गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ६३ नागकेसरपुष्पाणां विकासो यस्मिन् तथोक्ते); [तथा] मिलित- शिलीमुख-पाटलि-पटल-कृत-स्मर-तूण-विलासे (मिलिताः समवेताः शिलीमुखाः भ्रमराः येषु तादृशैः पाटलिपटलैः पाटलाकुसुमनिकरैः कृतः सम्पादितः स्मरस्य कामस्य यः तूणस्तस्य विलासः चेष्टितं यस्मिन् तादृशे; पाटलिः पारुलफुल इति भाषा; पाटलिपुष्पस्य तूणाकारत्वात् शिलीमुखशब्दस्य च श्लिष्टत्वात् साम्यं) [सरसवसन्ते इत्यादि] ॥४॥ अनुवाद—अब वनके विकसित पुष्प-समुदाय ऐसे प्रतीत हो रहे हैं, मानो मदनराजके हेमदण्ड हैं और भ्रमरावलिसे परिवेष्टित पाटलि (नागकेशर) पुष्पसमूह ऐसे दिखायी दे रहे हैं, मानो कामदेवके तूणीर हों। पद्यानुवाद— मदनराजके कनक-दण्ड-सा केसर-कुसुम-विकास, पाटल पर भौरोंकी छविका अङ्कित मधुर विलास। जुड़ी है मधु-रसिकोंकी भीर, नाचते हैं हरि सरस अधीर ॥ बालबोधिनी—सखि ! मदन-महीपतिके सुवर्ण छत्रकी विशिष्ट कान्तिके समान नागकेशर पुष्प प्रस्फुटित हो रहे हैं। उसमें भी भ्रमरावलीके तीक्ष्ण दन्तरूपी वाणोंसे बिद्ध यह वसन्तकाल विरहीजनोंके हृदयको भेद रहा है ॥४॥ विगलित-लज्जित-जगदवलोकन-तरुण-करुण-कृतहासे । विरही-निकृन्तन-कुन्त-मुखाकृति-केतकि-दन्तुरिताशे— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥५॥ अन्वय—विगलित-लज्जित-जगदवलोकन-तरुण-करुण-कृतहासे (विगलितं दूरं गतं लज्जितं लज्जा येषां [वसन्तस्य निरतिशयोद्दीपकत्वात् त्यक्तलज्जानामिति भावः] तादृशानां जगतां जगद्वासिनाम् अवलोकनेन दर्शनेन तरुणैः नवविकसित- पुष्पैरित्यर्थः करुणैः तदाख्यवृक्षैः [करुणानेवु इति भाषा] कृतः पुष्पविकाशरूप-हासः यत्र तादृशे); यूनामेव कामाभिज्ञतया
६४ $\qquad\qquad\qquad\qquad$ श्रीगीतगोविन्दम् हास्यस्योपयुक्तत्वे श्लिष्टार्थस्य तरुणशब्दस्योपादानम्) [तथा] विरहि-निकृन्तन कुन्त-मुखाकृति-केतकि-दन्तुरिताशे (विरहिणां वियोगिनां निकृन्तनाः संहारकाः ये कुन्ताः अस्त्रविशेषाः तेषां मुखानामाकृतिरिव आकृति-येषां तादृशैः केतकिभिः तन्नामक-कुसुमविशेषैः (केयाफुल इति भाषा) दन्तुरिताः कृतदन्तविकाशाः परिव्याप्ता इति यावत् आशाः दिशः यत्र तादृशे) [सरसवसन्ते हरिः इत्यादि] ॥५॥ अनुवाद—अरी सखि ! वसन्तके प्रतापसे ऐसा प्रतीत होता है कि सम्पूर्ण जगत निर्लज्ज हो गया है। यह देखकर तरुण करुण पादपसमूह (वृक्षराजि) प्रफुल्लित सुमनोंके व्याजसे हँस रहे हैं। देखो, विरहीजनोंके हृदयको विदीर्ण करनेके लिए बरछीकी नोकके समान आकारवाले केतकी (केवड़ा) प्रसून चहुँदिशि प्रफुल्लित विलसित विकसित हो रहे हैं। इनके संयोगसे दिशाएँ भी प्रसन्न हो रही हैं। पद्यानुवाद— लज्जा गलित विश्वका करता तरुण करुण उपहास, बिद्ध केतकी कुन्तमुखोंसे विरही मन-आवास। हार जाते हैं पलमें वीर नाचते हैं हरि सरस अधीर॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीसे कह रही है—प्यारी सखि ! और क्या कहूँ, इस वसन्तकालमें जगतके विरहीजन लाजका त्यागकर प्रियतमके विरहमें रोदन कर रहे हैं। सम्पूर्ण जगतमें प्राणीमात्रकी ही लज्जा पूर्णरूपेण समाप्त हो गयी है। जगतकी इस दशाका अवलोकन करके तरुण करुण विटपावली खिले एवं द्युतिमान पुष्पोंके बहानेसे हास्यसुधा बिखेर रही हैं। अथवा विलासिनी स्त्रियोंके हृदयकी कामवासनाको जानकर नवतरुण पुरुष हास्यामृतको प्रकाशित कर रहा है। करुणा और हास्य दोनों किस प्रकार सम्भव है?
