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गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

२२१ अयोध्याकाण्ड लोने नख-सिख, निरुपम, निरखन जोग, बड़े उर-कंधर बिसाल भुज बर हैं। लोने लोने लोचन, जटनिके मुकुट लोने, लोने बदननि जीते कोटि सुधाकर हैं॥ २॥ लोने लोने धनुष, बिसिख कर कमलनि, लोने मुनिपट, कटि लोने सरघर हैं। प्रिया प्रिय बंधुको दिखावत बिटप, बेलि, मंजु कुंज, सिलातल, दल, फूल, फर हैं॥ ३॥ ऋषिनके आश्रम सराहें, मृग-नाम कहैं, लागी मधु, सरित भरत निरझर हैं। नाचत बरहि नीके, गावत मधुप-पिक, बोलत बिहंग, नभ-जल-थल-चर हैं॥ ४॥ प्रभुहि बिलोकि मुनिगन पुलके कहत, भूरिभाग भये सब नीच नारि-नर हैं। तुलसी सो सुख-लाहु लूटत किरात-कोल, जाको सिसकत सुर बिधि-हरि-हर हैं॥ ५॥ श्रीलखनलाल और भगवान् राम बड़े ही सुन्दर हैं तथा सीताजी भी बड़ी ही सुघड़ हैं। ये सब महामनोहर चित्रकूटपर्वतपर कल्पवृक्षके नीचे बैठे हुए हैं। पीले और नीले कमलके समान इनके गोरे और साँवले शरीर हैं जो इस [चित्रकूटरूप] काम-सरोवरके मानो प्रेम, रूप और शोभामय कमल ही हैं॥ १॥ ये नखसे सिखतक सुन्दर अनुपम और दर्शनीय हैं। इनके वक्षःस्थल और कन्धे विशाल हैं तथा भुजाएँ अति सुन्दर हैं एवं इनके नेत्र तथा जटाओंके मुकुट भी बड़े ही मनोहर हैं। अपने मनोहर मुखमण्डलसे

गीतावली २२२ इन्होंने करोड़ों चन्द्रमाओंको जीत लिया है ॥ २ ॥ इनके करकमलोंमें सुन्दर-सुन्दर धनुष-बाण तथा कटिप्रदेशमें मनोहर मुनिवस्त्र और सुन्दर तरकस हैं। भगवान् राम अपनी प्राणप्रिया सीता तथा प्रिय सहोदर लक्ष्मणको वृक्ष, लता, मनोहर कुंजों, शिलातक तथा पत्र, पुष्प और फल दिखलाते हैं ॥ ३ ॥ वे ऋषियोंके आश्रमोंकी सराहना करते हैं, मृगोंके नाम बतलाते हैं, सब ओर मधु भरा हुआ है, नदी और झरने झर रहे हैं, मयूर सुहावना नृत्य करते हैं, भौंरे और कोकिल गाना गा रहे हैं तथा अन्य पक्षी और आकाश, जल एवं स्थलमें विहार करनेवाले प्राणी सुन्दर बोली बोल रहे हैं ॥ ४ ॥ प्रभुको देखकर मुनीश्वरगण शरीरमें पुलकित होकर कहते हैं—'देखो ये सब अधम स्त्री-पुरुष आज कैसे बड़भागी हो रहे हैं।' तुलसीदास कहते हैं, जिसके लिये ब्रह्मा, विष्णु और महादेव-जैसे देवता भी सिसकते रहते हैं, उस सुख और लाभको आज किरात और कोल आदि लूट रहे हैं ॥ ५ ॥ राग सारंग [ ४६ ] आइ रहे जबतें दोउ भाई । तबतें चित्रकूट-कानन-छबि दिनदिन अधिक अधिक अधिकाई ॥१॥ सीता-राम-लषन-पद-अंकित अवनि सोहावनि बरनि न जाई । मंदाकिनि मज्जत अवलोकत त्रिबिध पाप, त्रयताप नसाई ॥२॥ उकठेउ हरित भए जल-थलरुह, नित नूतन राजीव सुहाई । फूलत, फलत, पल्लवत, पलुहत बिटप बेलि अभिमत सुखदाई ॥३॥ सरित-सरनि सरसीरुह-संकुल, सवन सँवारि रमा जनु छाई । कूजत बिहँग, मंजु गुंजत अलि, जात पथिक जनु लेत बुलाई ॥४॥

२२३ अयोध्‍याकाण्ड त्रिबिध समीर, नीर भर झरननि, जहँ तहँ रहे ऋषि कुटी बनाई। सीतल सुभग सीलनिपर तापस करत जोग-जप-तप मन लाई ॥५॥ भए सब साधु किरात-किरातिनि, राम-दरस मिटि गइ कलुषाई। खग-मृग मुदित एक सँग बिहरत सहज बिषम बड़ बैर बिहाई ॥६॥ कामकेलि-बाटिका बिबुध-बन, लघु उपमा कबि कहत लजाई। सकल-भुवन-सोभा सकेलि मनो राम बिपिन बिधि आनि बसाई ॥७॥ बन मिस मुनि, मुनितिय, मुनि-बालक बरनत रघुबर-बिमल-बड़ाई। पुलक सिथिल तनु, सजल सुलोचनु, प्रमुदित मन जीवन फलु पाई ॥८॥ क्यों कहौं चित्रकूट-गिरि, संपति-महिमा-मोद-मनोहर ताई। तुलसी जहँ बसि लषन राम सिय आनंद-अवधि अवध बिसराई ॥६॥ जबसे दोनों भाई आकर रहे हैं तबसे चित्रकूटके वनकी शोभा दिनोंदिन अधिक-अधिक हो रही है ॥ १ ॥ सीता, राम और लक्ष्मणजीके चरणचिह्नोंसे अंकित उस सुहावनी भूमिका वर्णन नहीं होता। मन्दाकिनीका स्नान अथवा दर्शन करनेसे ही तीनों प्रकारके पाप और ताप नष्ट हो जाते हैं ॥ २ ॥ जल और स्थलमें उत्पन्न होनेवाले पौधे, जो सूख चुके थे, फिर हरे हो गये हैं, तथा कमल भी नित्य नवीन-नवीन शोभा धारण कर रहे हैं। सब प्रकारके अभिमत और सुखदायी वृक्ष तथा लता आदि पुष्पित, फलित, पल्लवित और हरे-भरे होरहे हैं ॥३॥नदीओर तालाबोंमेंकमल खिले हुए हैं, मानो लक्ष्मीजी अपनेघरोंको सँभालकर निवासकरनेलगी हों। पक्षिगण कूज रहे हैं तथा भ्रमरोंका मनोहर गुंजार हों रहा है, मानो वे जानेवाले पथिकोंको अपने पास बुला रहे हैं ॥ ४ ॥ शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु चल रहा है; झरनोंमें जल झर रहा है, ऋषिगण जहाँ-तहाँ कुटी बनाकर बसे हुए हैं तथा तपस्वी लोग

