कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
है, हेच' नमक' हुस्नोदमक' हूँ' रो गिलमा' ।
पापोश' चमक' इन्द्रमती हूरके आगे ॥
जेते हैं सलातीन जमी' और 'फलकके !
खिदमंतममें' हैं सारे मेरे फगफूरके आगे ॥
दिलदार है बाजारमें कोपर्दः नशीं' है ।
हाजिर 'बदिले बेदिल 'रञ्जुरके आगे ॥
मूसा 'सदहा गुजरे न देखा कभी सो औज' ॥
गाफिल हुए सब हिसोहवा' ढङ्ग लगाये ॥
कुछ जोर नहीं जालिम' जंवूरके आगे ॥
फिरता बतवाफे तो यह गरदूँ जो कमरकोज ।
सिजदे' झुका है तेरे मनशूरके आगे ॥
कह भेद उसीसे जो कि हो महूरमें' इसरार
कर फाश' न तू हरगिज 'गयूरके आगे ॥
नथुनेमें 'बनी जजान है जबतक तेरे आजिज ॥
कर उसकी बुजर्गी खडे जम्हूरके आगे ।
यथा ।
भारतो 'स्वसमवेदकी तहरीर' में देखो ।
उलमाय' फकीरनकी' तकरीर' में देखो ॥
जिनके सदहा लख हैं सुदर्शनसे गुलामों ।
सो साहब के कलमए 'तासीर में देखो ॥
मखलूक' जहाँ मजमअ' हुआ केते करोडों ।
इस सत्यगुरु की 'खादिम तौकरिमें' देखो ॥
बन्दे हैं पडे कैद हसीनान' हजारो ।
बबदल' बुते जुल्फकी' जञ्जीर में देखो ॥
जिस नामसे वाकिफ' न जमी' और न जमाँ' है ।
सो नाम है उस खादिमे जागीर में देखो ॥
१ तुच्छ, २ खार, ३ सौन्दर्य, लावण्य, ४ परी, ५ सुंदर सुंदर लडके, ६ जूती, ७ लावण्य,
८ भू, ९ आसमान, १० सेवा, ११ पदमें छिप हुआ, १२ हृदयके व्याकुल, १३ अत्यन्त रंजीदा,
१४ रातदिन, १५ तपिश, १६ जिस पर्वतपर मूसाको परमात्माके दर्शन हुए थे, १७ अत्यन्त-
जुल्मी, १८ वन्दना, १९ ढकना, २० जाहिर, २१ गमार, २२ कविकी कविताका नाम है ।
२३ आत्म बोधक शास्त्र या कबीर साहबका बीजक, २४ लिखावट, २५ उलमा, २६ फकीरों
२७ वचन, २८ स्वभाव, २९ पैदा, किया, ३० समूह, ३१ खिदमत करनेवाला, ३२ सत्कार ।
३३ प्रसन्न चेता, ३४ न फिरनेवाले, ३५ शरीर, ३६ जानकर, ३७ भू, ३८ जमाना,
जो कर न सके फतह' कोई मर्द सिपाई ।
सो आशकके नालए' शबगीर में देखो ॥
जिस इल्मसे महरूम' रहे खादिमोख्वाजः ।
सोई कदमें बरकत्' गुरु पीर में देखा ॥
बुल बुल है फुगा में जिसे कुमरी करे कूकू ।
हर' गुलशनो हर गुलवने तसवीर में देखा ॥
जिसके लिए जाबाज' है परवानए' बे खौफ' ।
सो महरुख' हर शमः व मुलगीर में देखो ॥
सदरञ्ज' उठा न गञ्ज' सो हाथमें आवे ।
आसान है सो उसकी तदवीरमें देखो ।
यह हरदो' जहाँ और जहाँदार तमासा ॥
सब खेल खुला' कैल की तजबीर में देखो ।
सोहाजिरो' नाजिर' है बहों जाहिरो वातिन' ॥
वेदारी और खाबकी ताबीर में देखो ।
जिसके लिये महाह' समीह्मद' सरायों ॥
यह सारा जहाँ उसकी तस्वीर में देखो ।
जो मजहब जारी न हुआ तीन जमाना ॥
घर घर है सो दौर इनकी अखीर में देखो ।
यों और वहाँ परदः दुई, इठगया' आजिज ।
सत् पुरुषको साहबे कबीर' वें देखो ॥
*यथा- ताजीम तेरे बन्देको गुलजार झुका ।
तकरीमको शम्शो महे अनवार झुका ॥
जब आपही से आप बजा घण्ट समावी ॥
पाबोसको गेती शहे दरबार झुका ॥
रक्कास झुका तबलः झुका तार व तम्बूर ।
बं बादए पैमानः व सरशार झुका ॥
१ जीव २ प्रेमी, ३ आहंकीलैन, ४ अलग, ५ हल्का, ६ प्रत्येक, ७ जीव, ८ पतंग, ९ निडर,
१० चन्द्रमुखी, ११ सदाके दुख, १२ ताला, १३ इसलोक और परलोक, १४ एक अनागत वक्ता,
१५ उपस्थित, १६ द्रष्टा, १७ हृदय, १८ सराहक, १९ स्तुति, २० द्वैत, २१ कबीर साहब ।
- यज्ञमें घंटाके अपने आप बज जानेसे सभीने सुदर्शन श्वपचको भगवान्का अनन्य भक्त जानकर शिर झुकाया था इसी शिर झुकानेकी बातको नाम निर्देशके साथ इस गजलमें भी कहा गया है ।
सूफ़ी भि झुंका रिन्द झुका जाजिबे मजबूत ।
मयः पीर मुर्गा खानए खुम्मार झुका ॥
मखलूक हुआ आगाह उस अकबर इसरार ।
आली अमलो इल्म अमलदार झुका ॥
जब पहिन अजर जामा चले हंस तुम्हारे ।
तसलीमको तब आगे हो ओंकार झुका ॥
हाज़िर थे इल्म और फ़नून फ़ाखिरे कसूबी ।
वा तजरबए तसबीहो जुन्नार झुका ॥
सदहा जमा जङ्गलको जलावे तजो पलकमें ।
ता विन्दए नाविक शररबार झुका ॥
है कौन बद अन्देशः जो आ पेश तुम्हारे ।
हैबत से तेरी चर्ख यह दौवार झुका ॥
सब वेष भगे देख तेरा तीर ज़िगर सोज़ ।
रुस्तम भी झुका शेवः सितमगार झुका ॥
ताज़ीस्त सनाख्वाँ हो तु इस कातिल अपने ।
सिजदेको पहले निरङ्कार झुका ॥
बोले न हँसे यार तलबगार फिर आजिज़ ।
जब तुझ हदफ़े सीनः पै सोफ़ार झुका ॥
गरुड़जी महाराज ।
कबीरसागरान्तर्गत बोधसागरमें एक 'गरुड़ बोध' भी है । उसमें सबसे पहिले धर्मदासजी कबीर साहिबसे गरुड़बोधका भेद पूछते हैं, एवं कबीर साहिब कहते हैं कि, पुरुषने कहा कि, ए सुकृत ! आप संसारमें जाओ जीवोंका उद्धार करो । ज्ञानीजीने पृथ्वीपर आकर, जिसने उनके वचन माना उसीका उद्धार कर दिया । सबसे पहले गरुड़जी मिले, मैंने उन्हें सत्यनामका उपदेश दिया, कैसे दिया । सो मैं तुझे सुनाये देता हूँ । गरुड़को जब मैं मिला तो गरुड़ने मुझे पूछा कि, आप कौन एवं कहाँसे आये हैं मैंने कहा कि, ज्ञानी मेरा नाम है संसामें दीक्षा देनेके लिये सत्य लोकसे आया हूँ । गरुड़ने यह सुनकर बड़ा आश्चर्य माना कि, कृष्णसे भिन्न दूसरा सत्य पुरुष कौन है । वे ही दसों अवतार धारण करते हैं । कुछ बातोंके पीछे कबीर साहिबने गरुड़जीको कृष्ण महाराज की आज्ञा लेने को भेजा था ।
कृष्ण वचन ।
चौ०— सुनके कृष्ण उत्तर तब दीन्हा । भले गरुड़ तुम उनको चीन्हा ॥
सरगुण कई बार अवतारा । निज साहब है अगम अपारा ॥