प्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ६५ करुणा इसलिए कि कण्ठाश्लेष प्रणयीजनोंके वियोगमें इनकी बड़ी दीन दशा होती है और हास्यका कारण है, विरहीजनोंकी अधीरता। खिले केतकी पुष्पोंके अग्रभागको देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वे विरहियोंके हृदयका विदारण करने हेतु बरछी हों। माधविका-परिमल-ललिते नवमालिकयातिसुगन्धौ। मुनि-मनसामपि मोहन-कारिणि तरुणाकारणबन्धौ- विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥६॥ अन्वय-माधविका-परिमल-ललिते (माधविकायाः परिमलेन आमोदेन ललिते मनोहरे) [तथा] नवमालिकया (नवमालिका- कुसुमेन) अतिसुगन्धौ (अतिसुरभित) [अतएव] मुनि-मनसामपि (तापस-चित्तानामपि; का वार्त्ता कामिनाम् इत्यपेरर्थः) मोहन-कारिण (मोहकरे) [तथाच] तरुणाकारणवन्धौ (एकशेषस्तरुणशब्दः; तरुणानां तरुणीनाञ्चेत्यर्थः; अकारणवन्धौ अकृत्रिमसुहृदि; हेतुं विनापि हितकारिणीत्यर्थः) [सरस-वसन्ते हरिः इत्यादि] ॥६॥ अनुवाद-यह वसन्त मास वासन्ती पुष्पोंके मकरन्दसे अतिशय ललित एवं मनोहर हो रहा है तथा नवमालिका (जूही) पुष्पोंकी सुगन्धसे सुगन्धित हो रहा है। इसकालमें तो मुनियोंके मनमें भी विकार उत्पन्न हो जाता है, वे मुग्ध हो उठते हैं। यह वसन्त युवावर्गका अकारण बन्धु है॥ पद्यानुवाद- माधविका-मालती-गन्ध अब रही दिशामें व्याप। मोहित मुनि-मन विकल तरुण जन खिंचते अपने आप॥ दिखाये कैसे हियको चीर, नाचते हैं हरि सरस अधीर॥ बालबोधिनी-माधवी लताके पुष्पोंके परागसे यह वसन्त ऋतु मनोहर हो गया है और वातावरण नवमालिका (जूही) की सुगन्धसे सुवासित हो गया है। यह सुवासितता मुनिजनोंके
६६ श्रीगीतगोविन्दम् मनमें कामविकारको उत्पन्न करा देती है; फिर साधारण पुरुषोंकी तो बात ही क्या की जाय? जब ऐसा वसन्त समय होता है, तब अचेतन लता कान्त (वृक्ष) के बिना नहीं रह सकती है, तो चेतनस्वरूपा हम जैसी स्त्री-लताएँ कान्तके बिना कैसे रह सकती हैं? उसमें भी मधुकरोंका गुञ्जन, कोयलोंका कूजन और भी हृदयविदारक हो जाता है। ऐसी स्थितिमें वह वसन्त तरुण-तरुणियोंका अकारण बन्धु है॥६॥ स्फुरदतिमुक्तलता-परिरम्भण-पुलकित-मुकुलित चूते। वृन्दावन-विपिने परिसर-परिगत-यमुनाजलपूते— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥७॥ अन्वय—स्फुरदतिमुक्तलता-परिरम्भण-पुलकित-मुकुलित-चूते (स्फूरन्तीनां आकम्पितानाम् अतिमुक्तलतानां माधवीलतानां परिरम्भणेन आलिङ्गनेन पुलकिताः जातरोमाञ्चाः इव मुकुलिताः ईषद्विकसितमुकुलाः चूताः रसालाः यत्र तादृशे) [यथा कश्चित् वराङ्गनालिङ्गितः जातरोमाञ्चो भवति तथेति भावः]; [तथा] परिसर-परिगत-यमुना-जलपूते (परिसरेषु पर्यन्तभूमिषु प्रान्तेषु इत्यर्थः परिगता प्राप्ता या यमुना तस्याः जलैः पूते पवित्रीकृते सुशोभिते इति तात्पर्यार्थः) वृन्दावन-विपिने (वृन्दावन-कानने) [सरसवसन्ते हरिः इत्यादि] ॥७॥ अनुवाद—हे सखि! चपल मुक्तालताके आलिङ्गनसे युक्त मुकुलित (मञ्जरियोंसे पूर्ण) तथा रोमाञ्चित आम्रवृक्षोंसे युक्त वृन्दाविपिनके सन्निकट प्रवाहमाना यमुनाके पावन जलमें श्रीहरि युवतियोंके साथ परस्पर मिलित होकर विहार कर रहे हैं॥७॥ पद्यानुवाद— वायु चञ्चलित लता माधवीसे आलिङ्गित आम, परिपुष्पित है; पूत जमुन-जलसे वृन्दावन-धाम॥
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ६७ समाया उसमें सागर क्षीर नाचते हैं हरि सरस अधीर ॥ बालबोधिनी—इस वासन्तिक कालमें चेतनके साथ जड़ पदार्थ भी कामसे विकृत देखे जा सकते हैं। समीरणके वश हुई अतिमुक्तालता (माधवीलता) ने जब आम्रवृक्षका आलिङ्गन किया तो वह मुकुलित और रोमाञ्चित हो गया। सन्निकटमें प्रवाहित होनेवाली यमुनाके जलसे पवित्र वृन्दाविपिनमें श्रीकृष्ण केलिक्रीड़ा कर रहे हैं ॥७॥ श्रीजयदेव-भणितमिदमुदयतु हरिचरणस्मृतिसारं । सरस-वसन्त-समय वनवर्णनमनुगत मदन-विकारम्— विहरति हरिरिह सरस वसन्ते.... ॥८॥ अन्वय—श्रीजयदेव-भणितम् (जयदेवोक्तं) इदम् अनुगत- मदनविकारं (अनुगतं अनुसृतं मदनस्य कामस्य विकारो विक्रिया येन तत् कामादीपकमित्यर्थः) हरि-चरण-स्मृतिसारं (हरिचरणयोः स्मृतिः स्मरणमेव सारः परमार्थो यस्य तथाभूतं) सरस-वसन्तमय-वनवर्णनं (सरसः यः वसन्तसमयः तत्र वनवर्णनम्) उदयतु (भक्तहृदये वृद्धिं गच्छतु) ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा वर्णित श्रीकृष्ण-विरहजनित उत्कण्ठिता श्रीराधाके मदनविकारसे सम्बलित इस वसन्त समयकी वनशोभाका चित्रणरूप यह सरस मङ्गलगीत अति उत्कृष्ट रूपसे प्रकाशित हुआ है। यह वासन्तिक काल कामविकारोंसे अनुस्यूत है जो श्रीहरिके चरणकमलकी स्मृतिको उदित कराता है ॥८॥ पद्यानुवाद— श्रीजयदेव काव्य केवल हरि-चरण-स्मृतिका सार, सरस वसन्त समय वन-वर्णन अनुगत मदन-विकार।
