गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
गीतावली ३२० राम छाम, लरिका लषन, बालि-बालकहि घालि को गनत ? रीछ जल ज्यों न घनमैं । काजको न कपिराज, कायर कपिसमाज, मेरे अनुमान हनुमान हरिगनमैं ॥ २ ॥ समय सयानी मृदु बानी रानी कहै पिय ! पावक न होइ जातुधान बेनु-बनमैं । तुलसी जानकी दिए, स्वामीसों सनेह किये कुसल, नतरु सब ह्वै हैं छार छनमैं ॥ ३ ॥ रावणके दूत भगवान्की सेनाको देख आये थे । दूतोंसे उनका समाचार सुन वह मनमें सोच रखकर ऊपरसे गाल बजाने लगा कि 'अहो ! कालके वशीभूत होकर ये रीछ और वानर युद्धमें मुझ- जैसे वीरसे लड़कर विजय प्राप्त करना चाहते हैं ! ॥ १ ॥ राम तो [सीताके वियोगमें] बहुत दुर्बल हैं; लक्ष्मण अभी लड़का ही है; बालिका पुत्र अपने ही कुलका घातक है, उसे तो गिनता ही कौन है ? और जाम्बवान् जलहीन मेघकी भाँति निस्सार है । सुग्रीव किसी भी अर्थका नहीं है और सारा ही वानरसमाज कायर है । हाँ, मेरे अनुमानसे इन वानरोंमें एक हनूमान् अवश्य ही शूरवीर है' ॥ २ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, इसी समय परम चतुर महारानी मंदोदरीने मधुरस्वरसे कहा—'प्रियतम ! आप राक्षसकुलरूप बाँसोंके वनमें अग्नि न बनें, इस समय जानकीको देने और प्रभुसे प्रेम करनेमें ही कुशल है; नहीं तो एक क्षणमें ही सब नष्ट हो जायगा' ॥ ३ ॥
३२१ सुन्दरकाण्ड [ २४ ] आपनी आपनी भाँति सब काहू की है। मंदोदरी, महोदर, मालवान महामति, राजनीति पहुँच जहाँलौं जाकी रही है ॥ १ ॥ महामद-अंध दसकंध न करत कान, मीचु-बस नीच हठि कुगहनि गही है। हँसि कहै, सचिव सयाने मोसों यों कहत, चहै मेरु उड़न, बड़ी बयारि बही है ॥ २ ॥ भालु, नर, बानर अहार निसिचरनिको, सोऊ नृप-बालकनि मांगी छारि लही है। देखो कालकौतुक, पिपीलिकनि पंख लागो, भाग मेरे लोगनिके भई चित-चही है ॥ ३ ॥ 'तोसो न तिलोक आजु साहस, समाज-साजु, महाराज-आयसु भो जोई, सोई सही है'। तुलसी प्रनामकै बिभीषन बिनती करै 'खग्राल बेधे ताल, कपि केलि लंका दही है' ॥ ४ ॥ इसी प्रकार मन्दोदरी, महोदर और महापति माल्यवान् आदि सभीने जिसकी जहाँतक राजनीतिमें पहुँच थी, अपनी-अपनी विधिसे रावणसे बहुत कुछ कहा ॥ १ ॥ किन्तु महान् मदसे अंधा रहनेके कारण उसने कुछ भी नहीं सुना। उस नीचने मृत्युके वशीभूत होकर आग्रहपूर्वक कुमार्गको ही ग्रहण किया। वह हँसकर कहने लगा—'अहा ! हमारे चतुरमन्त्री मानो ऐसी बात कहते हैं कि भाई ! बड़ी तेज हवा चल रही हैं, इसलिये सुमेरु पर्वत उड़ना चाहता है ! ॥ २ ॥ अरे ! रीछ, वानर और मनुष्य तो स्वभावसे ही गी० २१—
गीतावली ३२२ राक्षसोंके आहार हैं; तिसपर भी इन राजकुमारोंको यह माँगी हुई सेना प्राप्त हुई है। कालका खेल तो देखो, आज चींटियोंके पर लगने लगे; मेरे भाग्यसे ही लोगोंकी चितचाही हुई है [इसीसे उन्हें अनायास भरपेट आहार मिला है] ॥ ३ ॥ तुलसीदासजी कहते हैं, तब विभीषणने प्रणाम कर कहा—'महाराज ! आपकी जैसी आज्ञा है वही होगा, सचमुच आज त्रिलोकीमें साहस और सैन्य- बलमें आपके समान कोई नहीं है; [परंतु उधरका भी बल देख लीजिये।] भगवान् रामने [बालिवधके समय] संकल्पमात्रसे ही सात तालवृक्षोंको वेध दिया था और वानर हनुमान्ने खेलहीमें लङ्काको भस्म कर दिया था !' ॥ ४ ॥ [ २५ ] दूसरो न देखतु साहिब सम रामै । बेदऊ पुरान, कबि-कोबिद बिरंच-रत, जाको जस सुनत गावत गुन-ग्रामै ॥ १ ॥ माया-जीव, जग-जाल, सुभाउ, करम-काल, सबको सासकु, सब मैं, सब जामैँ । बिधि-से करनिहार, हरिसे, पालनिहार हर-से हरनिहार जपै जाके नामैँ ॥ २ ॥ सोइ नरबेष जानि, जनकी बिनती मानि, मतौ नाथ सोई, जातें भलो परिनामैं । सुभट-सिरोमनि कुठारपानि सारिखेहू लखी श्रौ लखाई, इहाँ किए सुभ सामैं ॥ ३ ॥ बचन-बिभूषन बिभीषन-बचन सुनि लागे दुख दूषन-से दाहिनेउ बामैं ।
