कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
५९२ कथासरित्सागर
५९२ कथासरित्सागर निशीथे च यशोवर्मा स्वप्नेऽपश्यदशङ्कितम्। प्रविष्टानत्र पुरुषान् दण्डहस्तान् भयङ्करान्॥१७९॥ धिगल्पाम्यधिकः कर्षो घृतस्य किमिति त्वया। मांसौदनश्च भुक्तोऽद्य पीतं च पयसः पलम्॥१८०॥ इति क्रोधाद् ब्रुवाणैस्तैराकृष्यैवाथ पात्यतः। पृष्ठपैरर्थवर्मा स सगूढे पर्यताड्यत॥१८१॥ घृतकर्षपयोमांसभक्तमम्यधिकं च यत्। भुक्तं तत्सर्वमुद्दरादाजकर्षुश्च तस्य ते॥१८२॥ तद्दृष्ट्वा स यशोवर्मा प्रबुद्धो यावदीक्षते। तावत्तस्याययौ शूलं विद्युत्स्पर्धमयोमयम्॥१८३॥ तत्र क्रन्दन् परिजनैर्मर्द्यमानोदरश्च सः। वमति स्मार्थवर्मा तदधिकं यत्स भुक्तवान्॥१८४॥ शान्तशूले ततस्तस्मिन्यशोवर्मा व्यचिन्तयत्। धिग्धिगर्थधियमिमां यस्या भोगोऽप्यमीदृशः॥१८५॥ भस्त्रीकृतयमीदृश्या भूमादमवनिःधियः। इत्यन्तश्चिन्तयन्सोऽत्र रात्रिं तामत्यवाहयत्॥१८६॥ प्रातस्तमर्थवर्माणमामन्त्र्य स ययौ ततः। यशोवर्मा गृहं तस्य वणिजो भोगवर्मणः॥१८७॥ सत्राभ्यागादधावत्स तेनापि च कृतादरः। निमन्त्रितोऽभूद्वणिजा सवहुर्भोजनाय सः॥१८८॥ न चास्य वणिजोऽपश्यत् स कञ्चिद्धनसञ्चयम्। अपश्यत्तु शुभं वेश्म वासांस्याभरणानि च॥१८९॥ ततः स्थिते यशोवर्म्मण्यस्मिन्प्रावर्त्ततात्र सः। भोगवर्मा वणिक्कर्त्तुं व्यवहारं निजोचितम्॥१९०॥ अमस्माद् भाण्डमादाय दशवन्धस्य तत्क्षणम्। विनेय स्वधनं मध्याहीनानुबपाणयत्॥१९१॥ त्वरितं तान् च दीनारान्भृत्यहस्तं विसृष्टवान्। स्वभार्याय विचित्रात्नपानसम्पादनाय च॥१९२॥
नवम लम्बक ५९३
नवम लम्बक ५९३ तब यशोवर्मा ने स्वप्न में देखा कि हाथों में डंडे लिए हुए कुछ भयंकर पुरुष बिना भय और शंका के वहाँ घुस आये ॥१७९॥ 'तूने आज एक तोला घी अधिक क्यों खाया मांस-रस के साथ भात अधिक क्यों खाया और दूध भी एक कटोरा अधिक क्यों पिया ?' क्रोध से ऐसा कहते हुए उन पुरुषों ने अर्थवर्मा को डंडों से खूब पीटा ॥१८०-१८१॥ और, उसने जो मांसरस भात और दूध अधिक खा लिया था उसे उन्होंने उसके पेट से निकाल लिया ॥१८२॥ स्वप्न में यह देखकर जगे हुए यशोवर्मा ने देखा कि अर्थवर्मा पेट के शूल से व्याकुल है ॥१८३॥ वेदना से चिल्लाता हुआ और सेवकों द्वारा पेट दबाया जाता हुआ अर्थवर्मा अपने अधिक खाये हुए को वमन करने लगा। उसका शूल शान्त होने पर, यशोवर्मा सोचने लगा कि इस अर्थलक्ष्मी को धिक्कार है जिसका इस प्रकार का भोग है ॥१८४-१८५॥ यदि वैश्य लक्ष्मी से ऐसे तंग किया जाता है, तो ऐसी लक्ष्मी से दरिद्र रहना ही अच्छा है, मन में इस प्रकार सोचते हुए उसने वह रात्रि व्यतीत की ॥१८६॥ प्रातःकाल यशोवर्मा अर्थवर्मा से मिलकर वहाँ से भोगवर्मा के घर पर गया ॥१८७॥ वहाँ भी भोगवर्मा द्वारा समुचित सत्कार किया गया यशोवर्मा भोगवर्मा से भोजन के लिए निमन्त्रित हुआ ॥१८८॥ उसने उस वैश्य के यहाँ किसी प्रकार की सम्पत्ति का आडम्बर नहीं देखा। केवल सुन्दर स्वच्छ भवन अच्छे वस्त्र और आभूषण मात्र देखे ॥१८९॥ तदनन्तर, यशोवर्मा की उपस्थिति में ही भोगवर्मा ने अपना दैनिक व्यापार¹ प्रारम्भ किया ॥१९०॥ एक से माल खरीदकर उसी समय उसने दूसरे को बेचिया और अपना धन बिना लगाये ही बीच में (दलाली से) दीनार कमा लिया ॥१९१॥ और, शीघ्र ही उन स्वर्ण-मुद्राओं को नौकर के हाथ अपनी स्त्री के पास भेजकर अच्छा भोजन बनाने के लिए निर्देश दिया ॥१९२॥ १ आढ़त का काम। ७५
५९४ कथासरित्सागर
५९४ कथासरित्सागर क्षणान्न्र सुहृदेकस्तमिच्छामरणनामकः । उपागत्यैव रभसाद् भोगवर्माणमभ्यधात् ॥१९३॥ मित्र भोजनमस्माकमुत्तिष्ठागच्छ भुञ्ज्महे । सुहृदो मिलिता ह्यन्ये त्वत्प्रतीक्षा स्थिता इति ॥१९४॥ अद्याहं नांगमिष्यामि प्राघुणोऽद्य स्थितो हि मे । इति ब्रुवाणं पुनरप्येनं स सुहृदब्रवीत् ॥१९५॥ भवता सममायातु तर्हि प्राघुणिकोऽप्ययम् । एषोऽपि न किमस्माकं मित्रमुत्तिष्ठ सत्वरम् ॥१९६॥ इत्याग्रहाद् भोगवर्मा नीतो मित्रेण तेन सः । यशोवर्मयुतो गत्वा भुङ्क्ते स्माहारमुत्समम् ॥१९७॥ पीत्वा च पानमागत्य सायं स स्वगृहे पुनः । सयशोवर्मको भेजे विचित्रं पानभोजनम् ॥१९८॥ प्राप्तायां निशि पप्रच्छ निजं परिजनं च सः । किमद्य रात्रिपर्याप्तमस्ति न सरकं न वा ॥१९९॥ स्वामिन्नास्तीति तेनोक्तं स भेजे शयनं वणिक् । पास्यामोऽपररात्रेश्च कथं जलमिति ब्रुवन् ॥२००॥ यशोवर्माथ तत्पार्श्वे सुप्तः स्वप्नेऽथ दृष्टवान् । प्रविष्टान् पुरुषान् क्षिप्रानन्यांस्तर्षा च पृच्छतः ॥२०१॥ कस्मादपररात्रार्थं सरकं भोगवर्मणः । चिन्तितं नाद्य युष्माभिः श्वभ्रभाङ्ग् स्थितः शठाः ॥२०२॥ इति पश्चात्प्रविष्टास्ते पुरुषा दण्डपाणयः । पूर्वप्रविष्टान् क्रोधात्तान् दण्डाघातैरताडयन् ॥२०३॥ अपराधोऽयमेको नः क्षम्यतामिति वादिनः । दण्डाहतास्ते पुरुषास्ते चाम्ये निरगुंस्ततः ॥२०४॥ यशोवर्माथ तद्द्दृष्ट्वा प्रबुद्ध्य समचिन्तयत् । अचिन्त्योपमतिः क्ष्माप्या भोगश्रीर्भोगवर्मणः ॥२०५॥ भोगहीना समुद्धापि नार्थ्यधीर्यशोवर्मणः । इति चिन्तयतस्तस्य सातिचक्रम यामिनी ॥२०६॥ प्रातश्च स यशोवर्मा तमामन्त्र्य वणिग्वरम् । जगाम विन्ध्यवासिन्याः पादमूलं पुनस्ततः ॥२०७॥
नवम लम्बक ५९५
नवम लम्बक ५९५ इतने में ही भोगवर्मा का डण्डामरण नाम का एक मित्र आकर शीघ्रता से उससे बोला— हृद्यान्न भोजन तैयार है उठो आओ। घर में और भी अनेक मित्र तुम्हारी प्रतीक्षा में बैठे हैं ।।१९२-१९४।। 'मैं आज नहीं आऊँगा क्योंकि मेरा यह मित्र पाहुना बैठा है। ऐसा कहते हुए भोगवर्मा से उसके मित्र ने कहा—‘तुम्हारे साथ तुम्हारा पाहुना भी आवे। क्या यह हमारा मित्र नहीं है ? अतः शीघ्र उठो ।।१९५ १९६।। वह मित्र इस प्रकार भोगवर्मा को आग्रह के साथ ले गया और उसने यशोवर्मा के साथ जाकर उत्तम भोजन किया ।।१९७।। तदनन्तर, उधर से ताम्बूल आदि पान करके सायंकाल भोगवर्मा अपने घर आया। घर आकर यशोवर्मा के साथ सायंकालीन भोजन किया ।।१९८।। रात होने पर उसने अपने सेवकों से पूछा कि 'आज रात्रि के लिए पूरा जल है या नहीं। 'हाँ प्रभु है'—सेवकों के इस प्रकार कहने पर वह वैश्य भोगवर्मा चारपाई पर यह कहते हुए सो गया कि देख आज पिछली रात में कैसा पानी मिलता है' ।।१९९-२००।। उसी के समीप सोये हुए यशोवर्मा ने स्वप्न में देखा कि दो-तीन पुरुष शयनागार में प्रविष्ट हुए और उन के पीछे 'हे दुष्टो आज तुम लोगों ने भोगवर्मा के लिए पिछली रात में पीने के जल का ध्यान क्यों नहीं रखा' इस प्रकार कहते हुए बहुत से दंडधारी पुरुष घुसे और उन्होंने क्रोध करके डंडों से उन सेवकों को मारा ।।२०१—२०३।। 'यह हमारा पहला अपराध है क्षमा करो'—ऐसा कहते हुए उन सेवकों को छोड़कर वे चले गये ।।२०४।। तदनन्तर, यह देखकर और जागकर यशोवर्मा ने सोचा कि बिना चिन्ता किये ही आनेवाली भोगवर्मा की भोगश्री प्रशंसनीय है ।।२०५।। अर्थ से पूर्ण होने पर भी भोग-रहित कर्मवर्मा की अर्थलक्ष्मी ठीक नहीं ऐसा सोचते-सोचते उसकी वह रात्रि व्यतीत हो गई ।।२०६।। प्रातःकाल ही यशोवर्मा वैश्य भोगवर्मा से आज्ञा लेकर वहाँ से फिर विन्ध्यवासिनी के चरणों में गया ।।२०७।।
५९६ कथासरित्सागर
५९६ कथासरित्सागर
तपस्य स्वप्नदृष्टायास्तस्याः पूर्वोक्तयोर्द्वयोः। विभोर्भोगाधियं तत्र वव्रे सास्मै ददौ च ताम् ॥२०८॥ अथागत्य यशोवर्मा गृहं देवीप्रसादतः । अचिन्तितोपगामिन्या तस्थौ भोगधिया सुखम् ॥२०९॥ तदेव भोगसम्पन्ना धीरप्यल्पतरा वरम्। न पुनर्भोगरहिता सुविस्तीर्णाप्यपार्थका ॥२१०॥ तत्किं समरखारस्य राज्ञः कार्पण्यसम्भवा। तप्यध्वे दानभोगाभ्यां वीक्ष्य स्वां श्रियं न किम् ॥२११॥ अतस्तं प्रति युष्माकमवस्कन्दो न भद्रकः । यात्राछन्नश्च नास्त्येव नापि वा दृश्यते जयः ॥२१२॥ इत्युक्ता अपि ते तेन पृच्छ ज्योतिर्विदा नृपाः । ययुस्समरखारुं तं नृपं प्रत्यसहिष्णवः ॥२१३॥ सीमाप्राप्तांश्च तान् बुद्ध्वा निर्यास्यन्समराय सः। राजा समरखारुः प्राक्स्नात्वा हरमपूजयत् ॥२१४॥ अष्टषष्ट्युत्तमस्थाननियतर्नामभिः शुभैः । यथावत्त च तुष्टाव पापघ्नैः सर्वकामदैः ॥२१५॥ राजन्युध्यस्व निश्शङ्कु शत्रूञ्जेष्यसि सङ्करे । इत्युद्गतां च गगनात्सोऽथ शुश्राव भारतीम् ॥२१६॥ ततः प्रहृष्टः सन्नह्य तेषां निजबलान्वितः । राजा समरखालोऽग्रे युद्धाय निरगाद्विषाम् ॥२१७॥ त्रिंशद् गजसहस्राणि त्रीणि लक्षाणि वाजिनाम् । कोटिः पादातटानां च तस्यासीद्वैरिणो बले ॥२१८॥ स्वबले च पदातीनां तस्य लक्षाणि विंशतिः । दश दन्तिसहस्राणि हयानां लक्षमप्यभूत् ॥२१९॥ प्रवृत्तं तु महायुद्धं तयोरुभयसेनयोः । यथार्थनाम्नि वीराख्ये प्रतीहारश्रियामयिनि ॥२२०॥ स्वयं समरवालोऽसौ राजा वहन्मराङ्गजम् ॥ महावगाहो भगवा महानद्यमिवाविशत् ॥२२१॥ मग्नः क्षात्र्यर्मन्मार्गेऽपि परसैन्यं महत्क्षणात् । यघाश्वगजपत्तीनां हयानां राजन्नोऽभवत् ॥२२२॥
