कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
मुझको हँसेगे और ठठुएँ उड़ावेंगे कि, गौनेहीमें नीरू अपनी स्त्रीके साथ एक पुत्रभी लेआया है इस कारण तू इस बालकको फँकआ ।
“नीरू देख रिसावई, बालक दे तू डार ।
सब कुटुम्ब हँसी करे, हसि मारे परिवार ॥
इस बातको जब नीमाने नहीं माना; तब वह जोलाहा अपनी स्त्रीको मारने पीटने पर तत्पर हुआ और झिड़कियाँ देने लगा । तब नीमा खड़ी २ अपने चित्तमें चिन्ता करने लगी । इतनेमें वह बालक स्वयम् बोल उठा कि, हे नीमा ! मैं तुम्हारे पूर्व जन्मके प्रेमके कारण तुम्हारे घर आया हूँ । तुम मुझको मत फँको और अपने घर ले चलो । यदि तुम मुझको अपना गुरु करके मेरा कहना मानोगे तो मैं तुम्हे आवागमनके झंझटसे छुड़ाकर मुक्त कर दूंगा और तुम्हारा समस्त दुःख संताप हर लूंगा । तुमको वह शब्द बतलाऊँगा कि, जिससे तुम कभी कालके फन्देमें नहीं पड़ोगे ।
“तब साहब हुँकारिया, ले चल अपने धाम ।
मुक्ति सन्देश सुनाइहौं, मैं आया यहि काम ॥
पूरब जनम तुम ब्राह्मण, सुरति बिसारी मौहि ।
पिछली प्रीतिके कारने, दरसन दीनो तोहि ॥”
जब वह बालक इस प्रकार बोला तो उसकी बात सुनकर नीमा निर्भय हो गयी और अपने पतिसे नहीं डरी । तब नीरूभी फिर कुछ नहीं बोला ।
“कर गहि बेगि उठाइया, लीन्हो कंठ लगाय ।
नारि पुरुष दोउ हरषिया, रंक महा धन पाय ॥
वे दोनों प्रसन्नतापूर्वक उस बालकको लेकर अपने घर गये ।
सैतीसवाँ प्रकरण ।
बालकके नाम धरनेको ब्राह्मणका आना ।
काशीके लोगोंने देखा कि, नीरू तो अपनी स्त्रीके साथ एक पुत्रभी लेता आया है, तो लोग ठठटा और हँसी करने लगे । तब नीरूने लोगोंको समझाया कि, हमने यह बालक लहर तालाबमें पाया है और बालकका कुल विवरण कह सुनाया ।
फिर नीरू ब्राह्मणको बुलाकर पूछने लगा कि, इस बालकका क्या नाम रखना चाहिये ? ब्राह्मण तो पत्रा लिये विचारही रहा था इतनेमें बालक स्वयम् बोल उठा कि, ऐ ब्राह्मण ! मेरा नाम कबीर है । दूसरा नाम रखनेकी चिन्ता
मत करो । यह बात सुनकर सब लोग अत्यंत चकित हुए कि, यह बालक तो स्वयम् ही अपना नाम बतलाता है, यह कैसा बालक है यह किसी सिद्धका अवतार है अथवा स्वयम् परमात्मा है या कोई देवता है । काशीमें इस बातकी चर्चा घर-घर होने लगी कि, नीरुके घरमें एक बच्चा आया है सो बातें करता है ।
साखी—“कासी उमगी गूल भया, मोमिनका घर घेर ।
कोई कहे ब्रह्मा विष्णु है, कोइ कहे इन्द्र कुबेर ॥
को कह वरुण धर्मराय है, कोइ कोइ कह ईस ।
सोलह कला सुमान गति, कोइ कहे जगदीस ॥
कोइ कहे बल ईश्वर नहीं, कोइ किन्नर कहलाय ।
कोइ कहे गन ईसका, ज्यों ज्यों मातु रिसाय ॥
कासीमें अचरज भया, गयी जगतकी निन्द ।
ऐसे दुल्लह ऊतरे, ज्यों कन्या अर्बिन्द ॥
खलक झलक देखन गया, राजा परजा रीत ।
जम्बु दीप जहानमें, उतरे शब्दातीत ॥
दुनी कहै यह देव है, देव कहे यह ईस ।
ईस कहै परब्रह्म है, पूरन विस्वा वीस ॥
(गोसाई गरीबदासजीके पारख अंगकी साखी)
अङ्गीसवों प्रकरण ।
काजीका नाम धरने आना और कबीर नामका निश्चय होना ।
फिर नीरुने काजीको बुलाया और पूछा कि, इस बालकका क्या नाम रखना चाहिये ? तब काजी कुरान और अन्यान्य किताबें खोलकर बालकका नाम देखने लगा, तब कुरानके अनुसार उस बालकके चार नाम निकले— १ कबीर, २—अकबर, ३ किबरा ४ किबरिया । जब ये चार नाम निकले तब काजी चुप हो अपने दांतोंके नीचे उंगली दबाने लगा । बार बार वह कुरान खोलकर देखता तो समस्त कुरान उसको उन्हीं नामोंसे भरा दिखलाई देता था । काजीके मनमें अत्यंत संदेह उत्पन्न हुआ कि, ये चारो नाम तो खुदाके हैं । काजी गंभीर चिन्तामें बुड़कियाँ लगाने लगा कि, क्या करें ! हमारे धर्मकी प्रतिष्ठा गई, इस बातपर गरीबदासजीकी साखी सुनो :—
“काजी गये कुरानले, धर लडकेका नावैं ।
अच्छर अच्छरमें फुरा, पन कबीर पहि जावैं ॥
सकल कुरान कबीर है, हरफ लिखे जो लेख ।
कासीके काजी कहैं, नई दीन की टेक ॥”
जब काशीके सब काजियोंको यह समाचार मिला तो वे इस समाचार-को सुनकर बड़े ही चिन्तित हुए । वे परस्पर कहने लगे कि, अत्यंत आश्चर्यका विषय है, यह कैसा अद्भुत व्यापार है ? समस्त कुरानमें कबीर ही कबीर दिखाई देता है, अब कौनसा उपाय करना चाहिये कि, ऐसे दरिद्री जोलाहेके पुत्रका इतना बड़ा नाम न रखवा जावे । यह बात अच्छी नहीं है, फिर फिर कुरान खोलकर देखते तो यही चारों नाम निकलते, इन चारों नामोंके अतिरिक्त और कुछ नहीं निकलता ।
उनचालीसवाँ प्रकरण ।
काजियोंका नीरूको कबीरको कत्ल करनेकी सलाह देना ।
तब काशीके काजियोंने आपसमें सम्मति करके नीरू से कहा कि, ऐ नीरू ! तू इस बालकको अपने घरके भीतर लेजाकर मार डाल नहीं तो तू काफिर हो जायगा तब वह जोलाहा कबीर साहबको अपने घरके भीतर लेगया और मार डालनेके लिये उनके गले पर छुरी मारना आरम्भ किया वह छुरी गलेमें एक ओरसे दूसरी ओर पार निकल गयी, न कोई जखम हुआ और न रक्तका एक बूंदही निकला, न गर्दन पर कोई चिन्हही हुआ । ऐसा जान पडा मानो हवामें छुरी चली ।