सो साहब हमको निरमाया । आज्ञा कीन्हीं हमहिं उपाया ॥
जो कबीर भाषे अरथाई । सोई वचन सत्य है भाई ॥
गरुड़ वचन ।
गरुड़ कहे तुम काहे न भाखी । कैसे मोहिं छिपायके राखी ॥
सरगुण प्रभु दीन्हा फैलाई । निरगुन कैसे नहिं प्रगटाई ॥
कृष्ण वचन ।
सुनहु गरुड़ एक वचन प्रमाना । निरगुन कोई बिरलै जाना ॥
हम देही धरि क्रीडा कीन्हा । यही मान सब काहू लीन्हा ॥
हम गीतामहैं सन्धि जनाई । ताको कोई न चीन्है भाई ॥
निरगुन भेद कहूँ परमाना । मनकर भेद न कोई जाना ॥
पढ़ गीता पण्डित बौराई । अर्थ भेद को गम नहिं पाई ॥
पढ़ गीता औरन समझावें । आप भरममें जन्म गवावें ॥
कथ गीता हम सकल बताई । पण्डित अर्थ न समझा जाई ॥
ब्रह्मा विष्णू शिव कह भाई । इन तीनों मिल बाजी लाई ॥
ता बाजी अटका सब कोई । निरगुणकी गम कैसे होई ॥
बाजी लायके जग भरमाई । निर्गुणकी गति कोइ नहिं पाई ॥
मैं सब जानूँ भेद अवगाहा । और देव नहिं पावैं थाहा ॥
गीताको हम कथ समझाई । सा अर्जुन नहिं मानी भाई ॥
रहन गहन उनहैं नहिं पाई । अरथ सुनै सब जन अरुझाई ॥
पण्डित पढ़ गीता अरथावै । गीता केर अर्थ नहिं पावै ॥
फिर फिर हमहींको ठहरावै । निर्गुणकी गम नाहीं पावै ॥
हम कबीरको नीके जाना । उनहीं कीन्ह सकल मण्डाना ॥
सकल जीव उन अण्ड मुँदाई । इनहीं सबहीं अर्थ दूढ़ाई ॥
जहैं लगि तीरथ देखहु जाई । इनहीं सब थापना थपाई ॥
और सकलको रचना कीन्हा । यहि विधि थाप सबनको दीन्हा ॥
हम तीनों पुरुष बिसराई । आप आपको कीन्ह बड़ाई ॥
साखी—कह कृष्णजी गरुड़से, तुम गुरु करो कबीर ॥
हंस लोक पहुँचावई, खेड़ लगावै तीर ॥
इस प्रकार श्रीकृष्णने जब गरुड़को आज्ञा दी कि, तुम कबीर सहाबको गुरु करो, तब गरुड़जी तुरन्त सत्यगुरुके पास गये । कबीर साहबकी आज्ञानुसार दीक्षा लेनेका सब प्रबंध किया । जैसा कि, अब वर्तमान कालमें कबीर पंथियोंमें दीक्षा लेनेकी प्रथा है । इसी नियमके अनुसार गरुड़जीने चारों ओर पत्र भेजकर बहुत साधुओंको एकत्रित कर भण्डारेका बड़ा प्रबंध किया । समस्त साधुमंडलिका प्रेम पूर्वक सेवा सत्कार किया ।
चौपाई—जितने साधु द्वारिका चीन्हू । तिनिहिं गरुड़ सबको दल दीन्हू ॥
जहैं लगि मुनिवर सहस अठासी । आए ऋषि मुनि सिद्ध चौरासी ॥
आए ऋषि जो सहस अठासी । नागलोकके भोग विलासी ॥
वासुदेव जहैं आप रहाये । और नाग बहुतेक चलि आये ॥
ब्रह्मा विष्णु जहैं आये भाई । शिव आये बहुतेक चलि लुगाई ॥
महादेव वचन ।
कह शिव कोपके वचन अपारा । तीन छोड़ कस और विचारा ॥
सब पर तेज महादेव कीन्हू । सब मिलिआय गरुड़को चीन्हू ॥
तब शिव ऐसे वचन सुनाई । हमें तीनों पर और न भाई ॥
गरुड़ वचन ।
सुनु ब्रह्मा सुनु विष्णु महेशा । मो को कीन्ही कृष्ण उपदेशा ॥
जो कछु कृष्ण बताई भेखा । सो तुम्हरो मत आखिन देखा ॥
महादेव वचन ।
यह सुनि महादेव रिसियाना । हमरी गति तुम कैसे जाना ॥
हम तीनों हैं त्रिभुवन राई । हमें छोड़ कस और दूढ़ाई ॥
शिवजी बहुत कुछ कह अत्यंत क्रुद्ध हुए बड़ा भय दिखलाया ।
पर गरुड़जीने कुछ भी परवाह नहीं की, ब्रह्मा विष्णु आदि सब देवता उपस्थित थे । जब गरुड़जीने कबीर साहबसे दीक्षा ली, सत्यगुरुका ज्ञान पाकर भली प्रकार सन्तुष्ट हुए, गरुड़जीके सामने बहुतसे लोग ब्रह्मा विष्णु तथा शिव सहित एकत्रित हुए, पर किसकी ताकत थी कि, ज्ञानमें गरुड़जीका सामना कर सके ।
जिस समय गरुड़जी दीक्षालेने लगे उस समयका वृत्तान्त सुनो कि, उनपर कैसी आकाशी दया हुई थी ।
चौ०—ऐसी भाँति भगति उन साजा । बाजे सकल अनाहद बाजा ॥
बाजे शंख बीन शहनाई । गैवको बाजा बाजै भाई ॥
ताल मृदङ्ग गैवसे वाजी । ऐसी भांति भक्त भल साजी ॥
सत्य लोकसे उतरे दासा । करें भक्ति वो भोग विलासा ॥
सखा समेत साज जो आई । जगमगज्योतिवरणि नहिं जाई ॥
निर्गुण भक्त कीन्ह सञ्जोई । केते भूल रहे सब कोई ॥
नागलोककी कन्या आई । मोहि रहे सब देखी भुलाई ॥
मोहे ब्रह्मा विष्णु महेशा । नारद शारद औ सुख देशा ॥
गण गंधर्व मोहे आचारी । निर्गुन भेद न परे विचारी ॥
मोहे कृष्ण द्वारिका वासी । मोहे सकल सिद्ध चौरासी ॥
यहि विधि भक्ति कीन्ह चितलाई । देहको सुधि सर्वाहि विसराई ॥
धन्य धन्य सब करें पुकारी । धन्य कबीर है भक्ति तुम्हारी ॥
धन्य गरुण है ज्ञानि जो पाया । ऐसे सब कमाल बचन सुनायी ॥
जब गरुड़जीने दीक्षा ली उस समय बड़ा सभाज हुआ । सत्यलोकसे हंस, उत्तर पड़े, सब सिद्ध साधु तथा देवता इकट्ठे थे, अंतरिक्षसे, अनगिनती बाजे बजने लगे, नागलोकसे एक स्त्री आई, उसको देख सब देवता तथा सिद्ध आदि मोहितसे हो गये, गरुड़जी ऐसे भाग्यवान् थे कि, उनके निमित्त कबीर साहबने सर्व सामग्री सत्यलोकसे मँगवाई थी, दीक्षा देनेके समय अनहद बाजा बजने लगा, ऐसा आनन्द हुआ । जो कभी देखा सुना नहीं गया था । गरुड़ने अत्यंत नम्रता पूर्वक सब ऋषि, मुनि तथा सब मनुष्योंका सत्कार किया जिससे बड़ा आनन्द हुआ । गरुड़जी सत्यगुरुका ज्ञान पाकर योग्य हो गए । पीछे सत्यगुरुकी आज्ञा लेकर तीनों देवताओंके निकट गये, पहले ब्रह्मासे मिले । ब्रह्माने देखा कि, गरुड़जी आते हैं तब प्रतिष्ठा सहित उठ खड़े हुए । यह बात उस समयकी हैं जब सभा विसर्जन हो चुकी थी, सब लोग अपने अपने घरको चले गये थे । जब ब्रह्माने देखा कि, गरुड़जी आते हैं, तब ब्रह्मा स्वागतके निमित्त उठे और बड़ी प्रतिष्ठा तथा मर्यादा की । जब गरुड़जी आसनपर बैठ गये तब वार्तालाप होने लगी । गरुड़जीने कहा कि, हे ब्रह्मा ! सत्यगुरुकी भक्ति मिले बिना कदापि मुक्ति न मिलेगी । करोड़ों बार सब उत्पन्न होते और मरते हैं उनकी मुक्ति कदापि नहीं होती । हे ब्रह्मा ! सत्यगुरुकी दया बिना आवा-गमनके दुःखसे कदापि कोई नहीं छूट सकता ।
