भारतकोश
संग्रह पर लौटें

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

अ० ११ ] भाषाटीकासमेता । ( २९९ ) वभासिकाः॥लोहितं स्रवते सोष्णं पित्तेन गुदजा मताः॥१४॥ सदाहाः कठिना ये तु तत्र पाको विबन्धता ॥ शीतकण्डूसम- स्थूलाः कफेन गुदजा मताः ॥१५॥ सदाहाः सरुजः श्यावाः कण्डूः शोषश्च जायते॥स्रवते सततं रक्तं ते कण्ड्वासृग्भवाऽर्शांसाः ॥१६॥ धान्याङ्कुरसमाकाराः क्रिमयः संभवन्ति च॥वातवर्च- समालिङ्गा गुदजाः संभवन्ति हि ॥ १७ ॥ वक्रास्तीक्ष्णाः स्फुटितवदना दीर्घबिम्बीफलाभाः केचित्सिद्धार्थककणनिभाः कालखर्जूरकाभाः ॥ कर्कन्ध्वाभाःकमलजसमा वा कलम्बेन तुल्या वायोश्चैते मनुजविहिताः सम्भवाश्चार्शसां च ॥१८॥ अब गुदाके रोगके लक्षणको कहते हैं। गुदामें खाज हो,रक्त प्रवृत्त हो,कठोर हो,विषम हो,- दीर्घ हो ये वातसे उपजे गुदाके बवासीरोंके मसोंके लक्षण हैं ॥१३॥ दाहवाली हों विचित्र हों नीलावर्णवाली हों,गरम रुधिर गिरता हो ये पित्तसे उपजे बवासीरके मसोंके लक्षण हैं ॥१४॥ और दाहवाली हों कठिन हों पकी हुई हों विष्टाबन्ध हों शीली हों,और खाजहो समान हों और स्थूल हों ये कफसे उपजो बवासीरकी गुम्हड़ियोंके लक्षण हैं ॥ १५॥ और जो दाहसहित हों, पीड़ासहित हों कपिशवर्णवाली हों, खाज हो, शोष हो और निरन्तर रक्त गिरे ये खाजसहित रक्तसे उपजे बवासीरके लक्षण हैं॥ १६ ॥और धान्यके अंकुरके समान चिह्नवाले क्रिमि हो जाते हैं और वायुके विष्ठाके समान लिंगवाले होते हैं ॥ १७ ॥ और टेढ़े, खुले हुए मुख- वाले, तीक्ष्ण, बड़े गूलरके फलके समान तेजवाले, कलौंजीके समान आकारवाले और कुछ काली खजूरीके समान आकारवाले और कुछ बेरके समान आकारवाले अथवा सिरसमके फलके समान आकारवाले तथा कमलगट्टाके समान आकारवाले ऐसे मस्से वायुसे उत्पन्न हुए बवासीरके होते हैं ॥ १८ ॥ अथ अर्शके स्थान । गुदे नासिकायां च कर्णे मुखे वा तथा नेत्रकोणे च योन्यन्त- रे वा ॥ असाध्या भवन्तीह रोगा नराणां क्रिया यत्नतस्तत्र सम्यग् विधेया ॥ १९ ॥ और गुदा, नासिका, कान, मुख, नेत्रोंके कोणमें, योनिका मध्य इन्होंमें मनुष्योंके अर्श- रोग होते हैं सो साध्य नहीं हैं वहां यत्नसे क्रिया करनी चाहिये ॥ १९ ॥

( ३०० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ गुदामें अर्शका स्थान । त्रिवलीगुदमध्ये तु बाह्यतोऽभ्यन्तरेषु च ॥ अर्शासां तु विजा- नीयात्रीणि स्थानानि चैव हि ॥ २० ॥ बाह्यतः सुखसाध्यः स्यान्मध्ये कष्टेन सिध्यति ॥ असाध्योऽन्तर्वलीजातो गुदजो भिषजां वर ॥ २१ ॥ गुदाके बाहिर और भीतर त्रिवली होती है सो बवासीरोंके तीन स्थान हैं ॥ २० ॥ बाहिरके स्थानका बवासीर सुखसाध्य है और जो मध्यमें हो वह कष्टसाध्य होता है और जो गुदाके अन्तर्वलीमें हो वह असाध्य रोग कहा है ॥ २१ ॥ अथ अर्शकी चिकित्साका प्रकार । प्रलेपवर्त्तिभिः स्वेदैर्बाह्याः सिध्यन्ति चोत्तमाः॥यन्त्रशस्त्रेण मध्यास्तु अन्तर्जाश्चान्तरौषधैः ॥ २२ ॥ तस्मात्पुत्र प्रयत्नेन क्रिया कार्या विजानता ॥ येनातुरस्य रक्षा स्याद्येन रोगो निवर्त्तते ॥ २३ ॥ प्रलेप, बत्ती लगाना, स्वेद इनसे बाहिरकी पिण्डिका सिद्ध होती है और गुदाके मध्यके मस्सॉको यन्त्र शस्त्रसे सिद्ध करे और अन्तर भीतरके बवासीरको औषधोंसे सिद्ध करे ॥२२॥ हे पुत्र ! इस वास्ते जानते हुए वैद्यको ऐसी क्रिया करनी चाहिये कि, जिससे रोगीकी रक्षा हो जावे और रोग निवृत्त होवे ॥ २३ ॥ अथ अर्शरोगके उपद्रव । करचरणमुखे वा नाभिमेट्रे गुदे वा भवति हि यदि पुंसां शोफ- शोषो ज्वरश्च ॥ श्वसनतमकच्छर्दिर्मोहहृत्पार्श्वशूलं कृशमरु- चिविबन्धश्चातिसारोपसर्गाः ॥ २४ ॥ इत्येवं द्वादशार्शासां संभवन्ति ह्युपद्रवाः ॥ उपद्रवैर्विना साध्या न साध्या बहू- पद्रवाः ॥ २५ ॥ यदि मनुष्योंके हाथ, पैर, मुख, नाभि, लिंग, गुदा इनमें शोजा और शोष हो तथा ज्वर हो, श्वास हो, अन्धेरी आवे, छर्दि हो, मोह हो, हृदयमें पसलीमें शूल हो, दुर्बलता, अरुचि, मलका बन्धा, अतिसार ये होवें तो ॥ २४ ॥ ये बारह प्रकारके बवासीरके उपद्रव जानने । उपद्रवोंके बिना तो बवासीर रोग साध्य है और उपद्रवोंसहित बवासीर असाध्य है ॥ २५ ॥

अ० ११ ] भाषाटीकासमेता । ( ३०१ ) अथ असाध्य अर्श । शूलारोचकतृष्णार्त्ताश्चातिरक्तप्रवाहवान् ॥ शूलशोफातिसारार्त्तो ध्रुवं न जीवतेऽर्शसा ॥ २६ ॥ शूल, अरुचि, तृषा इनकी पीड़ावाला और रक्तके प्रवाहवाला, शोजा अतिसार इनकी पीड़ासेयुक्त ऐसा अर्शरोगवाला पुरुष नहीं जीवता है ॥ २६ ॥ अथ पाचनक्वाथ । अतोऽर्शासां प्रवक्ष्यामि क्रियां चैव भिषग्वर॥वटिकाक्षारशस्त्राणि येन संपद्यते सुखम् ॥२७॥ अर्शासां च क्रियाः प्रोक्ताश्चार्शोघ्ना बलवर्द्धनाः ॥ पित्तशोणितशमना न च वातप्रकोपनाः॥२८॥ तस्यादौ पाचनं श्रेष्ठं ततो भेषजमाहरेत् ॥ पथ्यामृता च धनिका पाने क्वाथो गुडान्वितः ॥ २९ ॥ हे उत्तम वैद्य ! अब बवासीररोगोंकी क्रियाको कहते हैं गोली, क्षार, शस्त्रक्रिया इन इला- जोंसे सुख होता है ॥ २७ ॥ अर्शरोगोंको नाशनेवाली और बलको बढ़ानेवाली अर्शरोगकी क्रिया कही है जो क्रिया रक्तपित्तको शांत करनेवाली और वातको कोप नहीं करनेवाली हो सो करनी चाहिये ॥ २८ ॥ बवासीरकी आदिमें पाचन औषध करे पीछे अन्य औषध करे और हरड़ै, गिलोय, धनियां इनका क्वाथ बना उसमें गुड़ मिला पीना चाहिये यह पाचन औषध कहा है ॥ २९ ॥ अथ कल्कयोग । दन्ती विडङ्गमगधा धान्या भल्लातकं कुष्ठगुड़ं तिलं वा ॥ एषां च कल्कः पयसा प्रयुक्तः निहन्ति पाने गुदजांश्च रोगान् ३० जमालगोटाकी जड़, वायविडंग, पीपली, धनियां, भिलावा, गुड़, तिल, कूठ इनका कल्क बना दूधसे युक्त कर भक्षण करनेसे गुदाके रोगोंको नाशता है ॥ ३० ॥ नागरपिप्पलिबिल्वविडङ्गं शटचभया त्रिवृता पयदन्ती ॥ कल्कमिदं सगुडं प्रतिपाने वार्शसि नाशनकारि नराणाम्३१ सोंठ, पीपली, बेलगिरी, वायविडंग, जमालगोटाकी जड़, कचूर,हरड़ै निशोथ और जमाल- गोटा इनका कल्क बना गुड़ मिला खानेसे मनुष्योंके बवासीररोगोंका नाश होता है ॥ ३१ ॥ अथ पत्रकादिक्वाथ । पत्रककेसरशुण्ठिसमैलातुम्बुरुधान्यविडंगतिलानाम् ॥ क्वाथो हरीतकिसर्पिर्गुडेन पीतो निहन्ति गुदे गदजानि॥३२॥