तब कबीर साहब बोले कि, ऐ नीरू ! मेरा कोई माता पिता नहीं है । न मैं जन्मता हूँ, न मरता हूँ न मुझको कोई मार सकता है, न मैं किसीको मारता हूँ, न मेरा शरीर है । यह शरीर जो दिखलाई देता है, वह तुम्हारी भावना मात्र शब्दरूपी है । न मेरे मांस चर्म हड़डी और रक्त है, मैं स्वयम् परमात्मा हूँ । यह बात सुनकर जोलाहा और जोलाहिन अत्यंत भयभीत हुए और समस्त काशीमें हुल्लड मच गया कि, नीरूके गृहपर जो बालक है वह वार्तालाप करता है ।
अन्तमें विवश होकर कबीरही नाम ठहराया गया और किसीका कुछ वश न चला कि, उसको बदल सके और सबको भय उत्पन्न हुआ देखो गरीब-दासजीकी वाणीमें ।
चालीसवाँ प्रकरण ।
बालक कबीरका दूध पीना ।
बिना भोजनादि किये ही कबीर साहबका शरीर बड़ा होता जाता था और दिन प्रति आपका तेज तथा प्रताप बढ़ता जाता था । प्रमाण गरीबदासजी—
“दूध पिवे न अन्न भखे, नहिं पलन झूलंत ।
अधर अमान ध्यानमें, कमल कला फूलंत ॥”
जब जोलाहा जोलाहीने देखा कि, बालकको तो कुछ भोजन करने की आवश्यकता नहीं है और प्रति दिवस उसका सौन्दर्य उन्नतिपर है तब वे अपने मनमें अत्यंत चिंतित होकर कहने लगे कि ऐ कबीरजी ! आप कुछ भोजन करो यदि आप अन्न न खाओगे तो हम भी नहीं खायेंगे, यों दोनों कंदन करने लगे । तब कबीर साहबने उत्तर दिया कि ऐ नीरू ! गायकी एक कोरी बछिया और कुम्हारके घरसे एक कोरा बरतन लेआ । कबीर साहब की अज्ञानुसार नीरू गया और कोरी बछिया दूँढ़कर और कुम्हार के गृहसे एक बरतन ले आया । तब कबीर साहबने उस जोलाहेसे कहा कि, इस बछियाको मेरे सामने बाँध दो और उसके स्तनोंके नीचे बरतन रखदो । जोलाहेने वँसाही किया तब बालक कबीर साहबने उस बछियाकी ओर देखा तो उसके स्तनोंमें से दूध निकलने लगा और बरतन भर गया । वह दूध लेकर नीरूने कबीर साहबके सामने रख दिया तिसको आपने पीलिया । उसी प्रकार नीरू प्रतिदिवस किया करता था ।
निर्भयज्ञानमें इसी बालको इस प्रकार लिखा है कि, जब बालक कबीर कुछ खाते पीते नहीं थे, तब नीमा नीरूको बड़ा दुःख हुआ, सबसे वह पूछते फिरते कि, भाई ! हमारे घर जो अजीब बालक आया है, कुछ खाता पिता नहीं है, यद्यपि इससे उसके शरीरमें कुछ कमी नहीं दीखती बल्कि शरीर तो दिन दूना रात चौगुना तेजोभय और पुष्टही होता जाता है, तथापि हम लोगोंका मन नहीं मानता, कोई कुछ उपाय बतलावे तो हमें संतोष हो । यद्यपि नीमा नीरूकी बातोंको सुनकर प्रत्येक अपनी अपनी बुद्धि अनुसार कुछ न कुछ बतलाता और वे अनेक प्रयोग करते भी किन्तु जब बहुत उपाय करके थके तब निराश हो बहुत दुःखी हुए । अंतमें किसीने उन्हें सलाह दी कि, स्वामी रामानन्दजी वर्तमान कालमें बड़े सिद्ध और महात्मा त्रिकालदर्शी हैं, तुम उनके पास
जाकर पूछो तो वह कुछ उपाय बतला सकते हैं । इस बात पर नीमा नीरू स्वामी रामानन्दके आश्रमपर गये, किन्तु, वहाँ तो हिंदुओंमें से भी कितनी जातियोंका प्रवेश नहीं हो सकता था । क्योंकि, स्वामी रामानन्दजी शूद्रोंका मुहँ तक नहीं देखते थे । फिर मुसलमान वह भी मुसलमानोंमें भी सबसे नीच जाति जुलाहेकी गुजर वहाँ तक कैसे होसकती थी किन्तु “जिन ढूँढा तिन पाइयों” के अनुसार नीमा नीरूकी सच्ची लगनने, किसी प्रकार उनकी प्रार्थना स्वामी रामानन्दजी तक पहुँचा दी, तब स्वामीजीने ध्यान धरके बतलाया कि, एक कोरी (कुमारी) बछिया लाकर बालककी दृष्टि सन्मुख खड़ी कर दो, उसके थनसे दूध निकलेगा उसीको बालकको पिलाओ वह पी लेगा । नीमा नीरूने वैसाही किया और उस दिनसे सिद्ध बालक कबीर दूध पीने लगा ।
इकचालीसवाँ प्रकरण ।
बाल लीला ।
जब आप कुछ बड़े हुए तब छोटे छोटे लड़कोंके साथ खेलने लगे, उस समय आप उन लड़कोंसे ब्रह्मज्ञानकी बातें किया करते थे । वे बेसमझ क्या समझें । तब आप साधुओंके साथ बातें करने लगे । जब साधु लोग आपका ज्ञान सुनते तब अत्यंत आश्चर्यान्वित होते कि, यह छोटा बालक इस प्रकारकी बातें कैसे करता है ? इन बातोंकी सुध तो बड़े बड़े साधुओंको भी नहीं है, इसने चौथे पदकी बातें कहाँसे सीखीं ! साधुओंको विदित हो गया कि, यह बालक नहीं बरन् कोई सिद्ध है, लड़केके वेषमें प्रगट हुआ है ।
कबीर साहबके उस बालपनके अनेक कौतुकोंका विवरण ग्रंथोंमें लिखा है—उस समय जलनके रोगका काशीमें प्रकोप था । एक बूढ़ा स्त्री आयी और आप धूल मिट्टी खेल रहे थे । कबीर साहबसे बोली कि, मैं जलन रोगसे व्यथित हूँ, यदि तेरी इच्छा हो तो मैं आरोग्य लाभ करूँ । तब कबीर साहबने उस स्त्रीपर थोड़ीसी धूल डालदी और वह आरोग्य हो गयी और सुखी होकर प्रसन्न होती चली गयी । इस प्रकारकी अनन्त कथाएँ आपके बाल लीलाकी प्रसिद्ध हैं ।
बृहत् कबीर कसौटीसे बाललीला ।
