हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
१३८ .हम्मीररासो कुप्पिय १ मीर खेत चढ़ि बाजै ॥८२१॥ इतै सुसेख राव पद बंदे । गहै तेग मन माहिं अनंदे ॥ इतै सेख सदको उत आए । आप२ आप जय सद् सुनाए ॥८२२॥ कहै ३ सदकि सुनि साह सुजाँनं । ठठा भखर बसि करिए पाँनं ॥ कहा सेख हम्मीर सु रावं । उठे युद्ध कौं करि जिय चावं ॥८२३॥ छप्पय छंद जुटे बीर दुहुँ जंग अंग अनभंग महाबल । चढ़े जाँन आमाँन बढ़े निस्साँन ४ बरहल ॥ करि कमाँन करि पाँन काँन लौं करिखह रक्खे । धरि नराच गुन राखि धाव करि वेगि बरक्खे ॥ निज संग बीर सत पंचजुत सेख भेखरौ यह धरिव । उत खुरासाँन षट सहस ल सदकी सद हांकी करिव ॥८२४॥ तेग बेग बहु कढ़ी मनो पावकक लपट्यो । करी बाज नर जुद्द ५ कटे सिर पात्र उपट्टा ॥ परै धरनि धर नचै उदर काट अंत भभक्कै । चली रक्त धर धार लुत्थ परि लुत्थ धधक्कै ॥ षट सहस खिसे षुरसाँन दल लिय निसाँन बानै सुबर । किए नजर राव हम्मीर कै फबी फते महिमा समर ॥८२५॥ आइ सेख सिर नाय राव कूं बचन सुनाए । धनि छत्री चहुवाँन सरन पन जग जस छाए ॥ १ कोपे । २ अप्प अप्प । ३ कहै सदक्की साह सुजाँनं । ४ नीसाँन । ५ जुष्टि कट्टि । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १३६ तेज राज धन धाँम तात तिय हठ. नहिं छंडे । राखि १ धर्म्म दृढ़ सत्य कीर्ति जस जुग जुग मंडे ॥ अरि नीर नैन महिमा कहै अब जननी कब जन्म दे । जब मिलों राव हम्मीर तुम बहुरि समै हैंहै कदे ॥८२६॥ कहै राव हम्मीर धीर नहिं हीन उचारो । सुर न करें सनेह देह छिन भंग बिचारो ॥ बिछुरन मिलन संजोग आदि ऐसी चलि आई । ज्यों जीवन २ त्यों मरन सकल ३ वेदन यह ४ गाई ॥ कीजे ५ न भम ६ अनभंग चित मिलैं सूर कै लाक सब । हम तुम जु साह बहुरों ७ तथा होहि एक ८ तन तजि सुअब ॥८२७॥ तज्जथ स्व.रथ लोभ माह काहू नहिं करिये । देह घरे परऑँन ९ स्वामि का १० कारज सरिए ॥ को इतसों ले जात कहा उतसों ले आयौ । रहे अमर कीरत्ति पाप नरदेह सु गायौ ॥ सुनि सेख देख थिर नाहि कछु तन मट्टी मिलि जाइये । का सोच मरन जीवन तना यह लाभ सुजस सों पाइये ॥८२८॥ सुनि हमीर कै बचन साह पर सनमुख धाए । मीर गाभरू बीर आँनि तिन ११ सास नवाए ॥ अलादीन पतिसाह इतै सिर ऊपरि १२ राजै । तुम सिर राव हमीर स्वामि आपन १३ कुल लाजै ॥ नन तजो नोन की सरत दोउ यह तन तिल तिल खंडिये । मिलिये जु भिस्ति १४ मैं जाय अब धर्म न अपना छाडये ॥८२९॥ हँसि अलावदी साह सेख कौ बचन सुनाए १५ । १ रखि । २ ज्यामन, जाँमन । ३ चऊ । ४ मैं, बिधि । ५ किज्जे । ६ भंग । ७ गवरु, गमह । ८ इकक । ६ परमाँन । १० जो । ११ रिस । १२ उप्पर । १३ अप्पनि । १४ बिहस्त । १५ सुणांए । ·CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१४० हम्मीररासो दिली छाड़ि करि सीस बहुरि मुझकौ नहिं¹ नाए॥ मिलो मुझे तजि रोस हुरम मैं तुमकौ दीनी। अर गौरखपुर देस देहुँ तुम कौ सत चीन्ही²॥ मुसकाय साहि महिमा कहै³ बचन यादि वै किजिये। जननी जनमे फिरि आनि भव जबै मिलन गन लिजिये॥८३०॥ दोहरा छंद जब⁴ जननी जनमै बहुड़ि, धरूँ देह कहुँ आनि । तऊ न तजौं हमीर संग, सत्य बचन मम जानि ॥८३१॥ तब सु राव•हम्मीर सुनि, कीनी⁵ मदति सु सेख। हजगति महिमा साह कौ, बात लगावत देखि । ८३२॥ कहै हमीर यह बचन पर, गही साह सौं तेग⁶ । लोभ न करिये⁷ जीव का, गहो⁸ साह सो बेग ॥८३३॥ चौपाई छंद कहै मीर गभरू ये बातैं । गहे⁹ सार नहिं करिये घातैं ॥ हुकम धनी कै कौ प्रतिपालो । आइ अदङ्गि सीस पर चालो१० ॥८३४॥ सुनि गभरू कै बचन सुभाए । महिमा फूलि खेत मैं आए ॥ सनमुख सार सम्हाय सु बढ़ढ़ै । माया¹¹ मोह त्यागि खग कढ़ढ़ै ॥८३५॥ ———————————————————————————————— १ न नवाए। २ अरु गौरखपुर औधि देस दीनो (दिन्नो) सति चीन्हीं (चिन्हीं) । ३ कही । ४ अब । ५ कीन्ही । ६ टेक। ७ किजिय । ८ तो रहै हमारी टेक । ६ गहौ सार रन कौ रचि घातैं । १० प्रतिपालहु, भालहु अत्यानुप्रास । ११ महिमा । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
· हम्मीररासो १४१ दोहा छंद दोऊ बंधु रिसाइ कै, लई बाग १ इमि संग । उतरि खेत मैं निजि उभै, कीनौ हरष उमंग ॥८३६॥ मीर गाभरू पाँय परि, हुकम माँगि कर जोरि। स्वामि काज तन खंडिये, लगै २ न कबहुँ खोरि ॥८३७॥ हनूफाल छंद मिलि बंधु दोऊ ध्याय । बहु हरष कीन ३ सुभाय । अब स्वामि धर्म सुधारि । दोउ उठे बोर हँकारि ॥८३८॥ असमाँन ४ लग्गिय सीस । मनो उभै काल स दीस ॥ इत कोप महिमा कीन्ह । हम्मीर नौन सु चीन्ह ॥८३९॥ उत मीर गभरू आय । मिलि सेख कै परि पाँय ॥ फर तेग बेग समाहि । रहे दुहूँ सेन सचाहिं ॥८४०॥ कम्माँन लीन सु हत्थ । जनु ५ सार कार सुपत्थ ॥ धरि स्वामि काज ६ समत्थ । दोउ ७ उभै जुद्ध सपत्थ । ८४१॥ दुहुँ द्वंद जुद्ध सुकीन । मनु जुटे मल्ल नवीन ॥ तरवारि बज्जिय ताय । मनु लगी ग्रीषम लाय ॥८४२॥ कटि चरण सीसरु हत्थ । परि लुत्थ जुत्थ सु तत्थ ॥ घमसाँन थाँन सु धीर । घर धरण(नि) खेलत बीर ॥८४३॥ गजराज लुट्टत भुम्मि । बहु तुरँग परत सु झुम्मि ॥ बिव बीर बज्जिय सार । तरवारि बरसहु ८ धार ॥८४४॥ दोउ भ्रात स्वामि सकाँम । जग मै किये अति नाँम ॥ दोहुँ बीर देखत हूर । चढ़ि गए मुख अति नूर ॥
१ बग्ग । २ लषकत कबहुँ खोरि । ३ कियउ । ४ असमाँन सीख ( मत्थ ) सुलग्ग ( लगि ) । मनु उभै काल सुजग्ग । ५ बर खार धार सुपत्थ । ६ कज धर्म । ७ मनु उभ्यो । ८ फरसहु । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१४२ हम्मीररासो दल दोय दिक्खत बीर । पहुँचे बिहस्त गहीर ॥८४५॥ दोहरा छंद तिल तिल भे १ अँग दोहुँन कै, हने बाजि गजराज । हजरत राव हमीर कै, सबै सँवारे काज ॥ ८४६ ॥ मुसलमाँन हिंदवाँन २ कौ, चले सेख सिर नाय । चढ़ि बिमाँन दोऊ तहाँ, बिहस्त पहुँचे जाय ॥८४७॥ छप्पय छंद कहै साह मुख बचन ३ सुनो हम्मीर महाबल । अब न गहो तुम सार फिरै हम सकल दिली दल ॥ तुम्हैं माफ तकसीर राज रणथंभ करो थिर । हम तुम बीच कुराँन मुहिम नहिं करो दिलीसुर ॥ परगनें पाँच ४ दीन्हें अवर रणतभँवर भुगतो सदा । जब लग सुराज हमरो रहै तुम सु राज राजो तदा ॥ ८४८॥ चौपाई छंद कहै राव हम्मीर सु बानी । सुनि दिल्लीस सत्य जिय जानी ॥ जाकी अदति होय किमि मिट्टै । नर तैं होनहार किमि घट्टै ॥ ८४९ ॥ तुम्हरो दयो राज किन पायौ । तुम्ह कौ राज कहो किन धायौ ॥ बेर बेर कहा मुखै ५ उचारो । कोटि म्याँनपन क्यों न बिचारो ॥८५० ॥ कीरति अमर , अमर नहिं कोई । १ भए अंग । २ हितवाँन । ३ बच्न, बैन । ४ पंच दिन्निय । ५ मुख्ख । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो · १४३ दुर्योधन दसकंध सु जोई¹ ॥ काको गढ़ काकी यह दिल्लो । हरि की दई हमें तुम मिल्ली ॥८५१॥ हम तुम अंस एक उपजाए ॥ आदि पद्म रिषि अंग उपाए ॥ देव दोष उर घर भए न्यारे । हम हिंदु तुम यवन हँकारे ॥८५२॥ तजिये भोग भूमि कै सबहीं । चलिये सुरपुर बसिये अबहीं ॥ सग हमारो पहुँच्यो जाई । हम तुम रहें सबहिं पहुँचाई ॥८५३॥ गहो हथ्यार राज सब इंडो । राखो जस तन खंडि बिहंडो ॥ अबै चालि सुरपुर सुख मंडो मृत्युलोक² कै भोग सु इंडो ॥८५४॥ छंद त्रोटक यह बात³ कही चहुवाँन तबै । सुनि साह सबै भर पेलि जबै ॥ करि साज सबै रण मंडि महा । तिन भारथ पारथ जुद्ध सुहा ॥८५५॥ दल संग चढ़े सब सूर असी । सब तोप सु बाँन कमाँन कसी ॥ गजराज अनेक बनाय घने । मनो पावस बहल मेघ तने ॥८५६॥ हय कंद अमंद सु पोन मनो । १ कोड, जोड अंत्यानुप्रास । २ मर्त्यलोक । ३ बत्त ।
१४४ हम्मीररासो बहु दाँमनि सार चमंकि भनो ॥ घन गौर¹ सदायत देखतयं । ध्वज बैरख मंडल लूरत्तयं ॥८५७॥ बिरदावत बृंद कबिंद घने । मनो चात्रक मोर अनंद बने ॥ बगपंति सुदंति अनंत रजे । धुरवा करि सुंड छुटे भरजे ॥८५८॥ बहै² धार अपार जुधार बही । घन घोर सु नौबति नाद वही³ ॥ कर सोर समोर नकीब चले । यह भाँति दोउ दिस⁴ बीर⁵ मिले ॥८५९॥ करिये हंकार सुबीर चले । ... ... ... ... ॥ कह मीर सिकंदर नेम कियं । सिर नाय सुभाय हुकम्म लियं ॥८६० पहलै पुर जाय सु बीर भगं । रणथंभ कहा हजरत्ति अगं ॥ तुम सेर करथौ वह आप जथा । अब देखहु मोर सुहाथ जथा ॥८६१॥ सु जमीति खधार लई सबही । अरु मीर सिकंदर आय⁶ सही । करि कोप सिकंदर मीर चढ़े । तब राव हमीर कै भील कढ़े ॥८६२॥ तब भोज कही अब मोहिं कहो । १ घन घोर । २ वह सार अपार सु धार हुई । ३ जुई । ४ दल । ५ जोर । ६ आ पठई ।
