हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
अ० ७ ] भाषाटीकासमेता । ( २५३ ) कफशूलवालोंको लंघन कराना, वमन कराना, पाचन औषध देना हित है, और कड़े पदार्थ, अत्यंत मीठा पदार्थ नहीं देवे और शयन नहीं करावे ॥ ४५ ॥ अथ बिल्वादिक्वाथ । बिल्वाग्निमन्थवृषाचित्रकनागराश्च एरण्डहिङ्गु सहसैन्धवकं समाशम् ॥ क्वाथः सदैव कफजं विनिहन्ति शूलं सद्यःकरोति जठरानलवर्द्धनं च ॥ ४६ ॥ बेलगिरी, अरणी, वांसा, चीता, सोंठ, अरंड, हींग, सैंधानमक इनको समान- भाग ले क्वाथ बना देनेसे शीघ्र ही कफसे उपजे शूलको दूर करता है और जठराग्निको बढ़ाता है ॥ ४६ ॥ अथ मातुलुङ्गादिरस । मातुलुङ्गरसं धात्रीरसं सैन्धवसंयुक्तम्॥ शोभाञ्जनकमूलस्य रसं च मरिचान्वितम् ॥४७॥ सक्षारमधुनोपेतं श्लेष्मशूलनिवार- णम् ॥ कृतक्षयोद्भवं कासं नाशयत्याश्वसंशयम् ॥ ४८ ॥ बिजौरेका रस, आंवलेका रस इनमें सैंधानमक मिला और सहजिनेकी जड़के रसमें काली मिर्च मिला ॥ ४७ ॥ फिर जवाखार, शहद, इनसे युक्त कर इनके देनेसे कफका शूल दूर होता है और क्षयरोगसे उपजीहुई खांसीको शीघ्रही नाशता है ॥ ४८ ॥ अथ तुवरादिचूर्ण । तुवरं ग्रन्थिकैरण्डा व्योषं पथ्याजमोदकम् ॥ सक्षारलवणोपेतं चूर्णं शूले कफात्मके ॥ ४९ ॥ सफेद शिरस, पीपलमूल, अरंड, सोंठ, मिर्च, पीपल, हरड़े, अजमोद, जवाखार, नमक इनका चूर्ण कफसे उपजे शूलको दूर करता है ॥ ४९ ॥ अथ एरंडादि क्वाथ । एरण्डबिल्वबृहतीद्वयमातुलुङ्ग-पाषाणभित्रिकटूमूलकृते कषाये॥ सक्षारहिङ्गुलवणाश्च सुतैलमिश्राः श्रोण्यंसमेढ्रहृदयस्तनकु- क्षिदेयम् ॥ ५० ॥ अरंड, बेलगिरी, दोनोंकटेहली, बिजौरा, पाषाणभेद, त्रिकटु, सोंठ, मिर्च, पीपल, इनसे कियेहुए क्वाथमें जवाखार, हींग, नमक, तेल इनको मिला फिर, कटि, कंधे, लिंग, हृदय, कुक्षी, चूंची, इन स्थानोंमें इसकी मालिस करनी चाहिये ॥ ५० ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( २५४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ वातपित्तशूलचिकित्सा । पटोलारिष्टपत्राणि त्रिफलासंयुतानि च ॥ क्वाथं मधुयुतं पानं शूले पैत्ते समीरणे ॥ ५१ ॥ पित्तज्वरतृषादाहरक्तपित्तनि- वारणम् ॥ ५२ ॥ ( पटोलादि क्वाथ ) परवल, नींव इनके पत्ते, त्रिफला इनका क्वाथ बना तिसमें शहद- मिला पान कराना वातपित्तशूलको शांत करता है ॥ ५१ ॥ पित्तज्वर, तृषा, दाह और रक्तपित्त इनको निवारण करता है ॥ ५२ ॥ अथ दुरालभादिकल्क । दुरालभा पर्पटकं च विश्वा पटोलनिम्बाम्बुदतिन्तिडीकम् ॥ सशर्करं कल्कमिदं प्रयोज्यं सपित्तवातोद्भवशूलशान्त्यै॥५३॥ जवासा, पित्तपापड़ा, सोंठ, परवल, नींव, नागरमोथा, अमली इनका कल्क बना खांड मिला देनेसे पित्तवातसे उपजा शूल शांत होता है ॥ ५३ ॥ अथ वातकफशूलचिकित्सा । सौवर्चलं समशटी सहनागरा च शुण्ठीयुतेन कथितेन जलेन चूर्णम्॥पीतं निहन्ति मरुतायुतश्लैष्मिकाणां पार्श्वार्तिशूलज- ठरानलहृत्प्रशस्तम् ॥ ५४ ॥ “सौवर्चलादि चूर्ण” कालानमक, कचूर, नागरमोथा, सोंठ इनका चूर्ण बना औटाया हुआ जलके संग लेनेसे वात कफसे उपजाहुआ शूल शांत होता है और पसली, शूल, मन्दाग्नि इन रोगोंके हरनेमें श्रेष्ठ कहा है ॥ ५४ ॥ अथ दार्वादि क्वाथ । दारु नागरकं वासा हिङ्गु सौवर्चलान्वितम् ॥ क्वाथो वातकफे शूले आमेऽजीर्णे विबन्धके ॥ ५५ ॥ देवदार, सोंठ, वांसा, हींग, कालानमक, इनका क्वाथ वातकफसे उपजे शूल, आमरोग, अजीर्ण और मलके बन्धमें देना श्रेष्ठ है ॥ ५५ ॥ अथ त्रिदोषशूल चिकित्सा । पलाशकदलीवासापामार्गकोकिलाह्वयम्॥ गोमूत्रेण शृतं तच्च हिङ्गुनागरसंयुक्तम् ॥५६॥ हितं त्रिदोषजे शूले कामलाविड्वि- बन्धके ॥ गुल्मोदराणां शमनं मंदाग्नीनां नियच्छति ॥ ५७ ॥
अ० ७] भाषाटीकासमेता । (२५५) “पलाशादिघृत” टेसू, केला, वांसा, लटजीरा, तालमखाना, हींग, सोंठ, इनको गोमूत्रमें पक्व क्वाथ बना देनेसे ॥ ५६ ॥ त्रिदोषसे उपजा शूल, कामला, मलका बंधा, गुल्मरोग, उदररोग, मन्दाग्नि दूर होता है ॥ ५७ ॥ अथ सर्वशूलपर उपाय । एक एव कुबेराक्षः सर्वशूलापहारकः ॥ किं पुनः स त्रिभिर्युक्तः पथ्यारुचकरामठैः ॥ ५८ ॥ अकेली पाढ़रि ही सर्वशूलोंको दूर करती है, फिर उसके साथ हरड़े, सोंचर और हींग होवे तो क्या कहना अर्थात् अवश्यही शूलको दूर करती है ॥ ५८ ॥ अथ शङ्खक्षार । शङ्खक्षारं च लवणं हिङ्गुव्योषसमन्वितम् ॥ उष्णोदकेन तत्पीतं हन्ति शूलं त्रिदोषजम् ॥ ५९ ॥ शंखका खार, नमक, हींग, व्योष, (सुंठ, मिर्च, पीपल,) इनका चूर्ण गरमजलके संग पीनेसे त्रिदोषसे उपजा शूल नाश होता है ॥ ५९ ॥ अथ सामान्यसे सब शूलोंकी चिकित्सा । लङ्घनं वमनं चैव विरेकश्चानुवासनम् ॥ निरूहो बस्तिकर्माणि परिणामे त्रिदोषजे ॥ ६० ॥ त्रिदोषसे उपजे परिणामशूलमें लंघन, वमन, जुलाब, अनुवासनवस्ति, इन कर्मोंको करवावै ॥ ६० ॥ अथ चित्रकादिमोदक । चित्रकं त्रिवृता दन्ती विडङ्गं कटुकत्रयम् ॥ समं चूर्ण गुडेनाथ कारयेन्मोदकान्सुधीः ॥६१॥ भक्षयेत्प्रातरुत्थाय पश्चादुष्णो- दकं पिबेत्॥ परिणामोद्भवं शूलं हन्ति शूलं नरस्य च ॥ ६२ ॥ चीता, निशोत, जमालघोटेकी जड, वायविडंग, सोंठ, मिर्च, पीपल इनको समान भाग ले चूर्ण बना फिर वैद्यजन उसको गुड़में गोली बांधलेवे ॥ ६१ ॥ प्रातःकाल उठके इसका भक्षण करे और ऊपरसे गरमजल पीवे । यह परिणामशूलको नाशता है ॥ ६२ ॥ १ कृष्णवृन्ता कुबेराक्षीत्यमरः । कृष्णवृन्ता कुबेराक्षी सप्तगठलायाः “पाडली” इति ख्याताया इत्यमरविवेके । Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( २५६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ यवान्यादिचूर्ण । यवानीहिङ्गुसिन्धूत्थं क्षारं सौवर्चलाभया ॥ सुरामाण्डेन पातव्या परिणामे त्रिदोषजे ॥ ६३ ॥ अजवायन, हींग, सधानमक, जवाखार, कालानमक, हरड़े, इनको मदिराके संग पीनेसे त्रिदोषसे उपजा परिणामशूल शांत होता है ॥ ६३ ॥ अथ हिंग्वादिगुटी । हिङ्ग्व्योषवचाजमोदहपुषा पथ्या यवानी शटी जाजीपिप्पलि- मूलदाडिमवृकीचव्याग्निकं तिन्तिडी। तस्माच्चाम्लसुवर्चलोऽपि च यवक्षारं तथा सर्जिका सिन्धूत्थं विडचूर्णकं समकृतं स्याद्वी- जपूरे रसे ॥६४॥ कुर्याच्चूर्णगुटीं समक्षफलदाम क्षप्रमाणा- मिमां कल्को वातविकारिणां प्रददतः शूलार्शसप्लीहकान् ॥ कासानाहविबन्धमेहहृदयशूलं निहन्त्याशु वै कर्त्तव्यं किल संशयं न भिषजां वृन्दैः सदा धार्यते ॥६५॥ एष हिंग्वादिको नाम सर्वशूलार्त्तिनाशनः ॥ सर्ववातविकारघ्नः सर्वक्षय- निवारणः ॥ ६६ ॥ हींग, सूंठ मिर्च, पीपल, वच, अजमोद, हाउबेर हरड़े, अजवायन, कचूर, जीरा, पीपला मूल, अनारदाना, कश्मीरीपाठा, चव्य, चीता, आमलकी, निंबू, जवाखार, कालानमक, साजी, सेंधानमक, मणियारीनमक इनको समान भाग ले चूर्ण बना बिजौराके रसमें ॥६४॥ इसचूर्णकी तोला प्रमाण गोली बनावे अथवा इन्होंका कल्क वना देनेसे वातके विकार, शूल, बवासीर, तिल्ली, खाँसी, अफारा, मलका बंधा, प्रमेह और हृदयशूल शीघ्र ही नाशता है इसमें संशय न करे श्रेष्ठ वैद्य इसे धारण करते हैं॥६५॥ यह हिंगुआदिकनामवाला औषध सम्पूर्ण शूलकी पीड़ाओंको नाश करता है और सब प्रकारके वातविकारोंको नाशता है, सब प्रकारके क्षयरोगोंको निवारण करता है ॥ ६६ ॥ अथ शूलरोगके उपद्रव । अतीसारतृषा मूर्च्छा अनाहो गौरवोऽरुचिः ॥ श्वासकासौ वमिर्हिक्का शूलस्योपद्रवा दश ॥ ६७ ॥ शूलं सोपद्रवं तृष्णां भिषग्दूरे परित्यजेत् ॥ अनुपद्रवे क्रिया प्रोक्ता भिषजां सिद्धि- मिच्छता ॥ ६८ ॥
अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( २५७ ) अतिसार, तृषा, मूर्च्छा, अफारा, भारीपन, अरुचि, श्वास, खांसी, वमन, हिचकी, ये दश शूलके उपद्रव हैं ॥ ६७ ॥ उपद्रवोंसे युक्त और तृषासे संयुक्त शूलको वैद्य- जन दूरसे त्यागे और उपद्रव रहित शूलमें सिद्धिकी इच्छा करनेवाले वैद्यको चिकित्सा करनी कही है ॥ ६८ ॥ शूलमें पथ्यापथ्य । वर्जयेद्विदलं शूली तथा सघनशीतलम् ॥ पिच्छलं च दधि चैव दिवानिद्रां च वर्जयेत् ॥ ६९ ॥ शालिषष्टिकसिन्धूत्थहि- ङ्गुसौवीरकं तथा ॥ सुरा वा गुडशुण्ठी वा पाने श्रेष्ठा भिष- ग्वर ॥७०॥ शतपुष्पावास्तुकं च हितं प्रोक्तं प्रशस्यते ॥७१॥ एणतित्तिरिलावाश्च क्रौञ्चाः शशकसारसाः ॥ एषां मांसानि शस्तानि कथितानिभिषग्वर ॥ ७२ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारी- तोत्तरे तृतीयस्थाने शूलचिकित्सानाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ शूलरोगवाला पुरुष दालको वर्ज देवे और घना, शीतल और झागोंवाला ऐसा दहीत्याग देवे और दिनमें सोना वर्ज देवे ॥ ६९ ॥ शालीसंजक चावल, सांठी चावल, सैंधानमक, हींग, कांजी इनका सेवना हित है और मदिरा अथवा गुड़, सोंठ इनका पान करना वैद्यजनोंने हित कहा है ॥७०॥ सौंफ और बथुवेका शाक शूलरोगमें हित कहे हैं ॥ ७१ ॥ मृग, तीतर, लावापक्षी, कूंजीपक्षी, चौगड़ा, सारसपक्षी इनका मांस श्रेष्ठ कहा है ॥७२॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहाय- सूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने शूलचिकित्सानाम सप्तमो- ऽध्यायः ॥ ७ ॥ अष्टमोऽध्यायः ८. अथ पांडुरोगचिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि पांडुरोगं महागदम् ॥ पञ्चैव पाण्डुरोगास्ते सम्भवन्तीह मानुषे ॥ १॥वातिकः पैत्ति- कश्चैव श्लैष्मिकः सान्निपातिकः ॥ पञ्चमो रूक्षणः प्रोक्तो वक्ष्ये चैषां तु सम्भवम् ॥ २ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे पुत्र ! सुनो पांडुरोगकी चिकित्साको कहते हैं, मनुष्यके पांच प्रकारके पांडुरोग होते हैं ॥ १ ॥ वातसे उपजा १, पित्तसे उपजा २, कफसे उपजा ३, सन्नि- पातसे उपजा ४, रूक्षणसंज्ञक ५ पांचवा ऐसे ५ हैं इनके उत्पत्तिको कहते हैं ॥ २ ॥ १७ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( २५८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ पांडुरोगका निदान । दीर्घाध्वन्ये पीडितो वा ज्वरेण रक्तस्रावे पीडितो वा व्रणेन ॥ चिन्तायासाद्रोधनाद्वा मनुष्यस्यायं पाण्डुर्जायते सेवते यः ॥ ॥३॥क्षारं चाम्लं कल्यमैरेयसेवा अव्यायामान्मैथुनातिश्रमेण॥ निद्रानाशेनातिनिद्रा दिवापि योगैश्चैतैर्मृत्तिकाभक्षणेन ॥ ४ ॥ पथि शिथिलशरीरे रोगसंपीडिते वा लवणकटुकषायासेवना- म्लेन मृद्भिः॥