नवम लम्बक ५९७
[header] नवम लम्बक ५९७ [/header] वहाँ तपस्या में बैठे हुए यशोवर्मा ने स्वप्न में आई हुई विन्ध्यवासिनी से भोग-श्री की प्राप्ति के लिए वर माँगा और उसने वही दिया ॥२८८॥ तदनन्तर, यशोवर्मा देवी की कृपा से घर में जाकर बिना मोक्ष ही प्राप्त होनेवाली भोग-श्री से सुखपूर्वक रहने लगा ॥२८९॥ इस प्रकार, भोग से सम्पन्न थोड़ी भी श्री अच्छी है और भोगरहित अनन्त ऋद्धि भी व्यर्थ है ॥२९०॥ इसलिए, तुम लोग राजा समरबल की कृपणता से युक्त लक्ष्मी से क्यों ईर्ष्या करते हो? दान और भोग में लगती हुई अपनी सम्पत्ति को ही क्यों नहीं देखते? ॥२९१॥ इसलिए, उसके प्रति तुम्हारा आक्रमण ठीक नहीं। यात्रा का लग्न भी ठीक नहीं है और तुम्हारी विजय भी नहीं दीखती ॥२९२॥ उस ज्योतिषी से इस प्रकार कहे जाने पर भी वे पाँचों ईर्ष्यालु राजाओं ने नहीं माना और उन्होंने समरबल पर चढ़ाई कर दी ॥२९३॥ शत्रुओं को सीमा पर गये हुए जानकर युद्ध के लिए निकलते हुए समरबल ने स्नान करके शिव की पूजा की ॥२९४॥ अनन्तर उसने स्वाता के प्रसिद्ध मार्ग से उसने विधिपूर्वक पापहरूप करनेवाले शिव की स्तुति की ॥२९५॥ तब उसने 'हे राजन् बिना शंका के जाकर युद्ध करो शत्रुओं पर अवश्य विजयी होगे'— 'इस प्रकार आकाशवाणी सुनी ॥२९६॥ तब प्रसन्न होकर और अपनी सेना का साथ लेकर राजा समरबल उन शत्रुओं के साथ भिड़ा ॥२९७॥ उसके शत्रुओं की सेना में तीन हजार हाथी तीन लाख घोड़े और एक करोड़ पैदल सैनिक थे ॥२९८॥ उसकी अपनी सेना में बीस लाख पैदल सैनिक दस हजार हाथी और एक लाख घोड़े थे ॥२९९॥ दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध प्रारम्भ होने पर राजा का वीर नाम का अंगरक्षक आगे बढ़ा। तदनन्तर राजा समरबल भी समुद्र में महावराह के समान स्वयं भी उस सेना में धँस पड़ा ॥३००-३०१॥ थोड़ी सेनावाला होने पर भी समरबल ने शत्रुओं की सेना का खूब संहार किया जिससे हाथियों, घोड़ों और सैनिकों की लाशों के ढेर लग गये ॥३०२॥
५१८ कथासरित्सागर
५१८ कथासरित्सागर
धावित्वा चात्र समरबलं तं सम्मुखागतम्। आहत्य शक्त्या राजानं पाशेनाकृष्य बद्धवान्॥२२३॥ ततं समरशूरं च भुवि बाणाहतं नृपम्। द्वितीयं तद्वदाकृष्य पाशेनैव बबन्ध सः॥२२४॥ तृतीयं चात्र समरक्षितं नाम महीपतिम्। वीराख्यस्तत्प्रतीहारो बद्ध्वा तत्पार्श्वमानयत्॥२२५॥ सेनापतिर्देवबलस्तस्यान्यं समर्पयत्। नृपं प्रतापचन्द्राख्यं चतुर्थ सायकाहतम्॥२२६॥ ततः प्रतापसेनाख्यस्तद्दृष्ट्वा पञ्चमो नृपः। क्रोधाच्चमरवालं तं भूपमभ्यपतद्रणे॥२२७॥ स तु निर्धूय तद् बाणान् स्वशरीरेण विद्धवान्। राजा चमरवालस्तं ललाटे त्रिभिराशुगैः॥२२८॥ कण्ठक्षिप्तन पाशेन तं च काल इवाथ सः। आकृष्य स्ववशे चक्रे शराघातविमूर्च्छितम्॥२२९॥ एवं राजसु बद्धेषु तेषु पञ्चस्वपि क्रमात्। हतशेषाणि सैन्यानि दिक्ष्वस्तेषां प्रदुद्रुवुः॥२३०॥ अमितं हेमरत्नादि बहून्यन्तःपुराणि च। राज्ञा चमरबालेन प्राप्तान्येषां महीभुजाम्॥२३१॥ तन्मध्ये च महादेवी यशोल्लेखेति विश्रुता। राज्ञः प्रतापसेनस्य प्राप्ता तेनाङ्गनोत्तमा॥२३२॥ ततः प्रविश्य नगरं वीरब्देवबलौ च सः। क्षत्त्रसेनापती पट्टं बद्ध्वा रत्नैर्पूरयत्॥२३३॥ प्रतापसेनमहिषीं दाशभ्रमजितेति ताम्। यशोल्लेखां स भूपतिः स्वावरोधवधूं व्यधात्॥२३४॥ भुजार्जिताहमस्येति मोहे मां न्यपत्तापि यम्। काममोहप्रवृत्तानां शबला धर्मबासना॥२३५॥ दिनेश्चाभ्यर्थितो राज्ञ्या स यशोलेखया तया। राजा चमरवालस्तान् बद्धान् पञ्चापि भूपतीन्॥२३६॥ प्रतापसेनप्रभृतीन्गृहीतविनयादृतान् । मुमोच निजराज्येषु सस्कृत्य विससर्ज च॥२३७॥
नवम लम्बक ५९९
नवम लम्बक ५९९ तब राजा ने आगे दौड़कर सामने आये हुए समरबल को शक्ति से आहत करके पाश से खींचकर बाँध लिया ॥२२३॥ उसी प्रकार दूसरे समरशूर राजा के हृदय को बाण से बींधकर वैसे ही बाँध लिया ॥२२४॥ तीसरे राजा समरजित को उसके अंगरक्षक वीर ने बाँधकर उसके पास लाकर सौंप दिया ॥२२५॥ समरबाल के सेनापति देवबल ने इसी प्रकार बाणों से आहत चौथे राजा प्रतापचन्द्र को बाँधकर अपने राजा को भेंट कर दिया ॥२२६॥ यह देखकर प्रतापसेन नाम का पाँचवाँ राजा क्रोध से भरकर रणभूमि में समरबाल से भिड़ गया ॥२२७॥ समरबाल ने उसके बाणों को काटकर तीन बाणों से उसके ललाट का भेदन कर दिया ॥२२८॥ और फिर, गले में डाले हुए पाश से काल के समान समरबाल ने उसे खींचकर अपने वश में कर लिया ॥