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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

दन्तपत्रेण विभ्राजमानाम्, कौस्तुभभमस्तिस्तबकेनेव च श्रवणलग्ने- नाशोककिसलयेनालंकृताम्, महता मत्तमातङ्गमदमयेन तिलकेनादृश्य- च्छत्रच्छायामण्डलेनेवाविरहितललाटाम्, आपादतलीदासीमन्ताञ्च च- न्द्रातपधवलेन चन्दनेनादिराजयशसेव धवलीकृताम्, धरणीतलचुम्बि- नीभिः कण्ठकुसुममालाभिः सरिद्भिरिव सागराधिष्ठात्रीभिरधिष्ठिताम्, मृणालकोमलैरवयवैः कमलसंभवत्वमनक्षरमाचक्षाणां श्रियमपश्यत् । असम्भ्रान्तश्च पप्रच्छ—'भद्रे ! कासि, किमर्थं वा दर्शनपथमागतासि ?' इति । सा तु स्त्रीजनविरुद्धेनावष्टम्भेनाभिभवन्तीवाभाषत तम्—'वीर ! विद्धि मां नारायणोरःस्थलीलीलाविहारहरिणीम्, पृथुभरतभगीरथादि- राजवंशपताकाम्, सुभटभुजजयस्तम्भविलासशालभञ्जिकां, रणरु- धिरतरङ्गिणीतरङ्गक्रीडादोहददुर्ललितराजहंसीम्, सितनृपच्छत्रषण्डशि-

च्छादितयोदञ्चन्त्या उत्तरणमिवांशुकाङ्कञ्चयत इति । वर्ण्याभिप्रायेण त्रिपथेगेति नाम । मदे दाने लग्नः सक्तः । समद इत्यर्थः । श्रीर्हस्तिपृष्ठेन यातीति मदान्धेत्या- द्युक्तम् । हस्तिवाहित्वाल्लक्ष्म्या एवमुक्तम् । धरणीतलचुम्बिनीभिर्मालाभिः, सरि- द्भिश्च । हरिणीमिति । हरिणी किल स्थाल्या लीलया विहरति । वंशोऽन्वयेऽथ वंशे वेणौ पताकोत्क्षिप्यते । सुभटेत्यादिविशेषणेन वीरातुरागित्वमस्या दर्शितम् । स्तम्भे च शालभञ्जिकोत्कीर्णपुत्रिका क्रियते । षण्डो वनम्, तत्र शिखण्डिनी मयूरी ।

का किरणें उस पर डोल रही थीं । उसके हाथों में स्वाभाविक लालिमा थी लेकिन ऐसा लगता था कि वह मतवाले गजराज के मस्तक पर रहने वाले चन्द्र का दूसरा टुकड़ा हो । कान में अशोक का किसलय कौस्तुभमणि की किरणों के गुच्छे की भाँति लग रहा था । हाथी के मद का तिलक उसके ललाट पर तिरोहित छत्र की छाया के समान प्रतीत हो रहा था । पैर से ललाट तक चाँदनी के समान उज्ज्वल चन्दन से चर्चित होकर आदिराज मनु के यश के समान धवल हो रही थी । फूल की मालाएँ उसके कण्ठ से जमीन तक लटक रही थीं, मानों वह समुद्र पर्यन्त जाने वाली नदियों से युक्त हो । मृणाल के समान कोमल अपने अङ्गों से बिना शब्द के अपने को कमल से उत्पन्न बता रही थी । उसके विषय में स्थिर होकर राजा ने पूछा—'भद्रे, तुम कौन हो, क्यों सामने आई हो ?' वह स्त्री-जाति के विरुद्ध गर्व से अभिभूत करती हुई सी बोली—'वीर, तू मुझे नारायण के वक्षःस्थल में हरिणी के रूप में लीलानिहार करने वाली लक्ष्मी समझ । मैं पृथु, भरत, भगीरथ, मनु आदि के वंशों की पताका हूँ । योद्धाओं की भुजाओं के जयस्तम्भ में विलसित होने वाली शालभञ्जिका ( पत्थर की उत्कीर्ण मूर्ति) हूँ । युद्ध में बहती हुई रक्त की नदियों की तरङ्गों में क्रीडा का सुख अनुभव करने वाली मैं राजहंसी हूँ । राजाओं

१६० हर्षचरितम् खण्डिनीम् , अतिनिशितशस्त्रधारावनभ्रमणविभ्रमसिंहीम् , असिधारा- जलकमलिनीं श्रियम् । अपहृतास्मि तवामुना शौर्यरसेन । याचस्व । ददामि ते वरमभिलषितम्' इति । वीराणां त्वपुनरुक्ताः परोपकाराः । यतो राजा तां प्रणम्य स्वार्थवि- मुखो भैरवाचार्यस्य सिद्धिं ययाचे । लक्ष्मीस्तु देवी प्रीततरहृदया विस्ती- र्यमाणेन चक्षुषा क्षीरोदेनेवोपरि पर्यस्तेनाभिषिञ्चन्ती भूपालम् 'एवमस्तु' इत्यब्रवीत् । अवादीच्च पुनः—'अनेन सत्त्वोत्कर्षेण भगवच्छिवभट्टारक- भक्त्या चासाधारणया भवान्भुवि सूर्याचन्द्रमसोस्तृतीय इवाविच्छिन्नस्य प्रतिदिनमुपचीयमानवृद्धेः शुचिसुभगमान्यसत्यत्यागशौर्यशौण्डपुरुषप्रका- ण्डप्रायस्य महतो राजवंशस्य कर्ता भविष्यति । यस्मिन्नुत्पत्स्यते सर्व- द्वीपानां भोक्ता हरिश्चन्द्र इव हर्षनामा चक्रवर्ती त्रिभुवनविजिगीषुर्द्वितीयो मान्धातेव यस्यायं करः स्वयमेव कमलमपहाय ग्रहीष्यति चामरम्' इति वचसोऽन्ते तिरोबभूव । अपुनरुक्ता भूयो भूयः क्रियमाणापि चेत्यर्थः । परोपकारकरणपरत्वेन प्रीतत्वम्। अभिषिञ्चन्तीति । अभिषेको राज्ञ उचितः । शौण्डः प्रसक्तः । प्रकाण्डशब्दः प्रशंसा- वाची । द्वितीयः स्पर्द्धावान् । के उज्ज्वल आतपत्रों में मढ़ी जाने वाली मैं मोरनी हूं। शस्त्रों की तेज धारा के वनों में विहरण करने वाली सिंहिनी हूँ। तलवारों के धाराजल में खिलने वाली मैं कमलिनी हूँ। तेरे इस पराक्रम को देखकर खिंच आई हूँ। माँग, तुझे अभिलषित वर दूँगी।' वीर परोपकार की प्रतिज्ञा करके कभी नहीं मुकरते। स्वार्थ से विमुख होकर राजा ने प्रणाम करके भैरवाचार्य की सिद्धि के लिए वर माँगा। लक्ष्मी प्रसन्न होकर एकटक उसे देखने लगी और मानों दूध से अभिषेक करती हुई राजा से बोली—'यही हो।' और फिर कहा—'राजन्, अपने बल के इस उत्कर्ष से और भगवान् शिव भट्टारक की असाधारण भक्ति से तेरा महान् राजवंश होगा जो सूर्य और चन्द्रमा के बाद तीसरा स्थान प्राप्त करेगा। अविच्छिन्न चलता हुआ प्रतिदिन बढ़ता ही जायगा और उस वंश में प्रायः पवित्र, सुभग, मान्य, सत्य, त्याग और वीरता में समर्थ पुरुष होंगे। उसी वंश में हरिश्चन्द्र के समान समस्त द्वीपों पर राज्य करने वाला चक्रवर्ती हर्ष उत्पन्न होगा जो दूसरे मान्धाता के समान त्रिभुवन को जीत लेने की इच्छा रखने वाला होगा। स्वयं मेरा यह हाथ कमल को छोड़कर उसका चँवर उठाएगा।' यह कहकर लक्ष्मी अन्तर्हित हो गई।

तृतीय उच्छ्वासः १६१

भूमिपालस्तु तदाकर्ण्य हृदयेनातिमात्रमप्रीयत । भैरवाचार्योऽपि तस्या देव्यास्तेन वचसा कर्मणा च सम्यगुपपादितेन सद्य एव कुन्तली किरीटी कुण्डली हारी केयूरी मेखली मुद्री खड्गी च भूत्वावाप विद्या- धरत्वम् । प्रोवाच च—'राजन् ! अदूरव्यापिनः फल्गुचेतसामलसानां मनोरथाः । सतां तु भुवि विस्तारवत्यः स्वभावेनैवोपकृतयः । स्वप्नेऽप्य- संभावितां दातुमिमां दक्षिणां क्षमः कोऽन्यो भवन्तमपहाय । संपत्कणि- कामपि प्राप्य तुलेव लघुप्रकृतिरुन्नतिमायाति । त्वदीयैर्गुणैरुपकरणीकृ- तस्य त्वत्त एव च लब्धात्मलाभस्य निर्लज्जतेयमस्य मूढहृदयस्य । तदि- च्छामि येन केनचित्कार्यलवोपपादनोपयोगेन स्मारयितुमात्मानम्' इति । प्रत्युपकारदुष्प्रवेशास्तु भवन्ति धीराणां हृदयावष्टम्भाः । यतस्तं राजा 'भवत्सिद्ध्यैव परिसमाप्तकृत्योऽस्मि । साधयतु मान्यो यथासमीहितं स्थानम्' इति प्रत्याचचक्षे । तथोक्तश्च भूभुजा जिगमिषुः सुदृढं समालिङ्ग्य टीटिभादीन् कुवल- यवनेनेवावश्यायशीकरस्राविणा सास्रेण चक्षुषा वीक्षमाणः क्षितिपतिं

