कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
| प्रकरण १४३ | बाह्याभ्यन्तराश्चापदः |
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| अध्याय ५ |
(१) सन्ध्यादीनामयथोद्देशावस्थापनमपनयः। तस्मादापदः सम्भवन्ति। (२) बाह्योत्पत्तिरभ्यन्तरप्रतिजापा। अभ्यन्तरोत्पत्तिर्बाह्यप्रतिजापा। बाह्योत्पत्तिर्बाह्यप्रतिजापा। अभ्यन्तरोत्पत्तिरभ्यन्तरप्रतिजापा। इत्यापदः। (३) यत्र बाह्या अभ्यन्तरानुपजपन्ति, अभ्यन्तरा वा बाह्यान् तत्रोभय-योगे प्रतिजपतः सिद्धिर्विशेषवती। सुव्याजा हि प्रतिजपितारो भवन्ति, नोपजपितारः। तेषु प्रशान्तेषु नान्याञ्शक्नुयुरुपजपितुमुपजपितारः। कृच्छ्रोपजापा हि बाह्यानामभ्यन्तरास्तेषामितरे वा। महतश्च प्रयत्नस्य वधः, परेषामर्थानुबन्धश्चात्मनोऽन्य इति।
बाह्य और आभ्यन्तर आपत्तियाँ
(१) सन्धि, विग्रह आदि छः गुणों का उनके उचित स्थानों पर उपयोग न करना ही अपनय है। इस अपनय के कारण ही सारी विपत्तियाँ पैदा होती हैं।
(२) बाह्य और आभ्यन्तर आपत्तियाँ चार तरह से पैदा होती हैं। १. राष्ट्र-मुख्य तथा अन्तपाल आदि बाह्य लोगों के द्वारा उत्पन्न और मन्त्री, पुरोहित आदि आभ्यन्तर लोगों के द्वारा प्रोत्साहित पहिली आपत्ति है, २. आभ्यन्तर लोगों के द्वारा उत्पन्न और बाह्य लोगों के द्वारा प्रोत्साहित दूसरी आपत्ति है, ३. बाह्य लोगों के द्वारा उत्पन्न और उन्हीं के द्वारा प्रोत्साहित तीसरी आपत्ति है, इसी प्रकार ४. आभ्यन्तर लोगों के द्वारा उत्पन्न और उन्हीं से प्रोत्साहित चौथी आपत्ति है।
(३) जहाँ अपने देश के लोग विदेशियों से या विदेशी लोग अपने देश के लोगों से मिलकर षड्यन्त्र रचते हैं, उनमें से जो लोग षड्यन्त्र करने के लिए बहकाये गये (प्रतिजापिता) हैं उनको साम, दाम आदि उपायों से अपने वश में कर लेना अधिक लाभप्रद है, क्योंकि ऐसे लोगों का उद्देश्य धन लेना होता है। किन्तु षड्यन्त्र के लिए बहकाने वाले (उपजपिता) लोगों को सहज ही में वश में नहीं किया जा सकता है, क्योंकि उनके उद्देश्य का पता लगाना बड़ा कठिन होता है। इस प्रकार प्रतिजापित लोगों को यदि एक बार शान्त कर दिया जाय तो उपजपित फिर दूसरे लोगों को, भेद फूट जाने के भय से, उनकी जगह तैयार करने का साहस नहीं कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में बाह्य लोगों का आभ्यन्तर लोगों से और आभ्यन्तर लोगों
६१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवाँ अधिकरण
(१) अभ्यन्तरेषु प्रतिजपत्सु सामदाने प्रयुञ्जीत । स्थानमानकर्म सान्त्वम् । अनुग्रहपरिहारौ कर्मस्वायोगो वा दानम् । (२) बाह्येषु प्रतिजपत्सु भेददण्डौ प्रयुञ्जीत । सत्रणो मित्रव्यञ्जना वा बाह्यानां चारमेषां ब्रूयुः—‘अयं वो राजा दूष्यव्यञ्जनैरतिसन्धातुकामो, बुध्यध्वम्’ इति । दूष्येषु वादूष्यव्यञ्जनाः प्रणिहिता दूष्यान् बाह्यैर्भेदयेयुः, बाह्यान् वा दूष्यैः । दूष्याननुप्रविष्टा वा तीक्ष्णाः शस्त्ररसाभ्यां हन्युः । आहूय वा बाह्यान् घातयेयुरिति । (३) यत्र बाह्या बाह्यानुपजपन्ति, अभ्यन्तरानभ्यन्तरा वाः तत्रैकान्त-
का बाह्य लोगों से उपजाप करना बड़ा कठिन हो जाता है। उपजाप को स्वीकार करके यदि फिर वह फूट जाय तो उपजापिता का बड़ा भारी अनिष्ट हो जाता है, क्योंकि उसके एक महान् प्रयत्न की हत्या हो जाती है । इस तरह षड्यन्त्र का भंडाफोड़ हो जाने पर उपजाप्य व्यक्ति तो अपने स्वामी की प्रसन्नता से अभीष्ट लाभ को प्राप्त करता है और उपजापिता व्यक्ति अपने स्वामी की अप्रसन्नता से अनर्थ का भागी होता है ।
(१) यदि मन्त्री, पुरोहित आदि आभ्यन्तर व्यक्ति ही षड्यन्त्रकारियों को प्रोत्साहित करने वाले हों तो उन्हें साम और दान उपायों से शान्त कर देना चाहिए । विशेषाधिकार स्थानों पर नियुक्त करना तथा विशेष सम्मान देना साम कहलाता है, और धन देना, कर्जा तथा कर आदि से मुक्त कर देना एवं विशेष कार्यों में प्राप्त सम्पूर्ण फल को दे देना दान कहलाता है ।
(२) यदि षड्यन्त्र को प्रोत्साहित करने वाले लोग बाहरी हों तो उन्हें शान्त करने के लिए भेद और दण्ड का प्रयोग करना चाहिए । मित्र के छद्मवेश में रहने वाले गुप्तचर सभी उन बाहरी लोगों से राजा के गुप्त भेद का यह कह कर उद्घाटन करें कि ‘आपका यह राजा राजद्रोहियों के द्वारा आपको मध्यस्थ बनाकर धोखा देना चाहता है । इस रहस्य पर ध्यान देते हुए आप कभी भी इस कार्य में कदम न रखें ।’ अथवा राजद्रोहियों के गुप्त वेष में रहकर विजिगीषु के गुप्तचर भीतरी राजद्रोहियों से बाहरी लोगों का और बाहरी लोगों से भीतरी राजद्रोहियों से का भेद डाल दें । अथवा तीक्ष्ण गुप्तचर राजद्रोहियों के बीच में घुसकर शस्त्र या विष के द्वारा उनका वध कर डाले, अथवा किसी बहाने से बाह्य को अलग ले जा कर चुपचाप उसका वध कर दिया जाय ।
(३) यदि बाहरी, बाहरी लोगों के साथ और आभ्यन्तर, आभ्यन्तर लोगों के साथ षड्यन्त्र रचें और वहाँ यदि समानजातीय षड्यन्त्रकारी हों तो उनमें जो उपजा-
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योग उपजपितुः सिद्धिर्विशेषवती । दोषशुद्धौ हि दूष्या न विद्यन्ते । दूष्य-शुद्धौ हि दोषः पुनरन्यान् दूषयति ।
(१) तस्माद्बाह्येषूपजपत्सु भेददण्डौ प्रयुञ्जीत । सत्रिणो मित्रव्यञ्जना वा ब्रूयुः-‘अयं वो राजा स्वयमादातुकामः, विगृहीताः स्थ अनेन राज्ञा, बुध्यध्वम्' इति । प्रतिजपितुर्वा ततो दूतदण्डाननुप्रविष्टास्तीक्ष्णाः शस्त्ररसादिभिरेषां छिद्रेषु प्रहरेयुः । ततः सत्रिणः प्रतिजपितारमभिशंसेयुः ।
(२) अभ्यन्तरानभ्यन्तरेषूपजपत्सु यथार्हमुपायं प्रयुञ्जीत । तुष्टलिङ्गमत्तुष्टं विपरीतं वा साम प्रयुञ्जीत ।
(३) शौचसामर्थ्यापदेशेन व्यसनाभ्युदयापेक्षणेन वा प्रतिपूजनमिति दानम् ।
(४) मित्रव्यञ्जनो वा ब्रूयादेतान्–'चित्तज्ञानार्थमुपधास्यति वो राजा,
पिता हो उसे अपने पक्ष में कर लेना लाभप्रद होता है, क्योंकि उसके न रहने पर षड्यन्त्र आगे नहीं बढ़ पाता है । दूष्य व्यक्तियों को यदि शान्त किया जाय तो उनके दोष दूसरे अनेक लोगों को राजद्रोही बनाने में सहायक होते हैं ।
