कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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विश्वासों की जो मिथ्याएँ थीं, उनकी जगह सच्चाई, प्रकाश, न्याय और समानता ने ले ली थी। समाजवाद के अभ्युदय का यह अठारहवीं शताब्दी का स्वरूप था। इस नयी क्रांति के बाद पहिले तो उस समय के सामन्ती ठाकुरों तथा पूँजीवादियों के बीच संघर्ष हुआ और इसी बीच शोषकों तथा शोषितों का संघर्ष भी जारी था। यह संघर्ष था पूँजीवादी वर्ग का और मजदूर वर्ग का ( फ्रेडरिक एंगेल्स, समाजवाद : वैज्ञानिक और काल्पनिक, पृ० ६ ) ।
१८वीं शताब्दी में फ्रांसीसी समाजवादी क्रांति के पोषक हुए मोरेली, मैब्लीकी, सेंट साइमन, फूरिये और ओवेना। इनमें सेंट साइमन का नाम विशेषतया उल्लेखनीय है। फ्रांसीसी क्रांति के समय यद्यपि उसकी अवस्था तीस साल से भी कम थी, फिर भी उसका दृष्टिकोण इतना व्यापक और व्यक्तित्व इतना प्रतिभाशाली था कि उसके बाद जितने भी अर्थशास्त्री हुए हैं, उनके विचारों में जितनी बातें देखने को मिलती हैं उन सबका मूल साइमन की रचनाओं में है।
फूरिये ने सामाजिक विकास के पूरे इतिहास को जांगल, वर्वर, पितृसत्ता-त्मक और सभ्य—इन चार भागों में विभक्त किया है। अपने समसामयिक दार्शनिक होगेल की ही भाँति फूरिये ने भी द्वन्द्ववाद की प्रणाली का आश्रय लेकर यह दर्शाया है कि अंत में जाकर मनुष्य जाति का भी नाश हो जायेगा। उसने पूँजीवादी प्रवृत्तियों के समर्थक लेखकों की बड़ी खिल्ली उड़ाई है। वह एक सिद्धहस्त व्यंग्यकार भी था और उसने तत्कालीन समाज में व्याप्त धोखे-बाजी तथा व्यावसायिक मनोवृत्ति का बड़ा ही सजीव रूप उतारा है ( वही, पृ० १६ ) । फूरिये के विचारों के अनुसार समाज की उक्त बुराइयों को सुधारने का महत्त्वपूर्ण प्रयत्न किया, राबर्ट ओवेन ने। उसने समाज की पूर्ण साम्यवादी ढंग से संघटन की दिशा में भी यत्न किया ( वही, पृ० २० ) ।
अब तक समाजवाद का उद्देश्य था एक दोषरहित समाज-व्यवस्था का निर्माण करना किन्तु अब उसका उद्देश्य हो गया है पूँजीपति और मजदूर वर्गों के और उनके पारस्परिक संघर्षों के आर्थिक घटनाक्रमों के इतिहास का अध्ययन करना। इस समीक्षित सिद्धांत के द्वारा यह पता लग सका है कि अतीत का सारा इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास रहा है और वर्गों के उदय के मूल में एक मात्र कारण रही हैं, आर्थिक परिस्थितियां ( वही, पृ० २७-२८ ) ।
अब तक दार्शनिकों ने इतिहास को अतिभौतिकवादी, द्वंद्ववादी, आदर्श-
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वादी ढंग से परखने का यत्न किया और यह स्वीकार किया कि मनुष्य की चेतना ही उसकी सत्ता का आधार रही है; किन्तु अब भौतिकवादी ढंग से इतिहास की गवेषणा करने पर यह सिद्ध हो गया है कि मनुष्य की सत्ता को उसकी चेतना का आधार प्राप्त है। अब आवश्यकता इस बात को दिखाने की है कि ऐतिहासिक विकास की एक निश्चित अवस्था में पूंजीवाद का उत्पन्न होना अनिवार्य है; और इसलिए उस अवस्था के परिपक्व हो जाने पर उसका पतन भी निश्चित है।
इतिहास-संबंधी इस भौतिकवादी धारणा का महान् आविष्कारक था, मार्क्स। मार्क्स ने यह सिद्ध किया है कि उत्पादन और उत्पादित वस्तुओं का विनिमय ही समाज-व्यवस्था का आधार रहा है। इस आधार पर सामाजिक परिवर्तनों तथा राजनीतिक क्रांतियों का पता लगाने के लिए हमें न तो सत्य, न्याय एवं विचारों की खोज करनी चाहिए; बल्कि यह देखना चाहिए कि उस युग की उत्पादन तथा विनियम-प्रणाली में क्या-क्या परिवर्तन हुए। यह एक बहुत बड़ा सत्य अर्थशास्त्रियों ने खोज निकाला है कि किसी युग की ठीक परिस्थितियों का सही ज्ञान, उस युग की दार्शनिक विचारधारा से प्राप्त न होकर उस युग की आर्थिक परिस्थितियों से उपलब्ध हो सकता है।
