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विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

८१६ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे

रहते हैं, ये सभी अपने तेज (चिन्मय प्रकाश) से व्याप्त हैं ॥ ३२ ॥

त्रयस्तु पितरो नित्यं वर्धयन्ति दिवाकरम् ।
चतुर्भिः पितृभिश्चैव चन्द्रो वर्धति मण्डले ॥ ३३ ॥

तीन पितर सदा सूर्यदेवकी वृद्धि करते हैं और चार पितरोंके साथ चन्द्रमा अपने मण्डलमें बढ़ते हैं ॥ ३३ ॥

त्रयः पितृगणा नित्यं पिण्डान् पश्चाददन्ति ते ।
चत्वारोऽन्ये पितृगणाः सिद्धाः पञ्च क आददे ॥ ३४ ॥

तीन पितृगण सदा फलभोगके पश्चात् पिण्डों (स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों) का संहार करते हैं और चार अन्य पितृगण सिद्धरूप हो पञ्चविषय आदि हो जाते हैं, जिन्हें यजमान प्रजापतिने स्वीकार किया है ॥ ३४ ॥

त्वमेव पञ्च तान् घर्मांस्त्वमेवापञ्च तान् विभो ।
सनातनमयो दिव्यः शाश्वतो ब्रह्मसम्भवः ॥ ३५ ॥

प्रभो ! आप ही उन पाँच धर्मों (पञ्चीकृत भूतों) को और आप ही अपञ्चीकृत भूतोंको प्रकट करते हैं। आप सनातनमय, दिव्य, शाश्वत एवं वेदोंके आविर्भावके स्थान हैं ॥ ३५ ॥

यस्मात्त्वत्तेज आदत्ते अग्निर्वायुश्च सर्वशः ।
अतस्त्वं कर्मणा तेन आदित्यः समपद्यत ॥ ३६ ॥

अग्नि और वायु भी सब प्रकारसे आपके ही तेजका आदान (ग्रहण) करते हैं। इसलिये उस आदानरूप कर्मसे आप 'आदित्य' कहलाते हैं (आप ही सबके प्रकाशक स्वयं प्रकाशरूप हैं) ॥ ३६ ॥

यदादत्सि जगत् सर्वं रश्मिभिः प्रदहन्निव ।
युगान्तकाले सम्प्राप्ते परां सिद्धिमुपागतः ॥ ३७ ॥

आप युगान्तकाल आनेपर अपनी किरणोंसे सम्पूर्ण जगत्‌को दग्ध करते हुए-से उसका आदान (ग्रहण) करते हैं, इसलिये भी 'आदित्य' कहलाते हैं। आप सदा परम सिद्धिको प्राप्त हैं ॥ ३७ ॥

पक्षसंधावमावास्यां लोकं चरसि मानुषम् ।
ऋषिभिः सह गूढात्मा सूर्येन्दुवसुसम्भवैः ॥ ३८ ॥

आप अपने स्वरूपको छिपाकर सूर्य, चन्द्रमा और वसुओंसे उत्पन्न हुए ऋषियोंके साथ पूर्णिमा और अमावास्या-को (पूर्णमास और दर्श नामक यागोंको ग्रहण करनेके लिये) मनुष्यलोकमें विचरते हैं ॥ ३८ ॥

सफलं कर्म कर्तॄणां यजतां पुष्टिवर्धनः ।
हेतूनामविकाराय मा भूत् कर्मविपर्ययः ॥ ३९ ॥

आप सकल कर्म करनेवाले यजमानोंकी पुष्टि (सुख-समृद्धि) को बढ़ानेवाले हैं। स्वर्ग आदिके साधनभूत जो कर्म हैं। उनमें विकृति न हो—वे व्यर्थ न होने पावें और काललोपसे धर्म सम्बन्धी कृत्योंका लोप न हो जाय, इसकी देख-भालके लिये भी आप मनुष्यलोकमें विचरते हैं ॥ ३९ ॥

वनस्पत्योषधीश्चैव युगपत् प्रतिपद्यसे ।
बालभावाय वसुधां पक्षे पक्षे जनिस्तव ॥ ४० ॥

आप ही अमावास्याको चन्द्रमारूपसे एक ही साथ वनस्पतियों, ओषधियों और वसुधामें वास करते हैं। पुनः बालरूपसे उत्पन्न होनेके लिये ही आप ऐसा करते हैं। प्रत्येक शुक्लपक्षमें आपका नूतन जन्म होता है ॥ ४० ॥

भूतानां भुवि भूतेश भाव्यर्थे वसुधातले ।
वसु यद् भुवि किंचिच्च सर्वं तत्त्वन्मयं विभो ॥ ४१ ॥

भूतेश्वर ! विभो ! इस भूतलपर भूत और भविष्य प्राणियोंकी पुष्टिके लिये जो कुछ भी धन संचित है, वह सब आपका ही स्वरूप है ॥ ४१ ॥

त्वमेव विविधं धर्मं शाश्वतं वसुधातले ।
देवयज्ञं मन्त्रवाक्यमात्मयज्ञं समानुपम् ॥ ४२ ॥

आप ही भूतलपर नाना प्रकारके सनातनधर्म सम्बन्धी कर्म हैं और आप ही देवयज्ञ, मन्त्रवाक्य, आत्मयज्ञ तथा उसके अधिकारी मनुष्य हैं ॥ ४२ ॥

द्विविधः स्वर्गमार्गश्च सूर्यश्चन्द्रश्च निर्मलः ।
चन्द्रमाः पितृयानश्च देवयानश्च भास्करः ॥ ४३ ॥

आप ही स्वर्गलोकके द्विविध मार्ग निर्मल सूर्य और चन्द्रमा हैं। इनमें चन्द्रमा पितृयान (धूममार्ग) हैं और सूर्य देवयान (शुक्लमार्ग) हैं ॥ ४३ ॥

त्वमेव वसुधायुक्तो विश्वं चरसि सीमया ।
एकीकृत्य गणान् सर्वान् संक्षिप्यामुत्र सम्भवः ॥ ४४ ॥

आप ही इन्द्रिय आदि गणोंको एक करके-देहमात्ररूपसे संक्षिप्त करके भूमिवासी प्राणियोंके रूपमें वसुधासे संयुक्त होकर विश्वमें विचरते और मर्यादापूर्वक वहाँके विषयोंका सेवन करते हैं। परलोकमें भी आप ही विविध रूपोंमें प्रकट हैं ॥ ४४ ॥

एकस्त्वमसि सम्भूतः पुराणपुरुषो विराट् ।
अक्षयश्चाप्रमेयश्च कर्मकारकरो वशी ॥ ४५ ॥

एकमात्र आप पुराण-पुरुष ही विराट्रूपमें प्रकट हैं। आप अविनाशी, अप्रमेय, सबको वशमें रखनेवाले और नाना प्रकारकी लीलाएँ करनेवाले हैं ॥ ४५ ॥

मूर्तस्तेजसि सम्भूतो वायुः पर्यति खेचरः ।
सप्तमी रूपसंस्थानैर्नित्यमावृत्य तिष्ठति ॥ ४६ ॥

आप ही तेजस्तत्त्वमें 'रूप' होकर प्रकट हुए हैं, (इसीलिये तैजस नेत्रके द्वारा रूपका ग्रहण होता है); आप

भविष्यपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः ८१७


ही वायु बनकर आकाशमें सब ओर विचरण करते हैं। महत्तत्त्व, अहंकार और पञ्च तन्मात्रा—इन सात रूपसंस्थानोंके द्वारा आप सदा सबको व्याप्त करके स्थित हैं॥ ४६॥

साधने चापि निर्वाणे संहारे प्रलये तथा। धाता धारणकाले च दिशश्चक्षुषि धारिणि ॥ ४७॥

साधनकालमें जीवरूपसे, निर्वाण (कैवल्य मोक्ष) की अवस्थामें शुद्धरूपसे, दैनिक और ब्राह्म प्रलयमें रुद्ररूपसे तथा धारण (पोषण) कालमें धाता (पालक) विष्णुरूपसे आप ही स्थित हैं। दिशाएँ—वर्णाश्रम-धर्मकी मर्यादाएँ, आप ही विषयोंको धारण करनेवाली नेत्र आदि इन्द्रियोंमें इनके अधिष्ठाता चेतनके रूपमें विराजमान हैं॥ ४७॥

सेव्यमानो मुनिगणैर्नित्यं विगतकल्मषैः। कर्मभिः सत्यमापन्नैः समरागैर्जितेन्द्रियैः ॥ ४८ ॥ स्तूयमानश्च विबुधैः सिद्धैर्मुनिवरैस्तथा। सस्मार विपुलं देहं हरिर्हयशिरो महान् ॥ ४९॥

इस प्रकार नित्य पापरहित, जितेन्द्रिय, शत्रु और मित्रमें समान भावसे स्नेह रखनेवाले तथा सत्कर्मोंद्वारा सत्यको प्राप्त हुए मुनिगण जब श्रीहरिकी सेवा कर रहे थे और देवता तथा सिद्ध महर्षि उनकी स्तुति कर रहे थे, उस समय महान् देव श्रीहरिने अपने हयग्रीव नामक विशाल शरीरका स्मरण किया॥ ४८-४९॥

कृत्वा वेदमयं रूपं सर्वदेवमयं वपुः। शिरोमध्ये महादेवो ब्रह्मा तु हृदये स्थितः ॥ ५०॥

सर्वदेवमय वेदमय रूप धारण करके भगवान् श्रीहरि वहाँ शोभा पाने लगे। उनके मस्तकमें महादेव शिव और हृदयमे ब्रह्मा विराजमान थे॥ ५०॥

आदित्यरश्मयो बालाश्चक्षुषी शशिभास्करौ। जङ्घे तु वसवः साध्याः सर्वसंधिषु देवताः ॥ ५१॥

सूर्यकी किरणें उनकी रोमावलियाँ थीं। चन्द्रमा और सूर्य उनके नेत्रके स्थानमें प्रकाशित हो रहे थे। उनकी दोनों पिण्डलियोंकी जगह वसु और साध्यगण विराज रहे थे तथा समस्त संधि-स्थानोंमें देवताओंका वास था॥ ५१॥

जिह्वा चैश्वानरो देवः सत्या देवी सरस्वती। मरुतो वरुणश्चैव जानुदेशे व्यवस्थिताः ॥ ५२ ॥

जिह्वाके स्थानमें अग्निदेव थे। सत्या (वेदवाणीस्वरूपा) देवी सरस्वती उनकी वाणी थी। मरुद्गण और वरुण देवता उनके जानुदेश (घुटनों) में स्थित थे॥ ५२॥

एवं कृत्वा तथा रूपं सुराणामद्भुतं महत्। असुरं पीडयामास क्रोधाद् रक्तान्तलोचनः ॥ ५३॥

इस प्रकार सर्वदेवमय महान् एवं अद्भुत रूप धारण करके, जिनके नेत्रोंके कोये लाल थे, उन भगवान् हयग्रीवने क्रोधपूर्वक उस असुरको दबाया (इससे मधुका मेदा बाहर निकल आया)॥ ५३॥

मधोर्मेदोऽम्बुपूर्णा च पृथिवी समदृश्यत। प्रमदेव घना चैव शुक्लांशुकनिवासिनी ॥ ५४॥

उस समय मधुके मेदरूपी जलसे आच्छादित हुई यह सारी पृथ्वी ऐसी दिखायी देती थी, मानो श्वेत रंगकी साड़ी पहने हुए कोई हृष्ट-पुष्ट युवती शोभा पा रही हो॥ ५४॥

मेदिनीत्येव शब्दश्च लब्धः पृथ्व्या नरोत्तम। नामासुरसहस्रेण धरण्यां सम्प्रतिष्ठितम् ॥ ५५ ॥

नरश्रेष्ठ! उस मेदके कारण ही पृथ्वीको 'मेदिनी' नाम प्राप्त हुआ। सहस्रों असुरोंके द्वारा यह नाम भूतलपर प्रतिष्ठित एवं प्रचारित हो गया॥ ५५॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६॥


सप्तविंशोऽध्यायः

मधुके पतनसे समस्त प्राणियोंको हर्ष, वहाँ एकत्र हुए पर्वतों और वसन्त ऋतुका वर्णन, मधुवाहिनी नदीका प्राकट्य और गौरीसिद्धाका माहात्म्य

वैशम्पायन उवाच मधोर्निपतनं दृष्ट्वा सर्वभूतानि पुष्करे। प्रहृष्टानि प्रगायन्ति प्रनृत्यन्ति च सर्वशः ॥ १॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मधुका पतन हुआ देख पुष्करमें समस्त प्राणी अत्यन्त प्रसन्न हो उच्चस्वरसे गाने और नृत्य करने लगे॥ १॥

सुपार्श्वो गिरिमुख्यस्तु काञ्चनैः शिखरोत्तमैः। बहुधातुविचित्रैश्च खं लिखन्निव चाबभौ ॥ २.॥

पर्वतोंमें प्रधान सुपार्श्व अपने सुवर्णमय श्रेष्ठ शिखरोंसे आकाशमें रेखा खींचता-सा प्रतीत होता था। उसके वे शिखर अनेक धातुओंके कारण बड़े विचित्र दिखायी देते थे॥ २॥

गिरयश्चाभिशोभन्ते धातुभिः समरञ्जिताः। प्रांशुभिः शिखराग्रैश्च सविद्युत इवाम्बुदाः ॥ ३ ॥

अन्य पर्वत भी नाना प्रकारकी धातुओंसे रञ्जित हो

८१८श्रीमद्भारते खिलभागे-[ हरिवंशे

अपने ऊँचे शिखरोंसे बिजलियोंसहित मेघोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ ३ ॥
पक्षवातोद्धतो रेणुश्चूर्णैः साञ्जनवालुकैः ।
छादयन् पर्वताग्राणि महामेघ इवावभौ ॥ ४ ॥
पंखोंकी हवासे ऊपरको उठी हुई धूल अंजन (कोयले) और बालुकासहित चूर्णोंके साथ पर्वतोंके शिखरोंको ढकती हुई महान् मेघोंकी घटाके समान जान पड़ती थी ॥ ४ ॥
मेघसंश्लिष्टशिखराः पक्षविक्षिप्तपादपाः ।
काञ्चनोद्भेदबहुलाः खे तिष्ठन्तीव पर्वताः ॥ ५ ॥
उनके शिखर मेघोंसे आलिङ्गित हो रहे थे। वे अपने पंखोंकी वायुसे वृक्षोंको बिखेर रहे थे और उनमें सोनेकी बहुत-सी खानें प्रकट हुई थीं। इस प्रकार वे पर्वत आकाशमें खड़े हुए-से प्रतीत होते थे ॥ ५ ॥
पक्षवन्तः सशिखरा हेमधातुभिरञ्जिताः ।
पवनेन समुद्धूतास्त्रासयन्ति विहङ्गमान् ॥ ६ ॥
पंखों और शिखरोंसे सुशोभित, सुवर्णमय धातुओंसे अभिरञ्जित और वायुके वेगसे प्रताड़ित हुए वे पर्वत आकाश-चारी पक्षियोंको भी भयभीत कर देते थे ॥ ६ ॥
काञ्चनाः पर्वताः सर्वे स्फाटिकैर्मणिभिश्चिताः ।
सूर्यकान्तैश्च बहुभिश्चन्द्रकान्तैश्च निर्मलाः ॥ ७ ॥
वहाँ सभी पर्वत सुवर्णमय थे। सबपर स्फटिकमणियोंकी राशि संचित थी और वे सभी बहुसंख्यक सूर्यकान्त तथा चन्द्रकान्त मणियोंके कारण निर्मल प्रभासे उद्भासित हो रहे थे ॥ ७ ॥
हिमवांश्च महाशैलः श्वेतैर्धातुभिराचितः ।
काञ्चनैः शिखराग्रैश्च सूर्यपादप्रकाशितैः ॥ ८ ॥
मणिभिश्च प्रकाशाद्भिः पक्षान्तरविनिःसृतैः ।
ताम्रपुष्पैश्च शिखरैर्दीप्यमानैः स्वतेजसा ॥ ९ ॥
महापर्वत हिमवान् श्वेत धातुओंसे व्याप्त था । उसके शिखरोंके अग्रभाग सूर्यकी किरणोंमे प्रकाशित हो सुवर्णमय दिखायी देते थे । उसके पंखोंके भीतरसे प्रकट हुई प्रकाश-मान मणियाँ उसके शिखरोंको प्रकाशित कर रही थीं। लाल रंगके फूलोंसे सुशोभित तथा अपने तेजसे देदीप्यमान शिखर उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ ८-९ ॥
मन्दरश्चोग्रशिखरः स्फाटिकैर्मणिभिश्चिताः ।
वज्रगर्भो निरालम्बैः स्वर्गोपम इवावभौ ॥ १० ॥
भयंकर शिखरोंवाला मन्दराचल स्फटिक मणियोंकी राशिसे सम्पन्न था । उसके भीतर वज्रमणि (हीरा) छिपी हुई थी। वह अपने निरवलम्ब शिखरोंसे स्वर्गके समान सुशोभित होता था ॥ १० ॥
सहस्रशृङ्गः कैलासः शिलाधातुविभूषितः ।
तोरणैश्चैव निबिडैः प्रांशुभिश्चैव पादपैः ॥ ११ ॥
शिलाओं और धातुओंसे विभूषित सहस्र शिखरोंवाला कैलासपर्वत फाटकोंके समान ऊँचे और घने वृक्षोंसे सुशोभित हो रहा था ॥ ११ ॥
प्रवादयद्भिर्गन्धर्वैः किन्नरैश्च प्रगायिभिः ।
देवकन्याङ्गरागैश्च प्रक्रीडाद्रिरिवावभौ ॥ १२ ॥
भाँति-भाँतिके बाजे बजानेवाले गन्धर्वों, मधुर गीत गानेवाले किन्नरों तथा देवकन्याओंके अङ्गरागोंसे शोभा पानेवाला कैलास क्रीडापर्वतके समान प्रतीत होता था ॥ १२॥
मधुरैर्वाद्यगीतैश्च नृत्यैश्चाभिनयोद्गतैः ।
शृङ्गारैः साङ्गहारैश्च कैलासो मदनायते ॥ १३ ॥
मधुर वाद्ययुक्त गीतों, अभिनयपूर्ण नृत्यों, शृङ्गारमयी क्रीड़ाओं तथा नृत्यकालमें किये गये अङ्गविक्षेपों (चटकने-मटकने आदि) से कैलासपर्वत मूर्तिमान् कामदेवके समान रसका उद्दीपक हो रहा था ॥ १३ ॥
आदित्याभासिभिः शृङ्गैर्भिन्नाञ्जनचयोपमैः ।
विन्ध्यो नीलाम्बुदश्यामो विभिन्न इव तोयदः ॥ १४ ॥
कटे हुए कोयलोंकी राशिके समान काले और सूर्यकी किरणोंसे प्रकाशित शिखरोंसे युक्त विन्ध्यपर्वत नील मेघके समान श्याम कान्ति धारण किये खण्डित हुए मेघके समान प्रतीत होता था ॥ १४ ॥
धात्वर्थे सर्वभूतानां मेरुपुष्टे महाबले ।
निर्वैमुर्विमलं तोयं मेघजालैरिवोत्तमैः ॥ १५ ॥
समस्त प्राणियोंके जीवन-धारणके लिये उन सभी पर्वतों-ने महान् शक्तिशाली मेरुप्रष्ठपर उत्तम मेघसमूहोंके समान निर्मल जलकी वर्षा की ॥ १५ ॥
शिलाभिर्बहुचित्राभिर्धातुभिर्बहुरूपिभिः ।
प्रस्रवद्भिर्गुहाद्वारैः सलिलं स्फटिकप्रभम् ॥ १६ ॥
बहुत-सी विचित्र शिलाओं, अनेक रूपवाली धातुओं तथा स्फटिकके समान निर्मल जलका स्रोत बहानेवाले गुफा-द्वारोंसे उस पर्वतकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ १६ ॥
ग्रीष्मान्ते वायुसंगूढा घना इव सविद्युतः ।
चित्रैः पुष्पैस्तरुगणाः शोभन्त इव भूषिताः ॥ १७ ॥
नागाः कनकसंभूतैर्विचित्रैरिव भूषिताः ।
विचित्र पुष्पोंसे विभूषित हुए वृक्षगण वर्षा ऋतुमें वायुसे आच्छादित हुए बिजलीसहित मेघोंके समान शोभा पाते थे अथवा सोनेके विचित्र अलंकारोंसे अलंकृत हुए हाथियोंके समान सुशोभित होते थे ॥ १७ ॥
विहंगमाभिलीनाश्च लतास्तरुसमाश्रिताः ॥ १८ ॥
विलम्बन्त्यः सपुष्पाश्च नृत्यन्ते वायुघट्टिताः ।