( १ ) इसलिए षड्यंत्रकारी बाह्य लोगों को भेद और दण्ड के द्वारा दबाना चाहिए । विद्रोहियों के मित्रवेष में रहने वाले गुप्तचर उनसे कहें 'आपको समझ लेना चाहिए कि यह राजा आप लोगों को दूसरे लोगों के द्वारा गिरफ्तार कराना चाहता है । इसलिए आप लोगों को उचित है कि इस राजा से विग्रह कर दें ।' अथवा षड्यन्त्रकारी के पास किसी बहाने से जाकर छद्मवेष गुप्तचर शस्त्र या विष आदि के द्वारा उसको मार डालें । उसके बाद गुप्तचर इस बात का प्रचार करे कि उपजापिताओं को प्रतिजापिताओं ने मारा है, जिससे कि उनमें परस्पर अविश्वास पैदा हो जाय ।
( २ ) इसी प्रकार भीतरी लोगों के साथ षड्यंत्र रचनेवाले भीतरी लोगों में भी आवश्यकतानुसार साम आदि उपायों का प्रयोग किया जाय । अवस्था को देखते हुए उन पर संतोष के सूचक, पर वस्तुतः असंतोषप्रद साम का अथवा असंतोष के सूचक, पर वस्तुतः संतोषजनक साम का प्रयोग किया जाय ।
( ३ ) शौच या सामर्थ्य के बहाने, तथा बंधु-वियोग आदि के दुःखमय अवसर पर या पुत्रोत्सव आदि के सुखमय अवसर पर वस्त्र तथा आभरण के द्वारा किया गया सत्कार ही दान के प्रयोग का तरीका कहलाता है ।
( ४ ) अथवा बनावटी मित्र बने हुए खुफिया लोग उन आभ्यंतर षड्यंत्रकारियों से कहें 'तुम्हारे हृदयस्थ भावों को जानने के लिए धन देकर राजा तुम्हारी परीक्षा
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तदस्याख्यातव्यम्' इति । परस्पराद्वा भेदयेदेनान्—असौ चासौ च वो राजन्येवमुपजपति । इति भेदः ।
(१) दाण्डकर्मिकवच्च दण्डः ।
(२) एतासां चतसृणामापदामभ्यन्तरामेव पूर्वं साधयेत् । 'अहिभयादभ्यन्तरकोपो बाह्यकोपात्पापीयान्' इत्युक्तं पुरस्तात् ।
(३) पूर्वां पूर्वा विजानीयाल्लघ्वीमापदमापदाम् ।
उत्थितां बलवद्भूचो वा गुर्वी लघ्वीं विपर्यये ॥
इति अभियास्यत्कर्मणि नवमेऽधिकरणे बाह्याभ्यन्तराश्चापदो नाम पञ्चमोऽध्यायः; आदितः पञ्चविंशत्युत्तरशततमः ।
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लेगा । इसलिए तुम्हें अपने मन की बात सच-सच कह देनी चाहिए ।' इस प्रकार कह देने से वे डर जायेंगे । अथवा उनकी आपस में यह कहकर कि 'अमुक-अमुक व्यक्ति राजा से तुम्हारी शिकायत कर रहा था' फूट डलवा दे ।
(१) ऐसे प्रसङ्गों में दाण्डकर्मिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपांशुदण्ड का प्रयोग करना चाहिए ।
(२) उक्त चारों प्रकार की आपत्तियों में सर्वप्रथम आभ्यन्तर आपत्ति का प्रतीकार करना चाहिए; क्योंकि वह अधिक अनर्थकारी होती है । पहले भी इस बात का संकेत किया जा चुका है कि बाह्यकोप की अपेक्षा आभ्यन्तर कोप घर के साँप की तरह अधिक भयानक होता है ।
(३) पूर्वोक्त आपत्तियों में क्रमशः पूर्व-पूर्व की आपत्ति अपेक्षया लघु होती है; फिर भी जिस आपत्ति के पीछे बलवान् का हाथ हो उसका प्रतीकार पहिले करना चाहिए और इसी प्रकार निर्बल शत्रु के द्वारा पैदा की गयी सबसे बड़ी आपत्ति को लघु ही समझना चाहिए ।
अभियास्यत्कर्म नामक नौवें अधिकरण में बाह्याभ्यन्तरापद नामक पाँचवां अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण १४४ | दूष्यशत्रुसंयुक्ताः |
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| अध्याय ६ |
(१) दूष्येभ्यः शत्रुभ्यश्च द्विविधाः शुद्धाः ।
(२) दूष्यशुद्धायां पौरेषु जानपदेषु वा दण्डवर्जनुपायान् प्रयुञ्जीत । दण्डो महाजने क्षेप्तुमशक्यः, क्षिप्तो वा तं चार्थं न कुर्यात् । अन्यं चानर्थ-मुत्पादयेत् । मुख्येषु त्वेषां दाण्डकर्मिकवच्चेष्टेतेति ।
(३) शत्रुशुद्धायां यतः शत्रुः प्रधानः कार्यो वा, ततः सामादिभिः सिद्धिं लिप्सेत ।
(४) स्वामिन्यायत्ता प्रधानसिद्धिः, मन्त्रिष्वायत्तायत्तसिद्धिः, उभया-यत्ता प्रधानायत्तसिद्धिः ।
राजद्रोही और शत्रुजन्य आपत्तियाँ
( १ ) राजद्रोहियों और शत्रुओं द्वारा उत्पन्न दो प्रकार की आपत्तियाँ हैं एक दूष्यशुद्धा और दूसरी शत्रुशुद्धा ।
( २ ) दूष्यशुद्धा आपत्तियों के प्रतीकार के लिए नगरनिवासियों को तथा जनपद निवासियों को, राजद्रोहियों पर, दण्ड को छोड़ कर बाकी सभी साम, दान, भेद आदि उपायों का प्रयोग करना चाहिए; क्योंकि बड़े आदमियों पर सहसा दण्ड का प्रयोग कर देना असंभव हुआ करता है । यदि उन पर दण्ड का प्रयोग किया भी जाय तो उससे अभीष्ट की सिद्धि नहीं हो पाती, वरन् उससे कुछ दूसरा ही अनर्थ हो जाता है । इस प्रकार यदि साम आदि उपायों द्वारा उन प्रमुख राजद्रोहियों को शांत न किया जा सके तो उन पर दाण्डकर्मिक प्रकरण में निर्दिष्ट नियमों के अनुसार उपांशु-दण्ड का प्रयोग किया जाय ।
( ३ ) शत्रुशुद्धा अर्थात् शत्रुद्वारा उत्पन्न की गई किसी भी प्रकारकी आपत्ति को दूर करने के लिए उन सामंतों पर साम आदि उपायों का प्रयोग किया जाय, शत्रु-मंत्री या अमात्य आदि जिनके अधीन हों ।
( ४ ) मंत्री द्वारा उत्पन्न की गई आपत्ति का प्रतीकार स्वयं राजा को ही करना चाहिए । आयत्तसिद्धि अर्थात् कार्य शब्द से कहे गये अमात्य आदि की आपत्ति का प्रतीकार मंत्रियों द्वारा की जानी चाहिए । इसी प्रकार मंत्री और अमात्य, दोनों के द्वारा की गई आपत्ति का प्रतीकार राजा और मंत्री को करना चाहिए ।
६१८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण
(१) दूष्यादूष्याणामामिश्रितत्वादा मिश्रा । आमिश्रायामदूष्यतः सिद्धिः । आलम्बनाभावे ह्यालम्बिता न विद्यते । मित्रामित्राणामेकीभावात्परमिश्रा । परमिश्रायां मित्रतः सिद्धिः । सुकरो हि मित्रेण सन्धिर्नामित्रेणेति ।
(२) मित्रं चेन्न सन्धिमिच्छेद्भीक्ष्णमुपजपेत्, ततः सत्रिभिरमित्राद्भेद-यित्वा मित्रं लभेत । मित्रामित्रसङ्घस्य वा योऽन्तस्थायी तं लभेत । अन्त-स्थायिनि लब्धे मध्यस्थायिनो भिद्यन्ते । मध्यस्थायिनं वा लभेत । मध्य-स्थायिनि वा लब्धे नान्तस्थायिनः संहन्यन्ते । यथा चैषामाश्रयभेदस्तानु-पायान्प्रयुञ्जीत ।
