कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
व्याख्या—जो सबसे पहले हो चुका है, जो भविष्यमे होनेवाला है और जो वर्तमान कालमें अन्नके द्वारा अर्थात् खाद्य पदार्थोंके द्वारा बढ़ रहा है, वह समस्त जगत् परम पुरुष परमात्माका ही स्वरूप है। वे स्वयं ही अपनी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिसे इस रूपमें प्रकट होते हैं; तथा वे ही अमृतरूप मोक्षके स्वामी हैं अर्थात् जीवोंको संसार-बन्धनसे छुड़ाकर अपनी प्राप्ति करा देते हैं। अतएव उनकी प्राप्तिके अभिलाषी साधकोंको उन्हींकी शरणमें जाना चाहिये ॥ १५ ॥ सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥१६॥ तत् = वह परम पुरुष परमात्मा; सर्वतःपाणिपादम् = सब जगह हाथ-पैरवाला; सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् = सब जगह आँख, सिर और मुखवाला; ( तथा ) सर्वतःश्रुतिमत् = सब जगह कानोंवाला है, ( वही ) लोके = ब्रह्माण्डमे, सर्वम् = सबको, आवृत्य = सब ओरसे घेरकर; तिष्ठति = स्थित है ॥ १६ ॥ व्याख्या-उन परमात्माके हाथ, पैर, आँखें, सिर, मुख और कान सब जगह हैं। वे सब जगह सब शक्तियोंसे सब कार्य करनेमें समर्थ हैं। उन्होंने सभी जगह अपने भक्तोंकी रक्षा करने तथा उन्हें अपनी ओर खींचनेके लिये हाथ बढ़ा रक्खा है। उनका भक्त उन्हें जहाँ चाहता है, वहीं उन्हें पहुँचा हुआ पाता है। वे सब जगह सब जीवोंद्वारा किये जानेवाले कर्मोंको देख रहे हैं। उनका भक्त जहाँ उन्हें प्रणाम करता है, सर्वत्र व्याप्त होनेके कारण उनके चरण और सिर आदि अङ्ग वहीं मौजूद रहते हैं। अपने भक्तकी प्रार्थना सुननेके लिये उनके कान सर्वत्र हैं और अपने भक्तद्वारा अर्पण की हुई वस्तुका भोग लगानेके लिये उनका मुख भी सर्वत्र विद्यमान है। वे परमेश्वर इस ब्रह्माण्डमें सबको सब ओरसे घेरकर स्थित हैं—इस बातपर विश्वास करके मनुष्यको उनकी सेवामें लग जाना चाहिये। यह मन्त्र गीतामें भी इसी रूपमें आया है ( १३ । ३ ) ॥ १६ ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥१७॥ ( जो परम पुरुष परमात्मा ) सर्वेन्द्रियविवर्जितम् = समस्त इन्द्रियोंसे रहित होनेपर भी; सर्वेन्द्रिय- गुणाभासम् = समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है; (तथा) सर्वस्य = सबका; प्रभुम् = स्वामी; सर्वस्य = सबका, ईशानम् = शासक; ( और ) बृहत् = सबसे बड़ा; शरणम् = आश्रय है, [ प्रपद्येत = उसकी शरणमें जाना चाहिये ] ॥ १७ ॥ व्याख्या-जो सर्वशक्तिमान् परम पुरुष परमात्मा समस्त इन्द्रियोंसे रहित—देहेन्द्रियादि भेदसे शून्य होनेपर भी समस्त इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं तथा सबके स्वामी, परम समर्थ, सबका शासन करनेवाले और जीवके लिये सबसे बड़े आश्रय हैं, मनुष्यको सर्वतोभावसे उन्हींकी शरण ग्रहण करनी चाहिये। यही मनुष्य-शरीरका अच्छे से-अच्छा उपयोग है। इस मन्त्रका पूर्वार्द्ध गीतामें ज्यों-का त्यों आया है ( १३ । १४ ) ॥ १७ ॥ नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः । वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥१८॥ सर्वस्य = सम्पूर्ण, स्थावरस्य = स्थावर; च = और, चरस्य = जङ्गम; लोकस्य वशी = जगत्को वशमें रखनेवाला, हंसः = वह प्रकाशमय परमेश्वर, नवद्वारे = नव द्वारवाले, पुरे = शरीररूपी नगरमें; देही = अन्तर्यामीरूपसे हृदयमें स्थित देही है; ( तथा वही ) बहिः = बाह्य जगत्में भी, लेलायते = लीला कर रहा है ॥ १८ ॥ व्याख्या—सम्पूर्ण स्थावर और जङ्गम जीवोंके समुदायरूप इस जगत्को अपने वशमें रखनेवाले वे प्रकाशमय परमेश्वर दो आँख, दो कान, दो नासिका, एक मुख, एक गुदा और एक उपस्थ—इस प्रकार नौ दरवाजोंवाले मनुष्य- शरीररूप नगरमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित हैं और वे ही इस बाह्य जगत्में भी लीला कर रहे हैं। यों समझकर मन जहाँ सुगमतासे स्थिर हो सके, वहीं उनका ध्यान करना चाहिये ॥ १८ ॥
३८२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्बन्ध-पहले जो यह बात कही थी कि वे समस्त इन्द्रियोंसे रहित होकर भी सब इन्द्रियोंके विषयोंको जानते हैं, उसीका स्पष्टीकरण किया जाता है- अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ॥१९॥ सः=वह परमात्मा, अपाणिपादः=हाथ-पैरोंसे रहित होकर भी, ग्रहीता=समस्त वस्तुओंको ग्रहण करनेवाला; (तथा) जवनः=वेगपूर्वक सर्वत्र गमन करनेवाला है, अचक्षुः=आँखोंके बिना ही, पश्यति=वह सब कुछ देखता है, (और) अकर्णः=कानोंके बिना ही; शृणोति=सब कुछ सुनता है, सः=वह; वेद्यम्=जो कुछ भी जाननेमें आनेवाली वस्तुएँ हैं, उन सबको; वेत्ति=जानता है, च=और; तस्य वेत्ता=उसको जाननेवाला; (कोई) न=नहीं, अस्ति=है, तम्=(ज्ञानी पुरुष) उसे, महान्तम्=महान्; अग्र्यम्=आदि, पुरुषम्=पुरुष, आहुः= कहते हैं ॥ १९ ॥ व्याख्या-जिनका प्रकरण चल रहा है, वे परब्रह्म परमात्मा हाथोंसे रहित होनेपर भी सब जगह समस्त वस्तुओंको ग्रहण कर लेते हैं तथा पैरोंसे रहित होकर भी बड़े वेगसे इच्छानुसार सर्वत्र गमनागमन करते हैं। आँखोंसे रहित होनेपर भी सब जगह सब कुछ देखते हैं, कानोंसे रहित होकर भी सब जगह सब कुछ सुनते हैं। वे समस्त जानने योग्य और जाननेमें आनेवाले जड़-चेतन पदार्थोंको भलीभाँति जानते हैं, परंतु उनको जाननेवाला कोई नहीं है। जो सबको जाननेवाले हैं, उन्हें भला कौन जान सकता है। उनके विषयमें ज्ञानी महापुरुष कहते हैं कि वे सबके आदि, पुरातन, महान् पुरुष हैं ॥ १९ ॥ अणोरणीयान्महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः। तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् ॥२०॥ अणोः अणीयान्= (वह) सूक्ष्मसे भी अतिसूक्ष्म; (तथा) महतः महीयान्=बड़ेसे भी बहुत बड़ा; आत्मा=परमात्मा, अस्य जन्तोः=इस जीवकी, गुहायाम्=हृदयरूप गुफामें, निहितः=छिपा हुआ है; धातुः=सबकी रचना करनेवाले परमेश्वरकी, प्रसादात्=कृपासे; (जो मनुष्य) तम्=उस; अक्रतुम्=सङ्कल्परहित; ईशम्=परमेश्वरको; (और) महिमानम्=उसकी महिमाको; पश्यति=देख लेता है, (वह) वीतशोकः=सब प्रकारके दुःखोंसे रहित, [ भवति=हो जाता है ] ॥ २० ॥ व्याख्या-वे सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म और बड़ेसे भी बहुत बड़े परब्रह्म परमात्मा इस जीवकी हृदयरूप गुफामें छिपे हुए हैं। सबकी रचना करनेवाले उन परमेश्वरकी कृपासे ही मनुष्य उन स्वार्थके सङ्कल्पसे सर्वथा रहित, अकारण कृपा करनेवाले परम सुहृद् परमेश्वरको और उनकी महिमाको जान सकता है। जब उन परम दयालु परम सुहृद् परमेश्वरका यह साक्षात् कर लेता है, तब सदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंसे रहित होकर उन परम आनन्दस्वरूप परमेश्वरको प्राप्त कर लेता है ॥ २० ॥ वेदाहमेतमजरं पुराणं सर्वात्मानं सर्वगतं विभुत्वात् । जन्मनिरोधं प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनो हि प्रवदन्ति नित्यम् ॥२१॥ ब्रह्मवादिनः=वेदके रहस्यका वर्णन करनेवाले महापुरुष, यस्य=जिसके, जन्मनिरोधम्=जन्मका अभाव; प्रवदन्ति=बतलाते हैं, हि [ यम् ]=तथा जिसको, नित्यम्=नित्य, प्रवदन्ति=बतलाते हैं, एतम्=इस, विभुत्वात्=व्यापक होनेके कारण, सर्वगतम्=सर्वत्र विद्यमान, सर्वात्मानम्=सबके आत्मा, अजरम्=जरा, मृत्यु आदि विकारोंसे रहित, पुराणम्=पुराण पुरुष परमेश्वरको, अहम्=मैं, वेद=जानता हूँ ॥ २१ ॥ व्याख्या-परमात्माको प्राप्त हुए महात्माका कहना है कि 'वेदके रहस्यका वर्णन करनेवाले महापुरुष जिन्हें जन्म- रहित तथा नित्य बताते हैं, व्यापक होनेके कारण जो सर्वत्र विद्यमान है-जिनसे कोई भी स्थान खाली नहीं है, जो जरा-
॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३८३ मृत्यु आदि समस्त विकारोंसे सर्वथा रहित हैं और सबके आदि-पुराणपुरुष हैं, उन सबके आत्मा-अन्तर्यामी परब्रह्म परमेश्वरको मैं जानता हूँ ॥ २१ ॥ ॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥ चतुर्थ अध्याय य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगाद्वर्णाननेकान्निहितार्थो दधाति । वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देवः स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ १ ॥ यः=जो; अवर्णः=रंग, रूप आदिसे रहित होकर भी, निहितार्थः=छिपे हुए प्रयोजनवाला होनेके कारण, बहुधा शक्तियोगात्=विविध शक्तियोंके सम्बन्धसे; आदौ=सृष्टिके आदिमें; अनेकान्=अनेक, वर्णान्=रूप रंगः दधाति=धारण कर लेता है, च=तथा; अन्ते=अन्तमें; विश्वम्=यह सम्पूर्ण विश्व; (जिसमें) व्येति (वि+एति) च= विलीन भी हो जाता है, सः=वह, देवः=परमदेव (परमात्मा), एकः=एक (अद्वितीय) है, सः=वह, नः=हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या=शुभ बुद्धिसे, संयुनक्तु=संयुक्त करे ॥ १ ॥ व्याख्या-जो परब्रह्म परमात्मा अपने निराकार स्वरूपमें रूप-रंग आदिसे रहित होकर भी सृष्टिके आदिमे किसी अज्ञात प्रयोजनसे अपनी स्वरूपभूत नाना प्रकारकी शक्तियोंके सम्बन्धसे अनेक रूप-रंग आदि धारण करते हैं तथा अन्तमे यह सम्पूर्ण जगत् जिनमें विलीन भी हो जाता है-अर्थात् जो बिना किसी अपने प्रयोजनके जीवोंका कल्याण करनेके लिये ही उनके कर्मानुसार इस नाना रंग-रूपवाले जगत्की रचना, पालन और संहार करते हैं, वे परमदेव परमेश्वर वास्तवमें एक-अद्वितीय हैं। उनके अतिरिक्त कुछ नहीं है। वे हमें शुभ बुद्धिसे युक्त करें ॥ १ ॥ सम्बन्ध-इस प्रकार प्रार्थना करनेका प्रकार बताया गया। अब तीन मन्त्रोंद्वारा परमेश्वरका जगत्के रूपमें चिन्तन करते हुए उनकी स्तुति करनेका प्रकार बतलाया जाता है- तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्लं तद्ब्रह्म तदापस्तत्प्रजापतिः ॥ २ ॥ तत् एव=वही, अग्निः=अग्नि है, तत्=वह, आदित्यः=सूर्य है, तत्=वह, वायुः=वायु है, उ=तथा, तत्=वही, चन्द्रमाः=चन्द्रमा है, तत्=वह, शुक्रम्=अन्यान्य प्रकाशयुक्त नक्षत्र आदि है, तत्=वह, आपः=जल है, तत्=वह, प्रजापतिः=प्रजापति है; (और) तत् एव=वही, ब्रह्म=ब्रह्मा है ॥ २ ॥ व्याख्या-वे परब्रह्म ही अग्नि, सूर्य, वायु, चन्द्रमा, अन्यान्य प्रकाशमय नक्षत्र आदि जल, प्रजापति और ब्रह्मा है। ये सब उन एक अद्वितीय परब्रह्म परमेश्वरकी ही विभूतियाँ हैं। इन सबके अन्तर्यामी आत्मा वे ही हैं, अतः ये सब उन्हींके स्वरूप हैं। इस प्रकार इस सम्पूर्ण जगत्के रूपमें उन परमात्माका चिन्तन करना चाहिये ॥ २ ॥ त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी । त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ॥ ३-॥ त्वम्=तू, स्त्री=स्त्री है; त्वम्=तू; पुमान्=पुरुष है, त्वम्=तू ही, कुमारः=कुमार, उत वा=अथवा, कुमारी= कुमारी, असि=है, त्वम्=तू; जीर्णः=बूढ़ा होकर, दण्डेन=लाठीके सहारे, अञ्चसि=चलता है; उ=तथा, त्वम्=तू ही; जातः=विराट्रूपमें प्रकट होकर; विश्वतोमुखः=सब ओर मुखवाला; भवसि=हो जाता है ॥ ३ ॥ व्याख्या-हे सर्वेश्वर ! आप स्त्री, पुरुष, कुमार, कुमारी आदि अनेक रूपोंवाले हैं—अर्थात् इन सबके रूपमें आप ही प्रकट हो रहे हैं। आप ही बूढ़े होकर लाठीके सहारे चलते हैं अर्थात् आप ही वृद्धोंके रूपमें अभिव्यक्त हैं। हे परमात्मन् !