( ३०२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- तेजपात, नागकेशर, सोंठ, इलायची, धनियां, वायविडंग, तिल, हरड़ै इनको समान ले और धनियांको दो भाग ले फिर काथ बना गुड़ मिलाके पीनेसे गुदाके रोगोंका नाश होता है॥३२॥ अथ पिप्पल्यादियोग । पिप्पलिकामभयां गुडयुक्तां प्रातरिमां यदि खादति कश्चित्॥ तस्य गुदागतकीलकमाशु निहन्ति सकामलपाण्डुजरोगान् ३३ पीपल, हरड़ै इनको गुड़में मिला प्रातःकाल जो मनुष्य भक्षण करता है उसका गुदकीलरोग शीघ्रही नष्ट होता है और कामला, पांडु इन रोगोंके समूहोंका नाश होता है ॥ ३३ ॥ अथ वार्त्ताकयोग । सुस्विन्नवार्त्ताकफलस्य तोयं दध्ना सिताह्वासलिलामृतेन ॥ पाने विधेयं गुदकीलकानां क्रिमीन्निहन्यात्क्रिमिजांश्च रोगान्३४ बैंगने स्वेदित करके इनके जलमें दही और मिसरी मिलाके और अन्यजल मिलावे पीछे इसके पीनेसे गुदकीलरोगका नाश होता है ॥ ३४ ॥ अथ भल्लातकचतुष्टय । भल्लातकाः कृष्णतिलाश्च पथ्या चूर्णं गुडेनापि नरस्य सेव्यम्॥ हन्याच्च पाने गुदकीलमेहशूलार्शकासान् विनिहन्ति तस्य३५ भिलावे, कालेतिल, हरड़ै इनके चूर्णको गुड़के संग खानेसे गुदकीलक रोग दूर होता है और प्रमेह, शूल, बवासीर, खांसी इनका नाश होता है ॥ ३५ ॥ सूरणकन्दकमर्कदलैस्तु वेष्टितमेव हि कर्दमलिप्तम् ॥ तप्तमिदं किल वह्निसमानं भक्ष्यं सैन्धवतैलविमिश्रम् ॥३६ ॥ भक्षति चार्शविनाशनहेतोर्वातविकारहितोऽपि नरस्य ॥ ३७ ॥ जमीकंदको आकके पत्तोंसें लपेट उसपै गारा लीप फिर अग्निमें स्थापित कर देवे, जब तपके अग्निके समान हो जावे तब तैल और सैंधानमक मिला और दूध मिला॥ ३६ ॥ भक्षण करनेसे बवासीर दूर होता है और वायुके विकार भी दूर हो जाते हैं ॥ ३७ ॥ अथ कल्याणनामक लवण । चित्रकपुष्करमूलशटीनां तेषु समांशास्तिला विनियोज्याः ॥ सूरणकन्दखण्डसमेतास्तेषु समोऽग्निफलानि विदध्यात् ॥ ॥ ३८ ॥ सैन्धवं तस्य चतुर्गुणकञ्च भावितमर्कदलेन सम- स्तम् ॥ तञ्च घृतस्य घटे विनिधायारण्यसुगोमयवह्निविप-

अ० ११] भाषाटीकासमेता । (३०३) क्तम् ॥३९॥ क्षीरमिदं लवणाज्यविपक्कं तक्रयुतं प्रतिपानमतो- ऽपि॥ नाशयति गुदकीलककीलान्हन्ति विषूचिभगन्दररोगान् ॥४०॥कामलपाण्ड्वानाहविबन्धान्गुल्ममरोचकनाशनकारी॥ मूत्रगदं गळकण्डूक्रिमीणां नाशनभद्रकसैन्धवो नाम ॥ ४१ ॥ चीता, पोहकरमूल, कचूर इनके समान तिल और जमीकंदके टुकडे और इनके समान मालकांगनी ॥ ३८ ॥ इन सबोंसे चार भाग सैंधानमक इन सबोंको आकके पत्तोंके रसमें भावना दे पीछे इसको घृतके चिकने घड़ेमें घालके आरनोंकी अग्निमें पकावे ॥ ३९ ॥ पीछे इसको दूधमें पकावे । फिर नमक घृत इनमें पका तक्रेके संग पीनेसे गुदकीलरोगोंका नाश होता है और विषूचिका, भगंदर ॥ ४० ॥ कामला, पांडुरोग, आनाह, मलका बंधा, गुल्म, अरुचि इनका नाश होता है और मूत्ररोग, गलरोग, क्रिमिरोग इनको यह कल्याणलवण सैंधव औषध नाशता है ॥ ४१ ॥ अथ भल्लातकवटक। त्रिकटुकमगधानां मूलचित्रं त्रिगन्धं समतुलितममीषां तुल्यम- ल्लातकानि ॥ सकलमिह समन्तादेकतः सम्प्रचूर्ण्य द्विगुणतु- लितमात्रं योजनीयो गुडस्तु ॥ ४२ ॥ सकलमपि विकुव्य स्निग्धभाण्डे निधाय प्रतिदिनमपि सेव्यं चाक्षमात्रं सुधीरैः ॥ गुदजजठररोगं शूलगुल्मान्क्रिमींस्तु जनयति वडवाग्निं हन्ति पांडुं क्षयं वा ॥ ४३ ॥ त्रिकटु अर्थात् सोंठ, मिर्च, पीपल, पीपलामूल, चीता, त्रिगंध अर्थात् दालचीनी, तेजपात, इलायची इनको समान भाग लेवे और सबोंके समान भिलावे लेवे पीछे इन सबोंका एक जगह चूर्ण बना इनसे दूनी मात्रा गुड गेरे ॥ ४२ ॥ पीछे इन सबोंको कूट चिकने बरतनमें घाल घरे फिर धीर पुरुषोंको दिन दिन प्रति एक एक तोला प्रमाण खाना चाहिये यह गुदाके रोग, उदररोग, शूल, गुल्मरोग, क्रिमि, पांडु, क्षयरोग इनको नाशता है और जठराग्निको दीप्त करता है ॥ ४३ ॥ अथ प्राण देनेवाला मोदक। नागरं त्रिफलां चैव पलांस्त्रींश्च प्रयोजयेत् ॥ चतुष्पलानि मरि- चानां पिप्पलीनां पलद्वयम् ॥ ४४ ॥ पलमेकं तु चव्यस्य योज्यं तत्र भिषग्वरैः ॥ तालीसाद्धं पलं देयं पलार्द्धं पद्म-

