भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

बराबरी, एम, दपये लेनेवाला, प्रत्युपकारी

कुत्ता बगीचेके भीतर जाने न पाया। चौकीदारोंने रोका साहब उस कुत्तेको जमादारके हवाले करके बाड़ेके भीतर चला गया। कुछ कालके पीछे साहब बाहर आया जमादारसे कहा कि, मेरी छड़ी खो गई, यदि आप मेरे कुत्तेको भीतर जाने दो तो वह तुरन्तही चोर पकड़ लेगा। साहबकी प्रार्थना स्वीकार की गई। साहबने कुत्तेको ईशारा किया कि, मेरी छड़ी जाती रही है। दूंड ला। कुत्ता बाटिकाके भीतर गया और चारों ओर फिरा, अन्तमें उसने एक आदमीको पकड़ लिया। साहबने कहा कि, इस मनुष्यने मेरी छड़ी चुरा ली है। इस पर उस मनुष्यकी तलाशी ली गई, उसकी जेबसे वह छड़ी निकली। उसके अतिरिक्त उसकी जेबसे और भी छः छड़ियां निकलीं। बड़े आश्चर्यकी बात है, कि कुत्ता केवल अपने स्वामीकी छड़ीको पहचानकर मुंहमें ले चला आया। दूसरी छड़ियोंको नहीं छूआ।

मास्टिककी वफादारी—एक धनाढ्यके घरमें जिसे अङ्ग्रेजीमें बैरोनेट कहते हैं। एक मास्टिक कुत्ता था। उसकी वफादारीकी अनेक बातें अङ्ग्रेजी पुस्तकोंमें लिखी हुई हैं। बैरोनेट अमीरने उस कुत्तेकी ओर पहले ध्यान नहीं दिया न उसपर कुछ दया की। एक दिन वह अमीर अपने मकानमें सोनेके लिये चला, उसके साथ इटली देशका रहनेवाला उसका नौकर था पीछे पीछे चला वह कुत्ता भी चुप चाप उनके साथ हो लिया अटारीपर चला गया चाह्ता कि, अमीरके शयनागारमें प्रवेश कर—पहले तो उसको जाने न दिया पर जब वह द्वार पर बहुत चिल्लाने लगा तब बैरोनेटने द्वार खोल दिया उसको भीतर आने दिया। अब वह कुत्ता उसकी कोठरीके भीतर जाकर एक कोनेमें बैठ गया। जब आधी रातका समय हुआ तो उस अमीरकी कोठरीका द्वार खुला, कुत्ता जोरसे गुरनितथा भूंकने लगा। अमीरने उठकर बत्ती जलाकर देखा कि, वही उसका इटलीवासी नौकर था। उससे बैरोनेट पूछा कि, तूने किस अभिप्रायसे आधी रातको मेरी कोठरीका द्वार खोला। अन्तमें उसने स्वीकार कर लिया कि, आपको मारकर सब धन लूट लेजानेकी मेरी इच्छा थी। वास्तवमें यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि, इस बातकी सूचना इस कुत्तेको पहलेसेही क्यों होगई। उसने पहलेसेही जान लिया कि, मेरे स्वामीके साथ वह मनुष्य उस प्रकारका व्यवहार करनेवाला है। निश्चय वह कुत्ता पहलेकी बातोंको जानता था, इस कारण सचेत होकर स्वामीके कमरेमें चौकस होकर पहलेसेही बैठ गया था।

माउण्ट सेंट बर्नर्ड डाग—एक जातिका कुत्ता होता है। यह कुत्ता मास्टिक और निउफाइण्डलेण्डके वर्णसंकर कुत्तोंकी जाति है। ऐल्पके पर्वतों पर जहाँ

शराबी बन्दर

कि, अत्यन्त बरफ पड़ती है वहाँ रहता है । वहाँ धर्मशाला बनी हैं, वहाँ पर बरमंक नामके एक प्रकारके फकीर रहते हैं, जो धर्मशालोंका प्रबन्ध रखवा करते हैं । वे लोग इस प्रकारके कुत्तोंको पालते हैं । इन कुत्तोंको सिखलाते हैं । पथिक जब उन बरफोंमें जा पड़कर मरने लगते हैं तो वे फकीर पथिकोंके बचानेके लिये कुत्तेको छोड़ते हैं । उन कुत्तोंकी सभी जातियोंकी अपेक्षा इन कुत्तोंमें अधिक बुद्धि होती है । ये कुत्ते बहुत शिक्षित होते हैं अत्यन्त बुद्धिमानोंके साथ काम किया करते हैं । धर्मशालाओंके लोग इस कुत्तेके गलेमें, गरम शराबकी बोटल बांध दिया करते हैं । स्वीट जर लेण्डके बरफीले पर्वतोंमें यह कुत्ता गिरे पड़े मुसाफिरोंको बरफोंमें ढूँढ़ा करता है । परमेश्वरने इन कुत्तोंको ऐसी बुद्धि प्रदान की, यदि मसाफिर पन्द्रह या बीस फीट बरफके नीचे दबाहो तो उसी समय बरफको खरोंच खरोंचकर टालना आरम्भ करता है । बहुत ऊँची आवाजसे भूंकता है । जिससे एक मीलसे भी अधिक उसकी आवाज चली जाती है । कुत्तेकी आवाज सुनकर धर्मशालाओंके महन्त आपहुँचते हैं । उसकी सहायता करते हैं । उपरोक्त कुत्तेकी कहानी एक अङ्ग्रेजी पुस्तक लाइबरेरी, आफ, इण्टर-टेनिङ्ग, एलफारफीसमें लिखी है कि, इस कुत्तेने बाईस मनुष्योंकी जान बचाई थी । इस कारण कुत्तेके गलेमें उसकी सुकीर्तिका तगमा पहनाया था ।

एक बार यह कुत्ता एक पथिककी जान बचाने और उसकी धर्मशालामें लानेका उद्योग कर रहा था । वह सन् १८१६ ई० में मर गया और उसके स्मारक चिह्नके लिये उसकी एक सुविशाल सभाधि बनाई गई । वे पहाड़ी लोग अबतक भी उस कुत्तेकी भलाईको नहीं भुला सके हैं ।

इस कुत्तेको धर्मशालाओंके बरमंक लोग पर्वतोंमें भेजते हैं वह वफोंमें जाकर मुसाफिरोंको ढूँढ़ता फिरता है । जहां कहीं बरफका मारा अचेत पथिक दिखाई देता है तो उसके ऊपर बैठ जाता है अपने बालोंसे उसको भली प्रकार गरमाता है । उस कुत्तेके शरीर पर बहुत बाल होते हैं । उन बालोंकी गरमीसे पथिक कुछ चैतन्यता लाभ करता है वह उसको गलेकी बोटल विखाता है । वह मुसाफिर बोटलको उसके गलेसे खोलकर पीता है जिससे सचेत हो जाता है । कुत्ता पथिकको अपनी पीठपर लादकर धर्मशालेमें ले आता है । धर्मशालाओंके साधुगण उसकी भली प्रकार सेवा करते हैं वह आरोग्यता लाभ कर अपने घरको चला जाता है ।

निउफौण्ड लेण्ड डाग—नामके कुत्तेको एक साहब अपने मित्र सहित अपने साथ लिये चले जाते थे । कुत्तेके स्वामीने कुत्तेकी बहुत प्रशंसा करके कहा

पूर्व जन्म बेत्ता मृगेंद्र

कि, कितनीही दूरसे इस कुत्तेको कोई वस्तु लेनेको भेजा जाय तो वहाँसे वह वस्तु लाकर उपस्थित कर देता है। इस बातकी सत्यता प्रगट करनेको उस साहबने एक चौकोर पत्थरके बीचमें अठन्नी धरकर उस कुत्तेको दिखाकर अपनी राहली। वह पत्थर सड़कके किनारे पर पड़ा था। वह साहब घोड़ेपर सवार होकर तीन मीलके अन्तर पर गया। उसने उस कुत्तेको इशारा किया कि, अठन्नी ले आ। कुत्ता उसी समय अठन्नी लेने चट्टानके पास गया। साहब अपने घरको चला गया। साहबने घर पहुँचतेही कुत्तेकी प्रतीक्षामें सारा दिन बिता दिया पर कुत्ता न आया।