चौ०—अस्थिर योग न काहू पाई । कोटि ऋषीश रहे भरमाई ॥
कोटि रुद्र औतार जो लीन्हा । अविगत पुरुष न काहू चीन्हा ॥
गण गंधर्वकी कौन चलावे । सनकादिक शुक्रदेव भुलावे ॥
कबीर शब्दका अरबीमें अर्थ
शेषनागजी बहुत भुलाई । देवी भूल दया नहिं आई ॥
जीव अनेक घात जो लाई । अविगतिकी गति काहु नपाई ॥
आप आप सब करें बड़ाई । तुमहूं ब्रह्मा देह जो पाई ॥
कीन्हा खोज अन्त नहिं पाये । तब तुम आप आप ठहराये ॥
तुम्हारे भूले जगत भुलाना । आदि पुरुषका मर्म न जाना ॥
तैतिस कोटि देवता आहीं । सब भूले कोई पार न पाहीं ॥
तुम बाजीगर बाजी लाये । तुमहीं सकल दीन भरमाये ॥
जब गरुड़जीके कथनको ब्रह्माजी सुनकर अत्यंत क्रुद्ध हुए जान लिया कि, गरुड़ने हमको तुच्छ ठहरा लिया है, ब्रह्माने सबको बुलाया राजा इन्द्र अपने दरबारियों सहित और नाग नागिन इत्यादि सब देवते ब्रह्मा तथा गरुड़का वाद विवाद सुननेके लिये आविराजे, ब्रह्माजी बड़े ही क्रुद्ध थे कि, गरुड़ तो हमको तुच्छ और नीच जानता हुआ बटमार बताता है ।
चौपाई—दिव्य दृष्टि में देखा बानी । है कोई पुरुष अगम निर्वानी ॥
इस प्रकार सुन देवता और राजा इन्द्र इत्यादि गरुड़जीके सामने कोई बात नहीं कर सके, सबके सब पराजित हुए, सब मिलकर आदिभवानीके निकट गये, दण्डवत प्रणाम किया । ब्रह्माने कहा कि, हे माता मेरा रचा हुआ तो समस्त संसार है गरुड़ दूसरेको किस प्रकार ठहराता है ! आदि भवानीने उत्तर दिया कि, हे ब्रह्मा ! तू मिथ्यावादी है पहले तूने मिथ्या भाषण किया था, इसके कारण तुझको शाप मिला अब फिर तू क्यों घमण्ड करता है ? यदि तूही समस्त संसारका रचयिता था तो फिर तू किसका ध्यान धरने गया था ? अपनी अज्ञानता तथा मूर्खताको छोड़, सत्यपुरुषका ध्यान कर । महामायाके इस प्रकार कहनेपर ब्रह्मा लज्जित तथा निस्तब्ध हुए । आद्याके सामने किसीको कुछ उत्तर देते न बन पड़ा । तब फिर गरुड़जी बोले—
चौपाई—सुन ब्रह्मा मति है अज्ञाना । तुम माताको कहा न माना ॥
साखी—तुम ब्रह्मा जानो नहीं, भये करमके खोट ।
हम हम करके भूलिया, ताते लगी न चोट ॥
कहैं गरुड़ समझायकै, जनि भूलो अज्ञान ।
साहब एक अगम्य है, ताका करलो ध्यान ॥
सबने निरञ्जन देवताको जगत् रचयिता ठहराया कि, वह सबके ऊपर है । फिर शिवजी अत्यंत क्रुद्ध होकर बोले कि, मेरा बनाया हुआ तो सब कुछ है, मैं चाहूँ तो गरुड़ तुझको अभी समाप्त कर डालूँ । फिर तू बोलने योग्य न रहेगा कि, सत्य पुरुष कौन हैं । यह सुन गरुड़ बोले कि—
१४ अध्याय कबीरसाहबके प्राचीन शिष्य
चौ०- महादेव तुम मतिके हीना । तुम नहिं माया पुरुष को चीना ॥
ताते तुमहूँ गरव भुलाई । तुम्हरे मारे कोई न जाई ॥
तुम कंचक हो जीव विचारा । तुम्हरे कहे होई का पारा ॥
साखी-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सुनिये सत्य विचार ।
वह तो पुरुष अखण्ड है, तुम नहिं पाओ पार ॥
चौपाई-तुम भूले आपाको थापी । आप थाप भये तुम जापी ॥
जब देवताओंको घमण्डी देखा तब सत्य गुरुने एक ऐसा कौतुक दिखलाया कि, बङ्ग-देशका ब्राह्मण कुमार (जिसकी मृत्यु निकट आ चुकी थी) समीप था, अब वह मर जावे । मृत्युके भयसे भयभीत होकर देवताओंके शरणमें आया कहा कि, मेरे प्राणोंको बचाओ । इतनी बात सुनकर देवताओंने स्पष्ट उत्तर दिया कि, हम तुमको नहीं बचा सकते । यमराज महाप्रबल है । उसी समय गरुड़जीने सत्यगुरुकी कृपासे उस बालककी प्राणरक्षा की । देवताओंने लज्जित होकर सिर झुका लिया । गरुड़जीकी श्रेष्ठता तथा उच्चता अच्छी तरह प्रमाणित हो गई । उस समय लोग गरुड़जीकी प्रशंसा करते हुए धन्य धन्य कहने लगे । गरुड़जी सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश करते हुए सहस्रोंको भक्तिमें लगाने लगे । जो कोई आपके सामने वाद-विवाद करने आवे तो सबको परास्त कर दिया करते थे । जिस किसीको सन्देह हो वो उक्त ग्रंथमें देखकर अपने संदेहको मिटा सकता है ।
दुर्वासा ऋषि ।
दुर्वासा ऋषि बड़ही सुप्रसिद्ध बलिष्ठ तपस्वी और क्रोधी थे । क्योंकि, दुर्वासा शिवके अवतार अथवा अंश कहे जाते हैं । अत्रिमुनि तथा अनसूयासे तीन पुत्र उत्पन्न हुए थे । पहिला ब्रह्माका अंश चन्द्रमा, दूसरा विष्णुका अंश दत्त दिगम्बर सन्यासियोंके गुरु और तीसरा शिवका अंश दुर्वासा ऋषि था । इसके भयसे समस्त इन्द्रादि देवता और मनुष्य भयभीत होते थे । क्योंकि, ये शीघ्रही शाप देकर सत्यानाश कर देते थे । राजा इन्द्रको शाप देकर दरिद्र कर दिया । छप्पन करोड़ यादव और कृष्णकी संतानोंको क्रोधसे नष्ट कर डाला । इस कारण सब मनुष्य उनसे भयभीत होते हुए सदा कौपते रहते थे । जब सत्यगुरु कबीरसे साक्षात्कार हुआ ज्ञान सुना, तब सत्यगुरुके शरणमें आनेसे उनके समस्त दोष नष्ट हो गये । सत्यगुरुके हंस होकर मुक्तरूप हो गये, फिर तो दुर्वासाका समस्त क्रोध तथा रुष्टता जाती रही, वे शान्त तथा सतोगुणसे परिपूर्ण हो गये । दुर्वासा बोध मुझको मिल नहीं सका, नहीं तो मैं उसमेंसे कुछ यहाँ लिखता ।