६८ श्रीगीतगोविन्दम् लहर उठता रमणीका चीर नाचते हैं हरि सरस अधीर ॥८॥ बालबोधिनी—कवि श्रीजयदेव इस गीतका उपसंहार करते हुए इसके उत्कर्षका वर्णन करते हैं। इस मङ्गलगीतमें हरिचरण स्मृतिसाररूप शृङ्गार-रसके पोषक वसन्तकालके वनविहारका अभिव्यञ्जन है। इस गीतकी जय हो। जिसका मदनविकार हुआ है, ऐसे निकटवर्त्ती जन ही इसका श्रवण करें, जिससे उनके विकार दूर हो जायेंगे। यह मङ्गलगीत अष्टपदीय है, जिसमें जाति नामक अलङ्कार है। इसमें वर्णित श्रीराधा मध्या नायिका हैं। इसमें श्रीकृष्ण दक्षिण नायकके रूपमें हैं। इसमें शृङ्गार रसका विप्रलम्भ भाव है। इसमें प्रयुक्त छन्दका नाम लय है। इस तृतीय प्रबन्धका नाम "माधवोत्सव कमलाकर" है। दर-विदलित-मल्ली-वल्लि-चञ्चत्-पराग- प्रकटित-पटवासैर्वासयन् काननानि। इह हि दहति चेतः केतकी-गन्ध-बन्धुः प्रसरदसमबाण-प्राणवद्-गन्धबाहः ॥९॥ अन्वय—[अथ वसन्तवायु वर्णयति कवि:]—इह (वसन्ते) केतकीगन्धवन्धुः (केतकीनां गन्धस्य वन्धुः नित्यसहचरः अत्यागसहनइत्यर्थः) [तथा] प्रसरदसमवाण-प्राणवत् (प्रसरन् प्रतिदिशं सञ्चरन् तरुणचेतसि प्रवृद्धिं गच्छन् यः असमवाणः पञ्चवाणः मदन इत्यर्थः मदनोऽत्र नृपत्वेन निरूपितः तस्य प्राणवत् प्राणसदृशं अतिप्रिय इत्यर्थः; अस्य निरतिशय- मदनोद्दीपकत्वादिति भावः) गन्धवाहः (दक्षिणानिलः) [सख्युराज्ञा पालनीया इत्यालोच्य] दर-विदलितमल्ली-वल्लि- चञ्चत्पराग- प्रकटित-पट-वासैः (दर-विदलितानाम् ईषद्- विकसितानां मल्लीनां मल्लिकानां या वल्लयः लताः तासां चञ्चन्तः प्रसरन्तः ये परागाः पुष्परेणवः ते एव प्रकटिताः स्फुटीकृताः
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ६९ पटवासाः सुगन्धचूर्णविशेषाः तैः) काननानि वासयन् (सुरभीकुर्वन्) चेतः [वियोगिनामिति शेषः] दहति हि (नितरां सन्तापयत्येव) ॥१॥ अनुवाद—हे सखि! देखो, अर्द्ध प्रस्फुटित मल्लिकालताके मकरन्दके श्वेतचूर्णसे वनस्थली श्वेत पटवास द्वारा समाच्छादित हो गयी है। केतकी कुसुमोंके सुगन्धसे मलयपवन आमोदित हो रहा है, यह पवन कामदेवके बाणके समान उसका प्राणसखा बन विरहीजनोंके हृदयको दग्ध कर रहा है॥१॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीके सम्मुख वसन्तकालमें प्रवहमाना मलयवायुकी उद्दीपनाका वर्णन करती हुई कह रही है कि पवन विरहीजनोंके हृदयको तापित कर रहा है। यदि यह पूछा जाय कि किस अपराधके कारण वायु चित्तको दग्ध कर रही है तो इसके उत्तरमें कहते हैं, यह पवन कामदेवका प्राणतुल्य है, अतः अपने सखाके आदेशका पालन करते हुए विरहीजनोंके हृदयको तपाने लगता है। इस वसन्तकालमें मल्लिका-लता ईषत् रूपसे विकसित हो गयी है, उसके उड्डीयमान परागपुञ्ज ही पटवास बन गये हैं और केतकी प्रसूनोंके इस परिमल-चूर्णसे वायु सुगन्धसे परिपूर्ण हो गयी है, कामदेवके समान यह पवन भी विरहीजनोंको सन्तप्त कर रहा है। अतएव यह समीरण कामदेवके प्राणके समान है। प्रस्तुत श्लोक मालिनी छन्दका है, समासोक्ति तथा वर्णानुप्रास अलङ्कारोंकी संसृष्टि है॥१॥ अद्योत्सङ्ग-वसद्भुजङ्ग-कवल-क्लेशादिवेशाचलं प्रालेय-प्लवनेच्छयानुसरति श्रीखण्डशैलानिलः। किञ्च स्निग्ध-रसाल-मौलि-मुकुलान्यालोक्य हर्षोदया- दुन्मीलन्ति कुहूः कुहूरिति कलोत्तालाः पिकानां गिरः ॥२॥ अन्वय—अद्य (अधुना) श्रीखण्डशैलानिलः (श्रीखण्डशैलस्य मलयाचलस्य अनिलः वायुः) उत्सङ्ग-वसद्भुजङ्ग-कवल-क्लेशात् इव (उत्सङ्गे क्रोड़े वसन्तः ये भूजङ्गाः सर्पाः तेषां कवलेन
