काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)
Kashyapa Samhita Hindi
महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा
स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)
जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ८ ] शारीरस्थानम् १२३
पक्लेदिनां, पुरीषक्षये कुल्माषमाषकुष्माण्डामध्ययवशाकधान्याम्लानां, वातक्षये कटुतिक्तकषायरूक्षलघुशीतानां, पित्तक्षयेऽम्ललवणकटुकक्षारोष्णातीक्ष्णानां, श्लेष्मक्षये स्निग्धगुरुमधुरसान्द्रपिच्छिलानां द्रव्याणां, कर्माणि च यद्यद्यस्य धातोर्वृद्धिकरं तत्तदासेव्यं, एवमन्येषामपि शरीरधातूनां सामान्यविपर्ययाभ्यां वृद्धिक्षयौ यथाकालं कार्यौ, इति सर्वधातूनामेकैकशोऽतिदेशतश्च वृद्धिकराणि व्याख्यातानि भवन्ति ॥१०॥ .......................................
यानि द्रव्याणि पुण्यानि मङ्गल्यानि शुचीनि च।
नवान्यभग्नखण्डानि पुन्नामानि प्रियाणि च॥
गर्भिण्यै तान्युपहरेद्वासांस्याभरणानि च। न स्त्रीनपुंसकाख्यानि धारयेद्वा लभेत वा ।।
गर्भिणी का आचार व्यवहार—पुण्यकारक, मङ्गलमय, पवित्र, नवीन, अभग्न तथा अखण्डित, पुरुष नाम वाले (अथवा पुल्लिंग) एवं प्रिय द्रव्य तथा वस्त्र आभरणादि गर्भिणी को देवे। स्त्री अथवा नपुंसक नाम अथवा लिङ्ग वाले द्रव्यों को गर्भिणी न धारण करे और न प्राप्त करे।
धूपितार्चितसंभृष्टं मशकाद्यपवर्जितम्। ब्रह्मघोषैः सवादित्रैर्वादितं वेश्म शस्यते ।।
(प्रातरुत्थाय) शौचान्ते गुरुदेवार्चने रता। अर्चेदादित्यमुद्यन्तं गन्धधूपार्घ्यवाजपैः ।।
क्षीयमाणं च शशिनमस्तं यान्तं च भास्करम्। न पश्येद्गर्भिणी नित्यं नाप्युभौ राहुदर्शने ।।
सोमार्कौ सग्रहौ श्रुत्वा गर्भिणी गर्भवेश्मनि। शान्तिहोमपराऽऽसीत मुक्तयोगं तु याचयेत् ।।
न द्विष्यादतिथिं भिक्षां दद्यान्न प्रतिवारयेत्। स्वयं प्रज्वालिते चाग्नौ शान्त्यर्थं जुहुयाद्धृतम् ।।
पूर्णकुम्भं घृतं माल्यं पूर्णपात्रं घृतं दधि। न किञ्चित् प्रतिरुन्धीयान्न च बध्नीत गर्भिणी ।।
सूत्रेण तनुना रज्ज्वा स्तम्भनं बन्धनानि च। वर्जयेद्गर्भिणी नित्यं कामं बन्धानि मोक्षयेत् ।।
गर्भिणी जिस घर में रहती हो उसमें सदा धूप जलानी चाहिये, पूजा होनी चाहिये, घर मच्छर आदि से रहित होना चाहिये तथा गाजे बाजों सहित घर में सदा गाना-बजाना होता रहना चाहिये। गर्भिणी को प्रातः उठकर शौच स्नान आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर गुरु तथा देवता की अर्चना करनी चाहिये तथा गन्ध, धूप, अर्घ्य (नैवेद्य) तथा जप आदि के द्वारा उदय होते हुए सूर्य की पूजा करनी चाहिये। गर्भिणी को चाहिये कि वह क्षीण होते हुए (कृष्ण पक्ष के) चन्द्रमा तथा अस्त होते हुए (सायंकालीन) सूर्य को न देखे तथा दोनों राहुओं (राहु तथा केतु) को भी न देखे। चन्द्र ग्रहण तथा सूर्यग्रहण का ज्ञान होने पर गर्भिणी को गर्भगृह में जाकर शान्ति होम आदि कार्यों में लगकर सूर्य तथा चन्द्रमा की ग्रह द्वारा मुक्ति की प्रार्थना करनी चाहिये। वह अतिथि से द्वेष न करे, उसे भिक्षा देवे, अतिथि को कभी खाली न लौटाये तथा स्वयं शान्ति के निमित्त प्रज्वलित अग्नि में घृत की आहुति देवे। गर्भिणी स्त्री को जल से भरे हुए घड़े, घृत, माला, तथा घृत एवं दही से भरा हुआ पात्र इत्यादि किसी चीज का प्रतिरोध नहीं करना चाहिये। तथा गर्भिणी स्त्री को धागे अथवा पतली रस्सी आदि से स्तम्भन तथा बन्धन आदि नहीं बांधना चाहिये तथा उसे अपने सम्पूर्ण बन्धनों को ढीला रखना चाहिये। अर्थात् गर्भिणी स्त्री को कोई भी वस्त्र अथवा अन्य बन्धन आदि बहुत कस कर नहीं बांधना चाहिये।
अथ हीमानि रूपाणि गर्भिण्या उपलक्षयेत्।
यानिदृष्ट्वा विजानीयाद्गालजन्म(न्म)न्युपक्रमेत् (मम्) ।।
इसके बाद गर्भिणी के निम्न लक्षणों को देखकर यह जान ले कि अब बालक का जन्म होनेवाला है अर्थात् अब वह उपस्थित प्रसवा है॥
मुखग्लानिः क्लमोऽङ्गानामक्षिबन्धनमुक्तता। कुक्षेश्च स्यादवस्त्रंसस्त्वधोभागस्य गौरवम् ।।
पृष्ठपार्श्वकटीबस्तिवंक्षणं चातितुद्यति। योनिप्रस्रवणौदार्यभक्तद्वेषारतिक्लमाः ।।
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उपस्थितप्रसवा के लक्षण—मुख की ग्लानि अथवा मुख का मुरझाना, अङ्गों का क्लम या शिथिलता, अक्षिबन्धन की शिथिलता, कुक्षि का शिथिल होना (उरोदेश से गर्भाशय के नीचे खिसक जाने से), अधोभाग (शरीर के निचले हिस्से) का भारी होना, पीठ, पार्श्व, कटि, बस्ति तथां वंक्षण (राननों) में अत्यन्त पीडा होना, योनिस्राव, उदारता, भक्तद्वेष (भोजन में अरुचि), अरति (अरुचि) तथा थकावट—ये उपस्थित, प्रसवा के लक्षण हैं। चरक शा. अ. ८ में कहा है—तस्यास्तु खल्विमानि लिङ्गानि प्रजननकालमभितो भवन्ति, तद्यथा—क्लमो गात्राणां, ग्लानिराननस्य, अक्ष्णोः शैथिल्यं, विमुक्तबन्धनत्वमिव वक्षसः, कुक्षेरवस्रंसनं, अधोगुरुत्वं, वंक्षणबस्तिकटिकुक्षिपाश्वपृष्ठनिस्तोदो, योनेः प्रस्रवणं, अनन्नाभिलाषश्चेति, ततोऽनन्तरभावीनां प्रादुर्भावः प्रसेकश्च गर्भोदकस्य। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १० में भी कहा है—जाते हि शिथिले कुक्षौ मुक्ते हृदयबन्धने । सशूले जघना नारी ज्ञेया सा तु प्रजायिनी॥ तथा इसके आगे फिर कहा है—तत्रोपस्थितप्रसवायाः कटीपृष्ठं प्रति समन्ताद्वेदना भवत्यभीक्ष्णं पुरीषप्रवृत्तिमूत्रं प्रसिच्यते योनिमुखाच्छ्लेष्मा च॥
एतानि दृष्ट्वा रूपाणि कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् । प्रविशेयुः स्त्रियो वृद्धाः कुशलाः शस्तधाविताः १ ॥
इन उपर्युक्त लक्षणों को देखकर ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन करवाकर वृद्ध, कुशल, प्रशस्त तथा स्नान द्वारा शुद्ध हुई स्त्रियां गर्भिणी के पास गर्भग्रह में प्रवेश करें। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—तां ताः समन्ततः परिवार्य यथोक्तगुणाः स्त्रियः पर्युपासीरन्नाश्वासयन्त्यो वाग्भिर्ग्राहिणीयाभिः सान्त्वनीयाभिः। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. १० में भी कहा है—प्रजनयिष्यमाणां कृतमङ्गलस्वस्तिवाचनां कुमारपरिवृतां पुत्रामफलहस्तां स्वभ्यक्तामुष्णोदकपरिषिक्तामथैनां सम्भृतां यवागूमाकण्ठात् पाययेत्। ततः कृतोपधाने मृदुनि विस्तीर्णे शयने स्थितामाभुग्नसक्थीमुत्तानामशङ्कनीयाश्चतस्रः स्त्रियः परिणतवयसः प्रजननकुशलाः कर्तितनखाः परिचरेयुरिति॥
गर्भिणीं सान्त्वयेयुस्ता हर्षयेयुः प्रियंवदाः ।। आश्वासयेयुर्धर्मार्थों चोदयन्तं प्रजापतिम् ।। लोकान् पुत्रवतीनां च सुखानि विविधानि च । कीर्तयेयुरपुत्राणां दुःखानि निरयादिषु ।। अदितिं कश्यपं देवमिन्द्राणीमिन्द्रमश्विनौ । आयुष्मतां पुत्रवतां मङ्गल्यानां च कीर्तनम् ।।
प्रिय वचनों को बोलने वाली वे स्त्रियां धर्म और अर्थ के निमित्त प्रजापति ब्रह्मा को प्रेरित करती हुई गर्भिणी को सान्त्वना दें, उसे हर्षित (प्रसन्न) करें तथा उसे आश्वासन दें। उसके सामने पुत्रवती स्त्रियों के विविध सुखों तथा अपुत्रवती (पुत्र रहित) स्त्रियों के दुःखों का वर्णन करें। तथा उसके सामने अदिति और कश्यप देवता, इन्द्राणी, इन्द्रअश्विनीकुमार तथा अन्य आयुष्मान् पुत्रवान् तथा मङ्गलकारी देवताओं का कीर्तन करना चाहिए॥
तन्त्रीवर्णोऽल्पश२: स्त्रावः पिच्छिलः पुत्रजन्मनि । किंशुकोदकसंकाशः पुत्रिकाजन्म शंसति ।।
पुत्र की उत्पत्ति में स्त्री की योनि से गिलोय के रस के समान थोड़ा २ तथा चिपचिपा स्राव निकलता है। तथा कन्या (पुत्री) की उत्पत्ति में किंशुकोदक (पलाशढाक के फूल) के समान स्राव होता है॥
सूतेरूर्ध्वं तु ये स्त्रावा निन्दिताञ् शमयेत्तु तान् । तस्या अस्यामवस्थायामुपयाचेत देवताः ।।
प्रसव के बाद स्त्री की योनि से जो स्त्राव (Abnormal Dischargés) होते हैं, वे निन्दित माने गये हैं अतः उनको शान्त करे अर्थात् उनकी चिकित्सा करे। इस अवस्था में उसके लिये देवताओं से प्रार्थना करनी चाहिये॥
१. शस्ताः प्रशस्ताः, धाविताः शुद्धाश्चेत्यर्थः। २. गुडूची रस सदृश इत्यर्थः।
जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १२५
अव्यावृते स्त्रिया गर्भे विवृते चापरामुखे¹ । ग्राहीषु² वर्तमानासु सा विवर्तेत गर्भिणी ।।
स्त्री के गर्भ के अव्यावृत (संकुचित) होने पर, जरायु के मुख के फैल जाने पर तथा ग्राही (प्रसववेदनाओं Labour Pains) के उपस्थित होने पर गर्भिणी को इसके लिये तैयार हो जाना चाहिये ।।
न तीक्ष्णं³ ग्राहिशूलेषु क्षिप्रं नारी प्रजायते । विलम्बिताभिरावीभिर्गर्भः क्लेशयते स्त्रियम् ।।
प्रसव वेदनाओं के तीक्ष्ण (तीव्र-Acute) हो जाने पर गर्भिणी को शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। परन्तु यदि प्रसव वेदनायें ठीक समय पर न होकर देर में हो तो गर्भिणी को अत्यन्त क्लेश होता है।
केचिदस्यामवस्थायां व्यायामं मुसलादिकम् । जृम्भाचङ्क्रमणायं च भिषजो ब्रुवते हितम् ।।
कुछ वैद्य इस अवस्था में अर्थात् प्रसव वेदनाओं के देर में होने पर कहते हैं कि गर्भिणी को मूसल आदि द्वारा व्यायाम, जंभाई तथा इधर उधर चलना फिरना हितकारी है। अर्थात् इन क्रियाओं द्वारा शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। चरक शा. अ. ८ में भी कहा है—सा चेदावीभिः संक्लिश्यमाना न प्रजायेताथैनां ब्रूयात् उत्तिष्ठ मुसलमन्यतरत् गृह्णीष्वानेनतदुलूखलं धान्यपूर्णं मुहुर्मुहुरभिंजहि, मुहुर्मुहुरवजृम्भस्व, चङ्क्रमस्व चान्तरान्तरा इत्येवमुपदिशन्त्येके ।।
वर्जनीयं तु तत् सर्वं भगवानाह कश्यपः । नार्याः प्रसवकाले हि शरीरमुपमृद्यते ।।
त्रयो दोषाः प्रकुप्यन्ति विचाल्यन्ते च धातवः । गर्भिणी तदवस्था हि यत्नधार्या विशेषतः ।।
परन्तु भगवान् कश्यप कहते हैं कि मूसल आदि द्वारा व्यायाम, जंभाई एवं चङ्क्रमण आदि सब क्रियाओं का त्याग करना चाहिये। अर्थात् प्रसव को शीघ्र करने के लिये उपर्युक्त क्रियाओं का प्रयोग नहीं करना चाहिये। क्योंकि प्रसवकाल के समय स्त्री का शरीर अत्यन्त मृदु होता है, वातपित्त कफ तीनों दोष प्रकुपित होते हैं तथा उस समय शरीर की सब धातुएं अपने स्थान से विचलित हुई होती हैं। गर्भिणी की वह अवस्था अत्यन्त यत्नपूर्वक धारण करने योग्य होती है।