भविष्यपर्व ] सप्तविंशोऽध्यायः ८१९


जिनमें पक्षी छिपे हुए थे, वे वृक्षोंके सहारे फैली और लटकी हुई पुष्पित लताएँ वायुके झोंके खाकर नृत्य सा कर रही थीं ॥ १८ ॥

पवनेन समुद्धूता महता माधवेऽहनि ॥ १९॥
मुमुचुः पुष्पसंघातं तोयं वेलेव वर्षति।
वैशाखके दिनोंमें महान् वायुसे कम्पित हुई वे लताएँ उसी प्रकार पुष्प-समूहोंकी वर्षा कर रही थीं, जैसे लहरोंसे टकरायी हुई समुद्रकी तटभूमि जलकी बूँदें बिखेरती है ॥

फलवद्भिश्च विपुलैः शाखास्कन्धावरोहिभिः।
पादपैर्र्वर्णबहुलेर्ध्रियेत च वसुंधरा ॥ २०॥
जिसमें बहुत-सी शाखाएँ, तने और वरोहें (जटाएँ) शोभा पाती हैं, ऐसे अनेक रंगवाले विशाल एवं फले हुए वृक्ष मानो वसुधाको सहारा दे रहे थे ॥ २० ॥

मधुप्रिया मधुकरा मधुमत्ता विहंगमाः।
घोषयन्तीवं गायन्तः कामस्यागमसम्भवम् ॥ २१॥
जिन्हें मकरन्द प्रिय है, वे मधुमत्त मधुकर (भ्रमर) और कोकिल आदि पक्षी कलगान करते हुए कामदेवके आगमनकी घोषणा-सी कर रहे थे ॥ २१ ॥

विष्णुर्मधोर्निहन्ता च चकार मधुवाहिनीम्।
नदीं प्रस्रवनिर्भेदां सुतीर्थां बहुलोदकाम् ॥ २२॥
अंगारवर्णसिकतां मधुतीर्थां मनोरमाम्।
विमलैरम्बुभिः पूर्णां पुष्पसंचयवाहिनीम् ॥ २३ ॥
मधु दैत्यका नाश करनेवाले भगवान् विष्णुने वहाँ मधुवाहिनी नामक नदी प्रकट की, जिसका स्रोत फूटकर बह रहा था। वह उत्तम तीर्थवाली नदी प्रचुर जलसे भरी हुई थी। उसकी वालुका अङ्गारके समान वर्णवाली थी। वह मधुतीर्थस्वरूपा नदी मनको मोहे लेती थी। उसमें निर्मल जल भरा हुआ था और वह ढेर-के ढेर फूलोंको बहाये लिये जाती थी ॥ २२-२३ ॥

विवेश पुष्करं सा तु ब्रह्मणो वाक्यनोदिता।
ऋषिभिश्चानुचरिता ब्रह्मतन्त्रनिषेविभिः ॥ २४ ॥
ब्रह्माजीके वाक्यसे प्रेरित हो उसने पुष्करमें प्रवेश किया। ब्रह्मतन्त्रसेवी ऋषि भी उसके पीछे-पीछे गये ॥ २४ ॥

धात्री कपिलरूपेण गोर्भूत्वा क्षरते पयः।
मधुरं वितते यज्ञे ब्रह्मणाऽवाप्यचोदिता ॥ २५ ॥
तदनन्तर विशाल यज्ञ चालू होनेपर ब्रह्माजीके कहनेसे पृथ्वी गायका रूप धारण करके वहाँ मधुर दूधकी धारा बहाने लगी ॥ २५ ॥

सरश्च पृथिवीभूतं संधातुं प्राप्तवन्महीम्।
शुद्धं च भजते लोकं शाश्वतं परमाद्भुतम् ॥ २६ ॥
उस दूधसे जो सरोवर परिपूर्ण हुआ, वह पृथिवीस्वरूप है। वही प्राणिसमुदायको धारण करनेके लिये भूतलपर आकर प्रतिष्ठित हुआ। वह अपने परम अद्भुत शुद्ध शाश्वतस्वरूपको भी धारण करता है ॥ २६ ॥

सरस्वत्याः समुद्भूतं ब्रह्मक्षेत्रे तमोनुदम्।
मरुतीर्थमतिक्रम्य पुष्करेषु विसर्पति ॥ २७ ॥
सरस्वतीसे प्रकट हुआ वह दुःख एवं अन्धकारका नाश करनेवाला पुण्यतीर्थ मरुतीर्थको लाँघकर ब्रह्माजीके क्षेत्रभूत पुष्करतीर्थमें फैला हुआ है ॥ २७ ॥

सुचारुरूपा धर्मज्ञा अजा रूपेण छादयन्।
रूपं कनकवर्णाभं तपोयुक्तेन चेतसा ॥ २८ ॥
परम मनोहर रूपवाली धर्मज्ञा अजन्मा सरस्वती माया-रूपसे उस तीर्थके सुवर्णोपम दिव्य रूपको ढके रहती है। आलोचनायुक्त चित्तसे ही उसके यथार्थस्वरूप चिन्मय ब्रह्म-का साक्षात्कार होता है ॥ २८ ॥

अजगन्धकृतोन्मुक्तः सम्भूतः पर्वतो महान्।
गुरुद्वारगुणप्राणः शाश्वतः सिद्धसेवितः ॥ २९ ॥
वहाँ एक महान् पर्वत प्रकट हुआ, जो स्वाभाविक सुगन्धसे युक्त एवं उन्मुक्त है। उसका द्वार बहुत विशाल है तथा गुण ही उसके प्राण हैं। (अथवा गुरु ही उस अहंकाररूपी पर्वतपर चढ़नेके लिये द्वार है। गुरुके उपदेशसे ही उसके तत्त्वका ज्ञान होता है। तीनों गुण ही उसके जीवन हैं।) वह अनादि होनेके कारण सनातन कहा गया है। सिद्ध पुरुष भी उसका सेवन करते हैं। फिर मूढ़ोंकी तो बात ही क्या है ॥ २९ ॥

वेदिकाभिः सुचित्राभिः काञ्चनाभिर्विराजितः।
पुष्कराणि परीतानि त्वष्ट्रा विपुलदक्षिण ॥ ३० ॥
प्रचुर दक्षिणा देनेवाले जनमेजय ! सुवर्णमयी विचित्र वेदिकाओंसे वह पर्वत सुशोभित होता है। पुष्करतीर्थ-विचित्र जगत्का निर्माण करनेवाले शिल्पी ब्रह्माजी (अथवा परमेश्वर) से व्याप्त है ॥ ३० ॥

महामेरोर्यथा रूपं पञ्चभिर्धातुभिर्वृतः।
चेतना याभिसम्पन्नो रूपेणाद्भुतदर्शनः ॥ ३१ ॥
जैसे महामेरुगिरिका स्वरूप पाँच धातुओंसे युक्त होता है, उसी प्रकार वह पर्वत पाँच धातुओं (भूतों) से घिरा हुआ है। रूपसे वह अद्भुत दिखायी देता है तथा जो सुप्रसिद्ध चेतना है उससे वह सम्पन्न जान पड़ता है ॥ ३१ ॥

करिष्याम्यहमप्येतन्मनसा धर्मचारिणम्।
रूपं बहुविधं लोके पार्थिवीं चेतनां तथा ॥ ३२ ॥
(अब अपनेको परमात्मासे अभिन्न मानकर

८२० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

'मैं ही सब कुछ करता हूँ' इस भावसे तत्त्वका निरूपण कर रहे हैं।) मैं ही धर्माचरण करनेवाले इस शरीरका मानसिक संकल्पसे निर्माण करता हूँ। लोकमें जो नाना प्रकारका रूप दिखायी देता है, उसकी भी मैं ही अपने मनसे सृष्टि करता हूँ। इस पार्थिव शरीरमें जो चेतना है, उसको भी मैं ही अभिव्यक्त करता हूँ ॥ ३२ ॥

त्रींश्च लोकान् प्रपद्येयं पञ्चभिर्धातुलक्षणैः । षष्ठेन च ससर्जैयं मनसा धर्मचारिणीम् ॥ ३३ ॥

मैं पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंसे तीनों लोकोंकी बातें जान सकता हूँ। छठी इन्द्रिय मनके द्वारा धर्मचारिणी वृत्तिकी रचना कर सकता हूँ ॥ ३३ ॥

सङ्गेषु भावमोहाभ्यां पश्यन्ति च समृद्धयः । विमुक्ताः सर्वसङ्गेभ्यो धारयन्ति परिग्रहान् ॥ ३४ ॥

जो समृद्धिशाली पुरुष समृद्धियोंका सङ्ग प्राप्त होनेपर भाव और मोहसे (संकल्पमात्र और भ्रमरूपसे) उन्हें देखते हैं तथा सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त हो विषय संग्रह करनेवाले मन, बुद्धि, इन्द्रिय और प्राणोंको काबूमें करते हैं, वे ही तत्त्वज्ञानके अधिकारी हैं ॥ ३४ ॥

न च विन्देत मां कश्चिन्मनसा कामरूपिणम् । पञ्चधातुनिबद्धश्च नानाभाषितचोदनः ॥ ३५ ॥

प्रायः सब लोग पाञ्चभौतिक शरीरमें बँधे रहकर नाना प्रकारके फलोंकी चर्चा करनेवाली वेदवाणीसे प्रेरित हो सकाम कर्मोंमें लगे रहते हैं, अतः कोई भी मनसे इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले मुझ परमात्माको नहीं उपलब्ध कर पाता ॥

ये च विष्णुमधीयन्ते बहुधा कामविग्रहैः । ते मां पश्येयुरव्यक्तं तपसा दग्धकिल्बिषाः ॥ ३६ ॥

जो इच्छानुसार ग्रहण किये गये श्रीराम-कृष्ण आदि विग्रहोंसे उपलक्षित भगवान् विष्णुका नाम जप-कीर्तन आदिके द्वारा वारंवार स्मरण करते हैं, वे तपस्यासे अपने पापोंको दग्ध कर देनेवाले उपासक मुझ अव्यक्त परमात्माका साक्षात्कार कर सकते हैं ॥ ३६ ॥

ये च मामभिरोहेयुर्नरा धर्मपथे स्थिताः । तेऽपि स्वर्गजितः सन्तः पश्येयुर्मां गतक्लमाः ॥ ३७ ॥

जो मनुष्य धर्मके मार्गपर स्थित हो उक्त साधनसोपानके द्वारा मुझ निर्गुण ब्रह्मरूपी प्रासादपर आरोहण करते हैं, वे साधुपुरुष भी पाप-तापसे रहित हो स्वर्गपर विजय पा जाते और मेरा साक्षात्कार कर लेते हैं ॥ ३७ ॥

यश्चैव पर्वतः प्रांशुर्मेरुष्पृष्ठे व्यवस्थितः । एतमारुह्य युध्येयुः प्राणत्यागे सुनिर्मलाः ॥ ३८ ॥

मेरुपृष्ठपर जो ऊँचा पर्वत खड़ा है, उसपर आरूढ़ होकर निर्मल अन्तःकरणवाले पुरुष प्राणों (इन्द्रियों) की आसक्तिका त्याग करनेके लिये युद्ध-संघर्ष (उग्र साधना) करते हैं ॥ ३८ ॥

अप्सरोभिः समागम्य विचरेयुर्मनोजवाः । नन्दनं वनमारुह्य काम्यकं च महद्वनम् ॥ ३९ ॥

सिद्धिके पथपर बढ़नेवाले साधक मनके समान वेगशाली हो नन्दनवन और विशाल काम्यकवनमें पहुँचकर अप्सराओं-से मिलते और उनके साथ विहार करते हैं ॥ ३९ ॥

इमां विद्यां समास्थाय मद्भक्ताः पुष्करेष्विह । शरीरं क्षपयिष्यन्ति व्रतैर्बहुविधैः कृतैः ॥ ४० ॥

मेरे भक्त इस विद्याको पाकर पुष्करतीर्थमें नाना प्रकार-के व्रतोंका अनुष्ठान करके अपने शरीरको क्षीण कर देंगे ॥

सिद्धिं प्राप्य क्रमेयुस्ते कामैर्बहुविधैर्नराः । इमं लोकममुं चैव सम्पतेयुर्यथासुखम् ॥ ४१ ॥

वे मनुष्य सिद्धि पाकर नाना प्रकारकी कामनाओंसे सम्पन्न हो क्रमशः ऊपर उठते और आनन्दपूर्वक इहलोक तथा परलोकमें घूमते-फिरते हैं ॥ ४१ ॥

गौरी सिद्धेतिव्याख्याता त्रिषु लोकेषु विद्यया । प्रभावं तपसा वृत्तं दर्शयन्ती समाहिताः ॥ ४२ ॥

जब एकाग्रचित्त योगी तपस्यासे प्राप्त हुए पूर्वोक्त प्रभावको दिखाते हैं, तब विद्या (शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे प्राप्त हुए ज्ञान) से सिद्ध हुई गौरीदेवी दर्शन देती हैं, जो तीनों लोकोंमें सिद्धाके नामसे विख्यात हैं ॥ ४२ ॥

षण्णां ज्ञानाभिसंधीनामभिज्ञानात् ससंग्रहाः । भवेयुस्ते निरारम्भा धातुनिर्मुक्तबन्धनाः ॥ ४३ ॥

कर्माङ्ग, वाह्य और आभ्यन्तर भेदसे भगवन्मूर्तिके दो प्रतीक, विराट्, सूत्रात्मा और अन्तर्यामी—ये सब मिलकर छह ज्ञानाभिसंधियां (संयमके स्थान) हैं। इनका जो सम्पूर्ण रूपसे अनुभव है, उससे कामनाका अभाव हो जानेके कारण साधकोंको अक्षीण योगैश्वर्य प्राप्त होते हैं। वे किसी भी कार्यका आरम्भ नहीं करते और पाञ्चभौतिक बन्धनोंसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ४३ ॥

सहस्रगुणमप्यत्र दत्त्वा दानफलादिव । अविमानेन विप्राणां मनःशुद्धेन कर्मणा ॥ ४४ ॥ सर्वत्रैवाप्रमेयेण अत्यन्तं फलमाप्नुयुः । अमुष्मिंल्लोके धर्मज्ञाः सह सर्वकुलोद्भवैः ॥ ४५ ॥