अतिसुरसमजस्रं सेवनातिक्रमेण नयतिरुधिरशोषं तेन वै पाण्डुरोगम् ॥ ५ ॥ अत्यंत मार्गके चलनेसे अथवा ज्वरसे पीडित होनेसे, रक्तस्रावसे और व्रणसे पीडित होनेसे, चिंता होनेसे और परिश्रम होनेसे, मलआदिकके रोकनेसे मनुष्यके यह पांडुरोग हो जाता है॥ ३ ॥ क्षार, अम्ल अर्थात् खट्टा पदार्थ और प्रभातमें मैरेयसंज्ञक मदिराके सेवन करनेसे, कसरत नहीं करनेसे, मैथुन करनेसे और अत्यंत परिश्रम करनेसे और निद्राके नाश होनेसे, दिनमें अत्यंत सोनेसे इन योगोंकरके और मृत्तिकाके भक्षण करनेसे ॥ ४ ॥ रोग- पीडित शिथिल शरीर होनेपर, मार्ग चलनेसे, नमक, चरचरा, कसैला, खट्टा, मृत्तिका इनके सेवनेसे और निरंतर मैथुनके सेवनेका अतिक्रम होनेसे रुधिरका शोष हो जाता है उससे पांडु- रोग उत्पन्न हो जाता है ॥ ५ ॥ अथ पांडुरोगका पूर्वरूप । तेनाक्षकूटे श्वयथुः शरीरे पाण्डुत्वमायाति च पीतमूत्रः ॥ निष्ठिवते त्वक् प्रविदीर्य्यते च संजायते तस्य पुरःसराणि ॥६॥ उस पांडुरोगसे आंखोंके कोणमें सोजा हो, शरीर पीला हो, मूत्र पीला हो थुकथुकी हो त्वचा फट जावे ये पांडुरोगके पूर्व होने लगते हैं ॥ ६ ॥ अथ वातपांडुका लक्षण । तोदः परुषत्वशिरोगुरुत्वं त्वङ् मूत्रनेत्रे च नखे च पैत्यम् ॥ वातात्मकं तं मनुजस्य विद्धि लिङ्गै रुपेतोऽनिलपाण्डुरोगः॥७॥ व्यथा हो, कठोरपना हो, शिर भारी हो, त्वचा, मूत्र, नेत्र, नख ये पीले रहें ये लक्षण हों जिसके उसके वातसे उपजा हुआ पांडुरोग जानना ॥ ७ ॥ अथ पित्तपांडुका लक्षण । आम्लत्वपीतत्वकरो हि लोके बिभर्ति शोषं कटुतास्यतां च ॥ शोफस्तृषा मन्दज्वरश्च मोहः पीतच्छविः पित्तभवो हिपाण्डुः८ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । (२५९) आमपना और शरीरका पीलापन, शोष, कड़ुआ मुख रहना, मंदज्वर, तृषा, मोह, शोफ, पीलीछवि रहे ये लक्षण हों वह पित्तसे उपजा पांडुरोग जानना ॥ ८ ॥ अथ कफपांडुका लक्षण । तन्द्रालुशोफं कफकासयुक्तमालस्यप्रस्वेदगुरुत्वमेवम् ॥ संजायते तस्य कफात्मकोऽसौ नरस्य पाण्डुत्वभवो विकारः ॥९॥ तंद्रा हो, कफ, खांसी, शोजा ये हों, आलस्य हो, पसीना हो, भारीपन हो उस मनुष्यके कफसे उपजा पांडुरोग जानना ॥ ९ ॥ अथ त्रिदोषजपांडुका लक्षण । तन्द्रालस्यं श्वयथुवमथू कासहृल्लासशोषा विष्ठाभेदः परुष- नयने सज्ज्वरो वै क्षुधार्त्तः॥मोहस्तृष्णाक्लममथ नरस्याशु पश्ये- त्सुदूरं त्याज्यो वैद्यैर्निपुणमतिभिः सन्निपातोत्थपाण्डुः ॥१०॥ तंद्रा, आलस्य, शोजा, वमन, खांसी, थुकथुकी, शोष और मल पतला हो, कठोर नेत्र हों, ज्वर हो, क्षुधाकी पीडा हो, मोह हो, तृषा हो, ग्लानि हो, जिस मनुष्यके ये लक्षण हों वह सन्निपातसे उपजा पांडुरोगवाला मनुष्य उत्तम बुद्धिवाले मनुष्योंको दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥ १० ॥ अथ मट्टी खानेसे हुआ पांडुका लक्षण । मृत्तिकाभक्षणेनाथ शृणु पुत्र गदो महान्॥पाण्डुरोगो गरिष्ठो- ऽपि भवेद्धातुक्षयङ्करः॥११॥ मृद्भक्षणाच्चैव मलं प्रकीर्य्य स्रो- तांसि पूर्य्यन्ति तु मृत्तिकाभिः॥तेनैव नासृक् परिवर्त्तयन्ति न तर्पयन्ति वपुषं रसेन॥१२॥ क्षारात्कषायान्मधुरस्य पानात्स कोपयत्याशु नरस्य मृत्सा॥श्लेष्मप्रकोपान्मधुरानकरोति मृत्सा न जग्धा हितकारिणी स्यात् ॥ १३ ॥ विकृतिमुपगतास्ते मारुताद्यास्त्रयस्तु, द्युतिबलमभिहत्वा जीवनाशां निहन्ति भवति विकलमेवं पाण्डुरोगे शरीरं हरति जठरवह्निंमृत्तिकाभ- क्षणेन ॥ १४ ॥ हे पुत्र ! मृत्तिकाके भक्षण करनेसे महान् पांडुरोग होता है उसको सुनो, यह बडा क्लिष्टरोग है और धातुओंका क्षय करनेवाला है ॥ ११ ॥ मृत्तिकाके भक्षण करनेसे मल बिखर जाता है और उस मृत्तिकासे स्रोत भर जाते हैं फिर इसी कारणसे रुधिर नहीं प्रवृत्त होता है
और रससे शरीर पुष्ट नहीं होता है ॥१२॥ खारा, कसैला, मीठा इनका पान करनेसे मनुष्यके भक्षण की हुई मृत्तिका शीघ्र ही कुपित हो जाती है, मधुर पदार्थ सेवनसे वह मृत्तिका कफको कोप करती है इसवास्ते भक्षण की हुई मृत्तिका हितको करनेवाली नहीं है ॥ १३ ॥ वात आदिक दोष विकारको प्राप्त हुए कांति, बल, जीवनेकी आशा इनको शीघ्र ही नाश देते हैं और मट्टी खानेसे हुआ पांडुरोग जठराग्निका नाश करता है ॥ १४ ॥ अथ लोहचूर्णवटी । गोमूत्रे लोहं मतिमान्स्थापयेत्सप्तरात्रकम् ॥ तस्माच्चूर्णं तु मधुना देयं पाण्ड्वामयापहम् ॥ १५ ॥ बुद्धिमान् वैद्य लोहाको सात दिनतक गोमूत्रमें स्थापित करावे फिर उसका चूर्ण बना शह- दके संग देनेसे पांडुरोगका नाश होता है ॥ १५ ॥ शुंठादिमिश्रितलोहचूर्ण । त्र्यूषणं त्रिफला मुस्ता विडङ्गं चित्रकं समम् ॥ १६॥ भागमेकं लोहचूर्णं रसेनेक्षोर्विभावयेत्॥सप्ताहं खल्वितं लौहमलमस्मिन्पु- नर्वरम्॥१७॥शीलितं तु मधुना घृतेन वा पाण्डुरोगहृदयामया- पहम्॥अर्शसामपहरं हलीमकं कामलां च किल नाशयत्यहो १८॥ सूंठ, मिर्च, पीपल, त्रिफला, नागरमोथा, वायविडंग, चीता इनको समान भाग ले ॥ १६ ॥ एकभाग लोहाका चूर्ण इनको ईखके रसमें भावना देवे अथवा इसमें लोहेके मैलको सात दिनतक खरल कर मिलावे तो अतिश्रेष्ठ है ॥ १७ ॥ इस चूर्णको शहदमें अथवा घृतमें मिला खानेसे पांडुरोग, हृदयरोग, कामला, बवासीर, हलीमक रोगोंका नाश होता है ॥ १८ ॥ अथ मंडूकवटी । त्र्यूषणं चत्रिफलं सचित्रकं मेघचव्यसुरदारुमाक्षिकम् ॥ ग्रन्थिकं च शिखिभृङ्गराजकं योजयेत्पलिकभागिकानिमान् ॥ १९॥ चूर्णिताद्विगुणमेव योजयेल्लोहचूर्णमपि कज्जलप्रभम् ॥ अष्टभागसममूत्रकल्पितं पाचितं पुनरहो बलप्रदम् ॥ २० ॥ सेवयेद्गलमुपक्रमं तथा तत्र संयुतमिहास्ति शोभनम्॥नाशयेच्च कफकामलान्कृमीन्पाण्डुकुष्ठगुदजान्हलीमकम् ॥ २१ ॥ सूंठ, मिर्च, पीपल, त्रिफला, चीता, नागरमोथा, चव्य, देवदारु, सोनामाखी, पीपलामूल,
