कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
द्वाःस्थैरावेदितांस्तांश्च प्रविष्टान् पृच्छति स्म सः । महावराहो नृपतिरनङ्गरतिसन्निधौ ॥९७॥ नाम किं कस्य युष्माकं जातिर्विज्ञानमेव च । एतद्राजवचः श्रुत्वा तेष्वेकोऽस्तं व्यजिज्ञपत् ॥९८॥ पञ्चपट्टिकनामाहं शूद्रो विज्ञानमस्ति मे । वयामि प्रत्यहं पञ्च पट्टिकायुगलानि यत् ॥९९॥ तेभ्य एकं प्रयच्छामि ब्राह्मणाय ददामि च । द्वितीयं परमेशाय तृतीयं च वसे स्वयम् ॥१००॥ चतुर्थं मे भवेद् भार्या यदि तस्यै ददामि तत् । शरीरयात्रां विक्रीय पञ्चमेन करोम्यहम् ॥१०१॥ अथ द्वितीयोऽप्याचख्यावहं भाषाज्ञसंज्ञकः । वैश्यो रुतं विजानामि सर्वेषां मृगपक्षिणाम् ॥१०२॥ ततस्तृतीयोऽप्यवददहं खड्गधराभिधः । क्षत्रियः खड्गयुद्धेन जीये नान्येन केनचित् ॥१०३॥ चतुर्थश्चाब्रवीज्जीवदत्ताख्योऽहं द्विजोत्तमः । गौरीप्रसादविद्याभ्यां जीवयामि मृतां स्त्रियम् ॥१०४॥ एवमुक्तवतां तेषां शूद्रविट्क्षत्रियास्त्रयः । रूपं शौर्यं बलं चैव शशंसुः पृथगात्मनः ॥१०५॥ ब्राह्मणो रूपवर्जं तु बलशौर्यं शशंस सः । ततो महावराहः स्वं क्षत्तारमवदन्नृपः ॥१०६॥ नीत्वा विश्रामयैतांस्त्वं सम्प्रति स्वगृहेऽखिलान् । तच्छ्रुत्वा स तथेत्युक्त्वा क्षत्ता त्वानानयद्गृहम् ॥१०७॥ ततोऽब्रवीत् स राजा तामनङ्गरतिमात्मजाम् । एषां चतुर्णां वीराणां पुत्रि कोऽभिमतस्तव ॥१०८॥ शूद्रश्च वायकर्मकः क्रियते तस्य किं गुणैः । वैश्यो द्वितीयः पक्ष्यादिरुतिज्ञश्च तस्य किम् ॥१०९॥ श्रुत्वैतत्पितरं तं सा प्राहानङ्गरतिस्तथा । चतुर्णामपि तातैषां न कोऽप्यभिमतो मम ॥११०॥ ताभ्यां कथमहं दद्यामात्मानं क्षत्रिया सती । तृतीयस्तुल्यवर्णो मे भवति क्षत्रियो गुणी ॥१११॥ किं तु सेवोपजीवी स दरिद्रः प्राणविक्रयी । पृथ्वीपतिसुता भूत्वा कथं स्यां तस्य गेहिनी ॥११२॥
सप्तम लम्बक ४१७
सप्तम लम्बक ४१७ द्वारपाल द्वारा सूचना पाकर अन्दर आये हुए उनसे राजा महावराह ने अनंगरति के सामने ही पूछा—॥१९७॥ 'तुम्हारा नाम क्या है, जाति क्या है और कौन-सा विशेष विज्ञान तुमलोग जानते हो ?' राजा के प्रश्नों को सुनकर उनमें से एक ने कहा—॥१९८॥ 'मैं पंचपट्टिक नाम का शूद्र (जुलाहा) हूँ। बुनने का विज्ञान जानता हूँ और प्रतिदिन पाँच जोड़े कपड़े बुनता हूँ ॥१९९॥ उन पाँच जोड़ों में से एक ब्राह्मण को देता हूँ, दूसरा जोड़ा ईश्वर को अर्पण करता हूँ, तीसरा स्वयं पहनता हूँ और चौथा जोड़ा यदि मेरी पत्नी हो तो उसे दूँ और पाँचवें जोड़े को बेचकर जीवन-निर्वाह करता हूँ ॥१ १ ॥ तब दूसरा बोला—'मैं भाषाविज्ञानी वैश्य हूँ। सभी मृगों और पक्षियों की बोलियों को जानता हूँ' ॥१ २॥ तब तीसरा बोला—'मैं खड्गधर नाम का क्षत्रिय हूँ और खड्ग के अतिरिक्त मैं अन्य किसी वृत्ति से जीवन-निर्वाह नहीं करता' ॥१ ३॥ तदनन्तर चौथा बोला—'मैं जीवदत्त नाम का ब्राह्मण हूँ। पार्वती की कृपा और विद्या के प्रभाव से मरी हुई स्त्री को जिला लेता हूँ' ॥१ ४॥ ऐसा कहते हुए शूद्र, क्षत्रिय और वैश्य तीनों ने अपने रूप, शौर्य और बल की अलग- अलग प्रशंसा की किन्तु ब्राह्मण ने रूप को छोड़ केवल बल-मात्र की बात कही। यह सुनकर राजा महावराह ने अपने द्वास्थ (प्रतीहार) से कहा कि 'तुम इन सब को अपने घर ले जाकर विश्राम कराओ'। यह सुनकर 'जो आज्ञा' कहकर द्वास्थ उन्हें अपने घर ले गया ॥१ ५—१ ७॥ उनके चले जाने पर राजा ने अपनी कन्या अनंगरति से कहा 'कहो इन चारों वीरों में से तुम किसे चाहती हो ?' ॥१ ८॥ यह सुनकर वह अनंगरति पिता से बोली—'पिता इन चारों में से एक भी मुझे पसन्द नहीं है ॥१ ९॥ इनमें एक शूद्र और जुलाहा है, इस गुण से क्या लाभ ? दूसरा वैश्य पशुओं की बोलियाँ जानता है, उसके जानने से भी क्या लाभ ? मैं क्षत्रिया होकर अपने को वैश्य और शूद्र को कैसे दे दूँ ? तीसरा मेरी समान जाति का क्षत्रिय गुणी तो है, किन्तु वह सेवा से जीवन व्यतीत करनेवाला दरिद्र और प्राणों को बेचनेवाला है। मैं पृथ्वीपति की कन्या होकर उस नौकर की पत्नी कैसे बनूँ ॥११०-११२॥ ५३
४१८ कथासरित्सागर
