हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
नखमयूखजालकेन नूपुरव्याहाराहूतेर्भवनकलहंसकुलैर्ब्रह्मलोकनिवासिहृदयै- रिवानुगम्यमाना समं सावित्र्या गृहमगात् । अत्रान्तरे सरस्वत्यवतरणवार्तामिव कथयितुं मध्यमं लोकमवततारां- शुमाली । क्रमेण च मन्दायमाने मुकुलितविसिनीविसरव्यसनविषण्ण- सरसि वासरे, मधुमदमुदितकामिनीकोपकुटिलकटाक्षक्षिप्यमाण इव क्षेपीयः क्षितिधरशिखरमवतरति तरुणतरकपिलपनलोहिते लोकैक- चक्षुषि भगवति, प्रस्रुतमुखमाहेयीयूथक्षरत्क्षीरधाराधवलिते- ऽत्रासन्नचन्द्रोदयोद्दामक्षीरोदलहरीक्षालितेष्विव दिव्याश्रमोपशल्येषु, अपराह्णप्रचारचलिते चामरिणि चामीकरतटताडनरणितरदने रदति सुरस्रवन्तीरोधांसि स्वैरमैरावते, प्रसृतानेकविद्याधराभि- धोमुखीभवति । जालकं समूहः । व्याहार उक्तिः । मध्यमं लोकं भूमिम् । अंशुमाली रविः । क्रमेणेत्यादावस्मिन्सति सावित्री सरस्वतीमवादीदिति सम्बन्धः । विसरशब्द औणादिकः षण्डपर्यायः । मुदिताः सञ्जातमन्मथाः । कामिन्यः शृङ्गारिण्यः । सम्भोगान्तरायकारी कथमयमद्यापि नास्तमेतीत्यतः कोपः क्षिप्यमाणश्चातित्वरितं पतति । क्षेपीयस्तूर्णतरम् । लपनं वदनम् । लोकैत्यादिना सम्भोगविघ्नकारित्वमेव प्रकाश्यते । माहेयी गौः । उद्दामः प्रवृद्धिं गतः । उपशल्यं समीपम् । चामीकरं सुवर्णम् । रदना दन्ताः । रदति विलिखति । सुरस्रवन्ती गङ्गा । रोधस्तटम् । स्वैरं स्वेच्छम् । 'या दूतिका गमन- कालमपाहरन्ती सोढुं स्मरज्वरमरातिपिपासितेव । निर्याति वल्लभजनाधरपान- वाले लोगों के हृदय के समान भवन के कलहंस उसके नूपुरों की आवाज से बुलाये जाने पर उसका पीछा करने लगे । इसी बीच सूर्य मानो सरस्वती के अवतीर्ण होने या समाचार कहने के लिए मध्यमलोक ( भूलोक ) में उतरे । क्रमशः दिन मन्द पड़ने लगा । कमलिनी-समूह के मुकुलित होने के दुःख से सरोवर दुखी हो गए । मदिरा से मदमाती कामिनियों के क्रोध के कारण टेढ़े कटाक्षों द्वारा मानो फेंके जाने पर बड़ी शीघ्रता से तरुण वानर के मुँह के सदृश लाल वर्ण वाले संसार के एकमात्र नेत्र भगवान् सूर्य अस्ताचल के शिखर पर उतरने लगे । दिव्य आश्रमों के समीपवर्ती प्रदेश आर्द्र स्तनों वाली गौओं के झुण्ड से बहती हुई दूध की धारा से धवल हो रहे थे । मानो निकट में होने वाले चन्द्रोदय से बढ़े हुए क्षीरसागर की तरंगों द्वारा प्रक्षालित हो रहे हों । सन्ध्याकालीन भ्रमण के लिए निकला हुआ, चँवर धारण किये हुए
प्रथम उच्छ्वासः २५ Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सारिकासहस्रचरणालक्तकरसानुलिप्त इव प्रकटयति च तारापथे पाट- लताम्, तारापथप्रस्थितसिद्धदत्तदिनकरास्तमयार्घ्यावर्जिते रञ्जित- ककुभि, कुसुम्भभासि स्रवति पिनाकिप्रणतिमुदितसंध्यास्वेदसलिल इव रक्तचन्दनद्रवे, वन्दारुमुनिवृन्दारकवृन्दबध्यमानसंध्याञ्जलिवने, ब्रह्मो- त्पत्तिकमलसेवागतसकलकमलाकर इव राजति ब्रह्मलोके; समुच्चा- रिततृतीयसवनब्रह्मणि ब्रह्मणि, ज्वलितवैतानज्वलनज्वालाजटालाजि- रेष्वारब्धधर्मसाधनशिविरनीराजनेष्विव सप्तर्षिमन्दिरेषु, अघमर्षणमु- षितकिल्बिषविषगदोल्लाघलघुषु यतिषु संध्योपासनासीनतपस्विपङ्क्ति- पूतपुलिने प्लवमाननलिनयोनियानहंसहासदन्तुरितोर्मिणि मन्दाकिनीजले, लोभात्सा कथ्यते कविवरैरभिसारिकेति ॥' तारापथो नभः । आवर्जिते प्रकीर्णे । ककुभो दिशः । कुसुम्भं पद्मकम् । रक्तचन्दनद्रवे स्रवति सतीति योजना । वन्दारु वन्दनशीलम् । वृन्दारकशब्दः प्रशंसायाम् । सवनं प्रातःसंध्याह्ने सायं च सोम- यागैकदेशस्नानमित्यन्ये । ब्रह्म वेदः । वैतानो यज्ञभवः । जटालानि व्याप्तानि । अजिराण्यङ्गणानि । आरब्धे धर्मसाधने शिबिरे पुण्योपकरणस्कन्धावारे नीराज- नाख्यं शान्तिकर्म येषु । धर्मोपकरणविषये मा दोषः प्रादुरभवन्निति । 'शमनं सर्वपापानां जप्यं त्रिष्वघमर्षणम्' । गदो रोगः । उल्लाघं स्वस्थताकरम् । यत- यश्चतुर्थाश्रमिणः । सद्यो जलत्यक्तं तटं पुलिनम् । नलिनयोनिर्ब्रह्मा । हंसानां हासः इन्द्र का हाथी ऐरावत सुवर्ण के तटों पर अपने दाँतो को पांट कर बजाता हुआ स्वच्छन्द होकर मन्दाकिनी के किनारों को खोदने लगा । आकाश लाल हो गया, मानो मार्ग में इधर-उधर घूमती हुई सहस्रों विद्याधरी अभिसारिकाओं के चरणों में लगे महावर से पुत गया हो । आकाश में घूमते हुए सिद्धों द्वारा सूर्यास्त के अर्घ्यरूप में ढाला गया, दिशाओं को रंजित करता हुआ कुसुम्भी रंग का रक्तचन्दन चू रहा था, मानो शिव के प्रणाम करने में विभोर संध्या के शरीर से पसीना निकल रहा हो । वंदनशील मुनिजन अपनी सन्ध्योपासना में अंजलियाँ बाँध रहे थे, मानो ब्रह्माजी की उत्पत्ति वाले कमल की सेवा के लिए समस्त कमल इकट्ठे हों, इस प्रकार ब्रह्मलोक सुशोभित हो रहा था । ब्रह्माजी तीसरी बार ( संध्या- कालीन ) सवन ( यज्ञीय स्नान ) विषयक वेद का उच्चारण कर रहे थे । सप्तर्षियों के गृह- प्रांगण में यज्ञाग्नि की ज्वालाएँ व्याप्त थीं, मानो शिविर में धर्म का एक कार्य नीराजन (आरती) नामक शान्तिकर्म हो रहा हो । अघमर्षण मन्त्र के जप से पाप के विषाक्त रोग का विनाश हो जाने से यतिलोग स्वस्थ हो रहे थे । ( मन्दाकिनी के तट का ) पुलिन संध्यो- पासना के लिए तपस्वियों के बैठने से और भी पवित्र हो रहा था । तैरता हुआ ब्रह्मा जी CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
जलदेवतातपत्रे पत्ररथकुलकलत्रान्तःपुरसौधे निजमधुमधुरामोदिनि कृतम- धुप्रमुदि मुमुदिषमाणे कुमुदवने, दिवसावसानताम्यत्तामरसमधुरमधुसपीति- प्रीते सुषुप्सति मृदुमृणालकाण्डकण्डूयनकुण्डलितकंधरे धुतपत्रराजिवीजित- राजीवसरसि राजहंसयूथे, तटलताकुसुममधूलिधूसरितसरिति सिद्धपुरपुरंध्रि- धम्मिल्लमल्लिकागन्धग्राहिणि सायंतने तनीयसि निशानिश्वासनिभे नभ- स्वति, संकोचोद्बद्ध्युच्चकेसरकोटिसंकटकुशेशयकोशकोटरकुटीशायिनि षट्- चरणचक्रे, नृत्योद्धूतधूर्जटिजटाटवीकुटजकुङ्मलनिकरनिभे नभस्तलं स्तबक-