अधिकं सौकुमार्यं हि गर्भिण्याः क्लेद्यमेव च । स्रावकाले विशेषेण विषादभयसंश्रयः ।।
एकपादो यमकुले पाद एक इह स्थितः । दृष्ट्वा दुःखं स्त्रियस्तस्या इत्येवं ब्रुवते मिथः ।।
उस समय गर्भिणी अत्यन्त सुकुमार होती है तथा उसमें क्लेद की वृद्धि हुई होती है। उपर्युक्त क्रियाओं से जब गर्भ का स्राव होता है उस समय विशेष विषाद तथा भय होता है। उस समय अन्य स्त्रियाँ उसके दुःख (कष्ट) को देखकर परस्पर कहती हैं कि इसका एक पैर यम के घर में तथा एक पैर इस लोक में है अर्थात् इसकी इस प्रसवावस्था में कभी भी मृत्यु हो सकती है ।।
तस्यास्त्वस्यामवस्थायां व्यायामो न प्रशस्यते । व्यायामः सेव्यमानो हि गर्भिणीमाशु नाशयेत् ।।
अतिचङ्क्रमणेनापि हन्याद्गर्भमुपस्थितम् । अत्ययं प्राप्नुयाद्घोरं देहान्तकरणं महत् ।।
इसलिये गर्भिणी की इस अवस्था में व्यायाम हितकर नहीं है। व्यायाम करने से गर्भिणी की मृत्यु हो सकती है। अतिचङ्क्रमण (अधिक इधर उधर घूमने) से भी उपस्थित गर्भ नष्ट हो जाता है। उस स्त्री को देह का अन्त करने वाले, महान् तथा भयंकर रोग हो जाते हैं। उपर्युक्त मूसल आदि के व्यवहार तथा चङ्क्रमण आदि क्रियाओं का चरक में भी निषेध किया गया है। चरक शा. अ. ८ में कहा है—तन्नेत्याह भगवानात्रेयः–दारुणव्यायामवर्जनं हि गर्भिण्याः सततमुपदिश्यते, विशेषतश्च प्रजननकाले प्रचलितसर्वधातुदोषायाः सुकुमार्या नार्या मुसलव्यायामस्मीरितो वायुरन्तरं लब्ध्वा
१. अपरामुखे जरायुमुखे इत्यर्थः ।
२. 'आवीषु' इति पाठश्चेत् साधु ।
३. 'न तीक्ष्णं' इत्यत्र 'तीक्ष्णेषु' इति पाठश्चेत् साधु ।
१२६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् जातिसूत्रीयशरीराध्यायः ? ]
प्राणान् हिंस्यात्, दुष्प्रतीकारा हि तस्मिन् काले विशेषेण भवति गर्भिणी, तस्मान्मुसलग्रहणं परिहार्यमृषयो मन्यन्ते, जृम्भणं चङ्क्रमणं च पुनरनुष्ठेयमिति ।।
उपविष्टाऽसकृत्तस्मादनिर्विण्णा(ऽ)त्रपान्विता । वृद्धस्त्रीद्रव्यसंपन्ना प्रजायेत प्रजार्थिनी ।।
इसलिये प्रसव की इच्छा वाली स्त्री को चाहिये कि वह प्रसन्न मन वाली, लज्जा से रहित तथा वृद्धस्त्रियों एवं धन से युक्त हुई बार २ बैठी हुई प्रसव (प्रजननकार्य) को करे।
वचा लाङ्गलीकी कुष्ठं चिरबिल्वैलचित्रकाः । चूर्णितं मुख(हु)राजिघ्रेत्तथा शीघ्रं प्रजायते ।। आजिघ्रेद्भूर्जधूपं वा नमेरोगुग्गुलोस्तथा । अथ(धः) प्रपद्यते गर्भस्तथा क्षिप्रं विमुच्यते ।। पार्श्वसन्धिकटीपृष्ठं तैलेनोष्णेन प्रक्षितम् । मृद्नीयुरवकर्षेयुः शनैः प्राज्ञ्यः स्त्रियः सुखाः(खम्) ।।
चिरप्रसव की चिकित्सा अथवा उपाय—वचा, कलिहारी, कुष्ठ, चिरबिल्व (करञ्ज), छोटी इलायची तथा चित्रक का सूक्ष्म चूर्ण बार २ सूंघने के लिये देने से शीघ्र ही प्रसव हो जाता है। अथवा भोजपत्र के धुएँ को या सरल देवदारु और गूगल के धुएँ को सूंघने से गर्भ शीघ्र ही नीचे की ओर आ जाता है तथा अपने स्थान से छूट जाता है। तथा बीच २ में निपुण स्त्रियां उसके पार्श्व, सन्धियां, कटी तथा पृष्ठ देश में धीरे २ सुखपूर्वक उष्ण तेल चुपड़कर मालिश करें तथा अवकर्षण करें अर्थात् गर्भ को नीचे लाने का प्रयत्न करें। चरक शा. अ. ८ में भी ये भी ही विधियां दी हैं-अथास्यै दद्यात्कुष्ठैलालाङ्गलिकीवचा चित्रकचिरबिल्वचूर्णमुपाघ्रातुं, सा तन्मुर्मुहुरुपजिघ्रेत्, तथा भूर्जपत्रधूमं शिंशपाधूमं वा, तस्याश्चान्तरान्तरा कटीपार्श्वपृष्ठ सक्थिदेशानीषदुष्णेन तैलेनाभ्यज्यानुसुखमवमृद्नीयात्, इत्यनेन तु कर्मणा गर्भोऽवाक्प्रतिपद्यते ।।
दुर्बलां पाययेन्मद्यमित्येके, नेति कश्यपः । पूर्वक्लिष्टा तथैवास्या(ऽसौ)यवागूं तृषिता पिबेत् ।।
उपर्युक्त चिकित्साओं के अतिरिक्त कुछ लोग कहते हैं कि यदि वह दुर्बल हो तो उसे मद्य (Brandy) पिलाये, परन्तु भगवान् कश्यपं कहते हैं कि यह ठीक नहीं है। क्लान्त एवं तृषित (प्यासी) होने पर उसे यवागू पीना चाहिये।
यदा गर्भोदकं योनौ सशूलं संप्रवर्तते । कालेन चोदितो गर्भो विमुच्य हृदयोदरम् ।। बस्तिशीर्षमधोभागमवगृह्णाति जन्मनि । ग्लानिश्च जायतेऽत्यर्थं योन्युत्पीडनभेदनम् ।। इत्येतैः कारणैर्विद्याद्गर्भस्य परिवर्तनम् । अथास्याः प्रसवश्चेति ततः पर्यङ्कमारुहेत् ।। प्रावारमुपधानं वा ....................................................
(इति ताडपत्रपुस्तके ८७ तमं¹ पत्रम्² ।)
(शारीरस्थानस्यैतावानेव भाग उपलब्धः)
जब शूल सहित गर्भोदक योनि में आ जाये तथा काल से प्रेरित हुआ गर्भ हृदय प्रदेश को छोड़कर नीचे आ जाता है, बस्तिशीर्ष तथा उसके अधोभाग को पकड़ लेता है, ग्लानि अत्यधिक होती है, योनि में उत्पीडन तथा भेदन (वेदना)
१. अस्मिंश्च पत्रे ताडपत्रीयपुस्तके आपाततो दर्शने २२ किल पत्राङ्काः प्रतिभान्ति, परन्त्रापूर्वापरग्रन्थसन्निकर्षौचित्येन ८७ तमत्रुटितपत्रस्थानीयत्वेनेदं निर्दिष्टम् । २. अस्याग्रे चतुष्पत्रात्मको ग्रन्थः खण्डितस्ताडपत्रपुस्तके ।
जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] शारीरस्थानम् १२७
अनुभव हो—तब इन उपर्युक्त लक्षणों से यह जाना जाता है कि गर्भ का नीचे की ओर परिवर्तन हो गया है तथा प्रसव होने वाला है। इस अवस्था में उस उपस्थितप्रसवा स्त्री को प्रावार (चादर) तथा उपधान (तकिया) लगे हुए पलंग पर लिटाकर—(प्रवाहण करना प्रारम्भ कराये)
वक्तव्य—चरक शा. अ. ८ में कहा है—स यदा जानीयाद्विमुक्तं हृदयमुदरमस्यास्तवाविशति, बस्तिशिरोऽवगृह्णाति, त्वरयन्त्येनामावयः, परिवर्तते अधो गर्भ इति, अस्यामवस्थायां पर्यङ्कमेनामारोप्य प्रवाहयितुमुपक्रामयेत्। यह अध्याय यहीं पर मध्य में ही खण्डित हो गया है। प्रकरण को देखते हुए कहा जा सकता है कि सम्भवतः इससे आगे इसमें प्रवाहण द्वारा गर्भ की उत्पत्ति (Delivery) अपरापातन तथा माता एवं शिशु के जातकर्म का उल्लेख किया गया होगा। पाठकों के ज्ञान के लिये हम इन विषयों को अन्य ग्रन्थों के आधार पर संक्षेप से देते हैं। उपस्थित प्रसवा स्त्री के प्रवाहण के लिये चरक शा. अ. ८ में कहा है—ताश्चैनां यथोक्तगुणाः स्त्रियोऽनुशिष्युः—अनागतावीर्मा प्रवाहिष्ठाः, या ह्यनागतावीः प्रवाहयते व्यर्थमेवास्यास्तत्कर्मभवति, प्रजा चास्याविकृतिमापन्ना श्वासकाशशोषप्लीहप्रसक्ता वा भवति, यथा हि क्षवथूद्गारवातमूत्र पुरीषवेगान् प्रयतमानोऽप्यप्राप्तकालाान्न लभते कृच्छ्रेण वाप्यवाप्नोति तथाऽनागतकालं गर्भमपि प्रवाहमाणा, यथा चैषामेव क्षवथ्वादीनां सन्धारणमुपघातायोपपद्यते तथा प्राप्तकालस्य गर्भस्याप्रवाहणं, सा यथानिर्देशं कुरुष्वेति वक्तव्या, तथा च कुर्वती शनैः शनैः पूर्वं प्रवाहेत ततोऽनन्तरं बलवत्तरं, तस्यां च प्रवाहमाणायां स्त्रियः शब्दं कुर्युः ‘प्रजाता प्रजाता धन्यं धन्यं पुत्रम्’ इति, तथाऽस्या हर्षेणाप्यायन्ते प्राणाः। जब उसे प्रसववेदनाएं हो रही हों उस समय उसे प्रवाहण करना चाहिये। जब वेदनाएं न हो रही हों उस समय प्रवाहण का कोई लाभ नहीं होता। इस प्रकार वेदनाओं के साथ २ धीरे २ प्रवाहण को भी बढ़ा देना चाहिये। इससे गर्भ विशेष कष्ट के बिना बाहर आ जाता है। अपरापातन—गर्भ के बाहर आने के बाद परिचारिकाओं का सबसे प्रथम कर्तव्य यह देखना है कि अपरा (Placenta) बाहर आई है या नहीं। प्रसव के ४० मिनिट के बाद तक भी वह यदि बाहर नहीं आई है तो उसे निम्न विधि से गिराने का प्रयत्न करें ! एक स्त्री प्रसूता के पेट की दीवार में से गर्भाशय को इसप्रकार पकड़े कि उसका अंगूठा सामने तथा अंगुलियां गर्भाशय के पीछे रहें। अब गर्भाशय के आकुञ्चन (Contraction) के समय गर्भाशय को सामने से पीछे तथा नीचे की ओर दबाये। आकुञ्चन के साथ ही यह क्रिया करनी चाहिये। इस विधि में गर्भाशय को पार्श्व से नहीं पकड़ना चाहिये। इससे अपरा बाहर आ जाती है। इस विधि को (Crede's method) कहते हैं। योनि में तैल का अनुवासन तथा आस्थापन बस्ति द्वारा भी वायु के अनुलोम हो जाने से वात मूत्र एवं पुरीष के साथ ही अपरा भी बाहर आ जाती है। शिशुपरिचर्या—इस अपरापातन के साथ २ दूसरी ओर सद्योजात शिशु का भी ध्यान रखना चाहिये। अपत्यमार्ग से आते हुए शिशु को बहुत क्लेश उठाने पड़ते हैं अतः बालक कुछ मूर्च्छित सा होता है तथा पूरा श्वास भी नहीं लेता रहता है। उत्पन्न होने के बाद शिशु स्वयं रोता है। यह रोना (Cry) उसके लिये बहुत अच्छा एवं आवश्यक होता है क्योंकि इस रोने के द्वारा वह प्रथम बार श्वास लेता है तथा उसके फुफ्फुसों (Lungs) में हवा जाती है। यदि बालक स्वयं न रोये तथा होश में न आये तो उसे होश में लाने तथा डराकर रुलाने का प्रयत्न किया जाता है। इसके लिये चरक में उसके कानों के पास पत्थर बजाने तथा काले रंग के छाज से हवा करने को लिखा है। कहा है—अश्मयोः संघट्टनं कर्णयोर्मूले, शीतोदकेनोष्णोदकेन वा मुखे परिषेकः, तथा संक्लेशविहितान् प्राणान् पुनर्लभेत, कृष्णकपालिकाशूर्पेण चैनमभिनिष्पूणीपुर्यद्यच्चेष्टः स्यात् यावत्प्राणानां प्रत्यागमनम्। सद्योजात शिशु ऐसे स्थान से बाहर आता है जहां कि बाह्य वायुमण्डल का किसी प्रकार का संसर्ग नहीं होता। बाहर आकर वह अपना स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करता है। जीवन की दृष्टि से उसका अब माता के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं रहता है। उसके जीवन को प्रारम्भ करने के लिये ही उपर्युक्त विधि से उसमें (Cry) उत्पन्न की जाती है। इसके साथ ही शिशु के गले में श्लेष्मा आदि फंसी हो तो उसे भी अंगुली में कपड़ा लपेट कर उससे साफ कर देना चाहिये जिससे श्वास प्रश्वास ठीक तरह से हो सके। जब यह निश्चित रूप से मालूम हो जाय कि शिशु जीवित है अर्थात् स्वतन्त्र रूप से वह श्वास प्रश्वास लेने लगा है तब नाभिच्छेदन करना चाहिये। नाभिच्छेदन—शिशु की उत्पत्ति के कुछ ही देर बाद
३१ का.सं.
