कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली
(६१९)
रमैनी २३३-दीदार दीदार कहे सब कोई। दीदार कहे दीदार न होई ॥ को तुझसे दूजा है भाई। जेहि दीदार प्रेम चितलाई ॥ अलम जाहद आरफ जोई। आशक माशूक दीदारको होई ॥ आशिक इश्क समाना भाई। प्रेम समाना प्रेम समाई ॥ दूजे प्रकृति कहो जो कोई। करता माया एके होई ॥ विन माया करता नहीं भाई। विन करता नहीं माया आई ॥ जो ब्रह्मा पारब्रह्म सोई। ब्रह्माते न्यारा पुरुष न जोई ॥ सब गुन भरा यह करता तेरा। कहा मान तैं चेत सवेरा ॥ तेरी सुरत जो सुरत समाई। जरा मरन कहो को फिर आई ॥ जेहि कारन यह सब जग नाचा। ना वह मिला न वहिते बांचा ॥
समै--जो न्यारा सो बैरी तेरा, माया ब्रह्म करतार। कहे कवीर समझो तुम ज्ञानी, मानो कहा हमार ॥ तीन मारे तीन राखे, आठ मारे काठ। लौट हंसा नीर पीवे, सुखभनाके घाट ॥
रमैनी २३४--रहे समाय जो सुरता कोई। आवा-गवन न ताकर होई ॥ बाहर मरे न सुरत समावे। ताते फिर फिर आवे जावे ॥ अद्युधात ले रहे समाई। जुग जुग सो सुखराज कराई ॥ तत्त्व मध्य त्रिभुवन समाना। तत्त्व मध्य है पवन औ प्राना ॥ बिहार पवन कहाँ ते भाई। जहाँ ते पवन जीव ले आई ॥ बाहर भीतर सोई पवना। समझ न परे कहे आवागौना ॥ एक पवन ते अनेक विचारा। तत्त्व पांचका है टकसारा ॥ छत्तिस नारि पचासी पवना। आपन आपन गुन लावे तौना ॥ पंचते दूँठ कर एक निकारी। मूल तीन ऐसा टकसारी ॥
समै--समुद्र समाना बुंदमें, बूंद मध्य बिस्तार। कहे कवीर भेद करताका, बूझो यह टकसार ॥
रमैनी २३५--तत्त्व बित्त हमरी टकसारा। तेहिका सब जग
(६२०)
कवीरपंथी-
करो बिचारा॥ तत्त्व बित्त ते न्यारा जोई । जानो काल तुम्हारा सोई॥ राखे तत्त्व तो तत्त्व समाई । तत्त्व बिना जीव मर जाई॥ देखो तत्त्वमें बित्त समाना । तत्त्व बित्त काहू नहीं जाना॥ तत्त्व बित्त आगम टकसारा । तत्त्व बिना नहीं करता न्यारा॥ तत्त्व बित्तका जाने भेवा । आपहिं करता आपहिं देवा॥
समै--तत्त्व बित्त निज सार है, झूठा अपरंपार । पार उतर कोइ ना गया, परख देख टकसार॥ खंड अखंडित खंड है, खंडित दूजा खंड । कहें कवीर घरमें रहो, खाली है ब्रह्मंड॥
रमैनी २३६--अच्छर पांच ब्रह्मंड अपारा । तिनही बीच कवीर बिचारा॥ तेहिमें अक्षर एक जो सुकता । तेहिका जाने कोई जुगता॥ मा-के ऊपर क-के नीचे । परखो ज्ञानी तत्त्वके बीचे॥ दूसरे ठौर न वहाँ पर कोई । यह बिध जाने सुकता सोई॥ ना जाने यह कोई भेदा । सब जग गावे चारों वेदा॥ बीजहिमें अंकूर समाया । सो अंकूर बीज ले धाया॥ करता माया बीज अंकुरा । बूझो ज्ञानी यह मत पूरा॥ बीज ते रहा अंकूर निनारा । ऐसा देखो राम बिचारा॥ है सबमें और सबते न्यारा । अगम अगोचर कथा हमारा॥
समै--सरवन्न ज्ञान प्रज्ञान नहीं, देखो तत्त्व बिचार । पछा पछीमें जन परो, मानो कहा हमार॥ आदि अंत दो मत हैं, तिनमें मता अनंत । कहें कवीर दोनोंके मध्यमें, देखो हमारा तंत॥
रमैनी २३७--तत्त्व बित्त जो हमरा पावे । चौरासीका अंक मिटावे॥ द्वादस सोडस अष्टादस सोई । सहस्र दो दल औ चतुर विगोई॥ यही नहीं और जो न्यारा । तेहि गुरुवाका झूठ बिचारा॥ झूठे झूठ मिला सब कोई । झूठी बात बहुत सुख होई॥ सांच कहो तो कहा न माने । बूझ न परे तब झगरा ठाने॥ झगड झगड सब मर गये भाई । झगड झगड सब वहीं समाई॥
शब्दावली
(६२१)
समै--मता अखंड पारखंड छियानबे, देखो अपने नैन। कहैं कवीर दृशे बिना, जनि पतियाओ बैन॥ जब आपन करता लखो, सरवह होय तब ज्ञान। कहैं कवीर करता भया, मेटा सरब व्याखान॥
रमैनी २३८--देह धरे विदेह कहावे। करम करे करता न कहावे॥ जगमैं रहे औ रहे निनारा। ब्रह्मांड मध्य है नाहिं बिचारा॥ ज्ञान ध्यानमें नाहीं आवे। इच्छा करे न इच्छा पावे॥ सब कछु करे वो नाहीं करता। ना कछु धरे वो नाहीं धरता॥ माता पिता न बंधू भाई। सुख संपतमें रहा समाई॥ है संयोगी फिरे बियोगी। सदा अनंद फिरे कह रोगी॥
