कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
रक्षकका अवतार
विद्या तथा धनके अभिमानियोंको विचार करना चाहिये, कि, जब उनके अभिमानके मूल विद्या तथा धनादि दूसरीही अवस्थामें नष्ट होजाते हैं तो तीसरी और चतुर्थ अवस्थामें क्या गति होगी।
जैसे जाग्रत् अवस्थाका अहंकार असत्य है वैसेही स्वप्नावस्थाकी भी सब सामग्री मिथ्या हैं। इसी प्रकार सब अवस्थाओंके पदार्थ व अभिमान मिथ्या और मृगतृष्णाके जलके समान दुःखदायी हैं। इन्हीं पाँचोंके अभिमान में सारे अभिमानी बढ़ हैं। इनसे बाहर जानेका मार्ग किसीको प्राप्त नहीं होता।
इन पाँचों शरीरोंके परे छठा शरीर हंस देह है जिसमें प्राप्त होकर अहंकार नष्ट हो जाता है, जीव अपने यथार्थ स्वरूपकोप्राप्त हो जाता है। जिनको उपरोक्त पाँचों शरीर और उनकी अवस्थाकी यथार्थ सुधि नहीं वे कैसे ईश्वरको पासकेंगे। संतलोग इनको भली प्रकार जानते हैं। उसको अपने वशमें करके उनके ऊपर शासन करते हैं। जो इनकी विशेष सुधि नहीं रखता वह उनके बन्धनमें पड़ा हुआ दुःखी होता है।
हंस देहकी प्राप्तिके उपाय।
११५ प्रश्न—क्या उपाय करें कि, हंस देह शीघ्र प्राप्त हो?
उत्तर—हंस देहकी प्राप्तिके लिये सच्चे सत्यगुरुसे सच्चा प्रेम होना चाहिये। चूम्बक जिस प्रकार लोहेको अपनी ओर आकर्षण कर लेता है उसी प्रकार प्रेम शीघ्रही प्रियासे मिला देता है। सत्य प्रेमके विना प्रियाका मिलना असम्भव है।
सत्य प्रेमीके दश चिह्न—१ नेत्रका औसूसे डबडबाये रहना — २ नीदका न आना। ३ ठण्डी ठण्डी स्वांस लेना। ४ पीतरङ्ग। ५ देहकी कृशता। ६ धीमी बोली। ७ अल्प आहार। ८ ओठोंका सूखा रहना। ९ ध्यानावस्थित। १० प्रियकी प्रशंसा करना और लिखना।
उपरोक्त दश चिन्होंसे प्रेमी पहँचाना जाता है। कबीर साहबके प्रेममें राजा अमरसिंह रोते २ मृत्युके निकट पहुँच गये थे। पीछे सत्गुरुने दर्शन देकर कहा कि, हे राजन् ! अभी तुम्हारी शतवर्ष आयु शेष है इसको भोगलो तब लोक चलना। राजाने न माना कहा कि, मुझे कुछ न चाहिये मैं आपके संगही जाऊँगा तब कबीरसाहबने उसे लोकको पहुँचा दिया।
ऐसेही धर्मदास साहबको सत्गुरुके प्रेममें छः महीना रोते बीत गये। तब सत्गुरु मिले कृतार्थ करके अंतर्धान होगये। इस विरहमें अन्न पानी सब छोड़कर बाईस दिनतक रोते २ मृत्युतुल्य हो गये। फिर सत्गुरु प्रगट हुये और दर्शन दिया।
जीवनमुक्ति और विदेह मुक्ति हस्तक्षेप
सेवरीकी कथा ।
शिवरी भीलनी ईश्वरकी भक्तिकी ऐसी रंगी, प्रेमको इस पूर्णता तक पहुँचाया कि, भगवान् रामचन्द्रने उसके हाथके बेर खाये, उसकी कथा इस प्रकार है कि—
एक सूर्य्य वंशके परम प्रतापी महाराज अपनी राजकुमारी तथा राज-महिषी आदिके साथ तीर्थ राज प्रयागके स्नानके लिये गया । वहाँ अन्तःपुरचरीने महाराजसे प्रार्थना की कि, मैं पवित्र उपदेशोंसे विश्वको पवित्र करनेवाले पवित्रात्मा ऋषि गणोंके पुनीत दर्शनोंसे अपनेको पवित्र करना चाहती हूँ । इस पर उत्तर मिला कि, राज महलोंमें रहनेवाली इस तरह नहीं फिरा करतीं । इस तरह फिरनेवाली तो भीलनी होती है । यह सुन तीर्थराजमें स्नान करती बार अभिलाषा प्रगट की कि, मेरा अब जन्म हो तो मुझे नीच कुलोंकी महिला बनाना जो स्वतंत्रता के साथ परम पावन ऋषिमुनियोंकी सेवा कर सकती हूँ । भक्त वत्सल भगवान् अपने भक्तोंकी मनो कामना सदा पूरी करते हैं । उसी पवित्रात्माका शबर राजके कुलमें जन्म होगया उक्त भीलोंके राजाके यह एकही कन्या थी । हाथों २ में ही क्रशमः युवावस्थाको प्राप्त हुई । पिताने विवाहकी तयारी की बड़े २ वन्य पशु विवाहोत्सव में मारनेके लिये इकट्ठे किये गये थे । एक दिन राजकुमारी प्यारी सहेलियोंके साथ राज प्रासादके ऊपर चंद्रकिरण ले रही थी कि, कटहरोमें बंधे हुए बनले पशुओंकी करुण मूर्ति आँखोंके सामने आगई, यही समय शिवरीके हृदय पर्वतनका था । दर्दभरे शब्दोंमें सखियोंसे बूझा किये पशु मुझे क्यों दुखभरी आँखोंसे देख रहे हैं ? उत्तर मिला कि, ए भोली राजकुमारी ! ये तेरे विवाहमें काम आयेंगे । यह सुनतेही शिवरीका मुख तेजसे तमतमा उठा, झट बोल उठी कि, ऐसा विवाह मुझे नहीं करना है जिसमें अनन्त जीव दुःख पावें । भगवान्से लौ लगाई कि, तू ऐसी नींद भेज दे कि सब सोजायं तो मैं महलके बाहिर निकल जाऊँ । जगदीशने अपनी परम भक्ताकी मनोकामना पूरी की । शिवरी उसी समय राज महलका परित्याग करके वनको चली गई ।
यह एक बनमें रहा करती थी । वहाँही पासमें मतंगऋषि भी रहा करते थे । शिवरी रातको छिपकर ऋषिके आश्रममें लकड़ी धर जाती । ऋषियोंके स्नान करने जानेके मार्गको बूहार जाती । यह सब काम रातको इस भयसे करती कि, यदि ऋषि अथवा ऋषिके शिष्य देखलेंगे तो नीच जाति जान क्रोधित होंगे ऋषि नित्य लकड़ी और मार्ग बूहारा हुआ देखकर आश्चर्य करते । बहुत दिनों तक विचार करनेपर भी सेवा करने वालेका पता न लगा कि एक दिन ऋषिके