पीछे यह बात जान पड़ी कि, कुत्ता स्वामीकी आज्ञा पाते ही उसी समय उस स्थान पर आ पहुँचा। जहाँ कि, वह अठन्नी दबाई गई थी। उस चट्टानका हटाना अपने सामर्थ्यके बाहरका कार्य समझकर वहाँ खड़ा होकर भूंकने लगा। इसी अवसरमें उस पथसे दो सवार निकले उस कुत्तेको कष्टमें जानकर उनमें से एकने अपने घोड़ेसे उतरकर उस चट्टानको हटा दिया। वह अठन्नी देख उसको हटाकर अपनी जेबमें रख लिया कुत्तेके तात्पर्यको न समझ अपने घरकी राह ली। कुत्ता उनके घोड़ेके साथ बराबर बीस मील तक चला गया। सांझको दोनों सरायमें ठहरे रातके समय दोनों आनन्दपूर्वक एक कोठरीमें सो रहे वहाँकी भटियारी उनकी सेवा करती रही। वह कुत्ता भी उनकी चारपाईके नीचे छिपकर बैठा रहा। जिसने वह अठन्नी ली थी उसने उसको लेकर अपनी पतलूनकी जेबमें रख दिया था रातके समय पायजामा उतारकर खूंटोके ऊपर रख दिया। जब वे दोनों सो गये तो उस कुत्तेने पतलूनको अपने मुँहसे पकड़ लिया खिड़की द्वारा बाहर कूदकर निकल भागा। उसी खिड़कीसे वह निकल गया जो गर्मीके मौसममें वायुके आवागमनके निमित्त खुली रहा करती थी। इस कारण ही उस कुत्तेका दाव घात लगा रातके चार बजे अपने घर पहुँचा। साहबने पतलूनकी जेब खोल कर देखा तो चिह्नवाली अपनी अठन्नीको उसी प्रकार पाया उस जेबमें से घड़ी तथा एक रुपया भी निकला। साहबने ढँढोरा पिटवाया कि, एक पतलूनमें एक घड़ी तथा रुपये इस प्रकार आये हैं। इससे उस घड़ी तथा पतलूनवाले मनुष्यको पता चल गया कुत्तेकी समस्त कीर्ति खुल गई। इस जातिका कुत्ता बड़ा हिम्मतो तथा दयालु होता है। अपनेसे निर्बल कुत्तोंपर कभी भी बल प्रयोग नहीं करता।

हिरण।

हिरण बहुत ही सचेत तथा चैतन्य पशु है। उसको हितक पशु तथा मनुष्य

कुमरसिंहजीका सिंह कांटा निकलवाने-वाला

आखेट करके मार लेते हैं। यह बहुत चैतन्य रहने पर भी मारा जाता है। रात दिन सचेत रहता है। जब आखेट करनेवाले आते हैं तो हिरनी बच्चोंके समीप रहती है। बच्चोंके प्रेमके मारे भाग नहीं सकती। इसीमें प्रायः शिकार हो जाया करती है। अनेक जातिके हरिण होते हैं।

कस्तूरी मृग—भी इन्हीं हरिणोंमें होता है। उसके प्राणके इच्छुक अनेक मनुष्य होते हैं यह प्रायः चीन देशमें होता है चीनी तवारीखमें लिखा है कि, यह बड़ा सावधान तथा चैतन्य होता है पर्वतोंकी चोटियों पर रहता है, जहाँ कि, मनुष्य तथा पशु कठिनाता पूर्वक पहुँच सकते हों। मनुष्य भेड़िया तथा शेरोंसे बहुत सचेत रहता है यहाँ तक कि, वह अपने मूत्रको भी पी जाता है अपनी मँगनीको धूल मिट्टीमें ऐसा दबा देता है कि, कहीं चिन्ह भी न मिले कोई यह देखकर जानले कि, यहाँ मृग रहता है उसकी नाभीमें मुश्क भरा रहता है। जब कभी भेड़िया अथवा शेर उसका आखेट करनेको उसके समीप पहुँच जाता है कहीं भागनेकी युक्ति नहीं देखता तो ऐसा कार्य करता है कि, अपनी नाभीकी मुश्कको उस शेरकी ओर ऐसे वेगसे चलाता है कि, उस सुगंधसे शेर अथवा भेड़ियेका माथा फट जाता है जिससे वह मर जाता है। उस कस्तूरीकी सुगंध उसके मस्तकको फाड़ डालती है जिससे लहू आने लगता है, वह उसी समय मर जाता है। मनुष्य इस प्रकार उसका आखेट करते है कि, दो मनुष्य पर्वतपर चढ़ जाते हैं एक तो बन्दूक भरकर छिपके बैठ जाता और दूसरा स्वर तालके साथ गाने लगता है। वह जब राग गाने लगता है तो उसके सुननेके लिये मृग शिकारीके समीप आजाता है, राग सुननेमें आत्म विस्मृत कर जाता है। उसी समय बन्दूकधारी छिपा हुआ मनुष्य फँर करता है। गोली लगतेही वह गिरकर तड़पने लगता है। आखेट करनेवाला दौड़कर उसकी कस्तूरीकी थैली काट लेता है। यदि उस थैलीको शीघ्रही न काटे वह मुश्क जो बिलकुल रक्त है समस्त शरीरमें फैल जावे हरिणका मांस कड़वा हो जाये खानेके योग्य न रहे। तथा कस्तूरी भी हाथ न लगे। दूसरी युक्ति यह है कि, जब वह मृग पर्वतके नीचे जल पीने उतरता है तो छिपकर बन्दूकसे मार लेते हैं।

पंचकमें घासका त्याग—भारतवर्षमें लोग इस प्रकार कहते हैं कि, यह मृग प्रायः चींटे और चीटियोंके बिलपर बैठता है। चाहता है कि, चीटियां मुझको काटा करें जिसमें मुझे नींद न आवे मेरी अचेतावस्थामें आखेटकर्ता मुझको मार न ले। यह भी सुना है कि, भद्रा (पंचक) के पांच दिन होते हैं। उन दिनों भारतवासी घास फूसका कुछ काम नहीं करत। पण्डित लोग तो इन दिनोंको

इस्मारमन साहिबका मत होप साहबका कथन कच्चे मांस खिलानेका दोष-शेरका प्रेम

पत्रा देखकर जाना करते हैं पर यह मृग आपसे आप जाना करता है। जब पंचक लगते हैं उसी दिनसे मृग घास नहीं चरता वह मृग पंचकके दोष तथा गुणोंको भली प्रकार जानता है पांच घड़ी घास फूसका बिलकुल काम नहीं करता।
बकरी।

कितनेही मनुष्य बकरियोंको सिखलाते हैं, जिससे वे बड़ेही विचित्र कौतुक दिखाती हैं। इसकी बुद्धि अच्छी होती है। विषैली घासों तथा पौदोंको भली प्रकार पहचानती है, उनको कदापि नहीं खातीं। सुना जाता है कि, बकरियोंमें भविष्यका हाल जाननेकी शक्ति भी होती हैं। क्योंकि, जहाँ कहीं अनेक दिवसोंसे बन्द पड़ा भी कुआँ हो छिप गया हो, यदि उस स्थानको लोग जानने कुर्वेका पता लगाना चाहें तो बकरियोंके झुण्डको उस स्थानपर लेजाके बैठ देते हैं जब सब बकरियां जाती हैं तो छिपे कुर्वेके चारों ओर घेरा बाँधकर बैठ जाती हैं। जहाँ पर वह कुर्वा होता है उस भूमिपर एक भी नहीं बैठती छिपे हुये कूएँ के चौगिर्द बैठती हैं।

कथा सुननेवाली—फीरोजपुर जिलेके लखौके मौजेमें वेदी साहब कथा कहते थे। उसको सुनने अनेक मनुष्य एकत्रित होते थे। एक बकरी भी कथा सुननेको आया करती थी। कथा आरम्भ होनेके पूर्व बकरी आया करती थी। जबतक वह कथा होती तबतक खड़ी होके सुना करती थी। कथा होजानेपर सब लोग चले जाते सबसे पीछे वह बकरी जाया करती थी।

सदनाको उपदेश—सदना नामक एक कसाई था। एक दिन उसके घर एक अतिथि आया। उसने बिचारा कि, यदि बकरा मारूं तो ठीक नहीं उसका अण्डकोष काटलूं तो अतिथिके लिये यथेष्ट होगा। जब वो काटनेको तैयार हुआ तो बकरा बोला कि, ए सदना ! यह बात अच्छी नहीं। कितनी बार तुमने मेरा शिर काटा है मैंने तुम्हारा काटा है। तुम मेरा शिर काट लो अण्डकोष मत काटो। यह बात सुनकर सदना को ज्ञान आगया कसाईका काम छोड़कर परम भक्त हो गया।

भेड़।

भेड़ बकरीकीही एक जाति है। उसकी बुद्धिकी अनेक कहानियां कही जाती हैं। कप्तान ब्राउन साहबका कथन है कि, भेड़ोंको स्वदेशसे बहुत प्रेम होता है।

स्वदेश प्रेम—एक मनुष्यने अपनी भेड़को दूसरेके हाथ बेच दिया। खरीददार भेड़को अपने घर ले गया। वहाँ भेड़को स्वदेश याद आया वह जहाँ