समै--देखो तत्त्व विचारिके, केहि घरमा है करतार।
कहैं कवीर सदा तुझहीमें, कैसे भया निनार॥
रमैनी २३९--निनार निनार कहैं सब कोई। कोइ न देखे वह कैसे होई॥ अविगत पुरुष जो अगम अपारा। परले उतपत नाहिं दिदारा॥ अष्ट लोक सब जगत बतावे। पांच देवका भाव ले आवे॥ करनी सर ठहरावे भाई। जो नाहीं तासों लव लाई॥ दोमें अटका सब संसारा। लोकालोक जहां बिस्तारा॥ लोका लोककी गत है न्यारी। पारस पिया निरंजन धारी॥ दिरग औ बैराग अपारा। स्थूललिंग औ जोत विचारा॥ मुच्छम औ दस अंगुल कहाया। चतुरभुजी अंगुष्ठ पर लाया॥ सहस्रा रिषि औ अवगत देवा। ताते भया सकल यह भेवा॥ नेत नेत करके ठहराया। निराकार आकार बताया॥
समै--कर बियोग वहि पुरुषको, छांडो यह संसार।
कहैं कवीर न हाका गया, आपन क्यों न बिचार॥
रमैनी २४०--महम्मदका है यह फरमाना। एक दिन क्यामत होय निदाना॥ करनायत निकसे अवाज अपारा। रुईसे उड़ई
(६२२)
कवीरपंथी-
बृच्छ पहरा ॥ हफ्त जमीन हफ्त असमाना । धूमसे उडे यही फरमाना ॥ कापर तरुत रहे ठहराई । कहाँ उम्मत जो रसूल छोड़ाई ॥
समै--ले फरमान महम्मद आये, उम्मत किया कबूल । कहो अल्लह क्योंकर रहे, बिना साख बिन मूल ॥ आग दोनों घर लागी, कैसेहु नाहि बुझाई । कह कवीर ये दोनों अगुवा, दीन्हा जग भर्माई ॥ बैकुंठ धाम ब्रह्मा रचा, भिस्त महम्मद कीन्ह । ब्रह्मा दीये ब्राह्मनन, महम्मद तुर्कन दीन्ह ॥
रमैनी २४१--दीनके काजे अल्लह पठाया । ले फरमान महम्मद आया ॥ तिन फिर दुसरी राह चलाई । रोजा नमाज़ बांग ठहराई ॥ कलमा कुल मंत्र ठहराया । देहरा फोर मसजिद उठवाया ॥ तिन फिर कीन्हा मक्का मदीना । किबला कावा कुरान सफीना ॥ तिन फिर कीन्हे चार जो यारी । हराम हलाल औ पाये चारी ॥ सुरगी बकरी घोडा गाई । इनके तिन तकवीर बताई ॥ तिन फिर फिर हिंदू तुर्क बताया । हिंदू पर जजिया फरमाया ॥ तिन तन छूटे गोर गड़ाया । पीर औलिया अंबिया ठहराया ॥ तिन बेचून अल्लहको कीन्हा । आप चून हुकुम यह दीन्हा ॥
समै--अल्लहके दोस्त महम्मद, ते लाये फरमान । मुसलमान होवो सब कोई, पेट ते हो मुसलमान ॥ अल्लहका नूर पैगम्बर, नबीका नूर जहान । मुसलमान भिस्त जायगे, दोजख परे हिंदुवान ॥ खुदा महम्मद एक है, सबही कहो विचार । सबे परे भर्म जालमें, कहै कवीर पुकार ॥
रमैनी २४२--अल्लह एक महम्मद जाना । अल्लह ते दूर रहा हिंदुवाना ॥ ब्राह्मन ब्रह्म मिले सब जाई । तीन बरन अधविच रह भाई ॥ अल्लह मुकाम पश्चिमै कीन्हा । राम मुकाम पूरबमें लीन्हा ॥ दिवाले बसे चल सालिग्राम । मसजिद अल्लह किया
शब्दावली
(६२३)
मुकाम ॥ पूरब राम पश्चिम रहिमाना । और मुलक किसका अस्थाना ॥ पूजा रचा बहुत चितलाई । राम न कबहुँ दृष्टि दिखाई ॥ रोजा निमाज मरा तुर्काना । कबहुँ न मिला नबी रहमाना ॥
समै--धोखे धोखे सब जग बीता, दो अगुवाके साथ ।
कहैं कवीर पड़े जो विगारी, अब काहे न आवे हाथ ॥
रमैनी २४३--वेदका भेद न काहू पाया । कहो पंडित जीव कहाँ ते आया ॥ करताका किस घर विसरामा । काया छूटे कहाँ मुकामा ॥ काजी मुलना पढे कुराना । ब्राह्मन भुले पढे पुराना ॥ अपने करताकी खबर न पाई । माया भरम रहा लौ लाई ॥ कर्मके बंधन तजे न कोई । ताते बिनसे पुरुष औ जोई ॥
समै--लिखा पठीमें सब परे, यह गुन तजे न कोय । सब परे भरमजालमें, डारा यह जिव खोय ॥ कुसल बिनासी सब दुनिया, दुनिया कुसले लाग । कहैं कवीर अब ना बूझे, घर घर लागी आग ॥
रमैनी २४४--सब तुर्कन मिल कीन्ह विचारा । लाख पैगम्बर भये असी हजारा ॥ तिन पर स्वतंम महम्मद पाई । किताब कुरान अल्लाह पठाई ॥ अमर नाहीं औ चार मुकामा । वस्ती छोड़ उजार विसरामा ॥ जबरील हुवा उनका दरमानी । यहाँ वहाँकी कहे कहानी ॥ दो इमाम भमे चार यारा । लौलाकलमाका भया षसारा ॥ जग करता बेचन कहायो । बीच कुरानके यह लिख आयो ॥ यहाँकी आस झूठी सब भाई । वहाँकी आस लिया तिन खाई ॥
