भारतकोश
संग्रह पर लौटें

काश्यप संहिता (वृद्ध जीवकीय तन्त्र व विद्योतिनी हिन्दी टीका सहित)

Kashyapa Samhita Hindi

महर्षि काश्यप / जीवक (टीकाकार: श्री सत्यपाल भिषगाचार्य) द्वारा

स्रोत: Kashyapa Samhita (Vriddha Jivakiya Tantra) with Vidyotini Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished942 पृष्ठ
७०काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लक्षणाध्यायः २८]

योनिः शकटाकृतिरपत्यलाभाय, पीना सौभाग्याय, लम्बाऽपत्यवधाय, मण्डलाव्याभिचरणाय, उत्क्षिप्ताऽनपत्यत्वाय, सूचीमुखी दौर्भाग्याय, भृशविवृतसंवृतशुष्का लम्बा विषमा विलिङ्गा क्लेशलाभाय, मध्यनिबिडा कन्याप्रजननाय, उन्नता रमणीया मांसला पुत्रजन्मने, व्यञ्जनवती च धन्या, अतिलोमशा वैधव्यकरी, व्यञ्जनहीना त्वयशसे, पिप्लुमद्द्सावती व्यभिचारप्रव्रज्यायैः । तथैव लोमराज्युभयतो मध्यमगता नातिघना प्रशस्यते, वैधव्यायाति स्थूला, अतिस्थूलघनलोमा पौंश्चल्याय, अधोजाता दौर्भाग्याय, नाभिमतिवृत्ता मध्यत्वाय । कुक्षौ समुन्नतौ प्रशस्येते, लोमशौ प्रव्रज्यायै, सिरालौ कुभोजनाय, निम्नौ दारिद्र्याय, समौ मध्यत्वाय, दक्षिणोन्नतौ पुत्रजन्मने, वामोन्नतौ विपरीतौ । ईषदुन्नतमुदरमशिथिलमकठिनमविपुलं प्रशस्यते, दारिद्र्याय शुष्कम्, उन्नतं भोगाय, विशालविषमं विषमशीलभोगाय कल्पते, भृशशुष्कमनपत्यं; स्त्रियाश्चाधस्तादुपचितमशिरमतिविपुलमवलिकमनायुषे, मध्यं नाभेरूपरिष्टादनायुषे, एकवलिकं धन्यं, द्विवलिकं बुद्धिलाभाय, त्रिवलिकं सौभाग्याय, चतुर्वलिकं प्रजायुषे, बहुवलिकमध्यमनायुषे भवत्युदरम् । नाभिः गम्भीरा प्रदक्षिणा वृत्तोत्सङ्गिनी लोमसिरावर्तवर्जिता प्रशस्यते, गर्ताकृतिरनुन्नता सुखदुःखकरी, विषमोन्नताऽनायुष्या, स्वल्पाकृतिरनपत्या, विदेशस्था प्रव्राजयति, बृहती गम्भीरोन्नताऽऽधिपत्याय । नाभ्या पायुर्व्याख्यातः । पार्श्वे वृत्ते मांसले स्निग्धे अलोमसिरे प्रशस्येते, लोमसिरे प्रव्राजयते । पृष्ठं सममुपरिविशालमसिरमलोमकमनावर्तकं प्रशस्यते, मध्ये निम्नमायुष्मतां, निर्भुग्नं दुःखभागिनां, संक्षिप्तमनायुषां, लोमशममैत्राणामल्पापत्यानां च । लोमस्कन्धोवणिग्भारजीवी कितवो रङ्गजीवी वा, शुष्कांसो दरिद्रः, तावुभौ दीर्घायुषौ कदाचित् प्रव्रजेतामपि; स्निग्धांसः कर्षकः, पीनांस आढ्यः, कठिनांसः शूरः, शिथिलांसोऽस(श)क्तः; उन्नतांसः पुमान् प्रशस्यते, भ्रष्टांसा कन्या; विपरीते तद्गुणहानिः । कक्षावृत्तौ पृथुलौ पीनौ सुव्यञ्जनौ प्रशस्येते, विपरीतावधन्यौ, भृशलोमशौ च नारीणाम् । तथा बाहू आनुपूर्व्योपचितौ गूढारत्नी दीर्घौ जानुस्पृशौ प्रशस्येते, सिराततावायुष्मतां, पक्ष्म (क्ष)वन्तौ प्रजावताम्, असिरावप्रजानां, तिर्यक्सिरौ कृच्छ्रजीविनां, तिलवन्तौ प्रव्राजयतः, मशकलक्षणवन्तौ कलहाय । मणिबन्धने स्थूले पुंसः प्रशस्येते, तनू स्त्रियाः । उभयोरेव तिस्रो यत्रपङ्क्त्योऽच्छिन्नाः प्रशस्यन्ते, प्रथमा धन्या, द्वितीया मुख्या, तृतीया प्रजायुषे, सर्वाश्चेदविच्छिन्नाः स्निग्धा व्यक्तगम्भीरलिखिता आधिपत्याय, चतस्रो राजर्षेः, पञ्च षट् शतपुत्रस्य, सप्त देवनिकायानाम्, एकाऽपि चेदविच्छिन्ना व्यक्ता सुखायोपपद्यते ।

.................................................................................... (इति ताडपत्रपुस्तके ४६ तमं पत्रम् ।) .................................................. स्त्रीणां चातिदीर्घाश्चातिह्रस्वाश्च निन्दिताः । केशभूमिः स्निग्धा लोहिता निर्मला निर्व्रणा च प्रशस्यते ।।

मत्तगजवृषभसिंहशार्दूलहंसगतयोऽधिपतयः, स्तिमितगतयो धन्याः, चपलगतायश्चपलसुखदुःखलाधिनः, तिर्यग्गतयस्त्वधन्याः स्खलनाश्चाङ्गविस्फोटिनश्चाप्रशस्ताः । तथा, अतिगौरमतिकृष्णमतिदीर्घमतिह्रस्व- मतिकृशमतिस्थूलमतिलोमशमलोमशमतिसृद्वतिकठिनं च शरीरेष्व(रम) प्रशस्तमुच्यते । तथा बालानां रुषितरुदितस्वप्रजागरक्रोधहर्षविसर्गदानपङ्क्तिस्थैर्यगाम्भीर्याणि युक्तानि गुणाधिकानि प्रशस्यन्त इति ।। ६ ।।

हे वृद्धजीवक बालकों के दीर्घायुष्य के निम्न लक्षण होते हैं—नख—स्निग्ध, तनु (पतले) चिकने तथा ताम्र वर्ण के हों तो बालक अधिपति (राजा या स्वामी) होता है । स्थूल नख हों तो आचार्य होता है । रेखायुक्त तथा दीर्घ हों तो

लक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ७१

आयुष्मान् (दीर्घायुष्य वाला), नख नीचे झुके हुए, शुक्ति (सीप) तथा तुषाकृति हों तो बालक दरिद्र, रूक्ष हों तो दुखी, पुष्पित (पुष्पों की गन्धरूप अरिष्ट लक्षणों से युक्त) हों तो लुण्ठ व्यक्ति, श्वेतवर्ण के तथा मण्डलाकार हों तो कम आयु वाला, स्फुटित टूटे हुए हों तो पराधीन, विवर्ण हों तो व्यसनी, उन्नत (उठे हुए), किनारे पर मुड़े हुए या गोल तथा छोटे हों तो बालक सुखी होता है। नख विपुल हों तो वह मध्य श्रेणी का होता है तथा स्थूल श्वेत एवं विषम हों तो बालक भ्रमणशील होता है। पाद (पैर—Foot)—मोटे, अच्छी प्रकार प्रतिष्ठित तथा ऊपर की ओर रेखाओं वाले हों तो बालक आयुष्मान्, धनवान् तथा अधिपति (स्वामी) होते हैं। स्वस्तिक, लाङ्गल (हल) कमल, शंख, चक्र, घोड़ा, हाथी, रथ आदि मङ्गलकारी प्रहरणों से चिन्हित हों तो वे बालक राजा होते हैं। ताम्र वर्ण एवं चिकने हों तो ऐश्वर्यशाली होते हैं। यदि पैर मुड़े हुए हों तो मध्यम (साधारण) धन एवं आयु होती है। यदि उनके पैर श्वेत हों तो वे निर्धन, रेखाओं से रहित हों तो वे दूसरों का काम अर्थात् नौकरी (दासत्व) करने वाले, बहुत रेखायें हों तो वह रोगी, गोल तथा चिकनी एड़ी वाले हों तो वे सर्वगुणसम्पन्न, यदि छोटी एड़ी वाले हों तो कम आयु वाले एवं सन्तान रहित तथा यदि उनके पैर चपटे हों तो वे दूसरों की स्त्रियों को भगाने वाले अथवा उनसे प्रेम आदि करने वाले होते हैं। अङ्गुलियां, नाखून तथा पैर आदि यदि दीर्घ हों तो वे दीर्घायु तथा ह्रस्व हों तो अल्पायु होते हैं। अंगुलियां—यदि बालक की अंगुलियां मजबूत हों तो वह भाग्यवान्, पर्व (अंगुलियों की सन्धियां) यदि खूब गूढ हों तो भोगी तथा स्थूल हों तो आचार्य, और यदि अंगुलियां लोमश (बालों से युक्त) हों तो बालक निर्धन होता है। पाष्णि (एड़ी—Heal)—खुरदरी, परुष (कठोर), तनु (पतली), विषम, फटी हुई तथा मलिन एड़ी अप्रशस्त मानी गई है। उत्तरपाद (पैर का ऊपर का भाग—Dorsum of Foot)—उन्नत (उठा हुआ), शिराओं से रहित (जिस पर शिरायें—Veins उभरी हुई न हों) तथा लोम (बालों) से रहित प्रशस्त होता है। इससे विपरीत तथा विषम हो तो वह बालक चोर होता है। गुल्फ (टखने—Ankles)—मजबूत, छोटे तथा लोम (बालों) और शिराओं से रहित प्रशस्त माने गये हैं। इसके विपरीत यदि ये बहुत उभरे हुए हों तो धननाश तथा बहुत विशाल हों तो क्लेश (दुःख) के कारण होते हैं। प्रजङ्घा (Lower and of the leg)—यह पतली प्रशस्त मानी गई है। स्थूल प्रजङ्घापति पुत्र धन तथा सुख का क्षय करने वाली एवं चोरों की होती है। जङ्घा (Legs)—कसी हुई तथा शिरा और लोम से रहित प्रशस्त मानी गई है। अतिशुष्क (सूखी हुई पतली) अतिस्थूल तथा शिरा और लोम से युक्त अप्रशस्त होती हैं। ये (अप्रशस्त जङ्घायें) नारियों के लिये वैधव्य करने वाली होती हैं अर्थात् जिन स्त्रियों की जङ्घायें अप्रशस्त होती हैं वे भविष्य में विधवा हो जाती हैं। जानु (घुटने—Knee joints)—मजबूत प्रशस्त होते हैं। ऊरु (जांघ—Thigh)—मांस से युक्त, गहरी (Deep seated शिराओं वाली) तथा चिकनी—प्रशस्त होती हैं। दोनों स्फिक् (नितम्ब—Buttocks)—निर्वृत्त (गोल), जो लम्बे न हों, व्रण एवं लोमरहित तथा अविषम (जो विषम न हो अर्थात् सम हों) प्रशस्त होते हैं। शुष्क नितम्ब सन्तान रहित व्यक्ति के, लम्बे—प्रधानता नष्ट होने वालों के (अर्थात् जिनके नितम्ब लम्बे होते हैं उनकी प्रधानता—बड़प्पन नष्ट हो जाती है), बड़े नितम्ब दुश्चरित्रा के तथा छोटे शीलवान् बालकों के होते हैं। कुकुन्दर (Ischial tuberosities)—गंभीर (गहरे) लोमरहित, विभक्त हुए तथा समान आकार वाले प्रशस्त होते हैं। लोमयुक्त कुकुन्दर भ्रमणशील स्त्रियों के होते हैं। दक्षिण की ओर जिसमें आवर्त (चक्कर) हों वे प्रशस्त माने गये हैं, विपुल (बड़े) दीर्घायु वाले व्यक्तियों के तथा श्लिष्ट (आपस में मिले हुए) अल्पायु के होते हैं। जघन (कूल्हे—Pelvis)—कुछ लोग कहते हैं कि कूल्हे छाती के समान परिमाण वाले प्रशस्त होते हैं। बालकों की छाती विशाल होती है तथा बालिकाओं के कूल्हे (Pelvicregion) विशाल होते हैं। ये दोनों छाती तथा कूल्हे मध्यम आकारवाले प्रशस्त नहीं होते हैं। वृषण (Testicles)—गौरवर्ण वाले बालक के वृषण लम्बे तथा बड़े, कृष्णवर्णवाले के कृष्ण, रक्तवर्ण वाले के गौर तथा श्यामवर्ण वाले के श्याम होते हैं। रक्तवर्ण तथा लोमयुक्त वृषण मध्यम श्रेणी के माने गये हैं। मोटे वृषण प्रशस्त होते हैं। इससे विपरीत अर्थात् पतले वृषण दुर्भाग्य वाले तथा पुंस्त्व और सन्तान नाशक माने गये हैं। छोटे वृषण अल्पायुओं

७२ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् [लक्षणाध्यायः २८]

