भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

तीरीतकी आज्ञाएं, एक खुदा (ईश्वर) की पूजा करे, समीक्षा

बुल्लेशाह साहबको मर्दद और शौतान कहा करता था । हजरत शाह साहब उसकी बातोंको सुनकर धैर्यसे सन्तोष करके चुप रहते थे । एक दिन मौलवी कहने लगा कि, ऐ बुल्लेशाह ! तू जब मरेंगा तब मैं तेरा मुंह काला करवा, टोंगोंमें रस्सी बँधवा, समस्त शहरमें घसीटवाऊँगा । मौलवी उसका बड़ा काजी था, मुसलमानी राज्यमें फतवा दिया करता था बहुत बल रखता था । उसकी बातें सुनकर बुल्लेशाह साहबने कहा कि, ऐ काजी ! जब मैं मरूँगा तब तू यहाँ न होगा, मेरे मरनेके पीछे तू मरेंगा बहुत दुःख दर्दसे पड़ेगा, वहाँ तेरा प्राण न छूटेगा तब तू कुसूरमें आवेगा तो मेरे पगके नीचे गाड़ा जावेगा तभी तेरेको शान्ति होगी । अन्तमें मौलवी काबुल गया । बुल्लेशाहका देहान्त हो गया । कुसूरमें उनकी अन्तिम क्रिया हुई । वह काजी काबुलमें बीमार पडा, उसके शरीरमें बहुत जलन उत्पन्न हुई, बहुत दुःखी हुआ पर प्राण नहीं निकला, उसने कहा कि, मुझको शीघ्रही कुसूरमें बुल्लेशाहके चरणोंमें ले चलो । मौलवी बुल्लेशाहकी कब्र निकट पहुँचा तो उसका प्राणान्त हो गया बुल्लेशाहके पगकी ओर उसकी कब्र बनी है । उसकी सभी शरयतें और विद्याभिमान भूल गया, कोई काम न आया । सच्चे सन्तोंके विद्वेषियोंको कभी सुख नहीं मिल सकता ।

मृतकाचार्योंके शिष्य—विद्याभिमानियोंके कोई गुरु नहीं । केवल वे पुस्तकोंहीको गुरु माने बैठे हैं । किसी एक धर्मके आचार्यका नाम लेकर उसकी ओटमें नानाप्रकारके शुभ अशुभ व्यवहार करते रहते हैं, यद्यपि आचार्यकी सूरत भी नहीं देखी कि, वह कैसा है ? केवल किसीका नाम सुनकर उसके चेला बन जाते हैं कहते हैं । कि, हम अमुक आचार्यके अनुयायी हैं, ऐसाही है—जैसा कोई कहे कि, आकाशमें बाग लगा है मैंने उससे खूब फल तोड़कर खूब खाए जिससे पेट भर गया । ऐसे झूठ सत्य मार्गपर कभी नहीं आ सकते । जिसको मरे हुये बहुत काल बीत गया, उस आचार्यका नाम लेकर चेला बन जाना तो ऐसाही है—जैसा कोई स्त्री कहे कि, अमुक पुरुष जिसको मरे हुये अब बहुत दिन बीत गये हैं मैंने अपना पति आज बना लिया । इस प्रकारके पति बनानेसे सन्तानकी उत्पत्ति न होगी, यह सब मूर्खताका विचार है बिना गुरु चेलाके मिले कदापि ज्ञान नहीं होता । स्त्री पुरुषके संयोग बिना सन्तान उत्पन्न भी नहीं हो सकती ।

इस मण्डलीके लोगोंको आँख, कान और बुद्धि भी है पर प्रकाश और

निराकार निरव्यवका पता नहीं

शुद्धताके बिना अहंकृत बुद्धि, अज्ञान पथमें डाल देती है। जिसे वे ज्ञानके पथसे निराश रह जाते।

उपदेशके अयोग्य—ये विद्याभिमानी लोग सच्चे नहीं कहे जा सकते, बरन्पेटके लिये उद्यम करते हैं। सैकड़ों विद्याभिमानियोंपर एक अपढ़ सन्तका विचार जय पावेगा, इसमें कुछ सन्देह नहीं कि, जो तत्त्ववेत्ता विद्वान् नहीं अपने कहनेके अनुसार चलनेवाला नहीं उसके वचनपर विश्वास करना अपनेको कुमार्गमें डालना है। सन्त लोग विद्याभिमानियोंको उपदेश भी नहीं देते। क्योंकि उनका अन्तःकरण सांसारिक ज्ञानसे भरा रहता है। पुराने अह्वनामके २८ के बाबसालिब नबीके वृत्तान्तामें लिखा है कि, वह एक औरतसे जिसका कि मित्र एक राक्षस था कुछ समाचार पूछने गया इसी कारण उसका ज्ञान लुप्त हो गया।

इसी प्रकार सब मनुष्योंकी दशा है। जिस अन्तःकरणमें अभिमानने स्थान किया, वह अन्धकारमय पत्थरके समान कठोर हो गया, वह कभी सुधारने योग्य नहीं होता। बड़े २ विद्वान् लुकमान, अफसातून अस्तू सुकरात आदिकोंको सच्चे सन्तोंके उपदेशके बिना बहुत दुख भोगना पड़ा, हिकमत तथा रसालत राज्य आदिक सबका अन्तिम परिणाम शोक एवं निराशाही है।

गजल - जितने उल्माजमीं ऊपर न जाने क्या खुदाई।

शरीतकी सलाई उनकी आँखोंमें चलाई है ॥

यह हरदो ऐन अन्धे हैं सो यम जालिमके बन्दे है ॥

फकीरोंके कदमकी खाक आँखोंमें न पाई है ॥

हजो करके फकीरोंके हैं आशिक राहगीरोंके।

ठगोंकी दोस्ती करके गला अपना कटाई है ॥

दरूनी और बेरूनी आँख रौशन मिसल सद सूरज।

जो दर्वेशन खाक पायेका सुरमा बनाई है ॥

जो इस दुनियाके दाना सब हैं ओकबा महज नादानसो।

खबरदारान इश्क आलम खबर ऐसी सुनाई है।

पकड़ जब लेवे मलकुलमौत भूलें सारी दानाई है।

जो गन्धक आगके घर बीचमें डेरा बनाई है ॥

न जबतक वारते फुकरापर तनमन और धन आजिज।

करें तदबीर सो सदहा सो कहाँ राहे रहाई हैं ॥

बुत परिस्तीको खुदा परिस्ती

परमात्मा के तुल्य—साधुओंकी सद्भक्ति साधुओंके दर्शन एवं साधुओंका भोजन वस्त्र देना साधुओंकी अवश्यकता पूरी करना आदि नाना प्रकारोंसे साधुओंकी सेवा करनेका अनन्त फल है, वह वर्णन नहीं किया जा सकता। सच्चे साधुओंकी सेवा करना सर्वोपरि है वह परमात्माकी सेवाके समान है।

साधुओंके दर्शनका फल।

साधुओंके दर्शनका फल इतना है कि, मुझसे वर्णन नहीं किया जा सकता। कबीर साहबने स्थान स्थान पर इस विषय पर बहुत कुछ कहा है। सन्तोंके दर्शनसे पशुसे मनुष्य और मनुष्यसे फिर जीवन मुक्त हो जाता है; जैसा कि, मैं पहले लिख आया हूँ कि, कबीर साहबके दर्शनसे कुत्तीका बच्चा मनुष्य हो गया। मनुष्यसे जीवन मुक्त होगया तो सन्तके नाम और दर्शनका फल नहीं कहा जा सकता। जैन धर्मके ग्रन्थोंमें एक दृष्टान्त लिखा है कि—

