कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
जब अपनी युवास्थाको पहुँचता है सर्व प्रकारसे योग्य होता है तब अपना सर्व अधिकार देकर स्वयं अलग हो जाते हैं। जबतक वह किसी बातका अधिकारी नहीं होता तबतक उसकी सब प्रकार रक्षा करते हैं। क्योंकि, यदि दूध पीते बच्चे को कठिन पदार्थ खानेको देदिया जावे तो वह बीमार हो जावेगा यही नहीं वरन् मर जावेगा इसीप्रकार सब जीवधारी भजनमें एक समान हैं पर मुक्तिका पथ केवल मनुष्य शरीरमें है वह सत्यपुरुषकी भक्तिही है। यदि मनुष्य शरीर पाकर भी सत्यपुरुषकी भक्तिके मार्गको न जाना, उसका अस्तित्व और श्रेष्ठताको न पहिचाना, यथार्थ रीतिको छोड़ अन्यथा रीतिसे भजन करे तो पशु और मनुष्यमें क्या भेद हो? केवल सत्यपुरुषकी भक्तिही मनुष्यत्व है। जितने कर्मकाण्डी लोग हैं वे दूध पीते हुए बच्चोंके समान हैं वे ईश्वरीय भेदकी यथार्थताको क्या जानें? अल्पबुद्धिके कारण दूसरोंसे मिथ्याही लड़ते झगड़ते और वाद विवाद करते फिरते हैं।
विचारोंका तत्त्व निर्णय।
७ प्रश्न—सब तत्वज्ञानी विद्वान् तथा माकूलात् व मनकूलात् सत्य हैं कि असत्य?
उत्तर—समस्त मनकूलात् तो सत्य हैं पर उनका यथार्थ आशय विरलाही समझता है। जिनको दिनहीमें न सूझे, अन्धे हों उनको रात को क्या सूझेगा? अनेक (चश्मा) और दूरबीन अन्धोंको क्या लाभ दायक होंगे? पठित अपठित जो देहाभिमानमें पड़कर शरीरकेही पोषण पालनको अपना सर्वस्व समझे बैठे हैं उनको पुस्तकावलोकनसे माकूलात् और मनकूलात्केजाननेसे क्या लाभ हो सकता है?
तीन प्रकारके आनंद।
आनन्द तीन प्रकारका है। विषयानन्द, भजनानन्द, और ब्रह्मानन्द। जो विषयानन्द यानी सांसारिक विषयवासनाकी कामनाको छोड़ दे, वह भजनानन्दके पदको पासकता है। जब तक विषयके स्वादकी तनिक भी हृदयमें चाहना हो तब तक भजनानन्दके पदको पाना कठिनही नहीं बरन् दुर्लभ कार्य है। विषया-
१ जो बुद्धि विचार और प्राकृतिक नियम तथा अनुभव सबसे ठीक हो उसमें कोई ऐसी बात न हो जो कि, बुद्धि और विवेक के प्रतिकूल और प्राकृतिक नियमके विरुद्ध हो, उसे माकूलात् कहते हैं।
२ जिसमें बहुतसी ऐसी बातें होती हैं जो बुद्धिसे बाहर प्राकृतिक नियमके विरुद्ध और असम्भव जान पड़ती हैं, जैसे नानाप्रकारके मत मतान्तरकी पुस्तकोंमें अनेक ऐसी कथायें और बातें लिखी हैं जो असम्भव प्रतीत होती हैं। वे सब मनकूलात् कहाती हैं।
नन्दके अभिलाषी चाहे पठित अथवा अपठित कैसे भी क्यों न हो सब समानही हैं। जबतक मनुष्य विषयवासनाकी कामना देहाभिमान और जगतकी आपत्तिको उठा न दे तब तक भजनानन्द प्राप्त नहीं कर सकता। ईश्वरकी भक्ति और भजनमें ब्रह्मज्ञान नहीं मिल सकता जिसको ब्रह्मज्ञान न प्राप्त हो उसकी ब्रह्मज्ञानविषयक बातें करनी मिथ्या और मूर्खता है।
कर्मकाण्ड, योग, उपासना, ज्ञान ये चारों ब्रह्मज्ञानरूपी अटारी पर चढ़ने की सीढ़ीके ढण्डे हैं। विद्याभिमानी पहलेही (कर्मकाण्ड) ढण्डेपर खड़े हैं उनको चौथे ज्ञानके ढण्डेकी क्या सुधि है? सन्त तो चारों ढण्डोंके पार पहुँचे हैं। वे माकूलातके आशयको भली प्रकार समझते हैं। दूसरोंकी क्या शक्ति है कि उसके यथार्थको सङ्गम सकें? वे अपनी क्षुद्र बुद्धिके अनुसार अर्थ लगाते हैं। जैसी बुद्धिसे अर्थ लगाते हैं वैसेही उसका फल पाते हैं। अपनी बुद्धि और समझसे बढ़ कर कहाँसे लावें? और क्या लिखें?
८ प्रश्न—यथार्थ क्या है? उसको प्रगट क्यों नहीं करते? क्योंकि, सभी सत्यके चाहनेवाले हैं। सत्यको पुकार २ कर कहना चाहिए, जिससे सब लोग उसको जानकर सत्यपथ पर चले हुए मुक्ति पावें।
उत्तर—जो सत्य है वह असत्यके ओटमें इस प्रकार छिपा हुआ है कि, उसको देखते हुये भी नहीं देखते। जो सत्यकी इच्छा करेगा, उसके प्राप्त करनेका अधिकारी होगा उसको सत्य दिया जायेगा। सत्यका मार्ग कठिन जानकर उससे भागते हैं असत्यको स्वीकार करते हैं। मनुष्य पक्षपातमें पड़जाता है तो नीचसे नीच, निषेधसे निषेध कार्य्यको अज्ञानता वश नहीं छोड़ना चाहता। सत्य तो प्रत्यक्ष प्रगट सब स्थानमें सर्वदा पुकार रहा है पर असत्यके प्रेमी उसके परम तेजको नहीं सह सकते। सत्य प्रत्यक्ष, और प्रगट होने पर भी ऐसा गुप्त है, जैसे जबहरि-योंकी दूकान पर रत्न पेटियोंमें बन्द रहता है पर उसके ग्राहक जभी आते हैं तभी पेटी खोलकर उसको देखाते हैं। जो पारखी है उनके लिये रत्न सर्वदाही प्रत्यक्ष होता है। यद्यपि रक्षाके लिये पेटीमें रखा हो तो क्या? जो पारखसे रहित हैं उनके लिये यदि रत्नको बाहरही रखा जावे तब भी उनको कुछ लाभ नहीं हो सकता। इस कारण उचित है कि, जब कोई रत्नपारखी मिले तभी उसका सन्दूक खोलना चाहिये। हर एकके सामने खोलना ठीक नहीं, क्योंकि, सबके सामने खोलनेसे भय है कि, चोर डाकू नष्ट कर दें।
शब्द—जो कोई रत्न पारखी पेंये, हीरा जाय भँजये।
पलरा मूल तत्वकी ढाँडी, प्रेमको बांट बनये॥
वस्तु हमारी अगम अगोचर, लेके सराफ़ी जैये ।
लगी हाट यम जाल पसारा, तब वह वस्तु भजैये ॥
तौल तालकी जमा सुलाखी, तब वाको घर पैये ।
केतिक चोर फिरें गलियनमें, तिनते मत लुटवैये ॥
वस्तु अगोचर शब्द अनाहत, यहि विधि ध्यान लगैये ।
कहैं कबीर भावे सौदा, सद्गुरु होय लखैये ॥
साखी— हीरा रतनकी कोठड़ी, बार बार मत खोल ।
जो कोई आवे रतन पारखी, तब हीराका मोल ॥
९ प्रश्न—प्रत्येकमतमें मुक्तिका विचार—किसी धर्ममें (मजहब) कोई क्यों न हो यदि वह पुण्य करे, सर्वदा सदाचरणसे वरते तो मुक्त हो कि, नहीं ?