के तथा दुःख के कारण होते हैं। गौ, गदहा, घोड़ा, बकरी तथा भेड़ की आकृति वाले वृषण सौभाग्यशाली तथा आयुष्मान् बालकों के होते हैं। प्रजनन (शेप—Penis)—कोमल, दीर्घ, उच्छ्रित (उछ्राय अथवा हर्षयुक्त), बड़ी ताम्रवर्ण की तथा गोल मणि (Glans) युक्त, महान् कोश तथा महान् स्रोतों वाला प्रशस्त होता है। तथा तनु (पतला), बहुत छोटा, बहुत लम्बा, कोशरहित, श्वेत तथा काले स्राव वाला तथा वाम पार्श्व में आवृत्त वाला प्रजनन अप्रशस्त होता है। मूत्र-जो कष्ट से न आता हो, अत्यन्त पतला न हो, मात्रा में बहुत कम न हो तथा जिसका वेग सरलता पूर्वक हो-वह प्रशस्त होता है। इससे विपरीत अत्यन्त गन्ध (odour) वाला, वेदनायुक्त (Dysurea) अत्यन्त उष्ण, विवर्ण (श्वेतवर्णवाला अथवा अस्वाभाविक वर्ण वाला,-Straw Colour मूत्र का स्वाभाविक वर्ण माना जाता है, इससे विपरीत वर्ण वाला अस्वाभाविक होता है), अनिश्चित समय पर आने वाला तथा शब्द से रहित अप्रशस्त माना गया है। कन्याओं के लिये अथवा कन्या एवं बालक दोनों के लिये स्फालितमूत्रत्व (मूत्र का इधर-उधर फैल जाना) अनपत्यकर (सन्तानोत्पत्ति को नष्ट करने वाला) होता है। योनि (Vagina)—शकटाकार योनि सन्तानोत्पत्ति के लिये होती है स्थूल सौभाग्य के लिये, लम्बी अपत्यवध (सन्तानघात) के लिये, गोल व्यभिचार के लिये, उत्क्षिप्त (ऊपर उठी हुई) अनपत्य (सन्तान न होने) के लिये, सूचीमुखाकार दुर्भाग्य के लिये, बहुत अधिक फैली हुई बिल्कुल संकुचित, शुष्क, लम्बी, विषम तथा लिङ्गरहित योनि क्लेश के लिये, मध्यम रूप से भिंची हुई (न अधिक फैली हुई और न सिकुड़ी हुई) योनि कन्या की उत्पत्ति के लिये, उन्नत (उठी-उभरी हुई) रमणीय तथा मांसयुक्त योनि पुत्रोत्पत्ति के लिये होती है। व्यञ्जनयुक्त योनि प्रशस्त, अत्यन्त लोमश वैधव्य उत्पन्न करने वाली, व्यञ्जन रहित अप्रशस्त, तथा पिप्लु¹ (मांसाङ्कुर) एवं वसावती (वसा-भेद वाली) योनि व्यभिचार के लिये होती है। इसी प्रकार दोनों ओर बालों की पंक्तियों वाली, मध्यम तथा जो अत्यन्त घनी न हो वह योनि प्रशस्त होती है। अत्यन्त स्थूल वैधव्य के लिये होती है। अत्यन्त स्थूल एवं घने बालों वाली पुंश्चली (कुलटा) के लिये, नीचे झुकी हुई दुर्भाग्य के लिये तथा नाभि से भी ऊपर पहुंची हुई योनि मध्यम श्रेणी की होती है। कुक्षि (कोख-Flanks)—उन्नत (उठी हुई) प्रशस्त होती है। लोमयुक्त कोख अत्यन्त घूमने (भ्रमण करने) वाली के लिये, शिराओं से युक्त कुत्सित भोजनवालों के लिये, नीचे दबे हुए दरिद्रों के, सम आकार वाले मध्यम बालकों के, तथा यदि दक्षिण कुक्षि (Right flank) उभरी हुई हो तो पुत्रजन्म के लिये वाम कुक्षि (Left flank) उभरी हुई हो तो कन्या के जन्म के लिये होती है। उदर (Abdomen)—ईषत् उन्नत, अशथिल (जो शिथिल-ढीला न हो), कोमल तथा बहुत बड़ा न होना प्रशस्त होता है। शुष्क उदर दरिद्रों के लिये, बड़ा उदर भोग के लिये, विशाल तथा विषम उदर विषम स्वभाव तथा भोग वालों के होते हैं, अत्यन्त सूखा हुआ उदर अनपत्यकर होता है। स्त्रियों का पेट नीचे से बहुत अधिक उपचित (बढ़ा हुआ), शिराओं से रहित, अत्यन्त बड़ा तथा वलियों (लकीरों) से रहित अनायुष्यकर होता है। नाभि से ऊपर दबा हुआ होना अनायुष्यकर होता है। पेट पर यदि एक वलि (लकीर) हो तो वह प्रशस्त होता है, दो वलियों वाला बुद्धि के लिये, तीन वलियों वाला सौभाग्य के लिये, चार वलियों वाला सन्तान तथा आयु के लिये तथा बहुत वलियों वाला उदर अनायुष्यकर तथा अप्रशस्त होता है। नाभि (Umblicus)—गहरी, दक्षिण की ओर घूमी हुई, गोल, उठे हुए किनारों वाली, लोम शिरा तथा आवतों से रहित प्रशस्त होती है। गर्ताकार तथा अनुन्नत (जो उन्नत न हो) नाभि सुख तथा दुःख को करने वाली है। विषम रूप से उभरी हुई नाभि अनायुष्यकर होती है। स्वल्प आकृति वाली नाभि अनपत्यकर होती है। अपने स्थान से हटी हुई नाभि भ्रमणशील व्यक्ति की होती है तथा बड़ी, गम्भीर और उन्नत नाभि अधिपति (स्वामी) की होती है। नाभि के द्वारा ही वायु (गुदा-Anus) का भी व्याख्यान समझना चाहिये। अर्थात् नाभि के समान ही गुदा के लक्षण समझने चाहिये। पार्श्व—गोल, मांसल, स्निग्ध तथा लोम और शिराओं से रहित प्रशस्त होते हैं। लोम और


१. 'जडुलः कालकः पिप्लुः' इत्यमरः, 'निरुक्तृष्णो मांसाङ्कुरः' इत्यष्टाङ्गसंग्रहव्याख्यायामिन्दुः, जतुमणिरित्यस्य नामान्तरम्, पिप्लुमती वसावती (मेदःस्विनी) चेत्यर्थः।

लक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ७३

शिराओं से युक्त भ्रमणशील व्यक्ति के होते हैं। पृष्ठदेश (Back)—सम, ऊपर से विशाल, शिरा लोभ एवं आवतों से रहित प्रशस्त होता है। बीच के भाग में निम्न हो तो आयुष्यकर होता है। झुका हुआ दुखियों का होता है। यदि पृष्ठप्रदेश बहुत छोटा हो तो व्यक्ति अल्पायु तथा लोमयुक्त हो तो मित्ररहित एवं अल्प सन्तान वाला होता है। स्कन्ध (कन्धे-Shoulders)—कन्धों पर बाल बनियों, भार उठाने वालों, जुआरियों तथा रंगरेजों के होते हैं। शुष्क अंस (कन्धों) वाले व्यक्ति दरिद्र होते हैं। ये दोनों (लोमयुक्त एवं शुष्क स्कन्धों वाले) कभी-२ दीर्घायु भी होते हैं तथा वे व्यक्ति भ्रमणशील होते हैं। स्निग्ध अंस (कन्धा) कर्षण करने वाला, पीन (मोटे) कन्धे वाला गुणी होता है, कठिन (कठोर) कन्धों वाला शूरवीर, शिथिल कन्धों वाला अशक्त (दुर्बल) तथा उन्नत कन्धों वाला व्यक्ति प्रशस्त माना जाता है। कन्या झुके हुए कन्धों वाली प्रशस्त मानी जाती है। इनसे विपरीत में गुणों की हानि होती है अर्थात् वे अप्रशस्त होते हैं। कक्ष (बगल-Axilla)—उन्नत, विशाल, मोटे तथा सुस्पष्ट प्रशस्त माने जाते हैं। इससे विपरीत अप्रशस्त। स्त्रियों के अधिक बालों वाले कक्ष अप्रशस्त होते हैं। बाहु (Arms)—बाहु वे प्रशस्त होते हैं जो क्रमशः उपचित हों अर्थात् ऊपर से मोटी तथा नीचे क्रमशः पतली हों, जिसमें अरत्नि¹ (कोहनी) दृढ़ हों। जो दीर्घ हों तथा घुटनों को स्पर्श करने वाले हों अर्थात् इतने लम्बे हों कि घुटनों तक लटकते हों। शिराओं से युक्त बाहु आयुष्मान् बालकों के, पक्षयुक्त सन्तान वालों के, शिराओं से रहित सन्तानशून्य व्यक्तियों के, तिर्यक (तिरछी) शिरायें कृच्छ्रजीवियों (जो कठिनता से जीवित रहते हैं) के, तिलयुक्त बाहु भ्रमणशील व्यक्तियों के तथा मशक (मस्सो) से युक्त बाहु कलह करने वालों के होते हैं। मणिबन्धन (कलई-Wrist)—पुरुषों की मोटी तथा स्त्रियों की पतली प्रशस्त होती है। पुरुष तथा स्त्री दोनों की तीनों यवपंक्तियां यदि अविच्छिन्न हों तो वे प्रशस्त मानी गई हैं। प्रथम पंक्ति ऐश्वर्ययुक्त, दूसरी मुख्य तथा तीसरी प्रजा एवं आयु के लिये होती है। तीनों पंक्तियां यदि अविच्छिन्न (बिना कटी हुई—पूरी), स्निग्ध, स्पष्ट एवं गहरी चिह्नित दिखाई दे तो बालक अधिपति होता है। चारों पंक्तियां अविच्छिन्न राजर्षियों की, पांच तथा छः पंक्तियां यदि अविच्छिन्न हों तो उसके १०० पुत्र होते हैं। सात पंक्तियां अविच्छिन्न देवनिकायों की होती है तथा यदि एक भी पंक्ति अविच्छिन्न एवं स्पष्टरूप में दिखाई देती हो तो वह व्यक्ति सुखी होता है। .....................................................² स्त्रियों के (बाल) बहुत अधिक बड़े तथा बहुत छोटे निन्दित माने गये हैं। केशभूमि (बालों की जड़ें) स्निग्ध (चिकनी) लोहित, निर्मल तथा व्रणरहित प्रशस्त मानी गई है। मस्त हाथी, बैल, सिंह, चीते तथा हंस की गतियों वाले अधिपति (स्वामी) होते हैं। मन्दगति वाले प्रशस्त होते हैं। चञ्चलगतिवाले व्यक्ति चञ्चलतापूर्वक सुख तथा दुख को प्राप्त करते हैं। तिर्यक् गति वाले अप्रशस्त माने गये हैं। स्खलन (लड़खड़ाना) गति वाले तथा जिनके अङ्ग फटे हुए हैं वे व्यक्ति अप्रशस्त होते हैं। तथा अत्यन्त गौर, अत्यन्त कृष्ण, अतिदीर्घ, अतिह्रस्व, अतिकृश, अतिस्थूल अतिलोमश (बहुत अधिक बालों वाले) अलोमश (जिसके बिलकुल बाल न हों) अतिमृदु तथा अतिकठिन शरीर अप्रशस्त माने गये हैं। बालकों के रुषित (कुपित होना) रोना, सोना, जागरण, क्रोध, हर्ष, विसर्ग (मल मूत्र आदि का त्याग), आदान (अन्न जल आदि का ग्रहण), पंक्ति (पाचन), स्थिरता तथा गम्भीरता आदि लक्षण युक्तियुक्त एवं गुणवाले प्रशस्त माने गये हैं। (इससे पूर्व खण्डित अंश में संभवतः हस्तरेखाओं आदि का वर्णन किया गया है। पाठकों के ज्ञान के लिये अध्याय के अन्त में हम हस्तरेखाओं आदि के विषय को संक्षेप से देंगे) चरक शा. अ. ८ में आयुष्मान् बालकों के निम्न लक्षण दिये हैं:-तत्रेमान्यायुष्मतां कुमाराणां लक्षणानि भवन्ति, तद्यथा-एकैकजा मृद्वोऽल्पाः स्निग्धाः सुबद्धमूलाः कृष्णाः केशाः प्रशस्यन्ते, स्थिरा बहला त्वक्, प्रकृत्याकृतिसुसंपन्नमीषत्प्रमाणा-


१. 'निगूढकूर्परा वत्यर्थः' । 'अरत्निर्ना सप्रकोष्ठतलाङ्गुलिकरेऽपि च। कफोणावपि' इति मेदिनी।
२. ताडपत्र पुस्तक में इससे आगे के दो पृष्ठ खण्डित हैं जिसमें हाथ की (सामुद्रिक) रेखाओं, तथा केशपर्यन्त ऊर्ध्वजत्रु के अवयवों का संभवतः विस्तारपूर्वक निरूपण किया गया होगा। 'स्त्रीणां च' इत्यादि अगले वाक्य में केशों का ही वर्णन है।

७४ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लक्षणाध्यायः २८]

तिवृत्तमनुरूपमातपत्रोपमं शिरः, व्यूढं दृढं समं संश्लिष्टशङ्खसन्ध्यूर्ध्वव्यञ्जनमुपचितं व लनमर्धचन्द्राकृतिललाटं, बहलौ विपुलसमपीठौ समौ नीचैर्वृद्धौ पृष्ठतोऽवनतौ सुश्लिष्टकर्णपुत्रकौ महाच्छिद्रौ कर्णौ, ईषत्प्रलम्बिन्यावसङ्गते समे संहते महत्यौ भ्रुवौ, समे समाहितदर्शने व्यक्तभागविभागे बलवती तेजसोपपन्ने स्वङ्गापाङ्गे चक्षुषी, ऋज्वी महोच्छ्वासा वंशसंपन्नेषदवनताग्रा नासिका, महदृजुसुनिविष्टदन्तमास्यम्, आयामविस्तारोपपन्नां श्लक्ष्णा तन्वी प्रकृतिवर्णयुक्ता जिह्वा, श्लक्ष्णं युक्तोपचयमूर्ध्मोपपन्नं रक्तं तालु, महान्दीनः स्निग्धोऽनुनादी गम्भीरसमुत्थो धीरः स्वरः, नातिस्थूलौ नातिकृशावास्यप्रच्छादनौ रक्तावोष्ठौ, महत्यौ हनू, वृत्ता नातिमहती ग्रीवा, व्यूढमुपचितमुरः, गूढं जत्रु पृष्ठवंशश्च, विप्रकृष्टान्तरौ स्तनौ, अंसपातिनी स्थिरे पार्श्वे, वृत्तपरिपर्णायतौ बाहू सक्थिनी अङ्गुल्यश्च, महदुपचितं पाणिपादं, स्थिरवृत्तः स्निग्धास्ताम्रास्तुङ्गाः कूर्माकाराः करजाः, प्रदक्षिणवर्ता सोत्सङ्गा च नाभिः, उरस्त्रिभागहीना समा समुपचितमांसा कटी, वृत्तौ स्थिरोपचितमांसौ नात्युन्नतौ नात्यवनतौ स्फिचौ, अनुपूर्ववृत्तावुपचययुक्तावूरू, नात्युपचिते नात्यपचिते एणीपदे, प्रगूढसिरास्थिसन्धी जङ्घे, नात्युपचितौ नात्यपचितौगुल्फौ पूर्वोपदिष्टगुणौ पादौ कूर्माकारौ प्रकृतियुक्तानिवातमूत्रपुरीषाणि तथा स्वप्नजागरणआयासस्मितरुदितस्तनग्रहणानि यच्च किंचिदन्यदप्यनुक्तमस्ति तदपि सर्वं प्रकृतियुक्तमिष्टं, विपरीतं पुनरनिष्टम्, इति दीर्घायुर्लक्षणानि ।। इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. ३५ में भी बालकों के दीर्घायुष्य, मध्यमायुष्य तथा अल्पायुष्य के निम्न लक्षण दिये हैं—गूढसन्धिसिरास्नायुः संहताङ्गः स्थिरेन्द्रियः । उत्तरोत्तरसुक्षेत्रो यः स दीर्घायुरुच्यते ।। गर्भात्प्रभृत्यरोगो यः शनैः समुपचीयते । शरीरज्ञानविज्ञानैः स दीर्घायुः समासतः ।। मध्यम आयु—मध्यमस्यायुषो ज्ञानमत ऊर्ध्वं निबोध मे । अधस्तादक्षयोर्यस्य लेखाः स्युर्व्यक्तमायताः ।। द्वे वा तिस्रोऽधिका वाऽपि पादौ कर्णौ च मांसलौ । नासाग्रमूर्ध्वं च भवेदूर्ध्वं लेखाश्च पृष्ठतः ।। यस्य स्युस्तस्य परमायुर्भवति सप्ततिः ।। अल्पायुः—जघन्यस्यायुषो ज्ञानमत ऊर्ध्वं निबोध मे । ह्रस्वानि यस्य पर्वाणि सुमहच्चापि मेहनम् ।। तयोरस्यबलीढानि न च स्यात्पृष्ठमायतम् । ऊर्ध्वं च श्रवणौ स्थानान्नासा चोच्चा शरीरिणः ।। हसतो जल्पतो वाऽपि दन्तमांसं प्रदृश्यते । प्रेक्षते यश्च विभ्रान्तं स जीवेत्पञ्चविंशतिम् ।।