कुण्डलं कर्णवेष्टनम् । हारो मुक्ताहारः । केयूरमङ्गदं दोर्भूषा । फल्गुसारम् । प्रत्याचचक्षे पर्यहार्षीत् ।

यह सुनकर राजा हृदय में अत्यन्त प्रसन्न हुआ । लक्ष्मी के उस वचन से और अपने भलो भाँति किए कर्म से भैरवाचार्य भी शीघ्र सुन्दर बाल, मुकुट, कुण्डल, हार, केयूर, करधनी, मुद्गर, दण्ड और खड्ग धारण करके विद्याधर-योनि को प्राप्त हुआ । भैरवाचार्य ने राजा से कहा—'राजन्, सारहीन चित्त वाले मन्द लोगों के मनोरथ दूर तक नहीं होते, लेकिन सज्जनों के उपकार पृथिवी में फैले हुए होते हैं । जिसकी सम्भावना स्वप्न में भी नहीं की जा सकती ऐसी दक्षिणा आपके अतिरिक्त कौन दे सकता था ? सम्पत्ति के कण को पाकर तराजू के समान छोटी प्रकृति वाले लोग ऊपर उठ जाते हैं । आपके ही गुणों को उपकरण बनाकर आपसे ही जो मैं लाभवान् बना उससे ही मूढहृदय होकर निर्लज्ज बन गया हूँ । इसलिए अपने आपको स्मरण रखने के लिए थोड़ा भी कार्य करना चाहता हूँ ।' धीर पुरुषों के हृदय की गम्भीरता में प्रत्युपकार का प्रवेश करना कठिन होता है । जैसा कि राजा ने उत्तर दिया—'आपकी सिद्धि हो जाने में ही मैं कृतकृत्य हो गया । अब आप अपने अभिलषित स्थान में जाँय ।' इस प्रकार राजा के कहने पर भैरवाचार्य जाने के लिए तैयार हो गया । टीटिभ आदि का आलिङ्गन करके ओस टपकाते हुए कुवलयवन के समान आँसू से भरी आँखों

१६२ हर्षचरितम् पुनरुवाच—'तात ! ब्रवीमि यामीति न स्नेहसदृशम् । त्वदीयाः प्राणा इति पुनरुक्तम् । गृह्यतामिदं शरीरकमिति व्यतिरेकेणार्थकरणम् । तिलशः क्रीता वयमिति नोपकारानुरूपम् । बान्धवोऽसीति दूरीकरणमिव । त्वयि स्थितं हृदयमित्यप्रत्यक्षम् । त्वद्विरहानुकारिणी कारणेयं न सिद्धिरित्य- श्रद्धेयम् । निष्कारणस्तवोपकार इत्यनुवादः । स्मर्त्तव्या वयमित्याज्ञा । सर्वथा कृतघ्नालापेष्वसज्जनकथासु च चेतसि कर्तव्योऽयं स्वार्थनिष्ठुरो जनः' इत्यभिधाय वेगच्छिन्नहारोच्छलितमुक्ताफलनिकरताडिततारागणं गगनतलमुत्पपात । ययौ च सीमन्तितग्रहग्रामः सिद्धयुचितं धाम । श्री- कण्ठोऽपि—'राजन् ! पराक्रमक्रीतः कर्तव्येषु नियोगेनानुग्राह्यो ग्राहित- विनयोऽयं जनः' इत्यभिधाय राजानुमोदितस्तदेव भूयो भूविवरं विवेश । यामीत्यादिवक्रोक्त्या चेतः स्थितं सर्वं व्याहरति--न स्नेहसदृशमिति । स्नेहानु- रूपनिषेधेन स्नेह इव सुतरामाविष्कृत एव । उक्तं हि—'प्रतिषेध इवेष्टस्य यद्विशे- षाभिधित्सया । आक्षेप इति तं सन्तः शंसन्ति कवयः सदा ॥' इति । एवं त्वदीयाः प्राणा इत्यादौ । व्यतिरेकः पृथग्भागः । आवां किलाैक एवार्थः । तिलश इति । यावा- न्किलायमुपकारो बहुगुणस्तावन्तो नावयवास्तिलशो विभागेनास्माकम् । कारणा यातना । सीमन्तितो द्विधाकृतः । ग्रामः समूहः । से देखता हुआ राजा से फिर बोला—'तात, अगर कहूं कि जाता हू तो यह स्नेह के सदृश बात नहीं है। 'ये प्राण तुम्हारे हैं' इसमें पुनरुक्ति है। 'इस तुच्छ शरीर को स्वीकार करो' यह तो भिन्नता की बात हो जाती है। 'हमें तुमने तिल-तिल खरीद लिया' यह बात उपकार के अनुरूप नहीं, 'तुम हमारे बान्धव हो' यह तो और भी दूर कर देता है। 'यह हृदय तुम्हीं में है' इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं । 'तुम्हारा विरह कर देने वाली हमारी यह सिद्धि यातना ही हो गई' यह बात श्रद्धा के योग्य नहीं। 'तुमने बिना किसी कारण के मेरा उपकार किया' यह तो वही बात हुई। 'हमें याद रखना' यह आज्ञा हो जाती है। जब कृतघ्नों की चर्चा होगी और असज्जनों की कथा का प्रसङ्ग उपस्थित होगा तब स्वार्थ से निष्ठुर इस जन को अवश्य ध्यान में लाना।' यह कहकर भैरवाचार्य जोर से आकाश की ओर उड़ा । उसके हार के मोती टूटकर तारों में आघात करने लगे । तारों के समूह को दो भागों में बाँटता हुआ वह अपनी सिद्धि के उचित स्थान में चला गया। श्रीकण्ठ नाग ने कहा—'राजन्, पराक्रम से वश में करके नम्र किए गए इस जन को समय समय पर कार्यों में नियुक्त करके अनुगृहीत करेंगे।' यह कहकर और राजा का अनुमोदन प्राप्त करके उसने उसी विवर में प्रवेश किया ।

तृतीय उच्छ्वासः १६३ नरपतिस्तु क्षोणभूयिष्ठायां क्षपायां, प्रवातुमारब्धे प्रबुध्यमानकमलि- नीनिःश्वाससुरभौ, वनदेवताकुचांशुकापहरणपरिहासस्वेदिनीव साव- श्यायशीकरे परिमलाककृष्टमधुकृति कुमुदनिद्रावाहिनि निशापरिणतिजडे तुषारलेशिनी वनानिले, विरहविधुरचक्रवाकचक्रनिःश्वसितसंतापिताया- मिवापरजलनिधिमवतरन्त्यां त्रियामायां, साक्षादागतलक्ष्मीविलोकनकु- तूहलिनीष्विव समुन्मीलन्तीषु नलिनीषु, उन्निद्रपक्षिणि क्षरति कुसुमवि- सरमिव तुहिनकणनिकरं मृदुपवनलासितलते कानने, कमललक्ष्मीप्रबो- धमङ्गलशङ्खेष्विव ॰ रसत्स्वन्तर्बद्धध्वनमधुकरेषु मुकुलायमानेषु कुमुदेषु, उज्जिहानरविरथवाजिविसृष्टैः प्रोथपटुपवनैः प्रोत्सार्यमाणास्विव वारुण्यां ककुभि पुञ्जीभवन्तीषु श्यामालताकलिकासु तारकासु, मन्दरशिखराश्र- यिणि मन्दानिललुलितकल्पलतावनकुसुमधूलिविच्छुरित इव धूसरीभवति सप्तर्षिमण्डले, सुरवारणाङ्कुश इव च्युते गलति तारामये मृगे त्रीनपि टीटिभादीन्गृहीत्वा नागयुद्धव्यतिकरमलीमसानि शुचिनि वनवापीपयसि


वनेश्यादौ। अस्मिन्नस्मिन्सति नरपतिर्नगरं विवेशेति सम्बन्धः। क्षीणभूयिष्ठायां बहुतरं क्षीणायाम्। तुषारस्य शीतस्य लेशाः सन्ति तत्र तस्मिन्नीषच्छीतले। संतापितायामिवेति। संतापितश्च शीतलंस्थानमवतरन्ति। कुसुमविसरमिवेति समो- पमा। लासिता नर्तिता। उज्जिहान उद्गच्छन्। श्यामा रात्रिः, सैव लता व्रततिः।

अब तक रात बहुत ढल चुकी थी। जागती हुई कमलिनों के निश्वास की सुगन्ध से भरी हुई, वनदेवता के स्तन के वस्त्र को उड़ा लेने के परिहास में तर बतर हुई सी और तुषार के फुहारों से युक्त, सुगन्ध से भौरों को खींचती हुई और कुमुदों को सुलाती हुई, रात्रि के अवसान में ठण्डी वन की हवा बहने लगी। विरह से पीड़ित चक्रवाकों के निःश्वास से सन्ताप का अनुभव करती हुई रात पश्चिम समुद्र में उतरने लगी। मानों साक्षात् आई हुई लक्ष्मी को देखने के कुतूहल से कमलिनियाँ आँखें खोलने लगीं। जंगल के पक्षी जग पड़े। फूल के रूप में ओस पड़ रही थी। हल्की हवा से लताएँ नृत्य करने लगीं। कमल में निवास करने वाली लक्ष्मी के जागरण के लिए मंगल शंख के समान भीतर में बँधे हुए भौरे गुंजार रहे थे। कुमुद बन्द होने लगे। श्यामा लता की कली के समान तारे ऊपर आते हुए सूर्य के रथ के घोड़ों की थुथुन की तेज हवा से उड़ाये गए की तरह पश्चिम दिशा में पुंजीभूत होने लगे। मन्दराचल के शिखर पर पहुँचा हुआ सप्तर्षिमण्डल मन्द हवा से काँपती हुई कल्पलता के फूलों की धूल से धूसरित होने लगा। ऐरावत के अंकुश के समान मृगशिरा नक्षत्र नीचे चला गया। तब राजा ने १३ ह० च०