उत्तर—सुकृत पुरुषोंको उनके पुण्यका फल अवश्य मिलेगा पर पाप और पुण्य दोनोंही बन्धनके कारण हैं एकसे स्वर्ग दूसरेसे नर्ककी प्राप्ति होती है किन्तु मुक्ति नहीं होती। क्योंकि वो सद्गुरुके बिना कदापि नहीं मिलती जिस प्रकार ए नजिनके बिना रेल नहीं चलती उसी तरह गुरुज्ञानके बिना सत्यपद मिलना कठिन है। हाँ, इतना तो अवश्य है कि, जो अपने पुण्यको पूर्ण करते हैं उनपर सत्यगुरुकी कृपादृष्टि होती है, क्योंकि इस जीवको सदा सत्यगुरुकी अपेक्षा है।
कोई मनुष्य पूर्णपुण्य स्वरूप नहीं हो सकता। क्योंकि, पूर्वके अनेक जन्मोंसे इनके पाप पुण्यका सम्बन्ध होरहा है वरन् तौरेतके अनुसार मनुष्य जिसकी सन्तान है वह सबका पिता आदमही ईश्वरकी अवज्ञासे पापी हुआ। यही बात नहीं, वह ईश्वरकी अवज्ञासे प्रथम भी पापी था। उसके पापोंका सम्बन्ध अनेक जन्मोंसे चला आता था, जिसके कारण वह पीछे न भी अवज्ञाकारी और पापी हुआ। यद्यपि आदमकी उत्पत्तिमातृगर्भसे नहीं तो भी उसमें पाप थे। क्योंकि उसका अन्तःकरण विषय वासना और शारीरिककामनाओंसे भरा हुआ था। यही कारण है कि, उसका मन सांसारिक भोग विलासकी ओर आकर्षित हुआ। उसे स्त्री मिलने की बड़ी अभिलाषा थी जो उसके पतित होनेका कारण हुआ यदि उसमें पाप न होता तो वासना भी न होती वह निरपराधी दुःखमें न पड़ता इससे यह सिद्ध होता है कि, पहलेही पापसे दूषित था पूरा पुण्यस्वरूप नहीं था। मनुष्यको उचित है कि, पुण्यको पूर्णतापर पहुँचानेके लिये पूर्ण उपाय करे सत्यगुरुसे उसके फलकी आशा रखे। सर्वदा दृढ़ताके साथ यही विश्वास हृदयमें धारण करें कि, सत्यगुरुही बेडा पार करनेवाला है ?
१०—प्रश्न प्यारेकी मिलनेकी क्या युक्ति कौनसी—करनी चाहिये ?
उत्तर—प्रथम सच्चे धर्म (महजब) की खोज करनी चाहिये, फिर उसके सन्तोंकी सेवा और सङ्ग करना चाहिये जब साधुओंमें कोई ऐसा दृष्टि आवे कि, जो धर्मके मार्गको भलीप्रकार बतला सकता हो, संशयको दूर कर सकता हो, पारखपदको दिखला सकता हो आत्मज्ञानका मार्ग सुझा सकता हो तो, ऐसे सन्तको पाकर अपनेको धन्य जाने उसीको गुरु बनावे । श्रद्धा और प्रेमके साथ गुरुकी सेवा भक्ति करे उससे कभी न फिरे । गुरु करनेके पीछे उससे श्रद्धाहीन हो जानेकी अपेक्षा पहलेही गुरुको भली प्रकार पहचान कर उसके गुणदोषकी परीक्षा कर लेना चाहिये । गुरु करलनेके बाद पीछे दोषदृष्टी उचित नहीं । अपने गुरुके चरणकी धूल हो जाना उचित है । इस बातको श्रद्धा और विश्वास पूर्वक भली प्रकार निश्चय रखे कि, गुरुकी कृपासे गोविन्द मिलेगा गुरुकीही मूर्तिमेंसे गोविंद प्रगट होगा ।
शब्द—साईं तेरा अर्श तख है दूर ।
विन मुरसिद कोई भेद न पावे, भटकि मुये सब कूर ॥
चौदह तबक ख्वाबकी रचना, आतशकासा फूल ।
राज छोड़ि जिन काज किया है, भये चरणकी धूल ॥
नासूतमें माया खड़ी, मलकूत गुण अस्थूल ।
जो कोई निजको समझे बूझ, तामें नाहिं शऊर ॥
जबरूतमें सब यम जाल है, लाहूत अक्षर फूल ।
हाहूतमें अचिन्त पुरुष, बजत अनहद तूर ॥
वेद पुराण कुराण किताबा, यहां लगि खबर जहूर ।
सोहं इच्छा वहांसे आई, सब घट व्यापक नूर ॥
सब जीवनको त्रास देखिये, समरथ वचन कुबूल ।
कहे कबीर हम खुदके अहदी, लाये हुकुम हजूर ॥
११ प्रश्न—गुरु और चेलेकी पहचान, क्या चिन्ह और है ?
उत्तर—गुरुके चार लक्षण हैं । चेलेके भी चार चिन्ह हैं । गुरुके चार चिन्ह ये हैं कि, १—पूर्ण भक्तिसे सम्पन्न हो, २—अपने धर्म ग्रन्थ तथा शास्त्र और वेदोंके आशयको समझनेवाला हो, ३—समदृष्टि अर्थात् ईश्वरको सबमें
१ पीछे छवि अर्थ किया था जो तात्पर्यार्थ है क्योंकि जब अनहद बाजे बजेंगे तबही अनहदकी छवि सुन पड़ेगी ।
व्यापक देखनेवाला हो, ४—चलेको ईश्वरसे मिलाने, भक्तिमें लगा देने और उसकी शङ्काओंके दूर करनेकी शक्ति रखता हो।
जिसके अन्तःकरणमें विषय वासनासे उपरामता आगई हो, अपने मनको वश कर लिया हो, सब जीवोंके कल्याणकी चिन्ता हो, परोपकारी हो, वेद शास्त्रके आशयको खूब समझता हो, दूसरोंको समझा सकता हो वही गुरु-पदका अधिकारी है। ऐसे विद्वान्, सत्य असत्यको भलीप्रकार समझते हैं, अपने स्वरूपके ज्ञानको संशय रहित धारण करते हैं। वे जानते हैं कि, समस्त संसार मेराही रूप है, दूसरा कोई नहीं है। आत्मा को छोड़ कभी उनके हँत दृष्टि नहीं होती, सब मनुष्योंको सत्य पुरुषकी भक्ति और प्रेममें दृढ़ कराते हैं। श्रद्धा, भक्ति प्रेम, शौर्य, आदि देवी गुणोंके स्वरूपही होते हैं धन्य है वे पुरुष जिनको ऐसे गुरु मिलते हैं।
गुरु शब्दका अर्थ।
दोहा— गु आधियारे जानिये, रु कहिये परकाश।
मिटि अज्ञानहि ज्ञानदे, गुरु नाम है तामु॥
अर्थ—गु-शब्दका अर्थ है अन्धकार—अर्थात् अज्ञान। रु—का अर्थ है प्रकाश अर्थात् ज्ञान। तात्पर्य यह कि, अन्धकार रूप अज्ञानको नष्ट करके हृदयमें ज्ञानरूप प्रकाशको प्रगट करे वो गुरु कहलाता है गुरुके सब गुणोंमें श्रेष्ठ गुण शिष्यको ईश्वरपरायण कर देता है।
चलेके लक्षण—इसी प्रकार हैं। १ अहङ्कारका त्याग कर देना, २ विषय वासनासे रहित होना, ३—तन मन धनसे गुरुकी सेवा करना, ४—गुरुके वचन पर पूर्ण श्रद्धा विश्वास रखना इन चारों गुणोंमें दो गुण गुरुकी सेवा और गुरुपर विश्वास अत्यावश्यक है। जिसमें यह दो गुण हों उसमें शेषके दो गुण और भी आजावेंगे। गुरुकी सेवा और गुरुका विश्वास येही दो गुण भक्ति और मुक्तिके चिह्न हैं। यदि ये दो गुण न हों तो शिष्य अवश्य कालके गालमें जावे एवं उनका आवागमनसे छूटना दुर्लभ होवे।