३२३ सुन्दरकाण्ड तुपसो हुमकि हिये हन्यो लात, 'भले तात,' चल्यो सुरतरु ताकि तजि घोर घामैं ॥ ४ ॥ [विभीषण रावणसे कह रहा है—] 'रामके समान कोई और स्वामी दिखलायी नहीं देता, जिनके बिरदके बखानमें वेद, पुराण, कवि और विद्वज्जन रत रहते हैं तथा जिनके सुयशका श्रवण और गुणसमूहका गान करते रहते हैं ॥१॥ जो माया जीव, जगज्जाल, स्वभाव कर्म और काल—सबका शासक है, जो सबमें व्याप्त है और जिसमें सब स्थित हैं तथा जिनके नामको ब्रह्मा-जैसे रचयिता, विष्णु- जैसे पालक और शंकर-जैसे संहारक जपते रहते हैं ॥ २ ॥ वे ही राम नर-वेषमें अवतरित हुए हैं ऐसा जानो और मुझ दासकी विनय मान- कर ऐसी सलाह करो जिससे अन्तमें भला हो । देखो, कुठारधारी परशु जैसे शूरशिरोमणिने भी देख-दिखाकर समझ लिया कि यहाँ [अर्थात् रामसे] सन्धि कर लेनेमें ही कल्याण है' ॥ ३ ॥ विभीषण- के ये वाणीको विभूषित करनेवाले वचन सुनकर रावणको अनुकूल होनेपर भी अत्यन्त प्रतिकूल तथा दुःखमय और दूषित जान पड़े । अतः उसने हुमकर उनकी छातीमें लात मारी, तब विभीषण 'भैया ! अच्छा ! !' ऐसा कह [रावणरूप] घोर घामको त्यागकर [रामरूप] कल्पवृक्षकी ओर चल पड़े ॥ ४ ॥ विभीषण-शरणागति [ २६ ] जाय माय पायँ परि कथा सो सुनाई है । समाधान करति बिभीषनको बार बार, 'कहा भयो तात ! लात मारे, बड़ो भाई ॥ १ ॥
गीतावली ३२४ साहिब, पितु समान, जातुधानको तिलक, ताके अपमान तेरी बड़िए बड़ाई है। गरत गलानि जानि, सनमानि सिख देति, 'रोष किये दोष, सहें समुझें भलाई है ॥ २ ॥ इहांतें बिमुख भये, रामको सरन गए भलो नेकु, लोक राखे निपट निकाई हैं'। मातु-पंग सीस नाइ, तुलसी असीस पाइ चले भले सगुन, कहत 'मन भाई' है ॥ ३ ॥ विभीषणने अपनी माताके पास जाकर उसके चरणोंमें गिर वह सब वृत्तान्त सुना दिया। माता बारम्बार उन्हें समझाने लगी— 'भैया ! उसके लात मारनेसे क्या हुआ, आखिर तो वह तेरा बड़ा भाई ही है ॥ १ ॥ वह प्रथम तो तेरा स्वामी, दूसरे पिताके समान ज्येष्ठ भ्राता और तिसपर भी राक्षसकुलका तिलक है। उसके तो अपमान करनेमें भी तेरा बड़ा सम्मान ही है।' विभीषणको अत्यन्त खिन्न देख वह इसी प्रकार बहुत सत्कारपूर्वक समझाने लगी और बोली—'भैया ! इस समय क्रोध करनेमें तो बड़ा भारी दोष है और सहने-समझ लेनेमें सब प्रकार भलाई है ॥ २ ॥ हाँ, यहाँसे विमुख होकर रामकी शरण चले जानेमें थोड़ी-सी भलाई अवश्य है, फिर भी यदि लोककी रक्षा कर सको तो पूरी भलाई है।' [अर्थात् भाई का पक्ष छोड़नेकी अपेक्षा उसका पक्ष ग्रहण करके व्यवहारकी रक्षा करना ही उत्तम है।] तुलसीदासजी कहते हैं, तब विभीषण माताके चरणोंमें सिर नवा उसका आशीर्वाद पा वहाँसे चल पड़े। मार्गमें अच्छे-अच्छे शकुन होते देखकर कहने लगे—'मेरा तो मन- चाहा हो गया' ॥ ३ ॥