. १६४ हर्षचरितम् प्रक्षाल्याङ्गानि नगरं विवेश । अन्यस्मिन्नहनि तेषामात्मशरीरानन्तरं स्नानभोजनाच्छादनादिना प्रीतिमकरोत् । कतिपयदिबसापगमे च परिव्राड् भूभुजा वार्यमाणोऽपि वनं ययौ । पातालस्वामिकर्णतालौ तु शौर्यानुरक्तौ तमेव सिषेवाते । संपादितमनो- रथातिरिक्तविभवौ च सुभटमण्डलमष्ये निष्कृष्टमण्डलाग्रौ समरमुखेषु प्रथममुपयुज्यमानौ कथान्तरेषु चान्तरान्तरा समादिष्टौ विचित्राणि भैरवाचार्यचरितानि शैशववृत्तान्तांश्च कथयन्तौ तेनैव सार्धं जरामा- जग्मतुरिति । इति महाकविश्रीबाणभट्टकृते हर्षचरिते राजदर्शनं नाम तृतीय उच्छ्वासः । प्रियङ्गुलतिका मकरिका। तारामयो मृगशीर्षस्त्रितारोऽङ्कुशाकारः । आत्मशरीरानन्तरं स्नानेति । आत्मशरीरमनन्तरं यस्य तादृशेन स्नानभोजनाच्छादिना । तेषु कृत्वा पश्चादात्मनः करोतीत्यर्थः । शौर्यानुरक्ताविति न भोगलोलुभौ । अतिरिक्तोऽधिकः । मण्डलाग्रः खङ्गः । अन्तरान्तरा मध्ये मध्ये । कथयन्ताविति स्थिरप्रीतिसिद्धये ॥ इति श्रीशंकरकविरचिते हर्षचरितसंकेते तृतीय उच्छ्वासः । टीटिभ आदि तीनों को साथ लेकर नाग से युद्ध करने के कारण मलिन अङ्गों को वन की बावली के पवित्र जल में साफ कर नगर में प्रवेश किया । दूसरे दिन अपने से पहले उन्हें स्नान, भोजन और वस्त्र आदि से प्रसन्न किया । कुछ दिनों के बाद राजा के रोकने पर भी परिव्राजक टीटिभ वन में चला गया । उसकी वीरता में अनुराग करने वाले पातालस्वामी और कर्णताल दोनों राजा के पास ही रह गए । राजा ने उन दोनों के लिए इच्छा से ज्यादा धन दिया । सुभट मण्डल के बीच में उत्कृष्ट खड्ग धारण करने वाले और सेना के प्रधान नियुक्त हो गए। बातचीत के अवसर पर बीच बीच में राजा के पूछने पर भैरवाचार्य के विचित्र कार्य और बाल्यकाल के वृत्तान्त कहते रहते थे । क्रम से राजा के साथ वे दोनों भी बूढ़े हो गए । हर्षचरित तृतीय उच्छ्वास समाप्त ।

चतुर्थ उच्छ्वासः योगं स्वप्नेऽपि नेच्छन्ति कुर्वते न करग्रहम्। महान्तो नाममात्रेण भवन्ति पतयो भुवः ॥ १ ॥ सकलमहीभृत्कम्पकृदुत्पद्यत एक एव नृपवंशे । विपुलेऽपि पृथुप्रतिमो दन्त इव गणाधिपस्य मुखे ॥ २ ॥ अथ तस्मात्पुष्यभूतेर्द्विजवरस्वेच्छागृहीतकोषो नाभिद्म इव पुण्ड- रीकेक्षणात्, लक्ष्मीपुरःसरो रत्नसंचय इव रत्नाकरात्, गुरुबुधकविक- योगमित्यादिना प्रसिद्धाप्रस्तुतवैलक्षण्यमुच्यते । भूपतीनां योगो युक्तिः । गूढप्रत्याहाररसादनादिच्छेत्यर्थः, संबन्धश्च । करग्रहो दण्डग्रहणम्, विवाहश्च । नाममात्रेणेति । नामैव तेषां श्रुत्वा भुवनं कम्पत इत्यर्थः । अर्थशून्येन सकलेनेत्या- दिना भाविनी हर्षोत्पत्तिः सूचिता ॥ १ ॥ महीभृद्भिरपि कम्पो वेपथुः, चलनं च । पृथुरादिराजः विस्तीर्णश्च । प्रतिमा सादृश्यम्, दन्तकोशश्च । दन्त इवेति । दन्तोऽप्यंको गणाधिपस्य मुखे, समूहाधि- पत्यप्रदाने च ॥ २ ॥ अथेत्यादौ । राजवंशो निर्जगामेति संबन्धः । द्विजवरा विप्रोत्तमाः । ब्रह्मा च द्विजोत्तमः । कोशो गञ्जः, कर्णिका च । पुण्डरीकेक्षणः कमलोचनः, विष्णुश्च । लक्ष्मीः पुरःसरा यस्य लक्ष्मीपुरःसरः । ‘जातौ जातौ यदुत्कृष्टं तद्रत्नमभिधीयते’ । मणयश्च रत्नानि । गुरव उपदेष्टारः । बुधाः पण्डिताः । कवयः काव्यकृतः । कला- महान् लोग स्वप्न में भो योग अर्थात् शत्रु से छल-कपट की युक्ति नहीं सोचते और कर अर्थात् दण्ड भी नहीं देते । इस प्रकार वे नाममात्र ही पृथ्वी के पति हो जाते हैं । ( पति होकर स्वप्न में भो योग अर्थात् मिलन नहीं चाहते और करग्रहण अर्थात् विवाह नहीं करते । इस प्रकार केवल नाम से पति बन जाते हैं ) ॥ १ ॥ बहुत बड़े राजवंश में पृथु सदृश एक ही कोई उत्पन्न हो जाता है जो समस्त राजाओं को भय से कम्पित कर देता है। जैसे गणेशजी का एक ही विशाल दाँत सारे पर्वतों को उखाड़ फेंकता है ॥ २ ॥ जैसे विष्णु से ब्रह्मा जी द्वारा स्वेच्छा से अधिष्ठित मध्य भाग वाला नाभि-कमल ( ब्राह्मणश्रेष्ठों द्वारा अपनी इच्छा के अनुसार ग्रहण की गई धन-सम्पत्ति वाला राजवंश ) निकला। जैसे समुद्र से लक्ष्मी को आगे करके रत्नसमूह ( लक्ष्मी से युक्त राजवंश ) निकला। जैसे उदयाचल से गुरु ( बृहस्पति ), बुध, कवि ( शुक्र ), कलाभृत् ( चन्द्र

१६६ हर्षचरितम् लाभृत्तेजस्विभूनन्दनप्रायो ग्रहगण इवोदयस्थानात् महाभारवाहनयोग्यः सागर इव सगरप्रभावात्, दुर्जयबलसनाथो हरिवंश इव शूराभ्र्जेगाम राजवंशः । यस्मादविनष्टधर्मधवलाः प्रजासर्गा इव कृतमुखात्, प्रतापा- क्रान्तभुवनाः किरणा इव तेजोनिधेः, विग्रहव्याप्तदिश्रुखा गिरय इव भूसृत्प्रवरात्, धरणिधारणक्षमा दिग्गजा इव ब्रह्मकरात्, उदधीन्पातुमु- द्यता जलधरा इव घनागमात्, इच्छाफलदायिनः कल्पतरव इव नन्द- नात्, सर्वभूताश्रया विश्वरूपप्रकारा इव श्रीधरादजायन्त राजानः । वन्तो गीतादिज्ञाः । तेजस्विनः शूराः । भूनन्दना राजानः; इतरत्र,-गुरुर्बृहस्पतिः । उदयः प्रभावोऽपि । महाभारो भूपालनरूपो विजयरूपो वा तस्य निर्वहणे योग्यः । सगरवत्प्रभावो यस्य तस्माद्राज्ञः, सगराणां च यः प्रभावस्तस्मात् । 'प्रभवात्' इति पाठे सगरवत्प्रकृष्टो भव उत्पत्तिर्यस्य तस्मात्; अन्यत्र,-सगरस्य यः प्रभवस्तस्मा- दिति व्याख्या । दुर्जयो दुरभिभवः । बलं प्राणाः सैन्यं वा तेन युक्तः । ततः कर्म- धारयः; अन्यत्र,-दुर्जयोऽजितो विष्णुः, बलो हलधरः, ताभ्यां सनाथा । शूराद्वि- क्रान्तात्, शूरश्च यदूनां राजा तस्मात् । अविनष्टेन पूर्णेन । धवलाः शुक्लाः । अवि- नष्टधर्मान्धवांश्चाम्तितीति वा । कृतमुखात्संसकृतात्, कृतयुगादेश्च । प्रताप आतपः, रिपुभयजननी वार्ता च । विग्रहो विरोधः, देहश्च । भूभृतां राज्ञाम्, भूधराणां च । धारणं पालनम्, उद्वहनं च । ब्रह्म करोतीति ब्रह्माकरस्तस्मात् । सामानि गायतो ब्रह्मणः करात्करिण उत्पन्ना इति वार्ता । पातुं रक्षितुम्, ग्रासीकर्तुं च । घन आगम उपदेशो यस्य, घनागमश्च वर्षाकालः । नन्दयतीति नन्दनः, देवोद्यानं च । सर्वेषां भूतानां प्राणिनामाश्नया आश्रयणीयाः, सर्वस्य वा भूतस्याश्रयाः, सर्वेषां वा भूताः पारमार्थिका अत एवाश्रयणीयाः । श्रीधरो हरिरपि । तेजस्वी (सूर्य), भूनन्दन (मंगल) आदि ग्रहों का समुदाय निकला (उपदेश देने वाले गुरु, विद्वान्, कवि, कलावन्त, शूर और पृथिवी को आनन्दित करने वाले राजाओं आदि से युक्त राजवंश) निकला । जैसे राजा सगर के प्रभाव से भारवान् वस्तुओं का वहन करने वाला सागर (पृथिवी के पालनरूप महान् भार का वहन करने वाला राजवंश) निकला । जैसे शूर नामक यदुराज से दुर्जय अर्थात् विष्णु और बल अर्थात् बलराम से युक्त हरिवंश (अजेय सैन्य-बल वाला राजवंश) निकला । वैसे ही पुष्पभूति से एक राजवंश^१ चला । विनष्ट न होने वाले धर्म द्वारा उज्ज्वल प्रजा के निर्माण जैसे सतयुग से हुए, अपने प्रताप से सारे संसार को आक्रान्त करने वाली किरणें जैसे सूर्य से हुईं, अपने विस्तार में सारी दिशाओं में फैलने वाले पर्वत जैसे प्रधान पर्वत से हुए, पृथिवी के धारण १. राजवंश के पक्ष मे घटित होनेवाले श्लिष्ट शब्दों के अर्थ कोष्ठक में दिए गए हैं।