३८४ * विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * आप ही विराट्रूपमें प्रकट होकर सब ओर मुख किये हुए हैं, अर्थात् सम्पूर्ण जगत् आपका ही स्वरूप है। जगत्में जितने भी मुख दिखायी देते हैं, सब आपके ही हैं ॥ ३ ॥ नीलः पतङ्गो हरितो लोहिताक्षस्तडिद्गर्भ ऋतवः समुद्राः । अनादिमत्त्वं विभुत्वेन वर्तसे यतो जातानि भुवनानि विश्वा ॥ ४ ॥ [ त्वम् एव = तू ही; ] नीलः = नीलवर्ण; पतङ्गः = पतङ्ग है; हरितः = हरे रंगका; (और) लोहिताक्षः = लाल आँखोंवाला (पक्षी है एवं); तडिद्गर्भः = मेघ; ऋतवः = वसन्त आदि ऋतुएँ; (तथा) समुद्राः = सप्त समुद्ररूप है; यतः = क्योंकि; [त्वत्तः एव = तुझसे ही; ] विश्वा = सम्पूर्ण; भुवनानि = लोक; जातानि = उत्पन्न हुए हैं; त्वम् = तू ही; अनादिमत् = अनादि (प्रकृतियों) का स्वामी; (और) विभुत्वेन = व्यापकरूपसे; वर्तसे = सबमें विद्यमान है ॥ ४ ॥ व्याख्या—हे सर्वान्तर्यामिन् ! आप ही नीले रंगके पतङ्ग (भौंरे) तथा हरे रंग और लाल आँखोंवाले पक्षी—तोते हैं; आप ही बिजलीसे युक्त मेघ हैं, वसन्तादि सब ऋतुएँ और सप्त समुद्र भी आपके ही रूप हैं। अर्थात् इन नाना प्रकारके रंग-रूपवाले समस्त जड-चेतन पदार्थोके रूपमें मैं आपको ही देख रहा हूँ; क्योंकि आपसे ही ये समस्त लोक और उनमें निवास करनेवाले सम्पूर्ण जीव-समुदाय प्रकट हुए हैं। व्यापकरूपसे आप ही सबमें विद्यमान हैं तथा अव्यक्त एवं जीवरूप अपनी दो अनादि प्रकृतियोंके (जिन्हें गीतामें अपरा और परा नामोंसे कहा गया है) स्वामी भी आप ही हैं। अतः एकमात्र आपको ही मैं सबके रूपमें देखता हूँ ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—पूर्वमन्त्रमें परब्रह्म परमेश्वरको जिन दो प्रकृतियोंका स्वामी बताया गया है, वे दोनों अनादि प्रकृतियाँ कौन-सी हैं— इसका स्पष्टीकरण किया जाता है— अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः ॥ ५ ॥ =अपने ही सदृश अर्थात् त्रिगुणमय; बह्वीः = बहुत-से; प्रजाः = भूत-समुदायोंको; सृजमानाम् = रचने- वाली; (तथा) लोहितशुक्लकृष्णाम् = लाल, सफेद और काले रंगकी अर्थात् त्रिगुणमयी; एकाम् = एक; अजाम् = अजा (अजन्मा—अनादि प्रकृति) को, हि = निश्चय ही, एकः = एक; अजः = अज (अज्ञानी जीव); जुषमाणः = आसक्त हुआ; अनुशेते = भोगता है; (और) अन्यः = दूसरा; अजः = अज (ज्ञानी महापुरुष); एनाम् = इस; भुक्तभोगाम् = भोगी हुई प्रकृतिको; जहाति = त्याग देता है ॥ ५ ॥ व्याख्या—पिछले मन्त्रमें जिनका संकेत किया गया है, उन दो प्रकृतियोंमेंसे एक तो वह है, जिसका गीतामें अपरा नामसे उल्लेख हुआ है तथा जिसके आठ भेद किये गये हैं (गीता ७।४)। यह अपने अधिष्ठाता परमदेव परमेश्वरकी अध्यक्षतामें अपने ही सदृश अर्थात् त्रिगुणमय असंख्य जीवदेहोंको उत्पन्न करती है। त्रिगुणमयी अथवा त्रिगुणात्मिका होनेसे इसे तीन रंगवाली कहा गया है। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण ही इसके तीन रंग हैं। सत्त्वगुण निर्मल एवं प्रकाशक होनेसे उसे श्वेत माना गया है। रजोगुण रागात्मक है, अतएव उसका रंग लाल माना गया है तथा तमोगुण अज्ञानरूप एवं आवरक होनेसे उसे कृष्णवर्ण कहा गया है। इन तीन गुणोंको लेकर ही प्रकृतिको सफेद, लाल एवं काले रंगकी कहा गया है। दूसरी जिसका गीतामें जीवरूप परा अथवा चेतन प्रकृतिके नामसे (७।५), क्षेत्रज्ञके नामसे (१३।१) तथा अक्षर पुरुषके नामसे (१५।१६) वर्णन किया गया है, उसके दो भेद हैं। एक तो वे जीव, जो उस अपरा प्रकृतिमें आसक्त होकर—उसके साथ एकरूप होकर उसके विचित्र भोगोंको अपने कर्मानुसार भोगते हैं। दूसरा समुदाय उन ज्ञानी महापुरुषोंका है, जिन्होंने इसके भोगोंको भोगकर इसे निःसार और क्षणभङ्गुर समझकर इसका सर्वथा परित्याग कर दिया है। ये दोनों प्रकारके जीव स्वरूपतः अजन्मा तथा अनादि हैं। इसीलिये इन्हें 'अज' कहा गया है ॥ ५॥
- सांख्यमतावलम्बियोंने इस मन्त्रको सांख्यशास्त्रका बीज माना है और इसीके आधारपर उक्त दर्शनको श्रुति-सम्मत सिद्ध किया है। सांख्यकारिकाके प्रसिद्ध टीकाकार तथा अन्य दर्शनोंके व्याख्याता सर्वतन्त्रस्वतन्त्र-स्वामिवन्द्य श्रीवाचस्पति मिश्रने अपनी सांख्यतत्त्व- कौमुदी नामक टीकाके आरम्भमें इसी मन्त्रको कुछ परिवर्तनके साथ मङ्गलाचरणके रूपमें उद्धृत करते हुए इसमें वर्णित प्रकृतिकी वन्दना
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३८५ सम्बन्ध—वह परा प्रकृतिरूप जीवसमुदाय, जो इस प्रकृतिके भोगोंको भोगता है, कब और कैसे मुक्त हो सकता है— इस जिज्ञासापर दो मन्त्रोंमें कहते हैं— द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ ६ ॥ सयुजा=सदा साथ रहनेवाले, ( तथा ) सखाया=परस्पर सख्यभाव रखनेवाले, द्वा=दो, सुपर्णा=पक्षी (जीवात्मा एव परमात्मा); समानम् = एक ही, वृक्षम् परिषस्वजाते = वृक्ष ( शरीर ) का आश्रय लेकर रहते हैं, तयोः=उन दोनोंमेंसे, अन्यः=एक (जीवात्मा) तो, पिप्पलम्=उस वृक्षके फलो (कर्मफलों) को, स्वादु=स्वाद ले-लेकर, अत्ति= खाता है, अन्यः= ( किंतु ) दूसरा ( ईश्वर ), अनश्नन् = उनका उपभोग न करता हुआ, अभिचाकशीति=केवल देखता रहता है ॥ ६ ॥ व्याख्या—जिस प्रकार गीता आदिमे जगत्का अश्वत्थ-वृक्षके रूपमें वर्णन किया गया है, उसी प्रकार इस मन्त्रमें शरीरको अश्वत्थ-वृक्षका और जीवात्मा तथा परमात्माको पक्षियोंका रूप देकर वर्णन किया गया है। इसी प्रकार कठोपनिषद्में जीवात्मा और परमात्माको गुहामें प्रविष्ट छाया और धूपके रूपमें बताकर वर्णन किया गया है। दोनों जगहका भाव प्रायः एक ही है। यहाँ मन्त्रका सारांश यह है कि यह मनुष्य-शरीर मानो एक पीपलका वृक्ष है। ईश्वर और जीव—ये दोनों सदा साथ रहनेवाले दो मित्र मानो दो पक्षी हैं। ये दोनों इस शरीररूप वृक्षमें एक साथ एक ही हृदयरूप घोंसलेमें निवास करते हैं। शरीरमें रहते हुए प्रारब्धानुसार जो सुख-दुःखरूप कर्मफल प्राप्त होते हैं, वे ही मानो इस पीपलके फल हैं। इन फलोंको जीवात्मारूप एक पक्षी तो स्वादपूर्वक खाता है अर्थात् हर्ष-शोकका अनुभव करते हुए कर्मफलको भोगता है। दूसरा ईश्वररूप पक्षी इन फलोंको खाता नहीं, केवल देखता रहता है। अर्थात् इस शरीरमें प्राप्त हुए सुख-दुःखोंको वह भोगता नहीं, केवल उनका साक्षी बना रहता है। परमात्माकी भाँति यदि जीवात्मा भी इनका द्रष्टा बन जाय तो फिर उसका इनसे कोई सम्बन्ध न रह जाय। ऐसे ही जीवात्माके सम्बन्धमें पिछले मन्त्रमें यह कहा गया है कि वह प्रकृतिका उपभोग कर चुकनेके बाद उसे निःसार समझकर उसका परित्याग कर देता है, उससे मुँह मोड़ लेता है। उसके लिये फिर प्रकृति अर्थात् जगत्की सत्ता ही नहीं रह जाती। फिर तो वह और उसका मित्र—दो ही रह जाते हैं और परस्पर मित्रताका आनन्द लूटते हैं। यही इस मन्त्रका तात्पर्य मालूम होता है। मुण्डक० ३ । १ । १ में भी यह मन्त्र इसी रूपमें आया है ॥ ६ ॥ समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ ७॥ समाने वृक्षे=पूर्वोक्त शरीररूप एक ही वृक्षपर रहनेवाला; पुरुषः = जीवात्मा; निमग्नः = गहरी आसक्तिमें डूबा हुआ है; ( अतः ) अनीशया = असमर्थ होनेके कारण ( दीनतापूर्वक ), मुह्यमानः=मोहित हुआ, शोचति =शोक करता रहता है; यदा = जब ( यह भगवान्की अहैतुकी दयासे ), जुष्टम् = भक्तोंद्वारा नित्यसेवित; अन्यम् = अपनेसे भिन्न, ईशम् = परमेश्वरको; (और) अस्य = उसकी, महिमानम् = आश्चर्यमयी महिमाको, पश्यति = प्रत्यक्ष देख लेता है; इति=तब, वीतशोकः=सर्वथा शोकरहित; [ भवति = हो जाता है ] ॥ ७॥ व्याख्या-पहले बतलाये हुए इस शरीररूप एक ही वृक्षपर हृदयरूप घोंसलेमे परमात्माके साथ रहनेवाला यह जीवात्मा जबतक अपने साथ रहनेवाले परम सुहृद् परमेश्वरकी ओर नहीं देखता, इस शरीरमे ही आसक्त होकर मोहमे निमग्न रहता है, अर्थात् शरीरमें अत्यन्त ममता करके उसके द्वारा भोगोंका उपभोग करनेमे ही रचा-पचा रहता है, तबतक असमर्थता और दीनतासे मोहित हुआ नाना प्रकारके दुःखोंको भोगता रहता है। जब कभी इसपर भगवान्की अहैतुकी दया होती है, की है। यहाँ काव्यमयी भाषामें प्रकृतिको एक तिरंगी बकरीके रूपमें चित्रित किया गया है, जो बद्धजीवरूप बकरेके संयोगसे अपनी ही- जैसी तिरंगी—त्रिगुणमयी सन्तान उत्पन्न करती है। संस्कृतमें 'अजा' बकरीको भी कहते हैं। इसी श्लेषका उपयोग कर प्रकृतिका आलंकारिक रूपमें वर्णन किया गया है। उ० मं० ४९-