अत्र श्लोकाः—

यथा वक्त्रं तथा वृत्तं यथा चक्षुस्तथा मनः ।
यथा स्वरस्तथा सारो यथा रूपं तथा गुणाः ।।

जैसा व्यक्ति का मुंह होता है वैसा ही वृत्त (भाव) होता है अर्थात् मुख भावों के अनुसार बदलता रहता है । जैसी चक्षु होती है वैसा ही मन होता है अर्थात् चक्षुओं के द्वारा हम मन का अनुमान कर सकते हैं । जैसा स्वर होता है वैसा सार तथा जैसे रूप वैसे गुण । अर्थात् रूप के अनुसार गुण होते हैं । तात्पर्य यह है कि बाह्य आकृति आदि आन्तरिक भावों के अनुसार होती है तथा बदलती रहती है । कहा भी है—'आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषणेन च । नेत्रवक्त्रविकारैश्च लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः' ।। अंगरेजी में भी एक कहावत है—Face is the index of mind. जो मन का भाव होता है, चेहरे पर स्पष्टरूप से उसकी प्रतिच्छवि दिखाई देती है ।।

त्रिविधं सत्त्वमुद्दिष्टं कल्याणक्रोधमोहजम् । श्रेष्ठमध्याधमत्वं च तेषां प्रोक्तं यथाक्रमम् ।।

सत्त्व के भेद—सत्त्व तीन प्रकार के होते हैं । १. कल्याण से उत्पन्न होने वाला (२) क्रोध से उत्पन्न होने वाला (३) मोह से उत्पन्न होने वाला । इन्हें ही क्रमशः श्रेष्ठ, मध्य तथा अधम कहते हैं । अर्थात् कल्याण से उत्पन्न होने वाला सत्त्व श्रेष्ठ, क्रोध से उत्पन्न होने वाला मध्य तथा मोह से उत्पन्न होने वाला अधम होता है । चरक शा. अ. ४ में कहा है—त्रिविधं खलु सत्त्वं शुद्धं राजस तामसमिति । तत्र शुद्धमदोषमाख्यातं कल्याणांशत्वात्, राजसं सदोषमाख्यातं रोषांशत्वात् तथा तामसमपि सदोषमाख्यातं मोहांशत्वात् ।। उपर्युक्त सत्त्वों को ही क्रमशः शुद्ध (सात्त्विक), राजस तथा तामस भी कहते हैं । इनमें से प्रथम दोष रहित माना गया है । शेष दोनों रोष एवं मोह का अंश होने से दोषयुक्त होते हैं । रोष एवं मोह मन को दूषित करते हैं । इनके अभाव में मन शुद्ध होता है ।।

लक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ७५

अष्ट सप्त त्रिधा चैषां क्रमाद्भेदः प्रवक्ष्यते। सत्त्वानां, सत्त्वविज्ञानं हितमौषधकल्पने।।

इन सत्त्वों के क्रमशः आठ, सात और तीन भेद होते हैं अर्थात् श्रेष्ठ (शुद्ध) सत्त्व के ८ भेद, मध्य (राजस) सत्त्व के ७ भेद तथा अधम (तामस) सत्त्व के ३ भेद होते हैं। औषध कल्पना में सत्त्व का जानना हितकर होता है।

तपःसत्यदयाशौचदानशीलरतं समम्। ज्ञानविज्ञानसंपन्नं ब्राह्मं विद्याज्जितेन्द्रियम् ।।

शुद्ध सत्व के भेद—१. ब्राह्मसत्त्व—ब्राह्मसत्त्व से युक्त व्यक्ति तप, सत्य, दया, पवित्रता, दान तथा शील से युक्त, सम (सब प्राणियों में सम दृष्टि रखने वाला), ज्ञान तथा विज्ञान से युक्त और जितेन्द्रिय होता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—शुचिं स याभिसन्धं जितात्मान संविभागिनं ज्ञानविज्ञानवचनप्रतिवचनशक्तिसम्पन्नं स्मृतिमन्तं कामक्रोधलोभमानमोहेर्ष्याहर्षामर्षोपेतं समं सर्वभूतेषु ब्राह्मं विद्यात् ।। सुश्रुत. शा. अ. ४ में भी कहा है—शौचमास्तिक्यमभ्यासो वेदेषु गुल्पूजनम्। प्रियातिथित्वमिज्या च ब्रह्मकायस्य लक्षणम् ।।

प्रजावन्तं क्रियावन्तं धर्मशीलं जगत्प्रियम्। अनीर्ष्यमशठं प्राज्ञः प्राजापत्यं वदेच्छुचिम् ।।

२. प्राजापत्य सत्त्व—प्राजापत्य सत्त्व वाला व्यक्ति प्रजा (सन्तान) युक्त, क्रियाओं (यज्ञ आदि कों) को करने वाला, धर्मशील (धार्मिक), जगत्प्रिय (सम्पूर्ण जगत् जिसको प्रिय है अथवा जो सम्पूर्ण जगत् को प्रिय है), ईर्ष्या रहित, शठता (दुष्टता) रहित तथा पवित्र होता है ।।

शौचव्रतेज्याध्ययनब्रह्मचर्यदयापरम्। जितमानमदक्रोधं वक्तारं चाषमादिशेत् ।।

३. आर्षसत्त्व—शौच, व्रत, इज्या (यज्ञ), अध्ययन, ब्रह्मचर्य तथा दया से युक्त, मान (अहंकार) मद, तथा क्रोध को जिसने जीत लिया है तथा जो वक्ता है वह आर्ष सत्त्व होता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—इज्याध्ययनव्रतहोमब्रह्मचर्यपरमतिथिव्रतमुपशान्तमदमानरागद्वेषमोहेलोभरोषणं प्रतिभावचनविज्ञानोपधारणशक्तिसम्पन्नमार्षं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—जपव्रतब्रह्मचर्यहोमाध्ययनसेविनम्। ज्ञानविज्ञानसम्पन्नमृषिसत्त्वं नरं विदुः ।।

त्रिवर्गनित्यं विद्वांसं शूरमक्लिष्टकारिणम्। प्राहुरैन्द्रं महाभागमधिष्ठातारमीश्वरम् ।।

४. ऐन्द्रसत्त्व—ऐन्द्रसत्त्व वाला व्यक्ति त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ तथा काम) में लगा हुआ, विद्वान्, शूरवीर, निन्दित कर्म न करने वाला, महाभाग (महात्मा), अधिष्ठाता (स्वामी) तथा ऐश्वर्ययुक्त होता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—ऐश्वर्यवन्तमादेयवाक्यं यज्वान शूरमोजस्विनं तेजसोपेतमक्लिष्टकर्माणं दीर्घदर्शिनं धर्मार्थकामाभिरतमैन्द्रं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—माहात्म्यं शौर्यमाशा च सतत शास्त्रबुद्धिता। भृत्यानां भरणं चापि माहेन्द्रं कायलक्षणम् ।।

त्यक्तदम्भभयक्रोधं प्राप्तकारिणीमीश्वरम्। समं मित्रे च शत्रौ च याम्यं विद्यात् सुनिश्चितम् ।।

५. याम्यसत्त्व—जिसने दम्भ (अहंकार), भय तथा क्रोध का त्याग कर दिया है, जो प्राप्तकारी (युक्त कार्य करने वाला) ऐश्वर्यशाली, मित्र तथा शत्रुमें समान व्यवहार करने वाला तथा सुनिश्चित (दृढ़निश्चयी) व्यक्ति है—वह याम्यसत्त्व वाला होता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—लेखास्थवृतं प्राप्त कारिणमसंप्रहार्यमुत्थानवन्तं स्मृतिमन्तमैश्वर्यालम्बिनं व्यपगतरागद्वेषमोहं याम्यं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—प्राप्तकारी दृढ़ोत्थानो निर्भयः स्मृतिमान् शुचिः। रागमोहमदद्वेषैर्वर्जितो याम्यसत्त्ववान् ।।

अशुचिविशुचिः शूरः शीघ्रक्रोधप्रसादवान्। पुण्यशीलो महाभागो वारुणो वरुणप्रियः ।।

६. वारुणसत्त्व—जो व्यक्ति अशुचि, विशुचि, शूर, शीघ्र ही क्रुद्ध एवं शीघ्र ही प्रसन्न होने वाला, पुण्यशील, महाभाग (महात्मा) तथा वरुणप्रिय है—वह वारुणसत्त्व होता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—शूरं धीरं शुचिमशुचिद्वेषिणं

७६काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लक्षणाध्यायः २८]

यज्ज्वानमम्भोविहाररतिमक्लिष्टकर्माणं स्थानकोपप्रसादं वारुणं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है शीतसेवा सहिष्णुत्वं पैङ्गल्यं परिकेशता। प्रियवादित्वमित्येतद्वारुणं कायलक्षणम्।

स्थानमानपरीचारधर्मकामार्थलोभिनम्। क्रोधप्रसादफलदं कौबेरं प्राहूरूजितम् ।।

७. कौबेरसत्त्व—जो व्यक्ति स्थान (भूमि-मकान आदि), मान (आदर), परिचार (सेवा), धर्म, काम तथा अर्थ (धन) का लोभी अर्थात् स्थान, मान आदि का इच्छुक हो, जिसका क्रोध एवं प्रसाद (प्रसन्नता) फलप्रद हो अर्थात् क्रोध एवं प्रसाद निरर्थक न हो तथा बलवान् हो—वह कौबेरसत्त्व कहलाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—स्थानमानोपभोगपरिवारसम्पन्नं सुखविहारं धर्मार्थकामनित्यं शुचिं व्यक्तकोपप्रसादं कौबेरं विद्यात्॥ सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—मध्यस्थता सहिष्णुत्वमर्थस्यागमसंचयौः। महाप्रसवशक्तित्वं कौबेर कायलक्षणम्॥

श्लोकाख्यानेतिहासज्ञं गन्धमाल्याम्बरप्रियम्। नृत्तगीतोपहासज्ञं गान्धर्वं सुभगं विदुः ।।

८. गान्धर्वसत्त्व—जो व्यक्ति श्लोक, आख्यान (कथा) तथा इतिहास का जाननेवाला है, गन्ध (इत्र आदि) माला तथा वस्त्रों का प्रेमी है, नृत्य गीत तथा उपहास का ज्ञाता एवं ऐश्वर्यशाली है—वह गान्धर्वसत्त्व कहलाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—प्रियनृत्यगीतवादित्रोल्लापकं श्लोकाख्यायिकेतिहासपुराणेषु कुशलं गन्धमाल्यानुलेपनवसनस्त्रीविहारनित्यमनसूयकं गान्धर्वं विद्यात्॥ सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—गन्धमाल्यप्रियत्वं च नृत्यवादित्रकामिता। विहारशीलता चैव गान्धर्व कायलक्षणम्॥

ये चान्येऽपि शुभा भावाः शुद्धास्ते चापि सात्त्विकाः।
एतत् कल्याणभूयिष्ठं शुद्धं सत्त्वमिहाष्टधा ।।

इसके अतिरिक्त अन्य भी जो शुभ एवं सात्त्विक भाव होते हैं वे शुद्ध कहलाते हैं। इस प्रकार यह कल्याण अंश की प्रधानता वाला शुद्ध सत्त्व ८ प्रकार का कहा है।

वक्तव्य—चरक तथा सुश्रुत में सात्त्विक या शुद्ध सत्त्व के ७ भेद दिये गये हैं। उनमें प्राजापत्य सत्त्व का उल्लेख नहीं है। चरक. शा. अ. ४ में कहा है—इत्येवं शुद्धस्य सत्त्वस्य सप्तविधं भेदांशं विद्यात् कल्याणांशत्वात्, संयोगात्तु ब्राह्ममत्यन्तशुद्धं व्यवस्येत्॥ इन सातों सात्त्विक सत्त्वों में से भी ब्राह्मसत्त्व शुद्धतम जानना चाहिये। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—सप्तैते सात्त्विकाः कायाः—॥

आरोग्यं प्रशमो रूपं ज्ञानविज्ञानमार्यता। दीर्घमायुः सुखात्यक्तं सामान्यं शुद्धलक्षणम् ।।

शुद्ध सत्त्व के सामान्य लक्षण आरोग्य, शान्ति, रूप, ज्ञान, विज्ञान, आर्यता (स्वामित्व), दीर्घायु, सुख की प्राप्ति ये शुद्ध सत्त्व के सामान्य लक्षण हैं॥

ईश्वरोऽसूयकश्चण्ड आत्मपूजोपधिप्रियः। सानुक्रोशभयो रौद्रो हन्ता शूरस्तथाऽऽसुरः ।।

राजस सत्त्व के भेद—१. आसुर सत्त्व—ऐश्वर्यशाली, दूसरों के गुणों में दोषारोपण करने वाला, तीव्र क्रोधवाला, आत्मपूजा (अपनी प्रशंसा करने वाला अथवा अपनी ही आहार आदि के द्वारा पूजा करने वाला—स्वार्थी) तथा उपधिप्रिय (रागद्वेष अथवा छल-कपट का प्रेमी), अनुक्रोश (दया) तथा भय से युक्त, रौद्र (भीषण या उग्रस्वभाव), हत्या करने वाला तथा शूरवीर व्यक्ति—आसुर सत्त्व होता है। चरक. शा. अ. ४ में कहा है—शूरं चण्डमसूयकमैश्वर्यवन्तमौपधिकं रौद्रमननुक्रोशमात्मपूजकमासुरं विद्यात्। इसी प्रकार सुश्रुत शा. अ. ४ में कहा है—ऐश्वर्यवन्तं रौद्रं च शूरं चण्डमसूयकम्। एकाशिनं चौदरिकमासुरं सत्त्वमीदृशम्॥

लक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ७७

क्रूरच्छिद्रप्रहारी च रोषेर्ष्यामर्षसन्ततः । वैरमांसाशनायासः १ कलहार्थी च राक्षसः ।।

२. राक्षस सत्त्व—जो व्यक्ति क्रूर, छिद्रप्रहारी (अवकाश अथवा दुर्बलता पाकर प्रहार करने वाला), क्रोध, ईर्ष्या, एवं अमर्ष (असहिष्णुता-क्षमा न करना) से युक्त, वैर करनेवाला, मांस खाने वाला तथा कलहप्रिय (झगड़ालू) है, वह राक्षससत्त्व होता है । चरक शा. अ. ४ में कहा है—अमर्षिणमनुबन्धकोपं छिद्रप्रहारिणं क्रूरमाहारातिमात्ररुचिमामिषप्रियतमं स्वप्नायासबहुलमीर्षुं राक्षसं विद्यात् । सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—एकान्तग्राहिता रौद्रमसूया धर्मबाह्यता । भृशमात्मस्तवश्चापि राक्षसं कायलक्षणम् ।।

शुचिद्विड्शुचिः क्रूरोऽभीरुर्भीषयिताऽऽविलः । मद्यमांसप्रियः शङ्की पैशाचो बहुभोजनः ।।

