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हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

.अ० १७] भाषाटीकासमेता । (९५) आम, जामुन, बेर, अनार, आमला, छुहारा अथवा खजूरिया, फालसा, बिजौरा, चिरौंजी ॥ १ ॥ नारंगी, अमली, दाख, करौंदा, खिरनी, सुन्दर खजूर फल ये सब फलवर्गमें कहे हैं ॥ २ ॥ अथ आमके फलका गुण । अपक्वमाम्रं फलमेव शस्तं संग्राहि पित्तासृजि कोपनं च ॥ तथा विपक्वं मधुरं च चाम्लं भेद्यं सपित्तामयनाशनं च ॥ ३ ॥ कुछेक पका हुआ आमका फल श्रेष्ठ है, कब्जको करता है, पित्तको और रक्तको कोपता है और विशेष पका हुआ आमका फल मधुर है, खट्टा है, दस्तावर है और पित्तके रोगको नाशता है ॥ ३ ॥ अथ जामन बेर अनार चिरौंजीके गुण । जम्बूग्राही मधुरकफहा रोचनो वातहारी कोलं चाम्लं मधुरम- थवा श्लेष्मलं ग्राहि शस्तम्॥ श्रेष्ठं वातादिकरुजहरं दाडिमं चा- मयघ्नं तत्प्रोक्तं च मधुरमुदितं स्वादु राजादनं च ॥ ४ ॥ जामुनका फल कब्जको करता है, मधुर है, कफको नाशता है, रुचिको करता है और वातको हरता है । बेर खट्टा है अथवा मधुर है, कफको करता है, कब्जको करता है, सुन्दर है । अनारका फल श्रेष्ठ है, वात आदिकी पीडाको हरता है और रोगको नाशता है । खिरना मधुर है और स्वादु कहा है ॥ ४ ॥ अथ विशेषवर्णन । परूषककरहपीलुकानां पियालसिंहीकरमर्दकानाम् ॥ फलानि मेहं विनिहंति पित्तं हन्याच्च सर्वार्तुरसंधिवातम्॥५॥ फालसा, करहा, पीलू, चिरौंजी, कटेली, करौंदी इनके फल प्रमेहको और पित्तको हरते हैं और रोगीके संपूर्ण शरीरके वातको हरते हैं ॥ ५ ॥ अथ बिजौराका गुण । स्यान्मातुलुङ्गः कफवातहंता हन्ता क्रिमीणां जठरामयघ्नः ॥ संदुष्टरक्तस्य विकारपित्तसंदीपनः शूलविकारहारी॥६॥ श्वास- कासारुचिहरं तृष्णाघ्नं कण्ठशोधनम् ॥ दीपनं लघु रुच्यं च मातुलुङ्गमुदाहृतम्॥७॥त्वक् तिक्ता दुर्जरा तिष्या क्रिमिवात- कफापहा ॥ स्वादु शीतं गुरु स्निग्धं करहं वातापित्तजित्॥८॥ मध्यं श्लेष्मातकं छर्दिकफारोचकनाशनम् ॥ दीपनं लघु संग्राहि गुल्मार्शो हन्ति केशरम्॥ ९ ॥ पित्तमारुतहद्धातपित्तलं बद्धकेश- १ छन्दोभंगः प्रथमचरणेऽस्य पद्यस्य ।

( ९६ ) हारीतसंहिता। [ प्रथमस्थाने- रम् ॥ हृद्यं वर्णकरं रुच्यं रक्तमांसबलप्रदम् ॥ १० ॥ शूलाजीर्ण- विरुद्धेषु मन्दाग्नौकफमारुते॥अरुचौ श्वासकासे च स्वरसोऽस्यो- पदिश्यते ॥११॥ रसोऽतिमधुरो हृद्यो वीर्य्यं पित्तानिलापहम्॥ कफकृद्दुर्जरः पाके मातुलुङ्गकटाहकः ॥ १२ ॥ चेतोहारी पृथ- गति कटुत्वं च धत्तेऽभितोऽयं हृद्रोगानाहगुल्मश्वसनकफकरो ग्रीष्मकालेऽपहन्ता ॥ १३ ॥ वीर्य्यकृच्चार्शहृत्काले स्यात्तथा क्रिमिहन्मतम्॥तिक्तं पुष्पं च बीजं च गुल्मनुत्स्यात्तथापरम् १४ बिजौरा कफको और वातको नाशता है और कृमिरोगको हरता है और पेटके रोगको दूर करता है, दूषित हुए रक्तविकारको और पित्तको दूर करता है अग्निको जगाता है, और शूल- विकारको नाशता है ॥ ६ ॥ और विजौराका फल श्वास, खांसी, अरुचि इनको नाशता है, तृषाको हरता है, कंठको शोधता है, अग्निको जगाता है, हलका है, रुचिमें हित है ॥ ७ ॥ विजौराकी छाल कडुई है, दुर्जर है, खट्टी है और कृमि, वात, कफ इनको नाशती है और बिजौराकी कोंपल स्वादु है, शीतल है, भारी है, चिकनी है, वातको और पित्तको जीतती है ॥ ८ ॥ और बिजौराका गूदा कफको नाशता है, छर्दिको और कफ और अरोचकको नाशता है और बिजौराका केसर अग्निको जगाता है, हलका है, कब्जको करता है, गुल्मको और बवा- सीरको नाशता है॥ ९ ॥ पित्तको और वातको हरता है और केसरसे संयुक्त हुआ बिजौराका फल पित्तको और वातको करता है, सुन्दर है, वर्णको करता है, रुचिमें हित है और रक्त, मांस, बल इनको देता है ॥ १० ॥ और बिजौराका स्वरस शूल, अजीर्ण, मन्दाग्नि, कफ, वात, अरुचि, श्वास, खांसी इनमें उत्तम है ॥ ११ ॥ और बिजौराका रस अति मधुर है, सुन्दर है, वीर्य्यको देता है, पित्तको और वातको नाशता है, कफको करता है और पाकका- लमें दुर्जर है ॥ १२ ॥ और चित्तको हरता है, तिससे पृथक् अति चरचरापनाको धरता है और हृद्रोग, अफारा, गुल्म, श्वास इनको अन्य कालमें करता है और गरमकालमें नाशता है ॥ १३ ॥ बिजौराके फूल और बीज सुन्दर कालमें वीर्य्यको करते हैं बवासीरको दूर करते हैं, कृमिको हरते हैं, कडुवे हैं और गुल्मको नाशते हैं ॥ १४ ॥ अथ निंबूका गुण। निम्बुकं क्रिमिसमूहनाशनं तीक्ष्णमुष्णमुदरग्रहापहम् ॥ वातपि- त्तकफशूलिनां हितं नष्टधान्यरुचिशोधनं परम् ॥ १५ ॥ त्रिदो- षसद्योज्वरपीडितानां दोषाश्रितानां च सवज्जलानाम् ॥ मल- ग्रहे बद्धगुदे हितं च विषूचिकायां मुनयो वदन्ति ॥ १६ ॥ १ " आहतातत्क्षणाकृष्टद्रव्यात्क्षुण्णात् समुद्धरेत् । वस्त्रनिष्पीडितो यः स रसः स्वरस उच्यते" ॥ २ चरणद्वयात्मकस्यास्य श्लोकस्य प्रथमे पादे मन्दाक्रान्ता द्वितीये स्रग्धरेति ।