चतुर्थ उच्छ्वासः १६७ तेषु चैवमुत्पद्यमानेषु क्रमेणोदपादि हूणहरिणकेसरी सिन्धुराज- ज्वरो गूर्जरप्रजागरो गान्धाराधिपगन्धद्विपकूटपाकलो लाटपाटवपाटच्चरो मालवलक्ष्मीलतापरशुः प्रतापशील इति प्रथितापरनामा प्रभाकरवर्धनो नाम राजाधिराजः । यो राज्याङ्गसङ्गीन्यभिषिच्यमान एव मलानीव मुमोच धनानि । यः परकीयेनापि कातरवल्लभेन रणमुखे तृणेनेव धृते- नालज्जत जीवितेन । यः करधृतधौतासिप्रतिबिम्बितेनात्मनाप्यदूयत समितिषु सहायेन रिपूणां पुरः प्रधनेषु धनुषापि नमता यो मानी मानसेना- खिद्यत । यश्चान्तर्गतापरिमितरिपुशस्त्रशल्यशङ्कुकीलितामिव निश्चलामुवाह हूणादयो जनपदभेदाः । प्रजागरो निद्राक्षयः । 'स्वेदं मूत्रं पुरीषं च मज्जा चैवं मतङ्गजाः। यस्याघ्राय विभाघ्नन्ति तं विद्याद्गन्धहस्तिनम् ॥' कूटपाकलो हस्तिज्वरः । यतो हूणाद्युन्मूलकोऽत एव प्रथितापरनामा राजा । राज्याङ्गान्यमात्याद्याः । अभि- षिच्यमानो राज्ये प्रतिष्ठाप्यमानो यस्याभितः सिच्यते सोऽङ्गसङ्गीनि मलानि मुञ्चति । कातरैति । तृणं कातरैर्मुखे ध्रियते । तृणेनेति सहोपमा मुखे तृणधारणम- नौचित्यमेव पोषयति । धौतपदेन बिम्बस्वीकारसामर्थ्यमुक्तम् । समिदिन्धनं संग्रा- मञ्च । निश्चलाम्रनपायिनीम् । समीकृतास्तटावटा यैर्विटपाटवीयुक्तैस्तरुभिस्तथा करने मे समर्थ दिग्गज जैसे ब्रह्माजी के हाथ से उत्पन्न हुए, समुद्रपान करने के लिये तत्पर मेघ जैसे वर्षाकाल से उत्पन्न हुए, इच्छानुसार फल देने वाले कल्पवृक्ष जैसे नंदनवन से उत्पन्न हुए, समस्त भूतों पर आश्रित रहने वाले संसार के दृश्यमान रूप जैसे विष्णु से उत्पन्न हुए उसी प्रकार उस राजवंश से अनेक राजा उत्पन्न हुए। इन राजाओं के उत्पन्न होने के क्रम में प्रभाकरवर्धन नाम का राजाधिराज हुआ। उसका दूसरा नाम प्रतापशील था। वह हूणरूपी हिरन के लिए सिंह, सिन्धुदेश के राजा के लिए ज्वर, गुर्जर को चैन से न सोने देने वाला अनिद्र रोग, गान्धारराज रूपी मस्त हाथी के लिए जलता हुआ बुखार, लाट देश की चालाकी का अन्त करने वाला, मालव देश की लक्ष्मीरूपी लता को काट डालने वाला कुठार था। उसने अभिषेक के अवसर में ही राज्य के अङ्गों में लगे हुए मल के समान धन-सम्पत्तियों को धो डाला। दुर्बलों के प्रिय अपने जीवन को निरन्तर परोपकार में लगे रहने पर भी रण-मुख में तृण की भाँति धारण किए समझ कर वह अपने आप में लज्जित होता था। युद्धों में वह अपने हाथ की तलवार में प्रतिबिम्बित अपने आपको भी अपना सहायक समझ कर मानसिक सन्ताप का अनुभव करता था। मानी वह युद्धों में नत होते हुए अपने धनुष को देखकर मन से खिन्न होता था। उसने शत्रुओं द्वारा बाणों की कील ठोंककर निश्चल बनाई गई

राजलक्ष्मीम् । यश्च सर्वासु दिक्षु समीकृततटावटविटपाटवीतरुतृणगुल्म- वल्मीकगिरिगहनैर्दण्डयात्रापथैः पृथुभिर्भृत्योपयोगाय व्यभजतेव वसुधां बहुधा । यं चालब्धयुद्धदोहदमात्मीयोऽपि सकलरिपुसमुत्सारकः परकीय इव तताप प्रतापः । यस्य च वह्निमयो हृदयेषु, जलमयो लोचनपुटेषु, मारुतमयो निःश्वसितेषु, क्षमामयोऽङ्गेषु आकाशमयः शून्यतायां पञ्चम- हाभूतमयो मूर्त इवादृश्यत निहतप्रतिसामन्तान्तःपुरेषु प्रतापः । यस्य चासन्नेषु भृत्यरत्नेषु प्रतिबिम्बितेव तुल्यरूपा समलक्ष्यत लक्ष्मीः । तथा च यस्त प्रतापाग्निना भूतिः, शौर्योष्मणा सिद्धिः, असिधाराजलेन वंश- वृद्धिः, शस्त्रव्रणमुखैः पुरुषकारोक्तिः, धनुर्गुणकिणेन करगृहीतिरभवत् । यश्च वैरमुपायनं विग्रहमनुग्रहं समरागमं महोत्सवं शत्रुं निधिदर्शनमरि- तृणादिभिश्च गहनैः । विटपाः शाखाः । अटवी समूहः । गुल्मा जालकानि । वल्मीकः पिपीलककृतो मृत्कूटः । दण्डश्चतुरङ्गबलम् । तस्य यात्रापथैर्गमनमार्गैः । सीमास्था- नीयैर्व्यभजत खण्डशो व्यलभत । भूशय्यादिवशेन पांसुभृतत्वात्काठिन्याच्च क्षमा- मयः शून्यतायां निश्चेष्टत्वे । आसन्नेष्विति । आसन्नानि प्रतिबिम्बं गृह्णन्ति, भूतिः सम्पत् , भस्म च । ऊष्मा चाङ्गदाहिका शक्तिः । सिद्धिः पाकोऽपि । वंशो वेणुरपि । व्रणानां मुखान्यग्राणि । गुणान्येव वा मुखान्याननानि । मुखैः किलोक्तिर्भवति । करगृहीतिर्दण्डग्रहणम् । किणश्च व्यायामहस्त एव भवति । अज्ञातः शत्रुध्वभिगमोऽ- राजलक्ष्मी को धारण किया । उसने सब दिशाओं में नदियों के किनारे, गड्ढे, वन, वृक्ष, तृण, झाड़ी, वल्मीक, पहाड़ आदि को समतल बनाकर भृत्यों के आने-जाने के लिए दूर तक विस्तृत सैन्यमार्ग बनवाकर पृथिवी को मानों कई भागों में विभक्त कर दिया । शत्रु को नष्ट करने वाला उसका अपना प्रताप भी युद्ध की इच्छा के न पूर्ण होने पर उसे ही परकीय के समान होकर जलाता था। हृदयों में अग्नि होकर जलन पैदा करता हुआ, आँखों में आँसू का जल बना हुआ, साँसों में हवा का रूप धारण किए, अङ्गों में धूल भरने के कारण पृथिवी के रूप में परिणत और शून्यता अर्थात् विरह या मूर्च्छा की अवस्था में आकाश बना हुआ, मारे गये शत्रु राजाओं के अन्तःपुरों में उसका प्रताप पाँच महाभूतों के रूप में दिखाई पड़ा। उसकी लक्ष्मी समीप में स्थित भृत्यरूपी रत्नों में समान रूप से प्रतिबिम्बित हुई सी लगती थी। उसके प्रताप की अग्नि से ऐश्वर्य हुआ, शौर्य की गरमी से सिद्धि हुई, तलवार के धाराजल से वंश की वृद्धि हुई, शस्त्रों के घाव से पौरुष समझा गया, धनुष के गुण की रगड़ के गट्टे से कर की वसूली हुई। वह शत्रु द्वारा किए गए विरोध को उपहार के रूप में स्वीकार करता, उसके साथ युद्ध को उसका ही अनुग्रह मानता, संग्राम में उपस्थित होने को महोत्सव समझता, शत्रु को देखकर उसे

