कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
प्रथम तन्त्रम् ८२१ इस प्रकार, वह साधु मेरा सर्वस्व लेकर और हार का सिर पर रख लिया। तदनन्तर दोनों साधु निश्चिन्त होकर सो गये ।।११३।। उन दोनों के प्रसन्न होकर सो जाने पर भोजन चुराने के लिए पुनः आये हुए मुझे स्थायी साधु ने जगकर छड़ी से मेरे सिर पर मारा ।।११४।। उस प्रहार से आहत मैं बिल में भाग गया किन्तु भाग्यवश मरा नहीं। उसके पश्चात्, मुझमे उछलकर उससे भोजन लेने की शक्ति नहीं रह गई ।।११५।। धन ही पुरुषों का यौवन है और धन का अभाव ही बुढ़ापा है। धन के अभाव से मनुष्य का ओज तेज बल और रूप नष्ट हो जाता है।।११६।। तदनन्तर, केवल अपने पेट भरने का यत्न करने में ही किसी प्रकार समर्थ देखकर मेरे सभी साथी मुझे छोड़कर चले गये ।।११७।। जीवन-निर्वाह न कर सकनेवाले स्वामी को सेवक पुष्पहीन वृक्ष को भ्रमर, जल-रहित सरोवर को हंस चिरकाल तक उसका आश्रय पाकर भी छोड़ देते हैं।।११८।। इस प्रकार, वहाँ बहुत समय से रूठा हुआ मैं इस लघुपती कौए की मित्रता पाकर हे कण्ठश्रेष्ठ यहाँ तुम्हारे पास आ पहुँचा ।।११९।। हिरण्यक के ऐसा कहने पर मन्थरक कछुआ बोला--मित्र यह तुम्हारा अपना ही स्थान है। अतः तुम अधीर न होना ।।१२ ।। गुणी के लिए कोई विदेश नहीं है। सन्तोषी के लिए कोई दुःख नहीं। धैर्यशाली के लिए कोई विपत्ति नहीं और उद्योगी के लिए कोई कार्य असाध्य नहीं ।।१२१।। कछुआ जब इस प्रकार कह ही रहा था कि बहेलिये से डरा हुआ चित्रांगद नाम का एक हिरण दूर से उस वन में आ पहुँचा ।।१२२।। उसे देखकर और उसके पीछे बहेलिये को न आते देखकर उसे धीरज बँधाकर कौए कछुए आदि मित्रों ने उसके साथ भी मित्रता कर ली ।।१२३।। परस्पर एक दूसरे की सहायता करते हुए वे चारों सु-हृदय मित्र सुखपूर्वक उस वन में साथ ही रहने लगे ।।१२४।। एक बार बहुत देर तक चित्रांगद को न आते हुए देखकर, उसे देखने के लिए वह लघुपती कौआ ऊँचे वृक्ष पर चढ़कर चारों ओर उस वन को देखने लगा ।।१२५।। और उसने नदी के एक किनारे पर बील और जाल में बँध हुए चित्रांगद को देखा। आकर यह समाचार उसने चूहे तथा कछुए से कहा ।।१२६।। तब आपस में विचार कर कौआ उस हिरण्यक चूहे को साथ ले जाकर बँधे हुए चित्रांगद के पास ले गया ।।१२७।।
नीत्वा च तन्मे सर्वस्वं हारं मूर्ध्नि निधाय च। आगन्तुस्थायिनौ हृष्टौ प्रव्राजौ स्वपतः स्म तौ ॥११३॥ प्रसुप्तयोस्तयोस्त्वं च हर्तुं मां पुनरागतम्। प्रबुद्ध्याताडयद्यष्ट्या प्रद्राट् स्थायी स मूर्ध्नि मे ॥११४॥ तेनाहं व्रणितो दैवान्न मृतो बिलमाविशम्। भूयश्च शक्तिर्नाभून्मे तदन्नाहरणप्लवे ॥११५॥ अर्थो हि यौवनं पुंसां तदभावश्च वार्द्धकम्। तन्नाश्योजो बलं रूपमुत्साहश्चापि हीयते ॥११६॥ अथात्ममात्रभरणे यत्नवन्तमवेक्ष्य माम्। परित्यज्य गतं सर्वं स मूषकपरिच्छदः ॥११७॥ अवृत्तिकं प्रभुं भृत्या अपुष्पं भ्रमरास्तरुम्। अजलं च सरो हंसा मुञ्चन्त्यपि चिरोषितम् ॥११८॥ इत्थं तत्र चिरोद्विग्नः सुहृदं लघुपतिनम्। प्राप्यैतं कच्छपश्रेष्ठं त्वत्पार्श्वमहमागतः ॥११९॥ एवं हिरण्यकेनोक्ते कूर्मो मन्थरकोऽभ्यधात्। स्वमत्र स्थानमत्से तन्मा मित्राधृतिं कृथाः ॥१२०॥ गुणिनो न विदेशोऽस्ति न सन्तुष्टस्य चासुखम्। धीरस्य च विपन्नास्ति नासाध्यं व्यवसायिनः ॥१२१॥ इति तस्मिन् वदत्येव कूर्मे चित्राङ्गसंज्ञकः। दूरतो व्याधवित्रस्तो मृगस्तद्भवनमाययौ ॥१२२॥ तं दृष्ट्वा तस्य दृष्ट्या च पश्चाद् व्याधमनागतम्। आश्वासितेन तेनापि सख्यं कूर्मादयो व्यधुः ॥१२३॥ न्यवसस्ते ततस्तत्र काककूर्ममृगाखवः। परस्परोपकारेण सुखिनः सुहृदः समम् ॥१२४॥ एकदा क्वापि चित्राङ्गं चिरायातं तमीक्षितुम्। आरुह्य तरुमशिष्टं लघुपती स तद्वनम् ॥१२५॥ ददर्श च नदीतीरे कीलपाशेन संयतम्। चित्राङ्गमवदच्चैतत्तत्त्वदत्त्वाऽलुकूर्मयोः ॥१२६॥ तत सम्मन्त्र्य चञ्च्वा तं गृहीत्वाऽमुं हिरण्यकम्। चित्राङ्गस्यान्तिकं तस्य लघुपती निनाय सः ॥१२७॥
षष्ठम लम्बक ४२३
षष्ठम लम्बक ४२३ तब हिरण्यक ने जाल को दाँतों से काटकर क्षण-भर में जाल से बँधे हुए चित्रांगद को मुक्त कर दिया ॥१२८॥ तबतक नदी के मध्य से आकर मन्थरक कछुआ भी उनके पास किनारे पर आकर मिल गया ॥१२९॥ उसी समय जाल बाँधनेवाले बहलिये ने आकर मृग चूहे और कौए के भाग जाने पर उस कछुए को ही पकड़ लिया ॥१३०॥ हिरन के भागने से व्याकुल बहलिये ने कछुए को घास में रखकर, उसी से सन्तोष किया और घर की ओर चल पड़ा। उसके चलने पर दूरदर्शी हिरण्यक के परामर्शानुसार वह मृग कुछ दूर जाकर और गिरकर मुर्दे के समान पड़ गया और कौआ उसके सिर पर बैठकर मानों उसकी आँखें निकालने लगा ॥१३१ १३२॥ बहलिये ने दूर से हिरन को मरा समझकर और कछुए को घास-सहित नदी के किनारे रखकर मृग को लेने का प्रयत्न किया ॥१३३॥ उसे दूसरी ओर जाते हुए देखकर चूहे ने जाल काटकर कछुए को मुक्त कर दिया और वह नदी में कूद पड़ा ॥१३४॥ हिरन भी कछुए को रखकर आते हुए बहेलिये को देखकर छलांग मारकर भागा और कौआ उड़कर वृक्ष पर बैठ गया ॥