गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
२६४ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—सकल-भुवन-जन-वर-तरुणेन (सकलभुवनेषु ये जनाः युवानस्तेभ्यो वरः श्रेष्ठो यः तरुणः किशोरः तेन) वनमालिना या रमिता सा अतिकरुणेन (अतिशोकेन) रुजं (पीडां) न बहति (प्राप्नोति) [जगद्वल्लभतरुण-प्राप्त्या करुणानुपपत्तेः]; पक्षान्तरे या अरमिता, सा अतिकरुणे रुजं न बहति इति न; [अपितु बहत्येव इत्यर्थः] ॥७॥ अनुवाद—अखिल जगतके तरुण-श्रेष्ठ, सुकुमार मनोहर रूप लावण्य-विशिष्ट श्रीकृष्णके साथ रमण करनेवाली नायिका अपने अन्तःकरणमें दारुण विरह-वेदनाका अनुभव नहीं करती है क्योंकि वे अति करुण हैं। बालबोधिनी—समस्त लोकोंमें जितने भी तरुण युवा पुरुष हैं, उनमें श्रीकृष्ण सर्वातिशय युवतर हैं, सुन्दरतम हैं, वे नवकिशोर नटवर हैं। करुणावरुणालय वे जिस रमणीको भी रमायेंगे, वह अति करुण भावसे मेरी तरह निढाल नहीं पड़ेगी। निन्दापरक अर्थमें जगतमें श्रेष्ठ तरुण पुरुषोंके साथ रमण करनेवाली रमणी, उनमेंसे किसी एकका भी विरह होने पर करुणातिशयताके कारण कष्टका अनुभव करेगी ही। श्रीजयदेव-भणित-वचनेन । प्रविशतु हरिरपि हृदयमनेन ॥ सखि ! या रमिता.... ॥८ ॥ अन्वय—अनेन श्रीजयदेव-भणित-वचनेन (श्रीजयदेवोक्त- श्रीराधायाः माधवमुद्दिश्य वचनेत्यर्थः) हरिरपि [तदेकचित्तानां भक्तानां] हृदयं (चित्तनिकेतनं) प्रविशतु [प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेण स्वानां भावसरोरुहमित्युक्तेः] ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेवकवि विरचित श्रीराधाके विलाप-वचनोंके साथ श्रीहरि भी भक्तोंके हृदयमें प्रवेश करें।
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २६५ पद्यानुवाद- सजल जलद सम फुल्ल वदनके। कनक-निकष सम पीत वसनके ॥ सकल युव जन श्रेष्ठ तरुणके। प्रेरक कवि 'जय' काव्य करुणके ॥ मिले, जिसे हैं सरस भावसे, उसे, कभी वनमाली। विरह, स्वजन-स्वर-व्यङ्ग-दरद-सब जला न पाते आली ॥ बालबोधिनी—जयदेव कविके द्वारा माधवके उद्देश्यसे गाये गये इस प्रबन्धसे प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण हृदयमें प्रवेश करें। किसके हृदयमें? श्रीराधाके हृदयमें। साथ ही कर्ण-रन्ध्र द्वारा मेरे-कवि जयदेवके, इस प्रबन्धके पाठकोंके तथा श्रोताओंके भावरूपी हृदय-कमलमें भी प्रवेश करें। नागर नारायण हरि हृदयमें अवस्थित हों। इस प्रकार नारायणमदनायास नामका सोलहवाँ प्रबन्ध समाप्त हुआ। मनोभवानन्दन चन्दनानिल ! प्रसीद रे दक्षिण ! मुञ्च वामताम्। क्षणं जगत्प्राण ! विधाय माधवं। पुरो मम प्राणहरो भविष्यसि ॥१॥ अन्वय—[अत्यावेशेन मनोवाष्पमुद्गिरति दैन्येनाधुना मलयानिलं सविनयं प्रार्थयते]—हे मनोभवानन्दन (आनन्दयतीति आनन्दनः; मनोभवस्य आनन्दनः तत्सम्बुद्धौ हे मदनानन्दकर) हे चन्दनानिल (मलयवायो) प्रसीद (प्रसन्नो भव); [पुनरीर्याद्यादाह]—रे दक्षिण (सरल-स्वभाव, सर्वानुकूल इति यावत्) वामतां (प्रतिकूलतां) मुञ्च (त्यज) [दक्षिणपथप्रवृत्तस्य वाम-पथ प्रवृत्तेरयुक्तत्वात् वामता त्याज्य इति भावः]; [तर्हि किं विधेयं तत्राह]-[जगद्धितोऽपि मनोभवानन्दनाय चन्दनतरु- सम्पर्कात् विषमश्चेत् मां मारयसि तर्हि] हे जगत्प्राण ! क्षणं
२६६ श्रीगीतगोविन्दम् मम पुरः (अग्रतः) माधवं विधाय (संस्थाप्य) [पश्चात्] मम प्राणहरो भविष्यसि ॥१॥ अनुवाद—हे कन्दर्पको आनन्द देनेवाले मलयाचलके समीर! दक्षिण ही बने रहो! वामताका त्याग कर दो! हे जगतके प्राणस्वरूप! माधवको मेरे सामने कर तुम मेरे प्राण हर लेना। बालबोधिनी—कामदेवके बाणोंके प्रहारको न सह सकनेके कारण श्रीराधा मलयानलको सम्बोधित करती हुई कहती है—कामके बाणोंको उनके लक्ष्य तक पहुँचानेवाली मलयाचलकी वायु मेरे लिए प्रतिकूल बन गयी है, मुझे जलाकर अपने मित्र कामदेवको तो आह्लादित कर दिया और मुझे कामकी पीड़ासे इतना दग्ध कर दिया। दक्षिणानिल कहलाते हो, सम्पूर्ण जगतको आनन्द प्रदान करते हो, फिर मेरे लिए तुम्हारा आचरण प्रतिकूल क्यों है? क्यों वाम भाव धारण किया है? मैं जानती हूँ—तुम मदनके सहचर हो, मलयाचल पर्वत पर सर्पोंसे घिरे हुए चन्दन वृक्षोंके संसर्गसे तुम्हारा स्वभाव अवश्य ही दूषित हो गया है, कितना सन्तप्त कर रहे हो मुझे? हे जगत्प्राण! क्षणभरके लिए प्रसन्न हो जाओ, क्षमा करो मुझे। अपनी प्रतिकूलताका त्याग कर दो, मेरे प्राणोंको हर लेना, पर पहले एक क्षणके लिए प्राणनाथ माधवका दर्शन करा दो, फिर प्राणापहारक बन जाओ। वंशस्थ छन्द है, अतिशयोक्ति अलंकार है। रिपुरिव सखी-संवासोऽयं शिखीव हिमानिलो विषमिव सुधारश्मिर्यस्मिन् दुनोति मनोगते। हृदयमदये तस्मिन्नेवं पुनर्वलते बलात्— कुवलय-दृशां वामः कामो निकामनिरंकुशः ॥