साधुका द्रव्य हरण
शिष्योंने छिपकर जागनेपर सेवरीको लकड़ी लाकर झाड़ू देते हुये पकड़ा । जब उसे ऋषिपुत्रोंने पहचाना तो उन्हें उससे बहुत घृणा हुई प्रायश्चित्तका स्नान करने पंपासरमें गये । वे तालाबमें नहाने लगे तो तालाबका जल बिगड़ गया और उसमें कीड़े पड़ गये, वो एकदम खराब हो गया ।
मतंग ऋषिने सेवरीका हाल सुनकर उसे बुलाया बहुत प्रेमपूर्वक आश्वासन किया । उसकी अपनी चेली बना लिया अपने शिष्योंको डाँटा कि, तुम लोग सेवरीसे इतनी घृणा क्यों करते हो ? इसपर तो हजारों ब्राह्मण निछावर हैं । मतंग ऋषिने सेवरीसे कहा कि, तुझको रामचन्द्रजी दर्शन देंगे ।
सेवरीने अपने गुरुसे सुना कि, महाराज रामचन्द्रजीका दर्शन होगा । रामचन्द्रजीके दर्शनकी चिन्तासे प्रेममें मग्न होगई । सदा महाराजके मिलनेका स्मरण रखती । महाराजसे मिलनेके लिये दौड़कर उसी मार्गपर जाती जिधरसे कि, महाराजके आनेका समाचार पाचुकी थी, दौड़ते २ उसके मनमें आता कि, हाय मैं भीलनी हूँ ! महाराज मुझसे कैसे मिलेंगे ? मुझको नीच जाति जान घृणा करेंगे । ऐसा विचार होतेही किसी झाड़ीमें छिप जाती, रोने लगती । विचार करती, महाराज पतित पावन हैं, तब फिर झाड़ीसे निकलकर दौड़ती । कभी दूर २ तक मार्ग बुहारती हुई कहती कि, महाराजके आनेका मार्ग शुद्ध करती हूँ कभी २ महाराजको इधर उधर झाड़ियोंमें ढूँढ़ती फिरती, नित्य वनमें जाकर फल तोड़ती. क्योंकि, आपभी फलही फूल खाकर रहा करती । जिस पेड़के फल भीठे देखती उसीको रखलेती पर जो खट्टा होता उसे तो आप खाती जो मीठा होता उस भगवानको खिलानेके लिये रख छोड़ती ।
महाराजने कृपाकर उसके आश्रम पर पदार्पण किया, उस समय वेर और फल लाकर सेवरीने भगवान्के सामने रखे । महाराजने उन फलोंको ऐसे सराह सराहके खाया कि, तीनों लोकके अधिपतियोंको भी ईर्षा हो । उस वनके कितने ऋषियोंके मनमें अहंकार था कि, हम ब्रह्म ऋषि अथवा राजऋषि हैं, सबके मनमें बड़ी ईर्षा और अभिमान हुआ कि, महाराज प्रथम हमारे आश्रम-पर न पधारकर भिलनीके आश्रम पर गये । अन्तर्यामी रामचन्द्रजीने ऋषियोंकी मनकी जानकर कहा कि, है कोई ऐसा तप और धर्म करके पूर्ण जो पम्पासरमें स्नान करे और उसके स्नान करनेसे इसका जल शुद्ध हो जावे । सब ऋषियोंने क्रमशः उसमें गोता लगाया पर जलका शुद्ध होना तो क्या और भी गन्दा तथा भ्रष्ट हो गया । भगवान् रामचन्द्रने सेवरीसे कहा कि, तू इसमें नहा जैसेही सेव-
ग्रहण न करनेका कारण शून्यके हथियार
रोने तालाबमें पग दिया जल वँसाही शुद्ध और स्वच्छ होगया । यह देख सब ऋषि-
योका अभिमान जाता रहा, सेवरीका माहात्म्य अधिकसे अधिक प्रगट हुआ ।
महाराजा सेवरीको कृतार्थ कर वहाँसे चलनेका विचार करके सेवरीसे
चलनेकी बात कहने लग उसी समय विरह और वियोगको न सहनेवाली सेव-
रोंने अपना प्राण त्यागकर इस असार संसारको छोड़ दिया । महाराजने स्वयम्
अपने हाथसे उसका दाह किया, सेवरी परमधामको पहुँच गई ।
प्रेमका पद सबसे श्रेष्ठ है । जिसके मनमें प्रेमने स्थान किया वह प्यारेके
अतिरिक्त सर्व संसारसे मुक्त हो जाता है । समस्त ब्रह्माण्डको तुच्छ समझता
हुआ आशिक अपने प्यारेके अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं देखता । प्यारेको
सर्व ठौर देखता है क्षण मात्र भी उसे बिना उसके चैन नहीं पड़ता । जिस हृदयमें
प्रेम नहीं वह मनुष्य नहीं । कबीर साहबने इस प्रेमके विषयमें बहुत बचन कहे हैं ।
प्रेम अंगकी साखी ।
कबीर- ऐसा कोई ना मिला, शब्द गुरुका मीत ।
तन मन अरपे मृग ज्यों, सुने बधिककी गीत ॥
कबीर- प्रेम प्याला सो पिवे, शीश दक्षिणा देय ।
लोभी शीस न देइ सके, नाम प्रेमका लेय ॥
कबीर- आया प्रेम कहाँ गया, देखा था सब कोय ।
छिन रोवे छिनमें हँसे, यह तो प्रेम न होय ॥
कबीर- प्रेम प्रेम सब कोई कहै, प्रेम न चीन्हे कोय ।
आठ पहर भीना रहे, प्रेम कहावे सोय ॥
कबीर- बढे घटे छिन एकमें, सो तो प्रेम न होय ।
अघट प्रेम पिंजर बसे, प्रेम कहावे सोय ॥
कबीर- प्रेम प्यारे लालसे, मन दे कीजे भाव ।
सतगुरुके प्रतापसे, भला बना है दाव ॥
कबीर- प्रेमी दूँदत मैं फिर्है, प्रेमी मिला न कोय ।
प्रेमीसे प्रेमी मिले, तो भगती दूढ होय ॥
कबीर- जा घट प्रेम न संचरे, सो घट जान मसान ।
जैसे खाल लुहारकी, सांस लेत विन प्रान ॥
कबीर- प्रेम वणिज न करि सके, चढे न प्रेमके गैल ।
मानुष केरी खोलरी, ओढे देखा बैल ॥
अन्य धर्मोंकी आवश्यकता पश्चिमियोंके घृणितोंके ग्रहण करनेका कारण
कबीर- प्रेम बिना धीरज नहीं, विरह बिना वैराग ।
सतगुरु बिना मिटै नहीं, मन मनसाका दाग ॥
कबीर- जहाँ प्रेम तहाँ नेम नहीं, तहाँ न बुद्धि व्यवहार ।
प्रेम मगन जब मन भया, कौन गिने तिथि वार ॥
कबीर- प्रेम छिपाया ना छिपे, जा घट परगट होय ।