४१८ कथासरित्सागर चतुर्थो ब्राह्मणो जीवदतोऽप्यभिगतो न मे। स विरूपो विकर्मस्थः पतितो वेदवर्जितः ॥११३॥ स ते दण्डयितुं युक्तः किं नु तस्मै ददासि माम्। वर्णाश्रमाणां धर्मस्य राजा त्वं ह्यत रक्षिता ॥११४॥ खड्गशूराच्च नृपतेर्धर्मशूरः प्रशस्यते। खड्गशूरसहस्राणां धर्मशूरो भवेत् पतिः ॥११५॥ इत्याद्युक्तवतीमेतां सुतामन्तःपुरं निजम्। विसृज्य च समुत्तस्थौ स्नानाद्यर्थं स भूपतिः ॥११६॥ द्वितीयेऽह्नि च ते वीरा गृहात् क्षत्तुर्विनिर्गताः। बभ्रमुर्नगरे तत्र चत्वारोऽपि सकौतुकाः ॥११७॥ तावच्च पद्मकदलो नामात्र व्यालवारणः। भग्नालानो जनं मथ्नन्काशाया निरगान्मदात् ॥११८॥ सोऽप्यधावच्च तान् दृष्ट्वा वीरान् हन्तुं महागजः। ते चापि तस्याभिमुखं प्राधावन्नुद्यतायुधाः ॥११९॥ ततः खड्गधराख्यो यस्तन्मध्ये क्षत्रियः स तान्। अन्यान्निवार्य मीनको गजमभ्यापपात तम् ॥१२०॥ लुलाव च करं तस्य गर्जतोऽग्रप्रसारितम्। एकेनापि प्रहारेण विक्रत्सन् दावहस्तया ॥१२१॥ पादमध्ये च निर्गत्य दर्शयित्वा च लाघवम्। प्रहारं प्रददौ पृष्ठे द्वितीयं तस्य दम्भिनः ॥१२२॥ तृतीयेन च विच्छेद तस्य पादावुभावपि। ततो मुक्तारटिर्हस्ती पपात च ममार च ॥१२३॥ तं दृष्ट्वा विक्रमं तस्य जनः सर्वो विसिस्मये। राजा महावराहस्तद्बुद्ध्वा चित्रीयते स्म च ॥१२४॥ अन्यद्युः स गजारूढो मृगयाय नृपो ययौ। वीराः खड्गधराद्यास्ते चत्वारोऽपि समन्वयुः ॥१२५॥ तत्र व्याघ्रमृगक्रोडांन् ससैन्ये राज्ञि निघ्नति। अधावन् कुपिताः सिंहाः श्रुतवारणबृंहिताः ॥१२६॥ १ चीत्कारं कुर्वन्नित्यर्थः।
नवम लम्बक ४९९
नवम लम्बक ४९९
चौथा ब्राह्मण जीवदत्त भी मुझे पसन्द नहीं है। वह कुरूप, कर्महीन, वेदरहित और पतित है ॥११३॥ वह तो तुम्हारे लिए दंड देन योग्य है। हे पिता! तुम तो वर्णों और आश्रमों के रक्षक और धर्म के प्रतिपालक हो ॥११४॥ हे राजन्, खड्गशूर से धर्मशूर अधिक प्रशंसनीय है। हजारों खड्गशूरों का एक धर्मशूर स्वामी हो सकता है ॥११५॥ इस प्रकार कहती हुई अपनी कन्या को निवास-स्थान के लिए विदा कर, राजा स्नान आदि के लिए उठ गया ॥११६॥ दूसरे दिन वे चारों क्षत्रियी वीर, द्यूता के घर से निकल और नगर देखने की इच्छा से भ्रमण करने लगे ॥११७॥ इसी बीच पद्मकलश नाम का मदान्मत्त दुष्ट हाथी साँकल तोड़कर जनता को रौंदता हुआ गजशाला से बाहर निकल आया ॥११८॥ उस हाथी ने उन चारों वीरों को देखकर, उन पर आक्रमण कर दिया। वे भी अपने- अपने शस्त्रों को उठाकर हाथी की ओर दौड़ पड़े ॥११९॥ उन में से खड्गधर नामक क्षत्रिय वीर ने और तीनों को हटाकर अकेले ही हाथी का सामना किया ॥१२०॥ और चिंघाड़ते हुए हाथी की सूँड को उसने एक ही प्रहार से कमलनाल के समान काट दिया ॥१२१॥ और पैंतरा बदलकर उसके पैरों के नीचे से निकलकर उसकी पीठ पर दूसरा प्रहार किया ॥१२२॥ उसने तीसरे प्रहार में उसके पैर काट डाले तो चिल्लाता हुआ हाथी भूमि पर गिर पड़ा और मर गया ॥१२३॥ उसके इस पराक्रम को देखकर सभी लोग चकित रह गये और राजा महावराह भी यह सब सुनकर विस्मित हुआ ॥१२४॥ दूसरे दिन वह राजा हाथी पर बैठकर शिकार के लिए वन में गया और वे चारों वीर भी उसके पीछे गये ॥१२५॥ शिकार के समय सेना के साथ राजा के अनेक बाघों, मृगों और सूअरों के मार देने पर हाथियों के चिंघाड़ सुनकर क्रुद्ध सिंह चारों ओर से राजा की ओर दौड़ पड़े ॥१२६॥
५० कथासरित्सागर
५० कथासरित्सागर अभ्यापतन्तमेकं च सिंहं खड्गधरोऽथ सः। एकेन तीक्ष्णनिस्त्रिंशप्रहारेण द्विधाऽकरोत् ॥१२७॥ द्वितीयं च गृहीत्वैव चरणे वामपाणिना। आस्फोट्य भूतले सिंहं चकार गतजीवितम् ॥१२८॥ भापाङ्गो जीवदत्तश्च पञ्चपट्टिक एव च। एकैकं सिंहमेकैकं तथैवास्फोटयन् भुवि ॥१२९॥ एवं क्रमेण ते राज्ञः पश्यतः पादचारिभिः। लीलया बहवो वीरैः सिंहव्याघ्रादयो हताः ॥१३०॥ ततः सविस्मयस्तुष्टः कृताखेटः स भूपतिः। विवेश स्वपुरं तेऽपि वीराः स्वगृहं ययुः ॥१३१॥ स च राजा प्रविश्यान्तःपुरं श्रान्तोऽपि तत्क्षणम्। तत्रैवानाययामास तामनङ्गरतिं सुताम् ॥१३२॥ आख्याय तेषां वीराणामेकैकस्य पराक्रमम्। आखेटके यथादृष्टं तामुवाचातिविस्मिताम् ॥१३३॥ पञ्चपट्टिकभापाङ्गावसवर्णावुभौ यदि। विप्रोऽपि जीवदत्तश्चेद्रूपहीनो विकर्मकृत् ॥१३४॥ तत्क्षत्रियस्य दोषोऽस्ति तस्य खड्गधरस्य कः। सुप्रमाणसुरूपस्य बलविक्रमशालिनः ॥१३५॥ येन हस्ती हतस्तावद् यः पिनष्टि च भूतले। गृहीत्वा पादतः सिंहान् खड्गेनान्यान्निहन्ति च ॥१३६॥ दरिद्रः सेवकश्चेति दोषस्तस्योच्यते यदि। अहं तं सेव्यमन्येषां करिष्यामीश्वरं क्षणात् ॥१३७॥ तत्तं वृणीष्व भर्तारं यदि ते पुत्रि रोचते। इत्युक्ता तेन सानङ्गरतिः पित्रा जगाद तम् ॥१३८॥ सद्गुणीतेषु सर्वेषु तेषु वीरेष्विह त्वया। गणकः पृच्छ्यतां तावत् पश्यामः किं ब्रवीति सः ॥१३९॥ एवं तयोक्तः स नृपो वीरानानाम्य सत्र तान्। तत्सन्निधौ सानुरोधः पप्रच्छ गणकं स्वयम् ॥१४०॥ पश्यानङ्गरतेरेषां मध्यात् केन समं मिथः। ग्रहस्यानुकूल्यं लग्नञ्च भवेत् तस्याः सदा शुभम् ॥१४१॥
नवम लम्बक ५१