उत्पादन और विनिमय का तुमुल संघर्ष आज भी पूरी शक्ति पर है। भारत जैसे देश में, जहाँ कि समाजवादी व्यवस्था का आगमन एक नये युग के समान माना जायेगा और जिसके आगमन की माँग दिनों-दिन बढ़ रही है, उत्पादन तथा विनिमय का माध्यम बहुत ही असंतुलित है। इस असंतुलन एवं असंगति को दूर करने का केवल एक ही तरीका है कि :
"सर्वहारा वर्ग राजसत्ता पर अधिकार कर ले। इस सत्ता के सहारे उत्पादन के साधनों को पूंजीवादियों के दुर्बल हाथों से छीन करके उन्हें सार्वजनिक सम्पत्ति बना दिया जाय। इस कार्य द्वारा उत्पादन के साधनों को पूंजी के बन्धनों से वह मुक्त कर देगा और अपने सामाजिक स्वरूप की प्रतिष्ठा करने का उन्हें सु-अवसर देगा। उस अवस्था में समाज का उत्पादन पहिले से बनी योजना के अनुसार संभव हो सकेगा। उत्पादन का विकास हो जाने से समाज में विभिन्न वर्गों का अस्तित्व अनावश्यक और निरर्थक बन जायेगा। जैसे-जैसे सामाजिक उत्पादन के क्षेत्र से अराजकता दूर होगी, वैसे-ही-वैसे राज्य के राजनीतिक अधिकारों का भी अन्त हो जायेगा। मनुष्य अपने सामाजिक संघटन का स्वामी बन जायेगा; अतः वह प्रकृति का
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और अपने आपका भी स्वामी बन जायेगा। इतिहास में पहिली बार मनुष्य पूर्णतः स्वतन्त्र होगा।" (वही, पृ० ४८)
एंगेल्स के अतिरिक्त मार्क्स, लेनिन और स्टालिन का भी दृष्टिकोण यही रहा है; और आज भी यही स्थिति हमारे सामने विचारणीय है। १८५३ ई० में कोलोन में कम्युनिस्ट लीग के सदस्यों के सजा पाने के बाद मार्क्स राजनीति के आंदोलन से दूर हो गये। उसके बाद दस वर्ष तक उन्होंने ब्रिटिश म्युजियम में अर्थशास्त्र पर उपलब्ध विपुल सामग्री का अध्ययन किया। उनका यह अध्ययन १८५९ ई० में अर्थशास्त्र की समालोचना (भाग १) पुस्तक के रूप में फलित हुआ, जिसमें मूल्य और मुद्रा सम्बन्धी मार्क्सीय सिद्धान्तों की विस्तृत व्याख्या देखने को मिलती है। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में संप्रति सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक दास कापीटल, क्रिटीक डेर पोलीटीशन ईकोनोमी, एस्टॅर बांट का प्रथम खण्ड १८६७ ई० में हाम्बुर्ग से प्रकाशित हुआ। यह पुस्तक युगप्रवर्तक के रूप में सिद्ध हुई। इस पुस्तक में समाजवादी दृष्टिकोण से पूंजीवादी उत्पादन और उसके फलाफल की विस्तृत व्याख्या की गयी है।
विज्ञान के इतिहास में मार्क्स ने जिन महत्त्वपूर्ण बातों का पता लगाकर अपने यश को अमर बनाया उनमें से 'पहिली तो वह क्रांति है, जो संसार के इतिहास को देखने-परखने के दृष्टिकोण से उन्होंने की है। मार्क्स ने यह सिद्ध कर दिया है कि अब तक का सारा इतिहास वर्ग-संघर्षों का इतिहास रहा है; अब तक के सीधे और जटिल, सभी राजनीतिक संघर्षों की जड़ में सामाजिक वर्गों के राजनीतिक और सामाजिक शासन की समस्या ही रही है। समस्या यह रही है कि पुराने वर्ग अपनी मिल्कियत बनाये रखें या नये पनपते हुए वर्ग इस मिल्कियत पर हॉवी हो जाँय।"
इन बातों पर गम्भीरता से विचार किये जाने पर मार्क्स के अनुसंधान से "इतिहास को पहिली बार अपना वास्तविक आधार मिला। यह आधार एक बहुत ही स्पष्ट सत्य था, जिसकी ओर लोगों का ध्यान नहीं गया था। यानी यह कि मनुष्य को सबसे पहिले खाना, पीना, कपड़ा पहनना और घर में रहना होता है। इसलिए उसे काम भी करना होता है। इसके हल हो जाने पर ही प्रधानता पाने के लिए मनुष्य एक-दूसरे से झगड़ सकते हैं और राजनीति, धर्म, दर्शन आदि को अपना समय दे सकते हैं। अंततः इस स्पष्ट सत्य को अपना ऐतिहासिक आधार प्राप्त हुआ।"
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"मार्क्स ने जिस दूसरी महत्त्वपूर्ण बात का पता लगाया है, वह पूंजी और श्रम के सम्बन्ध की निश्चित व्याख्या है। दूसरे शब्दों में उसने यह दिखा दिया कि वर्तमान समाज में उत्पादन की जो पूंजीवादी पद्धति चालू है, उसके द्वारा किस तरह पूंजीपति, मजदूर का शोषण करता है। जब एक बार अर्थशास्त्र ने यह सिद्धांत बना लिया कि सभी तरह की संपत्ति और मूल्य का मूलस्रोत श्रम ही है तो, यह प्रश्न भी अनिवार्य रूप से सामने आता है कि इस सिद्धान्त से हम इस तथ्य का मेल कैसे करें कि मजदूर अपने श्रम से जिस मूल्य का निर्माण करता है वह सब उसे नहीं मिलता, वरन् उसका एक अंश उसे पूंजीपति को दे देना पड़ता है" (फ्रेडरिक एंगेल्स : कार्ल मार्क्स और उनके सिद्धांत पृ० ८-१०, डा० रामविलास शर्मा का अनुवाद)।