हम्मीररासो १४५ इतने अब हत्थ हमार लहो ॥ तब राव कही रणथम्भ अगै । दुइ(रहु) जैत अगै सिर भील तगै ॥८६३॥ अर जैत सरन्नि सुराखि तबै । सरि कौन करै तुम्हरी जु अबै ॥ तुम संग रतन्न चितोर गढ़ं । चढ़ि जाहु हमार जु काज बढ़ं ॥८६४॥ सुंनि भोज इसे कहि बैन तबै । यह सीस तुम्हार निमित्त¹ अबै ॥ रणथंभहिं हेत जु सीस दिवै । अब ओर कहा बिन राव जिवै ॥८६५॥ यह औसर फोर बनै कबहीं । हजरत्ति हमीर मिलै जबहीं ॥ कहि बत्त इती जु सलाँम करी । अपनी सब लीन जमीन² खरी ॥८६६॥ सब भील कसे हथियार जबै । निकसे कढ़ि भोज श्रमाँन तबै ॥ कमठा³ कर तीर सम्हार उठे । उत मीर सिक्रंदर आय जुटे⁴ ॥८६७॥ बजि घोर निसाँन प्रमाँन⁵ मिले । दल कोप करे बहु तोप चले ॥ घमसाँन जुबाँन कियौ तबहीं । दुहु सैन सुऐन बने जबहीं ॥८६८॥ गजराज हरौल करे बलयं । १ निमत्त, निमत्य । २ जमीति । ३ कमठार कुठार । ४ उठे, बुठे। ५ श्रमाँन । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१४६ हम्मीररासो उत सार अपार कढ़े दलयं ॥ . सजि भील अनी सुघनी हलकौ । कसि गातिय१ कोप कियौ बलकौ ॥८६९॥ कमठा कर धार अपार बलं । तब भोज मिल्यौ तहँ साह दलं ॥ नट कूदत२ जानि सु ढोल सुरं । बहै३ तीर अमीर सुजानि छुरं ॥८७०॥ करि कोप तबै गजदंत कढ़े । मुरि मूरिय धूरि उपारि बढ़े ॥ सब भीलन४ मत्त सुकोप कियं । जनु भाल बली मुख लंक लियं ॥८७१॥ जनु मार अपार कटार चलैं । बहु मीर अमीर रु भील मिलैं ॥ हजरत्ति सराहत भोज बलं । जनु मानव रिच्छ भिरत्त दलं ॥८७२॥ दोउ भोज सिकंदर मीर जुटे । मुख बानिय मीर अमीर रटे ॥ जब भोज कहै करि वार तुहीं । कहै मीर सिकंदर बूढ़ तुहीं ॥८७३॥ अब तोपर वार कहा करिये । सब लोक अलोक महा भरिये ॥ तब भोज स कोप कियौ रण मैं । करि कोप कटार दियौ तन मैं ॥८७४॥ तन कंगल भेदि धरन्नि पर्यौ ५ । किरवाँन चलाय स मीर हरख्यौ६ ॥
१ कागति । २ कुद्दत । ३ बहु । ४ भिल्लन । ५ धस्यौ । ६ हँस्यौ । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १४७ सिर भोज परयौ धरनी १ तल मैं। धर धावत रुंड लरै २ बल मैं ॥८७५॥ उत मीर सिकंदर भूमि परे ३ । बर हूर ४ . सुदूर सुआनि बरै ॥ परि खेत खधार अपार सबै । बिन सीस पराक्रम भोज अबै ॥८७६॥ भजि साह अनी तजि खेत तबै । परि भोज समाज सबीर सबै ॥ कसमीर अमीर सहस्र पची । सुमिले ५ धर धूर अली सु सची ॥८७७॥ तहाँ भोज स साथि हजार भले । बरि बाल सबै सुर लोक चले ॥८७८॥ दोहरा छंद परे ओज सँग भील भर, सहस दोइ इक ठौर। सहस पचीस कसमीर कै, अरुपँधार भर मौर ६ ॥८७६॥ सहस तीस बंधार कै, ओर सिकंदर मीर। अली सयद् ७ कै संग भट, परे मीर ८ दस भीर ॥८८०॥ भजी फोज पतसाह की, बिकल सकल उमराव । दोय सहस भट भोज सँग, रहे खेत करि चाव ॥८८१॥ चौपाई छंद राव हमीर भोज ढिंग आए। देखि ९ सु भोज नैन जल छाए ॥ तुम सब अमर भए कलि माहीं। १ धरनित्यल । २ भुम्मि लरै चल मैं । ३ भुम्मि गिरे । ४ हूरन । ५ उलटी भइ सेन दिलीस बची । ६ और । ७ सैद । ८ पीर । ६ देखि भोज भरि द्रग जल छाए। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१४८ हम्मीररासो स्वामि काँम सब देह सराहीं ॥८८२॥ जो न सिकंदर साह जु आए । राव हमीर कै सनमुख धाए ॥ देखि साह आपन दल भज्जै । हजरति देखि हमीरह लज्जै ॥८८३॥ राव हमीर खेत महिं ठाढ़े । हजरति अंग कोप अति बाढ़े ॥ कहै साह तब कोप सु बैनं । फिरे सकल नीचे कर नैनं ॥८८४॥ सर्बसु भूमि¹ भोग कर नीके । जंग समय लालच कर जीके ॥ भगे जात जीवत महिं अबहीं । गई बात² बीरन की सबहीं ॥८८५॥ सुन ये बैन बीर खिसयाने । राव हमीर सु जुद्धहिं ठाने ॥ जैन सिकदर साह अमानो । अरु कंधार भीरु³ सब जानो ॥८८६॥ यह हम्मीर राव चहुवाँन । जुरे जुद्ध मनु काल समाँनं ॥ तोप तुपक चहूर सब दगिगय⁴ । कर कृपाँन चहुवाँन सु जगिगय⁵ ॥८८७॥ भुजंगप्रयात छंद परे दोय हज़ार भीलं⁶ समत्थं । तहाँ च्यारि ओर गिरे खेत सत्थं ॥ १ भुम्मि । २ बूड़ि । ३ मीर । ४ दागी, त्यागी । ५ जागी । ६ भिलं । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १४९ परे कासमीरं सहस्र पचीसं । अली सेर मीरं परे संग दीसं ॥८८८॥ तबै साह कोपं किये बैन रीसं । फ़िरे बीर लज्जा समेतं सुदीसं ॥ तबै राव हम्मीर कोपे सुजाँनं । चले¹ संग चहुवाँन बलवाँन राँनं ॥८८९॥ लिये सेन बंधार दो लख जामी । जबै जैन साहं सिकंदर सु नामी ॥ इतै राव हम्मीर कम्माँन लीनी । मनो पथ भारत्थ सारत्थ कीनी ॥८६०॥ लगैं तीर अगं हुवे पार गज्जैं । परैं पील भुम्मी² सु घुम्मैं गरज्जैं ॥ कहूँ पक्खरं³ बाजि फूटैं⁴ सरीरं । छुटैं प्राण बाँन सु लागतं तीरं⁵ ॥८६१॥ जुरे जंग मीरं अमीरं सु फौजं । इतै राव हम्मीर उत⁶ साह फौजं ॥ चढ़े⁷ राव कै रात्रतं जो अमानै । बनै बंगलं अंग जंगं सु ठानैं ॥८९२॥ करैं रंग कै अंग बानै अनेकं । घने केसर' साज लीने सु तेकं ॥ किते बीर तोरा तबल्लं बनाए । घने नेत बंधं गजं गाह लाए ॥८६३॥ किते मौर बंधं सजे केसराँनं । किते बीर बाँके चढ़े चाहुवाँनं ॥ १ चढ़े । २ भूमै सु चक्कर भजैं । ३ पाखरं । ४ फुटैं । ५ मनो मेघ पावस्स बूंदंत नीरं । इसे राव के हत्थ लागतं तीरं । ६ तैं । ७ बढ़े । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१५० हम्मीररासो पढ़ैं पाहिं १ बंदीजनं बृंद भारे । मनो राति जोरंत टूटंत तारे ॥८९४॥ उठी उद्भू मोक्षं लगी नैन आई । उठे रोम अंगं सुजंगं मचाई ॥ उतै साह कीने २ घने गज्ज अग्गौं । मनो पाय चल्लैं पहारं सु मग्गौँ ॥ तिन्हैं उप्परैं साह ३ कै बीर धाए । गही तेग हत्थं उरं कोप छाए ॥८६५॥ इतै राव चहुवाँन कै बीर कोपे । मनो आजही साह कै बीर लोपे ॥ गर्जै सो हमीरं लखैं खेत राजैं । सबै सूर वीरं निसान्नं सु बाजैं ॥८९६॥ किते चाहुवानं पिले डाल पीलं । उठावंत मारंत पारंत ढीलं ॥ कहूँ सुंडि पै तेग बाहंत ऐसा । मनो रंभ भंभं कढैं तंग जैसी ॥८६७॥ कटैं दंत मातंग भाजत ३ जंते । गहैं पुच्छ सुईं पटकंत केते ॥ परैं पील पब्बत मनौ खेत भारी । बहैं रक्त ४ घावं मनो घाव कारी ॥८६८॥ तिहौं काल कबिराज उपम बिचारी । बहैं स्याम पब्बौ सु गेरू पनारी ॥ किते बाजि राजं पटकंत भूमैं । भए अंग भंगं खरे घाव घूमैं ॥८६६॥ कढ़ी तेग बेगं लपटं सु जानो ।
