भारतकोश
संग्रह पर लौटें

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

लोगों पर किया है । इसलिए इसमें कोई संशय नहीं है, पक्की बात है । तीन चीजें शर्तिया होती हैं। जिसे भी मैं नाम देता हूँ, तीन चीज़ें पक्का हो जाती हैं— 1. आत्मा और मन अलग हो जाते हैं। 2. संसार का आकर्षण समाप्त हो जाता है । 3. एक पूर्ण सुरक्षा मिल जाती है। असर सामने है। मेरा हर नामी नाम पाकर बदल जाता है। हर इंसान मन तरंग में नाच रहा है । मन प्रबल है । पर मेरे नामी के साथ अब ऐसा नहीं हो पा रहा है। नाम पाने के बाद मेरा हर नामी चेतन हो जाता है । अन्य पंथों के लोगों के साथ मेरे नामी की तुलना की जाए तो उनका अपने ऊपर कोई होल्ड नहीं मिलता है, कोई आध्यात्मिकता नहीं मिलती है। मेरे नामी अपने को सबसे अलग पाते हैं, उन्हें अपने अन्य साथी बेवकूफ़ लगते हैं, उनकी हरकतें पागलों वाली लगती हैं, क्योंकि उनके मूड का कोई पता नहीं होता कि कब अच्छे बन जाएँ और कब गंदे | कब मूड खराब हो जाए, कोई पता नहीं । यानी मन पर कोई होल्ड नहीं होता, इसलिए पागल लगते हैं । मेरे नामी का मन पर होल्ड होता है, क्योंकि नाम के साथ मैं मन से उसकी आत्मा का बिलगीकरण कर देता हूँ, दोनों को अलग कर देता हूँ, जिससे मन समझ में आने लगता है। यह काम दुनिया में सबसे कठिन है, जो कोई नहीं कर सकता है। जब मन समझ आने लग जाता है तो दुनिया फीकी लगने लग जाती है, उसका आकर्षण समाप्त होने लग जाता है । फिर तीसरा हर नामी को लगता है कि उसके साथ में एक सबल संरक्षक है, हरेक को वो संरक्षक अनुभव होता है । सच है, यह जो वस्तु मेरे पास है, किसी के पास नहीं है। इस वस्तु से मन की दुनिया समाप्त होती जाती है और आत्मा का रूप समझ आने लग जाता है I ध्यान क्यों किया जा रहा है ? यह जानने के लिए कि मैं क्या हूँ ? गुरु आत्मा और मन को अलग कर देता है । किसी कीमत पर यह काम अपनी ताकत से नहीं हो सकता है । मन ने ऐसे उलझा दिया है कि आत्मा कुछ समझ नहीं पा रही है। मन कहता है कि रोटी खानी है तो आत्मा कहती है कि यही मेरी इच्छा है। इस तरह मन ने आत्मा को अपने पीछे लगा रखा है। आत्मा सभी इच्छाओं में, कल्पनाओं में घूम रही है। जितने भी कर्म मनुष्य कर रहा है,

सभी उलझन वाले हैं । जब भी कोई चाहे कि इससे निकलें तो यह नहीं निकलने दे रहा है। इसकी पकड़ बड़ी दूर तक है। धन-दौलत दे देगा, सिद्धियाँ-शक्तियाँ दे देगा, पर अपने से आगे नहीं जाने देगा। एक अदद गुरु आपको बाहर निकाल देगा। मन की पहली ताकत है- अज्ञान । मन आत्मा में ऐसे घुल-मिल गया है कि बड़ा झमेला हो गया है। आत्मा यह झमेला लिए-लिए घूम रही है, इसे समझ नहीं पा रही है। चाहे कोई करोड़ों उपाय भी कर ले, इस झमेले को समझ नहीं सकता है, मन की सीमा से बाहर नहीं जा सकता है। गुरु यथार्थ में आत्म रूप दिखाता है। हंस की चोंच में गुण है। वो दूध पीता है । अगर उसमें पानी मिला हो तो वो उसे छोड़ देता है, केवल दूध-दूध पी जाता है। यदि पाव दूध में पाव पानी मिलाकर दे दिया जाए तो वो पूरा दूध पी लेगा और पूरा पानी छोड़ देगा। यह काम और कोई नहीं कर सकता है। केवल हंस। ऐसे ही पूर्ण सद्गुरु की सुरति में यह ताकत है कि आत्मा और मन को अलग कर सकता है । यह काम गुरु पल में कर देता है । फिर आत्मा दुबारा मन में नहीं समा सकती । चाहकर भी नहीं । जैसे- दूध को मथ घृत न्यारा किया,

पलट कर फिर ताहिं में नाहिं समाई ॥

दूध से घी बना लिया तो फिर दूध नहीं हो सकता। यदि दही को मथ मक्खन निकाल लिया तो फिर चाह कर भी उसमें नहीं समा सकता। जब पूर्ण गुरु आत्मा को मन से अलग कर देता है तो फिर आत्मा मन में नहीं समा सकती है। कितनी भी ताक़त लगा ले कोई, यह काम नहीं कर सकता है । पर-

कोटि जन्म का पथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय ॥

तब एक संतुष्टि मिलती है । जैसे काँटा लगा हो तो निकालने पर आराम मिलता है। ऐसे ही मन का काँटा गुरु निकाल देता है । फिर आप चाहकर भी जगत के पदार्थों में रम नहीं पायेंगे । जगत के पदार्थ आपको रोमांचित नहीं कर पायेंगे। ऐसे पर ही कहा- सतगुरु मोर शूरमा, कसकर मारा बाण । नाम अकेला रह

गया, पाया पद निर्माण ॥

यह काम पल में किया। फिर तीसरा, एक सुरक्षक भी साथ हो गया। हर पल के लिए एक ताकत साथ में दे देता है । तभी तो कहा— जब मैं था तो गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहीं ।

प्रेम गलि अति साँकरी, तामें दो न समाहिं ॥

जो आप अपने को महसूस कर रहे हैं, यही धोखा है। यह आपा ही आसक्त है। यह पूरा खत्म हो जाता है । क्यों ? गुरु समाना शिष्य में, शिष्य लिया कर नेह । बिलगाए बिलगे नहीं, एक रूप दो

देह ॥

गुरु आपको अपने समान कर देगा । आप अपनी दुनिया ही भूल जाओगे । साहिब की वाणी में वजन है—

नाम पाय सत्य जो बीरा, संग रहूँ मैं दास कबीरा ॥

सच मानना, अभी बार- बार चेताकर कह रहा हूँ, जब यहाँ से चला जाऊँगा तो दुनिया पछताएगी, क्योंकि सत्य है - जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।