कस्य च ॥४५॥ जीरकस्य समं मात्रा समेन तुलितो गुडः ॥ सुपक्वा सुघना श्यामा पिप्पलीनां शतत्रयम् ॥ ४६ ॥ उलू- खले क्षोद्यित्वा स्निग्धभाण्डेन धारयेत् ॥ ४७ ॥ अक्षप्रमाणा गुटिका नराणां प्रातः प्रदेया सकलामयघ्नी ॥ निहन्ति चार्शांसि च पाण्डुरोगं हलीमकं कामलकं भ्रमं वा ॥ ४८ ॥ गुल्मातिसारं च सरक्तपित्तं क्षयं क्षतं चाक्षयमस्य यक्ष्मा ॥ जीर्णज्वरारोचक- पीनसानां हितो भवेत्प्राणदमोदकोऽयम् ॥ ४९ ॥ सोंठ, त्रिफला, बारह बारह तोले प्रमाण लेवे, मिर्च १६ तोले लेवे, पीपल ८ तोले ॥ ४४ ॥ चव्य चार तोले लेवे और तालीसपत्र दो तोले, पद्माक २ तोले ॥ ४५ ॥ इन सबोंके समान जीरा और जीराके समान गुड़ लेवे और सुंदर पकी हुई सुंदर कडी और श्यामवर्णवाली ऐसी ३०० पीपल ॥ ४६ ॥ इन सबोंको ऊखलमें कूट फिर चिकने बरतनमें घाल धरें ॥४७ ॥ यह एक तोला प्रमाणकी गोली मनुष्योंको प्रातःकाल देनी चाहिये । यह सब रोगोंको नाशनेवाली है और बवासीर, पांडुरोग, हलीमक, कामला, भ्रम इन रोगोंका नाश होता है ॥ ४८ ॥ और गुल्म, अतिसार, रक्तपित्त, दारुण राजयक्ष्मा, जीर्णज्वर, अरुचि, पीनस इन रोगोंमें यह प्राणद मोदक हित है ॥ ४९ ॥ अथ कांसायनगुटिका । जाजीपिप्पलिमूलकोलमगधापथ्याग्निकं नागराः सूक्ष्मैला च पलद्वयेऽपि क्रमशः कृत्वा पलैः सन्धवम् ॥ भल्लातक्यफलानि पञ्चशतकं तेन समस्तेन तु द्वैगुण्येऽपि पुराणसूरणमतः सर्वस्य तुल्यो गुडः ॥ ५० ॥ क्षोदित्वा वटकाक्षमात्रमुपरि जातो विशेषो गुणः कुर्वन्त्यर्शनिवारणं क्षयमपि पुष्टं तथा सुप्रभम् ॥ मन्दाग्निवर्डवासमो भ्रमहरो हृद्रोगपाण्ड्वामयं शूलानाहभगन्दरो भयहरो दुष्टार्त्तिनिर्वासनः ॥ ५१ ॥ कृतोऽप्यर्थे विकारोऽपि ऋषिणा योगयुक्तिना ॥ काङ्क्षायनेन मतिमांस्तेन सौख्यमभी- प्सति ॥ ५२ ॥ जीरा, पीपलामूल, बेर, पीपल, हरड़ै, चीता, सोंठ, छोटी इलायची इनको आठ २ तोला प्रमाण लेवे और इनके समान सैंधानमक लेवे और पांचसौ भिलावे लेवे और पीछे कही

अ० ११ ] भाषाटीकासमेता । ( ३०५ ) इन सब औषधोंसे दूना प्रमाण पुराना जमीकंद लेवे और इन सब औषधोंके समान गुड़ लेवे ॥ ५० ॥ फिर इन सबोंको कूटके मिला लेवे पीछे १ तोला प्रमाण गोली बांध लेवे । यह गोली अतिविशेष गुणयुक्त है, बवासीररोगोंको निवारण करती है और क्षयरोगवाला सुंदर कांतिसे युक्त पुष्ट हो जाता है, मंदाग्नि अत्यंत तेज होती है, श्रमका नाश होता है और हृदयरोग, पांडु, शूल, अफारा, भगन्दर इनके भयको हरनेवाली है, दुष्ट पीडा बवासीरको नाशती है ॥ ५१ ॥ योगकी युक्तिवाले कांसायनमुनिने उत्तम औषध कहा है, बुद्धिमान् पुरुष इससे सुखको प्राप्त होता है ॥ ५२ ॥ अथ लवणोत्तमादि । लवणोत्तमवह्निकलिङ्गवचाचिरबिल्वमहत्पिचुमन्दयुतम् ॥ पिब सप्तदिनं किल मस्तुजलैर्यदि मर्दितुमिच्छसि पायुरुजाम् ५३॥ सेंधानमक, चीता, इंद्रजव, वच, करंजुवा, वंकायन, इनको सात दिनतक दहीके जलसे पीवे जो यदि वायुके रोगोंको अर्थात् गुदरोगोंको नाशनेकी इच्छा हो तो ॥ ५३ ॥ अथ एलादिगुटिका । विश्वोपकुल्यामरिचानि केशरं पत्रं लवङ्गैलकवृद्धिमाह्वयाः ॥ चूर्णं हितं शर्करयुक्तमेतद्गुदामयानामुदरार्त्तिशान्तये ॥ ५४ ॥ सोंठ १ भाग, पीपल २ भाग, मिरच ३ भाग, नागकेशर ४, तेजपात ५, लोंग ६, इला- यची ७, इनको एकोत्तरवृद्धिभागसे लेवे पीछे इनके चूर्णमें खांड मिला खाना गुदाके रोग और उदरके रोगकी शांतिके वास्ते हित है ॥ ॥ ५४ ॥ अथ अर्शनाशक चतुःसममोदक । सनागरं पुष्करवृद्धदारुकं गुडो नवो मोदकमम्बुदारकम् ॥ अर्शेषु दुर्नामकरोगदारकं करोति वृद्धं सहसैव दारकम् ॥५५ सोंठ, पोहकरमूल, बिदारा ,नवीन गुड, नेत्रवाला,देवदार इन्होंका मोदक खानेसे बवासीर रोगोंका नाश होता है और वृद्ध पुरुष तत्काल बालकसरीखा निरोग या स्त्रीसे युक्त होता है ॥ ५५ ॥ अथ त्रिकटुकाद्यमोदक । त्रिकटुकमभयानां पुष्करं चित्रकाणां कृमिरिपुतिलचूर्णं कारये- त्सद्गुडेन॥उषसि वटकमेकं भक्षयेद्यो मनुष्यो विनिहितगुदरो- गश्चाग्निवृद्धिं करोति ॥ ५६ ॥ सोंठ, मिरच, पीपल, हरडै, पोहकरमूल, चीता, वायविडंग, तिल इनका चूर्ण बना उसमें २०

( ३०६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- गुड़ मिला जो मनुष्य प्रातःकाल इस मोदकको भक्षण करता है उसके गुदाके रोग दूर होते हैं और जठराग्निकी वृद्धि होती है ॥ ५६ ॥ अथ मरिचाद्यमोदक । मरिचं नागरचित्रं सूरणभागोत्तरेण संकुट्य॥सर्वसमो गुडयुक्तो मोदको बिल्वप्रमाणं सेवेत्॥विनिहितपित्तविकारं क्षयति मनु- जानां करोति तनुपुष्टिम् ॥ ५७ ॥ मिरच १ भाग, सोंठ २, चीता ३, जमीकंद ४, इनको एकोत्तरवृद्धिभागसे लेवे फिर कूटके इन सबोंके समान गुड़ मिला मोदक बांध लेवे फिर चार तोला इस मोदकको भक्षण करे यह मोदक मनुष्योंके पित्तके विकारको नाशता है और मनुष्योंके शरीरकी पुष्टि करता है ॥ ५७ ॥ अथ सूरणपिंड । त्रिसमगतसूरणकन्दो लोहितवर्णेन यो भवेन्मतिमान् ॥ षट्- खण्डीकृतवानपि संशुष्कान्षोडशान्भागान् ॥५८॥ तस्यार्द्धेन तुलितश्चित्रकशुण्ठयौ च तत्र संयोज्या॥मरिचस्य चैकभागो गुडेन बद्धस्तु मोदको मनुजैः ॥५९॥ भक्षित एव हि गुणवा- न्निहन्ति सकलान्गुदामयान् ॥ त्वरितमग्नेर्दीपनमुक्तं गुल्मानां जठररुजाम् ॥ ६० ॥ तीनों तरफसे समान और लाल वर्णवाला ऐसे जमीकंदको लेके उसके छह टुकडे बना सुखा लेवे यह जमीकंद सोलहभाग लेना चाहिये ॥ ५८ ॥ और चीता, सोंठको आठ भाग लेवे, मिरच १ भाग लेवे, पीछे इनको गुड़में मिला मोदक बांध लेवे । यह मोदक गुणवाला है ॥ ५९ ॥ और भक्षण किया हुआ गुदाके सब रोगोंको नाशता है, जठराग्निको शीघ्र ही दीप्त करता है और गुल्मरोग, जठररोगको शीघ्र ही नाशता है ॥ ६० ॥ अथ भौमवटक । त्रिफलमगधजानां मूलतालीशपत्रं क्रिमिरिपुमगधानां पुष्करं चेत्समांशः॥मरिचदहनभागश्चैकभागेन शुण्ठी सकलतुलित- तुल्यः सूरणस्यैकभागः ॥६१॥ मदनचपलयुक्तं वृद्धदारैलभृङ्गं कृतमिह परिचूर्ण द्विगुणो शीर्णखण्डः ॥ कृतवटकमुखस्तु प्राश्नुते यो मनुष्यो हरति जठररोगं तस्य चाशु प्रकर्षम्॥६२॥