२२९॥ इस प्रकार, क्रम से उन पाँचों राजाओं के बँध जाने पर मरण से बची हुई उसकी सेना इधर-उधर भाग गई ॥ २३० ॥ तदनन्तर, इन राजाओं के अनन्त धन, रत्न और सोना के अतिरिक्त बहुत-सी रानियाँ समरबाल को मिलीं। उन सब रानियों में राजा प्रतापसेन की महारानी यशोधेखा सबसे बड़ी और सुन्दरी थी ॥२३१-२३२॥ तदनन्तर, अंगरक्षक वीर, सेनापति देवबल और राजा समरबाल विजय करके अपने नगर में पहुँचे। वहाँ जाकर राजा ने अपने सेनापति और अंगरक्षक को पट्ट बाँध करके उन्हें रत्नों से भर दिया ॥२३३॥ राजा समरबाल ने प्रतापसेन की महारानी यशोधेखा को क्षात्र धर्म से जीत लेने के कारण अपने अन्तःपुर की एक रानी बना लिया ॥२३४॥ 'मैं इसके बाहुबल से जीती गई हूँ'—ऐसा समझकर वह रानी यशोधेखा चंचल होकर भी राजा समरबाल के पास स्थिर हो गई। काम और मोह से प्रवृत्त स्त्रियों की सर्व भावना विचित्र होती है ॥२३५॥ कुछ दिनों के बाद रानी यशोलेखा की प्रार्थना पर समरबाल ने प्रतापसेन आदि विनय से विनम्र उन पाँचों राजाओं को छोड़ दिया और उनका सत्कार करके उन्हें अपने-अपने राज्य में भेज दिया ॥२३६-२३७॥
कथासरित्सागर
कथासरित्सागर ततः स तदकण्टक विजितशत्रु राज्यं निजं समृद्धमशिषच्चिरं समरवालपृथ्वीपतिः। अरंस्त च वराप्सरोम्यधिकरूपलावण्यया द्विपञ्जयपताकया सह समा यशोलेख्या ॥२३८॥ एवं बहूनपि रिपून् रभसप्रवृत्तान्द्राक्कुलानगणितस्वपरस्वरूपान्। एकोऽप्यनन्तमपौरुषभग्नसारदर्पम्वराञ्जयति सयुगमूर्ध्नि वीरः ॥२३९॥ इति गोमुखेन कथितामथ्यां श्रुत्वा कथां कृतश्लाघः। अकरोदथ नरवाहनदत्तः स्नानादि दिनकार्यम् ॥२४०॥ निनाय सङ्गीतरसाञ्च तां तथा निशां स गायन्स्वयमङ्गनासखः। सरस्वती तस्य नभःस्थिता यथा ददौ प्रियाभिश्चिरसंस्तवं वरम् ॥२४१॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरेऽलङ्कारवतीकम्बके चतुर्थस्तरङ्गः।
पञ्चमस्तरङ्गः मरुभूति कथा
ततोऽन्येद्युरलङ्कारवतीवासगृहे स्थितम्। नरवाहनदत्तं तं सन्निधौ सर्वमन्त्रिणाम् ॥१॥ एत्य विज्ञापयामास मरुभूतिस्तसेवकः। सोऽयं सौबिदलस्य सदन्तःपुररक्षिणः ॥२॥ मरुभूतेर्मया देव ! सेवा वर्षद्वयं कृता। भोजनाच्छादनं दत्तं समायेस्यामुना मम ॥३॥ भाषापितास्तु तत्पृष्ठे दीनाराः प्रतिवत्सरम्। पञ्चाशद्य ममानेन तानेष न ददाति मे ॥४॥ मुच्यमाणं चतन्नरत्वमाहूमाहूतं। तनोऽविष्टः प्रायद्धू सिंहद्वारेऽस्य तावकः ॥५॥ विचार्यति यत्रात्र देवो मे तत्करोम्यहम्। अग्निप्रवेशमधिकं विकल्प्यप हि मे प्रभुः ॥६॥
नवम लम्बक ६१
नवम लम्बक ६१ तदनन्तर शत्रुओं पर विजयी हुए राजा समरबल अपनी उस कंटक-रहित और समृद्धि- सम्पन्न राज्य का चिरकाल तक शासन करता रहा और अप्सराओं से भी अधिक रूप-लावण्यवाली विजय-पताका के समान यशोलेखा के साथ आनन्द भी उठाया ॥२३८॥ इस प्रकार, आवेग से प्रवृत्त द्वेष से व्याकुल और अपने-पराये स्वरूप को न जाननेवालों और असाधारण पुरुषार्थ के आगे चूर-चूर घमंडवालों को नीचक और पुंश्चल जीत लेता है ॥२३९॥ इस प्रकार गोमुख से कही गई यथार्थता से भरी कथा को सुनकर उसकी प्रशंसा करता हुआ नरवाहनदत्त अपने स्नान आदि दैनिक कृत्यों में लग गया ॥२४०॥ नरवाहनदत्त ने अपनी सभी पत्नियों के साथ संगीत-रस का पान करते हुए उस रात को भी बिताया। आकाश में गूँजती हुई उनकी स्वर-सरस्वती 'चिरजीवी हों' मानों ऐसा आशीर्वाद देती थी ॥२४१॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के अलंकारवती लम्बक का चौथा तरंग समाप्त पञ्चम तरंग मरुभूति की कथा किसी एक दिन अलंकारवती के निवास-भवन में बैठे हुए नरवाहनदत्त के पास सभी मन्त्रियों की उपस्थिति में आकर मरुभूति के सेवक ने निवेदन किया। वह सेवक राजा के रनिवास के रक्षक कंचुकी का सहोदर भाई था ॥१-२॥ उसने कहा- महाराज मैंने दो वर्षों तक मरुभूति की सेवा की और इसने उन दो वर्षों तक तात्त्विक मुझे भोजन-वस्त्र दिया ॥३॥ इसने कहा था कि प्रतिवर्ष तुम पचास दीनार (सोने की मुहरें) दिया करूँगा किन्तु इसने वे मुझे नहीं दिये ॥४॥ मेरे माँगने पर इसने मुझे पैरों से ठोकर मारी इसलिए मैं आपके सिंहद्वार पर अनशन करने के लिए बैठा हूँ। यदि आप मेरा विचार न करेंगे तो मैं अग्नि प्रवेश करूँगा क्योंकि यह मेरा स्वामी है ॥५-६॥ ७६
६२ कथासरित्सागर
६२ कथासरित्सागर