अ० १७] भाषाटीकासमेता । (९७) नींबू कीड़ोंके समूहको नाशता है, तीक्ष्ण है, गरम है, पेटके कब्जको हरता है और वात, पित्त, कफ इनके शूलवालोंको हित है और नष्ट अन्नमें रुचिको शोधता है ॥ १५ ॥ त्रिदोष और तत्काल उपजे ज्वरसे पीड़ितको और दोषसे आश्रितोंको और पानी झरनेवालोंको और विष्ठाके बन्धमें और बद्ध गुदरोगमें और विसूचिका अर्थात् हैजाके भेदमें हित है ऐसे मुनिजन कहते हैं ॥ १६ ॥ अथ नारंगीका गुण । नारङ्गं स्वादु गुणोपपन्नं संदीपनं रोचकमर्शसां च ॥ त्रिदोषहच्छूलक्रिमीन्निहन्ति मन्दाग्निकासश्वसनापहारि ॥ १७॥ नारंगी फल स्वादु है, गुणवाला है, अग्निको जगाता है, बवासीरमें रुचिको उपजाता है और त्रिदोष, शूल, कृमि, मंदाग्निरोग, खाँसी, श्वास इनको नाशता है ॥ १७ ॥ अथ इमलीका गुण । अपक्वमम्लीफलमम्लमस्ति तदस्रपित्तामकरं विदाहि ॥ वातामये शूलगदे प्रशस्तं पक्वं तथा शीतगुणोपपन्नम् ॥ १८ ॥ कच्ची इमली खट्टी होती है, वह रक्तपित्त और आमके रोगोंको उत्पन्न करती है तथा विदाही होती है। पकी हुई इमलीका फल वातरोगमें और शूलमें श्रेष्ठ है और शीतल होता है ॥ १८ ॥ अथ दाखका गुण । द्राक्षाफलं मधुरमम्लकषाययुक्तं क्षारेण पित्तमरुतां कफहारि शीघ्रम् ॥श्रेष्ठं निहन्ति रुधिरामयदाहशोषमूर्च्छाज्वरश्वसनका- सविनाशकारि ॥ १९ ॥ कषायन्ना विपाके च द्राक्षा चैव कफे हिता ॥ २० ॥ दाख मधुर है, खट्टा है, कसैला है, खारेपनेसे पित्त, वात, कफ इनको शीघ्र हरता है, श्रेष्ठ है और रक्तरोग, दाह, शोष, मूर्च्छा, ज्वर, श्वासरोग, खांसी इनको नाशता है ॥ १९ ॥ और पाककालमें कसैलेपनेको नाशता है और कफमें हित है ॥ २० ॥ अथ नारियलका गुण । नालिकेरं सुमधुरं गुरु स्निग्धंच शीतलम् ॥ हृद्यं सबृंहणं बस्ति- शोधनं रक्तपित्तनुत ॥ २१॥ विष्टम्भि पक्वं मतिमन्नपक्वं कफवा- तलम् ॥ बृंहणं शीतलं वृष्यं नालिकेरफलं विदुः ॥ २२ ॥ नारियल मधुर है, भारी है, चिकना है, शीतल है, हृदयको हित है, धातुओंको पुष्ट करता है, बस्तिको शोधता है, रक्तपित्तको नाशता है ॥ २१ ॥ विष्टंभी है ये सब पके हुए के गुण हैं, हे बुद्धिमन् ! नहीं पका हुआ नारियल कफको और वातको करता है, धातुओंको बढ़ाता है, शीतल है और वीर्यमें हित है ॥ २२ ॥ ७

(९८) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ केलेके फलका गुण । हृद्यं मनोज्ञं कफवृद्धिकारि शान्तं च सन्तर्पणमेव बल्यम् ॥ रक्तं सपित्तं श्वसनं च दाहं रम्भाफलं हन्ति सदा नराणाम् ॥ २३ ॥ संग्राह्यपक्वं किल शीतलं च कषायकं वातकफं करोति ॥ विष्ट- म्भि बल्यं गुरु दुर्जरं च आरण्यरम्भाफलमेव तद्वत् ॥ २४ ॥ पकाहुआ केलेका फल हृदयको हित है, मनोहर है, कफको बढ़ाता है, शांतिको करता है, तृप्तिको करता है, बलमें हित है और रक्तपित्त, श्वासदोग, दाह इनको सबकालमें नाशता है ॥ २३॥ नहीं पका हुआ केलेका फल कब्जको करता है, शीतल है, कसैला है, वातको और कफको करता है, विष्टंभी है, बलमें हित है, भारी है, दुर्जर है और वनके केलेका फल भी इन्ही गुणोंवाला है ॥ २४ ॥ अथ कैथाका गुण । कपित्थकाम्लं मधुरं कषायं विषेधं गुरु ॥ कासातिसारहृद्रो- गच्छर्द्यामयकफापहम् ॥ २५॥ कपित्थं मधुरं शीतं कषायं ग्राहकं लघु ॥ २६ ॥ कैथा फलका आमचूर खट्टा है, मधुर है, कसैला हैं, दस्त बन्द करता है, भारी है और खांसी, अतीसार, हृद्रोग, छर्दि, और कफरोग, इनको नाशता है ॥ २५ ॥ कैथा मधुर है, शीतल है, कसैला है, कब्जको करता है और हलका है ॥ २६ ॥ अथ खजूरिया अथवा छुहारेका गुण । अपक्वं खर्जूरफलं त्रिदोषशमनं मतम् ॥ पक्वमेव हितं श्रेष्ठं त्रिदोषशमनं परम् ॥ २७ ॥ नहीं पका हुआ खजूरिया अथवा छुहारा त्रिदोषको शांत करता है और पका हुआ हितकर श्रेष्ठ है और निश्चय त्रिदोषकों शांत करता है ॥ २७ ॥ अथ सुपारीका गुण । कषायमधुरं भेदि पूगं पित्तकफापहम् ॥ २८ ॥ सुपारीका फल कसैला है, मधुर है, मलको पतला करता है, पित्तको और कफको नाशता है ॥ २८ ॥ अथ नागरपानका गुण । नागवल्लीदलं हृद्यं सुगन्धि कफवातजित् ॥ २९॥ नागरपान हृदयको हितकर है, सुगंधवाला है, कफको और वातको जीतता है ॥ २९ ॥ १ विषेण सीदत्यवसादं करोत्युदरस्येति ।

अ० १८ ] भाषाटीकासमेता । (९९) अथ कत्थाका गुण । खदिरः कफपित्तघ्नः कण्ठ्यः कुष्ठनिबर्हणः ॥ ३० ॥ कत्था कफको और पित्तको नाशता है, कंठमें हित है, कुष्ठको दूर करता है ॥ ३० ॥ अथ चूनेका गुण । चूर्णकं पित्तहत्तीक्ष्णं ताम्बूलं कफवातजित् ॥ ३१ ॥ संयोगा- त्सुरसं स्वादु मुखवैरस्यनाशनम् ॥ दन्तस्थैर्यकरं शोषपीनसा- मयशान्तिकृत् ॥ ३२ ॥ चूना पित्तको हरता है, तीक्ष्ण है और नागरपान कफको और वातको जीतता है परंतु संयोगसे सुन्दर रसवाला है, स्वादु है और मुखके विरसपनेको हरता है ॥ ३१ ॥ और दांतोंको स्थिर करता है और शोष, पीनस इनको शांत करता है ॥ ३२ ॥ अथ कत्था कपूरसे संयुक्त नागरपानका गुण । रोगपाटवसंशुद्धिस्वरकान्तिकरं मतम्॥कण्ठ्यं रुच्यमुरस्यं च फलकर्पूरसंयुक्तम् ॥३३॥इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे प्रथम- स्थाने फलवर्गो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ कत्था, कपूरसे संयुक्त किया नागरपान रोगको शोधता है, स्वरको और कांतिको करता है, कंठमें हित है, रुचिको उपजाता है और छातीमें गुणको करता है ॥ ३३ ॥ इति बेरीनिवासि- बुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने फलवर्गो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥ १७ ॥ अष्टादशोऽध्यायः १८. अथ मधुवर्ग । अतो वक्ष्यामि माक्षीकं त्रिविधं शृणु पुत्रक ॥ भ्रामरं सारघं क्षौद्रं तेषां वच्मि गुणागुणम् ॥ १ ॥ अब शहदको कहूँगा । हे पुत्र ! वह शहद तीन प्रकारका है सुनो । भ्रामर १, सारघ २, क्षौद्र ३ इनके गुणोंको और दोषोंको कहता हूँ ॥ १ ॥ अथ सामान्यशहदका गुण । शीतं कषायं मधुरं लघु स्यात्सन्दीपनं लेहनमेव शस्तम्॥संशो- धनं च व्रणशोधनं च संरोपणं हृद्यतमं च बल्यम्॥२॥त्रिदोष-