समाजवादी दृष्टिकोण से इतिहास की इन नयी धारणाओं का परिणाम महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ। इनसे पता लगा कि पहिले इतिहास की गति वर्ग-विरोध और वर्ग-संघर्षों के बीच रही है; शासक और शासित, शोषक और शोषित का अस्तित्व बराबर बना रहा है। मार्क्स से पूर्व की समूची ऐतिहासिक प्रगति विशेषाधिकार प्राप्त एक अल्पसंख्यक समुदाय पर निर्भर थी। मार्क्स के विवेचन के बाद समाज की वे उत्पादक शक्तियाँ, जो पूँजीवादी नियंत्रण की सीमाओं को लांघ चुकी हैं, अब उस संघटित सर्वहारा वर्ग की ताक में हैं जिससे उस पर अधिकार कर ऐसी स्थिति उत्पन्न हो कि जन-साधारण का उत्पादन में ही भाग न हो, बल्कि, सामाजिक संपत्ति के वितरण और उसके संचालन में भी उसका हाथ रहे, जिससे कि उत्पादक शक्तियों और उत्पादन, दोनों में उत्तरोत्तर वृद्धि हो।
मार्क्स के बाद एंगेल्स, लेनिन और स्टालिन आदि अर्थशास्त्रियों एवं क्रांतिकारी राजनीतिज्ञों ने भी आज के वैज्ञानिक समाजवाद का मूल आधार यही माना है।
मानव-इतिहास में विकास के नियम की पहिली खोज मार्क्स ने की थी। उसने एक अभूतपूर्व सत्य का उद्घाटन किया कि किसी भी युग में जीविका के तात्कालिक भौतिक साधनों का उत्पादन ही समाज के आर्थिक विकास का मूल कारण रहा है। उसने बताया कि कला, धर्म, विज्ञान, राजनीति, साहित्य आदि के लिए समय देने से पूर्व यह आवश्यक है कि मनुष्य जाति के लिए रोटी, रोजी, वस्त्र और रहने के साधन सुलभ हों।
मार्क्स के विचारों में सच्चाई, आत्मबल, विश्वास और विश्लेषण की जो
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अनेक बातें एक साथ दिखायी देती हैं उनका सबसे बड़ा कारण यह रहा है कि वे अपने युग के सबसे लांछित और प्रताडित व्यक्ति थे । उनकी वाणी में अनुभव और अध्ययन की छाप थी । मार्क्स और एंगेल्स के सह-यत्न से प्रस्तुत और कम्युनिस्ट लीग ( बुन्ददेर कम्युनिस्टेन ) के दूसरे अधिवेशन में ( लंदन, नव० १८४७ ) में पढ़ा गया कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा-पत्र संसार के साम्यवादी इतिहास में अपना नाम रखता है । इस घोषणा-पत्र ने संसार के आगे एक नयी रूपरेखा यह प्रस्तुत की कि गतिमूलक द्वन्द्ववाद विकास का सबसे व्यापक और आधारभूत सिद्धान्त है । मार्क्स ने जर्मनी का प्राचीन दर्शन, इंग्लैंड का पुरातन ( क्लैसिकल ) अर्थशास्त्र और फ्रांस का समाजवाद, इन १९वीं शताब्दी की तीन सैद्धांतिक विचारधारा को एक सूत्र में गूंथ कर मार्क्सवाद को जन्म दिया; जिसको आज वैज्ञानिक समाजवाद कहा जाता है ।
मार्क्स का भौतिक दर्शन : मार्क्स ने दार्शनिक भौतिकवाद को स्वीकार किया है । मार्क्स के अनुसार संसार की एकता उसके अस्तित्व में न होकर उसकी भौतिकता में है । भूत या प्रकृति के अस्तित्व की पद्धति का नाम ही गति है । गति के बिना भूत का कोई अस्तित्व नहीं है । विचार और चेतना मानव-मस्तिष्क की उपज है; और मानव-प्रकृति की उपज है, जिसका विकास उसके साथ-साथ हुआ । इस दृष्टि से यह सिद्ध होता है कि मार्क्स का शेष प्रकृति से कोई विरोध नहीं है; बल्कि मानव-मस्तिष्क, प्रकृति की उपज होने के कारण शेष प्रकृति के साथ उसका साम्य ही स्वीकार करते हैं ।
हेगेल के द्वन्द्ववाद का समर्थन : मार्क्स और एंगेल्स, दोनों ने हेगेल के द्वंद्ववाद को जर्मनी के पुरातन दर्शन की सबसे महत्त्वपूर्ण देन बताई है; क्योंकि उसमें विकास के व्यापक सिद्धांत और प्रसार के लिये गंभीर तत्त्व वर्तमान है । मार्क्स के मतानुसार द्वंद्ववाद की कसौटी प्रकृति है और यह मानना होगा कि आधुनिक प्रकृति-विज्ञान ने इस कसौटी के लिए बहुत-सी सामग्री और दिन-पर-दिन बढ़ने वाली सामग्री दी है ( लेनिन का लेख : कार्ल मार्क्स और उनकी देन; कार्ल मार्क्स और उनके सिद्धांत, पृ० २० ) ।