जैसे यहाँ कोई अपराधी राजाको सहस्रगुना कर देकर उस करदानके फलसे राजाकी प्रसन्नता पाकर उस अपराधसे मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार धर्मज्ञ पुरुष सर्वत्र ही असंकुचित भावसे ब्राह्मणोंका सम्मान और शुद्धभावसे निष्काम-कर्मका अनुष्ठान एवं दान करके अपने समस्त पूर्वजोंके साथ

भविष्यपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः [ ८२१


ब्रह्मलोकमें जाकर आत्यन्तिक दुःखका निवारण करनेवाले अक्षय फलको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४४-४५ ॥

येषामिह च सांनिध्यं यज्ञे ब्राह्मणसंकुले।
ते भूयो यजमानाद्या अभिषिच्य पुनः पुनः॥ ४६ ॥

जिन यजमानों और ऋत्विजोंका ब्राह्मणोंसे भरे हुए यज्ञमें सांनिध्य है (यज्ञाङ्ग देवता आदिमें चित्तकी एकाग्रता है), वे यजमान आदि बारंबार बहुतसे यज्ञोंमें अवभृथस्नान करके पुनः पूर्वोक्त फल प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४६ ॥

तथा तां मन्यसे गौरीं मनसा धर्मचारिणीम्।
अनुग्रहाय भूतानां तन्ममाग्रे तपोधने ॥ ४७ ॥

राजन्! तुम दान और यज्ञकी सम्पत्तिको जैसे मेरे सामने स्थित समझते हो, उसी प्रकार पूर्वोक्त गौरी (ब्रह्मविद्या) को भी यदि तुम मुझ तपोधनके समीप—मेरे सम्मुख उपस्थित मानते हो तो अबसे ऐसा न मानना; क्योंकि वे गौरीदेवी सम्पूर्ण प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये मनसे निरन्तर धर्मका आचरण करती हैं (यह बाह्य सम्पत्ति तो परिमित है, परंतु वे आन्तरिक ज्ञान-सम्पत्ति होनेके कारण अनन्त हैं।) ॥ ४७ ॥

सत्य एष परोऽविद्ये भविता नात्र संशयः।
नाफलो विद्यते धर्मश्चरितो धर्मचारिणा ॥ ४८ ॥

यह आत्मा अबाधित सत्य है; परंतु विद्यारहित पुरुषसे बहुत दूर हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। निष्काम धर्मका आचरण करनेवाले पुरुषके द्वारा आचरित हुआ धर्म कभी निष्फल नहीं होता (अतः धर्मसे भी चित्तशुद्धिके द्वारा आत्मतत्त्वका साक्षात्कार हो सकता है) ॥ ४८ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे सप्तविंशोऽध्यायः ॥ २७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्कर-प्रादुर्भावविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २७ ॥


अष्टाविंशोऽध्यायः

पुष्करमें श्रीविष्णु आदिकी तपस्या और उसके प्रभावका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

दिशां जिगमिषुर्विष्वग्यामुत्तरां सत्यसाधनः।
तथा स धातुनिचये पुण्ये पर्वतरोधसि ॥ १ ॥
विष्णुः परमधर्मात्मा एकपादेन तिष्ठति।
दशवर्षसहस्राणि पुष्करे पुष्करेक्षणः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! सत्य ही जिनका साधन है, उन परम धर्मात्मा भगवान् विष्णुने उत्तर दिशा (सिद्धिकी पराकाष्ठा मोक्ष) को जानेकी इच्छा की। वे कमलनयन श्रीहरि पुष्करतीर्थमें धातुओंकी राशिसे परिपूर्ण एक पर्वतके पवित्र तटपर एक ही पैरसे दस हजार वर्षोंतक खड़े रहे !। १-२ ॥

आत्मन्यात्मानमाधाय तपसा ब्रह्मसम्भवः।
घटते कर्मणोग्रेण लोकमुत्थानकारणात् ॥ ३ ॥

ब्रह्माको भी जन्म देनेवाले वे भगवान् विष्णु अपने चित्तको विशुद्ध आत्मामें विचारद्वारा विलीन करके उत्थान (मोक्ष) के लिये उग्रकर्म (घोर तपस्या) करने लगे। साक्षात् परमेश्वर होकर भी उन्होंने जगत्को शिक्षा देनेके लिये ऐसा किया ॥ ३ ॥

भासुरो भस्मनाऽऽच्छाद्य गात्राणि स्वयमात्मनः।
अष्टौ वर्षसहस्राणि सहस्रं च तपोधनः ॥ ४ ॥

इसी प्रकार प्रकाशमान सोम भी स्वयं ही अपने अङ्गोंको भस्मसे आच्छादित करके आठ हजार वर्षोंतक तपस्यारूपी धनके संचयमें लगे रहे ॥ ४ ॥

तेजसा तेन ज्योतींषि विभाव्य ब्राह्मणर्षभः।
तिष्ठते नभसो मध्ये योगात्मा भावयञ्जगत् ॥ ५ ॥

तपस्याद्वारा प्राप्त हुए उस प्रसिद्ध तेजसे समस्त ग्रहनक्षत्रोंको तिरस्कृत करके योगात्मा ब्राह्मणशिरोमणि सोम सम्पूर्ण जगत्‌को आह्लाद प्रदान करते हुए आकाशके मध्यभागमें प्रकाशित होते हैं ॥ ५ ॥

सोमो विषयसंक्षिप्य मनसा धारयन्मनः।
युक्तः परमधर्मात्मा ब्राह्मीं सिद्धिमुपागतः ॥ ६ ॥

परम धर्मात्मा सोमने बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके विषयोंपर अधिकार कर लिया और योगयुक्त होकर वे ब्राह्मी सिद्धिको प्राप्त हुए ॥ ६ ॥

सम्प्रदृश्यत सर्वत्र दिवि भुव्यन्तरे तथा।
ज्योतिष्णु कर्म कुर्वाणो बहुरूपः स सम्पदा ॥ ७ ॥

वे प्रकाश फैलानेका कार्य करते हुए स्वर्ग, पृथ्वी और दोनोंके मध्यभाग अन्तरिक्षमें सर्वत्र दिखायी देते हैं तथा अपनी योग-सम्पत्तिसे नाना प्रकारके रसरूप बहुत-से स्वरूप धारण कर लेते हैं ॥ ७ ॥

महेश्वरोऽतिगुह्यात्मा वृषरूपेण तिष्ठति।
उद्धृत्य दक्षिणं पादं वायुभक्षः समाहितः ॥ ८ ॥
अष्टौ वर्षसहस्राणि सहस्रं शतमेव च।
महायोगी महादेवो नियमाद् ब्रह्मसम्भवः ॥ ९ ॥

अपने स्वरूपको अत्यन्त गुप्त रखनेवाले भगवान् महेश्वर

८२२ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे


वृषभरूपसे तपस्याके लिये अपना दाहिना पैर उठाकर नौ हजार एक सौ वर्षोंतक खड़े रहे । उन दिनों केवल वायु ही उनका आहार था। वे मनको ध्येय वस्तुमें निरन्तर एकाग्र रखते थे । ब्रह्माजीके उत्पत्तिस्थान महायोगी महादेवजी नियमपूर्वक तपस्यामें लगे रहे ॥ ८-९ ॥

अथ वायुर्घनीभूतो अन्ते चरति गोपतेः ।
फेनीभूतं समुद्गारैः पवनं निर्गिरन्मुखात् ॥ १० ॥

तदनन्तर एक दिन इन्द्रियोंका निग्रह करनेवाले भगवान् महेश्वरके निकट घनीभूत वायु विचरण करने लगी । उस समय वृषभरूपधारी महादेवजीने अपने उद्गारों (लार आदि) के द्वारा फेनके रूपमें परिणत हुई उस वायुको भीतर खींचकर फिर मुखसे बाहर निकाला ॥ १० ॥

स निष्क्रान्तस्ततो वक्त्रात् प्राणेन परमाप्तवान् ।
निर्यासमूतः पतितो नैवार्द्रो नैव पार्थिवः ॥ ११ ॥

उद्गारवायुके साथ उनके मुखसे निकली हुई वह वायु रूपान्तरको प्राप्त हो वृक्षोंकी गोंदके समान नीचे गिर पड़ी । उस समय वह न तो गीली थी और न पार्थिव—पाषाण आदिके समान सूखी ही ॥ ११ ॥

स फेनो वारिणाऽऽविश्य चचार वसुधातले ।
नैवार्द्रो नैव शुष्काङ्गो वायुसंघातमागतः ॥ १२ ॥

वायुका वह रूप फेनके नामसे प्रसिद्ध हुआ । वह फेन जलसे आविष्ट हो भूतलके समीपवर्ती अन्तरिक्षमें विचरने लगा । वह न गीला था न सूखा । वायुके ही घनीभूत स्वरूप-को प्राप्त हो गया था ॥ १२ ॥

तत्काले फेनमुत्क्षिप्य पवनः सह वारिणा ।
निरालम्बे निरालम्बस्त्वभ्राणि समपद्यत ॥ १३ ॥

उस समय जलसहित फेनको ऊपर उछालकर निराधार आकाशमें निराधार रुकी हुई वह वायु मेघोंके रूपमें परिणत हो गयी ॥ १३ ॥

ते क्षिपन्ति पयो भूमावात्मानं स्वेन घट्टिताः ।
नीलमेघारुणप्रख्या नैवार्द्रा नैव पार्थिवाः ॥ १४ ॥

वे ओलोंके समान अपने ही स्वरूपसे घनीभावको प्राप्त हो नील मेघ बनकर अपने आत्मा जलको ही इधर उधर बरसाते थे । सूर्यसारथि अरुणकी कान्ति पड़नेसे वे लाल रंगके भी दिखायी देते थे । वे भी न तो गीले थे और न मिट्टीके ढेलोंके समान सूखे ही ॥ १४ ॥

ब्राह्मीं मूर्तिं समाधाय वायुः सर्वत्रगो वशी ।
समाः सहस्रं सम्पूर्णं चचार विपुलं तपः ॥ १५ ॥

तदनन्तर सर्वत्र विचरनेवाले वायुदेवने ब्राह्मणका शरीर धारण करके मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए पूरे एक सहस्र वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की ॥ १५ ॥

वहिर्बहुजटी भूत्वा चीरवल्कलवासभृत् ।
तपस्तप्यदनाहारो मौनमास्थाय पौष्करे ॥ १६ ॥
वर्षाणां च सहस्राणि त्रीणि चैकं च यत्नतः ।

अग्निदेव भी बहुत-सी जटाएँ बढ़ाये चीर और वल्कल वस्त्र धारण किये बिना कुछ खाये-पीये मौन हो पुष्कर तीर्थमें चार हजार वर्षोंतक यत्नपूर्वक तपस्यामें लगे रहे ॥ १६३ ॥

तस्याग्नेस्तेजः सम्भूतो महानग्निः प्रवर्तते ॥ १७ ॥
स्वर्गप्रकाशं कृत्वा च स्वर्गवासी तमोनुदः ।
दिवि भूतप्रकाशाख्यस्तपसा ब्रह्मसम्भवः ॥ १८ ॥

उस अग्निके तेजसे एक महान् अग्निका प्रादुर्भाव हुआ, जो स्वर्गमें प्रकाश फैलाकर वहीं रहने और वहाँके अन्धकारको दूर करने लगी । (वही सूर्य आदिके रूपमें प्रसिद्ध है ।) वह ब्राह्मण अग्नि अपनी तपस्याके प्रभावसे स्वर्गमें 'भूतप्रकाश' नामसे प्रसिद्ध हुई ॥ १७-१८ ॥

तत्तमो भुवि राजेन्द्र मानुषेषु प्रतिष्ठितम् ।
भास्करस्तेजसंहारस्ततो भवति सत्तमः ॥ १९ ॥

राजेन्द्र ! वह अन्धकार भूतलपर मनुष्योंमें प्रतिष्ठित हुआ । (यहाँ अन्धकारका अर्थ धूम तथा उससे उपलक्षित धूम मार्ग है, जो वर्णाश्रमाभिमानी मनुष्योंमें प्रतिष्ठित है ।) तेजःपुञ्ज सूर्य उस पूर्व अग्निकी अपेक्षा अत्यन्त उत्कृष्ट हैं ॥ १९ ॥

मर्त्यानां सर्वभूतानां तेज आच्छिद्य वर्तते ।
न तु योगबले राजन् ब्राह्मणस्य विशेषतः ।
तत् तमो नाशयेद् रात्रौ नाप्यहो भविताद्वयम् ॥ २० ॥

राजन् ! योगबलके होनेपर सूर्यदेव मर्त्यलोकके अन्य समस्त प्राणियोंके तेजको तिरस्कृत कर देते या छीन लेते हैं । परंतु ब्राह्मणके तेजका वे संहार नहीं करते हैं। उसपर विशेष ध्यान रखते हैं । जो सूर्यदेवका उपासक है, उसके तम (धूम मार्ग) का वे रातमें भी नाश कर देते हैं (अर्थात् सूर्योपासककी रातमें मृत्यु हो तो भी उसे अर्चि आदि मार्ग ही मिलता है )। परंतु जो सकाम कर्मोंमें लगा हुआ है, उसकी दिनमें मृत्यु हो तो भी वह दिन उसे अद्वय (मोक्ष) पदकी प्राप्ति करानेवाला नहीं होता ॥ २० ॥

पुष्पमित्रो महातेजा यक्षः सर्वत्रगो वशी ।
तपश्चरति धर्मात्मा पुष्करेषु समाहितः ॥ २१ ॥

सर्वत्र जानेमें समर्थ और जितेन्द्रिय यक्ष महातेजस्वी धर्मात्मा पुष्पमित्र एकाग्रचित्त हो पुष्करमें तपस्या करते हैं ॥ २१ ॥

महेन्द्रशिखराद्धारा यावन्त्यो यान्ति मेदिनीम् ।
तावत्स्वरूपमास्थाय तिष्ठते निखिलाः समाः ॥ २२ ॥