( १०० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-

नाशं कुरुते च पुष्टिं कासक्षये वा क्षतजे च छर्दों ॥ हिक्काभ्रमे शोषणपीनसानां रक्तप्रमेहे सरलातिसारे ॥३॥ रक्तातिसारे च सपित्तरक्ते तृणमोहहत्पार्श्वगदेऽपि शस्तः ॥ नेत्रामये वा ग्रहणी- गदे वा विषे प्रशस्तं भ्रमरैश्चितं यत्॥४॥ आमरं सघनं जाड्यं भूयिष्ठं मधुरं च यत् ॥ शहद शीतल है, कसैला है, मधुर है, हल्का है, अग्निको जगाता है, स्वादु है, सुन्दर शोधता है, घावको शुद्ध करता है, घावपे अंकुरको लाता है, हृदयको परमहित है, बलमें हित है ॥ २ ॥ त्रिदोषको नाशता है, पुष्टिको करता है, खांसीमें, क्षयमें, छातीके फटनेमें, छर्दीमें और हिचकी, श्रम, शोष, पीनस, रक्तप्रमेह, सीधे अतीसार इनमें हित है ॥ ३ ॥ और रक्तातिसार, पित्तरक्त, तृषा, मोह, हृद्रोग, और पसलीरोग इनमें श्रेष्ठ है, आमर शहद नेत्ररोगमें अथवा संग्रहणीमें और विषमें हित है॥४॥ यह भ्रामर शहद बहुत गाढ़ा और भारी होता है तथा अतिमधुर होता है । अथ शहदकी विशेषता । क्षौद्रं विशेषतो ज्ञेयं शीतलं लघु लेहनम् ॥ ५ ॥ तस्माल्लघुतरं रूक्षं सारघं नातिशीतलम्॥कासे क्षये प्रशस्तं स्यात्कामलार्शो- विनाशनम् ॥६॥ नातिशीतं न च रूक्षं दीपनं बलकृन्मतम् ॥ अतीसारे नेत्ररोगे क्षते वा क्षतजे हितम् ॥ ७ ॥ आमरं वृक्षसं- स्थाने विटपे सारघं भवेत्॥रन्ध्रे तु कोटरे वापि क्षौद्रं तत्र प्रश- स्यते ॥८॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे मधुवर्गो नाम अ- ष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ और क्षौद्रसंज्ञक शहद विशेषपनेसे शीतल है, हल्का है, स्वादु है॥५॥इससे भी अति हलका सारघ शहद है, यह रूखा है, अति शीतल नहीं है, खांसीमें और क्षयमें अतिश्रेष्ठ है, कामलाको और बवासीरको नाशता है॥६॥क्षौद्र शहद अतिशीतल नहीं है, रूखा भी नहीं है, अग्निको जगाता है, बलको करता है और अतीसार, नेत्ररोग, घाव, क्षतसे उपजारोग इनमें हित है॥७॥वृक्षपे आमर शहद होता है, तृणके गुच्छेमें सारघ शहद होता है, वृक्षके छिद्रमें अथवा कोटरमें क्षौद्र शहद होता है, सो अच्छा होता है॥८॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविन्दत्तशास्त्र्यनुवादिताहा- रीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने मधुवर्गो नाम अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

अ० १९ ] भाषाटीकासमेता । ( १०१ ) एकोनविंशोऽध्यायः १९. अथ मद्यवर्ग । गौडी माध्वी तथा पैष्टी निर्यासा कथितापरा ॥ इति चतुर्विधा ज्ञेयाः सुरास्तासां प्रभेदकाः ॥१॥ भेदेन द्वादश प्रोक्ताः सुराः सौवीरकारसैः ॥ सीधुर्गौडी च मत्स्यण्डी गुडेन प्रभवास्त्रयः ॥२॥ माध्वीकं मधुकं माध्वं मधुना संयुताः सुराः ॥ पैष्टीष्व- रिष्टजातं तु तण्डुलप्रभवास्त्रयः ॥३॥ मृद्वीकारससम्भूता ताडमा- डरसोद्भवा॥ निर्यासा सा तु विज्ञेया तासां वच्मि गुणागुणम्४॥ गौडी, माध्वी, पैष्टी, निर्यासा, इन भेदोंसे मदिरा ४ प्रकारकी है उनके भेद ॥ १ ॥ बारह १२ कहे हैं। सीधु, गौडी, मत्स्यंडी ये तीन मदिरा गुड़से बनती हैं ॥ २ ॥ माध्वीक, मधुक, माध्व, ये तीन मदिरा शहदसे बनती हैं। पैष्टी, अरिष्ट, जात ये तीन मदिरा चाव- लोंसे बनती हैं ॥ ३ ॥ और मृद्वीका द्राक्षाके रससे बनती है, ताड़ मदिरा ताड़के रससे बनती है, और माड़ वृक्षके रससे भी मदिरा बनती है, वही निर्यास मदिरा जाननी । उनके गुण और दोषोंको कहता हूं ॥ ४ ॥ अथ सीधुमदिराका गुण । सीधुः कषायाम्लकमाधुरो वा सन्दीपनी मेदमलापमर्दः ॥ आमातिसारानिलपित्तशूलश्लेष्मामयार्शोग्रहणीगदघ्नः ॥ ५ ॥ सीधु मदिरा कसैली है, खट्टी है, कोई कोई मीठी होती है अग्निको जगाती है, मेदको और मलको नाशती है और आमातीसार, वात, पित्त, शूल, कफका रोग, बवासीर, ग्रहणीदोष इनको नाशती है ॥ ५ ॥ अथ गौडी मदिराका गुण । गौडी कषाया मधुराम्लशीता सन्दीपनी शूलमलापहन्त्री ॥ हृद्या त्रिदोषं शमयत्यजीर्णं पाण्ड्वामयार्शःश्वसनं निहन्ति॥६॥ गौडी मदिरा कसैली है, मधुर है, खट्टी है, शीतल है, अग्निको जगाती है, शूलको और अफाराको हरती है, सुंदर है और त्रिदोष, अजीर्ण, पांडुरोग, बवासीर, श्वास रोग इनको शांत, करती है ॥ ६ ॥ १ ( ताडमाडरसोद्भवा ) ताडनामक-वृक्षरससंभूता तथा माडनामक वृक्ष्ररसतो जाता अपि मदिरा माड- नामको वृक्षः कोंकणदेशे प्रसिद्धः । इति औषधकोशः ।