शौक्लयं, हंसा एव वा शुक्लतया हासः । दन्तुरा एव दन्तुरिताः । ये च सहासास्ते लक्ष्यमाणदन्तद्वया दन्तुरा इव दृश्यन्ते । आतपत्रं छत्रम् । पत्ररथाः पक्षिणः । कलत्रं दाराः । मधु मकरन्दः, मद्यं च । मधुपा भ्रमराः, मद्यपाश्च । मुमुदिषमाणे विचकि- सिषति । अन्यत्र-मोदितुमिच्छति । प्रारिप्स्यमानगीतादिगोष्ठीबन्ध इति यावत् । 'मञ्चाः क्रोशन्ति' इतिवत् । ताम्यदिति । ताम्यन्ति, न तु तान्तानि, प्रदोषस्य न तावत्प्रवृत्तत्वात् । 'मधु, मद्यमपि । सपीतिस्तु सहपानम् । अनेन तु प्रेमातिशय आवेद्यते । सुषुप्सति निद्रासति । मृद्विति । कण्डूयनं विक्रियाविशेषम् । कुण्डलिता चक्रीकृता । राजीवं पद्मम् । राजहंसा इत्यत्रैकशेषः । तटशब्दः प्रत्यासत्त्युप- लक्षणार्थः । पुरंध्रिरुत्तममहिला । धम्मिल्लाः संयताः कचाः । मल्लिका भूपदी । एषा च सायंमेवोन्मिषति । सायंतने दिनान्तभवे । कोषः कुड्मलम् । कोटरमभ्य- न्तरम् । कुटी गेहम् । शयनमत्र विश्रमणम्, न. तु स्वापः, पौनरुक्त्यापत्तेः अटवीति । विवक्षितम् । तत्रैवाकृत्रिमकुसुमसंन्बन्धात् । कुटजं गिरिमल्लिका । कुङ्म-
का वाहन हंस अपनी उज्ज्वल हंसी से मन्दाकिनी की तरंगों को निम्नोन्नत बना र[हा] था। जलदेवता के छत्रस्वरूप और पक्षि-कामिनियों के अन्तःपुर के प्रासादरूप, अपन[े] मकरंद को मीठी सुगन्ध वाले, तथा भौरों को प्रसन्न करने वाले कुमुद तत्काल खि[ल] रहे थे। राजहंसों का समूह ढंपते हुए कमलों के मीठे मधु ( मकरन्द या मद्य) क[ा] सहपान करने से छक कर, गर्दन को कुण्डलित करके कोमल मृणालों द्वारा शरीर खु[ज-] लाते हुए, पंखों को फड़फड़ा कर पद्मसरोंवरों को हवा देते हुए ऊँघ रहा था। तट [की] लताओं के फूलों की धूल उड़ा कर धूसर बनाती हुई, सिद्धों के नगर को उत्त[म] महिलाओं के बंधे हुए केशपाश की मल्लिका की गंध लेकर रात की सांस के समान वा[यु] मंद-मंद बहने लगी। झुण्ड के झुण्ड भौंरे सिकुड़ जाने से पराग भरे कमलों के कोशों [की] संकीर्ण कुटिया में विश्राम करने लगे। नृत्य के समय हिलती हुई भगवान् शंकर [की] जटाटवी से कुटज फूल-जैसे गुच्छेदार तारे आकाश में छिटक गए। संध्या की लाली खि[ल]
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम उच्छ्वासः २७ यति तारागणे, संध्यानुबन्धताम्रे परिणमत्तालफलत्वक्त्विषि कालमेघमे- दुरे, मेदिनीं मीलयति नववयसि तमसि तरुणतरतिमिरपटल- पाटनपटीयसि समुन्मिषति यामिनीकामिनीकर्णपूरचम्पककलिकाकद- म्बके प्रदीपप्रकरे, प्रतनुतुहिनकिरणकिरणलावण्यालोकपाण्डुन्त्याश्यान- नीलनीरमुक्तकालिन्दीकुलबालपुलिनायमाने शातक्रतवे क्रशयति तिमिरमाशामुखे, खमुचि मेचकितविकचितकुवलयसरसि शशधरकर- निकरकचग्रहाविले विलीयमाने मानिनीमनसीव शर्वरीशबरचिकुरचये चाषपक्षत्विषि तमसि, उदिते भगवत्युदयगिरिशिखरकटककुहरहरि- खरनखरनिवहहेतिनिहतनिजहरिणगलितरुधिरनिचयनिचितमिव लोहितं वपुरुदयरागधरमधरमिव विभावरीवध्वा धारयति श्वेतभानौ, कलिका । निकरः समूहः । अनुबन्धः संस्कारः । परिणमज्जरोठमवत् । तालस्तृण- राजः । मेदुरं घनम् । मीलयति स्थगयति । नववयसि प्रत्यग्रे । चम्पको हेमपुष्पकः । आश्यानमीषच्छुष्कम् । नीरं जलम् । कालिन्दी यमुना । नीलमभिप्रायेणैतत्पदम् । यस्तटभागो वारिणा त्यक्तस्तत्पुलिनम् । कूलं ततोऽन्यत् । क्रशयति । तनुकुर्वति । खमुचि त्यक्ताकाशे । भूभागमवलम्बमान इत्यर्थः । मेचकितं निर्विभागतां नीतम् । शशधरकरैः स्वीकारेण करम्बितेऽत एव क्षयं गच्छन्ति । अन्यत्र चन्द्ररश्मीनां धारणेन सेवनेन किंकर्त्तव्यतामूढ एवमधिगलत्यार्द्रतां मज- माने केशपाशपक्षे तु विस्रंसमाने । चाषः किकीदिविः पक्षी । हरिः सिंहः । नखरा नखाः । हेतिरायुधम् । विभावरी रात्रिः । श्वेतभानुश्चन्द्रः । अचलः, अर्था- हुए, पकते हुए तालफल की त्वचा के समान कलौंस भरी ललाई वाला प्रलयकालीन मेघों के सदृश गहन पहला अंधेरा धरती पर छा गया। रात्रिरूपी कामिनी के कान में खोसी हुई चम्पा की कली-जैसे दीपक गहन अंधेरे को हटाने लगे। यमुना का रेतीला किनारा नीले जल के हट जाने पर जैसा लगता है उसी प्रकार पूर्व दिशा का मुख चन्द्रमा की कुछ-कुछ रश्मियों के लुनाई-भरे आलोक से पीला होने लगा और अन्धकार को क्षीण करने लगा। विलीन होता हुआ अंधकार आकाश को छोड़ने लगा, खिले हुए कुवलय वाले सरोवर विभिन्न वर्ण के हो गए। चाष पक्षी के पंख जैसा और रात्रि रूपी भीलनी के बालों जैसा अँधेरा चन्द्र की किरणों के कचग्रह से मानिनी नायिका के मन के समान धीमा पड़ने लगा। रात्रिवधू के अधरराग के समान लाल चन्द्रमा उदित हो गया, मानो उदयाचल की खोह में रहने वाले सिंह के द्वारा पकड़े पंजे से मारे गए अपने हिरन के रक्त से वह रंग गया था। उदयाचल से बहती हुई चन्द्रकान्त मणियों की CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
२८ हर्षचरितम् अचलच्युतचन्द्रकान्तजलधाराधौत इव ध्वस्ते ध्वान्ते, गोलोकगलित- दुग्धविसरवाहिनि दन्तमयकरमुखमहाप्रणाल इवापूरयितुं प्रवृते पयो- निधिमिन्दुमण्डले, स्पष्टे प्रदोषसमये सावित्री शून्यहृदयामिव किमपि ध्यायन्तीं सास्रां सरस्वतीमवादीत्—‘सखि, त्रिभुवनोपदेशदानदक्षा- यास्तव पुरो जिह्वा जिह्रेति मे जल्पन्ती। जानास्येव यादृश्यो विसं- स्थुला गुणवत्यपि जने दुर्जनवन्निर्दक्षिण्याः क्षणभङ्गिन्यो दुरतिक्रम- णीया न रमणीया दैवस्य वामा वृत्तयः। निष्कारणा च निकारकणिकापि कलुषयति मनस्विनोऽपि मानसमसद्दृशजनादापतन्ती। अनवरतनयन- जलसिच्यमानश्च तरुरिव विपल्लवोऽपि सहस्रधा प्ररोहति अतिसुकु- मारं च जनं संतापपरमाणवो मालतीकुसुममिव म्लानिमानयन्ति। महतां र्दुदयाचलः, गोलोको रश्मिसमूहो वा। मकरमुखमिव मुखमग्रमस्येति समासः। विसंस्थुला निर्मर्यादाः। दुर्जनवन्निर्दक्षिण्याः क्रूराः। क्षणभङ्गिन्य इत्याश्वासनगर्भे- यमुक्तिः। वामाश्च स्त्रिय ईदृश्य एव। निकारः परिभवः। कणिका लेशः, शर्करिका च। कलुषयति दूषयति, कालुष्यं नयति च। मानसं चेतः सरश्च। अनवरत- मश्रुणा सिच्यमानः। अनवरतं घटसारणीप्रणालादिना नयनं प्रापणं यस्य तादृशो जलेनोक्ष्यमाणश्च। विपल्लव आपल्लेशः, विगतपल्लवश्च। प्ररोहति स्थिरीभवति। तरुपक्षे प्ररोहा विद्यन्ते यस्य स प्ररोहः, स इवाचरति प्ररोहतीति व्याख्या। संतापा खेदा, ऊष्मा च। मालतीकुसुमं सुमनःपुष्पमतिसुकुमारम्। महान्त उत्तमाः जलधारा से मानो सारा अंधेरा धुल गया। आकाश मे उठ कर चन्द्रमा अपनी सफेद चाँदनी से समुद्र को ऐसे भरने लगा जैसे हाथी के दाँतों का बना हुआ मकरमुखी पनाला गोलोक से दूध की धार बहा रहा हो। इस प्रकार प्रदोष समय के स्पष्ट हो जाने पर सावित्री शून्य-हृदय होकर कुछ सोचती और बड़बड़ाती हुई सरस्वती से बोली— 'सखि, तू त्रिभुवन को उपदेश देने में चतुर है' तेरे सामने मेरी जीभ कुछ बकते हुए शर्मिन्दा हो रही है। तू तो जानती ही है कि गुणवान् लोगों के विषय में जैसी दैवी प्रवृत्तियाँ मर्यादाहीन, दुर्जनों की तरह क्रूर, क्षणभङ्गुर, दुरन्त एवं अरमणीय होती हैं। समानता न रखने वालों द्वारा बिना किसी कारण के उत्पन्न परिभव का लेश भी मनस्वी के भी मन को कलुषित कर डालता है। विपत्ति का अंकुर निरन्तर आँसुओं से सींचे जाने पर (पल्लव रहित भी) वृक्ष के समान हजारों शाखा-प्रशाखाओं में बढ़ता ही जाता है। मालती के फूल की तरह अतिसुकुमार लोगों को सन्ताप के परमाणु मुरझा डालते हैं।
