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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ
श्रीरणयकांड३७९

शासक हुए, उनमें अधर्मी राजाओ ने कभी सुख नही पाया। इस ससार मे कौन चिरकाल तक जीवित रहनेवाला है। सब मिट जानेवाले ही तो हैं?

उस वीर (राम) से जिसने अपने वाण से मेरे भाई (सुबाहु) को और मेरी माता (ताड़का) को मार डाला और जिसके निकट खड़े रहनेवाले उनके भाई से मेरा सारा पराक्रम मिट गया, उनके स्मरण से ही मेरा व्याकुल मन काँप उठता है। राम के ऐसे पराक्रम से मै बहुत चिन्तित हूँ।

हम इस सत्य को प्रत्यक्ष देखते हैं कि सब स्थावर तथा जगम पदार्थ अस्थिर हैं, नष्ट होनेवाले हैं, अतः हे तात! कोई नीच कार्य करने का विचार न करो। मेरी बात सुनो, अपनी महान् समृद्धि के साथ तुम चिरकाल तक जियो। इस प्रकार, मारीच ने (रावण से) कहा।

यह सुनकर रावण अपनी भयंकर आँखो मे आग उगलने लगा। उसकी भौंहि तन गई; बहुत क्रुद्ध होकर उसने कहा—तुम कहते हो कि मेरी ये पराक्रमी सुन्दर भुजाएँ, जिन्होने गंगा को अपनी जटा में धारण करनेवाले (शिव) को उनके कैलास के सहित, एक हथेली पर उठाया था, अब एक मनुष्य से पराजित होनेवाली हैं।

अभी जो घटना हुई, उसके वारे में तुमने नही सोचा, पर निःसंकोच होकर मेरी निंदा की। जिन्होने मेरी वहन के मुँह में एक गढ़ा-सा खोद डाला हो, उन (मनुष्यो) की तुमने प्रशसा की, यह तुम्हारा एक अपराध है। फिर भी, मैने इसके लिए क्षमा कर दिया।

तब मारीच, यह सोचकर भी कि उसके ऊपर क्रोध करनेवाला वह निर्भीक (रावण) उनके वचनों को सुनकर पुनः क्रुद्ध होगा - चुप नही रहा। किन्तु, फिर कहा—तुम्हारा यह क्रोध मुझ पर नही है, किंतु यह स्वय तुम पर ही है और तुम्हारे कुल पर है।

यदि तुम यह सोचते हो कि तुमने कैलास पर्वत को उठाया था, तो यह भी तो सोचो कि जब जनक ने (राम से कहा कि यह धनुष शिवजी के द्वारा झुकाया हुआ पर्वत ही है, तुम इसे चढ़ाओ, तो राम ने एक क्षण में अनायास ही उस (धनुष) को हाथ मे उठा लिया और उस पर डोरी चढ़ाने के निमित्त उसे झुकाकर तोड़ दिया। वह पर्वताकार शिव-धनुष गगन को छूनेवाला मेरु-पर्वत ही तो था।

तुम (राम के प्रभाव के बारे मे) कुछ नही जानते हो। मेरे वचन को भी स्वीकार नही करते हो। वह (राम), युद्ध के लिए सन्नद्ध होकर पुष्पमाला धारण करे, इसके पूर्व ही, उसके शत्रुओ के प्राण लुट जाते हैं। तुमने मूढ़ता से यह समझ रखा है कि वह (सीता) एक मानव-स्त्री मात्र है। क्या वह, सीता का अपना रूप है? वह तो राक्षसो के पाप के परिणाम की ही प्रतिमूर्ति है।

मेरे मन मे, यह सोचकर कि (यदि तुम सीता का हरण करोगे, तो) तुम अपने बंधुओ-सहित मिट जाओगे, नही बच सकोगे, ऐसी धड़कन उत्पन्न हो रही है, जैसे नगाडा बज रहा हो। इसका तुम विचार नही करते। अज्ञान में पड़कर जो विष पीने जा रहा हो, उससे उसके समीप रहनेवाले ज्ञानी व्यक्ति, क्या यह कहेंगे कि यह कार्य ठीक है?

३८० कम्ब रामायण

उग्र तथा कलंक-रहित विश्वामित्र के द्वारा प्रदत्त अनेक ऐसे शस्त्र राम की आज्ञा में हैं, जो शिव आदि देवों के लोकों को तथा सब भुवनों को भी क्षण काल में विध्वस्त कर सकते हैं।

जिस परशुराम ने एक सहस्र बलिष्ठ हाथोंवाले (कार्त्तवीर्य अर्जुन) को अपने परसे से क्षण काल में काटकर ढेर कर दिया था, उस (परशुराम) की सारी शक्ति को, उसके दृढ़ धनुष के साथ ही, राम ने अपने वश में कर लिया था। क्या वैसा बल हमारे लिए प्राप्त करना संभव है ?

काम-पीडा के बढ़ जाने से तुम दुर्बल हो गये हो। अतः, तुमने ऐसे वचन कहे। यह कार्य विनाशकारी है। मैं तुम्हारा मामा हूँ और तुम्हारे कुल का वृद्ध पुरुष हूँ। मैं कहता हूँ, हे तात ! यह पाप-कार्य छोड़ दो।—इस प्रकार मारीच ने कहा।

राक्षसराज ने, अपने कथन के बारे में किंचित् विचार करने का परामर्श देने-वाले उस मारीच का धिक्कार करते हुए कहा—तुम, अपनी माता को मारनेवाले उस (राम) से डरकर जी रहे हो। क्या तुम्हें एक वीर पुरुष मानना उचित है ?

स्वर्गवाली देवी के निवासों को भस्म करके मैं सब लोकों पर इस प्रकार शासन-चक्र चलाता हूँ कि दिग्गज सब भयभीत होकर भागकर छिप गये हैं और देवता भी दुर्दशा-ग्रस्त हो गये हैं। क्या ऐसे मुझको दशरथ के वे पुत्र कष्ट दे सकेंगे ?—यह मेरी शक्ति भी अच्छी है !

मैं त्रिभुवन का एकच्छत्र राज्य वहन करता हूँ। यदि मुझे कोई शक्तिशाली शत्रु प्राप्त हो, तो उससे बढ़कर मेरे आनंद का विषय कोई दूसरा नहीं होगा। मेरी आज्ञा के अनुसार तुम्हें कार्य करना है। राजा के कार्य-संपादन करनेवाले मंत्री के कर्त्तव्य से क्या तुम स्खलित हो जाओगे ?

अगर तुम मेरी आज्ञा का अतिक्रमण करोगे, तो मैं तीक्ष्ण करवाल से तुम्हें काट दूँगा। किन्तु, अपने इच्छित कार्य को पूर्ण किये बिना नहीं रहूँगा। यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो इन घृणास्पद वचनों को छोड़कर मेरे मन की बात करो। यों रावण ने कहा।

राक्षसराज के यह वचन कहने पर, मारीच ने मन में विचार किया—जिसके मन में गर्व उत्पन्न होता है, वह उसी समय मिट जाता है। यही कथन सत्य है। लोग मन में काम-वासना उत्पन्न होने पर, उसी कामना पर प्राण छोड़ने के लिए भी तैयार हो जाते हैं—और वह तपाये हुए पात्र में डाले गये जल के जैसे ही, उफनकर, भीतर शांत हो गया। वह फिर कहने लगा—

तुम्हारे हित की कामना से मैंने यथार्थ बात कही। होनेवाले अपने किसी अहित को सोचकर और उससे डरकर मैंने कुछ नहीं कहा। विनाश का काल आ जाता है, तो भला भी बुरा लगता है। हे क्षुद्र स्वभाववाले ! बताओ, मुझे क्या करना है ? यों मारीच ने कहा।

मारीच के यह कहते ही रावण ने अपना क्रोध शान्त कर उसका आलिंगन किया

अरण्यकाण्ड ३८१

और कहा—पर्वत के समान पुष्ट कंधोंवाले। मन्मथ के उग्र बाणों से मरने की अपेक्षा राम के बाण से मरना ही कीर्त्तिदायक है न ? अतः, मंद मारुत से मेरे हृदय में काम उत्पन्न करनेवाली (सीता) को ला दो।

रावण के यह वचन कहते ही मारीच बोला—(मेरी माँ को मारनेवाले) राम से अपना बदला लेने के लिए मैं एक बार, दो-एक राक्षसों को साथ लेकर तपोवन में गया था। तब राम के बाणों से मेरे साथी मरकर गिर पड़े। भयभीत होकर मैं भाग आया। ऐसा मैं इस समय क्या कार्य कर सकता हूँ ? बताओ।

मारीच की बातें सुनकर रावण ने कहा तुम्हारी माता को मारनेवाले इस राम के प्राण हरने के लिए मैं तैयार हूँ। तुम्हारा यह प्रश्न कि मैं जाकर क्या करूँ, उचित ही है। हमारा कर्त्तव्य माया से धोखा देकर उस सीता का अपहरण करना ही है।

मारीच ने कहा—हे राजन् ! अब मैं और क्या कह सकता हूँ ? उस (राम) की देवी को पराक्रम से हरण करना उचित है। धोखे से हरण करना नीच कार्य है। तुम (राम से) युद्ध करके, विजय पाकर सीता को अपना लो और अपने प्रताप को बढाओ। ऐसा करना नीतिशास्त्र के अनुकूल होगा।

अपने हित-चिंतक (मारीच) का कथन सुनकर रावण हँस पड़ा और बोला - उन मनुष्यों को जीतने के लिए क्या सेना की भी आवश्यकता है ? क्या मेरे विशाल हाथ का करवाल पर्याप्त नहीं है ? फिर भी, सोचने की बात यह है कि यदि वे दोनों मनुष्य मर जायेंगे, तो वह नारी (सीता) एकाकिनी होकर अपने प्राण त्याग देगी न ? अतः, धोखे से उस नारी का हरण करना ही ठीक है।