अ० ११ ] भाषाटीकासमेता । ( ३०७ ) गुदजरुधिरपित्तं कासमन्दाग्निशूलान् क्षयतमकहलीमान् काम- लांश्च क्रिमींश्च ॥ विदधति बलपुष्टिं दापयेच्चाशु मार्गे प्रबल- यति हुताशं योगराजः प्रसिद्धः ॥६३॥ योगराजेन युञ्जीत स्मरणेनाप्यगस्त्यतः ॥ अस्य योगस्य योगेन भीमोऽपि बहु- भक्षकः ॥ ६४ ॥ त्रिफला, पीपलामूल, तालीसपत्र, वायविडंग, पीपल, पोहकरमूलको समान भाग लेवे और मिरच, चीता ये दोनों एक भाग, सोंठ एक भाग और इन सबोंके समान जमीकंद ॥ ६१ ॥ मैनफल, गठोना, विधारा, इलायची, भंगराका चूर्ण और दूनी पुरानी खांड इनका वटक अर्थात् गोली बना जो मनुष्य खाता है उसका जठररोग शीघ्र ही दूर होजाता है ॥ ६२ ॥ और गुदाका रक्तपित्त, खांसी, मंदाग्नि, शूल, क्षयरोग, तमक, श्वास, हलीमक, कामला, क्रिमि, इन रोगोंको नाशता है और बल पुष्टि इनको बढ़ाता है जठराग्निको तेज करता है यह सब योगोंका प्रसिद्ध राजा है ॥ ६३ ॥ इस योगराजको अगस्त्यमुनिका स्मरण करके प्रयुक्त करे । इस योगके प्रतापसे भीम भी बहुत भोजनको भक्षण किया करता था ॥ ६४ ॥ अथ चव्याद्यघृत । चव्यं पाठा त्रिकटु मगधा मूलकस्तुम्बुरूणां बिल्वाजाजीरज- निसुरसा पथ्यया सैन्धवं च ॥ पिष्ट्वा चैतत्समगविघृतं पाचये- त्सुप्रयुक्तं पानाभ्यंगे हरति गुदजान्वातरोग़ाश्मरीं च॥ ६५ ॥ चव्य, पाठा, त्रिकटु "सोंठ, मिर्च, पीपल", पीपलामूल, धनियां, बेलगिरी, जीरा, हलदी, तुलसी, हरड़े, सैंधानमक, इनको पीसके बराबरके गौके घृतमें पकावे । यह घृत पीनेसे और मालिस करनेसे गुदाके रोग, पथरी इनको नाशता है ॥ ६५ ॥ अथ पिप्पल्याद्य तैल । श्यामा कुष्ठं मधुकमदनं पुष्पकं चित्रकञ्च बिल्वं दारु प्रतिवि- षशताह्वाकलिङ्गाशटीनाम्॥पिष्ट्वा तैलं द्विगुणपयसा पाचितं चानुवासे चाभ्यङ्गे वा हितमपि गुदव्याधिनिर्णाशहेतोः॥६६॥ वातव्याधिश्रवणरुधिरे कर्णशूलेऽश्मरीणां जङ्घापृष्ठे कटिशिरः- शिरावेक्षणे वाततोदे॥विष्ठाबन्धग्रहगतगदे मूढगर्भे तथैव श्रेष्ठं तैलं सकलनिचयव्याधिसंधारणेन ॥ ६७ ॥

( ३०८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- पीपली, कूठ, मुलहटी, मैनफल, मैनफलका पुष्प, चीता, बेलगिरी, देवदार, अतीशा, शतावरी, इंद्रजव, कचूर, इनको तैलमें पीस फिर दूने दूधमें पका इसको अनुवासन वस्तिमें और मालिसमें बरतैं । यह गुदाकी व्याधिके नाशके हेतुमें हित है ॥ ६६ ॥ वातव्याधि, कानका रुधिररोग, कर्णशूल, पथरी, जांघ, पीठ, कटि, शिर, इनका रोग, नाड़ियोंका फुरणा, वातकी व्यथा, मलका बंधा इनको नाशता है, ग्रहदोषको दूर करता है, मूढगर्भको दूर करता है, यह तैल संपूर्ण व्याधियोंको नाशता है ॥ ६७ ॥ अथ मुस्ताद्यवटक । मुस्ता विश्वविडंगचव्यकशटी पथ्या च तेजोवती दन्तीन्द्रात्रि- वृता समांशकपली मात्रा च प्रत्येकशः॥तस्मादष्टपलांश्च पुष्क- रमपि षड् वृद्धदारोपलान् युञ्ज्यात्षोडशसूरणाख्यसलिल- द्रोणेऽखिलं कल्कितम् ॥६८॥ भूयो वै विपचेज्जलं त्रिगुणितं चोद्धृत्य तत्रैव हि संयुञ्ज्यात्पुनरेव चित्रकत्रिवृत्तेजोवतीसूर- णम्॥एलापत्रकनागकेशरलवंगानां समं चूर्णितमेषां षोडशभा- गयोग्यविहितं सर्वञ्च तं चैकतः ॥ ६९ ॥ स्थाप्यं स्निग्धघटे प्रभातसमये तं चाक्षमात्रं वटं जीर्णे क्षीरमपि प्रभूतमतिमान् पाने तथा भोजने ॥ अर्शोगुल्मभगन्दरांश्च ग्रहणीपाण्डु तथा कामलां शूलञ्चाथ विबन्धकासक्षतजान् हन्त्याशु यक्ष्मां- स्तथा ॥ ७० ॥ नागरमोथा, सोंठ, वायविडंग, चव्य, कचूर, हरडै, तेजबल, जमालगोटाकी जड़, इंद्रायण, निशोत, इन सबोंको समान भाग चार २ तोला प्रमाण लेवे और पोहकरमूल ३२ तोले लेवे विधारा २४ तोले प्रमाण लेवे, जमीकंद ६४ तोला प्रमाण लेवे फिर इनका कल्क बना १०२४ तो० प्रमाण जलमें पकावे ॥ ६८ ॥ पीछे कडा होजावे तब तिगुना जल मिला फिर पकावे पीछे इसको नीचे उतार इलायची, तेजपात, नागकेशर, लौंग इनको समान भागले चूर्ण बनाके उसमें मिलादेवे और इनका चूर्ण इन औषधोंसे सोलहवां भाग मिलाना चाहिये ॥ ६९ ॥ पीछे इसको चीकने बरतनमें घाल घरे फिर इसको प्रातःकाल एक तोला प्रमाण भक्षण करे पीछे यह चूर्ण जरजावे तब दूध पीवे और भोजनमें भी दूधको बरतैं तो बवासीर, गुल्म, भगंदर, संग्रहणी, पांडुरोग, कामला, शूल, मलका बंधा, खांसी, क्षतजरोग, राजयक्ष्मा, इन रोगोंको नाशता है ॥ ७० ॥