प्रथम उच्छ्वासः २९
चोपरि निपतन्नणुरपि सृणिरिव करिणां क्लेशः कदर्थनायालम्। सहजस्नेहपाशग्रन्थिबन्धनाश्च बान्धवभूता दुस्त्यजा जन्मभूमयः। दारयति दारुणः क्रकचपात इव हृदयं संस्तुतजनविरहः, सा नार्हस्येवं भवितुम्। अभूमिः खल्वसि दुःखक्ष्वेडाङ्कुरप्रसवानाम्। अपि च पुरा- कृते कर्मणि बलवति शुभेऽशुभे वा फलकृति तिष्ठत्यधिष्ठातरि प्रष्ठे पृष्ठतश्च कोऽवसरो विदुषि शुचाम्। इदं च ते त्रिभुवनमङ्गलैकमलम- मङ्गलभूताः कथमिव मुखमपवित्रयन्त्यश्रुबिन्दवः। तदलम्। अधुना कथय कतमं भुवो भागमलङ्कर्तुमिच्छसि। कस्मिन्नवतितीर्षति ते पुण्य- भाजि प्रदेशे हृदयम्। कानि वा तीर्थान्यनुग्रहीतुमभिलषसि। केषु वा धन्येषु तपोवनधामसु तपस्यन्ती स्थातुमिच्छसि। सज्जोऽयमुप- द्राघीयांसश्च। सृणिरङ्कुशः। मातरोऽपि जन्मभूमयः। दारुणो विषमः, काष्ठस्य च। क्रकचः करपत्रम्, हृदयं चित्तम्, मध्यं च। संस्तुतः परिचितः। सेति। सर्व- नामपदं जानासीत्यादिपूर्वोक्तार्थगर्भीकारेण। अभूमिस्थानम्, अक्षेत्रं च। क्ष्वेडो विषम्। शुभेऽशुभे वेत्यादि। सप्रतिपक्षा लोकोक्तिरियम्। 'अव्युत्पन्नमतिः कृतेन न सता नैवासता व्याकुलः' 'गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः' इत्यादिवत्। अधिष्ठातरि स्वामिनि। प्रष्ठेऽग्रगामिनि। अपवित्रतां नयन्ति, न तु शोभां त्याज- यन्ति। धामसु स्थानेषु। तपस्यन्ती तपश्चरन्ती। सज्जः प्रगुणः। आज्ञाकार्यमिति दृष्टस्वरूपः। निःसामान्यविश्रम्भभाजनतामभिव्यनक्ति सखीजनशब्दः। श्वश्रेय- छोटा भी अंकुश जैसे हाथियों पर गिर कर उनको परेशान कर देता है वैसे ही बड़ों के ऊपर थोड़े ही क्लेश का पड़ना बहुत कष्टकर हो जाता है। बंधु-बांधव के समान अपनी जन्म- भूमियां, जिनके साथ स्वाभाविक स्नेहपाश का गठबन्धन हो चुका है, दुस्त्यज है। अपने परिचित जनों का विरह दारुण आरे की तरह हृदय को चीर डालता है। पर तुझे इस तरह नहीं होना चाहिए। दुःखरूपी विष के पौधे के उत्पन्न होने के लिए तू स्थान नहीं है। और भी, जब कि पूर्वजन्म के बलवान् शुभ या अशुभ कर्म आगे और पीछे फल देने वाले हैं ही तो बुद्धिमान् को शोक करने का क्या अवसर है? त्रिभुवन का मंगल करने वाला तेरे कमल के समान इस मुख को अमंगल आँसू क्यों अपवित्र कर रहे हैं? बस रहने दे अब बता—धरती के किस भाग को अलंकृत करना चाहती है? किस पुण्यवान् प्रदेश में उतरने के लिए तेरा हृदय तुझे प्रेरित कर रहा है? किन तीर्थों को तू अनुगृहीत करना चाहती है? तपोवन के किन धन्य स्थानों में तपस्याभिरत रहने के लिए सोच रही है?
चरणचतुरः सहपांशुकीडापरिचयपेशलः प्रेयान्सखीजनः क्षितित- लावतरणाय। अनन्यशरणा चाद्यैव प्रभृति प्रतिपद्यस्व मनसा वाचा क्रियया च सर्वविद्याविधातारं दातारं च श्वःश्रेयसस्य चरणरजः- पवित्रितत्रिदशासुरं सुधासूतिकलिकाकल्पितकर्णावतंसं देवदेवं त्रिभुवनगुरुं त्र्यम्बकम्। अल्पीयसैव कालेन स ते शापशोकविरतिं वितरिष्यति' इति। एवमुक्ता मुक्तमुक्ताफलधवललोचनजललवा सरस्वती प्रत्यवा- दीत्—'प्रियसखि, त्वया सह विचरन्त्या न मे कांचिदपि पीडामुत्पा- दयिष्यति ब्रह्मलोकविरहः शापशोको वा। केवलं कमलासनसेवासुख- मार्द्रयति मे हृदयम्। अपि च त्वमेव वेत्सि मे भुवि धर्मधामानि समाधि- साधनानि योगयोग्यानि च स्थानानि स्थातुम्' इत्येवमभिधाय विरराम। रणरणकोपनीतप्रजागरा चानिमीलितलोचनैव तां निशा- मनयत्। सस्य कल्याणस्य दातारम्। सुधासूतिश्चन्द्रः। कलिका तारिका। शापविरति- र्ब्रह्मणैवोक्ता। अतस्तत्र किमन्यापेक्षयेत्याशङ्क्याह—अल्पीयसैव कालेनेति। आर्द्रयति स्नेहयति। धर्मधामानि। मध्यदेशादीनि समाधिश्चित्तैकाग्रधम्। उपचार करने में चतुर, बाल्यकाल से ही धूल की क्रीडाओं का साथी और प्रिय यह जन तेरे साथ पृथिवी पर उतरने के लिए तैयार है। अनन्यशरण तू आज से ही मन, वचन और कर्म से भगवान् शंकर को मान, जो समस्त विद्याओं के विधाता एवं कल्याण को देने वाले, देवों के देव और त्रिभुवन के गुरु हैं। जिन्होंने अपने चरण की धूल से सुर, असुर दोनों को पवित्र किया है और चन्द्र की एक कला को अपना कर्णावतंस बनाया है। बहुत थोड़े समय में वे तेरे शापजन्य शोक को दूर कर देगें।' इस प्रकार सावित्री के कहने पर मोती की भाँति सफेद आँसू के कण आँखों से टपकाती हुई सरस्वती बोली—'प्रिय सखी, ब्रह्मलोक का विरह या शापजनित शोक कोई भी पीड़ा उत्पन्न नहीं कर सकेंगे, जब तक तेरे साथ मैं विचरण कर रही हूँ। केवल ब्रह्माजी की सेवा का सुख मेरे हृदय को पिघला रहा है। पृथिवी पर मेरे लिए धर्म के स्थान जो समाधि (चित्त की एकाग्रता) के साधन एवं योग (चित्तवृत्ति का निरोध) के उपयुक्त हैं उन्हें तू ही जानती है।' इतना कह वह चुप हो गई। मानसिक उथल-पुथल (रणरणक) के कारण उसकी नींद उचट गई और उसने आँखें बिना बंद किये उस रात को बिताया।