सर्व कालमें गुरुकी स्तुति करना उचित है। गुरुसे विमुखता नरकका मार्ग है। जो कोई गुरुके विमुख हुआ, उसका ज्ञान विचार सब नष्ट हो जाता है यह कालका आखेट हुआ है इसके ऊपर एक दृष्टान्त है।
बाजीगर और चरवाहा—किसी समय एक बाजीगर कहीं कौतुक दिखला रहा था। उसके मध्य उसने यह कौतुक दिखलाया कि, तीन छुरे परस्पर एकही समयमें ऊपरसे फँकता उसे हाथोंसे पकड़ता था। यह देखकर एक चरवाहेने
कहा कि तू, तो हाथोंसे पकड़ता है, मैं इन छुरियोंको दांतोंसे पकड़ सकता हूँ । बाजीगरने कहा तू अपनी कला प्रगट दिखला. उस चरवाहेने एक छुरीको लेकर इस प्रकारसे फँकना और दांतोंसे पकड़ना आरम्भ किया कि, जब वह छुरी फँकता तब नीचे आते आते उसकी मूठही दांतपर आके गिरती. चरवाहेकी यह लीला देख लोगोंको बहुत आश्चर्य हुआ । बाजीगरने चरवाहेसे पूछा कि, तूने यह विद्या कहाँसे सीखी ? उसने कहा मैंने किसीसे सीखी नहीं बरन् स्वयं मुझे आगई है । बाजीगरने बहुत प्रकारसे पूछा पर उसने गुरु स्वीकार नहीं किया, तब बाजीगरने कहा जब तू गुरु स्वीकार नहीं करता तो अच्छा फिर तू यही कौतुक दिखला उस चरवाहेने फिर कौतुक दिखलाना चाहा पर अबकी बार मूठके बलसे गिरनेके बदले छुरी नोकके बल गिरी जो गिरतेही कण्ठके अन्दर घुस गई । वह मरने लगा उस बाजीगरने उससे फिर पूछा कि, अब भी तू कहदे तूने यह विद्या कहाँसे सीखी ? । चरवाहेने उस अवस्थामें स्वीकार किया कि, मैंने बगुलेको देखा था कि मछलियोंको ऊपर फँकता उनके नीचे आते आते मुँहमें निगल जाता. मैंनेभी वैसेही अभ्यास करना आरंभ कर दिया बाजीगरने कहा तेरा गुरु तो अवश्य था, तूने इनकार क्यों किया ? गुरुसे विमुख होनेका यही फल है अब तेरी मृत्यु आगई । थोड़ी देरमें वह चरवाहा मर गया ।
निष्कर्ष—भली प्रकार स्मरण रखना चाहिये कि, गुरु विमुखजन कभी सफलता नहीं पावेंगे और गुरुमुख गुरुकी सेवा और भक्ति करके अपनी मनो कामना सिद्ध कर लेते हैं, उनका प्रभाव बढ़ता है, सब प्रकारकी कला कौशल और विद्या प्राप्त होती है । इसीपर एक कथा है ।
द्रोणाचार्य और भील—एक समय पांडव और कौरवोंके बाण विद्याके गुरुद्रोणाचार्यके पास एक भीलने आकर कहा कि, मुझे बाण विद्या सिखलावो । द्रोणाचार्यने उत्तर दिया मैं तुझे बाण विद्या नहीं सिखलाऊँगा, तू भील है, इस विद्याको सीखकर बहुत अत्याचार और हिंसा करेगा । वह निराश होकर चला गया, बनमें पहुँचकर उसने द्रोणाचार्यकी एक मूर्ति स्थापित करके बड़े प्रतिष्ठा श्रद्धाके साथ उसीके सन्मुख अभ्यास करना आरम्भ किया । बड़ी प्रेम भक्तिसे नित्य प्रति मूर्तिको नमस्कार करता पूजन करके अभ्यास आरम्भ करता । थोड़ेही दिनोंमें उसने अपने अभीष्ट को सिद्ध कर लिया बाण विद्यामें ऐसा प्रवीण हुआ कि अर्जुनने भी उसकी प्रशंसा की । गुरुकी मिट्टीकी ही मूर्तिमें पूर्ण विश्वास होना, चाहिये । जबतक गुरुमें पूरा विश्वास न हो तबतक कदापि सफलता नहीं होती । गुरु कँसाही क्यों न हो शिष्य अपनी दृढ़ताके कारण उच्च पदको प्राप्त करेगा ।
१२ प्रश्न—मायासे पार होनेका कारण—समस्त संसार विष्णुका नाम जपता है, तो विष्णु स्थान स्थानपर धोखे कपट और छलके कार्य किया करते हैं। ईश्वर विरुद्ध उनके काम देखनेमें आते हैं, तो भी लोग उनको ईश्वर मानते हैं इसका क्या कारण है ?
उत्तर—हो, निस्सन्देह समस्त संसार विष्णुकाही नाम जपता है, विष्णु-कोही भक्ति करता है। इसका कारण यही है कि, यह संसार माया है, जगत्का कारण मायाही है। विष्णु मायापति है, स्वयं माया है। किसीकी सामर्थ्य नहीं कि, विष्णुकी मायाको पारकर सके, वह बड़ा शक्तिमान है, उसीकी मायामें पड़े हुये बड़े २ सिद्ध साधु महात्मा गोते खाते हैं संसारको जिस शक्तिने बनाया है वही अनादि प्रकृति है, वही समस्त संसारपर ईश्वरता करती है, कोई ऐसा प्रबल नहीं कि, इसे जय करे इसके बन्धनोंको तोड़कर पार जासके। यह सब छल कपट लील मरना मारना सुख दुख राज वैभव, देना लेना, सब मायाहीके काम हैं। अतः विष्णुने जो कुछ किया वह मायाके अविरुद्ध, किया। तीनों देव माया ही रूप हैं इन तीनोंमें श्रेष्ठ विष्णु हैं। यदि वे ऐसी लीला न करें तो मायाके गुण नष्ट हो जावें। विष्णु भगवानपर दोषारोपण करे वह अज्ञानी और पापी है। सर्व मनुष्य मायाहीकी भक्ति और भजन करते हैं, मायाही उनको फल देती है, मायाहीमें तीनों लोकका पसारा है। मायाही कर्ता धर्ता है। मायाहीने सबको मोहमें फँसा लिया, सर्व जगत् और ईश्वर मायाही है। जो विषयवासनाके अधीन है वे सब मायाके तुच्छ सेवकोंमें है।
१३ प्रश्न—मायाके पार जानेके लिये क्या न्याय करना चाहिये ?
उत्तर—मायाके पार जानेके वास्ते कबीर साहबकी शरण और आदेश है दूसरी कोई युक्ति नहीं है। जब कि, शिव और गोरख ऐसे योगी मायामें पड़े चक्कर खा रहे हैं तो दूसरेकी क्या कहनी है।
१४—प्रश्न—पन्थ प्रचलित होनेका कारण—बड़े २ विद्वान ज्ञानी और पण्डित संसारमें हुये पर किसीका धर्म (महजब) पृथिवीमें प्रचलित नहीं हुआ। बरन् जो लोग विशेष विद्या नहीं पढ़े थे उन्हींका धर्म संसारमें प्रगट प्रचलित हुआ, इसका क्या कारण है ?