यह सुनकर मारीच ने सोचा—मैं ऐसा उपाय बताता हूँ कि राम की देवी का स्पर्श करने के पूर्व ही इस (रावण) के शिर (राम के) बाणों से बिखर जायें, पर यह मेरी बात नहीं मानता। अब मेरे जीवित रहने का कोई मार्ग नहीं है। विधि के परिणाम को कौन जान सकता है ? अब इसकी आज्ञा का पालन करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है।

फिर उस (मारीच) ने कहा—अब मुझे कैसी माया रचनी है, बताओ। रावण ने कहा—तुम एक सोने के हिरण का रूप धारण कर लो और उस सीता के मन को ललचाओ। मारीच वैसा करने की सम्मति प्रकट करके चल पड़ा। उज्ज्वल शूलधारी राक्षसराज (रावण) भी दूसरे मार्ग से चला गया।

मारीच, पूर्वकाल में राम के बाण का प्रभाव जान चुका था। अतः, वह स्वयं हरिण का रूप लेकर वहाँ जाना नहीं चाहता था। किंतु, रावण की वैसी आज्ञा होने के कारण वह गया। अब उसके मन की दशा और उसके व्यापारों का वर्णन करेंगे।

मारीच का मन, अपने बन्धुओं का स्मरण करके दुःखी होता। वह वीर राम-लक्ष्मण से भयभीत होकर चक्कर खाता। गहरे तालाब का पानी विषमय हो जाय, तो उसमे रहनेवाली मछली जिस प्रकार विकल होती है, उसी प्रकार मारीच का मन भी व्याकुल हुआ। उसकी दशा का अनुमान करना भी कठिन है।

३८२ | कंब रामायण

विश्वामित्र के यज्ञ के समय राम से पीड़ित होकर और (दंडकारण्य में) पहले एक बार हरिण-वेष में जाकर भी जो मरा नहीं, वह मारीच अब तीसरी बार प्रयत्न करता हुआ राघव के आश्रम में जा पहुँचा।

उसने ऐसे एक स्वर्ण-हरिण का रूप धारण किया, जिसकी अनुपम उज्ज्वल देह की कांति से गगन और धरती भी प्रकाशित हो उठी। उत्तम हरिणी-समान सीता के मन में आकर्षण उत्पन्न करने के विचार से वह (पर्णकुटी के पास) गया।

किसी पर आसक्ति नहीं रखनेवाले मन तथा कपट से युक्त वेश्याओ की ओर जिस प्रकार सब कामुक व्यक्ति आकृष्ट होते हैं, उसी प्रकार उस स्वर्ण-हरिण की ओर सब प्रकार के हरिण आकृष्ट होकर उसको घेरकर चले।

उसी समय सीतादेवी, अपने अति सुन्दर कंकण-भूषित कोमल कर-कमलों से पुष्प-चयन करती हुई, इस प्रकार वहाँ चली आईं कि देखनेवालों के मन में यह संदेह उत्पन्न होने लगा कि इसके कटि है या नहीं।

जिसपर विपदा आनेवाली होती है, वे स्वप्न में ऐसे रूपों को देखते हैं, जिनका विचार तक वे अपने मन में कभी नहीं लाये होंगे। इसी प्रकार, सीता देवी ने, जिनको, इसके पूर्व कभी किसी को न प्राप्त हुई बड़ी विपदा आनेवाली थी, उस माया-मृग को देखा।

रावण की आयु अब समाप्त होनेवाली थी, और उसकी मृत्यु से धर्म की सुरक्षा होनेवाली थी। अतः, सीता उस (माया-मृग) को देखकर, यह नहीं जानती हुई कि यह धोखा है, उसके न चाहने योग्य सौंदर्य पर मुग्ध हो गई ?

वह हिरण ज्यों ही अर्धचंद्र समान ललाटवाली सीता के सम्मुख आकर खड़ा हुआ, त्यों ही वह (सीता) उसके प्रति अत्यधिक आकर्षण से भरकर, इस विचार से कि राम से उस हरिण को पकड़ लाने को कहे, मत्वर विजयी धनुर्धारी (राम) के निकट जा पहुँची।

सीता ने हाथ जोड़कर राम से कहा—हमारे आश्रम में अति उत्तम स्वर्णमय, दूर तक अपना प्रकाश फेंकनेवाला, माणिक्य तथा रत्नमय सुदृढ खुरों और कर्णों से शोभाय-मान एक हरिण आया है। वह अत्यन्त दर्शन-मधुर है।

ऐसा हरिण संसार में कहीं नहीं हो सकता, – ऐसा किंचित् भी विचार किये बिना ही, हमारे प्रभु और कमलभव के पिता (विष्णु के अवतारभूत) राम, हरिण-तुल्य देवी की बात सुनकर उमंग से भर गये।

यह मुझे चाहिए—यों अपनी देवी के कहने पर, राम ने यह नहीं कहा कि यह (हरिण) चाहने योग्य नहीं है। किन्तु, यह कहा कि आभरणधारी, स्वर्णलता-तुल्य हे देवि! हम उस हरिण को देखेंगे। तब अनुज लक्ष्मण ने उनका मनोभाव जानकर उस समय एक वचन कहा—

(उस हरिण के) स्वर्णमय देह है, माणिकमय पैर, पूँछ और कान हैं और वह कुदकता है—यों कहने से यह स्पष्ट है कि वह कोई मायामय मृग है। हे प्रभु! इसके विपरीत उसे यथार्थ मृग मानना ठीक नहीं है।

अरण्यकाण्ड ३८३

तब राम ने कहा— हे मेरे अनुज ! यथार्थ विवेक से सब कुछ जाननेवाले व्यक्ति भी इस अस्थिर संसार की दशा को पूरा-पूरा नहीं जान सकते ; इस संसार में अनेक सहस्र कोटि प्राणी हैं। अतः, संसार में कोई वस्तु असंभव है—ऐसी बात नहीं है।

तुम्हारा मन क्या कहता है ? हम अपने कानों से सृष्टि की विचित्र वस्तुओं के बारे में सुनते हैं। क्या तुम नहीं जानते कि पूर्वकाल में सात स्वर्णमय हंस¹ पैदा हुए थे ?

सृष्टि के प्राणियों की कोई रूप-व्यवस्था या कोई सीमा नहीं है। यों राम ने अपने भाई से कहा। इतने में मुग्धा (सीता) देवी चिन्ता करने लगीं कि वह स्वर्ण-मृग वन के भागों में जाकर कहीं अदृश्य न हो जाय।

इस प्रकार चिन्ता करनेवाली देवी का मनोभाव जानकर, अंजन-पर्वत सदृश प्रभु, यह कहते हुए कि हे आभरणों से भूषित देवि ! कहाँ है वह हरिण ? मुझे दिखाओ। चल पड़े। मुखरित वीर वलयधारी अनुज (लक्ष्मण) अपने भ्राता का यह कार्य देखकर चिन्तामग्न हो, उनके पीछे-पीछे चले। उसी समय अवश्यंभावी विधि के विधान के समान आया हुआ वह माया-मृग सम्मुख दिखाई पड़ा।

सम्मुख दिखाई पड़नेवाले उस हरिण को देखकर रामचन्द्र अपनी सूक्ष्म बुद्धि से कुछ विचार न करके कह उठे—अहो ! यह तो बहुत सुन्दर है। उन (सर्वज्ञ राम) के इस प्रकार कहने का कारण क्या था ? विष्णु ने सर्पशय्या को छोड़कर धरती पर (राम के रूप में) अवतार लिया था, तो वह देवताओं के पुण्यफल के परिणामस्वरूप ही तो था ? वह (भाग्य) क्या व्यर्थ होगा ? (अर्थात्, देवताओं के भाग्य-परिपाक के कारण ही रामचंद्र मायामृग को पकड़ने के लिए तैयार हुए थे।)

फिर, श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा—हे भाई ! इसे देखो। इसका उपमान क्या हो सकता है ? इसका उपमान यह स्वयं है। इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उपमान नहीं है। इसके दाँत उज्ज्वल मुक्ता-तुल्य हैं। हरी घास पर बढ़ाई गई इसकी जीभ बिजली के सदृश है। इसकी देह रक्त स्वर्ण के तुल्य है जिसपर चाँदी की-सी चित्तियाँ शोभित हो रही हैं।

हे दृढ धनुर्धारी ! इस हरिण की सुन्दरता को देखने पर स्त्री हो या पुरुष,—कौन इसपर मुग्ध नहीं होगा ? रेंगनेवाले और उड़नेवाले सब प्राणी इसे देखकर पिघल उठते हैं और इस प्रकार आकर घेर लेते हैं, जिस प्रकार दीपक पर पतंग आकर गिरते हैं।


१. एक कथा प्रसिद्ध है कि पूर्वकाल में भरद्वाज मुनि के सात पुत्र मानससरोवर पर योग-साधना करते थे। किसी कारण से वे योगभ्रष्ट हो गये और दूसरे जन्म में कौशिक ऋषि के पुत्र होकर उत्पन्न हुए। उस जन्म में एक दिन अत्यन्त क्षुधा से पीड़ित होकर उन्होंने अपने गुरु गर्ग महर्षि की गाय को मारकर खा डाला। किन्तु, खाने के पूर्व पितरों का श्राद्ध कर उन्हें तृप्त किया। इस पाप के कारण उन्हें अनेक योनियों में जन्म लेना पड़ा। किन्तु, पितरों को तृप्त करने के पुण्यफल से उन्हें सब जन्मों में अपने पूर्वजन्मों का स्मरण बना रहता था। एक बार वे सात स्वर्णहंस होकर जनमे थे। कदाचित् इसी कथा की ओर इस पद्य में संकेत है।—अनु०