७० श्रीगीतगोविन्दम् ग्रासेन यः क्लेशः तस्मात्); [भुजङ्गाः पवनाशनाः इति लोके प्रसिद्धमेव तस्य; भुजङ्गकवलेन विषव्याप्तदेहत्वादिति भावः] प्रालेय-प्लवनेच्छया (प्रालेयेषु हिमेषु प्लवनेच्छया अवगाहनाशया विषज्वालायाः शान्तये इति भावः) ईशाचलं (ईशस्य महादेवस्य अचलः पर्वतः हिमाचलस्तं) अनुसरति (गच्छति); [चन्दनतरु कोटरस्थ-विषधर-कवल-सन्तप्तोवायुः हिमस्नानेच्छया हिमाचलं यातीव; वसन्ते दक्षिणदिग्वर्त्तिनो मलयाचलात् वायेरुत्तरत्र गमनात् उत्तरे च हिमाचलस्य अवस्थानात् इयमुत्प्रेक्षा]। [किञ्च] स्निग्ध-रसाल-मौलिमुकुलानि (स्निग्धानि कोमलानि रसालानां चूततरूणां मौलिषु शिखरेषु यानि मुकुलानि तानि) आलोक्य (दृष्ट्वा) हर्षोदयात् (आनन्दोदयात्) पिकानां (कोकिलानां) कुहुः कुहूरिति कलोत्तालाः (कला अव्यक्तमधुरा उत्ताला अत्युच्चाः), गिरः (ध्वनयः) उन्मीलन्ति (उद्गच्छन्ति) ॥२॥ अनुवाद—अरी सखि! सुना है श्रीखण्डशैल (मलय पर्वत) में बहुतसे सर्प निवास करते हैं, वहाँका पवन भुजङ्गोंके विषसे निश्चित ही जर्जर हो गया है, इससे ऐसा लगता है कि वह उस विष ज्वालासे जलकर हिम सलिलमें स्नान करनेके लिए हिमालयकी ओर प्रवाहित होने लगा है। देखो! देखो! सखि! मधुर, मनोहर, स्निग्ध रसालमौलि मुकुलों (मञ्जरियों) को देखकर हर्षसे विभोर कोकिल कुहु-कुहुकी मधुर वाणीमें उच्चस्वरसे कूजन कर रही है। पद्यानुवाद— सतत सर्प पीड़ासे तापित, मलय पवन हिमदेश बहनेको आतुर रहता है, निशिदिन कोमल वेश। मधुर आमके वोरोंसे या बढ़ता जाता मिलने जो कोकिलकी कुहु कुहु सुन मदसे लगते खिलने ॥ बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें सखीने शृङ्गार रसके दोनों विभावोंका चित्रण किया है। इस मधुमासमें मलयाचलकी वायु हिमदेशकी ओर आ रही है। रातदिन मलयगिरिमें
प्रथमः सर्गः–सामोद-दामोदरः ७१ चन्दनके वृक्षोंपर जहरीले साँप अवस्थित रहते हैं। इसी कारण वह हवा हिमालयकी ओर प्रस्थान कर रही है। सर्पोंके दंशनके कारण मलयाचलमें सन्ताप उत्पन्न हो गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि अपने उस सन्तापके कारण ही हवा हिमालयकी शीत हवाका आनन्द प्राप्त करनेके लिए हिमदेशको जा रही है। इस समय रसाल तरुवरोंमें मञ्जरियाँ भी उद्भूत हो जाती हैं। इन आमकी बौरोंको देखकर कोकिल समुदाय हर्षसे आह्लादित होकर उच्चस्वरसे कुहु-कुहुका स्वर आलाप करने लगा है। इस तरहकी उन्मादिनी प्रोन्मादिनी वेलामें श्रीकृष्णसे तुम्हारा डरना उचित नहीं है, राधे! प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द, अनुप्रास तथा उपमा अलंकार, वैदर्भी रीति तथा विप्रलम्भ शृङ्गारका सूचक रति नामक स्थायी भाव है॥२॥ उन्मीलनमधुगन्ध-लुब्ध-मधुप-व्याधूत-चूताङ्कुर- क्रीडत्-कोकिल-काकली-कलकलैरुद्गीर्णकर्णज्वराः। नीयन्ते पथिकैः कथंकथमपि ध्यानावधानक्षण- प्राप्त-प्राणसमा-समागम-रसोल्लासैरमी वासराः॥३॥ इति श्रीगीतगोविन्दे तृतीय सन्दर्भः। अन्वय—[इदानीं चिरविरहिणः प्रियासङ्गं विना दिनयापनं दुर्घटमित्याह]–उन्मीलनमधु-गन्ध-लुब्ध-मधुप-व्याधूत-चुताङ्कुर- क्रीडत्-कोकिल-काकली-कलकलैः (उन्मीलत्सु प्रसरत्सु मधुगन्धेषु मकरन्दगन्धेषु लुब्धैः लोलुपैः मधुपैः भ्रमरैः व्याधूताः कम्पिताः ये चूतांकुराः आम्रमुकुलानि तेषु क्रीडतां कोकिलानां काकलीकलकलैः सूक्ष्ममधुरी-स्फुटध्वनिभिः) उद्गीर्णकर्णज्वराः (उद्गीर्णाः उद्भूताः कर्णज्वराः श्रोत्रपीडाः येषु तथोक्ताः)
७२ श्रीगीतगोविन्दम् ध्यानावधान-क्षणप्राप्तप्राणसमा-समागम-रसोल्लासैः (ध्यानं कान्तायाश्चिन्तनं तत्र यत् अवधानम् अभिनिवेशः तस्य क्षणे प्राप्तः अनुभूतः प्राणसमायाः प्रणयिन्याः समागमरसेन सङ्गसुखेन उल्लासः आनन्दः यैः तादृशैः सद्भिः) पथिकैः (विरहिभिः) अमी वासराः (वसन्तदिवसाः) कथंकथमपि (अतिकृच्छ्रेण) नीयन्ते (अतिबाह्यन्ते) ॥३॥ अनुवाद—हे सखि ! देखो ! उन्मीलित आम्र मुकुलके पुष्प किञ्जल्कके मधुगन्धके लुब्ध भ्रमरोंसे प्रकाशित मञ्जरियों पर कोयलें क्रीड़ा करती हुई कुहु-कुहु रवसे मधुर ध्वनि कर रही हैं और इस कोलाहलसे विरहीजनोंको कर्णज्वर हो रहा है। वसन्त ऋतुके वासरोंमें विरहीजन अतिशय कठोर विरह यातनाके कारण प्राणसम प्रेयसियोंका चिन्तन करने लगते हैं। तब उनके मुखमण्डलके ध्यानसे, उनके समागम जनित आनन्दके आविर्भूत हो जानेसे क्षणिक सुख लाभ करते हुए वे अति कष्टपूर्वक समयको अतिवाहित करते हैं॥३॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीसे कह रही है कि विरहीजनोंका प्रिय विरह भी अति दुःसह होता है। श्रीकृष्ण-विरहमें मलय पवन ही केवल पीड़ाप्रद होता है, ऐसा नहीं, आम्रवृक्षमें बैठनेवाली कोयलोंकी कुहु-कुहु अति मधुर एवं अस्फुट ध्वनि चारों ओर गुञ्जन करने लगती है, जिसमें विरहीजनोंका हृदय अतिशय रूपसे अनुतप्त होता है। ये क्रीड़ापरायण कोयलें कलध्वनिसे कर्णज्वर प्रादुर्भूत कर रही हैं। जब कोयलका स्वर सुनकर विरही प्रियतमाका स्मरण करते हैं तो उन्हें लगता है कि प्राणसमा प्रियतमाका समागम हो गया है। यह समय अति कष्टपूर्वक अतिवाहित होता है। इस श्लोकमें शार्दूल विक्रीड़ित छन्द है। इनमें काव्यलिङ्ग नामक अलङ्कार, गौड़ीया रीति तथा विप्रलम्भ शृङ्गार रस है। ‘वासराः’ पदमें बहुवचनका प्रयोग औचित्ययुक्त है॥३॥ इति श्रीगीतगोविन्दे तृतीयः सन्दर्भः।
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ७३ चतुर्थः सन्दर्भः अनेक-नारी-परिरम्भ-सम्भ्रम- स्फुरन्मनोहारि-विलास-लालसम्। मुरारिमारादुपदर्शयन्त्यसौ सखीसमक्षं पुनराह राधिकाम् ॥१॥ अन्वय—[ततश्च तयोः श्रीकृष्णानुसन्धान-चेष्टा सफला सञ्जाता। श्रीकृष्णः तयोर्नेत्रपथवर्ती वभुव एवं समये] असौ (पूर्वोक्ता श्रीराधायाः सखी) आरात् (अनतिदूरे) [समवस्थितमिति शेषः] अनेकनारी-परिरम्भ-सम्भ्रम-स्फुरन्मनोहारि-विलासलालसम् (अनेकानां नारीणां गोपतरुणीनां परिरम्भे निर्भरालिङ्गने यः सम्भ्रमः आवेगः तेन स्फुरन् निरतिशयस्फूर्त्तिशाली अतएव मनोहारी चित्ताकर्षणकारी यः विलासः केलिः तत्र लालसा एकान्तौत्सुक्यं यस्य तादृशं) मुरारिं समक्षं (अक्ष्णोः समीपे) उपदर्शयन्ती (अङ्गुलीसङ्केतेन प्रदर्शयन्ती) पुनः राधिकाम् आह ॥१॥ अनुवाद—अनन्तर श्रीराधिकाजीकी सखीने बड़ी चतुरतासे श्रीकृष्णका अनुसन्धान कर लिया। सखीने देखा कि अति सान्निध्यमें ही श्रीकृष्ण गोप-युवतियोंके साथ प्रमोद विलासमें निमग्न आदरातिशयताको प्राप्त कर रहे हैं। उन रमणियोंके द्वारा आलिङ्गनकी उत्सुकता दिखाये जाने पर श्रीकृष्णके मनमें मनोज्ञ मनोहर विलासकी लालसा जाग उठी है। सखी अन्तरालसे (आड़में छिपकर) राधाजीको दिखलाती हुई पुनः यह बोली— पद्यानुवाद— परिरम्भ मदिर रस मातल प्रमदा परिवेशित हरिको। दिखला, राधासे आली बोली पी कर मधु छबिको॥
७४ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—वनशोभाके चित्रण आदिके द्वारा कविने श्रीराधाजीके सुदीप्त भावको प्रकाशित किया है। कोई सखी श्रीराधाजीके समीप उपस्थित होकर श्रीकृष्णके अभिप्रायको साक्षात् रूपसे दिखलाती हुई कहती है (अनेक नारी इति श्लोकके द्वारा)—सखि देखो ! मुरारि इस समय क्या कर रहे हैं? वे इस समय इतनी तरुणियोंका आलिङ्गन प्राप्त करके भी तृप्त नहीं हो सके हैं, इसलिए अति मनोहारिणी श्रीराधाजीसे मिलनकी उत्सुकता प्रकट करने लगे हैं और विलासकी लालसासे उत्कण्ठित हो गये हैं। श्रीकृष्णका लीलाविलास नित्य है, इसलिए यह प्रत्यक्ष भी है। विरहमें स्मरण, स्फूर्ति तथा आविर्भाव—ये तीन वैशिष्ट्य परिलक्षित होते हैं। अतः यहाँ विलासका स्फुरित होना युक्तिसङ्गत है। इसमें वंशस्थविला छन्द, अनुप्रास अलङ्कार एवं दक्षिण नायक हैं॥१॥ गीतम् ॥४॥ रामकिरीरागेण यतितालेन च गीयते। चन्दन-चर्चित-नील-कलेवर पीतवसन-वनमाली केलिचलन्मणि-कुण्डल-मण्डित-गण्डयुग-स्मितशाली हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे विलासिनी विलसति केलिपरे ॥१॥ध्रुवम्॥ पीन-पयोधर-भार-भरेण हरिं परिरभ्य सरागं। गोपवधूरनुगायति काचिदुदञ्चित-पञ्चम-रागम्— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥२॥]