३८६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * तब यह अपनेसे भिन्न, अपने ही साथ रहनेवाले, परम सुहृद्, परम प्रिय भगवान्को पहचान पाता है। जो भक्तजनोंद्वारा निरन्तर सेवित हैं, उन परमेश्वरको तथा उनकी आश्चर्यमयी महिमाको, जो जगत्में सर्वत्र भिन्न-भिन्न प्रकारसे प्रकट हो रही है, जब यह देख लेता है, उस समय तत्काल ही सर्वथा शोकरहित हो जाता है। मुण्डक० ३। १। २ में भी यह मन्त्र इसी रूपमें आया है ॥ ७ ॥ ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः । यस्तं न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ ८ ॥ यस्मिन्=जिसमें; विश्वे=समस्त; देवाः=देवगण; अधि=भलीभाँति; निषेदुः=स्थित हैं; [तस्मिन्=उस;] अक्षरे=अविनाशी; परमे व्योमन्=परम व्योम (परम धाम) मे; ऋचः=सम्पूर्ण वेद स्थित हैं; यः=जो मनुष्य; तम्=उसको; न=नहीं; वेद=जानता; [सः=वह;] ऋचा=वेदोंके द्वारा; किम्=क्या; करिष्यति=सिद्ध करेगा; इत्= परन्तु; ये=जो; तत्=उसको; विदुः=जानते हैं; ते=वे तो; इमे=ये; समासते=सम्यक् प्रकारसे उसीमें स्थित हैं ॥ ८ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वरके जिस अविनाशी दिव्य चेतन परम आकाशस्वरूप परम धाममें समस्त देवगण अर्थात् उन परमात्माके पार्षदगण उन परमेश्वरकी सेवा करते हुए निवास करते हैं, वहीं समस्त वेद भी पार्षदोंके रूपमें मूर्तिमान् होकर भगवान्की सेवा करते हैं। जो मनुष्य उस परम धाममें रहनेवाले परब्रह्म पुरुषोत्तमको नहीं जानता और इस रहस्यको भी नहीं जानता कि समस्त वेद उन परमात्माकी सेवा करनेवाले उन्हींके अङ्गभूत पार्षद हे, वह वेदोंके द्वारा अपना क्या प्रयोजन सिद्ध करेगा ? अर्थात् कुछ सिद्ध नहीं कर सकेगा। परन्तु जो उन परमात्माको तत्त्वसे जान लेते हैं, वे तो उस परम धाममें ही सम्यक् प्रकारसे स्थित रहते हैं, अर्थात् वहाँसे कभी नहीं लौटते ॥ ८ ॥ छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति । अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत्तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥ ९ ॥ छन्दांसि=छन्द; यज्ञाः=यज्ञ; क्रतवः=क्रतु (ज्योतिष्टोम आदि विशेष यज्ञ); व्रतानि=नाना प्रकारके व्रत; च=तथा; यत्=और भी जो कुछ; भूतम्=भूत; भव्यम्=भविष्य एव वर्तमानरूपसे; वेदाः=वेद; वदन्ति=वर्णन करते हैं; एतत् विश्वम्=इस सम्पूर्ण जगत्को; मायी=प्रकृतिका अधिपति परमेश्वर; अस्मात्=इस (पहले बताये हुए महाभूतादि तत्त्वोंके समुदाय) से; सृजते=रचता है; च=तथा; अन्यः=दूसरा (जीवात्मा);- तस्मिन्=उस प्रपञ्चमें; मायया=मायाके द्वारा; संनिरुद्धः=भलीभाँति बँधा हुआ है ॥ ९ ॥ व्याख्या—जो समस्त वेदमन्त्ररूप छन्द, यज्ञ, क्रतु अर्थात् ज्योतिष्टोमादि विशेष यज्ञ, नाना प्रकारके व्रत अर्थात् शुभ कर्म, सदाचार और उनके नियम हैं तथा और भी जो कुछ भूत, भविष्य, वर्तमान पदार्थ हैं, जिनका वर्णन वेदोंमें पाया जाता है,—इन सबको वे प्रकृतिके अधिष्ठाता परमेश्वर ही अपने अंशभूत इस पहले बताये हुए पञ्चभूत आदि तत्त्व-समुदायसे रचते हैं; इस प्रकार रचे हुए उस जगत्में अन्य अर्थात् पहले बताये हुए ज्ञानी महापुरुषोंसे भिन्न जीवसमुदाय मायाके द्वारा बँधा हुआ है। जबतक वह अपने स्वामी परम देव परमेश्वरको साक्षात् नहीं कर लेता, तबतक उसका इस प्रकृतिसे छुटकारा नहीं हो सकता; अतः मनुष्यको उन परमात्माको जानने और पानेकी उत्कट अभिलाषा रखनी चाहिये ॥ ९ ॥ मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥१०॥ मायाम्=माया; तु=तो; प्रकृतिम्=प्रकृतिको; विद्यात्=समझना चाहिये; तु=और; मायिनम्=मायापति; महेश्वरम्=महेश्वरको समझना चाहिये; तस्य तु=उसीके; अवयवभूतैः=अङ्गभूत कारण-कार्य-समुदायसे; इदम्=यह; सर्वम्=सम्पूर्ण; जगत्=जगत्; व्याप्तम्=व्याप्त हो रहा है ॥ १० ॥ व्याख्या—इस प्रकरणमें जिसका मायाके नामसे वर्णन हुआ है, वह तो भगवान्की शक्तिरूपा प्रकृति है और उस माया नामसे कही जानेवाली शक्तिरूपा प्रकृतिका अधिपति परब्रह्म परमात्मा महेश्वर है; इस प्रकार इन दोनोंको अलग-अलग
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३८७ समझना चाहिये। उस परमेश्वरकी शक्तिरूपा प्रकृतिके ही अङ्गभूत कारण-कार्यसमुदायसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है ॥ १० ॥ यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं स च वि चैति सर्वम् । तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥११॥ यः = जो; एकः = अकेला ही; योनिम् योनिम् अधितिष्ठति = प्रत्येक योनिका अधिष्ठाता हो रहा है, यस्मिन् = जिसमें; इदम् = यह, सर्वम् = समस्त जगत्; समेति = प्रलयकालमें विलीन हो जाता है, च = और, व्येति च = सृष्टिकालमें विविध रूपोंमें प्रकट भी हो जाता है; तम् = उस, ईशानम् = सर्वनियन्ता; वरदम् = वरदायक; ईड्यम् = स्तुति करने योग्य, देवम् = परम देव परमेश्वरको, निचाय्य = तत्त्वसे जानकर, (मनुष्य) अत्यन्तम् = निरन्तर बनी रहनेवाली; इमाम् = इस (मुक्तिरूप), शान्तिम् = परम शान्तिको, एति = प्राप्त हो जाता है ॥ ११ ॥ व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वर प्रत्येक योनिके एकमात्र अध्यक्ष हैं—जगत्मे जितने प्रकारके कारण माने जाते हैं, उन सबके अधिष्ठाता हैं। उनमें किसी कार्यको उत्पन्न करनेकी शक्ति उन्हीं सर्वकारण परमात्माकी है और उन्हींकी अध्यक्षतामें वे उन-उन कार्योंको उत्पन्न करते हैं। वे ही उन सबपर शासन करते हैं—उनकी यथायोग्य व्यवस्था करते हैं। यह समस्त जगत् प्रलयके समय उनमें विलीन हो जाता है तथा पुनः सृष्टि-कालमें उन्हींमे विविध रूपोंमें उत्पन्न हो जाता है। उन सर्वनियन्ता, वरदायक, एकमात्र स्तुति करनेयोग्य, परमदेव, सर्वसुहृद्, सर्वेश्वर परमात्माको जानकर यह जीव निरन्तर बनी रहनेवाली परमनिर्वाणरूप शान्तिको प्राप्त हो जाता है। गीतामें इसका शाश्वती शान्ति (गीता ९। ३१), परा शान्ति (गीता १८ । ६२) आदि नामोंसे भी वर्णन आता है ॥ ११ ॥ यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः । हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानं स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥१२॥ यः = जो, रुद्रः = रुद्र, देवानाम् = इन्द्रादि देवताओंको, प्रभवः = उत्पन्न करनेवाला, च = और; उद्भवः = बढ़ाने- वाला है; च = तथा; (जो) विश्वाधिपः = सबका अधिपति, महर्षिः = (और) महान् ज्ञानी (सर्वज्ञ) है, (जिसने सबसे पहले) जायमानम् = उत्पन्न हुए, हिरण्यगर्भम् = हिरण्यगर्भको, पश्यत = देखा था, सः = वह परमदेव परमेश्वर; नः = हमलोगोंको; शुभया बुद्ध्या = शुभ बुद्धिसे; संयुनक्तु = संयुक्त करे ॥ १२ ॥ व्याख्या—सबको अपने शासनमें रखनेवाले जो रुद्ररूप परमेश्वर इन्द्रादि समस्त देवताओंको उत्पन्न करते और बढ़ाते हैं तथा जो सबके अधिपति और महान् ज्ञानसम्पन्न (सर्वज्ञ) हैं, जिन्होंने सृष्टिके आदिमें सबसे पहले उत्पन्न हुए हिरण्यगर्भको देखा था, अर्थात् जो ब्रह्माके भी पूर्ववर्ती हैं, वे परमदेव परमात्मा हमलोगोंको शुभ बुद्धिसे संयुक्त करें, जिससे हम उनकी ओर बढ़कर उन्हें प्राप्त कर सकें। शुभ बुद्धि वही है, जो जीवको परम कल्याणरूप परमात्माकी ओर लगाये । गायत्री-मन्त्रमें भी इसी बुद्धिके लिये प्रार्थना की गयी है ॥ १२ ॥ यो देवानामधिपो यस्मिँल्लोका अधिश्रिताः । य ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ १३ ॥ यः = जो, देवानाम् = समस्त देवोंका, अधिपः = अधिपति है, यस्मिन् = जिसमें, लोकाः = समस्त लोक; अधिश्रिताः = सब प्रकारसे आश्रित हैं, यः = जो; अस्य = इस, द्विपदः = दो पैरवाले, (और) चतुष्पदः = चार पैरवाले समस्त जीवसमुदायका, ईशे = शासन करता है, (उस) कस्मै देवाय = आनन्दस्वरूप परमदेव परमेश्वरकी; (हम) हविषा = हविष्य अर्थात् श्रद्धा-भक्तिपूर्वक भेंट समर्पण करके, विधेम = पूजा करें ॥ १३ ॥ व्याख्या—जो सर्वनियन्ता परमेश्वर समस्त देवोंके अधिपति हैं, जिनमें समस्त लोक सब प्रकारसे आश्रित हैं अर्थात् जो स्थूल, सूक्ष्म और अव्यक्त अवस्थाओंमें सदा ही सब प्रकारसे सबके आश्रय हैं, जो दो पैरवाले और चार पैरवाले अर्थात्
३८८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * सम्पूर्ण जीव-समुदायका अपनी अचिन्त्य शक्तियोंके द्वारा शासन करते हैं, उन आनन्दस्वरूप परमदेव सर्वाधार सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी हम श्रद्धा भक्तिपूर्वक हविःस्वरूप भेंट समर्पण करके पूजा करें। अर्थात् सब कुछ उन्हें समर्पण करके उन्हींके हो जायँ। यही उनकी प्राप्तिका सहज उपाय है ॥ १३ ॥ सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति ॥१४॥ सूक्ष्मातिसूक्ष्मम् = (जो) सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म; कलिलस्य मध्ये = हृदय-गुहारूप गुह्यस्थानके भीतर स्थित; विश्वस्य = अखिल विश्वकी; स्रष्टारम् = रचना करनेवाला; अनेकरूपम् = अनेक रूप धारण करनेवाला; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम् = समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे रखनेवाला है, (उस) एकम् = एक (अद्वितीय); शिवम् = कल्याणस्वरूप महेश्वरको; ज्ञात्वा = जानकर, (मनुष्य) अत्यन्तम् = सदा रहनेवाली; शान्तिम् = शान्तिको; एति = प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ व्याख्या-जो परब्रह्म परमात्मा सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं-अर्थात् जो बिना उनकी कृपाके जाने नहीं जाते, जो सबकी हृदय-गुहारूप गुह्यस्थानके भीतर स्थित हैं अर्थात् जो हमारे अत्यन्त समीप हैं, जो अखिल विश्वकी रचना करते हैं, तथा स्वयं विश्वरूप होकर अनेक रूप धारण किये हुए हैं-यही नहीं, जो निराकाररूपसे समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे रहते हैं, उन सर्वोपरि एक-अद्वितीय कल्याणस्वरूप महेश्वरको जानकर मनुष्य सदा रहनेवाली असीम, अविनाशी और अतिशय शान्तिको प्राप्त कर लेता है; क्योंकि वह महापुरुष इस अशान्त जगत्-प्रपञ्चसे सर्वथा सम्बन्धरहित एवं उपरत हो जाता है ॥ १४ ॥ स एव काले भुवनस्य गोप्ता विश्वाधिपः सर्वभूतेषु गूढः । यस्मिन्युक्ता ब्रह्मर्षयो देवताश्च तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश्छिनत्ति ॥१५॥ सः एव = वही; काले = समयपर; भुवनस्य गोप्ता = समस्त ब्रह्माण्डोंकी रक्षा करनेवाला; विश्वाधिपः = समस्त जगत्का अधिपति; (और) सर्वभूतेषु = समस्त प्राणियोंमें; गूढः = छिपा हुआ है; यस्मिन् = जिसमें; ब्रह्मर्षयः = वेदज्ञ महर्षिगण; च = और; देवताः = देवता लोग भी; युक्ताः = ध्यानद्वारा संलग्न हैं; तम् = उस (परमदेव परमेश्वर) को; एवम् = इस प्रकार; ज्ञात्वा = जानकर; (मनुष्य) मृत्युपाशान् = मृत्युके बन्धनोंको; छिनत्ति = काट डालता है ॥ १५ ॥ व्याख्या-जिनका बार-बार वर्णन किया गया है, वे परमदेव परमेश्वर ही समयपर अर्थात् स्थिति-कालमें समस्त ब्रह्माण्डोंकी रक्षा करते हैं, तथा वे ही सम्पूर्ण जगत्के अधिपति और समस्त प्राणियोंमे अन्तर्यामीरूपसे छिपे हुए हैं। उन्हींमें वेदके रहस्यको समझनेवाले महर्षिगण और समस्त देवता लोग भी ध्यानके द्वारा संलग्न रहते हैं। सब उन्हींका स्मरण और चिन्तन करके उन्हींमें जुड़े रहते हैं। इस प्रकार उन परमदेव परमेश्वरको जानकर मनुष्य यमराजके समस्त पाशोंको अर्थात् जन्म-मृत्युके कारणभूत समस्त बन्धनोंको काट डालता है। फिर वह कभी प्रकृतिके बन्धनमें नहीं आता, सदाके लिये सर्वथा मुक्त हो जाता है ॥ १५ ॥ घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मं ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१६॥ शिवम् = कल्याणस्वरूप; एकम् देवम् = एक (अद्वितीय) परमदेवको; घृतात् परम् = मक्खनके ऊपर रहनेवाले; मण्डम् इव = सारभागकी भाँति; अतिसूक्ष्मम् = अत्यन्त सूक्ष्म; (और) सर्वभूतेषु = समस्त प्राणियोंमें; गूढम् = छिपा हुआ; ज्ञात्वा = जानकर; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम् = समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर स्थित हुआ; ज्ञात्वा = जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशैः = समस्त बन्धनोंसे; मुच्यते = छूट जाता है ॥ १६ ॥ -जो मक्खनके ऊपर रहनेवाले सारभागकी भाँति सबके सार एवं अत्यन्त सूक्ष्म हैं, उन कल्याणस्वरूप
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३८९ एकमात्र परमदेव परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें छिपा हुआ तथा समस्त जगत्को सब ओरसे घेरकर उसे व्याप्त किये हुए जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोंसे सदाके लिये सर्वथा छूट जाता है ॥ १६ ॥ एष देवो विश्वकर्मा महात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। हृदा मनीषा मनसाभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥१७॥ एषः = यह; विश्वकर्मा = जगत्-कर्ता; महात्मा = महात्मा; देवः = परमदेव परमेश्वर, सदा = सर्वदा; जनानाम् = सब मनुष्योंके; हृदये = हृदयमें, संनिविष्टः = सम्यक् प्रकारसे स्थित है; (तथा) हृदा = हृदयसे, मनीषा = बुद्धिसे; (और) मनसा = मनसे; अभिक्लृप्तः = ध्यानमें लाया हुआ, [ आविर्भवति = प्रत्यक्ष होता है, ] ये = जो साधक; एतत् = इस रहस्यको; विदुः = जान लेते हैं; ते = वे; अमृताः = अमृतरूप, भवन्ति = हो जाते हैं ॥ १७ ॥ व्याख्या—ये जगत्को उत्पन्न करनेवाले, महात्मा अर्थात् सर्वशक्तिमान् सर्वव्यापी परमदेव परमेश्वर सदा ही सभी मनुष्योंके हृदयमें सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं। उनके गुण-प्रभावको सुनकर द्रवित और विशुद्ध हुए निर्मल हृदयसे, निश्चय- युक्त बुद्धिसे तथा एकाग्र मनके द्वारा निरन्तर ध्यान करनेपर वे परमात्मा प्रत्यक्ष होते हैं। जो साधक इस रहस्यको जान लेते हैं, वे उन्हें प्राप्त करके अमृतरूप हो जाते हैं, सदाके लिये जन्म-मरणसे छूट जाते हैं ॥ १७ ॥ यदातमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्न चासञ्छिव एव केवलः। तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता पुराणी ॥१८॥ यदा = जब, अतमः [ स्यात् ] = अज्ञानमय अन्धकारका सर्वथा अभाव हो जाता है, तत्* = उस समय (अनुभवमें आनेवाला तत्त्व ); न = न; दिवा = दिन है, न = न, रात्रिः = रात है, न = न, सत् = सत् है; च = और, न = न; असत् = असत् है; केवलः = एकमात्र, विशुद्ध; शिवः एव = कल्याणमय शिव ही है, तत् = वह, अक्षरम् = सर्वथा अविनाशी है; तत् = वह; सवितुः = सूर्याभिमानी देवताका भी, वरेण्यम् = उपास्य है, च = तथा, तस्मात् = उसीसे, पुराणी = (यह) पुराना; प्रज्ञा = ज्ञान; प्रसृता = फैला है ॥ १८ ॥ व्याख्या—जिस समय अज्ञानरूप अन्धकारका सर्वथा अभाव हो जाता है, उस समय प्रत्यक्ष होनेवाला तत्त्व न दिन है, न रात है। अर्थात् उसे न तो दिनकी भाँति प्रकाशमय कहा जा सकता है और न रातकी भाँति अन्धकारमय ही; क्योंकि वह इन दोनोंसे सर्वथा विलक्षण है, वहाँ ज्ञान-अज्ञानके भेदकी कल्पनाके लिये स्थान नहीं है। वह न सत् है और न असत् है—उसे न तो 'सत्' कहना बनता है, न 'असत्' ही; क्योंकि वह 'सत्' और 'असत्' नामसे समझे जानेवाले पदार्थोंसे सर्वथा विलक्षण है। एकमात्र कल्याणस्वरूप शिव ही वह तत्त्व हैं। वे सर्वथा अविनाशी हैं। वे सूर्य आदि समस्त देवताओंके उपास्यदेव हैं। उन्हींसे यह सदासे चला आता हुआ अनादि ज्ञान—परमात्माको जानने और पानेका साधन अधिकारियोंको परम्परासे प्राप्त होता चला आ रहा है ॥ १८ ॥ नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये परिजग्रभत् । न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ॥१९॥ एनम् = इस परमात्माको, (कोई भी) न = न तो; ऊर्ध्वम् = ऊपरसे, न = न; तिर्यञ्चम् = इधर-उधरसे; (और) न = न, मध्ये = बीचमेंसे ही; परिजग्रभत् = भलीभाँति पकड़ सकता है, यस्य = जिसका; महद्यशः = 'महान् यश'; नाम = नाम है, तस्य = उसकी, प्रतिमा = कोई उपमा; न = नहीं, अस्ति = है ॥ १९ ॥ व्याख्या—जिनका पहले कई मन्त्रोंमें वर्णन किया गया है, उन परम प्राप्य परब्रह्मको कोई भी मनुष्य न तो ऊपरसे पकड़ सकता है न नीचेसे पकड़ सकता है, और न बीचमें इधर-उधरसे ही पकड़ सकता है; क्योंकि ये सर्वथा अग्राह्य हैं— ग्रहण करनेमें नहीं आते। इन्हें जानने और ग्रहण करनेकी बात जो शास्त्रोंमें पायी जाती है, उसका रहस्य वही समझ सकता है, जो इन्हें पा लेता है। वह भी वाणीद्वारा व्यक्त नहीं कर सकता; क्योंकि मन और वाणीकी वहाँ पहुँच नहीं है। वे
- 'तत्' अव्यय पद है, यहाँ 'तदा' के अर्थमें इसका प्रयोग हुआ है ।
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होकर; मा = न तो; नः = हमारे; तोके = पुत्रोंमें; ( ओर ) तनये = पौत्रोंमें, मा = न; नः = हमारी; आयुषि = आयुमें; मा = न; नः = हमारी; गोषु = गौओंमें, ( और ) मा = न; नः = हमारे, अश्वेषु = घोड़ोंमें ही, रीरिषः = किसी प्रकारकी कमी कर; ( तथा ) नः = हमारे, वीरान् मा वधीः = वीर पुरुषोंका भी नाश न कर ॥ २२ ॥ व्याख्या—हे सबका संहार करनेवाले रुद्रदेव ! हमलोग नाना प्रकारकी भेंट समर्पण करते हुए सदा ही आपको बुलाते रहते हैं । आप ही हमारी रक्षा करनेमें सर्वथा समर्थ हैं, अतः हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप हमपर कभी कुपित न हों तथा कुपित होकर हमारे पुत्र और पौत्रोंको, हमारी आयुको—जीवनको तथा हमारे गौ, घोड़े आदि पशुओंको कभी किसी प्रकारकी क्षति न पहुँचायें । तथा हमारे जो वीर—साहसी पुरुष हैं, उनका भी नाश न करें । अर्थात् सब प्रकारसे हमारी और हमारे धन-जनकी रक्षा करते रहें ॥ २२ ॥ ॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥ पञ्चम अध्याय द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते विद्याविद्ये निहिते यत्र गूढे । क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः ॥ १ ॥ यत्र = जिस; ब्रह्मपरे = ब्रह्मासे भी श्रेष्ठ, गूढे = छिपे हुए, अनन्ते = असीम; तु = और, अक्षरे = परम अक्षर परमात्मा- में; विद्याविद्ये = विद्या और अविद्या, द्वे = दोनों, निहिते = स्थित हैं ( वही ब्रह्म है ), क्षरम् = ( यहाँ ) विनाशशील जडवर्ग, तु = तो; अविद्या = अविद्या नामसे कहा गया है, तु = और, अमृतम् = अविनाशी वर्ग ( जीवसमुदाय ); हि = ही; विद्या = विद्या नामसे कहा गया है, तु = तथा, यः = जो; विद्याविद्ये ईशते = उपर्युक्त विद्या और अविद्यापर शासन करता है; सः = वह, अन्यः = इन दोनोंसे भिन्न—सर्वथा विलक्षण है ॥ १ ॥ व्याख्या—जो परमेश्वर ब्रह्मासे भी अत्यन्त श्रेष्ठ हैं, अपनी मायाके पर्देमें छिपे हुए हैं, सीमारहित और अविनाशी हैं अर्थात् जो देश-कालसे सर्वथा अतीत हैं तथा जिनका कभी किसी प्रकारसे भी विनाश नहीं हो सकता, तथा जिन परमात्मामें अविद्या और विद्या—दोनों विद्यमान हैं, अर्थात् दोनों ही जिनके आधारपर टिकी हुई हैं, वे पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम हैं । इस मन्त्रमें परिवर्तनशील, घटने-बढ़नेवाले और उत्पत्ति-विनाशशील क्षरतत्त्वको तो अविद्या नामसे कहा गया है, क्योंकि वह जड है, उसमे विद्याका—ज्ञानका सर्वथा अभाव है । उससे भिन्न जो जन्म-मृत्युसे रहित है, जो घटता-बढ़ता नहीं, वह अविनाशी कूटस्थ तत्त्व ( जीव-समुदाय ) विद्याके नामसे कहा गया है, क्योंकि वह चेतन है, विज्ञानमय है । उपनिषदोंमें जगह-जगह उसका विज्ञानात्माके नामसे वर्णन आया है । यहाँ श्रुतिने स्वय ही विद्या और अविद्याकी परिभाषा कर दी है, अतः अर्थान्तर- की कल्पना अनावश्यक है । जो इन विद्या और अविद्या नामसे कहे जानेवाले क्षर और अक्षर दोनोंपर शासन करते हैं, दोनोंके स्वामी हैं, दोनों जिनकी शक्तियाँ अथवा प्रकृतियाँ हैं, वे परमेश्वर इन दोनोंसे अन्य—सर्वथा विलक्षण हैं । श्रीगीता- जीमें भी कहा है—'उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः' इत्यादि ( १५ । १७ ) ॥ १ ॥ यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको विश्वानि रूपाणि योनीश्च सर्वाः । ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति जायमानं च पश्येत् ॥ २ ॥ यः = जो, एकः = अकेला ही; योनिम् योनिम् = प्रत्येक योनिपर, विश्वानि रूपाणि = समस्त रूपोंपर, च = और, सर्वाः योनीः = समस्त कारणोंपर, अधितिष्ठति = आधिपत्य रखता है, यः = जो; अग्रे = पहले; प्रसूतम् = उत्पन्न हुए, कपिलम् ऋषिम् = कपिल ऋषिको ( हिरण्यगर्भको ), ज्ञानैः = सब प्रकारके ज्ञानोंसे, बिभर्ति = पुष्ट करता है; च = तथा, ( जिसने ) तम् = उस कपिल ( ब्रह्मा ) को, जायमानम् = ( सबसे पहले ) उत्पन्न होते, पश्येत् = देखा था; ( वे ही परमात्मा हैं ) ॥ २ ॥ —इस जगत्में देव, पितर, मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतङ्ग आदि जितनी भी योनियाँ हैं, तथा प्रत्येक
