कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
८६ कथासरित्सागर
८६ कथासरित्सागर ततस्तत्राययौ रात्रौ सानुगः स उलूकराट्। अवमर्दो न चापश्यत्तत्रैकमपि वायसम्॥७३॥ तावत् स चिरजीव्यत्र मन्द मन्दं विरौत्यधः। श्रुत्वा चोलूकराजस्तमवतीर्य ददर्श सः॥७४॥ कस्त्वं किमवस्थोऽसीत्यपृच्छत्तं सविस्मयः। ततः स चिरजीवी तं रुजेवाल्पस्वरोऽवदत्॥७५॥ चिरजीवीत्यहं तस्य सचिवो वायसप्रभोः। स च दातुमवस्कन्दमच्छते मन्त्रिसम्मतम्॥७६॥ ततस्तन्मन्त्रिणोऽन्यांस्तान्निर्भर्त्स्याहं समब्रवम्। यदि पृच्छसि मां मन्त्रं यदि चाहं मतस्तव॥७७॥ तन्न कार्यो बलवता कौशिकेन्द्रेण विग्रहः। कार्यस्त्वनुनयस्तस्य नीतिं चेदनुमन्यसे॥७८॥ श्रुत्वैतच्छत्रुपक्षोऽयमिति क्रोधात्प्रहृत्य मे। स काकः स्वैः समं मित्रैर्मूर्खोऽवस्थामिमां व्यधात्॥७९॥ क्षिप्त्वा च मां तरुतले क्वापि सानुचरो गतः। इत्युक्त्वा चिरजीवी स श्वसन्नासीदधोमुखः॥८०॥ उलूकराजश्च ततः स पप्रच्छ स्वमन्त्रिणः। किमेतस्य विधातव्यमस्माभिश्चिरजीविनः॥८१॥ तच्छ्रुत्वा दीप्तनयनो नाम मन्त्री जगाद तम्। अवध्यो रक्ष्यते चोरोऽप्युपकारीति सज्जनैः॥८२॥ वृद्धवणिक्चौरस्य च कथा तथाहि पूर्वं क्वाप्यासीद् वणिक्कोऽपि स कामपि। वृद्धोऽप्यर्थप्रभावेण परिणिन्ये वणिज्सुताम्॥८३॥ सा तस्य शयने नित्यं जरात्तोऽभूत् पराङ्मुखी। व्यतीतपुष्पकालेऽत्र भ्रमरीव तरोर्वने॥८४॥ एकदा चाविशच्चोरो निधिं सम्भ्यासयोस्तयोः। तं दृष्ट्वा सा परावृत्य तमाश्लिष्यत् पतिं भयात्॥८५॥
दशम लम्बक ८६१
दशम लम्बक ८६१ तब रात में उल्लूकराज असमर्थ अपने सहयोगियों के साथ वहाँ आया और उसने वहाँ एक भी कौए को न देखा ॥७३॥ तब चिरंजीवी नीचे पड़ा हुआ धीरे-धीरे कराहने लगा । उसका कराहना सुनकर उल्लूकराज ने नीचे आकर उसे देखा ॥७४॥ और आश्चर्य के साथ उससे पूछा—'तू कौन है और तेरी ऐसी दशा क्यों है ? तब वह चिरंजीवी वेदना से लड़खड़ाती हुई वाणी में धीरे से बोला ॥७५॥ “मैं चिरंजीवी नाम का काकराज का सचिव हूँ । वह अन्य मन्त्रियों की सम्मति से तुम पर आक्रमण करना चाहता था ॥७६॥ तब मैंने उसे और उसके अन्य मन्त्रियों को डाँटते-फटकारते हुए कहा—'यदि तुम मुझसे सम्मति पूछते हो और मुझे मानते हो और यदि नीति को मानते हो तो उसके अनुसार उस बलवान् उल्लूकराज से विरोध न करना चाहिए प्रत्युत उससे अनुनय-विनय करनी चाहिए ॥७७-७८॥ यह सुनकर यह शत्रु का पक्षपाती है'—ऐसा कहकर और क्रोध से मुझपर प्रहार करके उस मूर्ख कौए ने अपने साथियों के साथ मेरी यह दुर्दशा कर डाली ॥७९॥ तदनन्तर मुझे वृक्ष के नीचे फेंककर अपने अनुयायियों के साथ वह कहीं भाग गया। कहकर चिरंजीवी ने लम्बी साँस लेकर अपना मुंह लटका दिया ॥८० ॥ यह सुनकर उल्लूकराज ने अपने मन्त्रियों से पूछा कि अब हमें इस चिरंजीवी का क्या करना चाहिए' ॥८१॥ उल्लूकराज का यह प्रश्न सुनकर उसका दीप्तनयन नाम का मन्त्री उससे बोला—'अरक्षणीय चोर भी उपकारी समझकर सज्जनों द्वारा रक्षा करने योग्य है ॥८२॥ वृद्ध बनिया और चोर की कथा प्राचीन समय में कहीं एक बनिया था। वृद्ध होने पर भी उसने धन के प्रभाव से किसी बनिये की कन्या से विवाह कर लिया ॥८३॥ वह वैश्य-कन्या रात में बिस्तर पर उस बनिये से इस प्रकार मुंह फेरकर सोती थी जैसे वन में वसन्त-काल के बीतने पर भ्रमरी वृत्त से विमुख हो जाती है ॥८४॥ एक बार, रात में जब वे दोनों शय्या पर सो रहे थे तब घर में चोर घुस आया। यह देखकर उस कन्या ने भय से (पति की ओर) करवट बदलकर उस वृद्ध पति का आलिंगन किया ॥८५॥
४६२ कथासरित्सागर
४६२ कथासरित्सागर सममभ्युदयमाश्चर्यं मत्वा यावन्निरीक्षते । विवस्तत्र वणिक्तावत्कोणे चौरं ददर्श तम् ॥८६॥ उपकार्यसि मे तत्त्वां न मृत्यवेऽतिसृजाम्यहम् । इत्युक्त्वा सोऽथ चौरं तं रक्षित्वा प्राहिणोद् वणिक् ॥८७॥ एवं रक्ष्योज्प्यमस्माकं चिरजीव्युपकारकः । इत्युक्त्वा दीप्तनयनो मन्त्री तूष्णीं बभूव सः ॥८८॥ ततोऽन्यं वक्रनासाख्यं मन्त्रिणं कौशिकेश्वरः । स पृच्छति स्म किं कार्यं सम्यग्वक्तुं भवानिति ॥८९॥ वक्रनासस्ततोऽवादीद्वध्योऽप्य परमम्बित् । अस्माकमेतयोर्वैरं श्रेयसे स्वामिमन्त्रिणोः ॥९०॥ राक्षसचौर्योः कथा निदर्शनायैषा दैव श्रूयतामत्र वच्मि ते । कश्चित्प्रतिग्रहेण द्वे गावो प्राप द्विजोत्तमः ॥९१॥ तस्य दृष्ट्वाथ चौरस्ते गावो नेतुमचिन्तयत् । तत्कालं राक्षसः कोऽपि समैच्छत् खादितुं द्विजम् ॥९२॥ तदद्य निशि गच्छन्तौ दैवात्तौ चौरराक्षसौ । मिलित्वाऽन्योन्यमुक्तार्थौ यत्र प्रययतुः समम् ॥९३॥ अहं धेनू हराम्यादौ त्वद्गृहीतो ह्ययं द्विजः । सुप्तो यदि प्रबुध्येतद्वेरयं गोयुगं कथम् ॥९४॥ मव हराम्ह पूर्वं विप्रं मोचेद्वृथा मम । भवद्गोपुरशब्देन प्रबुद्धेऽस्मिन् परिश्रमः ॥९५॥ इति प्रविश्य तद्विप्रसदनं चौरराक्षसौ । यावतौ कलहायेतं तावत्प्राबोधि स द्विजः ॥९६॥ उत्थायात्तकृपाणं च तस्मिन् रक्षोघ्नजापिनि । त्रासाणे जग्मतुश्चौरराक्षसौ द्वौ पलाय्य तौ ॥९७॥ एवं तयोर्मिथो भङ्गो हितायाभूद्द्विजन्मनः । तथा भेदो हितोऽस्माकं शत्रोश्चिरजीविनोः ॥९८॥ इत्युक्तो वक्रनासेन कौशिकेन्द्रः स्वमन्त्रिणम् । तं च प्राकारकर्णाख्यमपृच्छत्सोऽप्यवाच तम् ॥९९॥