समै- सबके पीर महम्मद, मोमन तिनके सुरीद ।
दोस्त अल्लहके ये भये, और जहान नादीद ॥
रमैनी २४५--काजी एक रवायत लाया । अजरोस सो बुत त्रास कहाया ॥ तिसका बेटा हुवा खलीला । मुसलमान भया कहे दलीला ॥ यह देखो भूलनकी बात । एक घरमें दो धरे जाता ॥ आगमें परा भया गुलजारा । गिरोह ले गया दरिया पारा ॥
(६२४)
कबीरपंथी-
इदेहद मरा सब भाई ॥ अल्लहकी गत किनहुँ न पाई ॥
समै--कहते कहते वह गये, मिला न बहुरि संदेश ।
वाही संधिमें सब परे, अगुवाके उपदेश ॥
रमैनी २४६--जब अल्लाह तूफान उठाया । तबहिँ महम्मद किस्ती लाया ॥ बैठ किस्ती सब उतरे पारा । तूह भया सो खेवनहारा ॥ पुत्र भया उसका अन्याई । तूफान उठा तेहि दिया जुवाई ॥ कहर खुदाका जिस पर आवे । तिस बंदेको कौन बचावे ॥ यह आयेत कुरानमें आई । मुसलमान सब रहो लौलाई ॥
समै--इनही बातन सब जग भूला, करता परा न चीन्ह । पढ पढ बहुत किताबें जोही, अपना जी पै दीन ॥ जिस वृच्छका बीज था, लखावृच्छनहिं सोय । अकरताकरता सब मिले, डारा जियरा खोय ॥
रमैनी २४७--यह आयत कुरानमें आई । जहांते आया तहां समाई ॥ वह साहेब हम बंदा भाई । लाहुत ते सृष्टि किया पैदाई ॥ लम यलद व लम युलद कहाया । वह बेचून न लखे लखाया ॥ उसका नूर सकल पर छाया । वहांका थाहिं न किनहुँ पाया ॥ बहुर वहांकी हुकुम ते आया । कुन फैकुन कर पैद कराया ॥
समै--बाहर कोई ना हता, जो कछु लखे नमून । कहें कवीर वह भटकके, नाम धरा बेचून ॥ सब कहते बेचून है, नाहिं बसे वह सुन्न । कहें कवीर कहत न बने, यासे गुन गुन ॥
रमैनी २४८--ऐसी सुनी अकथ हम बानी । काजी मुलना कहें कहानी ॥ यह बेटा अल्लहको कहाया । कुमबइ जनी कहि सुवा जिलाया ॥ सो बहगये चौथे असमाना । खात मुलना करें बखाना ॥ मूसाते नूर अल्लह छिपाया । लितरानीका नूर दिखलाया ॥ देख नूर भया बेहोसा । अकल फहम सब भूले मूसा ॥ जो अल्लहका बंदा कहाई । सो बंदा वह भिस्तमें जाई ॥ यही बात तुरुक सब गावें । करताका कछु भेद न पावें ॥
शब्दावली
(६२५)
समै--एकके ऊपर एक भया, अपनी चलावे चाल । कहें कवीर किन्हू नाहैं भेजा, यह है अद्वुत रुयाल ॥
रमैनी २४९--तालिव पूजे देव औ देवा । वह परतीत करें नित सेवा ॥ खतमुन्नबी भये तेहि ठाई । सात तवककी छवीना भाई ॥ जाही खतना सब कछु जानी । दिलते बाहर कछु न आनी ॥ जब जबरईल अल्लहने पठाया । महम्मद सोई आयत ले आया ॥ और हुकुम अछाहने दीन्हा । खतामन्नबी बूझ तब लीन्हा ॥ अब प्रगट होय खेलो भाई । किताब कुरान मददकी आई ॥ हिंदू मार करो तुरकाना । करामात सो तन्द ठहराना ॥ यह अल्लह फरमान पठाया । लायहला कलमा लिय आया ॥ एत काद सबे मिल कीन्हा । अकलका कलमा महम्मद दीन्हा ॥
समै--यह सब काम मूसाके जानो, बूझे बिरला कोय । सही बात सबे पतियाना, जीव अमर कैसे होय ॥ तौरीत अंजील मंस्ख करी, ठहरा एक कुरान । ता घर अल्लहको ठहराया, जो है यही इमान ॥ अल्लह पैदा करनेहारा, सो बेचून निदान । कहें कवीर अल्लह यह नाहीं, ठहरा मकां लामकान ॥
रमैनी २५०--रोसन किताब किताब कुराना । सीसी पारेकी आना ॥ अलाह संवासी तहां लिख आई । रोजा नमाज और कछु भाई ॥ सरीयत मिछत नासूत तरीका । हकीकत मारफत लाहूत जबहूता ॥ एक मकानके मकान बहु कीन्हे । नबी खुदाके पाट लिख दीन्हे ॥ तिनमें अटका सब तुरकाना । मूसक भेद विलार न जाना ॥
समै--ठौर ठौर सब छोडके, गया जहां लाहूत । कहें कवीर दोनों पछ लूटे, अंसा अंतमें दूत ॥
रमैनी २५१--यह देखो अचरज तुम भाई । किताब कुरान ले
(६२६)
कवीरपंथी-
जगत बताई ॥ बीज दरुक्त का है लाहूता । साखा वृच्छ कहे जबरूता ॥ मलकूत तिसका पल्लव लिख आया । फलवृच्छका नासूत कहाया ॥ नासूत अछहकी कहे जवाना । सो नासूत अटका तुरकाना ॥ ऐसी खबर जबरईल ले आया । पट पट सुलना सब भरमाया ॥