१ ताहिं । २ कीनं । ३ भज्जंत । ४ रत्त । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १५१ मनो ग्रीषमं लाय लग्गी सुमानो ॥ जुटे बीस बीरं गहीरं सु गज्जैं । ० भजे कायर१ खेत छंडे सु लज्जैं ॥६००॥ कटे सीस बाहू कहूँ पाव ऐसे । बहैं तेग बेगं मनो ढार जैसे ॥ लगैं कंध ग्रीवा तबै सीस टूटैं२ । परै सीस धरनी तबै रुंड झूटैं३ ॥६०१॥ घने सीस तरबूज से भुम्मि डारैं । लरैं रुंड खेतं सिरं हक्क४ मारैं ॥ चहैं बाँन किरवाँन५ बज्जन६ सारैं । मनो काठ काटंत७ कष्टे कुद्दारैं ॥६०२॥ बहैं सील अंगं परैं पार होई । मनो रुंड मैं नाग लपटंत सोई ॥ कटारी लगैं अंग दीसंत पारं । मनो नारि मुग्धा कढ्यौ पानि बारं ॥६०३॥ छुरी वार सूरं करैं जार ऐसे । मना सपंनो पुच्छ दीखंत जैसे ॥ लगैं जोर सों यों विषाएं जवाँन । हुवैं अंग पारं जुटैं जर बाँनं !६०४!। भए लत्थ वत्थं दुहूँ सेन ऐसे । मनो यों अधारे भिरे मल्ल जैसे ॥ पछारैं उखारैं भुजा सीस सूरं । उछारैं८ हँकारैं उठैं९ बीर नूरं ॥६०५॥ मची मांस मेदं धरा कीच भारी । १ कातरं । २ दुट्टैं । ३ झुटूटैं । ४ हाँक । ५ कम्माँन । ६ बाजंत । ७ कष्ट, कष्टंत । ८ उछल्लैं, हकल्लैं । ६ उडैं । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१५२ हम्मीररासो चली मुट्ठि खेतं नदी मैं १ अकारी॥ बनैं कूल पीलं सुडोलं सु बग्गी। बहै बांच २ लोहू जलं धार गज्जी। ॥६०६॥ रथं चक्र आवर्त्त सो भौर मानो। घनं धंस बेला कुलं रूप मानो॥ नरौ ग्राह पावं करं खर्प जैसे। बनी अंगुरी मीन झींगा सु तैसे॥६०७॥ बहैं सीस इंदोवरं जानि फूले ३। खुले नैन यों चंचरीकं सु भूले॥ सिवालं सु केसं सुबेसं विराजैं। बने घाट बीसों खरे सूर गाजैं ॥९०८॥ भरैं जुगनी खप्परे सूर लोहो। मनो गाम बामा पनीहार सोही॥ करैं केलि भैरव हरं संग काली। मनो न्हात बैसाष कात्तिकवाली॥६०९॥ इसे घाट ओघाट ४ किन्ने ५ हमीरं। डरै कायर ६ साह कै मीर पीरं॥ भजी साह सेना सबै लाज डारी। भिरे खेत चहुवाँन गज्जंत ७ भारी ॥९१०॥ किते गिद्ध जंबू करालं सु चिल्ली। बगं ८ हंस केते बिहंगं सु झिल्ली॥ परे खेत साहं सिकंदर सु नामी। सवा लक्ख कंधार कै मीर बामी ॥९११॥ गिरे खेत हथ्थी ९ सतं पौन ऐसे।
१ बह। २ बिच्चि। ३ फुल्ले, भुल्ले अंत्यानुप्रास। ४ घट्ट औघट्ट। ५ कीने। ६ कातरं। ७ गाजंत। ८ वकं। ६ हाथी। CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
[Page Header] हम्मीररासो १५३