नवम लम्बक ५१ आक्रमण करते हुए एक सिंह को वीर खड्गधर ने तलवार के एक ही प्रहार से दो टुकड़े करके मार डाला ॥१२७॥ और, दूसरे सिंह के पैरों को बायें हाथ से पकड़कर और घुमाकर पृथ्वी पर पटककर मार डाला ॥१२८॥ इसी प्रकार भाषा-विज्ञानी वैश्य ब्राह्मण और पंचपट्टिक शूद्र आदि तीनों वीरों ने पैदल चलते हुए ही राजा के सामने अनेक सिंह बाघ आदि को पृथ्वी पर पटक-पटककर सहज ही में मार डाला ॥१२९-१३०॥ तब आश्चर्य के साथ सन्तुष्ट राजा शिकार खेलकर नगर को लौट आया और वे चारों वीर दाता के घर पर, अपने निवास-स्थान को चल गये ॥१३१॥ तब राजा ने श्रान्त होते हुए भी उसी समय अपने रनिवास में जाकर वहीं अनंगरति को बुलवाया और शिकार के समय उन वीरों का जो पराक्रम और कौतुक देखा था सब उस बहू सुनाया। यह सब सुनकर और जानकर वह भी अत्यन्त चकित हुई ॥१३२-१३३॥ राजा ने कहा—'बेटी पंचपट्टिक और भाषाविज्ञानी ये दोनों यद्यपि समान वर्ण (जाति) के नहीं हैं और यदि ब्राह्मण जीवदत्त कुरूप और कुत्सित कर्म करनेवाला है तो क्षत्रिय खड्गधर का क्या दोष है? उसका कुल और रूप भी सुन्दर है तथा वह शूर और पराक्रम शाली है ॥१३४-१३५॥ जिसने एक मदोन्मत्त और पागल हाथी को मार दिया और जो सिंहों को पकड़कर भूमि पर पछाड़कर, मसल डालता है और खड्ग से उनके दो टुकड़े कर डालता है ॥१३६॥ यदि तुम उसके ये दो दोष बताती हो कि वह दरिद्र है और सेवक है तो मैं उसे राज भर में दूसरों से सेवा किये जाने योग्य अर्थात् राजा बना दूँगा ॥१३७॥ इसलिए बेटी यदि तुम्हें वह अच्छा लगे तो उसे पति बना लो। पिता द्वारा इस प्रकार कही गई अनंगरति बोली—॥१३८॥ 'लगी बात है तो सब को यहीं बुलाकर और ज्योतिर्विदों को भी बुलवाकर पूछो कि वे क्या बतलाते हैं॥१३९॥ यह सुनकर राजा ने उन वीरों को बुलवाकर उनके सामने ही ज्योतिषी से अनुराग के साथ स्वयं पूछा—॥१४०॥ 'देखो इन चारों में अनंगरति के साथ किसकी कुण्डली मिलती है और उसके विवाह का लग्न कब कब है ? ॥१४१॥
[Page Header] ५२ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वा पृष्टनक्षत्रस्तेषां स गणकोत्तमः । गणयित्वा चिरं कालं राजानं तमभाषत ॥१४२॥ न चेत् कुप्यसि मे देव स्फुटं विज्ञापयामि तत् । अस्ति त्वद्दुहितुर्नेषामेकेनाप्यनुकूलता ॥१४३॥ न चेहास्ति विवाहोऽस्या एषा शापच्युतात्र यत् । विद्याधरी स शापोऽस्यास्त्रिभिर्मासैर्निवर्त्स्यति ॥१४४॥ तस्मान् मासत्रयं तावत् प्रतीक्षन्ताममी इह । नैषां स्वलोकं याता चेत्तत एतद् भविष्यति ॥१४५॥ एतन्मौहूर्तिकस्यास्य वचः सर्वेऽपि तत्र ते । श्रद्दधुस्तत्र चैवासन् वीरा मासत्रयावधि ॥१४६॥ गते मासत्रये राजा तान् वीरान् गणकं च सम् । स्वाग्रमानाययामास तामनङ्गरतिं च सः ॥१४७॥ दृष्ट्वा चाधिकसौन्दर्याम कस्मात् तां सुतां नृपः । बह्वर्षं गणकस्तां तु प्राप्तकालममन्यत ॥१४८॥ इदानीं ब्रूहि यद्युक्तं त हि मासास्त्रयो गताः । इति यावच्च तं राजा गणकं पृच्छति स्म सः ॥१४९॥ तावज्जातिं निजां स्मृत्वा सानङ्गरतिराननम् । आच्छाद्य स्वोत्तरीयेश मानुषीं तां तनुं जहाौ ॥१५०॥ एवमेषा स्थिता किंस्विदिति राजा स्वयं मुखम् । यावदुद्घाटयते तस्यास्तावत् सा ददृशे मृता ॥१५१॥ व्यामुक्त्तनेत्रभ्रमरा विवर्णवदनाम्बुजा । हप्तमञ्जुस्वना मुक्ता पद्मिनीव हिमाहता ॥१५२॥ ततः स सद्यस्तच्छोकवज्रपाताहतो भुवि । भूभृत् पपात निर्घोषः स्वपक्षच्छेदमुच्छ्रितः ॥१५३॥ राज्ञी पद्मवती सापि व्यामोहपतिता ययौ । भ्रष्टामरणपुष्पा क्ष्मामिभमग्नेव मञ्जरी ॥१५४॥ मुक्ताक्रन्दे परिजने तेषु वीरेषु दुःखिषु । सम्भ्रमांत क्षणाद्राजा जीववत्तमुवाच तम् ॥१५५॥
[Footnote] १ भू भृतः । राज्ञः पर्वतस्य च श्लेषेण वर्णनम् ।
नवम लम्बक ५१
नवम लम्बक ५१ यह सुनकर और गणक ने उन चारों के नक्षत्र पूछकर और कुछ समय तक विचार कर लेने के उपरान्त राजा से कहा—॥१४२॥ महाराज यदि आप क्रोध न करें तो स्पष्ट ही कहता हूँ कि इन चारों में एक के साथ भी तुम्हारी कन्या की कुंडली नहीं मिलती। और, इस कन्या का विवाह भी इस लोक में न होगा। क्योंकि यह शाप के कारण मनुष्य-जन्म में उत्पन्न हुई विद्याधरी है। आगामी तीन महीनों में इसका वह शाप दूर होगा ॥१४३—१४४॥ इसलिए, ये लोग तीन मास तक यहाँ रहकर प्रतीक्षा करें तदनन्तर यह कन्या यदि अपने विद्याधर-लोक में न गई, तो इसका इस लोक में विवाह हो सकेगा' ॥१४५॥ इस प्रकार, वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने ज्योतिषी की बातों में विश्वास प्रकट किया और वे चारों वीर तीन मास तक वहीं रहे ॥१४६॥ तीन महीने बीतने पर राजा ने उन चारों वीरों ज्योतिषी और अनंगरति को फिर बुलवाया। ज्योतिषी ने उस समय कन्या को अधिक सुन्दर देखकर उसका अन्तिम समय निकट आया जान लिया ॥१४७-१४८॥ अब कहो तीन मास बीत गये। इस प्रकार जैसे ही राजा ने ज्योतिषी से पूछा तबतक अनंगरति ने अपनी साड़ी के आंचल से अपना मुंह ढक लिया और उस मानव शरीर का परित्याग कर दिया ॥१४९-१५०॥ यह इस प्रकार मुँह ढककर क्यों बैठी है? ऐसा सोचकर राजा ने जब उसका मुंह स्वयं खोलकर देखा तब उसे मरी हुई पाया ॥१५१॥ वह हिम से मारी हुई कमलिनी के समान हो गई थी उसके नेत्र-रूपी भ्रमर उड़ते हुए थे मुख-कमल तेजोहीन था और अब उसके मुख में हंस के समान मधुर वाणी न थी ॥१५२॥ उसे मृत देखकर शोक-रूपी वज्र से मारा हुआ-सा और अपने पक्ष (पक्ष) के कटने से मूर्च्छित वह राजा (पर्वत) भूमि पर गिर पड़ा ॥१५३॥ उसकी माता पद्ममति भी हाथी से उखाड़ फेंकी गई लता के समान और अपने आभूषण रूपी पुष्पों के गिर जाने पर शून्य-सी होकर मूर्च्छित हो गई ॥१५४॥ अन्य भी परिजन सब लोग और वे चारों वीर भी अत्यन्त दुःखी हो गये। इतने में ही राजा ने स्वस्थ होश में आकर जीवदत्त से कहा ॥१५५॥