(३) धार्मिकं जातिकुलश्रुतवृत्तस्तवेन सम्बन्धेन पूर्वेषां त्रैकाल्योपका-रानपकाराभ्यां वा सान्त्वयेत् ।
(४) निवृत्तोत्साहं विग्रहश्रान्तं प्रतिहतोपायं क्षयव्ययाभ्यां प्रवासेन
( १ ) दूष्य और अदूष्य, दोनों के द्वारा उत्पन्न की गई आपत्ति को आमिश्र या मिश्रित कहते हैं । आमिश्र आपत्ति का प्रतीकार करने के लिए अदूष्य को ही साम आदि उपायों के द्वारा अनुकूल बनाना चाहिए, क्योंकि अदूष्यों ( राजभक्तों ) का सहारा लेकर ही दूष्य ( राजद्रोही ) आपत्तिजनक होता है । उनका सहारा न पाकर दूष्य अपने आप शांत हो जाता है । मित्र और शत्रु, इन दोनों के द्वारा उत्पन्न की गई आपत्ति को परमिश्र या शत्रुमिश्र कहते हैं । परमिश्र आपत्ति में शत्रु के द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की जा सकती है; क्योंकि मित्र के साथ संधि हो जाना सरल होता है और शत्रु के साथ इस तरह संधि होना कठिन रहता है ।
( २ ) मित्र यदि संधि करने के लिए राजी न हो तो बार-बार उसे शत्रु से भिन्न करने का उपाय करना चाहिए । सत्री आदि गुप्तचरों के द्वारा भेद डलवाकर मित्र को अपनी ओर करना चाहिए । मित्र और शत्रु संधि के अंत में रहने वाले सामंत को अपनी ओर मिलाना चाहिए; क्योंकि अंत में रहने वाले सामंत के वश में हो जाने पर मध्यस्थ राजा अपने आप फूट जाते हैं । अथवा मध्यस्थ सामंत को ही अपने वश में कर लेना चाहिए; क्योंकि उसको वश में कर लेने पर अंत में रहने वाले राजा आपस में नहीं मिल पाते हैं । अथवा जिस उपाय से भी शत्रु और मित्र अपने शक्ति-शाली आश्रयदाता से भिन्न रह सकें वैसा उपाय करना चाहिए ।
( ३ ) जाति, कुल, श्रुत ( शास्त्र-ज्ञान ) और वृत्त ( सदाचार ) आदि के स्तुति वचनों से तथा उनके कुलवृद्धों का सदा उपकार या अनपकार के द्वारा धार्मिक राजा को शांत करना चाहिए ।
( ४ ) उत्साहहीन, युद्धविमुख, निष्फल उपाय, क्षय, व्यय और प्रवास से संतप्त,
प्र० १४४ : अं० ६ ] दूष्य और शत्रु-जन्य आपत्तियाँ ६१९
चोपतप्तं शौचेनान्यं लिप्समानमन्यस्माद्वा शङ्कमानं मैत्रीप्रधानं वा कल्याण-बुद्धिं साम्ना साधयेत् ।
(१) लुब्धं क्षीणं वा तपस्विमुख्यावस्थापनापूर्वं दानेन साधयेत् ।
(२) तत् पञ्चविधम्—देयविसर्गो, गृहीतानुवर्तनम्, आत्तप्रतिदानम्, स्वद्रव्यदानमपूर्वम्, परस्वेषु स्वयंग्राहदानं चेति दानकर्म ।
(३) परस्परद्वेषवैरभूमिहरणशङ्कितमतोऽन्यतमेन भेदयेत् । भीरुं वा प्रतिघातेन, 'कृतसन्धिरेश त्वयि कर्म करिष्यति, मित्रमस्य निसृष्टं; सन्धौ वा नाभ्यन्तर' इति ।
(४) यस्य वा स्वदेशादन्यदेशाद्वा पण्यानि पण्यागारतयागच्छेयुः, तान्यस्य 'यातव्याल्लब्धानि' इति सत्रिणश्चारयेयुः । बहुलीभूते शासनमभिव्यक्तेन प्रेषयेत्—'एतत्ते पण्यं, पण्यागारं वा मया ते प्रेषितं, सामवायि-
ईमानदारी से किसी दूसरे राजा को अपना मित्र बनाने को इच्छुक, दूसरे पर विश्वास न करने वाले और सबके साथ मित्र-भाव का व्यवहार करने वाले कल्याणबुद्धि राजा को साम उपाय के द्वारा ही शांत करना चाहिए ।
( १ ) लोभी अथवा निर्धन राजा को तपस्वी और अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों को जामिन बनाकर दान के द्वारा वश में करना चाहिए ।
( २ ) वह दान पाँच प्रकार का होता है १. देयविसर्ग ( ग्रहण की हुई भूमि में ब्राह्मण आदि के लिए छोड़ा गया कुछ भाग ) २. गृहीतानुवर्तन ( पूर्वजों द्वारा गृहीत भूमियोग के लिए प्रतिषेध न करना ) ३. आत्त प्रतिदान ( गृहीत भूमि को फिर वापस दे देना ) ४. नये सिरे से स्वयं ही देना और ५. शत्रुदेश से लूटे हुए धन को लूटने वालों को ही दे देना ।
( ३ ) जो राजा आपसी द्वेष, वैर रखता हो तथा जिसके प्रति भूमि का अपहरण करने की आशंका हो उसे इन्हीं द्वेष्य आदि किसी एक के द्वारा भिन्न कर देना चाहिए । भीरु राजा को प्राणघात का भय देकर भिन्न कर देना चाहिए; अथवा यह कह कर उसको अलग कर देना चाहिए कि इस समय तो बलवान् राजा तुमसे संधि कर लेगा पर बाद में तुम्हीं पर आक्रमण कर देगा । क्योंकि संधि करने के लिए विजिगीषु के पास भी उसने अपना आदमी भेज दिया है । अथवा यह कह कर अलग कर दे कि शत्रु तथा मित्र के साथ संधि करते समय उसने तुम्हारा बहिष्कार कर दिया था ।'
( ४ ) अपने देश या शत्रु के देश से बाजार में बिकने के लिए यदि कोई चीज आये तो सत्री गुप्तचर उसके संबंध में यह अफवाह उड़ा दें कि यह सामान छिपे तौर पर संधि करने की इच्छा रखने वाले यातव्य से आया है । जब यह अफवाह सर्वत्र फैल जाय तब वध के लिए निश्चित पुरुष ( अभिव्यक्त ) के हाथ एक जाली पत्र
६२० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवाँ अधिकरण
केषु विक्रमस्व, अपगच्छ वा, ततः पणशेषमवाप्स्यसि' इति । ततः सत्रिणः परेषु ग्राहयेयुरेतदरिप्रदत्तमिति ।
(१) शत्रुप्रख्यातं वा पण्यमविज्ञातं विजिगीषुं गच्छेत् । तदस्य वैदेहक-व्यञ्जनाः शत्रुमुख्येषु विक्रीणीरन् । ततः सत्रिणः परेषु ग्राहयेयुः—‘एतत्पण्य-मरिप्रदत्तम्’ इति ।
(२) महापराधार्थमानाभ्यामुपगृह्य वा शस्त्ररसाग्निभिरमित्रे प्रणि-दध्यात् । अथैकमामात्यं निष्पातयेत् । तस्य पुत्रदारमुपगृह्य रात्रौ हतमिति ख्यापयेत् । अथामात्यः शत्रोस्तानेकैकशः प्ररूपयेत् । ते चेद्यथोक्तं कुर्युर्न चैनान्ग्राहयेत् । अशक्तिमतो वा ग्राहयेत् । आप्तभावोपगतो मुख्यादस्या-
लिखकर भेजना चाहिए । उस पत्र का आशय हो 'यह थोड़ा-बहुत सामान जो मैंने आपके लिए भेजा है और साथ ही बाजार में बिकने योग्य बड़ा सामान भी भेज रहा हूँ । मेरे शत्रु की सहायता करने वाले राजाओं पर तुम आक्रमण करो अथवा उन्हें छोड़कर मेरी सहायता के लिए तैयार बने रहो । शर्तनामे का बाकी धन तुम्हें 'चढ़ाई कर देने के बाद मिलेगा ।' उसके बाद सत्री गुप्तचर अन्य सामवायिक राजाओं को यह विश्वास दिला दें कि यह पत्र उनके शत्रु द्वारा ही भेजा गया है ।