३८४ | कंब रामायण

आर्य (राम) के इस प्रकार कहने पर लक्ष्मण ने उस हरिण को देखकर यह स्पष्ट रूप से जान लिया कि यह (हरिण) सच्चा नहीं है। फिर कहा—हे सुरभित तथा सुन्दर मालाधारी। यह हरिण स्वर्ण का भले ही हो, तो भी इससे हमें क्या प्रयोजन है? अतः, हमें अपने स्थान पर लौट जाना ही उचित है।

लक्ष्मण के ये वचन समाप्त करने के पूर्व ही उस अतिरूपवती (सीता) ने अनघ (रामचंद्र) को देखकर कहा—हे चक्रवर्त्ती-पुत्र ! मन को आकृष्ट करनेवाले इस हरिण को शीघ्र पकड़ लाओ। जब हम (वनवास की) अवधि पूरा करके नगर को लौटेंगे, तब यह खेलने के लिए अत्यंत उपयुक्त होगा।

'है या नहीं'—यों संदेह उत्पन्न करनेवाली कटि से युक्त (सीता) के यह कहने पर प्रभु उस हरिण को पकड़ने के लिए सन्नद्ध हुए, यह देखकर स्पष्ट विवेकवाले भाई (लक्ष्मण) ने उनसे निवेदन किया—हे भ्राता ! आप सोचकर जान सकते हैं कि हमें धोखा देने के लिए राक्षसों के द्वारा भेजा गया यह मायामय मृग है।

तब देवताओं के कष्टों को दूर करने के लिए अवतीर्ण प्रभु ने उत्तर दिया—यदि यह मायामृग ही है, तो भी मेरे बाण से यह मरेगा। मैं उस दशा में एक क्रोधी (क्रूर) राक्षस का वध करने का कर्त्तव्य पूरा करूँगा। यदि यह यथार्थ हरिण है तो इसे पकड़कर लाऊँगा। इन दोनों बातों में कोई भी अनुचित नहीं।

इसपर लक्ष्मण ने फिर कहा—हे वज्रसदृश दृढ़ तथा अतिसुन्दर कंधोंवाले। इस (हरिण) के पीछे किस प्रकार के राक्षस छिपे हैं—यह हमें विदित नहीं है। उनकी माया कैसी है—इससे भी हम परिचित नहीं हैं। यह हरिण क्या है—यह भी हमने समझा नहीं है। नीति-निष्ठ महाजनों ने जिस आखेट को घृणित और वर्ज्य कहा है, उसे करना कीर्त्तिकारक नहीं होता।

यह सुनकर चतुर्मुख के पिता (विष्णु के अवतार, राम) ने अपने उत्तम भाई से कहा—राक्षस वैर रखनेवाले हैं। उनकी संख्या अपार है। उनकी माया प्रभूत है—इन बातों को सोचकर ही क्या हम अपने व्रत को छोड़ दें? यह हास्यास्पद बात होगी। अतः, (हरिण) को पकड़ने का यह कार्य उचित ही है।

तब लक्ष्मण ने कहा—हे भ्राता। योग्य कार्यों को ठीक सोच-समझकर करना उचित है। इस (हरिण) को पकड़ लाने के लिए मैं जाऊँगा। इसे यहाँ भेजकर इसके पीछे छिपे रहनेवाले राक्षस असंख्य भी क्यों न हों, उन सबको मैं अपने धनुष पर अनेक तीक्ष्ण बाण चढ़ाकर मिटा दूँगा। यदि यह मायामय मृग न हो, तो इसे पकड़कर ले आऊँगा?

उस समय हरिणी-तुल्य उस (सीता) ने, गद्गदकंठ से शुकी की जैसी अमृत-वर्षिणी वाणी में कहा—हे नाथ ! क्या तुम स्वयं जाकर इस (हरिण) को नहीं पकड़ लाओगे? फिर रक्त रेखाओं से संयुक्त नीलोत्पल-जैसे अपने नयनों से मोती जैसे अश्रु-बिंदु बरसाती हुई और मान करती हुई पर्णशाला की ओर चल पड़ी।

इस प्रकार जानेवाली सीता का रोष देखकर रक्षक प्रभुने (लक्ष्मण से) कहा—

अरण्यकाण्ड ३८५

हे सुन्दरमाला-भूषित। इस हरिण को मैं स्वयं पकड़कर शीघ्र लौट आऊँगा। वन में रहनेवाली कलापी-समान सीता की रक्षा करते हुए तुम यहाँ रहो—यों कहकर वरछे-जैसे तीक्ष्ण बाण और धनुष लेकर सत्वर चल पड़े।

तब लक्ष्मण ने यह कहकर कि पहले (विश्वामित्र के) यज्ञ के समय आये हुए तीन राक्षसों में से (अर्थात्, ताड़का, सुबाहु और मारीच—इनमें से) एक राक्षस हमसे बचकर निकल गया था। हे प्रभु! मेरा अनुमान है कि उस समय बचकर भागा हुआ मारीच ही इस रूप में अब यहाँ आया है। आप सत्य को देखेंगे। जाइए। आपकी जय हो। लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार किया और लक्ष्मी-तुल्य सीता के निवास-भूत कुटीर के बाहर पहरा देने हुए खड़े रहे।

पर्वत-समान उन्नत कंधोंवाले रामचंद्र ने अपने विवेकवान् भाई के वचनों पर ध्यान नहीं दिया और पूर्णचंद्र का उपमान बननेवाले सुन्दर मुख से शोभित (सीता) देवी के मान का स्मरण करते हुए, सिंदूर और प्रवाल के जैसे रक्तवर्ण अपने मुँह पर संसंधान भरकर उस हरिण का पीछा करते हुए चल पड़े।

वह हरिण मंद-मट पैर रखता हुआ कभी चलता, कभी स्थिर खड़ा होता। फिर, घबराकर झपटता और कभी कान खड़े करके अपने खुरों को वज्र से सटाता हुआ उछल पड़ता एव अपनी गति से प्रभंजन और मन को भी मानों नवीन गति सिखाने लगता।

राम ने, त्रिभुवन को नापनेवाले अपने पैर को उठाकर आगे रखा। क्या उस चरण की पहुँच से परे रहनेवाला कोई लोक भी हो सकता है ? यो राम ने (उस हरिण का) पीछा किया। उन राम के उस समय के वेग के बारे में इनसे अधिक क्या कह सकते हैं कि उन्होंने अपनी अनुपम सर्वव्यापिता को प्रकट किया ?

वह (हरिण) पर्वत पर चढ़ता, मेघों के मध्य कूद पड़ता। उसका पीछा करने पर वह बहुत दूर भाग जाता। उसका पीछा करना छोड़कर विलंब करें, तो इतना निकट आ जाता कि हाथ बढ़ाकर उसे छू सकें। स्थिर खड़ा हुआ-सा दिखता; किन्तु झट उछलकर भाग जाता। इस प्रकार, वह (हरिण), धन पर ललचानेवाली वारनारियों के मन के समान सचरण करता। अहो !

तब उदार स्वभाववाले प्रभु ने विचार किया—इस (हरिण) का रूप कुछ है और इसके कार्य कुछ और हैं। पहले ही मेरे अनुज ने जो सोचा, वह ठीक ही लगता है। यदि मैं ठीक-ठीक विचार करता, तो इसके पीछे नहीं आता। राक्षसों की माया के कारण ही मुझे यह क्लेश उठाना पड़ रहा है।

इतने में वह मायावी राक्षस यह सोचकर कि यह (राम) अब मुझे पकड़ेगा नहीं, किंतु अपने बाण से मुझे परलोक में भेजने की बात सोच रहा है—अतिवेग से गगन में उड़ गया।

उसी क्षण प्रभु ने भी अपने चक्रायुध के समान अवार्य एक रक्तवर्ण बाण को यह आज्ञा देकर छोड़ा कि यह हरिण जहाँ भी जाये, वहाँ उसका पीछा करता हुआ जा और उसके प्राण हर ले।

३८६ कंब रामायण

वह दीर्घ, तीक्ष्ण तथा पत्राकार बाण, उस मायावी के वक्ष में जा लगा। तुरन्त वह (मारीच) अपने खुले मुँह से (हा लक्ष्मण ! हा सीते ! कहकर) पुकार उठा और अष्ट दिशाओं और उनसे परे भी प्रतिध्वनि करता हुआ एक पर्वत के जैसे गिर पड़ा।

ज्योही वह क्रूर राक्षस अपने यथार्थ रूप में मरकर गिरा, त्योही राम अपने उस भाई के बारे में, जिसने उस (हरिण को पकड़ने के) प्रयत्न को अहितकारी बताया था, सोचने लगे—मेरा वह भाई चतुर है। मेरे प्राणों के समान प्रिय है। मेरा वह चतुर अनुज मेरा उद्धार करनेवाला है।

फिर, रामचंद्र ने उस मारीच की देह को निकट जाकर देखा, जो दिगंत को अपनी पुकार से प्रतिध्वनित करता हुआ गिरा था, और स्पष्ट रूप से यह जान लिया कि वह वही मारीच है, जो पहले कलंक-रहित विश्वामित्र के महायज्ञ के समय आया था।

फिर, यह सोचकर वे (राम) चिंतित हुए कि दारुण बाण ज्योही उसके वक्ष में लगा, वह अपनी माया से मेरे कंठ स्वर का अनुकरण करके पुकार उठा। वह ध्वनि सुनकर मेघ-समान नयनोंवाली (सीता) देवी चिंतित हुई होगी।

