कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कबीरमन्शूर - विषयानुक्रमणिका
<!-- image: ★ --> <table border="1" style="width: 100%; border-collapse: collapse;"> <thead> <tr> <th style="text-align: center;">विषय.</th> <th style="text-align: center;">पृष्ठ.</th> <th style="text-align: center;">विषय.</th> <th style="text-align: center;">पृष्ठ.</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>प्रारंभिक उपोद्घात</td> <td style="text-align: center;">३१</td> <td>चार गुरुओंका वर्णन, स्वसंवेदका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">६०</td> </tr> <tr> <td>ग्रन्थकर्ताकी विज्ञप्ति</td> <td style="text-align: center;">३२</td> <td>वेद रक्षक, वेद व्यास</td> <td style="text-align: center;">६१</td> </tr> <tr> <td>स्वामी परमानन्दजीकी रचना</td> <td style="text-align: center;">३२</td> <td>कबीर साहबकी चार वाणी और चारों</td> <td></td> </tr> <tr> <td>कबीर मानु प्रकाशकी रचनाका समय</td> <td style="text-align: center;">३२</td> <td>वेदोंका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">६२</td> </tr> <tr> <td>कबीर मन्शूर (छोटा)</td> <td style="text-align: center;">३३</td> <td>चार ज्ञान, वेदके विषयमें, कुण्डलिनी</td> <td style="text-align: center;">६२</td> </tr> <tr> <td>तालीम कबीर कलियुग</td> <td style="text-align: center;">३४</td> <td>वेद तब और अब</td> <td style="text-align: center;">६४</td> </tr> <tr> <td>बड़ा कबीर मन्शूर</td> <td style="text-align: center;">३५</td> <td>वेद मंत्रोंकी शक्तिका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">६६</td> </tr> <tr> <td>तारीख खातमा</td> <td style="text-align: center;">३८</td> <td>वेद मंत्रकी शक्तिपर दृष्टान्त</td> <td style="text-align: center;">६६</td> </tr> <tr> <td>मंगलाचरण</td> <td style="text-align: center;">४१</td> <td>वेदकी श्रेष्ठतामें दूसरा दृष्टान्त</td> <td style="text-align: center;">६७</td> </tr> <tr> <td>प्रथमावृत्तिका मंगलाचरण</td> <td style="text-align: center;">४५</td> <td>स्वसंवेदकी शुद्धता</td> <td style="text-align: center;">६८</td> </tr> <tr> <td>१ अध्याय, सृष्टि रचना</td> <td style="text-align: center;">४६</td> <td>संसारके सब धर्मोंका मूल वेद</td> <td style="text-align: center;">"</td> </tr> <tr> <td>सत्यपुरुषका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">"</td> <td>अनुवादकका भ्रमविमोचनी विवेचन</td> <td style="text-align: center;">६९</td> </tr> <tr> <td>सत्यपुरुषके प्रतिनिधि</td> <td style="text-align: center;">४७</td> <td>श्रीमद्भगवद्गीता अ. ३ श्लो. ४५ विवेचन</td> <td style="text-align: center;">७२</td> </tr> <tr> <td>स्वसंवेदके प्राकट्यका वृत्तान्त</td> <td style="text-align: center;">४८</td> <td>दूसरी व्याख्या</td> <td style="text-align: center;">७६</td> </tr> <tr> <td>ब्रह्मसृष्टिका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">४९</td> <td>लोकमान्य तिलक</td> <td style="text-align: center;">७६</td> </tr> <tr> <td>कालपुरुषके