समै--वृच्छ नहीं डार फल लागे, चाखत सब संसार । कहैं कवीर वृच्छ वह अविगत, नाना फल अधिकार ॥ बीज वृच्छ दोनों नहीं, धरती नहीं गाँव । तेहि वृच्छ ते वृच्छ ऊपजे, सो फैले सब ठाँव ॥
रमैनी २५२--ले किताब काजी समझावे । रुह चार अछाहकी बतावे ॥ जमाती एक दूजे हैवानी । नवाती बहुर भये इनसानी ॥ अजब रूयाल अल्लह जब कीन्हा । जीव एक चार जिव दीन्हा ॥ पानी ते जीव रुह नावाती । जीव पवनते रुह जमाती ॥ दौडत जीव रुह हैवानी । लकम खुदाये रुह इंसानी ॥
समै--महम्मद बैठे मक्केपर, दिया यही उपदेश ।
सब जीवनमें खाकी प्यारा, दूर बंदगी भेस ॥
रमैनी २५३--नासूत मुकाम सरेका भाई । मलकूत तरीकत सब समझाई ॥ जबरूत हकीक भया संदेशा । लाहूत मारफत भया उपदेशा ॥ जिक्र तरीकत शुक्र शरीकत । फकर मारफत फिकर हकीकत ॥ प्रथम मुकाम सरेका भाई । दुसरी हकीकत लिया अर्थाई ॥ तिसरा मारफत कहे सब कोई । चौथा हकीकत दिया सोई ॥ इनकी बातनमें सब भूला । भया न लाभ गंवाया मूला ॥
समै--करता अपनेको नहीं चीन्हा, चला जहाँ नहीं कोय ।
बूझ समानी नाहिमें, डारा यह जिव खोय ॥
रमैनी २५४--यह सब कोई कहैं संदेशा । चार चार का दिया उपदेशा ॥ पहले तर्क नफसकी करे । तर्क खलक दूजी दिल धरे ॥
शब्दावली
(६२७)
तर्क दुनियाकी करे बिचारी । तर्क आखिर करे नर नारी ॥ दो वजूद आदमके गावे । बाज बिलवजूद सुमकीन बतलावे ॥ सुमकिन छोड वाजिबमें जाई । वाजिब जाके फेर न आई ॥
समै-बैठ सुकाम लाहूतके, बेचून दिया उपदेश । करता परा न चीन्हके, झूठा दिया संदेस ॥ झूठे संदेस बहुत सुख उपजा, करके गरव गुमान । कहें कवीर गये सब धोखे, फिरी मुहम्मद आन ॥
रमैनी २५५-तिहेत्तर फिरके करे विचारा । लामान लाहेको वारा ॥ आप आपमें झगरा ठाना । अल्लहका भेद काहु न जाना ॥ झगरा करत गये जुग चारी । किनहु न मानी बात हमारी ॥ रुह नफस निदी मारक आई । रुह इनसान खेतलाफ कहाई ॥ रुह नवाती लिया अरथाई । जमाती हिया बसाया गार्ई ॥ दिलमें बसे रुह हैवानी । ले किताब वह कहे कहानी ॥ लामातते आया जब रूत । जबरूत ते फिर आया मलकूत ॥ मलकूत ते लाहूत हिराना । लाहूत ते आया नासूत पयाना ॥ अर्जर भया फिर फकरमें आया । फकरे सुवा न करता पाया ॥
समै-पीर पैगम्बर सब चले, जहं लाहूत सुकाम । कहें कवीर उपदेश नवीके, जीव गये बेकाम ॥ रसूल गया लाहूतको, उमत्ता पाछे लाग । जीव करताके सब मरे, बिरले बांचे भाग ॥
रमैनी २५६-आदम सबका पिता कहाया । तीन गेहूँ भिस्तमें खाया ॥ किया गुनाह जमीं पर डारा । आदम दौवा हुवा कर- तारा ॥ तिसके भये दो बेटे भाई । एक सुन्नी एक कुफर चलाई ॥ ऐहमकाथ जो किया अजावा । यही खबर दिया कुरानकी तावा ॥ वही असमानते जबरील ले आया । तिनको नवीने जन्म कराया ॥ कुल आलमको दिया उपदेश । दुनिया चली वाहिके भेषा ॥
समै-आदम अल्लह दो कहे, आव अनासर नाह । रुह फिरस्ते
(६२८)
कबीरपंथी—
जनवो आदम, हुकुम ते भये जग माह ॥ खबर नहीं अछाहकी, कौन रूप कौन भेष । कहैं कबीर कहे ना नाही, झूठा यह उपदेश ॥
रमैनी २५७--वहांकी खबर न कोई लाया । बातन बातन जग भरमाया ॥ महम्मद कबहुं भेद न दीन्हा । मुसलमान कुल ना नहिं कीन्हा ॥ एक कोई भया पूछनवाला । कहो वचन तुमनकी रसूला ॥ कौन हता आदमके आगे । की यह सृष्टि रही बैरागे ॥ खबर दर्ई आदम था भाई । आदम पर आदम गोहराई ॥
समे--मक्के अंदर मूसा था, बिलारका भया दीवाना ।
मूसा सबको खात है, मूसा कोइ न जाना ॥
रमैनी २५८--खबर एक ऐसी हम पाई । सो वह लिखा कुरानमें आई ॥ दोनों हद आपन कर खेला । हरगिज एक न डुइ कर मेला ॥ तिसकी खबर महम्मद दीन्हा । अछह बेहोस वाहिको कीन्हा ॥ खबरदार होय दिया संदेशा । मुसलमान सब भयो उपदेशा ॥ इसकी खबर कहे नहिं कोई । जीका भरम न डारे खोई ॥
समे--करार न था अछाहको, लोटपोट कहे बात । कहैं कबीर अछाहना तहां, जहां नहीं दिन रात ॥ अछह महम्मद दो कहे, कहे नवी अस बात । कायमको फानी कहैं, येही भूलकी बात ॥