पलटू कहै साँच कै मानो । और बात झूठ कै जानो ॥

जहवाँ धरती नाहिं अकासा । चाँद सूरज नाहिं परगासा ॥

जहवाँ ब्रह्मा विष्णु न जाहीं । दस अवतार न तहाँ समाहीं ॥

आदि जोति ना बसै निरंजन । जहवाँ शून्य शब्द नहिं गंजन ॥

निरंकार ना उहाँ अकारा । अक्षर शब्द नहिं विस्तारा ॥

जहवाँ जोगी जाए न पावै । महादेव ना तारी लावै ॥

जहवाँ हद अनहद नहिं जावै । बेहद वहाँ रहनी ना पावै ॥

जहवाँ नाहिं अगिनि परगासा । पाँच तत्व ना चलता स्वाँसा ॥

सुन्न गगन में उठत है, सो सब बोल में आवै ।

निःसदी वह बोलै नाहीं, सो सत सबद कहावै ॥

  • पलटू साहिब

7. नाम दान का दिन

नाम दान का दिन

जब आप नाम-दान लेने आ रहे हो तो एक बात जान लेना कि आज आपका नया जन्म होने जा रहा है । आज तक जीवन में जो कुछ भी छल- कपट किया, पाप-कर्म किये, भूल जाओ, क्योंकि तब अज्ञान में थे, पाप-पुण्य का इतना बोध नहीं था। वैसे पाप होना नहीं चाहिए, पर पूर्व संस्कारों से बुद्धि न हुई और इस कारण पाप हुए। खैर, अब आप अज्ञानी नहीं रहेंगे। पाप- पुण्य का बोध आपको हो जाएगा, इसलिए अब कुछ ग़लत नहीं करना । सात नियम आपको बताए जायेंगे, जिनपर आपको दृढ़ता से चलना होगा। चिंता मत करें, आपको नाम की ताक़त का सहयोग मिलेगा। कहीं गफलत में होंगे तो वो ताक़त आपको रोकेगी, समझायेगी, पर उसके अनदेखा नहीं करना । यदि उसे अनसुना करके जानबूझकर ग़लत किया तो माफी नहीं मिलेगी। सज़ा साथ- साथ मिलेगी। सत्य बोलना, माँस न खाना, नशा न करना, चरित्रवान रहना, हक की कमाई खाना, जुआ नहीं खेलना और चोरी नहीं करना । तो आपको पहले ये नियम बताए जायेंगे । आप एक विश्वास के साथ नाम लेने आ रहे हैं तो और जगहों पर आपका विश्वास नहीं होना चाहिए, क्योंकि जिसकी सभी में आस्था है, समझो कि उसकी किसी में आस्था नहीं है, इसलिए वो नास्तिक है। आप आस्तिक होकर आएँ। पूरे विश्वास के साथ आएँ। इसलिए यदि आपने कोई डोरे, ताबीज, ग्रहों वाली अँगूठियाँ आदि पहन रखी हैं तो वो सब उतार आएँ, एक पूरे विश्वास के साथ समर्पित भाव से आएँ। ‘एक नाम को जानकर दूजा देई बहाय ।।' समझ लें कि आप सही जगह जा रहे हैं। मैंने बार-बार कहा है कि जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है। इस बात को दिमाग़ जल्दी नहीं मानता है । आप विश्वास रखें। ऐसे ही सब कुछ नहीं कहा। पर मैंने कभी यह नहीं कहा कि मैं ही साहिब हूँ, मैं ही सब

कुछ कर रहा हूँ। मैंने तो साहिब के लिए कहा। अपना नाम लेना ही नहीं है । पता है, दुनिया डर रही है। खैर, अभी तो साहिब पर्दा करके चल रहा है । जिस दिन पर्दा हट जायेगा, सब साहिब में लय हो जायेंगे । लय हो जायेंगे सब। आपको ऐसे ही सब कुछ छोड़कर आने को नहीं कहा है। इसके पीछे कोई रहस्य है। तो फिर नाम-दान के समय आपसे एक चीज़ माँगूगा — विश्वास । विश्वास है क्या? आप कहेंगे- हाँ, है । इसी विश्वास के बदले आपको नाम दूँगा। याद रहे, इसी विश्वास के बल पर आपको पार करना है । इसलिए सही में करना विश्वास । विश्वास क्या-

गुरु को अखंड ब्रह्म कर माने । गुरु को नहीं मानुष कर जाने ।।

फिर मैंने आपसे आपका तन, मन, धन - तीनों लेने हैं; कहूँगा कि सच्चे दिल से आँख बंद करके दो । पता है, ये क्यों लूँगा ! क्योंकि ये तीनों ही आत्मा पर बीमारी है। आत्मा भूल से इन्हें मेरा-मेरा कह रही है । इसलिए—

तन मन दिया तो भल किया, सिर का जासी भार ।

जो कछु कहे सो मैं दिया, बहुत सहे शिर मार ।।

बस, आप आँख बंद करके सच्चे दिल से दे देंगे। यदि सच्चे दिल से नहीं देंगे तो समझ लेना कि मैं भी सच में नहीं लूँगा। तो जब आप अपना तन, मन, धन–तीनों मुझे सौंप देंगे तो फिर बाद में मैं आपका तन आपको वापिस कर दूँगा, कहूँगा—जाओ ! घर में माता-पिता होंगे, बाल-बच्चे होंगे, उनकी सेवा करना, पर आज से इसे मेरा मानकर कोई भी ग़लत काम नहीं करना । आप तो मुझे सौंप चुके होंगे, पर मैं आपको वापिस कर दूँगा। फिर इस तरह धन भी आपको वापिस कर दूँगा, कहूँगा कि इससे कोई ग़लत काम नहीं करना, किसी पर झूठा मुकद्दमा भी नहीं करना। फिर आपका मन मैं आपको वापिस नहीं करूँगा, कहूँगा कि इसे मेरे पास ही रखना । इसके बाद फिर आपको शीश पर अपना हाथ रखकर एक-एक करके कान में मंत्र दूँगा और आपकी आत्मा को उस एक पल में मन से अलग करके आज्ञा चक्र पर एकाग्र कर दूँगा । आपकी आत्मा को अपने में समाहित करके फिर छोड़ दूँगा। इससे जो गुरु - अंश आपके साथ टच हो जायेगा, वो कभी समाप्त नहीं होने वाला । नाम रूप में साहिब खुद साथ खड़ा हो जायेगा ।