१३५॥ उधर से निराश लौटकर आए हुए बहेलिये ने जाल काटकर भाग हुए कछुए को भी न पाकर, दोनों ओर से हताश होकर अपने भाग्य को कोसा और अन्त में वह अपने घर चला गया ॥१३६॥ तब वे चारों मित्र फिर आपस में मिले और प्रेमी मृग उनसे बोला- ॥१३७॥ मैं भाग्यवान् हूँ कि आपलोग जैसे सच्चे और सहृदय मित्र मुझे मिले जिन्होंने अपने प्राणों की भी परवाह न करके मुझे मौत के पंजे से उबार लिया ॥१३८॥ इस प्रकार उस हिरण से प्रशंसित वे चारों मित्र कौआ कछुआ चूहा और हिरण उस वन में परस्पर प्रेम के साथ सुखी होकर रहने लगे ॥१३९॥ इस प्रकार पशु भी बुद्धि से अपना कार्य सिद्ध कर लेते हैं। वे भी अपने प्राणों की चिन्ता न करके आपत्तिके समय मित्र को नहीं छोड़ते ॥१४०॥ मित्रों में परस्पर ऐसी आसक्ति कल्याणकारी होती है, किन्तु यह ईर्ष्या के कारण स्त्रियों में प्रशंसनीय नहीं होती। इस सम्बन्ध में कथा सुनो ॥१४१॥ ईर्ष्यालु पुरुष और उसकी दुष्ट स्त्री की कथा किसी नगर में कोई ईर्ष्यालु पुरुष था। उसकी स्त्री बहुत रूपवती थी और उसे बहुत प्यारी थी ॥१४२॥
८२२ कथासरित्सागर
८२२ कथासरित्सागर हिरण्यकश्च तं बन्धविधुरं मूषको मृगम्। क्षणादमुञ्चदाश्वास्य दशनच्छिन्नपाशकम्॥१२८॥ तावन्मन्थरकोऽभ्येत्य नदीमध्यान् कच्छपः। आरुरोह तटं तेषां निकटं स सुहृत्प्रियः॥१२९॥ तत्क्षणं स कुतोऽप्येत्य लुब्धकः पाशदायकः। विद्रुतेषु मृगाद्येषु लब्ध्वा तं कूर्ममग्रहीत्॥१३०॥ क्षिप्त्वा च जालकान्तस्तं यावन्नष्टमृगाकुलः। स याति तावद्दृष्ट्वैतद् दीर्घदृश्वासुवाक्यत॥१३१॥ भृगो गत्वा ततो दूरं पतित्वासीन्मृतो यथा। काकस्तु मूर्ध्नि तस्यासीच्चक्षुषी पाटयन्निव॥१३२॥ तद्दृष्ट्वा स गृहीत तं व्याधो मत्वा मृगं मृतम्। गन्तुं प्रवृते नद्यास्तटं कूर्म्म निधाय तम्॥१३३॥ यात दृष्ट्वा तमभ्येत्य मूषकस्तस्य जालकम्। कूर्मस्य सोऽच्छिनत्तेन मुक्तो नद्यां पपात स ॥१३४॥ मृगोऽपि निकटीभूतं व्याधं वीक्ष्य विकच्छपम्। उत्थाय स पलाय्यागात् काकोऽप्यारुडवांस्तरुम्॥१३५॥ एत्य व्याधोऽत्र कूर्मं तं वत्सबच्छेदपलायितम्। अप्राप्तोभयविभ्रष्टो दैव शोचन्नगाद् गृहम्॥१३६॥ ततो मिलन्ति स्मैकत्र हृष्टाः कूर्मादयोऽत्र ते। मृगस्तु प्रीतिमानेवं कूर्मादींस्तानभाषत स॥१३७॥ पुण्यवानस्मि यत्प्राप्ता भवन्तः सुहृदो मया। प्राणानुपस्कृत्य यैरेष मृत्योरहमुद्धृतः॥१३८॥ एवं प्रशंसता तेन मृगेण सह तत्र ते। अन्योन्यप्रीतिसुखिताः काककूर्मसखोऽवसन्॥१३९॥ प्रज्ञया साधयन्त्येव विर्य्यल्पोऽपि समीहितम्। प्राणैरपि न मुञ्चन्ति तेऽन्येव मित्रमापदि॥१४०॥ एवं च श्रेयसी मित्रष्वासक्तिर्नाङ्गनासु ताम्। इर्ष्याय मत्त्याच्छंसन्ति तथा च श्रूयतां कथा॥१४१॥ ईर्ष्याकुपुरुषस्य तस्य च दुष्टस्त्रियःकथा नगर क्वापि कोऽप्यासीदीर्ष्यावान्नृप प्रभो। बभूव तस्य भार्या च वल्लभा रूपशालिनी॥१४२॥
दशम लम्बक ८२५
दशम लम्बक ८२५ वह अविश्वासी पति उसे कभी अकेला नहीं छोड़ता था। वह चित्रस्थ पुरुषों से भी उसके चरित्र के पतन की आशंका करता था ॥१४३॥ एकबार किसी आवश्यक कार्य से वह पुरुष पत्नी को साथ ही लेकर दूसरे देश को गया॥१४४॥ आगे के जंगली मार्ग में वह भीलों को देखकर भय से अपनी पत्नी को एक गांव के बूढ़े ब्राह्मण के घर में रखकर उस जंगल में गया ॥१४५॥ उस ब्राह्मण के घर रहती हुई उस स्त्री ने उस मार्ग से भीलों को जाते हुए देखा और एक युवा भील के साथ वह निर्लज्ज स्त्री ईर्ष्यालु पति को छोड़कर इस प्रकार निकल भागी जैसे वेगवती नदी बाँध तोड़कर निकल जाती है ॥१४६ १४७॥ जब उसका पति अपना कार्य समाप्त करके वहाँ आया तब उसने उस ग्रामीण वृद्ध से अपनी स्त्री की मांग की ॥१४८॥ 'मैं नहीं जानता कि वह कहाँ गई, इतना अवश्य है कि यहाँ कुछ भील आये थे सम्भवतः वे ही उसे ले गये हों। भीलों का वह गाँव भी यहीं पास में है। शीघ्र जाओ। तुम्हें स्त्री मिलेगी। मेरे प्रति कुछ विपरीत बुद्धि न करो' ॥१४९ १५०॥ ब्राह्मण से इस प्रकार कहा गया वह रोता-कलपता और अपनी बुद्धि की निन्दा करता हुआ भीलों के गाँव में गया और वहाँ जाकर उसने अपनी पत्नी को भी देखा ॥१५१॥ वह पापिन स्त्री भी उसे देखकर डरी हुई-सी उसके पास आकर बोली- मेरा अपराध नहीं है। मुझे भील बलपूर्वक ले आया' ॥१५२॥ 'चलो जबतक कोई देखता नहीं यहाँ गाँव में चलें। इस प्रकार कहते हुए उस प्रेमान्ध पति से वह बोली —॥१५३॥ 'शिकार पर गये हुए उस भील के आने का समय हो गया है। आने पर वह पीछे दौड़कर मुझे और तुझे दोनों को मार डालेगा ॥१५४॥ इसलिए, इस गुफ़ा में घुस कर बैठो। रात में सोये हुए उसे मारकर निडर होकर चलेंगे ॥१५५॥ उस दुष्टा स्त्री से इस प्रकार कहा गया वह मूर्ख उसी गुफा में घुसकर बैठ गया क्योंकि काम से अन्ध व्यक्ति के हृदय में विवेक के लिए स्थान नहीं होता ॥१५६॥ उस दुष्टा स्त्री ने सायंकाल घर पर आये हुए उस भील को दुर्बलमन के कारण आया हुआ अपना पति दिखा दिया ॥१५७॥ १ ४
८२६ कथासरित्सागर
