य सिन्धुका वध तो मुझे असाध्य ही प्रतीत होता है ॥ ११-१२ ॥ ब्रह्माजी बोले-देवर्षि नारदजीकी बातोंको सुनकर वे गण और षडानन आदि वीर उन सुरेश्वर देव मयूरेश्वरको उद्बुद्ध करनेके प्रयोजनसे देवदर्शन नारदजीसे कहने लगे- हे मुने ! हे अनघ ! हे नारद ! आश्चर्य है
क्री०ख०-अ०१२२] * गौतम तथा भगवान् शिवद्वारा मयूरेशके पराक्रमका वर्णन * ५६७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
कि आप सर्वज्ञ हैं, तथापि इस प्रकारकी बातें कर रहे हैं। ये प्रभु मयूरेश तो इसी कार्यकी सिद्धिके लिये अपने निज धामसे इस पृथ्वीपर आये हुए हैं ॥ १३-१४॥ ये मयूरेश सम्पूर्ण कामनाओंसे परिपूर्ण हैं, सम्पूर्ण पदार्थोंको प्रदान करनेवाले हैं। ये गुणातीत हैं, गुणोंके ईश हैं और सत्त्व-रज तथा तम—इन तीनों गुणोंमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाले हैं, इनके यथार्थ स्वरूपका निरूपण करनेमें ब्रह्मा आदि देव भी सर्वथा असमर्थ हैं, ये पृथ्वीके भारका हरण करनेके इच्छुक हैं, इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी अवध्य महाबलशाली असुरोंका वध करनेमें निरत हैं, ये अनन्त कोटि ब्रह्माण्डोंके नायक हैं, सम्पूर्ण जगत्के आत्मस्वरूप हैं और सभी लोकोंकी उत्पत्ति करनेवाले, पालन करनेवाले और फिर संहार करनेवाले भी ये ही हैं, क्या आप इन मयूरेशके स्वरूपको तथा इनके बल-पराक्रमको नहीं जानते ? ॥ १५-१७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—षडानन आदिकी इस प्रकारकी वाणी सुनकर देवर्षि नारदजी पुनः कहने लगे—जब मैं उस दैत्य सिन्धुको मरा हुआ देखूँगा और मुक्तिको प्राप्त हुआ देखूँगा, तभी मैं सभी वचनोंको सत्य मानूँगा, अन्यथा कभी नहीं ॥ १८-१९ ॥ नारदजीके इस प्रकारके वचनको सुनकर मयूरेश्वर अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे। वे क्रोधसे उद्दीप्त हो उठे और तीनों लोकोंको निनादित करते हुए गरजे ॥ २० ॥ उस समय वे तीनों लोकोंको जलाते हुए-से और इस पृथिवीको चूर-चूर करते हुए-से मेघके समान गम्भीर वाणीमें उन मुनि नारदजीसे बोले ॥ २१ ॥ मयूरेश बोले—हे मुनीश्वर नारदजी ! आप ब्रह्माजीके पुत्र होनेके कारण और सर्वज्ञ होनेके कारण माननीय हैं, अतः मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपनी मर्यादाका पालन करें ॥ २२ ॥ मैं आपकी कृपासे क्षणभरमें ही इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड तथा यमराजको भी निगल जाऊँगा। भूलोकको उलट डालूँगा और सभी सागरोंको सोख डालूँगा। हे मुने ! मैं अपनी निःश्वासवायुसे मेरुको हिला डालूँगा। हे नारदजी ! हे सर्वत्रगामी ! आप मेरी इस सत्य प्रतिज्ञाका इस समय श्रवण करें। मैं उस दैत्य सिन्धुको मार
[दायाँ स्तम्भ]
डालूँगा, इसमें विचार करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है ॥ २३-२४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—ऐसा कहकर वे विनायक मयूरेश मयूरपर आरूढ़ होकर युद्धके लिये चल पड़े। उसी समय नन्दी तथा भृंगी—दोनोंने उन विनायकसे कहा—हम दोनों युद्ध करेंगे, आप हमारे रणकौशलको देखें ॥ २५-२६ ॥ ऐसा कह करके वे दोनों वायुके समान वेगसे गण्डकीपुरीकी ओर चल पड़े। उन दोनोंके जानेका समाचार सुनकर वीरभद्र तथा भूतराज भी युद्धके लिये निकल पड़े। उस समय धरती काँपने लगी और शेषनाग व्याकुल हो उठे। तदनन्तर कार्तिकेय आदि चारोंने उस दैत्य सिन्धुका वह दुर्ग देखा, जो देवराज इन्द्र आदि देवताओंके लिये भी दुर्गम था ॥ २७-२८ ॥ उस दुर्गके भीतर एक पलंगपर सुखपूर्वक बैठे हुए दैत्यराज सिन्धुको उसके गुप्तचरोंने बताया कि हे महान् असुर ! पर्वतके समान विशाल आकृतिवाले चार वीर दसों दिशाओंको गुंजायमान करते हुए आपकी नगरीमें चले आये हैं, फिर आप निश्चिन्त क्यों बैठे हुए हैं ? इस प्रकारके वचनोंको सुनकर दैत्यराज सिन्धु क्षणभरमें ही चिन्तासागरमें निमग्न हो गया ॥ २९-३० ॥ सिन्धुपत्नी दुर्गा भी चिन्तासे व्याकुल हो उठी। दैत्य सिन्धुके समान ही उसका मुख भी काला पड़ गया। दोनोंका मुख नीचेको झुक गया और वे उसी क्षण महान् दुःखको प्राप्त हो गये ॥ ३१ ॥ दुर्गा कहने लगी—हे महाराज ! मैंने आपसे जो कुछ कहा था, उसे आपने नहीं किया, उसीका यह सब फल है, अब इस समय चिन्ता करनेसे क्या लाभ ? ॥ ३२ ॥ दुर्गा इस प्रकार बोल ही रही थी कि वे चारों श्रेष्ठ वीर—नन्दी, भृंगी, वीरभद्र और भूतराज राजाके सभामण्डपमें प्रविष्ट हो गये। वह सभामण्डप अनेक प्रकारके आश्चर्योंसे समन्वित था, विविध प्रकारके रत्नों तथा स्वर्णसे उसका निर्माण हुआ था तथा वह अनेक शिखरोंवाला था। क्रुद्ध होकर एकाएक भृंगी उछलकर उस सभामण्डपके बीचमें खड़े हो गये, उन महाबली भृंगीने बलपूर्वक तत्काल उस मण्डपको तोड़ डाला। उस मण्डपके टुकड़े-टुकड़े वहाँ आँगनमें
५६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चारों ओर बिखर गये॥ ३३-३५॥ सिन्धुने सर्पास्त्रको छोड़ा। उन सर्पोंने तीनों योद्धाओंको तदनन्तर वे तीनों वीर-नन्दी, वीरभद्र और भूतराज लपेट लिया, तब भृंगीने उसी समय एकाएक गरुड़ास्त्रका भी उस भृंगीके पास चले गये। युद्धके लिये आविष्ट उन संधान किया। तदनन्तर दैत्य सिन्धुने आग्नेयास्त्र चलाया, सभीके मुख लालवर्णके हो गये थे और वे सेनासहित यह देखकर भृंगीने पर्जन्यास्त्रको छोड़ा ॥ ४५-४६॥ उस सिन्धुको निगल जानेकी इच्छा रखनेवाले थे ॥ ३६ ॥ तब सिन्धुदैत्यने वायव्यास्त्रका प्रयोग किया तो उन वीरोंका वैसा पराक्रमपूर्ण कर्म देख करके भृंगीने पर्वतास्त्रसे उसका निवारण किया। तदनन्तर नन्दी दैत्यराज सिन्धुकी सेना सामने आ गयी। वह सेना आदि वे चारों वीर उसके साथ बड़े ही मान-सम्मानके खड्ग, ढाल, धनुष-बाण, भाला तथा मुद्गर धारण की साथ क्रमशः मल्लयुद्ध करने लगे। नन्दीने दैत्य सिन्धुके हुई थी। 'मारो, इन चारों महान् वेगशाली वीरश्रेष्ठोंको मस्तकपर स्थित मुकुटको गिरा दिया, भृंगीने अत्यन्त रुष्ट मार डालो', ऐसा कहकर दैत्य सिन्धुके सैनिक उन होते हुए उस दैत्यकी पीठपर प्रहार किया ॥ ४७-४८ ॥ चारोंको मारनेके लिये आये ॥ ३७-३८ ॥ वीरभद्रने उस दैत्यके देखते-देखते उसकी भार्याके दैत्यराज सिन्धुके असंख्य सैनिक बड़े ही उत्साहसे बाल पकड़ लिये और भूतराजने वैरभावका स्मरण करके उन चारों वीरभद्रादिके साथ युद्ध करने लगे। 'मैं तुम्हें उस सिन्धुदैत्यको लातोंसे मारा। दैत्य सिन्धुकी पत्नी मारता हूँ, तुम मुझे मारो'-इस प्रकार कहते हुए दुर्गानि अपने नेत्र बन्द कर लिये, वह उस प्रकारकी [वीरोंका] वहाँ महान् कोलाहल व्याप्त हो गया ॥ ३९ ॥ दुर्गति को प्राप्त अपने पतिको वैसी स्थितिमें देख न सकी। तदनन्तर दैत्यसेनाका उन चारोंके साथ भीषण वह अपने पतिके कर्मोंकी निन्दा करती हुई अपने भवनके संग्राम होने लगा। उठनेवाली धूलिके कारण वहाँ लिये पलायित हो गयी ॥ ४९-५० ॥ अन्धकार छा गया था, उस अन्धकारमें वे योद्धागण दैत्य सिन्धु भी अत्यन्त आवेशमें आ गया। उसने शस्त्रोंके चमचमाते प्रकाशमें युद्ध कर रहे थे ॥ ४० ॥ वीरभद्रका पाँव पकड़ लिया। नन्दीको मुष्टिकाके प्रहारसे उस युद्धमें नन्दी आदि चारों वीरोंने सैकड़ों करोड़ मारा और भृंगीकी चोटी पकड़कर जमीनपर गिरा दिया। दैत्योंको मार डाला। उन्होंने अपने ओजसे असंख्य भूतराज मूर्च्छित हो गये। तब दैत्यराज सिन्धु पुनः मुकुट महावीर दैत्योंका पाँव पकड़कर उन्हें भूमिपर पटक धारणकर और गलेमें मोतियोंकी माला पहनकर एक उत्तम दिया। फिर उन दैत्योंको बार-बार घुमाकर आकाशमें घोड़ेपर सवार हुआ और शेष बचे हुए सैनिकोंको बुलाकर फेंक दिया। वहाँसे जमीनपर गिरकर उनके सौ-सौ उनसे बोला- 'आज मैं उस मयूरेशको मार डालूँगा', ऐसा टुकड़े हो गये ॥ ४१-४२ ॥ कहकर वह पुनः युद्धके लिये चल पड़ा ॥ ५१-५३ ॥ उस युद्धभूमिमें बाणोंसे, विविध अस्त्रोंसे, शस्त्रोंसे, दैत्य सिन्धुने दिशाओं तथा विदिशाओंको गुंजायमान पाँवके प्रहारसे और हाथकी चोटसे दैत्योंकी उस सम्पूर्ण करते हुए गर्जना की। उस समयतक नन्दी आदि चारों सेनाका उन्होंने विनाश कर दिया ॥ ४३ ॥ वीर गणनायक मयूरेशके पास जा चुके थे, उन्होंने तदनन्तर वीरभद्र आदि वे चारों वीर वेगपूर्वक बताया कि दैत्यसेनाके सभी वीरोंको उन्होंने नष्ट कर दैत्यराज सिन्धुके भवनमें जाकर पलंगपर बैठे हुए उस डाला है। हे गणेश्वर ! उस सिन्धु दैत्यको भी हम सिन्धु दैत्यके बाल पकड़कर उसे विजयके स्मारक रणभूमिमें ले आये हैं। वह थोड़ी-सी सेनाके साथ है। स्तम्भके रूपमें रणक्षेत्रमें ले आये ॥ ४४ ॥ आप उसे इस भवसागरसे मुक्त कर दें। हे विघ्नराज ! तदनन्तर दैत्यराज सिन्धुने अपने महान् अस्त्रोंके आपकी आज्ञा नहीं थी, नहीं तो हम ही उसे मार द्वारा उन नन्दी आदिके साथ युद्ध किया। दैत्यराज डालते ॥ ५४-५६॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुकी सेनाके संहारका वर्णन' नामक एक सौ बाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२२ ॥