इत्युक्त्वा विरतं तस्मिन् मरुभूतिरभाषत । देया ममास्मै दीनाराः साम्प्रतं तु न सन्ति मे ॥७॥ इत्युक्तवन्तं सर्वेषु प्रहसत्सु स्वमन्त्रिणम् । नरवाहनदत्तस्तं मरुभूतिमभाषत ॥८॥ किमेवं मूर्खमाधत्से नाधिकेयं मतिस्तव । उत्तिष्ठ दीनारशतं दद्यास्मा अविशङ्कितम् ॥९॥ एतत्प्रभोर्वचः श्रुत्वा मरुभूतिर्विलज्जितः । तदैवानीय दत्तस्मै स दीनारशतं ददौ ॥१०॥ ततोऽत्र गोमुखोऽवादीन्न वाच्या मरुभूतिवत् । विचित्रचित्तवृत्तिर्यत् सर्गो देव प्रजापतेः ॥११॥ युष्माभिरेषा किञ्चात्र चिरदातुर्महीपतेः । तत्सेवकस्य च कथा प्रसङ्गाख्यस्य न श्रुता ॥१२॥
चिरदातुर्नृपस्य तद्भृत्यस्य प्रसङ्गाख्यस्य च कथा
चिरदातेत्यभूत् पूर्वं राजा चिरपुरेश्वरः । सुजनस्यापि तस्यासीत् परिवारोऽतिदुर्जनः ॥१३॥ देशान्तरागतस्तस्य प्रसङ्गो नाम भूपतेः । मित्राभ्यां सहितो द्वाभ्यां बभूव किल सेवकः ॥१४॥ सेवां च कुर्वतस्तस्य व्यतीतं वर्षपञ्चकम् । न स राजा ददौ किञ्चिन्निमित्तेऽप्युत्सवादिके ॥१५॥ स च तस्य न सम्प्राप विज्ञप्त्यवसरं प्रभोः । परिवारस्य दौरात्म्यात् सख्योः प्रेरयतोः सदा ॥१६॥ एकदा तस्य राज्ञश्च बालः पुत्रो व्यपद्यत । दुःखितं यस्य सर्वेऽपि भृत्यास्तं पर्यवारयन् ॥१७॥ तन्मध्यं च प्रसङ्गाख्यः शोकादेव स सेवकः । शस्त्रिभ्यां वार्यमाणोऽपि राजानं तं व्यजिज्ञपत् ॥१८॥ बहुकालं वय देव सेवका न च नस्त्वया । दत्तं किञ्चित्तथापीह स्थिता स्मस्त्वत्सुताशया ॥१९॥ त्वया यदि न दत्तं तत्स्वपुत्रोऽस्मासु दास्यति । सोऽपि दैवेन नीतश्चेत् तन्न किञ्चिदिह साम्प्रतम् ॥२०॥
नवम लम्बक ६३
नवम लम्बक ६३ इतना कहकर उसके चुप हो जाने पर मरुभूति ने कहा—'महाराज मुझे इसे दीनार देने हैं, किन्तु इस समय मेरे पास नहीं हैं। मरुभूति के इस प्रकार कहने पर और अन्य सभी मन्त्रियों के हँसने पर नरवाहनदत्त ने मरुभूति से कहा—'यह क्या तुम्हारी मूर्खता है? तुम्हारी ऐसी बुद्धि अच्छी नहीं है। जाओ इसे तुरन्त दीनार दो' ॥७-९॥ स्वामी की यह बात सुनकर मरुभूति लज्जित हुआ और उसने उसी समय लाकर सौ दीनार उसे दिये ॥१०॥ तब गोमुख ने कहा— इस सम्बन्ध में मरुभूति निन्दनीय नहीं हो सकता क्योंकि यह ब्रह्मा की सृष्टि ही विचित्र चित्तवृत्तियों की है ॥११॥ आप लोगों ने विलम्ब से वेतन देनेवाले राजा और उसके सेवक के प्रसंग की कथा नहीं सुनी? ॥१२॥ राजा चिरदाता और उसके प्रसंग नामक भृत्य की कथा पूर्वकाल में चिरपुर नगर का राजा विलम्ब से वेतन देनेवाला था। उसके स्वयं सज्जन होने पर भी उसका परिवार अत्यन्त दुष्ट था ॥१३॥ किसी दूसरे देश से आकर प्रसंग नाम का सेवक अपने दो मित्रों के साथ उस राजा के यहाँ आकर सेवा करने लगा ॥१४॥ सेवा करते हुए उसके पाँच वर्ष व्यतीत हो गये किन्तु राजा ने उत्सव त्यौहार आदि के समय भी उसे कुछ नहीं दिया। उस सेवक का दोनों साथियों के प्रेरित करने पर भी अन्य अधिकारियों की दुष्टता के कारण अपने स्वामी से निवेदन करने का अवसर नहीं मिला ॥१५-१६॥ एकबार उस राजा का छोटा-सा पुत्र मर गया। उस समय दुःखित राजा का सभी नौकरों ने आकर घेर लिया ॥१७॥ उसी समय वह प्रसंग नामक सेवक साथियों के रोक जाने पर भी शोक के आवेश में राजा से बोला—॥१८॥ 'स्वामिन् ! हमलोग बहुत समय से सेवक हैं किन्तु आपने कभी हम कुछ नहीं दिया। फिर भी हमलोग आपके इस पुत्र की आशा से आश्वासित रहते थे कि यदि आपने हम कभी कुछ नहीं दिया तो यह हम लोगों को देगा पर उसे भी इस दैव ने ले लिया तब यहाँ अब हमारा क्या रह गया ? ॥१९-२०॥
६४ कथासरित्सागर
६४ कथासरित्सागर
व्रजाम इति जल्पित्वा पतित्वा सोऽस्य पादयोः। राज्ञः प्रसङ्गतो निरगात् मन्त्रिद्वययुतस्ततः ॥२१॥ महो पुत्रेष्वपि बद्धास्था सेवका मे दृढा इमे। सर्वत ममन त्याज्या इति सञ्चिन्त्य तत्क्षणम्॥२२॥ स राजा तान् प्रसङ्गादीनानाय्यैव तथा धनैः। अपूरयद्यथा भूयो नतान् दारिद्र्यमस्पृशत्॥२३॥ एवं विचित्रा दृश्यन्त स्वभावा देव वहिनाम्। यत्कार्ये स नृपो नादावकाल तु ददौ तथा॥२४॥ इत्याख्याय कथास्थानपटुर्भूयः स गोमुखः। वत्सेश्वरसुतादेशादिमामक्कथयत्कथाम् ॥२५॥
राज्ञः कनकवर्षस्य कथा
आसीद् गङ्गातटे पूर्व पूतपौरं तदम्बुभिः। सौराज्यरम्यं कनकपुराख्यं नगरोत्तमम्॥२६॥ यत्र बन्धः कविगिरां छव पत्रेष्वदृश्यत। भङ्गोऽलकेषु नारीणां सम्यक्संग्रहणे खलः॥२७॥ तत्र वासुकिनागेन्द्रतनयात् प्रियदर्शनात्। जाता यशोधराख्यायां राजपुत्र्यां महायशाः॥२८॥ आसीत् कनकवर्षाख्यो नगरे नृपतिः पुरा। हरत्नभूभारवोढापि योऽशेषगुणभूषितः॥२९॥ मुग्धो यशसि न त्वर्थे भीतः पापान्न शत्रुतः। मूर्खः परापवादेषु न च शास्त्रेषु योऽभवत्॥३०॥ अल्पस्य यस्य कोपोऽभून्न प्रसादः महार्घ्यतः। चापे च बद्धमुष्टित्वं न दाने धीरचेतसः॥३१॥ यमात्यदम्भुसम्पन्नं रक्षता चाखिलं जगत्। मारव्यथाकुलं चक्र दृष्टेनैवावलाजनः॥३२॥