लोमश ऋषि
उस समय कबीर साहब करुणामय ऋषिके नामसे प्रसिद्ध थे । सहस्रोंको उपदेश करते फिरे, इस कालमें केवल तीन शिष्योंका वृत्तान्त जानता था । श्वपच सुदर्शन, गरुड़जी और दुर्वासाऋषि सो मैंने लिख दिया है । सहस्रोंने सत्यगुरुकी दयासे मुक्ति पाई, उनका विशिष्ट वर्णन यहाँ नहीं किया जा सकता ।
राजा जगजीवन ।
कबीर सागर नं ५ में जगजीवनबोध है । इसमें धर्मदास पूछता है तथा कबीर साहब मातृगर्भका समस्त वृत्तान्त कहते हैं कि, जब यह राजा अपनी माताके गर्भमें था तब दुःख तथा कष्टसे विकल होकर पुकारता था कि, हे सत्यगुरु ! मुझे इस नर्कसे निकालो । मैं आपका भजन तथा भक्तिके अतिरिक्त और कुछ न करूँगा । यह सब गर्भके भीतर सत्यगुरुसे वार्तालाप हो रहा था । वहाँ मातृगर्भके दुःखका वृत्तान्त अनेक रूपसे कहा गया है । जब यह राजा गर्भसे बाहर आया उस समय उसको गर्भके भीतरकी प्रतिज्ञाएँ भूल गईं । उसके माता पिताने बड़े बड़े गुणी तथा पण्डितोंको बुलाकर धागा गण्डा बँधवाया और बहुत तरहकी युक्तियाँ की, जिससे कि, बालककी आयु बढ़े । बड़े लाड़ चावके साथ पालन किया । जब वो बालक युवावस्थाको प्राप्त हुआ तो अनेक विवाह किये, कामकी तरङ्गोंमें पड़कर हिलोरे लेने लगा । जहाँ सुन्दर स्त्री सुनी बलपूर्वक मँगवाकर दिन रात भोग विलासमें लगा रहता था । भैरव, हनुमान तथा चण्डी इत्यादिके पूजामें भूला रहा । यही दशा सब मनुष्योंकी है कि, जब मातृगर्भके कठिन कष्टमें फँसता है तब प्रतिज्ञाबद्ध होता है कि, मैं तेरा भजन करूँगा । फिर बाहर आकर भूल जाता है और सांसारिक कामनाओंमें फँसकर मर जाता है तब सत्यगुरुकी दयालुताकी सोता प्रवाहित होती है । वे जीवोंको अचेत निद्रासे जगानेके लिये पृथ्वीके चारों तरफ फिरते हैं । इसी तरह फिरते २ पट्टन नगरमें आये, जहाँ यह राजा रहता था । राजा भोग विलासमें ऐसा निमग्न हो रहा था कि, भगतोंको देखकर हँसा करता और ज्ञान ध्यान कुछ न मानता था । कबीर साहब कहते हैं कि, मैंने इस नगरमें घूम घूमकर व्याख्यान किया परन्तु किसीने कुछ नहीं सुना । तब मैंने सोचा कि, राजा किस प्रकार कहना माने, पश्चात् यह युक्ति की कि, उस राजाकी एक फुलवारी थी जो चार कोस लम्बी तथा तीन कोस चौड़ी थी वह वाटिका बारह वर्षसे शुष्क होगई थी । उसकी लकड़ियाँ भी शुष्क होकर गल जानेके समीप हो गई थीं इसी शुष्क वाटिकाके एक कोनेमें मैं (कबीर साहब) आसन मारकर बैठ गया । फुलवारी जो बारह वर्षसे सूख गई थी सब हरी भरी हो गई । वृक्ष लहलहाने लगे ।
कुष्ठम ऋषि
वाटिका सहस्रों प्रकारके फल फूलसे भर गई। सहस्रों प्रकारके फल और फूल निकल पड़े जो कि, पहले कभी न देखे और न सुने गये थे। उन्हींसे वह वाटिका पूर्ण हो गई। फल फूलसे भरे वृक्षोंपर बुलबुल तथा भौंति भौंतिके पक्षी बोलने लगे। चारों ओरसे पक्षियोंका चहकारा सुनकर माली आश्चर्यसे चकित हुआ कि, यह वाटिका कैसे हरी-भरी हो गई? उसे बहुत फल फूल तथा मेवोंको लगा देखकर मालो बड़ाही हर्षित हुआ। उनमेंसे अनेक प्रकारके फूल, फल, मेवे डालियोंमें भर भरकर वह माली राजाके समीप आया, भेंट करके निवेदन करने लगा कि, महाराज! आपकी वाटिका हरी हो गई। भौंति भौंतिके फल, फूल और मेवे लग रहे हैं। हे महाराज! आपकी नौलखी फुलवारी ऐसे यौवनोंपर है कि, उसका वर्णन किया नहीं जा सकता है। राजाके समक्ष जब पुष्पों और मेवोंकी टोकरियाँ मालीने रखीं, तो वो देखकर राजा और उसके मन्त्रिवर्ग ऐसे चकित हुए कि, ऐसे फल फूल तथा मेवे हमने कभी देखे सुने न थे। न जाने ये कहाँसे आये? यह बात सुनकर राजा परम हर्षित हुआ। मन्त्रियों मुसाहबोंसे कहने लगा कि, आश्चर्यकी बात है। पश्चात् राजाने ज्योतिषियोंको बुलाया और वाटिका देखने चला। राजाके साथ समस्त मन्त्री मुसाहब तथा प्रजा थी। ज्योतिषियोंने कहा कि, महाराज! इस वाटिकामें कोई महापुरुष आकर बैठा है जिसके कारण यह वाटिका हरी भरी हो गई है। तब राजा उस वाटिकाको देखनेपर अत्यन्त ही आह्लादित हुआ। आज्ञा दी कि, इस वाटिकामें जाकर ढूँढो। लोग ढूँढने लगे। ढूँढते ढूँढते देखा कि, एक स्थानपर एक महापुरुष आसनमारे ध्यान लगाये बैठा है। सबोंने राजाको समाचार दिया। राजाने जाकर दण्डवत् प्रणाम किया। राजाके साथ समस्त मन्त्री तथा प्रजा आदिने दण्डवत् प्रणाम किया। राजा कहने लगा कि, मैं बड़ाही भाग्यवान् हूँ कि, ऐसे महापुरुषने मुझको दर्शन दिया जिसके कि, विराजने मात्रसे वर्षोंकी सूखी वाटिका हरी होगई राजाने सत्यगुरुका दर्शन किया तब हृदयमें ठण्ढक आई उसका चित्त स्थिर हुवा। राजाने कहा कि, महाराज! बारह वर्षसे यह वाटिका शुष्क पड़ी थी इसके समीप कोई नहीं आता था। आपके चरणरजसे यह वाटिका हरी भरी हो गई, आपके दर्शनसे मेरा हृदय प्रफुल्लित तथा प्रसन्न हो गया। अब महाराज! मुझपर दया दृष्टि डालिये, मेरे मस्तकपर हाथ रक्खिये। मुझको मुक्ति प्रदान कीजिये हे सत्यगुरु! मैं आपके साथ रहूँगा।
सत्य कबीर वचन।
चौ०—तुम तो कौल भुलाने भाई। किये कौल तुम गए भुलाई ॥