रीछ और शेरकीमैत्री, तेंदुआ

गई जहां रहती थी वहांसे उसका देश नौ दिनकी यात्राका मार्ग था । भेड़ वहांसे चली उसका बच्चा उसके साथ था । बच्चा थक कर पीछे रह जाता तो प्रेमके साथ फिर उसको साथ लेकर फिर आगे चलती जिस समय वह अष्टरालिंग नगरमें पहुँची थी वहाँ वार्षिक मेलेका दिन था । भेड़ मेलेमें नहीं घुसी नगरके किनारे बैठी रही, बड़े तड़के उसने अपनी राहली । केवल एक कुत्तोंने उसको एक स्थान पर चारों ओरसे घेरा पर उसने उनका सामना करके फिर अपनी राहली । एक मनुष्यने उसको भटकी हुई समझकर पकड़ रक्खा पर किसी प्रकार उसके हाथसे भी निकल कर वह फिर आगे चली जहां उसके जानेकी इच्छा थी वहाँ जा पहुँची ।

एक साहब सड़क पर भ्रमण करता हुआ चला जाता था । उसके पास एक भेड़ मिमियाती चिल्लाती हुई आई उसका मुहँ ताकने लगी उसने जान लिया कि, यह भेड़ मेरी सहायता चाहती है । वह साहब घोड़े से उतरकर उसके साथ हो लिया । भेड़ आगे आगे चली उसको एक स्थानमें ले गयी । वहां जाकर देखा कि, भेड़का बच्चा दो पत्थरोंके बीचमें फँसा है । उसका पांव ऊपरको है और वह तड़प रहा है साहबने उस बच्चेको निकाल कर उसकी माताको सौंप दिया । उसकी माता अपनी भाषामें धन्यवाद देनेके साथ साहबको कृतज्ञता भरी दृष्टिसे देखती हुई अपना बच्चा लिये चली गई । यह बात ब्राउन साहबकी नेचरल हिस्ट्रीमें लिखी हुई है ।

लोमडी

लोमडी बहुत ही चैतन्य होती है । किताबोंमें इसकी अनेक बातें लिखी हैं । लोमडियोंको भविष्यका बहुत ध्यान रहा करता है क्योंकि, वे जो कुछ खाती हैं उससे बचे भोजनको स्थान स्थान पर गाड़ देती हैं । उस पर चिन्ह भी कर देती हैं, जिसमें वह स्थान भूल न जाय अपनी गड़ी हुई जमाको भली भाँति पहचान ले । जब उनका मन चाहता है निकाल कर खा लेती हैं—बड़ी बुद्धि-मानीसे सचेत होकर आखेट करती हैं ।

बिल्ली और डायन

बहुत दिवसोंसे लोगोंका ऐसा ध्यान है कि, बिल्लियां जादूगार स्त्रियोंके साथ रहा करती हैं । वे ऐसा भी समझते हैं कि, स्वयम् डाइन बिल्लियोंके रूपमें होती हैं । डायन दुराचारिणी, भ्रष्ट तथा भाँति भाँतिके छलकपटोंसे भरी हुई रहती हैं । वे किसी छिपे हुये कार्यमें अथवा यात्राके लिये जाती हैं तो बिल्लीके स्वरूपमें होकर भ्रमण करती हैं ।

शेरका बच्चा हाथी, सीलोनका हाथी

लांडकी डाइनबिल्ली—एक बार लांड कोचरेन साहब उत्तरसागरके यात्रा कर रहे थे। उनके साथ एक काली बिल्ली भी थी। वह ऋतु बहुतही खराब था सदैव तुफान आया करता था वायु ठीक नहीं बहती थी। जहाजवाले इस प्रकार कहने लगे कि, सारी आपत्तियां उसी काली बिल्लीके कारण है जो कि, लांड साहबके साथ है। यह बात लांड साहबसे कही गई कि, आपके साथ जो काली बिल्ली है यह डायन है। साहबने कहा कि, यह तो भ्रम है पर जो तुम्हारी ऐसीही इच्छा है तो इसको पानीमें डाल दो। यह बात सुनकर सब मनुष्य भयभीत हो निवेदन करने लगे कि, साहब। ! ऐसा कार्य न कीजियेगा। जब आप इसको समुद्रमें फिकवाओगे तो वह और उपद्रव करेगी जिससे हम लोगोंके प्राणोंपर आपत्ति आवेगी। इससे यही उचित है कि, आप इस बिल्लीको दुःख न दीजिये, सुखसे रहने दीजिये। उन्होंने कहा कि, यदि आप इस बिल्लीको न छोड़ेंगे तो हमको आशा है कि, हम लोग कुशलपूर्वक अपने देश इङ्ग्लिस्थानको पहुँच सकेंगे। काली बिल्लीको लोग प्रायः डायन समझते हैं।

रक्तदानसे आपत्ति—उपरोक्त पुस्तकका लेखक यह भी लिखता है कि, एक बार एक गँवारिन हाथमें एक प्याला लिये मुझसे कहने लगी कि, मुझको आप अपने काली बिल्लीके बच्चेकी पूछमेंसे रक्तकी कुछ बूंदें दीजिये जिसमें मेरे घरके चूल्हेमें बरकत आ जाय बला दूर हो। दूसरी स्त्रीने आकर मुझसे कहा कि, सावधान ! भूलना नहीं काली बिल्ली कदापि अपने पाससे पृथक् करना न रक्त देना। यदि उसको बाहर करोगे तो उसीके साथ सौभाग्य और बरकत भी बिदा हो जायगी।

डायनकी सवारीकी शंका—कप्तान ब्राउन साहब कहते हैं कि, स्काटलैण्डके लोगोंका यह नियम था कि, वहाँके दालानोंमें लोग अपनी बिल्लियां बांध बांध कर रखते थे। वे अनुमान करते थे कि, आज की रात डायन बिल्लियोंपर सवार होगी इसी कारण उनसे अपनी २ बिल्लीको बचानेके लिये युक्तियां करते थे। जो लोग यह सावधानी करना भूल जाते थे, वे आपत्तिमें पड़ते देखते कि, उनकी बिल्लियां घरसे निकल कर बनमें भागी जाती हैं। प्रत्येकके ऊपर डायने सवार हैं नारवेंकी बड़ी सड़क पर चली जाती हैं। काली बिल्लीका अङ्गरेजीमें बहुत कुछ विवरण है, इंग्लैण्ड, स्काटलैण्ड और आयरलैण्डके मनुष्य इसके विषयमें अनुमान करते हैं कि, इसके कारण कितनीही आपत्तियां आती हैं कितनीही दूर हो जाती हैं। यह भी अनुमान करते हैं कि, बिल्लियां, मनुष्योंकी तरह बातें किया करती हैं। लेखक लिखता है कि, मैंने लण्डन अपने घरके पिछवाड़े अनेक बिल्लि-

हाथीकी उग्र कृतज्ञता, पुत्रसे प्रेम, बनेलेकी बुद्धिमत्ता मक्कारीका बदला, शिकारीको दण्ड

योंको एकत्रित देखकर निश्चय कर लिया कि, ये सब किसी गूढ़ परामर्शके लिये यहां इकट्ठी हुई हैं। आपसमें वार्तालाप करके कुछ निश्चय कर रही हैं।

बिल्लियोंका प्रेम—मेरे भाईके पास एक बिल्ली थी। वह उनसे बहुत प्रेम रखती थी। एकबार यात्रा करने गये उसको घर पर अपने मित्रोंके पास छोड़ गये। दो वर्षके पीछे जिस दिन उनके आनेकी आशा थी, लोग उसी दिन उस बिल्लीको बहुत बेचैन देखके चकित हुये। सब लोगोंने पहले वह गाड़ीकी खड़खड़ाहट सुनकर चाहती थी कि, पहलेही से जाकर अपने स्वामीसे मिले, उस दिन उसको बहुत हर्ष था। दूसरे दिन जाकर अपने स्वामीके मोंढेपर बैठे जैसे कि, वह पहले जाके बैठा करती थी जिस दिन बिल्लियोंका स्वामी मरा, उस दिन उसकी सारी बिल्लियोंने उसकी कब्र पर जाके अपने प्राण त्याग दिये।

चीलके रूपमें डायन—ये डायने बिल्लियांही नहीं बरन अन्यान्य जीवधारियोंके स्वरूपमें भी होती हैं, सुतरां फीरोजपुरके जिला दूध मौजेमें मैं था। वहांके लोग कहने लगे कि, काकूसिंह नामक साहूकार गांवके बाहर कहीं जाता था। एक दिन गांवसे बाहर उजाड़में उसको कड़ी प्यास लगी। वहां कहीं भी पानी नहीं मिला इस कारण तूषासे गिरकर अचेत हो गया। डायनके नामसे विख्यात एक तरखानी स्त्री, काकूसिंह के घर पर जाकर समाचार दिया कि, अमुक उजाड़ में काकूसिंह प्यासका मारा अचेत होकर पड़ा हुआ है। उसके घरके लोयसवारी तथा पानी लेकर शीघ्रही उसके पास पहुँच गये, उसके मुँहपर पानी छिड़का और पिलाया वह शीघ्रही चैतन्य हुआ। उसको सवार कराके घर लाये। वहां आने पर काकूसिंहने लोगोंने पूछा कि, जहां मैं अचेत होकर गिरा था वहां तो कोई मनुष्य नहीं था तुम लोगोंने मेरी बेहोशीका समाचार किस प्रकार मिला? लोगोंने कहा कि, अमुक तरखानीने कहा है। काकूसिंहने कहा कि, वहां कोई मनुष्य नहीं था केवल एक चील एक जुण्डके बूक्षपर बैठी थी। अतः जान पड़ा कि, डाइन चीलका रूप धरे है।