अ० ११ ] भाषाटीकासमेता । ( ३०९ ) अथ भल्लातकगुड । भल्लातकानां द्विसहस्रकाणां द्रोणे जले पाच्यपदावशेषम्॥ क्वाथे तु तस्मिन् विपचेद्गुडस्य तुलाप्रमाणं पुनरेव तत्र ॥ ७१ ॥ भल्लातकानां शतपञ्चकानि तत्रैव संयोज्य पलत्रिकं वा ॥ व्योषं जवानीघन सैन्धवानामेलालवङ्गं दलनागकेशरम्॥ प्रत्ये- ककर्षं तुलितं नियोज्यं न चात्र किञ्चित् प्रविचारणीयम्॥७२॥ संकुट्य तैले घृतभाजने वा स्थाप्यं प्रभाते,वटकप्रमाणम् ॥ भक्षे- द्गुडं यो विनिहन्ति रोगान्भगन्दराशःक्रिमीयक्ष्मपाण्डून् ॥७३॥गुल्माश्मरीमेहहलीमकं वा सरक्तपित्तं ग्रहणीं निहन्ति॥ करोति पुष्टिं बलमातनोति वर्णप्रकर्षं सुखमादधाति ॥ ७४ ॥ दो हजार भिलावोंको १०२४ तोले जलमें पकावे, जब चतुर्थांश बाकी रहे तब उतार उस क्वाथमें ४०० तोले गुड़को पकावे ॥ ७१ ॥ पीछे उसमें पांचसौ भिलावे मिलावे और त्रिफला, सोंठ, मिरच, पीपल, अजवायन, नागरमोथा, सेंधानमक, इलायची, लौंग, तेजपात, नागकेशर, इनको एक २ तोला प्रमाण गेरे ॥७२ ॥ पीछे इनको अच्छी तरह कूटके मिला तैलके अथवा घृतके चीकने पात्रमें घाल धरे पीछे प्रभातसमय इसको वड़ाके प्रमाण भक्षण करे । यह गुड़ भगंदर, बवासीर, क्रिमि, राजयक्ष्मा, पांडु ॥ ७३ ॥ गुल्म, पथरी, हलीमक, रक्तपित्त, संग्र- हणी, इन रोगोंको नाशता है और पुष्टि करता है, बलको बढाता है, वर्णको सुन्दर करता है, सुख करता है ॥ ७४ ॥ अथ अन्यभल्लातकगुड । दशमूलगुडूचीसटीक्षुरकं सहचित्रकभार्ङ्गिफलासहितम्॥ भल्ला- तकपंचशतं प्रदिशेद्विपचेज्जलद्रोणमितेन च तत् ॥ ७५ ॥ गुडजीर्णशतं प्रददेत्कथितमवतार्य्य सुशीतलमेलसमम्॥ दलके- सरभृङ्गलवङ्गयुतं कृतचूर्णमिदं सकलैकमिति ॥ ७६ ॥ घृत- भावितमेकदिनं विदधीद्घृतभाजनके दिनसप्तमिदम्॥ स्निग्धघटे विदधीत मनुष्यो दत्तमिदं गुदजामयसङ्घे ॥७७॥ मोदकमेक- मुषस्सु ग्रसेद्विनिहन्ति गुदामयमेहरुजः ॥ किल कासहलीम- ककामलके हितमेव हुताशनदीप्तिकरम् ॥७८॥ यस्तु शीतजले

( ३१० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- क्षिप्तो जलेनैव विलीयते॥ लोहितो लोहितां याति गुडपाकस्य लक्षणम् ॥ ७९ ॥ दशमूल, गिलोय, कचूर, गोखरू, चीता, भारंगी, त्रिफला, पांचसौ मिलावे, इन्होंने १०२४ तोले जलमें पकावे ॥७५॥ पीछे इस काथमें बराबर पुराना गुड़ मिला पकाके नीचे उतार शीतल हो जावे तब तेजपात, नागकेशर, भंगरा, लौंग इनका चूर्ण बना उसमें मिला ॥७६॥ फिर एक दिनतक घृतमें भावना दे पीछे सात दिनतक घृतके पात्रमें घाल रक्खे पीछे चिकने पात्रमें इसको घाल धरे । इस मोदकको गुदाके रोगोंके समूहोंमें खावे॥७७॥एक मोदक प्रातःकाल खावे । गुदाके रोग, प्रमेह,खांसी, हलीमक,कामला इन रोगोंको नाशताहै और जठरा- ग्निको दीप्त करता है ॥ ७८ ॥ जो जलमें गेरा हुआ डूब जावे और लाल लाल वर्णवाला हो जावे यह गुड़के पाकका लक्षण है ॥ ७९ ॥ अथ भल्लातकावलेह । ग्रन्थिकं चित्रकं मुस्तं चविकं त्रिफलामृता॥सहदेवी गजकर्णा- पामार्गश्च कुठेरकम् ॥८०॥ प्रत्येकं चतुष्पालिकं कल्के द्रोणा- म्भसा सुधीः ॥ द्वे सहस्रे समे पिष्टे भल्लातक्याः फलानि तु ॥ ८१॥ पादावशेषे कल्के च लोहचूर्णं तुलार्द्धकम्॥क्षिपेत्कुड- द्वयं सर्पिः सर्वं चैकत्र घट्टयेत् ॥८२॥ फलत्रिकं तथा व्योषं चित्रकं लवणाष्टकम्॥विडङ्गानि समांशानि सर्वाणि पलमात्रया ॥ ८३ ॥ चतुष्पलं वृद्धदारोर्मूर्वाख्या तु चतुष्पला ॥ संशु- ष्कसूरणं कन्दं चूर्णं चाष्टपलोन्मितम् ॥ ८४ ॥ संक्षिप्य स्वादयेच्चूर्णमवतार्य्य सुशीतले॥स्थापितं मधु संयोज्यं कुड- वद्वयमात्रया ॥८५॥ देयं गुदामये चादौ कल्कमप्रातराशने॥ अर्शांसि ग्रहणीरोगं कामलाराजयक्ष्मणः ॥८६ ॥ गुल्मक्रिमी- नश्मरीं च मन्दाग्निमेहशोणितम्॥नाशयत्याशु यक्ष्माणंकरोति बलमाकृतेः ॥८७॥ आशु वृद्धिं प्रकुरुते वलीपलितनाशनम् ॥ रसायनस्य योगेन नरो नागबलो भवेत् ॥ ८८ ॥ गंठोना, चीता, नागरमोथा, चव्य, त्रिफला, गिलोय, सहदेवी, गजपीपली, ऊंगा, ब्वई ॥ ८० ॥ इन सबोंको सोलह सोलह तोल प्रमाण लेवे पीछे कल्क बना एक हजार