(१०२) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने अथ मत्स्यंडी मदिराका गुण । हरति मलमियं संदीपनी पाण्डुमेहांल्लघुमधुरसुशीता रोचना पित्तहन्त्री॥जरयति सकलं वा पीतमम्लातिमात्रं श्वसनरुधि- रकासान्हन्ति वा कामलां च ॥ ७ ॥ रावकी मदिरा मलको हटाती है, अग्निको जगाती है, पांडुरोग, प्रमेह इनको हरती है, हलकी है, मधुर है, सुंदर शीतल है, रुचिको करती है, पित्तको हरती है, सब चीजोंको जलाती है, पीनेमें अति खट्टी है और श्वासरोग, रक्त, खांसी, कामला, इनको नाशती है ॥ ७ ॥ अथ माध्वीक मदिराका गुण । माध्वीकं शीतलाम्लं मधुरमपि तथा सत्कषायोष्णकं च ह- न्यात्पित्तामयार्शःश्वसनमपि तथा चातिसारं प्रमेहान् ॥ शूला- नाहोपमर्दं जरयति सकलं दीपयत्यग्निसात्म्यं तस्माद्वातामवातं वमनमपि तथा हन्ति सर्वांश्च रोगान् ॥ ८ ॥ माध्वीक मदिरा शीतल है, खट्टी है, मधुर है, पीनेमें उत्तम है, कसैली है, गरम है और पित्त- रोग, बवासीर, श्वासरोग, अतीसार, प्रमेह, शूल, अफारा और हड़फूटन इनको नाशती है, सब चीजोंको जराती है, अग्निको जगाती है इसलिये वात आमवात और वमन सब प्रकारके रो- गोंको नाशती है ॥ ८ ॥ अथ मदिराका गुण । कषाया मधुरा चाम्ला सुरा संदीपनी मता ॥ कासार्शोग्रहणीस्तन्यमूत्ररोगविनाशिनी ॥ ९ ॥ मदिरा कसैली है, मीठी है, खट्टी है, अग्निको जगाती है और खाँसी, बवासीर, ग्रहणीदोष, दुग्धरोग, मूत्ररोग इनको नाशती है ॥ ९ ॥ अथ पैष्टीमदिराका गुण । पैष्टी संदीपनी रुच्या कफकृद्वातनाशिनी ॥ पित्तला पाण्डुरोगाणां कारिणी बहुधा मता ॥ १० ॥ पैष्टी मदिरा अग्निको जगाती है, रुचिमें हित है, कफको करती है, वातको नाशती है, पित्तको उपजाती है और बहुधा के पांडुरोगोंको करती है ऐसा माना गया है ॥ १० ॥ अथ महुआ वृक्षकी मदिराका गुण । वातपित्तकरो रूक्षः कषायो विशदो गुरुः ॥ श्लेष्मलो भेदनो ग्राही मूत्रकृच्छ्रशिरोऽर्त्तिनुत् ॥ ११ ॥

अ० २० ] भाषाटीकासमेता । ( १०३ ) महुआकी मदिरा वातको और पित्तको करती है, रूखी है, कसैली है, सुंदर है, भारी है, कफको करती है, मलको पतला करती है, कब्जको करती है, मूत्रकृच्छ्रको और शिरके रोग- को नाशती है ॥ ११ ॥ अथ ताड़की मदिराका गुण । श्लेष्मदोषकरा वृष्या वातला श्लेष्मवर्द्धिनी ॥ कासहृल्लासविध्वंसकरणा ताडमण्डिका ॥ १२ ॥ ताड़की मदिरा कफको करती है, वीर्य्यमें हित है, वायुको उपजाती है, कफको बढ़ाती है और खाँसीको तथा जीकी मिचलाहट नाशती है ॥ १२ ॥ अथ मदिराकी विशेषता । पूर्णे कषायपित्ते च योगयुक्ता सुरा हिता॥ बहुदोषहरा चैव श्लेष्म- रोगे विशेषतः॥१३॥ श्रमज्वरातुरे शोषे शोफपाण्ड्वामये क्षये ॥ मतेः क्लमेऽपस्मारे च यक्ष्मणां च भ्रमेषु च ॥ १४ ॥ श्रान्ते वा विषपीते वा सर्पदष्टे जलोदरे ॥ रक्तपित्ते तथा श्वासे वारुणी न हिता मता ॥ १५ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे मद्यवर्गो नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥१९॥ कषायपनेसे युक्त हुआ पित्त जब पूर्ण हो तब योगसे युक्तकरी मदिरा हित है, यह बहुत दोषोंको हरती है और विशेष करके कफके रोगमें हित है ॥ १३॥ परिश्रम और ज्वरसे पीडित और शोष, शोजा, पांडुरोग, क्षय, बुद्धिकी ग्लानि, मृगीरोग, यक्ष्माआदिसे उपजा श्रम इनसे पीडितको ॥ १४ ॥ थकेको और विष खानेवालेको और सर्पसे डसेको और जलोदर, रक्तपित्त और श्वासरोगसे पीडितको मदिरा हित नहीं है ॥ १५ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ विंशोऽध्यायः २०. अथ चौपायोंका और दुपायोंका मांसवर्ग । शूलिनः शृङ्गिणश्चैव नखिनोऽन्ये प्रकीर्तिताः ॥ श्वापदाः पक्षि- णश्चान्ये मत्स्याश्चान्याः सरीसृपाः ॥ १ ॥ जलेचरा जलाधारा

(१०४) हारीतसंहिता। [प्रथमस्थाने- ग्रामारण्यानिवासिनः ॥ अनूपा जाङ्गला जीवास्तथा साधार- णोऽपरः ॥ २ ॥ मृगरुरुचित्राङ्गास्तथा गण्डश्च वनगवयमहषि- षाः ॥ सूकराद्याश्च येऽपि भवन्ति विविधवर्णा ग्रामवासिनश्च ॥ ३ ॥ ये ये वनगजाद्याश्च ग्रामकाद्याश्च शृङ्गिणः ॥ शूकरच्छिक्कराद्याश्च शूरिणो वा भवन्त्यमी ॥ ४ ॥ शूलवाले, शींगवाले, नखवाले, श्वापद, पक्षी, मच्छ, सर्प ये जो कहे हैं ॥ १ ॥ जलमें विचरनेवाले, जलके आश्रित हुए, ग्राममें बसनेवाले, वनमें बसनेवाले, आनूपदेशमें रहनेवाले, जांगलदेशमें रहनेवाले, सावारणदेशमें रहनेवालें ॥ २ ॥ मृग, लाल हरिण, विलावभेद, गेंडा नीलीगाय, भैंसा, शूकर आदि ये सब अनेक प्रकारके वर्णवाले ग्राममें वसनेवाले हैं ॥ ३ ॥ जो जो वनमें रहनेवाले हस्ती आदि हैं और जो ग्राममें रहनेवाले शींगवाले हैं और शूकर, छिक्कर और शूरी आदि भी ग्रामवासी हैं ॥ ४ ॥ अथ सरीसृपवर्णन । शशकः शल्लकी गोधा मार्जाराद्या नखायुधाः ॥ सर्पमत्स्यादिका ये च ते विज्ञेयाः सरीसृपाः ॥ ५ ॥ शशा, साही, गोह, बिलाव, आदि नखरूपी शस्त्रोंवाले हैं । सर्प और मत्स्य आदि सरी- सृप संज्ञक जानने ॥ ५ ॥ अथ आनूपवर्णन । मत्स्यमंकुरकाद्या ये कच्छपा दुर्जरादयः ॥ हंससारसचक्राद्याः कपिञ्जलकुकूदकाः ॥ ६ ॥ आनूपास्ते च विज्ञेयाः श्लेष्मला वात- कोपनाः ॥ ७ ॥ मत्स्य, मंकुरक आदि कच्छप, दुर्जर आदि और हंस, सारस, चकवा आदि और पपैय्या, पंडेरिआ पक्षी ॥ ६ ॥ ये सब आनूपदेशमें रहनेवाले हैं, कफको करते और बातको कोपते हैं ॥ ७ ॥ अथ जांगलवर्णन । शशलावकवातादा गोधाहरिणकूटकाः ॥ छिक्कराद्यास्तथान्येऽपि तित्तिराद्याश्च कूर्चकाः ॥ ८ ॥ भारद्वाजास्तथा श्येना मूषका वरवारणाः ॥ इत्येता जाङ्गला जीवा ये जलेन विना स्थिताः ॥ ९ ॥