गीतावली २२४ दत्तचित्त होकर शीतल और सुन्दर शिलाओंपर जप, तप एवं योगसाधन कर रहे हैं ॥ ५ ॥ सारे किरात और किरातिनियां साधु हो गये हैं। भगवान् रामका दर्शन पाकर उनकी कलुषता जाती रही है। पक्षी और मृगगण अपना स्वाभाविक वैर भूलकर प्रसन्नता- पूर्वक एक साथ विहार कर रहे हैं ॥ ६ ॥ उस वनको कामदेवके क्रीडोद्यान और नन्दनवनकी लघु उपमा देनेमें भी कविको लज्जा होती है, मानो विधाताने सारे भुवनोंकी शोभाको एकत्रकर भगवान् रामके वनमें ही लाकर बसा दिया है ॥ ७ ॥ उस वनके मिससे ही मुनिजन, मुनिपत्नियाँ और मुनिबालक रघुनाथजीके विमल सुयशका वर्णन करते हैं और अपने जीवनका फल पाकर पुलकित एवं शिथिलशरीर, सजलनयन और प्रसन्नचित्त हो जाते हैं ॥ ८ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, जहाँ आनन्दके सीमास्वरूप भगवान् राम, लक्ष्मण और सीताजी अयोध्याको त्यागकर निवास करते हैं उस चित्रकूटपर्वतकी सम्पत्ति, महिमा, प्रसन्नता एवं मनोहरताका मैं कैसे वर्णन कर सकता हूँ ॥ ९ ॥ राग गौरी [ ४७ ] देखत चित्रकूट-बन मन अति होत हुलास । सीता-राम-लखन-प्रिय, तापस-बृन्द-निवास ॥ १ ॥ सरित सोहावनि पावनि, पापहरनि पय नाम । सिद्ध-साधु-सुर-सेवित देति सकल मन-काम ॥ २ ॥ बिटप-बेलि नव किसलय, कुसुमित सघन सुजाति । कंदमूल जल-थलरुह अगनित अनबन भाँति ॥ ३ ॥

२२५ अयोध्याकाण्ड बंजुल मंजु, बकुलकुंज, सुरतरु, ताल तमाल। कदलि, कदंब, सुचंपक, पाटल, पनस, रसाल ॥ ४ ॥ सूरुह मूरि भरे जनु छबि-अनुराग-सभाग । बन बिलोकि लघु लागहिं बिपुल बिबुध-बन-बाग ॥ ५ ॥ जाइ न बरनि राम-बन, चितवत चित हरि लेत। ललित-लता-द्रुम-संकुल मनहु मनोज निकेत ॥ ६ ॥ सरित-सरनि सरसीरुह फूले नाना रंग। गुंजत मंजु मधुपबन, कूजत बिबिध बिहंग ॥ ७ ॥ लषन कहेउ रघुनंदन देखिय बिपिन-समाज । मानहु चयन मयन-पुर आयउ प्रिय ऋतुराज ॥ ८ ॥ चित्रकूटपर राउर जानि अधिक अनुरागु । सखासहित जनु रतिपति आयउ खेलन फागु ॥ ९ ॥ झिल्लि झाँझ, झरना डफ नव मृदंग निसान । भेरि उपंग भुंग रव, ताल कीर, बलगान ॥ १० ॥ हंस कपोत कबूतर बोलत चक्र चकोर । गावत मनहु नारिनर मुदित नगर चहुँ ओर ॥ ११ ॥ चित्र-बिचित्र बिबिध मृग डोलत डोंगर डाँग । जनु पुरबीथिन बिहरत छल संवारे स्वांग ॥ १२ ॥ नाचहिं मोर, पिक गावहिं, सुर बर राग बँधान । निलज तरुन-तरुनी जनु खेलहिं समय समान ॥ १३ ॥ भरि भरि सुंड करिनि-करि जहँ तहँ डारहिं बारि । भरत परस्पर पिचवनि मनहु मुदित नर-नारि ॥ १४ ॥ पीठि चढ़ाइ सिसुन्ह कपि कूदत डारहि डार । जनु मुंह लाइ गेरु-मसि भए खरनि असवार ॥ १५ ॥ गी० १५-