जब कबीर साहब कुछ बड़े हुए और छोटे २ लड़कोंके साथ खेलने लगे तब आप उन लड़कोंसे ब्रह्मज्ञानकी बातें करते, किन्तु वे संस्कार हीन बच्चे उन बातोंको तो समझते नहीं । परन्तु उधरसे चलनेवाले साधु संत अथवा कोई
विद्वान् पण्डित उनकी बातोंको सुनकर आश्चर्य करता । कोई २ नीमा नीरूसे जाकर कहता—
कोइ (कोइ) जाइ नीरूसो कहई । सुत तुम्हार बड बादी अहई ॥
सिद्ध साधु सम ज्ञान बखाने । ऐसी अगाध मति कैसे वह जाने ॥
तब— नीरू नीमा दोउ मिलि, बिनवें ताहि बहूत ।
सब गुनाह मोहिं बखसौ, जोरे बिगारा पूत ॥
उनकी अधीनता देखकर लोग उन्हें कहते—
सभै कहें कछु गुनह न कीन्हा । ज्ञान न गोष्ठि उन पूछै लीन्हां ॥
सुत तुम्हार होइहै बड़भागी । होइहै भक्त नाम अनुरागी ॥
यहि कहि जाहिं भवन निज सोई । नीरू महा हरष चित होई ॥
नीरूके घर मांस आनेकी बातको जानकर कबीर साहबका
अन्तर्धान होजाना ।
इस प्रकारसे कुछ दिन बीतनेपर एक दिन नीरूके घर, कोई मिहमान आया और वह मिहमान दूसरे मुसलमानोंका बहकाया हुआ नीरूसे मांस खिलानेका हठ करने लगा । यद्यपि नीरूने उसे बहुत समझाया तथापि उसमें पैठा हुआ भूत नहीं निकला । अन्तमें जातिपातिके डरसे नीरूको मांस लानेके लिये भजबूर होना पड़ा । सत्य है—
जाति पाति हुर्मंतके गाहक । तिनको डर उर पैठयो नाहक ॥
जब सन्ध्याको सब लड़के अपने २ घर आये किन्तु, कबीर साहब नहीं आये, तब नीमाने अडोस पडोसके लड़कोंसे पूछना प्रारम्भ किया । जब उन लोगोंसे कुछ पता न पाया तब दोनों स्त्री पुरुष बहुत बिकल हुए । रातभर उन लोगोंने अन्न पानी तो ग्रहण कियाही नहीं, बल्कि उनको निद्रा भी न आयी । भोर होतेही नीरू उठकर खोजनेको निकला । तमाम नगर छान डाला, किन्तु कबीर साहब उसे कहीं भी नहीं मिले । तब वह पागलके समान जाने अनजाने हरएक आदमियोंसे पूछने और जिधर तिधर भटकने लगा । अन्तमें सन्ध्याको “कबीर साहबको लिये बिना घर लौटकर जानेसे नीमा कबीर साहबको न पाकर प्राण त्याग देगी ।” यही विचारकर नीरू गंगाजीमें डूबनेके लिये गया जैसे वह गहरे पानीमें जाकर गोता खाने लगा वैसेही उसे मालूम हुआ कि, किसीने उसका हाथ पकड़कर बाहर किया हैं । उसने जब आंख खोलके देखा तो कबीर साहब उसके सामने खड़े हैं वह प्रेम और आनन्दसे एकदम कबीर साहबको पकड़ने चला; किन्तु कबीर साहब उससे दूर हो गये और कहने लगे—
३ अ० कलियुगका वृत्तान्त
खबरदार ! मेरे शरीरको हाथ मत लगाना । तुम लोग महाभ्रष्ट हो । कबीर साहबके कहनेका भाव न समझकर नीरू वात्सल्यभावसे बालकको फिर यह कहता हुआ पकड़नेको चला—
कहु प्यारे काल्ह कहैं रहेऊ । हम खोजत थकित होइ गयेऊ ॥
तब कबीर साहबने कहा—
कहहिं कबीर हम उहाँ न जाहीं । तुम अभच्छ आनेहु घरमाहीं ॥
अब नीरूको चेत हुआ, तब उसने कहा—
कहे नीरू कर जोरि अधीना । अब तो चूक सही हम कीना ॥
अबकी चूक बकसिये मोहीं । हाथ जोरिकै विनवैं तोहीं ॥
इस प्रकार कहकर नीरू रोने और नकरगडी करने लगा, तब कबीर साहबने उससे कहा—
ऐसे हमं नहिं जैबे भाई । घर आंगन सब लीपौ जाई ॥
बर्तन अशुच दूर सब करिहौ । करि अस्नान वस्तर तन फेरिहौ ॥
ऐसी करिहौ जाइ तुम, तौ पइहो वहि ठाँउ ।
नाहीं तो घरको को कहै, तजि जाऊं यह गौँउ ॥
इतना सुनकर नीरू मनमें बहुत डरा और उसी क्षण घरपर जाकर कबीर साहबकी आज्ञानुसार, सफाई करके इन्तजार करने लगा, तब कबीर साहब प्रकट हुए और नीमा तथा नीरूसे बोले—
नीरू सुनहु श्रवण दै, फेर जो ऐसी होइ ॥
तब कछु मेरो दोष नहीं, जैहो जन्म बिगोइ ॥
दोनों स्त्रीपुरुषने हाथ जोकर कहा—हे प्यारे ! अब कभी ऐसी भूल न होगी । आप हमको मत त्यागो । (बृहत्कबीर कसौटी)
बयालीसवाँ प्रकरण ।
सुव्रत ।
कुछ दिवसोंके उपरान्त समस्त जोलाहे एकत्रित होकर कहने लगे कि, ऐ नीरू ! हमारे रसूल अल्लाहकी आज्ञाके अनुसार अब तुम अपने पुत्रका खतनः (मुसलमानी) कराओ । इसी अभिप्रायसे समस्त जोलाहे एकत्रित हुए और काजीको बुलाया और नाई उस्तरा लेकर कबीर साहबके सामने गया । जब नाई उस्तरा लेकर आपके निकट गया तब, आपने पाँच लिङ्ग उसको दिखलाये
कलियुगमें शानीजीका पृथ्वीपर सत्य कबीर, सैयद अहमद कबीर व शेख कबीर, जिन्दा पुरुष आदि नामोंसे पृथ्वीपर प्रगट होकर मनुष्योंके उद्धार करनेका वृत्तान्त, उत्थानिकां श्वपंचको सुदर्शन चेताना कलियुगका प्रमाण
और नाईसे कहा कि, इन पाँचोंमेंसे जिसको चाहे तू काट ले । यह व्यवस्था देखकर नाई तो भयभीत होकर भाग गया और आपका खुतनः नहीं हुआ ।
तेतालीसवाँ प्रकरण ।
कुरबानी ।
एकबार आप छोटे छोटे बच्चोंके साथ खेल रहे थे, उस समय काजीने गायकी कुरबानीका प्रबंध किया—जिस समय गऊको जबह करने लगे । उस समय कबीर साहबने, जो बालकोंके साथ खेल रहे थे जान लिया कि, काछी गौके जबह करनेको तय्यार हैं—तब आप तुरन्त बालकोंके साथका खेलना छोड़कर गौकी ओर दौड़े । जब तक, आप गायके समीप पहुँचे तबतक तो काजीने गऊको समाप्त कर दिया । कबीर उसाहब आकर उस काजीको अनेक उपदेश देके अत्यन्त धिक्कारा और लज्जित किया तब यह काजी लजाकर अपने अपराधके निमित्त क्षमाका प्रार्थी हुआ । फिर आपने उस गऊको जीवित कर दिया और आप अन्तर्धान होगये । प्रमाण बृहंतकबीरकसौटी—