एक सिंहने एक सन्तको बनमें जाते हुये देखा। दर्शन करतेही मनमें यह विचार हुआ कि, मैं बड़ा पापी हूँ : एक तो जीवोंको खाता हूँ, दूसरे जीवित पशु सब मुझसे ऐसे भयभीत रहते हैं कि, मृतक तुल्य हो रहे हैं, अब ऐसा पाप न करूँगा। ऐसा सोच समझ कर व्याघ्र शान्त हो एक स्थान पर बैठ गया, तेरह दिन तक बराबर भूखा रहनेसे उसके प्राण निकल गये, इस पुण्यके प्रतापसे वह मरकर समस्त भारतवर्ष तथा अनेक देशोंका राजा हुआ। उसका नाम चक्रवर्ती भरत हुआ। बहुत समय तक राज्य करनेके बाद त्यागी होकर मुक्तिका अधिकारी हुआ। सहस्रों ऐसे दृष्टान्त हैं, कहाँ तक लिखूँ ? पर इसके साथ ऐसा तर्क न करना चाहिये कि, सन्तके दर्शन सभी मनुष्य करते हैं ऐसेही क्यों नहीं हो जाते ? वरन् ऐसा समझना चाहिये कि, जिनका अन्तःकरण कठोर है उनके पूर्वजन्मके पाप बहुत हैं उनका अन्तःकरण पत्थरके समान हो गया है, जिस पर तीररूपी उपदेश अथवा दर्शनका प्रभाव कुछ असर नहीं करता ऐसे अशुद्ध अन्तःकरणवालोंको साधुओंके दर्शन करने और वचन सुननेसे कुछ भी लाभ नहीं होता, कबीर साहब सन्ध्या स्मरणमें कहते हैं कि—

साखी — साधु साधु मुखसे कहे, पाप भसम होइ जाय ।

आप कबीर गुरु कहत हैं, साधू सदा सहाय ॥

साधुके नाम और दर्शनका फल है, जिन साधुओंकी यह महिमा है उनसे बढ़कर दूसरा कौनसा तीर्थ व्रत और दान, पुण्य है ? साधुओंके प्रसादका भी बड़ा माहात्म्य है। साधुओंके चरणामृतकी महिमा बहुत लिखी है, जिससे कि, मनुष्यका अन्तःकरण शुद्ध होता है।

तीनों पुच्छ हैं

साधुओंके भोजन देनेका पुण्य ।

जितने षट्दर्शनके सन्त हैं तथा दूसरे धर्मोंके साधु हैं उनको भोजन करानेसे महान् पुण्य होता है । कबीर साहब कहते हैं कि—

कहैं कबीर धर्मदाससे, भूला क्या डोला हो ।

कोटि यज्ञ फल होता है, एक साधु जेवायें हा ॥

कबीर साहब कहते हैं कि, एक साधुके भोजन देनेसे करोड़ों यज्ञोंका फल होता है । मैं प्रथमही लिख आया हूँ कि, पाण्डवोंकी यज्ञमें श्वपच सुदर्शनने जब भोजन किया तब यज्ञ पूरी हुई । दान पुण्य और यज्ञ आदिक किसी काम न आई । इस कारण सब साधुओंके भोजन देनेकी अपेक्षा हंस कबीरको भोजन देनेका सबसे अधिक पुण्य है ।

तिमिर लिंगको रोटीका फल—एक समय जिन्दा भेषमें कबीर साहब समर क़ंदमें रोटी २ पुकार रहे थे । किसीने रोटी नहीं दी पर तिमिरलिंग नामक एक लंगडने बड़े प्रेमके साथ रोटी खिलाई, पानी पिता सेवा की । साहबने उसको बड़ा भारी राज्य दिया, उसकी दरिद्रता दूर हो गई । वह कङ्काल बड़ा प्रभावशाली बादशाह बन गया । इसपर गरीबदासजीकी शास्त्री है ।

गरीब — देहली अकबरा बादमें, फिर लाहौरको जात ।

रोटी रोटी करत हैं, कोई न पूछे बात ॥

गरीब — तिमिरलिंग तालिब मिले, रोटीकी दी चाय ।

जिन्देकी उरमें धसी, तिमिरलिंग सुन माय ॥

गरीब — रोटी पोई प्रीतिसे, जलका तोटा हाथ ।

जिन्देकी पूज करे, मातु पुत्र दोउ साथ ॥

गरीब — तिमिरलिंग उभी रहे, मनमें कछू न चाय ।

मौज मेहर मौला करी, दीन्हा तख्त बैठाय ॥

गरीब — हिन्द जिन्द सभी दर्द, सेतुबन्ध लग सीर ।

बड़ गजनी ताबा करी, जिन्दा इस्म कबीर ॥

पारख अङ्गकी साखी ११६४ से ११७३ तक देखो ।

शास्त्र—साधु फकीरोंकी सेवा करनी चाहिये, सन्त सेवा सहस्रों आपत्ति दुःखोंको नाश करती है । पक्षपात रहित हो सब प्रकारके सन्तोंको भोजन दे

१ वास्तवमें सच्चा साधु हो कोई भी हो परमात्माकाही रूप है ।

बुत परिस्ती मत करो खुदाका नाम बेफ़ायदा मत लो

कदापि न चूके, इसी कारण शास्त्रोंमें आज्ञा है कि, गृहस्थ भोजन तैयार होनेपर पहले साधु अभ्यागतोंको खिलाले, पीछे आप भोजन करे । कबीर साहबने कहा है कि, जिस घरमें साधु भोजन नहीं करते वह मरघट और मसान है, उसके रहनेवाले भूत प्रेत हैं । जिस घरसे साधु अभ्यागत भोजन किये बिना फिर जाते हैं उस घरमें भूत प्रेत रहते हैं; भोजन करते हैं । इस कारण प्रत्येक गृहस्थको उचित है कि, घरमें भोजन तैयार हो जावे उस समय अपने

गीता अध्याय ३ श्लोक १३ ॥

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।

भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥

पदच्छेद—यज्ञ'शिष्टाशिनः सन्तः' मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः' । भुञ्जते' ते' ।

तु' अघं' पापाः' ये' पचन्ति' आत्मकारणात्' ॥ १३ ॥

पदार्थ—जो पुरुष यज्ञके शेष अन्नको भोजन करता है वह शिष्टपुरुष सब पापोंसे छूट जाता है पापात्मा पुरुष केवल अपने वास्तेही अन्न पकाते हैं वे पाप-काही भोजन करते हैं ।

जो अधिकारी जन ऋषियज्ञ, देवयज्ञ पितृयज्ञ, मनुष्ययज्ञ और भूतयज्ञों को करके बचे हुए अमृतरूप अन्नको भोजन करते हैं, वेही श्रेष्ठ कहे जाते हैं । श्रद्धापूर्वक सज्जनों संतों और —शास्त्रोंके कहे कर्मोंको करनेवाले पुरुषोंकोही श्रेष्ठ कहा गया है । श्रेष्ठजन प्रमाद करके किये हुये तथा और भी अनेक प्रकारोंसे हुए पापोंसे रहित होते हैं ।

पंच सूना रूप निमित्तसे उत्पन्न हुये पापोंको नष्ट करनेके लिये श्रेष्ठ जन अपने २ संप्रदायके अविरुद्ध पंच यज्ञका नित्य सेवन करते हैं ।

पंच यज्ञोंको न करनेवाले पुरुषोंको पापकी प्राप्तिका वर्णन करते हैं । पंच महायज्ञोंको न करनेवाले पापात्मा केवल अपने उदरके लियेही अन्नको पकाते हैं, देवता, अतिथि आदिके लिये रसोई नहीं बनाते वे पुरुष केवल पाप-काही भोजन करते हैं, अन्नका भोजन नहीं करते । यद्यपि पापात्माओंकी दृष्टिमें वह अन्नही है तो भी संत शास्त्र और देवताओंकी दृष्टि करके सो अन्न पापरूप ही है । एकतो उपरोक्त पाप अपना नित्य कर्तव्य छोड़नेसे दूसरा पाप लगता है । यथा— कण्डनी पेष्णी चुल्ली उदकुंभी च माजंनी ।

पंच सूना गृहस्थस्य ताभिः स्वर्गं न विदति ॥

अर्थ—गृहस्थ पुरुषों के गृहमें हिंसा होनेके पांच स्थान होते हैं । १—ऊखलके कूटनेसे जीवोंकी हिंसा होती है, २—पाषाणकी चक्कीमें अन्नको