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम उच्छ्वासः ३१ अन्येद्युरुदिते भगवति त्रिभुवनशेखरे खणखणायमानस्खलत्खलीन- क्षतनिजतुरगमुखक्षिप्तेन क्षतजेनेव पाटेलितवपुष्युदयाचलचूडामणौ जरत्कृ- कवाकुचूडारुणारुणपुरःसरे विरोचते नातिदूरवर्ती विविच्या पितामहविमान- हंसकुलपालः पर्यटन्नपरवक्त्रमुच्चैरगायत्— 'तरलयसि दृशं किमुत्सुकामकलुषमानसवासलालिते । अवतर कलहंसि वापिकां पुनरपि यास्यसि पङ्कजालयम्' ॥ तच्छ्रुत्वा सरस्वती पुनरचिन्तयत्—'अहमिवानेन पर्यन्त्युक्ता । भवतु । योगे हि तदुक्तम्—'आदौ समाधिमासीत पश्चाद्योगमुपाचरेत्' इति । रणरणको दुःखमरतिकृतम् । अन्येद्युरन्यस्मिन्नहनि । एते च कालाः संख्यादयो व्यवहारा इहत्या ब्रह्मलोक उपचारिताः । शेखर इव । शेखरो मुण्डमालकः । खलीनं कविका । क्षतजं रक्तम् । कृकवाकुः । कुक्कुटः । चूड़ा मांसमयी शेखरिका । विविच्य विचार्य । विमानपालः स्वप्रस्तावे हंसीं यदाह तेन सरस्वती पर्यन्योजितेवाभूत् । अपरवक्त्राख्यं वृत्तमाख्यायिकासु प्रयोक्तव्यम् । तथा चाह भामहः—'वक्त्रं चापर- वक्त्रं च काव्ये काव्यार्थशंसिनि' इति । तरलयसीत्यादि । अकलुषं मानसं यस्य स निर्मलचेता ब्रह्मा, मानसाख्यं सरः । लालिता शीलिता । वापिका पुष्करिणी, उप्यन्तेऽस्यां तानि कर्माणीति वापिका, मर्त्यभूमिरपि । पङ्कजमा- दूसरे दिन तीनों भुवन के शिरोमाल एवं उदयाचल के चूडामणि भगवान् सूर्य उदित हुए । उनका मण्डल टहाका लाल था, मानों खण-खण करते हुए लगाम की क्षति से उत्पन्न अपने घोड़ों के मुखरुधिर के फव्वारे उस पर पड़ गए हों। वृद्ध कुक्कुट की चूड़ा के समान लाल वर्ण वाला अरुण उनके आगे बैठा था। कुछ ही दूर पर घूमते हुये ब्रह्मा जी के वाहन हंसों के रक्षक ने सोच कर ऊँचे स्वर से अपवक्त्र का गान किया— 'अरी कलहंसी, मानसरोवर के निर्मल जल में रहने वाली तू अपनी उत्सुक आंखों को क्यों चंचल कर रही है ? अभी बावली में उतर जा, फिर पंकजालय (सरोवर) में जाना†।' उसे सुन कर सरस्वती ने फिर सोचा—'मानों मुझसे इसने कहा है। अच्छा, मैं † इस श्लोक में हंसपाल सरस्वती को भी सिखावन दे रहा है कि सरस्वती, तू निर्मल- चित्त ब्रह्मा जी की लाड़ली है, क्यों अपनी उत्सुक आँखें थका रही हैं ? अभी वापिका (मर्त्यलोक) में उतर, फिर ब्रह्मा जी (पंकजालय) को प्राप्त कर लेना। CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ३२ हर्षचरितम्
मानयामि मुनेर्वचनम्' इत्युक्त्वोत्थाय कृतमहीतलावतरणसंकल्पा परित्यज्य वियोगविक्लवं स्वपरिजनं ज्ञातिवर्गमविगणय्यावगणा त्रिः प्रदक्षिणीकृत्य चतुर्मुखं कथमप्यनुनयनिवर्तितानुयायिव्रतिव्राता ब्रह्मलोकतः सावित्री- द्वितीया निर्जगाम। ततः क्रमेण ध्रुवप्रवृत्तां धर्मधेनुमिवाधोधावमानधवलपयोधराम्, उद्धुरध्वनिम्, अन्धकमथनमौलिमालतीमालिकाम्, आलीयमान- बालखिल्यरुद्धरोधसम्, अरुन्धतीधौततारक्वचम् त्वङ्गतुङ्गतराङ्गतरो- त्तरलतरतारतारकाम्, तापसविकीर्णतरलतिलोदकपुलकितपुलिनाम्
लयो यस्य स ब्रह्मा, सरथ। पर्यनुयुक्ता उपपत्त्या बोधिता। अवगणा केवला सावित्रीव्यतिरेकेण नान्यपरिवारा। कथमपीति। न भृत्यादिवत्। व्रतव्रातस्त- पस्विसमूहः। तत इत्यादावीदृशं मन्दाकिनीमनुसरन्ती सरस्वती मर्त्यलोकमवतारेति संब- न्धः। ध्रुवं नित्यं वियत्। तस्मात्प्रवृत्ताम्। ध्रुवस्तारकाविशेषो ध्रुवाश्नित्यस्थानाद्वा विष्णोर्वा, ध्रुवावूरू पश्चाद्भागौ सक्थिनी ध्रुवे वा, तयोः प्रकर्षेण वृत्तां परिवर्तुलां वा अध इति पदेन धावनक्रियासहत्वाज्जलस्य ग्रहणं सूच्यते। अत एव धवलाः शुक्लाः पयोधरा मेघा यस्यास्ताम्। इतरत्राधो धावमानाः पयःपूर्णत्वाल्लम्बमानाः क्षीरस्रुतेश्च धवलाः स्तना यस्या। अधो धावमानं वेगेन प्रसरद्धवलं पयो धारयति या ताम्, अथो धावमानो धावलो यः पयोधो वत्सस्तं राति ददाति या ताम्, धवलो वृष- स्तस्मै पयो धारयति या तां वेत्यादिकाः कुव्याख्या एव। उद्धर उद्धटः। अन्धक-
, मुनि दुर्वासा के वचन मानती हूँ।' यह कह कर पृथिवी पर उतरने के लिए संकल्प करके उठी और वियोग से व्याकुल अपने परिवार को छोड़, अपने बन्धु-बांधवों को न मान, ब्रह्मा जी की तीन बार प्रदक्षिणा करके, साथ आते हुए तपस्वियों को किसी प्रकार अनुनय-विनय द्वारा लौटा कर, अकेले सावित्री को साथ ले ब्रह्मलोक से निकल पड़ी। तब क्रम से सरस्वती सात सागरों की पटरानी मंदाकिनी का अनुसरण करती हुई मर्त्यलोक में उतरीं। वह मंदाकिनी ध्रुव (नित्यस्थान, विष्णु) से निकली हुई कामधेनु के समान नीचे लटकते हुए पयोधरों (मेघों, स्तनों) को धारण कर रही थी। उसकी ध्वनि गम्भीर थी। वह अंधक के शत्रु भगवान् शंकर के मस्तक की मालती-माला थी। तटपर बालखिल्य मुनियों की भीड़-भाड़ थी। अरुन्धती वहाँ वल्कल का संमार्जन करती थी। उसकी दौड़ती हुई ऊँची लहरों पर चंचल तारे हिलोरें ले रहे थे। उसकी रेतों को तापस CC-0. Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection
आप्लवनपूतपितामहपातितपितृपिण्डपाण्डुरितपाराम्, पर्यन्तसुप्त- सप्तर्षिकुशशयनसूचितसूर्यग्रहसूतकोपवासाम्, आचमनशुचिशची- पतिमुच्यमानार्चनकुसुमनिकरशबलाम्, शिवपुरपतितनिर्मात्यमन्दारदा- मकाम्, अनादरदारितमन्दरदरोदृषदम्, अनेकनाकनायकनिकाय- कामिनीकुचकलशविलुलितविग्रहाम्, ग्राहग्रावग्रामस्खलनमुखरितस्रोत- सम्, सुषुम्णास्रुतशशिसुधाशीकरस्तवकतारकिततीराम्, धिषणाग्निहोत्र- कार्यधूमधूसरितसैकताम्, सिद्धविरचितवालुकानिङ्गलङ्घनत्रासविद्रुत- विद्याधराम्, निर्मोकमुक्तिमिव गगनोरगस्य, लीलाललाटिकामिव त्रिविष्टपविटस्य, विक्रयवीथीमिव पुण्यपण्यस्य, दत्तार्गलामिव नरक-
मथनः शिवः । आलीयमानाः श्लिष्यन्तः । बालखिल्या । मुनिभेदाः । रोधस्तटम् । त्वङ्गोच्चरत । आप्लवनं स्नानम् । पितरो देवविशेषाः, आज्यपाः, सोमपाः, बर्हिषा- दयश्च । आचमनेत्यादिना । पितामहवन्न स्नानादिनिष्ठात्वमस्योच्यते । अत्र एव शची- पदेन संभोगसक्तत्वमिव पोषितम् । निकायः समूहः सुषुम्णाख्योऽमृतमयो रवि- रश्मिः । धिषणो बृहस्पतिः । सिद्धकृतत्वेन लिङ्गेषु भगवत्संनिधानमावेद्यते । निर्मोकः सर्पकञ्चुकः । विस्रंसतया शुक्लत्वेन लहरिकावलीत्वेन निर्मोकमुक्तिमिवेत्युत्प्रेक्षा । गगनमिवोरगः कृष्णतया । ललाटिका ललाटालंकारः विटो भुजङ्गः । उच्चोषं
अपने तरल तिलोदक से पुलकित कर रहे थे । स्नान से पवित्र ब्रह्माजी द्वारा पितरों के लिए लुढ़काये गये पिण्डों से उसका तट उज्ज्वल हो रहा था । पास में सोये सप्तर्षियों की कुश-शय्या से सूचित हो रहा था कि उन्होंने यहाँ सूर्यग्रहण के अशौच का उपवास किया है। आचमन से पवित्र होकर इन्द्र द्वारा भेंट किए गए पूजा के फूलों से वह विविध वर्ण वाली हो रही थी । शिवपुर से गिरी मंदरमाला को वह धारण कर रहा था । आयास के बिना ही उसने मन्दराचल की कन्दराओं के चट्टान तोड़ डाले थे । अनेक स्वर्ग नायकों की दिव्याङ्गनाओं के कुचकलशों से (आहत होकर) वह डोल रही थी । घड़ियालों और चट्टानों पर निपात होने से उसके प्रवाह मुखर हो उठते थे । सूर्य की (अमृतमय रश्मि) सुषुम्णा से निकले अमृत के फुहारे मन्दाकिनी के तीर पर तारों की तरह बिछ गए थे । बृहस्पति के यज्ञ से उत्पन्न धुआँ नदी की रेत को धुआंस कर रहा था । सिद्धों द्वारा बनाये गए बालू के शिवलिङ्ग का अकस्मात् लंघन हो जाने से उत्पन्न त्रास के कारण विद्याधर इधर-उधर भाग रहे थे । मानों वह मन्दाकिनी गगन-सर्प की उज्ज्वल लहराती हुई केंचुल हो, त्रिभुवनरूपी विट (धूर्त) की लीला-ललाटिका (ललाट का अहंकार) हो, पुण्यरूप सौदे की बाजार-गली हो, नरक के नगर-द्वार को बन्द करने वाली आगल ३ ह० च०