३२५ सुन्दरकाण्ड 【 २७ 】 'भाई को सो करौं, डरौं कठिन कुफेरें । सुकृत-संकट परचो, जात गलानिन्ह गरचो, कृपानिधिको मिलौं पै मिलिकै कुबेरें' ॥ १ ॥ जाइ गह पांय, धाइ धनद उठाइ भेट्यो, समाचार पाइ पोच सोचत सुमेरें । तहँई मिले महेस, दियो हित उपदेस, रामकी सरन जाहि 'सुदिनु न हेरें ॥ २ ॥ जाको नाम कुंभज कलेस-सिंधु सोखिबेको, मेरो कह्यो मानि, तात ! बांधे जिनि बेरें । तुलसी मुदित चले, पाये हैं सगुन भले, रंक लूटिबेको मानो मनिगन-ढेरें ॥ ३ ॥ विभीषणजी इस प्रकार चिन्ता करने लगे—'मुझे भाईका-सा व्यवहार करना चाहिये, परन्तु बड़े भारी कुफेर (अड़चन) से मैं डर रहा हूँ।' इस प्रकार विभीषण धर्म-संकटमें पड़कर ग्लानिसे गले जा रहे थे। फिर उन्होंने निश्चय किया कि—'अच्छा, पहले भाई कुबेरसे मिलकर फिर कृपानिधान भगवान् रामसे मिलूंगा'॥१॥ ऐसा सोचकर उन्होंने कुबेरके पास जा उनके चरण पकड़ लिये । कुबेरजीने दौड़कर उन्हें उठाकर गले लगाया। फिर विभीषणसे कुसमाचार सुन, वे सुमेरुपर्वतपर खड़े-खड़े सोच-विचार करने लगे । उसी स्थानपर उन्हें श्रीमहादेवजी मिले; उन्होंने यह हितकर उपदेश दिया—'विभीषण ! तुम भगवान् रामकी शरण जाओ, इसमें कोई शुभ दिन देखनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ २ ॥ हे तात ! जिनका नाम क्लेशरूप समुद्रको सोखनेके लिये अगस्त्यके समान है, उनके
गीतावली ३२६ . पास पहुँचनेके लिये, मेरा उपदेश मानकर तुम किसी प्रकारका बेड़ा मत बाँधो [अर्थात् किसी प्रकारकी तैयारी मत करो]।' तुलसीदासजी कहते हैं, यह सुनकर विभीषणजी प्रसन्न होकर चल दिये। राहमें उन्हें अनेकों शुभ शकुन हुए, मानो कोई कंगाल मणियों- की ढेरी लूटनेके लिये जाता हो ॥ ३ ॥ राग केदारा [ २८ ] संकर-सिख-आसिष पाइकैं। चले मनहि मन कहत बिभीषन सीस महेसहि नाइकै ॥ १ ॥ गए सोच, भए सगुन, सुमंगल दस दिसि देत देखाइकें। सजल नयन, सानंद हृदय, तनु प्रेम-पुलक अधिकाइकें ॥ २ ॥ अंतहु भाव भलो भाईको, कियो अनभलो मनाइकै। भइ कूबरकी लात, बिधाता राखी बात बनाइकै ॥ ३ ॥ नाहित क्यों कुबेर घर मिलि हर हितु कहते चित लाइकै। जो सुनि सरन राम ताके मैं निज बामता बिहाइकै ॥ ४ ॥ अनायास अनुकूल कूलधर मग मुदमूल जनाइकै। कृपासिंधु सनमानि, जानि जन दीन लियो अपनाइकै ॥ ५ ॥ स्वारथ-परमारथ करतलगत, श्रमपथ गयो सिराइकै। सपने के सौतुक, सुख-सस सुर सींचत देत निराइकै ॥ ६ ॥ गुरु गौरीस, साँइ सीतापति, हित हनुमानहि जाइकै। मिलिहौं, मोहि कहा कीबे अब, अभिमत, अवधि अघाइकें ॥ ७ ॥ मरतो कहाँ जाइ, को जाने, लटि लालची ललाइकै। तुलसिदास भजिहौं रघुबीरहि अभय-निसान बजाइकै ॥ ८ ॥ श्रीमहादेवजीका उपदेश और आशीर्वाद पा विभीषणजी उन्हें
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सिर नवा मन-ही-मन यह कहते हुए चले ॥ १ ॥ दसों दिशाओंमें मङ्गलमय शकुन होते दिखायी दे रहे हैं—इससे उनका शोक दूर हो गया, नेत्रोंमें जल भर आया, हृदय आनन्दपूर्ण हो गया और शरीर प्रेमवश अत्यन्त पुलकित हो गया ॥ २ ॥ [वे कहने लगे—] 'आखिर, भाईका भाव तो मेरे लिये अच्छा ही हुआ, यद्यपि उसने यह कार्य तो मेरा अहित चाहकर ही किया था । विधाताने मेरी बात बना दी, अतः रावणकी लात मेरे लिये तो कूबरकी लात हो गयी [ अर्थात् जैसे कूबरमें लात लगनेसे वह सीधा हो जाता है, उसी प्रकार रावणकी लात लगनेसे मुझे भगवान् रामकी मङ्गलमयी शरण मिलनेकी सम्भावना हो गयी ] ॥ ३ ॥ यदि ऐसा न होता तो महादेवजी कुबेरके घर मिलकर हृदयमें मेरा हित विचार कर ऐसी बात क्यों कहते; जिसे सुनकर मैंने अपनी कुटिलता छोड़कर श्रीरामचन्द्रजीकी शरण ताकी है ॥ ४ ॥ उन कृपासागर त्रिशूलधरने अनायास ही अनुकूल होकर मुझे आनन्दजनक मार्ग दिखलाया और अपना दीनजन जानकर इस दासको आदरपूर्वक अपना लिया ॥ ५ ॥ उनकी कृपासे मुझे स्वार्थ और परमार्थ-दोनों ही करतलगत हो गये और श्रमका मार्ग निवृत्त हो गया । यह मैं स्वप्न देख रहा हूँ या प्रत्यक्ष ही हो रहा है। [मेरी अवस्था तो ऐसी है कि] मेरे सुखरूप अन्नको आज स्वयं देवतालोग सींच और ला रहे हैं [अर्थात् मुझे अत्यन्त सुख मिल रहा है] ॥ ६ ॥ अब मैं अपने गुरु भगवान् शंकर, स्वामी सीतापति श्रीराम और हितकारी हनुमान्जीसे जाकर मिलूँगा । अब मुझे करना ही क्या है; मुझे तो अब अघाकर अभीष्ट फलकी सीमा मिल गयी ॥ ७ ॥ कौन जाने मैं महान् विषय-