नाम पाय सत्य जो बीरा । संग रहूँ मैं दास कबीरा।।

बस, यहाँ पर अपना नया जन्म समझना। फिर आपको खोलकर नाम और मंत्र - दोनों समझा दिये जायेंगे । ध्यान में बिठाकर अभ्यास भी करवा दिया जायेगा। नाम लेने के बाद आप सुबह - शाम नाम - भजन में बैठना। वैसे तो खाते-पीते, सोते-जागते हर समय लगे रहना । पर बैठते समय पहले 4-5 मिनट गुरु-मंत्र करना यानी आपने गुरु को याद करने बुला लिया। अब जो नाम बताया गया, उसका स्वाँसों में सुमिरन करते हुए शीश से सवा हाथ ऊपर ध्यान को एकाग्र करके जैसे बताया, वैसा करना । इस भ्रम में नहीं पड़ना कि यह नाम तो जपने में आ रहा है। जैसे तार पर बिजली चलती है, ऐसे ही इसके द्वारा आध्यात्मिक किरणें आपके अंदर आयेंगी। जो नाम आपको दिया, वो कहने- सुनने में आने वाला नहीं है। वो आपके साथ है । 'सार नाम सत्पुरुष कहाया।।' वो खुद परम- पुरुष है, जिसे प्रकट कर दिया। तो इस भ्रम में न पड़कर नाम का सुमिरन करना, क्योंकि इसी से ध्यान एकाग्र होगा। वैसे कभी भी बैठ सकते हो और सच पूछो तो आधी रात का समय बड़ा सुंदर है, क्योंकि उस समय मैं मिल भी जाऊँगा । 'देखा देखी सब कहें, भोर भये गुरु नाम । अर्धरात को जागसी, खानाजाद गुलाम ।।' छ: महीने तक गुरु पूरा-पूरा आपके साथ होगा। इस बीच यदि उसे पा लिया तो पा लिया अन्यथा बाद में थोड़ी मुश्किल होगी। इसलिए जमकर ध्यान करना - पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ। यदि नाम या मंत्र भूल जाओ तो किसी भी नामी से पूछ सकते हो। पर याद रहे, अपनी पत्नी से नहीं । यदि उससे पूछा तो फिर भाई-बहन का रिश्ता हो जायेगा। किसी दूसरे गैरनामी के सामने नाम (शब्द) को प्रकट नहीं करना अन्यथा बुरी हालत हो जायेगी । नामी से आप कुछ भी समझ सकते हैं। यदि आन्तरिक दुनिया में कोई रुकावट आए तो उसके लिए मैं हर समय उपलब्ध हूँ, पूछ सकते हो।

8. हमारा पंथ क्या है

हमारा पंथ क्या है

‘साहिब' परम-पुरुष को कहते हैं और 'बंदगी' प्रणाम का पर्यायवाची सूचक है। इस तरह उस परम - पुरुष को प्रणाम का दूसरा नाम ' साहिब - बंदगी' है । साहिब बंदगी पंथ कोई कबीर पंथ नहीं है । यह संत - मत भी नहीं है। संत-मत इसलिए नहीं है कि कबीर साहिब से नाम लेने से पहले सभी काल-पुरुष की भक्ति ही तो कर रहे थे । इसलिए उनकी वाणी में काल - पुरुष की भक्ति से संबंधित शब्द भी हैं, जिन्हें पढ़कर भक्त लोग भ्रमित हो जाते हैं। और संकलनकर्ता कोई संत तो है नहीं कि सत्य - भक्ति से संबंधित शब्द छाँटकर अलग कर सके। तो दूसरा हम कबीर पंथी भी नहीं हैं। वर्तमान में जितने भी कबीर पंथी हैं, वो साहिब की मूल शिक्षा पर चल ही नहीं रहे हैं, भूल चुके हैं। काल-पुरुष सबको उलझा देता है। कईयों में ऐसा है कि दीक्षा हमसे लो पर गुरु कबीर साहिब को मानो । कबीर साहिब यह कहकर नहीं गये कि मेरी भक्ति करना। वो तो सद्गुरु की भक्ति के लिए बोल गये । वास्तव में मुझे कबीर साहिब की वाणी को लेने की ज़रूरत भी नहीं है। यह तो मैं मजबूरी में उदाहरण के लिए, अपनी बात का प्रमाण देने के लिए ले रहा हूँ, क्योंकि मैं जो बोल रहा हूँ, वो अनुभूति की बात कर रहा हूँ, आँखों देखी बात कर रहा हूँ जबकि बहुत से महात्मा द्वारा कबीर साहिब की वाणी को तो कई जगहों से तोड़-मरोड़कर मनमाने ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है । इसलिए यदि आप कबीर साहिब की वाणी को ही पढ़ेंगे तो भी भ्रमित हो जायेंगे। क्योंकि शुद्धता नहीं रह गयी है। मैं आपके सामने शुद्ध अध्यात्म पहुँचा रहा हूँ। इसलिए आपको कबीर साहिब या संतों की वाणी के गिर्द न घुमाकर अपने गिर्द ही घुमा रहा हूँ। एक ने कहा कि आप निरंकारी भी नहीं हैं, राधा स्वामी भी नहीं हैं, जैनी भी नहीं हैं, मुसलमान भी नहीं हैं, फिर मामला क्या है ? फिर क्या हैं? मैंने कहा कि यह फ़िलासफ़ी समझने में बड़ा समय लग जायेगा । किसी को इस्लाम समझाना हो तो कुरान आगे रख दो, समझ जायेगा। हिंदू धर्म समझाना हो तो बता दिया जाता है कि त्रिदेव हैं । ईसाई धर्म समझाना हो तो क्राइस्ट का

संदेश दे दो। पर किसी को साहिब बंदगी समझाना हो तो पसीना छूट जाता है। इसलिए आप परेशान हो जाते हैं। मैंने समझा दिया है आपको। आपके बस की बात नहीं है । पहले जितने भी आए, काल की भक्ति कही । हम ऋषि-मुनियों के उदाहरण नहीं दे रहे हैं। क्योंकि उन्होंने तो काल की बात की है। हमारी फ़िलासफ़ी तो ऐसी है कि एक छोटा-सा लड़का गाता फिरता है— 'मुझे अपने ही रंग में रँगदा फिरे, साहिब अपने ही रंग में रँगदा फिरे ॥' जो कह रहे हैं कि किसी को नहीं मानता, ठीक कह रहे हैं । हम मीराबाई की फ़िलासफ़ी पर नहीं हैं। क्योंकि उन्होंने तो पहले सगुण भक्ति की है, सगुण पद भी गाए हैं। बाद में जब रविदास जी से दीक्षा तो सत्य - भक्ति में आई। तो पहले वाला कोई पढ़ेगा तो कहेगा कि एक ही बात है। हम अंतर ठीक से समझायेंगे । पलटू साहिब भी पहले निरंजन के दायरे में घूम रहे थे। गुरु नानक देव स्वयं ओंकार की उपासना कर रहे थे। बाद में साहिब से नाम लिया । और दसवें द्वार से भी आगे बोल दिया। हम एक को बॉयकाट नहीं कर रहे हैं । उसकी वाणी पर चलो, यह नहीं कह रहे । जो लोग कह रहे हैं कि किसी को नहीं मानता, वो ठीक ही कह रहे हैं। कबीर साहिब की फ़िलासफ़ी पर चलना, यह भी नहीं कह रहा हूँ। समय के साथ लोगों ने उनकी वाणी को इतना तोड़-मरोड़ दिया है कि कुछ कहते नहीं बनता । भ्रमित हो जाता है इंसान। सबने अपनी बात बीच में मिला दी है। अपनी सुविधाओं के अनुसार लिख दिया है। इसलिए मैं जो आपके पास पहुँचा रहा हूँ, वो शुद्ध है। एक माई ने कहा कि 'साहिब' (परम-पुरुष) को मेरे लिए कहना कि मेरा कष्ट दूर करे। मैं पूछना चाहता हूँ कि वो फाल्ट में थी कि नहीं ! एक ने कहा कि जब ध्यान में बैठती हूँ तो कभी आपके गुरु जी आ जाते हैं, कभी कबीर साहिब आ जाते हैं। मैंने कहा—माई, तू तीन किश्तियों पर क्यों खड़ी है ! आपने मेरे गुरु से क्या लेना है ! आपको कबीर साहिब से क्या लेना है! आपको तो मुझसे काम होना चाहिए, केवल मुझसे । 'मुझे है काम सतगुरु से....' वो कबीर साहिब अपनी शरण नहीं बता गया; सारा भार गुरु को सौंप गया। कहा-