एक सौ तेईसवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०१२३ ] * देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम * ५६१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 एक सौ तेईसवाँ अध्याय देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम, मयूरेशका विराट्स्वरूप धारण करना, पुनः लघुस्वरूपमें होकर मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित परशुद्वारा सिन्धुका वध करना, शिव-पार्वती तथा देवोंका उपस्थित होना और मयूरेशस्तोत्रद्वारा स्तुति करना
ब्रह्माजी बोले- दैत्यराज सिन्धु आ गया है, यह समाचार सुनकर वे मयूरेश आनन्दित हो गये और अपने वाहन मयूरपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही युद्धके लिये निकल पड़े। वे अपने हाथोंमें धारण किये हुए चार आयुधोंसे सभी दिशाओं-विदिशाओंको प्रकाशित कर रहे थे। उन्होंने प्रलयकालीन मेघोंकी गर्जनाके समान गर्जना करते हुए आकाशको निनादित कर डाला॥ १-२॥ उन्होंने देखा कि युद्ध करनेके निश्चयसे दैत्य सिन्धु आगे खड़ा है, वह दैत्य सिन्धु भी इन्हें युद्ध करनेके लिये रणभूमिमें उपस्थित देखकर बार-बार उसी प्रकार उन्हें देखने लगा, जैसे हाथी सिंहको देखता है, सर्प गरुड़को देखता है, मधु और कैटभ दैत्योंनै जैसे भगवान् विष्णुको देखा था, त्रिपुरासुरने जैसे पार्वतीपति भगवान् शंकरको देखा और जैसे शुम्भ तथा निशुम्भ राक्षसोंने महाबलशालिनी जगदम्बाको देखा था। तदनन्तर विविध प्रकारके शस्त्रोंसे उन दोनों मयूरेश और दैत्य सिन्धुमें परस्पर युद्ध हुआ॥ ३-५॥ उस समय उन दोनोंकी देह रक्तसे सनी होनेके कारण जपापुष्पके समान लाल रंगकी हो गयी। उन दोनोंके शस्त्रोंके परस्पर आघातसे उत्पन्न अग्निने पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीको जला डाला॥ ६॥ उस समय सागर, द्वीपों तथा पर्वतोंसहित सारी पृथ्वी काँप उठी। तदनन्तर दैत्य सिन्धुने एक बाण हाथमें लिया और उसे आग्नेयास्त्र मन्त्रसे अभिमन्त्रितकर रणांगणमें उपस्थित उन देव मयूरेशको जला डालनेके लिये छोड़ा। वह अग्निबाण उस देवसेनाको जलाते हुए दसों दिशाओंकी ओर चला॥ ७-८॥ तदनन्तर तीनों लोकोंको कम्पित करते हुए मयूरेशने अपने पाश नामक आयुधको मेघास्त्रसे संयोजितकर दैत्यसेनापर छोड़ा। उस मेघास्त्रने जलधाराओंकी वर्षा
करते हुए आग्नेयास्त्रसे उत्पन्न अग्निको शान्त कर डाला। तब अत्यधिक अन्धकारके द्वारा दसों दिशाएँ व्याप्त हो गयीं॥ ९-१०॥ उन वेगशाली जलधाराओंने पर्वतोंको चूर-चूर कर डाला, वृक्षोंके समूहके समूह टूट पड़े। क्या यह प्रलय हो गया ? इस प्रकारसे वह दैत्यराज सिन्धु सोचने लगा। तब दैत्य सिन्धुने पवनास्त्रका प्रयोग करके उन जलवृष्टि करनेवाले मेघोंको तितर-बितर कर दिया। उस वायुने आकाशमण्डल तथा दसों दिशाओंको कम्पित कर डाला॥ ११-१२॥ तदनन्तर देव मयूरेशने अपने हाथमें धारण किये हुए कमलको पर्वतास्त्र मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उसे उस महान् दैत्यके ऊपर छोड़ दिया॥ १३॥ उस पर्वतास्त्रने वृक्षोंको उखाड़ डाला और दसों दिशाओं तथा आकाशको उद्भासित कर दिया, फिर वह अस्त्र दैत्यसेनाके मध्यमें गया और उसने बहुत-से पर्वतोंको प्रकट कर डाला। उत्पन्न हुए असंख्य बड़े- बड़े पर्वतोंने सारी पृथ्वीको आच्छादित कर डाला। उस समय न कहीं ठहरनेके लिये स्थान रह गया था और न कहीं जानेके लिये ही मार्ग बच गया था॥ १४-१५॥ पवनास्त्रको निष्प्रभाव हुआ देखकर और सभी ओर पर्वतोंको व्याप्त देखकर दैत्य सिन्धुने वज्रास्त्रको प्रेरित किया, जिससे असंख्य वज्र निकल पड़े॥ १६॥ उन असंख्य वज्रोंने पर्वतोंको चूर-चूर कर डाला। यह देखकर देव मयूरेशने अपने आयुध अंकुशको वज्रास्त्र मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया और उन वज्रोंपर उसे चला दिया। तब दोनों ओरसे वज्रयुद्ध होने लगा। उन वज्रोंके टकरानेकी ध्वनिसे पृथ्वी कम्पित हो उठी और पाताल, सभी दिशाएँ तथा आकाश भी प्रकम्पित हो उठा॥ १७-१८॥
५७० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
क्री०ख०-अ०१२३] * देव मयूरेश और दैत्य सिन्धुका भीषण संग्राम * ५७१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
प्रसन्नताके साथ देव मयूरेशकी स्तुति करने लगे ॥ ३८ ॥ सभी बोले-जो परब्रह्मस्वरूप, चिदानन्दमय, सदानन्दरूप, देवेश्वर, परमेश्वर, गुणोंके सागर, गुणोंके स्वामी तथा गुणोंसे अतीत हैं, उन आदि ईश्वर मयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ३९ ॥ जो एकमात्र विश्ववन्द्य और एकमात्र परम ओंकारस्वरूप हैं, जो गुणोंके परम कारण एवं निर्विकल्प हैं, उन जगत्के पालक, संहारक एवं उद्धारक आदि- मयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं। जो महादेवजीके पुत्र, महान् दैत्योंके नाशक, महापुरुष, सदा विघ्नविनाशक तथा सदैव भक्तोंके पोषक हैं, उन परम ज्ञानके कोष आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४०-४१ ॥ जिनका कोई आदि नहीं है, जो समस्त गुणोंके आदिकारण तथा देवताओंके भी आदि-उद्भावक हैं, पार्वतीदेवीको महान् सन्तोष देनेवाले तथा सबके द्वारा सदा ही वन्दनीय हैं, उन दैत्यनाशक एवं भोग तथा मोक्षके प्रदाता आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४२ ॥ जो परम मायावी (मायाके अधिपति) और मायावियोंके लिये भी अगम्य हैं, महर्षिगण जिनका सदा ध्यान करते हैं, जो अनादि आकाशके तुल्य सर्वव्यापक हैं, जीवमात्रके स्वामी हैं तथा जिनके असंख्य अवतार हैं, उन आत्मतत्त्वविषयक अज्ञानके नाशक आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४३ ॥ जो अनेकानेक क्रियाओंके कारण हैं, जिनका स्वरूप श्रुतियोंके लिये भी अगम्य है, जो वेदबोधित अनेकानेक कर्मोंके आदिबीज हैं, समस्त कार्योंकी सिद्धिके हेतु हैं तथा देवेन्द्र आदि जिनकी सदा सेवा करते हैं, उन आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४४ ॥ जो महाकालस्वरूप हैं, लव-निमेष आदि भी जिनके ही स्वरूप हैं, जो कला और कल्पस्वरूप हैं तथा जिनका स्वरूप सदा ही अगम्य है, जो लोगोंके ज्ञानके हेतु तथा मनुष्योंको सब प्रकारकी सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं, उन आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं। महेश्वर आदि देवता सदा जिनके चरणोंकी सेवा करते हैं, जो योगियोंके नित्य रक्षक, चित्स्वरूप, निरन्तर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और करुणाके सागर हैं, उन आदिमयूरेश्वरको हम नमस्कार करते हैं, नमस्कार करते हैं ॥ ४५-४६ ॥ हे सुरश्रेष्ठ ! आप सदा भक्तजनोंके लिये हठात् परमानन्दमय सुख देनेवाले हैं; क्योंकि आप संसारके जीवोंपर शीघ्र परम करुणाका विस्तार करते हैं। हे प्रभो ! काम-क्रोधादि छः प्रकारकी ऊर्मियोंके वेगको शान्त कीजिये; क्योंकि आपके अनन्त सुखदायक भजनकी अपेक्षा मुक्ति भी स्पृहणीय नहीं है। हे गजानन ! क्या हम आपके योग्य कोई उत्तम या सुन्दर स्तवन कर सकते हैं ? आप समस्त गुणोंकी निधि और सम्पूर्ण जगत्के प्रेमपात्र हैं। आपके गुणसमूहोंका वर्णन करनेकी शक्ति हममें नहीं है। आपका जो यह जगत्की सृष्टि-रचनाका क्रम है, वह समुद्रके समान अपार है ॥ ४७-४८ ॥ ब्रह्माजी बोले-इस प्रकार स्तुति करनेके अनन्तर वे सभी बड़े ही आदरपूर्वक उनसे निवेदन करने लगे- हे मयूरेश ! जो आपने कहा था, उस महान् वचनका आपने पालन किया ॥ ४९ ॥ सभी देवसमूहोंके लिये यह महादैत्य सिन्धु अवध्य था, उसे आज आपने मार गिराया है। उसी समय वहाँ पार्वती आयीं और वे बड़ी आनन्दित हुईं, उन्होंने उन मयूरेशका आलिंगन किया। भगवान् शिव भी वहाँ आये और उन्होंने मयूरेशका आलिंगनकर उनसे कहा-हे वत्स ! तुमने बहुत अच्छा कर्म किया है, अब सम्पूर्ण त्रिलोकी हर्षित हो गयी है ॥ ५०-५१ ॥ सभी देवताओंके लिये भी जो असाध्य था, उस दैत्य सिन्धुका तुमने वध किया है, फिर भी तुम्हें कोई श्रम मालूम नहीं हुआ, तुम महापराक्रमशाली हो, सभी लोगोंकी रक्षामें निरत रहते हो, चारों वेद भी तुम्हारे यथार्थ स्वरूपका निरूपण कर पानेमें असमर्थ हैं और तुम सभी विद्याओंके निधान हो। इस प्रकारसे कहनेके अनन्तर वे सभी सम्मानित होकर अपने स्थानोंको चले