३४ हर्षचरितम् नगरद्वारस्य, अंशुकोष्णीषपट्टिकामिव सुमेरुनृपस्य, दुगूलकदलिका- मिव कैलासकुञ्जरस्य, पद्धतिमिवापवर्गस्य, नेमिमिव कृतयुगस्य सप्त- सागरराजमहिषीं मन्दाकिनीमनुसरन्ती मर्त्यलोकमवततार। अपश्य- च्चाम्बरतलस्थितैव हारमिव वरुणस्य, अमृतनिर्झरमिव चन्द्राचलस्य, शशिमणिनिष्यन्दमिव विन्ध्यस्य, कर्पूरद्रुमद्रवप्रवाहमिव दण्डकार- ण्यस्य, लावण्यरसप्रस्रवणमिव दिशाम्, स्फाटिकशिलापट्टशयनमि- वाम्बरश्रियः स्वच्छशिशिरसुरसवारिपूर्णं भगवतः पितामहस्यापत्यं हिरण्यवाहनामानं महानदम्, यं जनाः शोण इति कथयन्ति। दृष्ट्वा च तं रामणीकहृतदया तस्यैव तीरे वासमरचयत्। उवाच च सावित्री—'सखि, मधुरमयूरविरुतः कुसुमपांशुपटलसिकतिलतरु- तलाः परिमलमत्तमधुपवेणीवीणारणितरमणीया रमयन्ति मां मन्दी- शिरोवेष्टनं दिक्षु प्रसिद्धम्। दुगूलशब्दो दुकूलसमानार्थः। पद्धतिमार्गः। अपवर्गो मोक्षः। कृतयुगस्य रचितयुगकाष्ठस्य रथस्येत्यर्थः। यथा नेमिवशाद्रथग्रहणं तथा तद्वशात्कृताख्यस्य युगस्य। सप्तसागरराजः। क्षीरसमुद्रः। चन्द्राख्य पर्वंत इति केचित्। शशिमणिश्चन्द्रकान्तः। पितामहस्येति। तद्भूवत्या तदाश्रयणम्। सिकता विद्यन्ते यस्य स सिकतिलः। मत्तशब्देन सशब्दत्वम्, वेणीपदेन स तन्त्रीसन्निवेश- सादृश्यमाह। वेणी पंक्तिः। लिङ्ग्यतेऽनेनेति लिङ्गमाकारः। पञ्च ब्रह्माणि सद्योजातः, वामदेवः, अघोरः, तत्पुरुषः। ईशानश्चेति। मुद्राबन्धो विशिष्टकराङ्गुलिसन्निवेशः। (अर्गला) हो, सुमेरु पर्वत रूपी राजा की अंशुक नामक महीन वस्त्र की उष्णीष (पगड़ी) पर बंधी हुई लंबी पाट हो, कैलास रूपी हाथी की रेशमी पताका हो, मोक्ष का मार्ग हो, सतयुग के रथ की धुरा हो। आकाश में उतरी हुई सरस्वती ने भगवान् पितामह के अपत्य हिरण्यवाह नामक महानन्द को देखा जो वरुण देवता का जैसा हार हो, जो चन्द्र पर्वत से झरता हुआ अमृत-निर्झर के समान था, जो विन्ध्य पर्वत से बहता हुआ चन्द्रकान्त मणि के प्रवाह के सदृश था, जो दण्डकारण्य के कर्पूर वृक्ष से बहते हुए कपूरी प्रवाह के समान था। दिशाओं के लावण्यरस का वह जैसे सोता था। मानों वह आकाश-लक्ष्मी के शयन के लिए गढ़ा हुआ स्फटिक का शिलापट्ट (पाटा) हो। वह महानन्द स्वच्छ, शिशिर और सुरस (स्वादिष्ट) जल से भरा था, उसे लोग शोण भी कहते हैं। शोण को देखकर सरस्वती का हृदय उसकी रमणीयता में रम गया और उसने वहीं डेरा डाला। उसने सावित्री से कहा—'सखी, इस महानद के तटवर्ती कछार में मोर मधुर ध्वनि करते हैं। वृक्षों के नीचे फूलों की रज बालू की तरह ढेर हो जाती है। फूलों की गन्ध से मतवाले
कृतमन्दाकिनीद्युतेरस्य महानदस्योपकण्ठभूमयः । पक्षपाति च हृदय- मत्रैव स्थातुं मे' इति । अभिनन्दितवचना च तथेति तया तस्य पश्चिमे तीरे समवातरत् । एकस्मिंश्च शुचौ शिलातलसनाये तटलतामण्डपे गृहबुद्धिं बबन्ध । विश्रान्ता च नातिचिरादुत्थाय सावित्र्या सार्धमु- च्चितार्चनकुसुमा सस्नौ । पुलिनपृष्ठप्रतिष्ठितशिवलिङ्गा च भक्त्या परमया परब्रह्मपुरःसरां सम्यङ्मुद्राबन्धविहितपरिकरां ध्रुवागीतिगर्भा- मवनिपवनवनगगनदहनतपनतुहिनकिरणयजमानमयीमूर्त्तिरष्टावपि ध्या- यन्ती सुचिरमष्टपुष्पिकामदात् । अयत्नोपनतेन फलमूलेनामृतरसमप्य- तिशिशयिषमाणेन् च स्वादिम्ना शिशिरेण शोणवारिणा शरी- स्थितिमकरोत् । अतिवाहितदिवसा च तस्मिँल्लतामण्डपशिलातले कल्पितपल्लवशायना सुष्वाप । अन्येद्युरप्यनेनैव क्रमेण नक्तंदिनमत्य- वाहयत् ।
ध्रुवाख्या विशिष्टा गीतिः । वनं तोयम् । यजमान उग्रः । अष्टौ पुष्पाण्येवाष्ट- पुष्पिका । तत्र गन्धप्रधानं पार्थिवम्, अर्घस्नानादिकं रसप्रधानमाप्यम्, प्रदीपा- भरणप्रभादिरूपप्रधानं तैजसम्, अनुलेपनप्रभृति स्पर्शप्रधानं वायवीयम्, सुषिरा- तोद्यगीतादिकं शब्दप्रधानमाकाशीयम्, अनुध्यानं मानसम्, अस्ति सर्वत्रैवेश्वर इति निश्चयो बौद्धम्, अहमेवेश्वर इत्याहंकारिकम् । यद्वा, आसनवर्गप्रवृत्तिष्वष्टसु प्रत्ये- कमष्टपुष्पिका । अतिशेतुमभिमवितुमिच्छतातिशिशयिषमाणेन । स्वादिम्ना मृष्ट- त्वेन । शरीरस्थितिमिति । न त्वातृप्तिभोजनम् । अन्येद्युरन्यस्मिन्नहनि ।
भौंरे वीणा के समान गुञ्जार कर रहे हैं। इसके सामने मन्दाकिनी भी कुछ नहीं। मेरा हृदय भी इसी स्थान में रहने के पक्ष में है।' सावित्री ने 'तथा' कह कर सरस्वती की बात का समर्थन किया। तब सरस्वती उसे लेकर उस महानद के पश्चिमी तीर पर उतरी। वहीं एक पवित्र शिलातल से युक्त लतामण्डप को घर मान कर ठहर गई। कुछ देर तक विश्राम करने के बाद उठी और सावित्री के साथ पूजा के फूल चुन कर स्नान किया। तब उसने नदी के किनारे रेत में बैठ कर बालू का शिवलिंग प्रतिष्ठित किया और परब्रह्म की स्तुति के अनन्तर सम्यक् प्रकार से कई मुद्राबन्ध किए और ध्रुवागीति के साथ पृथिवी, वायु, जल, आकाश, अग्नि, सूर्य, चन्द्र और यजमानमयी शिव की आठ मूर्तियों का देर तक ध्यान करती हुई आठ फूलों को अर्पित किया। किसी यत्न के बिना ही मिले हुए अमृत-रस से भी बढ़ कर मीठे फल-फूल से और शोण के ठण्डे जल से उसने शरीर की
