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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

३२ हम्मीररासो मंगल सुआल धरि एक अंस। बुध बारह वृश्चिक मैं प्रसंस ॥ घटि जीव एक अंसह सुसुद्ध । भृगु कन्या विद्या सुभग उद्दु ॥१८०॥ संसि मीन तीस कटि एक अंस । तिय राशि कह्यौ सुरभानुत्तंस ॥ सोइ कहे अंस चौबीस पूर । यह जन्म लग्न हम्मीर सूर ॥१८१॥ सुनि राव जैत मन हर्ष किन्न । भंडार अमित सब खोलि दिन्न ॥ गुरु बिप्र मंत्र मंत्री सु बोलि । बड़ भीर भइय नृप आय पौलि ॥१८२॥ किय स्राद्ध नंदि मुख बेद वृद्धि १ । सब जात कर्म किन्नौ सु सुद्धि ॥ गो भुम्मि अन्न कंचन सु दिन्न । द्विजराज सकल संतुष्ट किन्न ॥१८३॥ लिय बोलि सकल जाचक सु वृंद । हय हेम सुखासन दीन बंद ॥ बहु भूषन वाहन बिबिध रंग । जिहिं चाह लही सो दियौ संग ॥१८४॥ दधि दूब हरद भरि कनक थाल । बहु गाँन करत प्रबिसंत बाल ॥ दुंदुभि बजंत घर घरन बार । ध्वज कनक पताका द्वार द्वार । १८५॥ औछाह राजमंदिर अनूप । १ बिद्धि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासा ३३ आनंदमग्न नर नारि भूप ॥ सब दाँन देत घर घर उछाह। सब भय अजाचि जाचत सु ताह ॥१८६॥ बहु मंगल गावत अति अनूप । जय जयति कहत चहुवाँन भूप ॥१८७॥ वचनिका राव जैत कै गढ़ रणथंभवर तहाँ जैत घर हम्मीर जन्म्यौ संबत ११४१ साकौ १००६ दक्षणायन सरद ऋतु कार्तिक सुक्ला १२ द्वादसी रविवार घटी ३२ उत्तरा भाद्रपद घटी ६ पल ५६ । कछु घर को घरचौ पायौ । एक सेवक लोह पत्र पाथर सों घस्यौ तहाँ लोह सोनो ( सुवर्ण ) भयौ राव जैत कौं आणि दयौ ब्याघात योग घटी १६ पं० बालव कर्ण घटी २८ इष्ट घटी २६ पल ५ दिनमाँन घटी २८ पल १६ रात्रिमाँन घटी ३१ पल ४४ तुला संक्रांति गतांस १७ भोगांडस १३ चंद्रमा मीन को ११ अंस मंगल कन्या को १ अंस बुध वृस्चिक को १२ अंस वृहस्पति कुंभ को १ अंस सुक्र कन्या को १४ अंस सनि मीन को २६ अंस राहु कन्या को २४ अंस राव हम्मीर असी घड़ी जन्म लियौ । सब को मनोरथ पूर्ण कियौ । सर्ब वंस मैं हर्ष हुवो और अजमेर चित्तोड़ जु बोलि बिप्र पोष्या जाचक संतोख्या १ मंगल गाए बधावा २ बजाया ॥ ——— १ सरबस मैं (सर्वस्व मैं) दान दीन्हौं जग जस लीन्हौं । २ भए मन भाए। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

३४ हम्मीररासो अथ हम्मीरराव को और अलाउद्दीन पातसाह को बैर समय्यो बर्णन दोहा इक्क¹ समय पातसाह बन, मृगया कहि मन किन्न² । सबै खाँन उमराव चढ़ि, हय गय बृंद सु लिन्न³ ॥ १८८ ॥ हरम सबै पतसाह को, जो सिकार के जोग । साज बाज बनि बनि सकल, अरु अंदर के लोग ॥ १८६ ॥ सुंदरता सुकुमार निधि, वहै अपछरा अंग⁴ । ताके गुन गन तैँ बँध्यौ, निमिष न छाँड़त⁵ संग ॥ १६० ॥ छंद भुजंगप्रयात चले साह आखेट⁶ बज्जे निसाँनं । सबै भूप सथ्थं सुपथ्थं⁷ सुजाँनं ॥ सजे डंबरं अंबरं साज बाजं । बनी पख्खरं बाजि सांजं समाजं ॥ १६१ ॥ किते बीर बाने अमाने अपारं । किते मीर धीरं सजे सार धारं ॥ नफीरी बजी भेरि बज्जे रवहं । वहै उर्वसी संग लिन्नी समहं ॥ १६२ ॥ जके रूप सौं साह बंध्यौ सुजाँनं । जथा चंद्र की कांति चकोर माँनं ॥ जथा पंकजं⁸ वै दुरैफैं लुभाए । तथा साह बंध्यौ सनेहं सुभाए ॥ १६३ ॥