दशम लम्बक ८६३
दशम लम्बक ८६३ इस आश्चर्यजनक अपने सौभाग्य को देखकर उस वृद्ध बनिये ने चारों ओर देखा तो एक कोने में उसे चोर दिखाई दिया ॥८६॥ 'तू मेरा उपकारी है इसलिए मैं तुझे अपने सेवकों से पिटवाऊँगा नहीं' उस चोर से ऐसा कहकर उस बनिये ने उसे सुरक्षित रूप से बाहर निकाल दिया ॥८७॥ इसी प्रकार, अपने उपकारी इस चिरजीवी की हमें रक्षा करनी चाहिए। यह कहकर दीप्तनयन नाम का मन्त्री चुप हो गया ॥८८॥ तब उलूकराज ने वक्रनास नामक अपने दूसरे मन्त्री से पूछा कि 'इसका क्या करना चाहिए, आप अच्छी तरह बताइए' ॥८९॥ तब वक्रनास ने कहा- शत्रुओं के मर्म (गुप्त भेद) को जाननेवाले इस चिरजीवी की रक्षा करनी चाहिए। शत्रु राजा और उसके मन्त्री का बैर, हमारे कल्याण के लिए होगा मैं कहता हूँ ॥९०॥ ब्राह्मण चोर और राक्षस की कथा इस विषय में उदाहरण के लिए एक कथा सुनो। किसी ब्राह्मण ने दान में दो गौएँ पाईं। यह देखकर चोर ने उसकी गायें चुराने की इच्छा की और उसी समय एक राक्षस ने उस ब्राह्मण को खाने की बात सोची ॥९१-९२॥ अपने-अपने कार्य के लिए, रात में बाहर जाते हुए दोनों (चोर और राक्षस) मिले और अपना-अपना प्रयोजन बताकर एक साथ हो लिये ॥९३॥ पहले मैं गायें चुरा लेता हूँ क्योंकि तुमसे पकड़ा हुआ ब्राह्मण यदि जाग उठा तो मैं कैसे गौएँ चुराऊँगा ? ऐसा नहीं पहले मैं ब्राह्मण को खा लेता हूँ। यदि गायों के खुरों की खट- पटाहट से ब्राह्मण जाग उठा तो मेरा परिश्रम व्यर्थ हो जायगा ॥९४-९५॥ जब ब्राह्मण के घर में पहुंचकर चोर और राक्षस इस प्रकार बोल-चालकर लड़ने लगे तो उनके शब्द से वह ब्राह्मण जाग उठा ॥९६॥ उसने उठकर, राक्षसों के नाश करने का मन्त्र जपते हुए हाथ में तलवार उठाई तो वे दोनों चोर और राक्षस भाग गये ॥९७॥ जिस प्रकार चोर और राक्षस का आपसी झगड़ा ब्राह्मण के लिए हितकर हुआ वैसे ही काकराज और चिरजीवी का झगड़ा हमारे लिए हितकर होगा ॥९८॥ वक्रनास के ऐसा कहने पर उलूकराज ने प्राकारकर्ण नाम के मन्त्री से पूछा और मन्त्री ने उससे कहा-॥९९॥
८६४ कथासरित्सागर
८६४ कथासरित्सागर चिरजीव्यनुकम्प्योऽयमापन्नः शरणागतः। शरणागतहन्तो प्राक्स्वमामिषमदाच्छिखि ॥१००॥ प्राकारकर्णञ्चैवन्तत्सजिवं क्रूरलोचनम्। उलूकराजः पप्रच्छ सोऽपि शुद्धदमापत ॥१०१॥ ततो रक्ताक्षनामानं सचिवं कौशिकेश्वरः। तमेव परिपप्रच्छ सोऽपि प्राज्ञोऽब्रवीदिदम् ॥१०२॥ राजन्नपनयेनैतैर्मन्त्रिभिर्नाधितो भवान्। प्रतीयन्त न नीतिज्ञाः कृतावज्ञस्य वैरिणः ॥१०३॥ मूर्खो दृष्टव्यलीकोऽपि व्याजसान्त्वेन तुष्यति। रथकारस्य तद्भार्यायाश्च कथा¹ तथा हि तक्षा कोऽप्यासीद् भार्याभूतस्य तु प्रिया ॥१०४॥ तां चान्यपुरुषासक्तां तक्षा बुद्धवायसोक्तः। तत्त्वं जिज्ञासमानस्तां भार्यामबददेकदा ॥१०५॥ प्रिये राजाज्ञया दूरं स्वव्यापाराय याम्यहम्। तत्त्वया मम सक्तवादि पाथेयं दीयतामिति ॥१०६॥ तथेति दत्तपाथेयस्तया निर्गत्य गेहतः। सशिष्यो गुप्तमागत्य तत्रैव प्रविवेश स ॥१०७॥ तद्दृष्टस्तु भद्वायास्तस्मौ शिष्ययुतस्तले। माप्यथानाययत स्वं तद्भार्या परपूरुषम् ॥१०८॥ तेन साकं च खट्वायां रममाणा पतिं पदा। स्पृष्ट्वा बध्यञ्चित पापा मेने तत्रस्थमेव तम् ॥१०९॥ क्षणाम्भोपपतिस्तत्र व्याकुलः पृच्छति स्म ताम्। ब्रूहि प्रिये किमधिकं प्रियोऽहं तव किं पतिः ॥११०॥ तच्छ्रुत्वा कूटकुशला तं जारं निजगाद सा। प्रिया मम पतिस्तस्य कृते प्राणांस्त्यजाम्यहम् ॥१११॥ इदं तु चापलं स्त्रीणां महजं क्रियतेऽत्र किम्। अभक्ष्यमपि भक्ष्यं स्यान्नासां स्युर्यन्ति नासिका ॥११२॥ १ पञ्चतन्त्रे इयमेव कथा—प्रत्यक्षेऽपि कृते दोषे मूर्खः सान्त्वा प्रसाद्यते। रथकारः स्वहां भार्यां सजार्रा शिरसा वहन्। —इत्यनेन श्लोकेन समुल्लिखिता।
दशम लम्बक ८६५