उल्लूके रूपमें डाइन—कलावंतोंने उल्लुओंकी आवाज को अपने रागके साथ संयुक्त किया है, पुस्तकोंमें उल्लुओंकी बोलीको बरबादीका चिन्ह लिखा है। तथा अपवित्र पक्षी कहा है। डायन स्त्रियां उल्लुओंके स्वरूपमें भी फिरा करती हैं। अलेमान देशकी स्त्रियां भांति भांतिकी जादूटोने करती हैं। स्त्रियोंकी जादूगर उल्लू समझा करते हैं। उल्लू जादूगर स्त्रियां समझी जाती हैं। ऐसेही बङ्गाल देशकी स्त्रियां और उत्तरीय पर्वतोंकी स्त्रियां जादूके काममें अत्यन्त चतुर होती हैं।

आसक्ति

बिल्लीके रूपमें घात—बिल्लियां छोटे छोटे लड़की लड़कोंको मार लेती हैं। कभी कभी युवक स्त्री अथवा पुरुषको भी मार लेती हैं पर किसीको यह सुधि नहीं रहती कि, यह डायन है अथवा बिल्ली है कौन ?

स्त्रीकी हत्या — इसी किताबमें लिखा है कि, एक स्त्री सहसा चिल्ला कर पृथिवीपर गिरकर तड़पने लगी। लोग बाहरसे दौड़े आये देखा कि गला काटा हुआ है, रक्त बह रहा है। लोगोंने इधर उधर देखा तो कोई कारण न दिखाई दिया। न जान पड़ा कि, किस प्रकार उसका गला कटा। पर छतके ऊपर एक भयानक बिल्ली बैठी थी उस स्त्रीकी ओर क्रोधित होकर देख रही थी। इससे जान पड़ा कि, उसी बिल्लीने उसका गला काटा था। भारतवर्षमें डायन स्त्रियाँ लड़के तथा लड़कियोंके कलेजे बड़ी विधिसे खाया करती हैं।

चीलके रूपमें बूढ़ी डाईन — सेण्ट जान साहब डायनकी एक विचित्र कहानी लिखते हैं। वह इस प्रकार है कि, एक बूढ़ी स्त्री एक बनमें रहा करती थी। जहाँ वह रहती थी वहाँ एक झील थी डायन मनुष्य तथा पशु दोनों को बड़ी हानि पहुँचाया करती थी। उस परगनाके लोगोंने उस डायनको बहुत रोकना हटाना चाहा अनेक बार आत्मिक युक्तियोंद्वारा उसे परास्त करना चाहा उसपर आक्रमण, किया। अन्तमें वह कहीं छिप गई किसीको कुछ न जान पड़ा कि, कहाँ चली गई कहीं आस पासमें है वा नहीं दूरपर है। उसीके कारण मनुष्य तथा पशुओंमें सैकड़ों ही रोग होते थे। अन्तमें एक मनुष्यने देख लिया कि, वह झीलके किनारे पत्थरों के समीप उड़ उड़ कर फिरती है। लोग भली प्रकार ताड़ने लगे वह प्रायः जाती आती और फड़फड़ाती जान पड़ती थी। अनेक बार लोगोंने उसको गोली मारी पर नहीं लगी।

बमूलेके रूपमें मारा—आखिर एक वीर पुरुषने यह स्थिर किया कि, मैं इसको मार कर देशको आपत्तिसे बचाऊंगा। लोगोंसे कहा कि, मैं निश्चय विजय प्राप्त करूँगा। इसी कारण वह बन्दूक भर कर जहाँ वह रहती थी उसी पर्वत पर छिप कर बैठ गया। प्रतीक्षा करने लगा कि, डायन आवे तो मैं उसे गोली मार दूँ। सारी रात बीत गई मदिराके नशेसे वह वहाँ बड़ी चौकसीसे बैठ रहा था। अन्तमें बड़े घोर वायुमें एक विचित्र शब्द सुना देखा कि, डायन बगुलाका स्वरूप धारण किये उसी सिपाहीकी ओर चली आती है। सिपाही विचारने लगा कि, यदि मैं अपने घरमें होता तो अच्छा था क्योंकि, उसके हाथ सर्दीसे इतने अकड़ गये थे कि, वह कठिनतासे बन्दूकका घोड़ा दबा सकता था। अन्तमें वह डायन उसके शिरपर पहुँची उसने बन्दूक चलाई। प्रातःकाल लोग आये तो देखा

बच्चेका मां पर प्रेम, शिक्षण दरजीको दण्ड

कि, वह अचेत पड़ा है उसकी बन्दूक फट गई है गर्दनकी हड्डी टूट गई है । एक बहुत बड़ा बगुला मरा पड़ा है उसकी देहमें गोली इस पारसे उस पार निकल गई है । उसके समीप ही मृत बगुले को पड़ा देख कर लोगोंको निश्चय होगया कि, यह बगुला जादूगरनी स्त्री ही है ।

निष्कर्ष — इसी प्रकार सहस्रों सिद्ध साधु ऋषि मुनि तथा राक्षस जादूगर इत्यादि पशु पक्षी और हिंसक पशुओंके स्वरूपमें फिरते रहते हैं । इसमें उनको कोई नहीं पहचान सकता । जो जाने सो ही पहचाने, दूसरेका कुछ वश नहीं चल सकता । यह बात विद्या तथा मन्त्रोंके द्वारा प्राप्त हो सकती है यह केवल एक सिद्धि है दूसरा कुछ नहीं है । सिद्ध पशुके स्वरूपमें होकर अपना काम बनाकर पृथक हो जाते हैं । जैसे शेर बन गये अपने वंशीको मार लिया । लोगोंने जाना शेरने मारा है आप अलगके अलग बने रहे ।

अन्तर्धान होना — एक साधुने मुझसे कहा था कि, एक कोढ़ी मनुष्यकी चारपाईके सिरानेके दाहने पायेको पकड़कर एक बिल्ली खड़ी थी । उसने उसको बहुत हटाया पर नहीं हटी । वह पत्थर लेकर मारने दौड़ा । वहाँसे थोड़ी दूर पर एक बांसोंकी कोठी थी वह बिल्ली उधरको ही भाग गई । कोढ़ी उसके पीछे दौड़ा । बिल्ली बांसोंकी कोठीसे तीन चार हाथके अन्तर पर ही अन्तर्धान हो गई । चाँदनी रात थी गर्मियोंका दिन था । उसको बहुत दूँढ़ा पर पता न चला । यह डुमराव इलाकेके नाट नामक गांवकी बात है ।

विज्जू ।

एक प्रकारका जीव होता है । यह भारत वर्षमें कवरिस्तानोंके पास अधिकता से पाया जाता है यह गड़े मुर्देको निकाल कर खाया करता है इसका कद बिल्लीके कदसे कुछ ही बड़ा होता है यह पेड़पर चढ़कर चील्होंके बच्चोंको भी खाजाता है ।

विज्जूओंका परस्पर प्रेम — फ्रांस देशमें दो मनुष्य यात्रा कर रहे थे उनके साथ एक कुत्ता भी था, उस कुत्तेने विज्जूको उठा दिया उन मनुष्योंमेंसे एकने उसे बन्दूकसे मार दिया । वे उसको घसीटकर गांवले चले । थोड़ी दूर चले थे कि, पीछेसे एक दुखी विज्जूका करुण शब्द सुनाई दिया । वो निडर होकर मृत विज्जू के ऊपर चढ़ गया लोग उसे हटानेकी चेष्टा करने लगे पर प्रेमके दीवाने विज्जूने अपने जीवनका मोह छोड़ रखा था उसे सिवा अपने प्यारे बीजूके दूसरा कुछ भी नहीं दीखता था जब अनेक प्रकारकी कोशिशें करनेपर भी उसने मृत विज्जूको न छोड़ा तो पाषाण हृदय शिकारियोंने अपनी भयंकर बीभत्सना परिचय देकर उसे भी मार डाला । सहृदय संसारने मानवी वंबरताका दृश्य देख दुखीके प्रेमपर दो आंसू बहा दिये । बीजू प्रेमपर विशुद्ध बलि करके सबाके लिये अमर हो गया ।

लिपी, गेंडा, बेफीगाकी सहायता, ऊंट ऊंटकी प्रतिहिंसा

उपसम ।

उपसम एक छोटा पांच इञ्चका लम्बा जानवर होता है । यह अमेरिका देशमें उत्पन्न होता है, उसके ऊपर बड़े बड़े बाल होते हैं वे बहुत सुन्दर तथा मुलायम होते हैं । उसको शिकारी पकड़ते हैं वह उनके वशमें आजाता है वह ऐसा कपट करके पड़ जाता है कि, मानों मर गया । शिकारी उसको छोड़ देते हैं । छुटकारा पातेही वह उठकर तुरंत भाग जाता है ।