कबीर साहबकी सुन्नतका । (बृ. क. कसौटी)
एक तो नीरूके घर सिद्ध बालकको देखकर उसकी प्रसिद्धीसे लोग जलते थे । दूसरेही मांसाहारी मुसलमानोंके विरुद्ध नीरूने सदाके लिये मत्स्य-मांसको अपने घरमें न लानेकी प्रतिज्ञा करली थी । इससे मूर्ख मुसलमानोंने उसे अपने धर्मसे भ्रष्ट होते समझकर उसे सुधारनेकी फिक्र करना आरम्भ किया—
काशीके जोहलन मिली, आनि कियो परपंच ।
सबै कहैं नीरू तुम, क्या बैठे निश्चिन्त ? ॥
बेटेकी तुम सुन्नति कराओ । पंचोंका तुम हाथ धुलाओ ॥
काछी मुलनाको बुलवाओ । गैनी^१^ और शराब मँगाओ ॥
इस प्रकारकी उनकी बात सुनकर नीरूने कानपर हाथ रखकर कहा—
नीरू कहै सुन्नति करवाओं । पै नहिं गैनी गला कटाओं ॥
तब उसके जाति विरादरीबालोंने उससे क्रोध करके कहा—
जोलहा सब तब कहैं रिसाई । क्या नीरू तुम अकिल गवाईं ॥
अपने कुलकी रीति न छाड़ो । कुल परिवार करिहैं सब भांडो ॥
गैनी बिना कैसे बनै, मुसलमानकी रीति ।
पीर पैगम्बर रुठिहैं खता खाहुगें मीत ॥
बह सुनकर नीरूने कहा—
नीरू कहै सुनौ रे भाई ! ऐसो करौं तो पूत गवौई ॥
एक बार घर आमिष आना । तेहि कारन सुत भया बिगाना ॥
क्या रुठे क्या खुशी हो, पीर पैगम्बर झारि ।
गौघात में ना करौं, नीरू कहै पुकारि ॥
कबीर साहबके अन्तर्धान हो जानेकी बात तो प्रथमसे ही सबपर जाहिर होगयी थी, इसलिये सब विद्वेषियों और पक्षपातियोंने मिलकर नीरूको बहकाकर उसके द्वारा गोहत्या कराना चाहा, जिससे कबीर साहब नीरूके घरसे रुष्ट होकर चले जावें; तब नीरूकी नामवरी भी जाती रहे और काजी मुलना जो कबीर साहबको अपने धर्मका निकन्दन करनेवाला समझते थे, उनका कांटा भी निकल जावे। किन्तु जब सब जुलाहों तथा काजी मुलनाओंने देखा कि, नीरू तो फन्देमें नहीं आता तब वे एक चाल चले और छलसे कहा—
जोलहन मिली छलसे कह्यो, और करू सब साज ।
नीरू तुमरे कारने, गैनी आयउ बाज ॥
उन लोगोंने अपने मनमें विचार किया कि, नीरूके अनजानमें गाय जबह करेंगे जिसको देखकर कबीर नीरूका घर त्याग देगा। उधर नीरू तो सुन्नतका सामान इकट्ठा करने लगा और इधर मुल्ला काजियोंके साथ मिलकर उसके जाति बिरादरीवालोंने, एक गाय मँगाकर चुपचाप जबह करनेका निश्चय किया। नीरू इस काण्डसे एकदम अजान रहा।
उधर सब सामान दुरस्त हो जानेपर जब नाई छुरा लेकर कबीर साहबका सुन्नत करने गया तब कबीर साहबने लंगूटी खोलकर नाईको पाँच लिंग दिखलाकर कहा, इसमेंसे तेरी जो इच्छा हो सो काट ले। यह आश्चर्य देखकर नाई तो भयभीत होकर भाग गया। किन्तु जुलाहों तथा काजीसहित अन्य मुसलमानोंने, अवसर पाकर उसी समय जब नाई कबीर साहबका सुन्नत करने गया, गायको जबह कर दिया। यद्यपि उन दुष्टोंके इस गुप्त काण्डको किसी दूसरेने नहीं जाना, परन्तु अन्तर्यामी सर्वज्ञ कबीर साहबने इस बातको जान लिया। नाईके भाग जानेपर आप बच्चोंके साथ खेलने चले गये थे, सो खेल छोड़ कर वहाँसे दौड़े और गोहत्याके स्थानपर पहुँचकर काजीसे कहा—
हो काजी यह किन फरमाये, किनके मता तुम छुरी चलाये ॥
जिसका छीर जु पीजिये, तिसको कहिये माय ।
तिसपर छुरी चलायऊ, किन यह दिया दिढाय ॥
तब काजीने उत्तर दिया—
सुन कबीर वडन सो, होत आइ यह बात ।
गौस कुतुब औ औलिया, हजरत नबी जमात ॥
यह सुनकर कबीर साहबने उत्तर दिया, हे क्राजी ! और मुल्ला तथा सब मुसलमानो ! तुम किस भूलमें पड़े हो ! जरा विचार तो करो, तुम्हारा दीन थोड़े दिनोंसे चला है, जिसमें तुम इतना जोर जुल्म करके नाना प्रकारसे जीवोंको सतानेमें धर्म मानते हो; तुम गफलतमें पडकर असल मार्गसे भटक कर नर्कका मार्ग क्यों साफ कर रहो हो !
सुनो जब—
आदम आदि सुधि नहि पायी । मामा हौब्बा कहैंते आयी ॥
तब नहि होते तुरुख औ हिन्दू । मायको रुधिर पिताको बिन्दू ॥
तब नहि होते गाय कसाई । तब विसमिल किन फरमायी ॥
तब नहि रहो कुछ औ जाती । दोज्रख विहिश्त कहाँ उत्पाती ॥
मन मसलेकी खबर न जाने । मति भुलान दो दीन बखाने ॥
संजोगेकर गुण रवे, बिन जोगे गुन जाय ।
जिह्वा स्वादके करने, कीन्हे बहुत उपाय ॥
कबीर साहबकी बातको सुनकर पक्षपातसे अन्धे हुए क्राजी और मुल्ला मारे क्रोधके थरथर कांपने और कहने लगे कि, नीरूका यह लड़का महा काफिर हो गया, नबी पैगम्बर पीर औलिया सबको यह तुच्छ समझता है, आपही बड़ा ज्ञानी बनकर आया है ! और वे सब अज्ञानी थे । उनके क्रोधको देखकर नीमा और नीरू तो डरसे बहुत घबराने लगे । किन्तु कबीर साहब निभंय होकर विनय-पूर्वक क्राजीसे पूछने लगे—
केहि कारण तुम इहवां आये । यहि जगह किन तुमहि बुलाये ॥
काजीने कहा—
जोलाहन मोहि बुलायऊ, तोहरे सुन्नत काज ।
अब तुम मुसलिम होयके, रोजा करहु निमाज ॥
कलमा पढ़ौ नबीका, छोड़हु कुफुरकी बात ।