चतुर्थ उच्छ्वासः १६६ बाहुल्यमभ्युदयमाह्वानं वरप्रदानमवस्कन्दपातं दिष्टवृद्धिं शस्त्रप्रहार- पतनं वसुधारारसममन्यत । यस्मिंश्च राजनि निरन्तरैर्यूपनिकरैरङ्कुरि- तमिव कृतयुगेन, दिङ्मुखविसर्पिभिरध्वरधूमैः पलायितमिव कलिना, ससुधैः सुरालयैरवतीर्णमिव स्वर्गेण, सुरालयशिखरोद्धूयमानैर्धवलध्वजैः पल्लवितमिव धर्मेण, बहिरुपरचितविकटसभासत्रप्रपाप्राग्वंशमण्डपैः प्रसू- तमिव ग्रामैः, काञ्चनमयसर्वोपकरणैर्विभवैर्विशीर्णमिव मेरुणा, द्विजदीय- मानैरर्थकलशैः फलितमिव भाग्यसंपदा । तस्य च जन्मान्तरेऽपि सती पार्वतीव शंकरस्य, गृहीतपरहृदया वस्कन्दः । दिष्टवृद्धिरानन्दवर्धनम् । धूमेनोत्प्रेक्षा कार्ष्ण्यात् । सुधा मक्कोलम् , अमृतं च । सभासदः । उक्तं च—‘समज्या परिषदङ्गोष्ठीसभासमितिसंसदः । आस्थानी क्लीबमास्थानं स्त्रीनपुंसकयोः सदः ॥’ सत्रं सदादानम् । ‘सत्रमाच्छादने यज्ञे सदा- दाने वनेऽपि च’ इत्युक्तम् । प्रपा यत्र तोयदानम् । प्राग्वंशः पत्नीशाला । उक्तं च ‘प्राग्वंशः प्राग्हविर्गेहात्’ इति । बहिरुपपादिता विकटाः सभासत्रप्रपाप्राग्वंश- रूपा यैस्तैः । तस्येत्यादौ । तस्य च महादेवी यशोमती नामाभूत्सा यस्य वक्षसि ललासेति सम्बन्धः । सती साध्वी, शोभना वा । जन्मान्तरे श्यामायाः संज्ञैषा । शंकरस्येत्या- खजाने देख लेने की प्रसन्नता होती, शत्रु के बाहुल्य को अपना अभ्युदय मानता, युद्ध के लिए गुहार को आशीर्वाद समझना, आकस्मिक आक्रमण को अपनी भाग्यवृद्धि मानता और शस्त्र के प्रहार से शत्रु के गिरने पर धन की वर्षा का आनन्द अनुभव करता। उस राजा के शासनकाल में निरन्तर यज्ञों में यूप (यज्ञ की विशेष लकड़ी) के गाड़े जाने पर मानों सतयुग अंकुरित हो गया था। दिशाओं में फैलते हुए यज्ञधूम से ऊबकर मानों कलि भाग पड़ा था। चूने से पुते हुए मन्दिरों से मानों स्वर्ग उतर आया था। देवमन्दिरों के शिखरों पर फहराती हुई उज्ज्वल पताकाओं से मानों धर्म पल्लवित हो गया था। नगर के बाहर बड़े-बड़े सभाभवन, दानगृह, पानशाला, होमगृह और मण्डप आदि से मानों गाँव के गाँव बस गए थे। सोने की बनी हुई सामग्री के भरे रहने से ऐसा लगता कि मेरु ही वहां ला दिया गया हो। ब्राह्मणों के लिये दान में समर्पित होने वाले धन से भरे कलशों से मानों सौभाग्य की सम्पत्ति फली-फूली नजर आती थी। यशोवती नाम की उस राजा की पटरानी थी। जन्मान्तर में मिली हुई पतिव्रता धर्मपत्नी वह भगवान् शंकर की पत्नी पार्वती के समान, विष्णु की दूसरों के हृदय में

२०० हर्षचरितम् लक्ष्मीरिव लोकगुरोः, स्फुरत्तरलतारका रोहिणीव कलावतः, सर्वजन- जननी बुद्धिरिव प्रजापतेः, महाभूभृत्कुलोद्गता गङ्गेव वाहिनीनायकस्य, मानसानुवर्तनचतुरा हंसीव राजहंसस्य, सकललोकार्चितचरणा त्रयीव धर्मस्य, दिवानिशममुक्तपार्श्वस्थितिररुन्धतीव महामुनेः, हंसमयीव गतिषु, परपुष्टमयीवालापेषु, चक्रवाकमयीव पतिप्रेम्णि, प्रावृएमयीव पयो- धरोन्नतौ, मदिरामयीव विलासेषु, निधिमयीवार्थसंचयेषु, वसुधारामयीव प्रसादेषु, कमलमयीव कोशसंग्रहेषु, कुसुममयीव फलदानेषु, संध्यायमीव वन्द्यत्वे, चन्द्रमयीव निरूष्मत्वे, दर्पणमयीव प्रतिप्राणिग्रहणेषु, सामुद्र- दीनि महामुनिशब्दान्तानि राज्ञि योज्यानि । गृहीतमावर्तितम् । परहृदयं चेतः, वक्षश्च । लोकगुरोर्हरेश्च । तारका कनीनिका, नक्षत्राणि च तारकाः । जननी माता, जन्यतेऽनयेति जननी च। भूभृद्भिरिरपि। कुलं समूहोऽपि। वाहिनी सेना, नदी च । मानसं चेतः, सरश्च। चरणौ पादौ, कण्वादिशाखाश्च चरणाः। धर्मोऽस्ति यस्य स धर्मः। अर्शाआदित्वादच् । यद्वा,-साक्षादेव धर्मः। महामुनी राजर्षिः, वसिष्ठश्च । प्रावृट् वर्षा पयोधरौ स्तनौ, मेघाश्च पयोधराः । वसुधारा धनवृष्टिः। कोषो गञ्जः कर्णिका च । ऊष्मा गर्वः, औष्ण्यं च । प्राणिनि प्राणिनि प्रतिप्राणि सर्वजन्तुविषये ग्रहणेष्वावर्जनेषु, प्रतिबिम्बोत्पादनेषु च। सामुद्रं समुद्रकृतं शास्त्रम् । येनान्यस्व- निवास करने वाली लक्ष्मी के समान, चन्द्र की चमकते हुए चञ्चल तारों वाली रोहिणी के समान, ब्रह्मा की सब लोगों को उत्पन्न करने वाली बुद्धि के समान, वाहिनीपति अर्थात् समुद्र की हिमालय के कुल में उत्पन्न गङ्गा के समान (वाहिनीपति अर्थात् सेनापति राजा की विशाल राजकुल में उत्पन्न पत्नी यशोवती ), राजहंस को मानस ( मानसरोवर या चित्त ) में निवास करने में चतुर हंसी के समान, धर्म की सारे संसार से पूजित चरणों (वैदिक शाखाओं अथवा पैरों) वाली वेदविद्या के समान, महामुनि वशिष्ठ की दिनरात पास में रहने वाली अरुन्धती के समान, मन्द चाल चलने में हंस के समान, बोलने में कोयल के समान, पति के प्रति प्रेमभाव में चक्रवाकी के समान, पयोधरों (दोनों स्तनों अथवा मेघों) की ऊँचाई में वर्षाकाल के समान, विलासों में मदिरा के समान, धन के सञ्चय करने में निधि के समान, प्रसन्नता के अवसर पर धन की वृष्टि के समान, कोष अर्थात् भण्डारों की रक्षा करने में कमल के समान (कमल भी अपने कोष या बीजकोश का संग्रह करता है), फल देने में फूल के समान (फूलों के बाद फल ही उत्पन्न होते हैं), वन्दनीय होने में संध्या के समान, स्वभाव की शीतलता में चन्द्र के समान, सब लोगों को अपने में धारण करने में दर्पण के समान, दूसरों के चित्त की अवस्था परख लेने में सामुद्रिक शास्त्र के समान, सब जगह अपने प्रभाव से व्याप्त हो जाने में ईश्वर के समान,