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नाभिनाल (Umbilical cord) के स्पन्दन बन्द हो जाने पर नाभि से २ इञ्च तथा ३ इञ्च दूर—जो बन्धन लगाकर बीच में से नाभिनाल को काट देना चाहिये। ये बन्धन रक्तस्राव को रोकने के लिये लगाये जाते हैं। दूसरा बन्धन गर्भ में कहीं दूसरा शिशु (यमल-Twin) न हो—उसकी रक्षा के लिये सावधानी के रूप में लगाया जाता है। नाभिनाल को काटने से पूर्व उसके स्पन्दनों का बन्द हो जाना आवश्यक है। उसके बाद नाभि पर (Dusting powder) या कोई अन्य अवचूर्णन ओषध लगाकर पट्टी बांध देनी चाहिये। इसके बाद उसकी आंखों की ओर अवश्य ध्यान देना चाहिये। उन्हें अच्छी प्रकार Boric lotion से साफ करके उसमें १/२% Caustic की एक २ बूंद डाल देनी चाहिये क्योंकि यदि माता को कोई औपसर्गिक रोग हो तो उससे मुख्यरूप से शिशु की आंख में विकृति (Opthalmia Neonotorum) होने का डर रहता है। इन सब आवश्यक कार्यों को करके अब बच्चे को सुला देना चाहिये क्योंकि वह प्रसवजन्य श्रम के कारण पर्याप्त थका हुआ होता है। इनके अतिरिक्त शिशु को साधारण जीवन प्रारंभ करने से पूर्व अन्य भी कई उपद्रव होने का डर रहता है। इनकी ओर परिचारिकाओं को ध्यान देना आवश्यक है। नवजात शिशु में कई दिन तक उष्णता का नियन्त्रण ठीक तरह से नहीं होता है जिसके परिणामस्वरूप उनको सर्दी-जुकाम आदि (Exposure to cold) बहुत जल्दी होते हैं तथा यदि सावधानी न रखी जाय तो ये अत्यन्त घातक परिणाम तक उत्पन्न कर देते हैं। इसी प्रकार उष्णता का नियन्त्रण न होने से उनके तापमान में वृद्धि भी बहुत जल्दी हो जाती है। शिशु को दो चार दिन तक तो यदि तापमान में थोड़ी वृद्धि (१००°F तक) रहे तो उसे सामान्य अवस्था ही समझनी चाहिये परन्तु यदि बिना किसी विशेष कारण के लगातार तापमान में अधिक वृद्धि (१०३°F या इससे अधिक) रहे तो शरीर में द्रव की कमी समझनी चाहिये। शिशु के इस ज्वर को Dehydration fever कहते हैं। इस अवस्था में शिशु को आधी शक्ति वाला Normal saline Solution धीरे २ कई बार देना चाहिये जिससे यह ज्वर की अवस्था ठीक हो जाती है। दूसरा मुख्य उपद्रव शिशु को श्वासावरोध का होता है। यदि शिशु के गले की श्लेष्मा (Mucus) अच्छी तरह साफ होने पर भी नासिका (Nasal passages) में बाधा हो तो उसे श्वास लेने में कठिनाई होती है। यद्यपि वह मुख से श्वास ले सकता है तथापि शिशु को नासिका से श्वास लेने की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है इसलिये उसका श्वासावरोध होने लगता है। Robert Hutchison ने अपनी पुस्तक Diseases of children में लिखा है—The new born baby has such an intense instinctive urge to breathe through the nose (Probably because breast feeding can only be accomplished if the nose is used for breathing) that it will go blue in the face, struggle Cry and even stop breathing altogether rather than breath easily through the mouth इस अवस्था में एक रबड़ कैथेटर (Catheter) नाक के द्वारा बालक के गले में डालकर मार्ग को साफ कर देना चाहिये। भोजन—साधारणतया प्रथम तीन दिनों तक माता के स्तनों में शुद्ध दूध नहीं होता है अपितु एक भारी तथा पीला सा द्रव होता है जिसे खीस (Collustrum) कहते हैं। यह भारी तथा विरेचक (Lexative) होता है। इसलिये प्रारंभ में यह दूध नहीं दिया जाता है। आयुर्वेद में इस समय मधु एवं घृत (असमान मात्रा में) चटाने को लिखा है। चरक शा. अ. ८ में कहा है—‘‘ततोऽनन्तरं जातकर्म कुमारस्य कार्यम्, तद्यथा—मधुसर्पिषीमन्त्रोपमन्त्रिते यथाम्नायं-प्रथमं प्राशितुमस्मै दद्यात्। स्तनमत ऊर्ध्वम्’’। सुश्रुत शा. अ. १० में उस समय सुवर्ण प्राशन का विधान दिया है—‘‘अथ कुमारं शीताभिरद्भिराश्वास्य जातकर्मणि कृते मधुसर्पिरनन्ता ब्राह्मीरसेन सुवर्णचूर्णमङ्गुल्याऽनामिकया लेहयेत्’’। परन्तु इसके विपरीत कई चिकित्सक शिशु को उन दिनों भी माता का दूध देना ही पसन्द करते हैं। उनकी राय में वह खीस वाला दूध भारी होने पर भी विरेचक होने से शिशु के पेट को साफ कर देता है। आंतों में जो सूखा हुआ मल जिसे Muconium कहते हैं—एकत्रित होता है वह निकल जाता है। तथा स्तन को मुंह में देने से दूसरा लाभ यह होता है कि प्रत्यावर्तन क्रिया (Reflex action) द्वारा माता का गर्भाशय भी सिकुड़ता है जिससे गर्भाशय का स्त्राव (Lochia) निकलता रहता है। इसके बाद कुछ काल तक शिशु के तापमान, श्वास प्रश्वास गति, नाड़ीगति तथा मलमूत्र आदि का अवश्य ध्यान रखना चाहिये। प्रारंभ में शिशु का तापमान कुछ अधिक (99.8°F. के लगभग) रहता है परन्तु
| जातिसूत्रीयशारीराध्यायः ? ] | शारीरस्थानम् | १२९ |
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कुछ ही समय में घटकर यह 98.8.°F. हो जाता है। यदि चार दिन तक शिशु का तापमान 100°F. या इससे अधिक रहे तो ध्यान पूर्वक इसका कारण मालूम करने का प्रयत्न करना चाहिये। शिशु की श्वासगति ३०-६० तक तथा नाडीगति १४०-१५० तक रहती है। शिशु का भार (तौल) तथा ऊँचाई आदि भी उसके स्वास्थ्य की निश्चित पहचान है। उत्पत्ति के समय शिशु का भार लगभग ६ से ८ पौण्ड होता है। प्रारंभ के दो तीन दिनों में यह भार थोड़ा सा घटता है परन्तु सप्ताह भर बाद यह फिर बढ़ जाता है तथा आगे नियमपूर्वक बढ़ता रहता है। शिशु के भार में यदि प्रतिसप्ताह वृद्धि न हो तो उसका कारण ढूंढ़ना चाहिये। प्रथम ३ मास तक शिशु का भार ७ औंस प्रति सप्ताह बढ़ता है। जन्म के समय उसकी लम्बाई लगभग १९-१/२ इञ्च होती है। शिशु के लिये सबसे आवश्यक उसका भोजन (माता का दूध) तथा निद्रा है। नियमित समय पर शिशु को स्तनपान कराना चाहिये। शिशु जब रोये तब ही मुंह में स्तन दे देने की प्रथा अच्छी नहीं है। एतदर्थ इसे चम्मच भर पानी अथवा अजवायन के अर्क में मधु मिलाकर दिया जा सकता है। अधिक दूध से बालक को अजीर्ण, वमन, अतिसार आदि उपद्रव हो जाते हैं अतः दूध देने का समय निश्चित होना चाहिये। यदि माता का दूध न हो तो यथोक्त गुण वाला धात्री का दूध या कृत्रिम दूध भी आवश्यकतानुसार दिया जा सकता है। शिशु को दूध कितना, कितने अन्तर से तथा कब देना चाहिये इसके लिये निम्न तालिका है—
| आयु | अन्तर | रात्रि | मात्रा |
|---|---|---|---|
| १ म सप्ताह | २ घण्टे | २ बार | १-१-१/२ औंस |
| २ से ३ सप्ताह | ,, | ,, | १-१/२-३ ,, |
| ४ से ५ सप्ताह | ,, | १ बार | २-१/२-३-१/२ ,, |
| ६ से १२ सप्ताह | २-१/२ घण्टे | ,, | ३-४-१/२ ,, |
| ३ से ५ मास | ३ ,, | ,, | ४-५-१/२ ,, |
| ५ से ९ ,, | ,, ,, | Nil | ५-१/२-७ ,, |
| ९ से १२ ,, | ३-१/२ ,, | ,, | ७-१/२-९ ,, |
निन्द्रा—शिशु अपना अधिक समय सोने में बिताता है। प्रारंभ में वह २१ घण्टे सोता है तथा धीरे २ कम करते हुये ६ मास के बाद यह १४-१६ घण्टे पर पहुंच जाता है। नींद के लिये बालक को अफीम आदि का प्रयोग कराना कभी अच्छा नहीं होता है। शिशु के साथ २ माता के स्वस्थवृत्त का पूर्ण ध्यान रखना चाहिये। इस समय माता के शरीर में वायु की वृद्धि हुई होती है। इसलिये उसे भोजन में लघु आहार तथा सात्म्यानुसार घृत आदि किसी स्नेह में पञ्चकोल चूर्ण मिलाकर देना चाहिये अथवा ५-७ दिन तक लगातार दशमूल के क्वाथ में घृत अथवा एरण्ड तेल की योग्य मात्रा मिलाकर दोनों समय पीने को देनी चाहिये। इससे प्रकुपित हुआ वायु शान्त हो जाता है तथा विकार नहीं हो पाते हैं। फिर क्रमशः पुष्टिकारक आहार देकर उसके शरीर को पुष्ट कर दें। माता को २-४ दिन साधारण सा ज्वर हो जाना स्वाभाविक है जो उपर्युक्त उपचार से ठीक हो जाता है परन्तु यदि ज्वर अधिक दिन तक लगातार बना रहे तो उसे प्रसूति ज्वर (Perpual Fever) समझ कर प्रमाद रहित होकर सावधानी से चिकित्सा करनी चाहिये। दस दिन बाद बालक का नामकरण संस्कार किया जाता है। चरक तथा सुश्रुत में बालक के दो नाम रखने को लिखा है। (१) नक्षत्र नाम—अर्थात् जिस नक्षत्र में बालक उत्पन्न हुआ है उसके अनुसार तथा (२) अभीष्ट नाम। सुश्रुत शा. अ. १० में कहा भी है—'ततो दशमेऽहनि मातापितरौ कृतमङ्गलकौतुकौ स्वस्तिवाचनं कृत्वा नाम कुर्यातां यदभिप्रेतं नक्षत्र नाम वा। इसके बाद चरक तथा सुश्रुत में शिशु के वस्त्र, आभूषण, मणिधारण तथा खिलौने आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है यह सब पाठकों को वहीं से देखना चाहिये॥
पञ्चममिन्द्रियस्थानम्
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ओषधभेषजेन्द्रियाध्यायः ।
(अथात ओषधभेषजीयमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ।।१।।)
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।२।।