जौ पै मुख बोलै नहीं, नयन देत हैं रोय ॥
कबीर- प्रेम भाव एक चाहिये, भेष अनेक बनाय ।
भावे घरमें वासकर, भावे वनमें जाय ॥
कबीर- योगी जंगम सेवडा, संन्यासी दरवेश ।
बिना प्रेम पहुँचे नहीं, दुर्लभ सतगुरु देश ॥
कबीर- पीया चाहे प्रेमरस, राखा चाहे मान ।
एक म्यानमें दो खड़, देखा सुना न कान ॥
कबीर- पियारस पिया सो जो जाने, उतरे नहीं खुमार ।
राम अमल माता रहे, पिये अमी रस सार ॥
कबीर- प्याला है प्रेमका, अन्तर लिया लगाय ।
रोम रोममें रमि रहा, और अमल क्या खाय ॥
कबीर- ऐसी भट्टी प्रेमकी, बहुतक बैठे आय ।
शिर सौपे सो पीवसी, नातर पिया न जाय ॥
कबीर- जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहिं ।
प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं ॥
कबीर- जबलग जो मरनेमें डरे, तबलग प्रेमी नाहिं ।
बड़ी दूर है प्रेमघर, समझ लेउ मन माहिं ॥
कबीर- जैसा लौ पहले लगे, तैसे निबहे ओर ।
अपनी देहको को गिने, तारे पुरुष करोर ॥
कबीर- लागी लागी क्या करे, लागी नाहीं एक ।
लागी सोई जानिये, करे कलेजे छेक ॥
कबीर- लागी लागी क्या करे, लागी सोइ सराह ।
लागी सोई जानिये, जो उठि कराहि कराहि ॥
कबीर- लगन लगी छूटे नहीं जीभ चोंच जरि जाय ।
मीठो कहाँ अंगार है, गहे चकोर चबाय ॥
कबीर- जा खोजत मुनिवर थके, सुरनर मुनिवर देव ।
कहैं कबीर सुन साधुआ, कर सत गुरुको सेव ॥
नजम ।
सुनो यारो मुहब्बतकी कहानी । भरे नेमत दो आलम जिसका पानी ॥
किया शहे इश्कने जिस दिलमें डेरा । वहाँ बाकी रहा तेरा न मेरा ॥
जो दिलवर आनकर जादूको डारा । हुआ तब इश्कसे दिल पारः पारा ॥
जो आकिल या फलाई जमाना । हुआ सब अकल खोकरके दीवाना ॥
शहनशह था सब जमीं और जँका । बना कमतर सो खादिम खादमाँका ॥
हुई जब यारसे अपने जुदाई । गई तब बन्दगी भूली खुदाई ॥
कहाँ तब जुहद है तकवा तिहारत । मुहब्बत यारकी निशि दिन महारत ॥
निछावर कर दिया तन मन धन अपना । सो सब संसारको देखे जो सपना ॥
विरहका तीर दिल छिदकर हुआ पार । बेगाने खे़श आँखोंमें लगे खार ॥
जुदाई यारनेकी जब दिवाना । व्यावौ दशत सेहरा खाक छाना ॥
हैं निसदिन करते फिरत प्रियजारी । सद आह बनालः और अशकबारी ॥
किया दिलवरके कूचा जबसे फेरा । हुआ आँखोंमें कुल आलम अँधेरा ॥
मुहब्बत यारकी दिलमें जो जागी । अकल उस वक्तसे रुखसतको मांगी ॥
अकल कुत्तीको दुरदुर कर दिया है । नहीं तू है जहाँ मेरा पिया है ॥
उठाते गीत गाते अर्गनूसे । मुहब्बत यारमें फिरते जनूसे ॥
अरे हुदहुद मँरे पीतमकी पाती । तू ला पढ़कर जुड़ाऊँ अपनी छाती ॥
कि निसदिन यादमें है ज्ञान उबाली । हुआ सारे हवससे दिल जो खाली ॥
किया खाली जो खानः दिल सहलमें । बैठे दिलदारको तब उस महलमें ॥
नहीं कुछ काम है दुनियाँ व दीसे । तो दम मारना क्या आँ व ईसे ॥
कि जिस घरमें मेरा माशूक आवे । वहाँ कोई दूसरा रहने न पावे ॥
नहीं दुनियाकी कोई मुश्क व बू है । तू देखे दिलके अन्दर तुही तू है ॥
जो सारी मक्खियाँ दिलसे निकाला । तो उस घरबीचमें दिलवर बिठाला ॥
तु हो आनन्द कर दर बन्द नयना । दिल अन्दर दिलरोवासे बोल बैना ॥
सतगुरुकी प्रशंसा ।
मुसद्दस ।
मालम हुआ वेद व कुरआँकी रकमसे ।
जाहिर है तेरी हमद वं सना अहले कलमसे ॥
क्या किलक लिखे हीमः गो वागो अरमसे ।
दुनियामें न कोई वाकिफ है वस्ले सनमसे ॥
जो कुछ नजर आता है सो तेरेही करमसे ।
सब इल्मो अमल बरकत सतगुरुके कदमसे ॥
पृथ्वीका निरूपण इतीपर मुसलमानी धर्मके विद्वान्
जुजसायः कदम तेरे न इनसाँका गुजारा ।
तदवीर नहीं तेरी शरणका है सहारा ॥
लिखते तेरी औसाफ लगे बहर किनारा ।
दिल विदः रौशन करे मजमूं हमारा ॥
पैदा कलम हरकत तुझ दीदः दमसे ।
सब इल्म व अमल वर्कत सतगुरुकी कदमसे ॥
है कौनसा बाजार तेरा इश्क जहां है ।
है कौन फिरोशिन्दः खरिदार कहाँ है ॥
हमराज कोई आशिक जान वाज वहाँ है ।
जिस रम्जकी फहमीदको सर सिदकः शहाँ है ॥
सो हाथ लगे काइ न दीनार दिरम से ॥
सब इल्मों अमल वर्कत सतगुरुकी कदमसे ॥
आई है जहाँ जेह्लि सो खुरशौद झलक है ॥
सब तारफना जरः पानूर झलक है ॥
उमीद न कुछ आदम और जिन्ने मलिक है ॥
है जान अमान बख्श तुही फितनः फलक है ॥
जुज तेरे न महरम कोई इनसानके धरमसे ॥
सब इल्मों अमल बरकत सतगुरुकी कदमसे ॥
तू रहबर हो जिसकी करे रहनुमाई ।
फिलफौर सोई खुदमें लिया देख खुदाई ॥
हरजा तू है तुही है तुही अर्ज स्वामी ।
सदहा खाते गोता न इसरार सों पाई ॥
है फजल तेरा आजिजकी दीदः नमससे ।
सब इल्म व अमल वर्कत सतगुरुकी कदमसे ॥
सत्यकबीर धर्मका मूल ।