गीतावली २२६ लिये पराग सुमनरस डोलत मलय-समीर । मनहु अरगजा छिरकत, भरत गुलाल-अबीर ॥ १६ ॥ काम कौतुकी यहि बिधि प्रभुहित कौतुक कीन्ह । रीझि राम रतिनाथहि जग-बिजयी बर दीन्ह ॥ १७ ॥ दुखवहु मोरे दास जनि, मानेहु मोरि रजाइ । 'भलेहि नाथ', माथे धरि आयसु चलेउ बजाइ ॥ १८ ॥ मुदित किरात-किरातिनि रघुबर-रूप निहारि । प्रभुगुन गावत नाचत चले जोहारि जोहारि ॥ १९ ॥ देहिं असीस, प्रसंसहि मुनि, सुर बरषहिं फूल । गवने भवन राखि उर मूरति मंगलमूल ॥ २० ॥ चित्रकूट-कानन-छबि को कबि बरनै पार । जहँ सिय-लषनसहित नित रघुबर करहिं बिहार ॥ २१ ॥ तुलसिदास चाँचरि मिस कहे राम-गुनग्राम । गावहिं, सुनहिं नारि-नर पावहिं सब अभिराम ॥ २२ ॥ जो सीता, राम और लक्ष्मणको अत्यन्त प्रिय तथा तपस्वियोंका निवासस्थान है, उस चित्रकूट-वनको देखकर मनमें बड़ा ही आनन्द होता है ॥ १ ॥ वहाँ बड़ी ही सुहावनी, पवित्रकारिणी एवं पाप- नाशिनी 'पयस्विनी' नामकी नदी है, जो सिद्ध, साधु और देवताओंसे सेवित है और सम्पूर्ण मनोकामनाओंको पूर्ण कर देती है ॥ २ ॥ सघन और सुन्दर जातिके वृक्ष तथा लताएँ नवीन पल्लव और पुष्पोंसे आच्छादित हैं तथा अगणित और अनेक प्रकारके कन्द-मूल एवं जलथलके पौधे लगे हुए हैं ॥ ३ ॥ मनोहर बेत-बकुलसमुदाय (मौलसिरी), कल्पवृक्ष, ताल, तमाल, कदली, कदम्ब, चम्पक, पाटल, कटहल और आम्रके वृक्ष मानों छवि, अनुराग और सौभाग्य-

से अत्यन्त भरे हुए हैं। उस वनको देखकर देवताओंके बहुत-से वन और बगीचे भी तुच्छ जान पड़ते हैं ॥ ४-५ ॥ भगवान् रामके वनका वर्णन नहीं हो सकता, वह देखते ही चित्तको चुरा लेता है [और ऐसा जान पड़ता है] मानो मनोहर लता और वृक्षोंसे पूर्ण कामदेव- का निवासस्थान ही हो ॥ ६ ॥ वहाँके नदी और तालाबोंमें रंग- बिरंगे कमल खिले हुए हैं, जिनपर मनोहर भ्रमरगण गुंजारकर रहे हैं तथा तरह-तरहके पक्षी कूज रहे हैं ॥ ७ ॥ लक्ष्मणजी कहते हैं- 'हे रघुनाथजी ! इस वनका ठाट-बाट तो देखिये, ऐसा जान पड़ता है मानो कामदेवके नगरमें उसका प्रिय सुहृद् ऋतुराज (बसन्त) आनन्द मनाने आया हो ॥ ८ ॥ अथवा चित्रकूटपर आपका अधिक प्रेम देखकर मानो अपने सखाके सहित कामदेव फाग खेलने आया हो ॥ ९ ॥ वहाँ जो झींगुरका शब्द होता है वही झांझ है, झरना डफ, नवीन मृदंग और निसानके समान है, भौंरोंका शब्द भेरी और उपंग (नसतरङ्ग) है तथा तोतोंका कलरव ताल है ॥ १० ॥ इस वनमें जो हंस, कपोत, कबूतर, चकवा और चकोर आदि पक्षी बोलते हैं, वे ही इस कामनगरमें मानो चारों ओर नर-नारिवृन्द प्रसन्न होकर गा रहे हैं ॥ ११ ॥ सघन वनखण्डकी ऊँची भूमिमें जो चित्र-विचित्र अनेकों मृग डोल रहे हैं, वह ऐसा जान पड़ता है मानो उस नगरकी गलियोंमें अनेकों छैल ही स्वाँग बनाकर विचर रहे हों ॥ १२ ॥ मयूर नृत्य करते हैं तथा कोकिल पक्षी सुन्दर स्वरमें राग बाँधकर गान कर रहे हैं, वह ऐसा जान पड़ता है मानो निर्लज्ज युवक और युवतियाँ समयानुसार खेल रहे हों ॥ १३ ॥ हाथी और हथिनियां सूँडोंमें जल भरकर जहाँ-तहाँ उँडेल देती हैं, मानो स्त्री और पुरुष

गीतावली २२८ प्रसन्न होकर आपसमें पिचकारियाँ भर रहे हों ॥ १४ ॥ [काले और लाल मुखके] बन्दर अपने बच्चोंको पीठपर चढ़ाकर एक डालसे दूसरी डालपर कूदते हैं, वह ऐसा जान पड़ता है मानो [स्वांग रचनेवाले लोग] मुखोंपर गेरू या स्याही लगाकर गधोंपर सवार हो गये हों ॥ १५ ॥ मलयवायु पराग तथा पुष्पोंके रससे भरकर विचर रहा है, मानों वह जहाँ-तहाँ अरगजा छिड़कता हो अथवा मुखोंपर गुलाल या अबीर मल रहा हो ॥ १६ ॥ इस प्रकार प्रभुके लिये कौतुकी कामदेव मानो खेल कर रहा है और इसीलिये रघुनाथ- जीने प्रसन्न होकर उसे विश्वविजयी होनेका वर दिया है ॥ १७ ॥ [और उसे चेता दिया है कि] 'देखो, मेरे दासको दुःख न देना, सर्वदा मेरी इस आज्ञाका पालन करना।' तब कामदेव भी 'प्रभो ! बहुत अच्छा' ऐसा कहकर भगवान्‌की आज्ञा सिरपर धारणकर वहाँसे चला गया है ॥ १८ ॥ रघुनाथजीका रूप देखकर किराती और किरात भी खूब प्रसन्न हैं और प्रभुका गुण गाते-नाचते जुहार कर- करके चले जाते हैं ॥ १९ ॥ मुनिलोग भगवान्‌को आशीर्वाद देते और उनकी प्रशंसा करते हैं तथा देवतालोग फूलोंकी वर्षा करते हैं और हृदयमें भगवान्‌की मङ्गलमयी मूर्ति धारणकर अपने घरोंको चले जाते हैं ॥ २० ॥ जहाँ सीता और लक्ष्मणजीके सहित भगवान् राम सदा ही विहार करते हैं, उस चित्रकूटपर्वतके वनकी शोभाका वर्णन कर कौन कवि पार पा सकता है ॥ २१ ॥ तुलसीदास कहते हैं, हमने तो चाँचर (होली गान) के मिससे ही कुछ रामके गुण गाये हैं। जो स्त्री-पुरुष इनका गान या श्रवण करेंगे वे सब प्रकार शुभ फल प्राप्त करेंगे ॥ २२ ॥