१ एक। २ कीन। ३ लीन। ४ अच्छरी अंग। ५ छंडहिं। ६ आलादि (अलाउद्दीन)। ७ समत्थं सुखाँनं। ८ पंकजं पै दुरैफै लुभाए।

हम्मीररासो ३५ चले हयदलं पयदलं सत्थ रक्थं¹ । किते स्वाँन चीता मृगं संग जुध्थं ॥ चले साह गोसं सरोसं सुभाँनं । बजे नद्द नीसाँन नठन्नीन² चावं ॥१६४॥ उठी रेणु आकास छायौ सुहद्दं । मनो पावसं मेघ गज्जे सबद्दं³ ॥ चले तेज ताजी सुबाजी अपारं । सबै खाँन सुलतानं संगं जुझारं ॥१६५॥ करैं बीर लीला सुकीली⁴ बिधाँनं । धरैं बाँन कम्माँन संधाँन पाँनं ॥ लखे जीव जेते सु केते जिहाँनं । भ्रमै जंत्र तंत्रं सु पावै न जाँनं ॥१६६॥ बनै⁵ बेहरं गोत्र गंभीर नारी⁶ । बहैं नीर नद्दं सुभद्दं उन्हारी ॥ झरैं निज्झरं⁷ नाद भारी असारं⁸ । रहे फूलि संकूल बृक्षं अपारं ॥१६७॥ जहाँ अंब नीबू भए और केलं । सबै बृच्छ⁹ फुल्ले फले भार मेलं ॥ भरी भार साखा¹⁰ रही भुम्मि लग्गी । लता संकुलं पाद पंतैं उमग्गी ॥१९८॥ भ्रमै भृंग पुंजं सुगुंजं अपारं । मिली बेलि केती महीरूह¹¹ डारं ॥ मनौं मार अप्पार ताँने बिताँनं । १ हत्थं । २ वानै सुचावं । ३ सुमंद्दं, सुसद्दं । ४ सकेली । ५ बनं । ६ भारी । ७ नीझरं, निर्झरं । ८ पहारं । ६ बृक्ष फूले । १० सारं । ११ महीरोह । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

३६ | हम्मीररासो

तिहूँ काल हेरै लखै नाहिं भाँनं ॥१९९॥ रमै कोकिला कीर नच्चै मयूरं । कहैं बैन मानो बजै कामँतूरं ॥ बहै सीत मन्दं सुगंधं पवन्नं । करै काम उद्दीपनं देखि बन्नं ॥२००॥ सुरं^१ सुंदरं पंकजं बन्न फुल्ले । करैं गुंज भारी भ्रमै भ्रमर मुल्ले ॥ चहूँ ओर कुमोदनी चारु फुल्ली^२ । महा मोद सौं भार आनंद झुल्ली ॥२०१॥ किते जीव संमूह देखंत भज्जैं । मृगं व्याघ्र चीते रिछं जत्र गज्जैं^३ ॥ कहूँ कौलपुंजं कहूँ लीलगाहं । कहूँ चीतलं पांडुलं^४ ब्याघ्र नाहं ॥२०२॥ कहूं भिल्ल बंके^५ बसैं ताङस्थाँनं^६ । भखैं सिंह स्यार ससाझोन पाँनं ॥ करै सिंह गुंजार भारी भयाँनं । सुने प्राँनहारी डरैं जीव हाँनं ॥२०३॥ तहाँ साह की सेन किन्हौं प्रबेसं । तजे खाँन^७ पाँनं लए जो असेसं ॥ करैं बीर जेते सु केते उपावं । हनैं जीव जे साहि को बाज^८ पावं^९ ॥२०४॥ तहाँ साह कै यूँ भए जाय डेरा । चहूँ ओर को खाँन केते अनेरा ॥