प्राकट्यका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">४९</td> <td>वेदके प्राकट्यपर मतभेद</td> <td style="text-align: center;">७८</td> </tr> <tr> <td>कालपुरुषके तप करके तीनों लोकोंके</td> <td></td> <td>ब्रह्मासे ऋषिमुनियोंकी श्रेष्ठता</td> <td style="text-align: center;">८०</td> </tr> <tr> <td>राज्य पानेका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">५१</td> <td>वेद और किताबोंके मूलका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">८१</td> </tr> <tr> <td>निरंजनका कूर्मके पास जाकर तीनों लोकोंकी</td> <td></td> <td>वेदोंकी आज्ञा माननीय है</td> <td style="text-align: center;">८२</td> </tr> <tr> <td>रचना सामग्रीके मांगनेका विवरण</td> <td style="text-align: center;">५२</td> <td>समुद्र मंथन वृत्तान्त</td> <td style="text-align: center;">८२</td> </tr> <tr> <td>कूर्मजीका सत्पुरुषके पास फरिहाद करना</td> <td></td> <td>ब्रह्माका वेद पाठ और पिताकी जिज्ञासा</td> <td style="text-align: center;">८३</td> </tr> <tr> <td>और निरंजनको दण्ड मिलना</td> <td style="text-align: center;">५३</td> <td>गायत्रीका प्रकट होना</td> <td style="text-align: center;">८४</td> </tr> <tr> <td>निरंजनका पुनः तपस्याकर बीज खेत मांगना</td> <td style="text-align: center;">५४</td> <td>पुष्पावतीकी उत्पत्ति और ब्रह्माकी वापसी</td> <td style="text-align: center;">८४</td> </tr> <tr> <td>बीज खेत अर्थात् आदि भवानीका</td> <td></td> <td>ब्रह्मा गायत्री और पुष्पावतीकी कथा</td> <td style="text-align: center;">८५</td> </tr> <tr> <td>उत्पत्तिका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">"</td> <td>निरंजनका आद्याको शाप देना</td> <td style="text-align: center;">८७</td> </tr> <tr> <td>आद्यानिरंजनका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">५५</td> <td>विष्णुका पिताके दर्शन राज्य पाना आदि</td> <td style="text-align: center;">"</td> </tr> <tr> <td>तीनों देवोंके प्राकट्यका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">५६</td> <td>विष्णुको पिताका दर्शन होना</td> <td style="text-align: center;">८८</td> </tr> <tr> <td>चारों वेदोंके प्रागट्यका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">५७</td> <td>शिवका शाप और वर पाना</td> <td style="text-align: center;">८९</td> </tr> <tr> <td>वेदकी उत्पत्ति प्रथम अक्षर पुरुषसे</td> <td style="text-align: center;">५७</td> <td>कर्मका बदला</td> <td style="text-align: center;">९०</td> </tr> <tr> <td>वेदके प्रचारक ब्रह्मा</td> <td style="text-align: center;">५८</td> <td>विष्णुका ब्रह्माको आश्रय देना</td> <td style="text-align: center;">"</td> </tr> <tr> <td>अथर्वण वेद मंडूक उपनिषदकी कथा</td> <td style="text-align: center;">५८</td> <td>माया सृष्टिकी उत्पत्तिका वृत्तान्त</td> <td style="text-align: center;">९१</td> </tr> <tr> <td>वेदके साथ क्रोड मंत्र, वेदोंका सार</td> <td style="text-align: center;">५९</td> <td>माया सृष्टिका विवरण</td> <td style="text-align: center;">"</td> </tr> </tbody> </table>इति कबीर मन्शूर विषयानुक्रमणिका समाप्त ।