हे राजा ! जब तुम मातृगर्भमें थे तब तुम वचन बद्ध हुए थे कि, भजनके अतिरिक्त अब और कुछ न करेंगे, उस दुःखमें तो तुम पुकारते थे तथा हाय हाय करते थे कि मुझको इस दुःखसे निकालो, पर जब तुम गर्भके बाहर आये तब अपनी सारी प्रतिज्ञाओंको भूल शारीरिक कामना तथा पशुधर्मके वशीभूत होकर तुमने कैसे कैसे कुकर्म किये ? सत्यगुरुकी दयाको तुम एकबारही भूल गये, भोग विलासमें फँसकर अन्धे हो गये, मायाने तुम्हारे ज्ञानको बिलकुलही नष्ट कर दिया । जब यमदूत आवेंगे तुम्हारी मुश्कें बाँधकर नरकमें लेजावेंगे तब तुम्हारा कौन मित्र सहायता करेगा ? तुमको उनसे कौन छुड़ावेगा ? राजा ! तुम सोचो समझो कि, वे लोग जिन्हें तुम अपना मित्र समझते हो उनमेंसे कौन उस समय सहायक होगा ? कौन तुमको नरकसे बचावेगा ? मैं गर्भमें तुमको बहुत समझाया था, हे गँवार ! तू उन सब बातोंको भूल गया । मैंने सबसे घर घर पुकारकर कहा पर मेरा कहना किसीने भी न माना । इतनी बात सुनकर राजा बोला कि—
चौ०—अबतो सद्गुरु होहु सहाई । मोको जमसे लेहु छुड़ाई ॥
सबही करम बख्शकै दीजे । डूवत मोहिं उबारके लीजे ॥
सैन करि पालकी मँगवाई । लै सद्गुरुको माहिं बिठाई ॥
पाँव उभाड़ काँध धर लीन्हा । तबही महल पयाना कीन्हा ॥
सत्गुरु पगधर महलके माहीं । सब रानिनको राय बुलाहीं ॥
समरथ दरशन दीन्हौ आनी । धन धन भाग्य तुम्हारो रानी ॥
सत्गुरुको पलँग बैठाई । सब मिलि पाँव पखारो आई ॥
राजा भाखै शीष नवाई । मोको राखो गुरु शरनाई ॥
करिये सद्गुरु जीवको काजा । दया करो मैं लाऊँ साजा ॥
अब हम सरना लेब तुम्हारे । दया करो तन दुखत हमारे ॥
सत्यगुरु वचन ।
कस चल राजा लोक हमारा । मैं नहिं देखूँ लगन तुम्हारा ॥
कोटिन ज्ञान कथो असरारा । बिना लगन नहिं जीव उबारा ॥
जैसे लगन चकोर की होई । चन्द्र सनेह अँगार चुंगोई ॥
ऐसे लगन गुरुसे होई । धर्मराय शिर पर धर सोई ॥
तुम तो हो मोटे महाराजा । कैसे छोड़िहौ कुल मर्यादा ॥
कैसे छोड़िहौ मान बढ़ाई । कैसे छोड़िहौ मुख चतुराई ॥
कैसे छोड़िहो हाथी घोड़ा । कैसे छोड़िहौ ग्रन्थ मँडारा ॥
कैसे छोड़िहौ काम तरङ्गा । कैसे राजसे करो मन मङ्गा ॥
कैसे छोड़िहौ कनक जवहिरा । कैसे छोड़िहौ कुल परिवारा ॥
तुम तो उनकी बाँधी आसा । हम तो राजा कथैं निरासा ॥
जो तुम तजो अन्तरकी वासा । तवही चलो हमारे साथा ॥
राजा वचन ।
राजा कहें दोउ करजोरी । सुनिये समरथ विनती मोरी ॥
नगरके सब षट् वरन बुलाई । तेहि अवसर सब माल लुटाई ॥
तुम तो कह्यो बाहर लेउ वासा । मैं तो देहकी छाडी आसा ॥
अमृत वचन पियाओ आनी । हंस उबार करो निरवानी ॥
नगर कोट की छोड़ी आसा । निस दिन रहूँ तुम्हारे पास ॥
हुकुम करो सोई मैं लाऊँ । करो दया मैं शीश नवाऊँ ॥
उमँग उठे हर्षित मग मोरा । थकित भये जनु चन्द्र चकोरा ॥
सूखा बाग जो फल परकासा । तबसे पूजी मनकी आसा ॥
कसनी कसो सो सहुँ शरीरा । तबहुँ प्रीत न छोडूँ तीरा ॥
जो तुम कहो सो भक्ति कराऊँ । दया करो तो शीश चढ़ाऊँ ॥
सत्यगुरु वचन ।
तब समरथ अस शब्द उचारा । अब आरति काहो बिस्तारा ॥
चार गुरुको चौका कराओ । तिनका तोरायके जल अरपायो ॥
राजा गर्भ निवारौं तोरा । भाव भक्तिसे करो निहोरा ॥
भावभक्ति हम चाहैं राजा । धन सम्पत्तिसे नहिं कछु काजा ॥
तब राजाने कबीर साहबकी आज्ञानुसार समस्त सामग्री मँगा अत्यंत नम्रताके साथ विनय करने लगा कि, हे सत्यगुरु ! मैं आपकी शरणमें हूँ । मुझको यम फाँसीसे बचाओ । हे मेरे सत्यगुरु ! मैं महापापिष्ठ हूँ आपने मुझसा पापी भी कभी तारा है या नहीं ? ।
सत्यगुरु वचन ।
चौ० —तब सद्गुरु बहुतै बिहँसाना । फिर राजासे निर्णय ठाना ॥
सत्ययुगमें सत सुकृत नाऊँ । जाय सोरठमें धारचों पाऊँ ॥
खेमश्री ग्वालनहि उबारी । बह्तर जीव ले लोक सिधारी ॥
द्वादश पहुँचे पुरुषके पाँही । और हंस द्वीप रहौँही ॥
त्रेता मांहि मूनीन्दर नाऊँ । नगर अयोध्या धारचों पाऊँ ॥
जहँ मधुकर यक विप्रको नाऊं । चारसौ हंस लोक धर पाऊं ॥
हंस बयालीस लीन्हें सारा । पहुँच्यो महापुरुष दरबारा ॥
और हंस आनदीपमें किया । जिनजीव जैसे देह तब दीया ॥
अब द्वापरका कहूं विचारा । नृप नरहरि भुजकीन्ह उबारा ॥
सातसौ हंस परवानक कीना । कुटुम्ब सहित पायाना दीना ॥
चन्द्र विजय घर इन्दुमती नारी । तासंग राजा लियो उबारी ॥
केतो पूछो जीव सनेहा । गनत गनत नहिं आवै छेहा ॥
युगन युगन भवसागर आऊं । जो समझे तेहि लोक पठाऊं ॥
शब्द हमारा माने कोई । तो यमपुर नहिं जाय बिगोई ॥
इतनी बात कही समझाई । राजाके परतीत समाई ॥
यहाँ राजा अत्यंत नम्रतापूर्वक सत्यगुरुसे विनय करता है कि, मैं बड़ा भाग्यवान हूँ कि, सत्यगुरुने मुझको दर्शन दिया, फिर राजाने सत्यगुरुको चन्दन चौकीपर बैठकर कहा कि, मैं तो सत्यगुरुके चरणोंका सेवक हूँ । समस्त नगरमें समाचार पहुँचा । सब लोक दर्शनके लिये आये । बड़ा हल्ला मच गया कि, राजा जगजीवन अब लोकको जावेगा । तब राजाने अपनी समस्त रानियोंको बुलवाया, सभी आकर सत्यगुरुके चरणोंपर गिरीं ।
राजा जगजीवनकी रानियोंके नाम—चन्द्रमती, हनुमती, भानदेवी, भानुमती, बुद्धामती, प्राणप्यारी, सत्यभामा, अविकला, नामप्यारी, दिलदायक, रङ्गस्वरूपा, सूर्यमती ये हैं ।
राजा जगजीवनकी ये बारह रानियाँ तथा चार पुत्र थे । जब कबीर साहबने उन सबोंके शिरोंपर हाथ रखवा तो सबको अगम ज्ञान होगया । उन्होंने सत्यपुरुषका दर्शन करके अपनेको कृतार्थ किया ।
राजाके चारों पुत्रोंने आकर सत्यगुरुके चरण चूमे । राजा सारी रानियाँ तथा पुत्रोंसहित सत्यगुरुके शरणमें आया । पाँचसौ जीव इस राजाके साथ सत्यलोकको गये ॥
अध्याय १५.