अब हम औषधभेषजीय इन्द्रिय अध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था। अर्थात् इस अध्याय में औषध तथा भेषजरूप चिकित्सा संबन्धी इन्द्रियों (अरिष्ट लक्षणों) का वर्णन किया जायगा।
वक्तव्य—इस इन्द्रिय स्थान का केवल यही (अन्तिम) अध्याय ही उपलब्ध हुआ है। इससे पूर्व के सब अध्याय खण्डित हैं। इस स्थान का नाम इन्द्रिय स्थान इसलिये रखा गया है कि इसमें इन्द्र (जीवात्मा) के ज्ञापक लिङ्ग (लक्षण) दिये गये हैं। इन्द्र जीवात्मा को कहते हैं। जीवात्मा के अन्य बहुत से ज्ञापक लिङ्गों में ‘मृत्यु होना’ मुख्य लिङ्ग है। इस स्थान में मृत्यु के निदर्शक चिह्न दिये गये हैं अर्थात् जिन्हें देखकर वैद्य यह जान सके कि रोग असाध्य है तथा रोगी की मृत्यु होने वाली है—उन २ लक्षणों, पूर्वरूपों, भावों तथा अवस्थाओं का इस स्थान में समावेश किया गया है। इसी लिये इस स्थान का नाम इन्द्रिय स्थान है। मृत्यु के निदर्शक चिह्नों को रिष्ट या अरिष्ट भी कहते हैं। कहा भी है—रोगिणो मरणं यस्मादवश्यं भावि लक्ष्यते। तल्लक्षणमरिष्टं स्याद्रिष्टं चापि तदुच्यते ।। चिकित्सा से पूर्व इन अरिष्ट लक्षणों का जानना आवश्यक है। रोगों की साध्यासाध्यता का विचार करके ही चिकित्सा में प्रवृत्त होना चाहिये क्योंकि मरणासन्न, असाध्य अथवा गतायुष रोगी की चिकित्सा से कोई लाभ नहीं होता। इसके विपरीत अपनी प्रतिष्ठा की ही हानि होती है। इसी लिये सुश्रुत सू. अ. २९ में कहा है—असिद्धिमाप्नुयाल्लोके प्रतिकुर्वन् गतायुषः। अतोऽरिष्टानि यत्नेन लक्षयेत् कुशलो भिषक् ।। इसीलिये चिकित्सा से पूर्व इन्द्रियस्थान दिया गया है। चरक संहिता में भी इसी दृष्टि से चिकित्सास्थान से पूर्व इन्द्रिय स्थान दिया गया है ।।१-२।।
ओषधं भेषजं प्रोक्तं द्विप्रकारं चिकित्सितम्। तयोर्विशेषं वक्ष्यामि भेषजौषधयोर्द्वयोः ।।३।।
चिकित्सा दो प्रकार की कही है (१) ओषध चिकित्सा। (२) भेषज चिकित्सा। अब मैं ओषध तथा भेषज दोनों के अन्तर-भेद को कहता हूँ ।।३।।
ओषधं द्रव्यसंयोगं ब्रुवते दीपनादिकम्। हुतव्रततपोदानं शान्तिकर्म च भेषजम् ।।४।।
औषध तथा भेषज का अन्तर-दीपन आदि द्रव्यों के संयोग से जो चिकित्सा की जाती है उसे औषध कहते हैं तथा होम, व्रत, तप, दान एवं शान्ति कर्म आदि को भेषज कहते हैं ।।
उभयं तद्यदा जन्तोः कृतं न कुरुते गुणम्। क्षीणायुरिति सं(तं)ज्ञात्वा न चिकित्सेद्विचक्षणः ।।५।।
इन दोनों चिकित्साओं द्वारा चिकित्सा किये जाने पर भी यदि रोगी को लाभ न हो तो बुद्धिमान व्यक्ति उसे क्षीणायु
औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ] इन्द्रियस्थानम् १३१
(गतायु मरणासन्न) जाने तथा उसकी चिकित्सा न करे। चिकित्सा द्वारा गतायुष रोगी को लाभ क्यों नहीं होता इसके लिये सुश्रुत सू. अ. ३१ में कहा है—प्रेता भूताः पिशाचाश्च रक्षांसि विविधानि च। मरणाभिमुखं नित्यमुपसर्पन्ति मानवम् ॥ तानि भेषजवीर्याणि प्रतिघ्नन्ति जिघांसया। तस्मान्मोघाः क्रियाः सर्वा भवन्त्येव गतायुषाम् ॥५॥
यस्य गोमयचूर्णाभं चूर्णं मूर्धनि जायते। सस्नेते भ्रश्यते चैव मासान्तं तस्य जीवितम् ॥६॥
जिस मनुष्य के सिर पर गोबर के चूर्ण के सदृश तथा स्निग्ध चूर्ण हो जाता है और स्वयं विलीन हो जाता है, उसका जीवन एक मास अवशिष्ट समझना चाहिये। चरक इन्द्रिय अ. १२ में भी यह श्लोक बिलकुल इसी रूप में दिया गया है। इसी प्रकार सुश्रुत में भी कहा है—गोमयचूर्णप्रकाशस्य वा रजसो दर्शनमुत्तमाङ्गे बिलयनञ्च ॥६॥
कुक्षिः स्नातानुलिप्तस्य पूर्वं यस्य विशुष्यति। आर्द्वेषु सर्वगात्रेषु मासार्धं तस्य जीवितम् ॥७॥
जिस पुरुष के स्नान तथा अनुलेपन (चन्दन आदि का लेप) के बाद अन्य अङ्गों के गीला रहते हुए सबसे पूर्व कुक्षि (कोख) सूख जाती है। वह १५ दिन तक जीवित रहता है। चरक इन्द्रिय स्थान १२ में कुक्षि के स्थान पर उर (छाती) पढ़ा गया है—यस्य स्नानानुलिप्तस्य पूर्वं शुष्यत्युरोभृशम्। आर्द्वेषु सर्वगात्रेषु सोऽर्धमासं न जीवति ॥ इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. ३२ में कुक्षि के स्थान पर हृदय पढ़ा है—"प्राग्विशुष्यमाणहृदय आर्द्रशरीरः” ॥७॥
स्वप्नाधिपानगो नाशो ज्योतिषां पतनानि च। अग्निदाहोपशान्तिश्च पतनं गृहवृक्षयोः ॥८॥
गुहाटवीप्रवेशश्च स्वप्नं स्वप्ने विगर्हितम्। कृष्णां दण्डधरां नग्नां मुण्डां लोहितलोचनाम् ॥९॥
स्वप्ने दृष्ट्वैव जानीयाद्यमदूतानुपस्थितान्।
जो मनुष्य स्वप्न की अवस्था में नग (पर्वत) का नाश, ज्योतिवाले पदार्थों का गिरना, अग्निदाह से शान्ति, गृह एवं वृक्षों का पतन, गुफा तथा जंगल में प्रवेश और निन्दित स्वप्न देखता है तथा जो स्वप्न में काले रंग वाली, दण्ड को धारण करने वाली, नग्न मुण्डित (सिर जिसका मुंडा हुआ है) तथा लाल आंखों वाली स्त्री को देखता है-वह यम के दूतों को उपस्थित जाने अर्थात् मृत्यु को सन्निकृष्ट समझे ॥८-९॥
दीर्घकेशस्तननखीं विरागकुसुमाम्बराम् ॥१०॥
स्वप्ने दृष्ट्वा स्त्रियं कृष्णां कालरात्रीं निवेदयेत्।
स्वप्न में लम्बे बाल, लम्बे स्तन तथा लम्बे नखों वाली, विराग (विकृत रंग अथवा लाल रंग के) पुष्प एवं नक्षत्रों वाली, काली स्त्री को देखकर उसे कालरात्रि समझे अर्थात् उस रात्रि को कालरात्रि अथवा अन्तिम रात्रि समझे ॥१०॥
गन्धान् पुष्पाणि वासांसि या रक्तानि निषेवते ॥११॥
यदा स्वप्ने शिशुर्वादपि तदा स्कन्दग्रहाद्द्वयम्।
मयूरं कुक्कुटं बस्तं मेषं वा योऽधिरोहति ॥१२॥
रक्तार्चितः सहैतैर्वा तत्रापि स्कन्दतो भयम्।
घण्टां पताकां यः स्वप्ने विध्वस्तां भुवि पश्यति ॥१३॥
शयनं शोणिताक्तं वा तत्रापि स्कन्दतो भयम्।
अब ग्रहों द्वारा आक्रान्त शिशु के लक्षण कहे जाते हैं—स्कन्दग्रह—जब माता या शिशु स्वप्न में गन्ध वाले पदार्थ तथा लाल रंग के पुष्प एवं वस्त्रों को धारण करते हैं। अथवा बालक स्वप्न में मोर, मुर्गे, बकरे तथा मेंढे पर सवार होता है तथा रक्तचन्दन द्वारा उसका शरीर अर्चित हो। अथवा बालक स्वप्न में घण्टे तथा पताका को भूमि पर विध्वस्त
१३२ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ]
हुआ (फटा हुआ तथा नीचे गिरा हुआ) देखे तथा शयन (बिस्तरे) को रक्त से गीला देखे तो उस अवस्था में स्कन्दग्रह का भय समझना चाहिये ॥११-१३॥
रक्तपुष्पाम्बरधरा रक्तचन्दनरूषिता ।। १४ ।। नृत्यते सह भूतैर्वा स्कन्दापस्मारतो भयम् ।
यदि माता स्वप्न में लाल पुष्प तथा वस्त्रों को धारण करके तथा शरीर पर रक्तचन्दन का लेप करके भूतों (पिशाच आदियों) के साथ नृत्य करे तो उस अवस्था में स्कन्दापस्मार (स्कन्दसखा अथवा विशाख) का भय समझना चाहिये ॥१४॥
रक्तपद्मवनं प्राप्य धात्र्यात्मानं यदाऽर्चति ।। १५ ।। बालं वा पद्ममालाभिस्तदा स्कन्दपितुर्भयम् ।
यदि धात्री लाल कमल के वन में पहुंच कर पद्ममालाओं के द्वारा अपनी अथवा बालक की अर्चना करे तो स्कन्द के पिता अर्थात् त्रिपुरारि महादेव का भय समझना चाहिये ॥१५॥
रक्तपुष्पवनं धात्री स्वप्नेऽग्निं वा यदा विशेत् ।। १६ ।। दह्यते वाऽग्निना बालः पौण्डरीकाद्भयं तदा ।
पुण्डरीक—यदि धात्री स्वप्न में लाल फूलों वाले वन में अथवा अग्नि में प्रवेश करे तथा उसका शिशु अग्नि में जलाया जाता हो तो उस अवस्था में पुण्डरीक का भय समझना चाहिये ॥१६॥
समुद्रादिषु तोयेषु निमग्ने रेवतीभयम् ।। १७ ।। रेवती—स्वप्न में यदि बालक समुद्र आदि में अथवा अन्य जलों में डूबे-तो रेवती का भय समझना चाहिये ॥१७॥
शुष्ककूपनदीदर्श निहन्याच्छुष्करेवती । मांसादान् पक्षिणोदृष्ट्वा शकुन्या ब(व)ध्यते शिशुः ।। १८ ।। शुष्क रेवती—यदि स्वप्न में सूखे हुए कूंए तथा नदी का दर्शन हो तो शिशु शुष्क रेवती से आक्रान्त हुआ मर जाता है। शकुनी—यदि स्वप्न में मांसभक्षी पक्षियों (गिद्ध-बाज आदि) को देखे तो वह शकुनि द्वारा मार दिया जाता है ॥१८॥
अवडीनाभिदष्टस्तु सद्यो मरणमृच्छति । हरितालादिभी रङ्गैर्मण्डितः पीतकाम्बरः ।। १९ ।। मांसलोऽलङ्कृतः स्वप्ने तं हन्ति मुखमण्डिका ।
मुखमण्डिका—यदि बालक स्वप्न में किसी पक्षी के द्वारा काटा जाता है तो वह शीघ्र मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। स्वप्न में हरिताल आदि के रंगों से यदि आकाश को पीला रंगा हुआ देखता है तथा मांस का सेवन और अलंकारों (आभूषणों) को धारण करता है—उसे मुखमण्डिका नामक ग्रह मार देता है ॥१९॥
नक्षत्रग्रहचन्द्रार्कतारकाऽक्षिकनीनिकाः ।। २० ।। दृष्ट्वा प्रपतिताः स्वप्ने पूतनाभ्यो भयं भवेत् ।
पूतना—यदि स्वप्न में नक्षत्र, ग्रह, चन्द्र, सूर्य, तारे तथा आंखों की पुतलियां नीचे गिरी हुई दिखाई दें-तो पूतना का भय समझना चाहिये ॥२०॥
सर्वाण्येतानि रूपाणि नैगमेष्यां प्रपश्यति ।। २१ ।।
नैगमेष—ये ही पूर्वोक्त सब लक्षण नैगमेष ग्रह के होते है ॥२१॥
औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ] इन्द्रियस्थानम् १३३