(१) अथवा सामवायिक राजाओं से किसी एक के साथ संबंध जोड़कर, रत्न आदि बाजारू सामान बिना किसी के जाने हुए किसी तरह विजिगीषु के पास पहुँचा दिया जाय । उसके बाद व्यापारियों के वेष में रहने वाले गुप्तचर सामवायिक राजाओं में से किसी एक के हाथ उसको बेच दें; उसके बाद सत्री गुप्तचर दूसरे सामवायिक राजाओं के यहाँ जाकर पुलिस द्वारा उस सामान को बरामद करा दे और तब यह सिद्ध करे कि 'यह सामान आपके शत्रु द्वारा यहाँ अमुक-अमुक व्यक्तियों के पास बेचने के लिए भेजा गया है ।' इसका परिणाम यह होगा कि सामवायिक राजाओं को यह विश्वास हो जायेगा कि हम में से कोई राजा विजिगीषु के साथ मिला हुआ है । इस प्रकार उनमें परस्पर फूट पड़ जायेगी ।
(२) विजिगीषु को चाहिए कि अपने महापराधी अमात्य आदि को भूमि, हिरण्य आदि धन तथा मान-संमान देकर अपने वश में करे और फिर उन्हें शत्रु पर शस्त्र, रस आदि के द्वारा आक्रमण करने के लिए नियुक्त कर दे । पहिले इस प्रकार के महापराधी एक ही अमात्य को शत्रु के यहाँ भेजे । उसके चले जाने के बाद उसके स्त्री-पुत्रों को किसी एकांत स्थान में छिपा कर यह अफवाह फैला दे कि राजा ने उनको रात में मरवा डाला है । जब उस अमात्य पर शत्रु का पूरा विश्वास जम जाय तो वह, विजिगीषु के यहाँ से आये हुए अन्य अमात्यों का एक-एक करके राजा से यह परिचय करा दे कि ये लोग विजिगीषु के द्वेष के कारण निकल भागे हैं और
प्र० १४४ : अ० ६ ] दूष्य और शत्रु-जन्य आपत्तियाँ ६२१
त्मानं रक्षणीयं कथयेत्; अथामित्रशासनं मुख्यायोपघाताय प्रेषितमुभयवेतनौ ग्राहयेत्। (१) उत्साहशक्तिमतो वा प्रेषयेत्—'अमुष्य राज्यं गृहाण यथास्थितो न सन्धिः' इति। ततः सत्रिणः परेषु ग्राहयेयुः। (२) एकस्य स्कन्धावारं विवधमासारं वा घातयेयुः, इतरेषु मैत्रीं ब्रुवाणाः। तं सत्रिणः 'त्वमेतेषां घातयितव्यः' इत्युपजपेयुः। (३) यस्य वा प्रवीरपुरुषो हस्ती हयो वा म्रियेत, गूढपुरुषैर्हन्येत ह्रियेत वा, तं सत्रिणः परस्परोपहृतं ब्रूयुः। ततः शासनमभिशस्तस्य प्रेषयेत्—'भूयः कुरु ततः पणशेषमवाप्स्यसि' इति। तदुभयवेतना ग्राहयेयुः।
आपकी सेवा में रहने योग्य हैं। यदि वे अमात्य आदि विजिगीषु की आज्ञानुसार शस्त्र, विष आदि का ठीक-ठीक प्रयोग कर दें तो उनका भेद गुप्त बना रहने दे और यदि वे शत्रु को मारने में अपनी असमर्थता प्रकट करें तो उनका भेद खोलकर शत्रु द्वारा ही उन्हें गिरफ्तार करा दे। विजिगीषु द्वारा निकाला हुआ वह अमात्य सामवायिक राजाओं के प्रमुख से, यह कह कर भेद डाले कि 'आपको सामवायिक राजाओं के प्रमुखों से अपनी रक्षा करनी चाहिए; क्योंकि वे लोग विश्वास योग्य नहीं हैं।' उसके बाद साधारण सामवायिक राजाओं के उच्छेद के लिए शत्रु द्वारा भेजी हुई पूर्व लिखित कूट आज्ञा को उभयवेतन भोगी व्यक्तियों द्वारा प्रमुख सामवायिक राजाओं के पास पहुँचा दे।
(१) अथवा किसी उत्साही, शक्ति-संपन्न एक ही सामवायिक के पास उस कूट आज्ञा को भिजवाये। उस आज्ञापत्र का मसविदा इस प्रकार होना चाहिए 'आप उस मुख्य सामवायिक राजा के राज्य को ले लें, पूर्व निश्चित संधि अब स्वीकार नहीं की जा सकती है।' इसके बाद सत्री गुप्तचर दूसरे सामवायिकों को यह सूचित कर दे कि अमुक मुख्य सामवायिक के पास इस आशय का एक पत्र आया है।
(२) अथवा सत्री गुप्तचर किसी एक सामवायिक राजा की छावनी (स्कंधावार), आयात-निर्यात के मार्ग तथा उसके मित्रबल को नष्ट कर दें। दूसरे सामवायिक राजाओं से वे अपनी मित्रता बनाये रखें, जिससे कि उनको गुप्त रहस्य का पता न लगे। उसके बाद वह सत्री गुप्तचर उस सामवायिक राजा की दूसरे सामवायिक राजाओं से यह कह कर फूट डाल दे कि 'ये सामवायिक राजा उसे मारना चाहते हैं। ऐसी अवस्था में उनके साथ तुम्हारी संधि कैसे संभव है?'
(३) अथवा सामवायिक राजाओं में किसी राजा का कोई वीर सैनिक, हाथी या घोड़ा मर जाय या गुप्तचरों द्वारा मार दिया जाय अथवा अपहरण कर लिया जाय, तो सत्री गुप्तचर उसको किसी दूसरे सामवायिक द्वारा मारा गया बतायें।
६२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण
६२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण
(१) भिन्नेष्वन्यतमं लभेत । (२) तेन सेनापतिकुमारदण्डचारिणो व्याख्याताः । (३) साङ्घिकं च भेदं प्रयुञ्जीत । इति भेदकर्म । (४) तीक्ष्णमुत्साहिनं व्यसनिनं स्थितशत्रुं वा गूढपुरुषाः शस्त्राग्निरसादिभिः साधयेयुः । सौकर्यतो वा तेषामन्यतमः । तीक्ष्णो ह्येकः शस्त्ररसाग्निभिः साधयेत् । अयं सर्वसन्दोहकर्म विशिष्टं वा करोति । इत्युपायचतुर्वर्गः । (५) पूर्वः पूर्वश्चास्य लघिष्ठः । सान्त्वमेकगुणम् । दानं द्विगुणं सान्त्वपूर्वम् । भेदस्त्रिगुणः सान्त्वदानपूर्वः । दण्डश्चतुर्गुणः सान्त्वदानभेदपूर्वः ।
मारनेवालों में जिस सामवायिक राजा का नाम लिया जाय उसके पास एक बनावटी पत्र भेजा जाय, जिसका मजमून इस प्रकार हो 'इसी प्रकार तुम दूसरे सामवायिक राजाओं का नुकसान करते रहो । उसके बाद तुम्हें बाकी धन दे दिया जायेगा ।' उस पत्र को उभयवेतनभोगी गुप्तचर सामवायिक राजाओं तक पहुँचा दें । इस प्रकार सामवायिक राजाओं के बीच फूट डालने का यत्न किया जाय ।
( १ ) इस प्रकार जब सामवायिक राजाओं में फूट पड़ जाय तो उनमें से किसी एक राजा को अपने वश में कर लेना चाहिए ।
( २ ) भेद डालने के लिए जो उपाय सामवायिक राजाओं के संबंध में ऊपर बताये गये हैं वही उपाय सेनापति, युवराज तथा अन्य सैनिक अधिकारियों के लिए भी उपयोग में लाने चाहिए ।
( ३ ) संघवृत्त प्रकरण में निरूपित उपायों का आवश्यकतानुसार, यहाँ भी प्रयोग किया जा सकता है । यहाँ तक भेद-कार्यों का निरूपण किया गया ।
( ४ ) असहनशील, उत्साही, व्यसनी तथा दुर्ग-संपन्न शक्तिशाली शत्रु को गुप्तचर मिलकर शस्त्र, अग्नि तथा विष के प्रयोगों द्वारा मार डालें । अथवा उनमें से कोई एक ही समर्थ गुप्तचर ऐसे शत्रुओं को मार डाले; क्योंकि एक ही गुप्तचर पूर्वोक्त अनेक प्रकार के उपायों द्वारा सब प्रकार के शत्रुओं को अकेले ही मार सकता है । इस प्रकार का एक गुप्तचर वह कार्य कर सकता है, जो अनेक गुप्तचर मिलकर भी नहीं कर पाते हैं। यहाँ तक साम, दान, भेद और दण्ड, इस चतुर्वर्ग का निरूपण किया गया ।