हेगेल के दर्शन में एक क्रांतिकारी पहलू था । उसके द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के लिये ऐसे दर्शन की कतई आवश्यकता-अपेक्षा नहीं समझी गयी है जो विज्ञान से शून्य या परे हो । वस्तुतः द्वंद्वात्मक दर्शन के लिए कुछ भी अंतिम, त्रिकाल सत्य और पवित्र नहीं है । उसकी दृष्टि से हरेक वस्तु में क्षण-भंगुरता है ।
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आवागमन के अबाधक्रम को छोड़कर निरंतर नीचे से ऊपर की ओर अविराम गति से अग्रसर होना ही चिरंतन है। चितंनशील मस्तिष्क में द्वंद्वात्मक दर्शन इसी को उत्क्रांत करता है ( वही, पृ० २१; तथा ऐंगेल्स : डूरिंग का मत-खंडन, पृ० ३१ )।
वर्ग-संघर्ष : इतिहास से हमें विदित होता है कि जातियों और समाजों के संघर्ष से ही क्रांति का बीजारोपण हुआ है। आज का समाज दो प्रमुख हिस्सों में बँटा है : पूंजीवादी और श्रमजीवी। पूंजीवादी वर्ग के विरुद्ध जितने भी वर्ग खड़े हैं उनमें मजदूर वर्ग ही एक ऐसा है, जिसने वास्तविक क्रांति को जन्म दिया है। निम्न मध्य-वर्ग में छोटे कारखानेदार, दूकानदार, दस्तकार आदि जितने भी हैं उन्होंने भी अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये पूंजी-पति-वर्ग से ही संघर्ष किया है; किन्तु उनके संघर्ष में क्रांति के तत्त्व न होकर रूढिवादिता अधिक है। बल्कि मार्क्स ने उनको प्रतिक्रियावादी कहा है, क्योंकि वे इतिहास के पहियों को पीछे की ओर घुमाने की कोशिश करते हैं ( देखिए कम्युनिस्ट घोषणा पत्र )। संयोगवश उनके संघर्ष में यदि क्रांति का आभास भी मिलता है तब भी वे अपने वर्तमान हितों की अपेक्षा अपने भविष्य के स्वार्थों की ही रक्षा करते हैं।
आधुनिक समाजवाद की यही रूपरेखा है और मार्क्स तथा ऐंगेल्स प्रभृति अर्थशास्त्रियों ने मानवता के सुख-चैन और कल्याण के लिए इसी को एक मात्र साधन स्वीकार किया है।
आचार्य कौटिल्य और उनका अर्थशास्त्र
आचार्य कौटिल्य का महाव्यक्तित्व एक पारंगत राजनीतिज्ञ के रूप में मौर्य साम्राज्य के विपुल यश के साथ एकप्राण होकर, एक ओर तो भारत के राजनीतिक इतिहास में अपनी कीर्ति-कथा को अमर बनाये है और दूसरी ओर अपनी अतुलनीय, अद्भुत कृति के कारण संस्कृत साहित्य के इतिहास में अपने विषय का एकमात्र विद्वान् होने का गौरव उन्हें प्राप्त है। इन असाधारण खूबियों के कारण ही आचार्य कौटिल्य के नाम-माहात्म्य की कथाएँ पुराणों से लेकर काव्य, नाटक और कोष-ग्रन्थों में सर्वत्र परिव्याप्त हैं। कौटिल्य द्वारा नंद-वंश का विनाश और मौर्य-वंश की प्रतिष्ठा से सम्बन्धित विष्णुपुराण में एक कथा आती है :
'महाभदन्त तथा उसके नौ पुत्र १०० वर्ष तक राज्य करेंगे। अन्त में कौटिल्य नामक एक ब्राह्मण उस राज्य-परम्परा के अंतिम उत्तराधिकारी नंदवंश
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का विनाश करेगा। नंद-वंश के समूल विनष्ट हो जाने के उपरान्त उसकी जगह मौर्य-वंश के पहले प्रतापी शासक चन्द्रगुप्त का कौटिल्य राज्याभिषेक करेंगे। उसका पुत्र बिन्दुसार और बिन्दुसार का पुत्र अशोक होगा। ( महाभदन्तः तत्पुत्राश्चैकं वर्षशतमवनीपतयो भविष्यन्ति। नवैव। तान्न-न्दान् कौटिल्यो ब्राह्मणः समुद्धरिष्यति। तेषामभावे मौर्याश्च पृथ्वीं भोक्ष्यन्ति। कौटिल्य एव चन्द्रगुप्तं राज्येऽभिषेक्ष्यति। तस्यापि पुत्रो बिन्दुसारो भविष्यति। तस्याप्यशोकवर्धनः )।
इस पुराण-प्रोक्त विवरण से दो मोटी बातों का पता लगता है कि मगध के राज्य-सिंहासन पर पहले नन्द-वंश का अधिकार था और उसके बाद कौटिल्य के कौशल से मगध की राज-सत्ता छिन कर मौर्य-वंश के हाथों में आयी। इस दृष्टि से मौर्य-वंश की सत्यता पर आधारित आचार्य कौटिल्य के सही व्यक्तित्व का पता लगाने के लिये नंद-वंश की प्रामाणिक जानकारी उससे भी पूर्व मगध की शासन-परम्परा से परिचय प्राप्त करना आवश्यक हो जाता है।