मात्रैषां शक्तिरन्येषामधुनावसरोऽस्ति ते। प्रतिज्ञातं त्वया नारीं जीवयामि मृतामिति॥१५६॥ यदि विद्याबलं तद्स्ति तज्जीवय सुतां मम। दास्यामि तुभ्यमेवैतां विप्राय प्राप्तजीविताम्॥१५७॥ इति राज्ञो वचः श्रुत्वा जीवदत्तोऽभिमन्त्रितैः। अभ्युक्ष्य तोयैस्तां राजपुत्रीमार्यामिमां जगौ॥१५८॥ 'अट्टाट्टहासहसिते करङ्कमालाकुले दुरालोके। चामुण्डे विकराले साहाय्यं मे कुरु त्वरितम्'॥१५९॥ एव तेन कृते यत्ने जीवदत्तेन सा यदा। धान्ना न जीवितं प्राप विषण्णः सोऽवदत्तदा॥१६०॥ यत्सापि विन्ध्यवासिन्या विद्या मे निष्फला गता। तदेतेनोपहास्येन किं कार्यं जीवितेन मे॥१६१॥ इत्युक्त्वा जीवदत्तः स्वं शिरश्छेत्तुं महासिना। यावत् प्रवर्त्तते तावदुद्गाद् भारती दिवः॥१६२॥ भो जीवदत्त मा कार्षीः साहसं शृणु सम्प्रति। एषानङ्गरतिर्नाम सा विद्याधरकन्यका॥१६३॥ पित्रोः शापेन मानुष्यमियन्तं कालमागता। त्यक्त्वाद्यैतां तनुं याता स्वलोकं स्वतनौ स्थिता॥१६४॥ तद्विन्ध्यवासिनीमद्य गत्वाराधय तां पुनः। तत्प्रसादादिमां प्राप्स्यस्यपि विद्याधरीं सतीम्॥१६५॥ न चैषा दिव्यभोगस्था शोच्या राज्ञो न चापि ते। इत्युदीर्य यथातत्त्वं दिव्या वाग्विरराम सा॥१६६॥ ततः सुतायाः सस्कारं कृत्वा राजा जहौ शुचम्। सदारोऽपि ययुस्तज्ज्ये ष्ठयो भीरा यथागतम्॥१६७॥ जीवदत्तस्तु जातास्थो गत्वा तां विन्ध्यवासिनीम्। तपसाराधयामास स्वप्ने साप्यादिदेश तम्॥१६८॥ अनङ्गप्रभायाः कथा सुप्ता तवाहमूत्तिष्ठ शृणु चेदं ब्रवीमि ते। अस्ति वीरपुरं नाम नगरं तुहिमाचले॥१६९॥ विद्याधराधिराजोऽस्ति समरो नाम तत्र च। तस्यानङ्गवतीदेव्यां सुतानङ्गप्रभाजनि॥१७०॥
नवम लम्बक ५०५
नवम लम्बक ५०५ इस विषय में तुम्हारे इन साथियों की अब शक्ति नहीं है। यह तुम्हारा अवसर है। तुमने पहले ही प्रतिज्ञा की थी कि मैं मरी हुई को जिला देता हूँ ॥१५६॥ ता यदि तुममें विद्या का बल है तो इस मरी हुई मेरी कन्या को जिलाओ। जीवित हो जाने पर इस कन्या को तुम्हें दे दूंगा' ॥१५७॥ राजा की यह बात सुनकर जीवदत्त ने राजकन्या के मुंह पर जल का छींटा देकर इस आर्या को पढ़ा—॥१५८॥ अट्टात्टहासहसिते करङ्कमालाङ्कके दुरालोके। चामुण्डे विकराले साहाय्यं मे कुरु त्वरितम् ॥१५९॥ इस प्रकार, विद्या का प्रयोग करने पर भी जब वह कन्या जीवित न हुई, तब जीवदत्त ने दुःखी होकर कहा—॥१६०॥ विन्ध्यवासिनी द्वारा दी गई भी मेरी विद्या निष्फल हो गई। इसलिए, हँसने के योग्य मेरे इस जीवन से अब क्या लाभ है? ॥१६१॥ ऐसा कहकर जैसे ही जीवदत्त तलवार से अपना सिर काटने को उद्यत हुआ वैसे ही इस प्रकार की आकाशवाणी हुई—॥१६२॥ हे जीवदत्त साहस मत करो। सुनो यह अनंगरति विद्याधरकुमारी है॥१६३॥ माता-पिता के शाप से यह इतने दिनों तक मनुष्य-जीवन में रही। आज वह मनुष्य-देह छोड़कर अपने विद्याधर-देह में चली गई ॥१६४॥ अतः तुम जाकर फिर उसी विन्ध्यवासिनी देवी की आराधना करो। उसी की कृपा से तुम इस विद्याधरी को प्राप्त करोगे ॥ १६५॥ अब वह दिव्य भोगों को भोग रही है। अतः राजा और रानी को भी उसके लिए शोक न करना चाहिए। इतना कहकर दिव्य वाणी शान्त हो गई ॥१६६॥ तदनन्तर, रानी-सहित राजा ने कन्या का दाह आदि संस्कार करके उसका शोक त्याग दिया और वे तीनो वीर जहाँ से आये थे वहीं लौट गये ॥१६७॥ और जीवदत्त उस विद्याधरी की प्राप्ति में विश्वास करके विन्ध्यवासिनी की शरण में जाकर तपस्या करने लगा। विन्ध्यवासिनी ने स्वप्न में उसे आदेश दिया—॥१६८॥ अनंगप्रभा की कथा 'मैं तुमसे प्रसन्न हूँ उठो और सुनो मैं तुमसे यह कहती हूँ। हिमालय में वीरपुर नाम का का नगर है। वहाँ समर नाम का विद्याधरों का राजा है। उसकी रानी अनंगवती में अनंगप्रभा नाम की कन्या उत्पन्न हुई ।१६९ १० ॥ ६४
५६ कथासरित्सागर