चूहा ।

उपरोक्त पुस्तकमें एक मनुष्यका हाल लिखा है कि, मैं लंका टापूकी सैर कर रहा था । एक दिन मैंने अपने कुत्तेको चूहे पर छोड़ा । कुत्तेने चूहेको पकड़ लिया । उस समय चूहेको देखा तो मरा हुआ दिखाई दिया । उसके अङ्ग प्रत्यङ्ग ढीले तथा अशक्य जान पड़ते थे उसमें प्राणका तनिक भी चिह्न नहीं था । उसको छोड़ दिया । वह चूहा समय पाकर इतनी जोरसे भागा कि, उसकी गतिको कोई पहुँच न सकता था ।

श्वेत चूहा — जेसी साहब श्वेत चूहोंके विषय पर लिखते हैं कि, पादरी फ्रीमन साहब साँझको घूमनेके लिये बाहर चले जाते थे । उसने ऐसा कौतुक देखा कि, अनेक चूहे एक स्थानसे दूसरे स्थानको चले जाते हैं । वे खड़े होकर कौतुक देखने लगे । चूहोंकी भीड़ उनके समीप होकर चली गई अन्तमें उन्होंने देखा कि, पीछेसे एक बूढ़ा और अन्धा चूहा चला आता है । वह अन्धा अपने मुँहमें लकड़ी पकड़े हैं । लकड़ीका दूसरा सिरको आंखवाला चूहा अपने मुँहसे पकड़े लिये जाता है । अन्धा चूहा सब चूहोंके साथ बराबर चला जाता है वह लकड़ी पकड़ने वाला चूहा अन्धेका पथदर्शक तथा मजबूत रक्षक था ।

एक अङ्गरेजी पुस्तकमें लिखा है कि, नोबिन नामक एक लड़का था । उसको किसी मित्रने बहुमूल्य तेलकी कुछ शीशियां दीं । उसने वे लेकर अपनी कोठरीके एक कोनेमें रख दीं । दूसरे दिवस जाकर देखा तो दो शीशियां खाली थीं । उस समय उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि, यहां तो किसी दूसरेकी पहुँच नहीं थी, मेरी शीशियां कौन खाली कर गया ? वह चुपचाप एक कोनेमें बैठ गया । एक घण्टेके बाद देखता है कि, तीन चूहे एक बिलमेंसे निकल शीशियोंकी ओर गये । उनमेंसे एकने अपने पिछले दोनों पैरोंको भूमिसे लगा अगले दोनों पैरोंसे शीशीको दृढ़ता पूर्वक पकड़ लिया, दूसरा चूहा उसके शिरपर चढ़ गया । अपने दांतोंसे शीशीका ढक्कन खोल दिया । उसने अपनी पूँछको शीशीके भीतर डुबोया

ऊंटनीका मोह, चूर २ कर दिया

पृथिवी पर तीसरे चूहेको चुसाया । इस प्रकार बारम्बार अपनी पूँछ डुबाकर उसको चुसाता गया । जब उस चूहेका पेट भर गया, उसने शीशीको पकड़ लिया । शीशी पकड़नेवाला पृथिवीपर बैठ गया ऊपरवाला उसको तेल पिलाता गया । फिर नीचेवालेका पेट भरतेही ऊपरवाला नीचे आया । नीचेवाला ऊपर गया । इसी प्रकार उस ऊपरवालेने नीचेवालेका पेट भर दिया । इसी प्रकार तीनों पेट भरकर दोनों शीशियोंको खाली करके अपने बिलमें चले गये ।

सन् १८२९ ई० में बहुत बड़ी बाढ़ आयी. लोग बाढ़को टड़न नदीके किनारे पर खड़े देख रहे थे । देखा कि, एक हंस पानीपर पैरता चला आता है उसकी पीठपर एक काला दागभी दिखाई दे रहा है । वह हंस समीप आया । लोगों को उसकी पीठपर एक चूहा दिखाई दिया । जब वह हंस पृथिवीके समीप पहुँचा चूहा हंसकी पीठसे उतरकर भाग गया । हंसकी दयासे बाढ़से बचकर चूहा अपने प्राण बचा सका ।

अमेरिकाके एक मासिकपत्रमें यह हाल लिखा था कि, कुछ अङ्ग्रेज अफसर पोर्टस्मिथके पास आगके निकट बैठे थे, उनमेंसे एकने गाना-बजाना आरम्भ किया दश मिनिट भी न बीते होंगे कि, एक छोटीसी चूहिया निकल आई । लोग देख रहे थे कि, जिस जिस ढङ्गसे राग और ताल टूटता था उसी ढङ्गसे वह कूदती उछलती हुई प्रसन्न होती थी । इसके पीछे चूहिया अचेत होकर गिर पड़ी और मर गई । उसके दुःख दर्दका चिह्न भी जाता रहा कुछ कारण भी न जाना गया कि, क्यों मर गई ।

डाक्टर कारपेण्टर साहबका कथन है कि, एक स्त्रीने अपनी आँखों देखा कि, चूहोंका एक झुण्ड बच्चोंको आगले पञ्जोंमें दबाये एक घरसे दूसरे घर चला जा रहा है । जब वे प्रत्येक सीढ़ीपर पहुँचते थे तो एक दूसरेको बच्चा पकड़ा देते थे । इस प्रकार अगला अपने अगलेको दूसरा अगला अपने अगलेको पकड़ाता, इसी प्रकार सब सीढ़ीके ऊपर चढ़ते और उठाये चले गये । जिस बरतनमें उनका मुँह तथा पञ्चा पहुँच नहीं सकता था, उसमें वे अपनी पूँछ डुबा देते दूसरे साथी चूहोंको चखाते जिसमें स्वाद द्वारा मालूम हो जावे कि, इस बर्तनमें किस प्रकारकी वस्तु है उसका मित्र गन्ध तथा स्वादसे तुरन्तही जान लेता कि, अमुक वस्तु इसमें बन्द है, लेने योग्य होनेपर उसके लेनेकी चिन्ता करते ।

लाहौर जिलेके सुरसिंह नामक गांवमें एक जमींदारकी स्त्रीकी नथ जाती रही । उसने जान लिया कि, कोई चूहा लेगया होगा । उसके जमींदारने मदिराका प्याला भरकर चूहेके बिलपर रख दिया । चूहे मदिरा पीकर प्रसन्न हुए नथ बिलके बाहर रख गये ।

घ्राणशक्ति हवसियोंकी घ्राणशक्ति, घोड़ा, गोरखर

भारतवर्षमें विख्यात है कि, चूहोंको भविष्यका ज्ञान होता है क्योंकि, जिस मकानमें आग लगनेवाली होती है, उससे चूहे पहलेसेही निकल जाते हैं, वह मकान चूहोंसे खाली हो जाता है चूहे कुछ हानि करते हैं उनको गाली देनेसे वे घातक हो जाते हैं अधिक हानि किया करते हैं जो उनकी खुशामद करे तेल आदिका हलवा खिलावे तो कम हानि होती है ।

मैंने सुना था कि, एक गडेरिया भेड़ बकरियां चराता था । उसने एक झाड़ीमें ऐसा कौतुक देखा कि, एक चूहेने बिलसे निकालकर एक काला पैंसा बाहर रख दिया । इस प्रकार कई बार बिलके भीतर गया एक एक पैंसा बाहर लाकर रखता गया । जिससे बहुतसे पैंसोंका ढेर लगा दिया । उसे देखकर चूहा बहुत प्रसन्न हुआ । ढेरके इर्द गिर्द घूमने लगा । फिर उन पैंसोंको बिलके भीतर ले गया, गडेरिया यह कौतुक देख रहा था । उसने जान लिया कि, चूहा उनको बिलके भीतर ले जाना चाहता है वह ललकार कर दौड़ा । चूहा भयके मारे सूराखके भीतर घुस गया । गडेरियेने काले सिक्कोंको उठा लिया उन पैंसोंको भली प्रकार भलकर देखा तो चांदीके रुपये निकले । गडेरिया सांझको भेंड़ोंको लेकर अपने घर आया, सारे मनुष्योंसे चूहेका हाल कहा । गांवके लोग दौड़े आये अधिक द्रव्य प्राप्त करनेके लालचसे बिलको खोदा तो वही एक रुपया मिला जो भीतर लेगया था अधिक कुछ नहीं मिला चूहा भी अपने धनके शोकसे आखिरकार मरही गया ।

सर्प ।

भारतके इतिहासमें सर्पोंकी भी अनेक बातें मिलेंगी रामायण महाभारत भागवत और वेदोंमें सर्पोंकी अनेकों घटनाएं मिलती हैं । पृथ्वीके धारण करने वाले शेषनागसे लेकर भूमिपर फिर फिरकर मूषे खानेवाले तक इस जातिमें आजाते हैं । हिन्दू संस्कृतिमें नाग एक देवयोनि विशेष मानते हैं, इनके लोकको नागलोक कहते हैं इनकी अनेकों जातियां हैं, यहां उन्हींका कुछ वर्णन करते हैं ।