गुरु मानुष कर मानते, चरणामृत को पान ।

ते नर नरकै जायेंगे, जन्म जन्म होय स्वान॥

मेरे गुरुदेव मेरे गुरुभाइयों को बोल गये कि इन्हें ही गुरु मानना मेरे जाने के बाद, क्योंकि मैं अब अपने बिंदू पर जा रहा हूँ। तो हम सद्गुरु फ़िलासफ़ी पर चल रहे हैं ।

गुरु आज्ञा ले आवही, गुरु आज्ञा ले जाहीं ।

कहैं कबीर ता दास को, तीन लोक डर नाहीं ॥

हम कह क्या रहे हैं, यह समझो । गुरु ताक़त देता है; उसी से पार हो सकते हैं। मेरी वाणी में कमाई की बात नहीं मिलेगी । सेवा करो, यह भी नहीं कह रहा हूँ। जैसे किसान ने बीज बोया तो बहुत बड़ा काम हो गया। जमीन को गोड़ित किया, सींचा। फिर समय समय पर खाद भी डालनी है, सींचते भी रहना है। इस तरह आगे भी देखना है । मैंने जो आपको देना है, दे चुका हूँ । अब तो गहन सत्संग द्वारा उलझनों से परे कर रहा हूँ। बस, एक व्यक्तित्व कबीर साहिब को ओवरटेक नहीं कर रहा हूँ। बाकी किसी की फ़िलासफ़ी पर नहीं चल रहे हैं। मगहर में किताबें मिल रही थीं तो मैंने कहा कि नहीं ख़रीदना। पर कुछ ने मेरे मना करने पर भी चुपके से ख़रीद लीं। उसमें तो ग़लत बताया गया है । बाद में लोगों ने अपने विचार उसमें मिला दिये हैं । उसमें बताया गया है कि कबीर ने आत्मा को ही सब कुछ कहा है; किसी सत्लोक की बात नहीं है । तो मैं आपको शुद्ध चीज़ दे रहा हूँ । माँ ने बेटे को जन्म दिया तो बाद में खिलाया, पढ़ाया, लाड़-प्यार देकर बड़ा किया। नाम-दान के समय मेरा काम ख़त्म नहीं हो गया। माँ को परवरिश करनी होती है। तो मैं इसलिए दौड़ता घूम रहा हूँ। रोज़ के 5-5 सत्संग दे रहा हूँ। इसलिए हमारी फ़िलासफ़ी है – सद्गुरु भक्ति । जो सत्लोक की बात कह रहे हैं, उनमें भी भ्रांतियाँ हैं । वो तो पढ़कर बोल रहे हैं। कोई कहे कि जम्मू शहर समुद्र के बीच टापू पर है तो जो जम्मू में रहने वाले हैं, उनको कैसा लगेगा ! ऐसे ही मैं जान जाता हूँ कि ये खुद नहीं गये हैं। मैं तो स्वर्ग जाना हो तो चला जाता हूँ, ब्रह्माण्ड में घूमता रहता हूँ । पर सच यह है कि मैं अपने से बाहर नहीं निकलना चाहता हूँ ।

तो दूसरा हमारा जो मत है, वो है भृंग - मता । यह क्या है ? भाई, बाकी जो जीव हैं, वो पेट में रखकर जन्म देते हैं बच्चे को । पर भृंगा यह नहीं कर रहा है । वो पल-भर में अपने समान कर रहा है । इस तरह हम भी आपको अपनी तरह करके चल रहे हैं। इसलिए जितने भी उदाहरण दिये, साहिब की वाणी से । बाकी की फ़िलासफ़ी में दोष है, धोखा है, छल है। धर्मदास जी भी पहले ठाकुरपूजा करते थे । साहिब से कहा कि एक ही परमात्मा हैं—ठाकुर जी । साहिब जी धर्मदास जी को बड़े तरीके से लाइन पर लाए, कहा—

तीन लोक जो काल सतावे । ताको सब जग ध्यान लगावे ॥

निराकार जेहि वेद बखानै । सोई काल कोइ मरम न जानै ॥

त्रिगुण जाल यह जग फँदाना । गहै न अविचल पुरुष पुरान॥

जाकर ई जग भक्ति कराई। अंतकाल जिव सो धरि खाई ॥

कहा कि सब काल की भक्ति कर रहे हैं । जिसको सारा संसार भगवान समझ कर पूजा कर रहा है, वही अंतकाल में जीवों को खा जाता है । उसी निरंजन के त्रिदेव पुत्र हैं ।

सबै जीव सतपुरुष के आहीं । यम दै धोखा फँदाइस ताहीं ॥

प्रथमहि भये असुर यमराई । बहुत कष्ट जीवन कहँ लाई ॥

दूसरि कला काल पुनि धारा । धरि अवतार असुर सँघारा ॥

प्रभुता देखि देखि कीन्ह विश्वासा | अंतकाल पुनि करै निरासा ॥

जीवन बहु विधि कीन्ह पुकारा । रक्षा करन बहु करै पुकारा ॥

कहा कि सभी परम-पुरुष की आत्माएँ हैं, पर निरंजन ने धोखे से उन्हें फँसाकर रखा । पहले तो वो खुद ही राक्षस बनता है, जीवों को सताता है, फिर खुद ही अवतार धारण कर राक्षसों को खा जाता है । जीव लीला देखकर सोचते हैं कि यही हमारा रक्षक है, पर अंतकाल में यही जीवों को निराश करता है। साहिब ने कोई भी बात फिज़ूल में नहीं कही । तर्क दिये हैं । कह रहे हैं—