३९२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * योनिमें जो भिन्न-भिन्न रूप—आकृतियाँ हैं, उन सबके और उनके कारणरूप पञ्च सूक्ष्म महाभूत आदि समस्त तत्त्वोंके जो एकमात्र अधिपति हैं, अर्थात् वे सब-के-सब जिनके अधीन हैं, जो सबसे पहले उत्पन्न हुए कपिल ऋषिको* अर्थात् हिरण्यगर्भ ब्रह्माको प्रत्येक सर्गके आदिमें सब प्रकारके ज्ञानोंसे पुष्ट करते हैं—सब प्रकारके ज्ञानोंसे सम्पन्न करके उन्नत करते हैं तथा जिन्होंने सबसे पहले उत्पन्न होते हुए उन हिरण्यगर्भको देखा था, वे ही सर्वशक्तिमान् सर्वाधार सबके स्वामी परब्रह्म पुरुषोत्तम हैं ॥ २ ॥ एकैकं जालं बहुधा विकुर्वन्नस्मिन्क्षेत्रे संहरत्येष देवः । भूयः सृष्ट्वा पतयस्तथेशः सर्वाधिपत्यं कुरुते महात्मा ॥ ३ ॥ एषः = यह; देवः = परमदेव ( परमेश्वर ); अस्मिन् क्षेत्रे = इस जगत-क्षेत्रमें, ( सृष्टिके समय ) एकैकम् = एक एक; जालम् = जालको (बुद्धि आदि और आकाशादि तत्त्वोंको ), बहुधा = बहुत प्रकारसे; विकुर्वन् = विभक्त करके, ( उनका ) संहरति = ( प्रलयकालमें ) संहार कर देता है; महात्मा = ( वह ) महामना, ईशः = ईश्वर, भूयः = पुनः ( सृष्टिकालमें ), तथा = पहलेकी भाँति, पतयः सृष्ट्वा = ( समस्त लोकपालोंकी ) रचना करके; सर्वाधिपत्यम् कुरुते = ( स्वयं ) सबपर आधिपत्य करता है ॥ ३ ॥ व्याख्या—जिनका प्रकरण चल रहा है, वे परमदेव परमेश्वर इस जगत्रूप क्षेत्रमें सृष्टिके समय एक एक जालको अर्थात् बुद्धि आदि और आकाश आदि अपनी प्रकृतियोंको बहुत प्रकारसे विभक्त करके—प्रत्येक प्रकृतिको भिन्न-भिन्न रूप, नाम और शक्तियोंसे युक्त करके उनका विस्तार करते हैं और स्वयं ही प्रलयकालमें उन सबका संहार कर लेते हैं। वे महामना परमेश्वर पुनः सृष्टिकालमें पहलेकी भाँति ही समस्त लोकोंकी और उनके अधिपतियोंकी रचना करके स्वयं उन सबके अधिष्ठाता बनकर उन सबपर शासन करते हैं। उनकी लीला अतर्क्य है, तर्कसे उसका रहस्य समझमें नहीं आ सकता । उनके सेवक ही उनकी लीलाके रहस्यको कुछ समझते हैं ॥ ३ ॥ सर्वा दिश ऊर्ध्वमधश्च तिर्यक्प्रकाशयन्भ्राजते यद्वनड्वान् । एवं स देवो भगवान्वरेण्यो योनिखभावानधितिष्ठत्येकः ॥ ४ ॥ यत् उ = जिस प्रकार; अनड्वान् = सूर्य, ( अकेला ही ) सर्वाः = समस्त; दिशः = दिशाओंको, ऊर्ध्वम् अधः = ऊपर-नीचे, च = और, तिर्यक् = इधर-उधर—सब ओरसे, प्रकाशयन् = प्रकाशित करता हुआ, भ्राजते = देदीप्यमान होता है, एवम् = उसी प्रकार, सः = वह, भगवान् = भगवान्, वरेण्यः = भक्ति करनेयोग्य; देवः = परमदेव परमेश्वर, एकः = अकेला ही, योनिखभावान् अधितिष्ठति = समस्त कारणरूप अपनी शक्तियोंपर आधिपत्य करता है ॥ ४ ॥ व्याख्या—जिस प्रकार यह सूर्य समस्त दिशाओंको ऊपर-नीचे तथा इधर-उधर—सब ओरसे प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान होता है, उसी प्रकार वे भगवान्—सर्वविध ऐश्वर्यसे सम्पन्न, सबके द्वारा भजनेयोग्य परमदेव परमेश्वर अकेले ही समस्त कारणरूप अपनी भिन्न-भिन्न शक्तियोंके अधिष्ठाता होकर उन सबका संचालन करते हैं, सबको अपना-अपना कार्य करनेकी सामर्थ्य देकर यथायोग्य कार्यमे प्रवृत्त करते हैं ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—ऊपर कही हुई बातका इस मन्त्रमें स्पष्टीकरण किया जाता है— यच्च स्वभावं पचति विश्वयोनिः पाच्यांश्च सर्वान्परिणामयेद्यः । सर्वमेतद्विश्वमधितिष्ठत्येको गुणांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः ॥ ५ ॥ यत् = जो, विश्वयोनिः = सबका परम कारण है, च = और, स्वभावम् = समस्त तत्त्वोंकी शक्तिरूप स्वभावको, पचति = ( अपने सङ्कल्परूप तपसे ) पकाता है, च = तथा, यः = जो, सर्वान् = समस्त, पाच्यान् = पकाये जानेवाले पदार्थोंको, परिणामयेत् = नाना रूपोंमें परिवर्तित करता है, ( और ) यः = जो, एकः = अकेला ही; सर्वान् = समस्त; गुणान्
- कुछ विद्वानोंने 'कपिल' शब्दको सांख्यशास्त्रके आदि वक्ता एवं प्रवर्तक भगवान् कपिलमुनिका वाचक माना है और इस प्रकार उनके द्वारा उपदिष्ट मतकी प्राचीनता एवं प्रामाणिकता सिद्ध की है ।
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३९३ विनियोजयेत्=गुणोंका जीवोंके साथ यथायोग्य सयोग कराता है; च=तथा, एतत्=इस; सर्वम्=समस्त, विश्वम् अधितिष्ठति=विश्वका शासन करता है, (वह परमात्मा है) ॥ ५ ॥ व्याख्या-जो इस सम्पूर्ण विश्वके परम कारण हैं, अर्थात् जिनका और कोई कारण नहीं है, जगत्के कारणरूपसे कहे जानेवाले समस्त तत्त्वोंकी शक्तिरूप स्वभावको जो अपने संकल्परूप तपसे पकाते हैं-अर्थात् उन आकाशादि तत्त्वोंकी जो भिन्न-भिन्न शक्तियाँ प्रलयकालमें लुप्त हो गयी थीं, उन्हें अपने सङ्कल्पद्वारा पुन प्रकट करते हैं, उन प्रकट की हुई शक्तियोंका नाना रूपोंमें परिवर्तन कर इस विचित्र जगत्की रचना करते हैं, तथा सत्त्व आदि तीनों गुणोंका तथा उनसे उत्पन्न हुए पदार्थोंका जीवोंके साथ उनके कर्मानुसार यथायोग्य सम्बन्ध स्थापित करते हैं-इस प्रकार जो अकेले ही इस सम्पूर्ण जगत्की सारी व्यवस्था करके इसपर शासन करते हैं, वे ही पूर्वमन्त्रमें कहे हुए सर्वशक्तिमान् परब्रह्म परमेश्वर हैं ॥ ५ ॥ तद्वेदगुह्योपनिषत्सु गूढं तद्ब्रह्मा वेदते ब्रह्मयोनिम् । ये पूर्वदेवा ऋषयश्च तद्विदुस्ते तन्मया अमृता वै बभूवुः ॥ ६ ॥ तत्=वह, वेदगुह्योपनिषत्सु=वेदोंके रहस्यभूत उपनिषदोंमें, गूढम्=छिपा हुआ है; ब्रह्मयोनिम्=वेदोंके प्राकट्य-स्थान; तत्=उस परमात्माको, ब्रह्मा=ब्रह्मा; वेदते=जानता है, ये=जो, पूर्वदेवाः=पुरातन देवता; च=और, ऋषयः=ऋषिलोग, तत्=उसको, विदुः=जानते थे; ते=वे, वै=अवश्य ही, तन्मयाः= (उसमें) तन्मय होकर; अमृताः=अमृतरूप; बभूवुः=हो गये ॥ ६ ॥ व्याख्या-वे परब्रह्म परमात्मा वेदोंकी रहस्यविद्यारूप उपनिषदोंमें छिपे हुए हैं अर्थात् उनके स्वरूपका वर्णन उपनिषदोंमें गुप्तरूपसे किया गया है। वेद निकले भी उन्हींसे हैं-उन्हींके निःश्वास रूप हैं- 'यस्य निःश्वसितं वेदाः'। इस प्रकार वेदोंमें छिपे हुए और वेदोंके प्राकट्य-स्थान उन परमात्माको ब्रह्माजी जानते हैं। उनके सिवा और भी जिन पूर्ववर्ती देवताओं और ऋषियोंने उनको जाना था, वे सब-के-सब उन्हींमें तन्मय होकर आनन्दस्वरूप हो गये। अतः मनुष्यको चाहिये कि उन सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सबके अधीश्वर परमात्माको उक्त प्रकारसे मानकर उन्हें जानने और पानेके लिये तत्पर हो जाय ॥ ६ ॥ सम्बन्ध-पाँचवें मन्त्रमें यह बात कही गयी थी कि परमेश्वर सब जीवोंका उनके कर्मानुसार गुणोंके साथ संयोग कराते हैं, अतः जीवात्माका स्वरूप और नाना योनियोंमें विचरनेका कारण आदि बतानेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता । स विश्वरूपस्त्रिगुणस्त्रिवर्त्मा प्राणाधिपः संचरति स्वकर्मभिः ॥ ७ ॥ यः गुणान्वयः=जो गुणोंसे बँधा हुआ है; सः=वह, ॑ कर्ता=फलके उद्देश्यसे कर्म करनेवाला जीवात्मा; एव=ही; तस्य=उस, कृतस्य=अपने किये हुए कर्मके फलका; उपभोक्ता=उपभोग करनेवाला, विश्वरूपः=विभिन्न रूपोंमें प्रकट होनेवाला; त्रिगुणः=तीन गुणोंसे युक्त; च=और, त्रिवर्त्मा=कर्मानुसार तीन मार्गोंसे गमन करनेवाला है; सः=वह; प्राणाधिपः=प्राणोंका अधिपति (जीवात्मा), स्वकर्मभिः=अपने कर्मोंसे प्रेरित होकर, संचरति=नाना योनियोंमें विचरता है ॥ ७ ॥ व्याख्या-इस मन्त्रमें प्रकरण आरम्भ करते ही जीवात्माके लिये 'गुणान्वयः' विशेषण देकर यह भाव दिखाया गया है कि जो जीव गुणोंसे सम्बद्ध अर्थात् प्रकृतिमें स्थित है, वही इस जन्म-मरणरूप संसार-चक्रमें घूमता है (गीता १३। २१), जो गुणातीत हो गया है, वह नहीं घूमता। मन्त्रका सारांश यह है कि जो जीवात्मा सत्त्व, रज और तम-इन तीनों गुणोंसे बँधा हुआ है (गीता १४। ५), वह नाना प्रकारके कर्मफलरूप भोगोंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे नाना प्रकारके कर्म करता है और अपने किये हुए उन कर्मोंका फल भोगनेके लिये नाना योनियोंमें जन्म लेकर विभिन्न रूपोंमें प्रकट होता है और जहाँ भी जाता है, तीनों गुणोंसे युक्त रहता है। मृत्युके उपरान्त उसकी कर्मानुसार तीन गतियाँ होती हैं। अर्थात् शरीर छोड़नेपर वह तीन मार्गोंसे जाता है। वे तीन मार्ग हैं-देवयान, पितृयान और तीसरा निरन्तर जन्म-मृत्युके चक्रमें उ० अ० ५०-