५७२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
गये। मयूरेशको प्रणाम करनेके अनन्तर जब वे सभी | विजय प्राप्त होती है। वह अत्यन्त दुर्लभ ऐश्वर्यको प्राप्त देवता जाने लगे तो देव मयूरेश उनसे बोले—जो इस | करता है, पुत्रवान् होता है, धन-सम्पत्ति प्राप्त करता है स्तोत्रका पाठ करता है, वह समस्त कामनाओंको प्राप्त | और सबको अपने वशमें कर लेता है॥ ५५-५६॥ कर लेता है॥ ५२-५४॥ ब्रह्माजी बोले—मयूरेशके द्वारा ऐसा कहे जानेपर इस स्तोत्रका एक हजार बार पाठ करनेसे कारागृहमें | देवगणोंने उनके कथनका 'साधु-साधु' ऐसा कहकर बन्द बन्दीजनको वहाँसे मुक्ति प्राप्त होती है। इस | समर्थन किया और मयूरेशसे जानेकी आज्ञा प्राप्त करके स्तोत्रका दस हजार बार पाठ करनेसे मनुष्य जो असाध्य | वे देवता चले गये और देव मयूरेशने भी अपने गणोंके भी है, उसे तत्क्षण ही सिद्ध कर लेता है। उसे सर्वत्र | सहित अपने धामको प्रस्थान किया॥ ५७॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्धुके वधका वर्णन' नामक एक सौ तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १२३॥
एक सौ चौबीसवाँ अध्याय सिन्धु-वधके अनन्तर माता-पिता तथा पत्नीका करुण विलाप, पत्नी दुर्गाका सती होना, पिता चक्रपाणिके द्वारा मयूरेशकी स्तुति और उनसे गण्डकीनगरमें चलनेके लिये प्रार्थना करना, शिव-पार्वती तथा गणों एवं मुनियोंसहित मयूरेशका गण्डकीनगरके लिये प्रस्थान
ब्रह्माजी बोले—युद्धभूमिमें दैत्यराज सिन्धुके गिर | हमलोग रो रहे हैं। देवताओंको मरा हुआ देखकर जानेपर जो बचे हुए योद्धा थे, वे वापस गण्डकीनगरमें | पार्वतीका पुत्र वह मयूरेश अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्धस्थलमें चले आये और यहाँ उन्होंने देखा कि दैत्य सिन्धुकी | आया, उसने अपने अस्त्रोंके द्वारा दैत्यराज सिन्धुके माता उग्रा, पत्नी दुर्गा तथा उसके पिता चक्रपाणि | अस्त्रोंको रोककर तीक्ष्ण परशुको छोड़ा॥ ६-७॥ अत्यन्त चिन्तामग्न तथा बहुत व्याकुल होकर पड़े हुए | उस परशुके आघातसे सिन्धु मृत्युको प्राप्त होकर थे, उस समय उन लोगोंको अनेक प्रकारके अपशकुन | भूमिपर गिर पड़े। वहाँ उन दैत्य सिन्धुके सभी सैनिक भी दिखायी देने लगे॥ १-२॥ | तथा नगरनिवासीजन भी मूर्च्छित हो गये॥ ८॥ उन्होंने देखा कि कोई व्यक्ति अशुभकी सूचना देता | दूतोंके मुखसे इस प्रकारकी बात सुनकर वे सभी हुआ उत्तरकी ओर सिर करके सोया हुआ है। कोई अपने | रोने लगे। दैत्य सिन्धुकी पत्नी दुर्गा अत्यन्त विलाप करने दोनों घुटनोंके बीच सिर रखकर बैठा था और बिना कुछ | लगी और जोर-जोरसे सिर पीटने लगी॥ ९॥ बोले चुपचाप हिलता हुआ-सा प्रतीत हो रहा था॥ ३॥ | उसके केश बिखर गये, वह अपने मुखको बार- कोई स्त्री खिन्न-सी होकर अपनी ठुड्डीमें हथेलीको | बार पीटने लगी, उसके आभूषण गिर गये थे। उस समय टिकाकर बैठी हुई है, उसी समय यमदूतोंके समान कुछ | सिन्धुदैत्यकी माता उग्रा, पिता चक्रपाणि तथा समस्त दूत वहाँ आये, उन दूतोंका मुख अत्यन्त मुरझाया हुआ | पुरवासी रो-रोकर अपने हाथसे मुख पीटने लगे। वे था, उनकी स्थिति दयनीय थी, वे कुछ बोल नहीं रहे | अपना सिर जमीनपर पटक-पटककर जोर-जोरसे चिल्लाते थे, मौन थे। उनसे पूछे जानेपर उनमेंसे कुछ दूसरे दूतोंने | हुए भूमिपर लोटने लगे॥ १०-११॥ युद्धमें जो हुआ, वह समाचार बताते हुए कहा॥ ४-५॥ | कोई-कोई दुखी होकर धूलको अपने मुखपर तथा दूत बोले—असंख्य महान् वीरोंका वध करनेके | सिरपर उछालने लगा, कोई अपनी हथेलीके पृष्ठभागोंको अनन्तर दैत्यराज सिन्धु हम बालकोंको असहाय छोड़कर | दाँतसे काटने लगा और उनसे जमीन पीटने लगा। स्त्रियाँ स्वर्गको प्राप्त हो गये हैं, इसी कारण उनके विरहमें | अपनी अँगुलियोंको तोड़-मरोड़कर गिरिजाके पुत्र उस
क्री०ख०-अ०१२४ ] * सिन्धु-वधके अनन्तर माता-पिता तथा पत्नीका करुण विलाप * ५७३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 मयूरेशको शाप देने लगीं ॥ १२ ॥ उग्रा बोली—[हे वत्स !] मैंने विविध प्रकारके प्रयत्नों, कठोर तपस्या, भगवान् सूर्यकी प्रसन्नता, उन्हें नमन करने, उनकी स्तुति करने, विविध प्रकारके उपवासों तथा सभी प्रकारके दानोंको देनेके अनन्तर बहुत समयके बाद किसी प्रकार तुम्हें प्राप्त किया है, अरे शूर ! अरे मानी ! इस समय तुम्हें कौन ले गया है ? ॥ १३ ॥ तुम्हारे तीनों लोकोंके नायक होनेसे मैं भी तीनों लोकोंमें प्रशंसनीय थी, लेकिन अब इस समय लोग मुझे 'तुम भाग्यहीन हो' इस प्रकार कहकर उलाहना देंगे ॥ १४ ॥ पूर्वकालमें तुमने यमराजको जीत लिया था, फिर आज कैसे उनसे मिलना हो गया है ? हे पुत्र ! आज पुनः तुमने उसको कैसे नहीं जीत लिया ? ॥ १५ ॥ हे पुत्र ! तुम्हारे स्वर्गलोक चले जानेपर पार्वतीके पुत्र उस मयूरेशकी इच्छा पूर्ण हो गयी है। मुझसे बिना पूछे ही तुम सुख देनेवाले उस स्वर्गलोकको क्यों चले गये हो ? हे पुत्र ! मुझे दुखी देखकर तुम किस प्रकार सन्तोष प्राप्त कर सकोगे ? हे पुत्र ! जब तुम गर्जना करते थे तो भयभीत होकर मेघ गरजना छोड़ देते थे, किंतु हे पुत्र ! वही आज तुम रणांगणमें कैसे शान्त होकर गिरे पड़े हो ? ॥ १६-१७१/२ ॥ दुर्गा बोली—वेदोंके विधानके अनुसार विधाताने हम दम्पतीका शरीर दो होनेपर भी एक तो बनाया है, किंतु उस मूढ़बुद्धि ब्रह्माने प्राणोंकी एकता क्यों नहीं बनायी ? सौभाग्यके अभिमानसे गर्वित होकर मैं अपने सामने शची तथा सावित्रीको भी कुछ नहीं गिनती थी, फिर वही आज मैं विधवा कैसे हो गयी हूँ ? [हे स्वामिन् !] आप जब अपने हाथसे मेरे अंगोंमें कस्तूरी तथा चन्दनका लेप लगाते थे, तभी मेरे अंग शीतल होते थे, किंतु इस समय शोकाग्निके द्वारा वे सभी अंग दग्ध हो रहे हैं, उन्हें आप शीतलता प्रदान करें ॥ १८-२१ ॥ पहले तो आप मेरे बिना अणुमात्र विषका भी सेवन नहीं करते थे, फिर आप आज मेरे बिना स्वर्गके उस सुखका कैसे भोग कर रहे हैं ? ॥ २२ ॥ जो सज्जन होते हैं, सबके साथ समान व्यवहार करनेवाले होते हैं, वे बिना अपराधके अपने सेवककी उपेक्षा नहीं करते हैं, फिर आप क्यों मेरी उपेक्षा कर रहे हैं ? देवताओंका भी अन्त करनेवाले हे स्वामिन् ! आपने पूर्वकालमें बिना गुणोंकी अपेक्षा रखते हुए मुझसे विविध प्रकारका निश्छल प्रेम किया है, फिर इस समय उस अवर्णनीय प्रेमका परित्यागकर आप क्यों चले गये हैं ? ॥ २३-२४ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर तपोवृद्ध तथा ज्ञानवृद्ध-जन यह कठोर वचन कहकर उनको समझाने लगे कि धर्मशास्त्रको जाननेवाले विद्वान् मृत्युके अनन्तर रोनेकी प्रशंसा इसलिये नहीं करते हैं कि मित्र तथा सम्बन्धीजनोंके जो आँसू निकलते हैं, वे निश्चित ही प्रेतके मुखमें पड़ते हैं, अतः उस मृत व्यक्तिका हित करनेवाले दयावान्को चाहिये कि उस प्रेतके लिये जो हितकारी कर्म है, उसे सम्पन्न करे* ॥ २५-२६ ॥ विचार करनेपर यह सुनिश्चित होता है कि उन कृपालु, निर्गुण, चिदानन्दघन, ब्रह्मस्वरूप मयूरेशने दैत्य सिन्धुको भी मोक्ष ही प्रदान किया है। संसारका कल्याण करनेवाले उन मयूरेशने जीवोंपर दया करनेके लिये ही शरीर धारण किया है और उन्होंने युद्धमें सम्मुख उस सिन्धुका वध करके उसे मोक्ष प्रदान किया है ॥ २७-२८ ॥ आत्मा अनादि है, निर्गुण है और नित्य है, इसलिये उसकी न तो मृत्यु होती है और न कभी उसका जन्म ही होता है, ऐसा वेदमें निश्चित किया गया है ॥ २९ ॥ व्यक्ति अपने स्वार्थवश ही मृत व्यक्तिके लिये रोता है, वह उसका हित नहीं चाहता। असंख्य प्राणियोंके भारको वहन करनेवाली पृथिवी, कूर्म, वराह तथा पृथ्वीको