८२६ कथासरित्सागर स च निष्कृष्य तं भिल्लः क्रूरकर्मा पराक्रमी। प्रातर्देव्युपहारार्थं बबन्ध सुदृढं तरौ ॥१५८॥ भुक्त्वा च पश्यतस्तस्य रात्रौ तद्भार्यया सह। स समासेव्य सुरतं सुखं सुष्वाप तद्गृहे ॥१५९॥ तं दृष्ट्वा सुप्तमीर्ष्यालुः स पुमांस्तारुसङ्गतः। चण्डीं स्तुतिभिरभ्यर्च्य ययौ शरणमार्त्तितः ॥१६०॥ साविर्भूय वरं तस्मै तं ददौ येन तस्य सः। तत्खङ्गेनैव भिल्लस्य स्रस्तबन्धोऽच्छिनच्छिरः ॥१६१॥ एहीदानीं हतः पापो मयायमिति सोऽथ ताम्। प्रबोध्य भार्यां वक्ति स्म साप्युत्तस्थौ सुदुःखिता ॥१६२॥ गृहीत्वा तस्य च शिरो भिल्लस्यालक्षितं निशि। ततः प्रतस्थे कुस्त्री सा परया तेन सहैव च ॥१६३॥ प्रातश्च नगरं प्राप्य दर्शयन्ती शिरोऽत्र तत्। भर्त्ता हतो मेऽनेनेति चक्रन्दाक्रम्य तं पतिम् ॥१६४॥ ततः स नीतस्तद्युक्तो राजाग्रे पुररक्षिभिः। पृष्टस्तत्र यथावृत्तमीर्ष्यालुस्तदवर्णयत् ॥१६५॥ राजाथ तत्त्वमन्विष्य च्छेदयामास कुस्त्रियः। तस्याः कर्णौ च नासां च तत्पतिं च मुमोच तम् ॥१६६॥ स मुक्तः स्वगृहं प्रायात्कुस्त्रीस्नेहग्रहोज्झितः। एवं हि कुरुते देव योषिदीर्ष्यानिमन्त्रिता ॥१६७॥ शिक्षयन्त्यन्यपुरुषप्रसङ्गमीर्ष्यैव हि स्त्रियः। तदीर्ष्यामप्रकाश्यैव रक्ष्या नारी सुबुद्धिना ॥१६८॥ रहस्यं च न वक्तव्यं वनितासु यथा तथा। पृष्टेनापृच्छता क्षेममत्र च श्रूयतां कथा ॥१६९॥ नागपद्मयोः कथा नागः कश्चित् पुराप्यासीत् कुत्रचिद् गणिकागृहे। मानुषं रूपमास्थाय वैनतेयभयाद् भुवि ॥१७०॥ गणिकाप्यग्रहीद् भाटि सा हस्तिशतपञ्चकम्। स्वप्रभावाच्च तस्यै स नागः प्रत्यहं ददौ ॥१७१॥ कुतोऽन्वहमियन्तस्ते हस्तिनो ब्रूहि को भवान्। इति निर्बध्नती नाथं तं पप्रच्छ विलासिनी ॥१७२॥
शशम लम्बक ८२७
शशम लम्बक ८२७ उस क्रूर और पराक्रमी भील ने उसे गुफा के बाहर निकालकर, प्रातः काल देवी की बलि देने के लिए, एक पेड़ में कसकर बाँध दिया ॥१५८॥ और, भोजन करके रात में उसके देखते-ही-देखते उसकी स्त्री के साथ व्यभिचार किया। तदुपराम्त उसे साथ लेकर आनन्द से सो गया ॥१५९॥ पेड़ से बँधे हुए उस ईर्ष्यालु पुरुष ने उस भील को सोये हुए देखकर चंडी की स्तुति करके अत्यन्त दीन भाव से शरण की प्रार्थना की ॥१६ ॥ चंडी ने प्रकट होकर उसे वरदान दिया जिससे वह बन्धना से मुक्त हो गया। तदनन्तर, उसी की तलवार से ईर्ष्यालु ने भील का सिर काट दिया और अपनी स्त्री को जगाकर चलने के लिए कहने लगा। वह भी उठी और दुःख से उसके साथ जाने को तैयार हुई ॥१६१-१६२॥ वह दुष्टा उस भील के कटे सिर को चुपके-से अपने संग रखकर पति के साथ चल पड़ी। रात के अँधेरे में वह ईर्ष्यालु अपनी दुष्ट स्त्री की यह चाल लख नहीं सका ॥१६३॥ प्रातःकाल किसी नगर में पहुँचकर वहाँ वह भील का सिर दिखाकर और पति को हत्यारा बताकर रोने-चिल्लाने लगी ॥१६४॥ तब नगर के रक्षक (सिपाही) उस स्त्री को उसके पति के साथ राजा के सामने ले गये। वहाँ पूछे जाने पर उसने सच्चा समाचार राजा को सुना दिया ॥१६५॥ तदनन्तर, उस देश के राजा ने यथार्थ बात का पता लगाकर उस दुष्ट स्त्री के नाक-कान कटवा दिये और उसके पति को छोड़ दिया ॥१६६॥ वह उसका पति भी उस दुष्ट स्त्री के स्नेह-रूपी ग्रह से छूटकर किसी प्रकार अपने घर आया। 'महाराज ! ईर्ष्या से पागल स्त्री इस प्रकार के कांड कर डालती है ॥१६७॥ पुरुष की यह ईर्ष्या ही स्त्री को पर पुरुष का संग कराना सिखाती है। इसलिए, ईर्ष्या को छिपाकर ही बुद्धिमान् पुरुष को नारी की रक्षा करनी चाहिए ॥१६८॥ और अपना भला चाहनेवाले पुरुष को अपनी गुप्त बात कदापि स्त्री से प्रकट नहीं करनी चाहिए। इस विषय पर एक कथा सुनो ॥१६९॥ नाग और गरुड की कथा यह पर एक नाग मनुष्य का रूप धारण करके गरुड के भय से भागकर भूमि पर आकर किसी वेश्या के घर में रहता था ॥१७०॥ वेश्या ने उससे प्रतिदिन का मूल्य पाँच सौ हाथी माँगा। वह नाग भी अपने प्रभाव से उसे प्रति दिन पाँच सौ हाथी देता था ॥१७१॥ एकबार उस वेश्या ने नाग से बड़े ही आग्रह के साथ पूछा कि 'तुम्हें प्रति दिन इतने हाथी कहाँ से मिलते हैं सच बताओ और यह भी कहा कि तुम कौन हो ? ॥१७२॥
८९८ कथासरित्सागर
८९८ कथासरित्सागर मा वाचं कस्यचित्तातदयामयादेवमिह स्थितः। नागोऽहमिति वक्ति स्म सोऽपि तां मारमोहितः ॥१७३॥ सा तद्रहसि कुट्ट्यै शशंस गणिका ततः। अथ तार्क्ष्यो जगच्चिन्त्यस्तत्रागात् पुरुषाकृतिः ॥१७४॥ उपेत्य कुट्टनीं तां च जगाद त्वत्सुतागृहे। अहमद्य वसाम्यार्ये भाटकं मे गृह्यतामिति ॥१७५॥ इह नागः स्थितो नित्यमिमां पञ्चशतीं ददत्। तत्किमेवाहमादद्येति कुट्टन्यपि जगाद तम् ॥१७६॥ ततः स गरुडो नागं तत्र स्थितमवेक्ष्य तम्। विवेशातिथिभावेन तद्वारवनितागृहम् ॥१७७॥ तत्र प्रासादपृष्ठस्थं नागं तमवलोक्य सः। प्रकाश्यत्मानमुत्पत्य जघान च जघास च ॥१७८॥ अतो न कथयेत् प्राज्ञो रहस्यं स्त्रीष्वनर्गलम्। इत्युक्त्वा गोमुखो मुग्धकथां पुनरवर्णयत् ॥१७९॥ केशमूर्खकथा ताम्रकुम्भोपमशिरा कोऽप्यासीत् खलतिः पुमान्। स च मूर्खोऽर्थवांल्लोके लज्जते स्म कचैर्विना ॥१८०॥ अथ धूर्तस्तमागत्य काञ्चुकाद्योपजीविकः। एकोऽस्ति वैद्यो यो वेत्ति केशोत्पादनमौषधम् ॥१८१॥ एतच्छ्रुत्वा तमाह स्म तमानयसि चेन्मम। ततोऽहं तव दास्यामि धनं वैद्यस्य तस्य च ॥१८२॥ एवमुक्तवतस्तस्य धनं भुक्त्वाचिरेण सः। मुग्धस्यानीतवानेकं धूर्तो धूर्तचिकित्सकम् ॥१८३॥ उपजीव्य चिरं सोऽपि खल्वाटं तं भिषक्छिरः। अपास्य खर्पणं युक्त्वा मुग्धायात्मानमदर्शयत् ॥१८४॥ तद्दृष्ट्वाप्यविमर्शी सन् वैद्यं केशार्थमौषधम्। सं ययाचे स बद्धधीस्ततो वैद्योऽब्रवीत् स तम् ॥१८५॥ खल्वाटः स्वयमन्यस्य जनयेयं कचं कथम्। इति ते मूर्ख निर्लोम दर्शितं स्वशिरो मया ॥१८६॥ तथापि त्वं न वेत्स्यत्र धिगित्युक्त्वा ययौ भिषक्। एवमेव सदा धूर्ता क्रीडन्ति जडबुद्धिभिः ॥१८७॥