अ० २० ] भाषाटीकासमेता । ( १०५ )

शशा, लावा, चातात, गोह, हरिण, कूटक, छिक्कर आदि और तीतर आदि, जीवक पक्षी ॥ ८ ॥ काग अथवा मुर्गा विशेष, शिकरा, मूषा माषीविशेष ये सब जांगलसंज्ञक जीव हैं। ये पानीके विना भी स्थित रह सकते हैं ॥ ९ ॥ अथ जलचरजीववर्णन । शूक्रा मृगशल्लाद्याः सलिलाशयमाश्रिताः ॥ मकराद्याश्च ग- ण्डाका गवयाश्च तथापराः ॥ महिषाद्याश्च ये चैव ते च साधारणा मताः ॥१० ॥ कुररबकमकराः कङ्कचटकपिकभृङ्ग- सारसाः॥आडिदात्यूहहंसा जलकरटिकपिङ्गलटिहिभाद्याश्च ११ जलेचरा विहङ्गास्त खञ्जरीटाश्च भासकाः ॥ १२ ॥ इत्येते जलजा जीवाः स्थलजाः स्थलचारिणः ॥१३ ॥ शूकर, हरण, शल्ल अर्थात् साही आदि जीव पानीके आशयके आश्रित रहते हैं और मकर, मच्छ आदि गेंडा, नीलगाय भैंसा आदि जीव साधारण माने हैं ॥ १० ॥ पपैवा, बगला, मकरा, कंक, बत्तक, कोयल, भौंरा, सारस, आडीपक्षी, ढौंकरपक्षी, हंस, शंखका जीव, रटिक, पिंगापक्षी, टिटिहरी आदि जलमें विचरनेवाले हैं, खंजरीट और भास- पक्षी भी जलचारी हैं और स्थलमें विचरनेवाले स्थलचारी जीव कहाते हैं ॥ ११-१३ ॥ अथ ग्रामचारी पशुवर्ग । गजवाजिनस्तथोषूट्रा माहिषा सौरभौजकाः ॥ खरशूकरमेषाश्च श्वानो मार्जारमूषकाः ॥ १४ ॥ इत्येते पशवो ज्ञेया ग्रामवास- निवासिनः ॥ हस्ती, घोड़ा, ऊंट, भैंसा, बैल, बकरा, गधा, सुवर, मेढ़ा, कुत्ता, बिलाव, मूषा ॥ १४ ॥ ये सब जीव ग्राममें बसनेवाले हैं ॥ ग्रामचारी पक्षी । कुक्कुटकलविङ्कपारावतकपोतकाः ॥ १५ ॥ पक्षिणो ग्रामचाराश्च वच्मि चैषां गुणागुणम् ॥ १६ ॥ और मुर्गा, गौरैया, परेवा, कबूतर, ॥ १५ ॥ ये पक्षी ग्राममें विचरते हैं इनके गुण और दोषको कहता हूं ॥ १६ ॥ हरिणोंके मांसका गुण । शृङ्गिणां हरिणः श्रेष्ठो बल्यो रोचनदीपनः ॥ त्रिदोषघ्नो लघुः पाके मधुरो ज्वरिणां हितः ॥ १७॥

शींगवालोंमें हरिण श्रेष्ठ है, बलमें हित है, रुचिको देता है, अग्निको जगाता है, त्रिदोषको हरता है, हलका है, पाककालमें मधुर है, ज्वरवालोंको हित है ॥ १७ ॥ अथ कृष्णमृगके मांसका गुण । क्षते क्षयार्शसोः पाण्ड्वावरोचकनिपीडिते ॥ कासश्वासातुराणां च एणमांसं सुखावहम् ॥ १८ ॥ छातीका फटजाना, क्षय, बवासीर, पांडु, अरुची, खाँसी और श्वास इनसे पीडित रोगि- योंको कृष्णमृगका मांस हित है ॥ १८ ॥ अथ चित्रांगके मांसका गुण । चित्राङ्गो वातशमनो बृंहणो बलकृन्मतः ॥ श्लेष्मलः कथितो वापि दुर्जरो मेदवर्द्धनः ॥ १९ ॥ चित्तलका मांस वातको शांत करता है, धातुओंको पुष्ट करता है, बलको बढ़ाता है, कफको करता है, दुर्जर है और मेदको बढ़ाता है ॥ १९ ॥ अथ छिक्करके मांसका गुण । छिक्करो लघु वृही च मधुरो दोषनाशनः ॥ तुल्यो हरिणमांसस्य ज्वरेष्वपि प्रशस्यते ॥ २० ॥ छिकरका मांस हलका है, धातुओंको पुष्ट करता है, मधुर है, दोषको नाशता है, मृगके मांसके समान है और ज्वरमें भी श्रेष्ठ है ॥ २०॥ अथ रक्तमृगके मांसका गुण । रोहितो बृंहणश्चैव विबन्धी दुर्जरो घनः ॥ ज्वरिणां विषमाग्नीनामतीसारेण त्रासयते ॥ २१ ॥ रक्त मृगका मांस धातुओंको बढ़ाता है, विशेष करके कब्ज करता है, दुर्जर है, कठिन है और ज्वर, विषमज्वर, अग्नि, इन रोगवालोंको अतीसार करके त्रासित करता है ॥ २१ ॥ अथ गेंडा, रोझ, भैंसा, ऊट, घोड़ा इनके मांसोंके गुण । तथैव गण्डगवय महिषोष्ट्रतुरङ्गमाः ॥ विबन्धिगुरवः स्निग्धा वातालस्ये प्रकीर्त्तिताः ॥ २२ ॥ गेंडा, नीलीगाय, भैंसा, ऊंट, घोड़ा इन पाँचोंके मांस विशेष करके कब्ज करते हैं, भारी हैं चिकने हैं, वातमें और आलस्यमें हित हैं ॥ २२ ॥