- ब्रह्मोवाच तपोवृद्धा ज्ञानवृद्धाः प्राब्रुवन्निष्ठुरं वचः । न रोदनं प्रशंसन्ति धर्मशास्त्रविदो जनाः ॥ यदश्रु सुहृदामास्ये प्रेतस्य तत्पतेद् ध्रुवम् । तस्मात्तस्य हितं यत्स्यात्तत्कर्तव्यं दयावता ॥ (श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड १२४ । २५-२६)
५७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
धारण करनेवाले शेषनाग—ये सब प्रेतका भार सहन नहीं कर पाते। वृद्धजनोंद्वारा इस प्रकारसे कहा जानेपर वे लोग तब शोकमुक्त हुए ॥ ३०-३१ ॥ तदनन्तर दैत्य सिन्धुकी माता उग्रा, पिता चक्रपाणि, अपनी सखियोंके साथ भार्या दुर्गा तथा गण्डकीनगरके निवासी जन—ये सभी शोक करते हुए युद्धस्थलमें गये। वहाँ उन्होंने रणभूमिमें पड़े हुए सिन्धुको देखा, जिसे सेवक पंखा झल रहे थे, उसका मुखरूपी कमल फैला हुआ था और उसके नेत्र सफेद हो चुके थे ॥ ३२-३३ ॥ उसके शरीरसे रक्त प्रवाहित हो रहा था और दुर्गन्ध भी आ रही थी। वहाँ मांसभक्षी पक्षी तथा हिंसक पशु भरे हुए थे। उसके माता-पिता, पत्नी तथा वे सभी नगरनिवासी उसे चारों ओरसे घेरकर बैठ गये, वे अत्यन्त दुखी तथा शोकसे व्याकुल थे ॥ ३४ ॥ अपने स्वामी दैत्य सिन्धुका सिर अपनी गोदमें रख करके उसकी भार्या दुर्गा बड़े जोरसे चिल्लाती हुई शोक मनाने लगी। हे नाथ ! पहले मैं अपने दोनों हाथोंसे आपके पैर दबाया करती थी, किंतु यहाँ लोगोंके सामने ऐसा करना सम्भव नहीं है, अतः हे प्राणनायक ! हे वीर ! आप उठें, शत्रुके जिन्दा रहते आप कैसे निद्रामें सो गये हैं ? ॥ ३५-३६ ॥ तदनन्तर अपने पतिके मुखमें अपना मुख रखकर वह विलाप करते हुए हाहाकार करने लगी। तब वृद्धजनों एवं ज्ञानीजनोंने उसे ऐसा करनेसे रोका। तत्पश्चात् दैत्य सिन्धुकी माता उग्रा तथा पिता चक्रपाणि—दोनों उसके मुखको धोने लगे और फिर उससे बोले—अरे वत्स ! उठो, शत्रुगणोंके जीवित रहते, क्यों सो रहे हो ? ॥ ३७-३८ ॥ वज्र धारण करनेवाले देवराज इन्द्रके वज्रसे आहत हुएके समान तुम भूमिपर गिरे पड़े हो। इस समय उस छोटे-से बालक मयूरेशके साथ युद्ध करनेपर तुम कैसे भूमिपर गिर पड़े ? ॥ ३९ ॥ तुमने तो अपनी भौंहोंके इशारेमात्रसे यमराजको भी जीत लिया था, फिर तुम आज कैसे उस यमके वशमें आ गये ? हे विभो ! हमारे हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाले कुछ वचनोंको तो तुम बोलो ॥ ४० ॥ हे अनघ ! पूर्वकालमें जिसके शब्दसे तीनों लोक भी काँप उठते थे, फिर आज हे अमन्द पराक्रमवाले वही तुम वह शब्द क्यों नहीं बोल रहे हो ? ॥ ४१ ॥ हम लोगोंने तुम्हारा कोई ऐसा अपराध भी नहीं किया है कि जिस कारण तुम मौन हो गये हो। लगता है कि तुम क्रोधके कारण ही अपनी समस्त सेनाके साथ हमसे कुछ नहीं बोल रहे हो ॥ ४२ ॥ जिसने अपनी कान्तिसे कामदेवको भी जीत लिया था, वही तुम आज किस प्रकार विह्वलताको प्राप्त हो रहे हो ? तदनन्तर विद्वज्जनों तथा वृद्धजनोंने अनेक प्रकारके उदाहरणोंद्वारा रोते हुए उन उग्रा तथा चक्रपाणि आदिको आश्वस्त किया और धीरज बँधाया। साथ ही यह भी कहा कि जो मर गया है, उसके पीछे स्वयं मर जाना ठीक नहीं है, क्या दशरथके पुत्र श्रीराम परलोकमें नहीं गये ? क्या अपने पराक्रमके बलपर शत्रुओंको जीतनेके अनन्तर रघुश्रेष्ठ श्रीराम परलोक नहीं गये। अन्य और भी सैकड़ों राजा उनके लिये युद्धभूमिमें मृत्युको प्राप्त हुए और अब वे अनेक प्रकारकी अपनी कीर्तिको स्थापित करके स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक स्थित हैं ॥ ४३-४५ ॥ ब्रह्माजी बोले—तदनन्तर उन सभीने विल्व तथा चन्दनकी लकड़ीसे उसका दाहसंस्कार किया। पतिव्रताके गुणोंसे सम्पन्न उसकी भार्या दुर्गा उसीके साथ सती हो गयी। तदनन्तर दैत्य सिन्धुके पिता चक्रपाणि नगरनिवासियोंके साथ मयूरेशके समीपमें गये, उन्होंने उन्हें नमस्कार किया और फिर हाथ जोड़कर वे धीरे- धीरे उनकी स्तुति करने लगे ॥ ४६-४७ ॥ राजा बोले—हे विभो ! आप निर्गुण हैं, परमात्मा हैं, सम्पूर्ण चर एवं अचर जगत्की गति हैं, आप वेदत्रयीके द्वारा गम्य नहीं हैं, सत्त्वादि तीनों गुणोंके स्वामी हैं, निर्मल स्वरूपवाले हैं और सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं। आपकी मायाके कारण ही मोहित देवता आपको भलीभाँति नहीं जान पाते हैं। हे प्रभो ! आज आपके दर्शनसे मैं धन्य हो गया हूँ और ये सभी गण्डकी- नगरमें निवास करनेवाले भी धन्य हो गये हैं ॥ ४८-४९ ॥
क्री०ख०-अ०१२५ ] * कारागारसे मुक्त हुए देवताओंका मयूरेशकी महिमाका गान करना * ५७५ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार राजाके द्वारा स्तुत किये गये, सभी शास्त्रोंके तत्त्वार्थको जाननेवाले एवं कृपासिन्धु देव मयूरेश अत्यन्त प्रसन्नताके साथ बोले ॥ ५० ॥ देव बोले—हे चक्रपाणे! आपका पुत्र मृत्युको प्राप्त हो गया है, आप मुझसे वर माँग लें ॥ ५० १/२ ॥ राजा बोले—हे देवेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और यदि आप मुझे वर देना चाहते हैं, तो आप हमलोगोंके घरमें पधारिये और इस गण्डकीनगरीको पवित्र कीजिये ॥ ५१ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—राजाका इस प्रकारका वचन सुनकर मयूरेशने मोरपर आरूढ़ होकर चक्रपाणिके नगर गण्डकीको प्रस्थान किया। उनके पीछे-पीछे भगवान् शंकर तथा माता पार्वती भी गये। उन सभीके आगे-आगे वे सभी गण तथा मुनिगण प्रसन्नमन होकर चल रहे थे। समस्त वाद्योंकी ध्वनिके साथ वे सभी उस गण्डकीनगरकी ओर गये, जो विविध प्रकारकी ध्वजाओं और पताकाओंसे सुसज्जित था और जहाँके मार्ग जल आदिके छिड़कावसे स्वच्छ किये गये थे ॥ ५२-५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'मयूरेशका गण्डकीनगरीके लिये प्रस्थानका वर्णन' नामक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२४ ॥ एक सौ पच्चीसवाँ अध्याय कारागारसे मुक्त हुए देवताओंका मयूरेशकी महिमाका गान करना, चक्रपाणिद्वारा मयूरेशकी प्रथम पूजा करनेसे इन्द्रका रुष्ट होना, महान् ध्वनिके साथ मयूरेशका प्रकट होना और पुनः पंचदेवोंके रूपमें अवतरित होना, ब्रह्माजीद्वारा सिद्धि-बुद्धि नामक कन्याओंका मयूरेशके साथ विवाह करना ब्रह्माजी बोले—अपने नगरमें सबसे आगे पहुँचकर चक्रपाणिने अत्यन्त मूल्यवान् चादरों तथा वस्त्रोंके द्वारा और पताकाओं, ध्वजों एवं चामरोंके द्वारा अपनी राजसभाको सुसज्जित करवाया। उस सभामें भूमिमें स्थित स्तम्भोंमें नाना प्रकारके रत्नोंकी आभा प्रकाशमान हो रही थी, जिसमें गये मनुष्योंके प्रतिबिम्ब अनन्त प्रकारके दिखायी दे रहे थे ॥ १-२ ॥ देवेश्वर मयूरेशने विविध प्रकारके ध्वजोंसे सुशोभित उस गण्डकीपुरीको देखा। उस पुरीके ऊँचे-ऊँचे भवनोंके शिखरोंपर चढ़ी हुई स्त्रियाँ उन मयूरेशको देख रही थीं ॥ ३॥ बन्धनमें डाले गये वे देवता चक्रपाणिद्वारा मुक्त होनेपर मयूरेशके समक्ष आये। उनमें विष्णु, इन्द्र, अग्नि, कुबेर, मरुद्गण, सूर्य तथा इन्द्राणी आदि सभी थे। वे विविध वाद्योंकी ध्वनि करते हुए शीघ्र ही वहाँ आये। वे सभी देवता अपने-अपने वाहनोंसे उतरे और उन सभीने मयूरेश्वरको प्रणाम किया ॥ ४-५ ॥ देवताओंने तथा पुरवासियोंने बड़े ही आदरके साथ मयूरेशका आलिंगन किया। मयूरेशका दर्शनकर भगवान् विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हो उठे। विष्णु आदि सभी देवताओंने दैत्यराज सिन्धुका वध कर दिये जानेके कारण मयूरेशकी अत्यन्त प्रशंसा की ॥ ६ १/२ ॥ देवता बोले—जिसने स्वर्ग आदि सभी लोकोंको भी भयभीतकर अपने अधीन बना डाला था, ऐसे दैत्य सिन्धुका क्षणभरमें आपने वध कर डाला और शीघ्र ही देवताओंको अपना-अपना पद प्रदान कर दिया, ऐसा दूसरा कोई देवता न देखा गया है और न कभी सुना ही गया है ॥ ७ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले—वहाँ जो-जो भी वैष्णव, शैव, शाक्त तथा सूर्योपासक सौर थे, उन्होंने मयूरेशका अपने- अपने इष्टदेवके रूपमें अर्थात् विष्णु, शिव, दुर्गा तथा सूर्यके रूपमें दर्शनकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ उनका पूजन किया। मयूरेशकी जय हो, यह ध्वनि सुनकर सभीको बड़ा ही आश्चर्य हुआ ॥ ८-९ ॥ उस समय बालकों, युवावस्थाको प्राप्त मुग्धा युवतियों, प्रौढा स्त्रियों, वृद्धजनों तथा युवावस्थावाले पुरुषोंने देव मयूरेशका मानसिक पूजन किया ॥ १० ॥