मगध की शासन परम्परा
मगध या मागध भारतीय इतिहास का एक सुपरिचित अति प्राचीन नाम है। वेदों से लेकर पुराणों तक सर्वत्र मागध भूमि और मगध-वंश की चर्चाएँ उल्लिखित हैं। पुराणों से यह भी विदित होता है कि महाभारत युद्ध से पूर्व मगध में बार्हद्रथों का राज्य स्थापित हो चुका था और चेदि नरेश उपरिचर के पुत्र बृहद्रथ सर्वप्रथम मगधनरेश की उपाधि से विभूषित भी हो चुके थे। इनके पुत्र जरासन्ध और पौत्र सहदेव महाभारत युद्ध के समकालीन व्यक्ति थे। इनकी २३ वीं पीढ़ी के बाद मगध के राजसिंहासन पर अवन्तिनरेश चन्द्र-उद्योत का अधिकार हुआ। तदनन्तर गिरिव्रज का शिशुनागवंश मगध पर अधिष्ठित हुआ, जिसके उत्तराधिकारियों की ऐतिहासिक परम्परा है : शिशुनाग, काकवर्ण, क्षेमधर्मन्, क्षत्राजीत और विम्बसार। इनमें बिम्बसार ही सर्वाधिक प्रतापी नरेश था, जो कि तीर्थंकर महावीर स्वामी एवं गौतम बुद्ध का समकालीन हुआ।
बिम्बसार से मगध राज-वंश की परंपरा क्रमशः अजातशत्रु, दर्शक, उदयाश्व ( उदायी ), नंदिवर्धन् तक पहुँच कर अंत में महानंदि के हाथों में आयी। महानंदि इस वंश का अन्तिम एवं महाबलशाली सम्राट् हुआ, जिससे एक शूद्रा स्त्री द्वारा नंद नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ। इसी शूद्रा-पुत्र नंद ने मगध की राजगद्दी पर नंद-वंश की प्रतिष्ठा की।
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ऐतिहासिक खोजों से विदित है कि ५८५-३१५ वि० पूर्व ( ६३२-३७२ ई० पू० ) तक मगध की शासन-सत्ता शिशुनाग-वंश के अधीन रही और तदनन्तर नन्द-वंश उत्तराधिकारी हुआ, जिसका प्रथम यशस्वी सम्राट् महापद्म-नन्द था । ८८ वर्ष राज्योपरान्त वह दिवंगत हुआ । तदनन्तर लगभग २२ वर्ष तक उसके उत्तराधिकारियों का अस्तित्व बने रहने के बाद मगध की राज्य-लक्ष्मी मौर्यों के अधीनस्थ हुई । चन्द्रगुप्त मौर्य-वंश का पहला सम्राट् हुआ, जिसको पंचनद की ओर से नंद-वंश के विरोध में उभाड़ कर स्वाभिमानी ब्राह्मण-पुत्र चाणक्य मगध की ओर लाया ।
भारतीय इतिहास का उदीयमान नक्षत्र और मौर्य-वंश के महाप्रतापी सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य ने विष्णुगुप्त नामक एक अद्भुत कुटिल मति राजनीतिज्ञ ब्राह्मण की सहायता से मगध के नन्द-वंश को विनष्ट कर तथा शक्तिशाली यवनराज सिकन्दर के सम्पूर्ण प्रयत्नों को विफल कर लगभग ३२१ ई० पूर्व में एक विराट् साम्राज्य की स्थापना की थी, जिसको इतिहासकारों ने मौर्य-साम्राज्य के नाम से पुकारा । चन्द्रगुप्त सामान्य क्षत्रिय-वंश से प्रसूत था । लगभग २४ वर्ष तक मगध की राजगद्दी पर उसका एकच्छत्र शासन रहा ।
ग्रीक सेनापति सेल्युकस के राजदूत मेगस्थनीज की अनुपलब्ध कृति इण्डिका के अन्यत्र उद्धृत अंशों से और चन्द्रगुप्त के महामात्य कौटिल्य के अर्थशास्त्र से विदित होता है कि चन्द्रगुप्त मौर्य एक असाधारण दिग्विजयी सम्राट् हुआ है और उसने अपने राज्यकाल में धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक उन्नति के लिए अविरल प्रयत्न किये ।
कौटिल्य के नाम का निराकरण
मगध की शासन-परम्परा में नन्द-वंश और तदनन्तर मौर्य-साम्राज्य की प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक अध्ययन करने के पश्चात् आचार्य कौटिल्य के नाम-निराकरण की बात सामने आती है । आचार्य कौटिल्य की ख्याति दूसरे ही नामों से है । उनका एक लोक-विश्रुत नाम चाणक्य भी है । चाणक्य उन्हें चणक का पुत्र होने के कारण और कौटिल्य उन्हें कुटिल राजनीतिज्ञ होने के कारण कहा जाता है । वे दोनों नाम उनके पितृ-प्रदत्त न होकर वंश-नाम या उपाधि नाम हैं ।
कौटिल्य का वास्तविक पितृ-प्रदत्त नाम विष्णुगुप्त था । कौटिल्य के इस विष्णुगुप्त नाम का हवाला आचार्य कामंदक के नीतिसार में उपलब्ध होता है, जिसकी रचना ४०० ई० के लगभग हुई । आचार्य कामन्दक कृत नीतिसार