अ० २० ] भाषाटीकासमेत। ( १०७ ) अथ शूकरके मांसका गुण । वातघ्नं रोचनं वृष्यं दुर्जरं श्रमनाशनम्॥ सौकरं पित्तशमनं रुचिदं धातुवर्द्धनम् ॥ २३ ॥ सुअरका मांस वातको नाशता है,रुचिमें हित है, वीर्यमें हित है, दुर्जर है, परिश्रमको नाश- ता है, पित्तको शांत करता है, कांतिको देता है,धातुओंकों बढ़ाता है, ॥ २३ ॥ अथ शशाके मांसका गुण । शशको जाङ्गलश्रेष्ठो लघुर्वृष्यश्च दीपनः॥रुचिकृत्तर्पणो बल्य- स्त्रिदोषशमनो मतः ॥ २४ ॥ ज्वरे च पाण्डुरोगे च क्षये कासे गुदामये॥राजयक्ष्मणि पाण्डौ च तथातीसारिणां हितः॥२५॥ शशाका मांस जांगलजीवोंके मांसोंमें श्रेष्ठ है, हलका है, वीर्यमें हित है, अग्निको जगाता है, रुचिको करता है, तृप्तिको करता है, बलमें हित है और त्रिदोषको शांत करता है ॥ २४ ॥ और ज्वर, पांडुरोग, क्षय, खांसी बवासीर, राजरोग, पांडुरोग, अतीसार, इन रोगवालोंको हित है ॥ २५ ॥ अथ साहीके मांसका गुण । शल्लकी बृंहणो बल्यः स्निग्धो वष्यो रुचिप्रदः ॥ वातश्लेष्महरो हृद्यो मधुरो धातुवर्द्धनः ॥२६ ॥ साहीका मांस धातुओंको पुष्ट करता है, वीर्यमें हित है, बलको करता है, चिकना है, रुचिको देता है, वातको और कफको हरता है, सुन्दर है, मधुर है और धातुओंको बढ़ाता है ॥२६॥ अथ गोह सरीखे शल्यकनामवाले जीवके मांसका गुण शल्यको बृंहणो बल्यःस्निग्धो वृष्यो रुचिप्रदः ॥ वातलः किञ्चिद्धातूनां वर्द्धनो मधुरो घनः॥ २७ ॥ गोह सरीखे जीवका मांस धातुओंको पुष्ट करता है, बलमें हित है, चिकना है, वीर्यमें हित है,रुचिको देता है, वातको करता है, धातुओंको कुछ बढ़ाता है, मधुर है और कठिन है ॥ २७ ॥ अथ गोहके मांसका गुण । रक्तपित्तहरा वृष्या स्निग्धा मधुरशीतला ॥ श्वासकासहरा प्रोक्ता गोधा चार्शोहिता बला॥२८॥ गोहका मांस रक्तपित्तको हरता है, वीर्यमें हित है, चिकना है,मधुर है, शीतल है, श्वासको और खांसीको हरता है और बवासीरमें हित है बलप्रद है ॥ २८ ॥

( १०८ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ मूषाके मांसका गुण । स्निग्धो बलकरः शुक्रवर्द्धनो मधुरो लघुः॥ दुर्नामकृमिदोषघ्नो वातहारी च मूषकः ॥ २९ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे चतुष्पदानां मांसवर्गो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ मूसेका मांस चिकना है, बलको करता है, वीर्य्यको बढ़ाता है, मधुर है, हलका है और बवासीरको और कृमिदोषको हरता है और वातको भी नाशता है ॥ २९ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने मांसवर्गो नाम विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ एकविंशोऽध्यायः २१. ───❧~☙─── अथ स्थलमें विचरनेवाले जीवोंका मांसवर्ग । ( प्रथम लावापक्षीके मांसका गुण ) पक्षिणां च महाश्रेष्ठो लावको जाङ्गलात्मजः ॥ संग्राही दीपनः प्रोक्तः कषायो मधुरो लघुः ॥ १ ॥ तथा विपाके मधुरः सन्नि- पातेऽतिपूजितः ॥ २ ॥ जांगलदेशमें विचरनेवाले लावापक्षीका मांस अन्य पक्षियोंके मांससे श्रेष्ठ है । यह कब्जको करता है, अग्निको जगाता है, कसैला है, मधुर है और हलका है ॥ १ ॥ और पाककालमें मधुर है और सन्निपातमें अतिपूजित है ॥ २ ॥ अथ तीतरके मांसका गुण । तथैव तित्तिरो वृष्यो मेधाग्निबलवर्द्धनः॥सर्वदोषहरो बल्यो ब- लाका समता गुणैः ॥३॥वार्त्ताको विशदो वृष्यो यथा लावस्त- थैव च ॥ कृष्णगौरप्रभेदाश्च श्रेष्ठो गौरश्च तित्तिरः॥४॥ तृती- यतित्तिरोऽन्योऽपि सामान्यो गुणलक्षणैः॥सवातलोऽतिबलकृ- द्धनः किञ्चिद्रसायनः ॥ ५ ॥ तीतरका मांस वीर्य्यमें हित है और बुद्धि, अग्नि, और बल, इनको बढ़ाता है, सब दोषोंको हरता है, बलमें हित है और बगलाके मांसके समान गुणोंवाला है ॥ ३ ॥ वार्त्ताकसंज्ञक तीतरका मांस सुन्दर है, वीर्य्यमें हित है और लावाके मांसके समान गुणोंवाला है, कृष्ण और

अ० २१ ] भाषाटीकासमेता । (१०९) गौर तीतरोंमें गौर वर्णका तीतर श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥ इन्हींके गुण और लक्षणोंके समान तीसरे, रंगका तीतर अन्य भी होता है परंतु वह वातल है, अतिबलको करता है, उसका मांस कठिन है और कुछ रसायन है ॥ ५ ॥ अथ नीले मोरके मांसका गुण । मेधावृद्धिं स्रोतसां च करोत्युत्पाटनं शिखी ॥ सवातलोऽतिबलकृद्धनः किञ्चिद्रसायनः ॥ ६ ॥ नीले मोरका मांस बुद्धिको बढ़ाता है और नाड़ियोंको शुद्ध करता है, वातल है, अतिब- लको करता है, कठिन है और कुछ रसायन है ॥ ६ ॥ अथ साधारण मोरके मांसका गुण । सुस्निग्धो श्लेष्मलो वृष्यो घनः शुक्रविवर्द्धनः॥ मांसवृद्धिकरो बल्यो द्वितीयश्च मयूरकः ॥७॥ साधारण मोरका मांस सुन्दर चिकना है, कफको करता है, वीर्यमें हित है, कठिन है, वीर्य- को बढ़ाता है, मांसको बढ़ाता है, बलमें हित है ॥ ७ ॥ अथ मुर्गाके मांसका गुण । तथैव कौक्कुटो ज्ञेयो मधुरश्च गुणात्मकः ॥८॥ वैसे ही मुर्गाका मांस भी मोरके मांसके समान गुणोंवाला है और मधुर है ॥ ८ ॥ अथ कपोतके मांसका गुण । कापोतो बृंहणो बल्यो वातपित्तविनाशनः ॥ तर्पणः शुक्रजननो हितो नृणां रुचिप्रदः ॥९॥ कपोतका मांस धातुओंको पुष्ट करता है, बलमें हित है, वातको और पित्तको नाशता है, तृप्तिको करता है, वीर्यको बढ़ाता है और मनुष्योंको हित है, रुचिको देता है ॥ ९ ॥ अथ परेवाके मांसका गुण । तथा पारावतो ज्ञेयो वातश्लेष्मकरो गुरुः॥बल्यो वृष्यो रुचिकृच्च तथा हारीतको मतः ॥ १० ॥ पोतकी भङ्गिका क्षुद्रा तथा च कुनटी तथा ॥ एते तुल्यगुणा ज्ञेया लघुवातापहारिणः ॥११॥ परेवाका मांस वातको और कफको करता है, भारी है, बलमें हित है, वीर्यमें हित है, रुचिको करता है और ऐसे ही गुणोंवाला तिलजिरुपक्षीका मांस है ॥ १० ॥ और पोतक, इन्द्रगोप, मधुमाखी, कुनटी इन चारोंका मांस समान गुणोंवाला है, हल्का है और वातको हरता है॥ ११ ॥ अथ ककेराके मांसका गुण । लघुश्च कृकरो ज्ञेयः कायाग्निवर्द्धनो भृशम् ॥ १२ ॥ ककेराका मांस हलका है, शरीरकी अग्निको बढ़ाता है ॥ १२ ॥