तब तुम बिहश्तहि जाहुगे बैठहु नवी जमात ॥
इतना सुनकर कबीर साहबने कहा—
द्रापरके अन्तमें श्वपच सुदर्शनको चेताना और कथां दूसरी बार कलियुगमें कबीर साहिबके पृथ्वीपर प्रकट होनेका वृत्तान्त
जिन्ह कलमा कलीमांहि पढ़ाया । कुदरत खोज उनहु नहि पाया ॥
करमत करम करै करतूती । वेद किताब भया सब रीती ॥
करमत सो जो गरभ औतरिया । करमत सो जो नामहि धरिया ॥
करमत सुन्नति और जनैऊ । हिन्दू तुरुक न जाने भेऊ ॥
पानी पवन संजोयके, रचिया ई उत्पात ॥
सून्यहि सुरत समानिया, कासो कहिये जात ॥
इतनेमें काजी और मुल्लाओंको बिगड़ते देखकर वहाँ भीड़ जम गयी और कितने पक्षपाती हिन्दू भी वहाँ इकट्ठे हो गये, । तब काजीको उसकाने और क्रोधको बढ़ानेके लिये एक हिन्दूने कहा—“क्यों जी कबीर तुमको अपने धर्मका नियम मानना और काजी और मुल्ला जो धर्मके रक्षक और उपदेशक हैं उनकी आज्ञा पर चलना चाहिये । सो काजीजीकी आज्ञानुसार सुन्नत कराकर अपने धर्ममें मिलो । देखो, हमारे यहाँभी जब बालककी जनैऊ होती है तब वह संस्कारी बनता है, जबतक जनैऊ नहीं होती तबतक उसको शूद्रके तुल्य मानते हैं । वैसेही तुम्हारे धर्मका नियम सुन्नत कराना है, उससे क्यों भागते हो !” इतना सुनकर कबीर साहबने कहा—
जो तोहि कर्ता वरण विचारत । जन्मत तीन दंड अनुसारत ॥
जन्मत सूद्र मुये पुनि सूद्रा । किरतिम जनैऊ घाल जगदुद्रा ॥
जो तुम ब्राह्मण ब्राह्मनी जाये । और राहासे काहे न आये ॥
जो ये' तुरुक तुरुकनी जाये । पेटै काह न सुन्नति कराये ॥
कारी पीरी दूहौ गार्ई । ताकर दूर देहु बिलगार्ई ॥
छाडु कपट नर अधिक सयानी । कहहि कबीर भजु सारंगपानी ॥
यह सुनकर वह ब्राह्मण अवाक् होकर रह गया । तब काजीने कहा, देखो यह लड़का शरअसे बाहर बातें करता है इसकी बात सुननी उचित नहीं है । काजीकी इस बात पर उस लज्जित हुए ब्राह्मण और उसके साथियोंने भी जोर लगायी और सब एक मत होकर कहने लगे कि, इस लड़केके कहनेमें क्या आते हो, इसको तो पकड़ कर बांधो और सुन्नत करो । फिर क्या था ? पानीपर चढ़े हुए काजीने कई मांस हारी मुस्टेंडे मुसलमानोंको आज्ञा दिया कि, इस बालकको बांधो । देखतेही देखते थोड़ीही देरमें कबीर साहबको एक रस्सीमें बांधकर उन लोगोंने पछाड़ दिया और नाईकी खोज करने लगे । किन्तु नाई विचारा तो प्रथमही पाँच लिंग देखकर ऐसा भयभीत होकर भागा था कि
उसने पीछे फिरकर भी नहीं देखा था। अब उनको नाई मिलता तो कहोसे ! अब तो नाईके बिना काजी बहुत घबराया, चारों ओर लोग 'नाई ! नाई !' कहते दौड़ने लगे। उस समय कबीर साहबने काजीको सम्बोधन करके यह शब्द कहा—
काजी तुम कौन किताब बखाना ।
अंखत बकत रहौ निसि बासर मति एको नहि जाना ॥
सकति न मानो सुनति करत ही मैं न बदोंगा भाई ॥
जो खुदाय तुब सुनति करत तो आप काटि किन आई ॥
इतना कहकर वहाँ खड़े ब्राह्मण (हिन्दुओं) की ओर दृष्टि करके घालि जनेऊ ब्राह्मण होना, मेहरी क्या पहिराया ।
वह तो जन्मकी सूर्यन पिरोसी, सो तुम क्यों खाया ॥
हिन्दु तुएक कहाँसे आया, किन यह राह चलायी ।
दिलमें खोज खोज दिलहीमें, विहिस्त कहाँ किन पायी ॥
इतना कहकर कबीर साहब उठ खड़े हुए। उनके शरीरका बन्धन सब आपही खुलकर गिर पड़ा यह देखकर लोग बहुत आश्चर्यित हुये।
फिर कबीर साहबने काजीसे कहा—
कहै कबीर सुनोहो काजी। यह सब अहै शैतानी बाजी ॥
छिः!! छिः!! क्या इसीको मुसलमानी कहते हैं ?
यहि तरीका जो मुसलिम होई। तोपै दोजख परै न कोई ॥
फिर मुस्कुराते हुए कबीर साहबने काजीसे कहा, भाई ! अबतक तो खुद तुम्हें मुसलमानीकी खबर नहीं है, तब तुम मुझे कैसे मुसलमान करने आये थे ?
तुम तो मुसलिम भये नहि भाई। कैसे मुसलिम करहू आयी ॥
यदि तुम मुसलमानीका यथार्थ मार्ग जानते हो तो मुझसे कहो
जेहि तरीक सो साहिब राजी। सो तरीक मोहि कहिय काजी ॥
मारफ़तकी मुसलमानी, कहिये हजरत मोहि ॥
पाक जात केहिविधि मिले, सो मैं पूछौं तोहि ॥
यह सुनकर काजीने कहा, हम शरआके पाबन्द हैं, हमको मारफ़तकी बातमें जवान हिलानेकाभी हुक्म नहीं है—
काजीके उत्तरको सुनकर कबीर साहबने कहा, बस इतनेही पर काजीपना करनेका अभिमान करता है ? फिर यह शब्द कहा—
जगन्नाथकी स्थापनाकी उत्थानिका
भूला वे अहमक नादाना । हरदम रामहिं ना जाना ॥ टेक ॥
बरबस आनिके गाय पछारा, गला काटि जिव आप लिया ।
जीता जिव मुर्दा करि डारा, तिसको कहत हलाल किया ॥
जाहि मांसको पाक कहत है, ताकी उत्पत्ति सुन भाई ।
रज बीरज सो मास उपाना, सोई नापाक तुम खाई ॥
अपने दोष कहत नहिं अहमक, कहत हमारे बडेन किया ।
उनकी खूब तुम्हारी गर्दन, जिन तुमको उपदेश दिया ॥
सियाही गयी सुफेदी आयी, दिल सुफेद अजहूं न हुआ ।
रोजा निमाज बांग क्या कीजै, हुजरे भीतर बैठ हुआ ॥
पण्डित वेद पुरान पढें, मुलना पढें जो कुराना ।
कहै कबीर वे नरके गये, जिन हरदम रामहिं ना जान ॥
इतना कहकर कबीर साहब मरी हुई गौके निकट गये—