चतुर्थ उच्छ्वासः २०१ मयीव परचित्तज्ञानेषु, परमात्ममयीव व्याप्तिषु, स्मृतिमयीव पुण्यवृत्तिषु, मधुमयीव संभाषणेषु, अमृतमयीव तृप्यत्सु, वृष्टिमयीव भृत्येषु, निर्वृति- मयीव सखीषु, वेतसमयीव गुरुषु, गोत्रवृद्धिरिव विलासानाम्, प्रायश्चि- त्तशुद्धिरिव स्त्रीत्वस्य, आज्ञासिद्धिरिव मकरध्वजस्य, व्युत्थानबुद्धिरिव रूप- स्य, दिष्टवृद्धिरिव रतेः, मनोरथसिद्धिरिव रामणीयकस्य, दैवसंपत्तिरिव लावण्यस्य, वंशोत्पत्तिरिवानुरागस्य, वरप्राप्तिरिव सौभाग्यस्य, उत्पत्ति- भूमिरिव कान्तेः, सर्गसमाप्तिरिव सौन्दर्यस्य, आयतिरिव यौवनस्य, अनभ्रवृष्टिरिव वैदग्ध्यस्य, अयशःप्रमृष्टिरिव लक्ष्म्याः, यशःपुष्टिरिव चारित्रस्य, हृदयतुष्टिरिव धर्मस्य, सौहार्दस्य भाग्यरूपपरमाणुसृष्टिरिव प्रजापतेः, शमस्यापि शान्तिरिव, विनयस्यापि विनीतिरिव, आभिजा- त्यस्याप्यभिजातिरिव, संयमस्यापि संयतिरिव, धैर्यस्यापि धृतिरिव, विभ्र- मस्यापि विश्रान्तिरिव, यशोमती नाम महादेवी प्राणानां प्रणयस्य भावो ज्ञायते। परमात्मनि व्याप्तिः सर्वगतत्वमनुष्ठेयकार्यम्, ज्ञानं चान्यत्र। अमृतं सुधा, तोयं च। वेतसमयीवेति नम्रत्वात्। प्रायश्चित्तशुद्धिरिति। स्त्रीत्वं तयोज्ज्वलितं पवित्रितं वेत्यर्थः। व्युत्थानं समाधेश्चालनम्। आयतिः प्रतापः। अनभ्रवृष्टिरेवेति। यथा ह्यनभ्रवृष्टिश्चार्यहेतुस्तथा वैदग्ध्यं तस्यामाश्चर्यम्। शमस्यापीति। शमे हि कश्चाशान्तो भवति। शमं संप्राप्य लब्धात्मलाभो जायते। इत्येवमुत्तरत्रापि पुण्यकर्मों के अनुष्ठान में स्मृतिशास्त्र के समान, बातचीत करने में मधु के समान, सबको तृप्त करने में अमृत के समान, भृत्यों के लिये धन की वर्षा के समान, सखियों के लिये सुख का ही रूप धारण करने वाली, सारे विलासों की वंशवृद्धि के समान, स्त्रीत्व के समस्त प्रायश्चित्तों की शुद्धि के समान, कामदेव की आज्ञा की सिद्धि के समान, रूप के अभ्युदय की वृद्धि के समान, रति की भाग्यवृद्धि के समान, सौन्दर्य की मनोरथसिद्धि के समान, लावण्य की दैवी सम्पदा के समान, अनुराग की वंशोत्पत्ति के समान, कान्ति की वरप्राप्ति के समान, सौन्दर्य की अध्यायसमाप्ति के समान, यौवन की परिपूर्णता के समान, विदग्धता की मेघशून्य वर्षा के समान, लक्ष्मी के चञ्चलता रूप अयश के मार्जन के समान, चारित्र्य के यश की पुष्टि के समान, धर्म की हृदयतुष्टि के समान, प्रजापति द्वारा की हुई सौभाग्य के परमाणुओं की सृष्टि के समान, शम की भी शान्ति, विनय की भी विनम्रता, कुलीनता की भी कुलीनता, संयम की भी संयति, धैर्य की भी धृति और विभ्रम की भी विश्रान्ति के समान थी। वह राजा के प्राण, प्रेम, विश्वास, धर्म और

२०२ हर्षचरितम् विश्रम्भस्य धर्मस्य सुखस्य च भूमिरभूत् । यास्य वक्षसि नरकजितो लक्ष्मीरिव ललास । निसर्गत एव च स नृपतिरादित्यभक्तो बभूव । प्रतिदिनमुदये दिन- कृतः स्नातः सितदुकूलधारी धवलकर्पटप्रावृतशिराः प्राङ्मुखः क्षितौ जानुभ्यां स्थित्वा कुङ्कुमपङ्कानुलिप्ते मण्डलके पवित्रपद्मरागपात्रीनिहितेन स्वहृदयेनेव सूर्यानुरक्तेन रक्तकमलषण्डेनार्घं ददौ । अजपच्च जप्यं सुच- रितः प्रत्यूषसि मध्यंदिने दिनान्ते चापत्यहेतोः प्राध्वं प्रयतेन मनसा जह्वपूको मन्त्रमादित्यहृदयम् । भक्तजनानुरोधविधेयानि तु भवन्ति देवतानां मनांसि । यतः स राजा कदाचिद्ग्रीष्मसमये यदृच्छयासितकरकरसितसुधाधवलस्य हर्म्यस्य पृष्ठे सुष्वाप । वामपार्श्वे चास्य द्वितीयशयने देवी यशोमती शिश्ये । परिणतप्रायायां तु श्यामायाम्, आसन्नप्रभातवेलाविलुप्यमानलावण्ये व्याख्याक्रमः । आभिजात्यस्य कुलोचितत्वस्य । नरको नामासुरः, यातनास्था- नानि च नरकाः । स्वहृदयेनेवेति । स्वहृदयमपि सूर्यानुरक्तम् । प्राध्वं प्रह्वः । जह्वपूकशब्दो जपा- सक्तां लक्षयति । द्वितीयेत्यादिनास्य सदाचारनिष्ठोक्ता । उक्तं हि—'नाश्नीयाद्भार्यया साकं न च सुप्यात्तया समम्' इति । परिणतेत्यादावस्मिन्सति देवी यशोमत्युदतिष्ठदिति सुख की भूमि थी। जैसे विष्णु के वक्ष पर लक्ष्मी निवास करती है उसी प्रकार वह भी उसके हृदय में निवास करती थी । वह राजा स्वभाव से ही भगवान् सूर्य का भक्त था । प्रतिदिन सूर्योदय के समय स्नान करके, श्वेत दुकूल पहनकर, सिर पर सफेद वस्त्र ढककर, पूर्व की ओर घुटनों के बल बैठकर रक्तकमल से जो पद्मराग मणि के पवित्र थाल में सूर्य के प्रति अनुरक्त उसके हृदय के रूप में रखा हुआ था, कुङ्कुम के पंक से बनाए हुए सूर्यमण्डल में अर्घ देता था । शोभन चरित वाला वह प्रातःकाल, दोपहर और सायंकाल पुत्र के लिये पवित्र और विनत होकर शुद्ध मन से जप के योग्य आदित्य-हृदय मन्त्र का बारबार जप करता था । देवताओं के मन निरन्तर अपने भक्तों के अनुरोध के वश में होते हैं। बात यह है कि किसी समय वह राजा अपनी इच्छा से चन्द्रमा की चाँदनी से धुले हुए अपने कोठे पर सो रहा था। उसी के बगल में दूसरी शय्या पर रानी यशोवती भी सो रही थी।

चतुर्थे उच्छ्वासः २०३ लिलम्बिषमाणे सीदत्तेजसि तारकेश्वरे, कराग्रस्पृष्टकुमुदिनीप्रमोदजन्मनि शशधरस्वेद इव गलत्यतिशीतलेऽवश्यायपयसि, मधुमदमत्तप्रसुप्तसीम- न्तिनीनिःश्वासाहतेषु संक्रान्तमदेष्विव घूर्णमानेष्वन्तःपुरप्रदीपेपु, राजनि च विमलनखप्रतिबिम्बिताभिः संवाह्यमानचरण इव तारकाभिः, विस्रब्धप्रसारितैर्दिगङ्गनानामिवार्पितैरङ्गैरमधुसुगन्धिभिः स्वहस्तकमलता- लव्रन्तवातैरिव श्वसितैर्मुखश्रिया वीज्यमाने विमलकपोलस्थलस्थितेन सितकुसुमशेखरेणेव रतिकेलिकचग्रहलम्बितेन प्रतिमाशशिबिम्बेन विरा- जिते स्वपति देवी यशोमती सहसैव 'आर्यपुत्र ! परित्रायस्व परित्रा- यस्व' इति भाषमाणा भूषणरवेण व्याहरन्तीव परिजनमुत्कम्पमानाङ्गय- ष्टिरुदतिष्ठत् । अथ तेन सर्वस्यामपि पृथिव्यामश्रुतपूर्वेण किमुत देवीमुखे परित्रा- यस्वेति ध्वनिना दग्ध इव श्रवणयोरेकपद् एव निद्रां तत्याज राजा । शिरो- संबन्धः । तारकेश्वरे । करा रश्मयः, हस्तश्च करः । सीमन्तिनी ललना । सवाह्यमा- नानुपपद्यमाना । अङ्गैरितीत्थंभूतलक्षणे तृतीया । मधु मद्यम् । तद्वत् । मधु मकरन्दः । तालवृन्तमुत्प्रेपकः । सितग्रहणेन चन्द्रसादृश्यमाह । एकपदे तत्क्षणम् । शिरोभागाच्चेत्यादौ राजा वेगेनोत्पपातेति संबन्धः । रात प्रायः ढल चुकी थी । प्रभात के निकट होने से चन्द्रमा की चमक प्रायः कम पड़ती जा रही थी और वह धीरे धीरे लटकता जा रहा था । कुमुदिनी को कराग्र से छूने के आनन्द में चन्द्रमा के पसीने के रूप में अत्यन्त ठंढी ओस पड़ने लगी । अन्तःपुर के दीपक मधुपान के नशे में सोई हुई सुन्दरियों की सांसों के सम्पर्क से स्वयं मतवाले होकर जैसे घूर्णित होने लगे । तारिकायें राजा के निर्मल नखों में प्रतिबिम्बित होकर मानों उनके पैर दाबने लगीं, मानों राजा की मुखश्री दिगङ्गनाओं द्वारा विश्वास के साथ फैलाकर अर्पित किए गए अङ्गों के समान अपने हस्तकमल के पंखे की मधु से सुगन्धित साँसों की हवा से धीरे-धीरे उन्हें झल रही थी, मानों रतिकेलि के समय किए गये कचग्रह से लटका हुआ चन्द्रबिम्ब उनके निर्मल कपोल पर सफेद पुष्प की माला की भाँति झलक रहा था । राजा सो रहे थे कि रानी यशोवती एकाएक चौंककर 'आर्यपुत्र; बचाओ' यह कहते कहते अपने गहनों की आवाज से अन्तःपुर के परिजनों को जगाती और कांपती हुई उठ गई । सारी पृथिवी में कहीं भी पहले जो 'बचाओ' यह आवाज न सुन पड़ी थी उसे देवी के मुख से सुनकर कानों में जले हुये की भाँति राजा की नींद टूट गई । अपने सिरहाने, से कोप से काँपते हुए दाहिने हाथ से कर्णोत्पल के समान उसने अपनी तलवार खींच ली