पाद-टिप्पणी: १ सरं सुन्दरं पंकजं पुंज । २ फूली । ३ मृगं भार चीते वृकंजत्र गज्जैं । ४ पाडलं । ५ भील बाँके । ६ तास स्थानं । ७ जाँन । ८ बाच । ९ उपायं, जपायं (अंत्यानुप्रास) । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ३७ कहूँ¹ बीन बादित्र बाजंत ऐसी। सुने राग मोहं² मृगं माल बैसी ॥२०५॥ करैं गान ताँनं पसू पच्छि मोहैं। सुनै जीव आवंत³ जानैं न को हैं॥ सुने बीन पब्बीन⁴ सुर नाय रागैं। रहे मोहि कै माल डारे न भागे ॥२०६॥ कहूँ राग ऐसो करैं मेघ आवैं। तबै साह ताको बड़ी मौज चावैं ॥ असी भाँति आखेट कै रंग भीनो। निसा घौस जातंन काहू न चीनो ॥२०७॥ तिहीं ठौर बित्यौ सुसारौ बसंतं। रमै पातसाहं मनौ र्तिकंतं ॥ तिहीं ठौर ग्रीखम्म किन्नौ प्रबेसँ। महा संकुलं बृक्ष राजं सुदेसं ॥२०८॥ तहाँ तेज भाँनं न जाँनं न जाँनं। तिहीं हेत साहं रहे तास थानं⁵ ॥ समौ एक ऐसो तहाँ रौद्र आयौ। महा पौन प्रचंड औ मेघ छायौ ॥२०९॥ कहूँ ओर पतसाह खेलैं सिकारं। करैं केलि जेती जलं बाल लारं* ॥ भयौ अंधकारं महाघोर ऐनं। गई सुद्धि सुझै नहीं अप्प⁶ नैनं ॥२१०॥ १ बहू। २ मोहे। ३ आनंद। ४ पर्वीन। ५ तिहीं तेज भाँनंन जाँनं नं जातं। तिहीं हेत साहं रहे संक वातं। ६ आप। *लार (लाल)=जो क्रीड़ा में अन्यों के पूर्व विजय प्राप्त करती हो। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

३८ हम्मीररासो फुरथ्यौ¹ साह को सत्थ भोजत्थ तत्थं । भयौ घोर अंधार सुझै न हत्थं ॥ तजी बालकीड़ा जलं त्यागि भग्गी । जहीं ओर दौरी भयौ मुख अग्गी ॥२११॥ किहूँ ओर दासी किहूँ ओर खोजा* । कहूँ ओर हुरमैं कहूँ ओर कोजा ॥ जसो होनहारं बन्यौ आय जैसो । करो लाख कोऊ टरै नाहिं तैसो ॥२१२॥ लिखे लेख जो नाहिं मिट्टै सुकोई । यही बात निश्चै सुनो सर्व सोई ॥ सरं त्यागि चल्ली सुहुरमैं सुभीत । कँपै गात ताको रह्यौ व्यापि सीतं ॥२१३॥ तिहीं ठौर महिमा मिले सेख आई । महा साहसी सूर उद्धारताई ॥ निजं धर्म साधै तजै नाहिं राचं । कहै जो कछू² तो निवाहंत बाचं ॥२१४॥ मिली बाल ताकौं कही दीन बाँनी । समै³ बाम सेखं मनौं⁴ आप जानी ॥ डरो ना कहो आप हौ कौन कोई । कहूँ जो उढ़ावो यहाँ बैठि मोही ॥२१५॥ तवै बाजि तैं सेख भू पै जुआयौ । कछू वस्त्र हो अंग ताको उढ़ायौ ॥२१६॥ दोहरा छंद महिमा उतरे बाजि तैं, दियौ वस्त्र तिहिँ हत्थ । १ फुत्र्यौ । २ कहूँ । ३ उमै । ४ मनं । +खोजा=सेवक । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ३९ सीत भीत ता ना मिटी, कही हुरम यह गत्थ ॥२१७॥ पुच्छिय महिमा-साहि तब, को तू आप बताय । मैं घरनी पतिसाह की, रूपबिचित्रा नाय ॥२१८॥ जलक्रीड़ा हम करत सब, आयौ पौन प्रचंड । तब डेरन को भजि चलीं, तामैं मेघ सुमंड ॥२१९॥ भयौ भयानक तिमिर बन, सबै संत्थ गय भूल । मै इकली वन महँ यहाँ, डरति फिरति दुख मूल ॥२२०॥ छप्पय छंद तब महिमा कर जोरि हुरम कूँ सीस नवायौ१ । चढ़यौ अस्व की पिठ्ठि दैव पहुँचाव सुभायौ ॥ कहै हुरम सुन सेख देह कंपत है मोरी । छिनक बैठि यहिं ठौर सरन मैं लिन्नी (लीनी) तोरी । कहै सेख यह बीत नहिं, तुम साहिब मैं दास तुव । यह धरम नाहिं उलटी कहो, सरन सदा सेवक सुमुव ॥२२१॥ सेख समो पहिचानि स्वामि सेवग न बिचारौ । काम रूप तुम पुरुष बीर बानैत उदारौ ॥ बहुत काल अभिलाष रही जिय मैं यह भारी । कौन समो वह होय मिलै महिमा गुनबारी ॥ सुइ करिय आज साहिब सहल, सकल मनोरथ सिद्ध हुव । दै योग भोग संयोग यह, कौन दोस जग देहु तुव ॥२२२॥ चौपाई छंद कहै सेख तुम बेगम सच्चिय । ऐसी बात कहो मति कच्चिय ॥ मैं अब लों तिय जग मैं जानत । भगनी मात .सुत। सम माँनत ॥२२३॥ १ हुरम कहि कहि सन बोयौ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