रमैनी २५९--एक समय कुरानको खोला । आदम खता नसियाँ कर बोला ॥ येही आदम खताकी खानी । खताते भया खता यह जानी ॥ नापाक आवते पाक यह होई । अछह पहचाने औलिया सोई ॥ मनकी चाल चले सब चाला । यह मन सबहीका घर घाला ॥ यहि मनको कोई नहिं पाया । करता लखा न जीव गँवाया ॥
समे--मन सेती जियरा मिला, मन उड़ चला अकास ।
मन मिलके धोखे गया, तजिके भोग बिलास ॥
रमैनी २६०--तुर्क कहैं कलमा पठ भाई । कलमा पठा पै खोट
शब्दावली
(६२९)
न जाई ॥ कलमा पर साबूत ले आया। कलमाका कछु भेद न पाया ॥ जो कलमा कलमा है सोई। कलमाको चीन्हा नहीं कोई ॥ कलमा कहे भिस्तकी तारी। भिस्तकी आस दिया जिव हारी ॥ कलमा राह भिस्त ठहराई। कहे कैसे अल्लाहको पाई ॥ कलमाते किताब सब भाई। कलमाकी प्रतीत जिव आई ॥
समै-कलमा तोड़े कुफर बोले, सो जावे वहि गांव। अङ्ग बिहूना पुरुष वह, कहुँ नाहीं वह खाँव ॥ आलिम पठ पठ सब मरे, कलमाकी परतीत। कायम कोई ना हुवा, वाव जगतकी रीत ॥
रमैनी २६१-जो आया सो फेर न होई। एके दिवस पुरुष औ जोई ॥ केते रह भई हैं भाई। पैदा होत होत रह जाई ॥ करके कौल अल्लाह पठावे। काज करे दो घर ले जावे ॥ ऐसी भांति अल्लाहकी भाई। महम्मद सब उम्मत बकसाई ॥ एक बात अल्लाहकी नाहीं। भरमकी बात जगत भरमाइ ॥
समै-जिस विध पैदा सृष्टि भई, तिस विध कहे न कोय। जिस करता तस ना कहे, यही भरम जिय होय ॥ एक रीति करता करी, सकल करी सकलाय। कहें कवीर बहु विध भई, अब कछु नाहिं बसाय ॥
रमैनी २६२-मुसलमान पै फरज यह आई। रोजा नमाज निकाह पढाई ॥ ईद बकरीद जीव खंखारा। इन बातन ना रीझे करतारा ॥ दीन मजहब औ चारो यारा। ईमान भयको तुम निहारा ॥ तकवीर करी फातिहा कराई। राजी भये आप लिया खाई ॥
समै--मनकी लहर जैसी उठी, तैसी लागे करार। करार पर जो कछु मिला, सो सब ले गये झार ॥ जे समझे ते बच रहै, गये जहाँते अजान। कहें कवीर चेतो किन अबहुँ, छाडो मनका फरमान ॥
रमैनी २६३--मक्का मदीना काबा ठहराया। रहूँ अपनी काबे पर लाया ॥ तहँ अल्लाहका भया निवासा। रोजा बांग भई मन
(६३०)
कबीरपंथी—
आया ॥ मसजिद जाय बांग करे भाई । और ठौर अल्लह नहीं पाई ॥ मोमिन कहें दोस्त खुदाया । जिन कारण यह दुनों बनाया ॥ मक्के मदीना हज्ज कहवाई । वहां रहे सो कौन है भाई ॥ मोमिनका घर मक्का मदीना । दीन वो मजहब कुरान सफीना ॥ हिंदूका वहाँ नाहीं कामा । यही नबीका हुवा कलामा ॥
समै--मक्के भीतर सब रहे, अल्लह ते भइ ना भेट ।
किबला काबा कर मरे, मनकी परी झपेट ॥
रमैनी २६४--कुल आलमीन भया खुदाई । खुल मुसलमीन लिखा न आई ॥ क्या बूझ हिंदूको मारो । नातो मुसलमान कर डारो ॥ इसका संदेशा देय न कोई । मार घार आल है निरगम होई ॥ नाहीं अदली जो अदल चलावे । धोखा मेटि करतहिं लखावे ॥ करता आपन चीन्हों भाई । झूठी बात न जीव गंवाई ॥ रोजा नमाज औ चार मुकामा । मक्का मदीना भया विसरामा ॥ झूठा ख्याल तजे जो कोई । आप बिचारो करता सोई ॥
समै--बोलत बोलत झगडा पडा, झगड़ा बहुत बकान । कहैं कबीर भरमत फिरा, ताते तत्त्व नसान ॥ वहे वेचुन बेनमून नहीं, कहे तजल्ला नूर । कहैं कबीर नेरे बतलावे, बहुरि बतावे दूर ॥
यह अल्लह यही नूर है, यहि ते देख जमाल ।
कहे कबीर बातें असमानकी, सो है ख्वाबत ख्याल ॥
रमैनी २६५--बहु भाषा जनि बोलो भाई । बोलत बोलत तत्त्व नसाई ॥ हिंदू हद देहरा गाई । मुसलमान मक्का ठहराई ॥ तीरथ बरत उनके मन माना । रोजा नमाज इनके ठहराना ॥ बनके रसूल बखसावन हारा । इनके राम न ये करतारा ॥ राम कीन्ह पूरब विसरामा । अल्लह पश्चिम लिया मुकामा ॥
समै--करता आप न चीन्हे, झूठे लागा नेह । पूरब पश्चिम कर
शब्दावली
(६३१)
मरे, देहते भया विदेह ॥ अल्लह राम दो करता, दोउका एक सुकाम । कह कवीर जगत सब, तहाँ लिया विसराम ॥