मेरा भाई इस (हरिण) को देखते ही समझ गया था कि यह मायावी मारीच है। वह मेरे पराक्रम को समझने की बुद्धि रखता है। अतः, इस (मारीच) की पुकार के यथार्थ तत्त्व को (सीता को) वह समझा देगा। यो विचार कर राम स्वस्थचित्त हुए।

फिर, यह विचार कर कि यह (मारीच) केवल मरने के उद्देश्य से ही यहाँ नहीं आया होगा, हो न हो, कोई षड्यन्त्र करने का उपाय करके ही आया है, इसकी पुकार से कोई हानि उत्पन्न होने की संभावना है, अतः, ऐसी कोई विपदा उत्पन्न होने के पूर्व ही पर्णशाला को लौट जाना उचित है। रामचंद्र लौट पड़े। (१-२५२)


अध्याय ८

सीता-हरण पटल

शंखों से पूर्ण अनुपम समुद्र के जैसे सुन्दर स्वरूपवाले (राम) के संबंध में हमने वर्णन किया। अब सुरभिपूर्ण पुष्पालंकृत केशोंवाली लता-सदृश (सीता) देवी के सम्बन्ध में कहेंगे।

मारीच ने अपने दाँत पीसकर, अपने कंदरा के समान मुँह को खोलकर जो करुण पुकार की थी, वह ज्योही सीता के कानों में पड़ी त्योही वह वृक्ष पर से धरती पर गिरी हुई कोयल के समान व्याकुल होकर छाती पीटती हुई मूर्च्छित हो गई।

घने कुंतलोंवाली वह (सीता) देवी अवलंब से छूटी हुई लता के समान, और वज्र-ध्वनि के श्रवण से भयभीत हुए सर्प के समान मूर्च्छित होकर धरती पर लोट गई। फिर,

अरण्यकाण्ड ३८७

(संज्ञा पाकर) रोती हुई कहने लगी—हा ! मैने अज्ञान में पड़कर हरिण को पकड़कर लाने की बात कही और उसके फल-स्वरूप अपने जीवन-सर्वस्व को खो बैठी।

फिर, सीता ने लक्ष्मण से कहा—कलंक-रहित शुभगुणों से पूर्ण हमारे प्रभु, राक्षस की माया से विपदा-ग्रस्त हो गये हैं—यह विषय जानने के पश्चात् भी उनके भाई, तुम अभी तक मेरे निकट ही खड़े हो ? क्या यह उचित है ?

तब उस सत्यनिष्ठ (लक्ष्मण) ने समझाया—क्या आपका यह कथन उचित है कि इस लघु संसार में राम से भी अधिक पराक्रमी व्यक्ति है ? स्त्रीजनोचित बुद्धि के कारण ही आपने ऐसा कहा है।

हे स्त्रीत्व-गुण से पूर्ण देवि ! सप्त समुद्र, चतुर्दश भुवन, सप्त कुलपर्वत, इन सब प्रदेशों के निवासियो के क्षुद्र बल से क्या युद्ध मे राघव का विशिष्ट पराक्रम कभी घट सकता है ? (अर्थात्, कम नही हो सकता है।)

भूमि, जल, पवन, आकाश और अग्नि नाम के जो पदार्थ हैं, वे सब उन (राम) के क्रोध करने पर घबरा उठते हैं। मेघ-सदृश काले वर्णवाले उन कमल-नयन को आपने क्या समझा है, जो आप इस प्रकार व्याकुल हो रही हैं ?

क्या रामचंद्र निशाचरों से परास्त एव विपदा-ग्रस्त होकर दुहाई देंगे ? यदि कभी उन्हें वैसी दुहाई देनी भी पड़े, तो सारा ब्रह्मांड अस्तव्यस्त हो जायगा और ब्रह्मा प्रभृति सब जीव विनष्ट हो जायेंगे।

(उनके बल के विषय में) और क्या कहा जाय ? हमारे प्रभु रामचन्द्र, जिन्होंने भयकर त्रिपुरों को जला देनेवाले और भूमि और स्वर्ग के निवासियों के द्वारा प्रशंसित शिवजी के धनुष को तोड़ दिया था, उनके बल की अपेक्षा अधिक बल क्या किसी में हो सकता है।

(हमारे) रक्षक (राम) यदि ऐसी दशा को प्राप्त हुए होते, जैसा आपने सोचा है, तो तीनों लोक विध्वस्त हो गये होते। देव और मुनि मिट गये होते। उत्तम धर्म भी विनष्ट हो गया होता।

अधिक कहने की क्या आवश्यकता है ? महिमामय प्रभु ने वहाँ पर शर का प्रयोग किया है। उससे आहत होकर वह राक्षस वह दुहाई दे रहा है। उसके लिए आप द्रवीभूत होकर चिन्तित मत हों। निश्चिन्त होकर रहे।—यों लक्ष्मण ने कहा।

लक्ष्मण के इस प्रकार कहने पर, सीता का क्रोध और उबल उठा। उसे मरण की-सी वेदना होने लगी। उसका मन अत्यधिक घबरा उठा। वह निष्करुण होकर, लक्ष्मण के प्रति कठोर शब्द कहने लगी कि तुम्हारा यों खड़ा रहना नीति-मार्ग के अनुकूल नही है।

एक दिन का भी परिचय होने पर सच्चे बधु (अपने मित्र की सहायता के लिए) अपने प्राण तक देने को सन्नद्ध हो जाते हैं। किन्तु, तुम अपने ज्येष्ठ भ्राता को विपदा-ग्रस्त जानकर भी निर्भय हो स्थिर खडे हो। मेरे लिए (इनसे बुरी) और क्या गति हो सकती है ? अब मै अग्नि में गिरकर अपने प्राण का त्याग करूँगी।

३८८कंब रामायण

कमल के उद्यान में विहार करनेवाला हंस जिस प्रकार धुआँधार दावाग्नि में कूदने जाता हो, उसी प्रकार का कार्य करने के लिए प्रस्तुत (सीता) देवी की बातों को सुनकर उनकी रक्षा के लिए धनुष धारण करनेवाले (लक्ष्मण) ने उनके छोटे चरण-कमलों के सम्मुख धरती पर गिरकर साष्टांग नमस्कार किया। फिर बोला—

आप प्राण-त्याग करना क्यों चाहती हैं? आपकी बातों से मैं भयभीत हो रहा हूँ। (आपकी आज्ञा का) मैं उल्लंघन नहीं कर सकता हूँ। आप दुःख-मुक्त होकर यहीं रहें। यह दास जा रहा है। कठोर विधि-विधान को कौन रोक सकता है?

यह दास जा रहा है, कुछ अहित होने को है। आप कह रही हैं कि मैं प्रभु की आज्ञा का उल्लंघन कर यहाँ से जाऊँ। (मेरे जाने पर) आप अकेली रह जायेंगी। इसलिए सावधान रहिए।—यों कहकर उसस मन के साथ विदा होकर लक्ष्मण वहाँ से चलने लगे।

उस समय लक्ष्मण यह विचार करते हुए चले कि यदि मैं यहीं रहूँ, तो ये अग्नि में गिरेंगी। यदि मैं पर्वत-सदृश प्रभु के निकट जाऊँ, तो इनकी रक्षा न होने से कुछ अहित होगा। मुझे अपने प्राणों पर भी आसक्ति है। अब मैं क्या करूँ?—इस प्रकार सोचकर लक्ष्मण बहुत व्याकुल हुए।

यदि हो सके, तो धर्म से अहित को रोका जा सकता है। अझ मैं, जो पूर्वकर्म के परिणाम के फलस्वरूप इस प्रकार का जन्म पाकर यहाँ आकर इस विपदा में ग्रस्त हुआ हूँ, इन सीता की मृत्यु का कारण बनूँ—इससे तो यही उत्तम है कि मैं इस स्थान से हट जाऊँ।

फिर, सीता से कहा—मैं जा रहा हूँ। यदि (अहित) घटित हुआ, तो खगराज (जटायु) अपनी शक्ति-भर आपकी रक्षा करेगा। (यह कहकर) देवताओं के पुण्य-प्रभाव से महिमामय वह पुरुष-श्रेष्ठ (लक्ष्मण) उसी मार्ग से चल पड़ा, जिससे राम गये थे।

लक्ष्मण के वहाँ से जाते ही खड्ग-दांतोंवाला रावण, जो अवसर की ताक में छिपा बैठा था, अपनी वंचना को सफल बनाने के उद्देश्य से बाँस का त्रिदंड लिये अंतरशत्रुओं (अर्थात्, काम, क्रोध और मोह) के बंधनों से मुक्त हुए तपस्वी का वेष धारण करके आया।

उपवास रखनेवाले के समान उसकी देह दुर्बल थी। बहुत दूर तक पैदल चलकर आनेवाले के समान उसमें थकावट दिखाई पड़ती थी। नृत्य के संगीत के जैसे ही अति शुद्ध तथा वीणागान के समान मधुर शैली में (साम) वेद का गान करता हुआ वह (रावण) आया।

वह इस प्रकार मन्द-मन्द चलता था, जैसे पुष्पों की शय्या पर चल रहा हो। वह अपना पद इस प्रकार रखता था, मानों अग्नि-कणों पर चल रहा हो। उसके हाथ और पैर अनियंत्रित रूप से काँप रहे थे और उसमें अतिवार्धक्य दिखाई पड़ रहा था।

वह कमल के बीजों की एक जप-माला हाथ में लिये हुए था। उसके पास कूर्माकार एक आसन भी था। उसका शरीर झुका हुआ था। उसके वक्ष पर यज्ञोपवीत

अरयण्यकांड ३८६

शोभायमान था। इस वेष में वह, पवित्र अन्तःकरणवाली उस अरुंधती (के समान पति-व्रत्यवाली सीता) के आवास-भूत कुटीर के समीप आ पहुँचा।

देवताओं को भी मुग्ध करनेवाला (सन्यासी का) वेष धारण करके वह (रावण) उस कलकरहित पर्णशाला के द्वार पर पहुँचा और गलित कंठ से बोला—इस कुटीर में कौन है ?