दशम लम्बक ८६५ 'आपकी शरण म आया हुआ आपत्तिग्रस्त यह चिरंजीवी दया करने के योग्य है। राजा शिबि ने शरणागत की रक्षा के लिए अपना मांस भी दे दिया था ॥१०॥ प्राकारकर्ण से यह सुनकर उलूकराज ने अपने क्रूरलोचन नाम के मंत्री से चिरंजीवी के सम्बन्ध में पूछा कि इसका क्या करना चाहिए ? क्रूरलोचन ने भी प्राकारकर्ण की ही बात दुहराई। तब उलूकराज ने रक्ताक्ष नाम के अपने मन्त्री से उसी प्रकार पूछा। वह बुद्धिमान् मन्त्री इस प्रकार बोला-॥१११२॥ 'राजन् इन मन्त्रियों ने उल्टी नीति से तुझे नष्ट कर दिया। ये नीतिज्ञ नही प्रतीत होते ॥१ ३ रथकार और उसकी पत्नी की कथा मूर्ख व्यक्ति अपराध को देखकर भी झूठी सान्त्वना देने पर प्रसन्न हो जाता है। (इस विषय मे एक कथा सुनो) कहीं एक बढ़ई रहता था उसकी पत्नी उसे बहुत प्रिय थी ॥१४॥ उसकी स्त्री पर-पुरुष का संग करती है दूसरे लोगो से यह जानकर वह उसका भेद लेने के लिए एक बार अपनी पत्नी से बोला- ॥१५॥ 'प्रिय मैं राजा की आज्ञा से व्यापार के लिए कहीं दूर देश को जाता हूँ। इसलिए, तू पाथेय (मार्ग का भोजन) के लिए मुझे सत्तू आदि दे दे' ॥१६॥ अच्छा ठीक है—कहकर दिये हुए उसके पाथेय को लेकर और अपने एक शिष्य के साथ घर से बाहर निकलकर वह चुपके-से फिर घर म ही आ घुसा ॥१७॥ घर में अपनी पत्नी के परोक्ष मे वह शिष्य के साथ चारपाई के नीचे जा छिपा। पति चला गया यह जानकर उसकी स्त्री ने भी अपने जार को बुलाया और उस जार के साथ उसी चारपाई पर रमण करती हुई उसकी स्त्री ने अपने पति के अंग का स्पर्श करके यह जान लिया कि पति यहीं है। कुछ समय बाद उसके जार ने व्याकुलता के साथ उससे पूछा—'प्रिय यह बताओ कि मैं तुम्हें अधिक प्यारा हूँ या तुम्हारा पति ? ॥१८॥११॥ यह सुनकर अत्यन्त चतुर उस स्त्री ने अपने यार से कहा—'मुझे अपना पति इतना प्यारा है कि मैं उसके लिए अपने प्राणों को भी छोड़ दूँ' ॥१११॥ पर पुरुष का संग कर लेना तो स्त्रियों का स्वाभाविक धर्म है। इसमें क्या किया जा सकता है। यदि स्त्रियों को नाफ़ न हो तो उनके लिए विष्ठा खा ना भी असम्भव नही ॥११२॥ ११
८९४ कथासरित्सागर
८९४ कथासरित्सागर एतत्तस्या वचः श्रुत्वा तुष्टात्मा स कृत्रिमम्। तुष्टः शय्यातलात्सद्यो निर्गतः शिष्यमभ्यधात् ॥११३॥ दृष्टं त्वयाद्य साक्षी त्वं मम भक्तेरमीष्विति। अमुमवाध्रिता कान्तं सदेतां मूर्ध्न्यहं वहे ॥११४॥ इत्युक्त्वा सहसोत्क्षिप्य खट्वास्थावेव तावुभौ। सशिष्यं स जडो जायात्तज्जारौ शिरसावहत् ॥११५॥ इत्थं प्रत्यक्षदृष्टेऽपि दोषे कपटसान्त्वतः। मूर्खस्तुष्यति हास्यत्वं निर्विवेकश्च गच्छति ॥११६॥ तदयं चिरजीवी ते रक्ष्यॊ नारिपरिग्रहः। उपेक्षितो ह्ययं ह्येव हन्याद्रोग इव द्रुतम् ॥११७॥ इति रक्ताक्षरा श्रुत्वा कौशिकन्द्रोऽब्रवीत्स तम्। कुर्वन्नस्मद्धितं साधु प्राप्तोऽवस्थामिमामयम् ॥११८॥ तत्कथं स्मादृशः संरक्ष्यं किं कुर्यादेककश्च न। इति तस्य निराचक्र मन्त्रिवाक्यमुलूकराट् ॥११९॥ आश्वासयामास च सं वायसं चिरजीविनम्। ततः स चिरजीवी तमुलूकेशं व्यजिज्ञपत् ॥१२०॥ किं ममैतदवस्थस्य जीवनेन प्रयोजनम्। तन्मे दापय काष्ठानि यावदग्निं विशाम्यहम् ॥१२१॥ उलूकयोनिं च वरं प्रार्थयेऽहं हुताशनम्। कर्तुं वायसराजस्य तस्य वैरप्रतिक्रियाम् ॥१२२॥ इत्युक्तवन्तं विहसन् रक्ताक्षो निजगाद तम्। अस्मत्प्रभोः प्रसादात्त्वं स्वस्थ एव किमग्निना ॥१२३॥ न च त्वं कौशिको भावी यावत्काकत्वमस्ति ते। यादृशो यः कृतो धात्रा भवेत्तादृश एव सः ॥१२४॥ तथा च प्राङ्मुनिः कश्चिच्छ्येनहस्तच्युतं शिशुम्। मूषिकां प्राप्य कृपया कन्यां चक्रे तपोबलात् ॥१२५॥ वर्धितामाश्रमे तां च स दृष्ट्वा प्राप्तयौवनाम्। मुनिर्बलवते दातुमिच्छन्नादित्यमाह्वयत् ॥१२६॥ वह्निमे दिक्षितामेतां कन्यां परिणयस्व मे। इत्युवाच स वधिस्तं ततस्तं सोऽब्रवीद्रविः ॥१२७॥
द्वादश लम्बक ८६७
द्वादश लम्बक ८६७ इस प्रकार, उस दुष्टा पत्नी की दगाबाजी बात सुनकर प्रसन्न वह बढ़ई खाट के नीचे से निकलकर अपने शिष्य से बोला- आज तुमने देख लिया इसलिए तुम साक्षी हो कि यह स्त्री मेरी कैसी भक्त है। यह मुझको ही अपना पति समझती है। उसने इसे तो अपने स्वभावानुसार अपना यार बनाया है। अतः मैं इसे अपने सिर पर उठा लेना चाहता हूँ ॥११३-११४॥ ऐसा कहकर शिष्य के साथ उसने यार-सहित अपनी स्त्री की चारपाई को सिर पर उठा लिया ॥११५॥ इस प्रकार, अपनी आँखों के सामने अपराध देखकर भी झूठी सान्त्वना से मूर्ख व्यक्ति प्रसन्न हो जाता है। और वह विचारहीन व्यक्ति संसार में हँसी का पात्र बन जाता है ॥११६॥ इसलिए, शत्रु के व्यक्ति इस चिरजीवी की तुम्हें रक्षा न करनी चाहिए। यह उपेक्षित व्यक्ति है, रोग के समान शीघ्र नष्ट कर देना चाहिए ॥