रौनी २६६-क्योंकर भये ब्राह्मन ! ब्रह्मानी । तुम दस कर्म वह एक न जानी ॥ काजी सुनि सुन्नत करावैं । घरकी नारी क्योंकर कहवावे ॥ पुरान बेद औ शास्त्र वे देवा । जगत हीन करो फिर सेवा ॥ तुर्क नमाज कुरान भुलाना । पढ पढ सुवा मरम नहि जाना ॥ वे कहैं अल्लह वे कहैं रामा । एकही घर दोऊ विसरामा ॥
समै--जो जाके मन छपजे, सो वह चितमें देह ।
कहैं कवीर यह बातें झूठी, समुझ हमारी लेइ ॥
रौनी २६७-कंठी माला इनके मन माना । उनके तसबी पर किया ठिकाना ॥ इन देव पूजा तीरथ ठहरावा । उन नमाजके दिल लावा ॥ इन बैकुंठ किया विसरामा । उन भिस्त चल लीन सुकामा ॥ इनके अगुवा ब्राह्मण भाई । उनके महम्मद रहे ठहराई ॥ इनके धोती चौका असनाना । उनके एकेके सब माना ॥ इनके दस करम रहे विचारी । उनके खतना सुन्नत संभारी ॥
समै-दो मारग दो करता, कहो कौन केहि देस ।
कहैं कवीरा दोनों ते पूछत, उनका लावो संदेस ॥
रौनी २६८-एक बीज दो बृच्छ कहाई । एक बीज दो क्योंकर भाई ॥ बेद न काहू पेट पढाया । सुन्नत कराये तुरक नहि आया ॥ माला कंठी तिलक न संगा । तसबी वह लिया न अंगा ॥ हिंदू तुरक हो कोइ न आया । हिंदू तुरक बीच ठहराया ॥ तुरक पश्चिम दिशि चले विचारी । हिंदू पूरब चले संभारी ॥ हिंदू तुरक कहा बिनाना । यहीं भया औ यहीं समाना ॥
समै बीज बृच्छ नहि चीन्हे, मरे दोय पद सब कोय ।
कहैं कवीर दोनों पच्छ छाडो, करता चीन्हो सोय ॥
(६३२)
कवीरण्यी-
रमैनी २६९--गगन गुफा तहं राम हमारा । साध प्रान चला संसारा ॥ हिंदू चले सुन्नको भाई । ला मकान तुर्क लौ लाई ॥ पीर मुरीद दोऊ एक संगा । धोखे गये भये तेहि भंगा ॥ षट्दरशन छयानबे पारखंडा । सबे सुये चढे ब्रह्मण्डा ॥ सांचा भेद झटके माना । दोनों मिल झूठे लपटाना ॥
समै-सहकामी सेवा नहीं, सेवा सो जो निहकाम । धोखा सेवत जनम गँवाया, खोया किया न काम ॥ जहं काहूकी गम नहीं, नहीं चंद्र नहिं सेस । तहां कवीरा घर किया, सहूरुके उपदेस ॥
रमैनी २७०--दुइ जगदीश जगतमें छाया । मैं नहिं जानो कहाँ ते आया ॥ हजार नाम अछ्हाह कहाया । सहस्र नाम रामके गाया ॥ एक सुन्नी एक काफ़िर भाई । अपन अपन गुरु चीन्हो धाई ॥ तीरथ मूरत राम निवासा । मक्का मदीना अछ्हको बासा ॥ आप आपको दोनों लागे । करता आप न लखे अभागे ॥
समै--गगन गुफा बैठे हते, तिरबेनीके तीर ।
कहे कवीर सबही बैठे, सुन्न सिखर गंभीर ॥
रमैनी २७१--पंद्रह तिथि पंद्रह व्रत भाई । तुर्क मास रोजा ठहराई ॥ तीज दसहरा फाग दिवारी । दाहा सुबरात औ ईद बिचारी ॥ हिंदू खाया बकरा मारी । तुर्कन बकरी गाय पछारी ॥ हिंदूके घर वेद पुराना । तुरकनके ठहरा फरमाना ॥ हिंदूके निरगुन निरंकारा । तुरकनके बेचून बिचारा ॥ हिंदू नरक सरग ठहराया । तुर्कन भिस्त दोजख बतलाया ॥
समै--एक गांव दो बहिनी, दोनोंका एक नांव ।
दोनों पर एक बालक थे, बिन बूझे छूटे गांव ॥
रमैनी २७२--एकादसी व्रत रहा लौलाई । अन्न तजे छीर गऊको खाई ॥ निराधार रहे आतम जारी । करता आप न लखे
शब्दावली
(६३३)
बिचारी ॥ रोगी रहे तदवीर कराईं । पढे नमाज मासको खाईं ॥ दो घडी रात रहे फिर जगहीं । सरगही खाय परे नर तबहीं ॥ जीव हने कहें खाया खुदाईं । उनका उलस लिया हम खाईं ॥ पीर पैगम्बर सबहीं खाया । जबह किया फातिया दिलाया ॥ साद भया तब ध्यान पर आया । सब देवनको अरप चढाया ॥ पहले भोग देवको दीन्हा । तब वह खाय आप फिर लीन्हा ॥ वैस्वदेव करे चितलाई । देव पितरको दीन खवाई ॥
समे--यहि धंधा दोनों मरे, करता चीन्हे नाहिं ।
बिन समझे जाने सुमिरे, यही भूल जग माहिं ॥
रमैनी २७३--कहो महम्मद मोहि समुझाईं । मामा होवा कहांते आईं ॥ आदम किसका पुत्र कहाया । उन कैसे विश्वरूप बनाया ॥ पंडित अपना खोल पुराना । विश्वरूपका करे व्याना ॥ ब्राह्मण ब्रह्मा कहांते आय । कैसेके यह सृष्टि उपाय ॥ लौट उमील करे बयाना । ओंकारको दीन प्रवाना ॥ कौन रूप कौनसा गाऊं । कौन देश निरगुनका नाऊं ॥
समे--पुरुष नार एक संग हैं, साथ बीज अंकूर ।
देश विलायत सुन्न पर, परिपूर्ण सदा हजूर ॥