३. पैशाचसत्त्व—जो व्यक्ति पवित्रता से द्वेष करने वाला, अपवित्र, क्रूर, अभीरु (जो डरपोक न हो), दूसरों को डराने वाला, कलुषित, मद्य तथा मांस का प्रेमी, शङ्का (सन्देह) करने वाला, तथा बहुत भोजन करने वाला है—वह पैशाच सत्त्व होता है । चरक शा. अ. ४ में कहा है—महालसं स्त्रैणं स्त्रीरहस्काममशुचिं शुचिद्वेषिणं भीरुं भीषयितारं विकृतविहाराहारशीलं पैशाचं विद्यात् । सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—उच्छिष्टाहारता तैक्ष्ण्यं साहसप्रियता तथा । स्त्रीलोलुपत्वं नैर्लज्यं पैशाचं कायलक्षणम् ।।

तीक्ष्णमायासबहुलं निद्रालुं बहुवैरिणम् । अक्रुद्धभीरुं स्त्रैणं च सार्पं नित्यौष्ठलेहिनम् ।।

४. सार्पसत्त्व—जो व्यक्ति तीक्ष्ण, बहुत परिश्रमी, बहुत सोने वाला, बहुत समय तक वैर रखने वाला, अक्रुद्धभीरु२ (जब तक क्रुद्ध न हो तब तक डरपोक), स्त्री के वश में रहने वाला, सदा होठों को चाटने वाला अथवा सदा खाते रहने वाला है—वह सार्पसत्त्व होता है । चरक शा. अ. ४ में कहा है—क्रुद्धं शूरमक्रुद्धभीरुं तीक्ष्णमायासबहुलं संत्रस्तगोचरमाहारविहारपरं सार्पं विद्यात् । सुश्रुत शा. अ. ४ में कहा है—तीक्ष्णमायासिनां भीरु चण्डं मायान्वितं तथा । विहाराचारचपलं सर्पसत्त्वं विदुर्नरम् ।।

दानशय्यात्यलङ्कारपानभोजनमैथुनैः । नित्योपेतं प्रमुदितं याक्षं विद्यात् प्रभक्षणम् ।।

५. याक्षसत्त्व—नित्य दान, शय्या (शयन), अतिअलंकार (आभूषण अथवा सजावट), अतिपान, अतिभोजन तथा अतिमैथुन में लगा हुआ, प्रसन्न तथा खूब खाने वाला व्यक्ति याक्षसत्त्व कहलाता है ।।

अहङ्कृता महाहारा वैरिणो विकृताननाः । विरूपा विकृतात्मानो भूतसत्त्वा निशाप्रियाः ।।

६. भूतसत्त्व—जो व्यक्ति अहंकारी, बहुत खानेवाले, वैरी, विकृत मुख (चेहरे) वाले, विकृतरूप वाले तथा विकृत आत्मा वाले हैं तथा जिन्हें रात्रि प्रिय है—वे भूतसत्त्व वाले होते हैं । चरक तथा सुश्रुत में इसे प्रैतसत्त्व नाम से कहा गया है । चरक शा. अ. ४ में कहा है—आहारकाममतिदुःखशीलाचारोपचारमसूयकमसंविभागिनमतिलोलुपमकर्मशीलं प्रैतं विद्यात् । सुश्रुत शा. अ. ४ में कहा है—असंविभागमलसं दुःशीलमसूयकम् । लोलुपं चाप्यदातारं प्रतसत्त्वं विदुर्नरम् ।।

अमर्षिकुत्सिताहारवाग्द्यूतं नित्यशङ्कितम् । चलं दुर्मेधसं भीरुं शाकुनं विद्ध्यनोकसम् ।।

७. शाकुनसत्त्व असहिष्णु, कुत्सित (निन्दित) आहार तथा निन्दित वाणी में लगे हुए (अर्थात् निन्दित आहार एवं निन्दित शब्दों का प्रयोग करने वाले) नित्य शंका (सन्देह) करने वाले, चल (अस्थिर मति), कुण्ठित बुद्धि वाले तथा भीरु एवं जिसके रहने का स्थान ठीक तरह से निश्चित न हो ऐसे व्यक्ति को शाकुन सत्त्व कहते हैं । चरक शा. अ. ४


१. वैरे मांसाशने च आयासो यस्येत्यर्थः ।
२. यावन्नक्रुध्यति तावद्भीरुरित्यर्थः ।

७८ | काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् | लक्षणाध्यायः २८]


में कहा है—अनुषक्तकाममजस्त्रमाहारविहारपरमनवस्थितममर्षिणमसंचयं शाकुनं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—प्रवृद्धकामसेवी चाप्यजस्त्राहार एव च। अमर्ष णोऽनवस्थायी शाकुनं कायलक्षणम्॥

इत्येतद्राजसं सत्त्वं सप्तधा क्रोधकारितम्। व्यामिश्रगुणदोषं च रज एवोपलक्षयेत्।।

इस प्रकार क्रोध से उत्पन्न होने वाला राजससत्त्व सात प्रकार का है। इनमें गुण एवं दोषों के मिले होने से इन्हें राजस ही समझें।

वक्तव्य—चरक तथा सुश्रुत में राजससत्त्व के ६ भेद दिये हैं, उनमें याक्षसत्त्व नहीं दिया है। चरक में कहा है—इत्येतवं खलु राजसस्य सत्त्वस्य षड्विधं भेदांशं विद्यात् रोषांशत्वात्। सुश्रुत में भी कहा है—"षडेते राजसाः कायाः"।।

आहारमैथुनपरं स्वप्नशीलममेधसम्। अथैवं पाशवं विद्यान्मृजाऽलङ्कारवर्जितम्।।

तामस सत्त्व के भेद १. पाशव सत्त्व—सदा आहार तथा मैथुन में लगे हुए, अत्यधिक सोने वाले, निन्दित अथवा कम बुद्धिवाले, शुद्धि तथा अलंकार (आभूषण या सजावट) से रहित व्यक्ति को पाशवसत्त्व जानें। चरक शा. अ. ४ में कहा है—निराकरिष्णुमवमवेशं जुगुप्सिताचाराहारं मैथुनपरं स्वप्नशीलं पाशवं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—दुर्मेधस्त्वं मन्दता च स्वप्नमैथुननित्यता। निराकरिष्णुता चैव विज्ञेयाः पाशवा गुणाः।।

भीरुमप्रज्ञमाद्यूतं कामक्रोधवशं गतम्। हिंस्रमात्मपरं विद्यान्मात्स्यं सुप्रजसं शठम्।।

२. मात्स्य सत्त्व—भीरु, मूर्ख, आद्यून¹ (बहुत खाने वाला पेटू), कामी तथा क्रोधी (काम तथा क्रोध में लगा हुआ) हिंसक, आत्मपर (सदा अपने में ही लगा रहने वाला—दूसरों की परवाह न करने वाला), अधिक सन्तान वाला तथा धूर्त व्यक्ति मात्स्यसत्त्व कहलाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—भीरुमबुधमाहारलुब्धमनवस्थितमनुषक्तकामक्रोधं सरणशीलं तोयकामं मात्स्यं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—अनवस्थितता मौर्ख्यं भीरुत्वं सलिलार्थिता। परस्पराभिमर्दश्चमत्स्यसत्त्वस्य लक्षणम्।।

बधबन्धपरिक्लेशशीतवातातपक्षकम्। बुद्धयङ्गहीनमलसं वानस्पत्यं वदेदृजुम्।।

३. वानस्पत्य सत्त्व—वध, बन्धन, दुःख, सर्दी, वायु तथा धूप को सहने वाले, बुद्धि तथा अङ्गों से हीन, आलसी तथा ऋजु (सरल-सीधे सादे) व्यक्ति को वानस्पत्य सत्त्व कहते हैं। चरक शा. अ. ४ में कहा है—अलसं केवलमभिनिविष्टमाहारे सर्वबुद्ध्या हीनं वानस्पत्यं विद्यात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में भी कहा है—एकस्थानरतिर्नित्यमाहारे केवले रतः। वानस्पत्यो नरः सत्त्वधर्मकायार्थवर्जितः॥

इत्येतत्त्रिविधं सत्त्वं तामसं मोहसंभवम्। यच्चामेध्यमकल्याणं सर्वं तच्चापि तामसम्।।

इस प्रकार मोह से उत्पन्न यह तीन प्रकार का तामससत्त्व कहा है। और जो कुछ भी अपवित्र तथा अकल्याणकारी होता है वह सब तामस कहलाता है। चरक शा. अ. ४ में कहा है—इत्येवं खलु तामसस्य सत्त्वस्य त्रिविधं भेदांशं विद्यान्मोहांशत्वात्। सुश्रुत शा. अ. ४ में कहा है—इत्येते त्रिविधाः कायाः प्रोक्ता वै तामसास्तथा॥

सत्त्वं प्रकाशकं विद्धि, रजश्चापि प्रवर्तकम्। तमो नियामकं प्रोक्तमन्योन्यमिथुनप्रियम्।।

सत्त्व गुण प्रकाशक है (अर्थात् प्रत्येक वस्तु को प्रकाशित अर्थात् विशद करने वाला है), रजोगुणप्रवर्तक है (अर्थात् प्रत्येक वस्तु को प्रवृत्त करने वाला—गति देने वाला है) तथा तमोगुण नियामक (नियन्त्रण करने वाला) होता है। ये तीनों परस्पर एक दूसरे को प्रिय होते हैं अर्थात् ये तीनों परस्पर संयोग से कार्य करते हैं। सांख्यकारिका में कहा है—


१. 'आद्यूनः स्यादौदरिकः' इत्यमरः।

लक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ७९


सत्त्वं लघुप्रकाशकमिष्टमुपष्टम्भकं चलं च रजः । गुरुवरणकमेव तमः प्रदीपवच्चार्थतो वृत्तिः ।। प्रीत्यप्रीतिविषादात्मकाः प्रकाशप्रवृत्तिनियमार्थाः । अन्योन्याभिभवाश्रयजननमिथुनवृत्तयश्च गुणाः ।

यदा यच्चाधिकं यस्य स देही तेन भावितः । शुभाशुभान्याचरति फलं भुङ्क्ते तथाविधम् ।।

जिस व्यक्ति में जिस समय जिस सत्त्व की अधिकता (प्रधानता) होती है वह उसी के अनुसार शुभ एवं अशुभ आचरण करता है। तथा उसी के अनुसार (वैसा ही) वह फल भोगता है ।।

समानसत्त्वा बालानां तस्माद्धात्री प्रशस्यते । उद्वेगवित्रासकरी विपरीता न शस्यते ।।

इसलिये बालकों के लिये समान सत्त्ववाली धात्री प्रशस्त मानी गई है विपरीत सत्त्ववाली धात्री उद्वेग तथा कष्ट उत्पन्न करने वाली होने से निषिद्ध मानी गई है।

न जीवन्त्यथ जीवन्ति कृच्छ्रा धात्रीविपर्यये । समान त्त्वा बालानां पुष्टिरायुर्बलं सुखम् ।।

धात्री के विपरीत सत्त्व (गुणों) वाली होने से, बालक जीवित नहीं रहते हैं। और यदि जीवित रहते भी हैं तो अत्यन्त कठिनता से। समान सत्त्व वाली धात्री बालकों की पुष्टि, आयु, बल एवं सुख को देने वाली होती है ।।

त्वगसृङ्मांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्राणि धातवः ।
ओजः सत्त्वं च सर्वं च तत्सारं तु निबोध मे ।।

त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, शुक्र—ये सात धातुएँ, ओज तथा सत्त्व—ये सब ९ शरीर में सार होते हैं। उनके लक्षणों को तू मुझ से सुन। चरक में जिन २ लक्षणों द्वारा मनुष्य के बल की परीक्षा की जाती है; उन प्रकृति-विकृति आदि के साथ सार को भी दिया है। अर्थात् सार के द्वारा रोगी के बल की परीक्षा करने का भी विधान चरक वि. अ. ८ में कहा है—सारतश्चेति-साराण्यष्टौ पुरुषाणां बलमानविशेषज्ञानार्थमुपदिश्यन्ते। तद्यथा—त्वग्रक्त-मांसमेदोऽस्थिमज्जशुक्रसत्त्वानि। बल के प्रमाण को जानने के लिये सारों द्वारा लक्षण कहे गये हैं। सार के विषय में चक्रपाणि ने कहा है-‘विशुद्धतरो धातुरुच्यते’ अर्थात् विशुद्धतर धातु को ‘सार’ कहते हैं। जिस गुण की विशेषता होती है बालक उसी सार वाला कहलाता है। उदाहरणार्थ—जो बालक सत्त्वगुण विशिष्ट होता है उसे सत्त्वसार कहते हैं। यहां आठ सारों का वर्णन किया गया है। प्रकृत ग्रन्थ में ९ सार गिनाये गये हैं यहां ओज को अधिक गिना गया है ।।

त्वग्रोगरहितो भोगी प्रसन्नव्यञ्जनच्छविः । सद्यःक्षतप्ररोहश्च त्वक्सारः सुतनूरुहः ।।

त्वक् सार बालक के लक्षण—जो त्वचा के रोगों (Skin diseases) से रहित है, भोगी है, जिसके शरीर की छवि (कान्ति) निर्मल तथा स्पष्टरूप से दिखाई देने वाली है, जिसके घाव शीघ्र भर जाते हैं तथा जिसके रोग प्रशस्त होते हैं—वह बालक त्वक्सार कहलाता है ।।

रक्तसारोऽरुणाभासः ................................ ।।
..................................................................

(इति ताडपत्रपुस्तके ४९ तमं$^१$ पत्रम् ।)
(सूत्रस्थानस्यैतावानेव भाग उपलब्धः ।)


१. इससे आगे इस ताड़पत्रपुस्तक में ५० से लेकर ७४ तक के २५ पृष्ठ लुप्त हुए हैं, जिसमें सम्भवतः सूत्रस्थान का अवशिष्ट अंश, सम्पूर्ण निदान स्थान तथा विमान स्थान का भी पर्याप्त अंश होना चाहिये।


२८ का.सं.

८० काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् लक्षणाध्यायः २८]

रक्तसार बालक—अरुण आभा वाला ..... (होता है) ........................................................................... (सूत्र स्थान का इतना ही भाग उपलब्ध हुआ है)

वक्तव्य—उपर्युक्त श्लोक के बीच में ही यह अध्याय खण्डित हो गया है। अतः हम पाठकों के ज्ञान के लिये अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों के आधार पर इन सारों के लक्षण कहते हैं—चरक वि. अ. ८ में इनके निम्न लक्षण दिये हैं—त्वक्सार के लक्षण—तत्र स्निग्धश्लक्ष्णमृदुप्रसन्नसूक्ष्माल्पगम्भीरसुकुमारलोमा सप्रभेव च त्वक् त्वक्साराणां, सा सारता सुखसौभाग्यैश्वर्योपभोगबुद्धिविद्यारोग्यप्रहर्षणा न्यायुर्र्यान्वितरमाचष्टे । त्वक्सार पुरुष की त्वचा स्निग्ध, चिकनी, कोमल, निर्मल, पतली तथा थोड़े गहरे सुकुमार बालों वाली एवं प्रभायुक्त होती है। यह सारता सुख, सौभाग्य, उपभोग, बुद्धि, विद्या, आरोग्य, प्रसन्नता तथा दीर्घायुष्य को प्रकट करती है। रक्तसार के लक्षण—कर्णाक्षिमूखजिह्वाना-सौष्ठपाणिपादतलनखललाटमेहनं स्निग्धरक्तं श्रीमद् भ्राजिष्णु रक्तसाराणां, सा सारता सुखमुद्ग्रतां मेधां मनस्वित्वं सौकुमार्यमनतिबलमक्लेशसहिष्णु वमृष्णासहिष्णुत्वं चाचष्टे । रक्तसार पुरुष के कान, आंख, मुख, जिह्वा, नाक, होंठ, हस्ततल, पादतल, नाखून, मस्तक तथा मूत्रेन्द्रिय आदि स्निग्ध, लाल, शोभायुक्त तथा उज्ज्वल होते हैं। यह सारता सुख, क्रूरता, मेधा, तेजस्विता, सुकुमारता, अधिक बल का न होना, क्लेश को सहना तथा गर्मी को न सहना इत्यादि बातों को बताती है। मांस सार के लक्षण-शङ्खललाटकृकाटिकाऽक्षिगण्डहनुग्रीवास्कन्धोदरकक्षवक्षःपाणिपादसन्धयो गुरुस्थिरमांसोपचिता मांससाराणां, सा सारता क्षमां धृतिमलौल्यं वित्तं विद्यां सुखमार्जवमारोग्यं बलमायुश्च दीर्घमाचष्टे । मांससार पुरुषों के शङ्ख, ललाट, कृकाटिका, आंख, गाल, हनु, ग्रीवा, कन्धे, पेट, कक्ष, वक्ष (छाती), हाथ, पैर एवं सन्धियां भारी स्थिर तथा मांस से भरी हुई होती हैं। यह सारता, क्षमा, धैर्य, अलोलुपता, धन, विद्या, सुख, सरलता, आरोग्य, बल और आयुका सूचक है। मेदः सार के लक्षण—वर्णस्वरनेत्रकेशलोमनखदन्तौष्ठमूत्रपुरीषेषु विशेषतः स्नेहो मेदः-साराणां, सा सारता वित्तैश्वर्यसुखोपभोगप्रदानान्यार्जवं सुकुमारोपचारतां चाचष्टे, मेदः सार पुरुषों के वर्ण, स्वर; नेत्र, केश, लोम, नख, दन्त, ओष्ठ, मूत्र तथा पुरीष में स्नेह भी विशेषतः होती है। यह सारता धन, ऐश्वर्य, सुख, उपभोग, दान, सरलता तथा मृदु उपचार के योग्य होना—इत्यादि का सूचक है। अस्थिसार के लक्षण—पार्ष्णिगुल्फ-जान्वरत्नजत्रुचिबुकशिरःपर्वस्थूलाः स्थूलास्थिनखदन्ताश्चास्थिसाराः, ते महोत्साहाः क्रियावन्तः क्लेशसहाः सारस्थिरशरीरा भवन्त्यायुष्मन्तश्च । अस्थिसार पुरुषों की एड़ी, गुल्फ, जानु, कोहनी, जत्रु, ठोडी, शिर, पर्व, हड्डी, नख तथा दांत स्थूल होते हैं। वे बड़े उत्साही, क्रियाशील, क्लेश को सहने वाले, दृढ़ एवं स्थिर शरीर वाले और दीर्घायु होते हैं। मज्जासार के लक्षण—तन्वङ्गा बलवन्तः स्निग्धवर्णस्वराः स्थूलदीर्घवृत्तसन्धयश्च मज्जसाराः, ते दीर्घायुषो बलवन्तः श्रुतविज्ञानवित्तापत्यसम्मानभाजश्च भवन्ति । मज्जासार पुरुषों के अङ्ग पतले होते हैं, वे बलवान्, स्निग्ध वर्ण एवं स्वरवाले, मोटी-लम्बी एवं गोल सन्धियों वाले, दीर्घायु, बलवान्, श्रुत (शास्त्रज्ञान), विज्ञान, धन, सन्तान एवं सम्मानयुक्त होते हैं। शुक्रसार के लक्षण-सौम्याः सौम्यप्रेक्षिणश्च क्षीरपूर्णलोचना इव प्रहर्षबहुलाः स्निग्धवृत्तसारसमसंहतशिखरदशनाः प्रसन्नस्निग्धवर्णस्वरा भ्राजिष्णवो महास्फिचश्च शुक्रसाराः, ते स्त्रीप्रिया; प्रियोपभोगबलवन्तः सु श्र्यारोग्यवित्तसम्मानापत्यभाजश्च भवन्ति । शुक्रसार पुरुष सौम्य तथा सौम्यदृष्टि होते हैं। उनकी आंखें दूध के समान तृप्त अथवा शुभ्र होती हैं। उनको ध्वजोच्छ्राय (Ercetion) बहुत होता है। उनके दांत स्निग्ध, गोल, दृढ़, सम, संगठित तथा तीक्ष्ण अग्रभाग वाले होते हैं। वर्ण और स्वर निर्मल एवं स्निग्ध होते हैं। वे कान्तियुक्त होते हैं। उनके नितम्ब बड़े होते हैं। वे स्त्रियों के प्रिय होते हैं अथवा वे स्त्रियों को बहुत चाहने वाले होते हैं। वे उपभोग प्रिय एवं बलवान् होते हैं तथा सुख, ऐश्वर्य, आरोग्य, धन, सम्मान तथा सन्तान से युक्त होते हैं। सत्त्वसार के लक्षण—स्मृतिमन्तोभक्तिमन्तः कृतज्ञाः प्राज्ञाः शुचयो महोत्साहा दक्षा धीराः समरविक्रान्तयोधिनस्त्यक्तविषादाः स्ववस्थितगतिगंभीरबुद्धिचेष्टाः कल्याणाभिनिवेशिनश्च सत्त्वसाराः, तेषां स्वलक्षणैरेव गुणा व्याख्याताः । सत्त्वसार पुरुष स्मृति एवं शक्ति से सम्पन्न, भक्तियुक्त, कृतज्ञ, बुद्धिमान, पवित्र, अत्यन्त उत्साही, कुशल तथा धीर होते हैं। रण में विक्रमपूर्वक लड़ते हैं। उन्हें विषाद बिलकुल नहीं होता, उनकी गति स्थिर होती है। बुद्धि तथा चेष्टायें गम्भीर होती हैं। वे कल्याण में तत्पर होते हैं। तत्र सर्वैः सारैरूपेताः पुरुषा भवन्त्यतिबलाः

लक्षणाध्यायः २८] सूत्रस्थानम् ८१

परमगौरवयुक्ताः क्लेशसहाः सर्वारम्भेष्वात्मनि जातप्रत्ययाः कल्याणाभिनिवेशिनः स्थिरसमाहितशरीराः सुसमाहितगतयः सानुनादस्निग्धगम्भीरमहास्वराः सुखैश्वर्यवित्तोपभोगसम्मानभाजो मन्दजरसो मन्दविकाराः प्रायस्तुल्यगुणविस्तीर्णपत्याश्चिरजीविनश्च भवन्ति। इनमें से सब सारों से युक्त व्यक्ति अत्यन्त बलवान्, गौरवयुक्त, क्लेश को सहने वाले, आत्मविश्वासी आदि होते हैं। वे स्निग्ध, गम्भीर एवं महान् स्वर वाले होते हैं। वे सुख ऐश्वर्य, धन उपभोग एवं सम्मान से युक्त होते हैं। उन्हें वृद्धावस्था तथा रोग देर में होते हैं। वे दीर्घायु होते हैं तथा इनकी सन्तान भी इन्हीं गुणों से युक्त होती है। इन सारों के विषय में सुश्रुत सू. अ. ३५ में निम्न वर्णन मिलता है—स्मृतिभक्तिप्रज्ञाशौर्यशौचोपेतं कल्याणाभिनिवेशं सत्त्वसारं विद्यात्, स्निग्धसंहतश्वेतास्थिदन्तनखं बहुलकामप्रजं शुक्रेण, अकृशमुत्तमबलं स्निग्धगम्भीरस्वरं सौभाग्योपपन्नं महानेत्रं च मज्ज्ञा, महाशिरःस्कन्धं दृढदन्तहन्वस्थिनखमस्थिभिः, स्निग्धमूत्रस्वेदस्वरं बृहच्छरीरमायासासहिष्णुं मेदसा, अच्छिद्रगात्रं गूढास्थिसन्धि मांसोपचितं च मांसेन, स्निग्धताम्रनखनयनतालुजिह्वौष्ठपाणिपादतलं रक्तेन, सुप्रसन्नमृदुत्वग्ग्रीमाणं त्वक्सारं विद्यादिति। एषां पूर्वं पूर्वं प्रधानमायुःसौभाग्ययोरिति।

पाठकों के ज्ञान के लिये हम संक्षेप से कररेखाओं तथा उनके शुभाशुभ फलों का वर्णन करते हैं। कर रेखाओं के द्वारा बालकों की आयु, भाग्य, ऐश्वर्य, विद्या, बुद्धि, धन, सुख तथा दुःख आदि का ज्ञान होता है। हाथ में स्थित विशेष रेखाओं तथा वज्र, नक्षत्र, यव आदि चिह्नों का विशेष प्रभाव माना गया है। इसलिये बालकों के दीर्घायुष्य को जानने के लिये अन्य प्रशस्त एवं अप्रशस्त शारीरिक लक्षणों के साथ २ इन हस्तरेखाओं का जानना भी आवश्यक है। चिकित्सक को इन हस्तरेखाओं से विशेष सहायता मिल सकती है। हमारे पूर्वज सामुद्रिक शास्त्रवेत्ताओं ने हस्तरेखाओं के विषय में जो विचार किये हैं वे संक्षेप में निम्नप्रकार से हैं। हस्तरेखाओं को हम मुख्यरूप से तीन श्रेणियों (classes) में विभक्त कर सकते हैं। (१) मुख्य रेखाएँ, (२) अनुरेखाएँ, (३) वज्र नक्षत्रादि विशेष प्रकार के चिह्न। १. प्रथम श्रेणी की मुख्य रेखाएं निम्न हैं—i. पितृ रेखा—जो तर्जनी अंगुली के मूल से मणिबन्ध के मध्यभाग तक फैली हुई होती है। ii. मातृरेखा—जो इसी के लगभग समानान्तर हथेली के मध्य में रहती है। iii. आयुरेखा—जो कनिष्ठिका अंगुली के मूल से तर्जनी के मूल तक जाती है। iv. भाग्यरेखा—यह मणिबन्ध के मध्य से लेकर मध्यमाङ्गुली तक जाती है। v. रविरेखा या विद्यारेखा—जो अनामिका अंगुली के मूल से पितृरेखा तक जाती है। vi. वाणिज्य या स्वास्थ्य रेखा—जो पितृ रेखा से लेकर कनिष्ठिका तक जाती है। ये ६ मुख्य रेखायें मानी जाती हैं। २. इनके अतिरिक्त दूसरी श्रेणी की कुछ गौण रेखायें होती हैं जिन्हें अनुग रेखायें कहते हैं। i. पितृरेखा की अनुरेखा। ii. वाणिज्यरेखा की अनुरेखा—इसे प्रवृत्तिरेखा भी कहते हैं। iii. एक आयु रेखा की अनुग रेखा भी होती है। इसे शुक्रबुध संयोजिनी रेखा कहते हैं। ये द्वितीय श्रेणी की गौण रेखायें हैं। ३. तृतीय श्रेणी की रेखायें—ये हाथ में भिन्न २ स्थानों पर विशेष २ प्रकार के चिह्न होते हैं जिनके द्वारा शुभ एवं अशुभ भावों का ज्ञान होता है। ये निम्न हैं—

i. वज्ररेखा ii. नक्षत्र रेखा, iii. यव रेखा, iv. चतुष्कोण रेखा, v. त्रिकोण रेखा, ये सब रेखायें हाथ में करतल (Palm) के स्थानविशेष में विशेष फल देती हैं।

इन उपर्युक्त रेखाओं के अतिरिक्त करतल में सप्तग्रहों के भी पृथक् २ स्थान होते हैं। आगे ये सब दिखाये गये हैं। १. रविस्थान—अनामिका के निचे का अंश रविस्थान कहलाता है। २. चन्द्रस्थान—मणिबन्ध के बाईं तरफ का स्थान। ३. मंगलस्थान—करतल का मध्यस्थल। ४. बुधस्थान—कनिष्ठिका का निम्न स्थान। ५. बृहस्पतिस्थान—तर्जनी अंगुली का निम्न भाग। ६. शुक्रस्थान—अंगुष्ठ का निम्न स्थान। ७. शनि स्थान—मध्यमा अङ्गलि का निम्न स्थान। हाथ में भिन्न २ प्रकार की रेखाओं, चिह्नों तथा ग्रहों के स्थानों को देने के बाद अब हम संक्षेप से उनके फलों का वर्णन करते हैं। पितृरेखा—इस रेखा से शरीर के सम्पूर्ण पितृज भावों का परिचय होता है। शरीर के अन्दर जितने भी कठिन (कठोर) भाव होते हैं वे सब पितृज भाव माने जाते हैं। इससे ज्ञात होता है कि बालक में कितनी दृढ़ता है। शरीर के दृढ़ होने से आयु का संबन्ध है अर्थात् इस रेखा को देखकर आयु का विचार किया जाता है। इसी लिये पाश्चात्य विद्वान् पितृरेखा को आयु रेखा (Line of life) मानते हैं। मातृरेखा—इस रेखा से शरीर के सम्पूर्ण मातृज भावों का ज्ञान होता है। शरीर में जितनी भी स्निग्ध एवं कोमल वस्तुएं तथा भाव हैं वे सब मातृज कहलाते हैं। मस्तुलुङ्ग (Brain-मस्तिष्क) भी मातृज भाव माना जाता है। इसीलिये पाश्चात्य विद्वान् मातृरेखा को शिरोरेखा (Line of head) मानते हैं। आयु-

८२काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्लक्षणाध्यायः २८]