१ काव्येष्वेव गोमूत्रिकाकमलादयो बन्धा दृश्यन्ते स्मतापराधिनां बान्धवमभूत्। राज्येऽपराधाभावात्। २ खलः -यत्र ह्वलंकैस्तरंतंगृहः क्रियते क्षेत्रादानीप। अन्यत्र खतो दुर्जनं मूर्तः। ३ अनिर्णीतव्येति भावः।
मदन मञ्चुक ६५ हम सब जाते हैं। ऐसा कहकर और राजा के पैरों में पड़कर वह प्रसंग अपने दोनों साथिया के साथ निकलकर चला गया ॥२१॥ ओह ! ये मेरे सेवक मेरे पुत्र पर भी आशा बाँध हुए थे अतः इन्हें न छोड़ना चाहिए, इस प्रकार राजा उसी समय सोचने लगा ॥२२॥ और, उन प्रसंग आदि सेवकों को बुलाकर उसने धन से इतना भर दिया कि फिर उन्हें दरिद्रता ने कभी छुआ तक नहीं ॥२३॥ महाराज ! मनुष्यों के इस प्रकार विचित्र स्वभाव देखे जाते हैं कि राजा ने उत्सव आदिदान के अवसरों पर तो उन सेवकों को कुछ नहीं दिया किन्तु पुत्र-शोक के समय उन्हें धन से इस प्रकार परिपूर्ण कर दिया ॥२४॥ ऐसा कहकर, कथा कहने में कुशल गोमुख ने वत्सराज के पुत्र की आज्ञा से दूसरी कथा आरम्भ की ॥२५॥ राजा कनकवर्ण की कथा प्राचीन काल में गंगा के तट पर गंगाजल से पवित्र नाभरिकोंवाला कनकपुर नाम का एक उत्तम नगर था ॥२६॥ उस नगर में यदि बन्ध था तो कवियों की वाणी में नियम और चरित्र में नहीं। यदि छेदन था तो मञ्जर (मत्स्यन्दकार आदि) के पत्तों में छिद्र और वृत्ति में नहीं भंग था। तो नारियों के केशों में बन्धन या प्रतिज्ञा में नहीं। खल (खलिहान) धान्यों के संग्रह के लिए थ जगता में नहीं ॥२७॥ उस नगर का राजा कनकवर्ण महायशस्वी था जो नागराज वासुकि के पुत्र राजा प्रियदर्शन से यशोधरा नाम की राजकुमारी से उत्पन्न हुआ था और जो समस्त भूमि के भार को वहन करते हुए भी अ-शेष (समस्त गुणों से भूषित) था ॥२८-२९॥ राजा कनकवर्ण यश का लोभी था धन का नहीं पाप से डरता था शत्रुओ से नहीं दूसरो की निन्दा करने मे मूर्ख था शास्त्रो में नहीं ॥३०॥ जिस महात्मा राजा के हाथ में अन्यता थी प्रगल्भता में नहीं और जिसकी मुट्ठी धनुष में बँधी रहती थी दान में नहीं ॥३१॥ जिस आश्चर्यजनक सौन्दर्यशाली और संसार की रक्षा करनेवाले राजा के देखने मात्र से सुन्दरियां काम-वेदना से विह्वल हो जाती थीं ॥३२॥
६६ कथासरित्सागर
६६ कथासरित्सागर स कदाचिच्छरत्काले सोष्मप्युन्मदवारणः। राजहंसपरीवारे सोत्सवानन्दितप्रजे ॥३३॥ आत्मतुल्यगुणं रन्तुं चित्रप्रासादमविशत्। आकृष्टपद्मदामोदवहन्मारुतशीतलम् ॥३४॥ तत्र निर्वर्णयन् यावत्तच्चित्रं स प्रशसति। तावत् प्रविश्य भूपं तं प्रतीहारो व्यजिज्ञपत् ॥३५॥ इहागतो निवर्त्तेभ्योऽपूर्वश्चित्रकरः प्रभो। अनन्यसममात्मानं चित्रकर्मण्युदाहरन् ॥३६॥ रोलदेवाभिधानेन सिंहद्वारेऽत्र तेन च। एतदेवाभिलिख्याद्य चीरिकोल्लम्बिता१ किल ॥३७॥ तच्छ्रुत्त्वादराद् भूपेनादिष्टानयनः स तम्। आनिनाय प्रतीहारो गत्वा चित्रकरं क्षणात् ॥३८॥ स प्रविश्य ददर्शात्र चित्रावलोकनलीलया। स्थितं कनकवर्णं तं नृपं चित्रकरो रहः ॥३९॥ वरनारीकुचासङ्गसमर्पिततनूभरम् । सहेलोदञ्चितकरोपात्तताम्बूलवीटिकम् ॥४०॥ प्रणम्य चोपविष्टस्तं राजानं विहितादरम्। शनैर्विज्ञापयामास रोलदेवः स चित्रकृत् ॥४१॥ चीरिकोल्लम्बिता यद्यत् त्वत्पादाब्जदिदृक्षया। मया न विज्ञानमदात् तत्क्षन्तव्यमिदं मम ॥४२॥ आदिश्यतां च चित्रं किमालिखामीह रूपकम्। भवत्प्रत्यक्षतादिशायत्नो मे सफलो प्रभो ॥४३॥ इति चित्रकरोक्ते स राजा निजगाद तम्। उपाध्याय यथाकामं किञ्चिन्नालिख्यतां त्वया ॥४४॥ ह्लाद्यामो वयं यद्यद्भ्रान्तिस्तत्त्वोपगते तु का। इत्युक्तं तेन राज्ञाऽत्र तत्पार्श्वस्था बभाषिरे ॥४५॥ राज्ञोऽविकलतामन्यैरित्थं प्रोक्ते किं प्रयोजनम्। तच्छ्रुत्वा चित्रकृत् प्रा तं राजानमालिखत् ॥४६॥ १ पुरातने विज्ञापनार्थं पटे विलिख्य लम्ब्यते स्म। साम्प्रतं साईनबोर्ड 'बोलर' इत्यादि कथ्यते।
नवम लम्बक ६७