३६ | हर्षचरितम् एवमतिक्रामत्सु दिवसेषु गच्छति च काले याममात्रोद्गते च रवा- वुत्तरस्यां ककुभि प्रतिशब्दपूरितवनगह्वरं गम्भीरतारतरं तुरङ्गहेषित- ह्लादमशृणोत् । उपजातकुतूहला च निर्गत्य लतामण्डपादवलोकयन्ती विकचकेतकीगर्भपत्रपाण्डुरं रजःसङ्घातं नातिदवीयसि संमुखमपत- न्तमपश्यत् । क्रमेण च सामीप्योपजायमानाभिव्यक्ति तस्मिन्महति शफरोदरधूसरे रजसि पयसीव मकरचक्रं प्लवमानं पुरः प्रधावमा- नेन, प्रलम्बकुटिलकचपल्लवघटितललाटजजूटकेन, धवलदन्तपत्रिका- द्युतिहसितकपोलभित्तिना, पिनद्धकृष्णागुरुपङ्ककल्कच्छुरणकृष्ण- शबलकषायकञ्चुकेन, उत्तरीयकृतशिरोवेष्टनेन, वामप्रकोष्ठनिविष्टस्पष्ट- यामः प्रहरः । नक्तंदिवशब्देन तत्कालनिर्वर्तनीयं कर्मैव लक्ष्यते । गम्भीरश्चिर- कालस्थितः । तारतरो दूरदेशश्रूयमाणः । हेषितमश्वशब्दः । तद्रूपो ह्लादो ध्वनि- स्तम् । क्रमेणेत्यादावश्ववृन्दं संददर्शेति संबन्धः । शफरा मत्स्याः । तदुदरवत्तद्व- धूसरे । प्रलम्बेत्यादिना सज्जत्वमुक्तम् । कचाः । केशाः । सौकुमार्यात्पल्लवानीव । घटितललाटजूटता दाक्षिणात्येषु वेषः । दन्तपत्रिका कर्णामरणभेदः । पिनद्धो बद्धः । कृष्णागुरुणः पङ्को निघृष्टं कृष्णागुरुः, तस्य शुष्कस्य सतः कल्कक्षूर्णः, तच्छुरणा- त्कृष्णेन गुणेन शबलं कषायं साधिवासितं कञ्चुकं वारबाणं यस्य । उत्तरीयेत्यादिना । सन्नद्धतां वर्मादिप्रसङ्गं चाह । वामेत्यनेनाश्रमस्वभाववर्णना शृङ्गारिता चोक्ता । रक्षा मात्र के लिए अत्यल्प भोजन किया । इस प्रकार उसी लतामण्डप के शिलातल पर पत्तों की सेज बनाकर लेट गई । दूसरे दिन इसी क्रम से उसने रात-दिन गुजारे । इस तरह कई दिन बीत गए । समय बहुत चला गया । एक रोज एक पहर दिन चढ़ गया, तब सावित्री को उत्तर दिशा की ओर घोड़ों की हिनहिनाहट भरी आवाज सुन पड़ी, वह अपने शब्दों से वन की घांधियों को भर रही थी और अत्यन्त गम्भीर एवं तीखी थी। सरस्वती के मन में कुतूहल हुआ तो लतामण्डप से निकल आई और उसने सामने थोड़ी ही दूर पर खिले हुए केवड़े के पत्तेदार गर्भ के समान सफेद उड़ती हुई धूलराशि को देखा। क्रम से जब वह और भी समीप आ गई तो मछली के पेट के समान धूसर वर्ण वाले उस धूलि-पटल में एक सहस्र प्रायः युवकों को पैदल सेना के साथ घोड़े इस तरह चलते हुए दिखाई पड़े मानों जल में झुण्ड के झुण्ड मगर तैर रहे हों । (पैदल सेना के दो हजार जवान) आगे की ओर दौड़ते आ रहे थे । उनके सिर पर लम्बे और घुँघराले बालों का बंधा हुआ जूड़ा था । उनके कपोलों पर हाथीदांत के बने पत्ते हँसी की चमक उत्पन्न कर रहे थे । वे काले अगुरु की बुँदकियों के छींटे वाले लाल रंग के कंचुक कसे हुए थे ।
प्रथम उच्छ्वासः ३७ हाटककटकेन, द्विगुणपट्टपट्टिकागाढग्रन्थिग्रथितासिधेनुना, अनवरत- व्यायामकृतकर्कशशरीरे, वातहरिणयूथेनेव मुहुर्मुहुः खमुड्डोयमानेन, लङ्घितसमविषमावटविटपेन, कोणधारिणा, कृपाणपाणिना, सेवा- गृहीतविविधवनकुसुमफलमूलपर्णेन, 'चल चल, याहि याहि, अप- सर्पापसर्प, पुरः प्रयच्छ पन्थानम्' इत्यनवरतकृतकलकलेन युवप्रायेण, सहस्रमात्रेण पदातिजनेन सनाथमश्ववृन्दं सददर्श । मध्ये च तस्य सार्धचन्द्रेण मुक्ताफलजालमालिना विविधरत्न- खण्डखचितेन शङ्खक्षीरफेनपाण्डुरेण क्षीरोदेनेव स्वयं लक्ष्मीं दातु- मागतेन गगनगतेनातपत्रेण कृतच्छायम्, अच्छाच्छेनाभरणद्युतीनां निवहेन दिशामिव दर्शनानुरागलग्नेन चक्रवालेनानुगम्यमानम्, आनि- 'प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादरत्निमणिबन्धयोः' । हाटकं स्वर्णम् । यदेव द्विगुणाऽत एव गाढग्रन्थिसहत्वन् । ग्रथिताविस्रंसिनी । असिधेनुश्छुरिकः । वातहरिणो यो वाता- भिमुखं धावति । अवट उन्मार्गः । कोणो लगुडः । मध्य इत्यादि । तस्य च मध्येऽष्टादशवर्षदेशीयं युवानमद्राक्षीदिति सम्बन्धः । क्षीरोदस्याप्यर्थंचन्द्रादि सर्वं योज्यम् । छाया कान्तिरिप । चक्रवालेन समूहेन । उन्होंने अपने सिर पर चादर की पगड़ी बाँध ली थी । उनके बायें हाथ की कलाइयों में सोने के कड़े थे । उनकी कमर में कपड़े की दोहरी पेटी की मजबूत गाँठ थी और उसमें छुरी खोंसी हुई थी । निरन्तर व्यायाम करने से उनका बदन कड़ा था । हवा से बात करने वाले हिरनों की तरह वे मानों आकाश में उड़ते-चल रहे थे । वे ऊबड़-खाबड़ जमीन, खाइयों और झाड़ियों को डाँकते जाते थे । कुछ सैनिक मुँगरी या डंडे लिये थे और कुछ के हाथ में तलवारें थीं । सहायता के लिए उन्होंने बनैले फूल, फल, मूल और पत्ते ले लिये थे । 'चलो-चलो', 'जाओ जाओ', 'आगे रास्ता दो' इस तरह हमेशा शोर-गुल मचा रहे थे । सरस्वती ने घोड़ों की उस टुकड़ी के बीच में अट्ठारह वर्ष के एक अश्वारोही युवक को देखा । अर्धचन्द्र से युक्त, मोतियों की मालाओं वाला, अनेक प्रकार के रत्नों से खचित, शंख और दूध के फेन की तरह उजला छत्र उस पर छाया कर रहा था, मानों लक्ष्मी को उसे स्वयं अर्पित करने के लिए क्षीरसमुद्र ही आकाश में लहरा रहा हो । आभूषणों की निर्मल किरणें इस तरह उसका पीछा कर रही थी मानों उसके दर्शन के अनुराग से सारी
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ३८ हर्षचरितम् तम्बविलम्बिन्या मालतीशेखरस्रजा सकलभुवनविजयार्जितया रूपपता- कयेव विराजमानम्, उत्सर्पिभिः शिखण्डखण्डिकापद्मरागमणेररुणे- रंशुजालैरदृश्यमानवनदेवताविधूतैर्बालपल्लवैरिव प्रमृज्यमानमार्गरणु- परुषवपुषम्, बकुलकुड्मलमण्डलीमुण्डमालामण्डनमनोहरेण कुटिल- कुन्तलस्तबकमालिना मौलिना मीलितातपं पिबन्तमिव दिवसम्, पशुपतिजटामुकुटमृगाङ्कद्वितीयशकलघटितस्येव सहजलक्ष्मीसमा- लिङ्गितस्य ललाटपट्टस्य मनःशिलापङ्कपिज्जलेन लावण्येन लिम्पन्त- मिवान्तरिक्षम्, अभिनवयौवनारम्भावष्टम्भप्रगल्भदृष्टिपाततृणीकृत- त्रिभुवनस्य चक्षुषः प्रथिम्ना विकचकुमुदकुवलयकमलसरःसहस्र- सच्छादितदशदिशं शरदभिव प्रवर्तयन्तम्, आयतनयननदीसीमन्त- सेतुबन्धेन ललाटतटशशिमणिशिलातलगलितेन कान्तिसलिलस्रोत- नितम्बशब्दो मुख्यार्थः । 'पश्चान्नितम्बः स्त्रीकट्याः' इत्यमरः । शिखण्डखण्डिका चूडाभरणम् । प्रमृज्यमानेति । वर्तमानकालोऽत्र विवक्षितः । बकुलेत्यादिना निपीय- मानातातपपुल्यवस्तुनिदर्शः । कुन्तलः केशहस्तः, स एव स्तबकः । पुष्पस्तबकः पुष्पसंघात सहजाऽकृत्रिमा, सहोत्पन्ना च । लक्ष्मीः शोभना, श्रीश्च । लावण्यमत्र कान्तिः । अवष्टम्भो गर्वः । द्राघीयसा दीर्घतरेण । सहकारः सुगन्धद्रव्यभेदः सह- दिशाएं एकत्र होकर अनुसरण कर रही हों। मालती की शेखरस्रज उससे नितम्ब तक लटक रही थी, मानों वह समस्त भुवनों की विजय करने से प्राप्त रूप की पताका से विराज- मान हों । शिखण्ड-खण्डिका नामक उसके शिरोभूषण में जड़ी हुई पद्मराग मणि की लाल किरणें फैल रही थीं, मानों दृष्टिपथ में न आने वाली वनदेवता बालपल्लवों द्वारा मार्ग की धूल से उसकी रूखर देह को झाड़ती हो । मौलसिरी के कुड्मलों से बनी हुई मुण्डमाला से मनोहर एवं घुँघराले बालों के गुच्छों से भरे हुए अपने शिर से दिन के आतप को मन्द करता हुआ वह मानों दिन को पी रहा था। उसका ललाट शिव के ललाट के मुकुटचन्द्र के दूसरे खण्ड से मानों बना हुआ था और उसमें स्वाभाविक शोभा थी, मानों वह मनःशिला के पंकसदृश लाल-पीले अपने ललाट के लावण्य से सारे अन्तरिक्ष को लीप रहा था। वह नई जवानी के आरम्भ में गर्वीले और उद्धत दृष्टिपात करने वाली अपनी आँखों से सारे संसार को तृण के बराबर समझ रहा था, ऐसी आँखों की दीर्घता से मानों वह कुमुद, कुवलय और कमल से भरे हुए हजारों सरोवरों से समस्त दिशाओं को ढकने वाली शरत् को प्रवर्तित कर रहा था। उसका नासावंश मानों दीर्घ नयनों की नदी के सीमान्त में बनाया गया पुल का बाँध हो, या उसके ललाटरूपी चन्द्रकान्तमणि के