३९४ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * घूमना *। वह प्राणोंका अधिपति जीवात्मा जबतक मुक्त नहीं हो जाता, तबतक अपने किये हुए कर्मोंसे प्रेरित होकर नाना लोकोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारकी योनियोंको ग्रहण करके इस संसार-चक्रमें घूमता रहता है ॥ ७ ॥ सम्बन्ध-जीवात्माका स्वरूप कैसा है, इस जिज्ञासापर कहते हैं— अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः सङ्कल्पाहंकारसमन्वितो यः । बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः ॥ ८॥ यः = जो; अङ्गुष्ठमात्रः = अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला; रवितुल्यरूपः = सूर्यके समान प्रकाशस्वरूप, (तथा) संकल्पाहङ्कारसमन्वितः = सङ्कल्प और अहङ्कारसे युक्त है, बुद्धेः = बुद्धिके; गुणेन = गुणोंके कारण; च = और; आत्मगुणेन = अपने गुणोंके कारण; एव = ही; आराग्रमात्रः = आरेकी नोकके जैसे सूक्ष्म आकारवाला है, अपरः = ऐसा अपर (अर्थात् परमात्मासे भिन्न जीवात्मा), अपि = भी; हि = निःसन्देह, दृष्टः = (ज्ञानियोंद्वारा) देखा गया है ॥ ८ ॥ व्याख्या—मनुष्यका हृदय अँगूठेके नापका माना गया है और हृदयमें ही जीवात्माका निवास है। इसलिये उसे अङ्गुष्ठमात्र-अँगूठेके नापका कहा जाता है। उसका वास्तविक स्वरूप सूर्यकी भाँति प्रकाशमय (विज्ञानमय) है। उसे अज्ञानरूपी अन्धकार छूंतक नहीं गया है। वह सङ्कल्प और अहंकार-इन दोनोंसे युक्त हो रहा है, अतः सङ्कल्प आदि बुद्धि- के गुणोंसे अर्थात् अन्तःकरण और इन्द्रियोंके धर्मोंसे तथा अहंता, ममता और आसक्ति आदि अपने गुणोंसे सम्बद्ध होनेके कारण सूजेकी नोकके समान सूक्ष्म आकारवाला है और परमात्मासे भिन्न है। जीवके तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुषोंने गुणोंसे युक्त हुए जीवात्माका स्वरूप ऐसा ही देखा है †। तात्पर्य यह कि आत्माका स्वरूप वास्तवमें अत्यन्त सूक्ष्म है, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म जड पदार्थ उसकी तुलनामें स्थूल ही ठहरता है। उसकी सूक्ष्मता किसी भी जड पदार्थके परिमाणसे नहीं मापी जा सकती। केवल उसका लक्ष्य करानेके लिये उसे सम्बद्ध वस्तुके आकारका बताया जाता है। हृदय-देशमें स्थित होनेके कारण उसे अङ्गुष्ठपरिमाण कहा जाता है और बुद्धिगुण तथा आत्मगुणोंके सम्बन्धसे उसे सूजेकी नोकके आकारका बताया जाता है। बुद्धि आदिको सूईकी नोकके समान कहा गया है, इसीसे जीवात्माको यहाँ सूजेकी नोकके सदृश बताया गया है ॥ ८ ॥ सम्बन्ध-पूर्वमन्त्रमें जो जीवात्माका स्वरूप सूजेकी नोकके सदृश सूक्ष्म बताया गया है, उसे पुन स्पष्ट करते हैं— वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ९॥ वालाग्रशतभागस्य = बालकी नोकके सौवें भागके, च = पुन, शतधा = सौ भागोंमें, कल्पितस्य = कल्पना किये जानेपर, भागः = जो एक भाग होता है, सः = वही (उसीके बराबर), जीवः = जीवका स्वरूप, विज्ञेयः = समझना चाहिये; च = और, सः = वह, आनन्त्याय = असीम भाववाला होनेमे, कल्पते = समर्थ है ॥ ९ ॥ व्याख्या-पूर्वमन्त्रमें जीवात्माका स्वरूप सूजेकी नोकके सदृश सूक्ष्म बताया गया है, उसको समझनेमें भ्रम हो सकता है, अतः उसे भलीभाँति समझानेके लिये पुनः इस प्रकार कहते हैं। मान लीजिये, एक बालकी नोकके हम सौ टुकड़े कर लें, फिर उसमेंसे एक टुकड़ेके पुनः सौ टुकड़े कर लें। वह जितना सूक्ष्म हो सकता है, अर्थात् बालकी नोकके दस हजार भाग करनेपर उसमेंसे एक भाग जितना सूक्ष्म हो सकता है, उसके समान जीवात्माका स्वरूप समझना चाहिये। यह कहना
- छान्दोग्य उपनिषद्में ५। १०। २ से ८ तक और बृहदारण्यक ६। २। १५-१६ में इन तीन मार्गोंका वर्णन आया है। देवयान-मार्गसे जानेवाले ब्रह्मलोकतक जाकर वहाँसे लौटते नहीं, ब्रह्माके साथ ही मुक्त हो जाते हैं, पितृयानसे जानेवाले स्वर्गमें जाकर चिरकालतक वहाँके दिव्य सुखोंका उपभोग करते हैं और पुण्य क्षीण हो जानेपर पुन' मृत्युलोकमें ढकेल दिये जाते हैं, और तीसरे मार्गसे जानेवाले कीट-पतङ्गादि क्षुद्र योनियोंमें भटकते रहते हैं। † गीतामें भी कहा है कि एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जानेवाले, शरीरमें स्थित रहनेवाले अथवा विषयोंको भोगनेवाले इस गुणान्वित जीवात्माको मूर्ख नहीं जानते, ज्ञानरूप नेत्रोंवाले ज्ञानी जानते हैं ( १५। १०)।
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३९५ भी केवल उसकी सूक्ष्मताका लक्ष्य करानेके लिये ही है । वास्तवमें चेतन और सूक्ष्म वस्तुका स्वरूप जड और स्थूल वस्तुकी उपमासे नहीं समझाया जा सकता, क्योंकि बालकी नोकके दस हजार भागोंमेंसे एक भाग भी आकाशमें जितने देशको रोकता है, उतना भी जीवात्मा नहीं रोकता । चेतन और सूक्ष्म वस्तुका जड और स्थूल देहके साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता; वह सूक्ष्म होनेपर भी स्थूल वस्तुमें सर्वत्र व्याप्त रह सकता है । इसी भावको समझानेके लिये अन्तमें कहा गया है कि वह इतना सूक्ष्म होनेपर भी अनन्त भावसे युक्त होनेमें अर्थात् असीम होनेमें समर्थ है । भाव यह कि वह जड जगत्में सर्वत्र व्याप्त है । केवल बुद्धिके गुणोंसे और अपने अहंता, ममता आदि गुणोंसे युक्त होनेके कारण ही एकदेशीय बन रहा है ॥ ९ ॥ नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः । यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते ॥१०॥ एषः = यह जीवात्मा; न = न, एव = तो; स्त्री = स्त्री है; न = न; पुमान् = पुरुष है, च = और; न = न; अयम् = यह, नपुंसकः एव = नपुंसक ही है, सः = वह; यत् यत् = जिस-जिस, शरीरम् = शरीरको, आदत्ते = ग्रहण करता है, तेन तेन = उस-उससे, युज्यते = संवद्ध हो जाता है ॥ १० ॥ व्याख्या—जीवात्मा वास्तवमें न तो स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है । यह जब जिस शरीरको ग्रहण करता है, उस समय उससे संयुक्त होकर वैसा ही बन जाता है । जो जीवात्मा आज स्त्री है, वही दूसरे जन्ममें पुरुष हो सकता है; जो पुरुष है, वह स्त्री हो सकता है । भाव यह कि ये स्त्री, पुरुष और नपुंसक आदि भेद शरीरको लेकर हैं; जीवात्मा सर्वभेदशून्य है, सारी उपाधियोंसे रहित है ॥ १० ॥ सङ्कल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहैर्ग्रासाम्बुवृष्ट्या चात्मविवृद्धिजन्म । कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु रूपाण्यभिसम्प्रपद्यते ॥११॥ सङ्कल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहैः = संकल्प, स्पर्श, दृष्टि और मोहसे; च = तथा; ग्रासाम्बुवृष्ट्या = भोजन, जलपान और वर्षाके द्वारा, आत्मविवृद्धिजन्म = ( प्राणियोंके ) सजीव शरीरकी वृद्धि और जन्म होते हैं; देही = यह जीवात्मा; स्थानेषु = भिन्न-भिन्न लोकोंमें; कर्मानुगानि = कर्मानुसार मिलनेवाले, रूपाणि = भिन्न-भिन्न शरीरोंको, अनुक्रमेण = क्रमसे, अभिसंप्रपद्यते = बार-बार प्राप्त होता रहता है ॥ ११ ॥ व्याख्या—संकल्प, स्पर्श, दृष्टि, मोह, भोजन, जलपान और वृष्टि—इन सबसे सजीव शरीरकी वृद्धि और जन्म होते हैं । इसका एक भाव तो यह है कि स्त्री-पुरुषके परस्पर मोहपूर्वक संकल्प, स्पर्श और दृष्टिपातके द्वारा सहवास होनेपर जीवात्मा गर्भमें आता है; फिर माताके भोजन और जलपानसे बने हुए रसके द्वारा उसकी वृद्धि होकर जन्म होता है । दूसरा भाव यह है कि भिन्न-भिन्न योनियोंमें जीवोंकी उत्पत्ति और वृद्धि भिन्न-भिन्न प्रकारसे होती है । किसी योनिमें तो संकल्पमात्र- से ही जीवोंका पोषण होता रहता है, जैसे कछुएके अंडोंका; किसी योनिमें आसक्तिपूर्वक स्पर्शसे होता है, जैसे पक्षियोंके अंडोंका, किसी योनिमें केवल आसक्तिपूर्वक दर्शनमात्रसे ही होता है, जैसे मछली आदिका; किसी योनिमें अन्नभक्षणसे और जलपानसे होता है, जैसे मनुष्य-पशु आदिका, और किसी योनिमें वृष्टिमात्रसे ही हो जाता है, जैसे वृक्ष-लता आदिका । इस प्रकार नाना प्रकारसे सजीव शरीरोंका पालन-पोषण, तुष्टि-पुष्टिरूप वृद्धि और जन्म होते हैं । जीवात्मा अपने कर्मोंके अनुसार उनका फल भोगनेके लिये इसी प्रकार विभिन्न लोकोंमें गमन करता हुआ एकके बाद एकके क्रमसे नाना शरीरोंको बार-बार धारण करता रहता है ॥ ११ ॥ सम्बन्ध—उसका बार-बार नाना योनियोंमें आवागमन क्यों होता है, इस जिज्ञासापर कहते हैं— स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति । क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः ॥१२॥ देही = जीवात्मा, क्रियागुणैः = अपने कर्मोंके ( संस्काररूप ) गुणोंसे, च = तथा, आत्मगुणैः = शरीरके गुणोंसे ( युक्त होनेके कारण ), स्वगुणैः = अहंता ममता आदि अपने गुणोंके वशीभूत होकर, स्थूलानि = स्थूल, च = और, सूक्ष्माणि =
३९६ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