द्वारपर खड़े होकर इधर उधर देखे । जो कहीं भूखा साधु अथवा पथिक तथा किसी प्रकारका मनुष्य भूखा मिल जावे, तो प्रथम उसको सत्कार पूर्वक भोजन करावे, पीछे आप भोजन करे । जब कोई भोजन करने वाला न मिले तो अकेला भोजन करनेपर पश्चात्ताप करे । परमात्मासे उस दिन अभ्यागत न मिलनेके कारण, अपराध क्षमा करनेकी प्रार्थना करे । किसी प्रकार छल कपट और बनावट न करके साधु अभ्यागतोंको नित्य भोजन कराया करे । साधु अभ्यागतोंको भोजन कराती बार किसी प्रकारकी स्तानि और घृणा न लावे, भोजन पीसनेसे जीवोंकी हिंसा होती है; ३—तीसरा अन्नके पकानेके वास्ते चुल्लेमें अग्निके जलानेसे जीवोंकी हिंसा होती है; ४—पात्रोंमें जलके भरनेसे, बर्तनोंके मोजनेसे, जीवोंकी हिंसा होती है; ५—मृत्तिका जल आदिकों से घरके लीपने (माजने) से जीवोंकी हिंसा होती है । यह पंच प्रकारकी जी कि हिंसासे पापको प्राप्त हुआ गृहस्थ सद्गतिको नहीं प्राप्त होता ।

“पंचसूनाकृतं पापं पंचयज्ञैर्व्यपोहति” ॥

अर्थ—पंच हिंसाओंसे उत्पन्न हुये पाप पांच यज्ञोंके करनेसे निवृत्त हो जाते हैं । वे पंच यज्ञ ये हैं—

ऋषियज्ञं देवयज्ञं भूतयज्ञं च सर्वदा ।

नृत्यज्ञं पितृयज्ञं च यथाशक्ति न हापयेत् ॥

अर्थ—गृहस्थ रोज ऋषियज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ नरयज्ञ और पितृयज्ञ शक्तिके अनुसार करता रहे इनका परित्याग न करे ।

अपने २ धर्मग्रन्थोंके पठन पाठन, नित्य क्रिया पूजा पाठआदि करने तथा अपने गुरु और साधु विद्वानोंका भोजनादि करानेका नाम ऋषि यज्ञ है ॥ १ ॥

अन्य धर्मके विद्वान् सज्जन बुद्धिमान तथा स्वधर्मके साधु सज्जन तथा सहधर्मी गृहस्थको भोजन कराना अथवा, अपने इष्ट देवके हेतु नित्यकर्म करनेका नाम, देवयज्ञ है ॥ २ ॥

गौ, कुत्ता तथा अन्य सब प्रकारके जीवधारिओंकी भोजन आदिसँतृप्ति कराने, तथा स्थावर, शाक, पात, फल, फूल, वृक्ष, आदिके व्यर्थ छेदन न करनेको भूतयज्ञ कहते हैं । ३ ॥

गृह विषय प्राप्त हुये अतिथिको अन्नादिकोंसे संतोष करानेका नाम मनुष्य यज्ञ है ॥ ४ ॥

अपने पिता, प्रपिता पितामह, चचा, भाई आदि सब श्रेष्ठ पुरुषोंको भोजन आदिसँ नित्य प्रसन्न करने तथा अपने २ नियमानुसार श्राद्ध तर्पणादि करनेका नाम पितृयज्ञ है ॥

सत्यकबीर वचन सबतका दिन याद रखो

करनेवालेको तुच्छ न समझे । यदि मनमें किसी प्रकारकी घृणा अथवा ग्लानि आवेगी तो उसका यज्ञ भ्रष्ट होकर धर्म नष्ट हो जायेगा । मनमें कभी न समझे कि, मैं इस अभ्यागत अथवा साधुओंको भोजन कराता हूँ वरन् उसका कृतज्ञ हो कि, उसने कृपाकरके भोजन स्वीकार कर लिया । प्रत्येक धर्मोंके साधु और भूखोंको भोजन देना, सम्मान करना उचित है, उनको भोजन बस्त्रसे सन्तुष्ट करना महान् पुण्य है ।

जैन साहित्यका दृष्टान्त—जैनधर्मकी पुस्तकोंमें लिखा है कि, एक विधवा स्त्री थी, उसके केवल एकही पुत्र था । वह बहुत दरिद्र और दुखिया थी, परिश्रम करके अपना और बच्चेका पोषण करती थी उसका पुत्र सर्वदा उससे कहा करता कि ए माता ! “मुझे एक दिन खीर खिला ” वह दुखिया विधवा खीर कहाँसे खिलाती ? बहुत दिनोंतक पुत्रको सन्तोष देती रही पर अन्तमें


मित्तों अथवा अन्य संबंधियोंका भी सत्कार करे ।

पाराशर स्मृतिमें पूर्वोक्त यज्ञोंको न करनेवाले पुरुषोंको पापकी प्राप्ति कही है ।

श्लोक – वैश्वदेवविहीना ये आतिथ्येन विर्वजिताः ।

सर्वे ते नरकं यांति काकयोनिं व्रजंति ते ॥

काष्ठभारसहस्रेषु घृतकुंभशतैन च ।

अतिथिर्यस्य भग्नाशस्तस्य होमो निरर्थकः ॥

जो गृहस्थ वैश्वदेव न करते तथा अतिथिको भोजन नहीं देता वह मर करके अथवा जीवित रहनेपर ही अज्ञानता निर्दयता रूप मृत्युको प्राप्त हो करके नरकको प्राप्त होता है वा जीवित रहनेपर भी नाना दुःख कष्ट और लोकनिंदा आदि दुःखोंको प्राप्त होता है जो नरकसे भी अधिक दुखदाई हैं ।

जिन गृहस्थोंके गृहसे अतिथि पुरुष अन्नादिकोंकी प्राप्ति विना निराश होकर चलाजाता है । यदि सहस्रभार काष्ठों तथा घृतके सहस्र कुंडोंसेभी होम करे, पर किंचित मात्र फल नहीं पासकते कोई कितनाहूँ पुण्य क्यों करे, वेदपाठ, विद्याध्ययन, होम, यज्ञ करे पर यदि भूखा अतिथि द्वारसे फिर जावे तो सब निष्फल हो जाता है ॥

अतिथिका लक्षण पाराशर स्मृतिमें इस प्रकार किया हैं कि—

दूरादुपगतं श्रान्तं वैश्वदेव उपस्थितम् ।

अतिथिं तं विजावीयात्रातिथिः पूर्वमागतः ॥

माता पिताकी प्रतिष्ठा करो खून मत करो, व्यभिचार मत करो

एक दिन बहुत इच्छुक देखकर, कहींसे दूध, चावल, घी, खोंड़ आदिसामग्रियाँ इकट्ठा करके खीर पकायीं। घी खोंड़ डालकर पुत्रके आगे रख दिया। आप किसी कार्य्य वश इधर उधर चली गईं। इतनेहीमें दश दिनका भूखा एक साधु उस लड़केके निकट आकर भोजन माँगने लगा। लड़केने समस्त खीर उस साधुके थालीमें देदी, वह साधु भोजनसे सन्तुष्ट हो अपने आसनपर चला गया वह बालक केवल थाली चाटकर रह गया।

उसी पुण्यके प्रतापसे बालकने एक सेठके घर जन्म पाया। समय पाकर ऐसे अतुल धनका मालिक हुआ कि, उसके बराबर कोई धनी न था। जिस नगरमें वह रहता था वह राजधानी थी, क्योंकि, राजा भी वहाँही रहता था। एक समय एक सौदागर वहाँ आया। राजाके दरबारमें जाकर उसने बहुत तरहके जवाहिरात दिखलाये। उसके पास रत्न कमल था वो राजाको दिखलाया। राजाने उसका मूल्य पूछा, उसने लाख रुपया बतलाया। पश्चात् राजाने रानीके पास भेज दिया, रानीने उसको देखकर कहा कि, इसका मूल्य बहुत है। मैं न लूँगी फेर दिया। सौदागर वहाँसे चलकर उस सेठके घर गया। सेठ तो अपने आनन्द भवनमें था पर सौदागरने उसकी विधवा माताके निकट जाकर उपरोक्त रत्न कमल दिखलाया। माता उसको देखकर सौदागरसे बोली कि,