रेखा—पहले बताया जा चुका है कि आयुरेखा कनिष्ठका के मूल से तर्जनी के मूल तक जाती है। इस रेखा से प्रत्यक्ष रूप से बालक की आयु का विचार किया जाता है। मनुष्य की पूर्ण आयु १२० वर्ष की मानी गई है। कहा भी है— समाः षष्ठिर्द्विघ्ना मनुजकरिणां पञ्च च निशा। हयानां द्विपष्ठिः............ इत्यादि ।। (वराहमिहिर) यह आयु बुध स्थान से लेकर बृहस्पति स्थान तक क्रमशः १०, २०, ४० एवं ५० (= १२०) गणना के अनुसार ४ भागों में विभक्त हुई पूर्ण आयु (१२० वर्ष) को प्रकट करती है। भाग्यरेखा—इस रेखा से अधिकतर बालक के कार्य (राजसेवा-नौकरी) इत्यादि का विचार किया जाता है। रविरेखा—इस रेखा से बालक की विद्या एवं यश, प्रभाव आदि का विचार होता है। वाणिज्यरेखा—इस रेखा से स्वास्थ्य का विषय तथा व्यवसाय आदि का विचार किया जाता है इन तीनों रेखाओं (भाग्य, रवि तथा वाणिज्य रेखाओं) को सम्मिलित रूप से भाग्यरेखा कहा जा सकता है क्योंकि इन तीनों रेखाओं के द्वारा बालक के भव्य का ज्ञान होता है इन मुख्य रेखाओं के फलों के अतिरिक्त अनुग रेखाएं अपनी-अपनी मुख्य रेखाओं को दोषरहित करके अधिक बलवान बनाती है तृतीय श्रेणी की रेखाएं—वज्ररेखा-शुभस्थान अर्थात् बृहस्पति, शुक्र और सम उच्च चन्द्रमा तथा बुध के स्थान में भी ग्रहों के अपने २ स्वाभाविक भावों को बढ़ाते हैं। यदि यह वज्र रेखा क्रूर ग्रहों के स्थानों में (विशेषकर मंगल और शनि) हो तो उनकी स्वाभाविक अनिष्टकारिता को बढ़ाते हैं। नक्षत्ररेखा—इसके फल भी प्रायः इसी प्रकार के होते हैं। परन्तु नक्षत्रचिह्न वज्र की अपेक्षा अधिक बलशाली होता है। यवचिह्न—यह किसी रेखा या स्थान पर हो तो अनिष्टकारी माना जाता है। केवल अंगुष्ठ के मध्य में यदि यह चिह्न हो तो शुभ माना जाता है। उस अवस्था में बालक विद्वान्, अवि अथवा धनवान होता है। चतुष्कोण—इस रेखा के फल-बुध एवं बृहस्पति स्थान में शुभ होते हैं। इनके अतिरिक्त स्थानों में इसका होना अनिष्टकारक होता है। त्रिकोण—यह रेखा जिस ग्रह के स्थान में होती है उसी ग्रह की सबलता प्रकट करती है। यह चिह्न साधारणतया सभी स्थानों में प्रशस्त माना जाता है। इन उपर्युक्त सभी हस्तरेखाओं एवं चिह्नों का विचार करके बालक की आयु, भाग्य तथा कर्माजीव आदि का निर्णय किया जाता है। विषयान्तर होने से हमने संक्षेप में ही इस विषय को यहां दिया है। विशेष ज्ञान के लिये पाठकों को यह विषय अन्यत्र देखना चाहिये।


(चित्र: हस्तरेखा एवं ग्रह-स्थान)

  • भाग्य रेखा
  • बृहस्पति, शनि, रवि, बुध
  • मंगल
  • रवि रेखा
  • शुक्र
  • चन्द्र
  • भाग्य रेखा

करतल में सप्तग्रहों के पृथक्-पृथक् स्थान, पृष्ठ (सूत्रस्थान)

तृतीयं विमानस्थानम्

........................

**वक्तव्य—**इस अध्याय की केवल अन्तिम दो पंक्तियां ही उपलब्ध हुई हैं। शेष सम्पूर्ण अध्याय खण्डित है। अध्याय की समाप्ति-सूचक अन्तिम वाक्य '(इति) कर्णायजयावष्ठीवनं विमानम्' भी अत्यन्त अस्पष्ट है। इसे देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि इस अध्याय का क्या विषय है। अन्तिम पंक्ति से थोड़ी सी ध्वनि अवश्य निकलती है। 'अवेक्षितजान् गदान्' को देखकर यह कहा जा सकता है कि सम्भवतः इसमें दृष्टि-दोष से उत्पन्न होने वाले रोगों का वर्णन किया गया होगा। अन्त में उन्हीं का देवता तथा नक्षत्र आदिकों की पूजा के द्वारा प्रतीकार दिया हुआ है। इससे अधिक इसके विषय में कुछ कहना कठिन है।

पृथक् पूजा हिताशनम्।
तिथिनक्षत्रदेवार्चा घ्नन्त्यवेक्षितजान् गदान्॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः॥
(इति) कर्णायजयावष्ठीवनं (?) विमानम्॥

पृथक् २ देवताओं की पूजा, हिताशन (पथ्य आहार का सेवन) तथा तिथि, नक्षत्र और देवताओं की अर्चना से दृष्टिदोष नष्ट होते हैं॥
ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था।
(इति) कर्णायजयावष्ठीवनं (?) विमानम्॥


शिष्योपक्रमणीयविमानाध्यायः

अथातः शिष्योपक्रमणीयं विमानमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ह स्माह भगवान् कश्यपः ॥२॥

अब हम शिष्योपक्रमणीय विमानाध्याय का व्याख्यान करेंगे। ऐसा भगवान् कश्यप ने कहा था ॥१-२॥

**वक्तव्य—**शिष्योपक्रमणीय का अभिप्राय शिष्य का अध्ययन के निमित्त गुरु के पास आना है। गुरु उसकी सम्यक् प्रकार से परीक्षा करके उसे शास्त्र का ज्ञान देता है। शिष्य विद्या का अधिकारी है या नहीं, यह जानने के लिये ही इस अध्याय का उपक्रम किया गया है ॥१-२॥

अथ खलु गुरुः शिष्यमभिगतं विद्यार्थिनं शिष्यगुणान्वितं विधिनोपनयेदुदगयने पुण्याहे नक्षत्रेऽश्वयुजि रोहिण्यामुत्तरास्वन्यस्मिन् वा। पुण्ये प्रागुदक्प्रवणदेशे गोमयेनाद्भिश्च गोचर्ममात्रं स्थण्डिलमुपलिप्य; यथोक्तं तत्र लक्षणोल्लेखनाग्निप्रणयन-परिसमूहनपर्युक्षणब्रह्मप्रणीतास्तरणाज्योत्पवनाधाराज्यभागप्रिग्रहोमान् कृत्वा, पालाशीः समिधो घृताक्ता जुहोति—अग्नयेस्वाहा, सोमाय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा, कश्यपाय

८४काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम्शिष्योपक्रमणीयाध्यायः ९ ]

स्वाहा, अश्विभ्यां स्वाहा, इन्द्राय स्वाहा, धन्वन्तरये स्वाहा, सरस्वत्यै स्वाहा, पूर्णभागाय स्वाहा, अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इति हुत्वा; ब्राह्मणं हविष्यौदनेन दक्षिणावता तर्पयित्वा, देवांश्च बलिभिः, गुरवे पूर्णकुम्भं दक्षिणां दत्त्वा, 'दधिक्राव्ण' इति प्राङ्मुखो दधि प्राश्य, उपस्पृश्याद्भिः, परिक्रम्य प्रदक्षिणं, गुरोर्बाहुं संस्पृस्य ब्रूयात्—असावहं पुत्र इति, पादौ संस्पृश्य ब्रूयात्—असावहं शिष्य इति ।।३।।

सबसे प्रारम्भ में आचार्य को चाहिये कि वह समीप आये हुए, विद्या के इच्छुक तथा आगे कहे गये शिष्य के गुणों से युक्त शिष्य का उत्तरायण काल में प्रशस्त दिन तथा अश्विनी, रोहिणी, उत्तरा या अन्य किसी नक्षत्र में विधिपूर्वक उपनयन$^१$ करे। फिर पूर्व या उत्तर की ओर पुण्यकारक स्थान में गोबर तथा पानी से गोचर्म$^२$ के प्रमाण की एक चौकी या फर्श को लीपकर तथा यथोक्त लक्षणोल्लेखन (लक्षण के अनुसार भूमि खोदना आदि), अग्निप्रणयन (अग्नि का लाना), परिसमूहन (इधर-उधर बिखरी हुई वस्तुओं को एकत्र करना), पर्युक्षण (जल छिड़कना), ब्रह्मप्रणीत—आस्तरण (यज्ञ के लिए ब्रह्मा के निमित्त बनाया हुआ आसन बिछाना), आज्योत्पवन (घृत को पवित्र करना अथवा पिघलाना), आघाराज्याहुति$^३$, आज्य$^४$ भागाहुति तथा अन्य आहुतियां आदि तैयार करके घृतयुक्त पलाश (ढाक) की समिधाओं से निम्न देवताओं तथा ऋषियों के नाम से आहुति देवे—अग्नये स्वाहा, सोमाय स्वाहा, प्रजापतये स्वाहा, कश्यपाय स्वाहा, अश्विभ्यां स्वाहा, इन्द्राय स्वाहा, धन्वन्तरये स्वाहा, सरस्वत्यै स्वाहा, पूर्णभागाय स्वाहा, अग्नये$^५$ स्विष्टकृते स्वाहा। फिर दक्षिणा सहित हविष्य ओदन के द्वारा ब्राह्मणों तथा बलि के द्वारा देवताओं को तृप्त करके तथा गुरु को घड़ा भरके धन आदि की दक्षिणा देकर 'दधिक्राव्ण' इत्यादि मन्त्र बोलकर पूर्व दिशा में मुख करके दधि का सेवन करके, जल का स्पर्श करके तथा अग्नि को दक्षिण में रखकर परिक्रमा करके गुरु का हस्तस्पर्श करके वह कहे—यह मैं आपका पुत्र हूँ तथा गुरु के पैरों को स्पर्श करके कहे यह मैं आपका शिष्य हूँ। चरक वि. अ. ८ में शिष्योपनयन-विधि निम्न प्रकार से दी है—एवं विधमध्ययनार्थमुपस्थितमारिराधयिषुमाचार्यश्चानुभाषेत—अथोदगयने शुक्लपक्षे प्रशस्तेऽहनि तिष्यहस्तश्रवणाश्वयुजामन्यतमेन नक्षत्रेण योगमुपगते भगवति शशिनि कल्याणे करणे मैत्रे मुहूर्ते मुण्डः स्नातः कृतोपवासः कषायवस्त्रसंवीतः समिधोऽग्निमाज्यमुपलेपनमुदकुम्भांश्च गन्धहस्तोमाल्यदाम-प्रदीपहिरण्यहेमरजतमणिमुक्ताविद्रुमक्षौमपरिधिकुशलाजसर्षपाक्षतांश्च शुक्लांश्च सुमनसो ग्रथिताग्रथितांश्च मेध्यांश्च भक्ष्यान् गन्धांश्च घृष्ठानादायोपनिष्ठस्वेति, अथ सोऽपि तथा कुर्यात् । तमुपस्थितमाज्ञाय समे शुचौ देशे प्राक्प्रवणे उदक्प्रवणे वा चतुष्किष्कुमात्रं चतुरस्रंस्थण्डिलं गोमयोदकेनोपलिप्ते कुशास्तीर्णे सुपरिहितं परिधिभिश्चतुर्दिशंयथोक्तचन्दनोदक-कुम्भक्षौमहेमहिरण्यरजतमणिमुक्ताविद्रमालंकृतं मेध्यभक्ष्यगन्धशुक्लपुष्पलाजसर्षपाक्षतोपशोभितं


१. उपनयन का अर्थ अध्ययन के लिये शिष्य को आचार्य के समीप लाने से है—अध्ययनार्थमाचार्यसमीपं नीयतेऽनेनेत्युपनयनम् ॥
२. गोचर्म—२१०० हाथ लम्बे-चौड़े स्थान को कहते हैं। कहा भी है—
सप्तहस्तेन दण्डेन त्रिंशद्दण्डैर्निवर्तनम् ।
दश तान्येव गोचर्म दत्त्वा स्वर्गे महीयते ॥ (अनुवादक)
३. मुख्य होम के आदि और अन्त में जो आहुति दी जाती हैं उनमें से यज्ञ कुण्ड के उत्तर भाग में जो एक आहुति और यज्ञकुण्ड के दक्षिण भाग में दूसरी आहुति दी जाती है उसे 'आघाराज्याहुति' कहते हैं। जैसे 'ओं अग्नये स्वाहा । इदमग्नये—इदन्न मम' के द्वारा उत्तर भाग में तथा ओं सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय—इदन्नमम' के द्वारा दक्षिण भाग में आहुति दी जाती है। (अनुवादक)
४. जो कुण्ड के मध्य में आहुति दी जाती हैं उन्हें 'आज्यभागाहुति' कहते हैं। वे—'ओं प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये—इदन्न मम'। तथा ओं इन्द्राय स्वाहा। इदमिन्द्राय—इदन्न मम ॥ इत्यादि दो आहुतियां हैं।
५. स्विष्टकृत होमाहुति एक ही होती हैं जो कि निम्न मन्त्र से घृत अथवा भात की दी जाती है—ओं यदस्य कर्मणोऽयरीरिचं यद्वा न्यूनमिहाकरम्। अग्निष्टत्स्विष्टकृद्विद्यात् सर्वे स्विष्टं सुहुतं करोतु मे। अग्नये स्विष्टकृते सुहुतहुते सर्वप्रायश्चित्त हुतीनां कामानां समर्द्धयित्रे सर्वान्नः कामान्त्समर्द्धय स्वाहा। इदमग्नये स्विष्टकृते—इदन्न मम ॥

शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ८५

कृत्वा, तत्र पाला-शीभिरिङ्गुदीभिरौदुम्बरीभिर्माधुकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमाधाय प्राङ्मुखः शुचिरध्ययनविधिमनुविधाय मधुसर्पिर्भ्यां त्रिस्त्रिर्जुहुयादग्निमाशीः प्रयुक्तैर्मन्त्रैर्ब्रह्माणमग्निं धन्वन्तरिं प्रजापतिमश्विनाविन्द्रमृषींश्च सूत्रकारानभिमन्त्रयमाणः पूर्वं स्वाहेति । शिष्यश्चैनमन्वालभेत, हुत्वा च प्रदक्षिणमग्निमनुपरिक्रामेत् ततोऽनुपरिक्रम्य ब्राह्मणान्स्वस्ति वाचयेत्, भिषजश्चाभिपूजयेत् । इसी प्रकार सुश्रुत में भी कहा है—उपनयनीयस्तु ब्राह्मणः प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्त्तनक्षत्रेषु प्रशस्तायां दिशि शुचौ समे देशे चतुर्हस्तं चतुरस्रं स्थण्डिलमुपलिप्य गोमयेन दर्भैः सस्तीर्य रत्नपुष्पैर्लाजभक्तैरन्नैश्च पूजयित्वा देवता विप्रान् भिषजश्च तत्रोल्लिख्याभ्युक्ष्य दक्षिणाणं ब्रह्माणं स्थापयित्वाऽग्निमुपसमाधाय खदिरपलाशदेवदारुबिल्वानां समिद्भिश्चतुर्णां वा क्षीरिवृक्षाणां न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थमधूकानां दधिमधुघृताक्ताभिर्दार्वीहोमिकेन विधिना सप्रणवाभिर्महाव्याहृतिभिः स्रवेणाज्याहुतीर्जुहुयात् । प्रतिदैवतमृषींश्च स्वाहाकारं जुहुयात् । शिष्यमपि कारयेत् ॥३॥

अथ शिष्यगुणाः-क्षान्तिर्दाक्ष्यं दाक्षिण्यमानुकूल्यंशौचं कुले जन्म धर्मसत्याहिंसासामकल्याणज्ञान-विज्ञानस्थितिविनिवेशः पाटवं यथोक्तकारित्वं ब्रह्मचर्यमनुत्सेको लोभेर्ष्याविवर्जनमिति; अतोऽन्यथा दोषैः सवर्ज्यः ।।४।।