रमैनी २७४--दोई दीन कहांते आये । कहो कैसे दो दीन चलाये ॥ वेद न काहू पेट पढाया । सुन्नत कराय तुरुक नहिं आया ॥ देव न देहरा रामउ खाये । पीर मसीत न अल्लह बनाये ॥ वेद पुरान न राम बखाना । अल्लह न पढा किताब कुराना ॥ रोजा नमाज न अल्लह पढाया । पूजा अरचा न राम बताया ॥ पूरब राम न कहा संदेशा ॥ पश्चिम अल्लह न कहा उपदसा ॥
समे--बहे लोग सब जात हैं, दो अगुवाके साथ ।
कहैं कवीर ऐसा कोइ नाहीं, जो गहि राखे हाथ ॥
(६३४)
कबीरपंथी—
रमैनी २७५—चार यार मिल किनहु न जानी। बीबी फातमा जो पहचानी ॥ दसतार महम्मदी धरा उठाई। नूर महम्मदी दीन दिखाई ॥ सकल सृष्टि जो देख न पाया। कुंती जसोदा सोइ दिखाया ॥ कृष्णमई देखा संसारा। जिसके बखनका वार न पारा ॥ तेहि कारण हिंदू तप साधी। तेहि कारण उन कीन्ह उपाधी ॥
समै—मायाके यह सब गुन, चंचल चपल व्योहार।
छल छिद्र उन्ही बन आवे, करता इनते निनार ॥
नाटक चेटक अड़त अगम, रहा चहुँदिशि पूर।
कहैं कबीर यह भिस्त नहीं है, रहा सो खालिक दूर ॥
रमैनी २७६—एक महम्मद एक खुदाई। एक निरगुन एक सरगुन भाई ॥ निरवृत साथे लोग व्योहारा। रोजा नमाज दुनी ते न्यारा ॥ चहिये भिस्त चहिये दीदारा। राम चहिये औ सरग द्वारा ॥ पीर पैगम्बर औ चार यारी। बीबी फातमा बकसावन हारी ॥ देवी देवा आदि भवानी। एक दो नाहीं बहुत जिन जानी ॥
समै—एक साथे सब सघे, सब साथे सब जाय।
कहैं कबीर चेतो दोउ भाई, हम दीन्हो समझाय ॥
रमैनी २७७—लूटे ब्रह्मा हरि त्रिपुरारी। लूटे गौतम सुखदेव ब्रह्मचारी ॥ लूटे सनक सनंदन दोऊ। लूटे अगस्त विश्वामित्र ओऊ ॥ लूटे वशिष्ठ अत्री डुरवासा। शृंगीरिषि लूटे वन वासा ॥ पारासर लूटे माझ मंझारा। लूटे जमदग्नि औ सनतकुमारा ॥ लूटे गौस कुतुब बाबानी। लूटे औलिया अंबिया पीरानी ॥ महम्मद लूटे राह चलाई। लूटे चार यार जिनकी थी दुहाई ॥ लूटे ईसा मूसा मनसूरा। लूटे अरबहि मदीन के सूरा ॥ लूटे गोरख औ जैपाला। लूटे गोपी लूटे ग्वाला ॥ माधवाचारज लूटे जनकादे। रामानिज लूटे धर्मादे ॥ लूटे हनुवात नारद सपता।
शब्दावली
( ६३५ )
लूटे पांडव औ बलदाता ॥ लूटे नाथ मच्छंदर जोगी । लूटे युधिष्ठिर षट् रस भोगी ॥ सुर नर मुनि सब लूटे झारी । सब मिल मानो बात हमारी । अष्टभुजी माया आदि भवानी । तिन लूटे ज्ञानी विज्ञानी ॥
समै-पाया सब जग लूटिया, भरम जालमें डार । कहैं कबीर क्या कीजिये, ना समझे संसार ॥ ऐचातानी सब करें, कटे न भरमक डार । चारो जुग सबको समझाया, कहा न मान हमार ॥
रमैनी २७८-एक शब्दका सकल पसारा । एक शब्द सबहींते न्यारा ॥ एक शब्द सब जीते हारे । एक शब्द सब एक विचारे ॥ एक शब्द नित मरे औ जीवे । एक शब्द खावे औ पीवे ॥ एक शब्द सब करे करावे । एक शब्द कहुं जाय न आवे ॥ एक शब्द नित बोले चाले । एक शब्द त्रिभुवनको पाले ॥ एक शब्दके बाप न माई । एक शब्द निज रहा छिपाई ॥ एक शब्द है सर्व सनेही । एक शब्दके प्रान न देही ॥ शब्द शब्द जो कहे विचारी । तो यह आतम मरे न मारी ॥
समै--कह पंडित अस बोल तुम, क्यों भटकावो लोग । कहैं कबीर शब्द एक है, वहि क्यों करो वियोग ॥ अपनेको अपना मिला, दो दो नेना जोय । सरबंगी सबसो मिला, दिलकी दुबधा खोय ॥ तिल समान यह जगत है, काहू परा न चीन्ह । कह कबीर सद्वृत्त मिले, ज्ञानदीप जिन दीन्ह ॥ भली भयी नैनो लखा, मिट्टी दूरकी आस । जो कोई समझे भले, सोई है धर्मदास ॥
इति ज्ञानदीपककी रमैनी संपूर्ण ।
(६३६)
कवीरचंथी—
परिशिष्ट ।
ज्ञानवीपककी रसैनी जो पृष्ठ ६७३ से आरम्भ होता है, उसीका यह परिशिष्ट भाग है, जिसको सूचना उसी पृष्ठको टिप्पणीमें दिया है, । सड़े हुए पत्रोंसे जहां तक पढ़े जा सकते हैं वहां दिया जाता है— (पहली रसैनीका पत्रा एक दस नष्ट हो गया)
दूसरी रसैनीको अन्तिम साखी ।
हद हता तब आप था, सकल हता ता मांहिं । ज्यों तरवरके बीजमें, डार पात फल छांहिं ॥
रसैनी तीसरी ३.