२०४ हर्षचरितम् भागाच्च कोपकम्पमानदक्षिणकराकृष्टेन कर्णोत्पलेनेव निर्गच्छताच्छधारेण धौतासिना सीमन्तयन्निव निशाम्, अन्तरालव्यवधायकमाकाशमिवोत्तरी- यांशुकं विक्षिपन्वामकरपल्लवेन, करविक्षेपवेगगलितेन हृदयेनेव भयनिमि- त्तान्वेषिणा भ्रमता दिक्षु कनकवलयेन विराजमानः, सत्वरावतारितवा- मचरणाक्रान्तिकम्पितप्रासादः, पुरःपतितेनासिधारागोचरगतेन शशिम- यूखखण्डेनेव खण्डितेन हारेण राजमानः, लक्ष्मीचुम्बनलग्नताम्बूलरसर- ञ्जिताभ्यामिव निद्रया कोपेन चातिलोहिताभ्यां लोचनाभ्यां पाटलयन्प- र्यन्तानाशानाम् , बद्धान्धकारया त्रिपताकया भ्रुकुट्या पुनरिव त्रियामां परिवर्तयन् 'देवि ! न भेतव्यं न भेतव्यम्' इत्यभिदधानो वेगेनोत्पपात । सर्वासु च दिक्षु विक्षिप्सचक्षुर्यदा नाद्राक्षीत्किंचिदपि तदा पप्रच्छ तां भयकारणम् । अथ गृहदेवतास्विव प्रधावितासु यामिकिनीषु, प्रबुद्धे च समीपशा- यिनि परिजने, शान्ते च हृद्योत्कम्पकारिणि साध्वसे सा समभाषत- सीमन्तयन्द्बिधाकुर्वन् । त्रिपताकया त्रिरैखया । यामकिनीषु जागरिकासु । जिसकी निकलती हुई स्वच्छ धारा से रात मानो दो भागों में बट गई। बीच में व्यवधान बनते हुए आकाश के समान उत्तरीय अंशुक को उसने अपने बांये हाथ से फेंक दिया । झटके से हाथ फेंकने के कारण उसका कनकवलय निकलकर दूर उड़ गया मानों उसका हृदय ही रानी के डर के कारण को ढूँढ़ने के लिए दिशाओं में चक्कर काटने लगा हो । उसने शय्या से अपने बायें पैर को ज्यों ही नीचे रखा त्यों ही भवन का प्रासाद जैसे हिल गया । उसका हार टूटकर आगे बिखर गया, मानों उसकी तलवार के सामने पड़कर चन्द्रमा की किरणें टूक-टूक हो गई । मानों लक्ष्मी द्वारा चुम्बन किए जाने पर पान से भरे उसके मुख की लाली उनकी आँखों में संक्रान्त हो गई हो ऐसी क्रोध और निद्रा के कारण टहाका लाल अपनी आँखों से क्षितिज को प्रभा से लाल बना रहा था। क्रोध की अंधेरा लिए हुए तीन रेखाओं से भरी अपनी भौंह के द्वारा वह रात को फिर से आरम्भ कर रहा था। 'देवी, डरो मत, डरो मत' यह कहता हुआ झट से उठकर खड़ा हो गया । उसने चारों ओर दिशाओं में अपनी आँखें फैलायीं, लेकिन कहीं कुछ नहीं देखा, तब उससे डरने का कारण पूछा । उसी समय गृहदेवताओं के समान रात को अन्तःपुर में पहरा देने वाली स्त्रियाँ दौड़ीं । समीप के सोने वाले परिजन भी जग गए । जब हृदय को कम्पित कर देने वाला

चतुर्थ उच्छ्वासः २०५

'आर्यपुत्र ! जानामि स्वप्ने भगवतः सवितुर्मण्डलाद्भिर्गत्य द्वौ कुमारकौ, तेजोमयौ, बालातपेनेवापूरयन्तौ दिग्भागान्, वैद्युतमिव जीवलोकं कुर्वाणौ, मुकुटिनौ, कुण्डलिनौ, अङ्गदिनौ, कवचिनौ, गृहीतशस्त्रौ, इन्द्र- गोपकरुचा रुधिरेण स्नातौ, उन्मुखेनोत्तमाङ्गघटमानाञ्जलिना जगता निखिलेन प्रणम्यमानौ, कन्ययैकया च चन्द्रमूर्त्येव सुषुम्णारश्मिनिर्गतया- नुगम्यमानौ, क्षितितलमवतीणौ। तौ च मे विलपन्त्याः शस्त्रेणोदरं विदार्य प्रवेष्टुमारब्धौ। प्रतिबुद्धास्मि चार्यपुत्र ! विक्रोशयन्ती वेपमान- हृदया' इति। एतस्मिन्नेव च कालक्रमे राजलक्ष्म्याः प्रथमालापः प्रथयन्निव स्वप्न- फलमुपतोरणं रराण प्रभातशङ्खः। भाविनीं भूतिमिवाभिदधाना दध्वनु- रमन्दं दुन्दुभयः। चकाण कोणाहतानन्दादिव प्रत्यूषनान्दी। जयज- येति प्रबोधमङ्गलपरिपाठकानामुच्चैर्वाचोऽश्रूयन्त। पुरुषश्च वल्लभतुरङ्ग- मन्दूरामन्दिरे मन्दमन्दं सुप्तोत्थितः सप्रीणां कृतमधुरहेषारवाणां

मुकुटिनौ मौलियुक्तौ। अङ्गदिनौ संक्यूरौ। इन्द्रगोपकः कीटविशेषः ( भाषायां 'वीरबहूटी' इति ख्यातः)। सुषुम्णाख्योऽमृतमयो रविरश्मिः। कोणो वादनभाण्डम्। नान्दी भेरी। वल्लभेष्यादिना पुरुषस्य नैकट्यमाह।

वह भय शान्त हुआ तब देवी यशोवती ने कहा—'आर्यपुत्र, स्मरण करती हूँ कि स्वप्न में भगवान् सूर्य के मण्डल से निकल कर दो तेजस्वी कुमार अपने तेज से दिशाओं को भरते हुए, सारे जीवलोक को तङिन्मय बनाते हुए, सिर पर मुकुट, कानों में कुण्डल, हाथ में विजयट, शरीर पर कवच और शस्त्र लिए हुए, इन्द्रगोपक नामक कीट की भाँति अपने तेज की लाल प्रभा में स्नान किए हुए, उन्मुख होकर और अञ्जलि बांधे सारे संसार द्वारा प्रणाम किए गए, सुषुम्ना नाम की रश्मि से निकली हुई चन्द्रमूर्ति के समान एक कन्या द्वारा अनुगत होकर पृथिवी पर उतरे। उन दोनों ने अपने शस्त्र से रोती हुई मेरे उदर को फाड़कर प्रवेश करना आरम्भ किया। आर्यपुत्र, तब मैं जग गई, चिल्ला पड़ी और मेरा हृदय कांपने लगा ।' इसी बीच तोरण के समीप राजलक्ष्मी के प्रथम आलाप के समान, रानी के स्वप्न का फल मानों व्यक्त करता हुआ प्रभातकालीन शंख बज उठा। दुंदुभियाँ भी होने वाली समृद्धि को बताती हुई ध्वनित हो उठीं। भेरियां भी डण्डे से आहत होकर मानों उस खुशी में कड़कने लगीं। जागरणकाल में मङ्गलपाठ करने वालों के ऊंचे स्वर में जय-जयकार सुन पड़ने लगे। कोई अश्वपाल राजा के घोड़साल में सोकर धीरे धीरे उठा और मधुर