मनो पब्वतं¹ अंग दीखंत जैसे ॥ कसे साठि² हौदा परे खेत माहीं । ज़रावं जरं कंचनं कै सुमाहीं । ६१२॥ परे डंबर' सौ कई गज्जराजं । कई प्राणहीनं कई मो समाजं ॥ परे सत पंचं निसानन्नवारे । किते फग्जराजं परे खेत भारे ॥९१३॥ सवा लक्ख बाजी परे जे अमाँनं । परे खेत साहं सिकंदर सुजाँनं ॥ तिनै साह³ लक्खं बँधारं सवायं । परे एक⁴ लक्खं दिलीसं सुपायं ॥९१४॥ दुहूँ इक्क⁵ मीरं परे खेत नामी । कहूँ नाँम ताकै परै खेत बामी ॥ परे दूसरे मीर सिर खाँन भारी । रहे खेत महरम्म खाँनं सुधारी ॥ ९१५॥ परे जौमजादेन से मीर नामी । मोहोबत्त मुद्दफ्फर परे इक्क ठामी ॥ परे नूर मीरं अफर्रस्स धोरं, । बली इक्क निज्जाँम दीनं सु पीरं ॥९१६॥ परे मीर एते दुहूँ खेत सूरं । बहै नोर ड्यों रक्त⁶ बाहंत कूरं⁷ ॥ नची जुग्गनी और भैरव सु नच्चैं । भखैं गिद्ध आमिष जंबू सु रुच्चैं ॥९१७॥ थके सूर रथ्थं सु जाँमं सवायं । महाबीर घायं स घूमंत तायं ॥
[Footnotes] १ पब्वयं । २ सट्ठि । ३ सांत । ४ इक्क । ५ एक । ६ रक्त । ७ सूरं, पूरं । CC Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१५४ हम्मीररासो बरै अच्छरी सूर१ बीरं सु अच्छे । खुले मोक्ष२ द्वारं प्रबेसंत गच्छे ॥१९८॥ भयौ मंडलं कुडलं भाँन नहं । कढ़े सूर बीरं सु धीर उपहं ॥ महा रौद्र भौ खेत देखत जानो। कियौ अद्भुतं देव सो जुद्ध मानो३ । १९९॥ परे खेत खंधार मीरं सु राते । इके लक्ख हज्जार पंचास४ जाते ॥ इतै सूर हम्मीर कै संहस च्यारं । सु तो बीर धीरं खुले मोक्ष द्वारं ॥९२०॥ दोहरा छंद तब हमीर हर ध्याँन करि, हर हर हर उच्चारि। गज निज सनमुख५ पेलि कै, जुरे६ साह सौं रारि ॥९२१॥ त्रोटक छंद गजराज हमीर सु पेलि७ बरं । मुख तै उचरंत सु भाव हरं ॥ किरवाँन८ कढ़ी वलवाँन हथं । सनमुख्खं सु साहि सु बोलि९ जथं ॥९२२॥ सुनिये सु अलावदि बैन अयं । करि द्वंद सु उद्व सु जुद्ध धयं ॥ सब सेन कहा करिहैं सु सुधं । हम आपन१० इक्क११ करैं सु जुधं ॥६२३॥ दुहुँ ओर उछाह अथाह सजे ।
१ आय । २ मोच्छि । ३ जानौं । ४ पच्चीस । ५ सम्मुख पेलि कै । ६ जुरिग, जुरिउ । ७ पिल्हि । ८ कम्माँन चढ़ी । ६ बुल्लि गयं। १० अप्पन । ११ एक । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
हम्मीररासो १५५ हजरत्ति सु कोप अकथ्य¹ रजे ॥ सनमुख हमीर सु आय² जुटे। सब सथ्य जथारथ बेग³ हटे ॥९२४॥ तिहिं खेत⁴ खरे⁵ चहुवाँन नरं । पतिसाह सबै दल भज्जि⁶ भरं ॥ रहे मीर . उजीर कछूक तवै । चहुवाँनन कै दल देखि⁷ जबै ॥९२५॥ पतिसाह कही यह कौन बनी । सब सैन बड़ी⁸ चहुवाँन तनी ॥ तब मंत्र वजीर सु एमि कह्यौ⁹ । तुम मित्र सदा गुन जानि लह्यौ ॥६२६॥ सुनिराव सु दूत पठाय दयौ । चहुवाँनन सों हित जानि ठयौ ॥ अब¹⁰ विग्रह छाड़ि¹¹ सु संधि करो । चहुवाँनन सों हित जानि डरो¹² ॥ अपराध हमें सब दूरि करो । तुम होहु अभै हम कूच धरो ॥