२२६ अयोध्याकाण्ड राग बसन्त [ ४८ ] आजु बन्यो है बिपिन देखो, राम धीर । मानो खेलत फागु मुद मदन बीर बट, बकुल, कदंब, पनस, रसाल । कुसुमित तरु-निकर कुरव-तमाल ॥ मानो बिबिध बेष धरे छैल-यूथ । बिच बीच लता ललना-बरूथ ॥२॥ पनवानक निरझर, अलि उपंग । बोलत पारावत मानो डफ-मृदंग ॥ गायक सुक-कोकिल, झिल्लि ताल । नाचत बहु भाँति बरहि मराल ॥३॥ मलयामिल सीतल, सुरभि, मंद । बहु साहत सुमन-रस रेनु बृंद ॥ मनु छिरकत फिरत सबनि सुरंग । भ्राजत उदार लीला अनंग ॥४॥ क्रीडत जीते सुर-असुर-नाग । हठि सिद्ध-मुनिनके पंथ लाग ॥ कह तुलसिदास, तेहि छाड़ु मंन । जेहि राख राम राजीवनैन ॥५॥ 'हे धैर्यवान् भगवान् राम ! देखिये, आज यह वन ऐसा बना हुआ है, मानो वीरवर कामदेव आनन्दित होकर फाग खेलता हो ॥१॥ वट, बकुल (मौलसिरी), कदम्ब, कटहल, आम, कुरव और तमाल आदि वृक्ष फूले हुए हैं, मानो तरह-तरहके वेष धारण किये अनेकों छैल हों और उनके बीच-बीचमें लतारूप स्त्रीसमुदाय शोभायमान हों ॥ २ ॥ झरने ऐसे जान पड़ते हैं, मानो नगाड़े और ढोल हों, भ्रमर उपङ्ग (मुरचङ्ग) के समान प्रतीत होते हैं तथा कबूतर जो बोलते हैं वह मानो डफ और मृदङ्ग हैं। शुक और कोकिल गान करनेवाले हैं, झिल्लीकी झनकार मानो उनकी ताल है तथा मयूर और हंस अनेकों प्रकारसे नृत्य कर रहे हैं ॥ ३ ॥ शीतल-मन्द- सुगन्ध मलयमारुत फूलोंका रस और पराग लेकर बह रहा है, सो ऐसा जान पड़ता है, मानो उदार लीलाविहारी कामदेव सबपर सुन्दर

गीतावली . २३० रंग छिड़कता हुआ विराजमान हो ॥ ४ ॥ इसने खेलनेमें ही देवता, असुर और नाग आदिको जीत लिया है तथा यह हठपूर्वक सिद्ध- मुनीश्वरोंके मार्गमें रोड़े अटकाये हुए है । तुलसीदास कहते हैं—यह कामदेव तो उसीको छोड़ता है, जिसकी कमलनयन भगवान् राम रक्षा करते हैं ॥ ५ ॥ [ ४९ ] ऋतु-पति आए भलो बन्यो बनसमाज । मानो भए हैं मदन महाराज आज ॥१॥ मनो प्रथम फागु मिस करि अनीति । होरीमिस अरिपुर जारि जीति ॥ मारुत मिस पत्र-प्रजा उजारि । नयनगर बसाए बिपिन झारि ॥२॥ सिंहासन सैल-सिला सुरंग । कानन-छबि रति, परिजन कुरंग ॥ सित छत्रसुमन, बल्ली बितान । चामर समीर निरझर निसान ॥३॥ मनो मधु-माधव दोउ अनिप धीर । बर बिपुल बिटप बानैत बीर ॥ मधुकर-सुक-कोकिल बंदि-बृंद । बरनहिं बिसुद्ध जस बिबिध छंद ॥४॥ महि परत सुमन-रस फल पराग । जनु देत इतर नृप कर-बिभाग ॥ कलि सचिव सहित नय-निपुन मार । कियो बिस्व बिबस चारिहु प्रकार ॥५॥ बिरहिनपर नित नई परै मारि । डाँड़ियत सिद्ध-साधक प्रचारि ॥ तिनकीन काम सकै चापि छाँह । तुलसी जे बसहि रघुबीर बाँह ॥६॥ ऋतुराजके आनेपर वनकी शोभा बड़ी भली बन गयी है, मानो आज कामदेवको महाराज-पद प्राप्त हुआ हो ॥ १ ॥ अतः उन्होंने फागके मिससे मर्यादा छोड़कर [ वनरूप ] शत्रुके नगरपर विजय प्राप्तकर उसे होलीके बहाने जला ( सुखा ) डाला हो और फिर वायुरूपसे पत्ररूप प्रजाको लूटकर समग्र