अ० ११] भाषाटीकासमेता । (३११) चौवीस १०२४ तोले प्रमाण जलमें पकावे और दोहजार भिलावोंका कल्क बना उसका काथ बनावे ॥८१॥ जब चतुर्थांश बाकी रहे तब उतार २०० तोले प्रमाण लोहाका चूर्ण मिलावे और ३२ तोले प्रमाण घृत मिला पीछे एक जगह घोट ॥ ८२ ॥ पीछे त्रिफला, सोंठ, मिरच, पीपल, चीता, आठ प्रकारके नमक, वायविडंग इन सबोंको चार चार तोला प्रमाण लेवे ॥ ८३ ॥ और भिदारा १६ तोले, मूर्वा १६ तोले और सूखा हुआ जमीकन्द ३२ तोले प्रमाण लेवे इनका चूर्ण बना उस पाकमें गेर देवे ॥ ८४ ॥ पीछे शीतल हो जावे तब ३२ तोला प्रमाण शहद मिलावे ॥ ८५ ॥ पीछे गुदाके रोगकी निवृत्तिके वास्ते इस कल्कको प्रातःकाल खावे । बवासीर, संग्रहणी, कामला, राजयक्ष्मा इन रोगोंको नाशता है ॥ ८६ ॥ गुल्म, क्रिमि, पथरी, मन्दाग्नि, प्रमेह, रक्तरोग इन रोगोंको नाशता है और बल, आकृति इनको बढाता है ॥ ८७ ॥ धातुओंकी वृद्धि करता है बुढा- पाके सफेद बालोंको दूर करता है। इस रसायनके योगसे मनुष्य हस्तीके समान बलवाला होता है ॥ ८८ ॥ अथ रक्तबवासीरकी चिकित्सा । रक्तार्शसामुपचारं वक्ष्यामि शृणु पुत्रक ॥ प्रातस्तिलान्भक्षयेच्च नवनीतविमिश्रितान् ॥ ८९ ॥ सितानागरकं युक्तं नवनीतं सशर्करम् ॥ केशरं मातुलुङ्गस्य विडंगं शर्करायुतम् ॥ ९० ॥ भक्षेत्कूष्माण्डकालेहं नवनीतेन सशर्करम् ॥ एतेन रक्तगुदजा- ञ्छमयन्ति विचक्षणाः ॥९१॥ समङ्गा शाल्मलीपुष्पं चन्दनं ककुभत्वचम्॥नीलोत्पलमजाक्षीरे पिष्ट्वा पानमसृग्ददे ॥९२॥ कुटजमूलसकेसरमुत्पलं खदिरधातकिमूलशृतं पयः॥ पिबति म्रक्षणयोगमसृग्भवं गुदजनाशनकारिविकारणम् ॥ ९३ ॥ अब रक्तके बवासीरकी चिकित्साको कहते हैं पुत्र ! सुनो, तिलोंको नौनी घृतमें मिला प्रातः भक्षण करे ॥ ८९ ॥ और मिसरी, सोंठ, नौनीघृत, खांड इनको मिला खावे और विजौराकी केशर, वायविडंग, खांड इनको खावे ॥ ९० ॥ अथवा कोहलेको नौनी घृत और खांडके, संग खावे, इन इलाजोंसे वैद्यजन रक्तकी बवासीरोंको शांत करें ॥ ९१ ॥ मंजीठ, सेंवरा पुष्प, चन्दन, अर्जुनवृक्षकी छाल, नीलाकमल, इनको बकरीके दूधमें पीस पीनेसे रक्तके रोगोंका नाश होता है ॥ ९२ ॥ कूडाकी छाल और जड़, कमलकेशर, खैरकी जड़, धवकी जड़ इनमें दूधको पका काथ बना जो मनुष्य पीता है उसकी गुदाके रक्तके रोगोंका नाश होता है ॥ ९३ ॥

( ३१२ ) हारितसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ वर्त्तियोग । कुक्कुटस्य पुरीषञ्च तथा पारावतस्य च ॥ गृहधूमं च सिद्धार्थं धत्तूरकदलानि च ॥ काञ्जिकेन च संपिष्य वर्त्ति सञ्चारयेद्गुदे ॥ ९४ ॥ सूरणकन्दकवर्त्तिर्विधेया मल्लीरसेन घृतेन च लिप्त्वा ॥ रोगगुदे गुदकीलकमाशु नाशयेते गुदजांश्च क्रिमींश्च ॥९५॥ हरिद्रा मार्कवं कुष्ठं गृहधूमं सुवर्चलम् ॥ सिद्धार्थकरसश्चैव काञ्जिकेन च पिष्यते ॥ ९६ ॥ मधुना सह वर्त्तिः स्याद्गुदे सञ्चारिता यदि॥ अर्शासां नाशनं चैव करोति सहसा नृणाम् ९७ मुरगाकी बींट, कबूतरकी बींट, घरका धुवां, सरसों, धतूराके पत्ते, इनको कांजीमें पीस गुदामें बत्ती चढानी चाहिये ॥ ९४ ॥ जमीकंदकी बत्ती बना मोगरीके रससे और घृतसे लीपि गुदामें चढ़ानेसे गुदकीलक, गुदाके क्रिमि उन रोगोंका नाश होता है ॥ ९५॥ हलदी, भंगरा, कूट, घरका धुआं, कालानमक इनको सरसोंके रसमें और कांजीमें पीस ॥ ९६ ॥ पीछे शहद मिला बत्ती बना गुदामें चढ़ानेसे शीघ्र ही बवासीररोगोंका नाश होता है ॥ ९७ ॥ अथ देवदाल्यादि लेप । श्योनाकीपलसम्मितञ्च हुतभुग्व्योर्षै रसानां गणान्षड्ग्रन्थापि- चुमन्दवारिककणा भार्ङ्गीशिला तैलकम्॥ पिष्ट्वा श्लक्ष्णसमस्तका- ञ्जिकयुतं दत्त्वा शिलालेपनं दुर्नामानि निहन्त्यथापि गुदजा- न्सर्वातिसारामयान् ॥ ९८ ॥ सोनापाठा, चीता, व्योष अर्थात सोंठ, मिर्च, पीपल इनको चार २ तोला प्रमाण लेवे पीछे इनका रस निकाल लेवे और वच, नींबी, नेत्रवाला, पीपली, भारंगी, शिलाजीत इनको समान भाग ले पीछे तैलमें और कांजीमें तथा पूर्वोक्त औषधोंके रसमें इनको बारीक पीस शिलापै लीप देवे पीछे शिला ऊपरसे उतार गुदापै लगानेसे बवासीर, सब प्रकारके अतीसार इनका नाश होता है ॥९८॥ अथ अर्शरोगपर शस्त्रादिकर्म । यन्त्रं शस्त्राग्निकार्यञ्च कथितं तन्तु शल्यके॥ यथा यन्त्रेण छिद्यन्ते दाहस्तत्र विrate: ॥९९॥ चर्मकीलं तथा छित्त्वा दग्धं क्षारेण धीमता ॥ पक्वजम्बूंसमो वर्णो क्षारदग्धे प्रशस्यते ॥ १०० ॥ दग्धं वा सूरणक्षारं कदलीजीवमुद्गकैः। पलाशकोकिलाक्षारम-

अ० ११ ] भाषाटीकासमेता । ( ३१३ पामार्गघृतान्वितम् ॥ १०१ ॥ क्षारदाहे प्रशस्येत नवनीतघृतेन वा ॥ कुष्ठं पथ्या तथा निम्बपत्राणि च मनःशिला ॥१०२॥ तस्मान्मधुघृतमिश्रं निर्धूमाङ्गारके क्षिपेत्॥धूपयेद्गुदजांतेनयथा सम्पद्यते सुखम् ॥१०३॥ मनःशिला नागरकं सगुग्गुलं ससा- र्षपम् ॥ देवदारु सपौष्करं विशल्यासर्जजिकारसम् ॥ १०४ ॥ घृतेन धूपयेद्गुदजं गुदामयं भगन्दरम्॥निहन्ति दुष्टपीनसं व्रणं सपूयगन्धिकम् ॥१०५॥ निर्गुण्डीदलशंशुतालमथवा सत्सार्ष- पं चूर्णकं देवाह्वं घृतशर्करामधुयुतं धूपं गुदायां गते ॥ दुर्नामे सरुजे व्रणे च विषमे दुष्टे विसर्पेषु च पामापीनसकासनाशन- करो धूपो ग्रहोच्छेदनः ॥ १०६ ॥ यन्त्र, शस्त्र तथा अग्निकर्म कहा है वह शल्यतन्त्रमें कहा है और जो यन्त्रसे छेदन किया जावे वहां दाह करना चाहिये ॥ ९९ ॥ चर्मकीलको छेदन करके क्षारसे दग्ध करे और जो पक्का हुआ जामनके फलके समान वर्णवाला हो वह क्षारसे दग्ध करना श्रेष्ठ कहा है ॥ १०० ॥ जमीकन्दका खार, केला, जीवक, मूंग इनके खारसे दग्ध करना श्रेष्ठ कहा है और केशु, तालमखाना, ऊंगा इनको खारके घृतमें युक्त कर अथवा नौनीघृतमें युक्त कर ॥१०१॥ क्षारदाह करना श्रेष्ठ कहा है और कूठ, हरडै, नींबके पत्ते, मनसिल ॥ १०२ ॥ इनको शहदमें मिला धूवोंसे रहित हुए अंगारपै गेरे पीछे उससे गुदाके मस्सोंके धूमनी देवे तब रोगीको सुख प्राप्त होता है ॥ १०३ ॥ मनसिल, सोंठ, गूगल, सिरसम, देवदार, पोहकरमूल, कलहारी, साजीखार ॥ १०४ ॥ इनको घृतमें मिला धूप देनेसे बवा- सीरका मस्सा, गुदाके रोग, भगंदर, दुष्टपीनस, रादिकी गन्धसे युक्त व्रण, इनको नाशता है ॥ १०५ ॥ संभालूके पत्ते, तेजपात, हरताल, सरसोंका चूर्ण, देवदार, इनको घृत, खांड, शहदमें मिला धूप देनेसे गुदाके रोग दूर होते हैं। पीड़ासहित बवासीर, विषम और दुष्ट विसर्परोग, पामा, पीनस, खांसी, इन रोगोंको नाशता है और यह धूप ग्रहदोषको दूर करता है ॥ १०६ ॥ अथ अर्शरोगमें पथ्य । एवं क्रियाविधिः प्रोक्तश्चातः पथ्यानि मे शृणु ॥ शालिषष्टिक- मुद्गाश्च कुलत्थाढक्यवास्तुकम् ॥१०७॥ चिल्ली च शतपुष्पा च `` कूष्माण्डकपटोलकम् ॥ कारवेल्लं च तुण्डीरं सूरणो राजिकार्ज-