द्वादश लम्बक ८२९
द्वादश लम्बक ८२९ किसी से कहना नहीं गरुड़ के भय से यहाँ ठहरा हुआ मैं नाग हूँ। काम-मोहित उस नाग ने इस प्रकार अपना रहस्य उसे बता दिया ॥१७३॥ तब उस वेश्या ने यह बात एकान्त में अपनी माँ (कुट्टनी) से कह दी। कुछ दिनों के पश्चात् दैवयोग से पुरुष के रूप में नागा को ढूँढ़ता हुआ गरुड़ भी वहाँ आ पहुँचा और कुट्टनी के पास जाकर बोला कि आज मैं तुम्हारी बेटी के पास रहना चाहता हूँ मुँह माँगा मूल्य ले लो ॥१७४-१७५॥ कुट्टनी ने उससे कहा—'यहाँ एक नाग रहता है जो प्रतिदिन पाँच सौ हाथी देता है। तो एक दिन के मूल्य का क्या होता है ॥१७६॥ तब गरुड़ ने वहाँ पर ठहरे हुए उस नाग को जानकर अतिथि के रूप में वेश्या के घर में प्रवेश किया ॥१७७॥ वहाँ शयन के ऊपर बैठे हुए नाग को उसने देखा और अपने को प्रकट कर वह उछला और उस नाग को मारकर खा गया ॥१७८॥ 'इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति निरंकुश होकर स्त्रियों को कोई भी अपना गुप्त भेद न बताये' ऐसा कहकर गोमुख ने फिर मूर्खों की कथा कहनी प्रारम्भ की। ॥१७९॥ बेतालमूर्ख की कथा एक यथानामघट (ताँबे के घट) के पेटे के समान महान् सिरवाला था। किन्तु वह मूर्ख घट था और सिर पर बाल न होने के कारण समाज में लज्जित होता था ॥१८०॥ कुछ दिनों के पश्चात् उसका एक धूर्त अनुजीवी आकर उससे बोला—'एक वैद्य है जो बालों को उत्पन्न करने की ओषधि जानता है ॥१८१॥ यह सुनकर वह गंजा धनी बोला—'यदि तुम उस ओषधि को मँगा दो तो मैं तुम्हें और वैद्य को भी धन दूँगा ॥१८२॥ यह सुनकर सिरवाल उस उसका धन खाकर उस धूर्त उसने जिस एक धूर्त वैद्य को ले आया ॥१८३॥ बहुत दिनों तक उस मूर्ख का धन खाकर उस धूर्त वैद्य ने किसी युक्ति से अपनी पत्नी बुलाकर उस मूर्ख को धोखा भी क्या फिर सिखाया ॥१८४॥ वैद्य का गंजा देखकर भी उस मूर्ख ने गुप्त वैद्य युक्ति को समर्पण न दी। तब वैद्य ने उस मूर्ख से कहा— मैं स्वयं राजा दुःशासन सिर पर बाल पैदा करना चाहता हूँ। इसमें बहुत लगा है कारण इस लिए विश्वास था ॥१८५-१८६॥ जब मेरी स्त्री नहीं मानती तो ही विश्वास है मुझे। इस प्रकार कहकर वह वैद्य चला गया। इस प्रकार बाल बनने नहीं देखे उसके बाल भी पैदा करवा दिये ॥१८७॥
८२ कथासरित्सागर
८२ कथासरित्सागर
तैलमुग्धकथा
अथ श्रुता वरामुग्धस्तरङ्गमुग्धा निशम्यताम्। मुग्धोऽभूत् पुरुषः कश्चिद् भृत्यः शिष्टस्य कस्यचित् ॥१८८॥ स तेन स्वामिना तैलमानेतुं वणिजोऽन्तिकम्। प्रेषितो जातु तत्तस्मात् पात्रे तैलमुपाददे ॥१८९॥ तैलपात्रं गृहीत्वा सदागच्छंस्तेन केनचित्। ऊचे मित्रेण रक्षेव तैलपात्रं प्रयत्नतः ॥१९०॥ तच्छ्रुत्वा वोक्षितुमथ पात्रं तत्पर्यवर्तयत्। स मूढस्तेन तत्सर्वं तैलं तस्यापतद् भुवि ॥१९१॥ तद्बुद्ध्वा लोकहास्योऽसौ निरस्तः स्वामिना गृहात्। तस्मात् स्वबुद्धिर्मुग्धस्य वरं न त्वनुशासनम् ॥१९२॥
अस्थिमुग्धकथा
तैलमुग्धः श्रुतस्तावदस्थिमुग्धो निशम्यताम्। अभून्मूर्खः पुमान् कश्चिद् भार्याभूतस्य चासती ॥१९३॥ सा तस्मिन्नेकदा पत्यौ कार्याद्देशान्तरं गते। दत्तस्तम्भशिखां स्वामाप्तां कर्मकरीं गृहे ॥१९४॥ अनन्यवासीं संस्थाप्य निर्गत्यैवान्ततस्ततः। ययावुपपतेर्गेहं निर्गन्तुंसुसज्जिता ॥१९५॥ अथागतं तत्पतिं सा स्थितशिखाधुग्दग्दवम्। कर्मकर्यभवद् भार्या मृता दग्धा च सा तव ॥१९६॥ इत्युक्त्वा सा श्मशानं च नीत्वा तत्प्रत्यदर्शयत्। अस्थीन्यन्यचितास्थानि तान्यादाय रुदंश्च सः ॥१९७॥ कृतोदकोऽथ तीर्थेषु प्रक्षिप्यास्थीनि तानि च। प्रावर्त्तत स भार्यायास्तस्याः श्राद्धविधौ जडः ॥१९८॥ सद्विप्रं वरमुपानीतं कर्मकर्या तयैव च। तमेव भार्योपपतिं श्राद्धविप्रं चकार सः ॥१९९॥ ततोपपतिना सार्धं तद्भार्याऽभ्येत्य तत्र सा। उदारवेषा भुङ्क्ते स्म मृष्टान्नं मासि मासि तत् ॥२००॥ सतीधर्मप्रभावेण भार्या ते परलोकतः। पश्यागत्य स्वयं भुङ्क्ते ब्राह्मणेन समं प्रभो ॥२०१॥
दशम लम्बक ८११