५ कौ० भू०
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के आरंभिक अंश में हमें चार बातों की जानकारी होती है। पहली बात तो यह कि कौटिल्य ने अर्थशास्त्र की रचना की, दूसरी बात यह कि कामन्दक के नीति-ग्रंथ का आधारभूत वही अर्थशास्त्र था, तीसरी बात यह कि कौटिल्य ने नन्द-वंश का उन्मूलन कर उसकी जगह मौर्य-वंश को प्रतिष्ठित किया और चौथी बात यह कि कौटिल्य का असली नाम विष्णुगुप्त था। नीतिसार का सारांश इस प्रकार है :
नीतिसार उसी विद्वान् के ग्रन्थ का आधार है, जिसके वज्र ने पर्वत की तरह अविचल, अडिग नन्द-वंश को उखाड़ फेंका था, जिसने चन्द्रगुप्त को पृथ्वी का स्वामित्व दिया और जिसने अर्थशास्त्र रूपी महार्णव से नीतिशास्त्र रूपी नवनीत का दोहन किया, ऐसे उस महामति विष्णुगुप्त नामक विद्वान् को नमस्कार है।
नीतिशास्त्रामृतं धीमानर्थशास्त्र महोदधे ।
समुद्दध्रे नमस्तस्मै विष्णुगुप्ताय वेधसे ॥
—नीतिसार
विष्णुगुप्तस्तु कौटिल्यश्चाणक्यो द्रामिलो गुलः ।
वात्स्यायनो मल्लनागः पाक्षिलस्वामिनावपि ॥
वात्स्यायनो मल्लनागः कौटिल्यश्चणकात्मजः ।
द्रामिलः पाक्षिलः स्वामी विष्णुगुप्तो गुलश्च स ।
—हेमचन्द्र
वात्स्यायनस्तु कौटिल्यो विष्णुगुप्तो वराणकः ।
द्रामिल पाक्षिल स्वामी मल्लनागो वलोऽपि च ॥
—यादवप्रकाश-वैजयन्ती
कात्यायनो वररुचिर्मेयजिच्य पुनर्वसुः ।
कात्यायनस्तुकौटिल्यो विष्णुगुप्तो वराणकः ॥
द्रामिलपाक्षिल स्वामी मल्लनागो गुलोऽपि च ।
—भोजराज नाममल्लिका
नीतिसार के अतिरिक्त संस्कृत के कतिपय कोष-ग्रन्थों से भी आचार्य विष्णुगुप्त के पर्यायवाची नामों का पता लगता है, जिनमें कौटिल्य और चाणक्य के अतिरिक्त अनेक अप्रचलित नाम देखने को मिलते हैं। ये नाम प्राचीन और मध्यकालीन सभी ग्रन्थों में मिलते हैं। विभिन्न कोष-ग्रन्थों की इस नामावली की उपलब्धि से आचार्य कौटिल्य के वास्तविक नाम और उनके लिए प्रयुक्त होने वाले दूसरे नामों का स्वतः ही निराकरण हो जाता है।
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अर्थशास्त्र का प्रणेता
कामन्दकीय नीतिसार के पूर्वोक्त प्रमाणों से सुनिश्चित है कि अर्थशास्त्र का निर्माण आचार्य कौटिल्य ने किया। कुछ दिन पूर्व विदेशी विद्वानों के एक वर्ग ने यहाँ तक सिद्ध करने की चेष्टा की थी कि अर्थशास्त्र एक जाली ग्रन्थ है और जिसके नाम को उसके साथ जोड़ा गया है, वह कौटिल्य भी एक कल्पित नाम है। विदेशी विद्वानों की इन भ्रांत धारणाओं को व्यर्थ सिद्ध करने वाली नयी खोजों का सविस्तार उल्लेख आगे किया जायेगा। यहाँ तो इतना ही बता देना यथेष्ट है कि अर्थशास्त्र का प्रणेता विष्णुगुप्त कौटिल्य ही था।
अर्थशास्त्र में समाप्ति-सूचक एक श्लोक आता है, जिसका निष्कर्ष है कि इस ग्रन्थ की रचना उसने की, जिसने की शस्त्र, शास्त्र और नन्द राजा द्वारा शासित पृथ्वी का एक साथ उद्धार किया—
येन शास्त्रं च शस्त्रं च नन्दराजगता च भूः ।
अमर्षेणोद्धृतान्याशु तेन शास्त्रमिदं कृतम् ॥
—अर्थशास्त्र, पृ० ७७१
अर्थशास्त्र के इस श्लोक में वर्णित नन्दराज द्वारा शासित राजसत्ता को विनष्ट कर उसकी जगह मौर्य साम्राज्य की प्रतिष्ठा करने वाले अद्भुत राजनीति-विशारद आचार्य कौटिल्य का निर्देश पुराण और नीति ग्रन्थों के अनुसार पहिले किया जा चुका है। इससे प्रमाणित है कि अर्थशास्त्र का निर्माता कौटिल्य ही था। उक्त श्लोक में कौटिल्य की अहंवादिता का आभास मिलता है, जो कि सर्वथा युक्त है। ऐसा विदित होता है कि आचार्य कौटिल्य अर्थशास्त्र के निष्णात पंडित तो थे ही, साथ ही दूसरे शास्त्रों और शस्त्र-विद्याओं में भी कुशल थे।
अर्थशास्त्र और कौटिल्य के सम्बन्ध में कुछ दिन पूर्व जो विवाद चल पड़ा था, आधुनिकतम अनुसन्धानों ने उसको सर्वथा व्यर्थ सिद्ध कर अन्तिम रूप से यह प्रमाणित कर दिया है कि अर्थशास्त्र का निर्माता आचार्य विष्णुगुप्त कौटिल्य ही था।