<table> <tr> <td>ईश्वर</td> <td>...</td> <td>...</td> <td>सत्यपुरुष ।</td> </tr> <tr> <td>आचार्य</td> <td>...</td> <td>...</td> <td>कबीरसाहब ।</td> </tr> <tr> <td>गुरु</td> <td>...</td> <td>...</td> <td>पारख ।</td> </tr> <tr> <td>शास्त्र</td> <td>...</td> <td>...</td> <td>स्वसंवेद ।</td> </tr> <tr> <td>मार्ग</td> <td>...</td> <td>...</td> <td>निर्वाण ।</td> </tr> <tr> <td>चाल</td> <td>...</td> <td>...</td> <td>सतोगुणी ।</td> </tr> </table>कबीर मन्शूरका स्पष्ट सार ।
यह समस्त संसार कालका दास है, जो कोई कबीरसाहबका शरण गहकर कभी न छोड़ेगा वो अवश्य भवसागरके पार पहुँचेगा। नहीं तो दुःख सागरमें ही पड़ा गोता खावेगा ।
कबीर साहिबकी प्रार्थना ।
ऐ मेरे स्वामी ! बन्दी छोर ! तू गरीब निवाज है, मैं अधम अयोग्य और पापी हूँ । तू मेरे पापोंपर दृष्टि मत कर । तू संसारका उद्धारक है, मेरा भी उद्धार कर । मेरी ओरसे दृष्टि मत फेर । अचेत बच्चोंको माता पिताके बिना दूसरा आश्रय ही नहीं है ।
हे गुरु ! तूने बारम्बार कहा है कि, “मैं कलियुगमें जीवोंका उद्धार करूँगा” तू अपना वचन देख मैं तेरी शरणहूँ तू अपनी शरणकी लाज रखकर मेरा विनय श्रवण कर । जो इस पुस्तकके लिखनेके समय मेरा सहायक पुरुषोत्तमदास साधु था उसको उत्तम फल दे । जो इस पुस्तकको पढ़े सुने और मेरी शिक्षा स्वीकार करे उनको अज्ञान अंधरेसे निकालकर आत्मज्ञानके प्रकाशसे पूर्ण कर दे । सत्य कबीरो जयति ॥
शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
अथ समाप्तिके गजल ।
बुल बुलौं मुझदए बहार आया । इसके साथ ही पयाम यार आया ॥
आह वे नालेके दिन गये हैं गुजर । दिल परा गन्दा बरकरार आया ॥
खुल्द और जन्नते जिनौ क्या जान । दिन बशाशतका वेशुमार आया ॥
शोर बख्तीके दिन गये हैं गुजर । नेक बख्तीका रोजगार आया ॥
मिहर मुरशद कबीर जिसपर हो । उसको है भेद वार पार आया ॥
फिर न कोई दवा दविस आजिज । हाथमें अपने जब शिकार आया ॥
नखले मुहब्बतका समर मुझको दिखा ऐ बागवौं ॥
तेरे बागमें उल्फते शिजर मुझको दिखा ऐ बागवौं ॥
शफकत किया जो निहालपर ताजा किया तो पालकर ॥
भूला करम क्यों टालकर मुझको बता ऐ बागवौं ॥
सब खारो खस को खींचकर पाला है तूने सींचकर ॥
बैठा क्यों आँखें मींचकर मुझको बता ऐ बागवों ॥
खुद बागमें शामिल किया और पालकर कामिल किया ॥
फिर काटना क्यों दिल दिया मुझको बता ऐ बागवों ॥
आजिज पड़ा आजिज पड़ा ऊँधा हुआ पानी घड़ा ॥
तुझ विन भरे फिर कौन आ मुझको बता ऐ बागवों ॥
बागवों बाग कुहनमें तेरे अशजार जिते ॥
कोई है समर बख्श हैं पुर खार किते ॥
तुही खालिक तुही मालिक सबी तहरीक तेरी ॥
तू शहन्शाह जहाँ फौजके सरदार किते ॥
सभी महकूम तेरे हाकिमे आला है तूही ॥
तुही सरकार बड़ा छोटे हैं सरकार किते ॥
है हयात अबदी उनको जिसे तू बख्श अमान ॥
जिन्दा है कोई कोई और हैं मुरदार किते ॥
आलमोंका तू खुदावन्द फिकर सबकी तुझे ॥
सबका दिलवर है तुही और दिलदार किते ॥
नाम लेते हैं बहुत लोग तेरी दुनियामें ॥
हंस है कोई कोई और वह तीमार किते ॥
आसमों और जमीं कापते कब्बीर कहे ॥
आशिकको खबर गो कि खबरदार किते ॥
पेशकश हाथ सर अपनाले गली यारमें आ ॥
बे कीमतके वस्ल खरीदार किते ॥
जिसको तू अमल बख्श है अलमस्त ॥
बे नशः के छूटे हैं सरशार किते ॥
सबका है खुदा तुही खुदावन्दा नेक ॥
बे बहा तू है समर बख्श समर बार किते ॥
आजिजको चखा लज्जते उल्फत ऐ गुल ॥
गोबुलबुलो सदा जानिबे हरचार किते ॥
बुलबुलो खिजां गया अब आया है दिनबहार ॥
गागीत चहचहे सदा कर खेल दिन बहार ॥
गुल्शनमें जाके मगज मुअत्तर कर अपनेको ॥
एक रूप
क्या क्या है हुस्न खूब खिले गुल है पुर कतार ॥
कह ज़ाग वूम शूमसे अब दूर भाग जा ॥
खूबोंकी खूबियां तेरी आँखोंमें लगते खार ॥
वह बखत क्या मुबारक व साअत सईद है ॥
खुश वक्त बख्श आशिको माशूक दर किनार ॥
साहब कबीर होवे मिहरबां जिस ऊपर ॥
बे मिहनत सो आजिज हो दरिया पार ॥
तुम साहबरहमान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥
दया धरमके खानहो अगली मिहर मत छोड़िये ॥
हम तो हैं दायमपुर अता अलमो अमलकीजे अता ॥
दुनियां व दीन सुल्तान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥
हम इलमो अकलमें हेच हैं हम कालके दर पेच हैं ।
तुम जल्ले अलीशानहो अगली मिहर मत छोड़िये ॥
जान बख्शा मुर्दा लाशका पर्दः ढके कल्लाशका ।
तुम आलमें खाकान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥
ना चार आजिज जिऊ हम सामां नहीं कोई बहम ।
तुम साहेब सामान हो अगली मिहर मत छोड़िये ॥
दुश्मन दिले शहजोर है छलबल भरा सो चोर है ।
निशि दिन भरोसा तोर है सद शुक्र बन्दी छोरका ॥
जब गिरियः और जारी हुई जम जातना भारी हुई ।
तब आपकी यारी हुई सद शुक्र बन्दी छोरका ॥
दारा सिकन्दर कुट गये सूफी कलन्दर लुट गये ।
कोई हंस तुझसे जुटगये सद शुक्र बन्दी छोरका ॥
दरियाय दिलकी लहरमें सब बह गये इस बहरमें ।
पहुँचे कोई तेरे शहरमें सद शुक्र बन्दी छोरका ॥
जिसका यह तीनों भुवन है उससे बचे कह कवन है ।