( ५ ) उक्त चारों उपायों में पूर्व-पूर्व उपाय लघु होते हैं । साम में एक ही गुण होता है; दान में दो गुण होते हैं क्योंकि 'सान्त्वना' और 'देना', इसके दो अवयव हैं । भेद में तीन गुण होते हैं; क्योंकि 'साम', 'दान' और 'भेद', उसके तीन अंग हैं । इसी प्रकार दण्ड के चार अवयव होते हैं; तीन पहिले के और एक वह स्वयं ।
प्र० १४४ : अ० ६ ] दूष्य और शत्रु-जन्य आपत्तियाँ ६२३
(१) इत्यभियुञ्जानेषूक्तम् । स्वभूमिष्ठेषु तु त एवोपायाः । विशेषस्तु । स्वभूमिष्ठानामन्यतमस्य पण्यागारैरभिज्ञातान्दूतमुख्यानभीक्ष्णं प्रेषयेत्, त एनं सन्धौ परहिंसायां वा योजयेयुः, अप्रतिपद्यमानं कृतो नः सन्धिः इत्यावेद्येयुः । तमितरेषामुभयवेतनाः सङ्क्रामयेयुः—अयं वो राजा दुष्टः इति । (२) यस्य वा यस्माद्भयं वैरं द्वेषो वा, तं तस्माद्भेद्येयुः—'अयं ते शत्रुणात सन्धत्ते, पुरा त्वामतिसन्धत्ते, क्षिप्रतरं सन्धीयस्व, निग्रहे चास्य प्रयतस्व' इति । (३) आवाहविवाहाभ्यां वा कृत्वा संयोगमसंयुक्तानभेदयेत् । (४) सामन्ताटविकतत्कुलीनावरुद्धैश्चैषां राज्यं निघातयेत् । सार्थव्रजाटवीर्वा । दण्डं वाभिसृतम् । परस्परापाश्रयाश्चैषां जातिसङ्घांश्छिद्रेषु प्रहरेयुः । गूढाश्चाग्निरसशस्त्रेण ।
( १ ) आक्रमणकारी शत्रु तथा मित्र आदि सामवायिकों को भी इन्हीं उपायों के द्वारा शांत किया जा सकता है । इन पर तभी उक्त उपायों का प्रयोग किया जाय, जब तक कि आक्रमण के लिए प्रस्थान न करके अपनी ही भूमि में स्थित हों । उनके संबंध में विशेष बात यह है कि आक्रमण करने से पूर्व जब वे अपनी ही भूमि में वर्तमान हों उस समय अच्छी जानकारी रखनेवाले दूत-मुख्य उनमें से किसी एक के पास मणि-मुक्ता लेकर जायें और उसको अपने साथ सन्धि करने या दूसरे को मारने के लिए राजी करें । यदि वह सन्धि करना स्वीकार न भी करे तब भी दूतमुख्य यह अफवाह फैला दे कि अमुक राजा ने हमारे साथ सन्धि कर ली है । उस अफवाह को उभयवेतनभोगी व्यक्ति दूसरे मित्र राजाओं अथवा शत्रु-राजाओं तक पहुँचा दें; और कहें; कि 'अमुक राजा बड़ा दुष्ट है । उसने आप से कुछ न कह कर विजिगीषु राजा से चुपचाप सन्धि कर ली है ।'
( २ ) इस प्रकार गुप्तचर जिस राजा से शत्रुता, द्वेष या भय की आशंका रखते हों उसको अन्य राजाओं से भिन्न कर दे; बल्कि उनसे यह कहे कि 'देखो, यह राजा आपके शत्रु से संधि करता है । बाद में यह तुम्हें भी दबा लेगा । इसलिए आप जल्दी से अपने शत्रु विजिगीषु से संधि कर लें और इस अपने धोखेबाज मित्र को काबू में करने का प्रबंध करें ।
( ३ ) अवाह ( कन्या स्वीकार करना ) अथवा विवाह ( कन्यादान करना ) आदि के द्वारा संबंध जोड़कर ऐसे संबंधरहित दूसरे राजाओं में फूट उत्पन्न करना चाहिए ।
( ४ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह सामंत, आटविक या उनके मित्रों अथवा उनके शत्रुओं के कुल में पैदा हुए अवरुद्ध राजकुमारों के द्वारा उनके राज्य को हानि पहुँचाने का यत्न सोचे । अथवा उनके व्यापार-भार को ढोने वाले पशुओं, दूसरे गाय-
६२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण
(१) वितंसगिलवच्चारीन् योगैराचरितैः शठः।
घातयेत्परमिश्रायां विश्वासेनामिषेण च॥
इति अभियास्यत्कर्मणि नवमेऽधिकरणे दूष्यशत्रुसंयुक्ताः नाम षष्ठोऽध्यायः;
आदित सप्तविंशत्युत्तरशततमः।
—: ० :—
भैंसों तथा द्रव्यवनों या हस्तिवनों को नष्ट-भ्रष्ट करवा दे; अथवा रक्षा करने वाली सेना को ही नष्ट करवा दे; और परस्पर अलग किये गये जातिसंघ इन मित्र या शत्रु के प्रमादस्थानों पर बराबर प्रहार करते रहें। इसी प्रकार अन्य तीक्ष्ण, रसद आदि गुप्तचर भी अग्नि, विष आदि के द्वारा प्रहार करते रहें।
( १ ) परमिश्र ( मित्र और शत्रु द्वारा उत्पन्न की गई आपत्ति में ), शठ, विजिगीषु, वितंस ( पक्षियों के ठगने के लिए चित्र-विचित्र रंगोंवाला शरीर को ढकने वाला वस्त्र ), और गिल ( खाने योग्य मांस ) आदि के समान प्रयुक्त किए गए कपट उपायों के द्वारा, अपने ऊपर विश्वास पैदा कराके तथा कुछ सारवस्तु देकर, अपने शत्रुओं को वश में करना चाहिए।
इति अभियास्यत्कर्म नामक नौवें अधिकरण में दूष्यशत्रुसंयुक्त नामक छठा अध्याय समाप्त
—: ० :—
| प्रकरण १४५-१४६ | ## अर्थानर्थसंशययुक्ताः तासामुपाय-विकल्पजाः सिद्धयश्च |
|---|---|
| अध्याय ७ |
(१) कामादिरुत्सेकः स्वाः प्रकृतीः कोपयति, अपनयो बाह्याः। तदुभयमासुरी वृत्तिः। स्वजनविकारः कोपः परवृद्धिहेतुष्वापदर्थोऽनर्थः संशय इति।
(२) योऽर्थः शत्रुवृद्धिमप्राप्तः करोति, प्राप्तः प्रत्यादेयः परेषां भवति, प्राप्यमाणो वा क्षयव्ययोदयो भवति, स भवत्यापदर्थः यथा—सामन्तानामामिषभूतः, सामन्तव्यसनजो लाभः, शत्रुप्रार्थितो वा स्वभावाधिगम्यो लाभः, पश्चात्कोपेन पाणिग्राहेण वा विगृहीतः पुरस्ताल्लाभः, मित्रोच्छेदनेन सन्धिव्यतिक्रमेण वा मण्डलविरुद्धो लाभ इत्यापदर्थः।
अर्थ, अनर्थ तथा संशय संबंधी आपत्तियाँ और उनके प्रतीकार के उपायों से प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ
( १ ) काम, क्रोधादि दोषों के बढ़ जाने पर राजा की अपनी ही प्रकृतियाँ कुपित हो जाया करती हैं। अपनय अर्थात् नीतिभ्रष्ट हो जाने से परराष्ट्र संबंधी बाह्य प्रकृतियाँ कुपित हो जाती हैं। इसलिए कामक्रोधादि दोषों और अपनय, इन दोनों को आसुरी वृत्ति कहा गया है। अपनी प्रकृतियों का कोप शत्रु की उन्नति के अवसर पर आपत्ति का रूप धारण कर लेता है, जो कि अर्थ, अनर्थ और संशय, इन तीनों रूपों में प्रकट होता है।