कबीर मन्शूर
<!-- image: ★ -->प्रारंभिक उपोद्घात
इस ग्रन्थका नाम "कबीर मन्शूर" उर्दूमें लिखा है, इसी नामसे हिन्दीमें भी प्रसिद्ध हो गया है।
मन्शूर शब्द अर्बी भाषाका है। "नशर" का बहुवचन है ॥ "नशर" शब्दका अर्थ है ज्योति, रोशनी, प्रकाश इत्यादि तो मन्शूरका अर्थ हुआ।
"ज्योतियाँ, रोशनियाँ, प्रकाशों" इत्यादि इस हिसाबसे कबीरमन्शूरका अर्थ हुआ, कबीरकी ज्योतियाँ, कबीरके प्रकाश इत्यादि, यदि इसका हिन्दी अनुवाद किया जाय तो "कबीरज्योति" अथवा "कबीर प्रकाश" नाम रखना चाहिये, किन्तु विशेष नामका अर्थ नहीं किया जाता है, जिस नामसे जो प्रसिद्ध होता है, उसी नामसे पुकारा जाता है। इसीलिये इस हिन्दी अनुवादमें भी इसका नाम कबीरमन्शूरही रखा है। दूसरी बात है कि, पहिली आवृत्तिमें यह इसी नामसे छप चुका है और यह नाम लोगोंमें इतना प्रसिद्ध हो गया है कि, अब इसका दूसरा नाम रखा जाना ठीक नहीं है।
स्वामी श्रीपरमानन्दजी साहबको ऐसे नामसे बड़ा प्रेम था आपने सबसे पहले ग्रंथ बनाया है उसका नाम "कबीरभानुप्रकाश" रक्खा है। कबीर मन्शूर भी उसी भावको लिये हुए है। अन्तमें आपने कबीरकौमुदी लिखी है। कौमुदीका अर्थ भी चांदनीका ही है। भेद इतनाही है, उपर्युक्त दोनों ग्रंथ सूर्यके समान उग्रतेजको लिये हुए हैं और कौमुदी चन्द्रमाकी चन्द्रिकाके समान शीतलयुक्त प्रकाशका स्रोतक है।
ग्रन्थकर्ताकी विज्ञप्ति
स्वामी परमानंदजी साहबने कबीर मन्शूर ग्रन्थ लिखकर सबसे पहले सम्बत् १९३७ के आश्विन (कुवार) मास मुताबिक सन ईस्वी १८८० महीना सितम्बरमें पूर्ण किया था और मार्च १८८१ ई. में वह ग्रंथ छपकर तय्यार हो गया, उस आवृत्तिके सब ग्रंथ आपने अधिकारियोंको बिना मूल्य दे दिया था। आपने ग्रंथ बनाया छपवाया और बाँट भी दिया। किन्तु, आपके अंदर भरे हुए कबीरपंथके खजाने इतने अधिक हो गये कि, यदि उसमेंसे खर्च न किया-जाय तो, सोमके धनके समान होजावे और दूसरे पंजाबके सिकखोंने कुछ आक्षेप भी किये तब आपने दूसरा ग्रंथ सं. १९४२ बिक्रमीमें “तालीम कबीरकलियुग” लिखा, जो दूसरी बार कबीरमन्शूर की संशोधित और वर्द्धित आवृत्ति कही जा सकती है। इतने पर भी आपको संतोष नहीं हुआ, तब आपने फिरसे तीसरी बार उसे हाथमें लिया और उसे बढ़ाकर बड़े कबीरमन्शूरके रूपमें तय्यार किया जो सम्बत् १९४४ वैशाखमुदी (२५-४-२७) में छपकर तय्यार हो गया। जो कबीरमन्शूर पहली आवृत्तिमें ३५० पृष्ठोंमें छपकर पूरा हो गया था इस बार १५०० सौ से भी अधिक पृष्ठोंमें समाप्त हुआ। इतनेहीसे समाप्ति नहीं हुई, आपने रसाले तनासुख, कबीरगुणसागर आदि अनेक छोटे भोटे ग्रन्थ बनाये और कितने शब्द और पदोंको संग्रह कर उनपर व्याख्या लिखे। अन्तमें आपने “कबीरकौमुदी” नामका कबीरमन्शूरके समानही बृहत्ग्रन्थ लिखा है जो आपके लिये और ग्रंथोंके समानही अमुद्रित पडा है।
स्वामी परमानन्दजीकी रचना
स्वामी परमानंदजी साहबने कबीरभानुप्रकाश, कबीरमन्शूर, तालीम कबीरकलियुग, रसाले तनासुख, कबीरगुणसागर, कबीरकौमुदी आदि कई ग्रंथ और बहुतसे शब्द और पदोंपर व्याख्या लिखे हैं, जिनमें से बहुतोंका संग्रह मेरे कबीरदर्शन पुस्तकालयमें रक्खा हुआ है।
कबीर भानुप्रकाश की रचनाका समय
कबीर भानु प्रकाशके अन्तमें लिखा है :—
चौपाई
सतगुरुकी दायामय पूरी । लिख्यो ग्रन्थ जो भूतल भूरी ॥
रच्यो जो निजहिय हुआ हुलासा । ग्रन्थ कबीर भानु परगासा ॥