२॥ अन्वय—[अथ अनुरागहीने दयिते सानुरागं चित्तं निन्दति]— तस्मिन् (श्रीहरौ) मनोगते (चित्तारूढ़े) [सति] अयं सखीसंवासः
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २६७ (सखीभिः संवासः सहवासः) रिपुरिव (शत्रुरिव) [स्वच्छन्दगमन- प्रतिरोधकत्वात्] दुनोति (क्लिश्नाति); हिमानिलः (शीतलवायुः) [तापकत्वात्] शिखीव (अग्निरिव) [दुनोति]; सुधारश्मिः (चन्द्रः) [दाहकत्वात्] विषमिव [मम मनः] [दुनोति]; [यदि] अदये (दयाहीने) तस्मिन् [कान्ते] एवं पुनः [नानारूपेण कार्यमाणमपि] हृदयं बलात् वलते (संभक्तं स्यात्), [तर्हि] कुवलयदृशां (नीलोत्पलाक्षीणां कामिनीनां) कामः (अभिलाषः) निकाम-निरङ्कुशः (अत्यर्थमयन्त्रितः; हिताहितविचारापगमात् दुर्निवार इत्यर्थः) [अतएव] वामः (प्रतिकूलएव) ॥२॥ अनुवाद—हे सखि! सखियोंका सुखमय साथ, शत्रुके समान मेरे मनको शत्रु की भाँति अनुभूत हो रहा है, सुशीतल सुमन्द समीरण हुताशनके समान प्रतीत हो रहा है और सुधा-रश्मियाँ विषके समान मुझे कष्ट दे रही हैं, फिर भी मेरा हृदय बलात् उसीमें लगा हुआ है, सत्य है, कुवलय सदृश कामिनियोंके प्रति काम सर्वथा ही निरंकुश हुआ करता है। बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें श्रीराधा विरहके उन्मादमें अपने चित्रको ही उपालम्भ देती हुई अपनी सखीसे कहती है—हाय! मैं किसे दोष प्रदान करूँ? उस श्रीकृष्णके स्मरणसे जो मेरी प्रियसखियाँ मुझे श्रीकृष्णके समीप जानेसे मना किया करती थीं, आज उनका सुखमय संग भी मुझे वर्षोंकी शत्रुता जैसा प्रतीत होता है, शीत वायु मुझे ज्वालाके समान दग्ध करती है, चन्द्रमा हलाहल विष जैसा लगता है। फिर भी सखि! मेरा मन उस निर्दय निष्ठुर श्रीकृष्णके प्रति अबाध गतिसे दौड़ता हुआ चला जा रहा है, मेरा अविवेकी मन ही मेरे दुःखका कारण बन गया है। अहो! हिताहित विवेकरहिता कमलनयनाओंके लिए 'काम' ही नितान्त दुर्निवार होकर उनके अशेष दुःखका कारण बन जाता है। यह कामदेव अति निरंकुश है, सुन्दरियोंके प्रति
२६८ श्रीगीतगोविन्दम्
तो अति ही कठोर है एवं प्रतिकूल है, विरहियोंके प्रति अति निरंकुश आचरण करता है। इस श्लोकमें हरिणी-वृत्त तथा विरोधालङ्कार है। बाधां विधेहि मलयानिल! पञ्चबाण! प्राणान्गृहाण न गृहं पुनराश्रयिष्ये। किं ते कृतान्तभगिनि! क्षमया तरङ्गे- रङ्गानि सिञ्च मम शाम्यतु देहदाहः ॥३॥ अन्वय—[अधुना विरहोत्तप्तया प्राणोत्सर्गः कृत एवाह]—हे मलयानिल, त्वं बाधां (मनःपीडां) विधेहि (जनय) [वामत्वेन बाधाविधान-सामर्थ्यादित्यर्थः]; हे पञ्चबाण, (काम) प्राणान् गृहाण [पञ्चबाण-धारित्वे पञ्चबाणग्रहणयोग्यत्वादित्यर्थः]; हे कृतान्त-भगिनि (यम-सहोदरे यमुने) ते (तव) क्षमया किं? (क्षमां मा कुरु) [यमानुजायाः क्षमा न युक्ता]; [तर्हि किं कर्त्तव्यम्? तरङ्गैः मम अङ्गानि सिञ्च; देहदाहं (शरीरसन्तापः); शाम्यतु (चिरं निवृत्तो भवतु); [एतेन दशमीं दशां विधेहीति ध्वन्यते]; [अहं] पुनः गृहं न आश्रयिष्ये [तेन बिना गृहमपि सन्तापकमेव; ततो मरणमेव युक्तमित्यर्थः] ॥३॥ अनुवाद—हे मलयानिल! तुम बाधाओंका विधान करो! हे पञ्चबाण! तुम मेरे प्राणोंका हरण करो! हे यमुने! तुम यमकी बहन हो, तुम क्यों मुझे क्षमा करोगी? तुम तरङ्गोंके द्वारा मुझे अभिषिक्त कर देना, जिससे मेरे देहका सन्ताप सदाके लिए शान्त हो जाय। बालबोधिनी—संप्रति विरह-ताप-तापिता श्रीराधा अपने प्राणोंको त्यागनेका संकल्प लेकर कहती हैं—हे मलयपवन! हे शीत समीरण! क्यों प्रतीक्षा कर रहे हो? मुझे खूब जमकर पीड़ा देना! हे पञ्चबाण! मेरे प्राणोंका हरण कर लेना, अपने पाँच बाणोंसे तुम मेरे पाँचों प्राणोंका अपहरण