चौरो वो यदि चाण्डालः शत्रुर्वा पितृघातकः ।

न पृच्छेद्गोत्रचरणे स्वाध्यायं च व्रतानि च ।

हृदयं कल्पयेत्स्मिन्सर्वदेवमयो हि सः ॥

जो पुरुष दूर मार्गसे चलके आया हो, थका हो, वैश्वदेव करनेके समय प्राप्त होवे उसको अतिथि कहते हैं। जो अपने पुरोहितादिक पहले वहाँ हों तो वे अतिथि नहीं कहे जा सकते।

वैश्वदेव करनेके समय (भोजन तैयार होनेपर— ब्राह्मणादि सब गृहस्थोंके घरपर, जो कोई भूखा, चोर, चाण्डाल, शत्रु तथा पिताका हनन करनेवाला भी हो, आवे तो उसे अतिथि जानना वो सबका संगम है।

पुरुष अपने गृहमें प्राप्त हुये अतिथिका गोत्र न पूछे, शास्त्रकी वार्ता भी न करे वह पढ़ा है कि मूर्ख है ऐसी बात भी न पूछे। वेदकी शाखा आदि भी न पूछे वरन् ब्रह्मचर्यादि व्रतको भी न पूछे अतिथिको सर्व देवमय अथवा अपना इष्ट देवमय जानकर अन्नदिसे यथायोग्य सत्कार करे ॥

इस प्रकार जो गृहस्थ पूर्वोक्त पंचयज्ञोंको न करके केवल अपने उदर भरनेके लियेही अन्नको पकाता है वह पुरुष अन्नरूप पापको खाता है ॥

चोरी मत करो

तेरे पास केवल सोलह रत्न कमल हैं मेरी पतोहुओं बत्तीस हैं, यदि मैं सबको न दूंगी तो जिनको न मिलेगा वह मुझसे दुःखी होंगी । सौदागरने कहा, कि ऐ माता ! यह रत्नकमल जोड़े हैं, एकके दो दो बन जावेंगे । अन्तमें विधवा माताने सब ले लिये एकके दो दो करके अपनी बहुओंको पृथक् पृथक् दे दिये । उन्होंने जब पहने तो उसमें जो जवाहिरात जड़े हुये थे, वे शरीरमें चुभने लगे जिससे कष्ट होने लगा तब उनको उतारकर फेंक दिया । जब बूहारनेवाली आई उसको बूहारनेके समय रत्नकमल मिला । वह उसे पहनकर किसी कामके लिये राजाके महल गई । रानीने पूछा कि, यह रत्नकमल कहाँसे पाया ? उसने सेठके घरका सब हाल कहा । रानीने राजासे कहा । राजा सुनकर कहने लगा ऐसा धनवान् सेठ नगरमें रहता है, अब मैं उसकी भेंटको जरूर जाऊँगा । सेठके पास खबर भेजी कि, मैं आपसे मिला चाहता हूँ । मिलनेका समय नियत किया गया । सेठकी माताने राजाके भेंटके लिये सामग्री तैयार की उसका वर्णन बहुत विस्तारसे लिखा है, संक्षेपसे यह है कि, रत्न, मोती तथा सुवर्णके मुहरोंसे किश्तों और नानाप्रकारके नाना देशोंके बनाये हुवे सूती, ऊनी और रेशमी वस्त्र और उत्तम उत्तम घोड़े, हाथी आदि राजाकी भेंटके लिये ठीक किये । राजाके भोजनके लिये नाना प्रकारके व्यञ्जन तैयार कराये । राजाके पधारनेपर सेठके नायब और गुमाशतोंने राजाकी बड़ी प्रतिष्ठा और आवभगत करके रत्न जड़ित सिंहासनपर बैठाया । फिर सेठसे भेंट हुई, सेठने भली प्रकार आवभगत करके भोजन कराया । संयोगन राजाके हाथकी अँगूठी गिर गई उसकी खोज होने लगी, पर न मिली । यह बात सेठकी माताके कान पहुँची । उसने अँगूठीयोंके दो तीन कूवें खुलवा दिये कहा, कि आपकी जैसी अँगूठी थी वैसीही इसमेंसे खोजके निकाल लो । राजाने अँगूठियोंसे भरे कुवाको देखकर एक अँगूठी निकालकर पहन ली आनन्दपूर्वक राज महल को गया । राजाके चले जानेके बाद सेठने मातासे पूछा कि, यह कौन पुरुष था, माताने कहा कि, बेटा यह देशका राजा है, जिसकी हमलोग सब प्रजा हैं । उस युवकने कहा कि, मुझसे भी जब दूसरा बढ़कर है तो मैं दूसरेके आधीन होकर न रहूँगा । उसके मनमें उसी समय संसारसे बड़ी घृणा उत्पन्न हुई । संसार त्याग देनेका विचार किया । रात हुई उसकी स्त्री अटारीपर उसके पास गई स्त्रीको देखतेही उसने कहा,—अब तू मेरे पास मत आ, तू मेरी माताके तुल्य है । दूसरे दिन दूसरी स्त्री गई उससे भी ऐसाही कहा । जब उसने इसी प्रकार कई दिनतक किया सब स्त्रियाँ डर गयीं । उसके निकट जाना बन्द कर दिया । यह समाचार सेठकी बहिनके पास पहुँचा

सूठी गवाही मत दो इच्छीलके मुख्य धर्म

वह सुनकर बहुत शोकित हुई। यह समाचार जिस समय उसके पास पहुँचा वह उस समय अपने पतिके पीछे खड़ी उसे स्नान करवा रही थी। चित्त क्षोभित होनेके कारण आँखसे आँसू टपक कर पतिके पीठपर पड़े जिससे उसके पतिने पीछे फिकर देखा। स्त्रीको रोते देखकर पूछा तू क्यों रोती है। स्त्रीने उत्तर दिया कि, मेरे भाईको वैराग्य उत्पन्न हुआ है वह स्त्रियोंको माता कहकर पुकारता है। यह बात सुनकर उसने कहा तेरा भाई मूर्ख और नीच है, वह बारम्बार अपनी स्त्रियोंको माता क्यों कहता है ? एकही बार सबको क्यों नहीं त्याग देता ? यह बात सुनकर उसकी स्त्रीने व्यङ्गसे कहा कि, आप उससे भी अच्छे हो ? यह बात सुनकर उसके मनमें बड़ी चोट लगी उसी समय वैराग्य उत्पन्न हुआ। हाथमें कमण्डलु ले लंगोटी बाँधकर चल दिया। उसकी अस्सी स्त्रियाँ थीं बड़ा भारी सेठ था, सब स्त्रियोंको एक बार ही माता कहकर सब धन दौलत छोड़ दिया। वहाँसे चला २ अपने सालके पास पहुँचा, उसे पुकारकर कहा कि, ऐ मूर्ख ! तूने क्या ढोंग पसारा है ? आ नीचे उत्तर अपनी सब स्त्रियोंको एक बारही माता कह कर त्यागदे मेरे साथ चल। अपने बहनोंईके शब्द सुनकर वह नीचे उतरा सबको त्यागकर उसके साथ चल दिया। दोनों विरक्त हो गये। घरके लोग नानाप्रकार रोते चिल्लाते रह गये। उन्होंने उनकी तरफ कुछ भी ध्यान न दिया सालसे बहनोंई अधिक धनवान् था। जैसा वह धनवान् था वैसाही पूरा संत हुआ, अपने परायोंकी ओर स्वप्नमें भी ध्यान न दिया ईश्वरमें अखण्ड ध्यान लगाकर उसीमें निमग्न हो गया।

इस कथामें जो कुछ हुआ केवल उस खीरकाही प्रताप था, जो उस लड़केने साधुको खिलाई थी। उसीके प्रतापसे पहले ऐसा सेठ हुआ, फिर साधु होकर समाधिष्ठ हुआ, जिससे मुक्तिका भागी बनकर मनुष्य देहको सफल कर लिया।