तू ही सकल दवन है सद शुक्र बन्दी छोरका ॥
जग जीवको मारा झुला जाहिद व आबिद सब भुला ।
अब मुक्तिका द्वारा खुला सद शुक्र बन्दी छोरका ॥
अगला न रिश्ताः तोड़िये अपने कदमसे जोड़िये ।
आजिजका हाथ न छोड़िये सद शुक्र बन्दी छोरका ॥
सदगुरुको प्राप्त हो
सामा न सरे देखिये इस अहद हमारे ॥
सब फितनः भरे देखिये इस अहद हमारे ॥
कोई न सुने पन्द न पहचान न देखे ॥
अन्धे भरे देखिये इस अहद हमारे ॥
इल्म व अमल सब है अबस बाद फरोशी ।
गोया घरे देखिये इस अहद हमारे ॥
है कौन गुरु और कहाँ धर्म खुदा है ।
कोई न डरे देखिये इस अहद हमारे ॥
नेकीसे भगे सारे है बेपार बदीका ।
जब सबको घरे देखिये इस अहद हमारे ॥
इस अहदके आदमके अमल पर जो नजर कर ।
कोई न तरे देखिये इस अहद हमारे ॥
आई जो खिजा बाद गुलिस्तां में सब गुल ।
पजमुर्दा पड़े देखिये इस अहद हमारे ॥
जब आकर अन्न तेरी बारिशो वारा ।
सूखे लहर देखिये इस अहद हमारे ॥
आजिजको बशारत हैं यह सतगुरु शब्दसाख ।
सब खुशक हरे देखिये इस अहद हमारे ॥
मुखम्मस ।
जुज मिहर तुम्हारी कहीं आराम न होवे ।
इस दार फना नेक सरन्जाम न होवे ॥
तदबीर व तकदीरसे कुछ काम न होवे ।
निस जायमें इकता वह गुलन्दाम न होवे ॥
दोजख है सरापा जहाँ सत्तनाम न होवे ।
जब किशवरे हस्तीसे चले हंस अदमको ।
किस शान व शौकतसे लिये शब्द अमलको ॥
तत्र ब्रह्म विचारा फिर जा चूम कदमको ।
बाजारमें आकरके जो पहचान सनमको ॥
फिर आशिके सौदा यह कभी खाम न होवे ।
बहदत है तुझे और नहीं कोई है सानी ।
सब ओर भ्रम लावूत इस देर दुखानी ॥
गह खुशम गहें सब्ज गहे सुबक गिरानी ।
वे वर्ग सपर बाम चले बाद खिजानी ॥
पुर खार वह गुल्शन जहाँ गुलफाम न होवे ।
गल्तान सदहा विसमिले नखचीरमें देखे ।
मुरगां बकफस जेरके जंजीरमें देखे ॥
जर्ब जखम व कारी इसतीरमें देखे ।
तासीर अजब जालिमें रहगारमें देखे ॥
वह राह था मुझको जहाँ दाम न होवे ।
ऐ मेरे खिजर हाथ पकड़ आन हमारा ।
जुज्ज तेरे करम फ़ज़ल नहीं हमको सहारा ॥
है तेरी पनह आजिजे मिसकीं विचारा ।
दिन गुजर गया यों है न कुछ काम सिधारा ॥
रख अपना दिखा जल्दतर शाम न होवे ।
अब्र नसियां करम तेरे असर है कि नहीं ॥
सदफे बहर तेरे कोई गोहर है कि नहीं ॥
वागबां बागमें ऊल्फत का शजर है कि नहीं ॥
कोई नखले मुहब्बतमें समर है कि नहीं ॥
मन मिसकीं की तरफ तेरी नजर है कि नहीं ॥
ढूँढे मुल्क आदम और जिन्नो परी ॥
तुझ विन नहीं चैन सद आफात भरी ॥
शबे फुरकत न कटी हाय कटी उम्र मेरी ॥
वस्लकी रातकी हैहात न तू बात करी ॥
इस सबे हिज्जका आखिरको तो संहर है कि नहीं ॥
गौवास जो सद गोतः लगातेही मुआ ।
मुहरा हाथ लगा और न कुछ काम हुआ ॥
जब बहर करम लुफ़ तेरा मौजमें आया ।
बैठेही साहिल पर न सो न अम इनआम दिया ॥
दिल रियामें तेरे कोई लहर है कि नहीं ।
ऐबख्त बख्वाब होवे बेदार कभी ॥
मुझ गुनहगारको हो यार की दीदार कभी ॥
ऐ परदः नशी राज कर अफशार कभी ॥
निगह नेक होवे सोई गिरफ्तार कभी ॥
इस बन्देपर अगर्लासी मिहर है कि नहीं ॥
दर पैसे सफर मुझको वफाकेश जता ॥
शाफी मेरे हामी मेरे कर इल्म अता ॥
मुजरिम हूँ तेरा गरक गुनहगार खता ॥
ऐ चश्मये फँज व रहमत मुझको बता ॥
आजिजका तेरी राहमें गुजर है कि नहीं ॥
तरजीब बन्द ।
जबान मेरी बयान नुत्क असर दे । बदीद जाहिर व वातिन बसर दे ॥
न भूलूँ एक पल तुझे रहे तेरी याद । शबो रोज हर शामो सहर दे ॥
जो नेमत दो जहां सो सब खदफ़ है । खदफ़ कर दिल सदफ़ नाम घरदे ॥
नसदीं दिन बदिन गर्मी तरक्की । मुहबत मुशैद अब्दुल देहरदे ॥
खुदीको भूलकर बाखुद हूँ सरमस्त । शराबे इश्कका अपने खुमरदे ॥
न जाहिर जिवलः दिखलाता परीरू । उठाता इश्क आतश बात परदे ॥
रुख खुर छिप रहा है अब अन्दर । खुश औं वक्तके बुक़रा दौरे दिहरदे ॥
न मुझसा और नालायक व नादार । तू सब लायक है खाली पूर करदे ॥
हमारे बद अमल पर मत नजर कर । सरन और नाम अपनेका अजरदे ॥
बहुत दिनका सगेदर हूँ मैं तेरा । न दुर दुर कर न दूर कर पेट भरदे ॥
न जाऊँ दर बदर इक दर उम्मीद । बचाले जान और जिवदान बरदे ॥
मिहरकी बहर तू बेहद न पाय न । मिहर कीजे मिहर कीजे अपनी लहरदे ॥
सगेदरको फ़िरा हरगिज न दर दर । मिहर कीजे मिहर कीजे मिहर कर ॥
तुही कुनसे किया कोनों मकांको । तुही बरपा किया सब जिस्म व जांको ॥
तुही सत पुर्ष ज्ञानी नाम तेरा । तुही बतला दिया नामे निशांको ॥
किया तूहीने मलकुल मौत पैदा । तुही भेजा है मुरशिद मिहरबांको ॥
कहरेके वास्ते कर काल जब्बार । मिहरकर फिर किया अमनो अमांको ॥
बनजमे इस जहां निरगुण बनाना । किया पैदा हरी हर वेदख्वांको ॥
किया मकबूल और मकरुह व मरदूद । तुही खूबी दिया जन्नत जनांको ॥
तेरे सब नाम है आराम बख्शे । चले सब वस्फ सतनाम सुबहांको ॥
तेरे औसाफ लायक न मलायक । है क्या इमकान इन्सांकी जबांको ॥