४. सर्ग ८-९: खण्डिता व कलहान्तरिता
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २६९ कर लेना—इसीलिए तुम्हें पञ्चबाणोंसे उपहित किया जाता है। प्राणोंका हरण करना ही तुम्हारा प्रयोजन है। ठीक ही तो है—कामदेव सन्तप्त जनोंको उत्तप्त करके गृहकी ओर उन्मुख करा देता है। पर तुम मुझे कितना भी विवश कर लो, मेरे प्राण भले ही चले जायें, पर मैं घर कभी नहीं जाऊँगी, श्रीकृष्णके चरणोंका आश्रय लूँगी। दोनोंका उपालम्भ देकर कामसे विदीर्ण होकर यमुनासे कहती हैं—हे यमुने ! तुम यमराजकी बहन हो ! मलयानल एवं पञ्चबाण मुझे पीड़ित कर ही रहे हैं, कामदेव सम्भोगकारक हैं, पर वह तो विपरीत आचरणमय हो गया है, मल्यानिल सुखकारक होकर मुझे विकल बना रहा है, उन दोनोंके द्वारा प्राणोंके ग्रहण कर लिये जानेपर तुम भाई यमको क्या उत्तर दोगी ? इसलिए तुम मुझे क्षमा मत करो, तुम अपनी तरङ्गोंसे मेरे अङ्गोंका सिंचन कर दो, मृत देहको अपने सलिलमें समा लो, जिससे गतप्राण मेरे देहका दाह शान्त हो जाय। इस प्रकार श्रीराधा श्रीकृष्ण विरहमें दसवीं दशाको प्राप्त होने लगीं। प्रस्तुत श्लोकमें वसन्ततिलका छन्द तथा अप्रस्तुत प्रशंसा अलङ्कार है। प्रातर्नील-निचोलमच्युतमुर संवीत पीतांशुकं राधायाश्चकितं विलोक्य हसति स्वैरं सखीमण्डले। व्रीडाचञ्चलमञ्चलं नयनयोराधाय राधानने स्मेरस्मेरमुखोऽयमस्तु जगदानन्दाय नन्दात्मजः॥४॥ इति षोडश सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्द महाकाव्ये विप्रलब्धा वर्णने नागर-नारायणो नाम सप्तमः सर्गः। अन्वय—[अथैतद्दुःखवर्णनमंसहिष्णुः कविः सिंहावलोकन्यायेन साधारण-केलिरात्रैः प्रातश्चरितवर्णनेन श्रीराधायाः खण्डितावस्थां
२७० श्रीगीतगोविन्दम् वर्णयिष्यन् श्रीराधामाधवयोः प्राक्तन-केल्यनन्तरावरस्थितिवर्णनेन मङ्गलमातनोति]—[कदाचित्] प्रातः (प्रभाते) नीलनीचोलं (नीलं निचोलं वस्त्रं यस्य तादृशं परिहित-राधावसनमित्यर्थः) अच्युतं (हरिं) [तथा] संवीतपीतांशुकं (संवीतम् उत्तरीकृतं श्रीकृष्णस्य पीतम् अंशुकं वस्त्रं यत्र तादृशं) राधाया उरः (वक्षःस्थलं) विलोक्य सखीमण्डले स्वैरं (स्वच्छन्दम् उच्चैरित्यर्थः) [तथा] चकितं (चमत्कृतं यथा तथा) हसति [सति] राधानने (श्रीराधावदने) व्रीड़ाचञ्चलं (व्रीड़या लज्जया चञ्चलं यथा तथा) नयनयोः अञ्चलं (नेत्रप्रान्तं कटाक्षमित्यर्थः) आधाय (विन्यस्य) स्मेर-स्मेर-मुखः (मृदुमन्दसहास्यवदनः) अयं नन्दात्मजः (नन्दनन्दनः) जगदानन्दाय अस्तु (जगतामानन्दं विदधातु) [अतः सर्गोऽयं नागरा एव नरा नरसमूहास्तेषामयनं मूलभूतः श्रीकृष्णो यत्र स इति सप्तमः सर्गः] ॥४॥ अनुवाद—प्रातःकाल विभ्रमवश श्रीकृष्णने श्रीराधाजीका नील उत्तरीय वस्त्र (कञ्चुक) तथा श्रीराधाने अपने वक्षःस्थल पर श्रीकृष्णका पीत उत्तरीय वस्त्र धारण कर लिया, जिसे देख सखीमण्डल स्वच्छन्दतापूर्वक हँसने लगा। उन्हें हँसता हुआ देखकर श्रीकृष्णने मन्दमुस्कानके साथ सलज्ज होकर अपाङ्ग- भङ्गिमासे श्रीराधाके मुखारविन्दके प्रति कटाक्षपात किया। ऐसे नन्दनन्दन श्रीकृष्ण जगतके लिए आनन्दका विधान करें। बालबोधिनी—प्रस्तुत सर्गके अन्तिम श्लोकोंमें वैष्णवोंको कवि जयदेवके द्वारा आशीर्वाद दिया गया है—यह नन्दनन्दन श्रीकृष्ण जगतको आनन्ददायी हों। निकुञ्ज-वनके निकट जयदेवजीके द्वारा श्रीराधा-माधवकी पूर्व-केलिका स्मरण कर प्रातःकालकी स्थितिका निरूपण किया है। कवि जयदेव श्रीराधाका विरह वर्णन करनेमें असमर्थ हो गये, तब सिंहावलोकन न्यायसे रात्रिकालीन साधारण केलिका चित्राङ्कन कर प्रातःकालीन श्रीराधाकी खण्डितावस्थाका दिग्दर्शन कराया