दशम लम्बक ८११ तैलमूर्ख की कथा यह तो केशमूर्ख की कथा हुई अब तैलमूर्ख की कथा सुनो। किसी सज्जन के यहाँ एक मूर्ख सेवक था ॥१८८॥ उसे मालिक ने बनिये के पास तैल लाने के लिए भेजा। वह एक पात्र में बनिये से तैल लेकर चला ॥१८९॥ जब वह तैल का पात्र लेकर इधर आ रहा था तब उसके किसी मित्र ने उससे कहा—'देखो ध्यान दो। तैल का पात्र नीचे से चू रहा है' ॥१९० ॥ यह सुनकर उसने नीचे का भाग देखने के लिए उस पात्र को उलटा दिया और सारा तैल भूमि पर गिर पड़ा ॥१९१॥ यह देखकर लोग उसे हँसने लगे और स्वामी ने भी उसे नौकरी से निकाल दिया। इसलिए, मूर्ख की अपनी बुद्धि ही अच्छी उसे उपदेश न देना चाहिए ॥१९२॥ अस्थिमूर्ख की कथा तैलमूर्ख की कथा सुनी अब अस्थिमूर्ख की कथा सुनो। एक मूर्ख पुरुष था और उसकी स्त्री व्यभिचारिणी थी ॥१९३॥ एक बार वह मूर्ख किसी कार्यवश दूसरे देश को गया। तब उसकी दुष्टा स्त्री ने अपने घर में काम करनेवाली सेविका को सिखा-पढ़ाकर अपना विश्वासी बना लिया और उस मन्द के लिए अपनी सेविका बनाकर अपने जार के साथ वह निश्चिन्तता-पूर्वक रमण करने लगी और उसने (स्वामी के) घर पर जा बैठी ॥१९४-१९५॥ कुछ समय पश्चात् घर आये हुए उस पति को पहले से ही सिखाई-पढ़ाई हुई दासी ने आँसुओं के साथ गद्गद स्वर में कहा—'तुम्हारी पत्नी मर गई और फेंक भी दी गई। ऐसा कहकर उसने उसे श्मशान में ले जाकर उसके दाहस्थान को दिखा दिया और दूसरे की एकत्र की हुई हड्डियाँ भी उसकी पत्नी की बताकर दिखा दीं। वह मूर्ख उन हड्डियों को लेकर रोने लगा ॥१९६॥ तदनन्तर उसका पिण्ड आदि कर्म करके और उसकी हड्डियों को किसी तीर्थ में प्रवाहित करने का मार्ग उसकी श्राद्ध-क्रिया में लग गया ॥१९८॥ उसी दासी से अपना अग्राधिकारी ब्राह्मण बताकर लाये हुए पत्नी के जार को ही उसने श्राद्ध का ब्राह्मण बनाया और जिमाने लगा ॥१९ ॥ उसकी स्त्री भी प्रतिप्रयाण आदि पात्र के साथ आकर अन्य पंक्ति में यहाँ बने गुप्त पदार्थों का भोजन करती थी ॥२० ॥ और वह दासी उस अस्थिमूर्ख से कहती थी—स्वामिन् आपकी पत्नी सती धर्म के प्रभाव से परलोक न जाकर ब्राह्मण के साथ बैठकर स्वयं तुम्हारे यहाँ भोजन करती है ॥२०१॥
८१२ कथासरित्सागर
८१२ कथासरित्सागर इति कर्मकरी सा तमवोचत् तत्पतिं यथा। तत्तव प्रतिपेदे तत्सर्वं मूर्खशिरोमणिः ॥२०२॥ वञ्च्यन्ते हृदयैरेव कुस्त्रीभिः सरलाशयाः। धूतोऽन्यिन्मुग्धचण्डालकन्यका श्रूयतां त्वया ॥२ ३॥ चण्डालकन्यका कथा अभूद्रूपवती कापि मुग्धा चण्डालकन्यका। सार्वभौमवरप्राप्तौ सङ्कल्पं हृदि साकरोत् ॥२०४॥ सा मातु दृष्ट्वा राजानं नगरभ्रमनिर्गतम्। सर्वोत्तमं भर्तृबुद्धेरनुयातुं प्रचक्रमे ॥२०५॥ तावदागात् पथा तेन मुनिस्तस्य प्रणम्य सः। पादौ गजावरूढः सन् राजा स्वभवनं ययौ ॥२ ६॥ तद्दृष्ट्वा राजतोऽप्येनं विचिन्त्य मुनिमुत्तमम्। चण्डालकन्या राजानं त्यक्त्वा सा मुनिमन्वगात् ॥२०७॥ मुनिः सोऽपि व्रजन् दृष्ट्वा शून्यमग्रे शिवालयम्। न्यस्तजानुः क्षितौ तत्र शिवं मत्वा ययौ ततः ॥२०८॥ तद्वीक्ष्य सान्त्यजा मत्वा मुनेरप्युत्तमं शिवम्। भर्तृबुद्ध्या मुनिं त्यक्त्वा बंव तत्रव स्थियिये ॥२ ९॥ क्षणाच्चात्र प्रविश्य श्वा देवस्याहृत्य पीठिकाम्। जङ्घामुत्क्षिप्य जातोत्सर्गस्तस्य तद्व्यधात् ॥२१ ॥ तद्विलोक्यान्त्यजा गत्वा देवान्छ्वानं समुत्तमम्। यान्तं तमेवान्वगात् सा त्यक्त्वा देवं प्रतीच्छ्या ॥२११॥ श्वा चागत्यथ चण्डालगृहं परिचितस्य सः। चण्डालसूनोः प्रणयाल्लुलोठक्रमयोः पादयोः ॥२१२॥ तवालोक्योत्तमं मत्वा शुनश्चाण्डालपुत्रकम्। स्वजातितुष्टा वव्रे सा तमेव पतिमन्त्यजा ॥२१३॥ एवं कृतपदा दूरे पतन्ति स्वपदे जडाः। एव च मूर्खं राजानं सक्षेपमपरं शृणु ॥२१४॥ कृपणस्य राज्ञः कथा मूर्खः कश्चिद्भूदाजा कृपणः कोपवानपि। एकदा जगदुस्त्वैव मन्त्रिणस्तं हितैषिणः ॥२१५॥ दानं हरति देहह दुर्गति पारलौकिकीम्। तद्देहि दानमायूंषि भङ्गुराणि धनानि च ॥२१६॥ सञ्छ्रवा स नृपोऽवादीत् दानं दास्याम्यहं तदा। दुर्गतिं प्राप्स्यात्मानं मृतो द्रक्ष्यामि चेन्निति ॥२१७॥
षष्ठम लम्बक ८३३
षष्ठम लम्बक ८३३ वह मूलराज यह सब सच मानकर प्रसन्न हो गया। इसी प्रकार, सीधे-सादे हृदयवाले लोग दुष्ट स्त्रियों द्वारा खेल-खेल में ही ठगे जाते हैं। 'महाराज तुमने अस्थिमूर्ख की कथा सुनी अब एक मूर्खा चण्डाली की कथा सुनो ॥२२३॥ मूर्खा चण्डालकन्या की कथा एक मूर्ख और सुन्दरी चंडालकन्या थी। उसने सबसे बड़े पति की प्राप्ति के लिए मन में संकल्प किया ॥२२४॥ उसने किसी समय नगर भ्रमण के लिए निकले राजा को देखकर उसे पति बनाने के लिए उसके पीछे चलना प्रारम्भ किया ॥२२५॥ इतने में ही उस मार्ग से एक मुनि आया। राजा उतरकर उसके चरणों में प्रणाम करके फिर हाथी पर सवार हो गया और चला गया ॥२२६॥ यह देखकर, उस मुनि को राजा से भी उत्तम समझकर, वह कन्या उस मुनि के पीछे चल पड़ी ॥२२७॥ उस मुनि ने भी मार्ग में जाय हुए एक शिवालय को देखा वहाँ भूमि पर घुटना टेककर शंकरजी को प्रणाम करके वह आगे की ओर चला ॥२२८॥ उस चंडालकन्या ने उस मुनि से भी शिवजी को उत्तम समझकर मुनि को छोड़ शिवलिंग को पकड़ लिया ॥२२९॥ कुछ ही समय पश्चात् वहाँ पर एक कुत्ते ने आकर और देवता के चबूतरे पर चढ़कर, टाँगें उठाकर अपनी जाति के स्वभाव का काम किया। (अर्थात्, शिवलिंग पर मूत्र-त्याग कर दिया) ॥