सब गुन पूरन माया रानी । उन फिर ... .. उन फिर रचा वृच्छ औ ... ..
और सब नष्ट हो गया इसकी अंतिम कड़ी
और समें बचे हैं तो यह है—
तीन पुत्र तिर विधि गुनकारी । हरि ब्रह्मा तिनके त्रिपुरारी ॥ समै--हम संजोग गुन तीनभै, उन्ह पुनि कीन्ह पसार । हमै छोड गुन तीनते, उन कीन्हवा बेभिचार ॥
चौथी रसैनीका केवल इतनी अन्तिम कड़ी शेष है ।
ब्रह्मा भूला देख लोभाना । माताते पुत्रन छल माना ॥ सुतते मातु ते नारी । पुत्रते पिता मात ते बारी ॥ समै--माताते मेहरी भयी, भया पूत ते बाप ।
कहैं कवीर बडा अचंभा, ... ..
पांचवी रसैनीमें इतना शेष है ।
मैं कहत हौं पंडित अगम विचारा । ... .. पुत्र सीख देइ महतारी । ... .. पिता तुम्हारा रहे निरंकारा । ... .. कहे ब्रह्मा ते रूप न रेखा । ... .. अरध न उरध पुरुष ना नारी । ... .. इतना सुनके बचन भुलाना । ... .. मातुकी बात ब्रह्मा नहिं बूझे । ताते पैडा नहिं कछु सूझे ॥
शब्दावली
( ६३७ )
समै--सुत नहि माने बात, सेवे पुरुष विदेह । कहैं कवीर अबहुँ ना चेतो, छाडो झूठ सनेह ॥
छठी रमैनीमे इतना बचा--
... ... महा बलिया । एक बार छलके फिर छलिया ॥ ... ... । अष्ट भुजी माया आदि भवानी ॥ .. ... । सावित्री सती लच्छ कुमारी ॥ ... ... । तीनहु मिल संजोग कराई ॥ ... ... । सो पुत्रन ते भयी बेभिचारी ॥ ... ... । फिर मदेशते छल बल कीन्हा ॥
असँख जुग लो कहि कहि हारा । सेवै सबै सून्य निरंकारा ॥ समै--त्रिगुन हेत हती महमाया, हता न वह बिस्तार । कहैं कवीर भरसु त्रिदेवा, कीन्ह न आप बिस्तार ॥
सातवी रमैनीका बचा हुआ ।
सुनु ब्रह्माते आदि कहानी । ... .. हमहै वहि देसकी नारी । ... .. कर हम मौंजे परे त्रय छाला । ... .. हमरे पुत्र होय तिर देव । ... ..
समै--ब्रह्मा जननीसे पूछे, ... ..
कौन बरन वहि पुरुष है, ... ..
रूप नहीं रेखा नहीं, ... ..
गगन मंडलके बाहिरें, ... ..
ध्यान जु धरो गगनका, मूँदिन बप्रकिवार ।
देख परतिमा आपनी, तीनों भये निहाल ॥
त्रिदेवाके सुमरते, सबका भया अकाज ।
ब्रह्माका आसन डिगा, सुनत आपनी गाज ॥
(६३८)
कबीरपंथी—
आठवीं रमनीका शेष ।
माया महा आदि भवानी । वेद पाठ शास्त्र जो बखानी ॥
... .. । छनिवंती देवी जयवंती ॥
... .. । नैनवान गहि सर्बहि पछारी ॥
... .. । सुरनर मुनि सबके घर खाया ॥
समै—केदली खंभ दोउ जंघा, छबि दोउ कुचन अनार ।
... .. आदर्श अति, झलकत चंद लिलार ॥
... .. सो छल किया, तीनों लीनसि खाय ।
... .. तीनोंके पीछे, जगको छलसि बनाय ॥
नीमी रमनीका बचा भाग ।
छलबल बहुत कीन वर नारी । दो संजोग भयी संसारी ॥
दो संजोग त्रिभुवन पर छावे । दोउ पर कीन नाहिं लखावे ॥
एक प्रान देखे दो देही । पुरुष न रहे एक सनेही ॥
बीज वृच्छ है एके संग। वृच्छ बीजका एके रंगा ॥
माया ते मन उपजा भाई । करता जिय ... .. ॥
इच्छा विपरीत भई इक संगति । ... .. ॥
बीज मंत्र सब सृष्टि करतामैं । ... .. ॥
करता फिर सबनते पुकारी । मानेसो ... .. ॥
समै—अष्ट धातका पूतला, ... .. ॥
कह कबीर सुमरो जन क ... .. ॥
दसवीं रमनीका शेष ।
सुन पंडित तैं बात हमारी । ... .. ॥
मन उपजा इच्छा भइ भारी । भौ संजोग पुरुष औ नारी ॥
ताते भये तीन यह बारा । बिन संजोग नहीं संसारा ॥
अन्तर प्राप्ति नहिं पाया । धोखा सेवा मूल गंवाया ॥
जाके प्रान नहीं है देही । रूप न रेखा प्रान विदेही ॥