४० हम्मीररासो ता महिं तुम हजरत की बाला । सब कै एक वहै हकताला ॥ तातैं कहा धर्म मैं हारूँ । यह तो कबहुँ जिय न बिचारूँ ॥२२४॥ सुनहु सेख बेगम तिय सबहीं । तुम हूँ धर्म्म सुन्यौ है कबही ॥ तिय तजि लाज कहत रति जाचन । को नहिं धर्म जो पुरुष अराचन ॥२२५॥ तन मन धन जाचे तैं दिज्जिय । कह कुराँन पूरन सोइ किज्जिय१ ॥ पुरुष धर्म यह मूर न होई । तिय जाचत कौ नाटत कोई ॥२२६॥ सोरठा छंद तब जिय सोचि बिचारि, मनहीं मन महिमा समुझि । साँची है यह नारि, धर्म उभै जग महँ प्रगट ॥२२७॥ तब महिमा मुसकाय, कर गहि आलिंगन दियौ । इक तरु कौं तर जाय, दियौ तुरंगम बंधि तब ॥२२८॥ जीनपोस तर डारि, सस्त्र खुल्लि रखिय निकट । करी सुमार सुमार, उत्कंठा तिय मिलन की ॥२२६॥ छप्पय छंद महा मोद मन बढ़्यौ परस्पर तन मन फुल्लिव । मिटिव बंक मन संक निसँक ह्वै आसन भुल्लिव ॥ मानो कोक चकोर चंद लब्भव रबि लंबे । घन दामिनि मनु मिलिय काँम रति पति सुख फंवे ॥ १ दीजे, कीजे ( अंत्यानुप्रास ) CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ४१ दुहुँ ओर सोर स्वातिक सुभो, गाढ़ो आलिंगन दियव । नख खंड नाहिं परसे सरहिं, सकल कोक केली कियव ॥२३०॥ अंग अंग बिनअंग* रंग बड्डिव दुहुँ ओरन । कढिव बिरह तन ताप परस्पर बर सत मोरन ॥ हाव भाव रति अंग मुदित बर्षत अभिलाषै । करत कटाक्ष प्रकास बैन मधुरै मुख भाषै ॥ गहि अंग संग आसन दियव, कोक कला रस विस्तरिव१। आनंद द्वंद उन्माद जुत, काँम विवस दोउन भयव ॥२३१॥ तिहिं छिन इक मृगराज आनि तत्काल सुगज्जिव । प्रज्वलित नयन प्रचंड चँवर सिर उप्पर सज्जिव ॥ बिकट दंत मुख त्रिकट वाहु नख बिकट सुरंज्जै । तिहिं भय वन कै जीव सबै गजराज सुभज्जै ॥ आवत्त देखि तिहिं सिंह कौ, ह्वै सभीति तिय इम कहै । विधि कौन समै यह का भई, दैव बारि मैं बपु दहै ॥२३२॥ तब तिय कंपि सभीति उछरि महिमा गर लगिय । हे प्राणेश्वर कहा भई रसगत जु उमगिय ॥ तजहु भजहु अब वेगि, बचहु अब प्राण उबारो । मैं अब पलटे प्राण तजौं, तुम पर तन वारौं ॥ मुसकाय मीर तब यों कहैं, न डरि न डरि अबला सुभुव । तुट्टै जु आब रख्खों भुज न, कहा स्याल डर डरत तुव ॥२३३॥ छंद अर्द्धनाराच गहे कमाँन बाँनयं, धरंत ताहिं पाँनयं । तज्यौ न बाल आसनं, गह्यौ सरं सरासनं ॥२३४॥ १ विध्यरिव । २ प्रफुलित ।