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ७५ कापि विलास-विलोल-विलोचन-खेलन-जनित-मनोजं। ध्यायति मुग्धवधूरधिकं मधुसूदन-वदन-सरोजम्— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥३॥] कापि कपोलतले मिलिता लपितुं किमपि श्रुतिमूले। चारु चुचुम्ब नितम्बवती दयितं पुलकैरनुकूले— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥४॥] केलि-कला-कुतुकेन च काचिदमुं यमुनावनकुले। मञ्जुल-वञ्जुल-कुञ्जगतं विचकर्ष करेण दुकूले— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥५॥] करतल-ताल-तरल-वलयावलि-कलित-कलस्वन-वंशे। रासरसे सहनृत्यपरा हरिणा युवतिः प्रशंससे— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥६॥] श्लिष्यति कामपि चुम्बति कामपि कामपि रमयति रामां। पश्यति सस्मित-चारुतरमपरामनुगच्छति बामां॥७॥ [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥७॥] श्रीजयदेव-भणितमिदमद्भुत-केशव-केलि-रहस्यं । वृन्दावन-विपिने ललितं वितनोतु शुभानि यशस्यम् ॥ [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥८॥] नीचे प्रत्येक पद्य, अन्वय, श्लोकानुवाद, पद्यानुवाद तथा बालबोधिनी व्याख्या दी जा रही है— चतुर्थ प्रबन्धके श्लोक रामकिरी राग तथा यति तालसे गाये जाते हैं। चन्दन-चर्चित-नील-कलेवर पीतवसन-वनमाली केलिचलन्मणि-कुण्डल-मण्डित-गण्डयुग-स्मितशाली हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे विलासिनी विलसति केलिपरे ॥१॥ध्रुवम् ॥
७६ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—अयि विलासिनि (विलासवति) केलि-चलन्मणि- कुण्डल-मण्डित-गण्डयुग-स्मितशाली (केलिना क्रीडारसेन चलन्ती ये मणिकुण्डले रत्नमय-कर्णभूषणे ताभ्यां मण्डितं शोभितं गण्डयुगं कपोलयुगलं यस्य सः; तथा स्मितेन मृदुहासेन शालते शोभते इति स्मितशाली, स चासौ स चेति तथा) चन्दन-चर्चित-नीलकलेवर-पीतवसन-वनमाली (चन्दनैः चर्चितम् अनुलिप्तं नीलं कलेवरं यस्य सः; तथा पीत वसनं यस्य तथोक्तः; तथा वनमाली वनकुसुम-मालाधरः; स चासौ स चासौ स चासौ स चेति तथा) हरिः इह (अस्मिन्) केलिपरे (क्रीडासक्ते) मुग्धवधूनिकरे (सुन्दरी-समूहे) विलसति (विहरति) [अहो श्रीकृष्णस्य अकृत-वेदित्वम् ! त्वद्दत्त-चन्दन-वनमाला-भूषित स्त्वद्वर्णवसनावृताङ्गयष्टिरेव विलसतीत्यवलोकय] ॥१॥ अनुवाद—हे विलासिनी श्रीराधे! देखो! पीतवसन धारण किये हुए, अपने तमाल-श्यामल-अङ्गोंमें चन्दनका विलेपन करते हुए, केलिविलासपरायण श्रीकृष्ण इस वृन्दाविपिनमें मुग्ध वधुटियोंके साथ परम आमोदित होकर विहार कर रहे हैं, जिसके कारण दोनों कानोंमें कुण्डल दोलायमान हो रहे हैं, उनके कपोलद्वयकी शोभा अति अद्भुत है। मधुमय हासविलासके द्वारा मुखमण्डल अद्भुत माधुर्यको प्रकट कर रहा है॥१॥ पद्यानुवाद— चन्दन चर्चित नील कलेवर पीत वसन वनमाली केलि चञ्चला मणि कुण्डल गति स्मितमुख शोभाशाली। काम मोहिता, रूप गर्विता, गोपीजन कर साधे विलस रहे हैं श्रीहरि आतुर, निरखि विलासिनि राधे ॥ बालबोधिनी—इस गीतका राग रामकरी तथा झम्पा ताल है। रस-मञ्जरीकारने यहाँ रूपक ताल माना है। जब कान्ता नीलवसन धारणकर प्रभातकालीन आकाशकी भाँति स्वर्णिम आभूषण पहनकर अपने कान्तके प्रति उन्नत
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ७७ प्रकारका मान कर बैठती है, तब वह कान्त उनके चरणोंके समीप स्थित होकर मनाने लगते हैं, उस समयावस्थाका वर्णन रामकरी रागमें होता है। जहाँ श्रीराधाजी अपनी सखीके साथ विद्यमान हैं, उनसे थोड़ी ही दूर श्रीकृष्ण केलिपरायण तथा विलासयुक्त नायिकाओंके समूहमें विलासविहार कर रहे हैं, जिसे देखकर राधाजीके मनमें भी श्रीकृष्णके साथ रमण करनेकी लालसा जाग उठती है। श्रीकृष्ण निकुञ्जवनमें किसी व्रजसुन्दरीको आलिङ्गन करते हैं तो कृष्णके हृदयमें राधाजीकी स्फूर्त्ति होने लगती है॥१॥ मुग्ध—मुग्ध शब्द मुग्धा नायिकाके भेद तथा सुन्दर दोनोंका वाचक है। मुग्धके ये दोनों ही अर्थ यहाँ अभिप्रेत हैं। विलास—एक हावभावविशेषका नाम है। नाट्यशास्त्रमें भरतमुनिने कहा है— स्थाने यानासने वापि नेत्र वक्त्रादि कर्मणा। उत्पाद्यते विशेषो यः स विलासः प्रकीर्त्तितः॥ अर्थात् चलते, बैठते तथा यात्रा करनेके समय नेत्र एवं मुख आदिकी क्रिया और भङ्गीके द्वारा जो मनोहर चेष्टा होती है, वही विलास शब्दसे अभिहित है। स्मित—श्रीकृष्ण मुस्करा रहे हैं। ईषत् हासको स्मित कहते हैं। भरत मुनिके शब्दोंमें— ईषद् विकसितैर्गण्डैः कटाक्षैः सौष्ठवान्वितैः। अलक्षितद्विजं धीरमुत्तमानां स्मितं भवेत्॥ अर्थात् जो व्यक्ति मुस्कराता है, उसके दाँत दिखलायी नहीं पड़ते हैं। स्मितमें मनोहर कटाक्षके द्वारा कपोल थोड़े विकसित अवश्य हो जाते हैं। पीन-पयोधर-भार-भरेण हरिं परिरभ्य सरागं। गोपवधूरनुगायति काचिदुदञ्चित-पञ्चम-रागम्— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥२॥]