११७॥ रक्ताक्ष से इस प्रकार सुनकर, उलूकराज इस प्रकार उससे बोला- 'यह सज्जन चिरजीवी हमारा हित करता हुआ भी इस स्थिति को पहुँचा है ॥११८॥ तब इसकी रक्षा क्यों न की जाय फिर यह अकेला हमारा बिगाड़ ही क्या सकता है ? इस प्रकार बोलकर उलूकराज ने मंत्री का कथन काट दिया ॥११९॥ उसके बाद उलूकराज ने चिरजीवी कौए को आश्वासन दिया। तब चिरजीवी ने उलूकराज से निवेदन किया ॥१२०॥ 'इस अवस्था में मेरे जीने से क्या लाभ है ? इसलिए मुझे लकड़ियाँ दिलाओ जिससे मैं आग में जल मरूँ ॥१२१॥ और, मैं भगवान् से भी यही प्रार्थना करूँ कि काकराज का बदला लेने के लिए वह मुझे उलूक-योनि में जन्म दें' ॥१२२॥ ऐसा कहनेवाले चिरजीवी से रक्ताक्ष हँसकर बोला- 'हमारे स्वामी की कृपा से तू पूर्ण स्वस्थ है आग से क्या काम ?॥१२३॥ जबतक तू कौआ है तबतक उल्लू न बनेगा। विधाता ने जिसे जैसा बनाया है वह वैसा ही रहेगा' (इस प्रसंग में एक कथा सुनो।) ॥१२४॥ प्राचीन काल में किसी मुनि ने बाज के हाथ से छूटी हुई किसी चुहिया को पाकर दया करके अपने तपोबल से उसे कन्या बना दिया। अपने आश्रम में पालन-पोषण करके बढ़ाई गई और युवावस्था को प्राप्त उस कन्या को बलवान् पुरुष को देने के लिए मुनि ने सूर्य को बुलाया और कहा कि सबसे अधिक बलवान् को ही मैं यह कन्या देना चाहता हूँ। इसलिए तुम मेरी कन्या से विवाह करो। तब सूर्य ने ऋषि से कहा ॥१२५-१२७॥
८१८ कथासरित्सागर
८१८ कथासरित्सागर मत्तोऽपि बलवान् मेघ स मां स्थगयति क्षणात्। तच्छ्रुत्वा तं विसृज्याथ मेघमाहूतवान्मुनिः ॥१२८॥ तं तथैव च सोऽवादीत्तेनाप्येवमवादि सः। मत्तोऽपि बलवान् वायुर्यो विक्षिपति दिक्षु माम् ॥१२९॥ इत्युक्तो तेन स मुनिर्वायुमाह्वयति स्म तम्। स तथैव च तेनोक्तस्तमेवमवदन्मरुत् ॥१३०॥ मयापि ये न चाल्यन्ते मत्तस्ते बलिनोऽद्रयः। श्रुत्वैतदथ शैलेन्द्रमाह्वयन् मुनिसत्तमः ॥१३१॥ तस्मैव यावत्तद्वक्ति तावत्सोऽद्रिर्जगाद तम्। मूषका बलिनो मत्तो ये मे छिद्राणि कुर्वते ॥१३२॥ इति क्रमेण प्रत्युक्तो दैवतैर्ज्ञानिभिः स तैः। महर्षिराजुहावैकं मूषकं वनसम्भवम् ॥१३३॥ कन्यां गृहेतामित्युक्तस्तेनोवाच स मूषकः। कथं प्रवेक्ष्यति बिलं ममेषा दृश्यतामिति ॥१३४॥ पूर्ववन्मूषिकैवास्तु वरमित्यथ स ब्रुवन्। मुनिस्तां मूषिकां कृत्वा तस्मै प्रायच्छदाश्रमे ॥१३५॥ एवं सुदूरं गत्वापि भो यावृक्तानुगेन सः। त्वमुलूको न जातु त्वं चिरजीविन् भविष्यसि ॥१३६॥ इत्युक्तश्चिरजीवी स रक्ताक्षेण व्यचिन्तयत्। नीतिज्ञस्य न चैतस्य राज्ञानेन कृतं वचः ॥१३७॥ शेषा मूर्खा इमे सर्वे तत्कार्यं सिद्धमेव मे। इति सञ्चिन्तयन्तं तमादाय चिरजीविनम् ॥१३८॥ अविचार्यैव रक्ताक्षवाक्यं तद्बलमन्वितः। उलूकराजः स ययावथर्बो निजं पदम् ॥१३९॥ चिरजीवी च तहस्तमांसाद्यशनपोषितः। तत्पार्श्वस्थोऽचिरेणैव बर्हीबाभूत् सुपक्षतिः ॥१४०॥ एकदा तमुलूकेन्द्रमथवद्देश गाम्यहम्। आश्वास्य काकराजं तमानयामि स्वमास्पदम् ॥१४१॥ येन रात्रौ निपत्याथ युष्माभिः स निहन्यते। अह भवामि चैतस्य स्वप्रसादस्य निष्कृतिम् ॥१४२॥
दशम लम्बक ८६९
दशम लम्बक ८६९ 'मुझसे भी बलवान् मेघ है, जो क्षण-भर में मुझे ढक देता है'—यह सुनकर मुनि ने सूर्य को छोड़कर मेघ को बुलाया ॥१२८॥ उसे भी उसी प्रकार ऋषि ने कहा तो मेघ ने कहा—'मुझसे भी बलवान् वायु है जो क्षण भर में ही मुझे चारों दिशाओं में बिखेर देता है ॥१२९॥ उसके इस प्रकार कहने पर मुनि ने वायु को बुलाया। मुनि के उससे भी उसी प्रकार कहने पर वायु ने कहा—॥१३०॥ 'पर्वत मुझसे भी बलवान् हैं जो मुझसे भी हिलाये नहीं जा सकते। यह सुनकर मुनि ने एक पर्वतराज को बुलाया ॥१३१॥ उसी प्रकार जब मुनि ने पर्वतराज से कहा तब उसने कहा—'मुझसे भी बलवान् चूहे हैं जो मुझमें भी छेद कर देते हैं'॥१३२॥ इस प्रकार क्रमशः सभी देवताओं से कहे गये मुनि ने एक जंगली चूहे को बुलाया और उससे कहा— इस कन्या से विवाह करो। ऋषि के इस प्रकार कहने पर चूहे ने कहा—'यह मेरे बिल में प्रवेश कैसे करेगी यह देख लीजिए' ॥१३३-१३४॥ 'अच्छा तो ठीक है, यह कन्या पहले के ही समान चूहिया बन जाय' इस प्रकार मुनि ने उसे चूहिया बनाकर उस चूहे को दे दिया ॥१३५॥ 'इस प्रकार बहुत दूर जाकर भी जो जैसा है, वैसा ही है। इसलिए, हे चिरंजीविन्, तू कभी उल्लूक नहीं बन सकेगा' ॥१३६॥ रक्ताक्ष से इस प्रकार कहे गये चिरजीवी ने सोचा कि उल्लूकराज ने इस नीतिज्ञ रक्ताक्ष की बात नहीं मानी ॥१३७॥ शेष सभी मन्त्री मूर्ख हैं, इसलिए मेरा काम सिद्ध ही है। इस प्रकार सोचते हुए चिरजीवी को लेकर, बल से गर्वित उल्लूकराज असमर्थ रक्ताक्ष की बात न मानकर अपने निवासस्थान पर गया ॥१३८-१३९॥ उल्लूकराज से दिये गये मांस आदि पौष्टिक आहारों से पुष्ट होकर उसके पास रहते हुए चिरजीवी मोर के समान सुन्दर पंखोंवाला हो गया ॥१४०॥ एक बार वह चिरजीवी उल्लूकराज से बोला—'स्वामिन् मैं जाता हूँ और काकराज को विश्वास दिलाकर अपने स्थान पर ले आता हूँ ॥१४१॥ जिससे कि आप लोग रात में आक्रमण करके उसका नाश कर सकें। मैं आपकी (मुझ पर की गई) इस कृपा का प्रत्युपकार करना चाहता हूँ ॥१४२॥