लोलुप विषयोंकी लालसासे परेशान होता हुआ कहाँ जाकर मरता?' तुलसीदासजी कहते हैं, किन्तु अब तो अभय-दुन्दुभी बजाकर मैं रघुनाथजीका ही भजन करूँगा ॥ ८ ॥ [ २९ ] पदपदुम गरीबनिवाजके। देखिहौं जाइ पाइ लोचन-फल हित सुर-साधु-समाजके ॥ १ ॥ गईं बहोर, ओर निरबाहक, साजक बिगरे साजके। सबरी सुखद, गीध-गतिदायक, समन सोक कपिराजके ॥ २ ॥ नाहिन मोहि और कतहूँ कछु, जैसे काग जहाजके। आयो सरन सुखद पदपंकज चौथै रावन-बाजके ॥ ३ ॥ आरतिहरन सरन, समरथ सब दिन अपनेकी लाजके। तुलसी 'पाहि' कहत नत-पालक मोहुसे निपट निकाजके ॥ ४ ॥ 'अहो ! अब मैं गरीबनिवाज भगवान् रामके उन चरणकमलों- को जाकर देखूँगा और नयनोंका फल पाऊँगा जो देवता और साधुसमाजके लिये अत्यन्त हितकर हैं ॥ १ ॥ भगवान् राम बीते सुखको वापिस लानेवाले, अन्ततक रक्षा करनेवाले और बिगड़ी बातको बना देनेवाले हैं। वे शबरीको सुख देनेवाले, गृध्रकी मुक्ति करनेवाले और कपिराज सुग्रीवके शोकको शान्त करनेवाले हैं ॥ २ ॥ जहाजके कागके समान मुझे और कहीं कोई आश्रय नहीं है, अतः अब मैं रावणरूप बाजसे पीड़ित होकर उन्हींके सुखदायक चरणकमलोंकी शरण आया हूँ ॥ ३ ॥ वे सदा ही अपने भक्तोंकी लज्जा रखनेमें समर्थ और शरणागतोंके दुःखको दूर करनेवाले हैं।' तुलसीदासजी कहते हैं कि 'रक्षा करो' ऐसा कहनेपर तो वे मुझ- जैसे अत्यन्त निकम्मे पुरुषोंके भी शरणागत-पालक हैं ॥ ४ ॥
३२६ सुन्दरकाण्ड [ ३० ] महाराज रामपहँ जाउँगो। सुख-स्वारथ परिहरि करिहौं सोइ, ज्यौं साहिबहि सुहाउँगो ॥ १ ॥ सरनागत सुनि बेगि बोलि हैं, हौं निपटहि सकुचाउँगो। राम गरीवनिवाज निवाजिहैं, जानिहैं, ठाकुर-ठाउँगो ॥ २ ॥ धरिहैं नाथ हाथ माथे, एहितें केहि लाभ अघाउँगो। सपनो-सो अपनो न कछू लखि, लघु लालच न लोभाउँगो ॥ ३ ॥ कहिहौं, बलि, रोटिहा रावरो, बिनु मोलही बिकाउँगो। तुलसी पट ऊतरे ओढिहौं, उबरी जूठनि खाउँगो ॥ ४ ॥ 'अब मैं महाराज रामके पास जाऊँगा और सब प्रकारका सुख तथा स्वार्थ त्याग कर वही उपाय करूँगा जिससे स्वामीको प्रिय लगूँ ॥ १ ॥ मुझे शरणमें आया सुनकर स्वामी शीघ्र ही बुला लेंगे; किन्तु मैं अन्यन्त सकुचाऊँगा । तब गरीवनिवाज प्रभु राम मुझे बिना स्वामी और ठौर-ठिकानेका जानकर मेरी रक्षा करेंगे ॥ २ ॥ अहा ! प्रभु मेरे इस माथेपर अपने हाथ रक्खेंगे ! उससे बढ़कर और कौन लाभ होगा जिससे मैं अघाऊँगा; यह संसार स्वप्नवत् है; इसकी किसी वस्तुको अपनी न समझकर मैं तुच्छ लालचोंमें नहीं लुभाऊँगा ॥ ३ ॥ मैं कहूँगा—'प्रभो ! बलिहारी जाऊँ, मैं तो आपके टुकड़े खाकर रहूँगा और बिना मोल ही आपके हाथ बिक जाऊँगा, फिर मैं प्रभुके उतरे हुए वस्त्र पहनूँगा तथा बची हुई जूठन खाऊँगा' ॥४॥ [ ३१ ] आइ सचिव बिभीषनके कही । कृपासिंधु ! दसकंधबंधु लघु चरन-सरन आयो सही ॥ १ ॥