कीटवृश्चिकसर्पैर्वा दष्टः स्याद्विषमृत्युःकः१। श्वभिर्दुष्टैः खरैर्वाऽपि दक्षिणां याति मुण्डितः ।।२२।।
कृष्यते मृद्यते तैर्वा ज्वरस्यान्तस्तदुच्यते ।
ज्वर के मारक रूप—यदि स्वप्न में कीड़े, बिच्छू अथवा सर्प के द्वारा काटा जाकर विष से मृत्यु हो जाय अथवा मुण्डित हुआ कुत्ते, दुष्टप्राणी अथवा गदहों द्वारा दक्षिण दिशा की ओर ले जाया जाता हो तथा उन्हीं के द्वारा रोगी खींचा जाता हो तथा उसका मर्दन किया जाता हो तो वह रोगी ज्वर के द्वारा समाप्त हो जाता है। अर्थात् ज्वर के द्वारा उसकी मृत्यु हो जाती है ।।२२।।
प्रार्थितं कल्पितं दृष्टमनुभूतं श्रुतं च यत् ।।२३।।
भावितः पश्यति स्वप्ने ह्रस्वं दीर्घं दिवा च यत् ।
अफलाः सर्व एवैते निदानोक्तास्तु दोषजाः ।।२४।।
स्वप्नों के प्रकार—जो स्वप्न (१) प्रार्थित (२) कल्पित (३) दृष्ट (४) अनुभूत (५) श्रुत एवं (६) भावित होते हैं तथा (७) जो अत्यन्त छोटे (८) जो अत्यन्त लम्बे (९) जो स्वप्न दिन में देखे जाने वाले तथा (१०) जो निदान स्थान में दोषज (वातादि दोषों से उत्पन्न होने वाले) कहे गये हैं—ये सब स्वप्न निष्फल होते हैं। चरक इन्द्रिय अ. ५ में ७ प्रकार के स्वप्न कहे हैं—दृष्टं श्रुतानुभूतं च प्रार्थितं कल्पितं । तथा भाविकं दोषजं चैव स्वप्नं सप्तविधं विदुः ।। तत्र पञ्चविधं पूर्वमफलं भिषगादिशेत् । दिवा स्वप्नमतिह्रस्वमतिदीर्घं तथैव च ।। अरुणदत्त ने इन सातों स्वप्नों का अपनी टीका में निम्न विवरण दिया है—१. दृष्टं—यश्चक्षुषा जाग्रदवस्थायां किंचिद् वस्तुजातं दृष्ट्वा तदानीं सुप्तावस्थायां तादृशं वस्तुजातं संवित्तिरूपतयाऽनुभूयते स ‘दृष्ट’ उच्यते। दृष्ट स्वप्न वह होता है जिसे हम कभी भी जागृत अवस्था में देख चुके हों। २. श्रुत—यश्च शब्दमात्रेण वस्तुजातं श्रोत्रेन्द्रियेण गृह्यते तदिदानीं सुप्तावस्थायां तादृक्संवित्तिरूपतयाऽनुभूयते स ‘श्रुत’ उच्यते। जिसे हम पहले कभी सुन चुके हों। ३. अनुभूत—यस्तु जाग्रदवस्थायां यथायथमिन्द्रियैरनुभूयते सुप्तावस्थायां तादृगन्तः संवित्तिरूपतयाऽनुभूयते सोऽ ‘नुभूत’ उच्यते। जो कभी हमारे अनुभव में आया हो। ४. प्रार्थित—यस्मिन् दृष्टे श्रुतेऽनुभूते वा यत्पूर्वं जाग्रदवस्थायां वस्तुजातं मनसाऽभ्यर्थ्यते तथैव च सुप्तावस्थायामन्तः संवित्तिरूपतयाऽनुभूयते स ‘प्रार्थित’ उच्यते। जिसकी हमें जागृत अवस्था में आकांक्षा होती है। ५ कल्पित—यस्तु षड्भिः प्रत्यक्षानुमानादिभिर्न दृष्टो नापि श्रुतो नाप्यनुमतो दृष्टश्रुतानुभूतत्वाभावादेव न च प्रार्थितोऽपि तु केवलं मनसा यथेच्छमुत्प्रेक्ष्य यत्किंचनरूपाभिः कल्पनाभिः कल्पितो जाग्रदवस्थायां वस्तुजातान्तः संवित्तावपारूढस्तदानीं सुप्तावस्थायां तादृगनुभूयते स “कल्पितः” । जिसकी पहले हम कभी कल्पना कर चुके हैं। ६. भाविक—यश्च दृष्टश्रुतादिभ्यः स्वप्नेभ्योऽन्यो विलक्षणः स्वप्नो यथा दृश्यते सुप्तावस्थायामुत्तरकालं तथैव स्वप्नदर्शिना नरेण तन्मुखाबगततदर्थैरपि प्रत्यक्षतो दृश्यते स ‘भाविकः’। जो भावी शुभ या अशुभ फलों के सूचक होते हैं। ७. दोषज—दोषजः स स्वप्नो यो वातजः पित्तजः कफजो वा यथायथं दोषाणामनुरूपोऽन्तः संवित्ताव्नुभूयते स ‘दोषज’ उच्यते। अर्थात् जो वातादि दोष से उत्पन्न होते हैं। इन उपर्युक्त ७. प्रकार के स्वप्नों में से प्रथम पांच (अर्थात् दृष्ट, श्रुत, अनुभूत, प्रार्थित तथा कल्पित) तथा अत्यन्त लम्बे, अत्यन्त छोटे तथा दिवास्वप्न निष्फल माने गये हैं अर्थात् इन स्वप्नों का कोई फल नहीं होता है। शेष दोनों अर्थात् भाविक और दोषज फलप्रद होते हैं। चरक संहिता में दोषज स्वप्न को फलप्रद माना है परन्तु इस संहिता में उपर्युक्त श्लोक में दोषज स्वप्न को
१. यहां कीटादि का दंश विष के द्वारा मृत्यु का सूचक बताया गया है। इसके विपरीत सुश्रुत में ‘उरगो वा जलौको वा भ्रमरो वाऽपि यं दंशेत्। आरोग्यं निर्दिशेत्तस्य धनलाभं च बुद्धिमान् ।। इत्यादि शुभ फलों का सूचक श्लोक मुद्रित पुस्तक में मिलता है परन्तु सुश्रुत की ताडपत्र पुस्तक में यह श्लोक नहीं है।
१३४ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ]
भी निष्फल माना है। अष्टाङ्गहृदय में भी प्रकृति के अनुकूल दोषज स्वप्न को निष्फल ही माना है। यदि पित्त प्रकृति के मनुष्य को पित्तानुकूल स्वप्न आये तो वह दोषज होने पर भी प्रकृति के अनुकूल होने से निष्फल ही होता है। वहां कहा है—‘‘तेष्वद्या निष्फलाः पञ्च यथा स्वप्रकृतिर्दिवा विस्मृतो दीर्घह्रस्वोऽति’’ ।।
यथा तु फलवान् स्वप्नो वृद्धजीवक ! तच्छृणु । अदृष्टमश्रुतानुक्तमकल्पितमभाषितम् ।। २५ ।। कार्यमात्रं च यः स्वप्नो जीर्णान्ते फलवांस्तु सः । एतांश्चान्यांश्च दुःस्वप्नान् दृष्ट्वा रोगी विनश्यति ।। २६ ।। स्वस्थस्तु संशयं गत्वा धर्मशीलो विमुच्यते ।
हे वृद्धजीवक ! जिस प्रकार के स्वप्न फल वाले (फलप्रद) होते हैं वे तू मेरे से सुन । १. अदृष्ट—जो कभी देखा न हो । २. अश्रुत—जो कभी सुना न हो । ३. अनुक्त—जो कभी कहा न गया हो । ४. अकल्पित—जिसकी कभी कल्पना न की गई हो तथा ५. अभाषित—जिसका कभी भाषण न किया गया हो । तथा ६. जो केवल कार्यमात्र हों अर्थात् जिनका देखना सुनना आदि कोई कारण विद्यमान न हों । समाप्त होने के बाद ये उपर्युक्त स्वप्न फलवाले होते हैं । इन उपर्युक्त तथा अन्य भी दुःस्वप्नों (बुरे स्वप्नों) को देखने से रोगी नष्ट हो जाता है अर्थात् जो रोगी इन बुरे स्वप्नों को देखता है उसकी मृत्यु हो जाती है तथा स्वस्थ व्यक्ति का जीवन संशय में पड़ जाता है । इससे केवल धर्मपरायण व्यक्ति ही बच सकता है । चरक इन्द्रिय अ. ५ में कहा है—इत्येते दारुणाः स्वप्ना रोगी यैर्याति पञ्चताम् । अरोगः संशयं गत्वा कश्चिदेव विमुच्यते ।। इसी प्रकार सुश्रुत सू. अध्याय २९ में भी कहा है—स्वस्थः स लभते व्याधिं व्याधितो मृत्युमृच्छति ।। २५-२६।।
यद्यदेव द्विजादीनां स्वप्ने शीतकृशात्मनाम् ।। २७ ।। मलिनाम्बरपुष्पाणां दर्शनं न प्रशस्यते । तेषामेव तु हृष्टानां शुद्धपुष्पाम्बरात्मनाम् ।। २८ ।। दर्शनं शस्यते स्वप्ने तैश्च संभाषणं शुभम् ।
अब शुभ फल वाले स्वप्न कहे जायेंगे—शीत (ठण्डे) एवं कृश शरीर वाले जिन द्विज (ब्राह्मण) आदियों का मैले वस्त्र तथा मैले रंग के पुष्प धारण किये हुए दर्शन प्रशस्त नहीं माना गया है । वे ही यदि स्वप्न में प्रसन्न तथा शुद्ध (श्वेत) पुष्प एवं वस्त्र धारण किये हुए दिखाई दें तथा उनसे बातचीत हो तो शुभ माना जाता है ।।२७-२८।।
प्रासादवृक्षशैलांश्च हस्तिगोवृषपूरुषान् ।। २९ ।। अधिरोहन्ति ये स्वप्ने तेषां स्वस्त्ययनं कृतम् ।
स्वप्न में जो प्रासाद (महल), वृक्ष, पर्वत, हाथी, गौ, वृष (बैल) तथा पुरुष की सवारी करते हैं उनका स्वस्त्ययन (कल्याण) होता है ।।२९।।
सूर्यसोमाग्निविप्राणां नृणां पुण्यकृतां गवाम् ।। ३० ।। मत्स्यामिषस्य चाषस्य दर्शनं पुण्यमुच्यते ।
स्वप्न में सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, विप्र (ब्राह्मण), पुण्यवाले मनुष्य, गौ, मछली के मांस तथा चाष नाम की मछली के दर्शन शुभ माने जाते हैं ।।३०।।
शुक्लपुष्पाददर्शच्छत्रग्रहणं तोयलङ्घनम् ।। ३१ ।। स्वरक्तदर्शनं चैव सुरापानं च शस्यते ।
औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ] इन्द्रियस्थानम् १३५
स्वप्न में श्वेत पुष्प, आदर्श (दर्पण-शीशा) तथा छत्र (छाते का धारण करना) एवं पानी (नदी आदि) को लांघना, अपने रक्त का दर्शन तथा सुरापान प्रशस्त माना जाता है ॥३१॥
गवाश्वरथयानं च यानं पूर्वोत्तरेण च ।।३२।।
रोदनं पतितोत्थानं रिपूणां निग्रहस्तथा ।
पङ्ककूपगुहाभ्यश्च समुत्तारोऽध्वनस्तथा ।।३३।।
एवंविधानि चान्यानि सिद्धये मुनयोऽब्रुवन् ।
गौ तथा घोड़े के रथ पर सवार होना, पूर्व तथा उत्तर दिशा की ओर जाना, रोना, गिर कर पुनः उठना, शत्रुओं का दमन, कीचड़, कुएं, गुहा तथा मार्ग से पार होना—इत्यादि तथा इसी प्रकार के अन्य स्वप्नों को मुनियों ने सिद्धि (फल) वाला कहा है ॥३२-३३॥
अदारुणत्वं रोगाणां वैद्यभैषज्यसंभवम् ।।३४।।
धृतिर्जन्मानुकूल्यं च सत्त्वं धर्मश्च भूतये ।