उत्तर—इसका कारण यही है कि, जो लोग अपनी बुद्धिमानीका फल पा चुके उनको दूसरी सिद्धि और चमत्कार आदि प्राप्त नहीं होते क्यों कि, वे लोग अपनी पूर्णताके ऊपर अभिमान रखते हैं। ईश्वरी ज्ञानके लिये दीनता और नम्रताकी आवश्यकता है। यह गुण विद्याभिमानियोंमें कम होता है।
वे लोग अपनीही बुद्धिमानी और युक्तिको यथार्थ जानते हैं उनको गुरुपर विश्वास नहीं आता, उनसे गुरुकी सेवा और आज्ञाकारिता नहीं हो सकती । वे किसीको अपना उपदेष्टा नहीं समझते, वरन् पुस्तकोंकोही अपना ज्ञानदाता मानते हैं । जो जड़ को अपना गुरु और पथदर्शक समझे वह ईश्वरीय ज्ञानका अधिकारी नहीं हो सकता, जिसका जो मन चाहे वैसा किताबोंका आशय समझकर अपने मनमें आनन्दित हुआ करे । कोई पुस्तक यह कहने नहीं आती कि, मेरा यह आशय है यह नहीं है । मुसलमानों किताबोंके अनुसार खुदाने लुकमानसे पूछा कि, राज्य पंगम्बरी और तत्वज्ञान ये पदार्थ हैं इनमेंसे जो तू एक पसन्द करे वह तेरेको मिले । लुकमानने कहा कि, मुझे तत्वज्ञान दीजिये । लुकमानको तत्वज्ञानही मिला संसारमें लुकमान हकीम प्रसिद्ध हुआ इसी प्रकार मुलेमान बादशाहने तत्वज्ञानही माँगा, वह दोनों संसारमें बड़े प्रसिद्ध तत्वज्ञानियोंमें हैं । संसारमें बहुतसे ऐसे नबी सिद्ध और महात्मा हुये हैं जो एक अक्षर भी नहीं जानते थे । जिस प्रकार बालक निरपराध दीन और निष्कपट होता है तो उसको सब कोई प्यार करते हैं, गोदमें लेते हैं, लोग जानते हैं कि, यह कुछ चालाकी नहीं जानता । बुद्धिमानोंके लिये उनकी बुद्धिमानी ही वश है ।
नजम ।
जो विल्लीको वह दे परवाजका जोर । तो ख़िलकतमें परिन्दोंके पड़े शोर ॥
न हीरालालसे खुश हाल है कोह । न है फरहत नहै उसको गम अन्दोह ॥
न गजमुक्तासे गजको शादमानी । गोहरसे बहरको क्या कामरानी ॥
गई ख्वाहिश गुजर सब दिलसे उनके । हैसीनः में दफीनः इल्म उनके ॥
नाम आदिन सीम और जर घरबादशाही । न हुकमा मुस्तहक इल्मे इलाही ॥
दिया हर एकको एक एक इल्म ओला । वहरफन् इल्म कामिल आप मौला ॥
दिया बखश उसने सामान अजिजोंको । कि, जाहिर देख उनसे मअजिजोंको ॥
न मुहिरिम और न पाये खास वस्तु । जो सुकरातीस अफला तू अरस्तु ॥
वह उम्मी वन्दःको पोशिश पन्हावे । कि, ख्वाँदा होवे दरमाँदा न पावै ॥
१५ प्रश्न—भ्रमको मुक्तिमार्ग जाननेका कारण—यह कौसा बड़ा आश्चर्य है कि, सब मनुष्य अन्धे हो रहे हैं, किसीकी बुद्धि काम नहीं करती ऐसा आवरण पड़ गया है कि, कोई भी नहीं सँभल सकता, जो अनित्य और भ्रम है उसेही मुक्तिमार्ग समझते हैं, सत्यसे सब भागते हैं, इसका क्या कारण है ?
उत्तर—क्या तुम नहीं जानते कि, जिस समय चिड़ीमार मोहिनी मन्त्र पढ़ता है, गीत गाता है तब जङ्गल भरके पशु पक्षि आदि सब मोहित हो जाते
हैं स्वयं उसके जालमें आकर फँस जाते हैं वह सबको भून कर खा जाता है। इसी प्रकार दीपक पर पतङ्गें आकर गिरते हैं जल भुनकर नष्ट हो जाते हैं, उनको क्या सुख मिलता है ? इसी प्रकार मनुष्यकी बुद्धि काल पुरुषने अपनी मायासे भ्रष्ट कर दी। सब अन्धे हो गये हैं, सत्य पदको छोड़ मायाकी पूजामें लगे हैं। सत्यपदसे भागते हुए द्वेष करते हैं। सबकी परीक्षा कर देखो, जिसके धर्मका अवगुण दिखलावोगे वहाँ लड़ाई करनेको तैयार होगा, कोई ऐसा न कहेगा कि, "तुम मुझको सत्यमार्ग वतलाते हो, भ्रमसे हटाते हो, आवरण दूर करते हो मिथ्या भ्रमको छुड़ाते हो।" मायाका आवरण सबके ज्ञानपर पड़ा हुआ है, उसने ब्रह्मा, विष्णु, शिव और नारद आदि बड़े २ समर्थोंको भी नहीं छोड़ा, सबको मोहितकर अचेतकर दिया, फिर दूसरोंकी क्या सामर्थ्य है कि, उससे जीत सके। सब जीवधारियोंको मायाने अपने हाथमें कर रखा है, कोई भी कुछ कहे वो कर नहीं सकता। मेरी क्या सामर्थ्य थी कि, मायाका हाल लिखनेको लेखनी उठाता। कलम कहीं, कागद और स्याही कहीं कहीं चले जाते, केवल सर्वशक्तिमान् सद्-गुरु कबीर बन्दीछोरकी कृपा है कि, लिख रहा हूँ, नहीं तो यह भेद खोल डालनेकी कसीकी भी शक्ति नहीं है। साधु लोग समझकर मौन धारण करते हैं।
१६ प्रश्न—जीवका ईश्वरसे मिलना, ब्रह्म, क्यों कर पहचानाजा सकता है ? मायाका आवरण किस प्रकार छूटे ? जीव ईश्वरसे कैसे मिले ?
उत्तर—जब भक्ति और भजन करते २ अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है तब क्रमशः ज्ञानका प्रकाश होने लगता है। क्योंकि, अन्तःकरण अशुद्ध होनेके कारण ज्ञान नहीं होता जबतक शुद्ध ज्ञान नहीं होता तबतक सत्य नहीं जाना जाता। परमात्मा सर्व व्यापी है कोई स्थान कोई पदार्थ उससे भिन्न नहीं, जब तक असम्यक् दृष्टि है तब तक सम्यक् परमात्माका दर्शन (ज्ञान) असम्भव है। जिसने सत्यक् ज्ञान प्राप्त कर लिया वह सब कुछ परमात्मामें देखता है एवं परमात्माको सबमें देखता है।
१७ प्रश्न—सन्नाधर्म, समस्त मनुष्योंका सामान्य और एक यथार्थ धर्म क्या है ?
उत्तर—समस्त मनुष्योंका यथार्थ और सामान्यधर्म वही है जिससे आवागमन छूट जावे। जिससे अपना यथार्थ स्वरूप प्राप्त हो जावे जिससे अपने मूलको पाजावे। इस धर्मके गुरु कबीर साहब हैं। शास्त्र स्वसम्बेद है ज्ञान शारशब्द है।
१८ प्रश्न—मनुष्योंको ईश्वरने क्यों बनाया ।
उत्तर—जिस प्रकार कसौटीसे सोना परखा जाता है, कसौटीके द्वाराही खरा खोटा जाना जाता है, उसी प्रकार चौरासी लाख योनिमें मनुष्य योनि कसौटीके समान हैं इसमें आकर भले बुरेकी पारख हो जाती है । कसौटी ठीक हो तो सोनेके गुण अवगुणको ठीक बता सकती है । कसौटीमें दोष हो तो गुण दोषको ठीक नहीं बता सकती । इसी प्रकार मनुष्यको ईश्वरने इस कारण बनाया है कि, गम्भीर सारग्राहणी बुद्धिसे नित्य अनित्यका विचार करके अनित्य और भ्रमसे अलग हो जावे । इसी कारण मनुष्य सारी सृष्टिमें सर्व जीवधारियोंमें श्रेष्ठ है क्योंकि, मनुष्य शरीरको बिना पाये कोई मुक्तिका अधिकारी नहीं हो सकता । मनुष्य शरीरके अतिरिक्त जितने शरीर हैं वे इतने मुक्तिके अधिकारी नहीं जितना कि, मनुष्य शरीर है ।
१९ प्रश्न — मनुष्यका मरमरकर कहाँ जाते हैं ?
उत्तर—सब मनुष्य मरकर भ्रमपुरीको जाते हैं । भ्रमपुरीसे आते हैं, हमेशाही भ्रमपुरीमें रहते हैं । माता, पिता अपना पराया सारा संसार भ्रमही है ।
२० प्रश्न—मनुष्य नियत आयुके पहले क्यों मर जाता है ?
उत्तर — पापसे आयुक्षोण होती है । पुण्यसे बढ़ती है । किसीके भी पुण्य पाप क्यों न हों वे अवश्य अपना फल दिखाते हैं ।
२१ प्रश्न—भिन्न भिन्न उत्पत्तिका निर्णय, प्रत्येक धर्ममें उत्पत्तिका वर्णन भिन्न २ क्यों है ।
उत्तर — यह सृष्टि बारंबार उत्पन्न होती और नष्ट होती है । इसको उत्पत्तिके अनेक ढङ्ग हैं जिसको जैसा सूझा उसने वैसाही वर्णन कर दिया । अबतक किसीने भी स्पष्ट रीतिसे यह नहीं लिखा है कि, आदि उत्पत्ति कब और किस प्रकार हुई जो लिखते हैं वो अपनी कल्पनासेही लिख डालते हैं ।
२२ प्रश्न — सृष्टिका हेतु, जब केवल एकही अद्वैत ईश्वर था, दूसरा कुछ न था तो सृष्टि कैसे हुई ?