महेन्द्रपर्वतके शिखरसे जलकी जितनी धाराएँ पृथ्वीपर

भविष्यपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः ८२३


जाती हैं, उतने स्वरूप धारण करके वे सारे वर्षोंतक तपस्यामें ही लगे रहते हैं ॥ २२ ॥ जानुभ्यां पतितो भूमौ ज्योतिर्नभसि पश्यति । समाः सहस्रं निखिलं नेत्रैरनिमिषैर्जगत् ॥ २३ ॥ वे पृथ्वीपर घुटने टेककर पड़ जाते हैं (अर्थात् सूर्य- देवको नमस्कार करते हैं) । इसका फल यह होता है कि सूर्यमण्डलके मध्यभागमें जो आकाश-सा प्रकाशित होता है, उसमें एकटक आँखें लगाकर वे सहस्रों वर्षोंतक सम्पूर्ण जगत्‌को देखते रहते हैं ॥ २३ ॥ नेत्राणि बहुधा तस्य नेत्रान्तैरभिनिःसृताः । मध्यन्दिनकरे प्राप्ते रश्मिवान् सपरिग्रहे ॥ २४ ॥ ते रश्मयः प्रभानेत्रैः शतशोऽथ सहस्रशः । रराज तेजःसंयोगाद् विद्वद्भिरिव पावकः ॥ २५ ॥ सूर्यमण्डलके मध्यभागमें दृष्टि डालनेपर अंशुमाली सूर्य परिवेष (घेरे) की भाँति प्रतीत होते हैं और मध्यभागमें गोल दर्पणके समान दिखायी देते हैं । जब पुष्पमित्रके नेत्र- प्रान्त सूर्यमण्डलमें पहुँचते, तब सूर्यकी प्रभासे मिले हुए नेत्रोंके साथ वे सुप्रसिद्ध सूर्य‌रश्मियाँ वहाँसे निकलकर ऊपर- नीचे इधर-उधर सब ओर फैल जातीं और सूर्यकी धारणा करनेवाले उन यक्षराजके लिये बहुसंख्यक—सैकड़ों और हजारों नेत्र बन जाती थीं। वे उन अनेक नेत्रोंके तेजसे संयुक्त होकर ऐसी शोभा पाते थे, जैसे विद्वान् ऋत्विजोंसे घिरे हुए अग्निदेव सुशोभित होते हैं ॥ २४-२५ ॥ स विस्फुलिङ्‌गैर्नेत्रान्तैरादित्यमनुवर्तते । कर्मणोऽन्ते युगान्ते वा जगतो बहुरूपिणः ॥ २६ ॥ जब देहारम्भके कर्मोंका क्षय हो जाता है अथवा अनेक रूपवाले जगत्‌का प्रलयकाल उपस्थित होता है, उस समय वे पुष्पमित्र अथवा भावी कुबेर आगकी चिनगारियोंके समान प्रकाशित होनेवाले अपने नेत्रकोणोंके द्वारा सूर्यदेवका अनुवर्तन करते हैं ॥ २६ ॥ बहुतापः पुनर्भूत्वा निषण्णो वसुधातले । समाः सहस्रं सम्पूर्णं तपस्तेपे सुदारुणम् ॥ २७ ॥ निगृहीतेन्द्रियो भूत्वा अप्सरोभिर्ललाम ह । मेरोः शिखरमासाद्य कामं कामेन निर्वमन् ॥ २८ ॥ अपनी तपस्याका प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जानेपर वे पृथ्वीतलपर बैठ गये और इन्द्रियोंको काबूमें करके पूरे एक सहस्र वर्षोंतक पुनः अत्यन्त दारुण तपस्या करते रहे । तत्पश्चात् मेरु‌पर्वतके शिखरपर जाकर भोगके द्वारा ही काम‌का परित्याग करते हुए उन्होंने अप्सराओंके साथ रमण किया ॥ २७ २८ ॥ तपःकामः स यक्षस्तु कुबेरो नरवाहनः । विष्णुरेव तपोऽध्यक्षस्तेजसोऽन्ते विजृम्भति ॥ २९ ॥ तपस्याकी कामनावाला जो पुष्पमित्र नामक यक्ष था, वही नरवाहन कुवेर हुआ । उसके रूपमें तपस्याके अध्यक्ष भगवान् विष्णु ही थे; जो तपके अन्तमें तेजवृद्धि‌को प्राप्त हुए ॥ २९ ॥ न हि कश्चित् पुमानस्ति य एवं तप आचरेत् । त्रिषु लोकेषु राजेन्द्र ऋते विष्णुं सनातनम् ॥ ३० ॥ राजेन्द्र ! तीनों लोकोंमें सनातन भगवान् विष्णुको छोड़- कर दूसरा कोई पुरुष ऐसा नहीं है, जो ऐसी कठोर तपस्या कर सके ॥ ३० ॥ वासुकिर्बहुशीर्षस्तु नागेन्द्रो मौनमास्थितः । तप आचरते सम्यङ् निधाय मनसा मनः ॥ ३१ ॥ अनेक सिरवाले नागराज वासुकि भी मौन हो बुद्धिके द्वारा मनको सम्यकरूपसे ब्रह्ममें लगाकर तपस्या करते थे ॥ ३१ ॥ शेषः सत्यधृतिर्नागो बलवान् ब्रह्मसम्भवः । वृक्षमारुह्य धर्मात्मा अवाक्‌छीर्षोऽवलम्बते ॥ ३२ ॥ जिह्वाभिर्लेलिहानाभिर्गात्रजं विषमुत्सृजन् । समाः सहस्रं सम्पूर्णं निराहारस्तपोधनः ॥ ३३ ॥ सत्यको धारण करनेवाले ब्राह्मणपुत्र कश्यपनन्दन बलवान् नाग धर्मात्मा शेष एक वृक्षपर चढ़कर नीचेको सिर किये लटक रहे थे तथा लपलपाती हुई जिह्वाओंसे अपने शरीरका विष त्याग रहे थे । तपस्याके धनी शेषने पूरे एक सहस्र वर्ष निराहार रहकर बिताये ॥ ३२-३३ ॥ कालकूटं विषं तद्धि सुमहत् समपद्यत । येन लोको ह्यभिग्रस्तो न सुखं विन्दते नृप ॥ ३४ ॥ उनका छोड़ा हुआ वह विष ही महान् कालकूट नामक विष हो गया । नरेश्वर ! उस विषसे ग्रस्त हुआ लोक कभी सुख नहीं पाता है ॥ ३४ ॥ सर्वत्रानुगतं तीक्ष्णं भुजङ्गेषु महीपते । जङ्गमं स्थावरं चैव सर्वत्रानुगतं विषम् ॥ ३५ ॥ पृथ्वीनाथ ! वह तीक्ष्ण विष सर्पोंमें सर्वत्र व्याप्त है । स्थावर और जंगम सभी प्राणियोंमें अनुगत है ॥ ३५ ॥ परस्परविवृद्धेन हिंसायुक्तेन भारत । नाशयत्यात्मनोऽङ्गानि तेन तीक्ष्णेन भारत ॥ ३६ ॥ भारत ! एक-दूसरेके प्रति बढ़े हुए हिंसाभावसे युक्त तीव्र क्रोधके रूपमें परिणत हुआ तप तामस होकर साधकके अपने ही अङ्गोंका नाश कर डालता है ॥ ३६ ॥ अथ ब्रह्मा महाभागो भूतानां हितकाम्यया । मन्त्रं विसृजते राजन् ब्रह्माक्षरमहिंसकम् ॥ ३७ ॥ राजन् ! हिंसक विषकी उत्पत्तिके अनन्तर महाभाग ब्रह्माने सम्पूर्ण भूतोंके हितकी कामनासे हिंसाका निवारण

८२४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

करनेवाले—विषनाशक मन्त्रकी सृष्टि की, जो ब्रह्माक्षरमय (वेदाक्षरमय) है ॥ ३७ ॥

गरुत्मान् विततैः पक्षैर्नखाग्रैः सलिलं महीम्।
समाः सहस्रं सम्पूर्णं चूलाग्रेणावलम्बिना ॥ ३८ ॥

गरुड़ अपने फैले हुए पंखों, नखाग्रों (पञ्जाग्रों) तथा लटकती हुई शिखाके अग्रभागसे जल (जीवन) और पृथ्वी (शरीर) की पूरे सहस्र वर्षोंतक रक्षा करें *॥ ३८ ॥

पर्णभारैश्च विकचैर्विस्तीर्णैर्वसुधातले।
रराज वसुधा चैव पर्णैर्बहुविचित्रितैः ॥ ३९ ॥

वे अपने फैले हुए विकसित पङ्खोंके भारसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करके स्थित हैं, इस वसुधापर (तथा शरीरमें भी अन्तर्यामीरूपसे) विराजमान हैं; तथा उनके बहुसंख्यक एवं विचित्र पङ्खोंसे पृथ्वीतलकी बड़ी शोभा होती है। (यह गरुडजीका ध्यान है) ॥ ३९ ॥

येन वृत्तेन जीवेयुः सर्वभूतानि भारत।
इह लोके मनुष्येन्द्र देवलोके च भारत।
द्यौरिवाचितनक्षत्रा मही तलविसर्पिभिः ॥ ४० ॥

(अब मन्त्रका माहात्म्य बताते हैं—) भरतनन्दन! नरेन्द्र! गरुडमन्त्रके जपसे इहलोक तथा देवलोकके भी सभी प्राणी जीवित हो सकते हैं। नीचेकी ओर जानेवाले प्राणियों (तथा इन्द्रिय आदि) के साथ यह पृथ्वी (एवं देह) विषरहित हो नक्षत्रोंसे व्याप्त हुए आकाशकी भाँति शोभा पाती है ॥ ४० ॥

हिमवान् हिमसंम्पाते भवत्येकचरो वशी।
पुष्कराम्भसि धर्मात्मा मत्स्योल्लिखितमूर्धजः ॥ ४१ ॥

धर्मात्मा हिमवान् भी हेमन्त और शिशिर ऋतुमें पुष्करके जलमें खड़े हो तपस्या करते थे, उस समय उस सरोवरके मत्स्य उनके सिरके बालोंमें उलझ जाते थे। वे मन और इन्द्रियोंको वशमें करके अकेले ही वहाँ विचरते और तप करते थे ॥ ४१ ॥

अथ खबलमाक्रम्य पृथिवीं प्रांशुद्वाहिनीम्।
तपश्चरति धर्मात्मा बाहुमुद्यम्य दक्षिणम् ॥ ४२ ॥

वे धर्मात्मा हिमवान् अपने बलसे ऊँचे शरीरवाली पृथिवीको दबाकर दाहिनी बाँह ऊपर उठाये तपस्यामें संलग्न रहते थे ॥ ४२ ॥


* यहाँ मूलमें मन्त्रका विशेषण 'ब्रह्माक्षरमहिंसकम्' आया है। इसमें ब्रह्मसे प्रणव लिया गया है। 'अहिंसक अक्षर' से अमृत बीज 'वं' को ग्रहण किया गया है। इस बीजको विततपक्ष अर्थात् दीर्घस्वरसे युक्त कहा गया है। इसके बाद 'गरुत्मान्' पद आता है। इसका उपयोग पञ्चाङ्गन्यासमें किया जाता है। यथा—'ॐ वाँ गरुत्मान् हृदयाय नमः अङ्गुष्ठयोः' (ऐसा कहकर दोनों हाथोंकी तर्जनी अङ्गुलियोंसे दोनों अङ्गुष्ठोंका स्पर्श करे।) 'ॐ वीं गरुत्मान् शिरसे स्वाहा तर्जन्योः' (ऐसा कहकर दोनों हाथोंके अङ्गुष्ठोंसे दोनों तर्जनी अङ्गुलियोंका स्पर्श करे।) 'ॐ वूँ गरुत्मान् शिखायै वषट् मध्यमयोः' (ऐसा कहकर दोनों हाथोंके अङ्गुष्ठोंसे दोनों मध्यमा अङ्गुलियोंका स्पर्श करे।) 'ॐ वैं गरुत्मान् कवचाय हुम् अनामिकयोः' (पूर्ववत् अङ्गुष्ठोंसे अनामिका अङ्गुलियोंका स्पर्श करे।) 'ॐ वौं गरुत्मान् नेत्रत्रयाय वौषट् कनिष्ठयोः' (अङ्गुष्ठोंसे कनिष्ठिका अङ्गुलियोंका स्पर्श।) 'ॐ वः गरुत्मान् अस्त्राय फट् करतलकरपृष्ठयोः' (ऐसा कहकर हथेलीका और उसके पृष्ठभागसे पृष्ठभागका स्पर्श करे।) यह करन्यास हुआ। अङ्गन्यास भी इन्हीं मन्त्रोंसे करना चाहिये। यहाँ करन्यास वाक्योंमेंसे अङ्गुलियोंके नाम हटा देनेपर वे ही अङ्गन्यास वाक्य हो जायेंगे। अङ्गन्यासमें क्रमशः हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्रत्रय—इन पाँच अङ्गोंमें न्यास किया जाता है। इसीमें छठा अस्त्रन्यास है। अंगूठेको अलग करके सीधी अङ्गुलियोंसे हृदय और सिरमें न्यास करना चाहिये। अंगूठेको अंदर करके मुट्ठी बाँधकर शिखाका स्पर्श करना चाहिये। कोई-कोई केवल अंगूठेसे शिखाका स्पर्श बताते हैं। कवचन्यासमें दायें हाथकी सभी अङ्गुलियोंसे बायीं भुजाका और बायें हाथकी सभी अङ्गुलियोंसे दाहिनी भुजाका स्पर्श करना चाहिये। दो नेत्रोंके अतिरिक्त तीसरा नेत्र ललाटमें होता है। इसका न्यास करते समय तर्जनी और अनामिकासे दोनों नेत्रोंका और मध्यमासे ललाटका एक साथ स्पर्श करना चाहिये। अस्त्रन्यासमें दाहिने हाथको बायीं ओरसे सिरके ऊपरसे ले आकर बायीं हथेलीपर ताली बजायी जाती है। कुछ लोगोंका मत है कि नाराचमुद्रासे दोनों हाथोंको ऊपर उठाकर अंगूठे और तर्जनीके द्वारा मस्तकके चारों ओर करतल ध्वनि करनी चाहिये।

३८ वें श्लोकके 'सलिलं मही'से लेकर ... ... 'वलम्बिना' तक तान्त्रिक पद्धतिसे मूलमन्त्रका वर्णन है। आचार्य नीलकण्ठने उसका उद्धार करके इस पञ्चाक्षर मन्त्रका स्वरूप यों निश्चित किया है—'वं हस्रः लं वषट्'। इस मन्त्रका विनियोग इस प्रकार है—ॐ अस्य श्रीगरुत्मन्मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दः गरुत्मान् देवता वं बीजं हस्रः शक्तिः लं कीलकं विषनाशने विनियोगः। विनियोगके पश्चात् गरुडका निम्नाङ्कित रूपसे ध्यान करना चाहिये—

पर्णभारैश्च विकचैर्विस्तीर्णैर्वसुधातले।
रराज वसुधा चैव पर्णैर्बहुविचित्रितैः ॥

जो विस्तृत एवं विकसित पंखोंके भारसे सारी पृथ्वी और आकाशको व्याप्त करके स्थित हैं, जो भूतलपर (और शरीरके भीतर भी अन्तर्यामीरूपसे) विराजमान हैं तथा जिनके बहुत विचित्र पंखोंसे पृथिवीकी बड़ी शोभा हो रही है (उन गरुडदेवका मैं चिन्तन करता हूँ)।

इस प्रकार ध्यान करके मन्त्रका ५ लाख जप करनेसे यह सिद्ध हो जाता है।

भविष्यपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः ८२५

साग्रं वर्षसहस्रं च शतमेकं च सुव्रत।
तपश्चरति संयोगाद् वायुभक्षः समाहितः॥ ४३॥

सुव्रत! वायुका ही आहार करते हुए एकाग्रचित्त हो उत्तम योगका आश्रय ले हिमवान्ने ग्यारह सौ वर्षोंतक तपस्या की॥ ४३॥

समाधियोगात् सङ्गाद् वा ब्रह्मयोगस्य भारत।
येनेयं पृथिवी राजन् धार्यते ब्रह्मयोनिना॥ ४४॥
अनाद्यन्तेन नित्येन सर्वत्र विषयेषिणा।
योऽसौ विष्णुरगाधात्मा परमात्मा निराकृतिः॥ ४५॥

भरतनन्दन! राजन्! जो ब्रह्माजीके उत्पत्तिस्थान हैं, अनादि, अनन्त और नित्य हैं तथा जीवरूपसे सर्वत्र विषयका अनुसंधान करनेवाले हैं, जो समाधियोग अथवा प्रणवके जप एवं चिन्तनसे विशिष्ट हो यह सारी पृथ्वी धारण करते हैं, वे साक्षात् परमात्मा विष्णु हैं (वे ही कूर्म आदिरूपसे इस वसुधाको धारण करते हैं)। उनका स्वरूप अगाध है तथा वे निराकार ब्रह्म हैं॥ ४४-४५॥

दिने निषण्णो भवति रात्रौ भवति वै स्थिरः।
सत्यसंघः स धर्मात्मा कामकारकरो भवेत्॥ ४६॥

वे दिनमें बैठे होते हैं (अर्थात् विद्याके द्वारा प्राप्य हैं) और रातमें खड़े रहते हैं (अर्थात् अविद्यासे ऊपर उठे हुए हैं)। वे सत्यप्रतिज्ञ धर्मात्मा श्रीहरि इच्छानुसार (लीलापूर्वक) कार्य करते हैं॥ ४६॥

तस्य यः सोद्यतः पाणिः पृथिव्यां पृथिवीसमः।
रात्रौ स तपनो भवति मण्डलं विपुलं नभः॥ ४७॥

उन भगवान् विष्णुका जो हाथ भक्तोंका उद्धार करनेके लिये उठा हुआ है, वह इस भूतलपर धर्म कहा गया है। पृथ्वकी भाँति वही सबको धारण करनेवाला है। वह रात्रि (अविद्या) में प्रकाश या विवेक प्रदान करनेवाला है तथा वही विशाल आकाशमण्डलमें व्याप्त ब्रह्म है॥ ४७॥

स चन्द्रविषयं राजञ्छमयामास रुन्धति।
ग्रहाणां गतयश्चैव ताराणां च विशेषतः॥ ४८॥

राजन्! वह धर्म चन्द्रमा अर्थात् मनको बाँधनेवाले राग आदि दोषोंको शान्त करता है तथा क्षुद्र ग्रहों एवं ताराओंके तुल्य जो नेत्र आदि इन्द्रियाँ हैं, उन्हें विषयोंकी ओर जानेसे रोकता है॥ ४८॥

तां छायामाक्षिपन् सोमात् स्रवद्भिर्मण्डलेन वै।
पृथिव्यां दक्षिणो हस्तो महायोगी महामनाः॥ ४९॥

पृथ्वीपर जो भगवान्‌का दाहिना हाथ धर्म है, वह चन्द्रमासे झरनेवाली गङ्गाकी धाराओं और चन्द्रमण्डलके द्वारा अविद्याका नाश करता हुआ साधकको महायोगी एवं महामना बना देता है। (तात्पर्य यह कि गङ्गाजीके सेवन और चन्द्रमामें की हुई धारणासे अविद्याका निवारण होता है तथा धर्मका आश्रय लेनेसे ज्ञान और योगकी प्राप्तिके साथ-साथ मोक्ष सुलभ हो जाता है।)॥ ४९॥

सैषा छाया शशीभूता शशिमण्डलमविशत्।
अलिङ्गा पृथिवीलिङ्गादद्भुतादक्षया दिवि॥ ५०॥

यह अविद्यामयी रात्रिरूपा छाया लिङ्गरहित (प्रमाण-शून्य—मिथ्या) है। यह अद्भुत पृथ्वीरूप शरीर धारण करके वृत्तिकी एकाग्रतासे चन्द्रस्वरूप हो आकाशस्थ चन्द्रमण्डलमें प्रवेश कर जाती है। मिथ्या होनेके कारण ही यह अक्षय (मृगतृष्णाके सरोवरकी भाँति क्षयरहित) है॥ ५०॥

अङ्गाङ्गान्युपगृह्यैव तपश्चरति निश्चयात्।
प्रोक्ष्य पादौ तु सतलौ पृथिवी तपसि स्थिता॥ ५१॥

यह पृथ्वी तलुओंसहित दोनों पैरोंको धोकर (विविध तीर्थोंमें स्नान करके) सारे अङ्गोंको समेटकर (विषयोंकी ओरसे हटाकर) दृढ़ निश्चयके साथ तपस्या करने लगी और दीर्घकालतक उसमें स्थिर रही (इसी तपस्याके प्रभावसे जलके घनीभावरूप चन्द्रमाके आकारमें परिणत हुई पृथ्वी चन्द्रमण्डलमें प्रविष्ट हुई)॥ ५१॥