अ० ८ ] भाषाटीकासमेता । ( २६१ ) मेथी और भंगरा इनको चार चार तोला प्रमाण लेवे ॥ १९ ॥ और इस चूर्णसे दूना २ भाग कज्जलके समान बारीक लोहेका चूर्ण मिलावे इस सब चूर्णसे आठ ८ भाग गोमूत्रमें इस चूर्णको पकावे फिर पकाया हुआ यह चूर्ण बलको देनेवाला है ॥ २० ॥ पांडुरोगमें बलके अनुसार सेवन किया हुआ यह चूर्ण उत्तम है और कफरोग, कामला, क्रिमिरोग, पांडु, कुष्ठ, गुदाके रोग, हलीमक इनको नाशता है ॥ २१ ॥ अथ वज्रमंडूकवटक । पुनर्नवाव्योषत्रिवृत्सुराह्वयं निशाद्वयं चव्यफलत्रयं तथा॥ घनां यवां तिक्तकरोहिणीं समां द्विभागिकं लोहरजो विमिश्रयेत् ॥ २२ ॥ गवां पयो वा द्विगुणं वियोज्यं दार्ध्या प्रलेपं प्रणि- धाय धीमान्॥ छायाविशुष्का गुटिका विधेया क्षौद्रेण मूत्रेण गवां च भक्षयेत् ॥२३॥ ज्ञात्वा बलं रोगबलं नरस्य पाण्ड्वा- मये कामलसर्वमेहे ॥ गुल्मोदराजीर्णविषूचिकानां शोफाति- सारग्रहणीविबन्धान् ॥ शूलक्रिमीनर्शविकारहेतोर्वज्रोऽय- मस्तीति विचिन्तनीयम् ॥ २४ ॥ सांठी, सूंठ, मिर्च, पीपल, निशोथ, देवदार, हल्दी, चव्य, त्रिफला, नागरमोथा, इन्द्रजव, कुटकी,हरीतकी इनको समान भाग ले और दो भाग लोहेका चूर्ण मिला॥२२॥फिर इस सब चूर्णसे दूने गौके दूधमें इस चूर्णको पकावे जब चलानेकी कडछीमें चपकने लग जावे तब उतार छायामें सुखा गोली बना लेवे फिर शहदके संग अथवा गोमूत्रके संग भक्षण करे ॥ २३ ॥ मनुष्यके बलको और रोगके बलको जानके पांडुरोगमें, कामलामें, सम्पूर्ण प्रमेहरोगोंमें इसको भक्षण करे और गुल्मोदर, अजीर्ण, विषूचिका, शोजा, अतीसार, ग्रहणी, मलका बन्ध, शूल, क्रिमी रोग और बवासीरके विकारके लिये यह वज्र है इसमें चिन्ता न करनी चाहिये ॥ २४ ॥ अथ दूसरा वज्रमंडूकवटक । पञ्चकोलकटुत्रिकं घना देवदारुकृमिशत्रुकोल कम्॥एष भाग- सहितो वियोजितो मिश्रयेत्तदनु चायसं रजः ॥ २५ ॥ तत्र चाष्टगुणमूत्रमध्यतः पाचयेद्भवति येनलेपिका॥कारयेद्दरमा- त्रया पुनश्छाययापि पिषितञ्च शोषणम् ॥ २६ ॥ कारयेत्सु- रभिमंथितॆन च पानकञ्च शमयेत्सकामलम् ॥ पाण्डुमर्शम- तिसारमन्दभुक शोषमेहगुदजान् क्रिमीन्पि ॥ २७ ॥
( २६२ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने-
(पंचकोल) पीपल १ पीपलामूल २ चव्य ३ चीता ४ सूंठ ५, कटुत्रिक अर्थात् सूंठ, मिर्च, पीपल, नागरमोथा, देवदार, वायविडंग, कंकोल इनको समानभाग ले मिलावे, पीछे इनके समान लोहेका चूर्ण मिलावे ॥२५॥ फिर सब चूर्णसे आठगुने गोमूत्रमें इस चूर्णको पकावे जब पकजावे कड़छीमें चपके तब उतार बेरके समान गुटी बना छायामें सुखा फिर पीस लेवे ॥ २६ ॥ पीछे गायके मथे तक्रमें इसका पना बना सेवन करनेसे कामला, पांडुरोग, बवासीर, अतीसार, मन्दाग्नि, शोष, प्रमेह, गुदाके रोग, कृमि इनका नाश होता है ॥ २७ ॥ अथ अमृतवटक। धात्रीफलानां रसप्रस्थमेकं प्रस्थं तथा चेक्षुरसं विदध्यात् ॥ प्रस्थं तु कूष्माण्डरसप्रदिष्टमार्कंरसं प्रस्थविमिश्रमेकम् ॥२८॥ एकीकृतं मन्दहुताशनेन पाच्यं भवेद्यापदशेषमेति ॥ विमि- श्रयेदौषधसंघमेतत्पलैकमात्रं विपचेच्च पश्चात् ॥ २९ ॥ शृङ्गी सुराह्वं शतपुष्पधान्यं सुगन्ध¹शुण्ठी मधुकं विशाला। सपिप्पली- कं सकटुत्रयं च विडङ्गमुस्ताहपुषादलानि॥३०॥दीर्घाहरिद्राक- टुरोहिणीनां दुरालभापौष्करवत्सकानाम् ॥ कुष्ठाजमोदासुरसा- दलानि चूर्ण त्वमीषां विनियोजनीयम् ॥ ३१ ॥ गुडं पुराणं द्विगुणं तथा गो-घृतेन रम्यं वटकं विदध्यात् ॥ तद्भक्षणं कामलमर्शसं च पाण्डुं ज्वरं घोरतरं निहन्ति ॥ ३२॥ तच्छो- फशोषग्रहणीविकारान्वातातिसारक्षयकासगुल्मान् ॥ ३३॥ आंवलोंका रस ६४ तोले और ईखका रस ६४ तोले, कोहलाका रस ६४ तोले, आकका रस ६४ तोले ॥ २८ ॥ इनको एक जगह मिला मंद २ अग्निसे पकावे जब चतुर्थांश बाकी रहे तब इन आगे कहीहुई औषधोंको चार २ तोले प्रमाण मिलाके फिर पकावे ॥ २९ ॥ शृंगरा, देवदार, सौंफ, धनियां, रास्ना, सूंठ, मुलहठी, इंद्रायण, पीपल, कटुत्रय अर्थात् सूंठ, मिर्च, पीपल, वायविडंग, नागरमोथा, हाऊबेर ॥ ३० ॥ दारुहलदी, कुटकी, हरीतकी, जवासा, पोहकरमूल, कूडा इनके पत्ते इन सबोंको पहले कहे हुए प्रमाणके अनुसार ले चूर्ण बना मिला देवे ॥ ३१ ॥ इस चूर्णसे दूना पुराना गुड़ मिलावे, फिर घृतमें गोली बांधलेवे
१ "सुगन्धा गन्धनाकुली" इत्यमरः। गन्धनाकुली रास्नाभेद। नाई। कन्द विशेष अथवा "इष्टगन्धः सुगन्धिः स्यादित्यमरः" । सुगन्धवर्ग-स्याहजीरा, कुंदुरु, गन्धतृण, नीलोत्पल, खश, चन्दन, गठिवन, सुखं, सहिजन, गंधक, चना, भूतृण, कचूर, रुद्रजटा, वन्ध्यककौंटिकी, खेखसा, मालती, दूर्व, वच कुलींजन, रास्ना, कृष्णाशारिवा ।
अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( २६३ ) इसके भक्षण करनेसे कामला, बवासीर पांडुरोग, अतिदारुणज्वर ॥ ३२ ॥ शोक, शोष, संग्रहणी इन रोगोंका नाश होता है और वातरोग, अतीसार, क्षयी, खांसी, गुल्मरोग इनको नाशता है ॥ ३३ ॥ अथ पांडुरोगका पथ्यापथ्य । गोधूमशालयवषष्टिकमुद्गकानां श्यामाढकीघृतयुतं पयसा सत- क्रम् ॥ गाण्डीववास्तुकमथो शतपुष्पवर्त्तापथ्यं हितं निगदितं मनुजस्य पाण्डौ ॥ ३४॥ जाङ्ग्लानि च मांसानि भोजने च प्रशस्यते ॥३५॥ तिलं च रूक्षं कटुकं च तीव्रं दाहात्मकं काञ्जिकभेदकं च ॥ सुराम्लसौवीरकबीजपूरास्तैलानि वर्ज्यानि च पाण्डुरोगे ॥३६॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे तृतीयस्थाने पाण्डुरोगचिकित्सा नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ गेहूं, शालीसंज्ञक चावल, जव, सांठी चावल, मूंग, शामक, अरहर इन अन्नोंको घृतके संग अथवा दूधके संग अथवा तक्रके संग भोजन करना हित है और अर्जुनवृक्षके पत्ते, बथुवा, शोफा, वार्त्ताकु इनका शाक पांडुरोगवाले मनुष्यको हित है, पथ्य है॥ ३४ ॥ जांग- लदेशके जीवोंका मांस भोजनमें हित है ॥ ३५ ॥ पांडुरोगमें कडुए, रूखे, चरपरे दाह करनेवाले ऐसे कांजीके भेद, मदिरा, खटाई, कांजी, बिजौरा, तेल इन पदार्थोंको वर्ज देवे ॥ ३६ ॥ इति बेरीनिवासिबुधशिवसहायसूनुवैद्यरविदत्तशास्त्र्यनुवादितहारीतसंहिताभाषाटीकायां तृतीयस्थाने पांडुरोगचिकित्सानामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥ नवमोऽध्यायः ९. अथ क्षयरोगकी चिकित्सा । आत्रेय उवाच ॥ शृणु वरभिषां त्वं व्याधिभीमं नराणां भवति विहतचेष्टो वातलप्राणिनां वै ॥ चिरनिचयकरोऽयं प्राकृतैः कर्मपाकैरिह परिभवकारी मानुषस्य क्षयोऽयम् ॥१॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे वैद्योंमें उत्तम! जो मनुष्योंको घोर व्याधि होता है उसको सुनो, वातके स्वभाववाले प्राणियोंके यह रोग होता है, चेष्टाको हत कर देता है और पूर्वजन्मके कर्मविपाकसे नरकको करनेवाला है और इस संसारमें दुःखको करनेवाला यह क्षयरोग होता है ॥ १ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
( २६४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अथ क्षयरोगमें पापरूपी कारण । देवानां प्रकरोति भङ्गमथवा भ्रूणस्य सन्तापनं गोपृथ्वीधर- विप्रबालहननं चा रामविध्वंसनम् ॥ सोऽयं स्थानविनाशनं च कुरुते स्त्रीणां वधं यो नरस्तस्यैतैर्गुरुकर्मभिः क्षयगदो देहार्थहारी महान् ॥२ ॥ देवानां दहतो धनं च दहतो भ्रूणप्रपातेऽपि च देवत्वं हरतो विषं च ददतश्चारामकं निघ्नतः ॥ तेनासौ नियमेन सम्भवति वै नृणां च तीव्रा रुजा धातूनां क्षयकारिणी च मनुज- स्यात्मापहा दारुणा ॥ ३ ॥ क्षयो दशविधश्चैव विज्ञातव्यो भिषग्वरैः ॥ ४ ॥ जो पुरुष देवताओंकी मूर्तिको तोड़देता है और गर्भगत जीवको सन्ताप देता है, गौ, राजा, ब्राह्मण, बालक इनकी हत्या करता है और बगीचाका विध्वंस करता है, किसीके स्थानका विनाश करता है और जो स्त्रियोंका वध करता है उसके इन कर्मोंसे देहको नाश- करनेवाला महान् क्षयीरोग होता है ॥ २ ॥ जो पुरुष देवताओंको दग्ध करे, किसीके धनको दग्ध करे और गर्भको गिरावे, देवताके द्रव्यको हरे, विष देवे, बाग बगीचेका नाश करे इन विपरीतकर्मोंसे मनुष्यके अतितीव्र पीडा होती है, धातुओंको क्षय करनेवाली और आत्माको नाश करनेवाली दारुण क्षयव्याधि होजाती है ॥ ३॥ वैद्यजनोंको दशप्रकारका क्षयरोग जानना चाहिये ॥ ४ ॥ अथ क्षयरोगके हेतु । श्रमाद्वा भाराद्वा विषमशयनैर्दीर्घचलनैरजीण भोज्याद्वा सुरत- रतिसेवापरतया ॥ ज्वरेणातिक्रान्ताद्विषमशयनाच्छीतलतरैः क्षयं याति श्लेष्मा पवनमथ पित्तञ्च तनुषु ॥ ५॥ रोगाक्रान्ता- द्विषमशयनात्तस्य मन्दज्वराद्वा श्लेष्मापित्तञ्च मरुदथवा याति देहक्षयं वा ॥ श्रम, भार, विषमशयन, दीर्घमार्गमें गमन, अजीर्णमें भोजन, मैथुनमें अतिरमण कर- नेसे और ज्वरसे आक्रांत होनेसे, विषमशयन, अतिशीतल पदार्थका सेवन करनेसे कफ- कोपको प्राप्त होता है, फिर शरीरमें वायुको और पित्तको भी कुपित कर देता १ विषमशयन दोवार है इससे एक जगह कालपरत्व विषमशयन अर्थात् दिनको सोना रातको जागना समझे और दूसरी जगह क्रमपरत्वसे अर्थात् औंधासोना आदि समझें ।
अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( २६५ )