उत्तर—सृष्टिका कारण भ्रम और अज्ञानके सिवा दूसरा कुछ नहीं है । जब आदमीको उन्माद होता है तो मस्तिष्क बिगड़ जाता है, जिससे उसकी दृष्टिमें नाना प्रकारके रूप भासते हैं उसको देखके कभी वह हर्ष मानता है तो कभी शोक करता है, कभी देखकर डरता है, कभी रोता है, कभी हँसता है, कभी आश्चर्य करता है, यानी उन्माद ग्रस्त मनुष्यके मुखके नाना प्रकारके भाव प्रगट होते रहते हैं, उनके भावोंके प्रगट होनेका कारण केवल उन्मादही होता
है। सारा संसार शून्यसे हुआ है, यह पूर्णतया शून्य है। शून्य अथवा माया मिथ्या निर्मल है।
२३--प्रश्न-मुक्तपदका निर्णय, आदिमें कुछ नहीं था, अन्तमें भी कुछ न रहेगा, फिर मुक्ति किसको होती है ?
उत्तर--प्रथम कुछ न था इसका अर्थ यह है कि, प्रथम भ्रम (अज्ञान) न था। जब भ्रम उत्पन्न हुआ तो समस्त सृष्टि उत्पन्न हो गई, जब भ्रम न रहेगा तब सब नष्ट होजावेगा भ्रमके नष्ट हो जानेपर जो शेष रह जाता है वही मुक्त पद है।
२४ प्रश्न--जीवका ईश्वरांश होनेका निर्णय, जीव ईश्वरका अंश है तो चाहिये कि, एकके सुख दुःखसे सबको सुख दुःख हो ?
उत्तर--सर्व जीवधारियोंके अन्तःकरणमें ज्ञानका आवरण होगया है इस हेतु सबको सुख दुःख भिन्न २ प्रतीत होता है। जिसका भ्रम नष्ट हो गया उसको सर्व अन्तःकरणोंपर अधिकार होजाता है। जीव ईश्वरका अंश नहीं कहा जा सकता। क्योंकि, ईश्वर अविभाज्य और अखण्ड है वह निकट भी नहीं और दूर भी नहीं। जिस प्रकार एकही सूर्य है पर अनेक घड़ोंमें भिन्न भिन्न तरल पदार्थोंके रखनेसे भिन्न भिन्नही आकारोंमें उसका प्रतिबिम्ब पड़ता है परंतु वे सब सूर्य नहीं और सब सूर्यही हैं। अज्ञानीको आवरणके कारण भेद दृष्टि है ज्ञानीको नहीं
प्रश्न--एकसे अनेक एवं अनेकका एक, एकसे अनेक और अनेकसे एक किस प्रकार दृष्टि आता है।
उत्तर--एकसे अनेक इस प्रकार हुआ; जैसे एक शीशमहल हो उसमें सहस्रों काँचके ढ़ फानूस और ग्लास लटक रहे हों, उसमेंसे एक बत्ती जलाई जाय तो सहस्रों बत्तियाँ जलती हुई देख पड़ेंगी अनेकसे एक इस प्रकार हुआ कि, एक बत्तीको बुझा दो सब बत्तियाँ बुझ जायँगी, केवल उस बत्तीका गुप्त अलख स्वरूप रह जायगा शेष कुछ न रहेगा।
२६ प्रश्न--ज्ञानीके लक्षण क्या हैं ?
उत्तर--ज्ञानीका परख ज्ञानीही कर सकता है। दूसरेको नहीं मालूम हो सकती, जो स्वयं ज्ञानी है वह ज्ञानीके भेदको जानता है। बाहिरकी सामग्रीसे ज्ञानीकी पहँचान होना कठिन है।
२७ प्रश्न-परमाणुमें राज्य--आपने कहा था कि, राजा इन्द्रने एक
परमाणुमें अपनी दश पीढ़ी तक तीनों लोकका राज्य किया यह असंभव कैसे सम्भव हो सकता है ।
उत्तर—यह सारा संसार निर्मूल झूठ है इसमें कुछ भी सत्य नहीं है यह जीव जैसा सङ्कल्प करता है वैसाही इसके सन्मुख देख पड़ता है, दृढ़ सङ्कल्प, होनेसेही इसकी कामना पूर्ण होती है । यह सारा ब्रह्माण्ड एक परमाणुमें है, समस्त ब्रह्माण्डमें एक परमाणु है। जैसे समुद्र एक बुन्दमें है और एक बुन्दमें समुद्र है । जैसे ब्रह्माण्ड और परमाणु कुछ नहीं वैसेही समुद्र और बुन्द कुछ नहीं हैं । यह सब मायाके कौतुक हैं । माया सर्वशक्तिमतीप है जो चाहे तो एक परमाणुमें अनन्त ब्रह्माण्ड दिखादे और अनन्त ब्रह्माण्डोंको एक परमाणुमें लिखलावे । सहस्रों वर्षको एक क्षण और एक क्षणको सहस्रों वर्ष प्रतीत करावे । मायाका भेद किसीने नहीं पाया, सारे सिद्ध, साधु, पीर, पंगम्बर इसीमें पड़े गते खाते हैं किसीको पता नहीं लगता ।
जाकी गति ब्रह्मै नहिं पायो शिव सनकादिक हारे ।
ताकी गति नर कैसे पड़ही कहैं कबीर विचारे ॥
२८ प्रश्न—ईश्वरका प्रमाण—जो सारे संसारका ईश्वर है उसका प्रमाण किस प्रकारका हो सकता है ?
उत्तर—ईश्वर सबसे श्रेष्ठ है, उसको सिद्ध कर तो लिया सांसारिक बुद्धिज्ञान, अनुमान आदि सब निष्फल हैं । उसके लिये युक्ति प्रमाण सब तुच्छ हैं । यह प्रश्न तुम्हारा ऐसा है जैसे किसी एक नपुंसकको कोई एक तलवार देकर कहे कि, सारे । संसारको विजयकर आ, जैसे मच्छर बाज और शाहीनको मारे उसी तरह अगम अगोचर परमात्माकी सिद्धि में प्रमाण और बुद्धि लगाना है । समस्त सिद्ध साधु और विद्वान् मण्डली आदिसे अन्ततक सर्वदा ईश्वरके यथार्थ स्वरूपको प्रगट करनेमें असमर्थताही प्रगट करते रहे हैं ।
इसीपर अगस्तीन—नामका एक पादरी इस्त्री सनके ४०० में वर्तमान था वह बड़ा बुद्धिवान्, विद्वान् और धीर था । एकवार उसके मनमें ऐसी कल्पना उठी कि, ईश्वरने संसारमें पापको क्यों उत्पन्न किया ? वह सर्वशक्तिमान है, शैतानको उसने क्यों न बरजा ? यदि चाहता तो शैतानका नाश भी कर देता तथापि शैतानको न रोका, इसका क्या कारण है ! इसी प्रकार नानाप्रकारका संकल्प विकल्प करता, सोचता, विचारता, फिरता समुद्रके तटपर पहुंचा । वहाँ उसने देखा कि एक बालक किसी पक्षीके अण्डेका छिलका लिये हुये, उसीमें पानी भर-भर कर समुद्रसे बाहर एक छेदमें भरता है । वारंवार उस बालकको ऐसा करता
देखकर अगस्तीनने पूछा कि, तू क्या करता है ? बालकने उत्तर दिया मेरी इच्छा है मैं समुद्रको सुखा दूँ । अगस्तीनने कहा कि इस छोटेसे छिद्रमें तू समुद्रको कैसे भर सकता है ? यह बात सुनकर बालकने उत्तर दिया कि, यदि मैं समुद्रको इस छिद्रमें नहीं भर सकता हूँ तो तू ईश्वरके भेदको अपने छोटेसे मस्तिष्कमें किस प्रकार भर सकता है ? जिस प्रकार तू शैतान विषयक तर्क वितर्क अपने मनमें कर रहा है उसी प्रकार मैं समुद्र सुखा रहा हूँ । तू अपनी सीमाबद्ध बुद्धिसे असीम परमात्माके भेदको किस प्रकार जान सकता है ? यह कहकर वह बालक अंतर्धान हो गया । यह देख अगस्तीन मनही मन बहुत लज्जित होकर सत्यका विश्वासी हुआ ।
२९ प्रश्न—अवस्था साम्य, उस ब्राह्मणको जो सरयूके तटपर मायाको देखनेके लिये तपस्या करता था उसके तथा शाहुरूपके दृष्टान्तसे जाना जाता है कि, जाग्रत और स्वप्न एक बराबर ही है ?