गीता पाठ कै अर्थ बतलावा । पुनि पाछे बहु पाप लगावा ॥

द्वापर देखहु कृष्ण की रीती । धर्मनि परिखहु नीति अनीति ॥

अर्जुन कहँ तिन्ह दया दृढ़ावा । दया दृढ़ाय पुनि घात करावा ॥

बँधु घातकर दोष लगावा । पाण्डो कहँ बहु काल सतावा॥

भेजि हिमालय तेहि गलाये । छल अनेक कीन्ह यमराये ॥

बहु गंजन जीवन कहँ दीन्हा । ताको कहे मुक्ति हरि दीन्हा॥

द्वापर में देख लो, कृष्ण जी ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया, फिर घात करवाया। साहिब ने धर्मदास से कहा कि जिनकी भक्ति कर रहे हो, उनमें दोष है । मुझे बताना पड़ेगा; मेरी मजबूरी है। लोगों ने निंदा समझ लिया। बताना पड़ेगा कि यह काल के दायरे की भक्ति है, इससे ऊपर उठ । तो फिर बाद में कहा कि तू पाप कर गया है । अर्जुन चौंका, कहा कि आपने ही तो कहा था। उसने तर्क दिया । पर कृष्ण जी ने कहा- नहीं, वो राजनीति थी, पर तूने बंधुओं को मारा है, धर्म के अनुसार यह पाप है। यदि मैं मोहनलाल को कहूँ कि फलाने को मार । वो कहे कि यह तो पाप है, कैसे करूँ! मैं कहूँ कि मैं आज्ञा दे रहा हूँ, मार। वो मारे तो बाद में मैं कहूँ कि तूने तो पाप कर दिया तो यह कैसा है ! यह तो विरोधी वाणी हुई। मेरे शब्द विरोध में नहीं जाते हैं । तो फिर यज्ञ करवाया। लेकिन तब भी पिण्डा नहीं छूटा पाण्डवों का। फिर कहा कि हिमालय में जाकर प्रायश्चित करो। इतनी सर्दी में गलना पड़ा। फिर भी नहीं छूटा पिण्डा । फिर नरक में जाना पड़ा। तो यह सब निंदा है क्या! नहीं, यह तो सभी को पता है । बस, साहिब तो तर्क देकर समझा रहे हैं कि मुक्ति के लिए कहीं आगे बढ़ना होगा। 'बहु गंजन जीवन कहँ कीन्हा । ताको कहे मुक्ति हरि दीन्हा ॥ ' यह कौन सी मुक्ति थी ! तो साहिब धर्मदास को आगे समझाते हुए कह रहे हैं-

बलि ते सो छल कीन्ह बहूता । पुण्य नसाय कीन्ह अजगूता ॥

छल बुद्धि दीन्हे ताहिं पताला । कोई न लखै प्रपंची काला॥

लघु सरूप होय प्रथम देखाये । पृथिवी लीन्ह पुनि स्वस्ति कराये ॥

स्वस्ति कराइ तबै प्रगटाना । दीर्घ रूप देखि बलि भय माना ॥

तीन परग तीनौ पुर भयऊ । आधा पाँव नृप दान न दियऊ ॥

देहु पुराय नृप आधा पाऊँ । तो नहिं तव पुण्य प्रभाव नसाऊँ ॥

तेहि कारण पातालहिं दीन्हा । अन्धा जीव जल प्रगट न चीन्हा ॥

तब लै पीठ नपाय तेहि दीन्हा । हरि ले ताहि पतालै कीन्हा ॥

यहि चर जीव देखि नहिं चीन्हा । कहै मुक्ति हरि हमको दीन्हा ॥

बलि की क्या ग़लती थी ! साहिब तर्क से समझा रहे हैं, मुक्ति के विषय में सोचने को कह रहे हैं। आख़िर हम सब कौन सी मुक्त चाह रहे हैं, यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं। बाकी उनकी किसी से दुश्मनी नहीं थी । तो कहा कि पहले छोटा रूप धारण कर बलि से साढ़े तीन पग धरती माँग ली, फिर बाद में अपना रूप बड़ा करके तीन-लोक तीन पग में नाप लिये और आधा पाँव रह गया । आधा पाँव बलि राजा दान नहीं दे सका तो उसके परिणाम स्वरूप उसे पाताल भेज दिया गया। साहिब कह रहे हैं कि यह अंधा मनुष्य समझता नहीं है। स्पष्ट देखकर भी समझता नहीं है। यह सब होने के बाद कहता है कि हरि ने मुक्ति दी । पाताल में भेज दिया गया। क्या यह थी मुक्ति ? लोग तो साहिब की वाणी को तोड़ मरोड़ कर कह रहे हैं- तू राम सुमर पछतायेगा। हम कह रहे हैं— तू नाम सुमर पछतायेगा । हम आपको शुद्ध चीज़ दे रहे हैं । हम घी खिला रहे हैं और वो भी शुद्ध दे रहे हैं, बिना लस्सी वाला दे रहे हैं। बाकी से अलग भक्ति दे रहे हैं। बाकी काल की भक्ति दे रहे हैं, हम परम-पुरुष की भक्ति दे रहे हैं । बाकी जितने भी पंथ हैं, सत्य मानना, सब काल - पुरुष की भक्ति कर रहे हैं । कुछ हमारी तरह बातें बोल रहे हैं। सच खंड, अमर लोक, सत्पुरुष की बात कर रहे हैं, पर वास्तव में भक्ति वो भी काल - निरंजन की ही कर रहे हैं । क्योंकि वाणियों में वो बातें लिखी हैं, इसलिए वो पढ़कर बोल रहे हैं। लेकिन उनके पास अपना कुछ नहीं है । अन्दर से वो खालमखाली हैं। हम बाकी पंथों मुख्य पाँच कारणों से अलग हैं। ये कारण हैं कि हम- तीन लोक से परे एक चौथे लोक ( अमर लोक ) की बात कर रहे हैं ।

तीन लोक से भिन्न पसारा | अमर लोक सतगुरु का न्यारा ।।

तीन लोक प्रलय कराई । चौथा लोक अमर है भाई ।।

सबसे पहले हम तीन लोक से परे एक चौथे लोक (अमर-लोक) की बात कर रहे हैं । कबीर साहिब ने सबसे पहले इस अमर लोक का संदेश संसार को दिया। उन्होंने उस अद्भुत देश की बात कही, जिसकी ख़बर पहले किसी को नहीं थी। जैसे वैज्ञानिक लोग ब्रह्माण्ड के रहस्य जानने के इच्छुक हैं । वे नित्य नयी-नयी सूचनाएँ संसार को दे रहे हैं। इसी तरह साहिब ने भी संसार को एक अनुपम रहस्य दिया । उन्होंने ऐसे अद्भुत लोक की बात कही, जहाँ प्रलय नहीं है। यह तीन लोक तो प्रलय की सीमा में आ जाते हैं यानी इनकी एक निश्चिय अवधि है। जैसे हमारे शरीर की एक अवधि है, हर चीज की एक अवधि है । एक अवधि तक हमारा शरीर रहता है, फिर नष्ट हो जाता है । यानी इसकी एक सीमा है। इसी तरह हर चीज़ की एक सीमा है, पर हमारी आत्मा का किसी भी देश, काल या अवस्था में नाश नहीं होता । यह कभी नष्ट नहीं होती । जिस चीज की उत्पत्ति है, उसका नाश भी अवश्यंभावी है, पर हमारी आत्मा की उत्पत्ति नहीं, इसलिए यह नष्ट भी नहीं होती। यहाँ पर सोचो । यदि आत्मा अमर है तो इस आत्मा का देश या इस आत्मा का असली ठिकाना भी ऐसा होना चाहिए न, जिसका कभी नाश न हो, जो परम सत्य हो । क्योंकि—