सूर्यार्चिभिः पीयमानादाक्षिप्यत मही तले।
महीमिवाम्बुवसनां युगान्ते विष्णुतेजसा॥ ५२॥

फिर सूर्यकी किरणोंद्वारा पिये जाते हुए जलके साथ पृथ्वी भी उनके समीप खींच ली गयी, जैसे युगान्तकालमें रसातलके भीतर डूबी हुई सलिलवसना पृथ्वीको वराहरूपधारी भगवान् विष्णुने अपने तेजसे ऊपरको खींच लिया था॥ ५२॥

रराज सूर्यरश्मिभिर्व्यतिषिक्ता महानदी।
स्फाटिकेव शुभा सैषा काञ्चनैर्धातुभिर्वृता॥ ५३॥

सूर्यकी किरणोंसे मिश्रित हुई पृथ्वी एक महानदीके रूपमें परिणत हो गयी। उस समय वह सुवर्णमय धातुओंसे घिरी हुई सुन्दर स्फटिकशिलाकी भाँति सुशोभित हो रही थी॥ ५३॥

आदित्येन समादत्ता रश्मितेजोऽभिसम्भवैः।
मण्डलान्तर्गता देवी चक्षुषा नोपलभ्यते॥ ५४॥

सूर्यके द्वारा गृहीत होनेपर किरणोंके तेजसे एकी-भावको प्राप्त हो सूर्यमण्डलके भीतर स्थित हुई पृथ्वीदेवी नेत्रोंसे अदृश्य हो गयी॥ ५४॥

रश्मिभिः पुनरुत्तीर्णा ततो योगेन धावति।
आकाशगङ्गा संवृत्ता विपुलैरम्बुविग्रहैः॥ ५५॥

सूर्यकिरणोंसे उत्तीर्ण हो अगाध जलमय विग्रह धारण करके वे आकाशगङ्गा बन गयीं और वहाँसे वेगपूर्वक दौड़ीं॥ ५५॥

८२६श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

शीतच्छायैश्च तरुभिर्लताभिश्च सुगन्धिभिः।
पद्मखण्डैश्च विविधैः शुशुभे दिव्यगन्धिभिः ॥ ५६ ॥

मार्गमें शीतल छायावाले वृक्षों, लताओं, सुगन्धित कुसुमों तथा भाँति-भाँतिके दिव्य गन्धवाले पद्मसमूहोंसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ ५६ ॥

काञ्चनापीडजघना स्फाटिकान्तरमेखला।
पद्मरेणुसिता पीता चक्रवाकावतंसिका ॥ ५७ ॥
नीलगर्भसुकेशान्ता पुष्पसंचयसंकुला।
शोभते विप्रसर्पन्ति प्रमदेव विभूषिता ॥ ५८ ॥

वह महानदी आगे बढ़ती हुई वस्त्राभूषणोंसे विभूषित युवती स्त्रीकी भाँति शोभा पा रही थी । सुवर्णमय कमल मानो उसके कटिप्रदेशके आभूषण थे । स्फटिकमणिकी शिलाएँ मेखलाकी भाँति शोभा दे रही थीं। कमलोंके पराग-का अङ्गराग धारण करनेके कारण उसकी कान्ति श्वेत और पीत दिखायी देती थी। चक्रवाक उसके कानोंके आभूषण-से प्रतीत होते थे। जलके भीतर उगे हुए नीलकमल उसके सुन्दर केशकलापका भ्रम उत्पन्न कर देते थे। वह ढेर-के-ढेर पुष्पोंसे व्याप्त हो रही थी॥ ५७-५८ ॥

सैषा गङ्गा फलं लेभे पुष्करेण समाहिता।
सुतपा चन्द्रविहिता लोकानां धारणे रता ॥ ५९ ॥

वही यह सम्पूर्ण लोकोंको धारण करनेवाली पृथ्वी सुन्दर तपस्या करके पहले चन्द्रमारूपमें परिणत हुई, फिर गङ्गा-भावको प्राप्त हुई। उसने पुष्करतीर्थके सम्पर्कसे परमात्माके ध्यानमें एकचित्त हो उत्कृष्ट तपस्याका फल प्राप्त किया ॥

सरस्वती स्वरैर्व्यक्तैरधीते ब्रह्मवादिनी।
पृष्ठात् प्रयाता शैलेन्द्रे मन्दरे मन्दगामिनी ॥ ६० ॥

लोकधात्री पृथ्वी गङ्गाभावको प्राप्त हो पुष्करमें सरस्वती होकर व्यक्त स्वरोंमें वेदका पाठ करती हुई स्वाध्यायमें तत्पर रहती है। वह सरस्वती मेरु पृष्ठसे मन्दगतिसे चलती हुई गिरिराज मन्दराचलपर जा पहुँची ॥ ६० ॥

ऋङ्मयांश्चतुरो वेदान् पादैश्चतुर्भिरावृतान् ।
यजुर्भिः सामभिश्चैव ग्रथिताञ्छिक्षया तदा ॥ ६१ ॥

उस समय वह ऋषियोंके साथ शिक्षासे ग्रथित, चार पादोंसे युक्त, ऋक्प्रधान एवं यजुष् तथा साममन्त्रोंसे युक्त चारों वेदोंका स्पष्ट स्वरोंमें पाठ करने लगी ॥ ६१ ॥

ऋषिभिर्ज्वलनप्रख्यैस्तपसा दग्धकिल्बिषैः।
सुपार्श्वस्य गिरेः पादे परिदायैः सुपारणैः ॥ ६२ ॥

जिन ऋषियोंके साथ सरस्वती वेदपाठ करती थी, वे अग्निके समान तेजस्वी थे । तपस्यासे उनके सारे पाप भस्म हो गये थे। वे सुपार्श्वगिरिके चरणप्रान्तमें बैठकर शिष्योंको ब्रह्मका उपदेश देते थे और दूसरोंका उद्धार करनेमें समर्थ थे ॥ ६२ ॥

निःस्वनं सर्वभूतानि नियमैश्च न शृण्वते।
मन्दराग्रे विसर्पन्तं जगत् कृत्स्नमतीन्द्रियम् ॥ ६३ ॥

सरस्वतीका यह ब्रह्मघोष समस्त प्राणी नियमपूर्वक (अथवा नियमोंद्वारा भी) नहीं सुन पाते, क्योंकि वह इन्द्रियोंसे अतीत है। मन्दराचलके आगे फैलता हुआ वह शब्द सम्पूर्ण जगत्में व्याप्त हो रहा है (वह वैखरी शब्द ही है, किंतु सूक्ष्म होनेके कारण दुर्ग्राह्य है) ॥ ६३ ॥

विरामनियमे प्राप्ते तूष्णींभूता बभूव ह।
न वाचमीरयेद् देवी नियमात् सत्यवादिनी ॥ ६४ ॥

विरामका नियम प्राप्त होनेपर वाग्देवी चुप हो गयीं। उस अवस्थामें वे सत्यवादिनी देवी नियमतः वाणीका उच्चारण नहीं कर सकतीं (तुरीय ब्रह्मपदका निरूपण करते समय 'यतो वाचो निवर्तन्ते' इत्यादि श्रुतिके अनुसार वाग्देवीका मौन होना उचित ही है) ॥ ६४ ॥

अथ भूतानि सर्वाणि तूष्णींभूतानि सर्वशः।
न शेकुरभिधानार्थं व्याहर्तुं वदनैर्बलात् ॥ ६५ ॥

तदनन्तर सभी प्राणी सर्वथा चुप हो गये। वे अपने मुखोंसे बलपूर्वक कुछ कहनेके लिये बोल न सके ॥ ६५ ॥

विभज्य योगं मनसा सर्वभूतेष्वनुग्रहम्।
सरस्वती तीरयुता व्याजहार महास्वनम् ॥ ६६ ॥

समस्त प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये मनके द्वारा योगका विभाजन करके तटपर खड़ी हुई सरस्वती देवीने पुनः महान् शब्दका उच्चारण किया (तात्पर्य यह कि ब्रह्मका साक्षात् प्रतिपादन करनेमें असमर्थ होनेपर भी वाग्देवी तटस्थ लक्षणद्वारा उनके तत्त्वका निरूपण कर सकती हैं) ॥ ६६ ॥

सरस्वत्या समायुक्तां शिक्षां गृह्णन्ति देहिनः।
तस्मिन्नेवाथ ते सर्वे गानं गायन्ति शिक्षया ॥ ६७ ॥

सरस्वतीद्वारा दी हुई शिक्षाको दूसरे देहधारी भी ग्रहण करते हैं। वे सब उसी पदमें स्थित होकर शिक्षाके अनुसार मन्त्रोंका गान करते हैं ॥ ६७ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाश्विभिः सह।
जटिलाश्चीरवसना मुञ्जमेखलधारिणः ॥ ६८ ॥

आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण और अश्विनीकुमार-ये सब जटा रखाये, चीरवस्त्र पहने और मूँजकी मेखला धारण किये उसी शिक्षाके अनुसार मन्त्रोंका गान करते हैं ॥ ६८ ॥

गन्धर्वाः किन्नराश्चैव सनागाः सह चाम्भसः।
तपश्चरन्ति सहिताः पुष्करेषु मनीषिणः ॥ ६९ ॥

गन्धर्व, किन्नर, नाग और वरुण भी उसी शिक्षाके

भविष्यपर्व ] अष्टाविंशोऽध्यायः ८२७


अनुसार गाते हैं। ये सभी मनीषी पुरुष एक साथ होकर पुष्करमें तपस्या करते हैं॥ ६९॥

अपि कीटपतङ्गैश्च सह सर्वैः सरीसृपैः।
शोषयन्ति शरीराणि तपसोग्रेण यत्नतः॥ ७०॥

और उस उग्र तपस्याके द्वारा यत्नपूर्वक कीट-पतंगों तथा समस्त साँप-बिच्छुओंके साथ अपने शरीरोंको सुखाते हैं॥ ७०॥

विष्णुर्विष्णुत्वमापन्नो देहान्तरविसृष्टवान्।
संरक्षति महायोगी सर्वांस्तान् सहचारिणः॥ ७१॥

परमात्मा विष्णु व्यापक स्वरूपको प्राप्त होकर भी दूसरे चिन्मय विग्रह (चतुर्भुज स्वरूप) से युक्त होते हैं। उसी स्वरूपसे वे महायोगी विष्णु उन समस्त सहचारियों (आदित्य आदि देवों) का संरक्षण करते हैं॥ ७१॥

पुष्करे रमते विष्णुर्विष्णुरेव द्विधा कृतः।
दीप्यमानः स्वतेजोभिर्विधूम इव पावकः॥ ७२॥

पुष्कर अर्थात् सम्पूर्ण कार्यात्मक जगत्में व्याप्त हुए भगवान् विष्णु ही नर-नारायण आदिके रूपमें एक-से दो हो गये हैं और धूमरहित अग्निकी भाँति अपने तेजसे देदीप्यमान होकर तप आदिकी लीला करते हैं॥ ७२॥

सोऽग्निर्मनःसमुद्भूतः पृथिवीं तापयन्निव।
प्रधावति समं तेन मण्डलं दशयोजनम्॥ ७३॥

वे विष्णु ही मनःकल्पित गार्हपत्यादि अग्निरूप होकर पृथिवीके अभिमानी देवताको ताप देते (तपाकर सुवर्णके समान शुद्ध करते) हुए उसके साथ दस योजन ब्रह्माण्ड-मण्डलमें दौड़ते हैं (अर्थात् उसके कर्मोंका फल देनेके लिये उसके साथ-साथ रहते हैं)॥ ७३॥

विरराजार्चिभिर्दीप्तैः पृष्ठतश्चावलम्बिभिः।
विशीर्णपार्थिविभवैर्मयूखैरिव दीपितः॥ ७४॥

जिन्होंने देहात्मवादीकी सामर्थ्यको नष्ट कर दिया है, उन आगे-पीछे सब ओर फैली हुई उद्दीप्त लपटों अथवा किरणोंसे प्रकाशित हुए अग्निदेव बड़ी ही शोभा पाते हैं॥

तेषामग्नेर्विस्फुलिङ्गानां न शेकुर्लङ्घने रताः।
विप्रकीर्णस्य वसुधामर्यादामिव भास्करम्॥ ७५॥

जैसे विषयासक्त मनुष्य पृथ्वीकी मर्यादा बने हुए—उसका परिच्छेद करनेवाले सूर्यदेवको लाँघ नहीं सकते, उसी प्रकार वे सब ओर फैले हुए अग्निरूप विष्णुकी चिनगारियोंके समान जो ब्रह्मा आदि हैं, उनका भी लङ्घन नहीं कर सकते॥ ७५॥

सोऽग्निर्द्वीप्य विभज्यांशान् विधूम इव पावकः।
ऋत्विग्भिर्ज्वलनप्रख्यैर्विक्रीयत इवाध्वरे॥ ७६॥

वे अग्निदेव उद्दीप्त हो अपनी किरणोंको अनेक रूपोंमें विभक्त करके धूमरहित पावकके समान स्थित होकर अग्नितुल्य तेजस्वी ऋत्विजोंद्वारा यज्ञमें विविध रूपोंमें खरीदे जाते हैं (सोमरस खरीदनेवाले सोमके रूपमें उन्हींकी खरीद करते हैं)॥ ७६॥

सोऽग्निर्धूमगतस्तत्र तिष्ठते विपुलं तदा।
यावद् विष्णुक्रमः प्राप्तो नियमस्य समापनात्॥ ७७॥

वे विष्णुरूप निर्धूम अग्निदेव उस यज्ञमें, जबतक उसकी समाप्ति नहीं हो जाती तबतक द्रव्य देवता आदि विपुल रूपोंमें प्रकाशित होते हैं। फिर वे ही अग्नि देवता फलरूपसे वहाँतक पहुँचते हैं, जहाँतक (वामनसे विराट् रूप धारण करनेवाले) भगवान् विष्णुके तीनों पग पहुँचे थे॥ ७७॥

रक्षां कृत्वा स्थितं विद्याद् विष्णुर्विष्णुपराक्रमः।
भूत्वा शतशरीरो वै नागो बालाहकोऽभवत्॥ ७८॥

सबकी रक्षा करके स्थित हुए उन भगवान् विष्णुको जानना चाहिये। वे व्यापक पराक्रमी भगवान् विष्णु (ऐश्वर्ययोगसे) सैकड़ों शरीरोंमें प्रकट हो बालाहक नाग (मेघोंका भेदन करनेवाला ऐरावत हाथी) हुए॥ ७८॥

तमग्निमात्मसंस्पृष्टं लेलिहानं महामतिम्।
प्रतिप्रवृत्तं तेजोभिर्भूतानां हितकाम्यया॥ ७९॥
वारिणा सुखशीतेन प्राणिनां प्राणवर्धनः।
न्यषिञ्चद् दहनं तत्र नागो बालाहकस्तदा॥ ८०॥

शरीरके भीतर जठरानलरूपसे स्थित हुए उन विष्णु-स्वरूप अग्निदेवको, जो अपनी लपलपाती हुई लपटोंसे सबको चाट लेनेमें समर्थ, महामति (दिव्य ज्ञान देनेवाले) तथा समस्त भूतोंके हितकी कामनासे तेजस्वी रूप धारण करके कर्ममें प्रवृत्त हुए थे; प्राणियोंके प्राणोंकी पुष्टि करनेवाले बालाहक नागने उस समय वहाँ सुखद शीतलजलसे अभिषिक्त किया॥ ७९-८०॥

ततः सिद्धगणैर्जुष्टे पुष्करे तप्यते तपः।
संहृत्य मनसाऽऽत्मानं महायोगी महाबलः॥ ८१॥

तदनन्तर सिद्धगणोंसे सेवित वे महायोगी, महावैराग्यवान् अग्निदेव मन (बुद्धि) के द्वारा मनको अपनेमें विलीन करके पुष्करमें तपस्या करने लगे॥ ८१॥

पादगात्राणि संहृत्य मनो मूर्ध्नि विधारयन्।
अचलं स्थानमासाद्य तूष्णींभूतो बभूव ह॥ ८२॥

वे नीचेके अङ्गोंका ऊपरके अङ्गोंमें लय करते हुए मनको मूर्धा (सहस्रारचक्र) में स्थापित करके अविचल स्थान (ब्रह्मपद) को पाकर मौन हो गये॥ ८२॥

एष धर्मो हि धर्माणां नोपधानविकल्पितः।
हितः सर्वेषु भूतेषु इह चामुत्र चोभयोः॥ ८३॥

यही सब धर्मोंका धर्म है। इसमें उपाधिजनित विकल्प नहीं है। यह इहलोक और परलोक—दोनोंमें सभी प्राणियोंके लिये हितकर है॥ ८३॥

८२८ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


अथ दैत्या हतास्तत्र समागम्योद्यतायुधाः।
मायाप्राप्तैर्बहुविधैर्नगरैरभिसंवृताः ॥ ८४ ॥
तदनन्तर वे दैत्य जो पहले मार खाकर पराजित हो गये थे, पुनः हाथोंमें आयुध लिये वहाँ आ गये। वे नाना प्रकारके मायामय नगरोंसे घिरे हुए थे ॥ ८४ ॥