दूसरा दृष्टांत—एक संत चले जाते थे, उनको एक मनुष्यने नमस्कार करके कहा कि, महाराज ! आज आप मेरे घर भोजन करें। साधुने उसका निमन्त्रण मान लिया उसके घर भोजन करने गया। आदमीने साधुका हाथ धुलाकर थोड़ासा अलोना शाक भोजनके लिये दिया। वह बिचारा ऐसा दरिद्र था कि, शाकमें डालनेके लिये निमक भी नहीं पा सका था। साधु अलोना शाक आनन्दपूर्वक खाकर चला। साधुके घरसे बाहर निकलतेही उस श्रद्धालु भक्तके घरमें आकाशसे रत्नोंकी ऐसी वर्षा हुई कि, घर भर गया वह ऐसा धनी हो गया कि, नगरके राजाको उसपर ईर्षा आने लगी। राजाने अपने सेवकोंको आज्ञादी कि, साधुको खोज लाओ, हम भी उसको भोजन करावेंगे। राजाके सेवकोंने

आदिमें शब्द था और शब्द ईश्वर था अवधान जन्म, खुदाको न देखा गुणोंका भेद, प्रकाश

साधुको ढूंढना आरम्भ किया उधर राजाने साधुके लिये उत्तम २ भोजन बनावेकी आज्ञा दी । सेवक लोग साधुको बुलाकर ले आये भोजन करनेके लिये बैठाय। साधुको हाथही पर खानेका अभ्यास था, राजाके रसोइयोंने ऐसी गरम २ वस्तु उसके हाथपर रखदी कि, जिससे उनका हाथ जल गया । जिस समय वह साधु भोजन करके राजमहलसे बाहर निकला उसी समय आकाशसे आगकी वृष्टि हुई राजाका समस्त राजमहल जलकर भस्म हो गया । इसमें विचार करनेकी बात है कि, उस दरिद्र दुखियेने प्रेम, शुद्ध अन्तःकरण और सच्ची भाव भक्तिसे साधुको भोजन कराया था, उसको किसी प्रकारकी लौकिक कामना न थी । केवल अपना धर्म जानकर उसने भोजन कराया था । राजाने जो कुछ किया सो सच्चे भाव भक्तिके बिना सांसारिक लोभमें पड़कर किया इस कारण दोनोंको फल मिला, वो प्रत्यक्ष है । जो कोई भाव भक्ति सहित भी सांसारिक लोभसे साधु सेवा करता है उसको बहुत थोड़ा फल मिलता है । जो कोई भाव भक्ति बिना कुछ माहात्म्य देख सुनकर, किसी प्रकारकी कामनासे, सेवा करता है उसका फल ठीक उलटा होता है, जैसा कि, राजाको हुवा ॥

रोटी देनेसे हजरत ईसाका भी शाप चला गया—किसी मुसलमानी किताबमें मैंने पढ़ा था कि हजरत ईसा फिरते फिरते एक गाँवमें पहुँचे । उस गाँवके सब लोग उनके पास जमा हो कहने लगे कि, हजरत इस गाँवमें एक धोबी रहता है वह बड़ा दुष्ट है, गाँवभरके लोगोंको बहुत दुख देता है, किसीका कपड़ा फाड़ लेता है, किसीका चुराही लेता है, किसीका बदलाही लेता है, लोग उससे अत्यन्त दुःखी हैं गाँवके लोगोंकी यह बात सुनकर हजरतके मुखसे यह बात निकल गई कि, वह धोबी घाटसे जीवित न आवेगा, वहाँही मर जावेगा । उधर धोबीके भोजन करनेका समय हुआ, तब उसके तीन रोटी गई । धोबीने हाथ, पैर धोकर रोटी खाना चाहा । इतनेहीमें एक फकीर आकर खड़ा हुआ, खानेको माँगने लगा । धोबीको दया आगई उसने एक रोटी उठाकर फकीरको दे दी । उस फकीरने रोटी खाकर आशीर्वाद दिया कि, तेरा अन्तःकरण शुद्ध होजा । धोबीने दूसरी रोटी भी फकीरको दे दी, उस फकीरने रोटी लेकर कहा कि, तुझे ईश्वर अचानककी आपत्तियोंसे बचावे फिर धोबीने तीसरी रोटी भी देदी, तो फकीरने आशीर्वाद दिया कि, खुदा तुझे स्वर्गमें एक कोठरी दे । ये तीनों बात कहकर वह फकीर तो चला गया । सन्ध्या होते ही धोबी अपने घर आया । उसे घर आया देख सब लोग हजरत ईसाके पास जाकर कहने लगे कि, या हजरत ! यह धोबी तो सही सलामत जीता जागता घरको आया, आपके वचन

विभाग, कुरानके मुख्य धर्म सबका एक, सबका सार, विद्वानोंके भेद

झूठे हुये । हजरत ईसाने अपनी अन्तरदृष्टिसे देखकर लोगोंसे कहा कि, उस धोबीकी गठरी खोलो । लोगोंने गठरी खोली तो उनमेंसे एक बड़ा विषैला सॉप निकल पड़ा । हजरत ईसाने लोगोंसे कहा कि, यदि यह विषैला सॉप धोबीको काट लेता तो यह धोबी शीघ्रही मर जाता । जिस समय मैंने लोगोंसे कहा था कि, धोबी घाट परसे जीवित नहीं आवेगा, उसी समय सॉपको आज्ञा हुई थी कि इसको काटले, किन्तु धोबीने उस समय ऐसी उदारता और पुण्य किया कि, जिसके कारण इसके प्राण बच गये इसने अपने खानेकी रोटी एक कामिल फकीर पूर्ण महात्माको देदी । इसने पहली रोटी दी थी, तो फकीरने इसके अन्तःकरण शुद्ध होनेका आशीर्वाद दिया था । दूसरी रोटी फकीरने पाई थी तब कहा था कि, तुझे ईश्वर अचानक आपत्तियोंसे बचावे, फकीरने इतना कहा उसी समय सॉपके मुंहपर मुहर लग गई । सॉप काट नहीं सका । फकीरने तीसरी रोटी खाकर उसे स्वर्गमें स्थान मिलनेका आशीर्वाद दिया अब उस धोबीका अन्तःकरण शुद्ध हो गया, वह किसी प्रकारकी दुष्टता न करेगा । वह स्वर्गीय होगया है इस कारण, नरकियोंके समान दुष्ट व्यवहार न करेगा । उसी समय धोबी शुद्ध अन्तःकरण हो सदाचारी बन गया । फकीरको केवल तीन रोटी देनेसे धोबी मृत्युके मुखसे निकल कर स्वर्गका भागी हुआ ।

लंगोटी देनेसे चीर बढ़ा—महाराणी द्रौपदीने दुर्वासा ऋषिको एक लंगोटीदी थी, जिसके कारण उनका बस्त्र इतना बढ़ा कि, दुःशासन जैसा पहलवान भी खींचते २ थक गया, कपड़ोंका ढेर लग गया पर वह कम नहीं हुआ और महारानीकी प्रतिष्ठा रह गई ।

सहन शीलता और धैर्य ।

साधु लोग जो दुःख उठाते हैं, उनका वर्णन कौन कर सकता है ? देखो ग्रीष्म ऋतुमें जब कठिन धूप पड़ती है, उस समय पाँच अथवा चौरासी धुनी लगाकर तापते हैं । ऊपरसे सूर्यकी गरमी, नीचेसे पृथिवीकी तपन, चारों ओरसे अग्नीकी लू लगती है पर वे दृढ़ होते हैं कि, उससे तब तक हटना नहीं जानते जब तक कि, अग्नी न बुझ जावे । इसी प्रकार शरद कालमें जब कि, शर्दीके मारे दांतोंसे दांत बजते हैं उस समय पानीमें घुस जाते हैं । माघ पौषके महीनेमें पानीमें नङ्गे बैठे रहते हैं । प्राण जायें तो जायें पर अपनी टेकको नहीं छोड़ते । कोई उलटा लटक कर अग्निझप लेता है, कड़कड़ोंपर लेटा रहता है, कोई बाण शय्या बनाकर सोता है, कोई मौन धारण करता है, कोई ठाढ़ेश्वरी बनता है, कोई दिन रात एक पगसे खड़ा होकर भजन करता है, कोई प्राणायाम और