२३०॥ यह देखकर उस चंडालिनी ने कुत्ते को शिवजी से भी उत्तम समझकर पति बनाने की इच्छा से उस कुत्ते का पीछा किया ॥२३१॥ वह कुत्ता अपने परिचित एक चंडाल के घर में घुसकर एक युवा चंडाल के पैरों में प्रेम से लोटने लगा ॥२३२॥ यह देखकर वह चंडालकन्या कुत्ते से भी अधिक अपनी जाति के चांडाल को बड़ा मान कर, अर्थात् उसे सब से बड़ा मानकर, पति बनाकर संतुष्ट हुई ॥२३३॥ गोमुख ने नरवाहनदत्त से कहा—'स्वामिन्, इस प्रकार बहुत ऊँचे चढ़ने की चेष्टा करनेवाले मूर्ख फिर अपने ही स्थान पर आकर गिरते हैं। इसी प्रसंग में एक मूर्ख कृपण राजा की कथा सुनो' ॥२३४॥ कृपण राजा की कथा एक मूर्ख राजा था। वह धनवान् होते हुए भी अति कृपण था। एक बार उसके हितैषी मन्त्रियों ने उससे कहा—'स्वामिन्, इस लोक में किया गया दान परलोक की दुर्दशा को दूर करता है। इसलिए, दान दो क्योंकि जीवन और धन दोनों नाशवान् हैं ॥२३५-२३६॥ यह सुनकर राजा कहने लगा कि मैं दान तब दूँगा जब मरकर अपने को कष्ट म पड़ा हुआ देखूँगा' ॥२३७॥ १५
मित्रयोः कथा
ततश्चान्तर्हसन्तस्ते तूष्णीमासत मन्त्रिणः। एव नोज्झति मूढोऽर्थान् यावदर्थे स नोज्झितः ॥२१८॥ मित्रयोः कथा राजभीतौ धृतौ देव मध्ये मित्रद्वयं शृणु। बभूव चन्द्रापीडाख्यः कान्यकुब्जे महीपतिः ॥२१९॥ तस्याभवच्च धवलमुखाख्यः कोऽपि सेवकः। बहिर्भुक्त्वा च पीत्वा च सदैव प्राविशद् गृहम् ॥२२०॥ भुक्तपीतः कुतो नित्यमायासीति स भार्यया। पृष्टः स जातु धवलमुखस्तामवमभ्यधात् ॥२२१॥ सुहृत्सादर्वाहं शश्वद् भुक्त्वा पीत्वा च सुन्दरि। सदैवायामि येनास्ति लोक मित्रद्वयं मम ॥२२२॥ कल्याणवर्मनामको भोजनाद्युपकारकः। द्वितीयो वीरबाहुश्च प्राणैरप्युपकारकः ॥२२३॥ एव श्रुतैव धवलमुखोऽसौ भार्यया तया। ऊचे मित्रद्वयं तन्मे भवता दर्श्यतामिति ॥२२४॥ ततो ययौ स तद्युक्तस्तस्य कल्याणवर्मणः। गृहं सोऽपि महार्हैस्तमुपचारैरताधरत् ॥२२५॥ अन्येद्युः स ययौ वीरबाहोर्भार्यायुतोऽन्तिकम्। स च धूतस्थितः कृत्वा स्वागतं तं विसृष्टवान् ॥२२६॥ ततोऽब्रवीत् सा धवलमुखं भार्या सकौतुका। कल्याणवर्मा महतीं सत्क्रियामकरोत्तव ॥२२७॥ कृतं स्वागतमात्रं तु भवतो वीरबाहुना। तदार्यपुत्र तं मित्रं मन्यसेऽभ्यधिकं कथम् ॥२२८॥ तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीद् गच्छ मिथ्या तौ ब्रूह्यसौ क्रमात् । राजा नः कुपितोऽकस्मात् ततो ज्ञास्यस्यथ स्वयम् ॥२२९॥ इत्युक्त्वा तेन गत्वैव सा तथैति तयैश्च तत्। कल्याणवर्मणोऽबोधस्त श्रुत्वैव जगाद ताम् ॥२३० ॥ भद्रत्यहं वणिक्पुत्रो ब्रूहि राज्ञः करोमि किम्। इत्युक्ता तेन सा प्राप्तावीरबाहोरप्यन्तिकम् ॥२३१॥ तस्मै तच्च शशंसद्राजकोपं स्वभर्तरि। स युक्तैवाययौ धावन् गृहीत्वा खड्गचर्मणी ॥२३२॥
षष्ठम लम्बक ८१५
षष्ठम लम्बक ८१५ तब यह सुनकर मन ही मन हँसते हुए मन्त्री लोग चुप बैठ गए। इस प्रकार, मूर्ख तबतक धन को नहीं छोड़ता जबतक धन उसे नहीं छोड़ता ॥२१८॥ दो मित्रों की कथा ‘महाराज मूर्ख राजा की कथा सुनी। अब बीच में दो मूर्ख मित्रों की कथा सुनिए। कान्यकुब्ज देश में चन्द्रापीड नाम का एक राजा था ॥२१९॥ उसका धवलमुख नाम का एक सेवक था। वह सदा बाहर से ही खा-पीकर घर में जाता था। एक दिन उसकी स्त्री ने उससे पूछा कि तुम प्रतिदिन बाहर कहाँ से खा-पीकर आते हो? तब धवलमुख ने कहा—हे सुन्दरी मैं सदा अपने मित्र के यहाँ से खा-पीकर आता हूँ। मेरे दो मित्र हैं ॥२२०—२२२॥ उनमें एक कल्याणवर्मा नाम का मित्र सदा ही भोजन आदि से मेरा उपकार करता है। दूसरा वीरबाहु नाम का मित्र है, जो अपने प्राणों से भी मेरा उपकार करता है ॥२२३॥ उसके इस प्रकार कहने पर उसकी स्त्री ने उससे कहा—‘तुम उन दोनों मित्रों को मुझे दिखाओ’ ॥२२४॥ तदनन्तर, वह धवलमुख स्त्री के साथ कल्याणवर्मा के घर गया और उसने बहुमूल्य सामान से उनका स्वागत-सत्कार किया ॥२२५॥ तब दूसरे दिन धवलमुख अपनी पत्नी के साथ वीरबाहु के पास गया। जुआ खेलते हुए उसने धवलमुख और उसकी स्त्री का साधारण स्वागत करके उसे विदा कर दिया ॥२२६॥ तब धवलमुख की स्त्री ने उससे आश्चर्य के साथ कहा— ‘कल्याणवर्मा ने तो तुम्हारा बहुत आतिथ्य-सत्कार किया ॥२२७॥ किन्तु, वीरबाहु ने बहुत साधारण स्वागत किया। इसलिए, तुम वीरबाहु को कल्याणवर्मा से अधिक स्वागत-सत्कार करनेवाला (प्राण देनेवाला) क्यों मानते हो ? ॥२२८॥ यह सुनकर, धवलमुख अपनी पत्नी से बोला कि तू जाकर, यों ही उनकी परीक्षा लेने की दृष्टि से उन दोनों से कह दे कि ‘राजा अकस्मात् ही हमारे लिए क्रुद्ध हो गया है। उसके बाद स्वयं ही तुझे सब मालूम हो जायगा ॥२२९॥ धवलमुख से इस प्रकार कही गई उसकी स्त्री ने वैसे ही जाकर उसके दोनों मित्रों से कह दिया ॥२३०॥ उसने पहले कल्याणवर्मा से कहा तो वह सुनते ही कहने लगा— मैं बनिया का पुत्र हूँ। तुम्हीं बताओ मैं राजा का क्या करूँ?’ उससे इस प्रकार कही गई वह स्त्री उसके बाद वीरबाहु के पास गई ॥२३१॥ उससे भी उसने उसी प्रकार पति से राजा के अप्रसन्न होने की बात कही। यह सुनते ही वीरबाहु ढाल-तलवार लेकर दौड़ता हुआ धवलमुख के पास आया ॥२३२॥