  • बिनअंग=अनंग । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

४२ हम्मीररासो सु सिद्धि राग बागयं, ढए स धीर पागयं । कह्यौ हँकारि त्राचयं, सम्हारि स्वाँन साचयं ॥२३५॥ करी सुगुज्ज पुंजयं, उठ्यौं सु क्रोध गुंजयं । धरत्थौ सु चौर सीसयं, भुजा उठाय रीसयं ॥२३६॥ जथा सुक्रोध कालयं, उठ्यौ सु सिंह वालयं । करं कमाँन लिन्नयं, कसी सतानि¹ दिन्नयं ॥२३७॥ लग्यौ सुबाण मन्थयं, लखी अकत्थ गत्थयं । लग्यौ सुबाण पार भौ, गिरद्यौ सु सिंह स्यार भौ ॥२३८॥ दोहरा छंद सिंह मारि इक बाण तैं, भू मैँ दिन्नौ डारि । फिरि कमान तिहिं हथ्थ² तैं, धरी जु भूपर धारि ॥२३९॥ यहु साहस किन्नौ प्रगट, सम स्वभाव सम बुद्धि । गर्व हर्ष हिय नहिं कछू, प्रगटिय प्रेम प्रसिद्ध ॥२४०॥ मिलत मिलत मुसकात मृदु, कंपत हर्षंत गात । उचकनि लचकनि मसकिबो, सीकर हूकर बात ॥२४१॥ कवित्त छंद कंचन लता सी थहरात अंग अंग मिलि, सीकर समूह अंग अंगनि मैं दरसै । चुंबन कपोल नैन खंडन अधर नख, गहत पयोधर प्रचंड पानि परसै ॥ आनँद उमंगन मैं मुसकात बाल तुत- रात बतरात सतराअत रस बरसै । लपटनि झपटनि मसकनि अनेक अंग, रति रंग जंग तैं अनंग रंग सरसै ॥२४२॥ ———————————————————————————————— १ तान । २ हाथ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ४३ छप्पय छंद मिटी पवन परचंड, मिटिव मनमथ मद भारिव । हटेउ तिमर तिहिँ समय, प्रगट परगा(का)स सुधारिव ॥ सकल सत्थ जथ तत्थ, मिले अप्पन १ थल आइव । साहि हुरम को सोध करिव तिहिँ समय सुहाइव ॥ दिन्नी जु सिक्ख तब सेख कौं, अप्प अप्प सिबरन गयय२ । पहुँची सु जाय पतिसाह पै, हुरम साह आदार दियव ॥२४३॥ तब सु साहि करि कुच्च,३ सकल दिल्लिय दिसि आयव । चढ़िव सेन समूह, धूरि उड़ि अंबर छाइव ॥ घुमरि घुमरि निस्साँन,४ घोर दुंदभि घन बज्जिय । सकल खाँन उमराव, हरष संजुत मग रज्जिय ॥ कीन्हौं५ प्रबेस निज निज घरन, साह महल दाखिल भयव । सुख खाँन पाँन सौगंधजुत, अप्प अप्प६ रस बस भयत्र७ ॥२४४॥ इक्क८ समय पतिसाह, हुरम सँग सेज बिराजे । दंपति अति रस लीन, काक की कला९ सुसाजे ॥ रमत करत परकार, इक्क१० आसन रस११ भीने १२ । सरस परस्पर मुदित, उदित कंद्रप तन चीने ॥ तिहिँ समय दैव संजोग तै, इक आखू+ आवत भयव । देखंत ताहिं पतिसाहि को, मदन द्वंद उतरि गयव ॥२४५॥ दोहरा छंद मूषक हजरति देखि कै, आसन तजि ततकाल । लै कमाँन संधानि कै, हन्यौ तार लखि वाल ॥२४६॥ १ आपन । २ दीनी जु सीख तब सेख कौं आय आय डेरन गयव । ३ कूँच । ४ नीसाँन । ५ किन्हौ । ६ आप आप । ७ बसि छयव । ८ एक । ९ केलि । १० एक । ११ रति । १२ भिन्ने,चिन्ने,भिन्नय,चिन्नय, अंत्यानुप्रास । +आखू (आखु)= मूसा । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