९२७॥ नृप सों चर जाय कही तबहीं¹³ । सुनि राव यहै मुख वत्त¹⁴ कही ॥ अब खेत चढ़े कछु संधि नहीं । यह बत्त हमारि सुजानि सही ॥९२८॥ रिपु तैं बिनती¹⁵ सुइ कातरता । १ अगत्थ । २ आनि । ३ देखि । ४ अत्त, ग्रत्थ, ग्रर्थं । ५ अरे । ६ भाजि । ७ दिक्खि, पिक्खि । ८ बढ़ी । ६ कियौ, लियौ अंत्यानुप्रास । १० व्यग्रह । ११ छंदि । १२ दुहुँ ओर महा सुख भूरि भरो । १३ जबही । १४ ब्रात । १५ बिन्नति । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri
१५६ हम्मीररासो अब १ बृत कहे छल चातुरता । अब जाहु यहाँ हम सेन सजी । बिन साह को जुद्ध करंत ज़जो ॥९२९॥ वचनिका • अब राव हम्मीर दूत कौं नीति सहित२ उत्तर दियौ अरु युद्ध को उछाह कियौ आपणां उमरावों सों कही आयुध ३ छत्तीस ४ सों च्यारि आवधां सूं युद्ध कीजे५ अर जग मैं अमर जस लीजे ॥ तोप, बाण, चादरि, हथनालि, जंबूर, बंदूक, तमंचा, कमाँन, सेल इन६ नै त्यागो । अरु आयुध च्यारि लीजे । तरवारि, छुरी, कटारी, बिषाण, मल्ल युद्ध करि हजरति नै हाथ दिखावो तौ सायुज्य मुक्ति पावो ॥ पातसाह की ज्यान बखसीस करो और अच्छरी ७ बरो यह हम्मीर की आज्ञा साथै धरि राव हम्मीर कै उमरावाँ केसरिया साज बणाया अरु बेहरा बाँधि पातसाह की फौज परि हाँको८ कियौ ॥ त्रोटक छंद कछु जंत्र न तोप न' कंत९ नहीं । तजि चापन चक्रन बाँन जिहीं ॥ किरवाँन१० लई कर बाजि चढ़े । चहुवाँन अमाँन सुखेत बढ़े ॥९३०॥ उत मीर बजीर रु साहि निजं । करि कोप तबै पतिसाह सजं ॥ तरवारि दुधार अपार बहै । सब साहि सु सैन समूह दहै ॥९३१॥
• १ अरु नृत्य ( व्यर्थ ) । २ संजुक्त । ३ आयुध । ४ छः तीस मैं । ५ किजिये । ६ यन । ७ अप्छरा । ८ हल्लो । ९ रुकंत । १० कम्माँन ।
हम्मीररासो १५७ कटि ग्रीव भुजा धर यों बिफरे १ । मनु काटि करे रस कृत्त हरे ॥ उड़ि रन्थ परे धर रुंड उठे। २चहुवाँन धरासह धार उठे ॥९३२॥ सिर मारत हाँक३ परे धर मैं। धर जुझत जुद्ध करै अरमैं ॥ कर जोर कटार सु अंग बहैं। बहु खंजर पंजर देह दहें ॥९३३॥ बहु रंचक४ मुष्ट कबन्ध परै५ । मल जुद्ध समृद्ध सुबीर करै ॥ पचरंग अनगिय खेत बन्यौ। बकसी६ तब साह सों बैन भन्यौ ॥९३४। भयभीत सु साह की फौज७ भगी । घमसाँन मसाँन सु ज्योति जगी ॥ परियो चकसी लखि नैन तबै । उलटो गज कीन८ सु साह जबै ॥९३५॥ इक संग उजोर९ न और नर । फिरि रोकिय१० साह अनंत भर ।॥ चहुवाँन धरम्म सु जानि कहै। यह मारत साहि सु पाप अहै ॥९३६॥ अभिषेक लिलाट कियौ इन कै। महि ईस कहावत है तिन कै११ ॥ धरि अग्र१२सु साह को पील जबै । १ बिहरे । २ बहु श्रोण धरा जु अपार उठे । ३ हक्क । ४ रंजक । ५ भरैं । ६ बकसी नृप साहि कौ आप हन्यौ । ७ सैन । ८ किन्न । ६ वजीर । १० रुक्किय । १२ विनके । १२ अग्ग । CC-0. Mumukshu Bhawan Varanasi Collection. Digitized by eGangotri