( २ ) जो अर्थ अपनी लापरवाही से गँवाया हुआ शत्रु की वृद्धि करता है; जो अर्थ अपने हाथ में आ जाने पर भी दूसरों को लौटाया जाता है; और इसी प्रकार जो अर्थ प्राप्त होने पर भी क्षय-व्यय करने वाला होता है, उसे आपदर्थ; अर्थात्, अर्थरूप आपत्ति कहते हैं। जैसे : अनेक सामंतों द्वारा भोगी जाने योग्य वस्तु एक ही सामंत को मिल जाय, तो वह अन्य सामंतों के द्वारा मिलकर लौटाये जाने के कारण आपत्ति-जनक हो जाती है, इसी प्रकार व्यसन-पीड़ित सामन्त से छीना हुआ लाभ, स्वभावतः प्राप्त होने योग्य शत्रु से मांगा हुआ लाभ, पश्चात्कोप तथा पाणिग्राह के द्वारा बाधा पहुँचाये जाने पर यातव्य राजा से प्राप्त हुआ लाभ, मित्र का उच्छेदन करने तथा संधि को उल्लंघन करने के कारण, राजमण्डल की इच्छा के विरुद्ध प्राप्त हुआ लाभ—ये सब ही आपदर्थ हैं।
४० कौ०
६२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण
(१) स्वतः परतो वा भयोत्पत्तिरित्यनर्थः । (२) तयोः 'अर्थो न वा' इति, 'अनर्थो न वा' इति, 'अर्थोऽनर्थः' इति, 'अनर्थः अर्थः' इति संशयः । (३) शत्रुमित्रमुत्साहयितुमर्थो न वेति संशयः । शत्रुबलमर्थमानाभ्या-मावाहयितुमनर्थो न वेति संशयः । बलवत्सामन्तानां भूमिमादातुमर्थोऽनर्थः इति संशयः । ज्यायसा सम्भूययानमनर्थोऽर्थः इति संशयः । (४) तेषामर्थसंशयमुगच्छेत् । (५) अर्थोऽर्थानुबन्धः, अर्थो निरनुबन्धः अर्थोऽनर्थानुबन्धः, अनर्थो-ऽर्थानुबन्धः, अनर्थो निरनुबन्धः, अनर्थोऽनर्थानुबन्ध इत्यनुबन्धषड्वर्गः । (६) शत्रुमुत्पाट्य पाष्णिग्राहादानमर्थोऽर्थानुबन्धः । (७) उदासीनस्य दण्डानुग्रहः फलेन अर्थो निरनुबन्धः ।
(१) स्वयं या दूसरे किसी से प्राप्त हुए अर्थ के कारण जो भय की उत्पत्ति होती है, उसको अनर्यरूप आपत्ति कहते हैं ।
(२) १. यह अर्थ है या नहीं ? २. यह अनर्थ है या नहीं ? ३. यह अर्थ है या अनर्थ ? और ४. यह अनर्थ है या अर्थ ? इस प्रकार अर्थ और अनर्थ को लेकर चार प्रकार से उत्पन्न संशयरूप आपत्ति कहलाती है ।
(३) शत्रु के मित्र को शत्रु के साथ ही लड़ाने के लिए तैयार करते समय पहिला संशय होता है । शत्रु की सेना को धन तथा सत्कार के द्वारा बुलाने पर दूसरा संशय होता है । बलवान् सामन्त की भूमि को लेने में तीसरा संशय होता है । बलवान् सामन्त के साथ मिलकर यातव्य पर आक्रमण करने में चौथा संशय होता है ।
(४) इस दृष्टि से विजिगीषु को चाहिए कि उक्त चारों प्रकार के संशयों में जो संशय अर्थ-विषयक हो और अनर्थ के साथ जिसका कत्तई सम्बन्ध न हो, ऐसे संशय के विषय में उद्योग करे ।
(५) प्रत्येक अर्थ और अनर्थ के साथ अनुबन्ध का योग करने तथा न करने से उसके छह भेद होते हैं, जिन्हें अनुबंधषड्वर्ग कहते हैं । उसके भेद इस प्रकार हैं, १. अर्थानुबंध अर्थ, २. निरनुबंध अर्थ, ३. अनर्थानुबंध अर्थ, (ये तीन अर्थ के भेद हैं), और ४. अर्थानुबंध अनर्थ ५. निरनुबंध अनर्थ तथा ६. अनर्थानुबंध अनर्थ (ये तीन अनर्थ के भेद हैं) ।
(६) शत्रु का उच्छेद कर पाष्णिग्राह को भी अपने वश में कर लेना अर्थानुबंध अर्थ कहलाता है ।
(७) उदासीन राजा से धन आदि लेकर उसको सेना की सहायता देना निरनुबंध अर्थ कहलाता है ।
प्र० १४५-१४६ : अ० ७ ] अर्थानर्थ-संशय-विचार ६२७
(१) परस्यान्तररुच्छेदनमर्थोऽनर्थानुबन्धः । (२) शत्रुप्रतिवेशस्यानुग्रहः कोशदण्डाभ्यामनर्थोऽर्थानुबन्धः । (३) हीनशक्तिमुत्साह्य निवृत्तिरनर्थो निरनुबन्धः । (४) ज्यायांसमुत्थाप्य निवृत्तिरनर्थोऽनर्थानुबन्धः । (५) तस्य पूर्वः पूर्वः श्रेयानुपसम्प्राप्तुम् । इति कार्यवस्थापनम् । (६) समन्ततो युगपदर्थोत्पत्तिः समन्ततोऽर्थापद्भवति । (७) सैव पाष्णिग्राहविगृहीता समन्ततोऽर्थसंशयापद्भवति । (८) तयोर्मित्राक्रन्दोपग्रहात्सिद्धिः । (९) समन्ततः शत्रुभ्यो भयोत्पत्तिः समन्ततोऽनर्थापद्भवति । (१०) सैव मित्रविगृहीता समन्ततोऽनर्थसंशयापद्भवति । (११) तयोश्चलामित्रान्क्रन्दोपग्रहात्सिद्धिः । परमिश्राप्रतीकारो वा ।
( १ ) शत्रु के अन्तर्द्धि राजा का उच्छेद कर देना अनर्थानुबंध अर्थ है ।
( २ ) कोष और सेना के द्वारा शत्रु के पड़ोसी की सहायता करना अर्थानुबंध अनर्थ कहलाता है ।
( ३ ) हीनशक्ति राजा को सहायता का वचन देकर उसे लड़ने के लिए तैयार कर फिर उसकी मदद न करना निरनुबंध अनर्थ कहलाता है ।
( ४ ) अधिक शक्तिशाली राजा को सहायता का वचन देकर फिर उसकी मदद न करना अनर्थानुबंध अनर्थ कहलाता है ।
( ५ ) उक्त अनुबंध षड्वर्ग में पूर्व-पूर्व का अर्थ अधिक श्रेयस्कर है। यहाँ तक अर्थ-अनर्थ रूप कार्यों का प्रतिपादन किया गया ।
( ६ ) एक साथ चारों ओर से अर्थों की उत्पत्ति होने लगे तो उसको समंततः अर्थापत् कहते हैं ।
( ७ ) यदि उस समंततः अर्थापत् में पाष्णिग्राह द्वारा विरोध किया जाय तो उसको समंततः अर्थसंशयापत् कहते हैं ।
( ८ ) उक्त दोनों प्रकार की आपत्तियों का प्रतीकार मित्र और आक्रंद की सहायता से किया जा सकता है ।
( ९ ) चारों ओर से शत्रुओं द्वारा भय उत्पन्न होना समंततः अनर्थापत् कहलाता है ।
( १० ) यदि उक्त भय में मित्र विघ्न उपस्थित करे तो उसको समंततः अनर्थ-संशयापत् कहते हैं ।
( ११ ) इन दोनों भयों का प्रतीकार चलशत्रु और आक्रंद को अनुकूल बनाकर किया जा सकता है । अथवा नवम अधिकरण में परमिश्रा आपत्ति का जो प्रतीकार बताया गया है उसको भी यहाँ प्रयोग में लाया जाय ।
६२८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण
(१) इतो लाभ इतरतो लाभ इत्युभयतोऽर्थापद्भवति । तस्यां समन्ततोऽर्थायां च लाभगुणयुक्तमर्थमादातुं यायात् । तुल्ये लाभगुणे प्रधानमासन्नमनतिपातिनम्, ऊनो वा येन भवेत्तमादातुं यायात् । (२) इतोऽनर्थ इतरतोऽनर्थ इत्युभयतोऽनर्थापत् । तस्यां समन्ततोऽनर्थायां च मित्रेभ्यः सिद्धिं लिप्सेत । (३) मित्राभावे प्रकृतीनां लघीयस्यैकतोऽनर्थां साधयेत् । उभयतोऽनर्थां ज्यायस्या । समन्ततोऽनर्थां मूलेन प्रतिकुर्यात् । अशक्ये सर्वमुत्सृज्यापगच्छेत् । दृष्टा हि जीवता पुनरापत्तिः, यथा सुयात्रोदयनाभ्याम् । (४) इतो लाभ इतरतो राज्याभिमर्श इत्युभयतोऽर्थानर्थापद्भवति । तस्यामनर्थसाधको योऽर्थस्तमादातुं यायात्, अन्यथा हि राज्याभिमर्शं वारयेत् । (५) एतया समन्ततोऽर्थानर्थापद्व्याख्याता ।