सूक्ष्म, बहूनि एव=बहुत-से; रूपाणि=रूपों (आकृतियों, शरीरों) को; वृणोति=स्वीकार करता है; तेषाम्=उनके; संयोगहेतुः=संयोगका कारण; अपरः=दूसरा; अपि=भी; दृष्टः=देखा गया है ॥ १२ ॥ व्याख्या-जीवात्मा अपने किये हुए कर्मोंके संस्कारोंसे और बुद्धि, मन, इन्द्रिय तथा पञ्चभूत-इनके समुदाय- रूप शरीरके धर्मोंसे युक्त होनेके कारण अहंता-ममता आदि अपने गुणोंके वशीभूत होकर अनेकानेक शरीर धारण करता है । अर्थात् शरीरके धर्मोंमें अहंता-ममता करके तद्रूप हो जानेके कारण नाना प्रकारके स्थूल और सूक्ष्म रूपोंको स्वीकार करता है-अपने कर्मानुसार भिन्न भिन्न योनियोंमें जन्म लेता है । परंतु इस प्रकार जन्म लेनेमें यह स्वतन्त्र नहीं है; इसके संकल्प और कर्मोंके अनुसार उन-उन योनियोंसे इसका सम्बन्ध जोड़नेवाला कोई दूसरा ही है । वे हैं पूर्वोक्त परमेश्वर, जिन्हें तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंने देखा है । वे इस रहस्यको भलीभाँति जानते हैं । यहाँ कर्मोंके संस्कारोंका नाम क्रिया-गुण है, समस्त तत्त्वोंके समुदायरूप शरीरकी देखना, सुनना, समझना आदि शक्तियोंका नाम आत्मगुण है और इनके सम्बन्धसे जीवात्मामें जो अहंता, ममता, आसक्ति आदि आ जाते हैं-उनका नाम स्वगुण है ॥ १२ ॥ सम्बन्ध-अनादिकालसे चले आने हुए इस जन्म-मरणरूप बन्धनसे छूटनेका क्या उपाय है, इस जिज्ञासापर कहा जाता है- अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१३॥ कलिलस्य=कलिल (दुर्गम संसार) के; मध्ये=भीतर व्याप्त; अनाद्यनन्तम्=आदि-अन्तसे रहित; विश्वस्य स्रष्टारम्=समस्त जगत्की रचना करनेवाले; अनेकरूपम्=अनेकरूपधारी; (तथा) विश्वस्य परिवेष्टितारम्= समस्त जगत्को सब ओरसे घेरे हुए; एकम्=एक (अद्वितीय); देवम्=परमदेव परमेश्वरको; ज्ञात्वा=जानकर; (मनुष्य) सर्वपाशैः=समस्त बन्धनोंसे; मुच्यते=सर्वथा मुक्त हो जाता है ॥ १३ ॥ व्याख्या-पूर्वेमन्त्रमें जिनको इस जीवात्माका नाना योनियोंके साथ सम्बन्ध जोड़नेवाला बताया गया है, जो अन्तर्यामी- रूपसे मनुष्यके हृदयरूप गुहामें स्थित तथा निराकाररूपसे इस समस्त जगत्में व्याप्त हैं, जिनका न तो आदि है और न अन्त ही है अर्थात् जो उत्पत्ति, विनाश और वृद्धि-क्षय आदि सब प्रकारके विकारोंसे सर्वथा शून्य-सदा एकरस रहनेवाले हैं, तथापि जो समस्त जगत्की रचना करके विविध जीवोंके रूपमें प्रकट होते हैं और जिन्होंने इस समस्त जगत्को सब ओरसे घेर रक्खा है, उन एकमात्र सर्वाधार, सर्वशक्तिमान्, सबका शासन करनेवाले, सर्वेश्वर परब्रह्म पुरुषोत्तमको जानकर यह जीवात्मा सदाके लिये समस्त बन्धनोंसे सर्वथा छूट जाता है ॥ १३ ॥ सम्बन्ध-अब अध्यायके उपसहारमें ऊपर कही हुई बातको पुन स्पष्ट करते हुए परमात्माकी प्राप्तिका उपाय बताया जाता है- भावग्राह्यमनीडाख्यं भावाभावकरं शिवम् । कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम् ॥१४॥ भावग्राह्यम्=श्रद्धा और भक्तिके भावसे प्राप्त होने योग्य; अनीडाख्यम्=आश्रयरहित कहे जानेवाले; (तथा) भावाभावकरम्=जगत्की उत्पत्ति और सहार करनेवाले; शिवम्=कल्याणस्वरूप; (तथा) कलासर्गकरम्= सोलह कलाओंकी रचना करनेवाले; देवम्=परमदेव परमेश्वरको; ये=जो साधक; विदुः=जान लेते हैं; ते=वे; तनुम्= शरीरको; (सदाके लिये) जहुः=त्याग देते हैं-जन्म-मृत्युके चक्करसे छूट जाते हैं ॥ १४ ॥ व्याख्या-वे परब्रह्म परमेश्वर आश्रयरहित अर्थात् शरीररहित हैं, यह प्रसिद्ध है, तथा वे जगत्की उत्पत्ति और सहार करनेवाले तथा (प्रश्नोपनिषद् ६।६।४ में बतायी हुई) सोलह कलाओंको भी उत्पन्न करनेवाले हैं। ऐसा होनेपर भी वे कल्याणस्वरूप आनन्दमय परमेश्वर श्रद्धा, भक्ति और प्रेमभावसे पकड़े जा सकते हैं, जो मनुष्य उन परमदेव परमेश्वरको जान लेते हैं, वे शरीरसे अपना सम्बन्ध सदाके लिये छोड़ देते हैं अर्थात् इस संसार-चक्रसे सदाके लिये छूट जाते हैं।
॥ पञ्चम अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३९७ इस रहस्यको समझकर मनुष्यको जितना शीघ्र हो सके, उन परम सुहृद्, परम दयालु, परम प्रेमी, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वेश्वर परमात्माको जानने और पानेके लिये व्याकुल हो श्रद्धा और भक्तिभावसे उनकी आराधनामें लग जाना चाहिये ॥१४॥ ॥ पञ्चम अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥ ❖ अध्याय स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः । देवस्यैष महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ॥ १ ॥ एके = कितने ही; कवयः = बुद्धिमान् लोग; स्वभावम् = स्वभावको; वदन्ति = जगत्का कारण बताते हैं; तथा = उसी प्रकार; अन्ये = कुछ दूसरे लोग; कालम् = कालको जगत्का कारण बतलाते हैं; [ एते ] परिमुह्यमानाः [ सन्ति ] = ( वास्तवमे ) ये लोग मोहग्रस्त हैं (अतः वास्तविक कारणको नहीं जानते ), तु = वास्तवमे तो; एषः = यह; देवस्य = परमदेव परमेश्वरकी, लोके = समस्त जगत्में फैली हुई, महिमा = महिमा है; येन = जिसके द्वारा; इदम् = यह; ब्रह्मचक्रम् = ब्रह्मचक्र; भ्राम्यते = घुमाया जाता है ॥ १ ॥ व्याख्या—कितने ही बुद्धिमान् लोग तो कहते हैं कि इस जगत्का कारण स्वभाव है। अर्थात् पदार्थोंमें जो स्वाभाविक शक्ति है—जैसे अग्निमें प्रकाशन-शक्ति और दाह-शक्ति, वही इस जगत्का कारण है। कुछ दूसरे लोग कहते हैं कि काल ही जगत्का कारण है, क्योंकि समयपर ही वस्तुगत शक्तिका प्राकट्य होता है, जैसे वृक्षमें फल आदि उत्पन्न करनेकी शक्ति समयपर ही प्रकट होती है। इसी प्रकार स्त्रियोंमें गर्भाधान ऋतुकालमें ही होता है, असमयमें नहीं होता—यह प्रत्यक्ष देखा जाता है। परंतु अपनेको पण्डित समझनेवाले ये वैज्ञानिक मोहमें पड़े हुए हैं, अतः ये इस जगत्के वास्तविक कारणको नहीं जानते। वास्तवमे तो यह परमदेव सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी ही महिमा है, जगत्की विचित्र रचनाको देखने और उसपर विचार करनेपर उन्हींका महत्त्व प्रकट होता है। वे स्वभाव और काल आदि समस्त कारणोंके अधिपति हैं और उन्हींके द्वारा यह संसार-चक्र घुमाया जाता है। इस रहस्यको समझकर इस चक्रसे छुटकारा पानेके लिये उन्हींकी शरण लेनी चाहिये। संसार-चक्रकी व्याख्या १। ४ में की गयी है ॥ १ ॥ येनावृतं नित्यमिदं हि सर्वं ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद्यः । तेनेशितं कर्म विवर्तते ह पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखानि चिन्त्यम् ॥ २ ॥ येन = जिस परमेश्वरसे; इदम् = यह, सर्वम् = सम्पूर्ण जगत्; नित्यम् = सदा; आवृतम् = व्याप्त है, यः = जो, ज्ञः = ज्ञानस्वरूप परमेश्वर; हि = निश्चय ही; कालकालः = कालका भी महाकाल; गुणी = सर्वगुणसम्पन्न, (और) सर्वविद्यः = सबको जाननेवाला है, तेन = उससे; ह = ही, ईशितम् = शासित हुआ, कर्म = यह जगत्रूप कर्म, विवर्तते = विभिन्न प्रकारसे यथायोग्य चल रहा है, (और ये) पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखानि = पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश भी ( उसीके द्वारा शासित होते हैं); [ इति = इस प्रकार, ] चिन्त्यम् = चिन्तन करना चाहिये ॥ २ ॥ व्याख्या—जिन जगन्नियन्ता जगदाधार परमेश्वरसे यह सम्पूर्ण जगत् सदा—सभी अवस्थाओंमें सर्वथा व्याप्त है, जो कालके भी महाकाल हैं—अर्थात् जो कालकी सीमासे परे हैं, जो ज्ञानस्वरूप चिन्मय परमात्मा सुहृदता आदि समस्त दिव्य गुणोंसे नित्य सम्पन्न हैं, समस्त गुण जिनके स्वरूपभूत और चिन्मय हैं, जो समस्त ब्रह्माण्डोंको भली प्रकारसे जानते हैं, उन्हींका चलाया हुआ यह जगत्-चक्र नियमपूर्वक चल रहा है। वे ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँचों महाभूतोंपर शासन करते हुए इनको अपना-अपना कार्य करनेकी शक्ति देकर इनसे कार्य करवाते हैं। उनकी शक्तिके बिना ये कुछ भी नहीं कर सकते, यह बात केनोपनिषद्में यक्षके आख्यानद्वारा भलीभाँति समझायी गयी है। इस रहस्यको समझकर मनुष्यको उन सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका उपर्युक्तभावसे चिन्तन करना चाहिये ॥ २ ॥ तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूयस्तत्त्वस्य तत्त्वेन समेत्य योगम् । एकेन द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा कालेन चैवात्मगुणैश्च सूक्ष्मः ॥ ३ ॥
३९८ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * (परमात्माने ही) तत्=उस (जडतत्त्वोंकी रचनारूप), कर्म=कर्मको; कृत्वा=करके; विनिवर्त्य=उसका निरीक्षण कर, भूयः=फिर; तत्त्वस्य=चेतन तत्त्वका, तत्त्वेन=जड तत्त्वसे, योगम्=सयोग; समेत्य=कराके, वा=अथवा यों समझिये कि, एकेन=एक (अविद्या) से, द्वाभ्याम्=दो (पुण्य और पापरूप कर्मों) से, त्रिभिः=तीन गुणोंसे; च=और, अष्टभिः=आठ प्रकृतियोंके साथ, च=तथा, कालेन=कालके साथ, एव=और, सूक्ष्मैः आत्मगुणैः= आत्मसम्बन्धी सूक्ष्म गुणोंके साथ, [ एव=भी, ] [ योगम् समेत्य=इस जीवका सम्बन्ध कराके ] (इस जगत्की रचना की है) ॥ ३ ॥ व्याख्या—परमेश्वरने ही अपनी शक्तिभूता मूलप्रकृतिसे पाँचों स्थूल महाभूत आदिकी रचनारूप कर्म करके उसका निरीक्षण किया, फिर जड तत्त्वके साथ चेतन तत्त्वका सयोग कराके नाना रूपोंमें अनुभव होनेवाले विचित्र जगत्की रचना की।* अथवा इस प्रकार समझना चाहिये कि एक अविद्या, दो पुण्य और पापरूप सचित कर्म-सस्कार, सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण और एक काल तथा मन, बुद्धि, अहकार, पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये आठ प्रकृतिभेद, इन सनसे तथा अहता, ममता, आसक्ति आदि आत्मसम्बन्धी सूक्ष्म गुणोंसे जीवात्माका सम्बन्ध कराके इस जगत्की रचना की । इन दोनों प्रकारके वर्णनोंका तात्पर्य एक ही है ॥ ३ ॥ सम्बन्ध—इस रहस्यको समझकर साधकको क्या करना चाहिये, इस जिज्ञासापर कहा जाता है— आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि भावांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः । तेषामभावे कृतकर्मनाशः कर्मक्षये याति स तत्त्वतोऽन्यः ॥४॥ यः=जो साधक; गुणान्वितानि=सत्त्वादि गुणोंसे व्याप्त; कर्माणि=कर्मोंको, आरभ्य=आरम्भ करके; (उनको) च=तथा, सर्वान्=समस्त, भावान्=भावोंको; विनियोजयेत्=परमात्मामें लगा देता है—उसीके समर्पण कर देता है, (उसके इस समर्पणसे) तेषाम्=उन कर्मोंका, अभावे=अभाव हो जानेपर; (उस साधकके) कृतकर्मनाशः=पूर्वसंचित कर्म-समुदायका भी सर्वथा नाश हो जाता है, कर्मक्षये=(इस प्रकार) कर्मोंका नाश हो जानेपर, सः=वह साधक; याति=परमात्माको प्राप्त हो जाता है, (क्योंकि वह जीवात्मा) तत्त्वतः= वास्तवमें, अन्यः=समस्त जड-समुदायसे भिन्न (चेतन) है ॥ ४ ॥ व्याख्या—जो कर्मयोगी सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंसे व्याप्त अपने वर्ण, आश्रम और परिस्थितिके अनुकूल कर्तव्यकर्मोंका आरम्भ करके उनको और अपने सब प्रकारके अहता, ममता, आसक्ति आदि भावोंको उस परब्रह्म परमेश्वरमें लगा देता है, उनके समर्पण कर देता है, उस समर्पणसे उन कर्मोंके साथ साधकका सम्बन्ध न रहनेके कारण वे उसे फल नहीं देते । इस प्रकार उनका अभाव हो जानेसे पहले किये हुए सचित कर्म-सस्कारोंका भी सर्वथा नाश हो जाता है। इस प्रकार कर्मोंका नाश हो जानेसे वह तुरत परमात्माको प्राप्त हो जाता है; क्योंकि यह जीवात्मा वास्तवमें जड-तत्त्वसमुदायसे सर्वथा भिन्न एव अत्यन्त विलक्षण है। उनके साथ इसका सम्बन्ध अज्ञानजनित अहता-ममता आदिके कारण ही है, स्वाभाविक नहीं है ॥ ४ ॥ सम्बन्ध—कर्मयोगका वर्णन करके अब उपासनारूप दूसरा साधन बताया जाता है— आदिः स संयोगनिमित्तहेतुः परस्त्रिकालादकलोऽपि दृष्टः। तं विश्वरूपं भवभूतमीड्यं देवं स्वचित्तस्थमुपास्य पूर्वम् ॥ ५॥ सः=वह, आदिः=आदि कारण (परमात्मा), त्रिकालात् परः=तीनों कालोंसे सर्वथा अतीत; (एव) अकलः= कलारहित (होनेपर), अपि=भी, संयोगनिमित्तहेतुः=प्रकृतिके साथ जीवका सयोग करानेमें कारणोंका भी कारण; दृष्टः=देखा गया है, स्वचित्तस्थम्=अपने अन्तःकरणमें स्थित; तम्=उस; विश्वरूपम्=सर्वरूप, (एव) भवभूतम्=