पञ्चम उच्छ्वास: हूण युद्ध, राजा की मृत्यु व यशोमती सती

२०६ हर्षचरितम् पुरश्च्योतत्तुषारसलिलशीकरं किरन्मरकतहरितं यवसं वक्त्रापरवक्त्रे पपाठ- 'निधिस्ततत्र विकारेण सम्मणिः स्फुरता धाम्ना । शुभागमो निमित्तेन स्पष्टमाख्यायते लोके ॥ ३ ॥ अरुण इव पुरःसरो रवेि पवन इवातिजबो जलागमम् । शुभमशुभमथापि वा नृणां कथयति पूर्वनिदर्शनोदयः' ॥ ४ ॥ नरपतिस्तु तच्छ्रुत्वा प्रीयमाणेनान्तःकरणेन तामवादीत्-'देवि ! मुदोऽवसरे विषीदसि । समृद्धास्ते गुरुजनाशिषः । पूर्णा नो मनोरथाः । परिगृहीतासि कुलदेवताभिः । प्रसन्नस्ते भगवानंशुमाली । न चिरेणैवा- तिगुणवदपत्यत्रयलाभेनानन्दयिष्यति भवतीम्' इति । अवतीर्य च यथा- क्रियमाणाः क्रियाश्चकार । यशोमत्यपि तुतोष तेन पत्युर्भाषितेन । सस्योऽश्वाः । यवसं घासम् । 'नान्द्याः प्रायोऽम्बुधेर्वक्त्रम्' इति वक्त्रलक्षणम् । अपर- वक्त्रं प्रसिद्धम् । तत्र विकारेणेति । यत्राधोनिधिस्तत्र परिणाहोद्गताधोमुखशाखामू- लादिभाजो वृक्षा भवन्ति । निदर्शनं निमित्तम् । समृद्धाः परिपूर्णाः । परिगृहीता अङ्गीकृता । स्वर में हिनहिनाते हुए घोड़ों के सामने मरकत के समान हरी हरी घास जिनसे पानी की बूँदें टपक रही थीं, डालते हुए उसने वक्त्र और अपवक्त्र नामक छन्दों को पढ़ा- 'लोक में जैसे वृक्ष की शाखा के झुक जाने आदि विकार से भूगर्भ में छिपी हुई निधि का पता चलाया जाता है और स्फुरित होते हुए तेज से मणि का सद्भाव मालूम किया जाता है उसी प्रकार किसी प्रकार के निमित्त ( शुभसूचक स्वप्न आदि) से होने वाला मङ्गल समझा जाता है।' 'जैसे आगे उदित होने वाला अरुण सूर्य को और हवा का झकोरा जल की वर्षा को सूचित करता है उसी प्रकार पहले देखा गया शुभ या अशुभ लक्षण मनुष्यों के होने वाले शुभ या अशुभ को कह देता है।' राजा ने उसे सुनकर हृदय से प्रसन्न होते हुए रानी से कहा-'देवी, प्रसन्न होने के अवसर में क्यों मन को दुखाती हो ? तुम्हारे गुरुजनों के आशीर्वाद सफल हो गए । हमारे मनोरथ पूरे हुए। कुलदेवताओं ने तुम्हारी बात मान ली । तुम पर भगवान् सूर्य प्रसन्न हैं । वे कुछ ही समय में अत्यन्त गुणशाली तीन सन्तान देकर आनन्दित करेंगे।' यह कहकर राजा कोठे से उतरकर नियमानुसार अपने कार्य में लग गए। रानी यशोमती पति की इस बात से बहुत सन्तुष्ट हुई।

चतुर्थे उच्छ्वासः २०७ ततः समतिक्रान्ते कस्मिंश्चित्कालांशे देव्यां च यशोमत्यां देवो राज्यवर्धनः प्रथममेव संबभूव गर्भे । गर्भस्थितस्यैव च यस्य यशसेव पाण्डुतामादत्त जननी । गुणगौरवक्लान्तेव गात्रमुद्वोढुं न शशाक । कान्तिविसरामृतरसतृप्तेवाहारं प्रति पराङ्मुखी बभूव । शनैः शनैरुपची- यमानगर्भभरालसा च गुरुभिर्वारितापि वन्दनाय कथमपि सखीभिर्ह- स्तावलम्बेनानीयत । विश्राम्यन्ती सालभञ्जिकेव समीपगतस्तम्भभि- त्तिष्वलग्द्यत । कमललोभनिलीनैरलिभिरिव वृतावुद्धर्तुं नाशक्नुच्चरणौ । मृणाललोभेन च चरणनखमयूखलग्नैर्भवनहंसैरिव संचार्यमाणा मन्द- मन्दं बभ्राम । मणिभित्तिपातिनीषु निजप्रतिमास्वपि हस्तावलम्बनलो- भेन प्रसारयामास करकमलम्, किमुत सखीषु । माणिक्यस्तम्भदीधि- तोरप्यालब्बितुमाचकाङ्क्ष, किं पुनर्भवनलताः । समादेष्टुमप्यसमर्थासी- द्गृहकार्याणि, कैव कथा कर्तुम् । आस्तां नूपुरभारखेदितं चरणयुगलं मनसापि नोदसह्त सौधमारोढुम् । अङ्गान्यपि नाशक्तोद्धारयितुं दूरे भूषणानि । चिन्तयित्वापि क्रीडापर्वताधिरोहणमुत्कम्पितस्तनी तस्तान । प्रत्युत्थानेषूभयजानुशिखरांविनिहितकरकिसलयापि गर्वादिव गर्भणाधा- र्यत । दिवसं चाधोमुखी स्तनपृष्ठसंक्रान्तेनापत्यदर्शनौत्सुक्यादन्तःप्रवि- ष्टेनेव मुखकमलेनैवं प्रीयमाणा ददर्श गर्भम् । उदरे तनयेन हृदये च भर्त्रा तिष्ठता द्विगुणितामिव लक्ष्मीमुवाह । सख्युत्सङ्गामुक्तशरीरा च कुछ समय के बीतने पर देवी यशोमती के गर्भ में पहले पहल राज्यवर्धन हुआ । गर्भ में स्थित उसके यश से मानों जननी ने पीलापन धारण किया । उसके गुणों के भार से क्लान्त होकर मानों अपने शरीर को ढोने में वह असमर्थ होने लगी । उसकी कान्ति के अमृत रस से तृप्त होकर मानों वह भोजन से विमुख होने लगी । धीरे-धीरे गर्भ के भारी हो जाने से वह अलसाकर चलने लगी और गुरुओं के मना करने पर भी सखियों द्वारा हाथ का सहारा देकर प्रणाम करने के लिए पहुँचाई जाने लगी । जब वह थक जाने पर विश्राम के लिए समीप के किसी खम्भे का सहारा लेकर टिकती तो सालभंजिका की भाँति प्रतीत होती, मानों कमल समझ कर बैठे हुए भौरों से व्याप्त अपने चरणों को वह उठा नहीं पा रही थी, मानों उसके चरण के नख की किरणों को मृणाल समझ कर उसी के लोभ से हंस उसे मंद मंद चाल से चला रहे थे । मणि की दीवारों में पड़ती हुई अपनी छाया के ऊपर भी हाथ का सहारा लेने के लोभ से वह अपना हाथ फैला देती, सखियों के सहारे की तो बात ही क्या । माणिक्य के स्तम्भों की किरणों पर भी वह टिक जान-

२०८ हर्षचरितम् शरीरपरिचारिकाणामङ्केषु सपत्नीनां तु शिरःसु पादौ चकार । अवतीर्णे च दशमे मासि सर्वोर्वीभृत्पक्षपाताय वज्रपरमाणुभिरिव निर्मितम्, त्रिभुवनभारधारणसमर्थ शेषफणामण्डलोपकरणैरिव कल्पितम्, सकल- भूभृत्कम्पकारिण दिग्गजवयवैरिव विहितमसूत देवं राज्यवर्धनम् । यस्मिंश्च जाते जातप्रमोदा नृत्यमय्य इवाजायन्त प्रजाः । पूरितासंख्यशङ्खशब्द- मुखरं प्रहतपटहशतपटुरवं गम्भीरभेरीनिनादनिर्भरभरितभुवनं प्रमोदो- न्मत्तमर्त्यलोकमनोहरं मासमेकं दिवसमिव महोत्सवमकरोन्नरपतिः । उर्वीभृतो राजानः, पर्वताश्च । पक्षाः समूहाः, पतत्राणि च । पातः पतनम्, शातनं च । चाहती थी, भवनलता के सहारे को तो बात ही क्या । घर के कामों को अढ़ाने में भी वह असमर्थ थी, बातचीत करना तो दूर रहा । नूपुरों के बोझ से भी खिन्न हो जाने से उसके दोनों चरण थक जाते थे, ऐसी स्थिति में मन से भी कोठे पर चढ़ने का साहस नहीं कर पाती थी । वह अपने अङ्गों को भी धारण नहीं कर सकती थी, गहने तो दूर रहे । अपने क्रीड़ापर्वत पर जब केवल वह सोचते हुए ही चढ़ती तो उसके दोनों स्तन काँपने लग जाते । जब वह उठने का प्रयत्न करती तब अपनी दोनों जाँघों के अग्रभाग पर हाथ टेकती, फिर भी मानों गर्भ द्वारा अपनी गुरुता के गर्व से फिर बैठा दी जाती थी । दिन में वह अपना मुख नीचा किए रहती, स्तन पर उसके मुख का प्रतिबिम्ब संक्रान्त हो रहा था मानों अपने पुत्र को देखने की उत्सुकता से वह अपने मुख-कमल के भीतर प्रवेश करके प्रसन्न होती हुई गर्भ देखती थी । उदर में बच्चा एवं हृदय में पति के निवास करने से वह मानों दुगुनी शोभा धारण कर रही थी । वह सखियों की गोद में अपने आपको छोड़ देती थी । परिचारिकाओं के अङ्क में और अपनी सौतों के सिर पर उसने अपने चरण रखे। दसवें मास में उसने देव राज्यवर्धन को पैदा किया, मानों वह सारे पर्वतों के पक्ष काट फेंकने के लिए (अथवा सारे राजाओं में पक्षपात करने के लिए) वज्र के परमाणुपुंज से बना था या त्रिभुवन का बोझ धारण करने में समर्थ शेष नाग के फणामण्डल के निर्माण की सामग्री से बना था या सारे पर्वतों (अथवा राजाओं) को कँपा देने वाले दिग्गज के अङ्गों से बना था । उसके उत्पन्न होने की खुशी में सारी प्रजा नाचने लग गई । राजा ने महीने भर बड़ी धूम-धाम के साथ पुत्रजन्मोत्सव मनाया जो ऐसा लगा कि एक दिन में बीत गया। असंख्य शंखों की आवाज चारों ओर भर गई । सैकड़ों पटहों की कड़कड़ाहट गूँज गई । भुवन में भेरियों का गंभीर नाद भर गया । आनन्द से सारा संसार उन्मत्त होकर मनोहर लगने लगा ।