हैं ॥ ५ ॥ रोगसे आक्रांत होनेसे अथवा विषमशयन करनेमें अथवा मन्द ज्वरसे यह क्षयरोग होजाता है और कफसे, पित्तसे अथवा वायुसे इन तीन प्रकारोंसे देहमें क्षय- रोग होता है ॥ अथ क्षयरोगके प्रकार । रसासृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जाशुक्रगतस्तथा ॥ एवं दशविधा नॄणां क्षया देहे भवन्ति वै ॥६॥ पुनश्चैषां लक्षणानि सावधा- नतया शृणु ॥ ७ ॥ और रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य इन सात धातुओंमें होता है, ऐसे मनुष्यके शरीरमें दश प्रकारके क्षयरोग कहे हैं ॥ ६ ॥ अब फिर भी इनके लक्षणोंको कहते हैं सुनो ॥ ७ ॥ अथ वातक्षयका निदान । अतिस्वेदातिघर्मेण चिन्ताशोषभयादिना ॥ वाताद्यः सेवितैश्चापि जायते मारुतक्षयः ॥ ८॥ अत्यंत पसीना, अति घाम, चिंता, शोष, भय इत्यादिकोंसे और वायुको करनेवाले पदा- र्थोंके सेवनेसे वायुका क्षय होजाता है ॥ ८ ॥ अथ वातक्षयका लक्षण । तेन तन्द्राऽङ्गदाहश्च पिपासारुचिवपथुः ॥ तमः क्लमो भ्रमश्चैव भवेच्च मारुतक्षये ॥ ९ ॥ उससे तन्द्रा, अंगमें दाह, तृषा, अरुचि, कंपना, अंधेरी, ग्लानि, भ्रम ये उपद्रव वातके क्षयरोगमें होते हैं ॥ ९ ॥ वातक्षयमें सेव्यपदार्थ । तस्मादानूपानि सेव्यानि रसानि पललानि च ॥ रसोनादिककल्कञ्च सेव्येद्वातनाशने ॥ १० ॥ इसलिये वातको नाश करनेवाले रस और अनूपदेशके मांसोंका सेवन करे और लहसुनआ- दिक औषधोंके कल्कके सेवनेसे भी वातका नाश होता है ॥ १० ॥ अथ पित्तक्षयके हेतु । पित्तक्षयेऽग्निमान्द्यं च जायतेऽरुचिजाड्यता ॥ कासहृल्लासशोफश्च जायते मन्दचेष्टता ॥ ११ ॥
( २६६ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने ] पित्तके क्षयरोगमें मंदाग्नि, अरुचि, जड़ता ये रोग होते हैं और खांसी, श्वास, थुकथुकी, शोफ, मन्दचेष्टा ये उपद्रव होते हैं ॥ ११ ॥ अथ पित्तक्षयकी चिकित्सा । स्वेदाभ्यङ्गान्नपानानि दीपनानि प्रयोजयेत् ॥ जाङ्ग्लानि रसान्नानि सेवयेत्पित्तकृत्क्षये ॥ १२ ॥ स्वेद, मालिस, दीपन अर्थात् जठराग्निको दीप्त करनेवाले अन्नपान, इनको प्रयुक्त करे और पित्तसे उपजे क्षयरोगमें जांगल देशके जीवोंके मांसका रस हित है ॥ १२ ॥ अथ कफक्षयका कारण । व्यायामे च व्यवाये च रूक्षान्नाहारसेवनैः ॥ सन्तापक्रोधनश्चैव जायते कफसम्भवः ॥ १३ ॥ कसरत करनेसे, मैथुन, रूखा अन्नका भोजन, क्रोध, इनके सेवनसे कफका क्षयरोग बढता है ॥ १३ ॥ अथ कफक्षयका लक्षण । तन दाहोऽथवा पाण्डुः शोफो निःश्वसन भ्रमः ॥ विनिद्रता क्षुत्तृषा च स्त्रीसङ्गेनापि नन्दति ॥ १४ ॥ उससे दाह अथवा पांडुरोग, शोजा, श्वासरोग, भ्रम, निद्राका नाश, क्षुधा, स्त्रीसंगसे प्रसन्नता ये लक्षण होते हैं ॥ १४ ॥ अथ कफक्षयकी चिकित्सा । तस्य शीतान्नपानानि कन्दशाकादिकै रसैः ॥ अनूपदधिदुग्धैर्वा सेवनं च समीहितम् ॥ १५ ॥ उसके शीतल अन्नपान, कंदशाकआदिकोंके रस, अनूपदेशके जीवोंका मांस, दही, दूध, इनका सेवन हित है ॥ १५ ॥ अथ त्रिदोषजक्षयकी चिकित्सा । त्रिभिर्दोषैः क्षयं प्राप्तैस्तदा हि मरणं ध्रुवम् ॥ साधारणा क्रिया तस्य प्रयोक्तव्या महामते ॥ १६ ॥ जब त्रिदोषसे उपजा हुआ क्षयरोग होता है तब निश्चय मरण होजाता है । हे हारीत महामते ! उसकी साधारण चिकित्सा कही है ॥ १६ ॥
अ० ९ ] भाषाटीकासमेता । ( २६७ ) अथ धातु--रस-आदि सात ७ प्रकारकें क्षयरोगकें लक्षण ! अथ धातुक्षयं वक्ष्ये हारीत शृणु साम्प्रतम् ॥ रसरक्तमेदमांसानां प्रत्येकं क्षयलक्षणम् ॥ १७ ॥ हे हारीत ! अब धातुके क्षयरोगको कहते हैं सुन । रस, रक्त, मांस,मेद, इन सबोंके एक २ के लक्षणको कहते हैं ॥ १७ ॥ अथ रसक्षयका लक्षण ! रसक्षयेऽतिशोषश्च मन्दाग्नित्वं च वेपथुः॥ शिरोरुङ्मन्दचेष्टत्वं जायते च क्लमभ्रमौ ॥ १८ ॥ रक्तक्षये क्षयः पाण्डुर्मन्दचेष्टो भवेन्नरः ॥श्वासो निष्ठीवनं शोषो मन्दाग्नित्वं च जायते॥१९॥ रसके क्षय होनेमें अत्यंत शोष हो, मंद अग्नि हो, कंपना हो,शिरमें पीडा हो,मंदचेष्टा हो, ग्लानि हो, भ्रम हो ॥ १८ ॥ रक्तक्षय होनेमें क्षयरोग होवे तो पांडुरोग हो जावे, मंद- चेष्टा हो जावे, श्वास हो, थुकथुकी हो, शोष हो, मंदाग्नि हो ॥ १९ ॥ मांसक्षयका लक्षण । मांसक्षयेऽतिकृशता चेष्टनं चाङ्गभङ्गता ॥ निद्रानाशोऽतिनिद्रास्य विसंज्ञो लघुविक्रमः ॥ २० ॥ मासके क्षय होनेमें दुबलापन हो,देह चमकने लगे,देहमें दर्द हो,निद्राका नाश हो अथवा इसको अत्यंत निद्रा आवे और संज्ञा नहीं रहे, अल्पबल रहे ॥ २० ॥ अथ मेदःक्षयका लक्षण । मेदःक्षये मन्दबलो विसंज्ञता पारुष्यमङ्गस्य च भङ्गता स्यात्॥ श्वासातिकामारुचिताग्निमान्द्यंगतिर्विशोषश्च तथैव जायते२१ मेदके क्षय होनेमें मंदबल रहे, संज्ञा नहीं रहे, अंगभंग हो, कठोरता रहे और श्वास, अत्यन्त खांसी, अरुचि, मन्दाग्नि,गमन और शरीरमें शोष हो ये उपद्रव होते हैं ॥२१॥ अथ अस्थिक्षयका लक्षण । अस्थिक्षये स्यादतिमन्दचेष्टा वीर्यस्य मान्द्यं किल मेदसः क्षयः॥विसंज्ञता कम्पनता च कार्श्यता तथाङ्गभंगो वमनं कठोरता ॥२२॥दोषस्य शैथिल्यमथापि शोषिता विकम्पन शोषरुजश्च जायते ॥ लिङ्गैरथैभिः परिवेद्मज्जाक्षयोऽधिका कम्पनतैव चात्र ॥ २३ ॥