गीतावली ३३० बिषम बिषाद-बारिनिधि बूड़त थाह कपीस-कथा लही। गये दुख-दोष देखि पदपंकज, अब न साथ एकौ रही ॥ २ ॥ सिथिल-सनेह सराहत नख-सिख नीक निकाई निरबही। तुलसी मुदित दूत भयो, मानहु अमिय-लाहु माँगत मही ॥ ३ ॥ [वानरसेनाके समीप पहुँचनेपर] विभीषणके मन्त्रीने रघुनाथजी- से आकर कहा—'कृपासिन्धो ! रावणका छोटा भाई निष्कपट भावसे आपके चरणोंके शरणमें आया है ॥ १ ॥ वह अत्यन्त विषादरूप समुद्रमें डूब रहा था कि उसी समय उसे सुग्रीवकी कथारूप थाह मिली। अब आपके चरणकमलोंका दर्शन करके तो उसके सारे दुःख और दोष निवृत्त हो गये हैं और उसे किसी प्रकारकी कामना नहीं रही है' ॥ २ ॥ प्रभुके अङ्ग-अङ्गमें सुन्दरता अच्छी तरह छायी हुई थी। उसे देखकर वह मन्त्री स्नेहसे शिथिल होकर उसकी सराहना करने लगा। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय वह दूत ऐसा प्रसन्न हुआ, मानो उसे मट्ठा माँगते हुए अमृत प्राप्त हो गया हो ॥ ३ ॥ [ ३२ ] बिनती सुनि प्रभु प्रमुदित भए । रीछराज, कपिराज नील-नल बोलि बालिनंदन लए ॥ १ ॥ बूझिये कहा ! रजाइ पाइ नय-धरम सहित ऊतर दए । बली बंधु ताको जेहि बिमोह-बस बैर-बीज बरबस बए ॥ २ ॥ बाँह-पगार द्वार तेरे तैं सभय कबहुँ फिरि गए । तुलसी असरन-सरन स्वामिके बिरद बिराजत नित नए ॥ ३ ॥ दूतकी विनय सुनकर प्रभु परम प्रसन्न हुए। उन्होंने ऋक्षराज जाम्बवान्, कपिपति सुग्रीव, नील, नल और बालिकुमार अंगदको
३३१ सुन्दरकाण्ड. बुलाया ॥ १ ॥ [ तथा उनसे पूछा— ] 'आपलोग इस सम्बन्धमें क्या समझते हैं ?' प्रभुकी आज्ञा पा उन्होंने धर्म और नीतिके अनुकूल उत्तर दिये । वे बोले—प्रभो ! यह महाबलवान् और उसका भाई है जिसने मोहबस बरबस ही आपके प्रति शत्रुताके बीज बोये हैं [ इसलिये इससे सावधान रहना ही ठीक है ] ॥ २ ॥ परंतु हे बाँह-पगार (अपनी भुजारूप दीवारसे आश्रितकी रक्षा करनेवाले) ! आपके द्वारपर आकर कोई भी भयभीत कभी उलटा नहीं लौटा।' तुलसीदासजी कहते हैं, प्रभुके 'अशरण-शरण' ऐसे विरद तो नित्य नये विराजमान हैं ॥ ३ ॥ [ ३३ ] हिय बिहसि कहत हनुमानसों । सुमति साधु सुचि सुहृद बिभीषन बूझि परत अनुमानसों ॥ १ ॥ 'हौं बलि जाउँ और को जानै ?' कह्यो कपि कृपानिधानसों । छली न होइ स्वामि सनमुख, ज्यों तिमिर सातहय-जानसों ॥ २ ॥ खोटो खरो सभीत पालिये सो, सनेह सनमानसों । तुलसी प्रभु कीबो जो भलो, सोइ बूझि सरासन-बानसों ॥ ३ ॥ तब रघुनाथजी हृदयमें हँसकर हनूमान्जीसे कहने लगे— 'अनुमानसे तो मुझे विभीषण सुमति, साधु, शुद्धचित्त और सुहृद ही जान पड़ता है' ॥ १ ॥ तब हनूमान्जीने कृपानिधान भगवान् रामसे कहा—'मैं बलिहारी जाऊँ, आपसे बढ़कर इस विषयमें और कौन जान सकता है ? जिस प्रकार अन्धकार सूर्यके सम्मुख नहीं ठहर सकता, उसी प्रकार छली पुरुष तो प्रभुके सामने भी नहीं आ सकता ॥ २ ॥ यह भयभीत है; अतः यह अच्छा हो या
बुरा, अब इसका स्नेह और आदरपूर्वक पालन कीजिये अथवा जैसा करना उचित हो वह अपने धनुष-बाणसे ही पूछ लीजिये क्योंकि यह स्वभावसे ही दुष्टोंके घातक और साधुजनोंके प्रतिपालक हैं' ॥ ३ ॥ [ ३४ ] सांचेहु बिभीषन आइहै ? बूझत बिहँसि कृपालु लषन सुनि कहत सकुचि सिर नाइ है ॥ १ ॥ ऐहै कहा, नाथ ? आयो ह्याँ, क्यों कहि जाति बनाइ है। रावन-रिपुहि राखि, रघुबर बिनु, को त्रिभुवन पति पाइहै ॥ २ ॥ प्रभु प्रसन्न, सब सभा सराहित, दूत-बचन मन भाइहै। तुलसी, 'बोलिये बेगि,' लषनसों भइ महाराज-रजाइ है ॥ ३ ॥ कृपामय श्रीरामचन्द्र हँसकर पूछते हैं—'क्या सचमुच विभीषण यहाँ आवेगा?' यह सुनकर लक्ष्मणजीने सिर नवाकर सकुचाते हुए कहा—॥ १ ॥ 'प्रभो ! आवेगा क्या, वह तो यहाँ आ गया। आपके सामने ऐसी बात बनाकर कैसे कही जा सकती है? भला रावणके शत्रुको रखकर, एक रघुनाथजीको छोड़कर, और ऐसा कौन तीनों लोकोंमें है जो अपनी प्रतिष्ठा रख सके [अर्थात् त्रिलोकीके अन्य सभी लोगोंको रावण अप्रतिष्ठित कर सकता है, पर आपके यहाँ उसकी कुछ नहीं चलती, इसीसे विभीषण आपकी शरणमें आये हैं]' ॥ २ ॥ प्रभु प्रसन्न हुए, सब सभा प्रशंसा करने लगी और दूतकों भी ये वचन मनमें प्रिय लगे। तुलसीदासजी कहते हैं, उस समय लक्ष्मणजीको महाराजकी आज्ञा हुई कि उसे शीघ्र ही बुला लो ॥ ३ ॥