कलापी-तुल्य वह देवी, यह सोचकर कि कपट-रहित मनवाले कोई तपस्वी आये हैं, इक्षुरस-समान मधुर स्वर में यह कहती हुई कि 'पधारिए ! पधारिए !' इस प्रकार उसके सम्मुख आ खड़ी हुई, जैसे कोई प्रवाल-लता हो।

उस (रावण) ने, लावण्य के भी लावण्य, यश के आगार और शील की मर्यादा उस देवी को अपनी आँखों से देखा और मदस्रावी मत्तगज के समान स्वेद से भरकर, लालसा-रूपी वीचियों से पूर्ण कामना-समुद्र में डूब गया।

अशिथिल कोकिल स्वर से युक्त, देव-स्त्रियों से भी उत्तम रूपवाली वह (सीता) देवी ज्योही उसके सम्मुख प्रकट हुई, उस (रावण) के विरह-तप्त मनकी क्या दशा हुई—इसके बारे में क्या वर्णन करे ? उसकी शक्तिशाली भुजाएं फूल उठी और फिर कृश हो गई।

उसकी नयन-पंक्ति, वन-मयूर जैसी (सीता) के सौंदर्य के दर्शन से, पुष्पों के समृद्ध मधु का छककर पान करके गानेवाले भ्रमरों के समान आनंद से मत्त हो उठी—ऐसा कहने में क्या बड़ाई होगी ? उसके मन के जैसे ही उसकी आँखें भी आनंदित हो गईं।

वह (रावण) यह सोचता हुआ कि अरुण-कमल के समान को तजकर मेरे ये बीस नयन यहाँ आई हुई इस सुन्दरी के रत्न-कांति से युक्त लावण्य को देखने के लिए क्या पर्याप्त हैं ? हाय ! मेरे एक हजार अपलक आँखें नहीं हैं।—व्याकुल हो खड़ा रहा।

उसने सोचा—कलाइयों पर कंकण-पंक्तियों से शोभित होनेवाली इस नारी-रत्न के साथ क्रीडा करते हुए आनंद के अपार समुद्र में निमग्न होने के लिए क्या कठोर तपस्या के प्रभाव से प्राप्त, साढ़े तीन करोड़ वर्ष की मेरी आयु भी पर्याप्त होगी।

(फिर, उसने सोचा) अब मैं इस सुन्दरी को तीनों लोकों की सम्राज्ञी बना दूँगा। सब सुर और, असुर अपनी पत्नियों के साथ इसकी सेवा में निरत रहकर जीवन व्यतीत करेंगे। और, मैं भी इसकी सेवा करता हुआ रहूँगा।

(उसने यह भी विचार किया) दुःख के समय में ही जब इसका मुख इतना लावण्यपूर्ण है, तब किंचित् दंत-प्रकाश से युक्त मदहास फैलने पर इसका मुख कितना मनोहर लगेगा ? मैं अपनी उस बहन (शूर्पणखा) को, जिसने इस पुष्प-भरित कुंतलोंवाली का अन्वेषण कर मुझे इसकी पहचान दी है, अपना राज्य दे दूँगा।

वह (रावण) उस स्थान पर आकर इसी प्रकार के विविध विचार करता हुआ मन में अनुचित इच्छा भरकर खड़ा रहा। उसे देखकर अस्खलित शीलवाली सीता ने अपने अश्रु पोछ लिये और कहा कि इस आसन पर आप आसीन हो जायें। (और एक आसन डाल दिया।)

३६०कंब रामायण

सीता ने उसका स्वागत करके एक वेत्रासन डालकर उसपर आसीन होने को कहा। तब अपने बड़े त्रिदंड को पार्श्व में रखकर वह कपटी सन्यासी उस सुन्दर पर्णशाला में बैठ गया। उस समय—

पर्वत और वृक्ष थरथरा उठे। कठोर पापकर्म करनेवाले उस राक्षस को देखकर पक्षी भी मौन हो रहे। मृग भयभीत हुए। सर्प अपने फन को समेटकर कहीं छिप गये।

आसन पर बैठने के पश्चात् उसने (सीता से) प्रश्न किया—यह कौन-सा स्थान है? यहाँ निवास करनेवाले तपस्वी कौन हैं? इसके उत्तर में विशाल नयनोंवाली वह देवी, यह सोचती हुई कि यह कोई निष्कपट सन्यासी है, जो इस स्थान के लिए अजनबी है, कहने लगी—

हे महात्मा ! दशरथ के प्रसिद्ध कुल में उत्पन्न उन प्रभु का नाम आपने सुना होगा, जो उत्तम कुल-जात अपनी माता की आज्ञा को शिरोधार्य करके अपने भाई के साथ बिना किसी दुःख के इस स्थान में आकर रहते हैं।

फिर, रावण ने प्रश्न किया मैने (यह समाचार) सुना है, किन्तु उन्हें (अर्थात्, राम को) मैंने देखा नहीं है। गंगा के समृद्ध जल से सिंचित (कोशल) देश को एकबार गया हूँ। नील कुवलय और बरछे के जैसे नयनोंवाली तुम किनकी सुपुत्री हो, जो अपने अमूल्य समय को इस अरण्य में व्यतीत कर रही हो?

तब कलंकहीन शीलवती उस (सीता) देवी ने उत्तर दिया—अनघ मार्ग पर चलनेवाले हे यतिवर ! मैं उन जनक की पुत्री हूँ, जिनका मन आप (जैसे मुनियों) के अतिरिक्त अन्य देवता का ध्यान भी नहीं करता। मेरा नाम जानकी है। मैं काकुत्स्थ की पत्नी हूँ।

फिर, उत्तम आभरण-भूषित सीता ने पूछा—आप अत्यंत वृद्ध हैं। कर्मभोग से मुक्ति पाने की इच्छा रखनेवाले आप कहाँ से इस समय, इस कठोर वन-मार्ग को पार करके आये हैं?

तब रावण कहने लगा (ऐसा एक व्यक्ति है), जो इन्द्र का भी इन्द्र है (अर्थात्, इन्द्र से भी बढ़कर प्रभावशाली); (चित्र में) अंकित करने के लिए असाध्य सौंदर्य से युक्त है। चतुर्मुख (ब्रह्मा) के वंश में उत्पन्न है, स्वर्ग-सहित सब लोकों पर शासन करनेवाला है और जिसकी जिह्वा वेदों के मंत्रों का आवास है।

जो ऐसी शक्तिवाला है कि उसने पूर्वकाल में शिवजी के निवासभूत महान् कैलासगिरि को जड़-सहित उखाड़ लिया था। जिसको भुजाएँ ऐसी हैं कि (उन भुजाओं ने) दिशाओं को वहन करनेवाले गजों पर आघात करके उनके दाँतों को चूर-चूर कर दिया था।

जिसके द्वार के रक्षक स्वयं देवता हैं। जिसकी महिमा का गान करने की शक्ति शब्दों में नहीं है। जिसके अधीन कल्पतरु आदि देवलोक की सब विभूतियाँ हैं। जिसका सुन्दर विश्राम-स्थान गम्भीर समुद्र से आवृत स्वर्णमय लंका नगरी है।

जिसके वैभव से आकृष्ट होकर सुन्दर मन्दहास से युक्त तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ

अरण्यकाण्ड ३६१

स्वर्गलोक को छोड़कर (उसकी लंका में) आ गई हैं और (उसकी सेवा में रहकर) उसके पानदान उठाना, (उसके) पैर सहलाना, उसकी पादरक्षा लाना इत्यादिकार्य करती रहती हैं।

चन्द्रमा और सूर्य, उसके मन को देखकर (उसके अनुसार) संचरण करते हैं। दिव्यकांति से युक्त इन्द्र आदि देवता, इस लोक में स्थित उसके मेघस्पर्शी प्रासाद की रख-वाली करते हैं।

इस धरती पर स्थित उसकी उस लंकापुरी में, जो स्वर्णमय अमरावती, मनोहर नागलोक की राजधानी और इस विशाल भूलोक के सब नगरों से बढ़कर सुन्दर है, रहने-वाली सब वस्तुएँ दोषरहित हैं।

कमलभव (ब्रह्मा) के द्वारा दिये गये वर के प्रभाव से वह अनन्त आयुवाला है। वह अपने विशाल कर में, अर्धाङ्ग में अपनी स्त्री को धारण करनेवाले (शिवजी) के द्वारा प्रदत्त करवाल रखता है। उसने सब ग्रहों को कारागार में बन्दी बना रखा है। वह सब गुणों में महान् है।

वह क्रूरता से रहित सदाचरणवाला है। विस्तृत शास्त्र-ज्ञान से युक्त है। तटस्थ स्वभाववाला है (अर्थात्, पक्षपात से हीन बुद्धिवाला है)। उसका यौवन ऐसा है कि उसे देखकर मन्मथ भी (आश्चर्य में) स्तब्ध रह जायें। सब लोकों के निवासी जिन त्रिदेवों को अपने देवता मानते हैं, उन (त्रिमूर्तियों) की समस्त शक्ति से वह संपन्न है।

सब लोकों में रहनेवाली असंख्य सुन्दरियाँ उसकी कृपा को प्राप्त करने की लालसा रखती हैं। उसका ध्यान करती हुई वे सुन्दरियाँ कृश होती रहती हैं। तो भी वह उन सब की उपेक्षा करके अपने हृदय को सुख करनेवाली एक रमणी को खोज रहा है।

इस प्रकार के पुरुष द्वारा शासित उस वैभव-पूर्ण नगरी में कुछ दिन निवास करने की इच्छा से मैं वहाँ गया। दीर्घकाल तक वहीं रह गया। अब उस (पुरुष) से दूर होने की इच्छा न होते हुए भी किसी-न-किसी प्रकार वहाँ से चलकर इस स्थान में आया हूँ।—यों उस मायावी ने कहा।

तब सीता ने उस कपट-संन्यासी से पूछा—अपने शरीर को भी भार माननेवाले हे मुनि श्रेष्ठ ! वेदों तथा उन वेदों के ज्ञाताओं की कृपा की कामना न करके, लालच के साथ प्राणियों को खानेवाले उन क्रूरकर्मा राक्षसों के नगर में जाकर आप क्यों रहे?