सत्य सोई जो विनशे नाहीं ।।

यह तीन लोक काल - पुरुष का देश है । उसी ने सब जीवों को शरीर रूपी पिंजड़े में कैद करके रखा हुआ है। इसी तीन- लोक से परे जो अमर-लोक है, वहाँ परम-पुरुष का निवास है । सब संतों ने उसे साहिब नाम दिया है । परमात्मा नाम तो काल - पुरुष का है। गुरु नानक देव जी ने तो साफ़-साफ़ कह दिया— आठ अटा की अटारी मझारा, देखा पुरुष न्यारा । निराकार आकार न ज्योति, नहिं वह वेद विचारा । ओंकार कत्र्ता नहिं कोई, नहिं वहाँ काल पसारा। वो साहिब सब संत पुकारा, और पाखंड है सारा । सतगुरु चीन्ह दीन्ह यह मारग, नानक नजर निहारा । हम सब मुक्ति की बात करते हैं, पर हमें पता नहीं है कि हम मुक्ति क्यों चाहते हैं। वास्तव में जिस संसार में हम रह रहे हैं, वो काल - पुरुष का संसार है। यहाँ पर आत्मा को दुख ही दुख दिया जा रहा है। काल - पुरुष सब जीवों को कष्ट दे देकर तंग कर रहा है। इसलिए हम सब काल पुरुष की इस

दुनिया से छूटना चाह रहे हैं. पर झंझट यह है कि हमें यह ज्ञान नहीं है कि पूरा तीन लोक काल की सीमा के अन्दर है । हम मृत्यु लोक से छूटकर या स्वर्ग लोक जाना चाहते हैं या ब्रह्म लोक या पार- ब्रह्म लोक। इससे परे की दुनिया का हमें ज्ञान ही नहीं है । हमें आत्मा के सही ठिकाने का पता नहीं है । जाने- अनजाने में हम सभी उस साहिब की तलाश में हैं, पर ठीक से इस रहस्य को समझ न सकने के कारण हमने काल पुरुष को ही अपना परमात्मा मान लिया है। दुख और कष्ट देने वाले को ही अपना परम मित्र समझ लिया है। तभी तो साहिब कह रहे हैं—

जो रक्षक तहँ चीह्नत नाहीं । जो भक्षक तहँ ध्यान लगाहीं । ।

काल- पुरुष का यह तीन लोक पाँच तत्वों से बना है । पाँचों तत्वों की एक सीमा है। शास्त्रों का भी मानना है कि महाप्रलय में ये पाँचों तत्व नष्ट हो जायेंगे। दयानन्द सरस्वती जी के सत्यार्थ प्रकाश में भी इसका उल्लेख मिलता है और वैज्ञानिक लोग भी इस सच्चाई को समझ रहे हैं । क्या यह तीन लोक, जिसमें स्वर्ग लोक, पितर लोक, ब्रह्म लोक आदि आते हैं, नष्ट हो जायेगा ? हाँ, यह सब समाप्त हो जायेगा, इसलिए यह विश्वास के योग्य नहीं है। संत-महापुरुषों ने तभी तो संसार को झूठा, अनित्य, स्वप्नवत् आदि कहा है। इसमें कुछ भी सच नहीं है, क्योंकि सब नाशवान् है । इस अनन्त को संतों ने तीन भागों में बाँटा है - शून्य, महाशून्य और अमर लोक। शून्य और महाशून्य दोनों नाशवान् हैं, पर शून्य वो स्थान है, जहाँ पर ग्रह, उपग्रह आदि हैं, जबकि महाशून्य में निर्गुण सृष्टि है । वहाँ आर्टिकल्स नहीं हैं । यानी जहाँ तक सूर्य, चाँद, तारे, ग्रह, उपग्रह आदि हैं, वो शून्य स्थान कहलाता है । शून्य की सीमा यहाँ तक है। इसके ऊपर फिर महाशून्य है । महाशून्य में ये सब नहीं है। निर्गुण स्थान है । महाशून्य में सात आकाश हैं। इन सात आकाशों को संतों ने सात सुरति कहा है । ये आकाश बड़े विराट् हैं । इनके अन्दर बड़े चुंबकीय आकर्षण हैं। इनमें एक अलोकिक आनन्द है । ये इतने विराट् हैं कि शून्य जैसी करोड़ों सृष्टियाँ एक-एक में समाती जायेंगी । सर्वप्रथम शून्य से पाँच असंख्य योजन ऊपर जाने पर चिंत लोक आता है। अचिंत लोक से फिर तीन असंख्य योजन ऊपर जाने पर सोहंग लोक आता है। सोहंग लोक से पुनः पाँच असंख्य योजन ऊपर

जाने पर मूल - सुरति लोक है । यहीं से चेतना आई है। सुरति लोक से फिर तीन असंख्य योजन ऊपर जाने पर अंकुर लोक होता है । उसके ऊपर फिर इच्छा लोक, फिर वाणी लोक, जहाँ से अनहद धुनें भी आती हैं। अंत में फिर सहज लोक है। ये सात लोक सात आकाश भी कहलाते हैं। सहज लोक अर्थात सातवें आकाश तक भी प्रलय है। इन लोकों से ऊपर अर्थात सहज लोक से एक असंख्य योजन ऊपर जाने पर अमर लोक आता है। यही वो स्थान है, जहाँ कभी नाश नहीं है । यह तीन लोक तो नष्ट हो जाता है, पर वहाँ प्रलय नहीं है । तभी तो साहिब ने ऐसे लोक की बात कही है, जो अमर है, सत्य है, तीन लोक से परे है, सप्त आकाश से भी परे है । वहाँ कभी प्रलय नहीं है । यदि आत्मा अमर है तो निश्चय ही वो अमर देश ही आत्मा का सही ठिकाना है । चल हंसा तू देश हमारे, साहिब देत पुकारा है ।

सत्य तो केवल अमर लोक है, झूठा सब संसारा है।।

साहिब पुकार-पुकार कर कह गये हैं कि हे बंदे, इस झूठी दुनिया से ऊपर उठ और अपने देश चल। यह देश आत्मा का नहीं है । साहिब की वाणी बार-बार चेता रही है।