अग्निं दैत्याः पर्वतशिखरैरभिनिघ्नन्ति परंतप ।
ज्वलन्तं ज्वलनप्रख्या महाकाया महाबलाः ॥ ८५ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय ! वे अग्निके समान तेजस्वी महाकाय एवं महाबली दैत्य तेजसे प्रज्वलित होनेवाले अग्निदेवको पर्वतशिखरोंसे चोट पहुँचाने लगे ॥ ८५ ॥

मेघीभूताश्च मायाभिर्वर्षन्ति बलदर्पिताः ।
तस्मिन्नेवाभिसंघाते ससंघातं महाबलम् ॥ ८६ ॥
वे उस संघर्षमें बलके घमंडमें भरकर मेघरूप धारण करके मायाद्वारा सेवकसमूहसहित महाबली अग्निपर प्रस्तरोंकी वर्षा करने लगे ॥ ८६ ॥

ते शैलास्त्वर्चिषा दग्धाः शतशोऽथ सहस्रशः।
युगान्ते प्रभुरादित्यः प्रजा इव दिधक्षति ॥ ८७ ॥
परंतु जैसे भगवान् सूर्य प्रलयकालमें समस्त प्रजाओंको दग्ध कर देना चाहते हैं, उसी प्रकार उन अग्निदेवके तेजसे उस समय दैत्योंद्वारा गिराये हुए वे सैकड़ों-हजारों पर्वत-खण्ड जलकर भस्म हो गये ॥ ८७ ॥

न शेकुरग्निं दैत्यास्ते मायाभिर्मुखमुद्यतम् ।
आदित्यमिव दीप्यन्तं नभः सूर्योदये यथा ॥ ८८ ॥
देवताओंके मुखस्वरूप उद्यत हुए अग्निदेवको वे दैत्य अपनी मायाओं द्वारा पराजित न कर सके। ठीक उसी तरह, जैसे मंदेह नामक राक्षस सूर्योदयकालमें आकाशको प्रकाशित करते हुए सूर्यदेवको दबा नहीं पाते हैं ॥ ८८ ॥

विहितैरुद्यमैः सर्वैर्दैत्या भग्नपराक्रमाः ।
गन्धमादनमासाद्य निषण्णा नगमूर्धनि ॥ ८९ ॥
सारे उद्यम करके भी दैत्योंका पराक्रम भंग हो गया । वे हताश हो गन्धमादन पर्वतके शिखरपर जा बैठे ॥ ८९ ॥

स चाग्निवैष्णवैर्लोकैर्विद्युद्भिः सह संगतः ।
अन्तरिक्षचरान् दैत्यान् निर्दहन् व्यचरद् दिवि ॥ ९० ॥
वे अग्निदेव वैष्णवजनों तथा बिजलियोंसे मिलकर अन्तरिक्षचारी दैत्योंको दग्ध करते हुए आकाशमें विचरने लगे ॥ ९० ॥

नागो बालाहकश्चैव मेघैः संघातमागतः ।
मुमोच सलिलं भूमौ पर्जन्य इव वृष्टिमान् ॥ ९१ ॥
उस समय मेघोंके साथ संघभावको प्राप्त हुए बालाहक नाग (ऐरावत) ने वर्षा करनेवाले मेघकी भाँति भूमिपर पानी बरसाया ॥ ९१ ॥

मन्त्रैः संचोदितो नागो द्विजेभ्यो वदनोद्गतैः ।
मुमोच तोयसंघातं मानयन् विप्रजं जनम् ॥ ९२ ॥
ब्राह्मणोंके मुखोंसे उच्चारित हुए मन्त्रोंद्वारा प्रेरित हुए उस नागने ब्राह्मण संततिका समादर करते हुए वहाँ जल-समूहकी वर्षा की ॥ ९२ ॥

इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥


एकोनत्रिंशोऽध्यायः

तपस्याके प्रभावसे देवताओंका उत्कर्ष

जनमेजय उवाच
संयुज्य तपसा देवाः किमकूर्वस्ततः परम् ।
न हि तद् विद्यते लोके तपसा यन्न लभ्यते ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— मुने ! तदनन्तर देवताओंने तपस्यासे संयुक्त होकर क्या किया ? संसारमें ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो तपस्यासे सुलभ न हो ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
अथ दीक्षां समास्थाय सर्वे विष्णुमया गणाः ।
पुष्करादग्निमुद्धृत्य प्रणीय च यथाविधि ॥ २ ॥
जुहुवुर्मन्त्रविधिना ब्राह्मणा मन्त्रचोदिताः ।
हविषा मन्त्रपूतेन यथा वै विधिरैव च ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! तदनन्तर सभी विष्णुरूप ब्राह्मणगणोंने यज्ञकी दीक्षा ले पुष्करसे अग्निको उद्धृत करके उनकी विधिवत् स्थापना करनेके पश्चात् वेदाज्ञा-से प्रेरित हो मन्त्रोक्त विधिसे मन्त्रपूत हविष्यद्वारा जैसा विधान है, उसी प्रकार हवन किया ॥ २-३ ॥

स चाग्निर्विधिवत्तत्र वर्धते ब्रह्मतेजसा ।
तेजोभिर्बहुलीभूतः प्रभुः पुरुषविग्रहः ॥ ४ ॥
वे अग्निदेव वहाँ ब्रह्मतेजसे सम्पन्न हो विधिवत् बढ़ने लगे। महान् तेजकी राशिसे युक्त होकर वे प्रभु अग्निदेव पुरुषरूपमें प्रकट हो गये ॥ ४ ॥

ब्रह्मदण्ड इति ख्यातो वपुषा निर्दहन्निव ।
दिव्यरूपप्रहरणो हसिचर्मधनुर्धरः ॥ ५ ॥

भविष्यपर्व ] एकोनत्रिंशोऽध्यायः ८२९


उस समय उनका नाम 'ब्रह्मदण्ड' रखा गया। वे अपने तेजस्वी शरीरसे दूसरोंको दग्ध करते हुए-से जान पड़ते थे। उनका स्वरूप और आयुध सभी दिव्य थे। वे ढाल, तलवार धनुष तथा खङ्ग और खेटक लिये हुए थे ॥ ५ ॥

सगदो लाङ्गली चक्री शरी चर्मी परश्वधी ।
शूली वज्री खङ्गपाणिः शक्तिमान् वरकार्मुकः ॥ ६ ॥

विष्णुश्चक्रधरः सङ्गी मुसली लाङ्गलायुधः ।
नरो लाङ्गलमालम्ब्य मुसलं च महाबलः ॥ ७ ॥

गदा, हल, चक्र, बाण, चर्म, फरसा, शूल, वज्र, खङ्ग, शक्ति, श्रेष्ठ धनुष, मुसल और लाङ्गल—इन सब अस्त्रोंको नारायणने धारण किया था। महाबली नर हल और मुसल लिये हुए थे ॥ ६-७ ॥

वज्रमिन्द्रस्तपायोगाच्छतपर्वाणमक्षिपत् ।
रुद्रः शूलं पिनाकं च मनसाधारयद् भुवि ॥ ८ ॥

देवराज इन्द्रने तपस्याके प्रभावसे शतपर्वा वज्र प्राप्त किया था, जिसका वे प्रयोग किया करते हैं। रुद्रदेवने भूतलपर केवल शूल तथा पिनाक धारण कर रखा था ॥ ८ ॥

मृत्युर्दण्डं पाशमपः कालः शक्तिमगृह्णत ।
जग्राह परशुं त्वष्टा कुवेरश्च परश्वधम् ॥ ९ ॥

मृत्युने दण्ड, वरुणने पाश तथा कालने शक्ति ले रखी थी। त्वष्टाने परशु और कुवेरने फरसा ग्रहण किया था ॥ ९ ॥

निर्विकारैः समायुक्ताः शतशोऽथ सहस्रशः ।
विश्वकर्मा च त्वष्टा च चक्राते ह्यायुधं बहु ॥ १० ॥

इस प्रकार सब देवता सैकड़ों और हजारों निर्विकार (निर्दोष) अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे। विश्वकर्मा तथा त्वष्टा—ये दोनों उनके लिये बहुत-से आयुधोंका निर्माण करते थे ॥ १० ॥

इन्द्रायाग्निरथं प्रादात् सूर्याय च प्रतापिने ।
परमात्मा ददौ कृष्णो रुद्राय च महात्मने ॥ ११ ॥

परमात्मा भगवान् विष्णुने इन्द्रको, प्रतापी सूर्यको तथा महात्मा रुद्रको अग्निमय रथ प्रदान किया ॥ ११ ॥

छन्दोभिरेव त्वष्टा च स चकाराथ वाहिनीम् ।
विश्वकर्मा विमानानि चकार बहुभिः क्रमैः ॥ १२ ॥

त्वष्टाने वेदोक्त सरणिसे ही वाहिनीका निर्माण किया। विश्वकर्माने अनेक क्रमोंद्वारा बहुत-से विमान बनाये ॥ १२ ॥

शरीरांशं समुद्धृत्य विष्णुः सत्यपराक्रमः ।
पुष्करात् पर्वणि वनात् पृतनार्थे प्रवर्त्तयन् ॥ १३ ॥

सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णुने पर्वके दिन पुष्कर वनसे अपने शरीरका ही अंश निकालकर दिया और उसे सेना बनानेके लिये प्रेरणा दी ॥ १३ ॥

द्यां चैव सूर्य्यऋक्षाणां वाचा चै समकल्पयत् ।
यथा स पूज्यः संग्रामे शत्रून् निर्बिभिदे रणे ॥ १४ ॥

सूर्य तथा ग्रह-नक्षत्रोंकी स्थितिके लिये भगवान्‌ने वाणीद्वारा द्युलोककी रचना की। जिससे उस द्युलोकमें रहकर देव-पूज्य इन्द्रने संग्राममें अपने शत्रुओंको विदीर्ण किया था ॥ १४ ॥

स तं दण्डं समुचितं निर्विकारं समाहितम् ।
ब्रह्मा जग्राह विधिना अन्तर्द्धानगतः प्रभुः ॥ १५ ॥

'ब्रह्मा' रूपमें प्रकट हुए भगवान् विष्णुने इन्द्रद्वारा असुरोंपर गिराये गये उस दण्डको उचित और निर्विकार-अवस्थामें पाकर उसे विधिपूर्वक ग्रहण किया और उन सबकी दृष्टिसे वे अदृश्य हो गये ॥ १५ ॥

स्वैः प्रभावैश्च विधिना सोऽस्त्राग्रामं चतुर्विधम् ।
ऐन्द्रमाग्नेयवायव्ये रौद्रं रौद्रेण वर्चसा ॥ १६ ॥

उन्होंने अपने प्रभावसे चार प्रकारके अस्त्रसमुदाय—ऐन्द्र, आग्नेय, वायव्य तथा भयंकर तेजसे युक्त रौद्रकी रचना की ॥ १६ ॥

एभिर्विकारैः संयुक्ता दितेः पुत्रा महाबलाः ।
तपसा शिक्षया चैव स्वास्त्रैः प्रहरणैरपि ॥ १७ ॥

दितिके महाबली पुत्र भी तपस्या, शिक्षा और अपने आयुधोंसे युक्त होनेपर भी इन काम आदि विकारोंके वशी-भूत हो गये ॥ १७ ॥

बलेन चतुरङ्गेण वीर्येण सुसमाहिताः ।
अप्रधृष्या रणे सर्वे समपद्यन्त वै तदा ॥ १८ ॥

वे सब-के-सब उस समय चतुरंगिणी सेना और पराक्रमसे संयुक्त हो युद्धभूमिमें दुर्जय हो गये थे ॥ १८ ॥

ते विहाय गुहामध्यं सभाण्डोपस्करे रथे ।
मन्दरस्य गिरेः पादे विचेरुर्वसुधातले ॥ १९ ॥

वे गुफाओंके मध्यभागको त्यागकर सामानोंसे भरे हुए रथपर बैठकर मन्दराचलकी उपत्यकामें पृथ्वीपर ही विचरने लगे ॥ १९ ॥

चतुरङ्गं बलं सर्वं संहृत्य तमसः प्रभुः ।
विष्णुरेव महायोगांश्चचार वसुधातले ॥ २० ॥

तब तमोगुणके कार्यभूत असुरोंकी उस सारी चतुरङ्गिणी सेनाका संहार करके प्रभावशाली भगवान् विष्णुने ही भूतल-पर बड़े-बड़े योगोंका आचरण किया ॥ २० ॥

भूयोऽन्यत्तप आसेदुश्चरन्तो ब्राह्मणैः सह ।

८३० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे


तैव्व सर्वैः सुरगणैर्धर्मचीरनिवासिभिः ॥ २१ ॥ फिर धर्ममय और चीरमय वस्त्र धारण करनेवाले ब्राह्मणों और समस्त देवताओंके साथ विचरते हुए असुर दूसरी तपस्या करने लगे ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥


त्रिंशोऽध्यायः

पृथुका राज्याभिषेक तथा दैत्यों और देवताओं द्वारा मन्दराचलके मन्थनदण्डद्वारा समुद्रका मन्थन, समुद्रसे अन्य रत्नोंके साथ अमृतका प्राकट्य और राहुके सिरका छेदन

जनमेजय उवाच
शङ्कौ खिले वर्तमाने निर्मर्यादे महाग्रहे।
अविनाशे च भूतानां कथमासन् प्रजास्तदा ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन् ! जब लोहेकी कीलके समान हृदयमें कसक पैदा करनेवाला, मर्यादाशून्य महान् ग्रह (अशनि) विद्यमान था और प्राणियोंके मोक्षकी कोई सम्भावना नहीं रह गयी थी, उस समय सारी प्रजाएँ कैसे रहती थीं ? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
अभ्यषिञ्चत्पृथुं वैन्यं पुरा राज्ये प्रजापतिः।
राज्याय ऋषिभिः सार्धं प्रजाधर्मपरायणः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी बोले—**राजन् ! पूर्वकालमें प्रजापालन-रूप धर्ममें तत्पर रहनेवाले प्रजापतिने ऋषियोंको साथ लेकर वेनकुमार पृथुका प्रजाजनोंके राज्यपर राजोचित कर्म करनेके लिये अभिषेक कर दिया ॥ २ ॥

एष नः परमो राजा सानुरागो व्यजायत।
त्रेतायां सम्प्रवृत्तायामन्योन्यमनुजल्पिरे ॥ ३ ॥
एष नो वृत्तिदाता च शिल्पानां च प्रवर्तित।।
निर्माता सर्वभूतानां सत्यप्राप्तेन कर्मणा ॥ ४ ॥
उस समय सत्ययुग समाप्त होकर त्रेताका आरम्भ हुआ था। ऐसे समयमें पृथुको अपना संरक्षक पाकर सारी प्रजा आपसमें कहने लगी—'ये हमारे सर्वोत्तम राजा हैं। हमपर अनुराग होनेसे ही ये हमलोगोंके राजा हुए हैं। हमें जीविकावृत्ति देनेवाले ये ही हैं। ये अनेक प्रकारके शिल्पकर्मोंके प्रवर्तक होंगे। अपने सत्यप्राप्त (भगवदर्पित) कर्मसे ये समस्त प्राणियोंके जीवन-निर्माता होंगे ॥ ३-४ ॥

एतस्मिन्नन्तरे देवा गन्धमादनसानुषु।
बहुभिर्नियमैः श्रान्ता निषण्णा गिरिसानुषु ॥ ५ ॥
इसी समय अनेक प्रकारके नियमोंके पालनसे थके हुए देवता गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर बैठे थे ॥ ५ ॥

अथ गन्धं समासाद्य समन्ताद् देवदानवाः।
माधवे समये प्राप्ते तेन गन्धेन दर्पिताः ॥ ६ ॥
वैशाख मास एवं वसन्त ऋतुका समय प्राप्त था, वहाँ बैठे हुए.. देवताओं और दैत्योंको सब ओरसे एक दिव्य सुगन्धका अनुभव हुआ। वे उस गन्धसे मदमत्त हो गये ॥ ६ ॥

पुष्पमाश्रित्य यद् वीर्यं मारुतेन विसर्पितम्।
मनोग्राहि सुखं सर्वं पार्थिवं गन्धमुत्तमम् ॥ ७ ॥
वह किसी फूलमात्रकी प्रबल गन्ध थी, जो हवाने फैलायी थी। वह मनको बरबस खींचे लेती थी। पूर्णतः सुखदायिनी थी। पृथ्वीतलकी वह सबसे उत्कृष्ट गन्ध थी ॥ ७ ॥

ते दैत्यास्तेन गन्धेन किंचिद् विस्मयमागताः।
प्रसन्नमनसो भूत्वा परं सौख्यमुपागताः ॥ ८ ॥
उस सुगन्धसे दैत्योंको कुछ विस्मय हुआ। उनका मन प्रसन्न हो गया और उन्हें बड़ा सुख मिला ॥ ८ ॥

ऊचुश्च सहिताः सर्वे तेन गन्धेन दर्पिताः।
पुष्पमात्रस्य यद् वीर्यं किं तस्य फलतो भवेत् ॥ ९ ॥
उस गन्धसे उन्मत्त हो वे सब एक साथ होकर बोले—'जिसके फूलमात्रमें ऐसी शक्ति है, उसके फलसे न जाने क्या होगा ? ॥ ९ ॥

अनुमानेन विज्ञेया विविधाः कर्मबुद्धयः।
शुभाश्चैवाशुभाश्चैव बुद्धिप्राणेन देहिनाम् ॥ १० ॥
'कर्मविषयक बुद्धियाँ नाना प्रकारकी होती हैं। उन्हें अनुमानसे जानना चाहिये। उनमेंसे कुछ तो शुभ (मोक्षसाधक) होती हैं और कुछ अशुभ (भोगसाधक)। देहधारियोंको बुद्धिके बलसे उनको समझना चाहिये ॥ १० ॥