अर्थशास्त्र का उद्धार
अर्थशास्त्र और उसके निर्माता कौटिल्य के सम्बन्ध में जितना विवाद रहा, उससे कहीं अधिक भ्रमपूर्ण धारणाएँ उसके स्थिति-काल के सम्बन्ध में प्रचारित हुईं। आचार्य कौटिल्य की जीवन-सम्बन्धी जानकारी और उनके अद्भुत ग्रन्थ अर्थशास्त्र की छान-बीन करने में विदेशी विद्वानों का वर्षों तक
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घोर विवाद चलता रहा। इस तर्क-वितर्क और वाद-विवाद की परंपरा में जिन देशी-विदेशी विद्वानों का भरपूर हाथ रहा उनमें पं० शामशास्त्री, महामहोपाध्याय पं० गणपतिशास्त्री, श्री काशीप्रसाद जायसवाल, श्री नरेन्द्रनाथ लाहा, श्री राधाकुमुद मुकर्जी, श्री देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर, श्री रमेश मजूमदार, श्री उपेन्द्र घोषाल, श्री प्राणनाथ विद्यालंकार, श्री विनयकुमार सरकार और श्री जयचन्द विद्यालंकार प्रमुख हैं। इसी प्रकार विदेशी विद्वानों में श्री हिलेब्रांट, श्री हर्टेल, याकोबी साहब, श्री विंसेंट स्मिथ, श्री औटो स्टाइन, डा० जोली, डा० विंटरनित्स और डा० कीथ के नाम उल्लेखनीय हैं।
कौटिल्य अर्थशास्त्र के उद्धारक के रूप में पं० शामशास्त्री का नाम अर्थशास्त्र की महानता के साथ अमर हो चुका है। श्री शास्त्री जी ने मैसूर राज्य से प्राप्त कर इस महाग्रन्थ के कुछ अंशों को पहले-पहल १९०५ ई० में इण्डियन एण्टीक्वेरी में सानुवाद प्रकाशित किया और बाद में १९०९ ई० में सम्पूर्ण ग्रन्थ को बड़ी शुद्धता के साथ प्रकाशित भी किया। पं० शामशास्त्री ने ग्रन्थ के विस्तृत उपोद्घात में बड़े पाण्डित्यपूर्ण प्रमाणों के आधार पर अर्थशास्त्र के सम्बन्ध में तीन बातों का विशेष रूप से उल्लेख किया। पहली बात तो उन्होंने यह बतायी कि आचार्य कौटिल्य चन्द्रगुप्त मौर्य के आमात्य थे, दूसरी बात उन्होंने यह दिखायी कि अर्थशास्त्र कौटिल्य की ही कृति है और तीसरा निराकरण उन्होंने यह भी किया है कि अर्थशास्त्र का यही प्रामाणिक मूलपाठ है। पं० शामशास्त्री ने अर्थशास्त्र के जिस अनुवाद को प्रकाशित किया था, ट्रावनकोर राज्य से प्रकाशित कामन्दकीय नीतिसार की टीका में उद्धृत अर्थशास्त्र के अंशों से उनका मिलान ठीक नहीं बैठता है।
अर्थशास्त्र विषयक विवाद
पं० शामशास्त्री की दो बातों का, कि अर्थशास्त्र कौटिल्य की ही कृति है और वह अपने मूलरूप में उपलब्ध है, समर्थन हिलब्रांट, हर्टेल, याकोबी ( १९१२ ई० ) और स्मिथ ने भी किया। श्री विंसेंट स्मिथ ने अपने प्रसिद्ध इतिहास ग्रन्थ अर्ली हिस्ट्री आफ इण्डिया के तीसरे संस्करण ( १९१४ ई० ) में शास्त्री जी की उक्त स्थापनाओं को मान्यता देकर उन पर अपने समर्थन की अन्तिम मुहर लगायी।
स्मिथ साहब के उक्त इतिहास-ग्रन्थ के लगभग आठ वर्ष बाद विदेशी विद्वानों के एक वर्ग ने कौटिल्य, उनके अर्थशास्त्र और उसकी प्रामाणिकता एवं रचना-काल के बारे में अविश्वास की नयी मान्यताओं को स्थापित किया। उनके मतानुसार कौटिल्य, ग्रन्थकार का वास्तविक नाम न होकर
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एक कल्पित नाम है एवं अर्थशास्त्र तीसरी शती का रचा हुआ एक जाली ग्रन्थ है। ओटोस्टाइन महोदय ने मेगस्थनीज ऐण्ड कौटिल्य नामक अपनी तुलनात्मक पुस्तक में मेगस्थनीज और कौटिल्य के सम्बन्ध में पारस्परिक विरोध दिखाने की चेष्टा की है। ओटोस्टाइन के बाद डा० जोली ने इस क्षेत्र को संभाला और उन्होंने जिन नयी सूझों की उद्भावना की वे आज भी हमारे सामने हैं।
१९२३ ई० में डा० जोली की, पंजाबी संस्कृत सीरीज, लाहौर से एक पुस्तक प्रकाशित हुई, जिसका नाम है—अर्थशास्त्र ऑफ कौटिल्य। अपनी इस पुस्तक की प्रस्तावना में डाक्टर साहब ने यह सिद्ध किया कि अर्थशास्त्र तीसरी सदी में लिखा गया एक जाली ग्रन्थ है। उसके रचयिता कौटिल्य को डा० जोली ने एक कल्पित राज-मन्त्री कहा है।