५६ कथासरित्सागर सा रूपयौवनोत्सेका नैच्छत् कञ्चित् पतिं यदा। तदासिद्दुग्रहक्रुद्धौ पितरौ शपतः स्म ताम् ॥१७१॥ मानुष्यं व्रज तत्रापि न भर्तृसुखमाप्स्यसि। कन्यैव षोडशाब्दा तां त्यक्त्वा तनुमिहैष्यसि ॥१७२॥ मर्त्यो विप्रो भावी च खड्गसिद्धोऽप्य ते पतिः। मुनिकन्याभिलाषेण शापान्मर्त्यत्वमागतः ॥१७३॥ अनिच्छन्तीमपि त्वां च मर्त्यलोकं स नेष्यति। त्वया तस्य वियोगोऽत्र भविष्यत्यन्यनीतया ॥१७४॥ पूर्वजन्मनि तन्नाष्टौ हृता हि परयोषितः। तेनाष्टजन्मभोग्याहं दुःखं सोऽनुभविष्यति ॥१७५॥ त्वं चात्र जन्मन्येकस्मिन्नष्टानाभिव जन्मनाम्। दुःखं प्राप्स्यसि विधानां ह्यंशेन मनुषीकृता ॥१७६॥ सर्वस्यैव हि पापिष्ठसम्पर्कः पापभागदः। समपापः पुन स्त्रीणां भर्त्रा पापेन सङ्गमः ॥१७७॥ नष्टस्मृतिः पतींश्च त्वं बहून् प्राप्स्यसि मानुषान्। स्वयोचितवरद्वेषदुग्रहो विहितो यतः ॥१७८॥ योऽयाचत समानस्त्वां शुचरो मद्यमप्रभः। भूत्वा स मानुषोऽभूभूवन्ते भावी पतिस्तव ॥१७९॥ ततस्त्वं शापनिर्मुक्ता स्वलोकं पुनरागता। तमेव शुचरीभूतं सम्प्राप्स्यस्युचितं पतिम् ॥१८०॥ तदेष पितृशप्ता सा मूर्त्तानङ्गरतिः क्षितौ। प्राप्ताथ पित्रोनिकटं जातानङ्गप्रभा पुनः ॥१८१॥ अतो वीरपुरं गत्वा जित्वा तत्पितरं रणे। जानन्तमपि कौलीनरक्षितं तामवाप्नुहि ॥१८२॥ इमं गृहाण खड्गं च येन हस्तगतेन ते। गतिर्भविष्यत्याकाशे किं चाजयो भविष्यसि ॥१८३॥ इत्युक्त्वाऽर्पितखड्गा सा तस्य देवी तिरोदधे। स च प्रबुबुधे दिव्यं खड्गं हस्ते ददर्श च ॥१८४॥ अघोरपाय प्रहृष्टात्मा जीवदत्तो नताम्बिकः। तत्प्रसादामृताप्यायच्छान्ताघायतपः क्लमः ॥१८५॥
नवम लम्बक ५०७
नवम लम्बक ५०७ अपने रूप और यौवन के घमंड से उसने किसी भी पति को पसन्द नहीं किया तो उसके दुराग्रह से क्रुद्ध होकर उसके माता-पिता ने शाप दिया कि वह मनुष्य-योनि में उत्पन्न होगी और उस योनि में भी उसे पति-सुख न मिलेगा और सोलह वर्ष की अवस्था में ही वह मनुष्य- देह का त्याग कर यहाँ आ जायगी ॥१७१-१७२॥ मुनि-कन्या की अभिलाषा से शाप के कारण मानव-देह को प्राप्त कुरूप मानव खड्गधर तेरा पति होगा। तेरे न चाहने पर भी तुझे वह मर्त्यलोक में ले जायगा। तब दूसरे के द्वारा तुझे ले जाने पर उसके साथ तेरा वियोग होगा ॥१७३-१७४॥ क्योंकि उस खड्गधर ने पूर्वजन्म में दूसरों की आठ स्त्रियों का अपहरण किया है इसलिए वह आठ जन्मों तक भोगने के योग्य दुःखों को प्राप्त करेगा ॥१७५॥ तू भी मानव बन जाने से विद्याओं के नष्ट हो जाने के कारण एक ही जन्म में आठ जन्मों का दुःख भोगेगी ॥१७६॥ पापी व्यक्ति का सम्पर्क सभी को उसके पाप का भागी बना देता है। और, स्त्रियों को तो पापी पति के समान ही पाप का भागी होना ही पड़ता है ॥१७७॥ तूने योग्य वर मिलने पर भी उसका दुराग्रहपूर्ण द्वेष किया है। अतः तू पूर्वजन्मों का स्मरण न करते हुए अनेक मानव-पतियों को प्राप्त करेगी ॥१७८॥ जिस आकाशचारी और समान कुल के मदनप्रभ ने विवाह के लिए तुझे माँगा था वह मनुष्य-राजा होकर अन्त में तेरा पति बनेगा ॥१७९॥ तदनन्तर, शाप से मुक्त होकर फिर अपने लोक में आई हुई और उसी विद्याधर बने हुए मदनप्रभ को पति-रूप में प्राप्त करेगी ॥१८०॥ इस प्रकार माता-पिता द्वारा शाप दी गई अनंगरति पृथ्वी में उत्पन्न होकर और अब (मरकर) माता-पिता के पास पहुँचकर पुनः अनंगप्रभा हो गई है ॥१८१॥ अतः अब तुम वीरपुर जाकर और युद्ध में उसके पिता को जीतकर कुलीनता में सदृश जानते हुए उसे प्राप्त करो। और, इस तलवार को ले लो जिसके हाथ में रहने पर तेरी आकाश में गति हो जायगी और तू अजेय हो जायगा' ॥१८२-१८३॥ ऐसा कहकर और खड्ग देकर वह देवी अन्तर्हित हो गई। तदनन्तर वह जीवदत्त जाग उठा और उसने अपने हाथ में तलवार देखी ॥१८४॥ तदनन्तर, प्रसन्नचित्त जीवदत्त ने उठकर माता को प्रणाम किया और माता की कृपा से उसकी तपस्या का सारा क्लेश दूर होगया ॥१८५॥
५८ कथासरित्सागर
५८ कथासरित्सागर खड्गहस्त समुत्पत्य परिभ्रम्य हिमालयम्। प्राप वीरपुरस्य त समरं खचरेश्वरम् ॥१८६॥ तेन युद्धजितेनात्र प्रदत्तां परिणीय सः। तामनङ्गप्रभां भेजे दिव्यां सम्भोगसम्पदम् ॥१८७॥ कञ्चित्काल स्थितश्चात्र श्वशुर समरं च सम्। जीवदत्तो जगादैव तां चानङ्गप्रभां प्रियाम् ॥१८८॥ मनुष्यलोकं गच्छावस्त प्रत्युत्कण्ठितोऽस्मि यत्। प्राणिनां हि निकृष्टापि जन्मभूमिः परा प्रिया ॥१८९॥ एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य श्वशुरः सोऽन्वमन्यत। सा स्वनङ्गप्रभा इच्छादनुमेने विजानती ॥१९०॥ अथाङ्गोपात्तया साकमनङ्गप्रभया तया। जीवदत्त स नभसा मर्त्यलोकमवातरत् ॥१९१॥ दृष्ट्वात्र रम्यमेकं च पर्वतं सा जगाद तम्। श्रान्तानङ्गप्रभा क्षिप्रमिह विश्राम्यतामिति ॥१९२॥ ततस्तथेति तत्रैव सोऽवतीर्य तया सह। चकाराहारपानादि तत्तद्विद्याप्रभावतः ॥१९३॥ ततोऽनङ्गप्रभां जीवदत्तोऽसौ विधिचोदितः। सामुवाच प्रिये किञ्चिन्मधुरं गीयतां त्वया ॥१९४॥ तच्छ्रुत्वा गातुमारभे सा भक्त्या धूर्जटे स्तुतिम्। तेन तद्गीतशब्देन सोऽथ निद्रामगावृक्षिजः ॥१९५॥ साश्वदाखेटकभ्रान्तो निर्झराम्भोऽभिलाषुकः। राजा हरिवरो नाम पथा तेन किलाययौ ॥१९६॥ स तेन गीतशब्देन श्रुतेन हरिणो यथा। आकृष्टोऽभ्यापतत्तत्र रथमुत्सृज्य केवलः ॥१९७॥ शकुने पूर्वमाख्यातलक्ष्मोऽपश्यत् स भूपतिः। तामनङ्गप्रभां सत्यामनङ्गस्य प्रभामिव ॥१९८॥ यदा तद्गीतरूपाभ्यां नीत तस्य विहस्तताम्¹। निर्बिभेद यथाकामं हृदय मदनः शरैः ॥१९९॥ १ विहस्ततां = विवशतां नीतं = प्राप्तम्।