बहुविधिसे काजीको समझायी । महा पाप जिव घात बतायी ॥
फिर कबीर गऊ ढिग जायी । मरी गाय तिहिं काल जियायी ॥
गऊके पीठपर हाथ फेरतेही वह जीवित होकर उठ बैठी, फिर कबीर साहब उसको लिये हुए गंगा पर गये और गंगाजलसे स्नान कराकर नगरमें स्वतंत्र फिरनेको छोड़ दिया । उस दिनसे वह गऊ कबीर साहबकी गऊके नामसे प्रसिद्ध हो गयी और सब जगह आदर पाने लगी, और कबीर साहबनेभी उस दिनसे नीरूके घरका रहना त्याग दिया । कुछ दिनोंतक तो उनको कबीर साहबका दर्शन नहीं हुआ । किन्तु जब वे कबीर साहबके विरहमें बहुत विकल हो पागलों-के समान दर दर और घाट घाट फिरने लगे तब करुणामय साहबने करुणा करके उन्हें दर्शन दिया, किन्तु उनके घर नहीं गये । बल्कि काशीके बाहर एक स्थानमें कुछ भक्तोंने कुटी बांध दी, उसीमें रहने लगे । उसी स्थानको अब कबीरचौरा कहते हैं । जहाँ बड़ा भारी मुहल्ला बसा है, और कबीर पन्थियोंका बड़ा भारी स्थान है । कबीर साहबके वहाँ रहनेपर नीमा और नीरूभी वहाँ आकर रहने लगे । उन्होंने अपना पहला घर छोड़ दिया ।
इसी प्रकारसे कबीर साहबकी बाललीला अनेक आश्चर्य और उपदेश भरी हुई है, इस छोटेसे ग्रंथमें इससे अधिक लिखनेका अवकाश नहीं है । जिनको विस्तारपूर्वक हाल जाननेकी इच्छा होवे हमारे बनाये हुए कबीर दर्शन नामक ग्रन्थका प्रथम दर्शन देखें ।
कबीर साहिबके जगन्नाथ स्थापना
बालचरित्र है विविधि विधाना । सो संकेत न होय बखाना ॥
परचा जग अनेक परचारा । सो सब लिखित होय विस्तारा ॥
सबै विस्तार छांड़ि अब गाऊँ । रामानन्द गुरुको जस भाऊ ॥
चौवालिस्वों प्रकरण ।
बालककबीरका नीरूके घरसे अन्तर्धान होना ।
जब आप अन्तर्धान हो गये तब जोलाहा जोलाही आपको ढूंढने लगे वे दोनों चारों तरफ ढूंढते तथा रोते फिरते थे । उनको बड़ा दुःख हुआ । वे फूट फूट कर रोते तथा सबसे पूछा करते थे । समस्त नगरमें ढूंढ डाला पर आप कहीं नहीं मिले । उनको तीन दिवसोंपर्यंत भूखे प्यासे रहते बीत गये, अन्नजल कुछ भी उनके मुंहमें नहीं गया । वे अत्यंत निर्बल तथा अशक्य हो गये । जब आपने उन दोनोंको नितान्तही विह्वल पाया तब आय उनको सामने प्रगट हो गये । आपको देखतेही वे प्रसन्न होकर चरणोंपर गिर पड़े और अपने अपराधको क्षमा करवाना चाहा । कहने लगे कि, आप किधर चले गये ? हम ढूंढते २ हँरान हो गये । कबीर साहबने उत्तर दिया कि, तुमने महापाप किया कि, गऊको जबह करवाया । तब जोलाहा जोलाही अनेक सौगंधें खाने लगे कि, हमने यह कार्य नहीं करवाया बरन् हमें इस बातकी तनिक भी सुध नहीं थी—यह कार्य काजीका है । उन दोनोंने बहुत कुछ प्रार्थना तथा विनती कि, तब कबीर साहबने उन दोनोंको निर्दोष समझ लिया तब उनकै साथ गये, और रहने लगे । तबसे नीमा और नीरू सदा सचेत रहा करते थे ।
पैंतालीस्वों प्रकरण ।
बाल कबीरकी काफिरकी व्याख्या करना ।
जब आप छोटे २ बालकोंके साथ खेलते थे तब “राम राम” “गोविन्द गोविन्द” “हरि हरि” कहा करते थे, तब मुसलमान लोग सुनकर कहते थे कि, यह बालक कट्टर काफिर होगा । तब उनको कबीर साहब यह प्रत्युत्तर देते थे कि, काफिर वह होगा जो दूसरोंका माल लूटता होगा । काफिर वह होगा जो कपट भेष बनाकर संसारको ठगता होगा, काफिर वह है जो निर्दोष जीवोंका प्राण नाश करता होगा, काफिर वह होगा जो मांस खाता होगा, काफिर वह होगा जो मदिरा पान करता होगा, काफिर वह होगा जो दुराचार तथा बट-
जगन्नाथ मंदिरकी स्थापनाका वृत्तान्त
भारी करता होगा, मैं किस प्रकार काफ़िर हूँ । उस समय आर्पने यह साखी कहा :—
साखी—गला काटकर बिसमिल करें, ते काफ़िर वेबूझ ।
औरनको काफ़िर कहें, अपनी कुफ़ न सूझ ॥
छयालीसवाँ प्रकरण ।
बाल कबीर वैष्णवके बानेमें ।
एकबार कबीर साहबने गलेमें यज्ञोपवीत डाल लिया और अपने माथेपर तिलक लगा लिया तब ब्राह्मणोंने यह देखकर कहा कि, यह तो तेरा धर्म नहीं है तूने वैष्णव वेष कैसे बनाया ? और तू राम राम गोविंद गोविंद नारायण नारायण कहता है, यह तो मेरा धर्म है तेरा धर्म नहीं । तब कबीर साहब ब्राह्मणोंको उत्तर देते कि, हम तो ताना तनते हैं जानेऊ तुम्हारा किस प्रकार हुआ और गोविन्द और राम तो हमारे हृदयमें बसते हैं, तुम्हारे कैसे हुए । तुम तो गीता पढ़ते हो, परन्तु सांसारिक धनके निमित्त सदैव धनाढ्योंके द्वार द्वार पर दौड़ते और भटकते रहते हो और हम तो गोविन्दके अतिरिक्त और किसी अन्यको जानते ही नहीं । इतना सुनकर ब्राह्मण निरुत्तर होते । वहाँ आप यह शब्द कहते—
शब्द—मेरी जिह्वा विस्नू लैना नारायन हिरदे बसे गोविन्दा ।
जम द्वारे जब पूछि परे तब का करे मुकुंदा ॥ टें० ॥
हम घर सूत तनै नित ताना, कंठ जनेउ तुम्हारे ।
तुम नित बांचत गीता गायत्री, गोविन्द हिरदे हमारे ॥
हम गोरु तुम ग्वाल गुसाई, जनम जनम रखवारे ।
कबहिं न बार सो पार चलाये, तुम कैसे खसम हमारे ॥