न जानां भेद कुछ हम्दे सरायां । बयां किस तौर कीजे लाबयांको ॥
तुही बेमिस्ल साहब सबका सरदार । तुही बख्शे अद् और दोस्तांको ॥
अलख तूही है कोई लख न पाया । न जाने भेद तुझे राजे निहांको ॥
तुही सब कुछ किया है सबमें मौजूद । तुही देता है हरकस हर जमांको ॥
बहर खान व बहर शान व बहर शै । तुही था और तुही होगा तुही है ॥
हज्जारी पीर पैगम्बर बनाये । जुदा सब मजहबो मिललत चलाये ॥
नहीं वह नूर सद मामूर तारे । मिहर तुझ रख मिहर दैजूर जाये ॥
नहीं लमअ सोसद शमाअ शविस्तां । कि बरकत तेरीदिन मशअल जलाये ॥
शरीअत शाखकर सारी मुखालिक । न जाते राह इन्सांको बताये ॥
नबी पीरां फकीरां कैल फरजन्द । सभी औतार धर अल्लह बताये ॥
सभोंमें बरतरीं हैं राम और कृष्ण । निरंजन राय खुद धर देह आये ॥
जिते मजहब हैं इस आलममें जारी । नराहे रुस्तगारी कोई दिखाये ॥
नहीं मजहबसो सारे कालके जाल । किया मंसूख इक दूना चलाये ॥
किया मुरगाने जेरक दर कफस बन्द । जो दानांकी तरह दिलको झुकाये ॥
फँसे उसदाममें आराम जानां । जपे सब राम नहिं सत नाम पाये ॥
पड़ीं सब गाय दरकाबू कसाई । जिधर जावें उधर छूरी उठाये ॥
किया तब रहम तू मुशिद हकीकी । जो साहब था सत सुकृत कहाये ॥
करे सब जीवके दुख दन्द तू दूर । तेरा है नाम बन्दी छोर मशहूर ॥
तेरी मस्तोंकी महतीको न जाना । हुआ मदहोश बे खुद और दिवाना ॥
अनलहक भी न पहुँचे अपने हकको । हुआ था यह अनलहक का बहाना ॥
कोई नागा कोई भागा बियाबाँ । कोई अन्दर जमींके जा छिपाना ॥
कोई गावे बजावे तान तोड़े । नकल भाँडोंकी सबने अकल ठाना ॥
हुए बेगानः सब अपने अमलसे । न पहचाने कोई अपना यगाना ॥
तेरे प्यालेसे इक कतरा जो पिया । लिया सौ जान मुर्दोंका जिलाना ॥
नहीं भगवाँ तिलक कण्ठी न माला । निराला भेष धर तुझमें समाना ॥
हुआ जब अस्लसे वह वस्ल अपने । हुआ तब कतरये दरिया जमाना ॥
तेरी बेमिस्ल सागर मुश्कबूसे । रहे क्या अकल आदमकी ठिकाना ॥
मुअत्तर मगज उसबूसे हुआ जब । तो दानाई को खो बैठे हैं दाना ॥
हुए बेखुद खुदीको खोये बैठे । न अब तक तीर पहुँचा वर निशाना ॥
कितें पर पा किये परवाज बाला । जमींपर फिर फिर उनको है आना ॥
विमुख हुआओंकी गति
पिला पुर प्याला कर ऐ मेरे साक्री । रहेगा नाम बन्दी छोर बाकी ॥
यह चक्की चल रही गरंदून गरदां । जो खायो पीसकर सब नेकमर्दा ॥
बले जाते हैं पीरो पीर दाम्माँ । हकीकत क्या वहाँ फरऊन धाम्माँ ॥
चरख चक्की है और सब जीव दाना । मियाने मेख मुशिद मिहरवाना ॥
मियाने मेख मुशिदके कदम लग । अलग बच जायगा मतहो हिरासां ॥
जिधर जावे उधर धर पीस डाले । जमीन और आसमों घर बन वियावां ॥
पिये ब्रह्मा हरी हर कृष्ण राधो । पिये नौनाथ और जाहिद बुजर्गां ॥
बचे कोई न कर सद्दहा जो तदवीर । बचो पानी बनाया मेश गुरगां ॥
किया कब्जमें सबके जिस्म वजाँको । पड़ा पीछे कवी यह नफस शैतां ॥
यहसंव खिलकतखुरिशजमकीरोजीन । मला एक क्यापरी और जिन्नो इन्सां ॥
यह बैठे अकलपर सबके दिले भूत । जिधर चाहे उधर करदे परीशां ॥
जिधर यह भाग जावे आदमीजाद । चमकती सैफ हर जानिव नुमायां ॥
बले दन्दानं जेरी कालके सब । यह मुश्किलतुझ सिवाहोवेन आसां ॥
वहाँ कँल मकां आजिज मुकीमा । तुमही गफ़ूर और तुही रहीमां ॥
तरजीआ बन्द ।
ऐ के दर परधये शुक्र गुप्तार । जल्द वह जलवः कीजिये इजहार ॥
मुझे वह जाम भर पिला साक्री । मस्त हूँ तेरे इश्कमें सरशार ॥
हर तरफ औ लियान लल्लामा । इख्त लात इनका है अजाबुन् नार ॥
जाहिदोंके जहदमें मिलादे खाक । आविदोंके न दिलमें सब करार ॥
ओट तेरी बचाव चोट उनके । मैं हूँ इन्तहा व दुश्मनाने बक़तर ॥
मंजिले दूर तोशए राह नहीं । मैं पियादा व हमरहान सवार ॥
दस्तगीरी कर ऐ खुजिस्तः हकीर । दूईका परदः अजमियाँ बरदार ॥
मैं फकीर और मेरा गनीम गनी । न मुक्काबिल हो मुफ़लिसो ज़रदार ॥
कोई बाकी रहे न रसमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥
जिस्की जुल्फोंको देखकर लाला । दाग हस्रतसे दिल हुआ काला ॥
सद गुलिस्तां निसार खाक कदम । बुल बुलें जिस लिये करें नाला ॥
दीद बर दी है न दीद बदीद । माह पर आन कर पड़ा हाला ॥
तुही खालीक हुआ तुही मखलूक । तुही पैदा किया तूही पाला ॥
जब उठा पांच तीनका झंडा । सारे नामो निशों मिटा डाला ॥
तुही जाहिर है और तुही बातिन । तुही जेरीन और तुही चाला ॥
कदम खाक तेरेकी बरकात । दुश्मने सद ब जेर पामाल ॥
रामवनवास दृष्टान्त, हरिप्याश, रावण शिद्दाह बादशाह, नमरुद
सिर्फं तेरी भिहरसे यहज जीव । बे गुमाँ लामकाँ ऊपर चाला ॥
कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥
बे अदद आलमीन् परवर है । औलिया अम्बियाय सरवर है ॥
बन्दः मुजरिमका जूर्म करदे मुआफ । तू रहीमो करीम बरतर है ॥
जंग मैदानमें हूँ पड़ा घायल । न सनान सैफ ढोल बकतर है ॥