शिष्य के गुण—क्षमा, निपुणता, चतुराई, अनुकूलता, (आचार्य के अनुकूल होना), पवित्रता, उत्तमकुल में जन्म (कुलीनता), धर्म, सत्य, अहिंसा, साम (शान्ति), कल्याण, ज्ञान तथा विज्ञान की स्थिति प्रवेश, पटुता, यथोक्तकारित्व (आचार्य की आज्ञा के अनुसार कार्य करना), ब्रह्मचर्य, उत्सेक (गर्व-अहंकार) का अभाव और लोभ तथा ईर्ष्या का त्याग—ये शिष्य के गुण हैं । इसके विपरीत दोषों से युक्त शिष्य का त्याग कर देना चाहिये । अर्थात् उपर्युक्त गुणों से रहित शिष्य का ग्रहण नहीं करना चाहिये । चरक वि. अ. ८ में शिष्य के निम्न गुण दिये हैं—अध्यापने कृतबुद्धिराचार्यः शिष्यमेवादितः परीक्षेत । तद्यथा—प्रशान्तमार्यप्रकृतिमक्षुद्रकर्माणमृजुचक्षुर्मुखनासावंशं तनुरक्तविशदजिह्वमविकृतदन्तौष्ठममिण्मिनं धृतिमन्तममहंकृतं मेधाविनं वितर्कस्मृतिसम्पन्नमुदारसत्त्वं तद्विद्यकुलजमथवा तद्विद्यवृत्तं तत्त्वाभिनिवेशिनमव्यङ्गमव्यापन्नेन्द्रियं निभृतमनुद्धतवेशमव्यसनिनमर्थतत्त्वभावकमकोपनं शीलशौंचाचारानुरागदाक्ष्यप्रादक्षिण्योपपन्नमध्ययनाभिकाममर्थविज्ञाने कर्मदर्शने चानन्यकार्यमलुब्धमनलसं सर्वभूतहितैषिणामाचार्यसर्वानुशिष्टप्रतिपत्तिकरमनुरक्तमेवगुणसमुदितमध्याप्यमेव हुः । इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. २ में कहा है—ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यानामन्यतममन्वयवयः शीलशौर्यशौचाचारविनयशक्तिबलमेधाधृतिस्मृति-मतिप्रतिपत्तियुक्तं तनुजिह्वौष्ठदन्ताग्रमृजुवक्त्राक्षनासं प्रसन्नचित्तवाक्चेष्टं क्लेशसहं च भिषक् शिष्यमुपनयेत् । अतो विपरीतगुणं नोपनयेत् ॥४॥

अथ गुरुः-धर्मज्ञानविज्ञानापोहापोहप्रतिपत्तिकुशलगुणसंपन्नः सौम्यदर्शनः शुचिः शिष्यहितदर्शी चोपदेष्टा च भिषकशास्त्रव्याख्यानकुशलस्तीर्थगतज्ञानविज्ञानः कल्योऽनन्यकर्माऽव्यावृत्तः शिष्यगुणा^१न्वितश्च । अतोऽन्यथा दौषैर्वर्ज्यः ।।५।।

गुरु या आचार्य के गुण—धर्म, ज्ञान विज्ञान, ऊहापोह (तर्क वितर्क) तथा प्रतिपत्ति (प्रागल्भ्य, प्रागुत्पन्नमतित्व अथवा युक्ति) में कुशल, गुणसम्पन्न (गुणी), जिसका दर्शन या आकृति सौम्य हो, पवित्र, शिष्यों के हितों का ध्यान रखनेवाला, उपदेशक, चिकित्सा शास्त्र के व्याख्यान में कुशल, ज्ञान तथा विज्ञान जिसे कण्ठस्थ हों, कल्प (मंगलकारी), जो और कोई कार्य न करता हो (अर्थात् शिष्यों को अध्यापन के अतिरिक्त अन्य कोई आजीविकार्थ कार्य न करता हो), जिसने अध्यापन कार्य छोड़ा हुआ न हो (जिसे अध्यापन कार्य में रुचि हो) तथा जो पूर्वोक्त शिष्य में होने वाले गुणों से भी युक्त हो) इनके विपरीत दोषों से युक्त गुरु (आचार्य) का त्याग कर देना चाहिये । अर्थात् उपर्युक्त गुणों से रहित आचार्य अध्यापन कार्य के योग्य नहीं होता है । चरक वि. अ. ८ में आचार्य को निम्न गुणों से युक्त बताया है—ततोऽनन्तरमाचार्य


१. पूर्वोक्तैः शिष्यगुणैरपि यथासंभविभिर्युक्त इत्यर्थः ।

८६ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शिष्योपक्रमणीयाध्यायः ९ ]


परीक्षेत। तद्यथा—पर्यवदातश्रुतपरिदृष्टकर्माणं दक्षं दक्षिणं शुचिं जितहस्तमुपकरणवन्तं सर्वेन्द्रियोपपन्नं प्रकृतिज्ञं प्रतिपत्तिज्ञमुपस्कृतविद्यमनहङ्कृतमनसूयकमकोपनं क्लेशक्षमं शिष्यवत्सलमध्यापकं ज्ञापनसमर्थं चेति, एवंगुणों ह्याचार्यः सुक्षेत्रमार्तवो मेघ इव सस्यगुणैः सुशिष्यमाशु वैद्यगुणैः सम्पादयति ॥५॥

अथ शिष्यानुशासनं—भोः सौम्येनानुकूलेन धार्मिकेण जितेन्द्रियेणाहूताध्यायिना च भवितव्यं, सर्वनिवेदिना समानदुःखेन देशकालज्ञेन धृतिमत्ता च भवितव्यं, लोभक्रोधमोहेर्ष्याप्रहासवैरमद्यमांसस्त्रीभ्यो निवर्त्तयि(र्त्ति)तव्यं, गुरुशुश्रूषाऽवशेषेणाध्येतव्यं, न चाननुज्ञातेन न चानभ्यर्च्य वा गुरुमसमाप्तविद्येन वा प्र^१चरितव्यम् ।।६।।

शिष्य के प्रति उपदेश—वत्स ! तुझे सौम्य, अनुकूल (आचार्य के अनुकूल), धार्मिक, जितेन्द्रिय, अध्ययन के लिये जिसे बुलाया जाय, सब कुछ मुझे कह देनेवाला (अर्थात् मुझसे कुछ न छिपाने वाला), समान दुःख वाले (अर्थात् मेरे दुख को अपना दुख समझने वाला), देश तथा काल का ज्ञान रखने वाला और धृतिमान् होना चाहिये। लोभ, क्रोध, मोह, ईर्ष्या, प्रहास (दूसरे की हंसी मजाक उड़ाना), वैर, मद्य, मांस तथा स्त्री से दूर रहना चाहिये। गुरु की सेवा करते हुए अध्ययन करना चाहिये। गुरु से आज्ञा लिये बिना, उनकी अभ्यर्थना किये बिना तथा विद्या को पूर्ण रूप से समाप्त किये विना चिकित्सा कार्य में प्रवृत्त नहीं होना चाहिये। चरक वि. अ. ८ में शिष्य के प्रति उपदेश का अत्यन्त विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है—अथैनमग्निसकाशे ब्राह्मणसकाशे भिषक्सकाशे चानुशिष्यात्—ब्रह्मचारिणा श्मश्रुधारिणा सत्यवादिनाऽमांसादेन मेध्यसेविना निर्मत्सरेणाशस्त्राधारिणा च भवितव्यम्, न च ते मद्द्वचनात्किंचिदकार्यं स्यादन्यत्र राजद्विष्टात्प्राणहराद्विपुला-दधर्म्यादनर्थसम्पयुक्ताद्वाऽप्यर्थात्, मदर्पणेन मत्प्रधानेन मत्प्रियहितानुवर्तिना च शश्वद्भवितव्यं पुत्रवद्दासवदर्थिवच्चोपचर-ताऽनुवस्तव्योऽहमनुत्सुकेनावहितेनानन्यमनसा विनीतेनावैक्ष्यकारिणाऽनसूयकेन, न चानभ्यनुज्ञातेन प्रविचरितव्यं, अनुज्ञातेन प्रविचरता पूर्वं गुर्वर्थोपान्वाहरणे यथाशक्ति प्रयतितव्यं, कर्मसिद्धिमर्थसिद्धिं यशोलाभं प्रेत्य च स्वर्गमिच्छता त्वया गोब्राह्मणमादौ कृत्वा सर्वप्राणभृतां शर्मशासितव्यमहरहरुत्तिष्ठता चोपविशता च सर्वात्मना चातुराणामारोग्ये प्रयतितव्यं जीवितहेतोरपि चातुरेभ्यो नाभिद्रोग्धव्यं, मनसोऽपि च परस्त्रियो नाभिगमनीयास्तथा सर्वमेव परस्वं, निभृतवेशपरिच्छेदन भवितव्यमशौण्डेनापापेनापापसहायेन च श्लक्ष्णशुक्लधर्म्यधन्यस यशस्यमर्हितमितवचसा देशकालविचारिणा स्मृतिमत्ता ज्ञानोत्थानोपकरणसम्पत्सु नित्यं यत्नवता, न च कदाचिद्राजद्विष्टानां राजद्वेषिणां वा महाजनद्विष्टानां महाजनद्वेषिणां वाऽप्यौषधमनुविधातव्यं तथा सर्वेषामत्यर्थं वकृतदुष्टदुःखशीलाचारोपचाराणामनपवादप्रतीकाराणां मुमूर्षूणां च तथैवासन्निहितेश्वराणां स्त्रीणामनध्यक्ष्ाणां वा, न च कदाचित्स्त्रीदत्तमामिषमादातव्यमननुज्ञातं भर्तृऽथवाऽध्यक्षेण, आतुरंकुलं चानुप्राविशता त्वया विदितेनानुमतप्रवेशिना सार्धं पुरुषेण सुसवीतेनावाक्शिरसा स्मृतिमत्ता स्तिमितेनावेक्ष्यावेक्ष्य मनसा सर्वमाचरता बुद्ध्या सम्यगनुप्रवेष्टव्यं, अनुप्रविश्य च वाङ्मनोबुद्धीन्द्रियाणि न क्वचित् प्रणिधातव्यान्यत्रातुरादातुरोपकारार्थाद्वाऽऽतुरगतेष्वन्येषु वा भावेषु न चातुरकुलप्रवृत्तयोबहिर्निश्शारयितव्याः, हसितं चायुषः प्रमाणमातुरस्य न वर्णयितव्यं जानताऽपि तत्र यत्रोच्यमानमातुरस्यान्यस्य वाऽप्युपघाताय संपद्यते, ज्ञानवताऽपि च नात्यर्थमात्मनो ज्ञाने विकत्थितव्यं, आप्तादपि हि विकत्थमानादत्यर्थमुद्विजन्त्यनके। इसी प्रकार सुश्रुत सू. अ. २ में कहा है—ततोऽग्निं त्रिः परिणीयाग्निसाक्षिकं शिष्यं ब्रूयात्—कामक्रोधलोभमोहमानाहङ्कारेर्ष्यापारुष्यपैशून्यानृतालास्यायशस्यानि हित्वा, नीचनखरोम्णा शुचिना कषायवाससा सत्यव्रतब्रह्मचर्याभिवादनतत्परेणाऽवश्यं भवितव्यं, मदनुमतस्थानगमनशयनासनभोजनाध्ययनपरेण भूत्वा, मत्प्रियहितेषु वर्तितव्यम्, अतोऽन्यथा ते वर्तमानस्याधर्मो भवति, अफला च विद्या, न च प्राकाश्यं प्राप्नोति ॥६॥


१. चिकित्सार्थं व्यवहर्तव्यमित्यर्थः ।

शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ८७

अथाध्ययनविधिः—गुरुः शुचिरुद्धतहस्तः शुचौ देशे तद्वच्छिष्यायावहितायाथशब्दमोङ्कारं वा पूर्वं प्रयुज्य महाव्याहृतीरनूच्य सावित्रीं च त्रिभ्यस्याऽधीष्व भो इत्युक्ते(क्त्वा) रूपमेकं निगदेत्, तं चानुपठेत्, तच्छिष्यो रूपहतं संस्थाहतं च कुर्यात्^१, ग्रहणशक्त्यवेक्षः खण्डनसंदर्शनापूर्वग्रहणानि सोढुं यथोक्तश्रवणं तस्याभ्यासो धन्यः, धारणाध्यापनेनार्थतत्त्वाधिगमनं तु मोक्षाय । नानध्यायेष्वधीयीत, न गुरुव्यलीकेषु, न पर्वसु, न सन्ध्यायां, न विद्युदुल्कानभ्रवर्षाऽसूर्यदर्शनिषु (?), न महोत्सवे न भुक्तवान्, नाद्भुतदर्शने, न गोब्राह्मणगुरुपरात्मपीडायां, न पक्षिणीषु, नाप्यष्टकासु, नात्युच्चनाचप्लतक्लीबस्वरैः, नामुखाद् गुरोः, नालक्षितं, न संदिग्धं, न च क्षत्पिपासाव्याधिवैमनस्यादियुक्तोऽभ्यसेत् ।। ७ ।।

अध्ययन विधि—सबसे पूर्व गुरु पवित्र एवं उद्धत-हस्त होकर पवित्र स्थान पर सावधान हुए शिष्य के प्रति 'अथ' शब्द या ओङ्कार शब्दपूर्वक महाव्याहृतियों (ओं भूः स्वाहा, ओं भुवः स्वाहा, ओं स्वः स्वाहा, ओं भूर्भुवः स्वः स्वाहा इति) का उच्चारण करके तथा सावित्री (गायत्री मन्त्र) का तीन बार अभ्यास करके, 'वत्स पढ़ो' यह कहकर पहले किसी एक रूप (विषय) का उपदेश करे तथा उसको एकबार पुनः पढ़ाये (अर्थात् उसकी पुनः आवृत्ति कराये)। फिर उस उपदेश को शिष्य शब्द के स्वरूप तथा विषय की आवृत्ति द्वारा दृढ़ करे अर्थात् शिष्य उस उपदेश को अच्छी प्रकार याद करे। ग्रहणशक्ति के अनुसार खण्डन तथा संदर्शनपूर्वक ग्रहण किये हुए को सहना तथा यथोक्त श्रवण किये हुए का अभ्यास करना प्रशस्त होता है। उसके बाद उसे धारण करने तथा अध्यापन के द्वारा विषय के तत्त्व को जानने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। अनध्याय (अवकाश) के दिनों में, यदि गुरु-आचार्य को पीडा-रोग हो, पर्व (त्यौहारों) में, दोनों सन्ध्याकालों में तथा बिजली गिरने, उल्कापात, अनभ्र-वर्षा, तथा सूर्य के दर्शन न होने पर, महोत्सव में, खाने के बाद, अद्भुत वस्तु के दर्शन के बाद, गौ-ब्राह्मण-गुरु-अन्य व्यक्ति या स्वयं (अपने आप) को पीडा (कष्ट) होने पर तथा पक्षिणी (अमावस्या तथा पूर्णमासी) और अष्टका (अष्टमी) आदि की उपस्थिति में नहीं पढ़ना चाहिये। तथा पढ़ते समय न अत्यन्त ऊँचे, न नीचे, न लुप्त तथा न क्लीब (नपुंसक) स्वर से पढ़ना चाहिये। गुरुमुख से बिना पढ़े, अलक्षित (जो बताया नहीं गया है) तथा संदिग्ध स्थल को भी नहीं पढ़ना चाहिये (अर्थात् उसका अभ्यास नहीं करना चाहिये) तथा भूख, प्यास, रोग तथा उदासीनता के समय भी नहीं पढ़ना चाहिये। चरक वि. अ. ८ में कहा है—तत्रायमध्ययनविधिः—कल्यः कृतक्षणः प्रातरुत्थायोपव्यूषं वा कृत्वाऽऽवश्यकमपस्पृश्योदकं देवगोब्राह्मणगुरुवृद्धसिद्धाचार्येभ्यो नमस्कृत्य समे शुचौ देशे सुखोपविष्टो। मनःपुरःसराभिर्वाग्भिः सूत्रमनुपरिक्रामन्पुनः पुनरावर्तयेद् बुद्ध्या सम्यगनुप्रविश्यार्थतत्त्वं स्वदोषपरिहारपरदोषप्रमाणार्थम्, एवं मध्यन्दिनेऽपराह्णे रात्रौ च शश्वदपरिहापयन्नध्ययनमभ्यस्येदित्यध्ययनविधिः। इसी प्रकार चरक सू. अ. ८ में भी कहा है—न विद्युत्स्वनार्तवीषु नाभ्युदितासु दिक्षु नाग्निसंप्लवे न भूमिकम्पे न महोत्सवे नोल्कापाते न महाग्रहोपगमने न नष्टचन्द्रायां तिथौ न सन्ध्ययोर्नामुखाद् गुरोर्नावपतितं नातिमात्रं न तान्तं न विस्वरं नानवस्थितपदं नातिद्रुतं न विलम्बितं नातिक्लिबं नात्युच्चैर्नातिनीचैः स्वरैरध्ययनमभ्यसेत् ॥७॥