१३१ अयोध्याकाण्ड वनमें [नवीन कोंपलें उत्पन्न कर] कोई नया नगर बसाया हो ॥ २ ॥ उन मदन महाराजका राजसिंहासन पर्वतकी सुन्दर शिला है, वनकी शोभा रति है, मृगगण कुटुम्बी हैं, पुष्ट श्वेतच्छत्र हैं, लताएँ वितान हैं, वायु चमर है और झरने नौबत हैं ॥ ३ ॥ ऐसा जान पड़ता है मानो चैत्र और वैशाख—ये दोनों धीर-वीर सेनापति हैं, अनेकों सुन्दर वृक्ष उनके दृढ़प्रतिज्ञ वीर हैं तथा भौंरे शुक और कोकिल पक्षी वन्दीजन हैं, जो अनेकों छन्दोंमें उनका विशुद्ध यश बखान करते हैं ॥ ४ ॥ पृथ्वीपर जो फूलोंके रस, पराग अथवा फल गिरते हैं, वे मानो अन्य सामन्तगण उन्हें कर देते हैं । इस प्रकार नीतिनिपुण कामदेवने अपने मन्त्री कलियुगके सहित मानो साम, दाम, दण्ड, भेद—चारों प्रकारसे सारे विश्वको अपने अधीन कर लिया है ॥ ५ ॥ इसके राज्यमें विरही पुरुषोंपर नित्य नयी मार पड़ती है तथा सिद्ध और साधकोंको ललकारकर दण्ड दिया जाता है। तुलसीदास कहते हैं, किन्तु जो श्रीरघुनाथजीकी बाँहके नीचे बसे हुए (शरणागत) हैं, उनकी तो छायाको भी यह कामदेव नहीं छू सकता ॥ ६ ॥ राग मलार [ ५० ] सब दिन चित्रकूट नीको लागत । बरषाऋतु प्रबेस बिसेष गिरि देखन मन अनुरागत ॥ १ ॥ चहुँदिसि बन संपन्न बिहँग-मृग बोलत सोभा पावत । जनु सुनरेस देस-पुर प्रमुदित प्रजा सकल सुख छावत ॥ २ ॥ सोहत स्याम जलद मृदु घोरत धातु रँगभगे सृँगनि । मनहु आदि अंभोज बिराजत सेवित सुर-मुनि-भृंगनि ॥ ३ ॥

गीतावली २३२ सिखर परस घन-घटहि, मिलति बग-पाँति सो छवि कबि बरनी। आदि बराह बिहरि बारिधि मनो उठ्यो है दसन धरि धरनी ॥ ४ ॥ जल जुत बिमल सिलनि झलकत नभ बन-प्रतिबिंब तरंग। मानहु जग-रचना बिचित्र बिलसति बिराट अँग अंग ॥ ५ ॥ मंदाकिनिहि मिलत झरना भरि भरि भरि भरि जल आछे। तुलसी सकल सुकृत-सुख लागे मानौ राम-भगति के पाछे ॥ ६ ॥ चित्रकूट पर्वत सभी दिन बड़ा सुहावना लगता है। वर्षाऋतु- का प्रवेश होनेपर तो इसे देखनेके लिये मन बहुत ही छटपटाता है ॥ १ ॥ इसके चारों ओर फल-फूल आदिसें सम्पन्न वन है, वहाँ बोलते हुए पक्षी और मृगगण ऐसी शोभा पाते हैं, मानो किसी अच्छे राजाके देश और नगरमें प्रजा आनन्दपूर्वक सब प्रकारके सुख भोग रही हो ॥ २ ॥ [गेरू आदि] धातुओंसे रँगे हुए गिरिशिखरोंपर मधुर-मधुर घोर करते हुए मेघ ऐसे शोभायमान होते हैं मानो देवता और मुनिजनरूप भ्रमरोंसे सेवित आदिकमल [जिससे ब्रह्माजी प्रकट हुए थे] विराजमान हों ॥ ३ ॥ जब बगुलोंकी पंक्ति शिखरको स्पर्श करके श्याम घटाओंसे मिलती है तो उसकी छवि कवि इस प्रकार वर्णन करता है मानो आदिवराह समुद्रमें क्रीड़ा कर, दाँतोंपर पृथ्वी धारण कर उससे बाहर निकले हैं। [यहाँ पर्वत आदिवराह हैं, बगुलोंकी पंक्ति दाँत हैं और घटाएँ पृथ्वी है] ॥ ४ ॥ जलसे भरी हुई निर्मल शिलाओंमें आकाश और वनका प्रतिबिम्ब ऐसा झलकता है जैसे विराट् भगवान्‌के अङ्ग-प्रत्यङ्गमें संसारकी विचित्र रचना प्रतिफलित हो रही हो ॥ ५ ॥ तुलसीदास कहते हैं, स्वच्छ जलसे भरे हुए झर-झरकर मन्दाकिनी नदीमें मिले जाते हैं जैसे सारे सुकृत और सुख एकमात्र रामभक्तिके ही पीछे लगे हुए हैं ॥ ६ ॥