प्रथम उच्छ्वासः ३९ सेव द्राघीयसा नासावंशेन शोभमानम्, अतिसुरभिसहकारकर्पूर- कक्कोललवङ्गपारिजातकपरिमलपुचा मत्तमधुकरकुलकोलाहलमुखरेण मुखेन सनन्दनवनं वसन्तमिव अवतारयन्तम्, आसन्नसुहृत्परिहास- भावनोत्तानितमुखमुग्धहसितेर्दशनज्योत्स्नास्नपितदिङ्मुखैः पुनः- पुनर्नभसि संचारिणं चन्द्रालोकमिव कल्पयन्तम्, कदम्बमुकुलस्थूल- मुक्ताफलयुगलमध्याध्यासितमरकतस्य त्रिकण्टककर्णाभरणस्य प्रेङ्खतः प्रभया समुत्सर्पन्त्या कृतसकुसुमहिरत्कुन्दपल्लवकर्णावतंस- मिवोपलक्ष्यमाणम्, आमोदितमृगमदपङ्कलिखितपत्रभङ्गभास्वरम्, भुजयुगलमुद्दाममकराक्रान्तशिखरमिव मकरकेतुकेतोः दण्डद्वयं दधानम्, धवलब्रह्मसूत्रसीमन्तितं सागरमथनसामर्षगङ्गास्रोतस्संदानित- मिव मन्दरं देहमुद्वहन्तम्, कर्पूरक्षोदमुष्टिच्छुरणपांशुलेनेव कारफलेनैव क्रियते । पारिजातकोऽनेकद्रव्यसंस्कृतो मुखवासविशेषः, देववृक्षश्च । वसन्तश्चैवंविधेनैव मुखेन प्रारम्भेणोपलक्षितो भवति । रत्नत्रितयेन कृतं त्रिकोण- कण्टकाख्यं कर्णाभरणम् । मृगमदः कस्तूरिका । संदानितं बद्धम् । वेष्टितमित्यर्थः । कुचावत्र कान्तासंबन्धिनादेय चक्रवाकयुगलं तस्य कृते पुलिनसदृशम् । कोणः पल्लवः । पृष्ठतः पश्चाद्भागे कक्ष्यायाः परिवलनाधिकसूत्रितिरित्युक्तः । क्षिप्तो लम्ब- शिलातल से चू कर बहता हुआ कान्ति का प्रवाह हो, ऐसे वह अपने नासावंश से सुशो- भित था। सहकार, कर्पूर, कक्कोल, लवङ्ग ओर पारिजातक इन पाँच सुगन्धित पदार्थों की गन्ध उसके मुख से निकल रही थी, उस पर मतवाले भौंरे गुञ्जार रहे थे, मानों वह चन्दन वन के सहित वहाँ वसन्त को उतार रहा था। वह जब कभी अपने पास के मित्रों के साथ परिहास की भावना से मुँह ऊँचा करके हँसता था तो समस्त दिशाएँ उसके दातों की चाँदनी में धुल जाती थी और मानों वह आकाश में बार-बार संचरण करने वाले चन्द्रा- लोक का निर्माण कर रहा था। उसके कान में त्रिकंटक नाम का गहना था, जो कदम्ब के कुडमल के समान दो स्थूल मोतियों के बीच में पन्ने का जड़ाव करके बनाया गया था, ऐसे त्रिकंटक की प्रभा फैल रही थी, मानों उस युवक ने फूल के सहित कुन्द के हरे पल्लवों को कर्णावतंस बना लिया हो। सुगन्धित कस्तूरी के पंक की बनी हुई पत्ररेखाओं से उसके दोनों हाथ चमक रहे थे, मानों कामदेव की पताका के बड़े-बड़े मकरों से आक्रान्त शिखर वाले दो डंडे हों। मानों समुद्रमंथन से क्रुद्ध गंगा की धाराओं से जकड़े हुए मन्दराचल के समान श्वेत यज्ञोपवीत से वेष्टित शरीर को वह धारण कर रहा था।
४० हर्षचरितम् कान्तोच्चकुचचक्रवाकयुगलविपुलपुलिनेनोरःस्थलेन स्थूलभुजायाम- पुञ्जितम्, पुरो विस्तारयन्तमिव दिक्चक्रम्, पुरस्तादीषदधोनाभि- निहितककोणकमनीयेन पृष्ठतः कक्ष्याधिकक्षिप्तपल्लवेनोभयतःसंवलन- प्रकटितोरुत्रिभागेन हारीतहरिता निबिडनिपीडितेनाधरवाससा विभज्यमानतनुतरमध्यभागम्, अनवरतश्रमोपचितमांसकठिनविकट- मकरमुखसंलग्नजानुभ्यामतिविशालवक्षःस्थलोपलवेदिकोत्तम्भनशिलास्त- म्भाभ्यां चारुचन्दनस्थासकस्थूलतरकान्तिभ्यामूरुदण्डाभ्यामुप- हसन्तमिवैरावतकरायामम्, १अतिभरितोरुभारवहनखेदेनेव तनु- तरजङ्घाकाण्डम्, कल्पपादपपल्लवद्वयस्येव पाटलस्योभयपार्श्ववि- मानः पल्लवो यस्य तत् । संवलनं संकोचनम् । हारीतः पक्षिभेदः । हरिता नीलेन । मकरमुखं जानुनोरुपरिभागः । उत्तम्भनं धारणम् । स्थासकश्चन्द्रकः । आयामो दैर्ध्यम् । न केवलमायामं शुक्लत्वमप्युपहसन्तम् । धर्मयोरेकनिर्देशोऽन्यसंवित्साह- चर्यात । 'अतिभरितोरुभारवहनेन' इति पाठः । ऊरु एव भारः । प्रशस्ता जङ्घा कपूर के चूर्ण की मूठों से धूसरित उसकी छाती कान्ता के ऊँचे स्तन रूपी चक्रवाक युगल के लिए चौड़ी रेतीली जमीन थी, ऐसी छाती से वह मानों अपनी स्थूल भुजाओं के आयात में पुंजीभूत दिशाओं को फैला रहा था। हारीत पक्षी के समान नील वर्ण का कस कर बँधा हुआ अधोवस्त्र उसकी पतली कमर को विभाजित कर रहा था, सामने की ओर नाभि से कुछ नीचे उसका एक कोना बहुत अच्छा लग रहा था, उस अधोवस्त्र का कच्छ भाग पीछे की ओर पल्ला खोंसने के बाद भी कुछ ऊपर निकला रहता था। दोनों ओर शरीर के मोड़ने से दाहिनी जांघ का कुछ भाग दिखाई दे जाता था। वह अपने ऊरुदण्डों से ऐरावत की सूँड का मानों उपहास कर रहा था, दोनों जांघों का मांस हमेशा व्यायाम करते रहने से बढ़ गया था, वे ऐसी लगती थीं मानों कठिन और विकट मगर के मुख में फँस गई हों, वे चौड़ी छाती के चबूतरे को धारण करने के लिए शिलास्तम्भ थीं। चन्दन के सुंदर थप्पे से उसकी जाँघों में कान्ति और भी निखर उठी थी। हद से ज्यादा उभरी हुई जाँघों के भार-वहन करने से खिन्न होकर मानों उसकी टांगें पतली हो रही थीं। कल्पवृक्ष के दो पल्लवों के समान ललछूहू रंग के दोनों ओर लटकते हुए पैरों के नखों की किरणें डोलती हुई मानों घोड़ों का चामरमाला नामक अलंकार बना रही थीं। १. अतिभरितोरुभागभर ।
लम्बिनः पादद्वयस्य दोलायमानैर्नखमयूखैरश्वमण्डनचामरमालामिव रचयन्तम्, अभिमुखमुच्चैरुद्ध्वद्भिरतिचिरमुपरिविश्राम्यद्भिरिव वलितविकटं पतद्भिः खुरैः खण्डितभुवि प्रतिक्षणदशनविमुक्तखण- खणायितखरखलीने दीर्घघ्राणलीनलालिके ललाटलुलितचारुचामीकर- चक्रमे शिञ्जानशातकौम्भायानशोभिनि मनोरंहसि गोलाङ्गूलकपोलकाल- कायलोम्नि नीलसिन्धुवारवर्णे वाजिनि महति समारूढम्, उभयतः पर्याणपट्टश्लिष्टहस्ताभ्यामासन्नपरिचारकाभ्यां दोधूयमानधवलचामरिका- युगलम्, अग्रतः पठतो वन्दिनः सुभाषितमुत्कण्टकितकपोलफलकेन लग्नकर्णोत्पलकेसरपक्ष्मशकलेनेव मुखशशिना भावयन्तम्, अनङ्ग- युगावतारमिव दर्शयन्तम्, चन्द्रमयीमिव सृष्टिमुत्पादयन्तम्, विलास-