अरण्य में स्थित महातपस्वियों के समीप जाकर आप नहीं रहे; जल-संपत्ति से परिपूर्ण देशों में निवास करनेवाले पवित्र स्वभाववालों के ग्रामों में जाकर भी आप नहीं रहे। किन्तु, धर्म का स्मरण तक नहीं करनेवाले राक्षसों के मध्य जाकर रहे। यह आपने क्या किया?—इस प्रकार सीता ने कहा।

उस मर्यादाहीन (अर्थात्, धर्म की मर्यादा से परे रहनेवाले) ने यौवनवती देवी के कथन को सुना और उनकी निष्कपटता को देखा, जो यह कहते हुए भी कि वे राक्षस कठोर नेत्रवाले और भयङ्कर खड्गवाले हैं—भयविह्वल हो रही थीं। फिर, यों उत्तर दिया—हे चन्द्रमुखि ! राक्षस देवताओं के समान क्रूर नहीं हैं। हम जैसे व्यक्तियों के लिए वे अच्छे ही हैं।

३६२कंब रामायण

उसके यह कहने पर सुन्दर आभरण-भूषित सीता यह न जानने से कि माया में चतुर राक्षस कामरूपी है, उसपर कुछ संदेह न करती हुई बोली— पापियों से स्नेह करनेवाले लोग पवित्र नहीं होते। विचार करने पर यही कहना पड़ेगा कि वे भी (अर्थात्, पापियों से स्नेह रखनेवाले भी) उस पाप के भागी होते हैं।

तब रावण ने यह आशंका करके सीता कदाचित् उसपर संदेह कर रही है, उस संदेह को दूर करने के विचार से दूसरे ढंग से कहा कि तीनों लोकों के विवेकी पुरुषों के लिए उन बलशाली राक्षसों के स्वभाव के अनुकूल रहने के अतिरिक्त अन्य क्या आचरण संभव हो सकता है?

(दूसरों की) मनोदशा को पहचाननेवाले उस मायावी के यह कहने पर सद्‌गुणों में बड़ी हुई देवी ने कहा—धर्म के रक्षक उदार गुणवाले वे (रामचन्द्र) जबतक इस अरण्य में तपस्साधना करते रहेंगे, तबतक पाप-कर्म से जीनेवाले राक्षस अपने बंधु-सहित मर मिटेंगे। उसके पश्चात् संसार के कष्ट भी मिट जायेंगे।

हरिण-समान उस सीता के यह कहते ही वह (रावण) बोल उठा—हे मीन-जैसे चमकते नयनोंवाली! यदि मनुष्य, राक्षसों का समूल नाश करनेवाले हों तो (इसका अर्थ यह हुआ कि) एक छोटा खरगोश हाथियों के झुंड को मार देगा और एक हिरण का बच्चा वक्र नखोंवाले सिंह को मार देगा।

तब सीता ने कहा—घनीभूत विद्युत्-पुंज-जैसे केशोंवाले विराध तथा क्रोध के ताप से भरे मनवाले विजयी खर आदि राक्षसों के (राम हाथों) मरने का समाचार कदाचित् आपने नहीं सुना है। यह कहकर राम को उस समय जो क्लेश उठाना पड़ा था, उसका स्मरण करके वह देवी आँखों से अश्रु की वर्षा करने लगी।

फिर, आगे उन देवी ने कहा—आप कल ही देखेंगे कि प्रतापी सिंह-सदृश मेरे प्रभु से लंका के निवासी अपने कुल-सहित कैसे मिटते हैं और देवों की उन्नति कैसे होती है। क्या अधारणीय धर्म को पाप जीत सकता है? आप, दोषहीन मुनिवर क्या यह नहीं जानते?

वह रावण, जिसका मांसल शरीर (सीताजी की) मधुमिश्रित अमृत-जैसी अति मृदुल वाणी के उसके कानों में पड़ने से फूल उठा था, अब इस वचन को सुनकर कि मानव अधिक बलवान् है, अभिमान के उमड़ने से क्रोध से भर गया।

उस क्रोधी ने कहा—एक मनुष्य ने (अर्थात्, राम ने) धनुर्बल में क्षुद्र उन राक्षसों को मारा। यदि तुम इस बात की बड़ाई करती हो, तो कल ही तुम इसका परिणाम देखोगी कि (रावण की) बीस भुजाओं की हवा-मात्र लगने से वह मनुष्य (अर्थात्, रामचन्द्र) सेमर की रूई के जैसे उड़ जायगा।

निरर्थक वचन कहनेवाली हे मुग्धे! यदि मेरु पर्वत को उखाड़ना हो, ब्रह्मांड के खप्पर को तोड़ देना हो, समुद्र के जल को आलोड़ित करना हो, अथवा पृथ्वी को उठा लेना हो, इस प्रकार के अनेक कार्य करने हों, तो भी रावण के लिए ये सब सुलभ हैं। उसके लिए कौन-सा कार्य कठिन हो सकता है? तुमने क्या समझकर ये बातें कही हैं?

इस समय सीता के मन में संदेह उत्पन्न हुआ कि यह कर्म के द्वन्द्व से मुक्त मुनि

अरण्यकाण्ड ३६३

नहीं है। फिर, यह सोचती हुई खड़ी रही कि यह कौन हो सकता है ? इतने मे वह कपट सन्यासी ऐसा बन गया जैसा कोई विषधर कालमप क्रोधानल से उत्तप्त होकर अपना फन फैलाकर खड़ा हो गया हो।

(राम के वियोग से) पहले से ही अत्यन्त विषण्ण वह देवी, इस समय जिम प्रकार के दुःख मे निमग्न हुई, यदि उसके बारे में विचार करें, तो विदित होगा कि इससे बढ़कर अन्य कोई कही दुःख हो ही नहीं सकता। उन देवी के पास ऐसा कोई शब्द नही रहा, जिसे वे धीरज के साथ उम राक्षस को कह सकें। उनसे कोई काम भी करते नही बनता था। वे इस प्रकार विकम्पित हुईं, जिस प्रकार यम के आने पर प्राण काँपने लगते हैं।

तब रावण ने कहा—देवता लोग भी मेरी सेवा करते हे। ऐसे मेरे पराक्रम को तुमने नही जाना और (तुमने) मिट्टी के कीड़े-जैसे जीनेवाले मनुष्य को बलवान् कहा। तुम स्त्री हो, अतः बच गई, नहीं तो मैं तुमको पीसकर खा डालता। पर यदि वैसा करने का विचार भी करूँ, तो मेरे प्राण मिट जायेगे—(अर्थात्; तुम्हे मार डालूँगा, तो तुम्हारे वियोग में मैं भी मर जाऊँगा, अतः तुम्हें नहीं मारूँगा)।

हे हंसिनि ! भयविकम्पित मत होओ। जो मेरे मिर इसके पहले किसी के सामने नहीं झुके, उनपर वारी-वारी से, मुकुट के समान तुम्हे वहन करके मै आनंदित होऊँगा। असंख्य आभरणो से भूषित देव-सुन्दरियाँ तुम्हारी चरण-सेवा करेंगी। यों तुम चतुर्दश भुवन की सम्राज्ञी बनकर रहोगी।

ये वचन सुनते ही सीता ने झट अपने कर-पल्लवो से कानो को वन्द कर लिया। फिर कहा—अरे राक्षस ! मनोहर तथा भयंकर धनुष को धारण करनेवाले उनके कर, तथा विजय से शोभायमान काकुत्स्थ के प्रति अनन्य प्रेम तथा पातिव्रत्य रखनेवाली मेरे प्रति तू ने ससार के उत्तम धर्म की उन्नति के लिए प्रज्वलित वह्नि मे पवित्र ऋषियो के द्वारा देने योग्य हवि को खाने की इच्छा करनेवाले कुत्ते-जैसे (होकर), क्या कहा ?