सर्पोंके राजा — यह समाज भी मानव समाजकी तरह ही है जैसे मनुष्योंमें नरपति होते हैं उसी तरह अहिरोंमें भी अहिपति हुआ करते हैं उनके राजाके व्यवहार भी वैसेही हैं वासुकि आदि सर्प जातिके राजेही तो हैं । पर ये तो बड़े राजे हैं, इनके सिवा और भी अनेक छोटे छोटे राजे होते हैं जो भूमण्डलपर भी रहा करते हैं ।

सर्पसभा — सन् १८३५ ई० की एक बात इस प्रकार सुनी गई थी कि, एक ब्राह्मण राजपूताना शङ्खावारीका रहनेवाला था । अकालमें देश छोड़कर दक्षिण हैदराबादको गया, क्योंकि वहाँ उसके यजमान रहते थे । यजमानोंने

घोड़ोंके दो झुण्ड जंगली घोड़े और भेड़िये अरबी सरदारका घोड़ा वाजीगरोके घोड़े

ब्राह्मणकी सली प्रकार सेवा नहीं की, न कुछ दियाही, तब वह निराश होकर वहाँ से लौटा आ रहा था उजाड़में पहुँचा वहाँ घोर बन था दूर दूर तक बस्ती नहीं थी। उसमें बटका बहुत वृक्ष दिखाई दिया ब्राह्मण बट वृक्षके नीचे पहुँचा देखा कि, आठ दश मनुष्य झाड़ू दे देकर भली प्रकार सफाई कर रहे हैं। ब्राह्मणने उनसे पूछा कि, तुम कौन हो, क्यों सफाई करते हो ? उन लोगोंने उत्तर दिया कि, हम सांपोंके ब्राह्मण हैं, सब सर्प हमारे यजमान हैं। यहाँ हमारे अनेक यजमान रहते हैं। हम उनके लिये यह स्थान साफ कर रहे हैं, रातके समय हमारे सब यजमान यहाँ आवेंगे। यदि तुम गाना बजाना सुनना चाहते हो तो इसी स्थान पर रहो पर भयभीत न होना, मेरे यजमान आवें तो निडर होकर बैठे रहना वह ब्राह्मण इनके कहनेसे उस स्थानपर बैठा रहा। रातको राग, बाजा और बीन इत्यादि बजना आरम्भ हुआ। रातके दश बजेसे सांप आने लगे फर्श पर अपने अपने स्थान पर बैठने लगे। सभा जमी। बहुत सांप एकत्रित होगये। सांपोंके पुरोहितने बीचमें एक गद्दी लगाई। मानों वह राजसिंहासन था जो बहुत टीप टापके साथ रक्खा गया था दूधसे एक कड़ाह भरकर रखा गया उसमें बहुतसी चीनी मिलाई गई। सब सांप आचुके तब एक बहुत बड़ा और महा प्रबल काला सांप आया, बीचके राज सिंहसनके पास आकर सिंहसनके समीप नीचे अल्पकाल तक बैठकर फिर चला गया इसके पीछे वही सांप फिर आया। पृथिवीसे हाथ भर ऊँचा शिर उठा ऊपर छत्री फैलाये हुए चला आता था उसके शिरपर एक वित्तेभरका अत्यन्त सुन्दर श्वेत सर्प बैठा था। वही सबका राजा था सब सांपोंने उठकर उसकी बहुत प्रतिष्ठा की। काले सांपने अपना शिर सिंहसनसे लगा दिया बादशाह काले सांप के शिरसे उतर कर सिंहसन पर बैठ गया। राग तथा गीत इत्यादि सुनने लगा। दूसरे सर्प राजाके ईर्द गिर्द बैठे हुए नम्रता पूर्वक गाना सुन रहे थे। थोड़ीसी रात रह जाने पर सांपोंका राजा दूध पीकर चल दिया। उसके पीछे दूसरे सर्पभी अपनी पदवीके अनुसार दूध पी २ कर चले गये। सबेरा होगया उस दिन भी उन आदमियोंने उसी स्थानपर डेरा किया। दूसरी सांझ हुई उसी प्रकार राग रंग आरम्भ हुआ। उसी प्रकार सब सर्प आने लगे, गये दिनके समानही सर्पोंकी सभा जम गई। जो सर्प आता था वे अपने मुँहसे अर्शाफियां उगलता जाता था। वहाँ फर्श पर अर्शाफियोंका ढेर लग गया सांपोंका पुरोहित ब्राह्मण प्रत्येक नागके घरानेका नाम ले लेकर उनकी प्रशंसा करता जाता था। उन सर्पोंके घरानेके नाम और चिन्ह उनके पास लिखे थे। सर्पोंका बादशाह आया तो उसने भी मुँहसे एक अमूल्य मोती उगल दिया। एक सांपने दो अर्शाफियां ब्राह्मणके सामने धरदी ब्राह्मणने दोनों

बैल, सांड, बछड़ा और गऊ

अशॉफियोंको उठाकर अलग रख दिया कहा कि, मैं तेरी दक्षिणा स्वीकार नहीं करूँगा वह सर्प लौट गया। फिर दश अशॉफियां लाकर पुरोहितके सामने रखवीं पर वह प्रसन्न नहीं हुआ कहने लगा कि, मेरा यजमान बहुत धनाढ्य है उसने मुझको कभी कुछ नहीं दिया मैं इतनेमें मैं उससे प्रसन्न नहीं। अनेक सर्प उस पुरोहित की खुशामद करने लगे अन्तमें यह बात बादशाहके सामने उपस्थित हुई बादशाह की आज्ञा पाकर पुरोहितने उनकी बारह अशॉफियां स्वीकार करली सभी सर्पोंके दक्षिणा देचुकनेके बाद सबेरा होते ही बादशाह दूध पीके चला गया इसके पीछे सभी सर्पोंने दूध पी २ कर अपनी अपनी राह ली। सबेरे सर्पोंके ब्राह्मणने राज-पुतानेके ब्राह्मणको कुछ रुपये साथ अशॉफियां देकर बिदा किया कहा कि, तुम्हारे देशमें भी हमारा एक यजमान राजा रहता है। हम आज तक उसके पास कभी नहीं गये। वह नारनोल नगरके ढोसी पर्वतमें रहता है।

ढोसीपर्वतका नागराज - योगियोंने जान लिया कि एक अत्यन्त बलिष्ठ सर्पराज ढोसीके पर्वतमें रहता है। एक योगीने चाहकि, मैं किसी प्रकार उस सर्पको पकड़ूँ। उस पर्वत पर जाकर मंत्र पढ़कर बीना बजाने लगा। उस सर्पने एक ऐसी फुँफकार मारी कि, योगी राखका ढेर हो गया इसके पीछे उस योगीकी स्त्रीने विख्यात किया कि, जो कोई इस सोंपको पकड़े तो मैं उसकी अपनी दो पुत्रियां और बहुतसा धन दूँगी। इसी लालचसे अनेक योगी एकत्रित हुये। कच्चे बरतन पर्वत पर चुन दिये। मंत्र पढ़ना आरम्भ किया। उस सांपने फिर एक फुँफकार मारी सारे कच्चे बरतन लाल होगये। इस प्रकार योगियोंने अनेकों युक्तियां की पर वह सोंप न पकड़ा गया।

ग्रन्थकारकामत - मैंने अपने पितासे बचपनमें इस प्रकारके सांपोंके राजा की बातें सुनी थी पर उस समय मुझमें कुछ भी समझ नहीं थी, इस कारण वे बातें कहानी समझलीं पर अब सत्य जान पड़ती हैं क्योंकि, वस्तुतः सांपोंमें राजे तथा धनाढ्य लोग हैं उनके पुरोहित भी होते हैं जिनको कोई दूसरा धन्धा नहीं होता। केवल सांपोंसे धन लेकर अपना गुजारा किया करते हैं। सर्पोंकी अनेक जातियां हैं। उनकी आयु बड़ी होती है। उनमें सिद्ध होते हैं, मैंने सुना है कि, जब सर्प सहस्र वर्षका हो जाता है तो उड़कर मलयागिरि पर्वतपर चन्दनके वृक्षमें लिपट जाता है। कुछ कालतक उसमें लिपटा रहता है, उसके पीछे उसमें सिद्धि हो जाती है वह नाना प्रकारका स्वरूप बना सकता है। अपनी देह पलटकर मनुष्य आदिका स्वरूप धारण कर सकता है।