८४० कथासरित्सागर
८४० कथासरित्सागर यूयं तृणाद्यैराच्छाद्य द्वारं नीडगुहान्तरे। दिवा तदापातभयात् सर्वे तिष्ठन्तु रक्षिताः ॥१४३॥ इत्युक्त्वा तृणपर्णादिच्छन्नद्वारगुहागतान्। कुरूलोलूकानन्यो पार्श्वं चिरजीवी निजप्रभोः ॥१४४॥ तद्युवत्पश्चायायातावत्त्वह्रवीपाधितोल्युकः । लब्ध्वा प्रज्वलितैरेककाष्ठिकैः सह वायसैः ॥१४५॥ आगत्यैव विवान्धानां तेषां छन्नं तृणादिभिः। उलूकानां गुहाद्वारं ज्वारयामास वह्निना ॥१४६॥ प्राक्षिपस्तत्रवैकस्तदानीं तादृशं काष्ठिकम् । समिध्याग्निं यदाहान् तानुलूकान् सराजकान् ॥१४७॥ विनाश्य शत्रू काकेन्द्रस्तुष्टोऽथ श्रुतोथ सः। समं काककुलेनागाभिज न्यग्रोधपादपम् ॥१४८॥ तत्रास्थाय द्विपमध्यवासवृत्तान्तमात्मनः। काकेन्द्रं मघवन्नं तं चिरजीव्यब्रवीदिदम् ॥१४९॥ रक्ताक्ष एव सन्मन्त्री तस्यासीत्स्वद्विषो प्रभो। तस्यापकुर्वता वाक्यं मदान्धेनाभ्युपेक्षितं ॥१५०॥ यदस्याकारणं मत्वा वचनं नाकरोच्छठः। अतः सोऽपनयी मूर्खो मया विश्वास्य वञ्चितः ॥१५१॥ व्याजानुवृत्त्या विश्वास्य मण्डूका अहिना यथा। भूयः कश्चित्सुखं प्राप्तुमशक्तः पुरुषाधमे ॥१५२॥ भेकवाहनसर्पस्य कथा भेकानहिः सरस्तीरे तस्मिंस्तस्थौ सुनििश्चलः। तथास्थितं च तं भेकाः पप्रच्छुर्दूरवर्तिनः ॥१५३॥ ब्रूहि किं पूर्ववन्नास्मान्स्नास्यद्य भवानिति। इति पृष्टस्तदा भेकैः स तेः प्रोवाच पन्नगः ॥१५४॥ मया ब्राह्मणपुत्रस्य मण्डूकमनुधावता। भ्रान्त्या दष्टो बतोऽङ्गुष्ठः स च पञ्चत्वमाययौ ॥१५५॥ तत्पित्रा चास्मि शापेन भेकानां वाहनीकृतः। तद्युष्मान् कथमश्नामि प्रत्युताहं वहामि वः ॥१५६॥ तच्छ्रुत्वा तत्र भेकानां राजा वाहसमुत्सुकः। जलादुत्तीर्य तत्पृष्ठमारोहदमतीर्मुदा ॥१५७॥
दशम लम्बक ८७१
दशम लम्बक ८७१ आप सब लोग दिन में उसके आक्रमण के भय से बचने के लिए अपने घोंसलों को घास फूस आदि से ढककर उसके अन्दर सुरक्षित रहें ॥१४३॥ ऐसा कहकर, उल्लुओं को घास तथा सूखे पत्तों से ढके हुए द्वारवाली गुफा के भीतर करके चिरजीवी अपने स्वामी काकराज मेघवर्ण के पास गया ॥१४४॥ और जलती हुई चिता से एक-एक जलती हुई लकड़ी चोंच में लटकाए हुए कौओं को साथ लेकर वह वहाँ आया ॥१४५॥ और आकर दिन में अन्धे उन उल्लुओं के घास-फूस से ढके हुए गुफा के द्वार पर आग लगा दी ॥१४६॥ वह आग लगाकर, एक-एक लकड़ी चोंच से उठाकर आग में छोड़ता जाता था। इस प्रकार उसने राजा के सहित सभी उल्लुओं को जलाकर भस्म कर डाला ॥१४७॥ तदनन्तर, कौओं का राजा शत्रुओं का नाश करके अपने काक-परिवार के साथ पुनः उसी वटवृक्ष पर सुखपूर्वक निवास करने लगा ॥१४८॥ इसके बाद चिरजीवी ने काकराज मेघवर्ण को शत्रुओं के बीच रहने का अपना सारा समाचार सुनाकर यह कहा-॥१४९॥ 'स्वामिन् वहाँ तुम्हारे छत्र का एक ही मन्त्री था उसी की बात न मानकर उस मदान्ध उलूकराज ने मेरी उपेक्षा की। उस मूर्ख ने रक्ताक्ष मन्त्री की बात नहीं मानी इसीलिए नीतिहीन उस मूर्ख को मैंने विश्वास दिलाकर ठग लिया ॥१५०-१५१॥ मेंढकों के वाहन सर्प की कथा जैसे कपट-वृत्ति से विश्वास दिलाकर साँप ने मेढक को ठग लिया था'। एक वृद्ध साँप अपना चारा प्राप्त करने में असमर्थ होकर एक तालाब के किनारे निश्चल होकर पड़ा था। इस प्रकार, दीन साँप को देखकर दूर खड़े हुए मेढकों ने पूछा- अब तुम पहले के समान हम लोगों को क्या नहीं खाते हो। मेढक के इस प्रकार पूछने पर साँप ने उनसे कहा- 'एक बार एक मेढक की ओर दौड़ते हुए मैंने भ्रम से एक ब्राह्मण के बालक को काट लिया और वह मर गया। तब उसके पिता ने शाप से मुझे मेढक का वाहन बना दिया। तब मैं तुम लोगों को कैसे खाऊँ ? बल्कि आओ तुम लोगों को ढोने का काम करूँ ॥१५२-१५६॥ यह सुनकर उस पर सवारी करने के लिए उत्सुक मेढकों का राजा पानी से निकलकर उसकी पीठ पर निर्भय होकर चढ़ बैठा ॥१५७॥
८७२ कथासरित्सागर