७८ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—सखि, काचित् गोपवधूः पीनपयोधर-भार-भरेण (पीनयोः विशालयोः पयोधरयोः स्तनयोः भारभरेण भारातिशयेन; निविड़-स्तनभारातिशयेन इत्यर्थः) सरागं [यथास्यात् तथा] हरिं परिरभ्य (निर्भरमालिङ्ग्य) उदञ्चितपञ्चमरागं (उदञ्चित उद्घोषित उच्चैर्गीत इति यावत् पञ्चमरागो यस्मिन् तद् यथा तथा) अनु (पश्चात् परिरम्भणानन्तरमित्यर्थः) गायति। हरिरिहेत्यादि सर्वत्र योज्यम् ॥२॥ अनुवाद—देखो सखि ! वह एक गोपाङ्गना अपने पीनतर पयोधर-युगलके विपुल भारको श्रीकृष्णके वक्षस्थलपर सन्निविष्टकर प्रगाढ़ अनुरागके साथ सुदृढ़रूपसे आलिङ्गन करती हुई उनके साथ पञ्चम स्वरमें गाने लगती है। पद्यानुवाद— कोई पीन पयोधर गोपी युग भुजमें बँध जाती हरि गायनके अन्त साथ उठ पञ्चम स्वरमें गाती ॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीसे गोपियोंकी श्रीकृष्णके साथ की जानेवाली चेष्टाओंका वर्णन करती हुई कहती है—हे राधे, तुम्हारे साथ श्रीकृष्णका जो विलास है, वह असमोर्द्ध है। विपुल स्तनवाली गौरवातिशय युक्ता गोपीके द्वारा अतिशय अनुरागके साथ श्रीकृष्णका आलिङ्गन किया जाना तो एक आभास मात्र है। भला ये सुन्दरियाँ तुम्हारी समानता कहाँ कर सकती हैं। आगे-आगे श्रीहरि पञ्चम रागमें गा रहे हैं और गोपी उनके गानेके बाद उसी प्रकारसे गा रही है। गोपीको पीन पयोधरवती बताना उसकी सौन्दर्यातिशयताको सूचित करना है। इसमें श्रीकृष्णकी अनिपुणता भी प्रदर्शित हो रही है। अतएव उनके द्वारा आलिङ्गनका प्रयास किये बिना ही गोपी उनका आलिङ्गन कर रही है। अतः यह केलि रहस्य मधुर होनेपर भी श्रीराधाजीके अभावमें कैसे श्रेष्ठ हो सकता है?
प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ७९ परस्पर आलिङ्गन किये जानेपर ही शृङ्गार रस परिपुष्ट होता है, जो तुम्हारे (श्रीराधाजीके) साथ ही सम्भव है। फिर भी तुम्हारा स्मरण करते हुए श्रीश्यामसुन्दरकी लीलाचेष्टा देखो। शृङ्गार रसमें पञ्चम रागका ही प्रायः गान किया जाता है। भरत मुनिने कहा भी है— पञ्चमं मध्य भूयिष्ठं हास्य शृङ्गारयोर्भवेत्। अर्थात् हास्य तथा शृङ्गार रसमें मध्यताल प्रचुर पञ्चम राग ही गाया जाता है॥२॥ कापि विलास-विलोल-विलोचन-खेलन-जनित-मनोजम्। ध्यायति मुग्धवधूरधिकं मधुसूदन-वदन-सरोजम्— [हरिरिह-मुग्ध-वधूनिकरे... ॥३ ॥] अन्वय—सखि, कापि मुग्धवधूः (नवीना रमणी) विलास-विलोल-विलोचन-खेलन-जनित-मनोजम् (विलासेन विलोलयोः चटुलयोः विलोचनयोः नयनयोः खेलनेन चालनभङ्ग्या कटाक्षपातेनेत्यर्थः जनितः मनोजः कामः यत्र तत् यथास्यात् तथा) मधुसूदन-वदन-सरोजम् (श्रीहरिमुख-पङ्कजम्) अधिकं (अतिमात्रं) ध्यायति (चिन्तयति निरीक्षते; भ्रमरवत् रसविशेषा- न्वेषणपर इति श्लिष्ट-मधुसूदन-पदोपन्यासः) [अन्यत् पूर्ववत्] ॥३॥ अनुवाद—देखो सखि ! श्रीकृष्ण जिस प्रकार निज अभिराम मुखमण्डलकी शृङ्गार रस भरी चञ्चल नेत्रोंकी कुटिल दृष्टिसे कामिनियोंके चित्तमें मदन विकार करते हैं, उसी प्रकार यह एक वराङ्गना भी उस वदनकमलमें अश्लिष्ट (संसक्त) मकरन्द पानकी अभिलाषासे लालसान्वित होकर उन श्रीकृष्णका ध्यान कर रही है। पद्यानुवाद— कोई लास लोल लोचनसे बने सहज मतवाले। मधुसूदनके मुख सरसिजमें ठगी, दीठ-मधु ढाले ॥
८० श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—मुग्धानायिकाकी चेष्टाओंका वर्णन करती हुई सखी कह रही है—वह नायिका श्रीकृष्णके मुख कमलका ध्यान कर रही है। श्रीश्यामसुन्दर प्रेमविलासके कारण विलसित अपने चञ्चल नेत्रोंसे दृष्टि डालकर वर रमणियोंके मदनविकारको अभिवर्द्धित कर रहे हैं और अत्यधिक आनन्दका अनुभव मन-ही-मन कर रहे हैं। मुग्धा नायिकामें लज्जाका प्राचुर्य होता है, अतएव उसकी शृङ्गारिक चेष्टाएँ बड़ी ही मर्यादित होती हैं॥३॥ कापि कपोलतले मिलिता लपितुं किमपि श्रुतिमूले। चारु चुचुम्ब नितम्बवती दयितं पुलकैरनुकूले— [हरिरिह-मुग्ध-वधूनिकरे... ॥