दूसरे पण्डित या उलमा

योगमें सग्न रहता है, कोई षट्कर्म करता है कोई षट्चक्र वेधकर त्रिकुटीमें ध्यान लगाता है, सहस्रदल कमलमें जा समाता है ।

तप और भजनकी बहुतसी रीतियाँ हैं, उनका कौन बयान कर सकता है ? सब मतोंके साधु जो दुःख कष्ट भजनमें उठाते हैं, उससे उनका अन्तःकरण शुद्ध हो अनन्त सूर्यके समान प्रकाशमान हो जाता है, त्रिकालज्ञ हो जाते हैं, गुप्त सब भेद प्रगट हो जाते हैं । ऐसे पुण्यरूप महात्माओंको प्राकृतिक लोग दुःख कष्ट देते हैं । उनकी निन्दा करते हुए गालियाँ सुनाते हैं । वे महात्मा सब दुःखोंको धैर्यके साथ सह लेते हैं, कभी क्रोध नहीं करते, मूर्ख लोग दो चार पुस्तकें अथवा इधर उधरकी दो चार बातें, दो चार भजन साखी शब्द सीखकर उनसे बाद विवाद करके दुःख देनेका प्रयत्न करते हैं । इसपर एक दृष्टान्त लिखता हूँ ।

सिद्ध महात्मा और विद्याभिमानी—एक नगरमें फिरते २ एक साधु आये । बहुतसे नगरवासी उनके दर्शन करनेको आने लगे, उन लोगोंके साथ एक युवक विद्याभिमानी ब्राह्मण भी आया । अपनी विद्याके अभिमानसे साधुके साथ, वाद विवाद करने लगा । उसने कहा मेरे साथ शास्त्रार्थ करो । तब उसने कहा कि, तुम कहाँसे आये हो ? ब्राह्मणने उत्तर दिया—मैं इसी नगरसे आया हूँ । साधूने कहा, इसके प्रथम कहाँसे आये ? उसने उत्तर दिया कि, मेरा जन्म तो इसी नगरका है । सन्तने कहा तुम्हें कुछ सुधि नहीं । तुम पहले जन्म गीदड़ थे अब ब्राह्मणके शरीरमें आये हो जब तुम गीदड़ थे उस समय वर्षा होनेके कारण किसी कुम्हारके घरमें जा छिपे, वह किसी नाजके खानेसे तुम्हारा पेट फूल गया तुम मर गये कुम्हारने तुम्हें अपना हानिकारक जानकर खाल खींच ली वह खाल अभी तक उसके घरमें लटक रही है वह कुम्हार भी जीवित है ।

इतना सुनकर कितनेक लोगोंने कुम्हारके घर जाकर देखा तो साधुके वचनमें तनिक भी विभिन्नता न पाई । इस बातसे उस ब्राह्मण पुत्रको बड़ी लज्जा आई अपनी प्रतिष्ठा भङ्ग होते देख मनमें निश्चय कर लिया कि इस साधुका शिर अवश्य ही काट लूंगा । अर्द्धरात्रि होने पर एक तलवार ले नगरके बाहर उजाड़में पहुँचा जहाँ कि साधु ठहरा हुआ था । साधुके निकट पहुँचकर साधुको मारनेको ज्योंही तलवार उठाई त्योंही हाथ उठाये हुये पत्थरके समान रह गया । उसी प्रकार खड़े खड़े सबेरा हो गया । लोग साधुके दरशनको आने लगे लोगोंने देखा कि, वह ब्राह्मण पुत्र साधुके शिरपर नङ्गी तलवार लिये खड़ा है । यह देखकर बहुत आश्चर्यमें हुये ब्राह्मणपुत्रको बुलाने लगे पर वह न बोल सका ।

अर्थ करनेवाले, कर्तव्य ज्ञानी और अज्ञानी

फिर सबने साधुसे कहा कि महाराज ! अपराध क्षमा करो । तब साधूने कहा कि, मैंने न तो इसपर क्रोध किया, न शाप दिया, न इसका कुछ बुरा चाहा । लोगोंने बहुत विन्ती की तो साधूने उच्चस्वरसे पुकार कर कहा कि, मैंने तो इस ब्राह्मण पुत्रको कुछ दुःख नहीं दिया, यदि किसी देवताने इसको कील दिया हो तो अब छोड़ दो इसका अपराध क्षमा करें । इसपर आकाशवाणी हुई कि । साधुके कहनेसे मैं इस ब्राह्मणपुत्रको छोड़ता हूँ । नहीं तो इसको यहाँही पुखाकर मार डालता । ये केवल साधुके रक्षक देवताने जब ऐसा कहा तो ब्राह्मण पुत्रका बन्धन छूट गया । सचेत होकर साधुके चरणोंपर पड़ा उसका शिष्य हो गया । लोग साधुको धन्य धन्य करने लगे ।

मूर्खलोग सन्तोंकी बहुत निन्दा और ठट्ठा किया करते हैं पर सच्चे सन्त अपने भजन भक्तीको नहीं छोड़ते ईश्वरकी कृपा का भरोसा रख कर भजन करतेही रहते हैं । कुर्तोंके भूँकनेसे सन्तोंके भाग्यमें घटी नहीं होती, जिस विश्वम्भर ने मातृगर्भमें पालन किया, माताके स्तनोंमें दूध भर दिया, उस पर विश्वास करना ही योग्य है ।

विश्वास अङ्गकी साखी ।

कबीर - भू भूख तू क्या करे, कहा सुनावे लोग ।
भांडा गढ़ जिन मुख दिया, सोई भरने योग ॥

कबीर - रचनहारको चीन्हले, खाने को कहैं रोय ।
दिल मंदिरमें बैठिके, तान पछौरा सोय ॥

कबीर - सिर्जनहारा सिर्जिया, आंटा पानी लौन ।
देनेहारा देत है, मेटनहारा, कौन ॥

कबीर - चिता मतकर अर्चित रह, देनहार समरथ ।
पशूपखेरू जीव सब, तिनके गांठ न ग्रथ्य ॥

कबीर - अण्डा पाले काछुई, थन बिन राखे पोक ।
यों करता सब्रको करे, पाले तीनों लोक ॥

कबीर - जाके मन विश्वास है, सदा गुरु तेहि सङ्ग ।
कोटि काल झकझोरही, तऊ न होय चित भङ्ग ॥

कबीर - घटमें ज्योति अनूप है, रिज्ज मौत जिव साथ ॥
कहा सार है मनुष्यकी, कलम् धनीके हाथ ॥

कबीर - जाके दिलमें हरि बसे, सो जन कलपे काहि ॥
एकै लहर समुद्रकी, दुख दरिद्र सब जाहि ॥

पण्डित और मूर्ख मुक्तिका हेतु

कबीर – आगे पीछे हरि खड़ा, आप सहारे भार ।
जनको दुनिया क्यों करे ? समरथ सिर्जनहार ॥

कबीर – सबजन निर्धन जानिये, धनवन्ता नहिं कोय ।
धनवन्ता सोइ जानिये, राम नाम धन होय ॥

कबीर – देने हारा राम है, जाय जड़लमें बैठ ।
हरिको लेई ऊबरे, सात पताले पैठ ॥

कबीर – अर्द्ध शीश उद्धवै चरण, थह पिछली तकसीर ।
कुम्भी नरक पठाइया, जड़िया भरम जंजीर ॥

कबीर – नर नारायण रूप है, तू मत जाने देह ।
जो समझे तो समझ ले, खलक पलकमें खेह ॥
साधु महात्म्य अड़की साखी ।

कबीर – साधू आवत देखिके, चरणन लागो धाय ।
क्या जाने किहि भेषमें, हरिही जो मिल जाय ॥

कबीर – साधू आवत देखिके, हँसी हमारी देह ।
माथेका ग्रह ऊतरा, नयनों बँधा सनेह ॥

कबीर – साधू आवत देखिके, मनमें करें मरोर ।
सो तो होंगे चूहड़े, बसें गांवके छोर ॥

कबीर – आवत साधु न हरषिया, जात न दीया रोय ।
कहै कबीर ता दासकी, मुक्ति कहाँसे होय ॥