अधीत्यानुज्ञातः प्रचरेच्छुक्लवासाः संह(य)तकेशोऽनुद्ध्वान्तो युगमात्रावलोकी पूर्वाभिभाषी सुमुखः । न चातुरुकुलमनाहूतः प्रविशेत्, प्रविशंश्च निमित्तानि लक्षयेत् । न च सर्वतोऽवलोकयेदन्यत्रातुरात् । न चातुरुकुलेषु स्त्रीभिः प्रेष्याभिरपि सहोपहासं गच्छेत्, न चासामपूजापुरस्कृतं नाम गृह्णीयात्, मान्यस्थानेनैव तु ब्रूयात्, न च ताभिः संव्यवहारमतिप्रणयं वा कुर्यात्, न च भर्तुरविदितं स्त्रीभ्यः किञ्चिदादद्यात्, न चाविदितः प्रति(वि)शेत्, न च रहसि स्त्रिया सह ब्रूयादासीत वा, न चैनां विवृतां प्रेक्षेत विहसेद्वा,


^१. गुरुरैकैकविषयस्वरूपमुपदिशेत्, पुनरप्युपदेशं सुबोधायावर्तयेत्, शिष्यस्तमुपदेशं शब्दस्वरूपावृत्त्या च दृढी कुर्यादिति भावः ॥

८८ काश्यपसंहिता वा वृद्धजीवकीयं तन्त्रम् शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ]

प्रणयन्तीं चोपेक्षेत, न च प्रकाशयेत् । न चातुरकुलगुह्यं बहिःप्रकाशयेत्, नातुरकुलदोषान् प्रथयेत् । दृष्टारिष्टमपि चातुरं न तत्त्वं ब्रूयात्, नित्यमाश्वासयेत् । न मृत्युपरिगतशरीरमसाध्यरोगमनुपकरणं चोपगच्छेत्, नौषधमक्रमेणोपदिशेत्, न पराधीनं कुर्यात् । न स्वयं कृ¹तकमौषधं प्रयुञ्जीत, शरीरौषधव्याधिवयसां चावस्थान्तरज्ञः स्यात् । नित्यसंभृतधूपाम्नौषधः स्यात् । न चान्यभिषग्भिर्विरोधं गच्छेत् । संयुक्तश्च तैरौषधं प्रकल्पयेत् । प्रगल्भो निःशङ्क उपस्थितपदे विस्पष्टं विचित्रं मृदूपनयवद्ग्राहकमविरुद्धं धर्म्यं सदा ब्रूयात् । प्रजानां हि स्वस्तिकामो भिषगिह चामुत्र च नन्दत इति ।।८।।

शिक्षा ग्रहण करने के बाद आचार्य से अनुमति लेकर, शुभ्र वस्त्रों को धारण करके, बालों को ठीक करके, भ्रमरहित, युग (चार हाथ) मात्र दूरी तक देखने वाला (अर्थात् नीचे मुंह किये हुए), पहले बोलने वाला (अर्थात् परस्पर मिलने पर दूसरे के बोलने से पहले सत्कारयुक्त वचनों को बोलने वाला), तथा उत्तम एवं सुन्दर बात बोलने वाला होकर चिकित्सा क्षेत्र में प्रवेश करे । रोगी के घर में बिना बुलाये प्रवेश न करे । तथा प्रवेश करते हुए निमित्तों को देखे । रोगी के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं का अवलोकन न करे । रोगी के घर में स्त्रियों के साथ उपहास न करे । उनके द्वारा दी हुई पूजा (भेंट) को स्वीकार न करे । उचित ढंग से ही उनसे बातचीत करे । उनके साथ अत्यन्त व्यवहार तथा प्रीति न करे । पति के ज्ञान के बिना स्त्री से कोई वस्तु न ले । बिना ज्ञान के घर में प्रवेश न करे अर्थात् आगमन की सूचना दिये बिना रोगी के घर में प्रवेश न करे । स्त्रियों के साथ एकान्त में बातचीत न करे तथा उनके पास न बैठे । वस्त्रों से रहित अर्थात् नग्न अवस्था में उन्हें न देखे, न हंसे । यदि वह प्रीति करे तो उसकी उपेक्षा करे तथा उसके प्रति अपने भावों को प्रकट न करे । आतुरकुल की गुप्त (Private) बातों को बाहर प्रकाशित न करे । आतुरकुल के दोषों को न बढ़ाये । रोगी में अरिष्टलक्षणों का ज्ञान हो जाने पर भी रोगी से इस तत्त्व (वास्तविकता) का उल्लेख² न करें । उसे सदा आश्वासन देता रहे । मरणासन्न, असाध्य तथा उपकरण (धन आदि अथवा चिकित्सा के उपकरण) से रहित रोगी के पास न जाये तथा औषधक्रम (व्यवस्था) का उपदेश न करे । दूसरे के आधीन न रहे । स्वयं कृत्रिम ओषधि का प्रयोग न करे । शरीर, औषध, रोग तथा उम्र आदि की भिन्न २ अवस्थाओं का ज्ञान प्राप्त करे । धूप, अञ्जन आदि ओषधियां पास में सदा तैयार रहनी चाहिये । दूसरे चिकित्सकों के साथ विरोध न करे अपितु उनके साथ मिलकर औषध व्यवस्था करे । अवसर उपस्थित होने पर सदा प्रगल्भ एवं निःशङ्क (सन्देह रहित) होकर अत्यन्त स्पष्ट, विचित्र, मृदु, उपनयवत् (नीतियुक्त), ग्रहण करने वाली, अविरुद्ध (जो परस्पर विरुद्ध न हो) तथा धर्मयुक्त वचन बोले । लोगों के कल्याण की कामना करने वाला वैद्य इहलोक तथा परलोक में सुखी होता है । चरक सू. अ. ८ में अत्यन्त विस्तार के साथ इन सब कर्तव्य कर्मों का निर्देश किया गया है ॥८॥

अथान्यो भिषगभि³षदेत्तस्मै क्षमेत, साम्ना चानुनयेत् । पुनः पुनः कुत्सयन्तं तु विगृह्यादितो ग्रन्थेनाऽवकिरेत्, न चास्य वाक्यावकाशं दद्यात् । ब्रुवतोऽपि प्रोक्तं च ब्रूयात्-नैतदेवमिति । परिहसेत्, अपशब्दांश्चास्य विगृह्णीयात्, अर्थे कृच्छ्रे चैनमवतारयेत्, न चैनमवशः परुषयेत्, स्तोत्रगभीरैर्वैनं धर्षयेदिति ।।९।। (इति ताडपत्रपुस्तके ७५ तमं पत्रम् )


१. कृतकं=कृत्रिमम् ।
२. आजकल कुछ लोग इस सिद्धान्त को मानने लगे हैं कि रोगी को रोग की वास्तविक्ता का ज्ञान अवश्य करा देना चाहिये जिससे वह अच्छीप्रकार परहेज तथा संयम से रह सके अन्यथा रोग की गम्भीरता का ज्ञान न होने पर वह उसकी उपेक्षा कर सकता है ।
३. अभ्यागच्छेदित्यर्थः ।

शिष्योपक्रमणीयाध्यायः १ ] विमानस्थानम् ८९

इसके बाद यदि कोई दूसरा वैद्य उसके साथ संभाषण करे तो उसे सहन करे तथा शान्ति द्वारा उसे समझाये। परन्तु यदि वह बार २ कुत्सित वचन बोले तो उसके साथ विगृह्य संभाषा का प्रयोग करे। तथा ग्रन्थों से भिन्न २ वाक्य उसके सामने बोले। और उसे बोलने का अवकाश (अवसर-मौका) ही न दे। यदि वह बोलता भी हो तो उसे कहे—यह ठीक नहीं है। उसकी हंसी करे, तथा उसके अशुद्ध शब्दों को पकड़ ले। तथा उसे कठिन विषय में ले जाये। अपने वश अथवा सीमा से बाहर होकर बहुत कठोर वचन न कहे। तथा स्तुति-गर्भ वाक्यों के द्वारा ही उसे नीचा दिखाये। चरक वि. अ. ८ में विवाद के विषय में लिखा है—तद्विधेन च सह कथयता आविद्धदीर्घसूत्रसंकुलैर्वाक्यदण्डकैः कथितव्यं, अतिहृष्टं मुहुर्मुहुरुपहसता परं रूपयता च परिषदमाकारैर्बुवता चास्य वाक्यावकाशो न देयः, कष्टशब्दं ब्रुवता वक्तव्यो 'नोच्यते' इति, अथवा पुनः 'हीना ते प्रतिज्ञा'। इति पुनश्चाहूयमानः प्रतिवक्तव्यः—परिसंवत्सरो भवापि शिक्षस्व तावत् पर्याप्तमेतावते, सकृदपि हि परिक्षेपकं निहतं निहतमाहुरिति नास्य योगः कर्तव्यः कथंचिदप्येवं श्रेयसा सह विगृह्य वक्तव्यमित्याहुरेके, न त्वेवं ज्यायसा सह विग्रहं प्रशंसन्ति कुशलाः ॥९॥

भो भिषक् ! आयुः किं, किमायुर्वेदस्यायुर्वेदत्वं, किं चायुरित्युच्यते, कत्यङ्गश्चायुर्वेदः, कथं चाध्येयः, किमर्थं चाध्येय, किञ्चास्याद्यं तन्त्रं, कश्चैषां धुर्यः, कतमं च वेदं श्रयति, किं नित्योऽनित्यः, किमाश्रयश्चायुर्वेदः, कानि चैषां सु (स्व) लक्षणानि तत्रकृतीनां, तिसृणां च वेदनानामतीतवर्त्तमानानागतानां कतमां भिषक् चिकित्सति, किं चास्यायुर्वेद(स्य)साधनं, किं पुण्योऽपुण्यः ? इति पृष्टो वा प्रतिब्रूयात्—भोः तत्रायुर्जीवितमित्युच्यते ।। 'विद' ज्ञाने धातुः, 'विद्लृ' लाभे च, आयुरनेन ज्ञानेन विद्यते ज्ञायते, विन्दते लभ्यते न रिष्यतीत्यायुर्वेदः कत्यङ्गश्चायुर्वेद इति अष्टाङ्गः; तस्य कौमारभृत्यं कायचिकित्सा शल्याहर्तृकं शालाक्यं विषतन्त्रं भूततन्त्रमगदतन्त्रं रसायनतन्त्रमिति ।। अत्राह—अङ्गान्येतानि, शरीरमस्य कतमत्, यदाश्रयन्त्यङ्गानि, अङ्गानि हि शरीराश्रयाणि भवन्ति; अत्राह तस्य शरीरं धर्मः, धर्माश्रयं ह्यस्मिन् कर्म सिध्यतीति ।। कथं चोत्पन्न इति; आह—अथर्ववेदोपनिषत्सु प्रागुत्पन्नः; स्वयंभूर्ब्रह्मा प्रजाः सिसृक्षुः प्रजानां परिपालनार्थमायुर्वेदमेवाग्रेऽसृजत् सर्ववित्, ततो विश्वानि भूतानि ततस्तं पुण्यमायुर्वेदमनन्तमायुषो वर्धनमाधारमाप्यायनममृतमश्विभ्यां कः प्रददौ, ताविन्द्राय, इन्द्र ऋषिभ्यश्चतुर्भ्यः कश्यपवशिष्ठात्रिभृगुभ्यः; ते पुत्रेभ्यः शिष्येभ्यश्च प्रददुहिताथं धर्मार्थकाममोक्षशक्तिपरिपालनार्थं चेति, एवमुत्पन्नः ।। कथं चाध्येय इति, गुरोरनुमतेनेति ।। केन चाध्येय इति, ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रैरायुर्वेदोऽध्येयः ।। तत्रार्थपरिज्ञानार्थं पुण्यार्थं चात्मनः प्रजानुग्रहार्थं ब्राह्मणैः, प्रजासंरक्षणार्थं क्षत्रियैः, वृत्त्यर्थं वैश्यैः, शुश्रूषार्थमितरैः धर्मार्थं च सर्वैः । सुखजीवितदानं हि सर्वधर्मेभ्याधिकं ब्रुवते; ततश्च पुण्य एवमायुर्वेदः । सुखजीवितदानतुष्टाश्च देहिनः कृतज्ञाय संविभजन्ति पुरःस्तुवन्ति च; तदस्य धर्मार्थकामनिर्वर्तकं भवतीति किमर्थं चाध्येय इत्यत्रोक्तम् ।। किंचास्याद्यं तन्त्रमिति ?

कौमारभृत्यमष्टानां तन्त्राणामाद्यमुच्यते ।
आयुर्वेदस्य महतो देवानाभिव हव्यपः ।।

अनेन हि संवर्धितमितरे चिकित्सन्ति । बालस्य हृद्यमौषधमन्यत्, प्रमाणमन्य (दन्य) उपक्रमोऽन्ये च विशेषाः ।। कं च वेदं श्रयति ? अथर्ववेदमित्याह; तत्र हि रक्षाबलिहोमशान्ति ........ प्रतिकर्मविधानमुद्दिष्टं विशेषेण, तद्वदायूर्वेदे, तस्मादथर्ववेदं श्रयति । सर्वान् वेदानित्येके, पद्यगद्यकथ्येगेयविद्याश्रयादिति; न चैतदेवम्, आयुर्वेदमेवाश्रयन्ते वेदाः । तद्यथा—दक्षिणे पाणौ चतसृणामङ्गुलीनामङ्गुष्ठ आधिपत्यं कुरुते, न च नाम ताभिः सह समतां गच्छति, एकस्मिंश्च पाणौ भवति, एवमेवायमृग्वेदयजुर्वेदसामवेदाथर्ववेदेभ्यः


१. आयुर्वेदो धर्म्योऽधर्म्यो वेत्यर्थः ।