( २६८ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- अस्थिक्षयमें अतिमन्द चेष्टा हो, वीर्यमन्द हो जावे, मोटापा नाश हो जावे, संज्ञा नहीं रहे, माडा- पन हो, कंपना रहे, अंगभंग हो, वमन हो, कठोरता हो ॥ २२ ॥ और शोष हो वातआदिक दोषोंकी शिथिलता हो, शोजा हो, कंपना हो, रूक्षता हो और मज्जाके क्षयमें भी यही अस्थिक्ष- यके लक्षण होते हैं, केवल इसमें कंपनता अधिक होती है ॥ २३ ॥ अथ वीर्यक्षयका लक्षण । भ्रमः क्लमः स्यादतिमन्दचेष्टः शोफो निशाजागरणं च तन्द्रा ॥ मन्दज्वरः शोषसमो मनुष्ये शुक्रक्षये चाङ्गविचेष्टितानि ॥ २४ ॥ रौक्ष्यं रमणीद्वेषः रोषः शोफो भ्रमिश्च कम्पनता ॥ विरूपता वैकल्यं सन्धिषु शोषस्तथा याति ॥ २५ ॥ भ्रम हो, ग्लानि हो, मन्दचेष्टा हो, शोजा हो, रात्रिमें निद्रा नहीं आवे, तन्द्रा रहे, मन्दज्वर हो, शोष हो ये लक्षण हैं, और मनुष्यके वीर्यक्षय होनेमें अंग बेचैनीसे हिला करें ॥ २४ ॥ रूखापन, स्त्रियोंसे द्वेष, क्रोध, सूजन, भ्रम और कँपकपी, कुरूपता, विकलता और सन्धियोंमें सूजन वीर्यके क्षयमें होती है ॥ २५ ॥ अथ रसरक्तवृद्धिकारक औषध । इदानीं संप्रवक्ष्यामि भेषजानि यथाक्रमम् ॥ स्नेहनं रूक्षणं चैव तथा विम्लापनं हितम् ॥ २६ ॥ जाङ्ग्लानि च मांसानि भोज- नानि च सेवेयेत् ॥ गुडूची शृङ्गवेरञ्च यवानीकथितं जलम् ॥ २७ ॥ मरिचः कथितं दुग्धं पाने रात्रौ प्रशस्यते ॥ तेन रसानां वृद्धिः स्याच्छीघ्रं तस्माद्विमुच्यते ॥ २८ ॥ रसानां वृद्धिकरणं गोधूमयवशालिनाम् ॥ कथितानि भिषक्श्रेष्ठैर्जाङ्ग- लानि विशेषतः ॥ २९ ॥ अब यथाक्रमसे औषधोंको कहते हैं कि स्नेहन, रूक्षण, विम्लापन ये कर्म करने हित हैं ॥ २६ ॥ और जांगलदेशके जीवोंका मांस भोजनमें हित है और गिलोय, अदरख, अजवायन इनके क्वाथका जल हित है ॥ २७ ॥ मिरचोंमें पकाया हुआ दूध रात्रिमें पीना हित है इससे रसोंकी वृद्धि होती है और शीघ्रही क्षयरोगसे छूट जाते हैं ॥ २८ ॥ गेहूँ, जव, शालिसंज्ञक चावल, जांगलदेशके जीवोंका मांस ये रसके बढ़ानेवाले और वैद्योंकरके श्रेष्ठ कहे गये हैं ॥ २९ ॥ Nepal Sanskrit University, Balmeeki Campus, Kathmandu
अ० ९ ] भाषाटीकासमेता। ( २६९ ) अथ रक्तवृद्धिकारक औषध । घृतदुग्धसिताक्षौद्रमरीचानि च पिप्पली ॥ पानं शस्तं मनुष्याणां रक्तवृद्धिकरं परम् ॥ ३० ॥ घृत, दूध, मिश्री, शहद, मिर्च और पीपल इनका पीना हित है। मनुष्योंके रक्तकी वृद्धि करनेवाला है ॥ ३० ॥ अथ मेदोवृद्धिकारक औषध । अनूपानि च धान्यानि लघुनामानि कल्पयेत्॥कल्यांश्च घृत- दुग्धादीन्सेवयेन्मधुराणि च ॥ ३१ ॥ रसांश्च जाङ्ग्लानि स्युः सेवनार्थे भिषग्वर ॥३२॥ सितोपलादिकं चूर्णमजाक्षीरं सको- लकम् ॥ हितं पानं क्षये चैव कल्यंमप्रातराशनम् ॥ ३३ ॥ अनूपदेशके जीवोंका मांस, हल्के अन्न, घृत, दूध, कल्यसंज्ञक मदिरा, मधुरपदार्थ इनका सेवन हित है ॥ ३१ ॥ और हे वैद्योंमें श्रेष्ठ ! जांगलदेशके जीवोंका रस सेवना हित है ॥३२॥और सितोपला आदि चूर्ण और पीपलीसे संयुक्त किया हुआ बकरीका दूध पीना हित है। सायंकालमें भोजनके समय और कल्प कहिये प्रभातकालमें करे ॥ ३३ ॥ अथ अस्थिवृद्धिकारक औषध । पक्वानि घृतशस्तानि क्षीराणि विविधानि च ॥ चन्दनानि च द्राक्षादिचूर्णानि च भिषग्वर ॥ ३४ ॥ जांगलानि च सर्वाणि सेवनीयानि पुत्रक ॥ अन्नानि च मधुराणि सर्वाणि च प्रयो- जयेत् ॥ ३५ ॥ पके हुए घृत और अनेकप्रकारके दूध ये श्रेष्ठ हैंऔर हे उत्तम वैद्य ! चन्दन और द्राक्षादिक चूर्ण हित है ॥ ३४ ॥ और हे पुत्र ! सब प्रकारके जांगलदेशके जीवोंके मांस सेवनेमें हित हैं सब प्रकारके मीठे अन्न सेवनेमें हित हैं ॥ ३५ ॥ अथ शुक्रवृद्धिकारक औषध । शुक्रक्षये प्रपाकानि रसानि च विशेषतः॥ नवनीतं तथा क्षीरं मधुराणि च सेवयेत् ॥ ३६ ॥ कर्कटीमुलपयसा विदारीकन्द- शाल्मली ॥ सितान्व्यपानं च हितं शस्यन्ते मधुराणि च ॥३७॥ अग्रे चूर्णानि वक्ष्यन्ते शुक्रवृद्धिकराण्यर्थ ॥ ३८ ॥ १कल्यमप्रातराशनं कल्यं मधु अप्रातराशने प्रातःकालातिरिक्तसमये अशनंभोजनमित्यर्थः। आङ्पूर्वकंमशनम् आशनम्।
( २७० ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- शुक्रके क्षयमें अच्छीतरह पकाये हुए रस देने हित हैं और नौनीतघृत, दूध, मधुर पदार्थ, इनका सेवन करे ॥ ३६ ॥ काकडीकी जड़ विदारीकंद, शालवन,इनको दूधके संग मिश्री मिला पान करना हित है और मीठे पदार्थ हित हैं॥३७॥ अब आगे वीर्यकी वृद्धि करनेवाले चूर्णोंको कहेंगे ॥ ३८ ॥ अथ बलादि चूर्ण । बला विदारी लघुपञ्चमूली पञ्चव क्षीरद्रुमत्वक् प्रयोज्या ॥ पुनर्नवामेघतुगायुतं स्यात्सजीवनीयैर्मधुकैः समांशैः ॥ ३९ ॥ अक्षप्रमाणानि समानि तानि सर्वाणि चैतानि विचूर्णयित्वा ॥ विमिश्रयेत्तत्र कणाशतानि यवान्नगोधूमयवांश्च पिष्ट्वा ॥ ४० ॥ तुगासमांशं सिततण्डुलानां सेयं सुशृङ्गारकमिश्रितं तु॥ प्राकर्ण- कार्डेन वियोजनीयं सर्वांशकेनापि सिता प्रयोज्या ॥ ४१ ॥ विभावयेच्चामलकीरसेन वारत्रयं गोपयसा विभाव्य॥ ततोऽस्य सर्वैश्च सशर्करैर्वा घृतेन चैवं पुनरेव भाव्यम्॥४२॥ तं भक्षये- त्क्षौद्रयुतं पलार्द्धं जीर्णे च भोज्यं कटुकाम्लवर्जम् ॥ क्षीरं घृतं वा सितशर्करां वा यवान्नगोधूमकशालिभक्ष्यान् ॥ ४३ ॥ ज्ञात्वाग्निपाकं जठरे नरस्य देयो विधिज्ञैः क्षयरोगशान्त्यै ॥ पथ्यक्षये श्रान्तचिराभितापसंपीडितानां च तथा शिरोऽर्ती ॥४४॥ पित्तातुराणां रुधिरक्षयाणां श्रमाध्वसंपीडितकामला- नाम्॥श्वासातुराणां मधुमेहिनां च क्षीणेन्द्रियाणां बलकारि शस्तम्॥४५॥ गर्भो गृहीतश्च यया स्त्रिया च तस्याः प्रशस्तं तु बलादिचूर्णम् ॥ ४६ ॥ इति बलादिचूर्णम् ॥ खैरहटी, विदारीकंद, लघुपंचमूल अर्थात् सालवन, पिठवन,कटेहली, बडी कटेहली, गोखरू पीपल,वड, गूलर, पिलखन, आंव इन पांच वृक्षोंकी छाल प्रयुक्त करनी चाहिये और सूंठ, नागरमोथा, वंशलोचन और जीवनीआदिक गण औषध मुलहटी इन सबोंको समान भाग ॥ ३९ ॥ एक २ तोला प्रमाण ले फिर इन सबोंका चूर्ण बना उसमें सौ १०० पीपली मिला और जव, गेहूं ॥ ४० ॥ उत्तम सफेद चावल इनको वंशलोचनके समान