८१६ कथासरित्सागर
८१६ कथासरित्सागर मन्त्रिभिर्वारितः कोपाद्राजासौ सव्व्रजेति तम्। वीरबाहुः स धवलमुखोऽथ प्राहिणोद् गृहम्॥२३३॥ एव सदन्तरः तन्वि मित्रयोरेतयोर्मम। इति भार्याश्च धवलमुखेनोक्ता तुतोष सा।२३४॥ हृद्य यदुपचारेण मित्रमन्यत् सस्नेहं। तुल्येऽपि स्निग्धतायोगे तैलं तैलं घृत घृतम्॥२३५॥ इत्याख्याय कथामेतां मन्त्री मुग्धकथा क्रमात्। नरवाहनदत्ताय गोमुखोऽकथयत्पुनः ॥२३६॥ जलभीतमूर्खस्य कथा कश्चिन् मुग्धोऽध्वगस्तीर्त्वा कृच्छ्रात्तृष्णार्तरोऽटवीम्। नदीं प्राप्यापि न पपौ वीक्षाञ्चक्रे परं जलम्॥२३७॥ तृषितोऽपि पिबस्यम्भः किं नेत्युक्तोऽत्र केनचित्। इयत्कथं पिबामीति मन्दबुद्धिरुवाच तम्॥२३८॥ किं दण्डयति राजा त्वां सर्वं पीतं न चेत्त्वया। इति तेनोपहसितोऽप्यम्बु मुग्धः स नापिबत् ॥२३९॥ एव न शक्नुवन्तीह यद्यत्कर्तुमशेषतः। यथाशक्ति न तस्यांशमपि कुर्वन्त्यबुद्धयः ॥ २४० ॥ पुत्रघातिनो मूर्खस्य कथा जलभीत श्रुतो देव श्रूयतां पुत्रघात्ययम्। बहुपुत्रो दरिद्रश्च मूर्खः कश्चिदभूत् पुमान् ॥२४१॥ स एकस्मिन्मृते पुत्रे द्वितीयमवधीत् स्वयम्। कथं बालोऽयमेकाकी पथि दूरे व्रजेदिति ॥२४२॥ तत स निन्द्यो हास्यश्च देशांन्निर्वासितो जनैः। एव पशुश्च मूर्खश्च निर्विवेकमती समौ ॥ २४३॥ भ्रातृमूर्ख कथा श्रुतस्त्वया पुत्रघाती भ्रातृभीतमिमं शृणु। जनमध्ये कथा कुर्वन् कोऽप्यासीत् क्वापि मुग्धधीः ॥२४४॥ स भव्यं पुरुषं दूराद्दृष्ट्वा मूर्खोऽब्रवीदिदम्। एष मे भवति भ्राता रिक्थमस्य हराभ्यहम् ॥२४५॥ अह तु कश्चिदप्येतन्मम हेत नैतदृणं मम। इत्युक्तवान् स मूढोऽत्र पाषाणान्यग्रहामयत् ॥२४६॥ एवं मूढस्य मूढस्य स्वार्थाभिस्यातिचित्रता। भ्रातृभीत श्रुतो देव ब्रह्मचारिसुतं शृणु ॥२४७॥
दशम लम्बक ८३७
दशम लम्बक ८३७ तब धवलमुख ने बीरबाहु को यह कहकर शान्त किया और घर को लौटाया कि 'मंत्रिया न समझाकर राजा का क्रोध शान्त कर दिया' ॥२३३॥ तब धवलमुख ने अपनी स्त्री से कहा—'प्यारी तूने घर इन दोनों मित्रों का अन्तर देखा ! यह सुनकर उसकी स्त्री सन्तुष्ट हुई ॥२३४॥ इस प्रकार बाहरी शिष्टाचार (दिखावा) करनेवाले मित्र दूसरे होते हैं और सच्चे मित्र दूसरे । चिकनाहट समान होने पर भी तेल तेल है और घी घी ही है ॥२३५॥ गोमुख मंत्री इस प्रकार मूर्खों की कथा सुनाकर नरवाहनदत्त से फिर बोला ॥२३६॥ जलभीत मूर्ख की कथा एक मूर्ख पथिक ने प्यास से व्याकुल हो किसी प्रकार बीहड़ जंगल पार कर नदी के किनारे पहुँचकर भी पानी नहीं पिया और वह केवल जल की ओर ही देखता रहा ॥२३७॥ 'प्यास होकर भी पानी क्या नहीं पी रहे हो? किसी के इस प्रकार उससे पूछने पर वह मूर्ख बोला—'इतना पानी मैं कैसे पिऊँ'?॥२३८॥ 'यदि तू सब पानी न पियेगा तो क्या राजा तुम दंड देगा? इस प्रकार उसके द्वारा मजाक करने पर भी उस मूर्ख ने पानी नहीं पिया ॥२३९॥ इस प्रकार जिस कार्य को सम्पूर्ण रूप से किया जा सकता है, उसे मूर्ख जरा सा भी नहीं कर पाते ॥२४०॥ पुत्रघाती मूर्ख की कथा इस प्रकार जलभीत मूर्ख की कथा सुनी अब महाराज पुत्रघाती की कथा सुनो। बहुत पुत्रोंवाला एक दरिद्री पुरुष था। उसने एक पुत्र के मरने पर, दूसरे पुत्र को स्वयं मार डाला लोगों के पूछने पर कि 'तूने इस पुत्र को क्यों मार डाला? उसने उत्तर दिया कि 'यह बच्चा अकेला कैसे रहता? इसलिए, उसे दूसरा साथी भी दे दिया' ॥२४१-२४२॥ यह सुनकर उसकी निन्दा और हँसी करके लोगों ने उसे गाँव से निकाल दिया। इस प्रकार विचारहीन पुरुष और पशु दोनों ही समान होते हैं ॥२४३॥ भ्रातृमूर्ख की कथा
- राजन् तुमने पुत्रघाती की कथा सुनी अब भ्रातृमूर्ख की कथा सुनो। एक मूर्ख कुछ लोगों की मण्डली में बैठकर बात कर रहा था। इतने में किसी श्रेष्ठ पुरुष का दूर से ही आते देखकर वह बोला— यह मेरा भाई होता है। इसका पक्ष व हिसाबदार के रूप में हरण करना हूँ। परन्तु इसके साथ मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। ऐसा कहते हुए उस मूर्ख ने गन्धर्व को भी हँसा दिया ॥ २४- ४६॥
- स्वामिन् इस प्रकार मन्द की मूर्खता और स्वार्थ से अन्य व्यक्ति का अति विचित्रता होती । इस प्रकार आपने भ्रातृमूर्ख का कथा सुनी। अब कलाकारी के पुत्र की कथा सुनो॥ ४७॥
८१८ कथासरित्सागर