उत्तर—जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तुरिया और तुरियातीत ये सब अवस्था और उनके मध्यमकी दशा सब जीवकी अविद्यासे उपन्न होती हैं, इनको प्राप्त हुआ जीव नानाप्रकारके कौतुक देखा करता है । जो कुछ देखता है वो वाजीगरके खेलके समान मिथ्या लीलाकोही देखाता है । पर शुद्ध ज्ञान न होनेके कारण उसी असत्यमेंसे जिसपर विश्वास जम जाता है सत्य मान बैठता है । माया बड़ी प्रबल है । उसमें यह शक्ति है कि, क्षणमात्रमें ब्रह्माण्डको बनावे और बिगाड़े । यह मायाकाही आवरण है कि, सब लोगोंका यह संकल्प दृढ़ है कि, मैं अमुक नगर और स्थानका वासी हूँ, अनेक पीढ़ियोंका इस भूमिपर मेरा अधिकार है, यद्यपि कोई नहीं जानता कि, कौन नगर कब बसा और यह देश कबसे है तथापि अपने को उसका मालिक माने बैठे हैं । जो छोटे गामोंकी उत्पत्ति स्थितिको नहीं जान सकता वह संसारकी उत्पत्ति स्थितिको क्या जाने ? अपने २ अनुमानसे सब जाति और धर्मके लोगोंने जैसा २ निश्चय किया है वैसा २ अपने ग्रन्थ और पोथियोंमें लिख दिया है, उनके अनुयायियोंके लिये वही सत्य और स्थिर सिद्धान्त हो गया है । राजा विदग्धज्ञान क्षणमात्रमें सहस्रों वर्ष व्यतीत होगये थे । समस्त संसार गन्धर्वनगरके समान है । वस्तीका उजाड़ और उजाड़का वस्ती करना मायाकी लीला मात्र है । मायामें क्या नहीं हो सकता ? मायाकी इसी विचित्र शक्तिमें पड़े सर्वजीवधारी वारंवार गते खा रहे हैं । जबतक मायाके पार नहीं होते तबतकही बंधन है ।
३० प्रश्न—जीवकी ईश्वर प्राप्ति, मनुष्य ईश्वरको प्राप्त होता है क्या ?
उत्तर—यह ईश्वरको पहचानता है अपने आपमें ईश्वरको देखता है ईश्वर आत्मासे भिन्न नहीं है, जबतक ईश्वर और जीवका भेद है तबहीतक बन्धन है । ईश्वर जीवका भेद मिटे बिना मुक्ति नहीं हो सकती । ईश्वरको अपनी आत्मामेही जाननेसे मुक्त होगा ।
३१ प्रश्न—पुरुषार्थ और प्रारब्ध, मनुष्य पुरुषार्थसे जो चाहे वोकर सकता है प्रारब्धके माननेकी आवश्यकता ही क्या है ?
उत्तर—यदि प्रारब्ध न होता तो मनुष्य अपने पुरुषार्थसे जो चाहता कर लेता, कभी अपनी इच्छा नष्ट न होने देता पर इसके विरुद्ध यह देखनेमें आता है कि, कभी २ नाना प्रकारके पुरुषार्थ करने परभी मनुष्यको निराशही होना पड़ता है । अपनी कामनाकी अग्निमें जलते हुये अनन्त मनुष्योंने पुरुषार्थ करते २ अपना जीवन बिता दिया पर सफलताका दर्शन नहीं प्राप्त हुआ । इससे यह कहना कि, पुरुषार्थ ही सब कुछ है प्रारब्ध नहीं, यह केवल हठ और दुराग्रह है । पर इसके साथ ऐसा भी न समझना कि, सब कुछ प्रारब्धही है, बरन् पुरुषार्थ और प्रारब्ध दोनोंके संयोगसे कार्य सिद्ध होता है । जिस प्रकार पक्षीके एकही पर हों तो वो कदापि नहीं उड़ सकेगा, उड़ना दो पक्षोंसे ही होता है । इसके साथ २ एक बात और भी है कि, यदि दोनों पक्ष भी हों शारीरिकबल न हो तो उड़ना महान् कठिन ही नहीं बरन् असम्भव हो जाता है । उसी प्रकार प्रारब्ध और पुरुषार्थभी हो पर कार्य करनेका सम्यक् ज्ञान न हो तो कार्य सिद्ध नहीं हो सकता । इस कारण पुरुषार्थ, प्रारब्ध और गुरुकी दया इन तीनोंसे व्यवहार सिद्ध होता है । यदि मनुष्य स्वतंत्र होता तो संसारके सब दरिद्र मनुष्य भी राजा बन जाते । सभी वेषधारी सिद्ध बन जाते, सब कायर शूरवीर हो जाते, सब बन्दर हनुमान हो जाते । इससे यह सिद्ध हुआ कि, प्रारब्धके बिना पुरुषार्थ तुच्छ और पुरुषार्थके बिना प्रारब्ध तुच्छ है ।
३२ प्रश्न—सिद्धान्तोंकी भिन्नता, ईश्वर विषयक सिद्धान्त लोगोंके नाना प्रकारके हैं, कोई कुछ बतलाता है, और कोई कुछ कहता है इनमें यथार्थ क्या है?
उत्तर—यथार्थका ज्ञान किसीको नहीं है । जिसको जैसा विचार है जिसको जैसा संकल्प दृढ़ होगया है उसको वैसाही ईश्वर भान होता है । जैसा मैं पहले लिख आया हूँ कि, एक ब्राह्मणको भैंसाके रूपमें ही ईश्वरका दर्शन हुआ था । परमियाह नबीकी नोहमें लिखा है कि, रीछके रूपका परमात्मा था ।
“जैसी रूह वैसे फिरिश्तः” के अनुसार जैसा अपना कर्म होता है वैंसाही फल मिलता है ।
३३ प्रश्न—कियेका बदला, संसारमें किये हुये कम्मोंका बदला मिलेगा अथवा नहीं ?
उत्तर—किये हुये कम्मोंका फल अवश्य भोगना पड़ेगा । जो कोई किसी जीवधारीको किसी प्रकार दुःख पहुँचावेगा उसे भी दुःख पहुँचेगा ।
३४ प्रश्न—अगम्यकी गति, जो किसी युक्ति और तर्कसे न जान पड़े उसे किस प्रकार जानना चाहिये ?
उत्तर—गुरुकी सैन और मौनसे ।
३५ प्रश्न—कबीर पन्थकी विशेषता, मौन तो प्रत्येक धर्मवाले बतलाते हैं फिर आपमें क्या विशेषता हुई ?
उत्तर—हममें और अन्य धर्मियोंमें यह भेद है कि, उनके गुरु त्रय देव हैं जो मुक्त नहीं हैं हमारा गुरु नित्यमुक्त कबीर है । वही नित्य मुक्त कबीर समस्त जीवोंको क्षण मात्रमें मुक्त कर सकता है । वही सब शक्तिमान है ।
३६ प्रश्न—पूजाका निर्णय, किसकी पूजा, किसके अनुसार करना उचित है ।
उत्तर—सत्यपुरुषकी पूजा, स्वसंवेदके अनुसार करे ।
३७ प्रश्न—पापके कारण, संसारमें पापकी वृद्धि क्यों हुई ?
उत्तर—मनुष्यका हृदय विषयवासनासे पूर्ण है, पापकी अधिकताका यही कारण है । जब मनुष्यके हृदयसे विषयवासनाकी इच्छा नाश हो तब पाप भी नष्ट हो जावेंगे ।
३८ प्रश्न—मोक्ष मार्ग, ज्ञान और शरणागति इनमेंसे किससे मुक्ति होती है ।
उत्तर—भक्ति और ज्ञानसे भी मुक्ति होती है परन्तु शरणागतिका यह तो सर्वोच्च पद है यदि शरणागतिके नियमकी पूर्णता होसके ।
३९ प्रश्न—कर्मकी स्थिति, जब शरीर न रहेगा तो कर्म कहाँ रहेगा ?