· अ० ९ ·] भाषाटीकासमेता । (२७१)
भाग ले पीसके मिलादेवे और पीछे कहीहुई प्रकरणकी सब औषधोंसे आधाभाग भंगरा और इन सबोंके समान मिश्री मिला ॥ ४१ ॥ फिर इस चूर्णको आंवलेके रसमें भावना दे पीछे तीनवार गौके दूधमें भावना दे फिर इस सबचूर्णके समान खांड मिला फिर घृतमें भावनादे ॥ ४२ ॥ २ तोला प्रमाण उस चूर्णको शहदके संग खावे और यह चूर्ण जरजावे तब भोजन करे और चर्चरा तथा खट्टा भोजन नहीं करे और दूध, घृत, सफेद खांड, जव, गेहूं, शालिसंज्ञकचावल इनका भोजन करे ॥ ४३ ॥ मनुष्यके जठराग्निपाकको जानके विधिके जाननेवाले वैद्योंको क्षयरोगकी शांतिके वास्ते देना कहा है और मार्गमें क्षीणहुआ, हाराहुआ, बहुतकालसे संतापवाला इनोंसे पीड़ित हुए पुरुषोंको और शिरकी पीड़ामें ॥ ४४ ॥ और पित्तसे आतुर, रुधिरक्षयवाले, श्रम, मार्ग इनसे पीड़ित, कामलारोगवाले, श्वासरोगवाले, मधुमेहवाले, क्षीणइंद्रियवाले इन पुरुषोंको यह चूर्ण श्रेष्ठ कहा है ॥ ४५ ॥ और जिस स्त्रीके गर्भ ठहररहाहो उसको यह बलादिचूर्ण श्रेष्ठ कहा है ॥ ४६ ॥ अथ च्यवनप्राशननामक अवलेह । बिल्वाग्निमन्थस्योनाकाः काश्मरी पाटली तथा ॥ शालिपर्णी पृश्निपर्णी श्वदंष्ट्रा बृहतीद्वयम् ॥४७॥ शृङ्गी शीता चामलकी जयन्ती पुष्कराह्वयम्॥द्राक्षाभयामृता मेदा चन्दनागुरुपद्म- कम् ॥ ४८ ॥ बलाह्वयास्तु कर्णे द्वे जीवकर्षभकावुभौ ॥ काकोली क्षीरकाकोली विदार्याः कन्दमांसकम् ॥ ४९ ॥ सर्वेषां पलिका मात्रा योजयेद्भिषजां वरः॥धात्रीफलं पञ्चशतं सुपक्वरससंयुक्तम् ॥ ५० ॥ जलद्रोणे विपक्तव्यं चतुर्भागे च शोषितम् ॥ तथा निर्वाप्य मतिमान्कलकानि समुद्धरेत् ॥५१॥ तत्क्वाथं कलकयेत्तावद्यावद्दर्वीप्रलेपकः ॥ पुनस्तैलेन वाज्येन पक्त्वा चामलकीफलान् ॥५२॥पाचितांश्चूर्णितान्सर्वान्समश- र्करया युतान्॥चतुष्पलातुगाक्षीरैर्योजयेद्भिषजांवरः॥ ५३ ॥ पिप्पलीनां सहस्रैकं त्वगेलापत्रकं तथा॥एषां द्विपलिकां मात्रां विदध्यात्तत्रसत्तमः॥५४॥सव प्राक्वथिते लेहे योजयेच्च विचू- र्णितम्॥आदरेण समं लिह्यान्नराणां च रसायनम् ॥ ५५ ॥ श्वासकासक्षयपाण्डुकामलानां विशोषणम् ॥ क्षीणक्षतानां बालानां वृद्धानां देहलक्षणम् ॥५६॥ स्वरसङ्गपिपासानां हृद्रोगे
(२७२) हारीतसंहिता। [ तृतीयस्थाने- पित्तशोणितम्॥शुक्रदोषं शिरोरोगं पीनसं चापकर्षति ॥५७॥ जीर्णज्वरञ्च मन्दाग्निं कुष्ठं दुष्टं भगन्दरम्॥मेहं कृच्छ्राश्मरीं हन्ति तथा रोचनवारणम्॥५८॥हृद्रोगशूलमानाहं नाशयत्य- विसंशयम्॥वन्ध्यानां पुत्रजननं वृद्धानामल्परेतसाम् ॥५९॥ षण्ढोऽपि जायते चैव सदा ऋतुकरः परः॥मेधा स्मृती तथा तेजो वर्द्धयत्याशु निश्चितम् ॥६०॥ सौख्यसौभाग्यदर्शी च वृद्धोऽपि तरुणायते॥क्षयरोगविनाशाय कथितं चात्रिणा महत् ॥६१॥ च्यवनप्राशनं नाम कृष्णात्रेयविभाषितम् ॥६२॥इति च्यवनप्राशननामावलेहः ॥ बेलगिरी, अरणी, सोनापाठा, खंबारी, शालवन, पिठवन, गोखरू, छोटी कटेहली, बड़ी कटेहली ॥ ४७ ॥ भांग, गंगेरन, भूमि आंवला, जयंती अर्थात् अरणीभेद, बड़ीअरणी, पोहकरमूल, दाख, हरडैं, गिलोय, मेदा, चंदन, अगर, पद्माक ॥ ४८ ॥ खरैंटी, दोभाग दालचीनी, जीवक, ऋषभक, काकोली, क्षीरकाकोली, विदारीकंद ॥ ४९ ॥ इन सबोंको वैद्यजन चार २ तोला प्रमाण लेवे और पकेहुए रसके आंवले पांचसौ लेके ॥ ५० ॥ पीछे इन सब औषधोंको एकहजार चौसठ १०६४ तोले जलमें पकावे फिर चतुर्थांश बाकी रहे तब बुद्धिमान् पुरुष उन औषधोंको निकाल आंवलोंकी गुठली निकालके उनकी कली करलेवे और पीसके पीठीसी करले ॥ ५१ ॥ फिर पूर्वोक्त क्वाथ डालके पकावे फिर कडछी चपकने लगे तब उतारे और तेलमें अथवा घृतमें तिन आंवलोंकी पीठीको सेंकले ॥ ५२ ॥ पीछे पकाये हुए तिस चूर्णमें बराबरकी खांड मिलावे और १६ सोलह तोले वंशलोचन मिलावे ॥ ५३ ॥ उत्तम वैद्य इसी कहेहुए अवलेहमें हजार पीपली, दालचीनी ८ तोले, तेजपात ८ तोले, इनका चूर्ण मिलादेवे ॥ ५४ ॥ पीछे यह लेह मनुष्योंको आदरसे चाटना चाहिये । यह मनुष्योंको रसायन कहा है ॥ ५५ ॥ और श्वास, खांसी, पांडुरोग, कामला, इन रोगोंको नाशता है और क्षीणरोगसे क्षत हुए बालक, वृद्धजन, इनके देहकी रक्षा करने- वाला है ॥ ५६ ॥ स्वरभंग, पिपासा, हृदयरोग, पित्तरक्त, शुक्रदोष, शिरोरोग, पीनस इन रो- गोंको दूर करता है ॥ ५७ ॥ जीर्णज्वर, मंदाग्नि, दुष्ट कुष्ठ, भगंदर, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, अरुचि इन रोगोंको दूर करता है ॥ ५८ ॥ हृदयरोग, शूल, अफारा इनको नाशता है इसमें संदेह नहीं । यह चूर्ण वंध्यास्त्रियोंको पुत्रको देनेवाला और अल्पवीर्यवाले वृद्ध ॥५९॥ नपुंसक इनके वीर्यको बढ़ानेवाला है और बुद्धि, स्मृति, तेज इनको शीघ्र ही निश्चय बढ़ाता है ॥६०॥