नवम लम्बक ५९
नवम लम्बक ५९ वह हाथ में खड्ग लेकर आकाश में उड़ा और समस्त हिमालय में घूमकर वीरपुर में रहनेवाले विद्याधरों के राजा समर को प्राप्त किया ॥१८६॥ युद्ध में जीते हुए समर द्वारा प्रदत्त अनंगप्रभा को प्राप्त कर जीवदत्त दिव्य सम्पत्ति का उपभोग करने लगा ॥१८७॥ तदनन्तर, कुछ दिनों तक वहीं रहने के पश्चात् उसने एक दिन अपने श्वशुर समर और पत्नी अनंगप्रभा से कहा- 'हम दोनों (जीवदत्त और अनंगप्रभा) मनुष्य-लोक जाते। वहाँ जाने के लिए मैं उत्सुक हो रहा हूँ। प्राणियों को अपनी जन्म-भूमि निकृष्ट होने पर भी बहुत प्यारी लगती है ॥१८८-१८९॥ उसकी यह बात श्वशुर ने मान ली लेकिन भविष्य को समझती हुई अनंगप्रभा ने कठिनाई से इसे माना ॥१९०॥ तदनन्तर जीवदत्त अनंगप्रभा को गोद में लिये हुए मर्त्यलोक में उतरा। मार्ग में एक रमणीय पर्वत को देखकर अनंगप्रभा ने उससे कहा- 'मैं श्रान्त हो गई हूँ अतः इस पर्वत पर विश्राम करो' ॥१९१-१९२॥ 'ऐसा ही हो' इस प्रकार कहकर जीवदत्त उसके साथ उस पर्वत पर उतर गया और अनंगप्रभा की विद्याओं के प्रभाव से भोजन-पान आदि किया ॥१९३॥ तब दैव से प्रेरित जीवदत्त अनंगप्रभा से बोला--'प्यारी कुछ मधुर संगीत सुनाओ' ॥१९४॥ यह सुनकर अनंगप्रभा भक्ति से शिव की स्तुति गाने लगी। तब उसके गान के मधुर शब्द से वह जीवदत्त ब्राह्मण धीरे-धीरे निद्रामग्न हो गया ॥१९५॥ तबतक हरिवर नाम का राजा शिकार खेलता हुआ और झरने का जल ढूँढ़ता हुआ उस मार्ग से जा निकला ॥१९६॥ वह राजा हिरण के समान अनंगप्रभा के गीत से खिंचा हुआ रथ को छोड़कर वहाँ आ गया ॥१९७॥ अच्छे शकुनों से पहले ही शुभ सूचना प्राप्त राजा ने वहाँ कामदेव की शान्ति के समान सुन्दरी अनंगप्रभा को देखा ॥१९८॥ उसे देखते ही उसके गान और रूप से विवश राजा के हृदय को कामदेव ने बाणों से बींध दिया ॥१९९॥
५१२ कथासरित्सागर
५१२ कथासरित्सागर स्वनामख्याञ्जने तस्मिन् सोऽनङ्गप्रभया तया। सह दिव्यसुखस्तस्थौ ततो हरिवरो नृपः ॥२१५॥ साप्यनङ्गप्रभा तमेवासीत्तदनुरागिणी। विस्मृत्य स्वं प्रभावं स सर्वं शापविमोहिता ॥२१६॥ अत्रान्तरे स सप्ताद्रौ जीवदत्तो न केवलम्। प्रबुद्धो नैक्षतानङ्गप्रभां यावत् स्वमप्यसिम् ॥२१७॥ क्व साऽनङ्गप्रभा कष्टं क्व स खड्गोऽपि किं नु तम्। हृत्वा गता सा किं वा तौ नीतौ द्वावपि केनचित् ॥२१८॥ इत्युद्भ्रान्तो बहून् कुर्वन् वितर्कान् स दिनत्रयम्। गिरिं तं विचिनोति स्म दह्यमानः स्मराग्निना ॥२१९॥ ततोऽवतीर्य चिन्वानो वनानि दिवसान् दश। स बभ्राम न चापश्यत् तस्याः पदमपि क्वचित् ॥२२०॥ हा दुर्जनविधे कृच्छ्रात् सा दत्तापि कथं त्वया। खड्गसिद्ध्या सह हृता प्रियानङ्गप्रभा मम ॥२२१॥ इत्याक्रन्दन्निराहारो भ्रमन्नेकमवाप्तवान्। ग्रामं तत्र विवेशैकमार्तं द्विजगृहं च सः ॥२२२॥ गृहिणी तत्र सुभगा सुवस्त्रा चोपवेश्य तम्। आसने प्रियदत्ताख्यां स्वचेटीं शीघ्रमार्दिशत् ॥२२३॥ त्वरितं जीवदत्तस्य पादौ क्षाल्यतामस्य हि। निराहारस्य विरहाद्दिनमद्य त्रयोदशम् ॥२२४॥ तच्छ्रुत्वा विस्मितो जीवदत्तोऽन्तर्विममर्श सः। इहानङ्गप्रभा प्राप्ता किं किमेषाथ योगिनी ॥२२५॥ इति ध्यायन् धौतपादो भुक्तसद्दत्तभोजनः। प्रणतां प्रियदत्तां तामत्याश्चर्यात् पृच्छति स्म सः ॥२२६॥ एकं ब्रूहि कथं वेत्सि मद्वृत्तान्तमनिन्दिते। द्वितीयं चापि कथय प्रियाखड्गौ क्व मे गतौ ॥२२७॥ तच्छ्रुत्वा तमवोचत् सा प्रियदत्ता पतिव्रता। भर्तुरन्यो न मे चित्ते स्वप्नेऽपि कुरुते पदम् ॥२२८॥ पुत्रभ्रातृसमानन्यान् पश्यामि पुरुषानहम्। न च मेऽनर्चितो याति कदाचिदतिथिर्गृहात् ॥२२९॥
नवम लम्बक ५१५