४॥] अन्वय—सखि, नितम्बवती (विपुलनितम्बा) कापि (तरुणी गोपाङ्गना) श्रुतिमूले (कर्णमूले) किमपि लपितुं (भाषितुं) मिलिता (किञ्चित् कथनच्छलेन सङ्गता सती) पुलकैः (रोमाञ्चैः) [प्रियतम-स्पर्शसुखेन-अधीरा सतीति भावः] अनुकूले (अभिलाषुकै, प्रियाभिलाषसूचके इति यावत्) कपोलतले (प्रियतमस्य गण्डदेशे) चारु (मनोज्ञं यथास्यात् तथा) दयितं (प्रियं हरिं) चुचुम्ब॥४॥ अनुवाद—वह देखो सखि! एक नितम्बिनी (गोपी) ने अपने प्राणवल्लभ श्रीकृष्णके कर्ण (श्रुतिमूल) में कोई रहस्यपूर्ण बात करनेके बहाने जैसे ही गण्डस्थलपर मुँह लगाया तभी श्रीकृष्ण उसके सरस अभिप्रायको समझ गये और रोमाञ्चित हो उठे। पुलकाञ्चित श्रीकृष्णको देख वह रसिका नायिका अपनी मनोवाञ्छाको पूर्ण करने हेतु अनुकूल अवसर प्राप्त करके उनके कपोलको परमानन्दमें निमग्न हो चुम्बन करने लगी। पद्यानुवाद— चारु नितम्बवती कोई मिस कानोंमें कुछ कहने— पुलक कपोल चूम श्रीहरिके लगी प्रेम रस बहने ॥
प्रथमः सर्गः-सामोद-दामोदरः ८१ बालबोधिनी-नितम्बवती किसी प्रौढ़ा नायिकाकी सौन्दर्या- तिशयताको इस पद द्वारा सूचित किया गया है। सखियोंके बीचमें प्रियतमका चुम्बन करना अनुचित है, इसलिए कार्यान्तर बोधनका बहाना बनाकर उसने श्रीकृष्णके कपोलप्रान्तको चूम लिया-इस वाक्यांशके द्वारा नायिकाके शृङ्गार वैदग्ध्यको सूचित किया गया है, यहाँ श्रीकृष्ण अनुकूल नायक हैं ॥४॥ केलि-कला-कुतुकेन च काचिदमूं यमुनावनकुले। मञ्जुल-वञ्जुल-कुञ्जगतं विचकर्ष करेण दुकूले- [हरिरिह-मुग्ध-वधूनिकरे... ॥५॥] अन्वय-सखि, काचित् (गोपललना) यमुनाकूले (यमुनातीरे) मञ्जुल-वञ्जुल-कुञ्जगतं (मञ्जुलः मनोहरः यः वञ्जुलकुञ्जः लतादिपिहितो वेतसकुञ्जः तत्र गतं) अमुं (हरिं) केलिकला- कुतुकेन (केलिकलायां सुरतनैपुण्ये यत् कुतुकम् औत्सुक्यं तेन हेतुना) करेण (हस्तेन) दुकूले (पीताम्बरे) विचकर्ष (आकृष्टवती) ॥५॥ अनुवाद-सखि ! देखो, यमुना पुलिनपर मनोहर वेतसी (वञ्जुल या बेंत) कुञ्जमें किसी गोपीने एकान्त पाकर काम रस वशवर्त्तिनी हो क्रीड़ाकला कौतूहलसे उनके वस्त्रयुगलको अपने हाथोंसे पकड़कर खींच लिया। पद्यानुवाद- केलि कलाकुल कोई गोपी, यमुना जलके तीरे। ले जाने हरि, वसन खींचती, वञ्जुल वनमें धीरे ॥ बालबोधिनी-सखी किसी अधीरा नायिकाका वर्णन करते हुए श्रीराधासे कहती है, श्रीकृष्ण जब मनोहर वेतसी लताकुञ्जमें गये हुए थे, तब वह अधीरा नायिका श्रीकृष्णका वस्त्र पकड़कर उन्हें यमुना किनारे ले गयी; क्योंकि वह रहकेलि कलाकौतूहलसे आविष्ट हो गई थी। 'च' कारसे तात्पर्य है कि उसने विजन स्थान देखकर श्रीकृष्णके साथ अनेक प्रकारसे परिहास किया।
८२ श्रीगीतगोविन्दम् यमुनातीरे न कहकर यमुना जलतीरे कहनेका अभिप्राय है कि जलके समान ही तटपर शैत्य (शीतलता) तथा पावनता भी है। अन्य नायिकामें अनुरक्त श्रीकृष्णका वस्त्र खींचकर ले जाना अधीरताका अभिव्यञ्जक है ॥५ ॥ करतल-ताल-तरल-वलयावलि-कलित-कलस्वन-वंशे। रासरसे सहनृत्यपरा हरिणा युवतिः प्रशंससे— [हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥६ ॥] अन्वय—सखि, हरिणा (श्रीकृष्णेन) करतल-ताल-तरल- वलयावलि-कलित-कलम्बने-वंशे (करतलयोः पाणितलयोः तालेन ध्वनिविशेषेण तरला चञ्चला या वलयावलिः कङ्कणश्रेणिः तया कलितः अनुपूरितः कलम्बनः मधुरस्वरो वंशः वाद्यविशेषः यस्मिन् तादृशे) रासरसे (रासोत्सवे) सहनृत्यपरा (सहनृत्यन्ती) काचित् युवतिः प्रशंससे (साधु साध्विति प्रशंसिता) ॥६॥ अनुवाद—हाथोंकी तालीके तानके कारण चञ्चल कंकण- समूहसे अनुगत वंशीनादसे युक्त अद्भुत स्वरको देखकर श्रीहरि रासरसमें आनन्दित नृत्य-परायणा किसी युवतीकी प्रशंसा करने लगे। पद्यानुवाद— जिसकी ताल समय कर-चूड़ी वंशी-स्वरमें खनकी। रास-सखी की स्तुति श्रीहरिने जी भर भर कर की॥ बालबोधिनी—सखी श्रीराधाजीसे कह रही है कि रासलीलामें श्रीकृष्णके साथ नृत्य करती हुई कोई युवती तान, मान, लयके साथ हाथोंसे ताली बजाने लगी, जिससे उसकी चूड़ियाँ एक दूसरेसे टकराकर अभिघातके कारण मधुर ध्वनि प्रकट करने लगीं और इस प्रकार वलयकी खनकाहट और वंशीध्वनि मिलकर अद्भुत मधुर नाद प्रस्तुत करने लगी, जिसे सुनकर श्रीकृष्ण पुनः पुनः उस रमणीकी प्रशंसा करने लगे ॥६ ॥