भारतकोश
संग्रह पर लौटें

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

द्वितीय उच्छ्वासः ९५ मान एव क्षयिणि क्षामतां व्रजति बालवायसास्यारुणेऽपराह्णातपे, शिथि- लितनिजवाजिजवे जपापीडपाटलिम्न्यस्ताचलशिखरस्खलिते खञ्जतीव कमलिनीकण्टकक्षतपादपल्लवे पतङ्गे, पुरः परापतति प्रेङ्खदन्धकारलेश- लम्बालके शशिविरहशोकश्याम इव श्यामामुखे, कृतसंध्योपासनः शयनी- यमगात् । अचिन्तयच्चैकाकी—किं करोमि । अन्यथा सम्भावितोऽस्मि राज्ञा । निर्निमित्तबन्धुना च संदिष्टमेवं कृष्णेन । कष्टा च सेवा । विषमं भृत्यत्वम् । अतिगम्भीरं महद्राजकुलम् । न च मे तत्र पूर्वजपुरुषप्रवर्तिता प्रीतिः, न कुलक्रमांगता गतिः, नोपकारस्मरणानुरोधः, न बालसेवास्नेहः, न गोत्रगौरवम्, न पूर्वदर्शनदाक्षिण्यम्, न प्रज्ञासंविभागोपप्रलोभनम्, न विद्यातिशयकुतूहलम्, नाकारसौन्दर्यादरः, न सेवाकाकुकौशलम्, न विद्वद्गोष्ठीबन्धवैदग्ध्यम्, न वित्तव्ययवशीकरणम्, न राजवल्लभपरिचयः । स्वरूपकथनं क्षतपादपल्लवत्वादुत्प्रेक्षणम् । खञ्जतीवेति । यश्च खञ्जति स शिखर- प्राये विषमे पथि । ये पुनरस्ताचले शिखरस्खलनकारणं खञ्जनमित्युत्प्रेक्ष्यन्ते तान्प्रति कमलिनीत्यादि निरर्थकम् । खञ्जतीव स्खलतीव । पुरः पूर्वस्यां दिशि । अपराह्न का आतप क्षीण हो रहा था मानों मुकुलित होते हुए लाल कमलों ने उसे पी लिया हो। सूर्य ने अपने घोड़ों का वेग कम कर दिया और जपापुष्प के गुच्छे के समान पाटल होकर अस्ताचल के शिखर पर गिर पड़ा मानों कमलिनी के काँटे उसके पैरों में चुभ गये जिससे वह लँगड़ाने लगा मानों चन्द्रमा के विरहजन्य शोक से रात्रि का मुख (आरम्भ) नीला हो गया हो। अन्धकार के लम्बे-लम्बे बाल उस पर लहराने लगे। तब बाण ने सन्ध्योपासना की और शय्या पर पहुँच गये। फिर एकान्त में सोचने लगे—"मैं क्या करूँ? सम्राट् ने मुझे कुछ दूसरा समझ लिया है। अकारणबन्धु कृष्ण ने इस तरह का सन्देश भेजा (राजाओं की) सेवा कष्टकारी है, और हाजिरी बजाना और भी टेढ़ा है। राजदरबार में बड़े खतरे हैं। मेरे पुरखों को कभी न तो इससे रुचि रही है, न मेरा दरबार से पुश्तैनी सम्बन्ध रहा है। न तो राजकुल के द्वारा किये गए उपकार का स्मरण आता है, न बचपन में राजकुल से ऐसी मदद मिली है जिसका स्नेह माना जाय; न अपने कुल का ही ऐसा कोई गौरव रहा है, न पहली मेल-मुलाकात की अनुकूलता है; न यह प्रलोभन है कि बुद्धिसम्बन्धी विषयों में आदान-प्रदान किया जाय; न यह चाह है कि जान-पहचान बढ़ाऊँ; न सुन्दर आकाश से मिलने वाले आदर की चाह है; न सेवकों जैसी चापलूसी करने की आदत है; न मुझमें वैसी विलक्षण चतुराई है कि विद्वानों की गोष्ठियों में भाग लूँ; न पैसा खर्च करके दूसरों को वश में करने की आदत है; न राजा के प्रेमी जनों के साथ जान-पहचान है। जाना तो पड़ेगा ही। सर्वथा त्रिभुवन गुरु

अवश्यं गन्तव्यञ्च। सर्वथा भगवान्भवानीपतिर्भुवनपतिर्गतस्य मे शर- णम्, सर्वं साम्प्रतमाचरिष्यति, इत्यवधार्य गमनाय मतिमकरोत्। अथान्यस्मिन्नहन्युत्थाय, प्रातरेव स्नात्वा, धृतधवलदुकूलवासाः, गृहीताक्षमालः, प्रास्थानिकानि सूक्तानि मन्त्रपदानि च बहुशः समावर्त्य देवदेवस्य विरूपाक्षस्य क्षीरस्नपनपुरःसरां सुरभिकुसुमधूपगन्धध्वजबलि- विलेपनप्रदीपकबहुलां विधाय परमया भक्त्या पूजाम्, प्रथमहुततरलति- लत्वग्विघटनचटुलमुखरशिखाशेखरं प्राज्याज्याहुतिप्रवर्धितदक्षिणार्त्तिषं भगवन्तमाशुशुक्षणिं हुत्वा, दत्त्वा द्युम्नं यथाविद्यमानं द्विजेभ्यः, प्रदक्षि- णीकृत्य प्राङ्मुखीं नैचिकीम्, शुक्लाङ्गरागः, शुक्लमाल्यः, शुक्लवासाः, रोचनाचित्रदूर्वाग्रपल्लवग्रथितगिरिकर्णिकाकुसुमकृतकर्णपूरः, शिकासक्तसि- द्धार्थकः, पितुः कनीयस्या स्वस्रा मात्रेव स्नेहार्द्रहृदयया श्वेतवाससा साक्षा- श्यामा रात्रिः, योषित्त्व च। मुखमारम्भः, वदनं च। निर्निमित्तेत्याद्यभिप्रायेण वक्ष्यति। अवश्यं गन्तव्यं चेत्यादि। 'काकुः स्त्रियां विकारो यः शोकभीत्यादिभिर्ध्वनेः'। इह च लक्षणया वक्रोक्तिः। सांप्रतं युक्तम्। अथेत्यादौ। अन्यस्मिन्नहनि प्रीतिकूटाद्निरगादिति संबन्धः। प्रस्थानं प्रयोजनं येषां तानि प्रास्थानिकानि सूक्तानि, वेदोक्ता मन्त्रविशेषाः। विरूपाक्षस्त्र्यक्षः। प्राज्यं भूरि। आज्यं घृतम्। द्युम्नं धनम्। यथाविद्यमानमित्यनेन निर्लोभतोक्ता। नैचिकीं वराङ्गीम्, होमधेनुं वा, शुक्लां वा। गिरिकर्णिकाश्वखुरी माङ्गल्यौषधिः। सिद्धार्थकाः सर्षपाः। स्वस्रा भगिन्या। महाश्वेता देवताविशेषः। रविस्त्यदेवते- भगवान् शंकर तेरी शरण हैं, वहीं जाने पर सब भला करेंगे। यही सोचकर चलने का इरादा पक्का कर दिया। दूसरे दिन बाण उठा, प्रातःकाल ही स्नान कर लिया। श्वेत दुकूल पहनकर हाथ में अक्षमाला ली। प्रास्थानिक सूक्तों और मन्त्रों को बार-बार दुहराया और देवों के देव भग- वान् शंकर को दूध से स्नान कराके सुगन्धित फूल, धूप की गन्ध, ध्वज, भोग, विलेपन, प्रदीप आदि सामग्री के साथ बड़ी श्रद्धा-भक्ति से अर्चना की। अग्नि में आहुति दी। पहली बार तिल की आहुति पड़ते ही अग्नि की शिखाएँ चटकने लगीं और अधिक घी की आहुति पड़ते ही दाहिनी ओर बढ़ गई। अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को दक्षिणा दी। पूर्व की ओर खड़ी हुई उत्तम गौ की प्रदक्षिणा की। श्वेत चन्दन, श्वेत माला और श्वेत वस्त्र धारण किया। गोरोचना लगाकर दूबनाल में गुथे हुए श्वेत अपराजिता के फूलों का कर्णफूल कान में लगाया, चोटी में पीली सरसों रखी। पिता

द्वितीय उच्छ्वासः ९७ दिव भगवत्या महाश्वेतया मालत्याख्यया कृतसकलगमनमङ्गलः, दत्ता- शीर्वादो बान्धववृद्धाभिः, अभिनन्दितः परिजनजरतीभिः वन्दितचर- णैरभ्यनुज्ञातो गुरुभिः, अभिवादितैराघ्रातः शिरसि कुलवृद्धैः, वर्धित- गमनोत्साहः शकुनैः, मौहूर्तिकमतेन कृतनक्षत्रदोहदः, शोभने मुहूर्ते, हरितगोमयोपलिप्ताजिरस्थण्डिलस्थापितमसितेतरकुसुममालापरिक्षिप्तकण्ठं दत्तपिष्टपञ्चाङ्गुलपाण्डुरं मुखनिहितनवचूतपल्लवं पूर्णकलशमीक्षमाणः, प्रणम्य कुलदेवताभ्यः कुसुमफलपाणिभिरप्रतिरथं जपद्भिर्निजद्विजैरनु- गम्यमानः, प्रथमचलितदक्षिणचरणः, प्रीतिकूटान्निर्यगात् । प्रथमेऽहनि तु घर्मकालकष्टं निरुदकं निष्पत्रपादपविषमं पथिकजन- नमस्क्रियमाणप्रवेशपादपोत्कीर्णकात्यायनीप्रतियातनं शुष्कमपि पल्लवित- मित्र तृषितश्वापदकुललम्बितलोलजिह्वालतासहस्रैः पुलकितमिवाच्छभल्ल- त्यन्ये । दत्तेत्यादिभागो बान्धववृद्धामिप्रायेण समुच्चित एव । अभिनन्दित इति । प्रतिपदं द्वयमूल्यम् । जरत्यो वृद्धाः । आघ्रातः शिरसि चुम्बितः । मोहूर्तिका गणकाः । नक्षत्रदोहदं प्रतिनक्षत्रप्राशनम्, नक्षत्रविषयोऽभिलाषो वा । अजिर- मङ्गनम् । स्थण्डिलं भूः । परिक्षिप्तो वेष्टितः । पिष्टपञ्चाङ्गुलमाज्कोक्तामिः । पञ्च- भिरङ्गुलीभिर्मङ्गल्याय दोयते । अप्रतिरथं प्रास्थानिकं मन्त्रम् । निजेत्यादिना स्वस्य दातृत्वमुक्तम् । उत्कीर्णा निखाता । कात्यायनी दुर्गा । प्रतियातना प्रतिमा । काननत्वात्पल्ल- की छोटी बहन की भांति माता के समान स्नेह से भीने हृदयवाली, साक्षात भगवती महाश्वेता मालती ने प्रस्थान-समय के समस्त मङ्गलाचरण किये। सभी वृद्धाओं ने आशीर्वाद दिया और परिवार की वृद्धाओं ने अभिनन्दन किया। पूजितचरण गुरुओं ने जाने की अनुमति दी और अभिवादित कुलवृद्धों ने मस्तक सूँघा। शकुनों से जाने का उत्साह बढ़ा। फिर ज्योतिषी के अनुसार नक्षत्र-देवताओं को प्रसन्न किया। इस प्रकार शुभ मुहूर्त में हरित गोबर से लिपे हुए आँगन के चौतरे पर स्थापित पूर्ण कलश—जिसके कण्ठ में श्वेत फूलों की माला लपेट दी गई थी, जो पिसान के पंचांगुल थापों से उजला था एवं जिसके मुख में नये आम के पल्लव डाल दिये गये थे—को देखता हुआ, कुलदेवताओं को प्रणाम करके, हाथ में फल-फूल लिये हुए और अप्रतिरथ सूक्त के मन्त्रों का पाठ करते हुए अपने पुरोहित ब्राह्मणों द्वारा अनुगत होकर बाण दाहिना पैर पहले चलाकर प्रीतिकूट से निकल गया। पहले दिन चण्डिका वन पार किया और मल्लकूट नामक गाँव में पड़ाव किया। चण्डिका- वन में घाम का कष्ट होने लगा, वहां पानी का अभाव था, पत्रहीन वृक्षों के कारण वह वन ७ ह०