८७२ कथासरित्सागर ततस्तं वाहनसुखैरावश्यं सन्निधौभृतम्। कृत्वावसन्नमात्मानमुवाच स सकेतवम् ॥१५८॥ आहारं विना देव न गन्तुमहमुत्सहे। तन्मे दशाशनं भृत्याद्देववृत्तितस्तत् कथम् ॥१५९॥ तच्छ्रुत्वा भेकराजस्तमवाचद्वाहनप्रियः। काञ्चित् परिमितांस्तर्हि भुङ्क्ष्व मदनुचरानिति ॥१६०॥ ततः क्रमात् स मण्डूकानहिः स्वेच्छमभक्षयत्। सद्वाहनाभिमानाच्च सेहे भेकपतिः स तत् ॥१६१॥ एवं मध्यप्रविष्टेन मूर्खः प्राज्ञेन वञ्च्यते। मयाप्यनुप्रविश्यैव तव स्वद्विषवो हताः ॥१६२॥ तस्मान्नीतिविदा राज्ञा भवितव्यं कृतात्मना। यथैष मुच्यते मृत्योर्ह्रियते च परर्द्धयः ॥१६३॥ श्रीरियं च सदा देव द्यूतलीलेव सञ्चला। वारिणीवोर्मिचपला मदिरेव विमोहिनी ॥१६४॥ सा धीरस्य सुमन्त्रस्य राज्ञो निर्व्यसनस्य च। विशेषज्ञस्य सोत्साहा पार्श्वतश्चैव तिष्ठति ॥१६५॥ तदिदानीमवहितस्त्वं विद्वद्वचने स्थितः। निहतारातिसुस्थितः पाथि राज्यमकण्टकम् ॥१६६॥ इत्युक्तो मन्त्रिणा मेघवर्णः स चिरजीविना। सम्भाव्य तं काकराजश्चक्रे राज्यं तथैव तम् ॥१६७॥ इत्युक्त्वा गोमुखो भूयो वत्सराजसुतमब्रवीत्। तदेवं प्रज्ञया राज्यं तिर्यग्भिरपि भुज्यते ॥१६८॥ निष्प्रज्ञास्त्ववसीदन्ति काकोपहसिताः सदा। तथा च जाह्नवीभृत्या बभूवाश्वस्य कस्यचित् ॥१६९॥ साऽजानन्नपि तस्याज्ञां जानामीत्यभिमानतः। स्फारं कुर्वन् मौर्व्याबलात्प्रभोस्त्वचमपाटयत् ॥१७०॥ ततस्त्वेनं परित्यक्तं स्वामिभाववशाद सः। अजानानॊ ह्यतत्कुर्वन् प्राप्तमानी विनश्यति ॥१७१॥ इतश्च श्रूयतामन्यत् मासन्वै भ्रातरावुभौ। विप्रावभूतानामद्वय तयोः पित्र्यमभूद्धनम् ॥१७२॥
षष्ठम लम्बक ८०३
षष्ठम लम्बक ८०३ तब साँप ने भंगियों के साथ उस राजा को विविध प्रकार की बातों से प्रसन्न करके कपट से अपने को थका-हारा-सा प्रकट किया और मेढकराज से बोला-॥१५८॥ 'स्वामी भोजन के बिना अब मैं नहीं चल सकता। इसलिए, मुझे भोजन दो। सेवक बिना भोजन के कैसे रह सकता है ?॥१५९॥ यह सुनकर सवारी का शौकीन मेढकराज ने उस साँप से कहा—'तो कुछ थोड़े-से मेरे अनुचर मेढ़कों को खा लो' ॥१६०॥ तब वह सर्प अपनी इच्छानुसार मेढ़कों को क्रमशः खाने लगा। सवारी के आनन्द से अन्धा मेढकराज यह सब सहन करता था॥१६१॥ 'इस प्रकार मूर्खों के भीतर घुसा हुआ बुद्धिमान् मूर्खों को ठग लेता है। इसी प्रकार, महाराज मैंने भी शत्रुओं में घुसकर ही तुम्हारे शत्रुओं का नाश किया॥१६२॥ अतः बुद्धिमान् राजा को नीतिज्ञ भी होना चाहिए। अन्यथा सेवक मूर्ख राजा का मनमाना मूँछते-खसोटते और नष्ट कर डालते हैं॥१६३॥ यह लक्ष्मी जुए के छल के समान छल से भरी जल-तरंग के समान चंचल और मदिरा के समान मदीली होती है। इसलिए यह (लक्ष्मी) धैर्यशाली नीतिज्ञ व्यसनहीन और विशेषज्ञ राजा के पास जाल से बँधी हुई-सी स्थिर रहती है ॥१६४-१६५॥ अतः अब तुम सावधान होकर नीतिज्ञ विद्वानों की बात मानकर, शत्रु के नाश हो जाने से सुखी होकर निष्कण्टक राज्य का पालन करो' ॥१६६॥ मन्त्री चिरंजीवी से इस प्रकार कहा गया काकराज मेघवर्ण उस मन्त्री का सम्मान करके उसी प्रकार राज्य करता रहा ॥१६७॥ ऐसा कहकर गोमुख ने वत्सराज के पुत्र नरवाहनदत्त से कहा- स्वामिन् इस प्रकार बुद्धिबल से पशु-पक्षी भी राज्य करते हैं किन्तु बुद्धिहीन व्यक्ति धोखा में ही फँस जाते हैं और कष्ट पाते हैं। इस प्रसंग में एक कथा सुनो॥१६८-१६९॥ किसी धनी सेठ का एक मूर्ख सेवक था जो शरीर में मालिश करना नहीं जानता था। किन्तु 'जानता हूँ' इस अभिमान से बलपूर्वक मालिश करते हुए उसने स्वामी के शरीर की चमड़ी उधेर दी॥१७०॥ तब स्वामी ने उसे निकाल दिया और वह दुःखी हुआ। इस प्रकार न जानते हुए भी हठ- पूर्वक जो जानकारी का ढोंग रचता है वह नष्ट हो जाता है ॥१७१॥ और भी सुनो। मालव देश में दो ब्राह्मण-बन्धु रहते थे। उनके पैतृक धन का बँटवारा नहीं हुआ था॥१७२॥ ११
८७४ कथासरित्सागर
८७४ कथासरित्सागर विभज्यमाने पार्थेऽस्मिन्नूनाधिकविवादिमौ। स्वेयीकृत उपाध्यामश्छान्दसस्तावभाषत ॥१७३॥ वस्तु वस्तु समे द्वे द्वे अर्धे कृत्वा विभज्यताम्। युवाभ्यां येन नैव स्यान्नूनाधिककृतः कलिः॥१७४॥ तच्छ्रुत्वा वेश्मशय्यादिभाण्डं सर्वं पशूनपि। एकमकं द्विधा कृत्वा मूढौ विभजतः स्म तौ ॥१७५॥ एका दासी तयोरासीत्सापि ताभ्यां द्विधा कृता। तद्बुद्ध्वा दण्डितौ राज्ञा सर्वस्वं तावुभावपि॥१७६॥ द्वौ लोकौ नाशयन्त्येवं मूर्खा मूर्खोपदॆशतः। तस्मान्मूर्खांन्न सेवेत प्राज्ञः सेवेत पण्डितान् ॥१७७॥ असन्तोषोऽपि शोषाय तथा चेदं निशम्यताम्। आसन् प्रव्राजकाः केचिद्भिक्षासन्तोषपीवराः ॥१७८॥ तान्दृष्ट्वा पुरुषाः कश्चिदन्योन्यं सुहृदोऽब्रुवन्। अहो भिक्षाशिनोऽप्येते पीनाः प्रव्राजका इति ॥१७९॥ एकस्तेषु ततोऽवादीत् कौतुकं दर्शयामि वः। अहं कृशीकरोम्येतान् भुञ्जानानपि पूर्ववत् ॥१८०॥ इत्युक्त्वा स निमन्त्र्यैतान् क्रमात् प्रव्राजकान् गृहे। एकाहं भोजयामास षड्रसाहारमुत्तमम् ॥१८१॥ तेऽन्य मूर्खास्तिवास्वादं स्मरन्तो भैक्षभोजनम्। न तथाभिलषन्ति स्म तेन दुर्बलतां ययुः ॥१८२॥ ततः प्रदर्श्य सुहृदो दृष्ट्वा तत्सन्निधौ च तान्। प्रव्राजकांस्तदाहारदायी स पुरुषोऽब्रवीत् ॥१८३॥ सदा भैक्षेण सन्तुष्टा हृष्टपुष्टा इमेऽभवन्। अधुना तदसन्तोषदुःखाद्दुर्बलतां गताः॥१८४॥ तस्मात्प्राज्ञः सुखं वाञ्छन्सन्तोषे स्थापयेन्मनः। लोकद्वयऽप्यसन्तोषो दुःखहायान्तदुःसहः ॥१८५॥ इति सेनानुशिष्टास्ते सुहृदो ह्युक्तास्तद्वचम्। असन्तोषं जहुः कस्य सत्सङ्गो न भवेच्छुभः ॥१८६॥
दशम लम्बक ८७५
दशम लम्बक ८७५ जब वे बँटवारा करने लगे तब आपस में कम और अधिक भाग का झगड़ा खड़ा हो गया। तब उन्होंने एक वेदपाठी अध्यापक को निर्णायक माना। उसने कहा - 'तुम दोनों प्रत्येक वस्तु को दो भागों में बराबर बाँटो। इससे तुम दोनों में कम और अधिक का झगड़ा न होगा ॥१७३-१७४॥ मध्यस्थ (निर्णायक) की आज्ञा से उन दोनों ने मकान खाट बरतन पशु आदि सबके दो-दो बराबर टुकड़े करके बाँट लिये। अब उनके पिता की एक दासी रह गई। उसको भी काटकर उन दोनों ने दो टुकड़े कर डाले इस हत्या के अपराध में राजा ने उन दोनों का सब माल हरण करके उन्हें सजा दे दी ॥१७५-१७६॥ इस प्रकार, मूर्खजन धूर्तों के उपदेश से दोनों लोकों का नाश करते हैं। इसलिए, समझदार व्यक्ति को चाहिए कि वह धूर्तों का नहीं प्रत्युत विद्वानों की संगति करे ॥१७७॥ असन्तोष भी अच्छा नहीं होता। इस प्रसंग में एक कथा सुनो। कहीं पर कुछ साधु भिक्षा से सन्तोष कर हृष्ट-पुष्ट बने रहते थे। उन मोटे-ताजे साधुओं को देखकर कुछ मित्रों ने आपस में कहा - आश्चर्य है कि भीख माँगकर खानेवाले ये साधु भी इतने मोटे हुए हैं ॥१७८-१७९॥ तब उनमें से एक ने कहा - 'देखो मैं तुम्हें तमाशा दिखाता हूँ। भोजन करते हुए भी इन्हें मैं पहले के समान ही दुर्बल कर देता हूँ ॥१८०॥ ऐसा कहकर उसने उन साधुओं को क्रमशः अपने घर में निमन्त्रण देकर एक दिन बहुत- सुन्दर षड्रस भोजन कराया। वे मूर्ख साधु, उसके उत्तम और स्वादिष्ट भोजन का स्मरण करते हुए भिक्षा के भोजन से असन्तोष करने लगे और धीरे-धीरे दुर्बल हो गये ॥१८१ १८२॥ तब अपने मित्रों को बुलाकर उन साधुओं के सामने ही उस भोजन करानेवाले ने कहा- ॥१८३॥ 'मेरे यहाँ भोजन करने के पहले ये साधु भिक्षा के अन्न से ही हृष्ट-पुष्ट बने हुए थे। अब उस उत्तम भोजन का स्वाद पाकर इन्हें भिक्षा से असन्तोष हो गया इसलिए दुर्बल होने लगे ॥१८४॥ इसलिए, सुख चाहनेवाला बुद्धिमान् व्यक्ति मन को सदा सन्तुष्ट रखे। असन्तोष दोनों लोकों में असह्य और निरंतर दुःखदायी होता है' ॥१८५॥ इस प्रकार, उस मित्र से शिक्षा पाये हुए उसके मित्रों ने पापों के भांडार असन्तोष का त्याग कर दिया। सच है, सत्संग किसे कल्याणकारी नहीं होता ॥१८६॥
८७६ कथासरित्सागर
८७६ कथासरित्सागर सुवर्णमुग्धकथा अथ सुवर्णमुग्धस्य देवेदानीं निशम्यताम्। पुमान् कश्चिज्जल पातुं तडागमगमद्युवा ॥१८७॥ स जलोकोकहस्तस्य स्वर्णचूडस्य पक्षिणः। सुवर्णवर्णं तत्राम्भस्यपश्यत्प्रतिबिम्बकम् ॥१८८॥ सुवर्णमिति मत्वा तद्ग्रहीतुं प्रविवेश खम्। तडागं न च तत्राप दृष्टनष्टं चले जले ॥१८९॥ आरुह्यारुह्य च जले स तत्पश्यन् प्रविश्य तत्। पुनः पुनस्तडागाम्भो जिघृक्षुर्नाप किञ्चन ॥१९०॥ पित्रा च स्वेन दृष्टोऽथ पृष्टो निन्ये गृहं च सः। तां दृष्ट्वा प्रतिमां तोये खगं विद्राव्य बोधितः ॥१९१॥ निर्विमर्शा मृषाज्ञानैर्मुह्यन्त्येवमबुद्धयः। उपहास्याः परेषां च क्षोभ्याः स्वेषां भवन्ति च ॥१९२॥ मूर्खसेवकानां कथा अथ चान्यो महामूर्खवृत्तान्तोऽत्र निशम्यताम्। कस्याप्युष्ट्रोऽवसन्नोऽभूद्भारेण वणिजोऽध्वनि ॥१९३॥ स भृत्यानब्रवीत् कश्चिदुष्ट्रं गत्वान्यमानये। श्रित्त्वाधं योऽस्य करभस्याधं भारादितो हरेत् ॥१९४॥ मद्यागमं यथा वस्त्रपेटास्वेतासु न स्पृशेत्। अम्भश्चर्माणि युष्माभिस्तथा कार्यमिह स्थितैः ॥१९५॥ इत्युष्ट्रपार्श्वेऽवस्थाप्य भृत्यांस्तस्मिंस्ततो गते। वणिज्यकस्मादुन्नम्य प्रारेभे वर्षितुं घनः ॥१९६॥ तथा कार्यं यथा माम्भः पेटाश्चर्माणि संस्पृशेत्। इति न स्वामिना प्रोक्तमित्यालोच्याथ ते जडाः ॥१९७॥ कृष्ट्वा वस्त्राणि पेटाभ्यस्तैस्ते तान्यन्ववेष्टयन्। चर्माणि तेन वस्त्राणि विनेशुस्तेन वारिणा ॥१९८॥ पापा विमग्ने सकलो वस्त्रौघो नाशितोऽम्भसा। इत्यागतोऽथ स वणिक्क्रुद्धो भृत्यानभाषत ॥१९९॥ स्वयंवोदिष्टमुदकात् पेटाचर्माभिरक्षणम्। दोषस्तत्र च कोऽस्माकमिति तैऽपि तमभ्यधुः ॥२००॥