३३३ सुन्दरकाण्ड 【 ३५ 】 चले लेन लषन-हनुमान हैं। मिले मुदित बूझि कुसल परसपर-सकुचत करि सनमान हैं ॥ १ ॥ भयो रजायसु पांउ धारिए, बोलत कृपानिधान हैं। दूरितें दीनबंधु देखे, जनु देत अभय-बरदान हैं ॥ २ ॥ सील सहस हिमभानु, तेज सतकोटि भानुहूके भानु हैं। भगतनिकोहित कोटि मातु-पितु अरिन्हको कोटि कुसानु हैं ॥ ३ ॥ जनगुनरज गिरि गनि, सकुचत निज गुन गिरि रज परमानु हैं। बाँह-पगारु, बोलको अबिचल, बेद करत गुनगान हैं ॥ ४ ॥ चारु चाप-तूनोर तामरस-करनि सुधारत बान हैं। चरचा चलति बिभीषनकी, सोइ सुनत सुचित दै कान हैं ॥ ५ ॥ हरषत सुर, बरषत प्रसून सुभ सगुन कहत कल्यान हैं। तुलसी ते कृतकृत्य, जे सुमिरत समय सुहावनो ध्यान हैं ॥ ६ ॥ तब विभीषणको लेनेके लिये लक्ष्मणजी और हनुमान्जी चले। वे प्रसन्नतापूर्वक मिले और कुशल पूछकर परस्पर सम्मान करते हुए सकुचाने लगे ॥ १ ॥ वे बोले—'पधारिये, भगवान्की आज्ञा हो गयी है, कृपानिधान रघुनाथजी आपको बुला रहे हैं।' तब विभीषण- ने दूरहीसे प्रभुको देखा, मानो वे अभयका वर दे रहे हैं ॥ २ ॥ तथा शान्तिमें सहस्रों चन्द्रमाओंके समान, तेजमें अरबों सूर्योंके भी सूर्य, भक्तोंके लिये करोड़ों माता-पिताओंके समान हितकारी और शत्रुओंके लिये करोड़ों अग्नियोंके समान हैं ॥ ३ ॥ वे अपने भक्तके रजंतुल्य गुणोंको पर्वत-समान समझकर सकुचाते हैं और अपने पर्वततुल्य गुणको रजवत् समझते हैं। प्रभु अपनी भुजाओंसे शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले और प्रतिज्ञाके पक्के हैं, ऐसा वेद
गीतावली ३३४ भी उनका गुण गाते हैं ॥ ४ ॥ वे अपने करकमलोंसे सुन्दर धनुष, तरकस और बाणको सुधार रहे हैं; और उस समय जो विभीषणकी चर्चा चल रही है उसे एकाग्रचित्तसे कान लगाकर सुन रहे हैं ॥ ५ ॥ देवतालोग प्रसन्न होकर पुष्पोंकी वर्षा कर रहे हैं। ये शुभ शकुन भावी कल्याणकी सूचना देते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, जो लोग उस सुहावने समयका ध्यान और स्मरण करते हैं वे कृतकृत्य हैं ॥ ६ ॥ [ ३६ ] रामहि करत प्रणाम निहारिकैं। उठे उमँगि आनंद-प्रेम-परिपूरन बिरद बिचारिकैं ॥ १ ॥ भयो बिदेह बिभीषन उत, इत प्रभु अपनपौ बिसारिकैं। भलीभाँति भावते भरत-ज्यौं भेंट्यौ भुजा पसारिकैं ॥ २ ॥ सादर सबहि मिलाइ समाजहि निपट निकट बैठारिकैं। बूझत छेम-कुसल सप्रेम अपनाइ भरोसे भारिकैं ॥ ३ ॥ नाथ ! कुसल-कल्यान-सुमंगल बिधि सुख सकल सुधारिकैं। देत-लेत जे नाम रावरो, बिनय करत मुख चारिकैं ॥ ४ ॥ जो मूरति सपने न बिलोकत मुनि-महेस मन मारिकैं। तुलसी तेहि हौं लियो अंक भरि, कहत कछू न सँवारिकैं ॥ ५ ॥ भगवान् रामको देखकर विभीषणने प्रमाण किया तब प्रभु अपना विरद [शर०गतपालकत्व] स्मरणकर आनन्द और प्रेमसे परिपूर्ण हो उमगकर उठे ॥ १ ॥ इस समय उधर तो विभीषण विदेह हो गये [ उन्हें शरीरकी कुछ भी सुध न रही ] और इधर प्रभु अपनेको भूलकर प्रिय भाई भरतकी तरह भुजा फैलाकर खूब अच्छी तरह मिले ॥ २ ॥ फिर आदरपूर्वक सारे समाजसे भेंट करा अपने