४४ | हम्मीररासो चौपाई छंद हजरति हरषि तोर तिहिं¹ दिन्नौ । चूहौ² प्राण-हीन तब किन्नौ ॥ तबहीं साहि हरषि मुसकाए । तिय कौ ऐसे बचन सुनाए ॥२४७॥ कायर जाति तिया³ हम जानी । तातैं यह हम प्रथमहिं ठानी ॥ यह करनी अद्भुत तुम देखी । निज कर करी सु तुम अवरेखी ॥२४८॥ हँसी हुरम सुनि हजरति बानी । पुरुषन की तो अकथ⁴ कहानी ॥ मारैं सिंह तो न मुख भाखैं । जाचे नाहिं प्राण वै राखैं ॥२४६॥ मैं जग मैं ऐसा सुनि पाऊँ । कहैं साहि मैं बहुत बघाऊँ ॥ बकसो गुनह तो अबै बताऊँ । तुरत साहि कै पाइ लगाऊँ ॥ सोरठा छंद ऐसा मोहिं बताय, सिंह मारि सिफत न करै । बकसो औगुन आय, जो उन तात ज मारियौ ॥ २५१ ॥ हुरम तबै कर जोरि, बार बार सिर नाय कै । सुनहु गुनह⁵ अब मोर, हजरति बीतयौ आपनो ॥ २५२ ॥ १ तहँ । २ चूही प्राणहीन तिहिं चीनौ । ३ तीय । ४ अकह । ५ गुनाह जुमोर । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ४५ छप्पय छंद मृगया महँ जिहिं समय, सकल भुल्लिय १ बन माहीं । महा घोर तम भयौ, तहाँ २ वरनी नहिं जाही ॥ तदिन सेख संयोग, आनि हमसैं तब मिल्लिव । नहिंन सेख तकसीर, देखि मन मोरहिं चिल्लिव ॥ संयोग भोग बिछुरन मिलन, लिख्यौ बिधाता ज दिन जहँ । नहिं टरै लाख कोऊ करो सुतौ होय वह ३ त दिन तहँ ॥२५३॥ दोहरा छंद मैं सेखहिं जाँनत नहीं, सेख न जाँनत मोहिं । होनहार संजोग जो,४ मिटै न उतनी होहि ॥ २५४ ॥ सुरति करत सिंह जु उठ्यौ, लख्यौ सेख सति भाय । लै कमाँन मारचौ तुरत, तज्यौ न आसन आय ॥ २५५ ॥ सुनू स्वभाव ज सेख के, लच्छिन कहे जु आप । मैं सभीति भइ सिंह तैं, कहे मोहिं बिन पाप ॥ २५६ ॥ त्रोटक छंद सुनिये पन सेख करे निज ये । घर बैठत बाँ जल सों रजए ॥ नहिं भोजन सोहि गरम्म करै । उकरू नहिं बैठत भुंमि भरै ॥२५७॥ सरणागत आवत नाहिं तजै । पर बाम लखे मन माहिं लजै ॥ जहँ जाचत प्राण न राखत है। नहिं झूठ अकारन ५ भाखत है ॥२५८॥ १ भूले । २ तहाँ कछु बर्नि न जाही । ३ वहाँ । ४ तैं । ५ अकारथ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

४६ हम्मीररासो रण मैं नहिं पिट्ठि दई कबहुँ । लखि आरतिवंतन सौं अबहूँ ॥ तहँ मेटत आरति वार तिहीं । बिन आसन बैठत है कबहीं ॥२५६॥ मुख सैं उचरै न टरै कबहीं । सब तैं मधुरे मुख बैन सही ॥ दृग लाज भरे रिझवार घनैं । रहनी करनी कविराज भनैं ॥२६०॥ महिमा महिमा नहिं जात कही । जस चाहक गाहक गाहक ही ॥ बरबीर महाररणधीर अरै । खँग खेत गहै अरि खंड करै ॥२६१॥ सुनि साहि मनै अचिरज्ज भयौ । ततकाल जु सेख बुलाय लयौ ॥ छिरकाय धरा जल सौं जु भरे । बहु भोजन आनि गरम्म घरे ॥२६२॥ तर गेरि पटंबर अंबरयं । करि पालथि छोरिय कंमरयं ॥ बहु भाँति सिराहि सुभाय मनं । करिये तब भोजन आय¹ अनं ॥२६३॥ मिलिए सब जो कछु बाल कहे । महिमा तिय जानि सनेह लहे² ॥ प्रजुरे पतिसाहि सु कोप कियं । मनु³ ज्वाल बिसाल सुघृत्त दियं ॥२६४॥ दृग लाल बिसाल सुबंक भुवं । १ आप । २ लग । ३ जनु । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ४७ रद दाबत १ ओठ सु ओठ दुवं ॥ करि क्रोध तवै पतिसाहि कहै । उर मै अति क्रोध २प्रचंड दहै ॥२६५॥ सुनि जाँमहिं जो तकसीर परै । तिहिं कौ न कहो अब दंड धरै ॥ कर जोरि उठ्यौ महिमा तबहीं । हम तो तकसीर भरे सबहीं ॥२६६॥ तुव गर्दन वेग कबूल करो । है तकसीर जु सेख भरो ॥ तब सेख कहै कर जोरि तवै । करिये मन भावतु है जु अचै ॥२६७॥ तब बोलि हुरम्म कहै मुख तैं । पहलैं तकसीर परी हम तैं ॥ गरदन्न कबूल करी अबहीं । पहलैँ हम तैं तकसीर भई ॥२६८॥ समझे पतिसाह तबै मन मैं । अबला हठ नाहिं मिटै मन ३ मैं ॥ इनकौ सब बेगम लोग कहैं । मन चाहत सो हठता जु गहैं ॥२६९॥ दोहरा छंद हुरम बचन सुनि साह तब, मन बिचार तहँ कीन ४। बेगम जाति जु तीय की, इन मरवै मन दीन ५ ॥२७०॥ जाहु सेख इत ६ मति रहो, जहाँ लगि मेरो राज । जो राखै ७ ताकौ हनूँ, प्रगट सुसाज़ समाज ॥२७१॥ १ दब्बत । २ कोप । ३ तन । ४ किन्न । ५ दिन्न । ६ इह । ७ रक्खै । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

