हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
अ० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( २४७ ) जस्य विकारमुग्रम् ॥ ८ ॥ हल्लासकासवमिजाड्यशिरोगुरुत्वं स्तैमित्यशीतलतनूरुचिबन्धनं च ॥ भुक्तप्रसेकमधुरास्यमथा- भिरामं स्निग्धं मुखं भवति यस्य कफात्मकोऽसौ ॥ ९ ॥ चिह्नानि चैतानि भवन्ति यस्य कफात्मकं शूलमवेहि तस्य ॥ सपैत्तिकानीव भवन्ति यस्य वदन्त्यजीर्णेन च शूल- मस्य ॥ १० ॥ कसरत नहीं करना, चिकना नहीं खाना, पिच्छल भोजन करना, ईखका रस, तेल, दूध इन्होंका भोजन करना, अल्प भोजन करना, निद्राका सेवन करना इन योगों करके कफ कुपित होता है ॥७॥ उड़द, अत्यंत शीतल पदार्थ, शीतल दूध, दही, मच्छी और अनूपदेशके जीवोंका मांस इनके सेवन करनेसे कफ जठराग्निको शांत कर देता है और शीघ्रही शूलको उत्पन्न कर देता है, मनुष्यके कोष्ठस्थानमें अति उग्र विकार करता है ॥ ८ ॥ हल्लास अर्थात् थुकथुकी, खाँसी, वमन, जड़ता, शिर भारी, गीलापन, शीतल शरीर होना, रुचिबंध होनी, भोजन करे पीछे थूक आना, मीठा मुख रहे, आलस्य रहे, चिकना मुख रहे जिसके ये उपद्रव हों वह कफसे उपजा शूल जानना ॥९॥ जिसके ये लक्षण हों वह कफका शूल होता है और जिसके पित्तके लक्षण मिलते हों उसको वैद्यजन अजीर्णसे उपजा हुआ भी शूल कहते हैं ॥ १० ॥ अथ द्विदोषजशूलकी उत्पत्ति । हृत्कण्ठपार्श्वे सकफः सपित्तः हृन्नाभिमध्ये कफपित्तशूलः ॥ बस्तौ च नाभौ प्रकरोति पीडां देहेऽखिले यः स तु वातपित्तात् ११ कफसे उपजा शूल, हृदय, कंठ, पसली, इनमें पीड़ा करता है और पित्तसे उपजा शूल हृदय, नाभि इनमें पीड़ा करता है और कफपित्तसे उपजा शूल बस्तिस्थान और नाभिमें पीड़ा करता है और जो सब शरीरमें पीड़ा हो वह वातपित्तसे उपजा शूल जानना ॥ ११ ॥ अथ दशप्रकारके शूल । अथ शूलोंकी साध्यासाध्य परीक्षा । एकोऽपि सुखसाध्योऽसौ द्वन्द्वः कष्टेन सिध्यति ॥ त्रिदोषजस्त्वसाध्यस्तु बहूपद्रवसंयुतः ॥ १२ ॥ एक दोषसे उत्पन्न हुआ शूल सुखसाध्य होता है, दो दोषोंसे उपजा हुआ शूल कष्टसाध्य कहाता है, त्रिदोषसे उपजा और बहुत उपद्रवोंसे संयुक्त शूल असाध्य होता है ॥१२ ॥ अथ शूलोंकी संख्या और पृथक्करण । निदानैः कुपितो वायुर्वर्त्तते जठरान्तरे ॥ तेन शूला हि दशधा भिषग्भिः परिगीयते ॥१३॥ त्रयो वातादिका ज्ञेया द्वन्द्वजास्तु
( २४८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- पुनस्त्रयः॥सामनिरामकौ द्वौ च शूलाश्चाष्टाविमे स्मृताः॥१४॥ अजीर्णान्नवमः प्रोक्तो दशमः परिणामजः ॥ एवं दशप्रकारेण शूलं संभवते नृणाम् ॥१५॥ भुक्तोपरि भवेद्यस्तु सोऽपि ज्ञेयः कफात्मकः॥ जीर्णेऽन्ने च भवेद्यस्तु स ज्ञेयःपरिणामजः॥१६॥ कारणोंसे कुपित हुआ वायु उदरके भीतर वर्तता है फिर उसके किये हुए दश प्रकारके शूल उत्पन्न होजाते हैं ॥१३॥ तीन शूल वात आदिक दोषोंके और तीन दो दोषोंसे मिले हुए शूल और १ साम अर्थात् आमसहित शूल और १ निरामशूल ऐसे आठ प्रकारके तो ये हैं ॥ १४ ॥ और नवमा९ अजीर्णसे उपजा शूल और दशमा परिणामजशूल ऐसे मनुष्योंके दश प्रकारके शूल कहे हैं ॥ १५ ॥ जो भोजन करनेसे पीछे शूल होता है वह कफका शूल कहाता है और भोजन किया हुआ अन्न जर जावे तब शूल उपजे यह परिणाम- शूल कहाता है ॥ १६ ॥ अथ वातशूलका लक्षण । आध्मानमूर्ध्वं च विबन्धनं च जृम्भा तथा वेपथुमर्जनं च ॥ उद्गीरणं स्निग्धमुखातिजिह्वा वातेन शूलं भजते विचिज्ञः॥१७॥ ऊपरले अंगोंमें अफारा हो और मलका बंधा हो, जंभाई आवे,अत्यंत कांपै,वमन और डकार आवें, मुख और जिह्वा चिकनी हो, ये लक्षण वातकी शूलके हैं ॥ १७ ॥ अथ पित्तशूलका लक्षण । तृष्णा विदाहोऽतिरतिर्विमोहः कृच्छ्रेण मूत्रं कटुकास्यता च ॥ स्वेदातिशोषो वदनं च पीतं पित्तात्मकं तं प्रवदन्ति धीराः१८॥ दाह हो, ग्लानि हो, मोह हो, तृषा हो, कष्टसे मूत्र उतरे,मुख कड़ुआ रहे,पसीना आवे,अत्यन्त शोष हो, मुख पीला रहे ये लक्षण हों उसको वैद्यजन पित्तका शूल कहते हैं ॥ १८ ॥ अथ कफशूलका लक्षण । छर्दिस्तथा कासबलासमोह आलस्यतन्द्रा जडतातिशैत्यम् ॥ छर्दि हो, खांसी, जुखाम , मोह, आलस्य, तन्द्रा, जडपना और अत्यन्त शीतलता ये कफसे उपजे शूलमें कहते हैं ॥ अथ द्वन्द्वजशूलका लक्षण । कफात्मकं तद्विषजां वरिष्ठ शूलं भवेद्द्वन्द्वजरोगसंज्ञम् ॥ १९ ॥ त्रिभिस्तु दोषैस्तु त्रिदोषजःस्याद्रक्तेन चैकादश एवमुक्तः॥पित्ता-
स० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( २४९) त्मकानि प्रभवन्ति यस्य चिह्नानि रक्तस्य च छर्दनं स्यात्॥२०॥ शोषस्तृषाश्वासविदाहकासा भवन्ति रक्तप्रभवेऽतिशूलः॥२१॥ विना वातेन नो शूलं विना पित्तेन नो भ्रमः॥ न कफेन विना च्छर्दिर्न रक्तेन विना तमः ॥ २२ ॥ जो दो दोषोंसे उपजा हो, कफप्रधान वह द्वन्द्वज शूल कहाता है॥१९॥ तीन दोषोंसे उपजा हुआ त्रिदोषज शूल कहाता है और रक्तसे उत्पन्न हुआ ग्यारहवां शूल होता है, जिसके पित्तके लक्षण हों और रुधिरकी छर्दि करे ॥ २० ॥ शोष हो, तृषा हो, दाह हो, खांसी हो, श्वास हो, वह रक्तसे उपजा हुआ शूल कहाता है ॥ २१ ॥ वातके बिना शूल नहीं होता है और पित्तके बिना भ्रम नहीं होता है, कफके बिना छर्दि नहीं होती है और रक्तके बिना अन्धेरी नहीं होती है॥ २२ ॥ अथ सब प्रकारके शूलोंकी चिकित्सा । इति शूलपरिज्ञानमतो वक्ष्यामि भेषजम्॥ येन शूलार्त्तिशमनं शूली संपद्यते सुखम् ॥ २३ ॥ दृष्ट्वा शूलं लङ्घनं पाचनं च वान्तिं चैव स्वेदनं रेचनं वा॥ क्षारं चूर्णं चार्पयेच्छूलशान्त्यै पानाभ्यङ्गान्कासमाने मनुष्ये ॥ २४ ॥ इस प्रकार शूलका निदान तो कह दिया है । अब इनकी औषधोंको कहेंगे जिससे शूलकी पीडा शांत होती है और शूलरोगवाला पुरुष सुखी होता है ॥ २३ ॥ वैद्यजन शूलको देखि लंघन , पाचन, विरेचन, वमन, संस्वेदन इन कर्मोंको करवावे और शूलकी शांतिके लिये क्षारचूर्णको देवे और जो मनुष्यके खांसीसहित शूल हो तो पान, अभ्यंग अर्थात् मालिस करवावे ॥ २४ ॥ अथ शूल तथा गुल्मपर हिंग्वादि क्वाथ । हिङ्गु नागरशटीसुवर्चलं दारुपौष्करघनापुनर्नवाः ॥ क्वाथपानमिति शूलिनां हितं पाचनं जठरगुल्मिनामपि ॥२५॥ हींग, सोंठ, कचूर, कालानमक, देवदार, पोहकरमूल, नागरमोथा, सांठी, इनके क्वाथका पान शूलरोगवालोंको हित है और उदरगुल्मरोगवालोंको यह क्वाथ पाचन है॥ २५ ॥ अथ वातशूलपर हिंग्वादिक्वाथ । हिङ्गु पौष्करशटीसुवर्चलं क्वाथमेवमपि शूलिनां हितम् ॥ वातशूलशमनाय शस्यते पाचनं निगदितं च वर्त्तते ॥ २६ ॥
(.२५० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- हींग, पोहकरमूल, कचूर, कालानमक, इनका क्वाथ भी शूलरोगवालोंको हित है। यहक्वाथ वातशूलको शांत करनेके लिये श्रेष्ठ कहा है और यही क्वाथ पाचन भी कहा है ॥ २६ ॥ अथ सैंधवादि चूर्ण । सिन्धूत्थहिङ्गु रुचकं यवानी पथ्यायवक्षारशटीविचूर्णम् ॥ देयं सुखोष्णेन निहन्ति शूलं वातात्मकं वाप्यचिरेण शूलम् ॥ २७ ॥ सेंधानमक, हींग, कालानमक, अजवायन, हरड़ें, जवाखार और कचूरको समान भाग ले चूर्ण बना सुखसे सुहाते हुए गरम २ जलके संग देनेसे वातसे उपजा हुआ शूल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है ॥ २७ ॥ अथ हिंङ्ग्वादि चूर्ण । हिङ्गु सौवर्चलं पथ्या यवानी सपुनर्नवा ॥ बालैरण्डो बृहत्यौ द्वे तुवरं त्र्यूषणान्वितम् ॥ २८ ॥ क्षारसौवर्चलोपेतं क्वाथो वा चूर्णितस्तथा॥सद्यो वातात्मकं शूलं हन्ति सद्योविषूचिकाम् २९. हींग, कालानमक, हरड़ें, अजवायन, सांठी, नेत्रवाला, अरंड, दोनों कटेहली, सफेद शिरस, सोंठ, मिर्च पीपल, ॥ २८ ॥ जवाखार, कालानमक, इनका क्वाथ अथवा चूर्ण वातसे उपजे शूलको और विषूचिकाको शीघ्र ही नाश देता है ॥ २९ ॥ अथ तुंबुरुआदि चूर्ण । तुम्बुरुपौष्करहिङ्गु यवानी त्र्यूषञ्च वा त्रिबृहतीलवणेन॥ युक्तमिदं लवणाष्टकचूर्णं भवति शूलनिवारणक्षमम् ॥३०॥ धनियां, पोहकरमूल, हींग, अजवायन, सोंठ, मिर्च, पीपल, तीनों प्रकारकी कटेहली, नमक इन सबोंको युक्तकर चूर्ण बनावे यह लवणाष्टकचूर्ण कहाता है, शूलको शीघ्र ही निवा- रण कर देता है ॥ ३० ॥ अथ एरंडादिक्वाथ । क्वाथो निहन्ति मरुतोद्भवशूलसंघानेरण्डनागरसुवर्चलरामठेन ॥ पथ्यावचेन्द्रयवनागरतोययुक्तं हिङ्गु सुवर्चलयुतं च निहन्ति शूलम् ॥ ३१ ॥ अरंड, सोंठ, कालानमक, हींग अथवा हरड़ें, वच, इंद्रजव, सोंठ, हींग, कालानमक इन- का क्वाथ बना देनेसे वातसे उपजे शूलोंके समूहोंका नाश होता है ॥ ३१ ॥
अ० ७ ] भाषाटीकासमेत। ( २५१) अथ बृहद्धिङ्गुचूर्ण। हिङ्गु नागरषड्ग्रन्था यवानी अभया त्रिवृत् ॥ विडङ्गं दारु चव्यञ्च तुम्बरुकुष्ठमुस्तकाः॥३२॥हपुषा कलशी रास्ना वत्स- का सद्दुरालभा ॥ सितारवी बृहत्यौ च लांगली पञ्चजीरकम् ॥३३॥ पुष्करं तिन्तिडीकं च वृक्षाम्लं चाम्लवेतसम् ॥ द्वौ क्षारौ पञ्चलवणं समं चैकत्र मिश्रयेत् ॥३४॥ मूत्रेण भावनाञ्चै- कां दत्त्वा छायाविशोषिताम्॥बीजपूरकतोयेन भावयेच्च दिन- त्रयम् ॥ ३५ ॥ बिडालपदिकां मात्रां युञ्जीत शूलशान्तये ॥ वातेनोष्णोदकेनापि सितशर्करयान्वितः ॥ ३६ ॥ त्रिफला- क्वाथो मद्येन श्लेष्मरोगे प्रशस्यते॥शूलानाहविबन्धानां मन्दा- ग्रौ गुल्मविद्रधीन् ॥ ३७ ॥ प्लीहोदराणाञ्च पाण्डुज्वरिणां च विशेषतः ॥ निहन्ति देहसंघातं मेघवृन्दं मरुद्यथा ॥ ३८ ॥ हींग, सोंठ, वच, अजवायन, हरडें, निशोत, वायविडंग, देवदार, चव्य, धनियाँ, कूट, नागरमोथा ॥३२॥ हाऊबेर, पिठवण, रास्ना, कूडा, जवासा, सफेद गोकर्णी, दोनों कटेहली, कलहारी, पांचों जीरे ॥३३॥ पोहकरमूल, इमली, बिजौरा, अम्लवेत, जवाखार, सजीखार, पांचोंनमक इन सबोंको समानभाग ले एक जगह चूर्ण बना ॥ ३४ ॥ गोमूत्रमें भावना दे छा- यामें सुखालेवे पीछे बिजौराके रसमें तीन दिनतक भावना देवे ॥ ३५ ॥ पीछे एक तोला प्रमाण इस चूर्णको देनेसे शूलरोग शांत होता है, वातसे उपजे शूलमें गरमजलके सङ्ग देवे ॥ ३६ ॥ और कफसे उपजे शूलमें सफेद खांड़में अथवा त्रिफलाके क्वाथके सङ्ग अथवा मदिराके संग देना हित है और शूल, अफारा, मलका बन्धा, मन्दाग्नि, गुल्मरोग, विद्रधि ॥ ३७ ॥ तिल्ली, उदररोग, पांडुरोग, ज्वर, देहका मुटापा इन सब रोगोंको यह चूर्ण नाशता है जैसे मेघोंके समूहको वायु ॥ ३८ ॥ अथ पित्तशूलचिकित्सा। धात्रीफलं लोहरजश्व पथ्या त्र्यूषं समांशेन विभाव्य त तु ॥ रसेन वा दाडिममातुलुङ्ग्याश्चूर्ण सिताढ्यं च सपित्तशूले३९॥ धात्रीफलादि चूर्ण, आंवला, लोहका चूर्ण, हरड़ें, सोंठ, मिर्च, पीपली इन सबोंको समान भाग ले अनारके रसमें अथवा बिजौराके रसमें भावना देवे पीछे इस मिसरी मिला देनेसे पित्त- शूल शांत होता है ॥ ३९ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( २५२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ दाडिमादिचूर्ण । बिडालकं दाडिमपूतनां च धात्रीसमेतं विदधीत चूर्णम् ॥ तन्मातुलुंगस्य रसेन भावितं सपित्तशूलप्रशमाय भक्षेत् ॥४०॥ अनारदाना, हरड़ै, आंवला, इन सबोंका एक २ तोला प्रमाण ले चूर्ण बना फिर बिजौराके रसमें भावना देवे। यह चूर्ण पित्तशूलको शांत करता है ॥ ४० ॥ अथ जीवन्त्यादि घृत । जीवन्त्याद्यं घृतं पाने क्षीरं वापि सितान्वितम् ॥ कर्त्तव्यं रेचनं नित्य पित्तशूलनिवारणम् ॥ ४१ ॥ जीवंतीआदि औषधगणमें सिद्ध किया हुआ घृत अथवा मिश्रीसे युक्त दूध इनके जुलाबसे निश्चय पित्तशूलका निवारण होता है ॥ ४१ ॥ अथ पित्तशूलका दूसरा उपचार । शिशिरसरस्तोयागाहन चन्दनानि विशदघुटितमध्ये स्वापनं वै निशासु ॥ कनकरजतकांस्याम्भोजहैमं तुषारं कृतमिति विधिना वै पैत्तिके शूलहेतोः ॥ ४२ ॥ सरोवरके ठंढ़े जलसे स्नान करना, चंदन लगाना, उत्तम चौगरदे घेरवाले मकानमें रात्रिमें शयन करना और सुवर्ण, चांदी, कांशी, कमल, इनकी ठंढकसे शीतलता करनी ये विधि पित्तशूलमें करनी चाहिये ॥ ४२ ॥ अथ पित्तशूलमें भोजन । सितशाल्योद्भवा लाजाः सितामधुयुतं पयः ॥ दाहं पित्तज्वरं छर्दिं सद्यः शूलं निहन्ति च ॥४३॥ जाङ्गलानि च मांसानि भोजनाथ प्रशस्यते॥घृतं क्षीरं समधुरं प्रशस्तं पित्तशूलिनाम्॥४४ सफेद सांठी चावलोंकी खील, मिश्री, शहद इनसे युक्त दूध ये दाहको, पित्तज्वरको, छर्दिको और पित्तशूलको नाशती हैं ॥ ४३ ॥ और जांगलदेशके जीवोंका मांस भोजनके वास्ते श्रेष्ठ कहा है और घृत, दूध, शहद ये पित्तशूलवालोंको हित हैं ॥ ४४ ॥ अथ कफशूलचिकित्सा । लङ्घनं वमनं चैव पाचनं श्लेष्मशूलिनाम् ॥ न घनातिमधुराणि शयनं च विधेयकम् ॥ ४५ ॥
अ० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( २५३ ) कफशूलवालोंको लंघन कराना, वमन कराना, पाचन औषध देना हित है, और कड़े पदार्थ, अत्यंत मीठा पदार्थ नहीं देवे और शयन नहीं करावे ॥ ४५ ॥ अथ बिल्वादिक्वाथ । बिल्वाग्निमन्थवृषाचित्रकनागराश्च एरण्डहिङ्गु सहसैन्धवकं समाशम् ॥ क्वाथः सदैव कफजं विनिहन्ति शूलं सद्यःकरोति जठरानलवर्द्धनं च ॥ ४६ ॥ बेलगिरी, अरणी, वांसा, चीता, सोंठ, अरंड, हींग, सैंधानमक इनको समान- भाग ले क्वाथ बना देनेसे शीघ्र ही कफसे उपजे शूलको दूर करता है और जठराग्निको बढ़ाता है ॥ ४६ ॥ अथ मातुलुङ्गादिरस । मातुलुङ्गरसं धात्रीरसं सैन्धवसंयुक्तम्॥ शोभाञ्जनकमूलस्य रसं च मरिचान्वितम् ॥४७॥ सक्षारमधुनोपेतं श्लेष्मशूलनिवार- णम् ॥ कृतक्षयोद्भवं कासं नाशयत्याश्वसंशयम् ॥ ४८ ॥ बिजौरेका रस, आंवलेका रस इनमें सैंधानमक मिला और सहजिनेकी जड़के रसमें काली मिर्च मिला ॥ ४७ ॥ फिर जवाखार, शहद, इनसे युक्त कर इनके देनेसे कफका शूल दूर होता है और क्षयरोगसे उपजीहुई खांसीको शीघ्रही नाशता है ॥ ४८ ॥ अथ तुवरादिचूर्ण । तुवरं ग्रन्थिकैरण्डा व्योषं पथ्याजमोदकम् ॥ सक्षारलवणोपेतं चूर्णं शूले कफात्मके ॥ ४९ ॥ सफेद शिरस, पीपलमूल, अरंड, सोंठ, मिर्च, पीपल, हरड़े, अजमोद, जवाखार, नमक इनका चूर्ण कफसे उपजे शूलको दूर करता है ॥ ४९ ॥ अथ एरंडादि क्वाथ । एरण्डबिल्वबृहतीद्वयमातुलुङ्ग-पाषाणभित्रिकटूमूलकृते कषाये॥ सक्षारहिङ्गुलवणाश्च सुतैलमिश्राः श्रोण्यंसमेढ्रहृदयस्तनकु- क्षिदेयम् ॥ ५० ॥ अरंड, बेलगिरी, दोनोंकटेहली, बिजौरा, पाषाणभेद, त्रिकटु, सोंठ, मिर्च, पीपल, इनसे कियेहुए क्वाथमें जवाखार, हींग, नमक, तेल इनको मिला फिर, कटि, कंधे, लिंग, हृदय, कुक्षी, चूंची, इन स्थानोंमें इसकी मालिस करनी चाहिये ॥ ५० ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( २५४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ वातपित्तशूलचिकित्सा । पटोलारिष्टपत्राणि त्रिफलासंयुतानि च ॥ क्वाथं मधुयुतं पानं शूले पैत्ते समीरणे ॥ ५१ ॥ पित्तज्वरतृषादाहरक्तपित्तनि- वारणम् ॥ ५२ ॥ ( पटोलादि क्वाथ ) परवल, नींव इनके पत्ते, त्रिफला इनका क्वाथ बना तिसमें शहद- मिला पान कराना वातपित्तशूलको शांत करता है ॥ ५१ ॥ पित्तज्वर, तृषा, दाह और रक्तपित्त इनको निवारण करता है ॥ ५२ ॥ अथ दुरालभादिकल्क । दुरालभा पर्पटकं च विश्वा पटोलनिम्बाम्बुदतिन्तिडीकम् ॥ सशर्करं कल्कमिदं प्रयोज्यं सपित्तवातोद्भवशूलशान्त्यै॥५३॥ जवासा, पित्तपापड़ा, सोंठ, परवल, नींव, नागरमोथा, अमली इनका कल्क बना खांड मिला देनेसे पित्तवातसे उपजा शूल शांत होता है ॥ ५३ ॥ अथ वातकफशूलचिकित्सा । सौवर्चलं समशटी सहनागरा च शुण्ठीयुतेन कथितेन जलेन चूर्णम्॥पीतं निहन्ति मरुतायुतश्लैष्मिकाणां पार्श्वार्तिशूलज- ठरानलहृत्प्रशस्तम् ॥ ५४ ॥ “सौवर्चलादि चूर्ण” कालानमक, कचूर, नागरमोथा, सोंठ इनका चूर्ण बना औटाया हुआ जलके संग लेनेसे वात कफसे उपजाहुआ शूल शांत होता है और पसली, शूल, मन्दाग्नि इन रोगोंके हरनेमें श्रेष्ठ कहा है ॥ ५४ ॥ अथ दार्वादि क्वाथ । दारु नागरकं वासा हिङ्गु सौवर्चलान्वितम् ॥ क्वाथो वातकफे शूले आमेऽजीर्णे विबन्धके ॥ ५५ ॥ देवदार, सोंठ, वांसा, हींग, कालानमक, इनका क्वाथ वातकफसे उपजे शूल, आमरोग, अजीर्ण और मलके बन्धमें देना श्रेष्ठ है ॥ ५५ ॥ अथ त्रिदोषशूल चिकित्सा । पलाशकदलीवासापामार्गकोकिलाह्वयम्॥ गोमूत्रेण शृतं तच्च हिङ्गुनागरसंयुक्तम् ॥५६॥ हितं त्रिदोषजे शूले कामलाविड्वि- बन्धके ॥ गुल्मोदराणां शमनं मंदाग्नीनां नियच्छति ॥ ५७ ॥
अ० ७] भाषाटीकासमेता । (२५५) “पलाशादिघृत” टेसू, केला, वांसा, लटजीरा, तालमखाना, हींग, सोंठ, इनको गोमूत्रमें पक्व क्वाथ बना देनेसे ॥ ५६ ॥ त्रिदोषसे उपजा शूल, कामला, मलका बंधा, गुल्मरोग, उदररोग, मन्दाग्नि दूर होता है ॥ ५७ ॥ अथ सर्वशूलपर उपाय । एक एव कुबेराक्षः सर्वशूलापहारकः ॥ किं पुनः स त्रिभिर्युक्तः पथ्यारुचकरामठैः ॥ ५८ ॥ अकेली पाढ़रि ही सर्वशूलोंको दूर करती है, फिर उसके साथ हरड़े, सोंचर और हींग होवे तो क्या कहना अर्थात् अवश्यही शूलको दूर करती है ॥ ५८ ॥ अथ शङ्खक्षार । शङ्खक्षारं च लवणं हिङ्गुव्योषसमन्वितम् ॥ उष्णोदकेन तत्पीतं हन्ति शूलं त्रिदोषजम् ॥ ५९ ॥ शंखका खार, नमक, हींग, व्योष, (सुंठ, मिर्च, पीपल,) इनका चूर्ण गरमजलके संग पीनेसे त्रिदोषसे उपजा शूल नाश होता है ॥ ५९ ॥ अथ सामान्यसे सब शूलोंकी चिकित्सा । लङ्घनं वमनं चैव विरेकश्चानुवासनम् ॥ निरूहो बस्तिकर्माणि परिणामे त्रिदोषजे ॥ ६० ॥ त्रिदोषसे उपजे परिणामशूलमें लंघन, वमन, जुलाब, अनुवासनवस्ति, इन कर्मोंको करवावै ॥ ६० ॥ अथ चित्रकादिमोदक । चित्रकं त्रिवृता दन्ती विडङ्गं कटुकत्रयम् ॥ समं चूर्ण गुडेनाथ कारयेन्मोदकान्सुधीः ॥६१॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय पश्चादुष्णो- दकं पिबेत्॥ परिणामोद्भवं शूलं हन्ति शूलं नरस्य च ॥ ६२ ॥ चीता, निशोत, जमालघोटेकी जड, वायविडंग, सोंठ, मिर्च, पीपल इनको समान भाग ले चूर्ण बना फिर वैद्यजन उसको गुड़में गोली बांधलेवे ॥ ६१ ॥ प्रातःकाल उठके इसका भक्षण करे और ऊपरसे गरमजल पीवे । यह परिणामशूलको नाशता है ॥ ६२ ॥ १ कृष्णवृन्ता कुबेराक्षीत्यमरः । कृष्णवृन्ता कुबेराक्षी सप्तगठलायाः “पाडली” इति ख्याताया इत्यमरविवेके । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( २५६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ यवान्यादिचूर्ण । यवानीहिङ्गुसिन्धूत्थं क्षारं सौवर्चलाभया ॥ सुरामाण्डेन पातव्या परिणामे त्रिदोषजे ॥ ६३ ॥ अजवायन, हींग, सधानमक, जवाखार, कालानमक, हरड़े, इनको मदिराके संग पीनेसे त्रिदोषसे उपजा परिणामशूल शांत होता है ॥ ६३ ॥ अथ हिंग्वादिगुटी । हिङ्ग्व्योषवचाजमोदहपुषा पथ्या यवानी शटी जाजीपिप्पलि- मूलदाडिमवृकीचव्याग्निकं तिन्तिडी। तस्माच्चाम्लसुवर्चलोऽपि च यवक्षारं तथा सर्जिका सिन्धूत्थं विडचूर्णकं समकृतं स्याद्वी- जपूरे रसे ॥६४॥ कुर्याच्चूर्णगुटीं समक्षफलदाम क्षप्रमाणा- मिमां कल्को वातविकारिणां प्रददतः शूलार्शसप्लीहकान् ॥ कासानाहविबन्धमेहहृदयशूलं निहन्त्याशु वै कर्त्तव्यं किल संशयं न भिषजां वृन्दैः सदा धार्यते ॥६५॥ एष हिंग्वादिको नाम सर्वशूलार्त्तिनाशनः ॥ सर्ववातविकारघ्नः सर्वक्षय- निवारणः ॥ ६६ ॥ हींग, सूंठ मिर्च, पीपल, वच, अजमोद, हाउबेर हरड़े, अजवायन, कचूर, जीरा, पीपला मूल, अनारदाना, कश्मीरीपाठा, चव्य, चीता, आमलकी, निंबू, जवाखार, कालानमक, साजी, सेंधानमक, मणियारीनमक इनको समान भाग ले चूर्ण बना बिजौराके रसमें ॥६४॥ इसचूर्णकी तोला प्रमाण गोली बनावे अथवा इन्होंका कल्क वना देनेसे वातके विकार, शूल, बवासीर, तिल्ली, खाँसी, अफारा, मलका बंधा, प्रमेह और हृदयशूल शीघ्र ही नाशता है इसमें संशय न करे श्रेष्ठ वैद्य इसे धारण करते हैं॥६५॥ यह हिंगुआदिकनामवाला औषध सम्पूर्ण शूलकी पीड़ाओंको नाश करता है और सब प्रकारके वातविकारोंको नाशता है, सब प्रकारके क्षयरोगोंको निवारण करता है ॥ ६६ ॥ अथ शूलरोगके उपद्रव । अतीसारतृषा मूर्च्छा अनाहो गौरवोऽरुचिः ॥ श्वासकासौ वमिर्हिक्का शूलस्योपद्रवा दश ॥ ६७ ॥ शूलं सोपद्रवं तृष्णां भिषग्दूरे परित्यजेत् ॥ अनुपद्रवे क्रिया प्रोक्ता भिषजां सिद्धि- मिच्छता ॥ ६८ ॥
अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( २५७ ) अतिसार, तृषा, मूर्च्छा, अफारा, भारीपन, अरुचि, श्वास, खांसी, वमन, हिचकी, ये दश शूलके उपद्रव हैं ॥ ६७ ॥ उपद्रवोंसे युक्त और तृषासे संयुक्त शूलको वैद्य- जन दूरसे त्यागे और उपद्रव रहित शूलमें सिद्धिकी इच्छा करनेवाले वैद्यको चिकित्सा करनी कही है ॥ ६८ ॥ शूलमें पथ्यापथ्य । वर्जयेद्विदलं शूली तथा सघनशीतलम् ॥ पिच्छलं च दधि चैव दिवानिद्रां च वर्जयेत् ॥ ६९ ॥ शालिषष्टिकसिन्धूत्थहि- ङ्गुसौवीरकं तथा ॥ सुरा वा गुडशुण्ठी वा पाने श्रेष्ठा भिष- ग्वर ॥७०॥ शतपुष्पावास्तुकं च हितं प्रोक्तं प्रशस्यते ॥७१॥ एणतित्तिरिलावाश्च क्रौञ्चाः शशकसारसाः ॥ एषां मांसानि शस्तानि कथितानिभिषग्वर ॥ ७२ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे तृतीयस्थाने शूलचिकित्सानाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ शूलरोगवाला पुरुष दालको वर्ज देवे और घना, शीतल और झागोंवाला ऐसा दहीत्याग देवे और दिनमें सोना वर्ज देवे ॥ ६९ ॥ शालीसंजक चावल, सांठी चावल, सैंधानमक, हींग, कांजी इनका सेवना हित है और मदिरा अथवा गुड़, सोंठ इनका पान करना वैद्यजनोंने हित कहा है ॥७०॥ सौंफ और बथुवेका शाक शूलरोगमें हित कहे हैं ॥ ७१ ॥ मृग, तीतर, लावापक्षी, कूंजीपक्षी, चौगड़ा, सारसपक्षी इनका मांस श्रेष्ठ कहा है ॥७२॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहाय- सूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने शूलचिकित्सानाम सप्तमो- ऽध्यायः ॥ ७ ॥ अष्टमोऽध्यायः ८. अथ पांडुरोगचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि पांडुरोगं महागदम् ॥ पञ्चैव पाण्डुरोगास्ते सम्भवन्तीह मानुषे ॥ १॥वातिकः पैत्ति- कश्चैव श्लैष्मिकः सान्निपातिकः ॥ पञ्चमो रूक्षणः प्रोक्तो वक्ष्ये चैषां तु सम्भवम् ॥ २ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे पुत्र ! सुनो पांडुरोगकी चिकित्साको कहते हैं, मनुष्यके पांच प्रकारके पांडुरोग होते हैं ॥ १ ॥ वातसे उपजा १, पित्तसे उपजा २, कफसे उपजा ३, सन्नि- पातसे उपजा ४, रूक्षणसंज्ञक ५ पांचवा ऐसे ५ हैं इनके उत्पत्तिको कहते हैं ॥ २ ॥ १७ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( २५८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ पांडुरोगका निदान । दीर्घाध्वन्ये पीडितो वा ज्वरेण रक्तस्रावे पीडितो वा व्रणेन ॥ चिन्तायासाद्रोधनाद्वा मनुष्यस्यायं पाण्डुर्जायते सेवते यः ॥ ॥३॥क्षारं चाम्लं कल्यमैरेयसेवा अव्यायामान्मैथुनातिश्रमेण॥ निद्रानाशेनातिनिद्रा दिवापि योगैश्चैतैर्मृत्तिकाभक्षणेन ॥ ४ ॥ पथि शिथिलशरीरे रोगसंपीडिते वा लवणकटुकषायासेवना- म्लेन मृद्भिः॥अतिसुरसमजस्रं सेवनातिक्रमेण नयतिरुधिरशोषं तेन वै पाण्डुरोगम् ॥ ५ ॥ अत्यंत मार्गके चलनेसे अथवा ज्वरसे पीडित होनेसे, रक्तस्रावसे और व्रणसे पीडित होनेसे, चिंता होनेसे और परिश्रम होनेसे, मलआदिकके रोकनेसे मनुष्यके यह पांडुरोग हो जाता है॥ ३ ॥ क्षार, अम्ल अर्थात् खट्टा पदार्थ और प्रभातमें मैरेयसंज्ञक मदिराके सेवन करनेसे, कसरत नहीं करनेसे, मैथुन करनेसे और अत्यंत परिश्रम करनेसे और निद्राके नाश होनेसे, दिनमें अत्यंत सोनेसे इन योगोंकरके और मृत्तिकाके भक्षण करनेसे ॥ ४ ॥ रोग- पीडित शिथिल शरीर होनेपर, मार्ग चलनेसे, नमक, चरचरा, कसैला, खट्टा, मृत्तिका इनके सेवनेसे और निरंतर मैथुनके सेवनेका अतिक्रम होनेसे रुधिरका शोष हो जाता है उससे पांडु- रोग उत्पन्न हो जाता है ॥ ५ ॥ अथ पांडुरोगका पूर्वरूप । तेनाक्षकूटे श्वयथुः शरीरे पाण्डुत्वमायाति च पीतमूत्रः ॥ निष्ठिवते त्वक् प्रविदीर्य्यते च संजायते तस्य पुरःसराणि ॥६॥ उस पांडुरोगसे आंखोंके कोणमें सोजा हो, शरीर पीला हो, मूत्र पीला हो थुकथुकी हो त्वचा फट जावे ये पांडुरोगके पूर्व होने लगते हैं ॥ ६ ॥ अथ वातपांडुका लक्षण । तोदः परुषत्वशिरोगुरुत्वं त्वङ् मूत्रनेत्रे च नखे च पैत्यम् ॥ वातात्मकं तं मनुजस्य विद्धि लिङ्गै रुपेतोऽनिलपाण्डुरोगः॥७॥ व्यथा हो, कठोरपना हो, शिर भारी हो, त्वचा, मूत्र, नेत्र, नख ये पीले रहें ये लक्षण हों जिसके उसके वातसे उपजा हुआ पांडुरोग जानना ॥ ७ ॥ अथ पित्तपांडुका लक्षण । आम्लत्वपीतत्वकरो हि लोके बिभर्ति शोषं कटुतास्यतां च ॥ शोफस्तृषा मन्दज्वरश्च मोहः पीतच्छविः पित्तभवो हिपाण्डुः८ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । (२५९) आमपना और शरीरका पीलापन, शोष, कड़ुआ मुख रहना, मंदज्वर, तृषा, मोह, शोफ, पीलीछवि रहे ये लक्षण हों वह पित्तसे उपजा पांडुरोग जानना ॥ ८ ॥ अथ कफपांडुका लक्षण । तन्द्रालुशोफं कफकासयुक्तमालस्यप्रस्वेदगुरुत्वमेवम् ॥ संजायते तस्य कफात्मकोऽसौ नरस्य पाण्डुत्वभवो विकारः ॥९॥ तंद्रा हो, कफ, खांसी, शोजा ये हों, आलस्य हो, पसीना हो, भारीपन हो उस मनुष्यके कफसे उपजा पांडुरोग जानना ॥ ९ ॥ अथ त्रिदोषजपांडुका लक्षण । तन्द्रालस्यं श्वयथुवमथू कासहृल्लासशोषा विष्ठाभेदः परुष- नयने सज्ज्वरो वै क्षुधार्त्तः॥मोहस्तृष्णाक्लममथ नरस्याशु पश्ये- त्सुदूरं त्याज्यो वैद्यैर्निपुणमतिभिः सन्निपातोत्थपाण्डुः ॥१०॥ तंद्रा, आलस्य, शोजा, वमन, खांसी, थुकथुकी, शोष और मल पतला हो, कठोर नेत्र हों, ज्वर हो, क्षुधाकी पीडा हो, मोह हो, तृषा हो, ग्लानि हो, जिस मनुष्यके ये लक्षण हों वह सन्निपातसे उपजा पांडुरोगवाला मनुष्य उत्तम बुद्धिवाले मनुष्योंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥ १० ॥ अथ मट्टी खानेसे हुआ पांडुका लक्षण । मृत्तिकाभक्षणेनाथ शृणु पुत्र गदो महान्॥पाण्डुरोगो गरिष्ठो- ऽपि भवेद्धातुक्षयङ्करः॥११॥ मृद्भक्षणाच्चैव मलं प्रकीर्य्य स्रो- तांसि पूर्य्यन्ति तु मृत्तिकाभिः॥तेनैव नासृक् परिवर्त्तयन्ति न तर्पयन्ति वपुषं रसेन॥१२॥ क्षारात्कषायान्मधुरस्य पानात्स कोपयत्याशु नरस्य मृत्सा॥श्लेष्मप्रकोपान्मधुरानकरोति मृत्सा न जग्धा हितकारिणी स्यात् ॥ १३ ॥ विकृतिमुपगतास्ते मारुताद्यास्त्रयस्तु, द्युतिबलमभिहत्वा जीवनाशां निहन्ति भवति विकलमेवं पाण्डुरोगे शरीरं हरति जठरवह्निंमृत्तिकाभ- क्षणेन ॥ १४ ॥ हे पुत्र ! मृत्तिकाके भक्षण करनेसे महान् पांडुरोग होता है उसको सुनो, यह बडा क्लिष्टरोग है और धातुओंका क्षय करनेवाला है ॥ ११ ॥ मृत्तिकाके भक्षण करनेसे मल बिखर जाता है और उस मृत्तिकासे स्रोत भर जाते हैं फिर इसी कारणसे रुधिर नहीं प्रवृत्त होता है
और रससे शरीर पुष्ट नहीं होता है ॥१२॥ खारा, कसैला, मीठा इनका पान करनेसे मनुष्यके भक्षण की हुई मृत्तिका शीघ्र ही कुपित हो जाती है, मधुर पदार्थ सेवनसे वह मृत्तिका कफको कोप करती है इसवास्ते भक्षण की हुई मृत्तिका हितको करनेवाली नहीं है ॥ १३ ॥ वात आदिक दोष विकारको प्राप्त हुए कांति, बल, जीवनेकी आशा इनको शीघ्र ही नाश देते हैं और मट्टी खानेसे हुआ पांडुरोग जठराग्निका नाश करता है ॥ १४ ॥ अथ लोहचूर्णवटी । गोमूत्रे लोहं मतिमान्स्थापयेत्सप्तरात्रकम् ॥ तस्माच्चूर्णं तु मधुना देयं पाण्ड्वामयापहम् ॥ १५ ॥ बुद्धिमान् वैद्य लोहाको सात दिनतक गोमूत्रमें स्थापित करावे फिर उसका चूर्ण बना शह- दके संग देनेसे पांडुरोगका नाश होता है ॥ १५ ॥ शुंठादिमिश्रितलोहचूर्ण । त्र्यूषणं त्रिफला मुस्ता विडङ्गं चित्रकं समम् ॥ १६॥ भागमेकं लोहचूर्णं रसेनेक्षोर्विभावयेत्॥सप्ताहं खल्वितं लौहमलमस्मिन्पु- नर्वरम्॥१७॥शीलितं तु मधुना घृतेन वा पाण्डुरोगहृदयामया- पहम्॥अर्शसामपहरं हलीमकं कामलां च किल नाशयत्यहो १८॥ सूंठ, मिर्च, पीपल, त्रिफला, नागरमोथा, वायविडंग, चीता इनको समान भाग ले ॥ १६ ॥ एकभाग लोहाका चूर्ण इनको ईखके रसमें भावना देवे अथवा इसमें लोहेके मैलको सात दिनतक खरल कर मिलावे तो अतिश्रेष्ठ है ॥ १७ ॥ इस चूर्णको शहदमें अथवा घृतमें मिला खानेसे पांडुरोग, हृदयरोग, कामला, बवासीर, हलीमक रोगोंका नाश होता है ॥ १८ ॥ अथ मंडूकवटी । त्र्यूषणं चत्रिफलं सचित्रकं मेघचव्यसुरदारुमाक्षिकम् ॥ ग्रन्थिकं च शिखिभृङ्गराजकं योजयेत्पलिकभागिकानिमान् ॥ १९॥ चूर्णिताद्विगुणमेव योजयेल्लोहचूर्णमपि कज्जलप्रभम् ॥ अष्टभागसममूत्रकल्पितं पाचितं पुनरहो बलप्रदम् ॥ २० ॥ सेवयेद्गलमुपक्रमं तथा तत्र संयुतमिहास्ति शोभनम्॥नाशयेच्च कफकामलान्कृमीन्पाण्डुकुष्ठगुदजान्हलीमकम् ॥ २१ ॥ सूंठ, मिर्च, पीपल, त्रिफला, चीता, नागरमोथा, चव्य, देवदारु, सोनामाखी, पीपलामूल,
अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( २६१ ) मेथी और भंगरा इनको चार चार तोला प्रमाण लेवे ॥ १९ ॥ और इस चूर्णसे दूना २ भाग कज्जलके समान बारीक लोहेका चूर्ण मिलावे इस सब चूर्णसे आठ ८ भाग गोमूत्रमें इस चूर्णको पकावे फिर पकाया हुआ यह चूर्ण बलको देनेवाला है ॥ २० ॥ पांडुरोगमें बलके अनुसार सेवन किया हुआ यह चूर्ण उत्तम है और कफरोग, कामला, क्रिमिरोग, पांडु, कुष्ठ, गुदाके रोग, हलीमक इनको नाशता है ॥ २१ ॥ अथ वज्रमंडूकवटक । पुनर्नवाव्योषत्रिवृत्सुराह्वयं निशाद्वयं चव्यफलत्रयं तथा॥ घनां यवां तिक्तकरोहिणीं समां द्विभागिकं लोहरजो विमिश्रयेत् ॥ २२ ॥ गवां पयो वा द्विगुणं वियोज्यं दार्ध्या प्रलेपं प्रणि- धाय धीमान्॥ छायाविशुष्का गुटिका विधेया क्षौद्रेण मूत्रेण गवां च भक्षयेत् ॥२३॥ ज्ञात्वा बलं रोगबलं नरस्य पाण्ड्वा- मये कामलसर्वमेहे ॥ गुल्मोदराजीर्णविषूचिकानां शोफाति- सारग्रहणीविबन्धान् ॥ शूलक्रिमीनर्शविकारहेतोर्वज्रोऽय- मस्तीति विचिन्तनीयम् ॥ २४ ॥ सांठी, सूंठ, मिर्च, पीपल, निशोथ, देवदार, हल्दी, चव्य, त्रिफला, नागरमोथा, इन्द्रजव, कुटकी,हरीतकी इनको समान भाग ले और दो भाग लोहेका चूर्ण मिला॥२२॥फिर इस सब चूर्णसे दूने गौके दूधमें इस चूर्णको पकावे जब चलानेकी कडछीमें चपकने लग जावे तब उतार छायामें सुखा गोली बना लेवे फिर शहदके संग अथवा गोमूत्रके संग भक्षण करे ॥ २३ ॥ मनुष्यके बलको और रोगके बलको जानके पांडुरोगमें, कामलामें, सम्पूर्ण प्रमेहरोगोंमें इसको भक्षण करे और गुल्मोदर, अजीर्ण, विषूचिका, शोजा, अतीसार, ग्रहणी, मलका बन्ध, शूल, क्रिमी रोग और बवासीरके विकारके लिये यह वज्र है इसमें चिन्ता न करनी चाहिये ॥ २४ ॥ अथ दूसरा वज्रमंडूकवटक । पञ्चकोलकटुत्रिकं घना देवदारुकृमिशत्रुकोल कम्॥एष भाग- सहितो वियोजितो मिश्रयेत्तदनु चायसं रजः ॥ २५ ॥ तत्र चाष्टगुणमूत्रमध्यतः पाचयेद्भवति येनलेपिका॥कारयेद्दरमा- त्रया पुनश्छाययापि पिषितञ्च शोषणम् ॥ २६ ॥ कारयेत्सु- रभिमंथितॆन च पानकञ्च शमयेत्सकामलम् ॥ पाण्डुमर्शम- तिसारमन्दभुक शोषमेहगुदजान् क्रिमीन्पि ॥ २७ ॥