तुम बाभन हम कासीके जुलहा, बूझो मेरा ग्याना ।
तुम खोजत नित भूपति राजे, हरि संग मेरा ध्याना ॥
सैंतालीसवाँ प्रकरण ।
बालक कबीरकी ज्ञान कथनी और गुरुकी पूछ ।
हिन्दू तथा मुसलमान दोनों आपके साथ वाद विवाद किया करते थे सब परास्त होते थे । जब साधुओंने देखा कि, यह लड़का तो बड़ा ज्ञानी है, तब वे
कृष्णका इन्द्र दमन राजाको सपना देना समुद्रके कोपका कारण
लोग पूछते कि, कबीरजी ! आपका गुरु कौन है ? उस समय तो आपका कोई गुरु नहीं था, इस प्रश्नपर आप निरुत्तर और निस्तब्ध हो कुछ न बोलते । तब साधु लोग कहते कि बिना गुरुके तुम्हारा ज्ञान किसी कामका नहीं, बिना गुरुके किसीको मुक्ति नहीं मिलेगी, तुम्हारा यह सब ज्ञान और कथनी व्यर्थ है ! जब साधु लोग कबीर साहबपर इस प्रकार कटाक्ष करने लगे तब आपने रामानन्द स्वामीको गुरु करनेका संकल्प किया, उस समय आपका वय पाँच वर्ष मात्रका था ।
गुरु करनेका वृत्तान्त । (बृ. कसौटी)
सो वृत्तान्त अब करें बखाना । जिमि कबीर काशी कथ ज्ञाना ॥
पांच वरषके जब भये, काशीमांझ कबीर ।
गरीबदास अजब कला, ज्ञान ध्यान गुणसीर ॥
जबसे काजी कबीर साहबके बचनोंसे लज्जित होकर चला आया तबसे वह तो कभी साहबके सामने नहीं जाता । परन्तु उस दिनसे साहबकी ऐसी प्रसिद्धि हुई कि, आपकी ज्ञानपूर्ण बातोंको सुननेके लिये अनेक लोग आपके पास आने लगे ।
षटदर्शन मिलनेको आवैं । आत्मज्ञान सबकौ समझावैं ॥
सत्य पंथका कीन परचारा । हिंसा कर्म नीच निरधारा ॥
कबीरोपदेश ।
तीरथ बरत अरु मूरत पूजा । जीव हनैं ईश्वर कथ दूजा ॥
जीव घात करई जो कोई । बासा तासु नरकमें होई ॥
पाहनको पूजैं पाखण्डी । गल काटै जो सन्मुख चंड़ी ॥
बकरा मुरगा जबह जो करहीं । विस्मिल्लाः कहि धर्मकहि उच्चरहीं ॥
ते सब पापकर्म कमाहीं । हिन्दू तुच्छ दौउ नरके जाहीं ॥
इस प्रकारके उपदेशको सुनकर हिन्दू मुसलमान दोनोंही द्वेष मानने लगे । किन्तु कबीर साहबको कुछ भय नहीं था । बल्कि जब बहुतसे बालक इकट्ठे हो जाते तब आप उनके संग खेलने लग जाते और उनसे कहते सब, 'राम, राम, गोविन्द, गोविन्द' कहो ।
एक दिन एक मुसलमानने कहा, देखो यह कबीर हिन्दू देवोंका नाम लेता है । यह बड़ा भारी काफिर होगा । यह सुनकर कबीर साहबने उससे कहा—
गला काटि बिस्मिल करैं, ते काफिर बे बूझ ।
औरनको काफिर कहैं, अपना कुफ न सूझ ॥
यह सुनकर वह मुसलमान चुप हो गया । एक दिन कबीर साहब राम, कृष्ण, गोविन्दका नाम लेते सुनकर एक हिन्दूने कहा, 'क्यों बे ! मुसलमान होकर हमारे ईश्वरका नाम लेता है ?' तब कबीर साहबने उत्तर दिया—
शब्द—भाईरे दुई जगदीश कहांतें आये कौने मति भरमाया ।
अल्लहः राम करीमा केशव हरि हजरत नाम धराया ॥
गहना एक कनक ते बनता तामें भाव न दूजा ।
कहन सुननको दुइ कर थापे इक निमाज इक पूजा ॥
वहि महादेव वही मुहम्मह ब्रह्मा आदम कहिये ।
कोइ हिन्दू कोइ तुर्क कहावे एक जमीं पर रहिये ॥
वेद किताब पढ़ें वे खुतवा वै मूलना वे पांडे ।
विगत विगतकें नाम धरावें एक मटियाके भांडे ॥
कहैं कबीर वै दूनों भूले रामैं किनहु न पाया ।
वैं खसिया वे गाय कटावैं वादे जन्म गवाँया ॥
ऐसेही अवसर पर एक दिन एक ब्राह्मणने व्यंगसे कहा कि, भाई ? तू उससे क्या पूछता है, राम नाम बिना मुक्ति किसकी हुई है ! रामनाम सब वेदोंका सार है, अल्लाह, खुदामें क्या धरा है ! इसलिये तो कबीर अल्लाह खुदा छोड़कर राम राम कहता है । इसपर कबीर साहबने उसको उत्तर दिया—
शब्द - पंडित बाद बदौ सो झूठा ।
राम कहे जगत गति पावे, खांड कहै मुख मीठा ॥
पावक कहै पांव जो दहै, जल कहे तिरषा बुझायी ।
भोजन कहे भूख जो भागै, तौ दुनिया तरि जायी ॥
बरक संग सुवा हरि बोलै, हरि प्रताप नहि जानै ।
जो कबहुँ उडि जाय जंगलको, तो हरि सुरति न आनै ॥
विनु देखे विनु अरस परस, विनु नाम लियेका होई ।
धनके कहे धनिक जो होवे, निर्धन रहत न कोई ॥
सांची प्रीति विषय माया सो, हरि भगतनकी हांसी ।
कहहि कबीर एक राम भजे विनु, बाँधे जमपुर जासी ॥
जोई आकर कबीर साहबके विचारका खण्डन करना चाहता वह आपही परास्त होकर चला जाता. तब तो बिद्वेषियों मजहबियोंको बड़ी कठिनाता पड़ने लगी; क्योंकि, बालक कबीरकी अद्भुत लीला और चरित्रको देखकर
भ्रम विमोचन स्वामी रामानुजाचार्य और जगन्नाथपुरी
संसारी जीव सहजही उनकी ओर आकर्षित होते। और जो कबीर साहबके पास जाता सो आपके उपदेशको ग्रहण कर पाखण्डको छोड देता। यह देखकर विचार करते २ उन्हें और तो कोई उपाय नहीं सूझा, किन्तु उनमेंसे जब कोई कबीर साहबके निकट आता तब लोगोंकी भीड़ देखकर यह कहता, कि, भाइयो ! तुम इस दुधमुहे बालककी बातोंमें क्या लगे हो ! विचारने अबतक गुरुका भी मुख नहीं देखा है, जानते नहीं हो ? शुक्रदेव जैसे तपस्वी और त्यागी ज्ञानी महात्मा बिना गुरु किये स्वर्गमें नहीं जाने पाये। तब इस निगुरे बालककी बातोंको सुननेसे तुम्हारा क्या भला होगा ?