९८ हर्षचरितम् गोलाङ्गूललिह्यमानमधुगोलचलितसरघासंघातैः, रोमाञ्चितमिव दग्ध- स्थलीरूढस्थूलाभीरुकन्दलशतैः, शनैश्चण्डिकायतनकाननमतिक्रम्य मल्ल- कूटनामानं ग्राममगात् । तत्र च हृदयनिर्विशेषेण भ्रात्रा सुहृदा च जग- त्पतिनाम्ना संपादितसपर्यः सुखमवसत् । अथापरेद्युरुत्तीर्य भगवतीं भागीरथीं यष्टिगृहकनाम्नि वनग्रामके निशामनयत् । अन्यस्मिन्दिवसे स्कन्धावारमुपमणिपुरमन्वजिरवति कृतसन्निवेशं समाससाद । अतिष्ठच्च नातिदूरे राजभवनस्य । निर्वर्तितस्नानाशनव्यतिकरो विश्रान्तश्च मेखलकेन सह याममात्रा- वशेषे दिवसे भुक्तवति भूपुजि प्रख्यातानां क्षितिभुजां बहून्शिविरसंनि- वेशान्वीक्षमाणः शनैः शनैः पट्टबन्धार्थमुपस्थापितैश्च डिण्डिमधिरोहणा- याहूतैश्चाभिनवबद्धैश्च विक्षेपोपार्जितैश्च कौशलिकायतैश्च प्रथमदर्शन-


वितमिवेत्युत्प्रेक्षा । जिह्वैव लता, दीर्घत्वात् । गोलाङ्गूलः कृष्णमुखो वानरः । मधुगोलं माक्षिककरण्डः । सरघा मधुमक्षिकाः । अभीरुः शतावरी । कन्दलानि नवनालानि । भ्रात्रेति चन्द्रसेनेन । हृदयेत्याद्यभिप्रायेण सुखमित्युक्तम् । उपमणिपुरं पत्तनभेदम् । अन्वजिरवति नदीभेदकटे । संनिवेशो गृहादिरचना । निर्वर्तितेत्यादौ राजद्वारमीदृशमगमदिति संबन्धः । निर्वर्तितेत्यादि । राज- दर्शनेऽकातरत्वमात्मनः प्रतिपादयति । वारेन्द्रैः श्यामायमानमिति राजद्वारविशेषे-


तकलीफदेह था, वन के प्रवेश-वृक्षों पर कात्यायनी की मूर्तियाँ खुदी हुई थीं जिन्हें पथिक नमस्कार करते थे । वह वन सूख गया था, फिर भी श्वापद जन्तुओं की लपलपाती जीभों की हजारों लताएँ उसे मानों पल्लवित कर रही थीं । भालू और लंगूर मधुमक्खियों के छत्ते को चाटने लगते तो वे भन्नाकर उड़ने लगतीं मानों वन इस दृश्य से पुलकित था । दावान्नि से जली हुई वनभूमि में सतावर के मोटे पौधे इस तरह निकल आये थे मानों वह जंगल रोमा- ञ्चित हो उठा हो । मल्लकूट ग्राम में बाण के अभिन्नहृदय भाई और मित्र जगत्पति ने उसकी आवभगत की और वह सुखपूर्वक ठहरा । दूसरे दिन बाण ने गङ्गा पार कर यष्टिगृहक नाम के वन गाँव में रात बिताई । अन्य दिन राप्ती ( अजिरवती ) के किनारे मणिपूर नामक ग्राम के समीप पड़ी हुई छावनी मे पहुँचा और राजभवन के पास ही ठहरा । बाण ने स्नान-भोजन आदि सम्पन्न करके विश्राम किया और जब एक पहर दिन रहा और महाराज भी भोजन कर चुके तब मेखलक के साथ वह राजाओं के अनेक शिविरों को देखता हुआ धीरे-धीरे राजद्वार के पास आया । राजद्वार बड़े-बड़े हाथियों से श्यामायमान था, कुछ

द्वितीय उच्छ्वासः ९९ कुतूहलोपनीतैश्च नागवीथीपालप्रेषितैश्च पल्लीपरिवृढढौकितैश्च स्वेच्छायुद्ध- क्रीडाकौतुकाकारितैश्च दूतसंप्रेषणप्रेषितैश्च दीयमानैश्चाच्छिद्यमानैश्च मुच्य- मानैश्च यामावस्थापितैश्च सर्वद्वीपविजिगीषया गिरिभिरिव सागरसेतुबन्ध- नार्थमेकीकृतैर्ध्वजपटपटुपटहशङ्खचामराङ्गरागरमणीयैः पुष्याभिषेकदिव- तैरिव कल्पितैर्वारणेन्द्रैः श्यामायमानम्, अनवरतचलितखुरपुटप्रहतमृद- ङ्गैश्च नर्तयद्भिरिव राजलक्ष्मीमुपहसद्भिरिव सृक्विपुटप्रसृतफेनाट्टहासेन जवजडजङ्घां हरिणजातिमाकारयद्भिरिव संघट्टहेतोर्हर्षहेषितेनोच्चैरुच्चैः- श्रवसमुत्पतद्भिरिव दिवसकररथतुरगरुषा यक्षायमाणमण्डनचामरमालैर्ग- गनतलं तुरङ्गैरस्तरङ्गायमाणम्, अन्यत्र प्रेषितैश्च प्रेष्यमाणैश्च प्रेषितप्रति- निवृत्तैश्च बहुयोजनगमनगणनसंख्याक्षरावलीभिरिव वराटिकावलीभिर्घ- टितमुखमण्डनकैरस्तारकितैरिव संध्यातपच्छेदैररुणचामरकारचितकर्ण- षणम् । डिण्डिमः पटहः । विक्षेपः करः । नागवीथी हस्तिभूः । पल्ली शबरवसतिः । परिवृढः स्वामी । आकारितैराह्वानैः । 'आच्छिद्यमानैरपह्रियमाणैः । यत्र दिने पुष्यनक्षत्रे राजा स्नाति तद्दिनं पुष्याभिषेकाख्यम् । श्यामायमानं कालत्वमाप- द्यमानम् । अथ च दिवसः श्यामायति । रात्रिवदाचरतीति वक्रोक्तिः । अभिषेक- दिनानि च ध्वजादिरम्याणि । अनवरतेत्यादौ । तुरङ्गैरस्तरङ्गायमाणमिति संबन्धः । मृदोऽङ्गं मृदङ्गश्च मुरजः । सृक्विण्योष्ठपर्यन्तौ । अन्यत्रेत्यादो—क्रुमेलककुलैः कपि- पट्टबन्ध के लिए लाये गये, कुछ धौसे चढ़ाने के लिए लाये गये, कुछ नये पकड़े हुए, कुछ कर रूप में प्राप्त, कुछ उपहार में मिले, कुछ (सम्राट् के) प्रथम दर्शन क कुतूहल में लाये गये, कुछ नागवीथी या नागवन के अधिपतियों द्वारा भेजे गये, कुछ शबर बस्तियों के सरदारों द्वारा भेजे हुए, कुछ गजयुद्ध की क्रीड़ाओं और खेल-तमाशों के लिए बुलवाये गये या स्वेच्छा से दिये गये, कुछ दूत भेजने से भेजे गये, कुछ दिये गये, कुछ बलपूर्वक छीने गये, कुछ बंधन से मुक्त हुए और कुछ पहरे के लिए रखे गये थे, मानों समस्त द्वीपों पर विजय पाने की इच्छा से समुद्रों में पुल बांधने के लिए पहाड़ के पहाड़ लुट गये हों, ध्वजपट, पटह, शंख, चामर, अंग- राग आदि से सजे हाथी दीख पड़े, मानों पुष्य अभिषेक के दिन हों। वहाँ घोड़े लहरों के समान मचल रहे थे। उनके चंचल खुरों की टाप हमेशा मृदंग की आवाज में जमीन पर पड़ रही थी, मानों राजलक्ष्मी को नचा रहे थे। थूथन तक बहते हुए मुँह के गाज के अट्टहास से वे मानों वेग में विजड़ित जाँघ वाले हरिणों का उपहास कर रहे थे । प्रसन्नता से इस तरह हिनहिना रहे थे मानों होड़ के लिए इन्द्र के घोड़े उच्चैःश्रवा को पुकार रहे हों। सूर्य के रथ