कबीर – छाजन भोजन प्रीतिसे, दीजे साधु बुलाय ।
जीवत यश हो जगतमें, मुये परम् पद पाय ॥

कबीर – हों साधुनके सङ्ग रहूँ, अन्त न कितहूँ जाउँ ।
जो मोहिं अरपे प्रीतिसे, साधुन मुख होय खाउँ ॥

कबीर – साधु नदी जल प्रेमरस, तेहि परछाले अड़ ।
कहैं कबीर निरमल भया, साधू जनके सड़ ॥

कबीर – साधु मिले तो हरि मिले, अन्तर रही न रेख ।
मनसा वाचा कर्मना, साधू आप अलेख ॥

कबीर – निराकारकी आरसी, साधुनही की देह ।
लखा जो चाहे अलख को, इनहीमें लिखि लेह ॥

कबीर – साधुनहीकी दयाते, उपजे बहुत अनन्द ।
कोटि विघ्न पलमें टरे, मिटे सकल दुख दन्द ॥

किसीका भी भ्रम न गया वर्णमालापर विचार

कबीर - हरि दरबारी साधु हैं, इन्ते सब कछु होय ।
लेई मिलावैं रामको, इन्हें मिले जो कोय ॥

कबीर - साधू खोजा रामके, धसैं जो महलन माहिं ।
औरनको परदा लगे, इनको परदा नाहिं ॥

कबीर - गिरीही सेवैं साधुको, साधू सेवैं राम ।
यार्मि धोखा कछु नहीं, सरे दुनोंका काम ॥

कबीर - जो घर साधु न सेव है, पारब्रह्मपति नाहिं ।
सो घर मरघट सारखा, भूत बसे ता माहिं ॥

कबीर - हयवर गजवर शबन धन, छत्रपतीकी नारि ।
सोऊ पटन्तर नातुले, हरि जनकी पनिहारि ॥

कबीर - साधुनकी कुतिया भली, बुरी साकठकी माइ ।
वह बैठी हरियश सुने, वह निन्दा करने जाइ ॥

कबीर - सोई कुल जगमें भला, जा कुल उपजे दास ।
जा कुल दास न ऊपजे, सो कुल ढाक पलास ॥

कबीर - साधु वृक्ष हरिनाम फल, शीतल शब्द विचार ।
साधु न होते जगतमें, जल मरता संसार ॥

कबीर - साधु सिद्धकी एक मति, साधु महा परचण्ड ।
सिद्ध तारे तन आपना, साधु तारे नवखण्ड ॥

कबीर - हरि सेती हरिजन, बड़े, समझ देखु मनमाहिं ।
कहैं कबीर जग हरिविषे, सो हरि हरि जन माहिं ॥

कबीर - सन्त बड़े संसारमें, हरिते अधिक हैं सोय ।
बिन इच्छा पूरण करें, साहब हरि नहिं दौय ॥

कबीर - दरशन होवे साधुका, साहब आवे याद ।
लेखे सो दिन धारिये, बाकीका सब वाद ॥

अथ गुरु दर्शन विधि ।

कबीर - दरशन कीजे गुरुका, दिनमें कई एक बार ।
आसूयाका मेह ज्यों, बहुत करे उपकार ॥

कबीर - कई बार न होइ सके, दौय वक्त कर लेइ ।
सद्गुरु दरशनके किये, काल दगा नहिं देइ ॥

कबीर - दौय वक्त ना हो सके, दिनमें करै इकबार ।
सद्गुरु दरशनके किये, उतरे भवजल पार ॥

कबीर – एक दिना नहिं करिसके, दूजे दिन करि लेहि ।

सद्गुरु दरशनके किये, पावे उत्तम देहि ॥

कबीर – दूजे दिन ना करि सके, चौथे दिन कर जाय ।

सद्गुरु दरशनके किये, मोक्ष मूक्ति फल पाय ॥

कबीर – बार बार ना करि सके, पक्षे पक्ष करे सोय ।

कहैं कबीर ता दासका, जन्म सुफलही होय ॥

कबीर – पक्षे पक्ष ना करि सके, मास मास कर धाय ।

यामें भेद न कीजिये, कहैं कबीर समझाय ॥

कबीर – मास मास ना करि सके, छठे मास अलबत्त ।

यामें ढील न कीजिये, कहैं कबीर अविगत्त ॥

कबीर – छठे मास ना करि सके, बरस दिना करि लेहि ।

कहैं कबीर सो सन्त जन, यमहिं चुनौती देहि ॥

कबीर – बरष बरष नाकरि सके, ताको लागे दोष ।

कहैं कबीर वा जीव सो, कबहुँ न पावे मोक्ष ॥

कबीर – माता पिता सुत स्त्री, बन्धु कुटुम्बको जान ।

गुरु दरशनको जब चले, ये अटकावे आन ॥

कबीर – उनका अटका ना रहे, गुरु दरशनकी जाय ।

कहैं कबीर सो सन्त जन, मोक्ष मुक्ति फल पाय ॥

कबीर – खाली साधु न विदाकर, सुनि लीजे सब कोय ।

कहैं कबीरा भेंट धर, जो तेरे घर होय ॥

कबीर – मुहर रुपया पैसा, कपड़ा बासन देइ ।

कहैं कबीर सो जगतमें, जन्म सुफल करि लेइ ॥

कबीर – निराकार निज रूप है, प्रेम प्रीतिसे सेव ।

जो चाहे आकारको, साधू प्रत्यक्ष देव ॥

कबीर – जा सुखको मुनिवर रमे, सुर नर करें मिलाप ।

सो सुख सहजें पाइये, सन्तों सङ्गति आप ॥

कबीर – कोटि कोटि तीरथ करे, कोटि कोटि करे धाम ।

जब लगि सन्त न सेवई, तब लगि सरे न काम ॥

कबीर – आशा बासा सन्तका, ब्रह्मा लखे न वेद ।

षट् दर्शन खटपट करें, विरला पावे भेद ॥

अंकों पर विचार

कबीर - गुरु भये है, केतकी, भँवर भये सब दास ।

जहँ जहँ भक्ति कबीरकी, तहँ तहँ मुक्ति निरास ॥

सार - कहाँतक लिखूँ, ? सन्तोंकी महिमासे समस्त स्वसम्बेद भरा हुआ है । कबीर साहब सर्वदासे पुकारते आते हैं कि, हे संसारियो ! साधुसेवाके बिना तुम्हारा कल्याण न होगा । संसारमें ही फँसे रहकर आज्ञानमें पड़े रहोगे । यह सारा संसार मृतक है, सन्त इसको जीवन प्रदान करते हैं, तब चैतन्य होता है । मुर्दके कान तो होते हैं पर सुनता नहीं, आँख होती है पर देखता नहीं, इसी प्रकार उसकी सब इन्द्रियाँ तुच्छ और बोझरूप हैं । विद्याऽभिमानियोंकी भक्ति और उदारता सन्तोंकी निन्दा करनेसे लोप हो गई । इस कलियुगमें लोग प्रायः सुकर्म से भागकर पापकी ओर जाते हैं ।

कबीर - यहि कलियुग आयो अबै, साधु न माने कोय ।

कामी क्रोधी मसखरा, तिनकी पूजा होय ॥

बुल्लेशाह - बुल्ला जिन्दा पढ़िया अल्लिफ वे । वे क्या जाने हूधथो दे ।

संसारी सर्वदा व्यवहारके चक्रमें पड़ा रहता है, जैसे राजा, धनीसेठ, साहू-कार, वैसेही मजदूर, परिश्रमी, दरिद्र, दुखिया आदि सब सांसारिक व्यवहारमें लगे रहते हैं । व्यवहारिक प्रवृत्तीमें यह विचार नहीं रहता कि, सत्सङ्ग करके अपना कल्याण करें ।