उत्तर—जब स्थूल शरीर नहीं रहेगा तो कर्म सूक्ष्म शरीरके संग रहेगा ।
४० प्रश्न—नियामक, शुभ अशुभ, पाप पुण्य किसने बनाये ?
उत्तर—पाप पुण्यका नियामक काल पुरुष है ।
४१ प्रश्न—सृष्टि स्वाभाविक है, ईश्वरको सृष्टि उत्पन्न करनेकी क्या आवश्यकता थी ?
उत्तर—मनुष्यको भूख प्यास लगनेकी क्या आवश्यकता है ? जब भूख प्यास लगती है तो भोजन और जलके ग्रहणमें परवश प्रवृत्ति होती ही है । उसी प्रकार ब्रह्ममें माया फुरती है तो सृष्टि स्वाभाविकही प्रगट होती है ।
४२ प्रश्न—कार्य सिद्ध न होने का कारण, नानाप्रकार परिश्रम करने पर भी कार्य सिद्ध नहीं होता. इसका क्या कारण है ?
उत्तर—ईश्वरच्छा विरुद्ध अथवा प्रारब्धिही इसका कारण है ।
४३ प्रश्न—शुद्धधर्म, वह कौन धर्म है जो सब प्रकार शुद्ध है ?
उत्तर—वह धर्म कबीर साहबका है ।
४४ प्रश्न—भक्तिका निर्वचन, भक्ति किसको कहते हैं ?
उत्तर—भगसे पार होजाने का नाम भक्ति है । जबतक यह भगमें आया जाया करता है तबतक भक्ति पद नहीं मिलता । तबतक कोई भक्त नहीं हो सकता जबतक भगसे छुटकारा नहीं पा जावे । यह सारासंसार और तीनों लोक भगमेंही वर्तमान है । जो तीनों लोकसे पार होजावे उसका नाम भक्त है, भक्त न भगका साथ करता है न भगमें आता है कितनी स्त्रियोंके साथ जो कोई सम्भोग करेगा अवश्य उसको उसके गर्भमें आकर जन्म लेना पड़ेगा ।
४५—प्रश्न—सत्य परमात्माका धर्म, यदि ईश्वर एक है तो सब मनुष्योंका धर्म भी एकही होना चाहिये ?
उत्तर—ईश्वर तो एक है पर मनुष्योंकी कामना भिन्न भिन्न है । जैसी जिसकी कामना होती है वैसेही धर्मोंमें उसकी प्रवृत्ति होती है उसीमें उसको प्रसन्नता होती है । जिसको जो धर्म अच्छा लगता है, वह उसके अतिरिक्त दूसरेको स्वीकार नहीं करता. क्यों कि, अपनी इच्छानुसार उसको वह धर्म मिला है । जो धर्म सब दूषणोंसे शुद्ध हो वह सत्य परमात्माका धर्म है ।
४६ प्रश्न—भक्ति बिना मुक्तिका दाता, ऐसा भी कोई गुरु है जो बिना भक्तिके मुक्ति देशके ?
उत्तर—यह सामर्थ्य केवल कबीर साहबमें है कि, बिना भक्तिकेभी अनन्त जीवोंको परम धामको पहुँचा दिया और अनेक भक्तोंको सपरिवार सत्य लोकको पहुँचा दिया ।
४७—प्रश्न—कबीर पंथसे मुक्ति, हिन्दू मुसलमान आदि सर्व धर्मवालोंको क्या एकही प्रकारकी मुक्ति मिलेगी ?
उत्तर—अपने २ कर्मानुसार सदा योग्य स्थान सब कोई पावेंगे पर मुक्ति तो तब होगी जब कबीरपंथमें सम्मिलित होंगे ।
४८ प्रश्न—वेदान्ती और कबीर पन्थियोंमें भेद, आपने वेदान्तियोंको असत्यवादी कहा है पर आप भी तो उन्हीके समान वचन कहते हैं भेद क्या हुआ?
उत्तर—वेदान्तियोंका वचन तत्त्वमसिके अन्तर्गत है इसी कारण मिथ्या है, हमारा कहना तत्त्वमसिसे बाहर है जिसका ज्ञान उनको नहीं है।
४९ प्रश्न—चर्मचक्षुसे देख, लाभ न पाया, आपने कहा था कि, ईश्वर शारीरिक आँखोंसे देखा नहीं जाता, जो बाहरकी आँखोंसे देखा जाता है वह मिथ्या होता है, तो कबीर साहबको भी तो लोग आँखों से ही देखते थे ?
उत्तर—हो, जिन लोगोंने कबीर साहबको बहिर दृष्टिसे देखा, अन्तर दृष्टि रखते नहीं थे उनको कुछ लाभ नहीं हुआ।
५०—प्रश्न—शत्रु, मित्र, सर्वका कर्ता ईश्वरही है, मनुष्यको भी कुछ अधिकार है ?
उत्तर—आपमें ईश्वर है, ईश्वरमें आप हैं। जिसने सबमें ईश्वरको देखा उसने कर्तापिनेका अहंकार छोड़ दिया। मूर्ख लोग कहते हैं—ईश्वरने मेरे ऊपर आपत्ति डाली। यदि ऐसे मूर्खोंसे पूछो कि, ईश्वरको तेरे साथ क्यों शत्रुता हुई तो कहेंगे कि, “मैंने अमुक पाप कर्म किया था” इससे प्रमाणित होता है कि, कर्मही मित्र और शत्रु है।
५१ प्रश्न—नाम रूपसे छूटनेका मार्ग, नाम रूप सब मिथ्या और भ्रम है फिर किसका भजन ध्यान करना चाहिये ?
उत्तर—नाम और रूप दोनों निःसन्देह अनित्य हैं। इसके आगे गुरुकी कृपासे जाना जाता है। जब नाम रूप दोनोंही मिथ्या हैं तो फिर हम तुम कैसे सत्य हो सकते हैं ? इस कारण असत्यको असत्यके साथ मैत्री होनी ठीकही है। इससे यह प्रमाणित होता है कि, नाम और रूपका भजन करना चाहिये। जब नाम रूपके परेका विचार होगा तब ये आपही छूट जावेंगे।
५२ प्रश्न—ब्रह्माण्ड दर्शन, कबीर साहबने केवल महम्मद साहेबकोही ब्रह्माण्डोंका भ्रमण कराया कि, किसी औरको भी ?
उत्तर—करोड़ों अगिनित मनुष्योंको लोक दिखलाया जिसका कि, हाल कबीरपंथकी पुस्तकोंको पढ़नेसे जान पड़ेगा।
५३ प्रश्न—न्याय और दया एक साथ, ईश्वरको न्यायी और दयालुभी कहते हैं, दोनों गुण एक साथ कैसे रह सकते हैं ?
उत्तर—दो बात एक साथ इस प्रकार रह सकते हैं कि, जैसे न्यायने जो अबल पक्षादि पक्षियोंको दुखमें डाल दिया, प्रभुकी दयाने उस दशामें भी उसके
पोषण पालन करके रक्षा की । यह उसकी दयाही है कि, सहस्रशः जीवधारी वर्षा भूखे प्यासे रहनेपर भी जीवित रहते हैं ।
५४—प्रश्न—कोई पार न होगा, मेरे जाननेमें सब आचार्य ठीक मार्ग बतलाते हैं । सब अपने २ अनुयायियोंको भवसागर पार करावेंगे ?
उत्तर—मूर्खमल्लाह और टूटी नाव पर चढ़कर कोई पार नहीं जा सकेगा.
५५ प्रश्न—कबीर साहबकी भविष्यत वाणी, किन २ ग्रन्थोंमें है ?
उत्तर—कबीर साहबके ग्रन्थ और भविष्यत वाणीकी कुछ सीमा नहीं है अगनित और अपार है ।
५६ प्रश्न—भेष बनानेसे लाभ क्या ? यदि कोई भेषके बिना भजन करे तो नहीं हो सकता ?