( ३१४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- कम् ॥१०८॥ गुडस्तक्रं घृतं चैतत्प्रशस्यन्तेऽर्शसां सदा ॥ सूकरः शल्लकी गोधा मूषको वा सरीसृपः ॥ १०९ ॥ लावति- त्तिरवार्त्ताकमांसानि कथितानि च ॥११०॥ वल्लूरमत्स्यदधि- पिच्छलतैल बिल्ववार्त्ताक भोजनमतिप्रतिवर्जनीयम् ॥ नैसर्गिकं निशि दिवा शयनञ्च शीतं शीतान्तमेव परिवर्जितमादरेण १११ इत्यात्रेय भाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने अर्शश्चिकित्सा नामै- कादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ इस प्रकारसे क्रियाओंकी विधि कही है । अब पथ्यवस्तुओंको कहते हैं-सालिसंज्ञक चावल, सांठी चावल, मूंग, कुलथी, तुरीधान्य, बथुवा ॥ १०७ ॥ चिल्लीशाक अर्थात् बथुवाके भेद, सौंफ, कोहला, परवल, करेला, तोरी, जमीकंद, सिरसमकी डांकल इनका भोजन और शाक हित कहा है ॥ १०८ ॥ गुड़, तक्र, घृत ये बवासीरवालोंको हित हैं और शूकर, शेह गोह, मूंसा, सर्प आदि ॥ १०९ ॥ लावा, तीतर, बत्तक, इनके मांस, पथ्य कहे हैं॥११०॥ सूखा मांस, मत्स्यका मांस, दही, झागोंवाला, पदार्थ, तैल, बेलगिरी, बत्तकका मांस, इनका भोजन नहीं करे और रात्रिमें प्रकृतिके अनुसार शयन करे, दिनमें नहीं सोवे और शीतल पदार्थोंको वर्ज देवे ॥ १११ ॥ इति बेरीनिवासिबुधाशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादि- तहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ द्वादशोऽध्यायः १२. अथ खांसीकी चिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ अथ वक्ष्यामि कासानां निदानं सचिकित्सि- तम् ॥ कासांश्चाष्टविधांश्चैव शृणु पुत्र महामते ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-इससे अनन्तर कास अर्थात् खांसीरोगोंका चिकित्सासहित निदान कहते हैं, खांसी आठ प्रकारसे होती है सो हे पुत्र ! हे महामते ! सुनो ॥ १ ॥ अथ कासरोगके हेतु । हास्यात्प्रहास्यरजसानिलसंनिरोधान्मार्गेऽप्यतीव गमनादथ भोजनस्य ॥ वेगावरोधनिरतात्क्षवथोस्तथैव संजायतेऽपि मनुजां प्रतिधाम कासः ॥ २ ॥ संसेवनान्मधुरपिच्छलजाग-

अ० १२] भाषाटीकासमेता । (३१५) रेण स्वप्नैर्दिवातिदधिगौलयहिमाशनैेन ॥ संजायते मदनतैल- मथाल्पकन्दी मद्येन वा किल कफस्य जर्निर्नियुक्ता ॥ ३ ॥ हास्यसे, हँसीके और वायुके रोकनेसे, मार्गमें विशेष गमन करनेसे, भोजनका वेग रोकनेसे, छींकके रोकनेसे, मनुष्योंको खांसी रोग होता है ॥ २ ॥ मधुर तथा झागोंवाले पदार्थके सेवनेसे, जागनेसे, दिनमें सोनेसे और अत्यंत दही, गुल्ली बंधनेवाला पदार्थ, ठण्डा पदार्थ इनके भोजन करनेसे तथा मैनफल, तैल, अल्प कंद, इनके भक्षण करनेसे, मदिरा पीनेसे खांसीमें कफ उत्पन्न होता है ॥ ३ ॥ अथ कासरोगकी संप्राप्ति । ऊर्ध्वं गतोदानविपर्ययेण कफेन प्राणानुगतेन दीर्घः ॥ हृदं निरेत्य कफकासकण्ठे करोति तेनापि च काससंज्ञाम् ॥४॥ कंठमें रहनेवाला उदानवायुके विपरीत होजानेसे कफके संग प्राणवायुके दीर्घ संग होनेसे हृदयमें प्राप्त हुआ कफ खांसीके संग कंठमें प्राप्त हो जाता है उससे खांसी रोग होता है ॥ ४ ॥ अथ कासरोगके प्रकार । कासाश्चाष्टौ समुद्दिष्टाः क्षतजोऽन्यः प्रकीर्तितः॥ वातिकः पैत्ति- कश्चैव श्लैष्मिकः सान्निपातकः ॥५॥ वातपित्तसमुद्भूतः श्लेष्म- पित्तसमुद्भवः॥ सप्तमो लोहितेनात्र चाष्टमो जायते क्षयात् ॥६॥ न वातेन विना श्वासःकासो न श्लेष्मणा विना॥ न रक्तेन विना पित्तं न पित्तरहितः क्षयः ॥७॥ कथितः सम्भवः श्वासस्यातो वक्ष्यामि लक्षणम् ॥ येन संलक्ष्यते नृणां कासश्चाष्टविधः परः ॥ ८ ॥ खांसी आठ प्रकारसे भी होती है, एक खांसी क्षतज होती है, वातसे १, पित्तसे २, कफसे ३, सन्निपातसे ४, वातपित्तसे ५, कफपित्तसे ६ और सातमी रक्तसे और आठमी क्षयसे होती है॥ ५॥ ६ ॥ वातके विना श्वास नहीं होता, कफके विना खांसी नहीं होती, रक्तके विना पित्त नहीं होता, पित्तके विना क्षयरोग नहीं होता यह सिद्धान्त है ॥ ७ ॥ श्वासकी उत्पत्ति तो कह दी है अब लक्षण कहते हैं जिससे मनुष्योंको आठ प्रकारकी खांसी जानी जावेगी ॥ ८ ॥