बालरूपीका वीनप्रेम - मैंने एक कहानी सुनी थी कि, एक पाठशालामें

बैलसे आदमीकी बातें पूर्वके साधु ज्ञानी बैल, साध्वी रामगऊ

अनेक बालक पढ़ रहे थे वहाँ पर योगी बीन बजाने लगा । अनेकों लड़के उसकी बीन सुननेको बाहर निकल पड़े बीन सुन योगीको कुछ दे अपनी राह लगे । एक लड़का खड़ा २ बहुत देरतक बीन सुन सुनकर प्रसन्न होता रहा फिर चुपकेसे अपनी जेबमेंसे पांच रुपये निकाल योगीको दे उसने भी अपनी राह ली । जब वह योगी अपने घर गया और अपने पितासे उसने यह बात कही। तब उसके पिता ने कहा कि, ऐ पुत्र ! वह नागवंशी होगा नहीं तो बीनका स्वर सुनकर तुमको पांच रुपया कौन देनेवाला है ? यह केवल सांपकाही कार्य है कि, वह बीनकी आवाज सुनकर बहुत हर्षित होता है । अच्छा, अब मैं जाकर उसको पहचान लेता हूँ । उसके पिताने पाठशालाके निकट जाकर बीन बजाना आरम्भ किया । लड़के बीन सुनने आये योगीको कुछ दे देकर अपनी राहली । वही बालक देरतक प्रसन्न हो होकर बीन सुनता रहा फिर योगीको उसी प्रकार पारितोषिक देकर चला गया योगी उःउके पीछे पीछे दूर मैदानमें गया लड़केने कहा कि, ऐ योगी ! तू किस अभिप्रायसे मेरे पीछे आता है तू जो मांगे सो दूँ, मेरा पीछा मतकर । बालक तथा उस योगीकी कहानी बहुत लम्बी है । लड़केने योगीको अनेक कौतुक दिखाये । अपनी बहुत सिद्धि प्रगट की योगीको प्रसन्न करके घर लौटा दिया ।

सांड बननेवाला सांप — इसी प्रकारकी एक बात और सुनी गई है कि, पंजाब फीरोजपुर जिलेके कब्रबच्छागाममें सबेरेके समय गांवके सब पशु जड़लमें घास चरने जाया करते । चितकवरा सांड बनमेंसे आकर उस झुण्डमें और आ मिलता था । समस्त दिन ढोरोके साथ चरता फिरता था । सांडके समय सारे पशु गांवको लौट आते, वह भी गांवके निकट तक आता, सारे पशु तो गांवके भीतर चले आते, वह बाहरसेही पुनः बनकी राह ले लेता । चरवाहे रोज यह कौतुक देखा करते । उससे अनेकों गायें गर्भिणी हुई थीं । उनसे उसी स्वरूपकी बछिया तथा बैल उत्पन्न होने लगे । सभोंका चितकवरा रङ्ग और आँखें गोल थीं । कुछ कालके पीछे एक योगी उस गांवमें आया । उसने उसका हाल सुना तो जान लिया कि, यह सांप है सांड नहीं है । योगी उसके पीछे पड़ा । एक दो दिनतक उसका कौतुक देखता रहा । निश्चय कर लिया कि, यह सांप है । एक दिन सांड गांवके समीपसे बनकी ओर चला, वह योगी दूरतक उसके पीछे चला गया । घने बनमें एक बिलके सामने पहुंचकर बैल पृथिवी पर लोट पोटक के सर्प बनकर उसमें घुस गया । योगीने भली प्रकार अपनी आँखोंसे देख लिया बिलको पहचान लिया । उसने जाकर दूसरे योगियोंको समाचार दिया । कई एक मन्त्र प्रवीण योगी वहाँ आ पहुंचे । उस सांपको पकड़ लिया । जब सांप अपने त्रिलमें गया उस समय योगियों

जंगमोका बैल, भ्वालेकी रखवाली

ने कच्चे बरतने लाकर उसकी बाम्बीके मुँह पर रख कर मन्त्र पढ़ना आरम्भ किया सर्प पर मन्त्रका प्रभाव होतेही उसने फूँफकार मारी बरतन लाल हो गये। योगियोंने उन बरतनोंको हटाकर दूसरे बरतन बांबीके मुँह पर रख कर मन्त्र पढ़ना आरम्भ किया, सर्पने फिर फूँफकार मारी, बरतन अधकच्चे रह गये। योगियोंने बरतन हटाकर कच्चे बरतन वहाँ रखे मन्त्र पढ़ना आरम्भ किया। फिर उसने फूँफकार मारी तो बरतन ज्योंके त्यों कच्चे रह गये एक भी नहीं पका। उन लोगोंने जान लिया कि, अब उस सर्पका विष दूर हो गया। इसके पीछे वे लोग सांपको पकड़ पिटारीमें रख कर मकान ले गये।

स्त्री बननेवाली नागिन — एक दिन ऐसी घटना हुई कि, उस बिलके समीप एक जर्मीदार चला जाता था। उसने देखा कि, एक स्त्री बिलपर बैठी रो रही है, उस जर्मीदारने पूछा कि, तुम क्यों रोती हो, स्त्रीने उत्तर दिया कि, मैं नागन हूँ, मेरे भाईको योगी पकड़ लेगये हैं मैं उसकी जुदाईसे रोती हूँ। यदि तू मेरे भाईको छुड़ाकर मेरे पास ला दे तो मैं तुझको बहुतसा धन दूँ। नागन जर्मीदारको एक स्थानपर ले गई। उजाड़की जगह दिखाकर कहा कि, कमर भर नीचे खोदकर खजाना निकालो। जर्मीदारने कमरके बराबर खोदा बहुत धन पाया वह बहुत प्रसन्न हुआ। नागनने कहा कि, मेरे भाईकी यह पहचान है कि वह बहुत मोटा सांप है, योगीके पास जितने सर्प हैं किसीके माथे पर तिलक नहीं पर मेरे भाईके माथे पर तिलक है। यही उसकी पहचान है। अन्तमें जर्मीदार योगियोंकी खोजमें लगा, जहाँ वह सांप था उस योगीके पास गया। उस सांपको पहचान कर वह उसी योगी की सेवा करने लगा, जब कुछ दिन सेवा कर चुका तो एक दिन अवसर पा सांप की पेटारी ले भागा, उसी बिल पर आ पहुँचा। नागनको पुकारा, वह स्त्री बिलसे बाहर निकल पड़ी जर्मीदारने उस सांपको छोड़ दिया। नागन अपने भाईको देखकर अत्यन्त हर्षित हुई आप भी सांपन होगई, पीछे अपने भाईके साथ बिलमें समा गई। वह सांप योगियोंके पञ्जेसे छुटकर कहींका कहीं चला गया। जिस गांवमें यह घटना हुई थी उसी समयसे उसका नाम कबरबच्छा रक्खा गया। क्योंकि, उस सांपके जन्में हुए सारे बछड़े चितकबरे थे उनकी आंखें सांपोंकी तरह गोल थीं।

यमदूत — कुछ वर्ष बीते एक हलकारा बीकानेरराज्यसे अलवरराज्यको जाता था, उस प्रान्तकी भूमि बहुत उजाड़ तथा बीहड़ है। दूर दूर पर गाँव है। बरसातका मौसम था, घास अधिक उत्पन्न हुई थी, इतनी बड़ी बड़ी घास हो गई थी कि, जिसमें मनुष्य छिप जावे। घासोंके कारण राह भी छिप गई थी। हलकारा विवश हुआ, कहीं राह न मिलती न कोई मनुष्यही दिखाई देता कि, उससे पता

योग्य गऊ

पूछे । साँझ होगई अन्धकार हो चला, भटकते २ उसको एक ऊसर स्थान मिला जहाँ घास नहीं जमी थी, स्वच्छ स्थानको देखकर वहीं बैठ गया, भूख प्यास तथा भयके कारण नींद न आई । रातको क्या देखता है कि, उस श्वेतभूमिके बिलसे एक सांप निकल पड़ा—वह समूचा तो बिलके भीतर था पर हाथ भर बाहर निकल आया अपने बिलके बाहर लकड़ीके समान खड़ा रहा । यह कौतुक देख वह मनुष्य आश्चर्यान्वित होके सोचने लगा कि, यहां तो कोई वृक्ष अथवा पौधा नहीं था, यह ठूठ कौसा खड़ा जान पड़ता है । अपने मनमें यही सोच रहा था कि, इतनेमें कुछ दूरसे ऐसी आवाज आने लगी कि, मानों दो मनुष्य परस्पर बातें कर रहे हैं । उन दोनोंमेंसे एकने पुकार कर कहा कि, अमुक सर्प अपने घरमें है कि, नहीं ? दूसरे सांपने मनुष्यके स्वरमें उत्तर दिया कि, मैं अपने घरमें ही हूँ। उसने कहा कि, तू जा और यहांसे तीन कोसके अन्तर पर अमुक गांवमें अमुक महाजन रहता है उसको तू काट, यही परमेश्वरकी आज्ञा है । उसने उत्तर दिया कि, मैं कैसे जाऊं ? मेरे घर एक महिमान आया है मैं उसीकी चौकसी कर रहा हूँ । जिसमें कोई हिंसक पशु उसको मार न डाले, नहीं तो मुझे बड़ा प्राप होगा । उसने कहा कि, तू जा उसको काट हम दोनों तेरे अतिथिकी रक्षा करेंगे । सर्पने कहा कि, मैं उस महाजनको कैसे काटूँ ? उन्होंने कहा कि, महाजनके घरमें चूल्हेके पीछे एक तम्बाकूका डब्बा धरा है, तू जा उस डब्बेके पास बैठ रह जब वह तम्बाकू लेनेको आवे तो तू काट खाना, वे दोनों मनुष्यवागभाषी सर्प यमके दूत थे, वहीं खड़े होकर उस मनुष्यकी चौकीदारी करने लगे वह सांप जाकर महाजनके घरमें घुस तम्बाकूके डब्बेके पीछे बैठा । जब वह महाजन तम्बाकू लेनेको गया तो सांपने काटखाया वह मर गया पीछे वह सांप अपने बिलको पलट आया, वे दोनों यमदूत उस महाजन के जीवको ले गये ।