तस्माद् वयं पयोमध्ये ओषध्यो निर्मथामहे।
मन्दरेण विशालेन बलिना कामरूपिणा ॥ ११ ॥
'अतः हमलोग समुद्रके जलके भीतर ओषधियोंको डालकर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले विशाल एवं बलवान् मन्दराचलके द्वारा उसका मन्थन करें ॥ ११ ॥

समुद्रमभिसंरम्भान्मथ्नीमः सोमजं जलम्।
पीत्वा च सहिताः सर्वे प्रस्थिताः कामरूपिणः ॥१२॥

भविष्यपर्व ]त्रिंशोऽध्यायः८३१

'हम सब एक साथ अमृतकी प्राप्तिके लिये उद्यमशील हों और उत्साहपूर्वक समुद्रका मन्थन करें। इससे हमें सोमज जल अर्थात् अमृत प्राप्त होगा, जिसे पीकर हम इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ (एवं अमर) हो जायेंगे ॥ १२ ॥

विष्णुरेवाग्रणीस्तेषां भविष्यति महाबलः ।
दिवं च वसुधां चैव भोक्ष्यामः सह शत्रुभिः ॥ १३ ॥

'महाबली विष्णु ही उन देवताओंकी ओरसे अगुआ होंगे। हम (अमृत पान करके अमर हो) अपने शत्रुओं (देवताओं) के साथ स्वर्ग तथा भूतलका सुख भोगेंगे ॥१३॥

समूलपत्रशाखाश्च सपुष्पाः फलशालिनः ।
सर्वे ग्रहांश्च गृह्णीमः सुधां च वसुधातले ॥ १४ ॥

'मूल (पिता), पत्र (भार्या), शाखा (भाई) तथा पुष्प (संतान) आदि समस्त परिवारके साथ हम सब लोग अभीष्ट फलके भागी होंगे। इस वसुधापर ही हम सुधा पान करेंगे और ग्रहों (अपने भागों) को ग्रहण करेंगे' ॥ १४ ॥

उद्धृत्य गिरिपादेभ्यो गन्धमादनसानुजान् ।
प्रघोष्य वचनं दैत्या मन्दरस्य प्रकम्पने ॥ १५ ॥
समुद्धर्तुं प्रधावन्तः कम्पयन्ति स्म मेदिनीम् ।
निश्चयेन महावीर्या बाहुभिः परिघाहिभिः ॥ १६ ॥

इस प्रकार वे महापराक्रमी दैत्य मन्दराचलको हिलाने या उखाड़नेकी बातें करके पार्श्ववर्ती पर्वतोंसे तथा गन्धमादनके शिखरोंपर पैदा हुए वृक्षोंको उखाड़कर अपनी विशाल भुजाओं द्वारा मन्दर पर्वतको निश्चितरूपसे उठानेके लिये दौड़े और पृथ्वीको कम्पित करने लगे ॥ १५-१६ ॥

न शक्नुवस्ते समुद्धर्तुं शैलेन्द्रं दनुवंशजाः ।
निपेतुर्जानुभिर्घृष्टा विपुले पर्वतान्तरे ॥ १७ ॥

परंतु वे दानव गिरिराज मन्दरको किसी तरह भी उखाड़ न सके। उनके घुटने घिस गये और वे उस विशाल पर्वतके भीतर गिर पड़े ॥ १७ ॥

समाधायात्मनाऽऽत्मानं तपसा दग्धकिल्बिषाः ।
पितामहं प्रपद्यन्ते शिरोभिः कामरूपिभिः ॥ १८ ॥

तपस्याके द्वारा उनके पाप दग्ध हो गये थे। वे आप ही अपने मनको धीरज दे अपने दिव्य मस्तक ब्रह्माजीके चरणोंमें झुकाकर उनकी शरणमें गये ॥ १८ ॥

तेषां मनोऽभिलषितं ब्रह्मा सर्वत्रगो वशी ।
ज्ञात्वा बहुविधैर्वाक्यैर्व्याजहार सरस्वतीम् ॥ १९ ॥
अशरीरां शरीरस्थः परया वर्णसम्पदा ।
सर्वलोकमतिर्ब्रह्मा लोकानां हितकाम्यया ॥ २० ॥

ब्रह्माजी सर्वत्र गमन करनेवाले तथा सबको वशमें रखनेवाले हैं। उनकी बुद्धि सदा समस्त लोकोंके हितचिन्तनमें ही लगी रहती है। वे उन दैत्योंका मनोरथ जानकर लोकहितकी कामनासे नाना प्रकारके वाक्यों तथा उत्तम वर्णसम्पत्तिसे युक्त वाणी बोले । सशरीर होकर भी उन्होंने अशरीर वाणीका प्रयोग किया ॥ १९-२० ॥

आदित्यैर्वसुभिश्चैव रुद्रैश्च समरुद्गणैः ।
देवैर्यक्षैः सगन्धर्वैः किन्नरैश्च प्रगायिभिः ॥ २१ ॥
समेत्य सहितैः सर्वैः शक्यो उद्धरितुं गिरिः ।
अमृतार्थे महातेजा धातुभिः समरंजितः ॥ २२ ॥
सुरासुरगणाः सर्वे समुत्पाट्य महागिरिम् ।
हस्तारूढाः प्रपश्यन्ति वीरुधो हिमवद्रसम् ॥ २३ ॥

(उन्होंने कहा—) 'आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण, देवता, यक्ष, गन्धर्व और गानपरायण किन्नर—ये सब एक साथ मिलकर अमृतके लिये प्रयत्न करें तो विविध धातुओंसे रञ्जित इस महातेजस्वी पर्वतको उठा सकते हैं। समस्त देवता और असुर उस महापर्वतको उखाड़कर हिमवान् पर्वतके सारभूत रसको लता-बेलोंके रूपमें अपने हाथमें आया हुआ देखेंगे' ॥ २१-२३ ॥

एतच्छ्रुत्वा च वचनं सर्वेषामन्तिके तदा ।
दैतेया बाहुबलिनो मनोभिर्वाग्भिरेव च ॥ २४ ॥
विक्रीडभूता बहुधा बभूवुर्लवणाम्भसः ।
यत्र पुष्करविन्यस्तः सहितैर्देवदानवैः ॥ २५ ॥

उस समय सबके निकट खड़े हुए बाहुबलशाली दैत्य ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर मन और वाणी आदिके द्वारा उस कार्यके साधनमें प्रवृत्त हुए । जहाँ एक साथ हुए देवताओं और दानवोंद्वारा वह मन्थनदण्ड डाला गया था, उस लवण-समुद्रके वे खिलौने बन गये । उसके जलसे वारं-वार इधर-उधर आन्दोलित होने लगे ॥ २४-२५ ॥

सुरासुरगणाः सर्वे सहिता लवणाम्भसः ।
मन्दरं पुष्करं कृत्वा नेत्रं वासुकिमेव च ॥ २६ ॥
समाः सहस्रं मथितं जलमोषधिभिः सह ।
क्षीरभूतं समायोगादमृतं समपद्यत ॥ २७ ॥

समस्त देवता और असुरोंने एक साथ लवणसमुद्रके जलमें मन्दराचलको मथानीके रूपमें डालकर वासुकि नागको मथानी बनाया और ओषधियोंसहित समुद्रजलका एक सहस्र वर्षोंतक मन्थन किया। ओषधियोंके योगसे वहाँका जल दूध-रूप होकर अमृत बन गया ॥ २६-२७ ॥

तजह्रुरसुराः पूर्वमाक्रान्ता लोभमन्युना ।
धन्वन्तरिस्तथा मद्यं श्रीदेवीं कौस्तुभो मणिः॥ २८ ॥
शशाङ्को विमलश्चापि समुत्तस्थुः समन्ततः ।
उच्चैःश्रवा हयो रम्यः पीयूषं तदनन्तरम् ॥ २९ ॥

(कलशमें सञ्चित हुए) उस अमृतको पहले असुरोंने हर लिया, क्योंकि वे लोभ और क्रोधके वशीभूत हो रहे थे। पहले तो सब ओरसे उस समुद्रके जलसे धन्वन्तरि, मद्य,

८३२श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

देवी, कौस्तुभमणि तथा निर्मल चन्द्रमा प्रकट हुए । इसके बाद परम सुन्दर उच्चैःश्रवा नामक अश्व निकला । तत्पश्चात् 'अमृत' का प्रादुर्भाव हुआ ॥ २८-२९ ॥

पश्चाद् देवास्तदादातुमुद्यता राहुमब्रुवन् ।
न तु केचित्पिबन्ति स्म दैत्या नैव च दानवाः ॥ ३० ॥

(जब दैत्यों ने उसे अपने अधिकारमें कर लिया) तब देवता उसे लेनेके लिये राहुके विषयमें इस प्रकार कहने लगे—'कोई भी दैत्य और दानव अभी अमृतका पान नहीं करते हैं (किंतु यह राहु उसे पीनेकी चेष्टा कर रहा है) ॥ ३० ॥

चिच्छेदाथ हरिः संख्ये राहोश्चक्रेण कं तदा ।
अनिर्मुक्तं पितृगणैर्मुनिभिश्च सनातनैः ॥ ३१ ॥
तदिन्द्रहस्तादमृतं जहार पृथिवी स्वयम् ।
जगामाङ्कगता देवी ब्रह्मवाक्यप्रचोदिता ॥ ३२ ॥

तब श्रीहरिने युद्धमें अपने चक्रसे तत्काल राहुका सिर काट लिया । सनातन मुनियों और पितृगणोंने उस अमृतको नहीं छोड़ा था। इसी बीचमें स्वयं पृथ्वीदेवीने ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर इन्द्रके हाथसे वह अमृत ले लिया। वे ब्रह्माजीके शिष्यभावको प्राप्त हुई थीं। अमृत लेनेके पश्चात् वे चली गयीं ॥ ३१-३२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥


एकत्रिंशोऽध्यायः

बलिके यज्ञमें वामनद्वारा त्रिलोकीके राज्यका अपहरण तथा कालान्तरमें देवताओंद्वारा बलिका राज्याभिषेक

जनमेजय उवाच
निहते दैत्यसंघाते विष्णोश्चातिपराक्रमे ।
दैतेया दानवेयाश्च किमिच्छन्ति पराक्रमात् ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा— मुने ! जब दैत्योंका समूह मारा गया (अपने प्रयासमें निष्फल हो गया) और भगवान् विष्णुका अतिशय पराक्रम विजयी (सफल) हो गया, तब दैत्य और दानव अब पराक्रमसे क्या पाना चाहते हैं? ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच
दानवा राज्यमिच्छन्ति पराक्रम्य महाबलाः ।
तप इच्छन्ति सहिता देवाः सत्यपराक्रमाः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— महाबली दानव पराक्रम करके (तीनों लोकोंका) राज्य पाना चाहते हैं और सत्यपराक्रमी देवता एक साथ होकर तप करना चाहते हैं ॥ २ ॥

जनमेजय उवाच
कथं कालस्य महतो हिरण्यकशिपुस्तदा ।
यजते ब्रह्मणः क्षेत्रे प्राप्तैश्वर्यः स कामदः ॥ ३ ॥

जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन् ! उस समय हिरण्यकशिपु (वंशी राजा बलि) को तो महान् ऐश्वर्य प्राप्त था, वह दूसरोंको अभीष्ट वस्तुएँ देनेकी शक्ति रखता था। ऐसी दशामें उसने ब्रह्माजीके क्षेत्र (प्रयाग) में दीर्घ कालतक यज्ञ कैसे किया ? ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच
ईजे बहुसुवर्णेन राजसूयेन पार्थिवः ।
ऋतुना दानवश्रेष्ठो वसुधायां महाबलः ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजीने कहा— राजन् ! महाबलशाली दानव-श्रेष्ठ राजा बलिने पृथ्वीपर बहुत-सी सुवर्णराशियोंकी दक्षिणासे युक्त राजसूय यज्ञका अनुष्ठान किया ॥ ४ ॥

गङ्गायमुनयोर्मध्ये यदभूद् विपुलं तपः ।
समेयुरतत्र सहिता यजमाने महासुरे ॥ ५ ॥
ब्राह्मणा वेदविद्वांसो महाव्रतपरायणाः ।
यतयश्चापरे सिद्धा योगधर्मेण भारत ॥ ६ ॥

भारत ! गङ्गा और यमुनाके मध्यभाग प्रयागमें, जहाँ की हुई तपस्या कई गुनी बढ़ जाती है, जब महान् असुर बलि यज्ञ करने लगा, उस समय वहाँ बहुत से वेदवेत्ता ब्राह्मण, महान् व्रतमें तत्पर रहनेवाले यति तथा योगधर्मसे सिद्ध हुए अन्य महात्मा एक साथ पधारे ॥ ५-६ ॥

मुनयो बालखिल्याश्च धन्या धर्मेण शोभिताः ।
बहवो हि द्विजा मुख्या नित्यधर्मपरायणाः ॥ ७ ॥
ऋषयश्च महाभागा विप्रैः पूज्याः सहस्रशः ।
विपुलैरत्र विभवैर्ह्रियमाणैस्ततस्ततः ॥ ८ ॥

धर्मसे सुशोभित होनेवाले धन्य बालखिल्य मुनि, सदा धर्मपरायण बहुत-से श्रेष्ठ द्विज तथा ब्राह्मणोंद्वारा पूजनीय सहस्रों महाभाग ऋषि भी उस यज्ञमें पधारे थे। वहाँ जहाँ-तहाँसे भेंटमें आया हुआ महान् वैभव एकत्र किया जा रहा था ॥

शुक्रस्तु सह पुत्रेण दैत्यं याजयते प्रभुः ।
हिरण्यकशिपुं मध्ये गणानां ज्वलनप्रभः ॥ ९ ॥

पुत्रसहित प्रभावशाली महात्मा शुक्राचार्य, जो अग्निके समान तेजस्वी थे, नरेशगणोंके बीचमें उस दैत्यराज बलिका यज्ञ करा रहे थे ॥ ९ ॥

भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः [ ८३३

हिरण्यकशिपुश्चैव व्याजहार सरस्वतीम्।
कामाद् वरं ददातीति तद् वै सम्प्रतिपद्यताम् ॥ १०॥

उस समय बलिने याचकसे यह बात कही—'यह यजमान आपको इच्छानुसार वर दे रहा है, आप इसे ग्रहण करें' ॥

विष्णुर्वामनरूपेण भिक्षां तां प्रतिगृह्यति।
हिरण्यकशिपोर्हस्ताद् द्वे पदे पदमेव च ॥ ११॥

तब साक्षात् भगवान् विष्णुने वामनरूपसे उपस्थित होकर राजा बलिके हाथसे वह तीन पग भूमिकी भिक्षा ग्रहण की ॥ ११ ॥

ततः क्रमितुमारेभे विष्णुः सत्यपराक्रमः।
त्रींल्ँ लोकान् मुनिभिः क्रान्तैर्दिव्यं वपुरधारयत्॥ १२ ॥

तब सत्यपराक्रमी भगवान् विष्णुने अपने विक्रमों (डगों) से मुनियोंद्वारा प्रार्थनीय तीनों लोकोंको आक्रान्त करना (मापना) आरम्भ किया। उस समय उन्होंने दिव्य विराटरूप धारण कर लिया था ॥ १२ ॥

हृतराज्याश्च दैतेयाः पातालविवरं ययुः।
ससैन्यगणसम्बद्धाः सप्रासाः सासितोमराः ॥ १३ ॥
सयन्त्रलगुडाश्चैव सपताकारथध्वजाः।
सचर्मवर्मकोशाश्च सायुधाः सपरश्वधाः ॥ १४ ॥

राज्यका अपहरण हो जानेपर दैत्य अपनी सेना, प्रास, खड्ग, तोमर, यन्त्र, लगुड, पताका, रथ, ध्वज, ढाल, कवच, कोश, आयुध और फरसे सब कुछ साथ लेकर पाताल-गुफाको लौट गये ॥ १३-१४ ॥

तथेन्द्रविष्णुसहिताः सद्यस्ते ऽभ्युत्थिता गणाः।
अभ्यषिञ्चन् प्रमुदिता लोकानामधिपे सुराः ॥ १५ ॥

तदनन्तर (कुछ कालके बाद) इन्द्र तथा विष्णुके साथ दैत्यगण पुनः वहाँसे शीघ्र ही उठे। उस समय देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक बलिको त्रिलोकेश्वरके पदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ १५ ॥

स तान् स्वधामृतेनाशु पितृत्वे समतर्पयत्।
ब्रह्मा तदमृतं दिव्यं महेन्द्राय प्रयच्छति।
अक्षयं चाव्ययं चैव संवृतस्तेन कर्मणा ॥ १६ ॥

बलिने उन देवताओंको पितृपदपर प्रतिष्ठित करके उन्हें शीघ्र ही स्वधामय अमृतसे तृप्त किया। ब्रह्माजीने वह अक्षय एवं अविकारी अमृत महेन्द्रको दिया। बलिके उस कर्मसे देवेन्द्र सुरभित हो गये ॥ १६ ॥

ततः शङ्खमुपाध्मासीद् द्विषतां लोमहर्षणम्।
पितामहकरोद्भूतं जनितृ प्रथमे पदे ॥ १७॥

तदनन्तर इन्द्रने ब्रह्माजीके हाथसे प्रकट हुए दिव्य शङ्खको, जो प्रमुख पदपर प्रतिष्ठित करनेवाला था, बजाया, वह शत्रुओंके रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ १७॥