उत्तर—यद्यपि सच्चे भावसे किया हुआ भक्ति और भजन बिना भेषके भी ईश्वर स्वीकार करता है पर भेष बनानेमें बहुत बड़ा लाभ है जैसे और काग भेषसेही जाने जाते हैं; वैसेही गुरु और धर्मका पता भेषसेही जाना जाता है, भेषके देखतेही जाना जाता है कि, यह अमुक भेष का साधु है । उनका ऐसा कर्तव्य है । जैसे भगवाँ वस्त्रवालेको देख करही अनुमान होता है कि, यह शैव है. क्योंकि, शिवके सेवकों तथा योगियोंकोही यह भेष, दिया गया है. भगवाँ-वस्त्र भवसागरका चिन्ह है । जो कोई यह भेष बनावेगा उसका आवागमन न छुटेगा क्योंकि, जो जैसा वेष बनाता है उसका स्वभावभी वैंसाही हो जाता है । अतः जो भगवाँ वस्त्र पहनता उसका मन वेदांत शास्त्र पढ़नेको चाहता है । वेदांतका आशय समझे अथवा न समझे, साधन सम्पन्न हुआ हो अथवा न हो पर “अहं ब्रह्म” बोलना सीख जाता है । फिर क्या है । अहं ब्रह्म बननेके साथही पूर्ण अभिमानी बनता है । जब अपनेको सबसे बड़ा समझता तो किसीको नमस्कार क्यों, करेगा, उसमें दीनता क्यों होगी ? दीनता तथा सरलता बिना सत्संग होना असम्भव है, सत्संग न होनेसे मन आदिका विकार निकलना कठिन है, इसके नष्ट हुये बिना सत्य पदका पाना दुर्लभ है, सत्यपद पाये बिना मुक्ति पाना असम्भव है जैसे कोई सिपाही शस्त्रास्त्रसे सज्ज हो तो उस समय उसका मन अवश्य युद्ध करना चाहेगा । आशय यह है जो जैसा वेष बनावेगा वह वैंसाही कर्म करेगा ।
भगवाँ (गेरुआ) वस्त्रके बिना नीला आदि नाना रंगोंके वस्त्रसे भेष बनानेवालेका प्रचार होगया । पर सब भेषोंमें वैष्णव भेष सर्वोत्कृष्ट सर्व श्रेष्ठ है । इसकी प्रशंसा कबीर साहब तथा स्वयम्, विष्णु महाराजने की है ।
यह वैष्णव भेष भक्ति मुक्तिका चिन्ह है। कंठी तिलक और माला तथा उज्वल वस्त्रादि जो कि, वैष्णव रखते हैं यह मुक्तिका चिन्ह है। जलका रंग श्वेत है, सब रंगोंका मूल यही रंग है। यही सत्गुणका चिह्न एवं दयाका रूप है। जहां यह भेष होता है वहां दया तो आगे पताका लेकर चलती है। यह वैष्णव भेष दयाका भण्डार इसी भेषमें दयाका निवास है।
इस भेषके विषयक एक कथा।
एक मछुआ मछली मारनेके लिये नदीमें जाल डाले हुये बैठा था इतनेमें एक राजाकी सवारी सह सैन्य उधर आ निकली। सैन्यको देख मछुआ डर गया कि, राजा मुझे अवश्य दण्ड देगा। क्योंकि वह वैष्णव था। मछुयेका नाम कालू था, उसने अपने जालमें लगे हुये मुद्रियोंका तो मनिका बनाया और जालसे धागा ले एक माला बनायी, मिट्टीका तिलक लगाकर जालको पानीमें छिपा माला फेरने लगा। इतनेमें राजाकी सवारी आगई। राजाने देखा कि, कोई साधु बैठे भगवत्नाम जप रहा है। भक्ति पूर्वक उसके निकट जाकर राजा नमस्कार कर कुछ भेंट रखकर चल दिया, राजाकी देखादेखी सब सेना भरके लोगोंने पूजा भेंट चढ़ाई। नदी पार उतर चले जानेपर कालूने आँख खोलकर देखा। अपने आगे नाना प्रकारके वस्त्र और द्रव्यादि पदार्थोंका ढेर देख मनमें विचार करने लगा कि, जब मैंने केवल ढोंग करके भयसे वैष्णवका स्वाँग बनाया था तो मेरी इतनी प्रतिष्ठा हुई। यदि मैं सच्चा वैष्णव बन जाऊँ तो न मालूम मुझे क्या फल मिलेगा? ऐसा विचार कर कालू उसी समय हृदयसे मछुएका काम छोड़ दिया वैष्णव हो यह दोहा कहा—
दोहा— बाना बड़ा दयालका, छाप तिलक उर माल।
यम डरपे कालू कहे, भय माने भूपाल ॥
उसी दिनसे कालू सब औगुणोंको त्यागकर सच्ची वैष्णवताको प्राप्त कर, परमानन्दमें मग्गन हो गया।
इसी पर कबीर साहबकी—पुस्तकोंमें भेषकी महिमा बहुत लिखी है,
चौ०— माला तिलक मनोहर बाना। जाकी महिमा सकल बखाना ॥
राजस यज्ञ करे जब राजा। माला तिलक बिनु घण्ट न बाजा ॥
माला तिलक जब आन बिराजा। शंख पञ्चायन तबही बाजा ॥
तब यह महिमा प्रगटहि जानी। अपने मुख कहि शारंग पानी ॥
जाकी महिमा अगम अभेवा। निगुरा कहैं जाने गुरु सेवा ॥
निगुरा निज मुख निन्दा करई। ढोल बजाय नरकमें परई ॥
बाकी निन्दा सुने जो कोई । जाको रुचे सो जाय विगोई ॥
माला तिलक साहबको बाना । जाहि देखि यम काल डराना ॥
साखी— माला तिलक निन्दा करें, ते प्रगट यमदूत ।
कहैं कबीर विचारिके, तेई राक्षस भूत ॥
द्वादश तिलक बनावई, अगँ अगँ अस्थान ।
कहै कबीर विराजही, उज्वल हंस अमान ॥
५७ प्रश्न—पारख गुरु प्राप्त होनेकी युक्ति बताइये ।
उत्तर—गुरुकी सेवा तन मन धनसे करना, उसकी आज्ञासे कभी बाहर न जाना । गुरुके समान साधुकी सेवा भक्ति करनी और साधुमें किसी प्रकार भेद दृष्टि न करनाही पारख गुरुके मिलनेका सहज मार्ग है । इसी प्रकार साधु गुरुके सेवा करते २ गुरुमेंसे ही पारख गुरु प्रगट हो जावेगा । जैसे फूलमेंसे सुगन्धि निकल पड़ती है ।
५८ प्रश्न—स्वसंवेदसे वेदका प्राकट्य, आपने कहा कि, उत्पत्तिसे प्रथम चार वेद प्रगट हुये, स्वसंवेद कबीर साहबने पीछेसे कहा, फिर स्वसंवेदसे वेदका प्रागट्य कैसे माना जाय ?
उत्तर—माया सृष्टिसे प्रथमही स्वसंवेद था उसीसे निकालकर चार वेद व्यक्त हुए मायासृष्टिके पहले जीवसृष्टि और ब्रह्मसृष्टि दो सृष्टि थीं उसमें स्वसंवेद था स्वसंवेद स्वयम् सत्पुरुषका वचन है । उसके प्रथम कोई नहीं है । वेदके आदिमें स्वसंवेद था, अंतमें भी वही रहेगा, वही सर्वदा रहता है ।
५९ प्रश्न—भजनकी विधि, भजन किस प्रकार किया जाता है ? उसकी कितनी रीतियाँ हैं ?
उत्तर—साधारण नियम यह है कि, अपने गुरुकी आज्ञानुसार भजन कर-गुरु भक्ति, साधु सेवा तथा तपस्यामें स्वयम् मग्न हो जाना ॥
? सत्य पुरुषके लोकमें पहुँचानेवाली विद्याको परा विद्या या स्वसंवेद कहते हैं वो भी वेदोंमेंही है ज्ञान चिन्तामें वही प्रधान है इस कारण प्रधान पहिला एवं अप्रधान पीछे कहा जा सकता है । क्योंकि, जो जिसके कार्योंमें न आवे वो उसके जाने पीछाही है इसी प्रकार जो कबीर दर्शनमें परा विद्या विषयक साहित्य है वो तो उसी समयका कहा जा सकता है उसका वर्ण विन्यास भी उसी समयका होगा यह शब्द आदिमें उर्दू आदि आज कालकी भाषाओंके शब्दोंको देखनेसे जाना जाता है पर उसका जो परा विद्या विषयक तात्पर्य है वो ही स्वसंवेद कहला सकता है उसेही ज्ञान चिन्तावाले मुख्य कह सकते हैं एवं तात्पर्य मुख्य है वही स्वसंवेद है अन्य नहीं ।