कबीर साहिबके कलियुगके शिष्य ।
शाहंशाह इब्राहीम अद्वम् ।
सुलतान * इबराहीम अद्वम बड़ा सन्नाट् था । उसकी राजधानी बलखबुखारमें थी । यह बादशाह मुहम्मद साहबकी मृत्युके कुछ वर्षोंके पीछे ही हुआ था । इस बादशाहकी मृत्युकी तारीख पुस्तक जवाहिर फरीदीके अनुसार यह है—सुलतान इबराहीम अद्वमने २६ माह जमादिउल अब्बल सन २८० हिजरीमें इस संसारको त्यागकर उस संसारकी ओर कूंच किया था । यह बड़ा शाहंशाह जिसके कि अधीन बहुत बादशाह थे । बड़ाही चिन्तित हुआ कि, मुझको कोई सच्चे परमेश्वरका पथ दिखावे इसीमें दिन रात रहता था । यह बात बिना साधुओंकी दयाके प्राप्त नहीं हो सकती, इसलिये अनेक साधुओंसे उसने पूछा भी परन्तु कुछ पता न लगा, तब उसने बड़ाही ऋद्ध हो कहा कि, ये सब साधुगण मक्कार तथा झूठे हैं । यही नहीं अनेक साधुओंको पकड़कर कहा कि, अपने कौतुक दिखाओ । नहीं तो चक्की पीसो और हरासका खाना छोड़ दो । सब साधु चक्की पिसने लगे । इस प्रकार जब साधुगण विपत्तिमें फँसे तब समस्त साधुओंके राजा, समस्त संसारके रचयिता, परमात्माका दयालु हृदय विचलित हुआ । पितृक दयाने लहर मारी । सत्यगुरु कबीर बन्दी छोड़ जिन्दा साधुका स्वरूप धारणकर शहर बलखकी ओर रवाना हुये । पथमें जाते हुये देखा तो दो मनुष्य वाद विवाद कर रहे थे । एक कहता था कि काबा * आकाशपर है तो दूसरा कहता था कि, असम्भव बात है काबा पृथ्वीपर है ।
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बलखका बादशाह इब्राहीम नानाकी गद्दीपर बैठ था इसके पिताका नाम अद्वम शाह था । इसकी उत्पत्तिका वृत्तान्त तो यों है कि एकवार अलमस्त फकीर अद्वमशाह बलखकी एकमात्र शाहजादीपर आशिक हो गये थे, सद्गुरुकी कृपासे शादीके बादके ४० अमूल्य मोती बंजीरको देनेपर भी सिसकते जंगलमें फिकवा दिये गये थे । इसके थोड़ी देरबाद मरी हुई शाहजादीको कबरसे निकालकर अपनी कुटीमें ले आये थे । वहाँ भूले हुए काफिलेके वैद्यने हाथमें नस्तर देकर उस शाहजादीको उस समय सजीव कर दिया । जब कि, आप उस मृतकको भी लकड़ियोंके सहारे खड़ी करके दुख भरे शब्दोंके साथ उसका दीदार कर रहे थे । जीवित होनेपर इस शाहजादीने फकीरी अख्तियारकी तथा अद्वमशाहके साथ शादी की । उसी पर्ण कुटीमें इब्राहीमका जन्म हुआ, बड़ा होनेपर पाठशालामें नानासे पहिचाना जाकर भासहित राजमहलमें पहुँच गया तथा नानाके मरनेपर उसकी जगह बादशाह हुआ । यह कबीर सागर नं. ६ सुलतान बोधके ६६ पेजसे लेकर ९४ तक पृष्ठ में लिखा हुआ है ।
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मुसलमानोंका पूज्य स्थान जो अरब देशमें है जहाँ हज्ज करनेको जाते हैं ।
धनुष ऋषि
कबीर साहबने दोनोंका निबटेरा कर दिया । दोनोंको दोनों जगह आकाश और पृथ्वीमें काबा दिखला दिया । उन दोनोंने देखकर प्रसन्न हो सत्य गुरुको धन्यवाद देते हुये अपने अपने घरकी राह ली । कबीर साहब नगर बलखमें जा पहुँचे । देखा तो बड़े बड़े धर्मस्वरूप चक्की पीस रहे हैं । तब कबीर साहबने चक्कियोंके निकट जाकर अपना डण्ड घुमाकर कहा कि, ऐ चक्कियो ! ऐसे ऐसे माहात्माओंको आटा पीसनेमें लगाया है तुम आपसे आप चलो । इतना कहते ही सारी चक्कियाँ आपसे आप चलने लगीं । सब साधू पृथक् हो बैठे, कबीर साहबने शाहंशासके सेवकोंसे कहा कि, जाकर शाहंशाससे कहो कि, जितना गेहूँ तुम्हारे पास हो भेज दो पीस दिया जावेगा । यह कहकर कबीर साहब अन्तर्धान हो गये । सेवकोंने बादशाहसे जाकर कहा कि जापनाह ! सब चक्कियाँ आपसे आप चल रही हैं । एक जिन्दा फकीर आया है कि, जिसने अपनी लकड़ी घुमाकर चक्कियोंको चलनेको कहा जिससे वे आपसे आप चल रही हैं, जितने गेहूँकी इच्छा हो आप भेज दीजिये वह सब पिस जावेगा । बादशाहने जाकर देखा तो सब चक्कियाँ आपसे आप चल रही हैं चलानेवालेका पता नहीं है । बादशाह दूढ़ने लगा कि, जिस साधूने चक्कियाँ चलाई वह कहाँ गया ? यद्यपि बहुत कुछ दूढ़ा पर न पाया ।
चौ० - बलख शहर एक नगर अनूपा । तहां सुलतान जो ज्ञान स्वरूपा ॥
बादशाह शाहन सरदारा । प्रेम प्रीति मन मांहि विचारा ॥
इबराहीम अद्वम तेहि माना । राजहि मांहि भगति उन ठाना ॥
× षट् दर्शन कह बूझ्यो भाई । कौन राम और कौन खुदाई ॥
नहि तुम सबही कहो दिवाना । ना तुम दूर करो कुफ़राना ॥
- इतनी बात जबहि सुनिपाई । तब उठि धाये आप गोसाई ॥
जिन्दारूप गोसाई कीना । आय शाहको दर्शन दीना ॥
बैठे तखत आप सुलताना । जिन्दा कीन्हौं दोआ सलामा ॥
दोआ हमारी उन नहि माना । मायाके मद गर्व दिवाना ॥
× कबीर सागर नं. ६ में सुलतान बोध है इसमें शाहन्शाह इब्राहीम अद्वम और बलख बुखारेका वैराग्य पूर्ण चरित्र आया है । इसके कबीर साहब वक्ता तथा धर्मदासजी श्रोता हैं । पहिली तीनों चौपाईं वर वर ठीक हैं पर चौथी चौपाईका उत्तरार्ध नौमी चौपाईका है । पूर्वार्ध किन्हींके आशयपर लिखा है साक्षात् नहीं मिलता । = चौथीके बादकी पाँचवी सुलतान बोधमें क्रमके अनुसार चौथी चौपाईसे परे है ।
× इसके बाद आठ चौपाई और दो दोहाओंको पीछे छठी आदि चौपाई आई हैं । सुलतान बोधमें 'जबहि' के स्थानमें 'काशी' लिखा हुआ है किन्तु काशीके स्थानमें 'जबहि' लिखना ही उपयुक्त प्रतीत होता है क्योंकि, उस समय आपका काशीमें प्रादुर्भाव नहीं हुआ था ।
तात्पर्य
कह सुलतान सुनो दर्वेशा । जिन्दारूप कौनको भेसा ॥
कहाँसे आये कहाँको जाय । कौन काज हमरे गृह आय ॥
*साखी — कहाँसे आय जिन्दाजी, कहाँको तुम जाय ।
हिन्दू तुर्क एकौ नहीं, मेंहि कह्यो समझाय ॥
सत्य कबीर बचन ।
कह दरवेश सुनो चितलाई । जिन्दारूप सुखदायक भाई ॥