जङ्घाकाण्डम्। कल्पपादपसम्बन्धितया न केवलं लोहित्यं सौकुमार्यञ्चोच्यते। याव- त्सकलसंपत्फलप्रदत्वादिकप्रकर्षान्तरम् । अतिचिरमित्यादिनानाकुलत्वमुच्यते। यदु- क्तम्—'आवृत्ताः कुञ्चिताः स्थूलदलपाल्यग्रसंस्थिताः । विवर्ज्याश्चाकुलपदन्यासेन गम- नेन च ॥' इति विकटं चित्रम् । खुरैरिति । तद्व्यापारवैचित्र्याद्बहुत्वमग्रिमयोरेव । एवंविधसंनिवेशसंभवात् । खलीनं कविका । लालिका कविकाशेखरम् । आयानं हयमण्डनमाला । गोलाङ्गुलः कृष्णमुखो वानरः । नीलेत्यादौ कुमुदकुन्दमृणालगौर इत्यादिवन्न पौनरुक्त्यम् । महतोति । उक्तं च—'सर्वलक्षणहीनोऽपि महाकायः प्रशस्यते' इति । आसन्नेत्यनेन विश्वसनीयत्वमुक्तम् । अनङ्गयुगेति । अनङ्गजन्मना यदुपलक्षितं युगं कालविशेषस्तस्य नूतनमदसाहश्यात् । यद्वा—अनङ्गयोयुगं तद-
मन के समान वेग वालं, लंगूर के मुँह की तरह काले रोंगटे वाले सिन्धुवार जैसे नीले, तगड़े घोड़े पर वह सवार था। वह घोड़ा अपने खुरों से जो सामने देर तक उठे रह जाते और विकट रूप में टेढ़े होकर गिरते, जमीन को छोड़ रहा था । वह काँटेदार लगाम को प्रतिक्षण अपने दाँतों से छोड़ता तो खड़-खड़ आवाज होती । घोड़े की नाक पर सामने की ओर लगाम का कमानीदार हिस्सा और माथे पर सोने का पदक झूल रहा था । आवाज करती हुई सुवर्ण की आयान नामक माला से वह घोड़ा सुशोभित हो रहा था । अपने अश्व के पलान का एक हाथ से सहारा लेकर उसके दोनों ओर दो आसन्न परिचारक चँवर झल रहे थे । आगे आगे जो बन्दीजन सुभाषित पाठ कर रहा था उसे सुन कर उसके मुख- चन्द्र के दोनों कपोलभाग रोमाञ्चित हो रहे थे मानों उसके कर्णोत्पल का पराग झर गया
४२ हर्षचरितम् प्रायमिव जीवलोकं जनयन्तम्, अनुरागमयमिव सर्गान्तरमारभ- यन्तम्, शृङ्गारमयमिव दिवसमापादयन्तम्, रागराज्यमिव प्रवर्त- यन्तम्, आकर्षणाञ्जनमिव चक्षुषोः, वशीकरणमन्त्रमिव मनसः, स्वस्थावेशचूर्णमिवेन्द्रियाणाम्, असंतोषमिव कौतुकस्य, सिद्धयोग- मिव सौभाग्यस्य, पुनर्जन्मदिवसमिव मन्मथस्य, रसायनमिव यौव- 'नस्य, एकाराज्यमिव रामणीयकस्य, कीर्तिस्तम्भमिव रूपस्य, मूल- कोशमिव लावण्यस्य, पुण्यकर्मपरिणाममिव संसारस्य, प्रथमांकुर- मिव कान्तिलतायाः, सर्गाभ्यासफलमिव प्रजापतेः, प्रतापमिव विभ्रमस्य, यशःप्रवाहमिव वैदग्ध्यस्य, अष्टादशवर्षदेशीयं युवानम- द्राक्षीत् । वतारमिव । द्वित्वासंख्यापूर्वकत्वात् । चन्द्रमयीमिवेति कान्तिमयतवेन । आकर्ष- र्षणाञ्जनं वशीकरणार्थं कज्जलम् । असंतोषमिवेत्ति । यस्यैनं प्राप्य कौतुकं न निवर्तते, तस्य संतोष एव नास्ति । केषांचिदेव द्रव्याणां संबन्धो यो न कदा- चित्कार्ये व्यभिचरति स सिद्धयोगः । सौभाग्यं तावत्सर्वं किंचन वशीकुरुते, ए- चास्य तदेव सिद्धयोग इव तदाश्रयणेन निःशेषलोकवशीकरणक्षमत्वम् जन्मदिवस- मिति । तद्गोचरपतितानां कामोत्पत्तेः । रसायनमिवेति । यथा रसायनवशात्कवि- त्परिपूणंथ स्थिरश्च भवति, तद्वदेतदाश्रयेण यौवनम् । ईषदसमाप्तोऽष्टादशवर्षोऽष्टा- दशवर्षदेशीयस्तम् । न परेण संश्लिष्टस्तुरङ्गो यस्य तम् । तधीचस्य तु पर्याप्ति- श्लिष्टाद्युक्तम् । परिणतवयस्त्वेन सत्यवादिना सावित्रीसरस्वत्यो प्रति च विभ्रम- कारित्वमुच्यते । अन्यथोपक्रम एव संभाषणमात्रं न प्रवर्तते । हो। मानों वह अनङ्ग युग का अवतार दिखला रहा था, सारी सृष्टि को चन्द्रमय बना रहा था, सारे प्राणिलोक को विलासमय कर रहा था, राग के राज्य का प्रवर्त्तन कर रहा था, मानों वह नेत्र रूप आकर्षणाञ्जन, मन का वशीकरणमंत्र, इन्द्रियों को विवश करने वाला चूर्ण, कुतूहल का असन्तोष, सौभाग्य का सिद्धियोग, कामदेव का पुनर्जन्मदिन, यौवन का रसायन, सौन्दर्य का एकच्छत्र राज्य, रूप का कीर्तिस्तम्भ, लावण्य का मूल कोश, संसार के सारे पुण्यकर्मों का परिणाम, कान्ति रूपी लता का पहला अंकुर, ब्रह्मा के सृष्टिनिर्माण के अभ्यास का फल-स्वरूप, विभ्रम का प्रताप और वैदग्ध्य का यश- प्रवाह था ।
[Header] प्रथम उच्छ्वासः । ४३
पार्श्वे च तस्य द्वितीयमपरसंश्लिष्टतुरङ्गम्, प्रांशुमुत्तप्ततपनीयस्तम्भा- कारम्, परिणतवयसमपि व्यायामकठिनकायम्, नीचनखश्मश्रुकेशम्, शुक्तिखलतिम्, ईषत्तुन्दिलम्, रोमशोरःस्थलम्, अनुल्बणोदारवेषतया जरामपि विनयमिव शिक्षयन्तम्, गुणानपि गरिमाणमिवानयन्तम्, महानुभावतामपि शिष्यतामिवानयन्तम्, आचारस्याप्याचार्यमिव कुर्वाणम्, वलक्षवारबाणधारिणम्, धौतदुकूलपट्टिकापरिवेष्टित- मौलिं पुरुषम् । अथ स युवा पुरोयायिनां यथादर्शनं प्रतिनिवृत्यातिविस्मितमनसां कथयतां पदातीनां सकाशादुपलभ्य दिव्याकृति तत्कन्यायुगलमुपजात- कुतूहलः प्रतूर्णतुरगो दिदृक्षुस्तं लतामण्डपोद्देशमाजगाम । दूरादेव
शुक्तिखलतिं शुक्लाकारखल्वाटम् । तुन्दिलं लम्बोदरम् । अत एवास्य विकु- क्षिरिति नाम । अनुल्बणोऽनुद्धतः । उदारः श्रेष्ठः । जरामिति । जरा किल सर्वं- विनयं शिक्षयति । महानुभावता महाशयता । अनुभावयति कार्यमकार्यं वा बोध- यतीत्यनुभावः । शिष्यतामिति । परशासनदक्षकर्मं महानुभावतया तत एवावसो- यत इत्युक्तं भवति । आचारः शास्त्रकारप्रदर्शिता विशिष्टा नीतिः । स च सर्वस्मि- न्नाचार्यकमवलम्बते । संस्कारातिशयमापादयतीत्यर्थः । वलक्षः शुक्लः । वारबाणः कञ्चुकः । मौलयः केशाः । अथेति । नतु गतागतिकतया सर्वचेतनामभिप्रायेण सौन्दर्यमेतयोरभिव्यज्यते । प्रतिनिवृत्य न पुनः प्रसङ्गत उपेत्य । कन्याकत्वादेतन्नानुचितम् । प्रतूर्णी वेगगामी ।
उस नवयुवक के बगल में एक दूसरे पुरुष को देखा । वह भी दूसरे घोड़े पर सवार था । उसका कद लम्बा था । उसकी आकृति तपे हुए सोने के खम्भे के समान था । अवस्था अधेड़ होने पर भी उसका शरीर व्यायाम से गँठा हुआ था । उसके दाढ़ी, मूँछ और नाखून साफ-सुथरे कटे हुए थे । बाल झड़ जाने से बिलकुल सितुहे-जैसा लगता था । उसकी तोंद निकल आई थी । छाती में बाल जम गए थे, वेष सौम्य और श्रेष्ठ था, मानो वह अपनी वृद्धावस्था को भी विनय की सीख दे रहा था, गुणों में भी गौरव भर रहा था, महानुभावता को भी शिष्य बना रहा था, आचारों का भी आचार्य हो रहा था । वह उज्ज्वल कंचुक पहने हुए और सिर में धुली हुई दुकूलपट्टिका बाँधे हुए था । वह युवक देखकर लौटे हुए अग्रगामी पैदल सैनिकों से दिव्य आकृति वाली दो कन्याओं के विषय में सुनते ही कुतूहल से भर कर देखने के लिए उत्सुक हो घोड़े को तेज कर