नवम लम्बक ५१५ राजा हरिवर, अपने नाम से ही प्रसिद्ध हरिवर नगर, में उस परम सुन्दरी दिव्य रमणी अनंगप्रभा के साथ दिव्य सुख प्राप्त करता हुआ रहने लगा॥२१५॥ वह अनंगप्रभा भी राजा के प्रति अनुराग रखती हुई वहीं रहने लगी किन्तु वह अपने प्रभाव को भूलकर शाप से मोहित हो गई थी॥२१६॥ इसी बीच उस पर्वत पर सोकर उठे हुए जीवदत्त ने केवल अनंगप्रभा को ही नहीं देखा यह नहीं प्रत्युत अपनी तलवार को भी उसने नहीं देखा॥२१७॥ वह अनंगप्रभा कहाँ है वह तलवार भी कहाँ गई ? क्या अनंगप्रभा तलवार लेकर चली गई या उन दोनों को ही कोई तीसरा ले गया ? ॥२१८॥ इस प्रकार, उन्मत्त के समान विविध प्रकार की शंकाएं करता हुआ वह जीवदत्त कामाग्नि से जलता हुआ तीन दिनों तक सारे पर्वत पर उसे ढूँढता रहा॥२१९॥ तब पर्वत से उतरकर दस दिनों तक उसके नीचे वन में उसे ढूँढते हुए वह घूमता रहा किन्तु कहीं उसने उसके चरण का चिह्न भी न पाया॥२२०॥ 'हे दुष्ट दैव अत्यन्त कठिनाई से दी हुई तून खड्गसिद्धि के साथ मेरी प्राणप्यारी अनंगप्रभा को भी हर लिया' ॥२२१॥ इस प्रकार, रोते-कलपते और निराहार भ्रमण करते हुए उसे एक ग्राम मिला वहाँ वह एक सम्पन्न ब्राह्मण के घर में प्रवेश किया ॥२२२॥ उस घर में सुन्दरी और अच्छे वस्त्र पहने हुए गृहिणी प्रियव्रता ने उसे आसन देकर बैठाया और अपनी दासियों को आज्ञा दी कि शीघ्र ही इस जीवदत्त के चरण धुलाओ। स्त्री के वियोग से निराहार रहते हुए आज इसका तेरहवाँ दिन है॥२२३-२२४॥ यह सुनकर जीवदत्त मन में सोचने लगा कि क्या अनंगप्रभा यहाँ आई है या यह स्त्री ही कोई योगिनी है॥२२५॥ ऐसा सोचता हुआ धुले हुए पैरोंवाला और उसके दिये हुए भोजन से तृप्त जीवदत्त ने प्रणाम करते हुए बड़ी ही दीनतापूर्वक प्रियव्रता से पूछा-॥२२६॥ 'हे सदाचारिणी एक तो यह बताओ कि तुम मेरा वृत्तान्त कैसे जानती हो ? और, दूसरा यह बताओ कि मेरी प्रियतमा और तलवार कहाँ है ? ॥२२७॥ यह सुनकर वह पतिव्रता प्रियव्रता उससे बोली—'पति के सिवा दूसरा पुरुष स्वप्न में भी मेरे चित्त में स्थान नहीं पाता ॥२२८॥ दूसरे पुरुषों को मैं पुत्र और भ्राता के समान समझती हूँ। मेरे घर से कोई भी अतिथि बिना सत्कार प्राप्त किये हुए वापस नहीं जा सकता ॥२२९॥ ६५
सापि तं वीक्ष्य सहसा सुभगं पुष्पधन्वनः। पतिता गोधरेऽनङ्गप्रभा क्षणमचिन्तयत् ॥२००॥ कोऽयं किमयममुक्तपुष्पचापॊ मनोभवः। किं मूर्तो गीततुष्टस्य शर्वस्यानुग्रहो मयि ॥२०१॥ इति सञ्चिन्त्य पप्रच्छ सा तं मदनमोहिता। कस्त्वं कथं वनं खेदमागतोऽस्युच्यतामिति ॥२०२॥ ततो यथागतो यः स सर्वं तस्यै शशंस तत्। स राजा तामथापृच्छत् का त्वं सुन्दरि शंस मे ॥२०३॥ यश्च सुप्तस्थितोऽत्रायमेष कः कमलानने। इति तं पृच्छन्तं च सङ्क्षेपेण जगाद सा ॥२०४॥ अहं विद्याधरी खड्गसिद्धश्चैष पतिर्मम। दृष्टमात्रे च जातास्मि सानुरागाधुना त्वयि ॥२०५॥ तदेहि तावद् गच्छावस्त्वदीयं नगरं द्रुतम्। यावत् प्रबुध्यते नायं तत्र वक्ष्यामि विस्तरात् ॥२०६॥ श्रुत्वैतत्तद्वचो राजा प्रतिपद्य तथेति सः। त्रैलोक्यराज्यसम्प्राप्तिहर्षं हरिवरो दधे ॥२०७॥ नृपमङ्के गृहीत्वैमं गन्त्वाभ्युत्पत्य खं जवात्। इत्यनङ्गप्रभा सान्तः सत्वरा समचिन्तयत् ॥२०८॥ तावच्च भ्रष्टविद्याभूवद्भर्तृद्रोहेण तेन सा। स्मरन्ती पितृशापं च विषादं सहसा ययौ ॥२०९॥ तद्दृष्ट्वा कारणं पृष्ट्वा स राजा तामभाषत। न विषादस्य कालोऽयं प्रबुध्येतैष ते पतिः ॥२१०॥ दैवायत्तं च यत्सर्वं तच्छोचितुं नार्हसि प्रिये। को हि स्वशिरसश्छायां विभेद्योत्सृजयेद् गतिम् ॥२११॥ तदेहि याम इत्युक्त्वा तां स त्वरितद्विगरम्। अङ्के हरिवरश्चक्रे राजानङ्गप्रभां द्रुतम् ॥२१२॥ ततो निधानलब्ध्येव तुष्टो गत्वा यथागतं। राजारुरोह स्वरथं स भृत्यैरभिनन्दितः ॥२१३॥ तेन स्वनगरं प्राप स नभश्शीघ्रगामिना। रथेन रमणीयुक्तः प्रजानां दत्तकौतुकः ॥२१४॥
अष्टम लम्बक ५११
[Page Header] अष्टम लम्बक ५११
[Page Body] वह अनंगप्रभा भी सुन्दर राजा को देखकर, कामदेव के बाणों का लक्ष्य बन गई और अपने मन में सोचने लगी— ॥२ ०॥ यह कौन है? क्या यह धनुषहीन कामदेव है अथवा मेरे गात्र या स्तुति से सन्तुष्ट शिव का मुझपर मूर्त्तिमान् अनुग्रह है ॥२ १॥ ऐसा सोचकर काम-मोहिता अनंगप्रभा ने उससे पूछा—'तुम कौन हो और इस वन में कैसे आये हो बताओ' ॥२ २॥ तब राजा जहाँ जैसे आया था वह सब उसे उसने बताया और राजा ने भी उससे पूछा—'सुन्दरि, तू कौन है? मुझे बता ॥२ ३॥ हे कमलनयनी यहाँ यह जो सो रहा है, यह कौन है। ऐसा पूछते हुए राजा को अनंग प्रभा ने संक्षेप में सब वृत्तान्त सुना दिया ॥२ ४॥ मैं विद्याधरी हूँ और यह खड्गसिद्ध मानव मेरा पति है। किन्तु, मैं तुम्हें देखते ही तुम्हारे प्रति अनुरागिणी हो गई हूँ। तो आओ। शीघ्र ही तुम्हारे नगर को चलें। जबतक यह जागता नहीं तबतक तुम्हें विस्तार से सब समाचार सुनाती हूँ' ॥२ ५–२ ६॥ राजा ने उसका प्रस्ताव सुनकर और उसे स्वीकार करके माना तीनों लोकों का राज्य पा लिया ॥२ ७॥ अनंगप्रभा ने राजा को गोद में रखकर, क्या वेग से आकाश में उड़ जाऊँ—ऐसा शीघ्र ही मन में सोचा ॥२ ८॥ इतने में ही वह पति-विद्रोह के कारण भ्रष्ट विद्यावाली हो गई, अर्थात् अपनी विद्याओं को भूल गई। तब पिता के शाप का स्मरण करती हुई वह अत्यन्त दुःखी हो गई ॥