इस प्रकार के स्वप्नों से रोग भयंकर नहीं होते । वैद्य तथा भैषज्य द्वारा अच्छे हो जाते हैं । धारण शक्ति बढ़ती है, जन्म की अनुकूलता होती है अर्थात् व्यक्ति स्वस्थ होकर जीवित रहता है तथा सत्त्व, धर्म एवं भूति (कल्याण) की वृद्धि होती है । चरक इन्द्रिय अ. ५ में शुभ फलवाले निम्न स्वप्न दिये हैं—दृष्टः प्रथमरात्रे यः स्वप्नः सोऽल्पफली भवेत् । न स्वपेद्यः पुनर्द्दष्ट्वा स सद्यः स्यान्महाफलः ।। अकल्याणमपि स्वप्नं दृष्ट्वा तत्रैव यः पुनः । पश्येत्सौम्यं शुभाकारं तस्य विद्याच्छुभं फलम् ।। रात्रि के पहले प्रहर में देखा हुआ स्वप्न अल्प फलवाला होता है । परन्तु स्वप्न देखने के पश्चात् यदि फिर निद्रा न आये तो वह स्वप्न महाफल वाला होता है । इसी प्रकार अशुभ स्वप्न देखने के पश्चात् यदि उसी समय दूसरा शुभ स्वप्न आ जाय तो उसका अशुभ फल नष्ट होकर शुभ फल ही होता है। इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. २९ में भी शुभस्वप्नों का निर्देश किया गया है—अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि प्रशस्तं स्वप्नदर्शनम् । देवान् विद्वान् गोवृषभान् जीवितः सुहृदो नृपान् ।। समिद्धमग्निं साधूंश्च निर्मलानि जलानि च । पश्येत् कल्याणलाभाय व्याधेरपगमाय च ।। मांसं मत्स्यान् स्त्रजः श्वेता वांसासि च फलानि च । लभन्ते धनलाभाय व्याधेरपगमाय च ।। महाप्रासादसफलवृक्षवारणपर्वतान् । आरोहेद् द्रव्यलाभाय व्याधेरपगमाय च ।। नदीनदसमुद्रांश्च क्षुभितान् कलुषोदकान् तरेत् कल्यांणलाभाय व्याधेरपगमाय च ।। उरगो वा जलौको वा भ्रमरो वाऽपि यं दशेत् । आरोग्यं निर्दिशेत्तस्य धनलाभं च बुद्धिमान् ।। एवं रूपान् शुभान् स्वप्नान् यः पश्येदृत्याधितो नरः । स दीर्घायुरिति ज्ञेयस्तस्मै कर्म समाचरेत् ॥३४॥
दृष्ट्वा स्वप्नान् दारुणांन्वेतरान् वा पूतः स्नातः सर्षपानग्निवर्णान् ।
हुत्वा सावित्र्या सर्पिषाक्तांस्तिलांश्च पूतः पापैर्मुच्यते व्याधिभिश्च ।।३५।।
अशुभ स्वप्नों का परिहार—इन दारुण अथवा इसी प्रकार के अन्य स्वप्नों को देखने के बाद व्यक्ति को स्नान द्वारा पवित्र होकर अग्नि के वर्ण वाले सर्षप (सरसों) तथा घी से मुक्त तिलों को सावित्री (गायत्री मन्त्र) के द्वारा अग्नि में आहुति देनी चाहिये । इससे वह पवित्र हो जाता है तथा पाप एवं व्याधियों से मुक्त हो जाता है । सुश्रुत सू. अ. २९ में भी अशुभ स्वप्नों का परिहार दिया गया है—स्वप्नानेवं विधान् दृष्ट्वा प्रतरुत्थाय यत्नवान् । दद्यान्माषांस्तिलांल्लोहं विप्रेभ्यः काञ्चनं तथा ।। जपेच्चापि शुभान् मन्त्रान् गायत्रीं त्रिपदां तथा । दृष्ट्वा तु प्रथमे यागे स्वप्याद् ध्यात्वा पुनः शुभम् ।। जयेद्वाऽन्यतमं देवं ब्रह्मचारी समाहितः । न चाचक्षीत कस्मैचिद् दृष्ट्वा स्वप्नमशोभनम् ।। देवतायतने चैव वसेद्रात्रित्रयं तथा । विप्रांश्च पूजयेन्नित्यं दुःस्वप्नात् प्रविमुच्यते ॥३५॥
१३६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् औषधभेषजेन्द्रियाध्यायः १ ]
कौमारभृत्यमतिवर्धनमुक्तमेतज्ज्ञात्वा हि देहगतमिन्द्रियमादिरूपैः । श-श्चिकित्सितपरांस्तु विवर्जयध्वं शास्त्रं च धर्ममतयः परिपालयध्वम् ।। ३६ ।।
यह कौमारभृत्य सब से अधिक विशिष्ट (प्रशस्त) कहा गया है। अपने प्रारंभिक रूपों (लक्षणों) के द्वारा रोगी के देहगत इन्द्रियों (अरिष्टों) को जानकर सब चिकित्सकों को चाहिये कि वे रोगी को छोड़ दें अर्थात् उसकी चिकित्सा न करें तथा धर्ममति (धर्म में बुद्धि वाला) होकर शास्त्रों का पालन करना चाहिये। अर्थात् अरिष्ट लक्षण उत्पन्न हो जाने पर चिकित्सा से कोई लाभ नहीं होता है इसलिये इस अवस्था में व्यर्थ में चिकित्सा के पीछे न पड़कर धर्म-कर्म एवं शास्त्रों में मन लगाना चाहिये। संभवतः इससे कुछ लाभ हो सके।
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ।।
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति) वृद्धजीवकीये कौमारभृत्ये वास्त्वप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने औषधभेषजीयं नामेन्द्रियम् ।। समाप्तानि चेन्द्रियाणि ।।
(इन्द्रियस्थानस्यायमन्तिमोऽध्याय एवोपलब्धः)
षष्ठं चिकित्सास्थानम्
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....................................
ज्वरचिकित्सिताध्यायः ।
अथातो ज्वरचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥
अब हम ज्वर चिकित्सा का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥
प्रजापतिं समासीनमृषिभिः पुण्यकर्मभिः । पप्रच्छ विनयाद्विद्वान् कश्यपं वृद्धजीवकः ॥३॥
पुण्यकर्मा ऋषियों के साथ बैठे हुए प्रजापति कश्यप से विद्वान् वृद्धजीवक ने विनयपूर्वक पूछा ॥३॥
सूत्रस्थाने भगवता निर्दिष्टो द्विविधो ज्वरः । पुनरष्टविधः प्रोक्तो निदाने तत्त्वदर्शिना ॥४॥
भगवन् ! सूत्र स्थान में पहले तत्त्वदर्शी आपने दो प्रकार के ज्वर का निर्देश किया है। तथा पुनः निदानस्थान में ८ प्रकार के ज्वर बतलाये हैं।
**वक्तव्य—**यद्यपि इस संहिता के सूत्रस्थान के खण्डित होने से यह विषय यहां नहीं मिलता है तथापि ज्वरों के दो प्रकारों का चरक में भी उल्लेख मिलता है। चरक चि. अ. ३ में कहा है—द्विविधो विधिभेदेन ज्वरः शारीरमानसः । पुनश्च द्विविधो दृष्टः सौम्यश्चाग्नेय एव च ।। अन्तर्वेगो बहिर्वेगो द्विविधः पुनरुच्यते । प्राकृतो वैकृतश्चैव साध्यश्चासाध्य एव च ।। अनेक भेदों से ज्वर के दो प्रकारों का वर्णन किया गया है। सब से मुख्य शारीर एवं मानस भेद से ज्वर दो प्रकार का होता है। जब केवल शरीर में आश्रित होता है तब शारीर ज्वर कहलाता है। जब शरीर के साथ २ मन भी आक्रान्त होता है तब मानस ज्वर कहलाता है। सौम्य तथा आग्नेय भेद से भी ज्वर दो प्रकार का है। वेग के अनुसार भी अन्तर्वेग तथा बहिर्वेग भेद से ज्वर दो प्रकार का है। इसी प्रकार प्राकृत-वैकृत तथा साध्य-असाध्य भेद से भी ज्वर दो प्रकार का होता है। ज्वर के आठ प्रकार चरक नि. अ. १ में कहा है—अथ खल्वष्टभ्यः कारणेभ्यो ज्वरः संजायते मनुष्याणाम्, तद्यथा-वातात्, पित्तात्, कफात्, वातपित्ताभ्यां, वातकफाभ्यां, पित्तश्लेष्माभ्यां, वातपित्तश्लेष्मभ्यः, आगन्तोरष्टमात् कारणात्। आठ कारणों से ज्वर उत्पन्न होता है। १. वात, २. पित्त, ३. कफ, ४. वातपित्त, ५. वातकफ, ६. पित्तकफ, ७. वातपित्तकफ (सान्निपातिक), ८. आगन्तु, इसी प्रकार च. चि. अ. ३ में भी कहा गया है-भिन्नः कारणभेदेन पुनरष्टविधो ज्वरः ॥४॥
तेषां ज्वराणां कतमो जातमात्रस्य जायते । पूर्वरूपं च रूपं च किञ्च तस्य चिकित्सितम् ॥५॥
इतरेषां ज्वराणां च पूर्वरूपं सलक्षणम् । चिकित्सितं च किं तेषामामजीर्णज्वरेषु च ॥६॥
| १३८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | ज्वरचिकित्सिताध्यायः ? ] |
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क्षीरपस्य च किं पथ्यं पथ्यं किंवान्नभोजिनः । क्षीरान्नभोजिनः किंच ज्वरितस्य शिशोर्हितम् ।।७।।
कां च वृत्तिं ....................................................
(इति ताडपत्रपुस्तके ९२ तमं पत्रम्$^१$।)
नवजात शिशु को उन उपर्युक्त द्विविध तथा अष्टविध ज्वरों में से कौन सा ज्वर होता है । उस ज्वर के पूर्वरूप, रूप (लक्षण) तथा चिकित्सा क्या है ? अन्य ज्वरों के भी पूर्वरूप, रूप (लक्षण) तथा चिकित्सा क्या है ? आमज्वर तथा जीर्णज्वर में क्षीरप (दूध पीने वाले अर्थात् एक वर्ष तक के), अन्नभोजी (अन्न खाने वाले अर्थात् दो वर्ष से बड़े) तथा क्षीरान्नभोजी (दूध तथा अन्न दोनों का सेवन करने वाले अर्थात् एक से दो वर्ष तक के) बालकों को ज्वर में क्या पथ्य है ? उस ज्वर की वृत्ति (प्रवृत्ति) क्या है ॥५-७॥
वक्तव्य—पाठकों के ज्ञान के लिये उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर हम अन्य ग्रन्थों के आधार पर देने का प्रयत्न करेंगे ।
शारीर ज्वर—शारीर ज्वर वातादि के प्रकोप से पहले देह में होता है उसके बाद पीछे से मन भी आक्रान्त हो जाता है तथा इन्द्रियों की विकृति ही देहसन्ताप का मुख्य लक्षण है। इन्द्रियों की विकृति से ही देह की विकृति का ग्रहण हो जाता है। कहा भी है–इन्द्रियाणां च वैकृत्यं देहसन्तापलक्षणम्। मानस ज्वर-यह सर्वप्रथम मन में आश्रित होता है तथा तमोगुण एवं रजोगुण के कारण होता है। यह पीछे से शरीर को भी आक्रान्त कर देता है। चरक चि. अ. १ में कहा है–'वैचित्यमरतिग्लानिर्मनसस्तापलक्षणम्' अर्थात् चित्त का विक्षिप्त होना, किसी कार्य में मन न लगना तथा ग्लानि ये मानस ज्वर के लक्षण होते हैं। सौम्य तथा आग्नेय ज्वर-चरक चि. अ. ३ में कहा है–वातपित्तात्मकः शीतमुष्णं वातकफात्मकः । इच्छत्युभयमेतत्तु ज्वरो व्यामिश्रलक्षणः ।। योगवाही परं वायुः संयोगादुभयार्थकृत् । दाहकृत्तेजसा युक्तः शीतकृत्सोमसंश्रयात् ।। जिस ज्वर में वात के साथ पित्त का अनुबन्ध होगा वह आग्नेय तथा जिसमें वात के साथ कफ का अनुबन्ध होगा वह सौम्य ज्वर कहलाता है। आग्नेय ज्वर में रोगी शीत को तथा सौम्य ज्वर में उष्णता को चाहता है। यदि मिश्रित लक्षण हों तो वह शीत एवं उष्ण दोनों को चाहता है। अन्तर्वेगज्वर चरक चि. अ. ३ में कहा है—अन्तर्दाहोऽधिकस्तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः । सन्ध्यस्थिशूलमस्वेदो दोषवचों विनिग्रहः ।। अन्तर्वेगस्य लिङ्गानि ज्वरस्यैतानि