( १ ) जहाँ पर दोनों से अर्थविषयक आपत्ति प्राप्त हो उसे उभयतः अर्थापद् कहते हैं । उभयतः अर्थापद् और समन्ततः अर्थापद् में से किसी एक में यदि आदेय, प्रत्यादेय आदि लाभ-गुणों से युक्त अर्थ के प्राप्त होने की संभावना हो तो उस अर्थ को प्राप्त करने के लिए अवश्य जाना चाहिए । यदि दोनों ओर लाभगुण समान ही हों तो उनमें जो श्रेष्ठ फल देने वाला हो, या अपने देश के नजदीक हो, या थोड़े ही समय में प्राप्त किया जाने योग्य हो, या जिसके प्राप्त न करने पर अपनी हानि हो, उस अर्थ को लेने के लिए अवश्य जाना चाहिए ।
( २ ) यदि दोनों ओर से अनर्थ की ही उत्पत्ति होती हो तो उसे उभयतः अनर्थापद् कहते हैं । उभयतः अनर्थापद् और समन्ततः अनर्थापद् दोनों में मित्रों द्वारा सफलता प्राप्त करने की चेष्टा करनी चाहिए ।
( ३ ) ऐसी स्थिति में यदि मित्रों से सहायता प्राप्त न हो तो अपनी लघु प्रकृतियों ( साधारण राजकर्मचारी ) द्वारा ही एकतः अनर्थापद् का प्रतीकार किया जा सकता है । इसी प्रकार उभयतः अनर्थापद् का प्रतीकार ज्येष्ठ प्रकृति द्वारा और समन्ततः अनर्थापद् का प्रतीकार राजधानी को छोड़कर किया जा सकता है । यदि इतने पर भी इन आपदाओं को शान्त न किया जा सके तो अपना सर्वस्व त्याग कर चला जाना चाहिए । जीवित रहने पर अपने छोड़े हुए स्थान को पुनः प्राप्त किया जा सकता है, जैसा कि राजा नल और वत्सराज उदयन के जीवनचरित से स्पष्ट है ।
( ४ ) एक ओर से लाभ और दूसरी ओर से अपने राज्य पर आक्रमण किये जाने वाली अर्थ और अनर्थ युक्त स्थिति को उभयतः अर्थ-अनर्थापद् कहते हैं । इन दोनों स्थितियों में यदि अर्थ से अनर्थ का भी प्रतीकार किया जा सके तो अर्थ-प्राप्ति के लिए ही यत्न करना चाहिए, अन्यथा अर्थ को छोड़कर अनर्थ का ही प्रतीकार करना चाहिए ।
( ५ ) इसी प्रकार समन्ततः अर्थानर्थापद् के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।
प्र० १४५-१४६ : अ० ७] अर्थानर्थ-संशय-विचार ६२९
(१) इतोनर्थ इतरतोऽर्थसंशय इत्युभयतोऽनर्थार्थसंशया । तस्यां पूर्वमनर्थं साधयेत्, तत्सिद्धावर्थसंशयम् । (२) एतया समन्ततोऽनर्थार्थसंशया व्याख्याता । (३) इतोऽर्थ इतरतोऽनर्थसंशय इत्युभयतोऽर्थानर्थसंशयापत् । (४) एतया समन्ततोऽर्थानर्थसंशया व्याख्याता । (५) तस्यां पूर्वा पूर्वा प्रकृतीनामनर्थसंशयान्मोक्षयितुं यतेत । श्रेयो हि मित्रमनर्थसंशये तिष्ठन्न दण्डः, दण्डो वा न कोश इति । (६) समग्रमोक्षणाभावे प्रकृतीनामवयवान्मोक्षयितुं यतेत । तत्र पुरुषप्रकृतीनां च बहुलमनुरक्त वा तीक्ष्णलुब्धवज्र्जम् । द्रव्यप्रकृतीनां सारं महोपकारं वा । सन्धिनाऽऽसनेन द्वैधीभावेन वा लघूनि विपर्ययैर्गुरूनि ।
(१) एक ओर से अनर्थ का होना और दूसरी ओर से अर्थ में संशय का होना उभयतः अनर्थार्थसंशयापद् कहलाता है । इस आपत्ति में पहले अनर्थ का और बाद में अर्थसंशय का प्रतीकार करना चाहिए ।
(२) इसी प्रकार समंततः अनर्थार्थसंशयापद् के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।
(३) एक ओर से अर्थ और दूसरी ओर से अनर्थ का संशय होने पर उभयतः अर्थानर्थ-संशयापद् कहलाता है ।
(४) इसी के समान समंततः अर्थानर्थ-संशयापद् भी समझना चाहिए ।
(५) इन विपत्तियों में पहले अनर्थसंशय को हटाकर फिर अर्थ के लिए यत्न करना चाहिए । स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड और मित्र, इन प्रकृतियों में उत्तर-उत्तर की अपेक्षा पूर्व-पूर्व प्रकृति के अनर्थ का प्रतीकार करना चाहिए । मित्र की ओर से यदि अनर्थसंशय हो तो वह सेना की ओर से होने वाले अनर्थसंशय की अपेक्षा सुकर है, क्योंकि मित्र सेना की अपेक्षा अधिक कष्टकर नहीं होता है । इसी प्रकार सेना की ओर से होने वाला अनर्थसंशय, कोष से होने वाले अनर्थसंशय की अपेक्षा अधिक कष्टकर नहीं है । इसलिए कोष से होने वाले अर्थसंशय का ही पहिले प्रतीकार करना चाहिए ।
(६) यदि समग्र प्रकृतियों का अनर्थसंशय एक बार ही दूर न किया जा सके तो उनमें से कुछ का ही अनर्थसंशय दूर किया जाय । ऐसी स्थिति में पुरुष प्रकृतियों में से तीक्ष्ण और लोभी पुरुषों को छोड़कर पहिले उनके ही अनर्थसंशय का प्रतीकार किया जाय जो बहुसंख्यक होने के साथ-साथ अनुराग भी रखते हैं । द्रव्य प्रकृतियों में से अधिक मूल्यवान् एवं अत्यन्त उपकारक द्रव्यों को ही अनर्थसंशय से मुक्त करना चाहिए । संधि, आसन तथा द्वैधीभाव के द्वारा लघुद्रव्यों को छुड़ाने का और विग्रह तथा संश्रय के द्वारा गुरु द्रव्यों को छुड़ाने का यत्न करना चाहिए ।
६३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ नौवां अधिकरण
(१) क्षयस्थानवृद्धीनां चोत्तरोत्तरं लिप्सोत । प्रातिलोम्येन वा क्षयादीनाम् । आयत्यां विशेषं पश्येत् । (२) इति देशावस्थापनम् । (३) एतेन यात्रादिमध्यान्तेष्वर्थानर्थसंशयानामुपसंप्राप्तिर्व्याख्याता । (४) निरन्तरयोगित्वाच्चार्थानर्थसंशयानां यात्रादावर्थः श्रेयानुपसंप्राप्तुं पाष्णिग्राहासारप्रतिघाते क्षयव्ययप्रवासप्रत्यादेयमूलरक्षणेषु च भवति । तथानर्थः संशयो वा स्वभूमिष्ठस्य विषह्यो भवति । (५) एतेन यात्रामध्येऽर्थानर्थसंशयानामुपसम्प्राप्तिर्व्याख्याता । (६) यात्रान्ते तु कर्शनीयमुच्छेदनीयं वा कर्शयित्वोच्छिद्य वार्थः श्रेयानुपसम्प्राप्तुं नानर्थः संशयो वा पराबाधभयात् । (७) सामवायिकानामपुरोगस्य तु यात्रामध्यान्तगोऽनर्थः संशयो वा श्रेयानुपसंप्राप्तुमनिबन्धगामित्वात् ।
( १ ) क्षय ( शक्ति और सिद्धि की क्षीणता ), स्थान ( शक्ति और सिद्धि की एकावस्था ) और वृद्धि ( शक्ति और सिद्धि का उपचय ), इनमें से उत्तरोत्तर को प्राप्त करने का यत्न करना चाहिए । अथवा यदि भविष्य में किसी वृद्धि की अतिशय संभावना हो तो वृद्धि से स्थान और स्थान से क्षय, इस प्रतिलोम गति से ही उसे प्राप्त करने का यत्न करना चाहिए ।
( २ ) यहाँ तक देश-निमित्तक आपत्तियों का निरूपण किया गया ।