१०० हर्षचरितम् पूरैः सरक्तोत्पलैरिव रक्तशालिशालेयैरनवरतझणझणायमानचारुचामीकर- घुरुघुरुकमालिकैर्जत्करञ्जवनैरिव रणितशुष्कबीजकोशीशतैः श्रवणोपान्त- प्रेङ्खत्पञ्चरागवर्णोर्णाचित्रसूत्रजूटजटाजालैः कपिकपोलकपिलैः क्रमेलककुलैः कपिलायमानम्, अन्यत्र शरज्जलधरैरिव सद्यःस्रुतपयःपटलधवलतनुभिः कल्पपादपैरिव मुक्ताफलजालकजायमानालोकलुप्तच्छायामण्डलैनारायण- नाभिपुण्डरीकैरिवाश्लिष्टगरुडपक्षैः क्षीरोदोद्देशैरिव द्योतमानविकटविद्रुम- दण्डैः शेषफणाफलकैरिवोपरिस्फुरत्स्फीतमाणिक्यखण्डैः श्वेतगङ्गा- पुलिनैरिव राजहंसोपसेवितैरभिभवद्भिरिव निदाघसमयमुपहसद्भिरिव लायमानमित्यन्वयः । वराटिकाः श्वेतिकाः । शालीनां भवनं क्षेत्रं शालेयम् । 'व्रीहिशाल्योर्ढक्' । बीजकोशी शिम्बिका । क्रमेलका उष्ट्राः । अन्यत्रेत्यादिनाऽऽत- पत्रखण्डैः श्वेतायमानमित्यन्वयः । सद्य इत्याद्यभिप्रायेण शरद्ग्रहणम् । स्रुतं निर्गतम् । पयः क्षीरम्, जलं च । पटलवत्तेन च धवला तनुराकारो येषाम् । अन्यत्र, —धवलाश्च ते तनवः, क्षीणाश्च ते । पुण्डरीकग्रहणेनाकारसदृशत्वमप्युच्यते । गरुडपक्षा रत्नभेदाः, गरुडस्य चाङ्गरुहाः । क्षीरोदेति । शुक्लतया राजहंसाः मुख्यनृपाः रक्तचञ्चुचरणा राजहंसाः । निदाघस्य तिरस्करणादभिभवद्भिरिवेत्युक्तम्-उपहस- के घोड़ों की मानों ईर्ष्या से वे स्वयं अपनी चामरमाला को पंख बनाकर आकाश में उड़ जाना चाहते थे । अन्यत्र ऊँटों ने राजद्वार को कपिल वर्ण में परिणत कर दिया था। कुछ ऊँट भेजे गये थे, कुछ भेजे जा रहे थे, कुछ भेजे गये थे, फिर वापिस आ गये थे । उनके मुँह के चारों ओर कौड़ियाँ गूँथ कर पहना दी गई थीं जो मानों बहुत योजन पार करने पर उनकी संख्या गिनने के लिए अक्षरों की माला थी और वे कौड़ियों पर इस तरह लगतीं मानों सायंकाल के आतप के टुकड़े हों । ऊँटों के कानों में लाल चंवरियों के फूल लगे थे मानों लाल वर्ण वाले धान के खेतों में लाल कमल उत्पन्न हों । सोने के बने घुँघुरुरों की माला हमेशा उनके गले में झनझन आवाज करती थी, ऐसा लगता था जैसे सूखे हुए करंज-वनों में उनकी गुठलियों के बीज बज रहे हों । उनके कानों के पास पंचरंगी ऊन के फुन्दने लटक रहे रहे थे । वे वानर के कपोल की भाँति कपिल वर्ण के थे । अन्यत्र उजले-उजले अनेक छत्र उस प्रदेश को श्वेत द्वीप बना रहे थे । वे छत्र पानी बरस जाने के बाद बिल्कुल सफेद वर्ण वाले शरत् काल के मेघ के समान थे । कल्पवृक्षों की भाँति उनमें मोतियों की झालरें लगी थीं, जिनसे उत्पन्न आलोक के द्वारा छाया मिट गई थी। उनमें गारुड रत्न पिरोये गये थे जैसे विष्णु के नाभि कमलों में गरुड़ के पंख लगे रहते हैं । उनके दण्ड विद्रुम के बने थे, मालूम होता था वह क्षीर समुद्र का एक भाग हो गया हो । जैसे शेषनाग के फनों पर माणिक्य के टुकड़े चमकते रहते हैं उसी प्रकार इनमें

द्वितीय उच्छ्वासः १०१ विवस्वतः प्रतापमापिबद्भिरिवातपं चन्द्रलोकमयमिव जीवलोकं जन- यद्भिः कुमुदमयमिव कालं कुर्वद्भिज्योत्स्नामयमिववासरं विरचयद्भिः फेन- मयीमिव दिवं दर्शयद्भिरकालकौमुदीसहस्राणीव सृजद्भिरुपहसद्भिरिव शातक्रतवीं श्रियं श्वेतायमानैरातपत्रखण्डैः श्वेतद्वीपायमानम्, क्षणदृष्ट- नष्टाष्टदिङ्मुखं च मुष्णद्भिरिव भुवनमाक्षेपोत्क्षेपदोलायितुं दिनं गतागता- नीव कारयद्भिरुत्सारयद्भिरिव कुनृपतिसम्पर्ककलङ्ककालीं कालेयीं स्थितिं विकचविशदकाशवनपाण्डुरदशदिशं शरत्समयमिवोपपादयद्भिर्बिसतन्तु- मयमिवान्तरिक्षमाविर्भावयद्भिः शशिकरुचोनां चलतां चामराणां सह- द्भिरिवेति । प्रतापस्योपहास एव समुचितो वैयर्थ्यात् । अथ च प्रतापपदेन भङ्ग्या विवस्वत आरोपितविजिगीषुव्यवहारत्वाच्छत्रुमनःसंतापकारि यश उक्तम् । आतपं प्रकाशम् । आपिबद्भिरिति । तस्य सर्वत एवातिदर्शनात् । जीवलोकमिति । यश्च जीवानां लोकस्तत्र कथं चन्द्रलोक इति विरोधः । कुमुदमयमिति । कुमुदमय- त्वाच्छुक्लं भवति न तु कालम् । कुमुदमयं च समयं कार्तिकादि । ज्योत्स्नेति । वासरे ज्योत्स्ना न संभवतीति विरोधः । एवं च दिवः फेनमयीत्वम् । जलदे हि फेनानामभावः । कौमुदी कुमुदिनी, कार्तिकी च ज्योत्स्ना । पूर्वं सामान्येनोक्ता इति । विशेषेण श्वेता इवाचरन्तः श्वेतायमानाः । तैस्तत्र तेषां स्वत एव श्वेतत्वाच्छ्वेत- पदेन कथमुपमानतेत्युच्यते । श्वेतगुणा इवाचरन्तः श्वेतायमानाः । तेन यथा श्वेतगु- णयोगादन्यत्किञ्चिच्छ्वेतेते तद्वदेतद्योगात् राजद्वारमिति । श्वेताः स्फटिका इत्यन्ये । केचित्तु ‘श्वेतमानैः’ इति पठन्ति । क्षणेत्यादौ चामराणां सहस्रैर्दोलायमानमित्यन्वयः । भी लगे हुए थे । गंगा के श्वेत सिकतिल तटों के समान उनके राजहंस की आकृतियाँ कढ़ी हुई थीं । मानो वे ग्रीष्मकाल पर विजय प्राप्त कर रहे थे, मानो सूर्य के प्रताप को हँस रहे थे, आतप को मानो पीते जा रहे थे, मानों जीवलोक को चन्द्रलोकमय बना रहे थे, काल को कुमुदमय बना रहे थे, दिन में चाँदनी ही चाँदनी फैला रहे थे, आकाश को मानों फेनमय दिखा रहे थे, असमय में हजारों चाँदनियों का निर्माण कर रहे थे; इन्द्र की सम्पत्ति का मानों उपहास कर रहे थे । चन्द्रमा की किरणों के समान उज्ज्वल चलते हुए चँवर भी स्कन्धावार की शोभा बढ़ा रहे थे । आठों दिशाओं को क्षणभर में ही स्पष्ट कर देते और क्षण भर में ढक लेते मानों इस प्रकार त्रिभुवन का ही अपहरण करने लगे हों । ऊपर नीचे डोलते हुए चामरों ने सूर्य की किरणों को क्रम से छोड़ते-रोकते हुए मानों दिन का आजा-जाना लगा दिया था । कुत्सित राजाओं द्वारा कलंकित कलियुग के आचारों को मानों वे झाड़ रहे थे । शरत्काल की छटा को उत्पन्न कर रहे थे जिनमें काश के उजले-