घास की नोक पर रहनेवाली ओस की बूँद के जैसे क्षण-भगुर जो प्राण हैं, उनके खो जाने के भय से क्या मै उत्तम कुल के योग्य आचरण को त्याग दूँगी ? यह संभव नही। यदि तू अपने प्राणो की रक्षा करना चाहता है, तो बिजली के जैसे चमकते हुए वज्र के जैसे छोप करनेवाले तीक्ष्ण (राम के) बाण के लगने के पूर्व ही यहाँ से भाग जा।

सीता का यह वचन सुनकर उम क्रूर राक्षस ने कहा—दिशाओं को वहन करने- वाले हाथियों के अतिदृढ दाँतो को तोडनेवाले मेरे वक्ष पर यदि तुम्हारे पति का बाण आकर लगेगा, तो वह पर्वत रग गिरी हुई पुष्पमाला-जैसा जान पड़ेगा।

लक्ष्मी के लिए भी लक्ष्मी होनेवाली हे सुदरि ! तुम्हारे प्रति उत्पन्न प्रेम की व्याधि के कारण मेग शरीर दुर्बल हो रहा है। मुझे प्राण-दान करो और स्वर्गवासिनी घने केशोवाली अप्सराओं के लिए भी दुर्लभ पद को प्राप्त करो—यों कहकर भूधर से भी दृढ भुजावाले रावण ने उसे नमस्कार किया।

ज्योंहि वह (रावण) सीता के चरणों को प्रणाम करने के लिए झुका-त्योंही

३६४कंब रामायण

क्षमा की मूर्त्ति और अनुपम सुन्दरी वह देवी, इस प्रकार व्याकुल होकर जैसे मर्मस्थान में रक्ताचित खड्ग धँस गया हो, हे प्रभु ! हे अनुज ! कहकर पुकार उठी ।

उस समय, उस क्रूर (रावण) ने, पहले दिये गये अपने इस शाप¹ का स्मरण करके कि उसे परनारी का स्पर्श (उसकी इच्छा के बिना) नहीं करना चाहिए, अपनी स्तम्भ-जैसी बलवान् एवं ऊँची भुजाओं से उस आश्रम के स्थान को ही नीचे से एक योजन पर्यन्त खोदकर उठा लिया ।

(इस प्रकार सीता को उनके आश्रम के साथ) उठाकर उसने अपने रथ पर रख लिया । सुन्दर ककण-भूषित सीता ने रावण का यह कार्य देखा । किन्तु, अपने प्राणों (के समान प्रभु) को नहीं देखा । वह इस प्रकार मूर्च्छित हो गिर पड़ी जैसे मेघों से छूटकर कोई बिजली धरती पर आ गिरी हो । तब उस (रावण) ने आकाश-मार्ग से जाने का विचार किया । (१—७५)

अध्याय ६

जटायु-मरण पटल

रावण ने अपने सारथी से कहा कि रथ आगे बढ़ाओ । उस कथन को सुनकर सीता अग्नि में पड़ी हुई पुष्प-लता के समान तड़पने लगी । वह नीचे गिरकर लोटती । विह्वल होकर काँपती । मूर्च्छित होती । पीडा से छटपटा उठती । 'हे धर्म देवता ! इस विपदा से शीघ्र मुझे बचाओ'—यों प्रार्थना करती ।

(सीता कहती—) हे पर्वतो ! हे वृक्षो ! हे मयूरो ! हे कोयलो ! हे हरिणो ! हे हरिणियो ! हे हाथियो ! हे करिणीयो ! हे मेरे कातर प्राणो ! तुम मेरे प्रभु के निकट शीघ्र जाओ और उन अचंचल बलवान् वीर से मेरा हाल कहो ।

हे मेघो ! हे उद्यानो ! हे वनदेवताओ ! उत्तम वीर, वे मेरे प्रभु कहाँ हैं ? क्या तुम जानते हो ? यदि तुम मुझे अभयदान दो, तो मैं जीवित रह सकती हूँ—इससे तुम्हारी क्या हानि हो सकती है ?

हे वरद ! हे अनुज ! क्या आप (दोनो), कालमेघ के समान शरवर्षा करते हुए और राक्षस आदि क्रूर जनो का विनाश करते हुए यहाँ नहीं आयेंगे ? हे निष्कलंक भरत ! हे अनुज (शत्रुघ्न) ! क्या तुम अपयश के भागी बनोगे ?


¹ यह कथा प्रसिद्ध है कि एक बार रंभा अपने प्रियतम कुबेर के पुत्र नलकुबर से मिलने के लिए जा रही थी । मार्ग में रावण ने बलात् उसको पकड़ लिया । तब रंभा और नलकूवर ने रावण को यह शाप मिला कि यदि आगे कभी वह किसी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसका स्पर्श करेगा, तो उसके सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे और पतिव्रता स्त्री के पातिव्रत्य की अग्नि में वह जल जायगा । इसी भय के रहने से रावण ने सीता का स्पर्श नहीं किया ।—अनु०

अरण्यकाण्ड ३६५

हे गोदावरि ! तू शीतल है। तू द्रवीभूत है। तू माता-समान है। तेरा अन्तः-करण स्वच्छ है। तू दौड़कर जा और कुछ न कहने पर भी (दर्शन मात्र से मन की बात) समझने की शक्ति रखनेवाले मेरे प्रभु के निकट पहुँच जा और मुझ अभागिन का समाचार उन्हें दें।

सम्मुख दिखनेवाले हे निर्झरो ! पर्वत-कंदराओ मे निवास करनेवाले सिंहो ! तुम (मेरे प्रभु को) यह समाचार देकर उनसे धरती के साथ मुझे उठा ले जानेवाले इस रावण की बीस भुजाओ और उसके दस सिरों को विध्वस्त कराके आनंदित होओ।

इस प्रकार के विविध वचन कहकर मुक्त होने की इच्छा से रोनेवाली सीता को देखकर, अपने जीवन के दिनो को व्यर्थ करनेवाले उस रावण ने कहा—हे स्वर्णहारो से भूषित संयुत स्तनोवाली ! स्वर्णमय कर्णाभरणो से शोभायमान हे सुन्दरि ! वे मनुष्य क्या युद्ध में मुझे मारकर तुम्हे मुक्त कर सकेंगे ? और, अपने बलिष्ठ हाथो से ताली बजाकर ठठाकर हँस पड़ा।

उसके यों कहने पर सीता ने कहा—तूने माया से एक कपट-हरिण बनाया। तेरे प्राणो के लिए यम-सदृश प्रभु को तूने आश्रम से बाहर भेजने का उपाय किया। फिर, आश्रम में घुसकर मुझे हरकर ले जा रहा है यदि उनसे (अर्थात्, राम से) युद्ध करने की शक्ति तुझमे है; तो अपना रथ आगे न बढ़ा।

फिर सीता ने कहा—यदि तुम वीर होते तो, क्या यह सुनने के पश्चात् भी कि तुम्हारे कुल के राक्षसो को क्षणकाल में मारनेवाले और तुम्हारी बहन की नाक-कान काटने-वाले मनुष्य अरण्य मे ही हैं। (उन मनुष्यो के साथ युद्ध कर उन्हे मारे बिना), इस प्रकार माया करके मेरा अपहरण करते ? यह भय से उत्पन्न तुम्हारे मन की कायरता ही तो है ?

सीता के यह कहने पर रावण ने उससे कहा—हे नारीरत्न ! सुनो ! बलहीन शरीरवाले क्षुद्र मनुष्यो के साथ यदि मैं युद्ध करूँ, तो ललाट-नेत्र के पर्वत (हिमालय) को उठानेवाली मेरी भुजाओ का अपमान होगा। उस अपवाद की अपेक्षा ऐसी माया ही फलप्रद है न ?

मनोहर नयनोवाली प्रतिमासमान सुन्दर देवी ने वह वचन सुनकर कहा—अपने कुल के जो शत्रु हैं, उनके सम्मुख जाना अपमान है। उनके साथ करवाल लेकर युद्ध करना अपमान है। किन्तु, पतिव्रताओ को धोखा देना अपमान नहीं है। अहो ! निष्करुण राक्षसो के लिए अपमान क्या है ? अपयश क्या है ?

इस समय, 'अरे ! तू कहाँ जा रहा है ? ठहर, ठहर'—यों गर्जन करता हुआ, आँखो से क्रोध की अग्नि उगलता हुआ, विद्युत् के जैसे चमकती हुई चोंच के साथ जटायु ऐसा आया, मानो मेरु नामक स्वर्णमय पर्वत ही गगन-मार्ग से उड़कर आ गया हो।

उसके दोनो पंखो के हिलने से ऐसा प्रभंजन उठा कि उससे बडे-बडे पर्वत अपने स्थान से उखड़कर उड़ते और एक दूसरे से टकराकर चूर-चूर होकर धूल बनकर उड़ गये। समुद्र का जल गगन में भर गया और जल और थल एकाकार हो गये। ऐसा लगता था, जैसे प्रलयकालीन पवन विश्व-भर में फैल रहा हो।

३६६

कम्ब रामायण

वृक्ष अपनी सब शाखाओं के साथ धरती पर लंबे हो गिर गये। गगन के मेघ, अन्तरिक्ष में बहुत ऊपर कही उड़ गये। सर्प, यह सोचकर कि उग्र रूप गरुड ही नभोमार्ग से आ रहा है, अपने फन समेटकर छिप गये।

जटायु के दोनों पंखों की हवा के वेग के कारण, हाथी, शरभ आदि मृग, वृक्ष, कूज, शिलाएँ तथा सब अरण्य उड़कर अन्तरिक्ष में भर गये। जिससे अंतरिक्ष और अरण्य दोनो स्थानान्तरित-से हो गये।

जटायु अपने विशाल तथा बलवान् पंखों को फैलाये, यह कहता हुआ आया कि पुरुषोत्तम (राम) की देवी को भूखंड-सहित ऊँचे रथ पर रखे, तू कहाँ ले जा रहा है? मैं गगन को और सब दिशाओं को (अपने पंखों से) आवृत कर दूँगा (जिससे तेरे जाने का मार्ग नहीं रहे)।

गुणहीन उस (रावण) के यन्त्रमय रथ की गति को रोकने के विचार से, सिंदूर जैसे लाल पैर और सिर एवं सध्याकाश-जैसे कंठ के साथ, कैलास पर्वत के जैसे आकार-वाला गृद्धराज (जटायु) आ पहुँचा।

उस समय वहाँ आकर उस (जटायु) ने उस स्त्री-रत्न को देखकर कहा—डरो नहीं। फिर यह जानकर कि (रावण ने सीता का) स्पर्श नहीं किया है, अपने उमड़ते क्रोध को किंचित् शान्त करके रावण से कहने लगा—

तू मिट गया। तू ने अपने बन्धुवर्ग-सहित, अपने जीवन को जला दिया। अरे तू यह क्या करने लगा है? यह जान ले कि तू मर गया। इस देवी को छोड़कर चला जा। यदि ऐसा करेगा, तभी जीवित रह सकेगा।

हे मूढ़! तूने अपराध किया है। विश्व की माता-समान देवी को तूने अपने मन में क्या समझा है? हे विवेकहीन! अब तेरा सहारा कौन है? (अर्थात्, विश्व की माता के प्रति अपराध करने पर तेरी रक्षा करनेवाला कोई नहीं रहा।)

हे राजन्! क्या तू नहीं जानता कि राम ने तेरे कुलवालों के साथ घोर युद्ध करके उनके प्राणों को यमराज का सुन्दर भोजन बनाया था और यम ने हाथो में भर-भर-कर नवीन भोजन पाकर आनन्द उठाया था?