नवम लम्बक ६७ वह राजा कनकवर्ष एक समय जब प्रकृति में कुछ ऊष्मा रहती है हाथी मदोन्मत्त हो जाते हैं, राजहंसों के परिवार, अपनी प्रसन्नता से प्रजाजनों को आनन्दित करते रहते हैं ऐसे अपने गुणों के समान गुणवाले शरत्काल में विहार करने के लिए चित्र-मण्डप में गया जो कमल के पराग से सुगन्धित और शीतल वायु से रमणीय हो रहा था ।।३३-३४।। उस चित्र-भवन में राजा जबतक एक चित्र को भली भाँति देखकर उसकी प्रशंसा कर रहा था तबतक द्वारपाल ने आकर निवेदन किया— 'महाराज विदर्भ देश से एक चित्रकार यहाँ आया है वह चित्रकला में अपने को अद्वितीय कुशल बताता है ।।३५ ३६।। उस रोलदेव नामक चित्रकार ने राजभवन के द्वार पर चित्रपट में एक चित्र बनाकर लटका रखा है।।३७।। यह सुनकर राजा ने आदर के साथ उसे बुलाने के लिए आदेश दिया और द्वारपाल भी क्षण-भर में उस चित्रकार को लेकर वहाँ उपस्थित हो गया ।।३८।। उस चित्रकार ने चित्र-भवन में प्रवेश करके चित्रों को देखने के विनोद में लगे हुए राजा कनकवर्ष को एकान्त में देखा ।।३९।। तदनन्तर, सुन्दरी स्त्री के कुचों के बीच शरीर का भार दिये हुए, आसन पर बैठे हुए और हाथ में पान का बीड़ा उठाये हुए राजा से उस चित्रकार रोलदेव ने नम्रतापूर्वक निवेदन किया।।४०-४१।। महाराज मैंने आपके चरण-कमलों के दर्शन के लिए राजद्वार पर एक चित्र लटका रखा था न कि अपने कौशल के घमंड से। आप आज्ञा दें कि चित्र में किसका रूप अंकित करूँ जिससे चित्रकला सीखने का मेरा यत्न सफल हो ।।४२ ४३।। चित्रकार के ऐसा कहने पर राजा ने उससे कहा-हे उपाध्याय जो तुम्हारी इच्छा हो लिखो। हमें तो अपनी आँखों को आनन्दित करना है। तुम्हारी कुशलता में सन्देह ही क्या है। राजा के इस प्रकार कहने पर उनके समीप बैठे (दरबारी) लोग कहने लगे-'तुम राजा का ही चित्र बनाओ। अन्य किसी विरूप का चित्र बनाने से क्या काम ? यह सुनकर सन्तुष्ट चित्रकार ने पट पर राजा का चित्र बनाया ।।४४-४५।।
तुङ्गेन नासावंशेन दीर्घरक्तेन चक्षुषा। विपुलेन ललाटेन कुन्तलैः कुञ्चितासितैः ॥४७॥ विस्तीर्णेनोरसा रुद्धबाणाविव्रणशोभिना। भुजयुग्मेन दिग्वन्तिकराकारेण हारिणा ॥४८॥ मध्येन मुष्टिमेयेन केसरीन्द्रकिशोरवत्। उपायनीकृतेनेव पराक्रमपराजितैः ॥४९॥ यौवनद्विरदालानानिरुतेनोरुयुगेन च। अशोकपल्लवनिभनाङ्घ्रिद्वययुग्मेन चारुणा ॥५०॥ दृष्ट्वैव स्वानुरूपेण रूपेणालिखितं नृपम्। साधुवादं ददुः सर्वे तस्य चित्रकृतस्तदा ॥५१॥ जगदुस्तं च नेच्छामो द्रष्टुमेकाकिनं प्रभुम्। चित्रभित्तौ तदेतस्यामेतास्वालिखितास्विह ॥५२॥ राज्ञीषु मध्यादेकां स्वं सुविधायोनुरूपिकाम्। स्निग्धोपाध्याय पार्श्वस्थ पूर्णो नेत्रोत्सवोऽस्तु नः ॥५३॥ तच्छ्रुत्वा स विलोक्यात्र चित्रं चित्रकरोऽब्रवीत्। भूयसीष्वपि नैतासु तुल्या राज्ञोऽस्ति काचन ॥५४॥ [L17: जाने च पृथ्व्यामेवास्य तुल्यरूपान्ति नाङ्गना। अस्त्येक राजपुत्री तु शृणुताख्यामि तां च वः ॥५५॥ विश्वम्भवस्ति नगरं धीमत्कुण्डिनमञ्चपम्। दृढशक्तिरिति ख्यातस्तत्रास्ति च महीपतिः ॥५६॥ तस्यानङ्गवतीत्यस्ति राज्ञी प्राणाधिकप्रिया। तस्यां तस्य सुतोत्पन्ना नाम्ना मदनसुन्दरी ॥५७॥ यस्या वर्णयितुं रूपमस्या जिह्वाऽनया। मत्ता च प्रगल्भेत किं स्वेतावद्वाग्यहम् ॥५८॥ तां निर्भाय विधिर्मन्ये गच्छातच्छाऽपि सङ्गात्। निर्मान्तुमया तन्वी युगरपि न शक्ष्यति ॥५९॥ तेवान्य राज गेहेशी पृथिव्यां राजकन्यका। रूपलावण्यविनयैर्यया च तुलनं यः ॥६०॥ अतः तया हि तत्रत्यः कदाचित् प्रप्य पत्रिकांम्। आन्तोन्तःपुरं गत्वा राजपुत्र्या गतोऽभवम् ॥६१॥
नवम लम्बक ६१
नवम लम्बक ६१ चित्रकार ने राजा के शरीर के अनुसार उसकी उठी हुई साफ बनाई लम्बी और साफ बाँहें ऊँचा और चौड़ा ललाट तथा घुँघराले कच बनाये। चौड़ी छाती बनाई जिसमें बाण आदि शस्त्रों के घाव स्पष्ट दीख रहे थे। दिग्गजों की सूँडों के समान उसने सुन्दर भुजाएँ बनाईं ॥४७-४८॥ कमर इस प्रकार पतली बनाई मानों सिंह-शावकों ने (राजा के पराक्रम से) पराजित होकर उपहार-स्वरूप भेंट कर दी हो। जवान हाथियों के बाँधने के निमित्त बने खम्भों की तरह पतली जांघें बनाई और अशोक के नये पत्तों के समान सुन्दर दोनों पैर बनाये ॥४९-५०॥ सामने ही राजा के सर्वथा अनुरूप चित्र को बने देखकर सभी लोग उस चित्रकार को धन्यवाद देने लगे ॥५१॥ और बोले—हम अकेले राजा का देखकर सन्तोष नहीं है। इसलिए दीवार में चित्रित इन रानियों में से किसी एक का चित्र राजा के साथ बनाओ। जिससे हमारी आँख को आनन्द मिले' ॥५२ ५३॥ यह सुनकर और दीवार पर चित्रित रानियों के चित्रों को देखकर चित्रकार ने कहा- इन रानियों में राजा के समान रूपवाली एक भी रानी नहीं है ॥