१०२ हर्षचरितम् त्रैर्दोलायमानम्, अपि च हंसयूथायमानं करिकर्णशङ्खैः, कल्पलता- वनायमानं कदलिकाभिः, माणिक्यवृक्षकवनायमानं मायूरातपत्रैः, मन्दाकिनीप्रवाहायमाणमंशुकेः, क्षीरोदायमानं क्षौमैः, कदलीवनायमानं मरकतयूखैः, जन्यमानान्यदिवसमिव पद्मरागबालातपैः, उत्पद्यमाना- पराम्बरमिवेन्द्रनीलप्रभापटलैः, आरभ्यमाणापूर्वनिशमिव महानीलमयू- खान्धकारैः स्यन्दमानानेककालिन्दीसहस्रमिव गारुडमणिप्रभाप्रतानैः अङ्गारकितमिव पुष्परागरश्मिभिः, कैश्चित्प्रवेशमलभमानैरधोमुखैश्चरण- नखपतितवदनप्रतिबिम्बनिभेन लज्जया स्वाङ्गानीव विशद्भिः कैश्चिदङ्गु- लीलिखितायाः क्षितेर्विकीर्यमाणकरनखकिरणकदम्बव्याजेन सेवाचाम- कलेरियं कालेयी। सर्वत्राग्निकलिभ्यां ढक्। पद्मरागा इव बालातपास्तैः। महानीला गरुडमणयः। पुष्परागाश्च मणिभेदाः। कैश्चिदित्यादो शत्रुमहासामन्तैः समन्तादा- सेव्यमानमित्यन्वयः। सेवेत्यादि। त्वयेदानीं चामरग्रहणेन सेवनीय इति तेषां हि क्षितिः कलत्रमतस्तद्द्वारेण सेवनेच्छा। 'हारस्य यो मध्यमणिस्तरलंः स प्रको- उजले फूल चारों ओर खिल जाते हैं, मानों आकाश को मृणालसूत्रों से भर रहे थे। हाथी के कानों के शंख हंससमूह की भांति लग रहे थे। केले के खम्भे इस तरह लगाये गये थे कि राजद्वार कल्पलतावन के समान लग रहा था। नाचते हुए मोर के बह्रमण्डल की आकृति वाले मायूर आतपत्रों से वह स्थान माणिक्य के वृक्षों के वन के समान हो रहा था। वहाँ अंशुक इस तरह लहरा रहे थे कि आकाशगङ्गा का प्रवाह बन गया। क्षौम वस्त्रों से क्षीरसमुद्र का दृश्य उत्पन्न हो रहा था। मरकत मणियों की हरी-हरी किरणें इस तरह फैल गई थीं मानों वह केले का वन हो। पद्मराग मणियों की लाल-लाल किरणें उषाकाल की लाली के समान छिटक रही थीं मानों दूसरा दिन होने लगा हो। इन्द्रनीलमणियों की नीली प्रभा के फैलने से मानों दूसरा आकाश उत्पन्न हो गया ऐसा लग रहा था। महानील मणियों की किरणें इस तरह फैल रही थी मानों कोई अपूर्व रात्रि ही उत्पन्न होने वाली हो। गारुड मणियों की प्रभा इस प्रकार फैलती जा रही थी मानो यमुना के हजारों प्रवाह चल पड़े हों। पुष्पराग मणियों की रश्मियाँ अङ्गारे की भाँति लग रही थीं। भुजनिर्मित अनेक शत्रु महासामन्त वहाँ उपस्थित थे। कुछ तो भीतर प्रवेश नहीं पाने के कारण मुख नीचा किये हुए खड़े थे, चरण के नखों पर उनका मुख प्रतिबिम्बित हो रहा था मानो वे लज्जा के कारण अपने ही अङ्गों में सिमटते जा रहे थे। कुछ बैठे-बैठे अंगुलियों से जमीन पर लिख रहे थे, अपने नख के फैलते हुए किरणजाल से महाराज की सेवा में मानो

राणीवापयद्भिः कैश्चिदुरःस्थलदोलायमानेन्द्रनीलतरलप्रभापट्टैः स्वामि- कोपप्रशमनाय कण्ठबद्धकृपाणपट्टैरिव कैश्चिदुच्छ्वाससौरभभ्राम्यद्भ्रमर- पटलान्धकारितमुखैरपहृतलक्ष्मीशोकधृतलम्बश्मश्रुभिरिवान्यैः शेखरोड्डीय- मानमधुपमण्डलैः प्रणामविडम्बनाभयपलायमानमौलिभिरिव निर्जितै- रपि सुसंमानितैरिवानन्यशरणैरन्तरान्तरा निष्पततां विशतां चान्तर- प्रतीहाराणामनुमार्गप्रधावितानामर्थिजनसहस्राणामनुयायिनः पुरुषान श्रा- न्तैः पुनः पुनः पृच्छद्भिः 'भद्र ! अद्य भविष्यति भुक्त्वा स्थाने दास्यति दर्शनं परमेश्वरः, निष्पतिष्यति वा बाह्यां कक्षाम्' इति दर्शनाशया दिवसं नयद्भिर्भुजनिर्जितैः शत्रुमहासामन्तैः समन्तादासेव्यमानम्, अन्यैश्च प्रतापानुरागागतैर्नानादेशजैर्महामहोपालैः प्रतिपालयद्भिन्नरपतिदर्शनकाल- मद्ध्यास्यमानम्, एकान्तोपविष्टैश्च जैनैराहतैः पाशुपतैः पाराशरिभिर्वर्णिभिः सर्वदेशजन्मभिश्च जनपदैः सर्वाम्भोधिवेलावनवलयवासिभिश्च म्लेच्छ-


तितः' । चपलो वा । शेखरं मुण्डमालिकम् । मोलयः केशाः । निर्जितैः पुरस्कृत- न्यक्कृतैः, राजसेवाप्राप्तैः, संमानितैः पूजितैरिव । अनुयायिन इति । तेषां स्वयं सुलभत्वात् । जैनैः शाक्यैः । आर्हतैनंग्नक्षपणकैः । पाशुपतैः शैवभेदैः । पराशरेण


चँवर अर्पित कर रहे हों । कुछ के वक्ष पर लटकते हुए इन्द्रनील की प्रभा तरल हो रही थी मानो उन्होंने महाराज के क्रोध को शान्त करने के लिए अपने-अपने कण्ठ में कृपाण बाँध लिये थे । कुछ के मुख पर उच्छ्वास की सुगन्ध से भौंरे छा गये थे, मानों लक्ष्मी के अपहरण कर लिये जाने के शोक से उन्होंने बड़ी लम्बी दाढ़ी बढ़ा रखी थी । उनके मस्तक के ऊपर भौंरे मँडरा रहे थे, मानो प्रणाम करने के लिए झुकने के तिरस्कार के भय से उनके धम्मिल्ल उड़े जा रहे थे । वे पराजित थे, फिर भी सम्मानित के समान थे । उनका कोई दूसरा आश्रय नहीं था । बीच-बीच में अन्तःपुर से द्वारपाल निकलते तो उनके पीछे-पीछे अनेक याचक दौड़ पड़ते, आगे जानेवाले पुरुषों से ये शत्रुसामन्त बिना थकते पूछते रहते थे कि 'भद्र, सजाये जाते हुए मुक्तास्थानमण्डप में सम्राट् आज दर्शन देंगे या वे बाहरी आस्थानमण्डप में निकल कर आयेंगे ?' इस प्रकार सम्राट् के दर्शनों की आशा में दिन बिताते थे । भिन्न-भिन्न देशों के दूसरे राजे जो प्रताप अनुराग से पधारे हुए थे, महाराज के दर्शनों के अवसर की प्रतीक्षा में वहाँ विराजमान थे । एक ओर बौद्ध, जैन, शैव, संन्यासी, ब्रह्मचारी, अनेक देशों के लोग, समुद्रों के तटवर्ती जंगलों के निवासी म्लेच्छ और अनेक देशों के आये हुए राजदूत वहाँ वर्तमान थे । वह राजद्वार मानो प्रजा-

४. उच्छ्वास ७-८: हर्षवर्धन का दिग्विजय-प्रयाण, राज्यश्री-उद्धार एवं ग्रन्थ उपसंहार

१०४ हर्षचरितम् जातिभिः सर्वदेशान्तरागतैश्च दूतमण्डलैरूपास्यमानम् सर्वप्रजानिर्माण- भूमिमिव प्रजापतीनां, लोकत्रयसारोच्चयरचितं चतुर्थमिव लोकम्, महा- भारतशतैरप्यकथनीयसमृद्धिसंभारम्, कृतयुगसहस्रैरिव कल्पितसन्निवेशम् स्वर्वाबुंदैरिव विहितरामणीयकम्, राजलक्ष्मीकोटिभिरिव कृतपरिग्रहं राजद्वारमगमत् । अभवच्चास्य जातविस्मयस्य मनसि—‘कथमिवेदमियत्प्रमाणं प्राणि- जातं जनयतां प्रजासृजां नासीत्परिश्रमः, महाभूतानां वा परिक्षयः, पर- माणूनां वा विच्छेदः, कालस्य वान्तः, आयुषो वा व्युपरमः, आकृतीनां वा परिसमाप्तिः' इति । मेखलकस्तु दूरादेव द्वारपाललोकेन प्रत्यभिज्ञाय- मानः 'तिष्ठतु तावत्क्षणमात्रमत्रैव पुण्यभागी' इति तमभिधायाप्रतिहतः पुरः प्राविशत् । प्रोक्तमधीयते पाराशरिणो यतयस्तैः । वर्णिभिर्ब्रह्मचारिभिः । सर्वप्रजेति । अत्र हि स्थित्वा यदि प्रजापतयो न सृज्येयुः तत्कथं सर्वे भावाः कारणभूता इव तत्र लक्ष्येरन् । अर्बुदं दशकोटयः । कोटिलक्षशतम् । इह तु बहुसंख्योपलक्षणार्थावर्बुदकोटिशब्दौ । परिसमाप्तिरन्तारम्भः । तिष्ठत्विति । विद्यायुक्ते कदाचिदनादरशङ्केत्येतदर्थं- माह—पुण्यभागीति । पतियों को सब प्रकार की प्रजाओं के निर्माण का स्थान था। तीनों लोकों के सार को इकट्ठा करके मानो कोई चौथा लोक बना दिया गया था। सैकड़ों महाभारत भी लिखे जाँय फिर भी उसके वैभव का वर्णन नहीं किया जा सकता । मानो हजारों सतयुगों ने अपने-अपने रहने के लिए वहां भवन बना लिया था । मानो करोड़ों स्वर्गों उसको शोभा बढ़ा रहे थे। करोड़ों की संख्या में राजलक्ष्मी ने आकर उसे मानों अपना आश्रय बना लिया था । बाण को आश्चर्य हुआ, उसके मन में हुआ—'इतने प्राणियों को उत्पन्न करते हुए प्रजापतियों को कैसे नहीं थकान हुई ? या पांचों महाभूत समाप्त क्यों न हुए ? परमाणुओं का विच्छेद क्यों न हुआ ? समय का अन्त या आयु का खात्मा या आकृतियों की परिसमाप्ति क्यों न हुई ?' इधर मेखलक को दूर से ही द्वारपालों ने पहचान लिया । 'पुण्यभागी आप क्षण भर यहीं ठहरें' बाण से यह कह मेखलक बेरोकटोक भीतर घुस गया ।

द्वितीय उच्छ्वासः १०५

अथ स मुहूर्तादिव प्रांशुना, कर्णिकारगौरेण, वीध्रकञ्चुकच्छन्नवपुषा, समुन्मिषन्माणिक्यपदकबन्धबन्धुरवस्तबन्धकृशावलग्नेन, हिमशैल- शिलाविशालवक्षसा, हरवृषककुदकूटविकटांसतटेन, उरसा चपलहृषीक- हरिणकुलसंयमनपाशमिव हारं बिभ्रता, 'कथयतं यदि सोमवंशसंभवः सूर्यवंशसंभवो वा भूपतिरभूदेवंविधः' इति प्रष्टुमानीयताभ्यां सोमसूर्याभ्या- मिव श्रवणगताभ्यां मणिकुण्डलाभ्यां समुद्भासमानेन, वहद्वदनलावण्य- विसरवेणिकाक्षिप्यमाणेराधिक्रारगौरवाद्वोयमानमार्गेणेव दिनकृतः किरणैः प्रसालब्धया विकचपुण्डरीकमुण्डमालयेव दीर्घया दृष्ट्या दूरादेवानन्द- यता, नैष्ठुर्याधिष्ठानेऽपि प्रतिष्ठितेन पदे पदे प्रश्रयमिवावनम्रेण, मौलिना