५७६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
हे मुनि व्यासजी ! चक्रपाणिके भवनमें पहुँचकर देवेश्वर मयूरेश वहाँ मध्यमें स्थित एक शुभ सिंहासनपर आसीन हो गये और उनके चारों ओर देवता, मुनि और सात करोड़की संख्यावाले सभी गण स्थित हो गये। तदनन्तर वन्दीजनोंने स्तुतिगान किया और वैसे ही सफलमनोरथ देवताओं तथा राजाओंने भी स्तवन किया ॥ ११-१२ ॥ उस समय अप्सराओंके समूह नृत्य करने लगे। नारद आदि ऋषिगण गान करने लगे। तदनन्तर राजा चक्रपाणिने विधि-विधानके साथ सबका पूजन किया और पूजनके अनन्तर वे सभाके मध्यमें स्थित होकर कहने लगे— आज मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरे कर्म सफल हो गये, जो कि इन्द्र आदि लोकपाल मेरी सभामें उपस्थित हुए हैं। अपने सौ जन्मोंके अर्जित पुण्यफलोंके द्वारा आज मुझे मयूरेशके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त हुआ है ॥ १३–१४ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- मयूरेशकी सबसे पहले हुई पूजाको देखकर इन्द्र अत्यन्त क्रुद्ध हो उठे, वे जगदीश्वरकी मायासे मोहित होकर एकाएक बोल उठे ॥ १५ १/२ ॥ इन्द्र बोले- हे चक्रपाणि ! जगत्का निर्माण करनेवाले चतुर्मुख ब्रह्मा तथा लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुके यहाँ उपस्थित होनेपर भी तुम बड़े मूर्ख ही हो, जो कि तुमने एक बालकका सर्वप्रथम पूजन किया है। हम सभीको अपमानित करके मोहवश तुमने एक बालकका पूजन किया है ॥ १६-१७ ॥ तुमने सभी लोकोंकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा, संहार करनेवाले भगवान् शिव, सृष्टि-पालन तथा अन्त करनेवाली तीनों लोकोंकी माता जगदम्बा तथा तीनों लोकोंके स्वामी एवं वैदिक कर्मोंका प्रवर्तन करनेवाले भगवान् सूर्यको छोड़कर एक बालकका पूजन किया है, यह तुमने ठीक नहीं किया ॥ १८-१९ ॥ ब्रह्माजी बोले- देवराज इन्द्रके इस प्रकार कहनेपर राजा चक्रपाणि बोले- इस बालकमें रुद्र, सूर्य, कुबेर, इन्द्र, मरुद्गण तथा अग्नि आदि देवोंसे अधिक पराक्रम देखा गया है, जो कि इन्होंने दैत्यराज सिन्धुका वध कर दिया और इन गुणेश्वर मयूरेशने ही दैत्य सिन्धुके कारागारसे सभी देवताओंको मुक्त कराया है ॥ २०-२१ ॥ पृथ्वीके भारका हरण करनेके लिये ये भगवान् शिवके घरमें अवतीर्ण हुए हैं। ये परमात्मा हैं, अनन्त शक्तियोंसे सम्पन्न हैं और अनेकों दैत्योंका वध करनेवाले हैं ॥ २२ ॥ ब्रह्माजी बोले- राजा चक्रपाणि जब इस प्रकारसे बोल रहे थे कि उसी समय देवोंको एक महान् ध्वनि सुनायी पड़ी। उस ध्वनिसे ब्रह्माण्डमें विस्फोट होनेकी आशंकासे कुछ देवता मूर्च्छित होकर गिर पड़े ॥ २३ ॥ सम्पूर्ण पृथ्वी काँप उठी। उस समय कुछ भी दिखायी नहीं पड़ रहा था। करोड़ों सूर्योंके प्रकाशसे सहसा जगत् आच्छादित हो गया ॥ २४ ॥ तदनन्तर उन देवताओंने वहाँपर एक अत्यन्त सुन्दर देवको देखा। वह नाना प्रकारके अलंकारोंको धारण किये हुए था, उसकी दस भुजाएँ थीं और उसका मुख हाथीके समान था ॥ २५ ॥ इस प्रकारके स्वरूपको देखकर वे सभी देवता उस समय आश्चर्यचकित हो उठे। उसी क्षण उन्होंने पुनः उस देवको पाँचस्वरूपधारी ईश्वरके रूपमें देखा ॥ २६ ॥ वह मध्यमें पद्मासनमें स्थित वक्रतुण्डके रूपमें, आग्नेयकोणमें शिवरूपमें, नैर्ऋत्यकोणमें सूर्यरूपमें, वायव्यकोणमें पार्वतीके रूपमें और ईशानकोणमें विष्णुरूपमें दिखायी पड़ा। यह देखकर वे सभी देवता अत्यन्त भ्रममें पड़ गये। तभी उन्हें आकाशवाणी सुनायी दी, जो उन सभीके भ्रमका निवारण करनेवाली थी ॥ २७-२८ ॥ उस आकाशवाणीने कहा- ये देव सभी लोगोंके लिये आराधनीय हैं। एक होनेपर भी ये पाँच रूपोंमें प्रकट हुए हैं। ये देव आदि और अन्तसे रहित हैं। सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त रहनेवाले हैं और ये गजानन नामवाले हैं ॥ २९ ॥ ये देव देवताओं, मनुष्यों, यक्षों, नागों तथा राक्षसोंके द्वारा सदैव ही पूजनीय हैं और सभी विघ्नोंका विनाश करनेवाले हैं। इनका पूजन हो जानेसे पंचदेवों-गणेश, विष्णु, शिव, दुर्गा तथा सूर्यका पूजन हो जाता है। इन देवके विषयमें कोई शंका नहीं करनी चाहिये, ऐसा करनेपर वह नरकप्राप्तिका कारण बनेगी ॥ ३०-३१ ॥ ब्रह्माजी बोले- इस प्रकारकी आकाशवाणीको सुननेके अनन्तर इन्द्र आदि उन प्रधान देवताओंने सूँड़से
व्यासजीद्वारा भगवान् गणेशजीकी स्तुति [क्रीडाखण्ड अ० १५०]
क्री०ख०-अ०१२५ ] * श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग-पाँच * ५७७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 व्यासजीद्वारा भगवान् गणेशजीकी स्तुति [क्रीडाखण्ड अ० १५०] सिद्धि-बुद्धिके साथ मयूरेश (गणेशजी)-का विवाह [क्रीडाखण्ड अ० १२५]
५७८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 सुशोभित उन मयूरेशको आद्य ओंकारके रूपमें देखा ॥ ३२॥ | ही उसका वरण करो। तब सिद्धि-बुद्धिने सभी देवताओंको तदनन्तर ज्ञान प्राप्त हुए उन देवताओंने अपने भ्रम | छोड़कर मयूरेशके गलेमें माला पहना दी और वे दोनों तथा अभिमानका परित्यागकर 'जय' शब्दके द्वारा उन | बड़ी प्रसन्न हो गयीं। यह देखकर सभी देवता खिन्न सर्वान्तर्यामी प्रभुका पूजन किया ॥ ३३ ॥ | मनवाले हो गये और वे दीर्घ श्वास छोड़ने लगे। देवताओंके द्वारा मयूरेशका पूजन कर लेनेके अनन्तर | घुटनोंतक लम्बी उन मालाओंसे मयूरेशकी बड़ी शोभा दैत्य सिन्धुके पिता चक्रपाणिने बड़ी ही प्रसन्नताके साथ | हुई। तदनन्तर ब्रह्माजीने यथोचित विधि-विधानके अनुसार उन गुणेश्वर मयूरेशका पूजन किया। उन्होंने पंचामृत तथा | उन दोनों सिद्धि-बुद्धिका विवाह मयूरेशके साथ कर शुद्धजलसे उन मयूरेशको स्नान कराकर दिव्य वस्त्रों तथा | दिया ॥ ४१-४४ ॥ आभूषणोंसे उन्हें अलंकृत किया। तदनन्तर पुष्प, धूप, | तदुपरान्त उस सभाके मध्यमें स्थित होकर ब्रह्माजी दीप, विविध नैवेद्य निवेदित किये। इसके पश्चात् फल, | बोले- मेरे हृदयमें जो था, उसे मैंने आज प्राप्त कर लिया ताम्बूल तथा अनेक प्रकारकी दक्षिणाएँ उन्हें समर्पित कीं | है। ऐसा कहकर यथोचित रीतिसे ब्रह्माजीने उन दोनों और फिर नीराजन करनेके अनन्तर मन्त्रपुष्पांजलि और | कन्याओंको देवेश्वर मयूरेशको सौंप दिया ॥ ४५ ॥ प्रणाम निवेदित करके उनका स्तवन किया। इसी प्रकारसे | ब्रह्माजीने यह भी कहा कि आजतक मैंने इन दोनों राजा चक्रपाणिने बड़ी ही भक्ति-श्रद्धाके साथ सभी | कन्याओंका बड़े ही यत्नपूर्वक पालन-पोषण किया है, देवताओंकी भी पूजा की ॥ ३४-३६ ॥ | इस समय अब मैं इन दोनोंको तुम्हें समर्पित कर रहा हूँ, इसके पश्चात् नृपश्रेष्ठ चक्रपाणिने उन देवताओंसे | तुम बड़े ही यत्नसे इनकी रक्षा करना ॥ ४६ ॥ कहा- आज मैं आप लोगोंका पूजन करनेसे धन्य हो | इसके पश्चात् इन्द्र आदि देवताओंने मयूरेशसे गया हूँ, क्योंकि इस प्रकारसे सभी देवताओंका एक | निवेदन करते हुए कहा- हे देवेश ! आपकी कृपासे हम स्थानपर उपस्थित होना कहीं भी नहीं देखा गया है। | सभी देवता दैत्य सिन्धुके कारागारसे मुक्त हुए हैं। तदनन्तर वहाँपर विद्यमान अत्यन्त प्रसन्न हुए देवर्षि | आपकी ही कृपासे उस दैत्यराज सिन्धुने मोक्ष भी प्राप्त नारदजीने चतुर्मुख ब्रह्माजीसे कहा- ॥ ३७ १/२ ॥ | किया है, इस समय अब हम गौतम आदि मुनियोंके साथ हे कमलयोनि ब्रह्माजी ! आपकी आज्ञासे सिद्धि | अपने-अपने स्थानको जायँगे। आप हमें जानेकी अनुमति तथा बुद्धिके विवाहके सम्बन्धमें भगवान् शिव तथा | प्रदान करें ॥ ४७-४८ ॥ देवी पार्वतीको सभी बातें बताकर यह मैंने पहले ही | ब्रह्माजी बोले- तब देव मयूरेशने जानेकी इच्छा निश्चय कर लिया था कि सभी प्रकारके शुभ लक्षणोंसे | रखनेवाले उन देवों तथा मुनियोंको प्रसन्नतापूर्वक जानेकी सम्पन्न इन दोनों कन्याओंको आप मयूरेशको ही | आज्ञा प्रदान की। इसके पश्चात् शिवके समीपमें स्थित प्रदान करेंगे ॥ ३८-३९ ॥ | माता पार्वती ने अपनी सिद्धि तथा बुद्धि नामक दोनों तदनन्तर आसक्तिवश वे सभी देवता देव ब्रह्माजीसे | पुत्रवधुओंको तथा मयूरेशको बड़े ही आदरके साथ आदरपूर्वक यह माँग करने लगे कि 'ये कन्याएँ | अपनी गोदमें बैठाकर बड़े ही हर्षका अनुभव किया। मुझे प्रदान कीजिये।' तब ब्रह्माजीने उन दोनों- | उन्होंने [ब्राह्मणोंको] वस्त्र तथा आभूषण आदि अनेक सिद्धि एवं बुद्धिके हाथोंमें माला देकर इस प्रकार | दानोंको प्रदान किया ॥ ४९-५० ॥ कहा - ॥ ४० १/२ ॥ | जो मनुष्य भगवान् गणेशके द्वारा प्राप्त की गयी ब्रह्माजी बोले- हे देवियो ! यहाँ उपस्थित तैंतीस | सिन्धुदैत्यपर विजय तथा भगवान् गणेशके शुभ-विवाहके करोड़ देवताओंमें से कोई एक, जो तुम्हारे हृदयको भाता | इस आख्यानका श्रवण करता है, वह व्यक्ति अपने सभी हो, उसके गलेमें माला पहनाकर तुम दोनों मेरे समक्ष | अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है ॥ ५१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'मयूरेशके विवाहका वर्णन' नामक एक सौ पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२५ ॥
एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय
क्री०ख०-अ०१२६ ] * विवाहके अनन्तर मयूरेशका अपनी पुरीको प्रस्थान * ५७९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय विवाहके अनन्तर मयूरेशका अपनी पुरीको प्रस्थान, मयूरेशपुरीका वर्णन, भाद्रपदमासके गणेशव्रतकी विधि तथा उसकी महिमा, मयूरेशका द्वापरयुगमें सिन्दूरवधके लिये पुनः अवतरित होनेका आश्वासन देकर अन्तर्धान होना, ब्रह्माजीका एक सुन्दर प्रासादको निर्मितकर उसमें गजाननप्रतिमाकी प्रतिष्ठा करना, मयूरेशचरित्रश्रवणकी महिमा ब्रह्माजी बोले—सिद्धि तथा बुद्धिके साथ विवाह | सुननेमात्रसे तत्काल ही चक्रपाणिकी आँखोंमें आँसू आ गये। सम्पन्न हो जानेके अनन्तर देव मयूरेशने अपने वाहन | सभी नगरनिवासी उन मयूरेशको प्रणाम करके शोकाकुल मोरपर आरूढ़ होकर शीघ्र ही अपनी नगरीके लिये | होते हुए उच्चस्वरमें यह बात कहने लगे। आप जहाँ जा प्रस्थान किया॥ १॥ | रहे हैं, हम सभीको भी वहीं ले चलें। आपका हम लोगोंको उसी समय सभी देवता भी अपने-अपने वाहनोंपर | इस प्रकार यहाँ छोड़ना ठीक नहीं है ॥ ९-१० ॥ विराजमान होकर उन मयूरेशके आगे-आगे चलने लगे | यदि आप पहले यहाँ न आये होते, तो हम लोगोंको और मुनिगण उनके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ २॥ | दुःख नहीं होता। ऐसा कहकर उन मयूरेशको प्रणाम चक्रपाणिके साथ नगरके सभी निवासी, स्त्रियाँ | करके और उनसे आज्ञा लेकर वे सभी चले गये ॥ ११ ॥ तथा बालक बड़े ही आनन्दके साथ सहसा बाहर | राजा चक्रपाणिने भी उन्हें प्रणामकर अपने नगरको निकलकर उनके पीछे चलने लगे। उस समय सभी | प्रस्थान किया। उन मयूरेशके बहुतसे अद्भुत गुणोंका प्रकारके वाद्य बज रहे थे, अप्सराओंके समूह-के-समूह | वर्णन करते हुए वे सभी नगरनिवासी क्षणभरमें ही अपनी नृत्य कर रहे थे। उन सभीसे घिरे हुए मयूरेश जैसे ही | नगरीमें पहुँच गये और चक्रपाणिसे आज्ञा प्राप्तकर युद्धभूमिमें पहुँचे, त्यों-ही स्कन्द आदि वीर उन विभु | अपने-अपने घरोंको चले गये। चक्रपाणि भी अपने घर मयूरेशसे प्रार्थना करते हुए कहने लगे ॥ ३–४१/२ ॥ | चले गये ॥ १२-१३ ॥ वीर बोले—युद्धभूमिमें जिन सेनानियोंको दैत्योंकी | राजा चक्रपाणिने अपने नगरमें सूर्य, गणेश, विष्णु, सेनाने मार डाला था, वे सभी आपके दृष्टिपातरूप | शिव तथा दुर्गा—इन पंचदेवोंके लिये पाँच मन्दिर अमृतसे सिंचित होकर उठ खड़े हुए हैं। मयूरेशके द्वारा | बनवाये और उनमें एक-एक मूर्तिकी स्थापनापूर्वक उनको जीवित किया गया देखकर सभी देवता तथा | प्रतिष्ठा करवायी ॥ १४ ॥ नगरनिवासीजन अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गये और 'साधु- | राजा चक्रपाणि भक्तिभावपूर्वक उन पंचदेवोंकी साधु' इस प्रकारसे कहने लगे ॥ ५–६१/२ ॥ | नित्य पूजा किया करते थे। इधर मयूरेश भी क्षणभरमें योजनमात्र मार्ग तय करनेपर देवेश्वर मयूरेश मार्गमें | अपनी मयूरेशपुरीमें पहुँच गये ॥ १५ ॥ ठहर गये और चक्रपाणिके सिरपर अपना मंगलमय हाथ | उस नगरीको देखकर सभी गण बड़े ही आश्चर्यमें रखकर तथा शत्रुपक्षके वीरोंको भय पहुँचानेवाले अपने | पड़ गये। उस पुरीके स्तम्भ रत्नोंसे बने हुए थे और दसों हाथोंसे राजाका आलिंगनकर उनसे बोले ॥ ७-८॥ | उसकी दीवारें सोनेसे निर्मित थीं ॥ १६ ॥ देव बोले—मेरे कथनानुसार तुम शीघ्र ही सभी | उन रत्नमय तथा स्वर्णिम दीवारोंमें अपना प्रतिबिम्ब नागरिकोंके साथ अपने गण्डकीपुरकी ओर प्रस्थान | अकेला नहीं दिखता था, अपितु असंख्य जनोंसे समन्वित करो ॥ ८१/२ ॥ | दिखता था। उस रमणीय सभामण्डपमें ब्रह्मा आदि ब्रह्माजी बोले—मयूरेशके इस प्रकारके वचन | देवोंको बैठाकर मयूरेशने सभाके मध्यमें प्रवेश किया
५८० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- और सभी ओर दृष्टि दौड़ायी। उन्होंने उस सभाके पूर्वभागमें रतिके साथ कामदेवको तथा मार्जारी नामवाली लोकमें प्रसिद्ध देवीको देखा, जो सुख प्रदान करनेवाली हैं। सभाकी दक्षिण दिशामें उन्होंने भगवान् शिव और पार्वतीको देखा ॥ १७-१९॥ उनके आगे देवी विरजाको देखा, जो भक्तोंकी सकल कामनाओंको पूर्ण करनेवाली हैं। पश्चिम दिशामें धरणीदेवीसे समन्वित भगवान् वाराहको और सब प्रकारके विघ्नोंका नाश करनेवाली आश्रया नामवाली मंगलकारिणी देवीको देखा ॥ २० १/२ ॥ उत्तर दिशामें श्रीहरिका और प्रसिद्ध मुक्तादेवीका दर्शन किया, वे देवी सब प्रकारकी मुक्तिको प्रदान करनेवाली हैं। तैंतीस करोड़ देवता भी उन मयूरेशका दर्शन करनेकी इच्छासे वहाँ आकर स्थित हो गये ॥ २१-२२ ॥ [इसी प्रसंगमें ब्रह्माजी भाद्रपद चतुर्थी-व्रतानुष्ठानका निरूपण करते हुए कहते हैं—हे व्यासजी !] भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिको स्नान करनेके अनन्तर सर्वप्रथम गजाननकी पूजा करे, तदनन्तर पूर्व दिशामें जाकर वहाँ मार्जारी देवीका पूजन करे ॥ २३ ॥ पूजनके अनन्तर ब्राह्मणोंको विविध प्रकारके दान प्रदान करे और गजाननका स्मरण तथा ध्यान करके मौन व्रतसे रहे। इस प्रकारसे धीरे-धीरे चले कि चलते समय पैरोंसे होनेवाली आवाज न सुनायी दे ॥ २४ ॥ कृमि, कीट तथा पतंग आदिकी हिंसा न करे, प्रयत्नपूर्वक पवित्रता एवं संयमसे रहे। तदनन्तर पुनः स्नान करके देवाधिदेव गजाननकी (सायंकालीन) पूजा करे। इसी प्रकार दूसरे दिन तथा तीसरे दिन भी पहले दिनकी भाँति क्रमशः पूजन आदि करे, दूसरे दिन दक्षिणद्वारपर देवी विरजाकी पूजा मार्जारीदेवीके समान ही करे ॥ २५-२६ ॥ तीसरे दिन पश्चिमद्वारपर आश्रया नामवाली देवीको नमस्कार करके पूर्ववत् उनका पूजन करे, चतुर्थी तिथिको व्यक्तिको चाहिये कि वह उत्तरद्वारपर पूर्वोक्त विधिके अनुसार देवी मुक्ताका पूजन करे और फिर मयूरेशका पूजन करे। महोत्सव मनाये तथा रात्रिमें जागरण करे ॥ २७-२८ ॥ इस प्रकारसे जो उपवासपूर्वक चारों द्वारोंमें स्थित देवियोंका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह भगवान् मयूरेशके कृपाप्रसादसे अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। यदि समर्थ हो तो चतुर्थी तिथिको ही चारों द्वारोंपर पूर्वकी भाँति मार्जारी आदि देवियों और मयूरेशका पूजन करे। इन देवियोंके पूजनके आदि और अन्तमें जो स्नान करके देवेश्वर मयूरेशका दर्शन करता है, तो उसका फल देव गजानन प्रसन्न होकर तुरन्त ही प्रदान करते हैं ॥ २९-३० १/२ ॥ अतः भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिसे प्रारम्भ करके ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए चतुर्थी तिथिके दिन उषाकालमें स्नान करके तथा विधिपूर्वक सन्ध्या-वन्दनादि नित्यकर्म सम्पन्न करनेके अनन्तर विधि-विधानसे मयूरेश्वरका पूजन करे ॥ ३१-३२ ॥ पूजनके अनन्तर इक्कीस बार प्रदक्षिणा और नमस्कार करे। तदनन्तर शीघ्रतासे पूर्वद्वारमें जाकर मार्जारीको नमस्कार करे। फिर दक्षिणदिशामें विरजा, पश्चिमद्वारमें आश्रया, उत्तरद्वारमें जाकर श्रेष्ठ मुक्तादेवीको प्रणाम करे। इसके पश्चात् किंचित् दिन शेष रहनेपर मयूरेश्वरकी पूजाका आरम्भ करे। पूजक व्यक्ति अत्यन्त ध्यानपूर्वक सोलह उपचारोंद्वारा मयूरेश्वरका पूजन करे और रात्रिमें गीत तथा वाद्योंकी ध्वनिके साथ जागरण करे ॥ ३३-३५ ॥ प्रातःकाल होनेपर निर्मल जलमें स्नान करनेके अनन्तर पुनः देवेश्वर मयूरेशका पूजन करे। तदनन्तर यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी व्रतकी पारणा करे ॥ ३६ ॥ उन ब्राह्मणोंको सुवर्ण, वस्त्र, धान्य तथा गो आदि प्रदान करे। इस प्रकारसे जो व्यक्ति व्रत करता है, वह जो कुछ असाध्य है, उसे भी सिद्ध कर लेता है। वह पुत्र-पौत्रोंकी सम्पदासे सम्पन्न होता है और विविध सुखोंका उपभोग करनेके अनन्तर अन्तमें स्वर्गलोक प्राप्त करता है। वहाँ इन्द्र, यम, कुबेर आदि लोकपाल उस मनुष्यकी पूजा करते हैं ॥ ३७-३८॥ आठों प्रकारकी नायिकाएँ उस व्रती व्यक्तिके चरणकमलोंकी सेवा करती हैं। अन्धेको दृष्टि प्राप्त हो