( ११० ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- अथ खाती चिड़ाके मांसका गुण । तथा लघुर्वातहरः काष्ठकूतोऽग्निवर्द्धनः ॥ वातश्लेष्माधिको ज्ञेयः शीतलः शुक्रवर्द्धनः ॥ १३ ॥ अश्मरीं हन्ति विशदो बलकृन्मां- सतक्षणः ॥१४॥ खातीचिड़ाका मांस हलका है, वातको हरता है और जठराग्निको बढ़ाता है, वात और कफकी अधिकतासे संयुक्त है, शीतल है और वीर्यको बढ़ाता है ॥ १३ ॥ पथरीको हरता है सुन्दर है, बलको करता है, मांसको काटता है ॥ १४ ॥ अथ चकोर, तोता, मैना इनके मांसका गुण । चकोरोऽथ तथा शारी समदोषौ गुणागुणैः ॥ १५ ॥ चकोर, तोता, मैना इन्होंका भी मांस गुण और दोषोंसे समान है ॥ १५ ॥ अथ कुंजके मांसका गुण । क्रौंचो वृष्योऽतिरुचिकृदश्मरीं हन्ति नित्यशः ॥ शोषमूर्च्छाहरो वृष्यो हन्ति कासमरोचकम् ॥ १६॥ क्रौंचका मांस वीर्यमें हित है, अधिक रुचिको करता है, निश्चय पथरीको हरता है और शोष, मूर्च्छा, खांसी, अरुचि इनको नाशता है वीर्यमें हित है ॥ १६॥ अथ कोयलके मांसका गुण । कोकिलः श्लेष्मलो ज्ञेयः पित्तसंशमनो मतः ॥ १७॥ कोयलका मांस कफको करता है, पित्त शांत करता है ॥ १७ ॥ अथ विवृताक्षके मांसका गुण । वैवृताक्षस्त्रिदोषघ्नो बल्यः शुक्रविवर्द्धनः ॥ १८॥ विवृताक्षका मांस त्रिदोषको नाशता है, बलमें हित है और वीर्यको बढ़ाता है ॥ १८॥ अथ घरके चिड़ेके मांसका गुण । गृहस्य चटको वृष्यो बलशुक्रविवर्द्धनः ॥ सर्वदोषहरश्चापि दीपनो मांसवर्द्धनः॥ १९ ॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे स्थलच- राणां मांसवर्गो नाम एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥ घरकी चिड़ियाका मांस वीर्यमें हित है, बल और वीर्यको बढ़ाता है, सब दोषोंको हरता है, अग्निको जगाता है और मांसको बढ़ाता हैं ॥ १९ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसू- नुवैद्यरत्निरत्नसाह्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने स्थलचराणां मांसवर्गो नाम एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥

अ० २२ ] भाषाटीकासमेता । ( १११ ) द्वाविंशोऽध्यायः २२.

अथ जलचरोंका मांसवर्ग । प्रथम हंस आदि जलके पक्षियोंकें मांसका गुण । हंसः श्लेष्मकरो बलातिरुचिदो वृष्योगुरुः शीतलस्त द्वत्कण्ठ सु- जाड्यशुक्रजननो वृष्योऽतिरुच्यो मृदुः ॥ ज्ञेयः सारसकः कफा- निलहरो वृष्यो गुरुश्चोच्यते वृष्यो वीर्यविवर्द्धनः कफहरः कङ्क- स्तथा भासकः ॥ १ ॥ हंसका मांस कफको करता है, बलको और अति रुचिको देता है, वीर्यमें हित है, भारी है और शीतल है । और सारसका मांस हंसके मांसके समान गुणोंवाला है, कंठमें जडपनेको और वीर्यको करता है, वीर्यमें हित है, रुचिमें हित है और कोमल है, और कंक पक्षीका मांस कफ- को और वातको हरता है, वीर्यमें हित है और भारी है और भासपक्षीका मांस वीर्यमें हित है और वीर्यको बढ़ाता है, कफको नाशता है ॥ १ ॥ आडी आदि पक्षीक मांसका गुण । आडी वातविकारकासहननी बल्या वृषा दीपनी क्रौञ्ची चासुरि- शुक्रदोषहननी तुल्यस्तथा कर्कटः ॥ दात्यूहो मरुतस्यनाश- नकरो वृष्यो बलः शुक्रदश्चैष श्रेष्ठगुणः श्रमोपशमनः शुक्रप्रदो वातहा ॥ २ ॥ आड़ीका मांस, बातका विकार और खाँसीको हरता है, बलमें और वीर्यमें हित है और अग्निको जगाता है । क्रौंचका मांस और आसुरीका मांस वीर्यके दोषको हरता है, और इसीके समान गुणोंवाला कांकडपक्षीका मांस है और करढोंक पक्षीका मांस वातको नाशता है, वीर्यमें हित है, बलको और वीर्यको देता है और यह श्रेष्ठ गुणोंवाला है, परिश्रमको शांत करता है॥२॥ अथ मकर मच्छके मांसका गुण । मत्स्यानां मकरः श्रेष्ठो दीपनो वातनाशनः ॥ रुचिप्रदः शुक्रकरश्चाश्मरीदोषनाशनः ॥ ३ ॥ सब प्रकारके मच्छोंके मांसोंमें मकरमच्छका मांस श्रेष्ठ है, अग्निको जगाता है,वातको नाशता- है, रुचिको देता है, वीर्यको करता है और पथरीदोषको नाशता है ॥ ३ ॥

( ११२ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने- .अथ मच्छके मांसका गुण । शृङ्गी वातविनाशनो रुचिकरो वृष्यः कफघ्नो मतस्तस्माद्रोहित- को हितो बलकरो वातात्मकः श्लेष्मकः ॥ ४ ॥ श्लेष्माकरी तु शफरी नलमीनः कफात्मकः ॥ शकुली च विशाला च ज्ञेयौ वातकफात्मकौ॥बिलं विमत्स्यं ज्ञेयं च वातपित्तकफाकरम्॥५॥ शृङ्गी मछलीका मांस वातको नाश करता है, रुचिकर है,वीर्यमें हित है और कफको नाश करनेवाला माना गया है। रोहू मछलीका मांस शृङ्गीसे अधिकहित करनेवाला है,बल करता है, वात प्रकृतिवाला है और कफको बढ़ाता है ॥४॥ शफरी मछली कफ करती है, नल मछली कफ प्रकृतिवाली है, शकुली मछली वातप्रकृतिवाली है, विशाला मछलीका मांस कफस्वभाव वाला है, बिल और विमत्स्य नामक मछलीका मांस वात, पित्त,कफ इन तीनोंको करता है॥५॥ अथ कछुवाके मांसका गुण । कच्छपो मधुरः स्वादुःशुक्रवृद्धिकरो मतः ॥ वातश्लेष्मप्रजननो बृंहणो रूक्ष एव च ॥ ६ ॥ कछुवेका मांस मधुर है, स्वादु है, वीर्यको बढ़ाता है ,वात और कफको उपजाता है, धातु- ओंको पुष्ट करता है और रूखा है ॥ ६ ॥ अथ केकड़ाके मांसका गुण । कुलीरोऽतिबलो वृष्यः पाण्डुक्षयविनाशनः ॥ शोफातिसारग्रहणीस्थविराणां स्त्रियां हितः ॥ ७ ॥ केकड़ाका मांस अधिक बलको करता है वीर्यमें हित है,पाण्डु और क्षय रोगको नाश करता है और शोजा,अतीसार,संग्रहणी दोष,इनसे पीडित और बूढे और स्त्रियोंको हित है ॥ ७ ॥ अथ मांसविशेषता । मकरो दीपनो हृद्यो ग्राही चोष्णविकारहा ॥ मूत्राश्मरीणां शमनो गुल्मातीसारनाशनः ॥ ८ ॥ मकर मच्छका मांस अग्निको जगाता है, सुन्दर है, कब्जको करता है, गरम विकारको ना- शता है, मूत्ररोग और पथरीको शांत करता है, गुल्म और अतीसारको नाशता है ॥ ८ ॥ अथ वर्जनाय मांसका गुण । काकश्येनखगारिसारसशुका यूकाः कलिङ्गा बकाः । भल्लूकोष्ट्रवराहधेनुतनयव्यालास्तथा गर्दभाः ॥ १ अस्मिन् श्लोके शार्दूलविक्रीडितस्य चरणद्वयमेवास्ति ।