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २७१ है। श्रीश्रीराधा-माधव दोनोंने एक साथ रति-केलिके द्वारा पिछली रात बितायी है एवं विभ्रमसे एक-दूसरेके वस्त्र पहन लिये हैं। इस वैचित्र्य परिवर्त्तनसे सखियाँ हँस पड़ीं, उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। अच्युत श्रीकृष्णने अपने तनपर नील-वसन कञ्चुकको धारण किया है और श्रीराधाका उर पीताम्बरसे ढका हुआ है। यह वस्त्र-विनिमय ही सखियोंके स्वच्छन्द हास्यका कारण है। लज्जासे चञ्चल नेत्रोंको श्रीराधाके मुख पर रखते हुए कटाक्षपात कर श्रीकृष्ण मन्द-मन्द मुस्कराने लगे। प्रस्तुत श्लोकमें कवि जयदेवकी लोकमङ्गलकी कामना प्रकट हुई है। हास्य रस, शार्दूल विक्रीड़ित छन्द, स्वभावोक्ति अलङ्कार, नायक शठ एवं नायिका अभिसारिका है। श्रीगीतगोविन्दके सोलहवें सन्दर्भकी बालबोधिनी वृत्ति समाप्त। इति सप्तमः सर्गः।
अष्टमः सर्गः विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः अथ कथमपि यामिनीं विनीय स्मरशरजर्जरितापि सा प्रभाते। अनुनयवचनं वदन्तमग्रे प्रणतमपि प्रियमाह साभ्यसूयम् ॥१॥ अन्वय—[इदानीं श्रीराधायाः खण्डितावस्थां वर्णयति; यदुक्तं— साहित्यदर्पणे—पार्श्वमेति प्रियो यस्या अन्यसम्भोगचिह्नितः। सा खण्डितेति कथिता धीरैरीर्षाकषातिता इति]—अथ (बहुविध- प्रलापानन्तरं) सा स्मरशर-जर्ज्जरितापि (स्मरस्य कामस्य शरेण जर्जरितापि; क्षणमात्रमतिबाहयितुमशक्तापीति भावः) कथमपि (अतिकृच्छ्रेण) यामिनीं विनीय (अतिबाह्य) प्रभाते (प्रातः) अग्रे (पुरतः) अनुनयवचनं (स्वापराधजनित-कोपोप- शमन-वाक्यं) वदन्तमपि, [ततोऽपि प्रसादमनालोक्य] प्रणतमपि [अनेन प्रेम्णः पराकाष्ठा दर्शिता] प्रियं (श्रीकृष्णं) साभ्यसूयं (कण्ठागतप्राणाया अपि प्रियदर्शनमात्रेण असूयोदयात् स यथातथा) आह ॥१॥ अनुवाद—अतःपर श्रीराधाने जैसे-तैसे वह रात बिताई। प्रातःकाल होनेपर श्रीकृष्ण उनको प्रणिपातपूर्वक सानुनय वचनसे उनके रोषभरे मानको प्रशमित करनेका प्रयास करने लगे, परन्तु श्रीराधा मदनबाणोंसे जर्जरित होनेपर भी विरहवचनोंसे युक्त प्रियकान्त श्रीकृष्णको अपने निकट प्रणतभावसे समुपस्थित देखकर अतिशय असूया (ईर्ष्या) भावसे उनको इस प्रकार कहने लगीं। पद्यानुवाद— किसी तरह दुःख-रात बिताई, हो आया जब भोर। चरणों पर झुकते, अधरों पर हँसते दीखा 'चोर'॥ किन्तु नहीं राधाका इससे नाचा रे मन मोर। हुई क्षुब्ध, सागरमें जैसे लहरोंका हो रहा शोर॥
अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २७३ हे माधव ! हे कमल-विलोचन ! वनमाली ! रसभीने ! अपनी व्यथा-हारिणीके ढिग जाओ हे परलीने ! बालबोधिनी—पिछली रात श्रीराधा सब कल्पनाजाल रचती रहीं, विरहमें श्रीकृष्णकी बाट जोहती रहीं, श्रीकृष्ण नहीं आये, श्रीराधा विरहसे जर्जरित हो गई, विदीर्ण हो गई, रात भर मदमाते वसन्तकी बयारकी व्यथाका सन्देश-प्रतिसन्देश पहुँचाती रहीं। उस वसन्ती रातमें दसों दिशाओंसे भाँति-भाँतिके फूलोंकी गन्ध और कामके शरोंसे आहत हो गयीं, संकेतस्थल पर विलाप करती रहीं, मिलनेके सपने देखती रहीं, मिलनकी स्मृतियोंमें खोयी रहीं। कैसा अजस्र विरह, इतनेमें ही प्रातःकाल हो गया। कैसी बिडम्बना है कि मानिनी नायिकाओंका मान अपने प्रियतमके समक्ष और भी अभिवर्द्धित हो जाता है। श्रीकृष्ण उनके सामने उपस्थित होकर प्रणाम करते हुए अत्यधिक अनुनय करनेवाले, प्रणतमान होकर सान्त्वना देने लगे, उनके कोपको दूर करनेका प्रयास करने लगे, परन्तु काम-पीड़ासे जर्जरिता श्रीकृष्णके शरीरमें सम्भोगका चिह्न देखकर वे और भी अधिक अधीर हो गयीं। श्रीराधाके चरणोंमें श्रीकृष्णका झुकना प्रेमकी पराकाष्ठा है, श्रीराधाके प्राण कण्ठगत हैं, प्रियके दर्शनसे ही श्रीराधामें असूया भाव प्रवाहित होने लगा और वे कहने लगीं— सप्तदशः सन्दर्भः गीतम् ॥१७॥ भैरवीरागयतितालाभ्यां गीयते। गीतगोविन्द काव्यका यह सत्रहवाँ प्रबन्ध भैरव-राग तथा यति-तालसे गाया जाता है। रजनि-जनित-गुरु-जागर-राग-कषायितमलस-निमेषम्। वहति नयनमनुरागमिव स्फुटमुदित-रसाभिनिवेशम्॥