यह बादशाह बड़े राग रङ्गमें डूब रहा था, यहाँलों कि, जब स्त्रियाँ उसके पैर को स्तनोंसे सुहलाने लगतीं थी तब उसको आराम मिलता विषय वासनासे एक बारगीही अंधा हो रहा था । परम सुन्दरी सोलह सहस्र स्त्रियाँ उसके पास थीं । जब कबीर साहबसे वार्तालाप होने लगी तब सत्यगुरुने पूछा कि, बादशाह ! तुम भोग विलासमें पड़े हो मृत्युके उपरान्त तुम्हारी क्या दशा होगी ? बादशाहने उत्तर दिया कि, हम वैकुण्ठको जावेंगे । साहबने पूछा कि, यह सब माल खजाना धन दौलतका क्या होगा ? बादशाहने कहा कि, यह सब कुछ मेरे साथ जावेगा । जिन्दाने बादशाहको एक सुई देकर कहा कि, जब आप वैकुण्ठको चलें तब इस सुईको भी अपने साथ लेते चलें, मैं इसको आपसे वहाँ ले लूंगा । बादशाहने लेकर कहा कि, सहस्रों सुइयों में आपको वहाँ देदूंगा । इतनी बातें हुईं । फिर कबीर साहब तो बिदा हो गये । दरबारका समय हुआ । सब दरबारी उपस्थित हुये सर्वसाधारणने दरबारमें बादशाहके हाथमें सुई देखकर निकटवर्तियोंने पूछा कि, जाँपनाह ! यह सुई क्यों लिये हुये हैं ? बादशाहने उत्तर दिया कि, यह सुई जिन्दा फकीरकी है । उसने कहा है कि, जब तुम वैकुण्ठको चलो तब मेरी सुईको वहाँ लेते जाना मैं इसे लेलूंगा । इस कारण मैंने इसको यहाँ रखलिया है । वहाँ उसको देदूंगा । दरबारियोंने समझाया कि शाहंशाह ! वहाँ तो आपका यह शरीर भी न जावेगा आप सुई कैसे ले जायेंगे । शाहंशाहके मनमें बड़ी चिन्ता हुई कि, जब एक सुई भी मेरे साथ न चलेगी तो इतनी संन्य तथा वीर धन संपत्ति आदि कैसे काम आवेगी ? ये सब मिथ्या है । यह शोचकर बादशाह दुःखसागरमें डुबकियों लगाने लगा, खाना पीना छोड़ दिया । प्रण कर लिया कि, जब फिर मैं जिन्दा फकीरका दर्शन पाऊँगा तभी भोजन इत्यादि करूँगा । फिर कबीर साहबने दर्शन दिया । संसार छुड़ा देनेके
- 'कहाँसे आये' यह दोहा इन चौपाइयोंके बीचकी बहुतसी चौपाइयोंको छोडकर बादमें आया है । २३ चौपाई और बीचके एक दोहेको छोडकर बादमें यह दोहा आया है ।
गुप्तमुनि
हेतु अनेक शिक्षायें दीं । परन्तु शाहंशाह कुछ दिनोंतक शिक्षाका याद रखके फिर भूल गया । एक दिवस शिकार खेलने गया । शिकारमें एक कबूतर पर अपना बाज छोड़ा । उस बाजने कबूतरको पकड़कर तोड़ डाला । लोग बड़ी प्रशंसा करन लगे कि, बाजने कौसी फुरतीसे कबूतरको पकड़कर तोड़ डाला । इनकी बातें सुनकर बादशाह अत्यंत हर्षित हुआ । इतनेमें फिर कबीर साहब बादशाहके सामने आये । समझाया कि, हे बादशाह ! इसी प्रकार तुमको एक दिवस यमराज पकड़कर तोड़ डालेगा, जैसे कि, बाजने कबूतरको तोड़ा है । सावधान ! यमसे तुम्हारा बल नहीं चलेगा । सैन्य और भंडारा आदि काम नहीं आवेंगे । इतना कहकर कबीर साहब अन्तर्धान हो गये । बादशाहके मनमें परमेश्वरका भय उत्पन्न हुआ और सत्यगुरुकी शिक्षा हृदयमें बैठ गई । फिर एक दिवस जब कि बादशाह बड़ेही सुख सम्भोगमें अचेत सो रहा था तब आकाशसे आवाजें आने लगीं । उस आकाश बानीने बादशाहको उपदेश दिया कि, “ऐ बादशाह ! तू सचेत हो, क्यों अचेत हो रहा है ?” तब बादशाह आश्चर्यनिवृत्त होकर इधर उधर देखने लगा कि, कौन मुझे शिक्षा देता है ? चारों ओर देखा पर कोई स्वरूप कहीं दिखाई नहीं दिया । तब निस्तब्ध होकर बैठ रहा ।
एक दिवस बादशाह अपने महलमें बैठा था कि, एक मनुष्यको अपनी छतपर फिरते पाया । उससे पूछा, तू कौन है ? मेरी छतपर क्यों फिरता है ? उसने उत्तर दिया कि, मैं $\times$ बूलूच हूँ मेरा ऊँट खोया गया है, दूँदता फिरता हूँ । तब बादशाहने कहा क्या छतपर ऊँट चढ़ सकता है ? तू कैसा बुद्धिहीन है ? तब बूलूचने उत्तर दिया कि, मैं तो मूर्ख नहीं वरन् ऐ बादशाह ! तू बिना बुद्धिका है । कारण यह कि, ऊँटका छतपर फिरना तो सरल है पर यह कठिन है कि, तू जो आशा रखता है कि, मैं बादशाही करता हुआ वैकुण्ठको जाऊँगा यह तो महामूर्खताका काम है । इतना कहकर वह बूलूच तो अन्तर्धान हो गया । बादशाहके मनमें अन्तदिवसकी गम्भीर चिन्ता उत्पन्न हुई । फिर भी बादशाहको अचेत देखकर एक दिवस कबीर साहबने एक कुत्तेको उत्तेजित किया । वह दौड़कर बादशाहके सन्मुख आया । उसके समस्त शरीरमें घाव थे, जिसमें कि, बहुतसे कीड़े पड़े हुए थे, जो कि, उसके मांसको खाते थे जिससे वह अत्यन्त व्यथित और व्यग्र हो रहा था । जब वह बादशाहकी ओर दौड़कर चला । तब बादशाहकी लौडियोंने बहुत रोका और हटाने लगीं, तथापि उस कुत्तेने एक भी न माना, सुलतानके सामने जा खड़ा हुआ । मनुष्यकी भाषामें यों कहने लगा कि,
$\times$ बूलोचिस्थान देशके रहनेवालेको “बूलूच” कहते हैं ।
“ऐ सुलतान इब्रामहीम अद्वम ! मैं भी किरमान देशका बादशाह था । बहुत आखेट किया करता था । अब तू देख कि, मैं कुत्ता हो गया हूँ । जिन २ जीवोंको मैंने मारा और उनका माँस खाया वे सब जीव मेरा माँस खाते हैं, कीड़े होकर मेरे शरीरसे लगके अपना प्रतिशोध ले रहे हैं । इनसे अब मेरा छुटकारा नहीं हो सकता, अब मैं क्या करूँ । तू आखेट करता है तो तेरी भी यही दशा होगी” इतना कहकर, वह कुत्ता भाग गया । बादशाहके मनमें जीववध करने (आखेट करने) के कारण बड़ी बुरी चिन्ता उत्पन्न हुई, परन्तु थोड़े दिनोंके बाद, फिर भी भूल गया । ‘एक दिन शाहजु चलै शिकारा’ यहाँसे लेकर ‘नहीं वह कुत्ता नहीं दवैशा’ यहाँतक का यह हिन्दी अनुवाद है कि, एक दिवस बादशाह शिकार खेलनेको निकला, शिकारके पीछे अपना घोड़ा डाल दिया । जब अपनी सैन्यसे दूर निकल गया तब उसको बड़ी कड़ी प्यास लगी । उसके सब सेवक बहुत दूर हो गये थे । कहीं जलका चिन्ह न मिला, इस कारण बादशाहने विवश होकर अपना घोड़ा आगे बढ़ाया तो एक वटवृक्ष दिखाई दिया । बादशाह अपना घोड़ा दौड़ाकर इस वृक्षकी छाँहकी ओर चला । जब उस वृक्षकी छाया में पहुँचा, तो क्या देखता है कि, इस वृक्षके नीचे एक विरक्त बैठे है उसके दोनों ओर जलसे भरे दो कोरघडे रखे हैं, उनपर कोरें प्याले रखे हैं । उस महात्माने बादशाहको जल पिलाया । जब वह जल पीकर ठण्ढा हुआ तो क्या देखता है कि, उस महात्माके दोनों ओर दो कुत्ते बँधे हैं और एक भेख (खूँढा) खाली है । उस विरक्तने घी, मैदा, भाँति भाँतिके मेवे तथा मिश्री आदि निकालकर उन दोनों कुत्तोंके सामने मलीदा बनाकर रखवा, परन्तु उन कुत्तोंने वह मलीदा न खाया । वह महात्मा सोटेसे उन कुत्तोंको धमकाने लगा कि, मलीदा खाओ, नहीं तो मैं तुमको दण्ड दूंगा । पर वे कुत्ते मलीदेमें मुंह भी न लगाते थे । बादशाहने कहा कि साई साहब ! ये मलीदा खाना क्या जाने, उनको आप क्यों आँख दिखाते हैं ? फकीरने उत्तर दिया कि, “ऐ बादशाह ! यह बात नहीं; यह दोनों इसलिये यह पदार्थ नहीं खा सकते कि, इन्होंने पूर्वजन्ममें कुछ दान पुण्य नहीं किया है । यदि दान पुण्य करते तो निस्सन्देह खा सकते थे ।” बादशाहने पूछा कि, पूर्वकालमें ये दोनों कौन थे ? सन्तने उत्तर दिया कि ये, दोनों बलख बुखारेके बादशाह थे—(उन दोनोंका नाम भी कहा) तब शाहंशाहने