- इसका वर्णन तैत्तिरीय उपनिषद् (ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवाक १ और ६) में, ऐतरेयोपनिषद् (अध्याय १ के तीनों खण्डों) में, छान्दोग्योपनिषद् (अध्याय ६, खण्ड २-३) में और बृहदारण्यकोपनिषद् (अध्याय १, ब्राह्मण २ ) में भी विस्तारपूर्वक आया है।
- श्वेताश्वतरोपनिषद् * ३९९ जगत्रूपमें प्रकट, ईड्यम्=स्तुति करने योग्य, पूर्वम्=पुराणपुरुष, देवम् उपास्य=परम देव (परमेश्वर) की उपासना करके (उसे प्राप्त करना चाहिये) ॥ ५ ॥ व्याख्या-वे समस्त जगत्के आदि कारण सर्वशक्तिमान् परमेश्वर तीनों कालोंसे सर्वथा अतीत हैं। उनमें कालका कोई भेद नहीं है, भूत और भविष्य भी उनकी दृष्टिमें वर्तमान ही है। वे (प्रश्नोपनिषद्में बतायी हुई) सोलह कलाओंसे रहित होनेपर भी अर्थात् संसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित होते हुए भी प्रकृतिके साथ जीवका संयोग करानेवाले कारणके भी कारण हैं। यह बात इस रहस्यको जाननेवाले ज्ञानी महापुरुषोंद्वारा देखी गयी है। वे ही एकमात्र स्तुति करने योग्य हैं। उन्हें ढूँढनेके लिये कहीं दूर जानेकी आवश्यकता नहीं है। वे हमारे हृदयमें ही स्थित हैं। इस बातपर दृढ विश्वास करके सब प्रकारके रूप धारण करनेवाले तथा जगत्रूपमें प्रकट हुए, सर्वाधार, सर्वशक्तिमान् परम देव पुराणपुरुष परमेश्वरकी उपासना करके उन्हें प्राप्त करना चाहिये ॥ ५ ॥ सम्बन्ध-अब ज्ञानयोगरूप तीसरा साधन बताया जाता है- स वृक्षकालाकृतिभिः परोऽन्यो यस्मात्प्रपञ्चः परिवर्ततेऽयम् । धर्मावहं पापनुदं भगेशं ज्ञात्वात्मस्थममृतं विश्वधाम ॥ ६ ॥ यस्मात्=जिससे, अयम्=यह; प्रपञ्चः=प्रपञ्च (संसार); परिवर्तते=निरन्तर चलता रहता है, सः=वह (परमात्मा); वृक्षकालाकृतिभिः=इस संसारवृक्ष, काल और आकृति आदिसे, परः=सर्वथा अतीत; (एव) अन्यः=भिन्न है; (उस) धर्मावहम्=धर्मकी वृद्धि करनेवाले, पापनुदम्=पापका नाश करनेवाले, भगेशम्=सम्पूर्ण ऐश्वर्यके अधिपति; (तथा) विश्वधाम=समस्त जगत्के आधारभूत परमात्माको, आत्मस्थम्=अपने हृदयमें स्थित; ज्ञात्वा=जानकर, (साधक) अमृतम् [प्रति]=अमृतस्वरूप परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥ व्याख्या-जिनकी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे यह प्रपञ्चरूप संसार निरन्तर घूम रहा है-प्रवाहरूपसे सदा चलता रहता है, वे परमात्मा इस संसार-वृक्ष, काल और आकृति आदिसे सर्वथा अतीत और भिन्न हैं। अर्थात् वे संसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित, कालका भी ग्रास कर जानेवाले एव आकाररहित हैं। तथापि वे धर्मकी वृद्धि एव पापका नाश करनेवाले, समस्त ऐश्वर्योंके अधिपति और समस्त जगत्के आधार हैं। यह सम्पूर्ण विश्व उन्हींके आश्रित है, उन्हींकी सत्तासे टिका हुआ है। अन्तर्यामीरूपसे वे हमारे हृदयमें भी हैं। इस प्रकार उन्हें जानकर ज्ञानयोगी उन अमृतस्वरूप परमात्माको प्राप्त हो जाता है ॥६॥ सम्बन्ध-पहले अध्यायमें जिनका वर्णन आया है, वे ध्यानके द्वारा प्रत्यक्ष करनेवाले महात्मालोग कहते हैं- तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् । पतिं पतीनां परमं परस्ताद्विदाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥ ७ ॥ तम्=उस, ईश्वराणाम्=ईश्वरोंके भी; परमम्=परम, महेश्वरम्=महेश्वर, देवतानाम्=सम्पूर्ण देवताओंके, च=भी; परमम्=परम, दैवतम्=देवता, पतीनाम्=पतियोंके भी, परमम्=परम, पतिम्=पति, (तथा) भुवनेशम्= समस्त ब्रह्माण्डके स्वामी, (एव) ईड्यम्=स्तुति करनेयोग्य, तम्=उस, देवम्=प्रकाशस्वरूप परमात्माको, (हमलोग) परस्तात्=सबसे परे, विदाम=जानते हैं ॥ ७ ॥ व्याख्या-वे परब्रह्म पुरुषोत्तम समस्त ईश्वरोंके-लोकपालोंके भी महान् शासक हैं, अर्थात् वे सब भी उन महेश्वरके अधीन रहकर जगत्का शासन करते हैं। समस्त देवताओंके भी वे परम आराध्य हैं, समस्त पतियों-रक्षकोंके भी परम पति हैं तथा समस्त ब्रह्माण्डोंके स्वामी हैं। उन स्तुति करनेयोग्य प्रकाशस्वरूप परम देव परमात्माको हमलोग सबसे पर जानते हैं। उनसे पर अर्थात् श्रेष्ठ और कोई नहीं है। वे ही इस जगत्के सर्वश्रेष्ठ कारण हैं और वे सर्वरूप होकर भी सबसे सर्वथा पृथक हैं ॥ ७ ॥ न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ ८॥
३०० * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * तस्य=उसके; कार्यम्= (शरीररूप) कार्य; च=और; करणम्=अन्तःकरण तथा इन्द्रियरूप करण; न=नहीं; विद्यते=है, अभ्यधिकः=उससे बढ़ा, च=और; तत्समः= उसके समान; च=भी; (दूसरा) न=नहीं; दृश्यते= दीखता; च=तथा; अस्य=इस परमेश्वरकी; ज्ञानबलक्रिया=ज्ञान, बल और क्रियारूप; स्वाभाविकी=स्वाभाविक; परा=दिव्य; शक्तिः=शक्ति; विविधा=नाना प्रकारकी; एव=ही; श्रूयते=सुनी जाती है ॥ ८ ॥ व्याख्या-उन परब्रह्म परमात्माके कार्य और करण-शरीर और इन्द्रियाँ नहीं हैं। अर्थात् उनमें देह, इन्द्रिय आदिका भेद नहीं है। तीसरे अध्यायमें यह बात विस्तारपूर्वक बतायी गयी है कि वे इन्द्रियोंके बिना ही समस्त इन्द्रियोंका व्यापार करते हैं। उनसे बड़ा तो दूर रहे, उनके समान भी दूसरा कोई नहीं दीखता; वास्तवमे उनसे भिन्न कोई है ही नहीं। उन परमेश्वरकी ज्ञान, बल और क्रियारूप स्वरूपभूत दिव्य शक्ति नाना प्रकारकी सुनी जाती है ॥ ८ ॥ न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् । स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ॥९॥ लोके=जगत्में; कश्चित्=कोई भी, तस्य=उस परमात्माका; पतिः=स्वामी; न=नहीं; अस्ति=है; ईशिता= उसका शासक, च=भी; न=नहीं है; च=और; तस्य=उसका; लिङ्गम्=चिह्नविशेष भी; न एव=नहीं है; सः=वह; कारणम्=सबका परम कारण; (तथा) करणाधिपाधिपः=समस्त करणोंके अधिष्ठाताओंका भी अधिपति है; कश्चित्= कोई भी; न=न; च=तो; अस्य=इसका, जनिता=जनक है; च=और; न=न; अधिपः=स्वामी ही है ॥ ९॥ व्याख्या-जगत्में कोई भी उन परमात्माका स्वामी नहीं है। सभी उनके दास और सेवक हैं। उनका शासक- उनपर आज्ञा चलानेवाला भी कोई नहीं है। सब उन्हींकी आज्ञा और प्रेरणाका अनुसरण करते और उनके नियन्त्रणमें रहते हैं। उनका कोई चिह्नविशेष भी नहीं है, क्योंकि वे सर्वत्र परिपूर्ण, निराकार हैं। तथा वे सबके परम कारण-कारणोंके भी कारण और समस्त अन्तःकरण और इन्द्रियोंके अधिष्ठातृ-देवताओंके भी अधिपति-शासक हैं। इन परब्रह्म परमात्माका न तो कोई जनक-अर्थात् इन्हें उत्पन्न करनेवाला पिता है और न कोई इनका अधिपति ही है। ये अजन्मा, सनातन, सर्वथा स्वतन्त्र और सर्वशक्तिमान् हैं ॥ ९ ॥ यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः स्वभावतो देव एकः स्वमावृणोत् । स नो दधाद्ब्रह्माप्ययम् ॥ १० ॥ तन्तुभिः=तन्तुओं द्वारा, तन्तुनाभः इव=मकड़ीकी भाँति; यः एकः देवः=जिस एक देव (परमात्मा) ने; प्रधानजैः=अपनी स्वरूपभूत मुख्य शक्तिसे उत्पन्न अनन्त कार्योंद्वारा, स्वभावतः=स्वभावसे ही; स्वम्=अपनेको; आवृणोत्=आच्छादित कर रक्खा है; सः=वह परमेश्वर; नः=हमलोगोंको, ब्रह्माप्ययम्=अपने परब्रह्मरूपमे आश्रय; दधात्=दे ॥ १० ॥ व्याख्या-जिस प्रकार मकड़ी अपनेसे प्रकट किये हुए तन्तुजालसे स्वय आच्छादित हो जाती है-उसमें अपनेको छिपा लेती है, उसी प्रकार जिन एक देव परमपुरुष परमेश्वरने अपनी स्वरूपभूत मुख्य एव दिव्य अचिन्त्यशक्तिसे उत्पन्न अनन्त कार्योंद्वारा स्वभावसे ही अपनेको आच्छादित कर रक्खा है, जिसके कारण संसारी जीव उन्हें देख नहीं पाते, वे सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्मा हमलोगोंको सबके परम आश्रयभूत अपने परब्रह्मस्वरूपमें स्थापित करें ॥ १० ॥ एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥११॥ एकः=(वह) एक; देवः=देव ही; सर्वभूतेषु=सब प्राणियोंमें; गूढः=छिपा हुआ; सर्वव्यापी=सर्वव्यापी; (और) सर्वभूतान्तरात्मा=समस्त प्राणियोंका अन्तर्यामी परमात्मा है; कर्माध्यक्षः=(वही) सबके कर्मोंका अधिष्ठाता; सर्वभूताधिवासः=सम्पूर्ण भूतोंका निवासस्थान, साक्षी=सबका साक्षी; चेता=चेतनस्वरूप, केवलः=सर्वथा विशुद्ध; च=और; निर्गुणः=गुणातीत है ॥ ११ ॥