अथेत्यादौ । ईदृशपुरुषेणानुगम्यमानो निर्गत्यावोचदिति संबन्धः । अन्तराले स्वतन्त्ररादिवर्णनामावादथेत्यादिना समनन्तरमेव निर्गमनेन पुनरादर एव प्रती- यते । अत आह—मुहूर्तादिवेति । पुरुषानुगतत्वेन चादर एव पोष्यते । वीध्रं निर्म- लम् । बन्धुरं शोभनम् । वस्तं सुवर्णपट्टिकाकटिसूत्रम् । तस्य बन्धेन निवेशनेन कृशमवलग्नं मध्यं यस्य तेन । हिमशैले । हिमग्रहणं राज्ञो धवलत्वात् । हरग्रहणं जराशौक्ल्यप्रतिपादनाय पूर्ववत् । हृषीकाणीन्द्रियाणि । आनीताभ्यामिति । आन- यने तस्य प्रमविष्णुता ध्वन्यते । यश्च स्रष्टुमानीयते स श्रवणं गच्छति । वेणिका


तब कुछ ही क्षण में मेखलक बाहर निकला उसके पीछे-पीछे एक दूसरा भी पुरुष था । वह लम्बा और कर्णिकार की भाँति पीतवर्ण का था । उसका शरीर निर्मल कंचुक से ढँका था । उसकी कमर चमकते हुए माणिक्य के पदकों वाली सुन्दर पेटी से बँध जाने के कारण पतली हो गई थी । उसकी छाती हिमालय की चट्टान के समान चौड़ी थी । शिव के वाहन वृषभ की पीठ के टाट के समान उसके दोनों कन्धे थे । वह अपने चंचल इन्द्रिय- हरिणों को बांध रखने के लिए पाश के समान अपने वृक्ष पर हार धारण किये हुए था । चन्द्र और सूर्य के समान मणिकुण्डल उसके कानों में शोभित हो रहे थे, मानों वे (चन्द्र और सूर्य) उन कानों से पूछ रहे थे कि 'यदि चन्द्रवंश में या सूर्यवंश में कोई हर्ष जैसा सम्राट् उत्पन्न हुआ हो तो उसे बताओ।' वह दूर ही से अपनी बड़ी-बड़ी आँखों द्वारा आनन्दित कर रहा था, उसकी आँखें खिले हुए पुण्डरीक की मानो मुण्डमाला थी, जिसे सूर्य की किरणों ने प्रसन्न होकर मानो अर्पित किया था, क्योंकि उसके मुख की लावण्यप्रभा के प्रवाह से वे किरणें बिल्कुल तिरस्कृत हो रही थीं, फिर भी सूर्य के अधिकार-गौरव को देख- कर उसने उनके लिए मार्ग दे दिया था । अत्यन्त निष्ठुर पद पर प्रतिष्ठित होने पर भी वह अपने झुके मस्तक से विनय की भाँति सफेद पगड़ी धारण किये था। उसके बायें हाथ में स्थूल

१०६ हर्षचरितम् पाण्डुरमुष्णीषमुद्वहता, वामेन स्थूलमुक्ताफलच्छुरणदन्तुरत्सरुं करकिस- लयेन कलयता कृपाणम्, इतरेणापनीततरलतां ताडिनीमिव लतां शात- कौम्भीं वेत्रयष्टिमुन्मृष्टां धारयता पुरुषेणानुगम्यमानो निर्गत्यावोचत्— 'एष खलु महाप्रतीहाराणामनन्तरश्चक्षुष्यो देवस्य पारियात्रनामा दौवा- रिकः। समनुगृह्णात्वेनमनुरूपया प्रतिपत्त्या कल्याणाभिनिवेशी' इति। दौवारिकस्तु समुपसृत्य कृतप्रणामो मधुरया गिरा सविनयमभाषत— 'आगच्छत। प्रविशत देवदर्शनाय। कृतप्रसादो देवः' इति। बाणस्तु 'धन्योऽस्मि, यदेवमनुग्राह्यं मां देवो मन्यते' इत्युक्त्वा तेनोपदिश्यमान- मार्गः प्राविशदभ्यन्तरम्। अथ वनायुजैः, आरट्टजैः, काम्बोजैः, भारद्वाजैः, सिन्धुदेशजैः, पारसी- प्रवाहः। वामेनेति। तदा तस्य व्यापारानुपपत्तेः अपनीतेत्यादिनास्य नियम- विधायित्वं पोष्यते। उन्मृष्टामुत्तंसिताम्। अनेन भास्वरतैव पोष्यते। अनन्तरः प्रधानम्। चक्षुष्यः प्रियः। आगच्छतेत्यादौ बहुत्वनिर्देशेनादर एवास्यापाद्यते। अथेत्यादौ एवंविधैस्तुरङ्गैरारचितां मन्दुरां विलोकयन्दूरादिमधिष्ण्यागारम- पश्यदिति सम्बन्धः। वनायुजादीनि देशविशेषेणाश्वानां नामानि। शोणैरित्यादि- मोतियों की जड़ाऊ मूठ वाली तलवार था और दाहिनी हाथ में तरलता से रहित विद्युल्लता के समान; चमक चढ़ी सोने की वेत्रयष्टि थी। मेखलक ने कहा—'यह महाप्रतीहारों का मुखिया, महाराज का प्रिय, परियात्र नामक दौवारिक है। कल्याण में अभिनिवेश रखने वाले आप इसका उचित सम्मान करें। दौवारिक पारियात्र ने पास आकर प्रणाम किया और मधुर आवाज में विनयपूर्वक बोला—'आप आइए, और महाराज के दर्शन के लिए प्रवेश कीजिए, महराज आप पर प्रसन्न हैं। बाण ने कहा—'मैं धन्य हूँ, जो मुझे महाराज इस प्रकार अपने अनुग्रह के योग्य समझ रहे हैं।' यह कहकर पारियात्र के द्वारा मार्ग दिखाने जाने पर बाण ने भीतर प्रवेश किया। बाण ने भीतर प्रवेश करते ही अनेक राजवल्लभ तुरङ्गों की बनी हुई मन्दुरा (घोड़साल) देखीं। वहाँ कुछ वनायुज (वानाघाटी वजीरिस्तान में उत्पन्न) घोड़े, कुछ आरट्टज (वाहीक या पंजाब में उत्पन्न) घोड़े; कुछ काम्बोज (मध्य एशिया में वन्धु नदी के पामीर प्रदेश में उत्पन्न) घोड़े, कुछ भारद्वाज (उत्तरी गढ़वाल के) घोड़े, कुछ सिन्धुदेशज (सिंधसागर या थल दोआब के उत्पन्न) घोड़े, कुछ पारसीक (सासानी ईरान के) घोड़े थे। कुछ शोण (लालकुम्मैत), कुछ श्याम (मुदकी), कुछ श्वेत (सब्जा), कुछ पिञ्जर (समंद), कुछ हरित (नीलासब्जा),

[Header] Digitized by Arya Sanद्वितीय उच्छ्वासःhennai and eGangotri १०७

कैश्च, शोणैश्च, श्यामैश्च, श्वेतैश्च, पिञ्जरैश्च, हरिद्भिर्श्च, तित्तिरिकल्माषैश्च, पञ्चभद्रैश्च, मल्लिकाक्षैश्च, कृत्तिकापिञ्जरैश्च, आयतनिर्मांसमुखैः, अनुत्क- टकर्णकोशैः, सुवृत्तश्लक्ष्णसुघटितघण्टिकाबन्धैः, यूपानुपूर्वीवक्रायतोदग्र- ग्रीवैः, उपचयश्वसत्स्कन्धसंधिभिः, निर्भुग्नोरःस्थलैरस्थूलप्रगुणप्रसृते- वर्णविशेषवर्णनम् । 'शोणः पद्मारुणः स्मृतः' । पिञ्जरैरीषत्कपिलैः । हरिच्छुकनिभो वर्णः । तित्तिरिः पक्षिभेदस्तद्वच्चित्रैः । 'सिताश्च यस्य वाजिनः शफाः समस्तकं मुखम् । स पञ्चभद्रनामको नृपस्य राज्यसौख्यदः' ।। शुक्लपर्यन्ते असिततारके नयने येषां ते मल्लिकाक्षाः । उक्तं च - 'पृथुस्निग्धा समा चैव मल्लिकाकुसुमप्रभा । राजी यस्य तु पर्यन्ते परिक्षेप्ये तु लोचने ।। सह यो मल्लिकाक्षस्तु दृष्टिपर्यन्ततारकः ॥' इति । तारकाः कदम्बककल्पनेकविन्दुकल्माषितत्वचः कृत्तिकापिञ्जरा यतः । आयतेत्यादि । तदुक्तम् - 'मुखं तन्वायतनातं चतुरस्रं समाहितम् । ऋजु चैवो- पदिष्टं च परिपूर्णं च शस्यते ॥' इति । कृष्णेनाप्युक्तम् - 'उज्जा अतुंगअत्थं गिम्मं संवाहिरान अच्छअणं' इति । अनुत्कटो ह्रस्वः । कोशो मध्यम् । शिरसो ग्रीवायाश्च यन्मध्यं स घण्टिकाबन्धः । यो निगाल इत्युच्यते तस्य सुवृत्तादि शस्यते । यदाह- 'ग्रीवाशिरोऽन्तरश्लिष्टो दीर्घवृत्तः समाहितः । नाद्धर्तो नार्धितो नातिदुनहिोऽति- विधानतः ॥ सुदिग्धोऽनुपदिग्धश्च निगालो गदितः शुभः ॥' इति । यूपो यज्ञचिह्नं तस्येवानुपूर्वी यस्याः । तथा वक्रा आयता उदग्रा उद्घुरा ग्रीवा येषाम् । तदुक्तम्- 'ग्रीवा मूलम्बिनी वृत्ता दीर्घा च सुसमाहिता । गले बद्धा विदोवृत्ता तथा शिरसि चोद्यता । निगाले स्याच्च निर्मांसा वृद्धो साकुञ्चिता भृशम् । श्लिष्टमांसाब्रबद्धा च तुरगस्य प्रशस्यते ॥ इति । उपचयेत्यादि । तदुक्तम् - 'स्कन्धः सुपरिपूर्णः स्याद्व्यक्त- मांसः पृथुत्रिकः । बहुमांसाङ्गसंश्लिष्टः स्थिरमांसश्च पूरितः ॥' इति । निर्भुग्नं स्थूल- त्वादबहिर्निःसृतम् । उक्तं च - 'स्थूलास्थि महदच्छिद्रं पृथुलं यच्च निर्वलि । उर ईदृक्प्रशंसन्ति स्थूलक्रोडं महत्तरम् ॥ इति । निर्भुग्नमुत्पन्नद्रोणिकमिति केचित् । कुछ तित्तिरकल्माष (तीतरपंखी) घोड़े थे । (शुभ लक्षणो वाले घोड़े थे ढंसे) पञ्चभद्र (अर्थात् पञ्चकल्याण-हृदय, पृष्ठ, मुख और दोनों पाश्र्वों में पुष्पित था भौंरी याला), मल्लिकाक्ष (शुक्ल अपांग वाला) और कृत्तिकापंजर (तारों जैसी सफेद चित्तियों वाला, चितकबरा) । उनका मुँह लम्बा और मांसरहित था, कान छोटे-छोटे थे, घंटी (सिर और गर्दन की जोड) गोल, चिकनी और सुडौल थी, गर्दन ऊपर उठी हुई और यूप की तरह लम्बी और टेढ़ी थी, कन्धे की जोड़ मांस से फूली हुई थी, छाती निकली हुई थी, जांघे पतली और सीधी थीं, खुर लोहे की भांति कड़े थे; वेग में टूटने के भय से मानो अंतड़ियों से रहित और गोल उदर भाग था (पीठ, छाती, कटि भागों के मांस के खिंच जाने से)