लक्षयेत् । अन्तर्वेग ज्वर में शरीर के अन्दर अधिक दाह, तृष्णा, प्रलाप, श्वास का अधिक वेग से चलना, भ्रम, सन्धियों तथा अस्थियों में शूल, पसीना न आना तथा दोष एवं पुरीष (मल) का अन्दर रुक जाना–ये लक्षण होते हैं। बहिर्वेग ज्वर—सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीनां च मार्दवम्। बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमेव च ।। बहिर्वेग ज्वर में–बाह्यताप (Temperature) बहुत अधिक होता है तथा तृष्णा आदि लक्षण मृदु होते हैं तथा यह सुखसाध्य होता है। प्राकृत तथा वैकृत ज्वर चरक चि. अ. ३ में कहा है—प्राकृतः सुखसाध्यस्तु वसन्तशरदुद्भवः । कालप्रकृतिमुद्दिश्य प्रोच्यते प्राकृतो ज्वरः । प्रायेणानिलजो दुःखः कालेष्वन्येषु वैकृतः ।। काल की प्रकृति (स्वभाव) के अनुसार ही ज्वर प्राकृत कहा जाता है। वसन्त और शरद् ऋतु में होने वाला प्राकृत ज्वर सुखसाध्य होता है। वसन्त कफ का प्रकोप-काल है इसलिये वसन्त में कफज्वर प्राकृत होता है। शरद् पित्त का प्रकोप-काल है इसलिये शरद् ऋतु में होने वाला पित्तज्वर प्राकृत होता है। ये दोनों ज्वर सुखसाध्य होते हैं। परन्तु वात के प्रकोप-काल (वर्षा) में उत्पन्न वातिक ज्वर प्राकृत होते हुए भी कष्ट साध्य है। अन्य कालों में वैकृतज्वर कष्टसाध्य होते हैं। जैसे वसन्त में पैत्तिक ज्वर अथवा शरद् में कफज्वर का होना वैकृत ज्वर कहलाते हैं। ये कष्टसाध्य होते हैं। साध्यज्वर—बलवत्स्वल्पदोषेषु ज्वरः साध्योऽनुपद्रवः । बलवान् तथा अल्प दोष वाले पुरुषों में उपद्रवों से रहित जो ज्वर होता है उसे साध्य कहते हैं। असाध्यज्वर—हेतुभिर्बहुभिर्जातो बलिभिर्बहुलक्षणः । ज्वरः
१. अस्याग्रे अष्टपत्रात्मको ग्रन्थः खण्डितंस्ताडपत्रपुस्तके।
ज्वरचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १३९
प्राणान्तकृद्यश्च शीघ्रमिन्द्रियनाशः ।। जो ज्वर बहुत से प्रबल कारणों से उत्पन्न हुआ हो, जिसमें बहुत से लक्षण हों तथा जो शीघ्र इन्द्रियशक्ति को नष्ट करने वाला हो वह असाध्य होता है । अष्टविध ज्वरों के लक्षण १. वातज्वर—चरक नि. अ. १ में कहा है—तस्येमानि लिङ्गानि भवन्ति, तद्यथा-विषमारम्भविसर्गित्वम्, ऊष्मणो वैषम्यं, तीव्रतनुभावानवस्थानानि ज्वरस्य, जरणान्ते दिवसान्ते निशान्ते धर्मान्ते वा ज्वराभ्यागमनमभिवृद्धिर्वा ज्वरस्य, विशेषेण परुषारुणवर्णत्वं नख नयनवदनमूत्रपुरीषत्वचामत्यर्थं क्लृप्तीभावश्च, अनेकविधोपमाश्चलाचलाश्च वेदनास्तेषां तेषामङ्गावयवानां, तद्यथा—पादयोः सुप्तता, पिण्डिकयोरुद्वेष्टनं, जानुनो केवलानां सन्धीनां विश्लेषणं, ऊर्वोः सादः, कटीपार्श्वपृष्ठस्कन्धबाह्वंसोरसां च भङ्गरुग्णमृदितमुथितचटितावपीडितावन्नुनत्वमिव, हन्वोश्चाप्रसिद्धिः स्वनश्च कर्णयोः, शङ्खयोर्निस्तोदः, कषायास्यताऽऽस्यवैरस्यं वा, मुखतालुकण्ठशोषः, पिपासा, हृदयग्रहः, शुष्कच्छर्दिः, शुष्ककासः, क्षवथूद्गारविनिग्रहः, अन्नरसखेदः, प्रसेकारोचकाविपाकाः, विषादविजृम्भा-विनामवेपथुश्रमभ्रमप्रलापजागरणारोमहर्षदन्तहर्षस्तथोष्णाभिप्रायता, निनिदानोक्तानानुपशयो विपरीतोपशयश्चेति वातज्वरलिङ्गानि ।
२. पित्तज्वर—युगपदेव केवले शरीरे ज्वराभ्यागमनमभिवृद्धिर्वा भुक्तस्य विदाहकाले मध्यन्दिनेऽर्धरात्रे शरदि वा विशेषेण, कटुकास्यता, घ्राणमुखकण्ठौष्ठतालुपाकः, तृष्णा, भ्रमो मदो मूर्च्छा, पित्तच्छर्दनम्, अतीसारः, अन्नद्वेषः, सदनं, स्वेदः, प्रलापो रक्तकोठाभिनिर्वृत्तिः शरीरे, हरितहारिद्रत्वं नखनयनवदनमूत्रपुरीषत्वचाम्, अत्यर्थमूष्मणस्तीव्रभावोऽतिमात्रं दाहः शीताभिप्रायता, निदानोक्तानामनुपशयो विपरीतोपशयश्चेति पित्तज्वरलिङ्गानि भवन्ति ।
३. श्लेष्म ज्वर—युगपदेव केवले शरीरे ज्वराभ्यागमनमभिवृद्धिर्वा भुक्तमात्रे पूर्वरात्रे वसन्तकाले वा विशेषेण, गुरुगात्रत्वं, अनन्नाभिलाषः, श्लेष्मप्रसेको, मुखस्य च माधुर्यं, हल्लासो, हृदयोपलेपः, स्तिमितत्वं, छर्दिः, मृद्वग्निता, निद्राधिक्यं, स्तम्भः, तन्द्रा, श्वासः, कासः, प्रतिश्यायः, शैत्यं, शैत्यं च नखनयनवदनमूत्रपुरीषत्वचामत्यर्थं, शीतपिडकाश्च भृशमङ्गेभ्य उत्तिष्ठन्ति, उष्णाभिप्रायता, निदानोक्तानामनुपशयो विपरीतोपशयश्चेति श्लेष्मज्वरलिङ्गानि भवन्ति ।
४. वातपित्त—ज्वर चरक चि. अ. ३ में कहा है—शिरोरुक् पर्वाणां भेदो दाहो रोम्णां प्रहर्षणम् । कण्ठास्यशोषो वमथुस्तृष्णा मूर्च्छा भ्रमोऽरुचिः ।। स्वप्ननाशोऽतिवाग्जृम्भा वातपित्तज्वराकृतिः ।।
५. वातकफ ज्वर—शीतको गौरवं तन्द्रा स्तैमित्यं पर्वाणां च रुक् । शिरोग्रहः प्रतिश्यायः कासः स्वेदाप्रवर्तनम् ।। सन्तापो मध्यवेगश्च वातश्लेष्मज्वराकृतिः ।।
६. कफपित्त ज्वर—मुहुर्दाहो मुहुः शीतं स्वेदस्तम्भो मुहुर्मुहुः । मोहः कासोऽरुचिस्तृष्णा श्लेष्मपित्तप्रवर्त्तनम् ।। तिक्ततिक्तास्यता तन्द्रा श्लेष्मपित्तज्वराकृतिः ।।
७. सन्निपात ज्वर—क्षणे दाहः क्षणे शीतमस्थिसन्धिशिरोरुजा । सास्रावे कलुषे रक्ते निर्भुग्ने चापि दर्शने ।। सस्वनौ सरुजौ कर्णौ कण्ठः शूकैरिवावृतः । तन्द्रा मोहः प्रलापश्च कासः श्वासोऽरुचिर्भ्रमः ।। परिदग्धा खरस्पर्शा जिह्वा स्रस्ताङ्गता परम् । ष्ठीवनं रक्तपित्तस्य कफेनोन्मिश्रितस्य च ।। शिरसो लोठनं तृष्णा निद्रानाशो हृदि व्यथा । स्वेदमूत्रपुरीषाणां चिराद्दर्शन-मल्पशः ।। कृशत्वं नातिगात्राणां प्रततं कण्ठकूजनम् । कोठानां श्यावरक्तानां मण्डलानां च दर्शनम् । मूकत्वं स्रोतसां पाको गुरुत्वमुदरस्य च । चिरात्पाकश्च दोषाणां सन्निपातज्वराकृतिः ।।
८. आगन्तु ज्वर—चरक चि. अ. ३ में कहा है—आगन्तुरष्टमो यस्तु स निर्दिष्टश्चतुर्विधः । अभिघाताभिषङ्गाभ्यामभिचाराभिशापतः ।। ते पूर्वे केवलाः पश्चान्निजैर्व्यामिश्रलक्षणाः । हेत्वौषधविशिष्टाश्च भवन्त्यागन्तवो ज्वराः ।। आगन्तु ज्वर पूर्व स्वतन्त्र होते हैं तथा पीछे से इनमें वातादि दोष भी प्रकुपित हो जाते हैं ।
आमज्वर के लक्षण—अरुचिश्चाविपाकश्च गुरुत्वमुदरस्य च । हृदयस्याविशुद्धिश्च तन्द्रा चालस्यमेव च ।। ज्वरोऽविसर्गी बलवान् दोषाणामप्रवर्त्तनम् । लालाप्रसेको हल्लासो क्षुन्नाशो विरसं मुखम् । स्तब्धसुप्तगुरुत्वं च गात्राणां बहुमूत्रता । न विङ्जीर्णा न च ग्लानिर्ज्वरस्यामस्य लक्षणम् ।। आमज्वर में उपर्युक्त अरुचि, अपचन आदि लक्षण होते हैं । उसकी चिकित्सा निम्न प्रकार से की जाती है ।
चिकित्सा—आमज्वर में दोषों को पचाना ही मुख्य उद्देश्य होता है । इसीलिये चरक में कहा है—"ज्वरे लङ्घनमेवादौ" । लङ्घन कराने से आमरस की उत्पत्ति नहीं होती है इसलिये दोषों का पाचन भी शीघ्र होकर ज्वर से मुक्ति हो जाती है । इसीलिये अष्टाङ्गसंग्रह में कहा है—आमाशयस्थोहत्वाऽग्निं सामो मार्गान् पिधापयत् । विदधातिज्वरं दोषस्तस्माल्लङ्घनमाचरेत् ।। आमदोषों में दोषों का पाचन किये बिना कभी वमन नहीं कराना चाहिये ।
जीर्णज्वर की चिकित्सा—जीर्णज्वराणां सर्वेषां पयः प्रशमनं परम् । पेयं तदुष्णं शीतं वा यथास्वं भेषजैः शृतम् ।। तथा—
१४० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् ज्वरचिकित्सिताध्यायः ? ]
अभ्यङ्गांश्च प्रदेहांश्च सस्नेहान् सावगाहनान् विभज्य शीतोष्णतया कुर्याज्जीर्णे ज्वरे भिषक् ।। जीर्णज्वर में रोगी को दुग्धपान कराना चाहिये तथा अवस्थानुसार शीत एवं उष्ण अभ्यङ्ग आदि देने चाहिये। ज्वर की वृत्ति (प्रवृत्ति या उत्पत्ति) चरक चि. अ. १ में कहा है—प्रवृत्तिस्तु परिग्रहात्। निदाने पूर्वमुद्दिष्टा रुद्रकोपाच्च दारुणात्। ज्वर की उत्पत्ति दो प्रकार से मानी गई है १. परिग्रह २. रुद्रकोप से। परिग्रह से अभिप्राय धन के एकत्र करने से है। चरक वि. अ. ३ में परिग्रह द्वारा ज्वर की उत्पत्ति निम्न प्रकार से दी है—भ्रश्यति तु कृतयुगे केषांचिदत्यादानात्सांपन्निकानां शरीरगौरवमासीत्, शरीरगौरवात् श्रमः, श्रमादालस्यम्, आलस्यात् संचयः, संचयात् परिग्रहः, परिग्रहाल्लोभः प्रादुर्भूतः। ततस्त्रेतायां लोभादभिद्रोहः, अभिद्रोहादनृतवचनम् अनृतवचनात् कामक्रोधमानद्वेषपारुष्याभिघातभयतापशोकचित्तोद्वेगादयः प्रवृत्ताः, ततस्त्रेतायां धर्मपादोऽन्तर्धानमगमनत् तस्यान्तर्धानात् (युगवर्षप्रमाणस्य पादह्रासः) पृथिव्यादीनां गुणपादप्रणाशोऽभूत्, तत्प्रणाशकृतश्च सस्यानां स्नेहवैमल्य रसवीर्यविपाकप्रभावगुणपादभ्रंशः, ततस्तानि प्रजाशरीराणि हीनगुणपादैराहारविहारैरयथापूर्वमुपष्टभ्य- मानान्यग्निमारुतपरीतानि प्राग्व्याधिभिर्ज्वरादिभिराक्रान्तानि। अधर्म के कारण लोगों में आलस्य उत्पन्न हो गया तथा आलस्य के संचय तथा संचय से परिग्रह (अर्थात् अच्छे बुरे सब तरह के उपायों से धन लेने की इच्छा) हो गया। और परिग्रह से लोभ, असत्य, काम, क्रोध, अहंकार, द्वेष, भय, ताप, शोक आदि उत्पन्न हो गये। तथा क्रमशः पृथ्वी आदि के गुणों