३३५ सुन्दरकाण्ड अत्यन्त समीप बिठा लिया और उसे सप्रेम अपनाकर, खूब भरोसा दे कुशल-क्षेम पूछने लगे ॥ २ ॥ तब विभीषणने कहा—हे नाथ ! जो लोग आपका नाम जपते हैं, उन्हें भी ब्रह्माजी अच्छी तरह कुशल, कल्याण, मङ्गल और सब प्रकारका सुख प्रदान करते हैं और अपने चारो मुखोंसे उसकी विनती करते हैं [फिर मैं साक्षात् आपहीके समीप बैठा हुआ हूँ, मेरे कुशल-क्षेमका क्या कहना है ? ] ॥ ४ ॥ जिस मूर्तिको बड़े-बड़े मुनि और लोकेश्वरगण भी मनको जीतकर स्वप्नमें भी नहीं देख पाते, उसीने मुझे गोदमें भर निया ! [फिर मेरे सौभाग्यका क्या कहना है ? ] मैं इसमें कोई बात बनाकर नहीं कहता ॥ ५ ॥ [ ३७ ] करुनाकरकी करुना भई । मिटौ मीचु, लहि लंक संक गइ, काहूसो न खुनिस खई ॥ १ ॥ दसमुख तज्यो दूध-माखी-ज्यों, आपु काढ़ि साढ़ी लई । भव-भूषन सोइ कियो बिभीषन मुद मंगल-महिमामई ॥ २ ॥ बिधि-हरि-हर, मुनि-सिद्ध सराहत, मुदित देव दुंदुभी दई । बारहि बार सुमन बरषत, हिय हरषत कहि जै जै जई ॥ ३ ॥ कौसिक-सिला-जनक-संकट हरि भृगुपतिकी टारी टई । खग-मृग, सबर-निसाचर, सबकी पूंजी बिनु बाढ़ी सई । ४ ॥ जुग-जुग कोटि-कोटि करतब, करनी न कछू बरनी नई । राम-भजन-महिमा हुलसी हिय, तुलसीहूकी बनि गई ॥ ५ ॥ इस प्रकार जब करुणाकरकी करुणा हुई तो विभीषणका मरणभय दूर हो गया, लङ्काका राज्य पाकर रावणकी शंका जाती रही तथा किसीसे ईर्ष्या-द्वेष नहीं रहा ॥ १ ॥ जिस विभीषणको
गीतावली ३३६ रावणने दूधकी मक्खीके समान निकालकर स्वयं मलाई [ साररूप लङ्काकी विभूति ] ले ली थी, उसीको भगवान्ने संसारका भूषण तथा मुद-मङ्गलमयी महिमासे सम्पन्न बना दिया ॥ २ ॥ उस समय ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, मुनि और सिद्धगण उसके भाग्यकी प्रशंसा करने लगे तथा देवताओंने प्रसन्न होकर दुन्दुभी बजाना और हृदय- में प्रसन्न होकर जय-जयकार करते हुए बारंबार पुष्प बरसाना आरम्भ कर दिया ॥ ३ ॥ भगवान् विश्वामित्रजी, जनकजी और पाषाणरूपा अहल्याका संकट दूर कर परशुरामजीके आतंकको नष्ट किया तथा पक्षी ( जटायु ), मृग (मारीच ), शबरी और निशाचर (विभीषण) इन सबकी बिना पूँजीके ही उन्नति की ॥ ४ ॥ इस प्रकार युग- युगमें प्रभुके करोड़ों दिव्य कर्म हैं—यह उनके कुछ नये कार्य नहीं बतलाये गये । हृदयमें रामभजनकी महिमाका उल्लास होनेसे इस समय तुलसीकी भी बान बन गयी है ॥ ५ ॥ [ ३८ ] मंजुल मूरति मंगलमई । भयो बिसोक बिलोकि बिभीषन, नेह देह-सुधि-सीव गई ॥ १ ॥ उठि दाहिनी ओरतें सनमुख सुखद माँगि बैठक लई । नखसिख निरखि-निरखिसुखपावतभावत कछु, कछुऔर भई ॥ २ ॥ बार कोटि सिर काटि, साटि लटि, रावन संकरपै लई । सोइ लंका लखि अतिथि अनवसर राम तृनासन ज्यों दई ॥ ३ ॥ प्रीति-प्रतीति-रीति-सोभा-सरि, थाहत जहँ जहँ तहँ घई । बाहु-बली, बानैत बोलको, बीर बिस्वबिजई जई ॥ ४ ॥ को दयालु दूसरो दुनी, जेहि जरनि दीन-हियकी हई ? तुलसी काको नाम जपत जग जगती जामति बिनु बई ॥ ५ ॥
३३७ सुन्दरकाण्ड प्रभुकी अति मनोहर और मङ्गलमयी मूर्ति देखकर विभीषण शोकहीन हो गये और उसके प्रेममें वे देहानुसंधानकी सीमाका अतिक्रमण कर गये ॥ १ ॥ फिर उन्होंने दाहिनी ओरसे उठकर प्रभुके सामनेकी सुखप्रद बैठक माँग ली। वहाँ प्रभुको नखसे सिख- तक देख-देखकर आनन्दित होने लगे। देखिये, वे चाहते कुछ थे ओर हो कुछ और ही गया ! ॥ २ ॥ जिस लङ्काको रावणने करोड़ों बार अपने सिर काट-काटकर अत्यन्त क्लेश उठानेके अनन्तर श्री- महादेवजीसे प्राप्त किया था, वही भगवान्ने विभीषणको अपना अनवसरका अतिथि समझकर [संकोचवश] तृणके आसनके समान दी ! ॥ ३ ॥ प्रभु प्रीति, प्रतीति, रीति और शोभाकी नदीके समान हैं। उनको जहाँ-जहाँ (जिस-जिस गुणकी) थाह ली जाती है, कहीं वे अथाह दिखायी देते हैं ! वे भुजाओंके बड़े पराक्रमी, प्रतिज्ञा के पक्के और (परशुराम आदि) विश्वविजयी वीरोंको जीतनेवाले हैं ॥ ४ ॥ संसारमे ऐसा दयालु और कौन है जिसने दीनजनोंके हृदयोंकी जलन दूर की हो; तुलसीदासजी कहते हैं, संसारमें रामके सिवा और किसका नाम जपनेसे पृथ्वी बिना बोये ही जमती है [अर्थात् सुकृत किये बिना ही पुण्यफल प्राप्त होता है] ? ॥ ५ ॥ [ ३९ ] सब भाँति बिभीषनकी बनी। कियो कृपालु अभय कालहुतें, गइ संसृति-सांसति घनी ॥ १ ॥ सखा लषन-हनुमान, सभु गुर, धनी राम कोसलधनी। हिय ही और, और कीन्हों बिधि, रामकृपा औरै ठनी ॥ २ ॥ कलुष-कलंक-कलेस-कोस भयो जो पद पाय रावन रनी। सोइ पद पाय बिभीषन भो भव-भूषन दलि दूषन-अनी ॥ ३ ॥ गी० २२—
गीतावली ३३८ बांह पगार, उदार सिरोमनि, नत-पालक, पावन पनी। सुमन बरषि रघुबर-गुन बरनत, हरषि देव दुंदभी हनी॥ ४ ॥ रंक-निवाज रंक राजा किए गए गरब गरि गरि गनी। राम-प्रनाम महामहिमा-खनि, सकल-सुमंगलमनि-जनी॥ ५ ॥ होय भलो ऐसे ही अजहुँ गये राम-सरन परिहरि मनी। भुजा उठाइ, साखि संकर करि, कसम खाइ तुलसी भनी॥ ६ ॥ विभीषणकी बात सब प्रकार बन गयी। कृपालु रघुनाथजीने उसे कालसेभी निर्भय करदिया और उसे संसारका घोर त्रास भी नहीं रहा ॥ १॥ उसे लक्ष्मण और हनूमान्-जैसे सखा, शंकर-जैसे गुरु और कोसलेश्वर राम-जैसे स्वामी मिले। उसके हृदयमें तो कुछ और था; किन्तु विधाताने कर कुछ और ही दिया तथा अब रामकृपासे कुछ और ही बानक बन गया ॥ २ ॥ रणधीर रावण जिस [लङ्केश्वर] पदको पाकर पाप, कलंक और क्लेशोंका कोष बनाहुआ था, विभीषण उसी पदको पाकर सम्पूर्ण दोषोंके दलका दलन कर संसारका भूषण बन गया ॥ ३ ॥ जिसकी भुजाएँ दोनोंकी रक्षा करनेके लिये दीवाररूप हैं तथा जो उदारशिरोमणी, प्रणतपालक और पवित्र प्रण करनेवाले हैं, उन रघुनाथजीके गुणोंका देवतालोग प्रसन्न होकर पुष्प बरसाते तथा दुन्दुभी बजाते गान करने लगे ॥ ४ ॥ गरीबनिवाज रघुनाथजीने गरीब विभीषणको राजा बना दिया। इससे बड़े-बड़े धनियोंका (अपनेको भक्तशिरोमणि समझनेवालोंका) मान मर्दन हो गया। भगवान् रामको किया हुआ प्रणाम महामहिमाकी खान है; उससे सब प्रकारके मङ्गलरूप मणियोंका प्रादुर्भाव होता है ॥ ५ ॥ आज भी अभिमान छोड़कर भगवान् रामकी शरण जानेसे इसी प्रकार
३३१ सुन्दरकाण्ड भला हो सकता है। यह बात तुलसीदासने शंकरको साक्षी कर भुजा उठा सौगन्ध खाकर कही है ॥ ६ ॥ [ ४० ] कहो, क्यों न विभीषनकी बनै ? गयो छोड़ि छल सरन रामकी, जो फल चारि चारहौं जनै ॥ १ ॥ मंगलमूल प्रनाम जासु जग, मूल अमंगलके खनै ! तेहि रघुनाथ हाथ माथे दियो, को ताकी महिमा भनै ? ॥ २ ॥ नाम-प्रताप पतितपावन किए, जे न अघाने अघ अनै ॥ कोउ उलटो, कोउ सूधो जपि भए राजहंस बायस-तनै ॥ ३ ॥ हुतो ललात कृसगात खात खरि, मोद पाइ कोदो-कनै । सो तुलसी चातक भयो जाचक राम स्यामसुंदर घनै ॥ ४ ॥ कहो, विभीषणकी बात क्यों न बने। जो छल त्यागकर भगवान् रामकी शरण गये थे, जो कि चार प्रकारके भक्तोंके लिये चारों प्रकारके फल उत्पन्न करते हैं ॥ १ ॥ जिनको किया हुआ मङ्गलमूलप्रणाम संसारमें अमङ्गलकी जड़को उखाड़ डालता है. उन्हीं रघुनाथजीने जिनके सिरपर अपना हाथ रक्खा, उन विभीषणजीकी महिमा कौन कह सकता है ॥ २ ॥ जो पाप और अनीति करते कभी नहीं अघाये थे, उन पतितोंको भी प्रभुने अपने नामके प्रतापसे ही पवित्र कर दिया। कोई उलटा और कोई सीधा नाम जपकर ही काकवत् आचरणवाले भी राजहंसवत् शुद्ध हो गये ॥ ३ ॥ जो दुर्बल शरीरवाला था और खली खाता था [जिसे खानेको निस्सार वस्तुएँ ही मिलती थीं], जो एक-एक टुकड़े के लियेलालायित रहता था और कोदोके कण (साधारण भोजन) पाकर भी बड़ा आनन्द