२३३ अयोध्याकाण्ड कौसल्याकी विरह-वेदना राग सोरठ [ ५१ ] आजुको भोर, और सो, मांई । सुनौं न द्वार बेद-बंदी-धुनि गुनिगन-गिरा सोहाई ॥ १ ॥ निज निज सुंदर पति-सदननितें रूप-सील-छबि छाईं । लेन असीस सीय आगे करि मोपै सुतबधू न आईं ॥ २ ॥ बूझी हौं न बिहँसि मेरे रघुबर 'कहाँ री ! सुमित्रा माता ?' ! तुलसी मनहु महासुख मेरो देखि न सकेउ बिधाता ॥ ३ ॥ [रामविरहसे व्याकुल होकर माता कौसल्या कह रही हैं—] अरी माई ! आजका भोर तो मुझे और ही तरहका जान पड़ता है। आज द्वारपर न तो वेद और वन्दीजनकी ही ध्वनि सुनायी देती है और न गुणियोंकी मनोहर वाणीका ही शब्द है ॥ १ ॥ अपने-अपने पतियोंके सुन्दर महलोंसे रूप, शील और छबिसे सम्पन्न मेरी पुत्रवधुएँ भी सीताको आगे कर आज मेरे पास आशीर्वाद लेनेके लिये नहीं आयीं ॥ २ ॥ आज मुझसे रघुवीरने हँसकर यह नहीं पूछा कि 'अरी माँ ! सुमित्रा माता कहाँ हैं ? अहो ! मेरे महासुख- को मानो विधाता ही नहीं देख सका' ॥ ३ ॥ [ ५२ ] जननी निरखति बान-धनुहियाँ । बार बार उर-नैननि लावति प्रभुजूकी ललित पनहियाँ ॥ १ ॥ कबहूँ प्रथम ज्यों जाइ जगावति कहि प्रिय बचन सबारे । उठहु तात ! बलि मातु बदनपर, अनुज-सखा सब द्वारे ॥ २ ॥

गीतावली २३४ कबहुँ कहति यों, बड़ी बार भइ, जाहु भूप पहँ, भैया। बंधु बोलि जेँइय जो भावै, गई निछावरि मैया ॥ ३ ॥ कबहुँ समुझि बन-गवन रामको रहि चकि चित्र लिखी-सी। तुलसिदास वह समय कहेतें लागत प्रीति सिखी-सी ॥ ४ ॥ माता रघुनाथजीके खेल-कूदके धनुषको देखती हैं और प्रभुजी- की जो नन्ही-नन्ही सुन्दर जूतियाँ उन्हें बारम्बार हृदय और नेत्रोंसे लगाती हैं ॥ १ ॥ कभी पहलेकी भाँति सबेरे ही मन्दिरमें जाकर इस प्रकारके प्रिय वचन कहकर जगाने लगती हैं कि, 'हे तात ! उठो, मुखचन्द्रपर माता बलिहारी जाती है, देखो, सारे अनुज और सखा- गण द्वारपर खड़े हैं, ॥ २ ॥ और कभी कहती हैं—'भैया ! बहुत विलम्ब हो गया है, महाराजके पास जाओ और अपने साथियोंको बुलाकर जो रुचे सो भोजन करो, माता निछावर होती है' ॥ ३ ॥ तथा कभी रामका वनगमन स्मरण कर चकित होकर चित्रलिखित- सी रह जाती है। तुलसीदास कहते हैं, उस समयका वर्णन करनेसे तो प्रीति सीखी हुई-सी जान पड़ती है [क्योंकि सत्य प्रेम होनेपर तो उसका वर्णन ही नहीं हो सकेगा, चित्त विवश होकर विरहाग्निमें दग्ध हो जायगा] ॥ ४ ॥ [ ५३ ] माई री ! मोहि कोउ न समुझावै। राम-गवन साँचो किधौं सपनो, मन परतीति न आवै ॥ १ ॥ लगेइ रहत मेरे नैननि आगे राम-लषन अरु सीता। तदपि न मिटत दाह या उरकी, बिधि जो भयो बिपरीता ॥ २ ॥ दुख न रहै रघुपतिहि बिलोकत तनु न रहै बिनु देखे। करत न प्रान पयान, सुनहु सखि ! अरुझि परी यहि लेखे ॥ ३ ॥

३. किष्किन्धा एवं सुन्दरकाण्ड: सुग्रीव-मैत्री, विभीषण-शरण एवं लंका-दहन

२३५ अयोध्याकाण्ड कौसल्याके बिरह-बचन सुनि रोइ उठीं सब रानी । तुलसिदास रघुबीर-बिरहकी पीर न जाति बखानी ॥ ४ ॥ [माता कौसल्या कहती हैं—] 'अरी मैया ! मुझे कोई नहीं समझाता । मुझे अभीतक विश्वास नहीं होता कि रामका वनगमन सत्य है या कोई स्वप्न हुआ है ॥ १ ॥ राम, लक्ष्मण और सीता मेरे नेत्रोंके सामने सदा लगे ही रहते हैं, तो भी विधाता ऐसा विपरीत हो गया है कि इस हृदयका दाह दूर ही नहीं होता ॥ २ ॥ रघुनाथजीके देखनेपर तो दुःख नहीं रह सकता और बिना देखे शरीरका रहना असम्भव है। किन्तु मेरे प्राणोंने अभीतक कूच नहीं किया; अतः सखि ! सुनो, इस नियममें अवश्य कोई गड़बड़ हुई है ॥ ३ ॥ कौसल्याजीके ये विरहवाक्य सुनकर सब रानियाँ रो पड़ीं । तुलसीदास कहते हैं, रघुनाथजीके विरहकी व्यथाका वर्णन नहीं हो सकता ॥ ४ ॥ [ ५४ ] जब जब भवन बिलोकति सूनो । तब तब बिकल होति कौसल्या, दिनदिन प्रति दुख दूनो ॥ १ ॥ सुमिरत बाल-बिनोद रामके सुंदर मुनि-मन-हारी । होत हृदय श्रति सूल समुझि पदपंकज श्रजिर-बिहारी ॥ २ ॥ को अब प्रात कलेऊ मांगत रूठि चलैगो, माई ! स्याम-तामरस-नेन स्रवत जल काहि लेउँ उर लाई ॥ ३ ॥ जीवौं तौ बिपति सहौं निसिबासर, मरौं तौ मन पछितायो । चलत बिपिन भरि नयन रामको बदन न देखन पायो ॥ ४ ॥ तुलसिदास यह दुसह दसा श्रति, दारुन बिरहु घनेरो । दूरि करै को भूरि कृपा बिनु सोकजनित रुज मेरो ? ॥ ५ ॥