४८ हम्मीररासो कट्टन गरदन जोग तू, कीनौ १ कुविध २ खरान । को रक्खै ३ या भूमि पर, रक्खि ४ करै को जवान ॥२७२॥ छप्पय छंद यह महि मँडल जितो, आँन मेरी सब मांनैं। खूनी रक्खै कौन, कोउ ऐसा तू जानै ॥ हम तैं बली बताय, ओट जाकी तू तकै। बचै न काहू ठौर, एक बिन गए न मक्कै ॥ कर जोरि सेख इम उच्चरै, बली एक साहिब गिनूँ। निर्वीज धरा ५ कबहुँ न है, ६ मैं हमीर स्रवनन सुनूँ ७ ॥२७३॥ तब सुसेख सिर नाय, रजा हजरति जो पाऊँ । जौ न गिनै पतिसाह, सर्न मैं ताकी ८ जाऊँ ॥ तुमहिं न नाऊँ सोस, नहिंन फिरि दिल्लिय आऊँ । जुद्ध जुरे नहिं टरौं, हत्थ तुम कौ जु दिखाऊँ ॥ यह कहत सेख सल्लम किय, तबहिं चला चलचित्त भुब । निज धाम आय अप अनुज सों, बिबर बिबर बातें जु हुब ॥२७४॥ छंद पद्धरी आए जु सेख घर तब सरोष । जिय जान्यौ अपनो सकल दोष ॥ मिलिय ९ जु मीर गबरू सुधाय । चलचित्त देखि तिहिं पूछि १० जाय ॥२७५॥ किहिँ हेतु आज चिंतत सुभाय । किहिँ कियव वैर सो मुहिँ ११ बताय ॥ तिहिँ मारि करूँ ततकाल टूक १२ ।

१ किन्नौ । २ कुबदि । ३ राखै । ४ राखि । ५ भुंमि । ६ हैं । ७ गिन्यौ, सुन्यौ अंत्यानुप्रास । ८ जाकी । ६ मिल्ली । १० पुच्छि । ११ मो । १२ दुक्क । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हम्मीररासो ४९ हिय क्रोध अगिन साँ^१ उठत ऊक^२ ॥२७६॥ को^३ करै बैर बिन कर्म्मबीर । मिट^४ गये अन्न जल को सु सोर ॥ तिहिं^५ कौन रहै रक्खै सु कौन । यह जानि मर्म तुम रहो मौन ॥२७७॥ यह सुनत मीर गबरू सुभाय । सो^६ पर्यौ धर्नि मुच्छा सु खाय ॥ तदि कर्यौ बोध यहु बिधि सुताहिं । नहिँ करो सोच रहो^७ निकट साहि ॥२७८॥ तब कहूँ मीर गबरू सु ताहिं । सब तजो देश मक्के सु जाहि ॥ कै रहो राव हम्मीर पास । तन रहै खुसी नासै जु त्रास ॥२७६॥ तब चलिव सेख तजि साहि देस । सब^८ सुभट संग लिन्हे^९ सुबेस ॥ सत पंच सैन गजराज पंच । रथ सत्थ लिये निज नारि संच ॥२८०॥ सब रखत साज निज संग लीन । दासी^१० जु दास सुंदर नवीन ॥ सजि साज बाज डेरे अनूप । लदि ऊँट किते सँग चलिय^११ जूप ॥२८१॥ चढ़ि^१२ सैन सज्योँ निज संग बाँम । १ यौं । २ हूक हुक्क । ३ महिमा साहोवाच । ४ मिटि अन्न जहाँ जाके सनीर । ५ तव । ६ सुइ परचो धरनि मुर्छा सुखाइ । ७ रहु । ८ निज । ६ लीन्हे । १० सब दासि दास । ११ चले । १२ सजि सेख चढ्यौ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