मने मजरुह सा तु है जरहि । दिले दिलगीरका तु दिलबर गीर है ॥
मने मिसकीन से अपना रुख मत फेर । मुझ ले जाय तेरेहि दर है ॥
अब किधर जाऊँ छोड़ दामन को । तेरे साये कदम मेरा घर है ॥
कर जफ़ा या वफ़ा तुझे सब जेब । मुझे मनजूर जो तेरी सर है ॥
हैं हुमायूँ नसीब सो जिनके । मूनसे मह मुदाम दरबर है ॥
कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥
देख उस रंग रूप रोगनको । तब लिया जान वाजीगर फनको ॥
शार अफशाने दीदः हों ताजः । देख जब अपने रङ्ग गुल्शन को ॥
गममें गिरियाँ बर न उरियानी । प्यार तिनको न रहे इस तनको ॥
दिल चपल चुलबुला हुआ साफिन । मार कर मुर्दा कर दिया मनको ॥
खसो खाशाकसे जब हुआ पाक । पार आवैठे मार आसनको ॥
तुझसाकादर व मुझसा बे मकदूर । संग पारस मिला जो आहनको ॥
यह गलत मसलः आह और कहो । जिनको पहनाव खास जोशनको ॥
ज्रुम सब भर बड़क नजर न हजर । पारचा पाट टाट सोजन को ॥
कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सतगुरु कबीर बन्दी छोर ॥
दे वसा आन गेबका घेरा । जल्द कर मेरे कूचेमें फेरा ॥
जोड़ खंजर न छोड़ विस्मिलको । ऐ दिलाराम काम कर मेरा ॥
कारपरदाज तू गरीब निवाज । खानये दिल मेरे करो देरा ॥
रूय खुरशौद की झलक झिलमिल । नूर हों पूर दूर अंधेरा ॥
भागजा जहाँ पड़े व पा जंजीर । सब जवानिब है कलका घेरा ॥
खाब गफलतसे कर दिया बेदार । बेहद्द अहसान बन्देपर तेरा ॥
बिन तेरे कौन कब जग जीव । तूही साहब है और सब वितेरा ॥
हाथ धर कर जिसे उठाया तू । बेगुमाँ उसका पारहो बेरा ॥
कोई बाकी रहने सरमें शोर । कहो सत गुरु कबीर बन्दी छोर ॥
बख्स तू दया व झको किब्लेगाह । रोजो शब तूही तू है शाम पगाह ॥
फिरऊन, अख्वाव बादशाह
कीजे मुहरम बदीजे अकल हिलाल । रख मेरा जामः पाक ज़ेर निगाह ॥
होत गाफिल न तुझसे लमह कोई । वख्शदे मुझको मेरे शाहन्शाह ॥
यह दशावाज दिलये मुरदार । रख पिनह खुद जे हीलये रोवाह ॥
ऐ मेरे जान ऐ मेरे जानाँ । मुन्तजिर जलवः तेरे दीदः वराह ॥
रूबरू तेरे हूँ मैं किस ढवसे । हूँ पिशोमान फेलनामा स्याह ॥
कोई वाकी रहा नहीं चारा । लेके दम सदै तौवः नालः व आह ॥
रु रहाई रही न राह गुरेज । वन्दः नाचारा को है तेरी पनाह ॥
कोइ वाकी रहे न सरमें शोर । कहो सत्गुरु कबीर बन्दी छोर ॥
इस जहांका न काम वाकी है । एक तेरा सत्य नाम वाकी है ॥
कुल फानी जो दीदः मनजरमें । सार शब्दे पयाम वाकी है ॥
हक तेरेसे अदा न कोई ऐ हक । हक तेरा लाकलाम वाकी है ॥
सब चले जायँगे रहे न कोई । इक तेराही क्रयाम वाकी है ॥
देता है तू जो खास खासोंको । शरबते नोश जाम वाकी है ॥
परदेसे पैरवान का रहबर है । जल्सए खासो आम वाकी है ॥
तेरी हमदो सना रहै कायम । जब तलक सुबह व शाम वाकी है ॥
हो चुका जोर दौराका आजिज । अब तेरा ऐहतमाम वाकी है ॥
कोई बाकी रहे न सरमें शोर । कहो सत्गुरु कबीर बन्दी छोर ॥
तरजिआ बन्द ।
न तुझ बिन कोई सीधी राह पाया । भटकते मरगया घरको न आया ॥
जो कुफरस्तानमें खुद खुद फँसाया । रहे पुरखार दौराने दिखाया ॥
पकड़ जमराजने उसको भुलाया । पड़े मुरगों सब सय्यादके फंद ॥
छुड़ाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्द खुदावन्दा खुदावन्द ॥
कभी तुझ बिन न जीवका कुफ टूटे । यह फिर फिर जायकर उसांहीसे जूटे ॥
यह दानाई की दौलत सारी लूटे । तमीज और अकल दानिश उसे छूटे ॥
हुआ सरमस्त इसमें फिर न फूटे । मिलाया बागबाने उससे पैबन्द ॥
छुड़ाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥
पकड़ कर हाथ अपनी रह दिखादे । सफीना सीनःपर नामा लिखादे ॥
न भूलूं फिर सबक मुझको सिखादे । किताबें अकल की ताकों रखादे ॥
रहे बाकी न कोई सब उठादे । खयाले खाम अज दिल चन्द दर चन्द ॥
छुड़ाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥
व बज्रमें खुद परिस्तां कौन जावे । वहां की ला खबर हमको सुनावे ॥
धर्म विमुखोंका हाल
गया जो फिर कभी कोइ न आवे । जो आवे सो खबर पिछली भूलावे ॥
न भूले तौ कभी इकता कहावे । मिहर तेरी से पावे जीव आनन्द ॥
छुड़ाले बन्देको अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥
इस आसी बन्दः को अपने करमसे । बचाले पाँच और तीनों भरमसे ॥
गिरह दिल खोलकर महरम मरमसे । कि रख लीजे पिनह अपनी शरमसे ॥
अरज करता है आजिज दीदःनमसे । कदम बरकत तेरी हो फाल फरखुन्द ॥
छुड़ाले बन्दे को अज हस्तिये बन्द । खुदावन्दा खुदावन्दा खुदावन्द ॥
गुरु की प्रशंसा
खोलं अब खुद जबों ब हम्दो सिपास । मुशिदे मिहरबान भिच्छुक दास ॥
अहल इसरार जिसने बतलाया । जो न इन्सान के क्रीन कयास ॥
सोई सतगुरु कबीर की मूरत । अमलो इल्म ज्ञान ध्यान की रास ॥
आत्मा दास मिहर आतम लाभ । जिसने पहनाये मुझको हंस लवास ॥
खाक पा जिस्से दीदः मन रोशन । उनकी शफकत है सारी इल्म असास ॥
हूँ गुनाहों से सरनगूँ नादिम । तौ भी अपनी शरण का उनको पास ॥