५४॥ मैं समझता हूँ कि सारे भूमण्डल में राजा के समान रूपवाली सुन्दरी स्त्री है ही नहीं। हाँ एक राजकुमारी है सुनिए, मैं बताता हूँ —॥५५॥ विदर्भ देश में कुण्डिनपुर नाम का एक सम्पन्न नगर है वहाँ पर रुक्मरुचि नाम से प्रसिद्ध एक राजा है ॥५६॥ उसकी प्राणों से भी प्यारी अनंगमंजरी नाम की रानी है। उस रानी से राजा से उत्पन्न मदनसुन्दरी नाम की कन्या है। एक ही जिह्वा से उसके सौन्दर्य का वर्णन करने के लिए मेरे जैसा व्यक्ति समर्थ नहीं है। फिर भी मैं इतना ही कहता हूँ कि ब्रह्मा उसे बनाकर अब पुनः इच्छा होने पर भी यथा शक ऐसी सुन्दरी को नहीं बना सकता ॥५७—५८॥ सारी पृथ्वी में वही एक इस राजा के सदृश सुन्दरी कन्या है। रूप लावण्य अवस्था कुल आदि सभी में वह इस राजा के उपयुक्त है ॥५९॥ एक बार वहाँ रहते हुए मैं दाइयों द्वारा बुलाये जाने पर उनके रनिवास में गया था ॥६१॥ ७३
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तत्रापश्यमहं तां च चन्दनाद्र्रविलेपनाम्। मृणालहारां बिसिनीपत्रशय्याविवर्त्तिनीम् ॥६२॥ कदलीपत्रपवनैर्वीज्यमानां सखीजनैः। पाण्डक्षामामभिव्यक्तस्मरज्वरलक्षणाम् ॥६३॥ हे सख्यश्चन्दनालेपकदलीदलमारुतैः । कृतमभिः किमेतेन विफलेन श्रमेण वः॥६४॥ एते हि मन्दपुण्यां मां दहन्ति शिशिरा अपि। एवं निवारयन्तीं च सखीराश्वासनाकुलाः॥६५॥ विलोक्य तदवस्थां तां तद्वितर्कसमाकुलः। कृतप्रणामस्तस्याश्च पुरतोऽहमुपाविशम् ॥६६॥ उपाध्यायेतृगास्मिंश्च चित्रे मे देहि रूपकम्। इत्युक्त्वा वेपमानेन पाणिना धृतवर्त्तिका॥६७॥ शनैरालिख्य सा भूमौ दर्शयन्ती नृपात्मजा। अलेखयन् मया कश्चिद्युवानं रूपवत्तरम्॥६८॥ आलिख्य सुन्दरं तं च देवं चिन्तितवानहम्। काम एवानया साक्षादयमालिखितो मया॥६९॥ किन्तु पुष्पमयश्चापो हस्त यन्नास्य लेखितः। तेन जाने न कामोऽयं तद्रूपः कोऽप्यसौ युवा ॥७०॥ अय च नूनमनया दृष्टः क्वापि श्रुतोऽपि वा। एतन्निबन्धनं चेवमस्याः स्मरविजृम्भितम् ॥७१॥ तदितो मेऽप्रमातव्यमुग्रदण्डो ह्ययं नृपः। एतत्पिता देवशक्तिर्युयुच्छेदं न क्षमेत मे ॥७२॥ इत्यालोच्यैव नत्वा तामहं मदनसुन्दरीम्। राजकन्यां निरगमं तया सम्मानितस्ततः ॥७३॥ श्रुतं चात्र महाराज मया परिजनामिषः। स्वैरं कथयतो यत्सा सानुरागा श्रुते त्वयि॥७४॥ ततश्चित्रपटे गुप्तं लिखितां तां नृपात्मजाम्। आदायाहं भवत्पादमूलं त्वरितमागतः॥७५॥
१ मूर्च्छन्तीं स्मरसन्तापेन।
नवम लम्बक ६११
नवम लम्बक ६११ वहाँ उसे मैंने शरीर म चन्दन का लेप किये हुए मृणाल का हार पहने हुए, कमल के पत्तों की शय्या पर करवटें बदलते हुए और सखियों द्वारा केले के पत्ता से हवा की जाती हुई, पीली और दुर्बल शरीरवाली तथा प्रकट होते हुए कामज्वर के लक्षणावाली देखा। वह सखियों से कह रही थी--'सखियो 'चन्दन के लेप और कदलीदल की वायु आदि से किये गये सब उपचार ठंढे होने पर भी मुझे जलाते हैं। इन्हें बन्द करो। इन निष्फल प्रयत्नो से क्या लाभ ? धीरज देती हुई सखियों को वह इस प्रकार मना कर रही थी ।।६२-६५।। इस अवस्था मे पड़ी हुई उसे देखकर और उसी म सम्बद्ध विभिन्न तर्कों स व्याकुल मैं उस प्रणाम कर उसके सामने बैठ गया ।।६६।। 'उपाध्याय ऐसा चित्र बनाकर मुझे दो। इस प्रकार कहकर कांपते हुए हाथ म कूची लिये हुए उसने धीरे-धीरे पृथ्वी पर चित्र लिखकर दिखाते हुए मुझे किसी अनन्त रूपशाली युवा को लिखवाया ।।६७-६८।। महाराज उसके निर्देशानुसार चित्र बनाकर मैंने सोचा कि उसने मुझसे साक्षात् कामदेव का ही चित्र लिखवाया है। किन्तु, उसने चित्र के हाथ में काम का बाण नहीं लिखवाया इससे मैं समझता हूँ वह कामदेव नही किन्तु उसी के समान रूपवाला कोई युवा मनुष्य है।।६९-७० ॥ उसने इस युवक को अवश्य कही देखा या सुना है और इसी के सम्बन्ध से उस यह काम- ज्वर की व्यथा भी है ।।७१।। अब मुझ यहाँ से शीघ्र ही चला जाना चाहिए क्योकि यह राजा उग्र दण्ड देनेवाला है। यदि इसके पिता देवशक्ति को पता लगा तो वह कदापि क्षमा न करेगा ।।७२।। ऐसा सोचकर और उस मदनसुन्दरी का नमस्कार करके उससे सम्मानित मैं वहाँ से निकल गया ।।७३।। और महाराज मैंने उसके चरित्रता से यह भी समझा कि वह आपका जानकर आपके लिए प्रेम करती है ।।७४।। इसीलिए चित्रपट पर गुप्त रूप से उसे लिखकर और लेकर तुरन्त आपकी सेवा म आया हूँ ।।७५।।