( ३ ) देशनिमित्तक आपत्तियों के स्वरूप और प्रतीकार के समान ही युद्धयात्रा के आदि, अन्त तथा मध्य में होने वाले अर्थ, अनर्थ और संशयों की प्राप्ति तथा प्रतीकार का भी निरूपण समझना चाहिए ।
( ४ ) यदि युद्धयात्रा के आदि में अर्थ, अनर्थ और संशय एक साथ ही उत्पन्न हो जायें तो उनमें से पहिले अर्थग्रहण करना ही श्रेयस्कर होता है । पाष्णिग्राह तथा आसार के प्रतिघात के लिए और क्षय, व्यय, प्रवास, प्रत्यादेय तथा मूल स्थान इन सबकी रक्षा के लिए अर्थ ही मूल कारण होता है : यदि युद्ध यात्रा के आरम्भ में अर्थ के समान ही अनर्थ और संशय भी उपस्थित हों तो अपनी भूमि में स्थित राजा उनका प्रतीकार सरलता से कर सकता है ।
( ५ ) इसी प्रकार युद्धयात्रा के मध्य में उत्पन्न अर्थ, अनर्थ और संशय की प्राप्ति तथा प्रतीकार का व्याख्यान भी समझ लेना चाहिए ।
( ६ ) यात्रा के अन्त में, परभूमि में स्थित विजिगीषु के लिए निर्बल एवं उच्छेदनीय शत्रु का ही अर्थग्रहण करना श्रेष्ठ है । ऐसी स्थिति में अनर्थ या संशय का ग्रहण करना उचित नहीं है, क्योंकि ऐसे समय शत्रु की ओर से बाधा पहुँचने की पूरी सम्भावना बनी रहती है ।
( ७ ) यदि राजमंडल के किसी अप्रधान राजा पर आक्रमण किया जाय तो उस
प्र० १४५-१४६ : अ० ७ ] अर्थानर्थ-संशय विचार ६३१
(१) अर्थो धर्मः काम इत्यर्थत्रिवर्गः । तस्य पूर्वः पूर्वः श्रेयानुपसम्प्राप्तुम् । (२) अनर्थोऽधर्मः शोक इत्यनर्थत्रिवर्गः । तस्य पूर्वः पूर्वः श्रेयान् प्रतिकर्तुम् । (३) अर्थोऽनर्थ इति, धर्मोऽधर्म इति, कामः शोक इति संशयत्रिवर्गः । तस्योत्तरपक्षसिद्धौ पूर्वपक्षः श्रेयानुपसंप्राप्तुम् । (४) इति कालावस्थापनम् । इत्यापदः । (५) तासां सिद्धिः पुत्रभ्रातृबन्धुषु सामदानाभ्यां सिद्धिरनुरूपा, पौरजानपददण्डमुख्येषु दानभेदाभ्यां, सामन्ताटविकेषु भेददण्डाभ्याम् । (६) एषाऽनुलोमा विपर्यये प्रतिलोमा । मित्रामित्रेषु व्यामिश्रा सिद्धिः । परस्परसाधका ह्युपायाः ।
समय यात्रा के मध्य में और अन्त में होने वाले अनर्थ तथा संशय का प्रतीकार करना ही श्रेयस्कर होता है, क्योंकि प्रधान राजा उस समय नेतृत्व में ही फँसे रहते हैं और अप्रधान राजा प्रतिबन्धरहित होने के कारण कहीं भी जा सकता है ।
( १ ) अर्थ, धर्म और काम, इनको अर्थत्रिवर्ग कहा जाता है । इस अर्थत्रिवर्ग में पूर्व-पूर्व का ग्रहण करना अधिक श्रेयस्कर है ।
( २ ) अनर्थ, अधर्म और शोक, इनको अनर्थत्रिवर्ग कहा जाता है । इस अनर्थ-त्रिवर्ग में पूर्व-पूर्व का प्रतीकार करना अधिक कल्याणप्रद है ।
( ३ ) अर्थ-अनर्थ, धर्म-अधर्म और काम-शोक इनमें परस्पर संशय का होना संशयत्रिवर्ग कहा जाता है । इस संशयत्रिवर्ग में अनर्थ, अधर्म और शोक का प्रतीकार होने पर अर्थ, धर्म और काम का ग्रहण करना अधिक श्रेयस्कर है ।
( ४ ) यहाँ तक यात्राकाल के आदि, मध्य तथा अन्त आदि के अर्थों एवं अनर्थों की व्याख्या और अर्थ, अनर्थ तथा संशययुक्त सभी प्रकार की विपत्तियों का निरूपण किया गया ।
( ५ ) पुत्र, भाई और बन्धु-बांधवों के संबन्ध में साम तथा दान के अनुरूप प्रतीकार करना ही उचित समझा गया है । इसी प्रकार नागरिकों, जनपदवासियों, सैनिकों और राष्ट्र के प्रमुख व्यक्तियों के विषय में दान तथा भेद उपायों का प्रयोग करना ही उचित है । सामंत और आटविकों के संबंध में भेद तथा दण्ड के उपायों का प्रयोग करना उचित है ।
( ६ ) इस रीति से किया गया प्रतीकार अनुलोम कहलाता है और इसके विपरीत होने पर वह प्रतिलोम कहा जाता है । मित्र तथा शत्रुओं के विषय में आवश्यकतानुसार मिले-जुले ( व्यामिश्र ) उपायों द्वारा प्रतीकार करना चाहिए; क्योंकि सभी उपाय परस्पर एक-दूसरे के सहायक ही होते हैं ।
६३२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ नौवां अधिकरण
(१) शत्रोः शङ्कितामात्येषु सान्त्वं प्रयुक्तं शेषप्रयोगं निवर्तयति । दूष्यामात्येषु दानम् । संघातेषु भेदः । शक्तिमत्सु दण्ड इति । (२) गुरुलाघवयोगाच्चापदां नियोगविकल्पसमुच्चया भवन्ति । (३) 'अनेनैवोपायेन नान्येन' इति नियोगः । (४) 'अनेन वाऽन्येन वा' इति विकल्पः । (५) 'अनेनान्येन च' इति समुच्चयः । (६) तेषामेकयोगाश्चत्वारस्त्रियोगाश्च, द्वियोगाः षट्, एकश्चतुर्योग इति पञ्चदशोपायाः । तावन्तः प्रतिलोमाः । (७) तेषामेकेनोपायेन सिद्धिरेकसिद्धिः, द्वाभ्यां द्विसिद्धिः, त्रिभिस्त्रिसिद्धिः, चतुर्भिश्चतुःसिद्धिरिति ।
( १ ) अपने जिन अमात्यों पर शत्रु संदेह करता है उन पर किया गया साम प्रयोग अन्य सभी उपायों का निवारण कर देता है। इसी प्रकार शत्रु के दूष्य अमात्यों में दान, आपस में मिले हुए अमात्यों में भेद और शक्तिमान्-अमात्यों में दण्ड का प्रयोग, शेष सभी उपायों को निवृत्त कर देता है ।
( २ ) छोटी-बड़ी आपत्तियों के अनुसार ही उपायों के नियोग, विकल्प और समुच्चय हुआ करते हैं ।
( ३ ) केवल इसी उपाय से कार्यसिद्धि हो सकेगी, दूसरे से नहीं, इसी का नाम नियोग है ।
( ४ ) इस उपाय से कार्यसिद्धि होगी या दूसरे उपाय से इसका नाम विकल्प है ।
( ५ ) इस उपाय को तथा दूसरे उपाय को मिलाकर कार्यसिद्धि होगी, इसका नाम समुच्चय है ।
( ६ ) साम आदि चारों उपायों को अलग-अलग, दो-दो, तीन-तीन या चार-चार एक साथ मिलाकर पंद्रह तरह से प्रयोग में लाया जा सकता है । जैसे—सामदानभेद, सामदानदण्ड, सामभेददण्ड और दानभेददण्ड—ये चार; केवल साम, केवल दान, केवल भेद और केवल दण्ड—ये चार; सामदान, सामभेद, सामदण्ड, दानभेद, दानदण्ड और भेददण्ड—ये छः और सामदानदण्डभेद, इन चारों को मिलाकर एक; इस प्रकार ( ४+४+६+१ ) पंद्रह प्रयोग होते हैं । पंद्रह प्रकार के प्रतिलोम उपाय भी होते हैं; जैसे—दण्ड, भेद, दान, साम—ये चार; दण्डभेददान, दण्डभेदसाम, भेददानसाम, दण्डदानसाम—ये चार; दण्डभेद, दण्डदान, दण्डसाम, भेददान, भेदसाम, दानसाम—ये छह और दण्ड आदि चारों एक साथ मिलाकर पंद्रह प्रतिलोम उपाय होते हैं ।
( ७ ) उक्त उपायों में से एक ही उपाय के द्वारा जो कार्यसिद्धि होती है उसे