चलना तो है दूर मुसाफिर काहे सोवे रे ॥

यह आत्मा बड़ी दूर से आई है । यह देश इसका नहीं है। यदि यह परमात्मा का देश होता तो साहिब की वाणियाँ यह क्योंकर कहतीं ! चल हंसा सतलोक हमारे, छोड़ो यह संसारा हो ।

यहि संसार काल है राजा, कर्म का जाल पसारा हो ॥

चौदह खंड बसे वाके मुख में, सबही को करत अहारा हो ।

बारबार कोयला कर डारन, फिर फिर दे अवतारा हो ॥

ब्रह्मा विष्णु शिवतन धरिया, और को कौन विचारा हो ।

सुन नर मुनि सब छलछल मारले, चौरासी में डारा हो ॥

मध्य अकाश आप जहँ बैठे, ज्योति शब्द ठहियारा हो ।

ताको रूप कहाँ लग बरनो, अनंत भानु उजियारा हो ॥

श्वेत स्वरूप शब्द जहाँ फूले, हंसा करत बिहारा हो ।

कोटिन चाँद सूर्य छिपि जैहैं, एक रोम उजियारा हो ॥

वही पार इक नगर बसत है, बरसत अमृत धारा हो ।

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा, लखो पुरुष दरबारा हो ॥

कह रहे हैं कि हे हंस ! इस संसार को छोड़ो और हमारे सत्यलोक में चलो। यह संसार तो काल - पुरुष का देश है, जहाँ कर्म का जाल फैला हुआ है। यह काल-पुरुष सबको मार-मारकर बुरा हाल कर रहा है । त्रिदेव आदि भी यहाँ शरीर धारण कर रहे हैं। वो सुर, नर, मुनि आदि सबको धोखा दे रहा है और चौरासी में डाल रहा है। वो स्वयं तो आकाश में ज्योति-स्वरूप होकर बैठा हुआ है । वहाँ करोड़ों सूर्यों का प्रकाश है। पर उससे परे एक देश है। वहाँ अमृत-धारा बह रही है। वहाँ करोड़ों चाँद और सूर्य एक रोम के प्रकाश से लजा जाते हैं। हे धर्मदास ! परम-पुरुष के उस दरबार को देखो। यह संसार काल-पुरुष का देश है । यहाँ पर कुछ भी आत्मा के हित में नहीं है। वो सबको यहाँ पर दुख दे रहा है। लोग अवतारों की महिमा गाते हैं, पर साहिब कह रहे हैं कि वो भी उसी की सीमा में हैं। तीन-लोक में जो भी , सब काल के दायरे में है । यह हरदो यहाँ काल पुरुष के है हिजारे । हर सिम्त व हर जाय में यम जाल

पसारे ॥

यक लोक व यक वेद दो दरिया के किनारे | सैयाद के काबू में हैं सब जीव

बेचारे ॥

चलती है यहाँ तेग व तलवार दोधारे । चल हंस अचल मोलिदो

मावाय हमारे ॥

कह रहे हैं कि यहाँ सब काल का ही है। हर शै में उसका जाल फैला हुआ है। दुनिया के सब लोग उस क्रूर के काबू में हैं। इसलिए हे हंस ! तू हमारे देश में चल । आगे कह रहे हैं- जब भूल गया आदम को आपही आपा । पावन्द हुवा तिफली जवानी व

बुढ़ापा ॥

सबपर है लगा मलिक मौत मोह व छापा । है आग लगी बेश: जलेगा यह

सरापा ॥

जलते हैं धोल उड़ते धुवें धार शरीरे । चल हंस अचल मोलिदो मावाय

हमारे ॥

कह रहे हैं कि यहाँ सब पर मौत का साया मण्डरा रहा है । काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि की आग लगी हुई है, जिसमें सारा संसार जल रहा है। इसलिए इस जलते हुए संसार को छोड़ और हमारे देश में चल। अफसोस लिया लूट धरम धरमन धूरत। एक इश्क जदः भई है हर कौन किया भौन है यह हुस्न है औरत ॥ मोहिनी मूरत । दिल पार हुवा पार: बमह पारए

सूरत॥

बाजार खड़े मार वा बीमार नजारे ।

चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥

यहाँ पर आत्मा का धर्म लूट लिया गया है, उसका लोप हो गया है। यहाँ पर प्रेम करने के लिए एक सुन्दर स्त्री बनी है। सब उसी पर मोहित हो रहे हैं। यहाँ सबको यह रोग लगा हुआ है। इसलिए हे हंस! तू इस संसार को छोड़ और हमारे देश में चल । कैलास चलेगा व अमरावती अलकावती गोलोक जिनूँ लोक चलेगा ॥ चलेगा। सब स्वर्ग चलेगा व तपोलोक चलेगा। जो हद्द जनो मर्द में सो लोक

चलेगा ॥

वो भी जल जावे जहाँ नौलाख

सितारे | चल हंस अचल मोलिदो मावाय

हमारे ॥

यहाँ जो कुछ भी देख रहे है, एक दिन नष्ट हो जायेगा। स्वर्ग लोक, तप लोक आदि भी नहीं रहेगा। नौ लाख तारे भी नहीं रहेंगे । इसलिए हे अमर हंस! तू इस नश्वर संसार को छोड़कर उस अमर - धाम को चल । कोई न रहे एक पुरुष लोक रहेगा । आवे जो वहाँ से सो ख़बर उसकी

कहेगा ॥

सब कौल कर शमः अजिले सोल बहेगा ।

जिसको वह नजर आवे सो फिर कछु न

चहेगा ॥

निश्चल सो रहे कायक जहाँ अमृतधारे ।

चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥

अगर कुछ अमर है, अगर कुछ रहेगा तो वो परम - पुरुष का लोक ही

रहेगा और अन्य कुछ भी नहीं रहेगा; सब मिट जायेगा । जो वहाँ से आयेगा, वो उसकी ख़बर कहेगा। जिसको वो नज़र आ गया, फिर वो कुछ न चाहेगा । इसलिए हे हंस! तू उसी देश को चल ।

हंसों की हुन खूबी कही जाए सो कैसे ।

यह नातिकः गुम सुम्म बयां कीजिए ऐसे ॥

एक मूय मुनौविर कह इस नूरका जैसे 1

छिप जाय करोड़ों महेहुर तलअत तैसे ॥

सब हंस पुरुष रूप पुरुष उनको दुलारे ।

चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥

वहाँ हंसों की सुन्दरता का बखान नहीं किया जा सकता है। करोड़ों सूर्य और चंद्रमा वहाँ के प्रकाश के आगे फीके पड़ जाते हैं । परम - पुरुष वहाँ सब हंसों से प्रेम करते हैं । हे हंस ! तू भी वहाँ चल ।