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* विवाहके अनन्तर मयूरेशका अपनी पुरीको प्रस्थान *
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जाती है, मूक व्यक्ति अवश्य ही वाणी प्राप्त कर लेता है। जो भार्याकी अभिलाषा करता है, वह भार्या प्राप्त कर लेता है और जो विद्यार्थी है, वह उत्तम बुद्धिको प्राप्त कर लेता है। चारों द्वारोंमें उपवास करनेपर भी यही फल कहा गया है॥ ३९-४०१/२॥ [इस प्रकार चतुर्थी-व्रतानुष्ठानका निरूपण करके ब्रह्माजी पुनः पूर्ववर्ती प्रसंगका वर्णन करते हैं—] तदनन्तर किसी दिनकी बात है, देवेश्वर मयूरेश विष्णु, ब्रह्मा तथा शिव आदि सभी देवताओंसे अत्यन्त स्निग्ध वाणीमें कहने लगे ॥ ४११/२ ॥ मयूरेश बोले— हे देवो ! जिस कार्यको सम्पन्न करनेके लिये मैं अवतरित हुआ था, वह कार्य मैंने पूर्ण कर लिया है। मैंने बहुत-से दैत्योंका वध किया और पृथ्वीके भारको हलका कर दिया। दैत्य सिन्धुके कारागृहसे सभी देवताओंको मुक्त किया है॥ ४२-४३॥ अब स्वाहाकार, स्वधाकार तथा वषट्कार आदि अर्थात् देवपूजन, यज्ञ तथा पितृकर्म-श्राद्धादि पहलेकी भाँति होने लगेंगे। हे देवो ! आप सबसे आज्ञा लेकर अब मैं अपने धामको जाना चाहता हूँ॥ ४४॥ मयूरेशके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर सभी देवता शोकमें पड़ गये। आँसू बहाते हुए तथा एक- दूसरेका मुख देखते हुए वे कहने लगे॥ ४५॥ हे मयूरेश ! हम लोगोंको छोड़ करके आप कहाँ जाना चाहते हैं? आप स्नेहका परित्यागकर इस प्रकारसे अत्यन्त निष्ठुर कैसे हो गये हैं? तदनन्तर देवी पार्वती भी यह सब सुनकर एकाएक शोकसे व्याकुल हो उठीं। मूर्च्छित होकर वे भूमिपर गिर पड़ीं। एक मुहूर्तके बाद चेतना लौटनेपर वे कहने लगीं—॥ ४६-४७॥ हे दीनानाथ ! हे दयासागर ! हे जगन्नाथ ! हे सिन्धुदैत्यका विमर्दन करनेवाले ! मुझ अपनी माताका परित्यागकर तुम कहाँ जाओगे ? हे सुरेश्वर ! आपके चले जानेपर मेरे प्राण भी नहीं रहेंगे ॥ ४८१/२ ॥ देव बोले— हे शुभे ! द्वापरयुग आनेपर मैं पुनः आपकी पुत्रताको प्राप्त होऊँगा। मेरा वचन मिथ्या नहीं होगा। आप कुछ भी चिन्ता न करें। आपके वियोगसे
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मुझे भी अतुलनीय दुःख हो रहा है॥ ४९-५०॥ हे माता ! सुहृज्जनोंका एक स्थानपर रहना सर्वदाके लिये सम्भव नहीं होता है। आगे अत्यन्त भयंकर सिन्दूर नामक एक दैत्य उत्पन्न होगा। वह सभी देवताओंके लिये अवध्य होगा, तब मैं आपके पुत्रके रूपमें उत्पन्न होऊँगा। हे शिवप्रिये ! मैं स्मरणमात्र करनेसे ही आपके समक्ष उपस्थित हो जाऊँगा॥ ५१-५२॥ तदनन्तर कार्तिकेय बोले—आप जहाँ जा रहे हैं, मुझे भी वहाँ ले चलें। बालक, असहाय तथा दीनकी उपेक्षा करना ठीक नहीं है॥ ५३॥ देव बोले— हे बन्धु ! आप चिन्ता न करें, मैं यहाँ पुनः आऊँगा। मुझ अन्तर्यामीका आपसे कभी भी वियोग नहीं होगा। तदनन्तर मयूरेश्वरने अपने भाई कार्तिकेयको अपना वाहन मयूर प्रदान किया और उसी समय उनका मयूरध्वज यह नाम रखा ॥ ५४-५५ ॥ तदनन्तर बन्धु गुणेश्वरकी आज्ञासे कार्तिकेय उस मयूरके ऊपर [जैसे ही] आरूढ़ हुए, उसी क्षण वे देव मयूरेश्वर अन्तर्धान हो गये ॥ ५६ ॥ उन मयूरेश्वरके अन्तर्धान हो जानेपर ब्रह्मा, विष्णु तथा महेशने सर्वदा ही उन्हें अपने हृदयदेशमें प्रतिष्ठित देखा। तदनन्तर ब्रह्माजीने एक अत्यन्त मनोहर प्रासाद बनवाया और बालुकासे गजाननकी मूर्ति बनाकर उस मन्दिरमें विधिवत् स्थापित की। सभी लोगोंने विविध उपचारोंके द्वारा यथाविधि उन गजाननका पूजन किया। वसिष्ठ आदि मुनिगणोंने ब्रह्मकमण्डलु नामक नदीमें स्नान किया और सन्ध्यावन्दनादि सम्पूर्ण कर्म सम्पन्न करनेके अनन्तर वे गजाननकी उस अत्यन्त सुन्दर मूर्तिके समीप गये॥ ५७–५९॥ कुछ मुनियोंने व्रत करके गजाननके धामको प्राप्त करनेके लिये मन्दिरके चारों ओर चार द्वार बनाये। कुछ स्नान करनेके अनन्तर उन गजाननको प्रणाम करके दौड़ते हुए उनकी परिक्रमा करने लगे॥ ६० ॥ उस समय सभी देवता तथा मुनिगण अत्यन्त प्रसन्न होकर परस्पर कहने लगे कि इस प्रकारका पुण्यक्षेत्र अन्य कहीं देखा नहीं गया है, जहाँ कि साक्षात् देव
५८२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गजानन स्थित हों। ये मयूरेश विघ्नोंका निवारण करनेवाले | प्राप्ति होती है और यह आख्यान मनुष्योंके सभी हैं और भक्तोंकी मनोकामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। | प्रकारके पापोंका विनाश करनेवाला है ॥ ६४-६५ ॥ इस प्रकार कहकर तथा उन गजाननका पूजन करके वे | इस मयूरेश-चरितका श्रवण पुत्र देनेवाला, धन सभी मुनिगण अपने-अपने आश्रमोंकी ओर चले | प्रदान करनेवाला, विद्या प्रदान करनेवाला तथा समस्त गये ॥ ६१-६२ ॥ | दुःखोंका निवारण करनेवाला है। यह शारीरिक तथा तदनन्तर ब्रह्मा आदि देवता भी अपने-अपने स्थानोंपर | मानसिक सभी बाधाओंको दूर करनेवाला और कुष्ठ चले गये। भगवान् शंकर अपने परिवारके साथ आनन्दित | आदि दुष्ट रोगोंका विनाश करनेवाला है ॥ ६६ ॥ होते हुए कैलासको चले गये। तब स्वधा, स्वाहा और | यह मयूरेशका आख्यान पढ़ने तथा सुननेवाले वषट्कार होने लगा, जिससे इन्द्र आदि देवता बड़े प्रसन्न | पुरुषोंके लिये अत्यन्त मंगलकारी है और भुक्ति तथा हो गये ॥ ६३ १/२ ॥ | मुक्ति प्रदान करनेवाला है। यह मनुष्योंको विजयश्रीका ब्रह्माजी बोले- हे मुनि व्यासजी! त्रेतायुगमें | अधिष्ठान है। क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों-सभीको लक्ष्मी मयूरेश्वरने जो कुछ भी किया था, वह सम्पूर्ण चरित्र | प्रदान करनेवाला और पुष्टिको बढ़ानेवाला है ॥ ६७ १/२ ॥ आपको बता दिया है। देव मयूरेशके चरितका श्रवण | [ब्रह्माजी बोले-] हे मुनि व्यासजी! जो-जो सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। मयूरेशकी कथाके | आपने पूछा, वह सब मैंने बता दिया। अब आप मेरे सुननेसे कृतार्थता प्राप्त होती है, यश तथा आयुष्यकी | मुखसे पुनः गजाननके चरित्रका श्रवण करेंगे ॥ ६८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'द्वारमहिमाका वर्णन' नामक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२६ ॥
एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय गजानन-अवतारके प्रसंगमें ब्रह्माजीकी जँभाईसे सिन्दूरकी उत्पत्ति, ब्रह्माजीद्वारा उसे अनेक वरदानोंकी प्राप्ति, वरदानोंकी परीक्षाके लिये सिन्दूरका ब्रह्माजीको ही लक्ष्य बनाना और ब्रह्माजीका भयभीत होकर वैकुण्ठ जाना
व्यासजी बोले- हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! हे देवेश ! | प्राप्त करते हैं। हे मुने! मैं विनायकचरितकी उस कथाको आपने गुणेशके शुभ चरितका विस्तारसे वर्णन किया। फिर | आपसे कहूँगा, जो चरित देव विनायकने द्वापरयुगमें किया भी हे देव ! उसके सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं हुई है। मनुष्य | था, उसे आप इस समय सुनें ॥ ४-५ १/२ ॥ अमृतके पानसे तो तृप्त हो सकता है, किंतु कथाके श्रवणसे | जिस प्रकारसे वे देव गजानन रक्तवर्णवाले, चार तृप्त नहीं हो सकता। मैंने त्रेतायुगमें हुए गुणेशके अवतारकी | भुजाओंवाले, गजके मुखवाले एवं मूषकके वाहनवाले सम्पूर्ण कथा सुन ली है ॥ १-२ ॥ | हुए, वह सब मैं आपसे कहता हूँ ॥ ६ १/२ ॥ तदनन्तर द्वापरयुगमें गजानन नामसे उन्होंने कहाँ | किसी समयकी बात है, भगवान् शंकर संयोगवश अवतार लिया और हे महाप्रभु ! मूषक उनका वाहन | ब्रह्मलोकमें पहुँचे। तब उन्होंने शयन कर रहे ब्रह्माजीको किस प्रकार हुआ ? हे कमलासन ब्रह्माजी ! आप मेरे इस | जगाया। उस समय वे क्रुद्ध होकर उठे और उन्होंने दीर्घ संशयको दूर करनेकी कृपा करें ॥ ३ १/२ ॥ | जँभाई ली ॥ ७-८ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे वत्स ! हे मुने ! मेरे मनमें जो | उस जँभाईसे एक महाभयानक पुरुष उत्पन्न हुआ। बात थी, उसे पूछकर आपने बहुत अच्छा किया है, | उत्पन्न होते ही उस पुरुषने सभीको भयभीत कर क्योंकि श्रोता, वक्ता तथा पूछनेवाला - ये तीनों ही सिद्धिको | देनेवाला तीव्र ध्वनियुक्त शब्द किया, उस ध्वनिसे समुद्र,