१०८ हर्षचरितम्

लोहपीठकठिनखुरमण्डलैः, अतिजवतृटनभयान्निर्मितान्त्राणीवोदराणि वृत्तानि धारयद्भिः, उद्यद्द्रोणीविभज्यमानपृथुजघनैः, जगतीदोलायमान- बालपल्लवैः, कथमप्युभयतो निखातदृढभूरिपाशसंयमननियन्त्रितैः, आय- तैरपि पश्चात्पाशबन्धपरवशप्रसारितैकाङ्घ्रिभिरायततरैरिवोपलक्ष्यमाणैः, बहुगुणसूत्रग्रथितग्रीवागण्डकैः, आमीलितलोचनैः, दूर्वारसश्यामळफेनल- वशबलान् दशनगृहीतमुक्तान् फरफरितत्वचः कण्डूजुषः प्रदेशान् प्रचाल- यद्भिः, सालसवलितवालधिभिः, एकशफविश्रान्तिश्रमस्रस्तशिथिलित- जघनार्धैः, निद्रया प्रध्यायद्भिश्च, स्खलितहुंकारमन्दमन्दशब्दायमानैश्च, ताडितखुरधरणीरणितमुखरशिखरखुरलिखितक्ष्मातलैर्घासमभिलषद्भिश्च, प्रकीर्यमाणयवसग्रासरसमत्सरसमुद्भूतक्षोभैश्च, प्रकुपितचण्डचण्डालहुङ्कार- कातरतरतरलतारकैश्च, कुङ्कुमप्रमृष्टिपिञ्जराङ्गतया सततसन्निहितनीरा- ऽस्थूलप्रगुणप्रांस्यतैनिर्मांसऋजुजङ्घैः । उक्तं च—'जङ्घे वृत्ते दीर्घे निर्मांसे पूजिते निगूढसिरे' इति । मण्डलशब्देन वृत्तत्वमुच्यते । तदुक्तम्—'खुरास्तुरङ्गे वृत्ताश्च ह्रस्वाश्च सुदृढा घनाः' इति । तथा शिलातलनभैः खुरैरिति । उदराणीति । तदुक्तम्- 'उदरं वृत्तमगुरु मृगस्योपचितं तथा । अच्छिद्रह्रस्ववृत्ताल्पसमकुक्षि च पूजितम् ॥' इति । द्रोणी शोभाविशेषः । यदाह— 'पृष्ठोरःकटिपार्श्वस्थमांसोत्कर्षणनिर्मिता । द्रोणिकेति प्रशंसन्ति शोभा वाजिनि पञ्चमी ॥' इति । बाला एव पल्लवाः । उभयत इति । अत्युद्दामवेगवत्त्वादुभयत्र पाशबन्धः । गण्डको भूषणभेदः । फरफरिताः पुनः पुनरीषत्कम्पिताः । वालधिः पुच्छः । शफः समुद्गयुक्तः पादः । खुरधरणी खुराग्रःकाष्ठपट्टाच्छादिता भूः । चण्डालोऽश्वपालः । प्रमृष्टिः प्रमार्जनम् । विता- प्रकट होता हुआ शोभा-विशेष उनके पुट्ठों को विभक्त कर रहा था। पूँछ के बाल जमीन तक लटक रहे थे। किसी प्रकार अगाड़ी और पिछाड़ी गड़ी हुई, मजबूत रस्सियों से बंध कर उन्हें नियन्त्रण में रखा गया था। वे लम्बे थे, फिर भी पिछाड़ी बाँधने से उनका एक पैर बिल्कुल फल गया था, इससे और भी उनकी लम्बाई बढ़ गई थी। उनके गले का गण्डक नामक अलंकार तिगुने-चौगुने सूत में गूँथा हुआ था। वे अपने खुजलाइट युक्त अंगों, जो दूब के रस से सांवले फेनों से रंग गये थे, जिन्हें दांतों से पकड़ कर छोड़ दिया था तथा जो फरफरा रहे थे, को चलाते रहते थे। आलस्य के साथ पूँछ टेढ़ी करते थे। एक ही खुर की टेक लेकर विश्राम करने से वे थक जाते और उनकी आधी जांघ हटाने लगती। नींद में कुछ सोच रहे थे। हूँफकर धीरे-धीरे हिनहिनाने लगते थे। खुर से पृथ्वी पर ताड़न से मुखर खुरों के अग्र-भाग से पृथ्वी पर लिखते और घास की अभिलाषा कर रहे थे।

द्वितीय उच्छ्वासः १०९ जनानलरक्ष्यमाणैरिवोपरिविततवितानैः, पुरःपूजिताभिमतदैवतैः, भूपाल- वल्लभैस्तुरङ्गैरारचितां मन्दुरां विलोकयन्, कुतूहलाक्षिप्तहृदयः किंचिदन्त- रमतिक्रान्तो हस्तवामेनात्युच्चतया निरवकाशमिवाकाशं कुर्वाणम्, महता कदलीवनेन परिवृतपर्यन्तं सर्वतो मधुकरमयीभिर्मदस्स्रुतिभिर्नदीभिरिवापत- न्तीभिरापूर्यमाणम्, आशामुखविसर्पिणा बकुलवनानामिव विकसतामामो- देन लिम्पन्तं घ्राणेन्द्रियं दूरादव्यक्तमभिधिष्ण्यागारमपश्यत् । अपृच्छच्च- ‘अत्र देवः किं करोति ?' इति । असावकथयत्—'एष खलु देवस्यौपवाह्यो बाह्यं हृदयं जात्यन्तरित आत्मा बहिश्चराः प्राणा विक्रमक्रीडासुहृद्दर्पशात इति यथार्थनामा वारणपतिः । तस्यावस्थानमण्डपोऽयं महान् दृश्यते' नकं रक्तकम् । देवतात्र गोविन्दः आरचितां भूषिताम् । हस्तवामशब्दो भाष्यकृता वामहस्तमार्ग इत्यर्थे धृतः । बकुलेत्यादिना प्राशस्त्यमेव पोषयति । तदुक्तम्—'माल- तीमुक्तपुंनागबकुलोपमसौरभम् । दानं पिष्टाम्बुसदृशं मुञ्चञ्श्वेतं तु शीतलम् ॥' इति । श्लैष्मिका दानलक्षणम् । एवं च घर्मलक्षणे तु प्रकोपसमयेऽपि तथाविधमद- वर्णनया श्लेषप्रकृतित्वं प्रकाशयति—'श्लेष्मप्रकृतिकं श्रेष्ठं मद्रजाति तथैव च' इति च शास्त्रकृता दर्शितम् । धिष्ण्यं मण्डपम् । औपवाह्यः क्रीडा हस्ती । यस्मात्केचन संनाह्याः केचिद्भद्रजातीया उभयस्वभावा भवन्ति करिणः । अस्य च यद्यपि विक्रम- क्रीडासुहृदित्यनेन दर्पशात इति यथार्थनामा वारणपतिरित्यनेन च सांन्नाह्यत्व- मेवोक्तम्, तथाप्यौपवाह्य इति कथनेऽद्वंद्वयेऽपि योग्यत्वाद्वद्रजातीयत्वं चास्य बिखेरी जाती हुई घासों के मत्सर से क्षुब्ध हो उठे थे। सईसों की तगड़ी डंपटान सुनकर मारे डर के उनकी पुतलियाँ दीन भाव से फिरने लगती थीं। उनके अङ्ग मानों केसर से मले गये थे अतः मानों उनके समीप सदा नीराजन अग्नि जलती हो । उनके ऊपर चंदोवे तने हुये थे। उनके सामने अभीष्ट देवता पूजे गये थे। मन्दुरा को देखकर बाण का हृदय कुतूहल से भर गया और कुछ आगे बढ़कर बायीं ओर दूर होने से अव्यक्त से हाथोसाल को देखा जो अत्यन्त ऊँचा होने से आकाश को अवकाशहीन बना रहा था। केलों के विशाल वन से वह चारों ओर से घिरा हुआ था। सब ओर से नदियों की भाँति बहती हुई मद की धारायें थीं जिन पर भौरें झूल रहे थे। उसकी गन्ध दिशाओं में इस प्रकार फैल रही थी मानों मौलसिरी के फूलने की गन्ध नाक में भर रही हो। बाण ने मेखलक से पूछा—'यहाँ महाराज क्या करते हैं ?' उसने कहा—'यह महाराज का क्रीड़ाहस्ती यथार्थनामा दर्पशात है, जिसे वे युद्ध में साथ ले जाते हैं। यह महाराज का बाहरी हृदय है, दूसरे स्वरूप में आत्मा है, बहिश्चर प्राण है। उसका यह विशाल अवस्थान मण्डप दिखाई दे रहा है।' बाण ने उससे कहा—