( २६२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
(पंचकोल) पीपल १ पीपलामूल २ चव्य ३ चीता ४ सूंठ ५, कटुत्रिक अर्थात् सूंठ, मिर्च, पीपल, नागरमोथा, देवदार, वायविडंग, कंकोल इनको समानभाग ले मिलावे, पीछे इनके समान लोहेका चूर्ण मिलावे ॥२५॥ फिर सब चूर्णसे आठगुने गोमूत्रमें इस चूर्णको पकावे जब पकजावे कड़छीमें चपके तब उतार बेरके समान गुटी बना छायामें सुखा फिर पीस लेवे ॥ २६ ॥ पीछे गायके मथे तक्रमें इसका पना बना सेवन करनेसे कामला, पांडुरोग, बवासीर, अतीसार, मन्दाग्नि, शोष, प्रमेह, गुदाके रोग, कृमि इनका नाश होता है ॥ २७ ॥ अथ अमृतवटक। धात्रीफलानां रसप्रस्थमेकं प्रस्थं तथा चेक्षुरसं विदध्यात् ॥ प्रस्थं तु कूष्माण्डरसप्रदिष्टमार्कंरसं प्रस्थविमिश्रमेकम् ॥२८॥ एकीकृतं मन्दहुताशनेन पाच्यं भवेद्यापदशेषमेति ॥ विमि- श्रयेदौषधसंघमेतत्पलैकमात्रं विपचेच्च पश्चात् ॥ २९ ॥ शृङ्गी सुराह्वं शतपुष्पधान्यं सुगन्ध¹शुण्ठी मधुकं विशाला। सपिप्पली- कं सकटुत्रयं च विडङ्गमुस्ताहपुषादलानि॥३०॥दीर्घाहरिद्राक- टुरोहिणीनां दुरालभापौष्करवत्सकानाम् ॥ कुष्ठाजमोदासुरसा- दलानि चूर्ण त्वमीषां विनियोजनीयम् ॥ ३१ ॥ गुडं पुराणं द्विगुणं तथा गो-घृतेन रम्यं वटकं विदध्यात् ॥ तद्भक्षणं कामलमर्शसं च पाण्डुं ज्वरं घोरतरं निहन्ति ॥ ३२॥ तच्छो- फशोषग्रहणीविकारान्वातातिसारक्षयकासगुल्मान् ॥ ३३॥ आंवलोंका रस ६४ तोले और ईखका रस ६४ तोले, कोहलाका रस ६४ तोले, आकका रस ६४ तोले ॥ २८ ॥ इनको एक जगह मिला मंद २ अग्निसे पकावे जब चतुर्थांश बाकी रहे तब इन आगे कहीहुई औषधोंको चार २ तोले प्रमाण मिलाके फिर पकावे ॥ २९ ॥ शृंगरा, देवदार, सौंफ, धनियां, रास्ना, सूंठ, मुलहठी, इंद्रायण, पीपल, कटुत्रय अर्थात् सूंठ, मिर्च, पीपल, वायविडंग, नागरमोथा, हाऊबेर ॥ ३० ॥ दारुहलदी, कुटकी, हरीतकी, जवासा, पोहकरमूल, कूडा इनके पत्ते इन सबोंको पहले कहे हुए प्रमाणके अनुसार ले चूर्ण बना मिला देवे ॥ ३१ ॥ इस चूर्णसे दूना पुराना गुड़ मिलावे, फिर घृतमें गोली बांधलेवे
१ "सुगन्धा गन्धनाकुली" इत्यमरः। गन्धनाकुली रास्नाभेद। नाई। कन्द विशेष अथवा "इष्टगन्धः सुगन्धिः स्यादित्यमरः" । सुगन्धवर्ग-स्याहजीरा, कुंदुरु, गन्धतृण, नीलोत्पल, खश, चन्दन, गठिवन, सुखं, सहिजन, गंधक, चना, भूतृण, कचूर, रुद्रजटा, वन्ध्यककौंटिकी, खेखसा, मालती, दूर्व, वच कुलींजन, रास्ना, कृष्णाशारिवा ।
अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( २६३ ) इसके भक्षण करनेसे कामला, बवासीर पांडुरोग, अतिदारुणज्वर ॥ ३२ ॥ शोक, शोष, संग्रहणी इन रोगोंका नाश होता है और वातरोग, अतीसार, क्षयी, खांसी, गुल्मरोग इनको नाशता है ॥ ३३ ॥ अथ पांडुरोगका पथ्यापथ्य । गोधूमशालयवषष्टिकमुद्गकानां श्यामाढकीघृतयुतं पयसा सत- क्रम् ॥ गाण्डीववास्तुकमथो शतपुष्पवर्त्तापथ्यं हितं निगदितं मनुजस्य पाण्डौ ॥ ३४॥ जाङ्ग्लानि च मांसानि भोजने च प्रशस्यते ॥३५॥ तिलं च रूक्षं कटुकं च तीव्रं दाहात्मकं काञ्जिकभेदकं च ॥ सुराम्लसौवीरकबीजपूरास्तैलानि वर्ज्यानि च पाण्डुरोगे ॥३६॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने पाण्डुरोगचिकित्सा नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ गेहूं, शालीसंज्ञक चावल, जव, सांठी चावल, मूंग, शामक, अरहर इन अन्नोंको घृतके संग अथवा दूधके संग अथवा तक्रके संग भोजन करना हित है और अर्जुनवृक्षके पत्ते, बथुवा, शोफा, वार्त्ताकु इनका शाक पांडुरोगवाले मनुष्यको हित है, पथ्य है॥ ३४ ॥ जांग- लदेशके जीवोंका मांस भोजनमें हित है ॥ ३५ ॥ पांडुरोगमें कडुए, रूखे, चरपरे दाह करनेवाले ऐसे कांजीके भेद, मदिरा, खटाई, कांजी, बिजौरा, तेल इन पदार्थोंको वर्ज देवे ॥ ३६ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने पांडुरोगचिकित्सानामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ नवमोऽध्यायः ९. अथ क्षयरोगकी चिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ शृणु वरभिषां त्वं व्याधिभीमं नराणां भवति विहतचेष्टो वातलप्राणिनां वै ॥ चिरनिचयकरोऽयं प्राकृतैः कर्मपाकैरिह परिभवकारी मानुषस्य क्षयोऽयम् ॥१॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे वैद्योंमें उत्तम! जो मनुष्योंको घोर व्याधि होता है उसको सुनो, वातके स्वभाववाले प्राणियोंके यह रोग होता है, चेष्टाको हत कर देता है और पूर्वजन्मके कर्मविपाकसे नरकको करनेवाला है और इस संसारमें दुःखको करनेवाला यह क्षयरोग होता है ॥ १ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( २६४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ क्षयरोगमें पापरूपी कारण । देवानां प्रकरोति भङ्गमथवा भ्रूणस्य सन्तापनं गोपृथ्वीधर- विप्रबालहननं चा रामविध्वंसनम् ॥ सोऽयं स्थानविनाशनं च कुरुते स्त्रीणां वधं यो नरस्तस्यैतैर्गुरुकर्मभिः क्षयगदो देहार्थहारी महान् ॥२ ॥ देवानां दहतो धनं च दहतो भ्रूणप्रपातेऽपि च देवत्वं हरतो विषं च ददतश्चारामकं निघ्नतः ॥ तेनासौ नियमेन सम्भवति वै नृणां च तीव्रा रुजा धातूनां क्षयकारिणी च मनुज- स्यात्मापहा दारुणा ॥ ३ ॥ क्षयो दशविधश्चैव विज्ञातव्यो भिषग्वरैः ॥ ४ ॥ जो पुरुष देवताओंकी मूर्तिको तोड़देता है और गर्भगत जीवको सन्ताप देता है, गौ, राजा, ब्राह्मण, बालक इनकी हत्या करता है और बगीचाका विध्वंस करता है, किसीके स्थानका विनाश करता है और जो स्त्रियोंका वध करता है उसके इन कर्मोंसे देहको नाश- करनेवाला महान् क्षयीरोग होता है ॥ २ ॥ जो पुरुष देवताओंको दग्ध करे, किसीके धनको दग्ध करे और गर्भको गिरावे, देवताके द्रव्यको हरे, विष देवे, बाग बगीचेका नाश करे इन विपरीतकर्मोंसे मनुष्यके अतितीव्र पीडा होती है, धातुओंको क्षय करनेवाली और आत्माको नाश करनेवाली दारुण क्षयव्याधि होजाती है ॥ ३॥ वैद्यजनोंको दशप्रकारका क्षयरोग जानना चाहिये ॥ ४ ॥ अथ क्षयरोगके हेतु । श्रमाद्वा भाराद्वा विषमशयनैर्दीर्घचलनैरजीण भोज्याद्वा सुरत- रतिसेवापरतया ॥ ज्वरेणातिक्रान्ताद्विषमशयनाच्छीतलतरैः क्षयं याति श्लेष्मा पवनमथ पित्तञ्च तनुषु ॥ ५॥ रोगाक्रान्ता- द्विषमशयनात्तस्य मन्दज्वराद्वा श्लेष्मापित्तञ्च मरुदथवा याति देहक्षयं वा ॥ श्रम, भार, विषमशयन, दीर्घमार्गमें गमन, अजीर्णमें भोजन, मैथुनमें अतिरमण कर- नेसे और ज्वरसे आक्रांत होनेसे, विषमशयन, अतिशीतल पदार्थका सेवन करनेसे कफ- कोपको प्राप्त होता है, फिर शरीरमें वायुको और पित्तको भी कुपित कर देता १ विषमशयन दोवार है इससे एक जगह कालपरत्व विषमशयन अर्थात् दिनको सोना रातको जागना समझे और दूसरी जगह क्रमपरत्वसे अर्थात् औंधासोना आदि समझें ।
अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( २६५ )
हैं ॥ ५ ॥ रोगसे आक्रांत होनेसे अथवा विषमशयन करनेमें अथवा मन्द ज्वरसे यह क्षयरोग होजाता है और कफसे, पित्तसे अथवा वायुसे इन तीन प्रकारोंसे देहमें क्षय- रोग होता है ॥ अथ क्षयरोगके प्रकार । रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्रगतस्तथा ॥ एवं दशविधा नॄणां क्षया देहे भवन्ति वै ॥६॥ पुनश्चैषां लक्षणानि सावधा- नतया शृणु ॥ ७ ॥ और रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य इन सात धातुओंमें होता है, ऐसे मनुष्यके शरीरमें दश प्रकारके क्षयरोग कहे हैं ॥ ६ ॥ अब फिर भी इनके लक्षणोंको कहते हैं सुनो ॥ ७ ॥ अथ वातक्षयका निदान । अतिस्वेदातिघर्मेण चिन्ताशोषभयादिना ॥ वाताद्यः सेवितैश्चापि जायते मारुतक्षयः ॥ ८॥ अत्यंत पसीना, अति घाम, चिंता, शोष, भय इत्यादिकोंसे और वायुको करनेवाले पदा- र्थोंके सेवनेसे वायुका क्षय होजाता है ॥ ८ ॥ अथ वातक्षयका लक्षण । तेन तन्द्राऽङ्गदाहश्च पिपासारुचिवपथुः ॥ तमः क्लमो भ्रमश्चैव भवेच्च मारुतक्षये ॥ ९ ॥ उससे तन्द्रा, अंगमें दाह, तृषा, अरुचि, कंपना, अंधेरी, ग्लानि, भ्रम ये उपद्रव वातके क्षयरोगमें होते हैं ॥ ९ ॥ वातक्षयमें सेव्यपदार्थ । तस्मादानूपानि सेव्यानि रसानि पललानि च ॥ रसोनादिककल्कञ्च सेव्येद्वातनाशने ॥ १० ॥ इसलिये वातको नाश करनेवाले रस और अनूपदेशके मांसोंका सेवन करे और लहसुनआ- दिक औषधोंके कल्कके सेवनेसे भी वातका नाश होता है ॥ १० ॥ अथ पित्तक्षयके हेतु । पित्तक्षयेऽग्निमान्द्यं च जायतेऽरुचिजाड्यता ॥ कासहृल्लासशोफश्च जायते मन्दचेष्टता ॥ ११ ॥
( २६६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने ] पित्तके क्षयरोगमें मंदाग्नि, अरुचि, जड़ता ये रोग होते हैं और खांसी, श्वास, थुकथुकी, शोफ, मन्दचेष्टा ये उपद्रव होते हैं ॥ ११ ॥ अथ पित्तक्षयकी चिकित्सा । स्वेदाभ्यङ्गान्नपानानि दीपनानि प्रयोजयेत् ॥ जाङ्ग्लानि रसान्नानि सेवयेत्पित्तकृत्क्षये ॥ १२ ॥ स्वेद, मालिस, दीपन अर्थात् जठराग्निको दीप्त करनेवाले अन्नपान, इनको प्रयुक्त करे और पित्तसे उपजे क्षयरोगमें जांगल देशके जीवोंके मांसका रस हित है ॥ १२ ॥ अथ कफक्षयका कारण । व्यायामे च व्यवाये च रूक्षान्नाहारसेवनैः ॥ सन्तापक्रोधनश्चैव जायते कफसम्भवः ॥ १३ ॥ कसरत करनेसे, मैथुन, रूखा अन्नका भोजन, क्रोध, इनके सेवनसे कफका क्षयरोग बढता है ॥ १३ ॥ अथ कफक्षयका लक्षण । तन दाहोऽथवा पाण्डुः शोफो निःश्वसन भ्रमः ॥ विनिद्रता क्षुत्तृषा च स्त्रीसङ्गेनापि नन्दति ॥ १४ ॥ उससे दाह अथवा पांडुरोग, शोजा, श्वासरोग, भ्रम, निद्राका नाश, क्षुधा, स्त्रीसंगसे प्रसन्नता ये लक्षण होते हैं ॥ १४ ॥ अथ कफक्षयकी चिकित्सा । तस्य शीतान्नपानानि कन्दशाकादिकै रसैः ॥ अनूपदधिदुग्धैर्वा सेवनं च समीहितम् ॥ १५ ॥ उसके शीतल अन्नपान, कंदशाकआदिकोंके रस, अनूपदेशके जीवोंका मांस, दही, दूध, इनका सेवन हित है ॥ १५ ॥ अथ त्रिदोषजक्षयकी चिकित्सा । त्रिभिर्दोषैः क्षयं प्राप्तैस्तदा हि मरणं ध्रुवम् ॥ साधारणा क्रिया तस्य प्रयोक्तव्या महामते ॥ १६ ॥ जब त्रिदोषसे उपजा हुआ क्षयरोग होता है तब निश्चय मरण होजाता है । हे हारीत महामते ! उसकी साधारण चिकित्सा कही है ॥ १६ ॥