यह सुनकर कबीर साहबने विचार किया “यद्यपि मुझे गुरु करनेकी आवश्यकता नहीं है, तथापि भक्तिकी मर्यादा स्थापित करने और सत्य धर्मके प्रचारके लिये मैं संसारमें आया हूँ, इसलिये गुरु करना उचित है। दूसरे आजकलके सबसे बड़े गुरु स्वामी रामानन्दजी संसारी भावनाओंमें पड़कर सत्य-मार्गसे भ्रष्ट हो रहे हैं। सो वह शिष्य बनकर मेरा उपदेश तो सुनेंगेही नहीं, मैं ही उनका शिष्य बनकर उनको मार्गपर लाऊँ तो ठीक है।” किन्तु, रामानन्द स्वामी तो वर्णाश्रमके फन्देमें ऐसे पड़े थे कि, द्विजोंके सिवाय किसीका मुख भी नहीं देखते थे। फिर मुसलमान करके प्रसिद्ध बालक कबीरको वह अपना शिष्य कैसे बनाते ? इसलिये कबीर साहबने यह युक्ति निकाली। जो आगेके प्रकरणमें वर्णित है।
अङ्गतालीसवाँ प्रकरण ।
कबीरसाहबका रामानन्द स्वामी वैष्णवके पास जाना और दीक्षा देनेका निवेदन करना और स्वामीजीका दीक्षा देनेसे इनकार करना तब कबीर साहबका एक छोटा लडका होकर रामानन्दके पथमें पड़ना, स्वामीजीके खड़ाऊँकी ठोकर कबीर साहबको लगने और चेलाका संबंध बनानेका वृत्तान्त ।
कबीर साहबका जब पाँच वर्षका वय हुआ तब आपने रामानन्द स्वामीके पास समाचार भेजा कि, स्वामीजी ! मुझको दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाइये और मुझसे गुरुदक्षिणा लीजिए। यह बात सुनकर स्वामीजीने उत्तर भेजा कि, मैं शूद्रको दीक्षा नहीं देता। देखो रामानन्द और कबीर गोष्ठी ज्ञानतिलकमें—
तीसरी बार कबीर साहिबका पृथ्वीपर प्रकट होना इत्यादि
कबीर वचन ।
रामानन्द गुरुदिच्छा दीजे । गुरुदच्छिना हमसे लीजे ॥
रामानन्द वचन ।
सूद्रेके कान न लागा भाई । तीन लोकमें मोर बड़ाई ॥
जब रामानन्दजीने स्पष्ट उत्तर दे दिया कि, मैं दीक्षा नहीं दूंगा, तब कबीर साहब चुप चाप चले आये। स्वामीजीका यह नियम था कि, एकपहर रात रहताँ तब गंगास्नानको आया करते थे। कबीर साहबने वह समय ठीक कर लिया और जब स्वामी ी स्नान करने चले तब आप छोटे बालकका रूप धारण करके स्वामीजीके मार्गमें सीढ़ियोंपर सो गये। स्वामीजी खड़ाऊँ पहने चले आते थे। वहाँ आतेही आपकी खड़ाऊँ की ठोकर बालकके शिरमें लगी। तब बालक रोने लगा। जब लड़केको रोते देखा तब स्वामी जी खड़े हो गये, और बालकके शिरपर हाथ धरकर कहा कि, बत्स ! मत रों राम राम कहो। तब कबीर साहब शान्त हो गये और कहने लगे गुरुजी राम राम कहूँ ? स्वामीजीने कहा हों राम राम कहो, उस समयसे कबीर साहब बराबर राम राम कहने लगे और स्वामी रामानन्दजीसे गुरु शिष्यका संबंध जोड़ लिया। फिर प्रातःकाल कंठी धारण कर हाथमें तुलसीकी माला लेलिया और मस्तकपर तिलक लगाकर ठीक वैष्णव मूर्ति बना राम राम की धुन लगादी। कबीर साहबका यह रंग ढंग देखकर अनेक मनुष्य प्रश्न करने लगे, कबीर साहबजी ! आपने यह वेष्ट वैष्णवका किस कारण बनाया है ? तब वे सब लोगोंको उत्तर देने लगे कि, मैंने रामानन्द स्वामीको गुरु बनाया है। यह बात सुनतेही संन्यासी तथा वैरागियोंने स्वामीजीसे जाकर कहा कि, महाराज ! आपने ऐसी मर्यादा छोड़ दी कि, जोलाहेके पुत्रको शिष्य कर लिया, ऐसा आपको उचित नहीं था। यह बात सुनकर स्वामीजीने कहा कि, मैंने चेला नहीं किया, बुलाओ कबीरको। लोग गये और कबीर साहबको बुला लाये।
उनचासवों प्रकरण ।
स्वामी रामानन्द कबीर साहबको शिष्य स्वीकार करना ।
उस समय रामानन्द स्वामीका यह नियम था कि, वह किसीको देखते नहीं थे और कंदराके भीतर परदेमें रहा करते थे। कबीर साहबको लाकर लोगोंने परदेके बाहर खड़ा किया। परदेके भीतरसे स्वामीजी बोले कि, ऐ कबीर ! मैंने तुमको अपना चेला कब बनाया। तब कबीर साहबने उत्तर दिया
कबीर साहिबका ४ थी ५ वीं छठीं और ७ वीं बार प्रकट होने का वृत्तान्त
कि, स्वामीजी जब आप गंगा स्नान को जाते थे, और मैं पथमें पड़ा था, आपके खड़ाऊँ की ठोकर मेरे माथेमें लगी मैं रुदन करने लगा । तब आपने कहा राम राम कह; उस समयसे मैं राम राम कहने लगा । तब स्वामीजीने कहा कि, हों ! एक बालक था जिसको मेरे खड़ाऊँ की ठोकर लगी और उससे मैंने राम राम कहा था । तब कबीर साहबने कहा कि गुरुजी वह लड़का मैं ही था । स्वामी जीने कहा कि, क्या इस प्रकार कोई गुरु चेला हो सकता है ? कबीर साहबने कहा कि, गुरुजी वेदशास्त्रमें रामनामसे बढ़कर और दूसरा क्या है ? तब स्वामीने उत्तर दिया कि, सबसे बढ़कर यही है, इससे बढ़कर और कुछ नहीं है । कबीर साहबने कहा कि, जो नाम सबसे बढ़कर है, सो तो आपने मेरे माथेपर हाथ धरकर देही दिया, फिर गुरु और शिष्य किस प्रकार होता है । कबीर साहबने स्वामीजीको अपनी बातोंसे निरुत्तर कर दिया । तब स्वामीजी बोले कि, जिस बालकसे मैंने राम नाम कहा था वह छोटा था और तू तो बड़ा जान पड़ता है । उस समय कबीर साहब वैसाही छोटा बालक बनकर, स्वामीजीकी गुफाके भीतर घुस गये और उनके चरणोंपर गिरकर कहने लगे कि, मैं उस समय ऐसाही छोटा था न ! यह कौतुक देखकर लोगोंको अत्यंत आश्चर्य हुआ कि, देखो यह बालक कौसा छोटा हो गया । तब अनन्तानन्दजीने, जो रामानन्द-स्वामीके बड़े चेले थे, समझाया कि, गुरुजी आप कबीरको मनुष्यका बालक न समझो, यह सिद्धका अवतार है, आप इससे किसी प्रकारका भेद मत करो । उस समय से स्वामीजीने कबीर साहबसे परदा छोड़ दिया और अपने शिष्योंमें मिला लिया । स्वामीजीके जितने शिष्य थे सब कबीर साहबको गुरुके समान मानते और अत्यंत मर्यादा तथा प्रतिष्ठा किया करते थे । स्वयम् कबीर साहब भी सबसे नितान्तही नम्रता पूर्वक मिलते थे, आपके गुरु भाई आपके आज्ञा कारी थे, आपका बड़ा ध्यान रखते थे, यों स्वामी रामानन्द स्वामीके चौदहसौ चौरासी शिष्योंमें सबके सरदार कबीर साहब बने ।
फिर समय २ पर कबीर साहब और रामानन्द स्वामीमें ज्ञान और मुक्तिके विषयमें विवाद हुआ करता था । रामानन्द स्वामी तथा कबीर साहब की वार्तालाप बहुत है जिसकी इच्छा हो दूँढ कर देखलें, कबीर साहबने स्वामीजी को अनेक कौतुक दिखलाए, सो भिन्न २ ग्रंथोंमें लिखे हैं ।
कबीरसाहब और स्वामी रामानन्दजीकी गोष्ठी ।
(वृहतक० सौ०)