( ३१६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ वातसे उपजी खांसीके लक्षण । क्षीणेन्द्रियः पार्श्वरुजोऽतिवेगः शूलावृत्तो वा गलके च बद्धः॥ निद्राकृतिर्भिन्नरवो मनुष्यो वातेन कासस्य भवेत्प्रकाशः॥९॥ इंद्रिय क्षीण हों, पसलीमें पीडा हो, अत्यंत वेग हो, शूल हो, गलबंधा रहे, निद्रासी आवे स्वर फटा रहे तो वातसे उपजी खांसी जाननी ॥ ९ ॥ अथ पित्तसे उपजी खांसीके लक्षण । कण्ठे विदाहो ज्वरशोषमूर्च्छास्तृष्णाभ्रमः पित्तभवे च कासे ॥ आस्ये कटुत्वं च शिरोऽर्त्तिपित्तं निष्ठीवते पीतनखानि नेत्रे १० कंठमें दाह हो, ज्वर, शोष, मूर्च्छा, तृषा, भ्रम ये हों तब पित्तसे उपजी खांसी जाननी और मुखमें कडुआपान हो, पित्त थूके, शिरमें पीडा हो, नख, नेत्र ये पीले रहें ॥ १० ॥ अथ कफकी खांसीके लक्षण । जाड्यं वमिः पाण्डुभवं च कासं निष्ठीवते यः सघनं कफं वा ॥ भक्तारुचिर्वा कफपूर्णदेहे घनःस्वरःश्लेष्मभवे च कासे॥११॥ जडता हो, वमन हो, पिलास लिये सुफेद और चिकना करडा कफ थूके, भोजनमें अरुचि हो, कफसे पूर्ण शरीर हो, भारी स्वर हो, ये कफसे उत्पन्न हुई खांसीके लक्षण हैं ॥ ११ ॥ अथ त्रिदोषकी खांसीके लक्षण । कण्डूदाहश्वासच्छर्द्दिशोषारोचकपीडिताः ॥ शिरोऽर्त्तिशोफह्र- ल्लासःकासे त्रिदोषसम्भवे॥१२॥कासः कण्डूःपिपासा च कुक्षि- शूलो विनिद्रता ॥शुष्ककासःपिपासा च वातपित्तोद्भवः कफः ॥१३॥ धूमगन्धः पीतवर्णोऽक्षिप्रपाकी सरक्तकः ॥ रक्तनेत्रः पिपासाद्यः पित्तश्लेष्मान्वितः कफः ॥ १४ ॥ खाज हो, दाह हो, श्वास हो, छर्दि हो, शोष हो, अरुचिकी पीडा हो, शिरमें पीडा हो, शोजा हो, थुकथुकी हो, ये त्रिदोषसे उपजी खांसीके लक्षण हैं ॥१२॥ खांसीकी धसक हो, खाज हो, तृषा हो, कुक्षिमें शूल हो, निद्रा नहीं आवे, सूखी खांसी हो तो वातपित्तसे उपजा कफ अर्थात् खांसी जाननी ॥ १३ ॥ धूवां सरीखी गंध हो, पीला वर्ण हो, आंखि पकजावें, कफमें रक्त, अति लाल नेत्र हो तो पित्तकफसे उपजी खांसी जाननी ॥ १४ ॥ अथ क्षतजखांसाक लक्षण । व्यवायातिप्रसङ्गेन वेगरुद्धाभिघातकः ॥ भारोद्धरणयातेन

अ० १२ ] भाषाटीकासमेता । ( ३१७ ) जायते क्षतजः कफः ॥१५॥ तेन हृदि व्यथा रूक्षं कासते च स- शोणितम्॥श्वासः संक्षीयते गात्रं दीनो मन्दज्वरातुरः ॥१६॥ वेपते पर्वभेदश्च मोहभ्रमनिपीडितः । एवं क्षतजनिर्दिष्टो नृणां प्राणापहारकः ॥ १७ ॥ मैथुनके अत्यंत प्रसंगसे, वेगके रोकनेसे, अभिघातसे और बोझाके उठानेसे क्षतसे उपजा- हुआ कफ जानना ॥ १५ ॥ उस करके हृदयमें पीडा हो, रूखी खांसी आवे अथवा खांसीमें रक्त आवे, श्वास हो,गात्र क्षीण हुआजावे,गरीब रहे, मंदज्वरकी पीडा रहे, कंपना रहे, हड्फूटन हो, मोह, भ्रम, इनकी पीडा हो ऐसे मनुष्योंके क्षतज अर्थात् चोटसे उपजीहुई खांसी जाननी यह प्राणको हरनेवाली खांसी है ॥ १६ ॥ १७ ॥ अथ रक्तकी खांसीके लक्षण । अल्पायासात्क्षतात्क्षीणात्संपातात्क्षणभोजनात्॥ पातनाघात- योगेन जायते रक्तजः कफः ॥१८॥ विस्रगन्धास्यहृच्छूलदीनो वै विकलेन्द्रियः ॥ रक्तनिष्ठीवनोपेतः श्वासो वापि मदातुरः ॥ १९ ॥ क्षीयते सततं गात्रं मोहस्तृष्णा च जायते ॥ इत्येतै- र्लक्षणैर्युक्तं रक्तकासं विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥ कुछ परिश्रम करनेसे, चोटसे, क्षीण होनेसे, गिरनेसे और दुष्टभोजनसे,गिरनेके घातके योगसे रक्तसे उपजाहुआ कफ होजाता है ॥ १८ ॥ मुखमें बुरी गंध आवे, हृदयमें शूल हो, गरीब रहे, इंद्रिय विकल रहें, रक्तके थूकनेसे युक्त हो, श्वास हो, मदसे पीड़ित हो ॥ १९ ॥ शरीर निरंतर क्षीणहुआ जावे, मोह हो,तृषा हो, इन लक्षणोंसे जो युक्त हो वह रक्तसे उपजी खांसी जाननी ॥ २० ॥ अथ सबप्रकारकी खांसियोंके लक्षण । अथ क्षयानुमानेन लक्ष्यते कासलक्षणम् ॥ पाण्डुरोगे तथा यक्ष्मे गुल्मे वापि क्षतक्षये॥२१॥ शोफार्शसां प्रतिश्याये चाव- श्यं काससम्भवः ॥ एतेषां चानुमानेन कासं संलक्षयेद्भृशम् ॥ २२ ॥ स्थवरिणां रक्तकासः सोऽपि याप्यः प्रकीर्त्तितः ॥ बालानां जायते कासो धात्रीवैकल्पयोगतः ॥ २३ ॥ एते

( ३१८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थानं-

कासाः समुद्दिष्टा दशभिर्भिषगुत्तमैः ॥ तेषां क्रियाप्रतीकारः पथ्यभेषजमेव च ॥ २४ ॥ इससे अनंतर क्षयके अनुमान करके खांसीका लक्षण कहते हैं । पांडुरोग, राजयक्ष्मा, गुल्म, क्षतक्षय, शोजा, बवासीर, पीनस इनमें अवश्य खांसी होजाती है इनके और अनुमानसे अत्यंत खांसीका लक्षण जानना ॥ २१ ॥ २२ ॥ वृद्ध पुरुषोंको जो रक्तसहित खांसी होती है वह याप्यरोग कहाता है और धायके विकलताके योगसे बालकोंको खांसी उत्पन्न होती है इन दशप्रकारके लक्षणों करके वैद्यजनोंने खांसी कही है सो उनके बंद करनेवाली क्रियाओंको कहते हैं और पथ्य औषधोंको कहते हैं ॥ २३ ॥ २४ ॥ अथ वातकी खांसीकी चिकित्सा । शतमूलिकायाः कथितः कषायः पीतः कणाचूर्णयुतः सुखोष्णः॥ नृणां निहन्यान्मरुतोद्भवं तु कासं सशूलं च विपाचनं स्यात् ॥२५॥ भार्ङ्गी शटीगोस्तनिशृङ्गवेरशृङ्गीकणाचूर्णयुतोऽवलेहः॥ गुडेन तैलेन हितो नराणां कासस्य वायोश्च विकारहंता ॥ २६ ॥ नागरं पुष्करं दारु दुस्पर्शकं पिप्पली मुस्तकं रास्ना च शटी ॥ भार्ङ्गिका शर्करा संयुतं चूर्णं कं हन्ति कासं विनिःश्वासवातोद्भवम् ॥ २७ ॥ महाशतावरीका काथ बना उसमें पीपलका चूर्ण मिला सुखसे सुहाता हुआ गरम २ पीनेसे मनुष्योंके वातसे उपजी हुई शूलसहित खांसी दूर होती है और पकजाती है ॥ २५ ॥ भारंगी, कचूर, दाख, अदरक, काकडासींगी, पीपल, इनका चूर्ण बना गुड़में और तेलमें अवलेह बना चाटनेसे वातसे उपजी हुई खांसी दूर होती है ॥ २६ ॥ सोंठ, धमासा, काकड़ासींगी, कचूर, पोहकरमूल, देवदार, भारंगी, पीपल, नागरमोथा, रास्ना इनका चूर्ण बना खांड मिला खानेसे श्वासरहित वातकी खांसी दूर होती है ॥ २७ ॥ अथ कट्फलआदि औषध । कट्फलं रोहिषं धान्यं भार्ङ्गी मुस्ता वचा तथा ॥ कर्कटं पर्पटं दार्वी देवदारु च नागरम्॥२८॥कल्कतं मधुना युक्तं पानमस्य न संशयः॥ कासश्लेष्मप्रतीकारमनेन किल निश्चितम् ॥ २९ ॥ शोषवातक्षयं कण्ठग्रहं पीनसकं कफम् ॥ हिक्कां कफज्वरं चैव नाशयत्याश्वसंशयम् ॥ ३० ॥