क्री०ख०-अ०१२७ ] * गजानन-अवतारके प्रसंगमें ब्रह्माजीकी जँभाईसे सिन्दूरकी उत्पत्ति * ५८३
द्वीपों तथा पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी काँप उठी। दिशाओंके रक्षक, सभी दिक्पाल आश्चर्यचकित हो उठे। क्षुब्ध होकर शेषनाग विष उगलने लगे ॥ ९-१० ॥ सभी पर्वत चूर-चूर होकर गिर पड़े और समस्त प्राणी व्याकुल हो उठे। तीनों लोकोंमें निवास करनेवाले मनुष्योंके लिये कल्पान्तमें होनेवाले प्रलय-जैसी स्थिति हो गयी। वह अपने मस्तकसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको विदीर्ण करता हुआ-सा खड़ा हो गया। उसके शरीरसे निकलनेवाली सुन्दर गन्ध तीनों लोकोंमें फैल गयी ॥ ११-१२ ॥ उस पुरुषके जपाकुसुमके समान कान्तियुक्त देहकी प्रभासे सभी दिशाएँ अरुणिम वर्णकी हो उठीं। क्या ब्रह्माजीद्वारा यह कोई दूसरा कामदेव उत्पन्न हो गया है, यह विचारकर कामदेव उस पुरुषके सौन्दर्यको देखकर तत्क्षण ही लज्जित हो उठा। अपने सामने स्थित उस पुरुषको देखकर कमलयोनि ब्रह्मा विस्मित हो गये और उससे बोले—तुम किसके पुत्र हो? कहाँसे उत्पन्न हुए हो? तुम्हारी क्या करनेकी इच्छा है? वह सब मुझे बताओ ॥ १३-१४१/२ ॥ पुरुष बोला—हे सुरेश्वर! आप अनेकों ब्रह्माण्डोंकी रचना करनेवाले होनेपर भी तथा सब कुछ जाननेवाले होनेपर भी भ्रममें पड़े हुएकी भाँति मुझसे क्यों पूछ रहे हैं? आपकी जँभाईसे ही उत्पन्न मुझे आप क्यों नहीं जान पा रहे हैं? ॥ १५-१६ ॥ आप अपने पुत्र मुझपर कृपा करें और अपनी बुद्धिके अनुसार मेरा नाम रखें। हे नाथ! मुझे रहनेके लिये स्थान प्रदान करें, साथ ही मेरा भोजन क्या होगा तथा मुझे कौन-सा कार्य करना है, यह सब मुझे बतायें। उस पुरुषके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर चतुरानन ब्रह्माजी बोले—चूँकि तुम्हारा शरीर रक्तवर्णका है, इसलिये तुम 'सिन्दूर' नामसे प्रसिद्ध होओगे ॥ १७-१८ ॥ तुम्हारी सामर्थ्य महान् होगी और तुम तीनों लोकोंको वशमें करनेमें सक्षम होओगे। तुम क्रोधके आवेशमें जिसका भी आलिंगन करोगे, वह सौ टुकड़ोंमें विभक्त हो जायगा ॥ १९ ॥ तुम्हें पाँच भूतों—पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाशसे भी कभी कोई भय नहीं होगा। देवता, दानवों, यक्षों तथा मनुष्योंसे तुम्हें भय नहीं होगा। इन्द्र आदि लोकपालों तथा साक्षात् कालसे भी कोई तुम्हें भय नहीं होगा। नागों, राक्षसोंसे भी कोई भय नहीं होगा, तुम्हें न तो दिनमें भय रहेगा और न रात्रिमें कोई भय रहेगा ॥ २०-२१ ॥ हे सिन्दूर ! तुम्हें न तो सजीव प्राणियोंसे भय होगा और न निर्जीव प्राणियोंसे। तीनों लोकोंमें जहाँ भी तुम्हारा रहनेको मन करे, वहाँ रहो ॥ २२ ॥ तदनन्तर ब्रह्माजीके मुखसे उत्पन्न वह सिन्दूर अत्यन्त सन्तुष्ट हो गया। तब वह अपनी आवाजके द्वारा चराचरसहित तीनों लोकोंको कँपाते हुए दहाड़ा ॥ २३ ॥ उस तीव्र ध्वनिसे समुद्र क्षुब्ध हो उठे, सभी लोकपाल भाग उठे। तदनन्तर उस सिन्दूरने पितामह ब्रह्माजीको प्रणाम करके कहा ॥ २४ ॥ सिन्दूर बोला—हे अखिल ब्रह्माण्डके स्वामी ब्रह्माजी ! आपके वचनरूपी अमृतसे मैं अत्यन्त प्रसन्न हो गया हूँ। आप ही सत्त्व-रज तथा तम—इन तीनों गुणोंके द्वारा इस विश्वकी रचना करते हैं, उसकी रक्षा करते हैं और अन्तमें उसका लय भी कर देते हैं ॥ २५ ॥ आपके सो जानेपर यह समस्त संसार भी सो जाता है और सर्वत्र अन्धकार व्याप्त हो जाता है। हे विभो ! मेरा यह महान् अहोभाग्य है कि बिना तपस्या किये, बिना दानोंको दिये और बिना व्रत, उपवास किये आप मुझपर पुत्रका स्नेह प्रकट करके प्रसन्न हैं, अन्यथा आप प्रसन्न नहीं होते। हे प्रभो ! करोड़ों कल्पोंतक तपस्याके परिणामस्वरूप ही आप प्रसन्न होते हैं ॥ २६-२७ ॥ ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार कहनेके अनन्तर उन्हें प्रणामकर और उनकी प्रदक्षिणा करके वह सिन्दूर अपने मनको अनुकूल लगनेवाले स्थानकी ओर चल पड़ा। मार्गमें वह यह तर्क-वितर्क करने लगा कि न तो मैंने कोई तपस्या की है, न ध्यान किया है, न किसी मन्त्रका जप किया है और न ही शास्त्रोंका स्वाध्याय किया है, तो फिर क्यों उन ब्रह्माजीने मुझे इतने वर प्रदान किये हैं, क्या उनके दिये वरदान सत्य हैं अथवा मिथ्या हैं? वहाँ पिता ब्रह्माके पास जाकर ही इन वरदानोंकी परीक्षा
५८४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * : [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 करूँगा। ऐसा कहकर वह सिन्दूर पितामह ब्रह्माजीके | जायगी, वे गजानन 'सिन्दूरप्रिय' हो जायँगे और वे देव पास गया। उसने अपने दोनों हाथ फैलाकर भयंकर | गजानन 'सिन्दूरवधकर्ता' के नामसे प्रसिद्ध हो जायँगे। गर्जना की ॥ २८-३०॥ | ऐसा कहकर भयभीत हो कमलयोनि वे ब्रह्माजी वहाँसे उसने ब्रह्माजीका आलिंगन करना चाहा, तब | शीघ्र ही चल पड़े ॥ ३४-३५ ॥ पितामह ब्रह्माजी उससे बोले, मैंने तुम्हें पुत्रस्नेहके कारण | वे ब्रह्मा मनकी गति तथा वायुके वेगके समान ही वर प्रदान किये हैं, जो अन्यके लिये दुर्लभ हैं; किंतु | वहाँसे पलायित हुए थे, अतः तीव्रतावश श्वास लेने तथा दुर्भावनावश तुम मेरा ही अपकार करनेके लिये यहाँ | छोड़नेके कारण वे हाँफने लगे। शाप सुनकर क्रुद्ध हुआ आये हो, निश्चित ही सर्पको दिया गया दूध विष ही | वह दैत्य सिन्दूर भी उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगा ॥ ३६ ॥ हो जाता है। तुम दुष्ट भावनासे ग्रस्त हुए हो, अतः | दौड़नेके कारण पसीनेसे भीगे शरीरवाला वह दुष्ट जाओ, तुम दैत्य हो जाओगे। परमात्मा गजानन शीघ्र ही | दैत्य सिन्दूर जहाँ-जहाँ वे ब्रह्माजी जाते थे, उनको देखते अवतार लेकर तुम्हारा वध कर डालेंगे ॥ ३१-३३॥ | हुए वह उनके पीछे-पीछे जाने लगा। अगला चरण तुम्हारे शरीरमें सुगन्ध है, यह जानकर देव गजानन | रखते ही मैं इन्हें पकड़ लूँगा यह कहते हुए वह दैत्य अपने अंगोंमें उस सुगन्धित सिन्दूरका लेप भी करेंगे। | पीछे दौड़ने लगा। काँपते हुए ब्रह्माजी शीघ्रतासे वैकुण्ठमें इसीसे उन गजाननकी देह भी अरुणम वर्णकी हो | जा पहुँचे ॥ ३७॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'सिन्दूरकी उत्पत्तिका वर्णन' नामक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १२७॥ एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय ब्रह्माजीका नारायणको सिन्दूरदैत्यके विषयमें बताना, उसी समय सिन्दूरका वहाँ आना, भगवान् विष्णुके कहनेपर सिन्दूरका भगवान् शिवसे युद्ध करने कैलासपर जाना, शिवको ध्यानस्थ देखकर सिन्दूरका पार्वतीका हरण करना, मयूरेशका द्विजरूपसे उपस्थित होकर सिन्दूरको समझाना, सिन्दूरका वापस लौट जाना, मयूरेशद्वारा माता पार्वतीको अपने गजानन-अवतारका स्मरण दिलाना ब्रह्माजी बोले- ब्रह्माजीने वैकुण्ठलोकमें जाकर | उनकी सेवा-पूजा करके भगवान् विष्णुने उनसे देखा कि भगवान् नारायण निर्विकार भावसे रत्नों तथा | पूछा कि कौन-सा ऐसा कार्य आपके समक्ष आ सुवर्णसे सुशोभित कमलके आसनपर विराजमान हैं ॥ १ ॥ | उपस्थित हुआ है, आपका मुख क्यों मुरझाया हुआ है, भगवान् विष्णुने भी अपने सामने म्लान मुखवाले | आप क्यों लम्बी-लम्बी साँस ले रहे हैं और प्रभाहीन ब्रह्माजी और उनके पीछे आकाशसे स्पर्धा करनेवाले | क्यों दिखायी दे रहे हैं? हे पितामह ! आपकी ऐसी मस्तकसे युक्त महादैत्य सिन्दूरको आता हुआ देखा ॥ २ ॥ | स्थिति देखकर मुझे महान् कष्ट हो रहा है ॥ ४१/२ ॥ यह देखकर दयालु लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु | भगवान् विष्णुके इस प्रकारके वचनोंको सुनकर सहसा शीघ्र ही उठ पड़े और उन्होंने ब्रह्माजीका हाथ | कमलयोनि ब्रह्माजी बोले ॥ ५ ॥ पकड़कर एवं उनका आलिंगनकर उन्हें अपने आसनपर | ब्रह्माजी बोले- मैं अपने भवनमें प्रगाढ़ निद्रामें बैठाया ॥ ३ ॥ | सोया हुआ था, उसी समय भगवान् शिवने मुझे जगाया,