२७४ श्रीगीतगोविन्दम् हरि हरि याहि माधव याहि केशव मा वद कैतववादं तामनुसर सरसीरुहलोचन या तव हरति विषादम् ॥ध्रुवम् ॥१ ॥ अन्वय—रजनि-जनित-गुरु-जागर-राग-कषायितम् (रजन्यां जनितेन गुरुणा दीर्घेण जागरेण जागरणेन यो रागस्तेन, तस्यामनुरागेण च कषायितं लोहितीकृतं) [तथा] अलसनिमेषं (अलसेन निमेषः निमीलनं यत्र तं) [तथाच] उदितरसाभिनिवेशं (उदितः प्रकटितः रसाभिनिवेशः तस्याः सुरते अभिनिवेशः येन तथाभूतं) तव नयनं स्फुटम् (अभिव्यक्तम्) अनुरागं बहतीव (धारयतीव); [तां प्रति तव हृदि स्थितोऽनुरागः प्राचुर्यात् अरविन्दचक्षुषा निर्गत इव प्रतीयते इति भावः]; हे माधव [त्वं] याहि, हे केशव [त्वं] याहि [द्विरुक्त्या कोपाधिक्यं सूचितम्]; कैतववादं (त्वदेकपरायणोऽहमिति कपटवचनं) मा वद; हे सरसीरुहलोचन (कमललोचन; दृष्टिपातमात्रेणैव मुग्धस्त्रीजनवञ्चनपरायण इत्यभिप्रेत्यर्थः) हरि हरि (खेदे) [त्वत्तोऽपि वञ्चनचतुरा] या [सहजप्रेमानभिज्ञस्य] तव विषादं (कापट्यापादितवैमनस्यं) हरति, ताम् (तव चित्तानुरूपचतुरव्यापारां कान्ताम्) अनुसर (अनुगच्छ) ॥१ ॥ अनुवाद—हे हरि ! (अपनी सुललित नयन-भङ्गिमासे अबलाओंके मनको हरण करनेवाले) मुझे खेद है। हे माधव ! जाओ ! हे केशव ! चले जाओ ! तुम झूठ मत बोलो ! जो तुम्हारे दुःखका हरण कर सकती है, तुम उसीके पास चले जाओ ! रात्रिमें बहुत अधिक जागरणके कारण अलसतामय मन्द-मन्द निमीलित, रति रसावेश संयुक्त आरक्त नयन उस ब्रजसुन्दरीके प्रति प्रबलानुरागको अभी भी प्रकाशित कर रहे हैं। पद्यानुवाद— नैश जागरणसे रतनारी बनी सखे ! हैं आँखें। रह-रहकर झप-झप उठती है मृदु पलकोंकी पाँखें ॥
अष्टमः सर्गः-विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २७५ छलक रही अनुराग माधुरी अलसाई 'कोरों' से। वह कौन बँधी सी झलक रही है रेशमके डोरोंसे ॥ हे माधव ! हे कमल विलोचन ! वनमाली ! रसभीने !। अपनी व्यथाहारिणीके ढिंग, जाओ हे परलीने ! ॥ बालबोधिनी-श्रीकृष्णकी आँखें रातभर जागनेके कारण और विरहानुभूतिसे लाल हो गयी हैं और अलसता हेतु बार-बार मुँदी जा रही हैं, ऐसी अनुरञ्जित आँखोंको देखकर श्रीराधा श्रीकृष्णको भावोंकी सार्थकता हेतु कई नामोंसे सम्बोधित करती हैं-सपत्नी विषयक ईर्ष्या प्रकट करती हैं। हरि ! हरि !-ये दोनों अव्यय पद 'खेद' प्रकट करनेके लिए प्रयुक्त हुए हैं। गान छन्दको पूर्ण करनेके लिए भी स्तोभ रूपमें इनका प्रयोग हो सकता है। खण्डिता श्रीराधा अपने सम्मुख प्रणतवान अपने प्रियसे कहती हैं-हे माधव ! हे लक्ष्मीपति ! जाओ ! चले जाओ ! आप अन्यासक्त हैं, किस प्रकार दूसरोंकी प्रताड़ना करोगे-यह 'मा' शब्दसे द्योतित होता है। अथवा मा अर्थात् लक्ष्मी स्वभावसे चञ्चला हैं, उनके पतिका भी चञ्चल होना युक्तिसंगत ही है। मैं एक पतिपरायणा हूँ, आप मुझसे किस प्रकार स्नेह कर सकते हैं? अतः चले जाओ। इस प्रकार दोषारोप और तिरस्कार कर पुनः असन्तुष्ट होकर कहने लगीं-हे केशव ! चले जाओ ! प्रशस्त हैं केश जिसके, उसमें अनुरक्त रहने वाले-यह 'केशव' शब्दकी व्युत्पत्ति होती है। आप किसी केशसंस्कारवती स्वैरिणीमें रत रहें-यहाँ 'केशव' शब्दमें व्यङ्ग है। अतः हे केशव अर्थात् हे बहुबल्लभ ! मुझ एक-परायणासे इस कैतववादसे क्या प्रयोजन-छल-वाक्य मत बोलो। मुझ दुःखीमें रोष क्यों है, यदि यह आशङ्का करते हो, तो सुनो-ऐसा नहीं है। हे सरसीसहलोचन ! अर्थात् कुमुदलोचन जो तुम्हारा विषाद हर लेती है, उसी (प्रिया, बहुबल्लभ) का अनुसरण करो। अनुरूपका अनुरूपामें ही
२७६ श्रीगीतगोविन्दम् अनुरूप प्रेम होता है। श्लोकमें 'सरसीरुहलोचन' शब्द कहा गया है। सरसीरुह शब्द 'कमल' एवं 'कुमुद' दोनोंका समान रूपसे वाचक है। श्रीकृष्णका कमललोचनत्व प्रख्यात है, किन्तु श्रीराधाको तो यहाँ सरसीरुह शब्दसे कुमुद रूपी अर्थ ही अभिप्रेत है। कुमुद रात्रिभर विकसित रहता है और दिवसको देखकर मुकुलित हो जाता है। श्रीकृष्ण भी चन्द्रवंशी हैं, अतः रात किसी नायिकाके साथ चन्द्रमाके समान ही जागकर बितायी है। पुनः श्रीराधा श्रीकृष्णसे कहती हैं-तुम्हारी आँखोंमें अनुराग अभी भी दिखायी दे रहा है, रागकी लालिमारूपी दोष अभी भी विद्यमान है, तत्कालीन उदित शृङ्गार रसका अनुरागमय अभिनिवेश अभी भी आँखोंमें लक्षित हो रहा है। जैसा चित्त वैसी चतुराई। उन तीन सम्बोधनोंकी व्याख्या इस प्रकार भी होती है- माधव-आप हमारे 'धव' अर्थात् पति नहीं हैं, पति होते तो क्या वञ्चना करते। यथार्थमें 'मा' अर्थात् श्रीराधा और 'धव' उनके प्राणप्रियतम हैं। केशव-जो प्रकृष्ट वेश-भूषाको धारण करते हैं, सदा ही जिनके केश मुक्त हैं। सरसीरुहलोचन-सदा आनन्दमें डूबे हुए होनेके कारण अर्द्धनिमीलित नेत्रवाले हैं। हाय ! रातभर जिसने करुणा बरसाई है, उसीके पास जाओ। यह सुनकर श्रीकृष्ण बोले-मैं तुमसे एक प्राण और एक शरीर हूँ। राधे ! मैं सच कहता हूँ कि मैंने किसी दूसरी स्त्रीका सङ्ग नहीं किया, मेरी आँखें हैं ही लाल रङ्गकी, किसी अङ्गनाके साथ जागरणके कारण नहीं, अलसतासे आँखें मुँद रही हैं॥१॥