तं श्रुत्वा शङ्खशब्दं तु त्रयो लोकाः समाहिताः।
निर्वृतिं परमां प्राप्ता इन्द्रं नाथमवाप्य च ॥ १८॥
सर्वैः प्रहरणैश्चैव संयुक्ता वह्निसम्भवैः।
मन्द्राग्रेषु विहितैर्ज्वलद्भिरिव पावकैः ॥ १९ ॥

उस शङ्ख-ध्वनिको सुनकर तीनों लोकोंके प्राणियोंका मन एकाग्र हो गया। वे इन्द्रको अपना रक्षक पाकर परमानन्दमें निमग्न हो गये। अग्निसे प्रकट हुए और प्रज्वलित पावकके समान प्रकाशित होनेवाले जो समस्त आयुध मन्दराचलके शिखरोंपर विद्यमान थे, उनसे संयुक्त हुए तीनों लोक बहुत ही संतुष्ट हुए ॥ १८-१९ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे भविष्यपर्वणि पौष्करे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत भविष्यपर्वमें पुष्करप्रादुर्भावविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥


द्वात्रिंशोऽध्यायः

दक्ष-यज्ञ-विध्वंस

वैशम्पायन उवाच
ततो महति वृत्तान्ते स्थिते राज्ये महोदये।
देवतानां मनुष्याणां सहवासोऽभवत् तदा ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! तदनन्तर पूर्वोक्त महान् वृत्तान्त घटित होनेपर जब परम अभ्युदयकारी राज्यकी प्रतिष्ठा हो गयी, तब देवता और मनुष्य परस्पर साथ-साथ रहने लगे ॥ १ ॥

एकतः समधीयन्ति सहिताः प्ररुदन्ति च।
स्वयं च भागं गृह्णन्ति यज्ञकर्मणि भारत ॥ २ ॥

भारत ! वे देवता और मनुष्य एक साथ स्वाध्याय करते, परस्पर प्रेमवश एक साथ रोते और यज्ञकर्ममें मनुष्योंद्वारा दिये गये भागको देवता स्वयं आकर ग्रहण करते थे ॥

प्राचेतसं ततो दक्षं दीक्षित्वा वै वृहस्पतिः।
वाजिमेधाय भगवानृषिभिः परिवारितः ॥ ३ ॥

उन्हीं दिनों प्राचेतस दक्षको अश्वमेधयज्ञकी दीक्षा देकर भगवान् वृहस्पति ऋषियोंसे घिरे हुए वहाँ बैठे ॥ ३ ॥

तस्मिन् मातामहे यज्ञे दक्षस्य विदितात्मनः।
शामित्रमकरोद् रुद्रो भागार्थं सह नन्दिना ॥ ४ ॥

म० ६० २७—

८३४श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंश

आत्मज्ञान शून्य मातामह दक्षके उस यज्ञमें नन्दीसहित भगवान् रुद्रने अपने भागके लिये शामित्र कर्म (पशुभूत दक्षकी हिंसाका कार्य) किया ॥ ४ ॥
रुद्रस्यैव हि तद् रूपं द्विधाभूतं तदीप्सया।
जातः परमधर्मात्मा नन्दी पुरुषविग्रहः ॥ ५ ॥
नन्दी भगवान् रुद्रके ही दूसरे रूप हैं, जो उन्हींकी इच्छासे परम धर्मात्मा पुरुष-शरीरसे प्रकट हुए हैं ॥ ५ ॥
तेन योगेन राजेन्द्र यत्तद् ब्रह्म सनातनम्।
विहितं सत्यवचनैस्तेनैव परमात्मना ॥ ६ ॥
राजेन्द्र ! पूर्वोक्त योगके प्रभावसे वह जो प्रसिद्ध सनातन ब्रह्म है, उसीको उन परमात्मा रुद्रने ही वेदवाक्योंद्वारा उस रूपमें प्रकाशित किया था ॥ ६ ॥
सरूपैश्चाप्यरूपैश्च विरूपाक्षैर्घटोदरैः।
ऊर्ध्वनेत्रैर्महाकायैर्विकटैर्वामनैस्तथा ॥ ७ ॥
शिखिभिर्जटिभिश्चैव त्र्यक्षैश्च शङ्कुकर्णभिः।
चीरिभिश्चर्मिभिश्चैव कूटमुद्गरपाणिभिः ॥ ८ ॥
सघण्टाधारिभिश्चैव मुञ्जमेखलधारिभिः।
सहस्तकतकैश्चैव स्वर्णकुण्डलधारिभिः ॥ ९ ॥
सडिण्डिमैः समेरीयैः समृदङ्गैः सवेणुभिः।
एतैः परिवृतो देवो मखं तं समुपारुजत् ॥ १० ॥
भगवान् रुद्रके गणोंमेंसे कुछ रूपवान् थे, कुछ रूप-हीन। कितनोंके नेत्र विकराल रूपवाले थे । कितने ही घटोदर (घड़े-जैसे पेटवाले) थे। कितने ही गणोंके नेत्र ऊपर (सिरपर) थे। कोई विशालकाय थे तो कोई वामन । बहुततेरे बड़े विकट दिखायी देते थे। कितनोंके सिरपर बड़ी-बड़ी चोटियाँ थीं और बहुत-से जटाएँ रखाये हुए थे। किन्हींके तीन आँखें थीं तो किन्हींके खूंटे-जैसे कान थे। कोई चीर (फटे-पुराने वस्त्र) पहने हुए थे तो कोई चमड़े लपेटे रहते थे। कितनोंके हाथोंमें कूट, मुद्गर शोभा पाते थे। कोई घण्टा धारण करते थे तो कोई मूँजकी मेखला पहने हुए थे। कितनोंके हाथोंमें कड़े और कानोंमें सोनेके कुण्डल शोभा पाते थे। कोई डिण्डिम (डंका) पीटते थे तो कोई भेरी (ढाक); कोई मृदङ्ग बजाते थे तो कोई वेणु। ऐसे गणोंसे घिरे हुए महादेवजीने दक्षके उस यज्ञका विध्वंस किया था ॥
सशङ्खमुुरजैश्चापि सतालफलपाणिभिः।
उग्रायुधधरो देवः सपिनाक इवान्तकः ॥ ११ ॥
कितने ही गण शङ्ख और मुरज बजाते थे। कितनोंके हाथोंमें ताड़के फल थे। उस समय भयंकर आयुध एवं पिनाक धारण करनेवाले महादेवजी यमराजके समान जान पड़ते थे ॥ ११ ॥
विरराजाचिर्भिर्दीप्तैर्मखे मखवतां वरः।
कालाग्निरिव दीप्तार्चिर्जगद्दग्धुमिवोद्यतः ॥ १२ ॥
आगकी लपटोंसे उद्दीप्त हुए उस यज्ञमण्डपमें यज्ञ-वानोंमें श्रेष्ठ भगवान् रुद्र सारे जगत्‌को जला डालनेके लिये उद्यत हुई प्रज्वलित शिखावाली प्रलयाग्निके समान शोभा पाते थे ॥ १२ ॥
नन्दी पिनाकपाणिश्च जघ्नुतुर्मखमत्तमम्।
युगान्त इव कालाग्निः क्षिप्रं दग्धुमिवोद्यतः ॥ १३ ॥
नन्दी और पिनाकधारी महादेवजी दोनों ही उस उत्तम यज्ञका नाश कर रहे थे। भगवान् रुद्र प्रलयकालमें समस्त संसारको भस्म करनेके लिये उद्यत हुए अग्निदेवके समान जान पड़ते थे ॥ १३ ॥
यूपमुत्क्षिप्य धावन्ति निशाचरगणास्तथा।
त्रासयन् मुनिसंघांश्च चीरचर्मनिवासिनः ॥ १४ ॥
चीर और चर्म धारण करनेवाले निशाचरगण मुनियोंके समुदायको त्रास देते और यूप उछालते हुए दौड़ रहे थे ॥ १४ ॥
हवींष्यन्ये पिबन्त्येव जिह्वाभिस्ताम्रलोचनाः।
भक्षयन्ति पशूनन्ये रसनान्तावलम्बिभिः ॥ १५ ॥
ताँबे-जैसे नेत्रवाले कितने ही रुद्रगण अपनी जिह्वाओंसे हविष्यौंका पान कर रहे थे। कितने वहाँ पशुओंको चबा रहे थे और वे पशु उनकी जिह्वाके अग्रभागपर लटक रहे थे॥ १५॥
समुचुक्षुरापरे यूपान् पशवः प्रहरन्ति च।
वह्निमध्ये प्रसिञ्चन्ति वारिभिः प्रशमाय च ॥ १६ ॥
दूसरे रुद्रगण यूपोंको ऊपर फेंकते और पशुओंको पीटते थे। कितने ही यज्ञकुण्डमें पानी डालते थे, जिससे वहाँ प्रज्वलित हुई आग बुझ जाय ॥ १६ ॥
सोममन्ये जहुः केचित्नेत्रैस्ताम्राजपोपमैः।
दर्भान् केचिद् विलुम्पन्ति हस्तैः पद्मदलप्रभैः ॥ १७ ॥
कोई ताँबे और जपा-कुसुमके समान लाल नेत्रोंसे देखते हुए सोमरसको नष्ट करने लगे। कोई प्रफुल्ल कमल-दलके समान कान्तिवाले हाथोंसे वहाँ बिछे हुए कुशोंको चौपट करने लगे ॥ १७ ॥
वभञ्जिरे च यूपाग्रान् कलशांश्चापि चिक्षिपुः।
विच्छिदुः काञ्चनान् वृक्षाञ्छोभार्थमुपकल्पितान् ॥ १८ ॥
किन्हींने यूप तोड़ डाले, किन्हींने कलश उठाकर फेंक दिये तथा कुछ गणोंने वहाँ शोभाके लिये बनाये गये सुवर्णमय वृक्षोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ १८ ॥
विभिदुश्चैव वाणैस्ते मुमुचुश्च हिरण्मयान्।
लुलुपुश्चैव पात्राणि ममन्थुरणीमपि ॥ १९ ॥
कुछ गणोंने बाणोंद्वारा सुवर्णमय वृक्षोंको विदीर्ण कर

भविष्यपर्व ] द्वात्रिंशोऽध्यायः [ ८३५

दिया तथा उनपर सुनहरे बाण छोड़े। कितनोंने यज्ञपात्र तोड़ डाले और अरणीको भी मथ डाला ॥ १९ ॥

अरुजंश्चैव प्राग्वंशं लुलुपुश्च समाहिताः ।
चखादिरे पुरोडाशान् नखाग्रैश्च चकर्तिरे ॥ २० ॥
कुछ गणोंने पत्नी-शाला उजाड़ दी और वहाँके सब सामान लूट लिये। यह सब कार्य वे बड़ी सावधानीसे कर रहे थे। उन्होंने पुरोडाश खा लिये और उनके रक्षकोंको अपने नखोंके अग्रभागसे बकोट लिया ॥ २० ॥

एवं दिवा च रात्रौ च भिद्यमानो महामखः ।
चुक्रोश च महानादान् भिद्यमान इवार्णवः ॥ २१ ॥
इस प्रकार जब दिनमें और रातमें भी पीड़ा दी गयी, तब वह महान् यज्ञ मूर्तिमान् होकर मथे जाते हुए समुद्रके समान बड़े जोर-जोरसे आर्तनाद करने लगा ॥ २१ ॥

धनुः सशरमादाय पूर्वदत्तं स्वयंभुवा ।
कृतं कीचकवेणुभ्यां समरे सुमहारथः ॥ २२ ॥
प्रतिगृह्य महादेवः स शरैः समयोजयत् ।
धनुर्विगृह्य जानुभ्यां जघान स महाक्रतुम् ॥ २३ ॥
तब महारथी महादेवजी दोनों घुटनोंके बलपर खड़े हो गये और साक्षात् ब्रह्माजीने जिसे बाणसहित पहलेसे दे रखा था तथा जो 'कीचक और वेणु' नामक बाँसोंसे बनाया गया था, उस धनुषको हाथमें ले उसे झुकाकर उन्होंने उसपर बाण रक्खा तथा उस महायज्ञको उसका निशाना बनाया ॥ २२-२३ ॥

स विद्धस्तेन बाणेन खं समुत्पतितः क्रतुः ।
मृगो भूत्वा नर्दमानो ब्रह्माणमुपधावति ॥ २४ ॥
उस बाणसे घायल होकर वह यज्ञ आकाशमें उछला और मृग होकर आर्तनाद करता हुआ ब्रह्माजीके पास दौड़ा गया ॥ २४ ॥

शरेणाभिहतस्त्राणं न लेभे प्रशमं भुवि ।
शरणार्थी ह्ययं प्राप्तः शरेणान्तर्गतेन च ॥ २५ ॥
बाणसे आहत हो जानेके कारण उसे भूतलपर न तो कहीं रक्षाका आश्वासन मिला और न चित्तमें शान्ति ही प्राप्त हुई। अतः वह शरणार्थी होकर शरीरमे धँसे हुए बाणके साथ ही ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित हुआ ॥ २५ ॥

तमुवाच मृगं ब्रह्मा शुभं सानुनयं वचः ।
स्वरेणोत्तमवीर्येण गम्भीरेण सुभाषिणा ॥ २६ ॥
ब्रह्माजीने उस मृगसे उत्तम बलसे युक्त, गम्भीर एवं सुन्दर भाषण करनेवाले स्वरसे यह शुभ एवं अनुनयपूर्ण बात कही—॥ २६ ॥

एवंरूपो नभसि त्वं भविष्यसि महामृगः ।
विजितश्च त्रिपर्वेण शरेणानतपर्वणा ॥ २७ ॥
'महायश ! तुम झुकी हुई गाँठ और तीन पर्ववाले बाणसे पराजित हो इसी तरह महान् मृगके रूपमें आकाशमें स्थित रहोगे ॥ २७ ॥

तिष्ठन् नक्षत्रशिरसि सह रुद्रेण नित्यशः ।
सोमेन सह संयुको ह्यक्षयेणाव्ययेन च ॥ २८ ॥
'तुम नक्षत्रके सिरपर स्थित हो 'मृगशिरा' कहलाओगे और रुद्र (आर्द्रा) के साथ तुम्हारा सदा सांनिध्य बना रहेगा। तुम अक्षय अव्यय सोमके साथ संयुक्त रहोगे (सोम ही तुम्हारे देवता होंगे) ॥ २८ ॥

दिवि संचारभूतो वै ताराभिः सह संगतः ।
ज्योतिर्भूतो ज्योतिषां त्वं ध्रुवश्चैव महाध्रुवः ॥ २९ ॥
'आकाशमें तुम्हें संचार प्राप्त होगा। तुम ताराओंके साथ मिले रहोगे। तुम ज्योतियोंके बीच ज्योतिर्मय होकर प्रकाशित होओगे तथा 'ध्रुव' एवं 'महाध्रुव' बने रहोगे ॥ २९ ॥

यच्चैतद् रुधिरं दिव्यं क्षतजादभिनिःसृतम् ।
नभस्युत्पतितं चैव प्रवेगेन प्रधावतः ॥ ३० ॥
क्षतजं बहुवर्णं च क्षेत्रं मण्डलसंज्ञितम् ।
निमित्तभूतं भूतानां वर्षे वर्षप्रदं तथा ॥ ३१ ॥
'तुम्हारे शरीरमें जो बाणके आघातसे घाव हो गया है और इससे जो यह दिव्य रुधिर निकला है, तुम्हारे वेगपूर्वक दौड़नेसे आकाशमें भी उछला है और अनेक रंगोंमें परिणत हो गया है; अतः यह मण्डल नामसे प्रसिद्ध क्षेत्र होगा और वर्षाऋतुमें प्राणियोंके लिये निमित्त (वर्षासूचक लक्षण) बनकर वृष्टि प्रदान करनेवाला होगा ॥ ३०-३१॥

सुखं दुःखं च भूतानां दर्शने सम्प्रवर्तते ।
इन्द्रियश्रवणाच्चैव नभसीन्द्रायुधोऽभवत् ॥ ३२ ॥
इसके दर्शनसे प्राणियोंको सुख और दुःख होता है। यह नेत्रेन्द्रियका विषय सुना गया है। अतः लोकमें इन्द्रायुध (अथवा इन्द्रधनुष) के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३२॥

चक्षुषी मानुषे राजन् विस्मयात् समवैक्षत ।
अद्भुतं बहुचित्रं च मनसा सम्प्रकल्पितम् ॥ ३३ ॥
राजन् ! पहले-पहल जब यह प्रकट हुआ, तब मनुष्योंकी आँखोंने बड़े विस्मयसे इसकी ओर देखा। यह अद्भुत, विचित्र तथा ब्रह्माजीके मनसे कल्पित है ॥ ३३ ॥

न तु रात्रौ प्रदृश्येत खे सग्रहाणि संज्ञितम् ।
दिनस्यैव सदा त्वग्रे महत्कार्यं प्रदृश्यते ॥ ३४ ॥
भूमावेव समुत्तिष्ठेदाकाशे तु विलीयते ।
यह रातमे नहीं दिखायी देता। आकाशमें जबतक सूर्यकी ज्योति रहती है, तभीतक इसका भान होता है। यह महान् कार्य सदा दिनके आगे ही दृष्टिगोचर होता है। यह भूतलपर ही उठता है और आकाशमें विलीन होता है ॥ ३४½ ॥