२ ९॥ उसे दुःखी देखकर और उसका कारण पूछकर राजा ने उससे कहा—यह शोक करने का समय नहीं है, तेरा पति जग जायगा ॥२१०॥ प्रिये यह बात तो दैवाधीन है। इस पर सोच न करो। अपने सिर की छाया और दैव की गति का कौन उल्लंघन कर सकता है? ॥२११॥ तो आओ अब चलें'—ऐसा कहकर उस पर विश्वास करती हुई अनंगप्रभा को राजा ने शीघ्रता से गोद में उठा लिया ॥२१२॥ तब माना गड़ा हुआ खजाना प्राप्त किया हुआ-सा वह राजा शीघ्र ही जाकर अपने रथ पर चढ़ गया और सेवकों ने उसका अभिनन्दन किया ॥२१३॥ वह राजा मन के समान शीघ्रगामी उस रथ से उस रमणी के साथ प्रजाओं को कौतुक देता हुआ अपनी राजधानी में जा पहुँचा ॥२१४॥
५१२ कथासरित्सागर
५१२ कथासरित्सागर स्वनामलाञ्छने तस्मिन् सोऽनङ्गप्रमया तया। सह दिव्यसुरस्तस्थौ ततो हरिवरो नृपः॥२१५॥ साप्यनङ्गप्रभा तत्रवासीत्तदनुरागिणी। विस्मृत्य स्वं प्रभावं तं सर्वं पापेविमोहिता॥२१६॥ अत्रान्तरे स तत्राद्रौ जीवदत्तो न केवलम्। प्रबुद्धो नैक्षतानङ्गप्रभां यावत् स्वमप्यसिम्॥२१७॥ क्व साऽनङ्गप्रभा कष्टं क्व स खड्गोऽपि किं नु तम्। हृत्वा गता सा किं वा तौ नीतौ द्वावपि केनचित्॥२१८॥ इत्युद्विभ्रान्तो बहून् कुर्वन् वितर्कांन् स दिनत्रयम्। गिरिं तं विचिनोति स्म दह्यमानः स्मराग्निना॥२१९॥ ततोऽश्वतीर्थं चिन्वानो वनानि दिवसान् दश। स बभ्राम न चापश्यत् तस्याः पदमपि क्वचित्॥२२०॥ हा दुर्जनविधे दुःखात् सा दत्तापि कथं त्वया। खड्गसिद्ध्या सह हृता प्रयानङ्गप्रभा मम॥२२१॥ इत्याक्रन्दन्निराहारो भ्रमन्नेकमवाप्तवान्। ग्रामं तत्र विवेशैक्रमाढ्यं द्विजगृहं च सः॥२२२॥ गृहिणी तत्र सुभगा सुवस्त्रा चोपवेश्य तम्। आसने प्रियदत्ताख्या स्वचेटीं शीघ्रमादिशत्॥२२३॥ त्वरितं जीवदत्तस्य पादौ क्षालयतास्य हि। निराहारस्य विरहाद्दिनमद्य त्रयोदशम्॥२२४॥ तच्छ्रुत्वा विस्मितो जीवदत्तोऽन्तर्विममर्श सः। इहानङ्गप्रभा प्राप्ता किं किमेषाथ योगिनी॥२२५॥ इति ध्यायन् धौतपादो भुक्तसद्दत्तभोजनः। प्रणतः प्रियदत्तां तामत्याश्चर्यां पृच्छति स्म सः॥२२६॥ एकं ब्रूहि कथं वेत्सि मद्द्वृत्तान्तमनिन्दिते। द्वितीयं चापि कथय प्रियासङ्गो क्व मे गतो॥२२७॥ तच्छ्रुत्वा तमवोचत् सा प्रियदत्ता पतिव्रता। भर्तुरन्यो न मे चित्ते स्वप्नेऽपि कुरुते पदम्॥२२८॥ पुत्रभ्रातृसमान् यान् पश्यामि पुरुषानहम्। न च मेऽनर्चितो याति क्वाप्यतिथिर्गृहात्॥२२९॥
नवम लम्बक ५१५
नवम लम्बक ५१५ राजा हरिवर, अपने नाम से ही प्रसिद्ध हरिवर नगर, में उस परम सुन्दरी दिव्य रमणी अनंगप्रभा के साथ विषय सुख प्राप्त करता हुआ रहने लगा॥२१५॥ वह अनंगप्रभा भी राजा के प्रति अनुराग रखती हुई वहीं रहने लगी किन्तु वह अपने प्रभाव को भूलकर शाप से मोहित हो गई थी॥२१६॥ इसी बीच उस पर्वत पर सोकर उठे हुए जीवदत्त ने केवल अनंगप्रभा को ही नहीं देखा यह नहीं प्रत्युत अपनी तलवार को भी उसने नहीं देखा ॥२१७॥ वह अनंगप्रभा कहाँ है वह तलवार भी कहाँ गई ? क्या अनंगप्रभा तलवार लेकर चली गई या उन दोनों को ही कोई तीसरा ले गया ? ॥२१८॥ इस प्रकार, उन्मत्त के समान विविध प्रकार की शंकाएँ करता हुआ वह जीवदत्त कामाग्नि से जलता हुआ तीन दिनों तक सारे पर्वत पर उसे ढूँढ़ता रहा॥२१९॥ तब पर्वत से उतरकर दस दिनों तक उसके नीचे वन में उसे ढूंढते हुए वह घूमता रहा किन्तु कहीं उसने उसके चरण का चिह्न भी न पाया॥२२ ॥ 'हे दुष्ट दैव अत्यन्त कठिनाई से दी हुई तूने खड्गसिद्धि के साथ मेरी प्राणप्यारी अनंगप्रभा को भी हर लिया' ॥२२१॥ इस प्रकार, रोते-कलपते और निराहार भ्रमण करते हुए उसे एक ग्राम मिला जहाँ वह एक सम्पन्न ब्राह्मण के घर में प्रविष्ट किया ॥२२२॥ उस घर में सुन्दरी और अच्छे वस्त्र पहने हुए गृहिणी प्रियदत्ता ने उसे आसन देकर बैठाया और अपनी दासियों को आज्ञा दी कि शीघ्र ही इस जीवदत्त के चरण धुलाओ। स्त्री के वियोग से निराहार रहते हुए आज इसका तेरहवां दिन है॥२२३-२२४॥ यह सुनकर जीवदत्त मन में सोचने लगा कि क्या अनंगप्रभा यहाँ आई है या यह स्त्री ही कोई योगिनी है॥२२५॥ ऐसा सोचता हुआ धुले हुए पैरोंवाला और उसके दिये हुए भोजन से तृप्त जीवदत्त ने प्रणाम करते हुए बड़ी ही दीनतापूर्वक प्रियदत्ता से पूछा—॥२२६॥ 'हे सदाचारिणी एक तो यह बताओ कि तुम मेरा वृत्तान्त कैसे जानती हो ? और, दूसरा यह बताओ कि मेरी प्रियतमा और तलवार कहाँ है ? ॥२२७॥ यह सुनकर वह पतिव्रता प्रियदत्ता उससे बोली—'पति के सिवा दूसरा पुरुष स्वप्न में भी मेरे चित्त में स्थान नहीं पाता ॥२२८॥ दूसरे पुरुषों को मैं पुत्रों और भाइया के समान समझती हूँ। मेरे घर से कोई भी अतिथि बिना सत्कार प्राप्त किये हुए वापस नहीं जा सकता ॥२२९॥ ६५