- इब्राहीमका पिता कौन था इसके विषयमें पूर्वही लिख चुके हैं कि, सच्चे साधु, अद्वम शाह थे । जिसने सच्चे भक्तोंका दर्शन पाया वो कुत्तेकी योनिमें जावे यह सच्ची श्रद्धाके प्रति-कूल बात है । ऐसी ही बातोंको लेकर बोधसागरके इसी प्रकरण पर भारत पथिक कबीर पन्थी स्वामी युगलानन्दजीने एक टिप्पणी लिखी है कि, “जो शाह इब्राहीम अद्वमके बाप बाबाको-
दत्तात्रेय और कबीर
जाना कि, ये दोनों मेरे बाप तथा दादे हैं । नाम सुनकर बादशाह लज्जित हुआ, फिर पूछा तीसरीमेख किस प्रयोजनसे खाली रक्खी है ? फकीरने उत्तर दिया कि, इस समय जो बादशाह बलख बुखारके सिंहासनपर आसीन है जब वह मरकर कुत्ता होगा तब मैं उसे इस तीसरे मेखसे बाँधूंगा । इस बातको सुनकर बादशाहके मनमें बड़ा शोक हुआ । यदि मुझको मरकर कुत्ताही बनना पड़ेगा तो बादशाही तुच्छ है यदि मुझपर यही विपत्ति आती है तो सब सांसारिक वैभव लेकर क्या करूँगा ? इससे संसारसे घृणा उत्पन्न हुई, दुःखका बादल हृदय पर छा गया और अन्तका सोच हुआ कि, मैं कैसे कुत्ता न बनूँ ? साधुके उपाय बताते ही बादशाहने साधुको पहिचान लिया कि, सब अन्तर्धान हो गये ।
एक दिवस ऐसी घटना हुई कि, एक मनुष्य बादशाही दुर्गके भीतर आगया । सिपाही लोग उसको बाहर निकालने लगे परन्तु वह निकलता नहीं था और कहता था कि, ऐ भाई ! मैं पथिक हूँ, यह सराय है संध्या हो गई है, इस सरायमें रात बिताकर प्रातःकाल मैं यहाँसे विदा हो जाऊँगा । सिपाहियोंने समझाया कि, यह सराय नहीं, यह तो बादशाही दुर्ग है । उसने कहा कि, यह तो दुर्ग नहीं सराय है, मैं पथिक हूँ, इस सरायमें रात बिताकर प्रातःकाल यहाँसे चला जाऊँगा । यद्यपि सिपाही बहुत कुछ समझाते थे पर वह फकीर मानता नहीं था । बारम्बार यह कहता था कि, यह दुर्ग नहीं अवश्यही मुसाफिर खाना है । इस बात पर बड़ा हल्ला मचा, इस अवसरमें बादशाह वहाँ आय-हुँचा पूछा कि, यह कौसा हल्ला है ! सुलतानी सेवकोंने निवेदन किया कि, एक मनुष्य दुर्गके भीतर घुस आया है, यद्यपि उसको रोकते हैं पर यह नहीं मानता ।
बलखका बादशाह लिखा है यह बिलकूल निर्मूल है, क्योंकि, इसके पिता तो परम सन्त थे । यहाँ दोनों कुत्तोंको शाह इब्राहीम अदमके बाप दादे बतलाना बहुत ही भूल है । इससे जाना जाता है कि, इस पुस्तकमें उत्तरोत्तर मिलावट होती चली गई है । एवं मिलावट करनेवाले भी साधारण विचारके ही जान पड़ते हैं । ऐसी ऐसी मिलावट और भूलके कारण कबीर पन्थी साहित्यकी निन्दा होती है किन्तु बुद्धिमानोंको विचार वर्कहीन ही उसे ग्रहण करना चाहिये ।" इस प्रकरणको लेकर उक्त संशोधकजीने यह परिस्फुट कह दिया है कि, जो कबीर पन्थी; ग्रन्थोंमें ऐसी असंगत बातें हों उन्हें साधारण बुद्धिके लोगोंकी मिलावटकी समझनी चाहिये । यह विचार यहीके लिये हो यह बात नहीं । किन्तु सब जगहके लिये हैं । इसी सुलतानबोधमें अगाड़ी चलकर लिखा हुआ मिलता है कि, मेरे पास इसकी कितनी ही प्रतियाँ हैं जिनमें कई तो सौ वर्षसे भी अधिक पुरानी हैं । पुरानी प्रतियोंकी अपेक्षा नवीन प्रतियोंमें इतनी बातें मिलाई हैं कि, वे उससे ढयोढी हो गई हैं । इस सबसे तो यही प्रतीत होता है कि, या तो स्वामी परमानन्दजीने इसे अनुसंधानसे रख दिया है, या वे कुत्ते इब्राहीमके नाना पर नाना होंगे । सर्वथा ही निन्दास्तुतिकी सभी बात विचारणीय हुआ करती हैं । वो ऐसी नहीं होती कि बिना विचारे विश्वासके योग्य हों ।
कहता है कि, यह दुर्ग नहीं, सराय है, मैं इसमें रातभर रहूँगा दुर्गके बाहर नहीं निकलता । यह बात सुनकर बादशाहने प्रश्न किया कि, ऐ पथिक ! इस दुर्गको तू सराय कैसे कहता है ! पथिकने बादशाहसे पूछा कि, इस दुर्गको किसने निर्मित किया था ? बादशाहने अपने नाना अथवा परनानेका नाम बताया । पथिकने पूछा कि, बनानेवालेके उपरान्त फिर कौन रहा ! बादशाहने उत्तर दिया कि, मेरा नाना रहा । मुसाफिरने कहा, फिर कौन रहा ? बादशाहने उत्तर दिया कि, अब मैं हूँ । फिर कहा, तुम्हारे उपरान्त कौन रहेगा ? तब बादशाहने कहा कि मेरा पुत्र रहेगा । तब उस पथिकने कहा कि, बाबा जहाँ ? इतने पथिक आये और चले गये किसीको स्थिरता नहीं हुई वह दुर्ग कैसे ठहरा ? यह तो अवश्यही सराय है । यदि इस सरायमें एक दिवस मैं भी रह जाऊँगा तो आपति क्या है ! यह बात सुनकर बादशाह तथा सब मनुष्योंको चेत हो गया । क्योंकि वास्तवमें यह संसार सराय है और पूर्णतया अस्थिर तथा नाशमान है ।
इस बादशाहका वृत्तान्त अनेक पुस्तकोंमें लिखा है अंग्रेजी पुस्तकोंमें भी मने देखा है । एक पुस्तक अंग्रेजीमें एडिसनके नामकी है उसको मने देखा । उसके नोटमें इसी प्रकार लिखा था कि, जिस प्रकार कबीर साहब पथिक बनकर सरायमें रहे । दुर्गको सराय कहा और बूलूच होकर छत पर फिरे थे । जिस प्रकार लिखा अंग्रेजी पुस्तकोंमें है इसी प्रकार और देशके लोग इस बादशाहका वृत्तान्त लिखते हैं । पर फारस तथा अरबके लोग बहुत कुछ लिखते हैं । फारसी पुस्तकोंमें इनके अनेक किस्से हैं । इनकी फकीरी तथा बादशाहीका सब वृत्तान्त लिखा है, पर वह बात किसीको नहीं मालूम कि, इस बादशाहके गुरु पीर कबीर साहब हैं, कोई नहीं जानता कि, बादशाहका क्या धर्म था । प्रत्यक्षमें लोगोंको यही मालूम है कि, बादशाह मुहम्मदी फकीरोंमें थे, पर थे वो हंस कबीर, कबीर साहबकी दया उत पर हुई । इबराहीम अद्वमका वृत्तान्त अन्यान्य ग्रंथोंमें भी है । जहाँ कहीं जिसने जो बात पढ़ी वह उसकी बात बता सकता है । इस बादशाहके मनमें विश्वास तो भली भाँति जम गया था पर अबतक उसने बादशाही नहीं छोड़ी थी ।
सुलतान इबराहीम अद्वमने कबीर साहबके अनेक कौतुक देखे । अभी-तक उसको संसारसे पूर्णतया घृणा नहीं हुई । एक दिवस कबीर साहब बादशाही दासीका रूप बनकर उसके पलंग पर लेट रहे । वह पलंग फूलोंसे भली-प्रकार सुसज्जित था, उसपर लेटतेही नौंद आगई वह बाँदी अचेत होकर सो गई । जब बादशाह लेटनेको आया तब देखा कि, बाँदी पलंग पर लेटी हुई है ।