गीतावली २३६ माता कौसल्या जब-जब घरको सूना देखती हैं तब-तब व्याकुल हो जाती हैं। उन्हें दिन-दिन दूना दुःख हो रहा है ॥ १ ॥ वह भगवान् रामके मुनिमनहारी बालविनोदोंको याद करती हैं और (उनके) सुकुमार चरणकमलोंको राजमन्दिरके आंगनमें ही विचरनेवाले समझकर उनके हृदयमें बड़ी पीड़ा होती है ॥ २ ॥ [वे कहने लगती हैं-] अरी मैया ! अब प्रातःकाल होते ही कलेवा मांगकर [ उसमें देरी होनेपर ] कौन रूठकर भागेगा और श्यामकमलसदृश नेत्रोंसे जल बहते देखकर मैं किसे हृदयसे लगाऊँगी ! ॥ ३ ॥ अब मैं जीऊँगी तो रात-दिन दुःख सहना पड़ेगा और यदि मर गयी तो हृदयमें यह पश्चात्ताप रह जायगा कि 'वनको जाते समय मैं नेत्र भरकर रामका मुख भी न देख सकी' ॥ ४ ॥ यह दशा बड़ी ही दुःसह है, बड़ा ही कठोर विरह है, ऐसा कौन है जो अत्यन्त कृपाके बिना मेरी इस शोकजनित पीड़ा- को दूर कर सके ॥ ५ ॥ [ ५५ ] मेरो यह अभिलाषु बिधाता । कब पुरवै सखि सानुकूल ह्वै हरि सेवक-सुखदाता ॥ १ ॥ सीता-सहित कुसल कोसलपुर आवत हैं सुत दोऊ । श्रवन-सुधा-सम बचन सखी कब आइ कहैगो कोऊ ? ॥ २ ॥ सुनि संदेस प्रेम-परिपूरन संभ्रम उठि धावोंगी । बदन बिलोकि रोकि लोचन-जल हरषि हिये लावोंगी ॥ ३ ॥ जनकसुता कब सासु कहैं मोहि, राम लखन कहैं मैया । बाहु जोरि कब अजिर चलहिंगे स्याम-गौर दोउ भैया ॥ ४ ॥ तुलसिदास यहि भाँति मनोरथ करत प्रीति अति बढ़ी । थकित भई उर आनि राम-छबि मनहु चित्र लिखि काढ़ी ॥ ५ ॥

२३७ अयोध्याकाण्ड 'अरी सखि ! मेरी इस अभिलाषाको भक्तसुखदायक विधाता श्रीहरि अनुकूल होकर कब पूर्ण करेंगे ? ॥ १ ॥ हे सखि ! मेरे पास आकर कोई पुरुष कानोंको अमृतके समान प्रिय लगनेवाले ये वचन कब कहेगा कि सीताके सहित तुम्हारे दोनों पुत्र कुशलपूर्वक अयोध्यापुरीको आ रहे हैं' ॥ २ ॥ इस सन्देशको सुनकर मैं प्रेममें भरकर एक साथ उठकर दौड़ूँगी और उनके मुख देखकर नेत्रोंके प्रेमाश्रुओंको रोककर उन्हें हर्षपूर्वक हृदयसे लगा लूंगी ॥ ३ ॥ जनकनन्दिनी सीता मुझसे कब 'सासूजी' कहकर बोलेंगी और कब राम-लक्ष्मण मुझे 'मैया' कहकर पुकारेंगे ? और कब वे श्याम-गौर- वर्ण दोनों भाई बाँह-से-बाँह मिलाकर मेरे आँगनमें डोलेंगे ?' ॥ ४ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं ऐसे मनोरथ करते-करते कौसल्याजीका स्नेह अत्यन्त बढ़ गया और वे हृदयमें रामचन्द्रजीकी छवि धारण कर थकित-सी रह गयीं, मानो चित्रमें लिखी हुई हों ॥ ५ ॥ महाराज दशरथका देहत्याग [ ५६ ] सुन्यौ जब फिरि सुमंत पुर आयो । कहिहै कहा, प्रानपतिकी गति, नृपति बिकल उठि धायो ॥ १ ॥ पाँय परत मंत्री अति ब्याकुल, नृप उठाय उर लायो । दसरथ-दसा देखि न कह्यो कछु, हरि जो संदेस पठायो ॥ २ ॥ बूझि न सकत कुसल प्रीतमकी, हृदय यहै पछितायो । साँचिहु सुत-बियोग सुनिबे कहँ धिग बिधि मोहि जिआयो ॥ ३ ॥ तुलसिदास प्रभु जानि निठुर हौं न्याय नाथ बिसरायो । हा रघुपति कहि पर्यो अवनि, जनु जलतें मीन बिलगायो ॥ ४ ॥