११० हर्षचरितम् इति । स तमवादीत्—'भद्र ! श्रूयते दर्पशातः । यद्येवमदोषो वा पश्यामि तावद्धारणेन्द्रमेव । अतोऽर्हसि मामत्र प्रापयितुम् । अतिपरवानस्मि कूतूहलेन' इति । सोऽभाषत—'भवत्वेवम् । आगच्छतु भवान् । को दोषः । पश्यतु तावद्धारणेन्द्रम्' इति । गत्वा च तं प्रदेशं दूरादेव गम्भीरगलगर्जितैर्वियति चातक- कदम्बकैर्भुवि च भवननीलकण्ठकुलैः कलकेकाकलकलमुखरमुखैः क्रियमाणाकालकोलाहलम्, विकचकदम्बसंवादिमदसुरासौरभभरित- भुवनम्, कायवन्तमिवाकालमेघकालम्, अविरलमधुबिन्दुपिङ्गल- पद्मजालकितां सरसीमिवान्यवगाढां दशां चतुर्थीमुत्सृजन्तम्, निधीयते । जात्यन्तरितो द्वितीयां जातिं हस्तिरूपां प्राप्तः । यद्येवमिति । यदि सत्यं दर्पशातोऽयमदोषो वेति । वाशब्दश्चार्थे । यदि च न दोष इत्यर्थः । यतो रसदाना- दिमयेन केनचिद् द्रष्टुं न लभ्यते । कुतूहलेन परवान्कुतूहलायितः । गत्वेत्यादौ । दूरादेव दर्पशातमपश्यदिति सम्बन्धः । गर्जितं बृंहितम् । चातकाः स्तोककाः । नीलकण्ठा मयूराः । केका मयूररुतानि । मेघकालमिति । मेघकालश्च चातककदम्बनीलकण्ठकुलकदम्बकसौरभादियुक्तः । अविरला घना ये मधुविन्दव इव मधुविन्दवो माक्षिककणास्तद्वत्पिङ्गलाणि पद्मजालकानि संजातानि यस्याम् । 'पद्मकं बिन्दुजालं स्याद्गात्रकं करिणामिति' । यथा—'पद्मस्वस्तिकसंस्थानो बिन्दु- मिश्र कचैस्तथा । स्वङ्गिताङ्कस्तुषारामः शावः शक्तिकरः करी ॥' इत्युक्तम् । अन्ये मधुबिन्दवो मकरन्दकणास्तैः पिङ्गलानीति व्याख्येयम् । महत्सरः सरसी । अत्यव- गाढामिति । परिणताम् । दशां कालावस्थाम् । चतुर्थीमिति । 'चतुर्थ्यामवगाढायां 'भद्र, दर्पशात का नाम सुना जाता है। यदि ऐसी बात है और कोई झंझट न हो तो उस गजराज को देखूँगा। मुझे वहाँ ले चलो, मैं अपने कुतूहल के वेग से लाचार हूँ।' वह बोला—'ऐसी बात है तो आइये, झंझट क्या है ? तब तक गजराज को देख लें।' उस स्थान में जाकर बाण ने दूर ही से दर्पशात को देखा । उसकी गम्भीर चिग्घाड़ से आकाश में चातक पक्षी और पृथ्वी पर गृहमयूर अव्यक्त-मधुर एवं केका की आवाज से मुखरित हो असमय में कोलाहल कर रहे थे। उसकी गम्भीर चिग्घाड़ सुनकर आकाश में चातक पक्षी मेघ की गड़गड़ाहट समझ कर कोलाहल करने लगे और पृथिवी के गृहमयूर अपनी केका- वाणी द्वारा असमय में मुखरित हो उठे। खिले हुए कदम्ब के समान अपने मद की सुरासौरभ से उसने दिशाओं को भर दिया था। असमय में वर्षाकाल मानो शरीरधारी हो गया था। पूर्ण मधु-बिन्दुओं के कण पिङ्गल वर्ण. से पद्म-समूहों से भरी हुई सरसी की भांति सघन मधुमाक्षिकों की तरह पिङ्गल वर्ण के पद्मकः नाम के बूंदों से युक्त परिपक्व चतुर्थी अवस्था को छोड़ रहा था।

अनवरतमवतंसशङ्खैरामन्द्रकर्णतालदुन्दुभिध्वनिभिः पञ्चमीप्रवेशमङ्गला- रम्भमिव सूचयन्तम्, अविरतचलनचित्रत्रिपदोललितलास्यलयैर्दोलाय- मानदीर्घदेहाभोगवतया मेदिनीविदलनभयेन भारमिव लघयन्तम्, दिग्भित्तितटेषु कायकिव कण्डूयमानम्, आहवायोदस्तहस्ततया दिग्द्वार- णानिवाह्वयमानम्, ब्रह्मस्तम्भमिव स्थूलनिशितदन्तेन करपत्रेण पाटयन्तम्, अमान्तं भुवनाभ्यन्तरे बहिरिव निर्गन्तुमीहमानम्; सर्वतः- सरसकिसलयलतालासिभिर्लेशिकैश्चिरपरिचयोपचितैर्वनेरिव विक्षिप्तं, सशैवलबिसविसरशबलसलिलैः सरोभिरिव चाधोरणैराधीयमाननिदाघ- समयसमुचितोपचारानन्दम्, अपि च प्रतिगजदानपवनादानदूरोत्क्षिप्ते- नानेकसमरविजयगणनालेखाभिरिव वलिवलयराजिभिस्तनीयसीभिस्तर- ङ्गितोदरेणातिस्थवीयसा हस्तार्गलदण्डे नार्गलयन्तमिव सकलं सकुलशैल- समुद्रद्वीपकाननं ककुभां चक्रवालम्, एकं करान्तरापितेनोत्पलाशेन लेखाबिन्दुभिराचितः' इत्युक्तम् । शङ्खैः । शङ्खशब्दैरित्यर्थः । कर्णेत्यादि । कर्णौ च दुन्दुभिश्वनितौ । 'कर्णौ च करिणः कार्यंकारिणो सत्प्रशंसिनौ' इति । पञ्चमो दशा त्रिपदी । एकपदोत्क्षेपे पादत्रयावस्थितिः । लयो लीलाः । आहवः संग्रामः । ब्रह्मस्तम्भो ब्रह्माण्डम् । करपत्रं क्रकचं स्थूलनिशितदन्तं भवति । तच्च भेदयति स्तम्भम् । अमान्तमवर्तमानम् । लेशिकैर्घासिकैः । आधोरणैर्गजारोहैः । वलयाकारा वलिर्वलिवलयम् । अर्गलयन्तं सनाटकं कुर्वाणम् । कुमुदवनानीत्युत्प्रेक्षा । दन्तयो- र्वर्णप्राशस्त्यमाह—'पयःकुमुदकुन्दाभौ केतकीकुमुदद्युती । मृगाङ्ककिरणालोको कीर्ति- निरन्तर कानों के शंख गम्भीर कर्णताल तथा दुन्दुभि के समान आवाज द्वारा मानों वह पांचवीं स्वास्थ्यदशा के प्रवेश का मंगळारम्भ सूचित कर रहा था। अपने तीन पैरों पर खड़ा होकर सुन्दर नृत्य की मुद्रा में स्थूल शरीर को निरन्तर लम्बित कर रहा था, मानों पृथिवी के धँस जाने के भय से बोझ को हल्का कर रहा हो। मानों वह (झूमता हुआ) दिशाओं की भीतों में अपनी देह खुजला रहा था। मानों अपनी सूँड़ उठा-उठाकर दिग्गजो को युद्ध के लिए गुहार रहा था। अपने मोटे-मोटे और तेज दाँतों के आरे से मानों ब्रह्माण्ड को फाड़ रहा था । वह संसार में न अटने के कारण मानो बाहर निकलना चाहता था। मेघों की भाँति बहुत दिनों के परिचित घसियारे सरस पत्तों और लताओं से उसे नचा रहे थे, तथा सरोवरों की भाँति महावत सेवार सहित कमलनाल के जलों को छिड़क कर ग्रीष्म-काल के समुचित उपचार का आनन्द उसे दे रहे थे। वह अपनी सूँड के अर्गलादण्ड को जिसमें मानो अनेक समरों की विजय की गणना-लेख हों, ऐसे महीन चारों ओर की लकीरों से मध्यभाग में युक्त था, प्रति-