८१८ कथासरित्सागर ब्रह्मचारि पुत्रस्य कथा कश्चित् पितृगुणाख्यानप्रवृत्तमखिमध्यग । मुग्धः स्वपितुरुच्चैष वर्णयन्नवमभ्यधात् ॥२४८॥ आबाल्याद्ब्रह्मचारी मे पिता नान्योऽस्ति तत्समः । तच्छ्रुत्वा त्वं कुतो जात इति तं सुहृदोऽब्रुवन् ॥२४९॥ मानसोऽहं सुतस्तस्येत्येव पुनरपि ब्रुवन् । विशेषतो विहसितः स तैर्मूढशिरोमणिः ॥२५०॥ अत्यारूढ वदन्त्येवमसम्बद्धं जहादायाः । ब्रह्मचारिसुतं श्रुत्वा श्रूयतां गणकोऽप्ययम् ॥२५१॥ मूर्खज्योतिर्विदः कथा बभूव नाम गणकः कश्चिदविज्ञानवर्जितः । स भार्यापुत्रसहितः स्वदेशाद्वृत्त्यभावतः ॥२५२॥ गत्वा देशान्तरं तत्र मिथ्याविज्ञानमात्मनः । कृतकप्रत्ययेनार्थपूजां प्राप्तुमदीधयत् ॥२५३॥ परिष्वज्य सुतं बालं स तं सर्वजनाग्रतः । रुरोद पृष्टश्च जनैरथ पापो जगाद सः ॥२५४॥ भूत भव्यं भविष्यच्च जानेऽहं तदयं शिशुः । विपत्स्यते मे दिवसे सप्तमे तेन रोदिमि ॥२५५॥ इत्युक्त्वा तत्र विस्माप्य लोकं प्राप्तेऽह्नि सप्तमे । प्रत्यूष एव सुप्तं च स व्यापादितवान् सुतम् ॥२५६॥ दृष्ट्वाथ तं मृतं बालं सञ्जातप्रत्ययैर्जनैः । पूजितो धनमासाद्य स्वदेशं स्वैरमाययौ ॥२५७॥ इत्यर्थलोभात् मिथ्यैव विज्ञानस्थापनेच्छवः । मूर्खा पुत्रमपि घ्नन्ति न रम्येष्वेषु बुद्धिमान् ॥२५८॥ क्रोधिनो मूर्खस्य कथा अथ च श्रूयतां मूर्खः क्रोधनः पुरुषः प्रभो । बहिः स्थितस्य कस्यापि पुंसः कुत्रापि शृण्वतः ॥२५९॥ अभ्यन्तरे गुणान् कश्चिच्छशंस स्वजनाग्रतः । तदा चैकोऽब्रवीत्तत्र सत्यं स गुणवान् सखे ॥२६०॥ किं तु द्वौ तस्य दोषौ स्तः साहसी क्रोधनश्च यत् । इति वादिनमेवैतं बहिर्वर्ती निशम्य सः ॥२६१॥ पुमान् प्रविश्य सहसा वाससावेष्टयद् गले । रे चास्ति साहस किं मे क्रोधः कच्चन मया कृतः ॥२६२॥
दशम लम्बक ८११
दशम लम्बक ८११ ब्रह्मचारी पुत्र की कथा अपने-अपने पिताओं का व्याख्यान करते हुए मित्रों के बीच एक मूर्ख अपने पिता की प्रशंसा करते हुए बोला—'मेरे पिता बालब्रह्मचारी हैं। यह सुनकर उसके मित्र बोले—'तब तू किससे उत्पन्न हुआ? मैं उनका मानसपुत्र हूँ'—ऐसा कहते हुए उस मूर्खराज ने सबको खूब हँसाया॥२४८—२५०॥ मूर्ख व्यक्ति इस प्रकार बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं। राजन् तुमने ब्रह्मचारी के पुत्र को सुना अब एक ज्योतिषी को भी सुनो॥२५१॥ मूर्ख ज्योतिषी की कथा एक अज्ञ ज्योतिषी था। जीविका के अभाव में वह अपनी स्त्री और पुत्र को साथ लेकर चल पड़ा। दूसरे देश में जाकर बनावटी विषाद दिखाकर वह अपने धन और यश की डींग हाँकने लगा॥२५२-२५३॥ एक बार बहुत लोगों के सामने आते सड़क की गोद में गिराकर वह रोने लगा। लोगों के पूछने पर उस पापी ने कहा—॥ २५४॥ 'मैं भूत, वर्तमान और भविष्य ये तीनों काल जानता हूँ। मेरा यह पुत्र आज से सातवें दिन मर जायगा। इसलिए रोता हूँ ॥२५५॥ ऐसा कहकर और लोगों को आश्चर्य में डालकर, सातवाँ दिन आने पर उसने प्रात: काल ही सोते हुए अपने पुत्र को गला घोंटकर मार डाला॥२५६॥ इस प्रकार बालक के मरने पर ज्योतिषी को त्रिकालदर्शी मानकर विस्मित जनता ने धन से उसकी पूजा की और वह इस प्रकार धन कमाकर अपने घर आ गया॥ ५७॥ इस प्रकार धन के लोभ से झूठी पण्डिताई का प्रचार करने के उत्साह में व्यक्ति अपने पुत्र तक की हत्या कर डालते हैं। अत: बुद्धिमान् पुरुष को उनसे स्नेह न करना चाहिए॥ ५८॥ धोबी गधे की कथा महाराज एक और गधे की कथा सुनो। एक पुरुष गधे और ... का धनी था। किसी पुरुष ने घर के भीतर न आने तक व्यग्रचित्त व संशय से किसी के पूछने हुए उसके गुणों की प्रशंसा की। तब वह बोला—यह ठीक है किन्तु उसमें दो दोष हैं क्योंकि वह बड़ा आलसी और पापी है। बाहर खड़े हुए उस गधे ने यह सुनकर और लज्जावश अपना अपमान समझकर क्रोधावेश में उस पुरुष का स्तन उसके ही काटने में बोलकर आक्षेप करते हुए कहा—अरे अनभिज्ञ मेरा क्या अपराध है और किस वजह कलंक दिया ? ॥२ ५९॥
८४ कथासरित्सागर
८४ कथासरित्सागर इत्युवाच च साक्षेपं पुमान् क्रोधाग्निना ज्वलन् । ततो हसन्तस्तत्रान्ये तमूचुः किं ब्रवीत्यदः ॥२६३॥ प्रत्यक्षवञ्चितश्चौद्यसाहसोऽपि भवानिति । एवं स्वदोषः प्रकटोऽप्यज्ञैर्देव न बुध्यते ॥२६४॥ एकस्य मूर्खराज्ञः कथा इदानीं श्रूयतां मुग्ध-कन्यावर्धयिता नृपः । राजाभून्मूर्खोऽपि कन्यैका सम्प्राजनि तस्य च ॥२६५॥ स वर्धयितुकामस्तामतिस्नेहेन सत्वरम् । वैद्यानानीय नृपतिः प्रीतिपूर्वमभाषत ॥२६६॥ सदौषधप्रयोगं तं कञ्चित् कुरुत येन मे । सुतैषा वर्धते शीघ्रं सद्मर्त्रे च प्रदीयते ॥२६७॥ तच्छ्रुत्वा तेऽब्रुवन्वैद्या उपजीवयितुं जडम् । अस्त्यौषधमितो दूरात्तत्तु देशादवाप्यते ॥२६८॥ आनयामश्च यावत्तावदेव सुता सव । बदृश्या स्मापनीयैषा विमाने सत्र हीदृशम् ॥२६९॥ इत्युक्त्वा स्वापयामासुश्छन्नां से तां नृपात्मजाम् । संवत्सरानत्र बहूनौषधप्राप्तिशंसिनः ॥२७०॥ यौवनस्थां च तां प्राप्तामोपधेन प्रवर्धिताम् । द्रुवाजा दर्शयामासुः सुतां तस्मै महीभृते ॥२७१॥ सोऽपि तान्पूरयामास वैद्यांस्तुष्टो मनोरथैः । इति व्याजाज्जडधियो धूर्तैर्मृग्यन्त ईश्वराः ॥२७२॥ मूर्खकृपणस्य कथा अथ चाकर्ण्यतामर्धपणोपार्जितपण्डितः । अभून्नगरवास्येकः पुमान् प्रज्ञाभिमानवान् ॥२७३॥ ग्रामवासी च तस्यैकः पुमान् संवत्सरावधि । भृतकोवृत्यसन्तोषादापृच्छ्य स्वगृहं ययौ ॥२७४॥ गते तस्मिंश्च पप्रच्छ भार्या सन्धि गतः स ना । त्वत्त किञ्चिन्न गृहीत्वेति साप्यर्धपणमम्यधात् ॥२७५॥ ततो वक्षपजान् कृत्वा पाथेयं स नदीतटे । गत्वा स्वभृतकात्तस्मात्तमर्धपणमानयत् ॥२७६॥ तच्चार्धकोशरु शसन् स ययौ लोकहास्यताम् । एवं बहु क्षपयति स्वल्पस्यार्थे धनाधमी ॥२७७॥