गीतावली २३८ महाराज दशरथने जब सुना कि सुमन्त अयोध्यामें लौट आया है तो इस उत्कण्ठासे कि 'देखें प्राणनाथ रामकी क्या दशा सुनाता है, वे व्याकुल होकर उठ दौड़े ॥ १ ॥ फिर मन्त्रीको अत्यन्त व्याकुल होकर अपने चरणोंमें गिरते देख राजाने उसे उठाकर हृदयसे लगा लिया और मन्त्रीने भी महाराज दशरथकी वह दीनदशा देखकर, भगवान्‌ने जो संन्देश भेजा था, उसके विषयमें कुछ भी न कहा ॥ २ ॥ महाराज भी अपने प्रियतम पुत्रकी कुशल नहीं पूछ सकते थे, क्योंकि उनके हृदयमें तो यही पछतावा था कि मुझे धिक्कार है जो विधाताने सचमुच ही पुत्रका वियोग सुननेके लिये मुझे जीवित रक्खा है ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, [महाराज दशरथ कहने लगे—] 'प्रभुने मुझे निष्ठुर जानकर मेरा जो परित्याग किया, वह उचित ही है।' और फिर 'हा रघुनाथ !' ऐसा कहकर वे पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो कोई मछली जलसे पृथक् कर दी गयी हो ॥ ४ ॥ [ ५७ ] मुएहु न मिटंगो मेरो मानसिक पछिताउ । नारिबस न बिचारि कीन्हौं काज, सोचत राउ ॥ १ ॥ तिलकको बोल्यो, दिये बन, चौगुनो चित चाउ । हृदय दाड़िम ज्यों न बिदरयो समुझि सील-सुभाउ ॥ २ ॥ सीय-रघुबर-लषन बिनु भय भभरि भगी न आउ । मोहि बूझि न परत, यातें कौन कठिन कुघाउ ॥ ३ ॥ सुनि सुमंत ! कि आनि सुंदर सुवन सहित जिआउ । दास तुलसी नतरु मोको मरन अमिय पिआउ ॥ ४ ॥ महाराज दशरथ सोचते हैं—'मैंने स्त्रीके वशीभूत होकर सोच- समझकर काम नहीं किया; इससे प्राप्त हुआ मेरा मानसिक पश्चात्ताप

२३६ अयोध्याकाण्ड मरनेपर भी दूर नहीं होगा ॥ १ ॥ देखो, मैंने रामको राजतिलकके लिये बुलाकर वनवास दे दिया, फिर भी उनके चित्तमें चौगुना उत्साह बना रहा ! उनका ऐसा शील और स्वभाव जानकर भी मेरा हृदय दाड़िम (अनार) के समान फट नहीं गया ॥ २ ॥ यदि सीता, राम और लक्ष्मणके बिना भी मेरी आयु भयसे घबड़ाकर नहीं भगी तो मुझे यह नहीं जान पड़ता कि इससे बढ़कर और कौन-सा कठोर घाव होगा ? ॥ ३ ॥ हे सुमन्त ! सुनो, या तो मेरे सुन्दर पुत्रोंको लाकर मुझे उनके साथ जीवित रक्खो, नहीं तो अब मुझे मृत्युरूप अमृतका ही पान करा दो' ॥ ४ ॥ [ ५८ ] अवधि बिलोकि हौं जीवत रामभद्र-बिहीन ! कहा करिहैं आइ सानुज भरत धरमधुरीन ॥ १ ॥ राम-सोक-सनेह-संकुल, तनु बिकल, मनु लीन । टूटि तारो गगन-मग ज्यों होत छिन-छिन छीन ॥ २ ॥ हृदय समुझि सनेह सादर प्रेम पावन मीन । करी तुलसीदास दसरथ प्रीति-परमिति पीन ॥ ३ ॥ 'अब मैं जीवित रहकर अयोध्याको मंगलमूर्ति रामके बिना देखूंगा । धर्मधुरन्धर भरतजी भी भाई शत्रुघ्नसहित आकर अब क्या करेंगे ?' ॥ १ ॥ इस प्रकार रघुनाथजीके वियोगसे शोक और उनके स्नेहसे संकुलित महाराज दशरथका शरीर व्याकुल है और मन डूबता जा रहा, जैसे टूटा हुआ तारा आकाशमार्गमें क्षण-क्षणमें क्षीण होता जाता है ॥ २ ॥ तुलसीदास कहते हैं, महाराज दशरथ- ने मछलीके पवित्र प्रेम और स्नेहको हृदयमें आदरपूर्वक समझकर प्रीतिकी मर्यादाको ही दृढ़ किया ॥ ३ ॥

गीतावली २४० राग गौरी [ ५९ ] करत राउ मनमों अनुमान । सोक-बिकल, मुख बचन न आवै, बिछुरे कृपानिधान ॥ १ ॥ राज देन कहि बोलि नारि-बस मैं जो कह्यो बन जान । आयसु सिर धरि चले हरषि हिय कानन भवन समान ॥ २ ॥ ऐसे सुतके बिरह-अवधि लौं जौ राखौं यह प्रान । तौ मिटि जाइ प्रीतिकी परमिति, अजस सुनौं निज कान ॥ ३ ॥ राम गए अजहूँ हौं जीवत, समुझत हिय अकुलान । तुलसिदास तनु तजि रघुपति हित कियो प्रेम परवान ॥ ४ ॥ कृपानिधान भगवान् राम बिछुड़ गये । इससे महाराज दशरथ अत्यन्त शोकातुर हैं और उनके मुखसे वचन भी नहीं निकलता और वे मनमें अनुमान करते हैं— ॥ १ ॥ 'अहो ! मैंने राज्य देना कहकर जिस समय स्त्रीके वशीभूत हो बुलवाकर वन जानेके लिये कहा, उस समय जो मेरी आज्ञाको सिरपर धारण कर हृदयमें हर्षित हो वनको घरके समान चले गये ॥ २ ॥ ऐसे पुत्रके वियोगकी अवधितक यदि मैंने अपने प्राणोंको रक्खा तो प्रेमकी मर्यादा टूट जायगी और अपने ही कानोंसे मुझे अपयश भी सुनना पड़ेगा' ॥ ३ ॥ 'हाय ! रामके चले जानेपर भी मैं आजतक जीवित हूँ'—ऐसा समझकर उनका हृदय व्याकुल हो गया । तुलसीदासजी कहते हैं, तब उन्होंने रघुनाथजीके लिये अपना शरीर त्यागकर अपने प्रेमको प्रमाणित कर दिया ॥ ४ ॥