११२ हर्षचरितम् कदलीदण्डेनान्तर्गतशीकरसिच्यमानमूलम्, मुक्तपल्लवमिवापरं लीलाव- लम्बिना मृणालजालकेन समररसोच्चरोमाञ्चकण्टकितमिव दन्तकाण्ड- मुद्वहन्तम्, विसर्पन्त्या च दन्तकाण्डयुगलस्य कान्त्या सरःक्रीडास्वा- दितानि कुमुदवनानीव बहुधा वमन्तम्, निजयशोराशिवमिव दिशाम- र्पयन्तम्, कुकरिकीटपाटनदुर्विदग्धान् सिंहानिवोपहसन्तम्, कल्पद्रुम- दुकूलमुखपटमिव चात्मनः कलयन्तम्, हस्तकाण्डदण्डोद्धरणलीलासु च लक्ष्यमाणेन रक्तांशुकसुकुमारतरेण तालुना कवलितानि रक्तपद्म- वनानीव वर्षन्तम्, अभिनवकिसलयराशीनिवोद्गिरन्तम्, कमलकवलगीतं मधुरसमिव स्वभावपिङ्गलेन वमन्तं चक्षुषां, चूतचम्पकलवलीलवङ्ग- क्कोकोलवन्त्येलालतामिश्रितानि सहसकाराणि कर्पूरपूरितानि पारिजातक- कल्याणकारको ।।' इत्युक्तम् । रक्तांशुकेति । उक्तं च—'रक्तोष्ठतालुरसनम्' इति । स्वभावपिङ्गलेनेति । उक्तं च 'शशिसूर्यसमामासे कलविङ्काक्षसन्निभे । प्रसन्नमधु- पिङ्गे च स्थिरे चामीलने तथा ॥ अपरिस्राविणी चैव कुशाग्निनिभभास्वरे । नेत्रे शस्ते समे स्निग्धे दीर्घे चाविलपक्ष्मणो ।।' इति । चूतेत्यादिना प्रशस्तत्वमाह । यदाह—'उभयस्रुतिरप्येष विवर्णो हर्षवर्जितः । यदि स्यादपगन्धश्च तदासो न द्वन्द्वी हाथी के मद-जल की वायु ग्रहण करके दूर ऊपरं उठाया मानों कुल पर्वतों, समुद्रों, द्वीपों और जंगलों सहित दिशाओं के चक्रवाल को अर्गलित कर रहा हो । उसने अपने दांत के बीच सूँड़ से कदली का पत्ररहित दण्ड रख लिया था यथा उसके पानी से दन्तमूल सिंच रहा था मानों उसका पल्लवरहित दूसरा दन्तकाण्ड लीला से लटकाये मृणालों से प्रतीत होता था कि समर के अनुराग से उत्पन्न रोमाञ्च के कंटक से युद्ध हो, इस प्रकार वह अपने दोनों दांतों का धारण कर रहा था । उसके दोनों दाँतों की कान्ति आगे की ओर फैल रही थी, मानों वह जलक्रीडा के समय चखे हुए कुमुदवनों को अनेक प्रकार से वमन कर रहा था, अपनी यशो- राशि को दिशाओं के लिए (दाँत की किरणों के रूप में) अर्पित कर रहा था, उन शेरों पर हँस रहा था जो क्षुद्र गजों को विदीर्ण करके मतवाले बन जाते हैं, या वह कल्पवृक्ष के दुकूल का अपना मुखपट (रुमाल) बना रहा था। जब वह अपनी सूँड़ लीला से उठाया करता तो उसके मुख का रक्तांशुक के समान सुकुमार तालुभाग दिखाई देने लगता था, वह मानों गटके हुए लाल कमलों को बरसाने लगा हो, या नये-नये लाल पत्तों को उगल रहा हो । वह अपनी स्वाभाविक पीली आँखों से मानो कमलों के ग्रास के साथ पिये मधुरस का उदिगरण कर रहा था। सहकार और कपूर से युक्त पारिजात के वन का उसने उपभोग किया जिनमें आम, चंपक, लवली, लवंग, इलायची के भी आस्वाद लिये थे, मानों इसी से दोनों कपोलों से बहती

वनानीवोपभुक्तानि पुनःपुन करटाभ्यां बहलमदामोद्व्याजेन विसृज- न्तम्, अहर्निशं विभ्रमकृतहस्तस्थितिभिरर्धखण्डितपुण्ड्रेक्षुकाण्डकण्डूयन- लिखितैरल कुलवाचालितैर्दानपट्टकैर्लभमानमिव सर्वकाननानि करिप- तीनाम्, अविरलोदविन्दुस्यन्दिना हिमशिलाशकलमयेन विभ्रमनक्षत्र- मालागुणेन शिशिरीक्रियमाणम्, सकलवारणेन्द्राधिपत्यपट्टबन्धबन्धुर- मिवोच्चैस्तरां शिरो दधानम्, मुहुर्मुहुः स्थगितापावृतदिङ्मुखाम्यां कर्णता- लतालवृन्ताभ्यां वीजयन्तमिव भर्तृभक्त्या दन्तपर्यङ्किकास्थितां राज- लक्ष्मीम्, आयतवंशक्रमांगतेन गजाधिपत्यचिह्नेन चामरेणेव चलता बाल- सतां मतः ॥' इति करटाभ्यां गण्डाम्याम् । अर्धेत्यादिनेक्षुकाण्डकस्य लेखनीसा- दृश्यमाह । लिखितैः कृतलेखैरप्यलिकुलेषु सत्सु वाचालितशब्दयोगो येषामित्यने- नालिकुलस्य लिप्यक्षररूपतां ध्वनयति । लिप्यक्षरेषु च सत्सु पाठ्यमानेषु वाचा- लता । दानपट्टकलिखितैः किंचिद्धि लभ्यते । अक्षरपाटिकैश्च तेषां हस्तस्थितिं क्रियते । दानि च वाच्यन्ते । यद्वा स्वहस्तेनाक्षरकरणं हस्तस्थितिः । हिमशिला वातवज्जीभूतं हिमम् । केचित्तु 'हिमानि हिमशकलानि चन्द्रकान्ताः' इत्याहुः । हिमस्य च तदा वर्णनानुचितत्वात् । पर्वतेभ्यो हिमानयनं सुलभमेवेति पूर्वोक्तमेद श्रेष्ठम् । यतश्चन्द्रकान्तानां दिवा स्रुतिर्न भवतीति । नक्षत्रमाला हस्त्याभरणभेदः । उच्चैस्तरामिति । उच्चं हि शिरः करिणः शस्यते । यदुक्तम्— 'समं महच्च पूर्णं च नातिस्तब्धोच्चमस्तकम् । नावाग्रं नातिपृथुलं वितानावग्रहं मृदु ॥' इति । दन्तावेव हुई मदधारा के व्याज से वह उन्हीं की गन्ध को फैला रहा था† । दिनरात वह अपने हाथ से तैयार किये गये, अर्ध-खण्डित ईख की लेखनी से लिखे गये एवं भौरों द्वारा पढ़े गये दानपट्टों से करपतियों के सभी जंगलों को मानो प्राप्त कर रहा था। निरन्तर पानी टपकाने वाले, चन्द्रकान्त के टुकड़ों से बने नक्षत्रमाला नामक आभूषण में वह ठंडा हो रहा था। वह ऊँचा मस्तक, जो मानों सभी वारणेन्द्रों के आधिपत्य के पट्टबन्ध के कारण निम्नोन्नत था, धारण कर रहा था। बार-बार उसके कानों के पंखे चलते रहते थे जिससे दिशायें ढकती और खुलती रहती थीं। इस प्रकार वह अपने स्वामी की भक्ति से दाँत से पलंग पर बैठी हुई राजलक्ष्मी को पंखा झल रहा था। वह अपनी हिलती हुई पूँछ से, जो † उस समय सहकार, कपूर, कक्ककोल, लवंग, पारिजातक आदि सुगन्धद्रव्य थे जिनसे मुखवास बनाया जाता था, उसी की गन्ध दर्पशात के मदजल में थी, क्योंकि जंगलों में उसने भी इनके वृक्षों का उपयोग किया था। ८ ह०

११४ हर्षचरितम् धिना विराजमानम्, स्वच्छशिशिरशीकरच्छलेन दिग्विजयपीताः सरित इव पुनःपुनर्मुखेन मुञ्चन्तम्, क्षणमवधानदाननिःस्पन्दीकृतसक- लावयवानामन्यद्विरदडिण्डिमाकर्णनाङ्गवलनानामन्ते दीर्घफूत्कारैः परिभव- दुःखमिवावेदयन्तम्, अलब्धयुद्धमिवात्मानमनुशोचन्तम्, आरोहाधिरूढि- परिभवेन लज्जमानमिवाङ्गुलीलिखितमहीतलं, मदं मुञ्चन्तम्, अवज्ञा- गृहीतमुक्तकवलकुपितारोहाटनानुरोधेन मदन्द्रीनिमीलितनेत्रत्रिभागस्, कथं कथमपि मन्दमन्दमनादरादाददानं कवलान्, अर्धजग्धतमालपल्लवस्स्रु- तश्यामलरसेन प्रभूततया मदप्रवाहमिव मुखेनाप्युत्सृजन्तम्, 'चलन्तमिव तदवस्थानसमुचितत्वात् । पर्यङ्किका च दन्तमयः पर्यङ्कः आस्त इति श्लेषः । आयत- वंशः, वक्रवंशः, शरवंशः' बालवंशश्चेति चत्वारो वंशाः । तेषु बालवंश आयत एव शास्त्रकृतामभिप्रेतः । तथा च-'यावत्पूरितपार्श्वस्थ वंशश्चापलताकृतिः । शुमो ज्ञेयो गजेन्द्राणामायतः कुरुते सुखम् ॥' इति तैरुक्तम् । आयताद्वंशात्तत्क्रमेण गोपु- च्छवदायत इति विग्रहः । समानाहों हि वालधिः शोकं करोति । यदुक्तम्- 'वकं स्थूलं च ह्रस्वं च पुच्छं कचविवर्जितम् । समानाहं हिं नागस्य भर्तुः शोककरं स्मृतम् ॥' इति । वंशं पृष्ठास्थि, कुलं च । क्रम आनुपूर्वी; पारम्पयं च । वालधिः पुच्छम् । लज्जमानमिति । एष लज्जते स भूमि लिखति, दर्प चोज्झति । अंगुली करिकराग्रावयवः, करशाखा च । तन्द्रो आलस्यम्, गाढनिद्रा वा । चलन्तमिव- उसके आयत पृष्ठवंश से निकली हुई, उसके गजाधिपत्य का चिह्न एवं चामर के समान थी, शोभित हो रहा था। अधिपति है। वह अपने मुँह से ठण्डे और सफेद जल के फुहारे बार-बार फेंकता रहता था, मानों दिग्विजय के समय सोखी हुई नदियों को उगल रहा हो । क्षण भर ध्यान देने से सभी अङ्गों को निश्चल कर देने वाले, दूसरे हाथियों के डिण्डिम घोष ( यशोगान ) के श्रवण से उत्पन्न अङ्गों के चाञ्चल्यरहित हो जाने से लम्बे फूत्कारों द्वारा अपने परिभव का कष्ट मानों आवेदन कर रहा था। वह पश्चात्ताप अनुभव करता कि उसे युद्ध करने का अवसर नहीं दिया जा रहा है। दूसरे उसकी पीठ पर चढ़ते तो वह अपना परिभव महसूस करके अपने नखों से जमीन पर कुछ लिखने लगता। मद का त्याग कर रहा था। उसने कौर लेकर भी अवज्ञा से छोड़ दिया, इसपर महावत ने कुपित होकर खाने के लिए अनुरोध किया तो उसने मद से अलसा कर आँखें बन्द कर लीं। बहुत प्रयत्न करने पर रह-रहकर अनादर से कौर ले लेता था। आधा खाये हुए तमाल-पत्रों से चूता हुआ सांवला पानी इतना अधिक हो गया था, मानों वह मुख से भी मद-प्रवाह को छोड़ रहा था। दर्प से वह मानो काँप रहा था, शौर्य से जीवित था, शौर्य १. दलन्त ।