तुम को मारने के लिए दौड़कर आनेवाले क्रोधी तथा घोर मत्तगज पर तू मिट्टी का ढेला फेंकना चाहता है। घोर विष को खाकर, भले ही तू यह न जाने कि वह (विष) प्राणहारी है, फिर भी क्या अपने प्राणों को स्थिर रख सकेगा?

तीनो लोको के निवासी, देवेंद्र, त्रिमूर्त्ति, यम आदि सब राम के आगे ऐसे रहते हैं जैसे व्याघ्र के सम्मुख हरिण हो। अति उत्तम धनुर्धारी राम को जीतने की शक्ति किसमें हैं?

इस संसार में अपने कुल के साथ विनाश पाने का इससे बढ़कर अन्य कुछ उपाय नहीं है। इतना ही नहीं। दूसरे जन्म में भी (यह कार्य) घोर नरक देनेवाला है। तूने इस कार्य को अपने किस जन्म के लिए सुखप्रद समझा है?

ये मानव (राम और लक्ष्मण) त्रिदेवों में प्रधान तथा (सारी सृष्टि के) आदि

अरण्यकाण्ड ३६७

कारणभूत परमतत्त्व (अर्थात्, विष्णु) ही हैं। अतः, इनकी समता किस देवता के साथ की जा सकती है ? तुझमें विवेक नही है । अतः, पागल होकर तूने यह अपराध किया है ।

उस अविनाशी तत्त्व (अर्थात्, रामचन्द्र) के धनुष से शर के निकलते ही त्रिपुरों को जलानेवाले वृषभारूढ शिवजी की कृपा से प्राप्त तेरे वरदान और तेरी सारी विद्याएँ विनष्ट हो जायेंगी।

स्वर्ग के राज्य में आनन्द पानेवाले चक्रवर्त्ती (दशरथ) के पुत्र (राम) अपना धनुष झुकाये हुए तेरे सम्मुख आ जायं, तो उन्हे रोकना असम्भव होगा। मैं इस सुन्दर ललाट-वाली देवी को उनके आवास में पहुँचा दूँगा । तू शीघ्र यहाँ से भाग जा । जटायु के इस प्रकार कहते ही—

रावण अपनी उज्ज्वल आँखों से चिनगारियाँ उगलने लगा । ओठ चबाते हुए उसने जटायु को देखकर कहा—अब ज्यादा बक-बक मत कर । अब शीघ्र तू उन मानवों को दिखा ।

सम्मुख आनेवाले ऐ गिद्ध ! मेरे शर से तेरी छाती में बड़ा छेद न हो जाय, इसलिए तू अभी यहाँ से हट जा । गरम किये हुए लोहे में पड़ा हुआ जल उससे कदाचित् निकल भी आ जाये, किन्तु मेरे हाथों में पड़ी इक्षु-समान बोलीवाली यह सुन्दरी मुक्त नही हो सकती, तू यह जान ले ।

इस समय जटायु ने हंसिनी-तुल्य सीता को दुगुने डर से काँपती हुई देखकर कहा—हे माता ! इस राक्षस की देह अभी टुकड़े-टुकड़े हो जायगी । अतः, यह सोचकर कि प्रभु (राम), धनुष लेकर नहीं आये हैं, तुम चिंतित मत होओ ।

तुम व्याकुल होकर मुक्ता के समान अश्रुओं को अपने मुख पर से स्तन-तटी पर गिराती हुई दुःख मत करो । इसके दस शिरो को ताड़ के फलो के गुच्छे के समान मैं तोड़ दूँगा और इसके द्वारा वशीभूत दसों दिशाओ को (उन शिरो को) मै बलि के रूप में अर्पण करूँगा ।

फिर जटायु, रावण के शिरों की पंक्ति को गरजते मुँह से काटकर गिराने के लिए अपने पंखो से वज्र की ध्वनि उत्पन्न करते हुए शीघ्र उड़कर आया और रावण की मनोहर, विशाल, वीणा के चित्र से युक्त ध्वजा को तोड़कर देवों के आशीर्वाद का पात्र बना ।

रावण, जो पहले कभी इस प्रकार के अपमान का भाजन नही बना था, उस समय अपनी आँखों को पिघली लाख जैसे लाल करके ठठाकर हँस पड़ा और सप्तलोकों को भयभीत करते हुए पर्वत के जैसे अपने धनुष को एव अपनी भौंहो को झुका लिया ।

अर्धचन्द्र के जैसे वक्र खड्ग-दन्तोंवाले उस (रावण) के शरों की घोर वर्षा जटायु पर होने लगी । जटायु ने कुछ शरो को अपने दृढ नखो से तोड़ दिया, कुछ शरों को यम को भी भयभीत करनेवाली चोंच से छिन्न-भिन्न कर दिया ।

विशाल और भयकर आँखोंवाले असंख्य सर्पों को एक साथ मिटानेवाले गरुड के समान जटायु, (रावण के) दशों शिरों पर अपनी चोंच नामक चक्रायुध को बढ़ाकर, उसके पुन. अपने धनुष को झुकाने के पूर्व ही उसके निकट पहुँच गया और उसके कुण्डलों को छीनकर उड़ गया ।

३६८कंब रामायण

तब बड़ा गर्जन करता हुआ रावण ने, चौदह बाणों को जटायु के विशाल वक्ष पर इस प्रकार छोड़ा कि वे (बाण) उसके वक्ष को भेदकर पार हो गये। फिर, उसपर अनेक बाण और छोडे। देवता, यह सोचकर कि जटायु अब गिर गया, भय-कंपित होकर उष्ण निःश्वास भरने लगे।

वह गृद्धराज अपने घावों से रक्त की अविरल धारा बहाता हुआ उस मेघ के जैसा लगता था, जो धरती पर खर आदि राक्षसों के रक्त-प्रवाह को समुद्र समझकर (उसे) पीने के पश्चात् उस (रक्त-रूपी) जल को बरसाकर श्वेत वर्ण हो रहा हो।

इस प्रकार का जटायु क्रुद्ध हुआ। निःश्वास भरा। रावण की बीस भुजाओं के मध्य झपटा। अपनी चोंच से मारा। नखों से खरोंचा। अपने पंखो से आघात किया और उस (रावण) के मुक्ताहार-भूषित वक्ष पर के कवच के बंधनो को ढीला कर दिया।

यों अपने कवच को ढीला करनेवाले जटायु पर रावण ने एक सौ बाण चलाये। तब देवता भी भय-विकंपित हुए। इतने में जटायु ने उछलकर रावण के धनुष को चोंच से पकड़कर छीन लिया। यह देखकर देवता हर्षध्वनि कर उठे।

उज्ज्वल रजताचल (हिमाचल) को उसपर निवास करनेवाले शिवजी-सहित अपने बलवान् कंधों पर उठानेवाले उस (रावण) के धनुष को जटायु ने अपनी चोंच से पकड़कर खींच लिया और ऊपर उड़ा, तो वह इन्द्र-धनुष के साथ गगन में उड़नेवाले मेघ के समान लगा। उस (जटायु) के बल का वर्णन कौन कर सकता है ?

जिस रावण ने (युद्ध मे) कभी अपनी पीठ न दिखानेवाले सहस्रनेत्र (इन्द्र) को भी अपने शस्त्र से पीडित किया था और भगा दिया था, उस (रावण) के धनुष को उस जटायु ने अपनी चोंच से छीन लिया और अपने पैरो से तोड़ दिया। जो (जटायु) रक्तवर्ण देव (शिव) के धनुष को अपने हाथो से तोड़ देनेवाले (राम) का सहायक था और उनके पिता का प्रिय मित्र था।

विश्वकंटक रावण, अपने बल के योग्य उस धनुष को टूटते हुए देखकर क्रुद्ध हुआ और अपने पराक्रम में कुंठित न होकर, विषकंठ (शिव) के त्रिपुर-दाह करनेवाले अनुपम शर के समान (भयंकर) शूल को उठाकर जटायु पर प्रयुक्त किया।

तब गृद्धराज ने, इस विचार से कि वह (रावण) कही मुझे शक्तिहीन न समझ ले, यह कहते हुए कि, देख मेरी शक्ति को, उस (रावण के) त्रिशूल को अपनी छाती पर रोक लिया। तब स्वर्ग के निवासी (देवता) यह सोचकर कि इस प्रकार का कार्य करने-वाला पराक्रमी दूसरा कोई नही है, अदृश्य खडे रहकर ही अपनी भुजाएँ ठोंकने लगे।

वह त्रिशूल (जटायु के वक्ष से टकराकर) इस प्रकार लौट आया, जिस प्रकार, धन पर लक्ष्य रखनेवाली वारनारियो की संगति की कामना करनेवाले निर्धन पुरुष (उन वारनारियो के पास से) लौट आते हैं, मधुर दृष्टि रखनेवाली गृहिणी-विहीन¹ गृहों में


¹ अतिथि उसी घर में आतिथ्य पाना चाहते हैं, जहाँ गृहिणी मीठी वाणी से उनका स्वागत-सत्कार करती है; अन्यथा अतिथि लौट जाते हैं।—अनु०