अष्टमः सर्गः-विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २७७ कज्जल-मलिन-विलोचन-चुम्बन-विरचित-नीलिम-रूपम्। दशन-वसनमरुणं तव कृष्ण! तनोति तनोरनुरूपम्॥ हरि हरि याहि माधव.....॥२॥ अन्वय-[त्वच्चिन्तयैव जागरानेत्रे मे रागः, नतू अन्यस्या रतिरागादितिचेत् तत्राह]-हे कृष्ण, कज्जल-मलिन-विलोचन- चुम्बन-विरचित-नीलिमरूपम् (कज्जलेन मलिनयोः विलोचनयोः नेत्रयोः तस्या इति शेषः, चुम्बनेन विरचितं नीलिमरूपं यत्र तादृशं) तव अरुणं (सहजलोहितं) दशनवसनं (अधरः) [अधुना] तनोः (तव शरीरस्य) अनुरूपं (सदृशरूपं श्यामतामित्यर्थः) तनोति (व्यनक्ति) [हरि हरि याहि माधव याहीत्यादि सर्वत्र योजनीयम्]॥२॥ अनुवाद-आपकी दशन-पंक्तिके-वसन स्वरूप अरुण वर्णके सुन्दर अधर व्रजयुवतियोंके काजलसे अञ्जित नयनोंके चुम्बन करनेसे कृष्णवर्ण होकर आपके शरीरके अनुरूप ही कृष्णताको प्राप्त हो रहे हैं। पद्यानुवाद- उसकी कजरारी आँखोंके चुम्बनसे हैं काले। अरुण अधर ये छली! तुम्हारे, दीख रहे मतवाले॥ बालबोधिनी-श्रीराधा अपने अन्तरमें खण्डिताका आरोप करके बड़े मर्मभेदी व्यङ्गवाणोंसे माधवको भेदने लगती हैं-कृष्ण! कपटताकी आवश्यकता नहीं है। यदि तुम यह कहते हो कि दूसरी किसी भी रमणीके साथ मैंने रात नहीं बितायी है तो ये आँखें इतनी लाल-लाल क्यों हो रही हैं? उसी अनुरागिणीके प्रति अभी भी तुम्हारा प्रेम तुम्हारी आँखोंमें झलक रहा है। श्रीकृष्ण कहने लगे-प्रिये! मैं सच कहता हूँ कि मैंने किसी भी रमणीके साथ रात्रि जागरण नहीं किया, अलसताके कारण मेरी आँखें बन्द हो रही हैं। श्रीराधा कहने लगीं-पुनः यह तुम्हारे लाल अधर काले क्यों हो रहे हैं? तुम्हारे शरीरके अनुरूप रातभर उसकी काजल-अँजी
२७८ श्रीगीतगोविन्दम् आँखोंका तुमने चुम्बन किया है। जाओ, उसीके पास जाओ, जिसने तुम्हारी आँखोंको रङ्गा है, इन होठोंको रंगा है, रातभर अपनी करुणा बरसायी है, मुझसे झूठी बातें मत करो, जाओ! रति रसावेशमें संयुक्त हुए आपके आरक्त नयन उस ब्रजसुन्दरीके प्रति प्रबल अनुराग रूप रंगसे रंजित होकर प्रकाशित हो रहे हैं। वपुरनुहरति तव स्मर-सङ्गर-खरनखरक्षत-रेखम्। रकत-शकल-कलित-कलधौत-लिपेरिव रति-जयलेखम्॥ हरि हरि याहि माधव.....॥३॥ अन्वय—[त्वच्चिन्ताशोकेन मलिनोऽयमधरो नतु अन्यनारीनेत्र- चुम्बनादित्याह]—स्मर-सङ्गर-खर-नखर-क्षतरेखं (स्मरसङ्गरे मन्मथयुद्धे खरैः तीक्ष्णैः बाणैरिव नखरैः क्षतान्येव रेखाः यस्मिन् तत्) तव वपुः (शरीरं) मरकत-शकल-कलित-कलधौत- लिपेरिव (मरकतशकले नीलमणिखण्डे कलिता अर्पिता या कलधौतस्य सुवर्णस्य लिपिः अक्षरविन्यासः तस्या इव) रतिजयलेखं (रतेः जयलेखम् विजयपत्रम्) अनुहरति (सदृशीकरोति) [वपुषः कृष्णत्वात् नखक्षतस्य रक्तत्वाच्च मरकतार्पितलिपेः साम्यम्] ॥३॥ अनुवाद—आपका यह श्यामल शरीर कामकेलिके समय रतिरणनिपुणा कामिनीके प्रखर नखोंसे रेखाङ्कित हुआ है, ऐसा प्रतीत होता है, मानो मरकतमणिरूपी दीवार पर स्वर्णलिपिसे रति-जय-लेख अंकित कर दिया हो। पद्यानुवाद— स्मर-संगर-खर नख-क्षत-रेखा अंकित वपु पर ऐसे। नील पटल पर रति-जय लेखा, स्वर्ण-लिखित हो जैसे॥ हे माधव! हे कमल-विलोचन! वनमाली! रसभीने! अपनी व्यथा-हारिणीके ठिग जाओ हे परलीने! बालबोधिनी—श्रीराधा कहती हैं—हे कृष्ण! तुम्हारा अंग-अंग तुम्हारी काम-केलिकी कहानी कह रहा है। उस रमणीने
अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २७९ आपके वक्षःस्थल पर तीक्ष्ण नखक्षत किया है—ऐसा लग रहा है कि तुम्हारा हृदय रणभूमि है, यहाँ विकट युद्ध हुआ है। नीलवर्ण आपके वपुपर उस रमणीके द्वारा किये गये नख-क्षतोंकी लालिमामयी तीक्ष्ण रेखाएँ ऐसी प्रतीत हो रही हैं, मानो मरकतमणिकी नीली शिलापर स्वर्ण-मसिसे लिखी हुई लिपि हो, रतिजयपत्री हो। यह जय-लेख अपना विजय-सन्देश कह रहा है। कामीके प्रति कामिनीका भेजा गया यह केलिलेख—'मैंने रतिक्रीड़ामें इसे सम्पूर्णरूपेण जीत लिया है। कामिनीके द्वारा दूतरूपमें भेजे जानेके कारण 'अधमत्व' ही व्यंग्यार्थसे सूचित हो रहा है। 'खर' शब्दसे श्रीराधाका विशेष अभिप्राय है—एक तो इससे विलासभङ्गता सूचित होती है, दूसरे नख-आघात-क्षत ऐसे होने चाहिए, जिसमें तीक्ष्णता न हो, अपितु मृदुता हो। तीक्ष्णता तो कष्टदायिनी होती है। लगता है उस रमणीको रतिविलासका ज्ञान है ही नहीं। तुम जाओ! श्रीकृष्णने उत्तर दिया—राधे! मैं तुम्हें कंटकाकीर्ण वनोंमें खोज रहा था, वहीं काँटोंसे मेरा शरीर क्षतविक्षत हो गया है, ये किसी रमणीके नख-क्षत नहीं हैं। चरणकमल-गलदलक्तक-सिक्तमिदं तव हृदयमुदारम्। दर्शयतीव बहिर्मदन-द्रुम-नव-किसलय-परिवारम् ॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥४॥ अन्वय—[त्वान्वेषणे भ्रमणात् वने ममेदं वपुः कण्टकैः क्षतं नतु नखक्षतानीमानीति चेत् तन्न]—इदं तव उदारं (मनोहरं) हृदयं [तस्याः] [प्रेमोल्लासतः] चरण-कमल-गलदलक्तक -सिक्तं (चरण-कमलाभ्यां गलता स्रवता अलक्तकेन सिक्तम्); [अतएव] मदनद्रुम-नव-किशलय-परिवारं (मदनद्रुमस्य हृदयस्थस्य कामवृक्षस्य नवकिशलय-परिवारं बालपल्लवसमूहं) [हृदयात्] बहिः दर्शयतीव (प्रकटयतीव) ॥४॥ अनुवाद—आपके प्रशस्त हृदयपर वराङ्गनाके चरण-कमलोंके
२८० श्रीगीतगोविन्दम् अलक्तक रससे रञ्जित लोहित वर्ण चिह्न ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो आपके अन्तःकरणमें अवस्थित बद्धमूल मदन-वृक्षके अरुण-वर्ण नूतन पल्लव बाहर अभिव्यक्त हो रहे हैं। पद्यानुवाद— कमल चरणके स्रवित अलकासे उर भीगा (क्या सीखे) ? अन्तरका स्मर-तरु-किसलय सा छाया बाहर दीखे ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा व्यंग्यपूर्वक श्रीकृष्णसे कहती हैं—अहो, आपका हृदय अति उदार है—कैसा मनोहर स्वरूप धारण किया है ! आपने तो अति प्रेमोल्लाससे औदार्यको अभिव्यक्त करते हुए उस कामिनीके चरणकमलोंको ही हृदयमें धारण कर लिया है। उसके चरणोंसे स्रवित आलता-रसका लाल रंग आपके वक्षःस्थलको रञ्जित कर रहा है। श्याम-वर्ण पर जावक-रसका लाल-वर्ण तुम्हारी शोभाको और भी अभिवृद्धि कर रहा है। ऐसा लगता है, तुम्हारा हृदयस्थित अनुराग ही कामतरुके नव-नव किसलयोंकी भाँति लाल वर्णके रूपमें बाहर प्रकाशित हो रहा है। तुम्हारे हृदयमें विद्यमान कामवृक्षके नवीन पल्लव बाहर निकल रहे हैं। यह तुम्हारे अन्तःकरणका निषिद्ध प्रेमव्यापार मदन-वृक्षके रूपमें तुम्हारी हृदयस्थली पर उग आया है। इन चरण-चिह्नोंके रूपमें इस वृक्षके नये-नये लाल-लाल पल्लव दिखायी दे रहे हैं। तुम उस अनुरागको छिपा नहीं पा रहे हो। तुम्हारे लिए यहाँ कुछ नहीं है, जाओ ! कुछ टीकाकारोंके मतानुसार इस कथनके द्वारा श्रीराधाका अभिप्राय यह है कि श्रीकृष्ण द्वारा उस नायिकाके साथ क्रोध नामक बन्धविशेषसे रमण किया गया है। श्रीकृष्णने अपनी निर्मलता प्रस्तुत करते हुए कहा—यह तो गैरिकादि धातुओंका चित्रचिह्न है, मैंने किसी भी अङ्गनाके चरणकमलोंको धारण नहीं किया, न ही किसीके महावरको हृदयमें लगाया है।
अष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८१ दशन-पदं भवदधर-गतं मम जनयति चेतसि खेदम्। कथयति कथमधुनापि मया सह तव वपुरेतदभेदम्॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥५॥ अन्वय—[गैरिकचित्रितमेतत् नान्याङ्गना-चरणालक्तक- सिक्तमितिचेत् तत्राह]—एतत् (प्रत्यक्षदृष्टं) तव वपुः (शरीरं) अधुनापि (एवं भावान्तरमापतितेऽपि) मया सह अभेदं (ऐक्यं; नावयोर्भेद इति) कथं कथयति (सूचयति); (तस्याः तत्कथनप्रकारमाह; यतः] भवदधरगतं दशनपदं (दन्तक्षतं) मम चेतसि खेदं जनयति [व्यङ्गोक्तिरियम्; त्वदधरस्थितस्य मच्चित्तव्यथाजनकत्वात् अभेदो ज्ञायते; नयनरागादिकं छद्मना आच्छादितम् इदन्तु उदितचन्द्र कलावत् प्रकाशमानमिति भावः] ॥५॥ अनुवाद—उस विलासिनीके दन्त आघातसे आपके अधर क्षत-विक्षत हो रहे हैं, जिन्हें देख मेरे अन्तःकरणमें खेद उत्पन्न होता है और अब भी, आप कहते हैं कि तुम्हारा शरीर मुझसे पृथक् नहीं है, अभिन्न है। पद्यानुवाद— लख अधरों पर दन्तक्षतोंको छिद जाता जी मेरा। फिर भी क्यों कोई कहता है, ‘राधे! है हरि तेरा॥’ हे माधव! हे कमल-विलोचन! वनमाली! रसभीने! अपनी व्यथाहारिणीके ढिग जाओ हे परलीने!! बालबोधिनी—हे कृष्ण! नयन राग इत्यादिको तुम छल-छद्म वाक्योंसे आच्छादित कर सकते हो, परन्तु उस विलासिनीके दाँतोंसे क्षत-विक्षत अधर-पल्लवको कैसे छुपा पाओगे जो चन्द्रकलाकी भाँति प्रकाशित हो रहा है? तुम्हारी यह निर्लज्ज हँसी मेरे चित्तमें दाह पैदा करती है, सुरतकालमें तुम्हारे होठों पर उस रमणीके ‘दशन’ की छाप मुझमें खेद उत्पन्न कर रही है, विरहके कारण मेरी दशा दशमी स्थिति तक पहुँच गयी है। बार-बार यही कहते हो—हम-तुम एक
२८२ श्रीगीतगोविन्दम् हैं—पर इस स्थितिमें तुम अभेद कैसे अभिव्यक्त कर सकते हो—तुम चले जाओ। श्रीकृष्णने सफाई दी—प्रिये ! यह तो सौरभलुब्ध भ्रमरोंके द्वारा दंशन कर लिये जानेसे ही मेरे अधर क्षत हो रहे हैं, इन अधरों पर किसी रमणीका दंशन नहीं है। बहिरिव मलिनतरं तव कृष्ण मनोऽपि भविष्यति नूनम्। कथमथ वञ्चयसे जनमनुगतमसमशरज्वरदूनम् ॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥६ ॥ अन्वय—[सौरभलुब्धभ्रमरेण दृष्टोऽयमधरो नतु अन्यनायिका- चुम्बनादितिचेत्, तदपि न]—हे कृष्ण तव [मलिनात्मकं] मनः अपि बहिरिव बाह्यं शरीरमिव) नूनं (निश्चितं) मलिनतरं (कृष्णं) भविष्यति। अथ (अन्यथा) अनुगतं (त्वदेकायत्तं) असम-शर-ज्वरदूनं (असमशरस्य कामस्य ज्वरेण दूनं सन्तप्तं) [मां] कथं वञ्चयसे (प्रतारयसि) (शुद्धान्तःकरणस्य नेयं रीतिरित्यर्थः] ॥६ ॥ अनुवाद—हे कृष्ण! जैसे तुम्हारा शरीर मलिन है, वैसे ही तुम्हारा मन भी अवश्य ही मलिन हो गया होगा। यदि ऐसा न होता तो मदन-शरसे जर्जरित अपने अनुगत (आश्रित) जनकी इस प्रकार वञ्चना न करते। पद्यानुवाद— मन भी तन सा कृष्ण! तुम्हारा बना हुआ है काला। अपनी जान जलाते रहते (पड़ा निठुरसे पाला) ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा खेदको प्राप्त होकर श्रीकृष्णसे कहती हैं—हे कृष्ण ! बाहरसे तुम जितने काले हो, अन्दरसे तुम उससे भी अधिक काले हो। स्वभावतः उदार एवं उज्ज्वल मन मेरे प्रति इतनी उदासीनता कैसे बरत सकता है ? अपने ही अनुकूल, अपने ही आश्रितजनके साथ इतना छल, मेरी उपेक्षा कर परायी रमणीके साथ विलास, जो
अष्टमः सर्गः-विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८३ मलिन-मन होता है, वही अपने आश्रित व्यक्तिके साथ छल कर सकता है। मैं तो पहलेसे ही काम-शरोंसे पीड़िता हूँ, कमसे कम इस स्थितिमें तो धोखा नहीं देना चाहिए। जाओ छलिया! तुम यहाँसे चले जाओ। कोई शुद्ध अन्तःकरण वाला व्यक्ति ऐसा कभी नहीं कर सकता। श्रीकृष्णने कहा-राधे ! मुझपर व्यर्थ ही शंका मत करो, मैं कभी भी तुम्हारी वञ्चना नहीं कर सकता हूँ। भ्रमति भवानबला-कवलाय वनेषु किमत्र विचित्रम्। प्रथयति पूतनिकैव वधू-वध-निर्दय-बाल-चरित्रम् ॥ हरि हरि याहि माधव..... ॥७॥ अन्वय-[न वञ्चयाम्यहं त्वमेव मुधा शङ्कसे इत्यत आह]-भवान् अबला-कवलाय (अबलानां कवलाय ग्रासाय कान्तावाधायेति यावत्) वनेषु भ्रमति अत्र [विषये] किं विचित्रं [न किमपीत्यर्थः]; [अत्र उदाहरणमाह]-पूतनिका (पूतना) एव वधु-वध-निर्दय-बालचरित्रं (वधुवधे नारीहत्यायां निर्दयं बालचरित्रं) [कियत्] प्रथयति (विस्तारयति) [नतु सर्वमित्यर्थः]; [बाल्ये चेदेवं कैशोरे किमत्र विचित्रमिति भावः] ॥७॥ अनुवाद-आप अबलाओंका बध करनेके लिए ही वन-वनमें भ्रमण कर रहे हो, इसमें आश्चर्य ही क्या है! बाल्य-चरित्रमें ही आपने पूतनाका वध करके अपने निर्दय निष्ठुर स्वभावका परिचय दिया है, नारीबधपरायणता तो आपके चरित्रमें है ही। पद्यानुवाद- अबला-वधकी साध लिये, तुम वन वन डोल रहे हो। बालचरितका प्रथम पृष्ठ क्या फिरसे खोल रहे हो? ॥ हे माधव! हे कमल-विलोचन! वनमाली! रसभीने! अपनी व्यथाहारिणीके ढिग जाओ हे परलीने!।। बालबोधिनी-पुनः श्रीराधाने कहा-यह तो आपकी स्वभावसिद्धता ही है कि वनोंमें आप अबलाओंको 'ग्रसने'