५० हम्मीररासो बज्जिव निसाँन गज्जिव सु ताँम ॥ मग चलत करत मृगया अनेक । मिलि चलिय१ सकल बर बीर एक२ ॥२८२॥ जिहिं मिलै राव राजा सु जाय । पतिसाहू बैर सुनि रहै चाय ॥ चहुँ चक्क फिरयौ महिमा सुधीर । नहिं३ कह्यौ रहन काहू सुबीर ॥२८३॥ द्वै४ दीन सेख देखे सुझारि । बिन राव दसौँ दिसि फिरिव हारि ॥ तब तक्कि५ सेख हम्मीर राव । सोइ आइ सरन परसे जु पाव ॥२८४॥ दोहरा छंद गढ़ बंका६ वंको सुधर, बंका६ राव हमीर । लखि प्रतीति मन महँ७ भइय, हर्षे महिमा मीर ॥२८५॥ देखि जलासय बिटप बहु, उतरि सुडेरा कीन८ । हय गय बंधे तरुन तर, खाँन पाँन बिधि लीन९ ॥२८६॥ डेरा ड्यौढ़ी करि खरे, करी बिछायती बेस । करि१० मसलति कौँ सलि जुरी, सब भर सरस सुदेस ॥२८७॥ मंत्री मंत्र सुपूच्छि११ तब, इक चर लीन सु बोलि । जाहु राव के पास तुम, कहो बात सब खोलि१२ ॥२८८॥ प्रथम सलाँम कहो जु तुम, बिरत१३ कहो सु बिसेष । हुकम होय जो मिलन कौं, तो हजूर है सेख ॥२८६॥ इतने मैं जानी परै, पन भ्रम प्रीति प्रतीति । १ चलै । २ केक । ३ नन कह्यौ । ४ द्वै, दोउ दोन, दोय । ५ तके । ६ बंको । ७ जिय मैं । ८ किन्न । ६ लिन्न । १० करी कचहरी आप तत्र । ११ पुच्छि । १२ बुल्लि, खुल्लि । १३ वृत्त, वृत्तांत । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri

हर्ष सोक यहिँ गति लख्यौ, तुम जानत सब रीति ॥२६०॥ तब सु दूत गय राव पहँ, करी खबरि दरबाँन । बोलि हजूरि सुदूत कौ, पूछत कुसल सुजाँन ॥२९१॥ सकल बात सुनि दूत मुख, हर्ष राव बहु कीन१ । तबहिं उलटि पठयौ सु वह, सेख बुलाय सुलीन२ ॥२९२॥ नाराच छंद चल्यौ जु सेख राव पहँ बनाय साज कीनयं३ । तुरंग पंच नाग एक साज साजि लीनयं४ ॥ कमाँन दोय टंकनो सु देस मुल्लताँन की । कृपाँन एक५ बेस देस पालकी सुजाँन की ॥२६३॥ लिये सु दोय बज्र लाल एक५ मुक्त मालयं । कही जु एक५ दोय बाज स्वाँन दोय पालयं ॥ सवार एक आपही सबै 'पयाद चल्लियं । रहे तनक्क पौरि जाय फेरि अग्ग हल्लियं ॥२६४॥ सुबेतहार अग्ग६ जाय राव कौ सुनाइयं । हमीर राव बेगि आय७ रावतं खँदाइयं ॥ चले लिवाय सेख कौ जहाँ जु राव बट्टियं । सभा समेत राव देखि सेख कौ सु उठ्ठियं ॥२९५॥ मिले उभै समाज सौं कुसल्ल छेम पुच्छियं । परस्सि पानि पाव सेख हाथ८ जोरि सुच्छियं ॥ करी जुअग्ग सेख भेंट बुल्लियौ सु बाचयं । सरन्नि राव राखि९ राखि मैं सरन्नि साचयं ॥२६६॥ फिरचौ सु मैं सु दीन दोय खाँन जाँति सब्वयं । जितेक राज रावताय छत्र जाति सब्वयं ॥


१ किन्न । २ लिन्न । ३ किन्नयं । ४ तुरंग पंच नाग इक्क साज सज्जि लिन्नयं । ५ इक्क । ६ अग्र । ७ आप । ८ हत्थ । ६ रक्खि रक्खि ।