शुक्र गुरुदेव का कर ऐ आजिज । जब तलक तेरे तनमें होश हवास ॥
छन्द--- अत्र सन्त सुरति सम्हाल देखो कन्त निज पहचानिये ।
अगम अविचल अलख लखि निहअन्त वाको जानिये ॥
लखि वार पार है सोई साहब ज्ञान आँख जो तानिये ।
देखो दो नेत्र कबीर जहाँ तहाँ दूसरो नहीं मानिये ॥
अविगत अलेख भौ लेख नहिं सो एक बन्दी छोरहै ।
नर देह बाते नेह काजे भयो अब निसि भोर है ॥
जो नाम ररत काल डरत है हरत सो जम जोर है ।
बड भाग अटल सुहाग उनको जिहि भरोसा तोर है ॥
लोमस भुशुंड के झुंड ऋषिमुनि जासु गुण वर्णन करें ।
सनकादि नारद धनुक गुप्त सेवत चित्त चरणन धरे ॥
ऋषभ आदि योगेश्वर जनक नृप सत पद चरनन परे ।
बहु सिद्ध सो गुरुङ् गोरख आय तुम शरणन तरे ॥
कोटिन पैगम्बर पीर गये भव तीर नाम कबीरते ।
केहि कहत बनत अगनिंत ऋषि भये अमर सत शरीरते ॥
धरमदासको प्रभु खास निजकर बिलग नारो छीरते ।
सत्तनाम मिल निज धाम दीनो काम एक पदथीरते ॥
विष बेलि फल संसार है यह झार विष जेहि तेहि भरा ।
विष अण्ड पिंड समस्त है विष बारिमय भव सागरा ॥
बिलगाय विषते कौन ऐसो भवन तीनमें नागरा ।
करि कोटि यतन न ज्ञान रतन है मिटे किमि यह ज्ञागरा ॥
जहाँ कामक्रोध और लोभ मोहते सकल पूरण पावई ।
सब रोम रोममें विष भरा है अमृत नाहि समावई ॥
जग विषम आग है लागि तुम विनु ताहि कौन बुझावई ।
जीव कठिन काल कराल वशते बन्दी छोर छुड़ावई ॥
स्तुति करें और आरति सब हंस मिलि सत लोकमें ।
सतपुरुष आय बचाय खुद जीव जरत यमकी झोकमें ॥
न पाय कोइ उपाय साहब धाय धर जीव शोकमें ।
अरुझा सबहिं सरुझा न कोई जीव लोक वेद अथोकमें ॥
सतलोक हंस विलोक आनन्द बजत अनहद तूर है ।
प्रभु आरति अरु स्तुति करत सब सहज और अंकूर है ॥
इच्छा सोहं अचिन्त अक्षर शिखरे पद धूर है ।
एक रोम जासु प्रकाश ऐसो कोटि चन्दा सूर है ॥
यह तीन लोक सशोक देखिये आय आनन्द कन्द है ।
दशदिशि पसर यम जाल है सब जीव फन्द तेहि फन्द है ॥
गुरु वैद्य साँचा वेदवांचा हर लियो दुख दन्द है ।
भव भीर हरण कबीर दासन दास परमानन्द है ॥
कवित्त—पावन पतित जीव दीननके हितु प्रभु तू है गुरु पुरुष कहाओ
धूँ और है । कहत कबीर धर्म धरत न धीर करे अचल शरीर न लगत हीम
जोर है । पशु पंछी तारत है निगम पुकारत है आरतको देखिके निहार रिम
कोर हैं । पीरो पयम्बर हैं धीर जो दिगम्बर हैं वदे वदे बानीहू विरद बन्दी छोर
है ॥ तजत न बानी सुर मुनिन बखानी प्रभु शरणमें आनी जो करत निहोर है ।
तीन लोक ढूँढ़ जाये दूसरे कहूँ न पाये लगसो चरण दुख हरण जो शोर है ॥
नहीं शुभ करनी है बहु दुख भरनी है उस गुरु शरणी है कलि काल घोर है ।
अधम उधारनको जगत सुधारनको भक्ति मुक्ति धारण कबीर बन्दी छोर है ॥
बूड़े बड़ ज्ञानी सिद्ध साधक जो ध्यानी बिन नाम सहिदानी जिन्हें आशा न तोर है ।
बलबीज चूसत है सिद्ध साधू दूषत है निशि दिन मूसत है अन चीन्ह चोर है ॥
जीवको है ठौर नहीं सुरमुनि दौर नहीं परमानन्द पौर नहीं पाव न जो दौड़ है ।
बन्दी छोर बन्दी छोर बन्दी छोर एक भजू साहब कबीर टेक सोई बन्दी छोर है ॥
ग्रन्थकर्त्ताका अन्तिम निवेदन ।
पाठक गणोंसे निवेदन है कि, दासने यह पुस्तक स्वसम्बेदके अनुसार लिखी है, जिस किसीका मन चाहे कबीरपंथके विद्वानोंसे विचारकरके निश्चय करले। यदि कहीं प्रमाणादिकोंमें कुछ सन्देह अथवा भेद जान पड़े तो कृपा दृष्टिसे मुझे क्षमा करें क्योंकि, मनुष्य जीवनही भूलसे पूर्ण है।
पुस्तक समाप्तिकी तिथि ।
शुक्र बेहद परम गुरु गोविंद । की सरनजाम नुसखये दिल बन्द ॥
करमो फजल उसपै सतगुरुका । जो समझकर पढ़े सुने यह पन्द ॥
इससे शीरीं न कोई शर्बत और । आब हैवों न शूर्ब मिस्त्री कन्द ॥
पाव पहचान जो कोई मुशिदको । हो दफा सब जहाँका दुख दन्द ॥
कर अमल गर निगर न चश्म अपने । राज महरम न हो तो बर मन खन्द ॥
ईस्वी सन अठारह सौ अस्वन । उनीससौसैंतीस बिक्रमाँ सनः हिन्द ॥
मिहर सितम्बर व हिन्दवी अस्वन । खतम तारीख नुसखये चारम चन्द ॥
मैं उसीका हूँ खादमाँ खादिम । जिसके दरगह न पहुँचे कोई परन्द ॥
आजिज बा तख़लुस आजिज । नाम जिसका है दास परमानन्द ॥
है कबीर मन्सूरका, यह अविकल अनुवाद ।
विषम विषय निरधारिके, “माधव” रच्यो अवाद ॥
साहब ग्रन्थन सिन्धुमें, मो मन दुवकी लीन ।
सारशब्द हीरा अजब, तहँते लायो वीन ॥
बुद्धि अनौते भेदि तेहिं, ज्ञान सूत्रमें पोह ।
सन्त पारखिनके गरे, ग्रन्थमाल यह सोह ॥
यदि यह माला धारिके, सन्त भजहिगे राम ।
तो सब सिद्धी शान्ति सुख, पैहँ माधवनाम ॥
श्री कबीर पन्थी स्वामी परमानन्दजी साधु विरचित उर्दू कबीर मन्शूरका संशोधन तथा परिष्कार पूर्वक, सर्व तन्त्र स्वतंत्र भक्तों के चरण रज रिसर्च स्कॉलर पं० माधवाचार्य परिकृत हिन्दी अनुवाद समाप्त हुआ ।
पुस्तके मिलने के स्थान :-
१. इंदमराज श्रीकृष्णदास,
श्रीमं०