फकीर और शेखफरीदुद्दीन - एक दिन एक फकीर उक्त अत्तारसे मिलने को गया चाहता कि, कुछ बातें करें पर अत्तार साहब अपनी दूकानके कार्यायमें ऐसे निमग्न थे और इतनी भोड़ लगी हुई थी कि, इतनाभी समय न मिला जो उससे बाचचीत भी कर सकें सबेरसे शाम होगयी पर अत्तार साहब उस फकीरसे वार्तालाप न कर सके । सन्ध्याको फकीरने अत्तार साहबसे कहा कि, तुमको क्षणमात्र भी अवकाश नहीं मिलता, व्यवहारमें ऐसे निमग्न हो कि, कुछ लोक परलोककी भी सुधि नहीं, किस प्रकार तुम्हारा प्राण निकलेगा ? । इतना सुनकर फरीदुद्दीन अत्तार साहबको बहुत क्रोध आया झिड़ककर फकीरसे कहा कि, तेरी जान कैसे निकलेगी ? वह फकीर इतना सुनतेही दूकानके नीचे कम्मल और प्याला रखकर वहीं लेटकर मर गया । फरीदुद्दीन अत्तारने यह हाल देखा तो उनके मनमें संसारसे बहुत वैराग्य और घृणा उत्पन्न हुई । अंतारीकी दूकान छोड़कर फकीर होगये, फकीरोंमें पूर्णता प्राप्त की बड़े प्रसिद्धिये थे भी शेख मन्सूरके समान (११४ वर्षकी अवस्थामें) बसरामें कत्ल किये गये ।

मुहम्मदसाहिबके कार्य - योरोपके लोग नानाप्रकारकी युक्तियाँ करके

भारत वर्षसे द्रव्य ले गये और ले जाते हैं । इससे सांसारिक विषय वासना राग भोगमें पड़कर परलोकको एकदम भुला दिया है दिन दिन सांसारिक व्यवहारमें निमग्न होते जाते हैं । भजन भक्तिका अथवा पारलौकिक विचारका स्वप्नमें भी ध्यान नहीं करते । आशा, तृष्णा और सांसारिक कामनाओंमें ऐसे फँसे हुये हैं कि, दिनरात इन्हीं चिन्ताओंमें चक्कर खाया करते हैं कि, किस प्रकारसे धन, दौलत और मान, बड़ाई, प्राप्त हो । योरपवालोंमेंसे कोई भी भजन तपस्या और ईश्वर स्मरणमें लगा हुवा नहीं देख पड़ता । उनका उद्धार होना बहुत कठिन है क्योंकि, मायाके चाहनेवाले जगतसे प्रेम करनेवाले संसारमेंही रहेंगे, उनका कभी बन्धन न छूटेगा । परमात्माकी दीन दुखियोंपर असौम कृपा होती है । हजरत ईसाने कहा है कि, ऊंटका सूईके छिद्रसे निकल जाना सहज है, पर एक धनाभिमानीका मोक्ष पाना कठिन है । महम्मद साहबके समयसे पहले जब पुस्तकावलोकनका बहुत प्रचार हुआ तो उनके समयमें बहुत किताब जलाई गई थी क्यों कि, वह समझते थे किताबोंके बहुत पढ़नेसे भजन भक्ति नष्ट हो जाती है । उसी समय बुत्तपरस्ती जादूगरी, रमल, ज्योतिष, यंत्र, मंत्र आदिका बहुत प्रचार बढ़ गया था, विज्ञानकी भी बहुत चर्चा थी, पर महम्मद साहबने अरबमें उन सब बातोंका खण्डन करके मनुष्योंको रोज़ा निमाज़ सिखलाया भजन बन्दगीमें लगाया ।

बिना पढ़े ज्ञानी — अब मैं उन महात्माओंका वर्णन करता हूँ, जिन्होंने एक अक्षर भी नहीं पढ़ा है केवल एक परमात्माके नामका स्मरण करके दिनरात उसीमें निमग्न हो अपने भजनको पूरा किया है । उनकी सच्ची भक्ति देखकर सद्गुरु कबीर बन्दीछोर मिलता है । जिनको साहब नहीं मिलता वे सिद्धियोंको प्राप्त कर लेते हैं । जिनपर सद्गुरुकी कृपादृष्टि हुई उनका कार्य पूरा हुआ, वे लोग पुस्तकों के कीड़ोंको नहीं चाहते, न उनको उपदेशके योग्य ही समझते हैं । जिस प्रकार कागजके कीड़े कागज कोही खाते और उसीमें रहते हैं उसी प्रकार विद्याभिमानी लोग पुस्तकोंको चाटते रहते हैं बात बात पर वाणी और पुस्तकोंकाही आधार लेते हैं ।

नामके स्मरण करनेवालोंको आवश्यक है कि, पढ़ने लिखनेसे निवृत्त हो जावें । काम पढ़नेपर पुस्तक देखना जरूर चाहिये पर अपना सब समय उसीमें लगा देनेसे भजन नहीं हो सकता । केवल नामकोही दिन रात ध्यान करता रहै क्योंकि, नामके अतिरिक्त जो कुछ हैं वह सब मायिक और तुच्छ हैं, अन्धकारमें डालनेवाला है । यदि नीच घरका भी भोजन करके भजनमें लगा रहे, ईश्वरमें सच्चा प्रेम करे, गुरुमें सच्ची भक्ति रखे तो उसके समान राजा इन्द्र भी नहीं,

मुसलमान विद्वान् खुदा और उसका कलाम शिरके अर्थका अभाव अलिफ लाम और मीम, प्रश्न

इन्द्र उसके आगे दरिद्र और तुच्छ है। यदि खानेको नाज न मिलें, जोकी भूसी और साग पात खाकर भजन करें, तो भी सारे संसारके पदार्थोंसे वैराग्य और अनाशक्ति धारण करें। जो कोई भजनानन्दी बनना चाहता है भक्ति प्राप्त करनेकी अभिलाषा रखता है, वह अपने कामके बिना अन्य पुस्तकोंका देखना छोड़ दे। यदि पहले नाना विषयोंकी पुस्तकोंको पढ़ा हो तो उनको भी एकदम भुलो दे। जबतक मनसे लौकिक पारलौकिक सब प्रकारकी वासनाओंको नष्ट करके भजनमें न लगेगा, तबतक भजनका यथार्थ आनन्द नहीं मिल सकता। एक ईश्वर भक्तिके बिना जो कुछ लिखना पढ़ना है वो सब शत्रु तुल्य हैं।

साखी कबीर साहबकी।

कबीर - मैं जानूँ पढिबो भलो, पढिबे ते भल योग।

भक्ति न छाड़ूं रामकी, भावे निन्दे लोग॥

कबीर - लिखना पढ़ना चातुरी, यह संसारी जेब।

जिस पढ़ने सो पाइये, वह पढ़ना कितने नसीब॥

कबीर - पढ़ते पढ़ते पढ़ गये, कर गये टट्टी चोर।

जिस पढ़ने से हरि मिलें, वह पढ़ना कछु और॥

कबीर - बहुत पढ़ना दूर कर, अति पढ़ता संसार।

पेड़ न उपजे प्रेमकी, क्यों पावे करतार॥

कबीर - पढ़ना दूर करि, पुस्तक देउ बहाय।

बावन अक्षर प्रेमके, राम नाम लौ लाय॥

कबीर - धरती अम्बर ना हता, कौनसा पण्डित पास।

कौन मुहूरत थापिया, चाँद सूर्य आकाश॥

कबीर - पण्डित बोरिया पत्रा, काजी छाड़ि कुरान।

वह तारीख बताइये, थाना जमी असमान॥

सार - जो कोई भक्ति करना चाहता है वह व्यर्थका पढ़ना लिखना छोड़ कर भजनमें लग जाये। यदि कुछ पढ़नेकी इच्छा भी हो तो एक अल्लिफ अथवा-अ-पढ़ ले और कुछ न पढ़े। यदि इतनेमें भी सन्तोष न हो तो अपने धर्ममें गुरुके ग्रन्थोंको पढ़े, पेटके लिये कुछ भी चिन्ता न करे, साहब आपही पेटकी चिन्ता कर लेगा, मनुष्य अपने भजनमें चूक न करे।

शब्द - साधु भाई खेती करो, हरि नामकी॥

रुपया न लागे पैसा न लागे, कौड़ी न लागे छदामकी।

तन मन बैल सुरति हरवाहा, रई लागो गुरु ज्ञानकी॥