जहाँ रात न दिन है व नहीं सूरज चंदा ।

सोहंग दुरै चँवर करे पुरुष अनन्दा ॥

यक मूरत सारे न खुदावन्द न बन्दा ।

इस मंजिल नजदीक नहीं काल का फंदा ॥

जिस लोक हमेशा को परमहंस पधारे ।

चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥

वहाँ न रात है, न दिन है, न सूर्य है, न चाँद, न कोई खुदा, न बन्दा । सब उसी के रूप हैं । जिस लोक में परमहंसों का आना-जाना लगा रहता है, है हंस! तू भी उस देश में चल । सतगुरु की शरण लेके चलो बहके उस पार । वह कादिर मुतलक हुवा जिस जीव का

मददगार ॥

पहुँचावे वतन में न बुतन में होवे कर पल में सुबुक दोष उठा उसका गरां बार । आजिज से गुनहगार कतारों को जो औतार ॥ तारे ।

चल हंस अचल मोलिदो मावाय

हमारे ॥

हे हंस ! सतगुरु की शरण ग्रहण कर, क्योंकि वो ही जीव का सच्चा सहायक है। वो तुझे पल में वहाँ पहुँचा देगा। वो तेरे सब दोषों को मिटाकर तुझे वहाँ ले जायेगा। हे हंस ! इस तरह सद्गुरु की शरण लेकर उस देश में चल।

काल- पुरुष ने इस संसार में कुटुंब परिवार आदि के मोह - जाल में जीव को फँसा दिया है । काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि में जीव उलझ गया है । साहिब चेता रहे हैं-

खलक है रैन का सपना। समझझ दिल कोई नहीं अपना ॥

कहीं है लोभ की धारा । बहा जग जात है सारा ॥

घड़ा ज्यों नीर का फूटा । पतर जैसे डार से टूटा ॥

ऐसी निर्जान जिंदगानी। अजौं क्यों न चेत अभिमानी ॥

सजन परवार सुतदारा। सभी उस रोज हों न्यारा ॥

निकल जब प्राण जावेंगे। कोई नहिं काम आवेंगे ॥

निरख मत भूल तन गोरा । जगत में जीवना थोरा ॥

सदा जिन जान यह देही । लगाओ सतनाम से नेही ॥

कटे यम काल की फाँसी। कहें कबीर अविनाशी ॥

कह रहे हैं कि यह संसार तो रात के सपने की तरह हैं । यहाँ पर कोई भी अपना नहीं है। यहाँ पर लोभ की कठिन धारा बह रही है और सारा संसार उसी में बहे जा रहा है। जैसे पानी का घड़ा फूटता है, जैसे डाली से पत्ता टूटता है, ऐसे ही यह जिंदगी एक दिन समाप्त हो जायेगी । इसलिए हे अभिमानी जीव ! सावधान हो जा। मित्र, कुटुम्बी, पुत्र, स्त्री आदि कोई भी तेरे काम नहीं आयेगा। ये सब एक दिन छूट जायेंगे। जब तेरे प्राण निकल जायेंगे तो ये सब तेरे काम नहीं आयेंगे। तू गोरे तन को देखकर मत भूल। इस संसार में थोड़ा-सा ही जीवन है। इसलिए तू अहंकार, लोभ और सारी चतुराई को त्यागकर इस संसार की माया से परे रह और सत्यनाम से प्रीत कर, जिससे काल की फाँस कट सके । साहिब बार-बार कह रहे हैं- हंसा सुध करो आपन

देश ॥

जहाँ से आयो सुधि बिसरायो, चले गयो परदेश ॥

वहि देशवा में जोते न बोवै, मोती फिरै हमेश ॥

वहि देशवा में मरै न बिगड़ै, दुक्ख न पड़त कलेश ॥

चलो हंसा बसो मानसरोवर, मोती चुगो हमेश॥

कहत कबीर सुनो भाई साधो, अजर अमर वह देश ॥

वो विद्वानों की समझ से बाहर है, क्योंकि वो वेद-शास्त्रों की सीमा

से भी कहीं ऊपर है। वहाँ बुद्धि और कल्पना की पहुँच भी नहीं है । वहाँ जाकर फिर कभी इस मृत्यु लोक में नहीं लौटना है। तहँ के गये बहुरि न आवै, ऐसा देश हमारा है । अवधू बेगम देश हमारा है। वेद कितेब पार नहीं पावत, कहन सुनन से न्यारा है । बिन बादल जहँ बिजुरी चमके, बिन सूरज उजियारा है। बिना सीप जहाँ मोती उपजे, बिन मुख बैन उच्चारा है । ज्योति लगाए ब्रह्म जहाँ दरशे, आगे अगम अपारा है ।

कहैं कबीर तहाँ रहनि हमारी, बूझे गुरुमुख प्यारा है ।।

सगुण निर्गुण से परे सत्य भक्ति की बात कर रहे हैं

भक्ति-भक्ति सब जगत बखानी । भक्ति भेद कोई बिरले जानी।।

संन्यासी योगी लटधारी । करी भक्ति पर युक्ति न धारी ।।

यह भक्ति की कैसी युक्ति ! कुछ लोग सगुण उपासना कर रहे हैं, ठीक है । उसकी निंदा नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि जो भक्ति करने वाला है, वो ज़रूर आम आदमी से अच्छा है । उसमें प्रेम भी होगा, इसलिए वो निंदनीय नहीं है, पर हरेक भक्ति की अपनी पहुँच है, संतों ने यह कहा, निंदा की ही नहीं। सगुण और निर्गुण भक्ति में गुरु का ज़्यादा महत्व नहीं है। गुरु का काम केवल शिष्य को राह बताना है। सफर शिष्य को ही तय करना है । यह शिष्य की ताक़त पर निर्भर करता है कि वो कहाँ तक पहुँच पाता है। इसमें नाम का भी ज़्यादा महत्व नहीं है । यह नाम भी सांसारिक ही होता है । इसी कारण शिष्य ब्रह्माण्ड तक ही सीमित रहता है, उससे परे नहीं जा पाता । सगुण- भक्ति से सामीप्य और सालोक्य मुक्ति की प्राप्ति होती है जबकि निर्गुण-भक्ति से सारोप्य और सायुज्य मुक्ति मिलती है। सामीप्य मुक्ति : सामीप्य मुक्ति क्या है ? अच्छे काम करो, किसी को न सताओ, श्राद्ध आदि करो, सारा जीवन अपने कुल देवता की उपासना करते रहो तो यह मुक्ति आसानी से मिल जाती है । इसमें मरने के बाद जीव पितर लोक में चला जाता है और हज़ारों साल तक वहाँ रहता है । वहाँ पर संसार जैसा कष्ट नहीं है। सुख है वहाँ पर । वहाँ आत्मा को एक सूक्ष्म देही होती है,