वह बहुत विषैला सर्प था, उसके विषके कारण उस भूमिपर वृक्ष न उगते थे । प्रातःकाल होते ही सर्प अपनी बाँबीमें घुस गया. हलकारा उपरोक्त बात की सत्यता जाननेके लिये गाँवमें गया. उसने बनियाके घर जाकर देखा तो रोना पीटना पड़ रहा है । मनुष्य पशु है, पशु मनुष्य है दोनोंमें कुछ भेद नहीं, जिसने सत्य ज्ञान पाया है वही मनुष्य है शेषके सभी पशु हैं ।

मानुषीके गर्भसे बाबा धारीराम सांप — पचास वर्षसे पहिलेकी बात है जौनपुरसे लगभग बारह कोसके अन्तर पर ताखा नामक एक गाँव है, उसमें एक कायस्थजातिकी स्त्री गर्भिणी हुई । प्रसवके समय बच्चोंके बदले उसके पेटसे एक थैली निकली । स्त्रियोंने उस थैलीको तोड़ा तो उसके भीतरसे सांपके अनेक

चीता मारनेवाला सांड, राक्षसकी गाय भिस्तीका बैल

बच्चे निकल पड़े, लोगोंने देखा तो उन सबको मार डाला पर उनमेंसे एक बच्चा कोठीके बीच छिप रहा, वहाँके लोगोंको इस बातका कुछ भी पता न चला। परमेश्वर उसकी रक्षा करने लगा। कायस्थ अपनी आयु सम्पूर्ण करके मर गया। उसके पाँच अथवा चार बेटे थे, उनमें आपसमें फूट हुई, वे जुदे २ होने लगे। अपने पिता का धन भी आपसमें बाँटने लगे। वह कायस्थ बहुत धनाढ्य था, बहुत धन छोड़ कर मरा था। वे भाई तराजूसे तौलतौलकर रुपये बाँटने लगे उन्होंने अपने भागके अनुसार ढेर लगाया वे तो पाँच ढेर लगाते थे, पर छः हो जाते थे। उन लोगोंने कई बार ढेर लगाये पर प्रत्येक बार रुपयोंका एक ढेर बढ़ा जाया करता था। उन लोगों को अत्यन्त आश्चर्य हुआ। विचारने लगे कि, अवश्यही इस एक ढेरका स्वामी कोई है। तब उन लोगोंने पुकारके कहा कि, इस ढेरका जो स्वामी हो वह यहाँ आकर उपस्थित हो जाय। सर्प कोठलीके नीचे से आकर एक ढेरके ऊपर बैठ गया। उन लोगोंने जान लिया कि, यह हमारा भाई इस ढेरका स्वामी है, लोगोंने उस दिनसे उस साँपका नाम धारीराम रक्खा। यह धारीराम बहुत अच्छा साँप था उनके घरमें रहा करता था। उनके घरका काम काज किया करता था। वे कायस्थ खेती बारीका काम कराते थे। जहाँ कहीं कुछ प्रयोजन होता था तो धारीरामको भेजा करते थे। इस गाँवके समस्त मनुष्य धारीरामको जानते थे, उससे कोई भी भयभीत न होता था, मजदूरोंकी अवश्यकता होती थी तो घरके लोग कह देते थे कि, जाओ मजदूरोंको बुला लाओ। धारीराम मजदूरोंके घर जाकर द्वार खट-खटाता मजदूर जान लेते कि, बाबा धारीराम आए, शीघ्र चलो। समस्त मजदूरों को एकत्रित करके काममें लगा देता सब कुछ देख रेख किया करता था। गाँवके सारे मनुष्य उसको बाबा धारीराम कहा करते थे। सभी नौकरोँ तथा मजदूरोंसे बाबा धारीराम काम लिया करता था कभी किसीको भी कष्ट न पहुँचाता था बड़ा ही भला था।

एक दिवसका हाल है कि, बाबा धारीराम किसी काय्यवश बाहर चला जाता था। उधरसे परदेशी बनजारे बैल लादे चले जाते थे। वे सब इस साँपके स्वभावसे अनभिज्ञ थे, इस कारण उसको मार एक झाड़ीपर रखकर चले गये। धारीरामने अपने भाइयोंको स्वप्न दिया कि, मुझको बनजारे मारकर अमुक झाड़ीपर रखकर चले गये हैं, घरके लोग वहाँ गये। झाड़ीपर साँपका शव मिला। उसको वहाँसे उठा लाये हिंदुओंकी रीतिके अनुसार उसकी अंतिम क्रिया की। उस समय मैं बालक था मेरी जन्मभूमिसे पाँच कोसके अन्तरपर ताखा गाँव है जहाँकी कि, यह घटना है। प्रायः जब लोग साँप देखते साँपके आक्रमणके भीतर आते तो

न्यायकी प्रार्थना, विशेष बात धर्मात्मा भैंसा, भैंसकी कामात्मता, भैंसका प्रेम

पुकारते दोहाई देते कि “दोहाई बाबा धारीरामकी” जिससे धारीराम का नाम सुनतेही सांप भाग जाता। बैर छोड़ देते। सांप काटनेके समय मैं सदैव सुना करता था कि, लोग बाबा धारीरामकी दोहाई दिया करते थे और सांपके विषसे बच जाते थे। उसके भाईयोंने उसके मरनेपर बहुत शोक किया। उसकी श्राद्धादि सब क्रियाएं मनुष्योंकी तरह ही की।

सांप और बालक—पञ्जाब देश जिला लुधियाना जिगरावें गाँवके विषयमें सुना गया था कि, एक छोटा लड़का रोटी खाते २ एक सर्पको पकड़ उसका शिर रोटीके साथ लगाकर कहता कि, ओ तू रोटी खा। सब लोग खड़े देख रहे थे उसके माता पिता खड़े पुकारते कि, तू सांपको छोड़ दे पर वह लड़का न छोड़ता था। सांपका शिर पकड़कर रोटीको लगा लगाकर कहता कि, तू रोटी खाले, लोग देख कर चकित हो रहे थे। अन्तमें लड़केने सांपका शिर छोड़ा, सांप भाग गया लड़के को कुछ भी कष्ट न पहुँचाया।

मानुषी भाषापर तौरीत—तौरीतमें उत्पत्तिकी पुस्तकका (३) बाब देखो। सर्प होवासे मनुष्यके समान बातें करता था, इससे प्रमाणित होता है कि, उस समय पशु मनुष्योंके समान वार्तालाप किया करते थे। मनुष्योंके समान ही एक दूसरेका कहा भी मान लेते थे। यह बात आश्चर्यकी नहीं है, यदि यह बात आश्चर्यकी होती तो आदम धोखा न खाता।

हदीस मुहम्मदीमें—इस प्रकार लिखा है कि, पहले शैतान कूदकर बिहिश्तकी दीवार पर बैठ गया पर वैकुण्ठके भीतर न जाता। सोचने लगा कि, अब मैं बिहिश्तके भीतर कैसे बैठूँ। उस समय उसने मयूरको देखा उससे प्रार्थना की कि, मुझको वैकुण्ठकी सैर करवा दो। मयूरने कहा कि, मुझमें सामर्थ्य नहीं पर मेरा मित्र एक सांप है तेरे पास उसको बुलाता हूँ, वह तेरा काम अवश्य करेगा। मयूर अपने मित्रके समीप गया। उससे सलाह की सर्पको लेकर शैतानके पास गया। वह सर्प शैतानके समीप गया वह शैतान अपना अतिलघुस्वरूप करके उस सर्पके मुँहमें बैठ गया। सर्प बिहिश्तके भीतर गया। उसके साथ शैतान भी बिहिश्त के भीतर गया सांपके मुँहसे बाहर निकल आया हौवाको बहकाया। आदम तथा हौवा दोनों कलुषित हुये।

खुदाका शाप—खुदाने उन पाँचोंको शाप दिया। शैतानको तुच्छ ठहराया। उस समय सर्पके ऊँटके समान चार पाँव थे उसके याकृतके होठ तथा कस्तुरी की जीभ थी। वह बड़ा सुन्दर था आगे परमेश्वरने उसके समस्त गुण पृथक् कर दिये। वह विषसे भर गया पेटके बल चलने लगा। मयूरके भी बहुत प्रकाशित छः पंख छीन लिये गये। उसका सौन्दर्य जाता रहा।