मण्डूकादिसरीसृपादिगणा येऽन्ये मता ईदृशस्ते भक्ष्या न शुभावहा ननु नृणां वर्ज्या भिषग्भिर्बुधैः ॥ ९ ॥ गृहचटकच- कोराः काकजात्याः खगाश्च पिकशुकमघशारीभृङ्गदात्यूहमा- ङ्गाः ॥ जलकरंटकपोताः पोटकीखअरीटाः कुकुरमघमलिङ्गन यूकपिङ्गादयश्च ॥ १० ॥ एते भक्ष्या नैव भक्ष्या नचेष्टा ये चान्येऽप्यज्ञातनामाण्डजाश्च ॥ अन्ये चापि श्वापदा ये च निंद्यास्ते खाद्ये वै वर्जिताश्चात्र सर्वे ॥११॥ इति आत्रेयभाषिते हारीतोत्तरे मांसवर्गो नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ काक, बाज, शिकरा, सारस, तोता, यूक, कलिङ्ग और बक पक्षी तथा रीछ, ऊंट, सूकर, बैल, भेडिया और गर्दभ तथा मण्डूक आदि सरीसृप जीवोंका समूह तथा और भी जो इन्हींकी भांति माने गयेहैं वे सब भक्ष्य मनुष्योंका कल्याण करनेवाले नहीं इसी लिये पंडित वैद्योंको अवश्य इनका त्याग करना चाहिये ॥ ९ ॥ घरमें रहनेवाली चिड़िया, चकोर, काककी जातिके पक्षी, शिकराकी जातिके पक्षी, कोयल, तोताकी जातिके पक्षी, मघा, शारी, भंवरा, करढौकपक्षी, मांग, शंखका जीव, कबूतर, पोटकी, खंजना कुत्ता, मघ, मलिंग, जूम, पिंगापक्षी ॥१०॥ इनके मांस खानेके योग्य नहीं हैं और श्रेष्ठ भी नहीं हैं तथा जो जो हिंसक तथा निंदित जीव हैं उनके भी मांस वर्जने चाहिये॥ ११ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवा- दितहारीतसंहिताभाषाटीकायां प्रथमस्थाने मांसवर्गो नाम द्वाविंशोध्यायः ॥ २२ ॥ त्रयोविंशोऽध्यायः २३. ———————— अथ अन्नपानवर्ग । प्रथम मँडका गुण । मण्डः परिस्रवो भक्तस्तर्पणो वातनाशनः ॥ मूत्रमेहसमीरघ्नो रुचिकृन्मूत्रलो मतः ॥ १ ॥ आशुमण्डो भवेद्ग्राही मधुरो वा कफात्मकः ॥ तर्पणः क्षयदोषघ्नः शुक्रवृद्धिकरः परः ॥ २ ॥ मण्ड झरनेवाला है, खानेयोग्य हैं तृप्तिको करता है, वातको नाशता है, मूत्र, मेह और वातको नाशता है, रुचिको करता है और मूत्रको उपजाता है ॥१॥ शीघ्र किया मण्ड कब्जको करता है, मधुर है, कफकी प्रकृतिवाला है, तृप्तिको करता है, क्षय दोषको नाशता है और वीर्यको बढ़ाता है २ ८

( ११४ ) हारीतसंहिता । [ प्रथमस्थाने-

अथ भातका गुण । अप्रसाधितभक्तो युगन्धराणां भक्तश्च घनो विशदमधुरश्च ॥ कफे त्रिदोषशमनश्च कथ्यते कासश्च श्वासात्मक एव स स्मृतः॥३॥ नहीं साधित किया ऐसा युगन्धर चावलोंका भात कठिन है, सुन्दर है, मधुर है, कफमें हित है, त्रिदोषको नाशता है, खांसीको और श्वासरोगको हरता है ॥ ३ ॥ अथ यवागूका गुण । सन्दीपनो स्वेदकरा यवागूः सम्पाचनी दोषमलामयानाम् ॥ सन्तर्पणी धातुबलेन्द्रियाणां शस्ता भवेत्स्याज्ज्वररोगिणां च॥४॥ यवागू पसीनाको लाती है, अग्निको जगाती है, दोष, मल और रोग इनको पकाती है और धातु, बल और इन्द्रियोंको तृप्त करती है और ज्वररोगवालोंको श्रेष्ठ है ॥ ४ ॥ अथ यवागूका लक्षण । भागैकञ्च भवेद्द्रव्यं द्विभागन जलं क्षिपेत् ॥ चित्रकं पिप्पली- मूलं पिप्पलीचव्यनागरम् ॥५॥ धान्यकस्य समांशानि पिष्ट्वा श्वेतांश्च तण्डुलान्॥संशुद्धा शिथिला किञ्चित् सा यवागूर्निग- द्यते ॥ ६ ॥ यवागूमुपभुञ्जानो जनो नारुचिमाचरेत्॥ शाक- माषफलैर्युक्ता यवागूः स्याच्च दुर्जरा ॥ ७ ॥ एक भाग द्रव्य और दो भाग पानी मिलावे और चीता, पीपलामूल, पीपल, चव्य, सोंठ ॥ ५ ॥ धनियां ये सब समभाग लेने, सफेद और दूसरे रंगके चावल इन सबोंको पीस मिलाके पकावे कुछ पतली रहे तिसको यवागू कहते हैं ॥ ६ ॥ यवागूका भोजन करता हुआ मनुष्य अरुचिको नहीं प्राप्त होता और शाक, उड़द, फलसे युक्त यवागू दुर्जर होती है ॥ ७ ॥ अथ मंडका गुण । पञ्चकोलैकधान्याकैर्युक्तो रास्नान्वितः पुनः ॥ मण्डस्त्रिदोषशमनो ज्वराणां पाचनः परः॥ ८ ॥ पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, धनिया, रायसनसे युक्त किया मंड त्रिदोषको नाशता है और ज्वरोंको पकाता है ॥ ८ ॥ अथ खीरका गुण । पायसं गुरु विष्टम्भजननं श्लेष्मवातलम् ॥ पित्तसंशमनं बल्यं वृष्यं श्रेष्ठं रसायनम् ॥ ९॥ खीर भारी है, विष्टंभको करती है, कफ और वातको करती है, पित्तको शांत करती है, बलमें और वीर्यमें हित है, श्रेष्ठ है और रसायन है ॥ ९ ॥


१ “पिप्पली चव्य विश्वाह्वा पिप्पलीमूलचित्रकैः। पञ्चकोलमिति ख्यातं सद्यो दीपनपाचनम्”॥ शार्ङ्गधरे ।