में ह्रास हो जाने से मनुष्यों के शरीर का पोषण क्रम हो गया जिससे ज्वर आदि व्याधियां उत्पन्न हो गई। (२) रुद्रकोप से ज्वर की उत्पत्ति चरक चि. अ. ३ में निम्न वर्णन मिलता है—द्वितीये हि युगे सर्वमक्रोधव्रतमास्थितम्। दिव्यं सहस्रं वर्षाणामसुरा अभिदुद्रुवुः ।। तपोविघ्ननाशनाः कर्तु तपोविघ्नं महात्मनाम् । पश्यन् समर्थश्चोपेक्षां चक्रे दक्षः प्रजापतिः ।। पुनर्महेश्वरं भागं ध्रुवं दक्षः प्रजापतिः । यज्ञे न कल्पयामास प्रोच्यमानः सुरैरपि ।। ऋचः पशुपतेर्याश्च शैव्यश्चाहुतयश्च याः । यज्ञसिद्धिप्रदास्ताभिर्हीनं चैव स इष्टवान् ।। अथोत्तीर्णव्रतो देवो बुद्ध्वा दक्षव्यतिक्रमम् । रुद्रो रौद्रं पुरस्कृत्यं भावमात्मविदात्मनः ।। सृष्ट्वा ललाटे चक्षुर्वे दग्ध्वा तानसुरान् प्रभुः । बाणं क्रोधाग्निसंतप्तमसृजत्सत्रनाशनम् ।। ततो यज्ञः स विध्वस्तो व्यथिताश्च दिवौकसः । दाहव्यथापरीताश्च भ्रान्ता भूतगणा दिशः ।। अथेश्वरं देवगणः सह सप्तर्षिभिर्विभुम् । तमृग्भिरस्तुवद्यावच्छिवे भावे शिवः स्थितः ।। शिवं शिवाय भूतानां स्थितं ज्ञात्वा कृताञ्जलिः । भिया भस्मप्रहरणस्त्रिशिरा नवलोचनः ।। ज्वालामालाकुलो रौद्रो ह्रस्वजङ्घोदरः क्रमात् । क्रोधाग्निरुक्तवान् देवमहं किं करवाणि ते ।। तमुवाचेश्वरः क्रोधं ज्वरो लोके भविष्यति । जन्मादौ निधने च त्वमपचारान्तरेषु च ।। इसमें रुद्र के कोप से उत्पन्न हुई क्रोधाग्नि से ज्वर आदि की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है। इसी प्रकार अष्टाङ्गसंग्रह में भी ज्वर की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है—ज्वरस्तु स्थाणुशापात् प्राचेतसत्वमुपागतस्य प्रजापतेः क्रतौ भागमपरिकल्पयतस्तद्विनाशार्थं पूर्वजन्मावमानितया रुद्राण्या प्रेरितस्य पशुपतेर्दिव्यमब्दसहस्रं परिरक्षितवतः क्रोधमतिचिरकालसम्भृतो व्रतान्ते रोषाग्निः किङ्कररूपेण किल पिण्डितमूर्तिर्वीरभद्रनामा भस्मप्रहरणस्त्रिशिरोऽक्षिबाहुपादः पिङ्गललोचनो दंष्ट्रो शङ्कुकर्णः कृष्णतनुरुत्तमाङ्गाग्निश्चचार । स देवीविनिर्मितया सह भद्रकाल्या प्रतिरोमकूपमभिनिःसृतैर्विविधविकृता- कृतिभिरनन्तैर्भयानकवाक्यक्रियावपुर्भिरनुचरैः परिवृतश्चतुर्युगान्तकरकालाम्भोदसहस्रनिनदोऽनुनादयन् रोदसी ज्वालागर्भेण परीतः कलकलारावेण महाभूतसंप्लवकारिणा विधाय दानवबधमश्वमेधाध्वरविध्वंसनञ्च प्राञ्जलिर्विज्ञापयामास शिवम्। शिवीभूतोऽसि देवदेव, दैवैः पितामहप्रभृतिभिर्जगतः पित्रा च धात्राऽभिषूयमानः । सम्प्रत्यहं किं करवाणीति ।। तं शूली क्रोधमादिदेश । यस्मात् त्रिदशैरप्यजय्य ! मन्क्रोध ! व्रतविघ्नं चिकीर्षुर्दैत्यसैन्यं दक्षो दक्षहव्यं च त्वया जीर्णमतो जगतोऽस्य सस्थावरस्य ज्वरयिता ज्वरो भवान् भवतु । त्वं हि सर्वरोगाणां प्रथमः प्रवरो जन्ममरणेषु तमोमयतया महामोहः प्राग्जन्मनो विस्मारयितापचारान्तरेषु चोष्मायमाणत्वात्सन्तापात्मा द्वयेष्वपि ध्रुवो भवेति । इसीप्रकार सुश्रुत उत्तर अध्याय ३९ में भी कहा है—रुद्रकोपाग्निसंभूतः सर्वभूतप्रतापनः । इसप्रकार हमने अध्याय के खण्डित प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयत्न किया है ।
गर्भिणीचिकित्सिताध्यायः ? ] चिकित्सास्थानम् १४१
गर्भिणीचिकित्सिताध्यायः ।
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वक्तव्य—इस अध्याय में गर्भिणी स्त्री के भिन्न २ रोगों की चिकित्सा दी गई है । यह अध्याय प्रारंभ में खण्डित है । खण्डित अंश में अन्य भी कई रोगों की चिकित्सा दी गई होगी ।
: संयोज्य मधुना शीतं क्षीरं मधु-रसाधिक(त)म् । शर्करा मधु तैलं च यष्टीमधुकफाणितम् ।।
एते हि लेहिता घ्नन्ति तथैव परिकर्तिकाम् ।
परिकर्तिका रोग—मधुर द्रव्यों से सिद्ध किये दूध को शीतल करके उसमें मधु मिलायें तथा उसमें शर्करा, मधु, तिलतैल मुलहठी तथा फाणित¹ (राब या काकवी) मिलाकर दिये जाते हैं । इनके लेहन करने (चाटने) से परिकर्तिका रोग नष्ट हो जाता है ।
वक्तव्य—(i) परिकर्तिका रोग में गुदा, नाभि तथा बस्ति आदि में परिकर्तनवत् पीडा होती है । सुश्रुत चि. अ. ३४ में कहा है—तत्र गुदनाभिमेढ्रबस्तिशिरःसु सदाहं परिकर्तनमनिलसङ्गो वायुविष्टम्भो भक्तारुचिश्च भवति ।।
फाणितं तिलकल्कं च शर्करा मधुकं तथा ।।
तण्डुलोदकसंयुक्तं सद्यो हन्ति प्रवाहिकाम् । काश्मर्यवृक्षत्वक्कल्कं श्यामामूलं तथैव च ।।
यवागूं दधिमण्डेन सिन्ध्वामल्पघृतां पिबेत् । किराततिक्तकं लोध्रं यष्टीमधुकमेव च ।।
पातव्यं मधुसंयुक्तं सद्यो हन्ति प्रवाहिकाम् ।
प्रवाहिका रोग—फाणित, तिलकल्क, शर्करा तथा मुलहठी में तण्डुलोदक मिलाकर देने से प्रवाहिका शीघ्र ही नष्ट हो जाती है । तथा गम्भारी वृक्ष की त्वचा का कल्क, त्रिवृत् (निशोत) की जड़ तथा यवागू को दही के मण्ड के साथ सिद्ध करके उसमें थोड़ा घी मिलाकर पिलायें । चिरायता, लोध्र तथा मुलहठी के चूर्ण को मधु के साथ देने से भी प्रवाहिका शीघ्र ही नष्ट हो जाती है ।
वक्तव्य—प्रवाहिका रोग का लक्षण सुश्रुत चि. अ. ३४ में निम्न दिया है—तत्र सवातं सदाहं सशूलं गुरु पिच्छिलं श्वेतं कृष्णं सरक्तं वा भृशं प्रवाहमाणः कफमुपविशति । अर्थात् मल में शूलसहित बार २ रक्त एवं पिच्छिल कफ आता है तथा दाह होती है ।।
वर्षाभूमूलनिक्वाथं योजयेद्देवदारुणा ।।
तत् पिबेन्मधुसंयुक्तं शूना स्त्री मूर्वया सह ।
शोथरोग—शोथ वाली स्त्री को पुनर्नवा की जड़ के क्वाथ में देवदारु चूर्ण, मरोड़फली तथा मधु मिलाकर सेवन करना चाहिये ।।
पिप्पल्यङ्कोठमूलानि वाजिलेण्डरसं तथा ।।
माहिषेण पिबेद्दध्ना कामलायां चिकित्सितम् ।
१. फाणित का लक्षण आयु में निम्न दिया है—
इक्षो रसस्तु यः पक्वःकिञ्चिद्गाढो बहुद्रवः ।
स एवेक्षुविकारेषु ख्यातः फाणितसंज्ञया ।।
१४२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् गर्भिणीचिकित्सिताध्यायः ? ]
कामलारोग (पीलिया—Gaundice)—कामला रोग में पिप्पली तथा अङ्कोठ की जड़ को घोड़े की लीद के रस में मिला कर भैंस की दही के साथ सेवन करना चाहिये ॥
मातुलुङ्गरसः पेयः सैन्धवेन सुयोजितः ।।
हृदि शूलस्य भैषज्यं श्रेष्ठमित्याह कश्यपः । पिप्पलीमूलकल्कस्तु पत्रं गन्धप्रियङ्गवः ।
मातुलुङ्गरसश्चैव हृदि शूलस्य भेषजम् । प्रियङ्गवोऽथ पिप्पल्यो भद्रमुस्तं हरेणवः ।।
क्षौद्रं बदरचूर्णं च षडङ्गं हृदयौषधम् ।
हृदयरोग (Heart disease)—भगवान् कश्यप कहते हैं कि मातुलुङ्ग (बिजौरै) के रस में उचित परिमाण में सैन्धव डालकर पिलाना हृच्छूल को श्रेष्ठ ओषधि है। पिप्पलीमूल का कल्क, तेजपत्र तथा गन्धप्रियङ्गु (फूल प्रियङ्गु) को मातुलुङ्ग के रस के साथ हृच्छूल में देना चाहिये तथा प्रियङ्गु, पिप्पली, भद्रमुस्ता, हरेणु, मधु तथा बेर का चूर्ण ये ६ हृदय रोग की ओषधियां हैं ॥
स्निग्धो मांसरसः पथ्यः सैन्धवेनावचूर्णितः ।
माहिषे षष्टिका वाऽपि स्यादम्ले त्वचि मारुते ।
त्वचागत वायु रोग में सैन्धव नमक डालकर स्निग्ध मांसरस अथवा सांठी के चावल भैंस के दही के साथ मिला कर देना पथ्य है ।
भद्रदारुहरीतक्यौ सैन्धवं कुष्ठमेव च । सफाणितं घृतं चैव लेह ऊर्ध्वानिलापहः ।
ऊर्ध्ववात में—भद्रदारु (देवदारु), हरड़, सैन्धव, कुष्ठ तथा फणित (राब) में घी मिलाकर अवलेह बनाकर देने से ऊर्ध्ववात रोग नष्ट होता है ॥
पिप्पल्यो गैरिकं भार्गी हिङ्गु कर्कटकी तथा ! समाक्षिको भवेल्लेहो हिक्काश्वासनिबर्हणः ।
हिक्का तथा श्वासरोग में—पिप्पली, गेरु, भारङ्गी, हींग तथा काकड़ाशृङ्गी के चूर्ण को मधु के साथ अवलेह बनाकर देने से हिक्का तथा श्वासरोग नष्ट होते हैं ॥
पिप्पली पिप्पलीमूलं मुस्ता नागरमेव च । दीपनीयं पिबेदेतं पयसा शर्कराऽन्वितम् ।।
पिप्पली, पिप्पलीमूल, नागरमोथा तथा सोंठ के चूर्ण को शर्करायुक्त दूध के साथ पीने से अग्नि दीप्त होती है ॥१४॥
नित्यं स्नाता च हृष्टा च शुक्लवस्त्रधरा शुचिः ।।
देवविप्रपरा सौम्या गर्भिणी पुत्रभागिनी ।।
नैवोन्नता न प्रणता न गुरुं धारयेच्चिरम् ।।
उद्वेजनं तथा हास्यं संघातं चापि वर्जयेत् ।।
गर्भिणी का आचरण—पुत्र की इच्छा करने वाली गर्भिणी को चाहिये कि वह नित्य स्नान करे, प्रसन्न रहे, शुभ्र वस्त्रों को धारण करे, मन को पवित्र रखे, देवताओं तथा ब्राह्मणों का सम्मान करे, सौम्य रहे और उसे बहुत ऊँचा उठना, बहुत झुकना, बहुत देर तक भारी पदार्थों को उठाना, कांपना, अधिक हंसना तथा संघात (चोट) का त्याग कर देना चाहिये । अर्थात् गर्भिणी को उपर्युक्त क्रियाएं नहीं करनी चाहिये क्योंकि इनसे गर्भपात का भय रहता है ।
वक्तव्य—चरक शा. अ. ८ में गर्भोपघातकर भावों का वर्णन किया गया है—गर्भोपघातकरास्त्विमे भावा भवन्ति; तद्यथा-उत्कटुकविषमकठिनासनसेविन्या वातमूत्रपुरीषवेगानुपुरुन्धत्या दारुणानुचितव्यायामसेविन्यास्तीक्ष्णोष्णातिमात्रसेविन्याश्च