८७८ कथासरित्सागर
८७८ कथासरित्सागर घर्मस्वाद्रेषु नश्यन्ति वस्त्राणीति मयोदितम्। वस्त्राणामेव रक्षार्थमुक्तं वो न तु चर्मणाम्॥२०१॥ इत्युक्त्वा पान्यकरन्यस्तभारा वणिग्ततः। स गत्वा स्वगृहं भृत्यान् सर्वस्वं तानदण्डयत्॥२०२॥ एवमज्ञातहृदया मूर्खा कृत्वा विपर्ययम्। घ्नन्ति स्वार्थं परार्थं च तावुभावपि चोत्तरम्॥२०३॥ अपूपमुग्धकथा अथ चापूपिकामुग्धः सङ्क्षेपेण निशम्यताम्। क्रीणाति स्माप्यगः कश्चित्पणनाष्टावपूपकान्॥२०४॥ तेषां च यावत् षड्भुक्तं तावत्तेन न तृप्तवान्। सप्तमेनाथ भुक्तेन तृप्तिस्तस्योदपद्यत॥२०५॥ ततश्चक्रन्द स जडो मुषितोऽस्मि न किं मया। एष एवादितो भुक्तोऽपूपो येनास्मि तर्पितः॥२०६॥ नाशिताः किं वृथैवान्ये मया हस्तेन किं कृताः। इति शोचन् क्रमात्तृप्तिमजानञ्जहसे जनैः॥२०७॥ । ॥२०८॥ कस्यापि मूर्खसेवकस्य कथा कश्चिद्दासो हि वणिजा मूर्खः केनाप्यभाष्यत। रक्षेस्त्वं विपणीद्वारं क्षणं गेहं विशाम्यहम्॥२०९॥ इत्युक्तवति यातेऽस्मिन्वणिजि द्वारपट्टकम्। विपणीतो गृहीत्वांसे नाटो द्रष्टमगात्नटम्॥२१०॥ आगच्छंश्च ततो दृष्ट्वा वणिजा तेन भर्त्सितः। त्वदुक्तं रक्षितं द्वारं मयेदमिति सोऽब्रवीत्॥२११॥ अत्यनर्थाय सम्भवत्यरोक्तात्पर्यविजृम्भणम्। एष च महिषीमुग्धमपूर्वं शृणुताधुना ॥२१२॥ १ मूलपुस्तके श्लोकोऽयं लुप्तः।
दशम लम्बक ८७९
दशम लम्बक ८७९ 'चमड़े के भीगा होने से उसके भीतर रखे वस्त्र नष्ट हो जायेंगे-यह मैंने कपड़ों की रक्षा के लिए ही तो कहा था। चमड़े की रक्षा के लिए नहीं'—ऐसा कहकर उस बनिये ने ऊँट के दूसरे बच्चे पर भार लादा और वहाँ से घर गया। घर जाकर उसने सेवकों का सर्वस्व हरण करके उन्हें दंड दिया॥२ १२ २॥ इस प्रकार मूर्ख व्यक्ति हृदय की सच्ची भावना न समझकर सीधी बात को भी उल्टी समझते हैं और अपनी तथा दूसरों की हानि कर डालते हैं और वैसा ही उत्तर भी देते हैं॥२ १॥ अपूपमूर्ख की कथा इसी प्रकार मालपुए के मूर्ख की कथा संक्षेप में सुनो। किसी बटोही ने एक पैसे के आठ पूए खरीदे। उनमें से छह पूए खा लेने तक उसका पेट न भरा किन्तु सातवाँ पूवा खाते ही उसका पेट भर गया। यह देखकर वह खिसियाने लगा कि 'हाय मैं लुट गया। यदि मैं इस सातवें पूए को पहले खा जाता तो बाकी पूए नष्ट न होते। इसी एक से ही पेट भर जाता ? उसकी यह बात सुनकर वहाँ बैठ सभी व्यक्ति पेट पकड़-पकड़कर हँसने लगे ॥२ ४ २ ८॥ एक मूर्ख नौकर की कथा अब एक और महामूर्ख की कथा सुनो। किसी बनिये का मूर्ख सेवक था। बनिये ने उससे कहा-'दुकान के दरवाजे की रक्षा करना मैं थोड़ी देर के लिए घर जाता हूँ। बनिये के इस प्रकार कहकर चले जाने पर वह दुकान के दरवाजे को अपने कन्धे पर रखकर कहीं नट का खेल देखने चला गया। बनिये ने आकर जब यह देखा तब उसे खूब डाँटा। तब सेवक ने उत्तर दिया कि तुमने द्वार की रखवाली के लिए कहा था तब मैंने उसकी रक्षा कन्धे पर रखकर की ॥२ १-२११॥ इस प्रकार, किसी बात के भीतरी अर्थ को न समझकर मूर्ख केवल शब्द को ही पकड़ते हैं। इसी प्रकार एक महिष मूर्ख की कथा सुनो॥२१२॥
८०८ कथासरित्सागर
८०८ कथासरित्सागर घर्मस्वाङ्गेषु नश्यन्ति वस्त्राणीति मयोदितम्। वस्त्राणामेव रक्षार्थमुक्तं भो न तु घर्मणाम्॥२०१॥ इत्युक्त्वा भायकरभन्यस्तभारो वणिक्ततः। स गत्वा स्वगृहं भृत्यान् स्वस्वं तानवण्डयत्॥२०२॥ एवमज्ञातहृदया मूर्खा कृत्वा विपर्ययम्। घ्नन्ति स्वार्थं परार्थं च तावद्भवति नोत्तरम्॥२०३॥ अपूपमुग्धकथा अथ चापूपिकामुग्ध संक्षेपेण निशम्यताम्। क्रीणाति स्माप्यगं कश्चित्पणेनाष्टावपूपकान्॥२०४॥ तेषां च यावत् षड्भुङ्क्ते तावन्मेने न तृप्तताम्। सप्तमेनाथ भुक्तेन तृप्तिस्तस्योदपद्यत॥२०५॥ ततश्चक्रन्द स जडो मुषितोऽस्मि न किं मया। एष एवादितो भुक्तोऽपूपो येनास्मि तर्पितः॥२०६॥ नाशिता किं वृथैवाये मया हस्तेन किं कृताः। इति शोचन् क्रमात्तृप्तिमजानञ्जहसे जनैः॥२०७॥ । ॥२०८॥ कस्यापि मूर्खसेवकस्य कथा कश्चिद्दासो हि वणिजा मूर्खः केनाप्यमन्त्र्यत। रक्षेस्त्वं विपणीद्वारं क्षणं गेहं विशाम्यहम्॥२०९॥ इत्युक्तवति यातेऽस्मिन्वणिजि द्वारपट्टकम्। विपणीतो गृहीत्वाऽंसे वासो द्रष्टमगान्नटम्॥२१०॥ आगच्छंश्च ततो दृष्ट्वा वणिजा तेन भर्त्सितः। त्वदुक्तं रक्षितं द्वारं मयेदमिति सोऽब्रवीत्॥२११॥ हरयनर्थाय व्यर्थकपोरोक्षतात्पर्यविज्जडः। एवं च महिषीमुग्धमपूर्व शृणुताधुना॥२१२॥ १ मूलपुस्तके श्लोकोऽयं त्रुटितः।