डा० जोली के उक्त मत को अतर्क्य कहकर डा० विंटरनित्स ने अपने ग्रन्थ ए हिस्ट्री आफ इण्डियन लिटरेचर (१९२७ ई०) में जोली साहब के मत की ही पुष्टि की। इसके पश्चात् डा० कीथ ने १९२८ ई० में सर आशुतोष स्मारक ग्रन्थ के प्रथम भाग में एक लेख लिखकर भरपूर शब्दों में यह सिद्ध किया कि अर्थशास्त्र की रचना ३०० ई० से पहले की कदापि नहीं हो सकती है। इससे भी आगे बढ़कर उक्त लेख में एक नयी बात उन्होंने यह भी जोड़ दी कि सम्पूर्ण अर्थशास्त्र एक अप्रामाणिक रचना है।
डा० जोली के भ्रमपूर्ण प्रचार और प्रस्तावना में उद्धृत उनके तर्कों को डा० जायसवाल ने खंडित किया और प्रामाणिक आधारों को साक्षी रखकर स्पष्ट किया कि अर्थशास्त्र जैसा संस्कृत साहित्य का महान् ग्रन्थ जाली नहीं है। उसका रचयिता कौटिल्य एक कल्पित व्यक्ति न होकर सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य का महामात्य था। अर्थशास्त्र उसी की कृति है, जो प्रामाणिक रूप में संप्रति उपलब्ध है और जिसकी रचना ४०० ई० पू० में हुई (विस्तृत विवरण के लिए डा० जायसवाल-हिन्दू-राजतन्त्र परिशिष्ट 'ग' 'पहिले खण्ड के अतिरिक्त नोट' पृ० ३२७-३६७) ।
इसी प्रकार श्री जयचंद विद्यालंकार ने डा० कीथ द्वारा अपने निबन्ध में उपस्थित किये गये तर्कों एवं उनकी युक्तियों की विस्तृत आलोचना करके दूसरे इतिहासकारों की इस राय से कि कौटिल्य चन्द्रगुप्त मौर्य (३२५-२७३ ई० पूर्व) के राजमन्त्री थे और अर्थशास्त्र उन्हीं की कृति है, जो अपने प्रामाणिक रूप में उपलब्ध है, अपना अभिमत कौटिल्य अर्थशास्त्र के ३०० ई० पू० के लगभग रचे जाने के समर्थन में पेश किया (चन्द्रगुप्त विद्यालंकार : भारतीय इतिहास की रूपरेखा २, पृ० ५४७, ६७३-७००) ।
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अर्थशास्त्र का व्यापक प्रभाव
संस्कृत-साहित्य के कतिपय ग्रन्थकारों की कृतियों पर अर्थशास्त्र का पर्याप्त प्रभाव है, जिससे उसकी सार्वभौम मान्यता का सहज में ही पता चलता है। ईसवी पूर्व प्रथम शताब्दी में वर्तमान संस्कृत के सुपरिचित महाकवि कालिदास से लेकर याज्ञवल्क्य, वात्स्यायन, विष्णुशर्मा, विशाखदत्त तथा बाण प्रभृति महाकवियों, स्मृतिकारों, गद्यकारों और नाटककारों की सातवीं शताब्दी ई० तक की रची गयी कृतियाँ अर्थशास्त्र से प्रभावित हैं। वैसे भी स्वतन्त्र रूप से अर्थशास्त्र का दाय लेकर अनेक तद्विषयक कृतियाँ संस्कृत में निर्मित हुईं, किन्तु दूसरे विषय के जिन ग्रन्थों में कौटिल्य अर्थशास्त्र का महत्त्व एवं उसकी शैली का अनुकरण है, उनकी संख्या भी पर्याप्त है।
महाकवि कालिदास (१०० ई० पू०) के रघुवंश, कुमारसंभव और शाकुन्तल अत्यधिक रूप से अर्थशास्त्र से प्रभावित हैं। इसी प्रकार याज्ञवल्क्य-स्मृति (१५० ई०) भी अर्थशास्त्र के प्रभाव से अछूती नहीं। आचार्य वात्स्यायन (३०० ई०) ने तो अपने कामसूत्र का एकमात्र आधार कौटिल्य का अर्थशास्त्र स्वीकार किया है और इसी हेतु इन दोनों का प्रकरण-विभाजन भी एक जैसा है। (मिलाइये, अर्थशास्त्र २।१, १०।७, १७।५५, १०।७३, ९।१, ७।१५, १।२, ८।३ क्रमशः रघुवंश १५।९, कुमारसंभव ६।७३, रघुवंश १७।४९, १२।५५, १७।५६, १७।७६, १७।८९, १८।५० तथा शाकुन्तल २।५ कामसूत्रमिदं प्रणीतम्। तस्यायं प्रकरणाधिकरणसमुद्देशः; कामसूत्र १।१)।
संस्कृत के जन्तु-विषयक कथाओं का एकमात्र प्रतिनिधि ग्रन्थ पञ्चतन्त्र संप्रति अपने मूल में उपलब्ध नहीं है, जिसकी रचना ३०० ई० पू० मानी जाती है और अपने विषय का जिसे दुनिया के जन्तु-कथा-काव्यों में पहिला स्थान प्राप्त है, तथापि उसके विभिन्न छायारूपों में विष्णु शर्मा कृत पञ्चतन्त्र ही प्रधान माना जाता है, जिनकी रचना कथमपि ३०० ई० के बाद की नहीं है। इस कथा-ग्रन्थ में चाणक्य के अर्थशास्त्र को मनुस्मृति और कामसूत्र की भाँति अपने विषय का एकमात्र प्रतिनिधि ग्रन्थ कह कर स्मरण किया गया है। (ततो धर्मशास्त्राणि मन्वादीनि, अर्थशास्त्राणि चाणक्यादीनि, कामशास्त्राणि वात्स्यायनादीनि।) पञ्चतन्त्र के प्रथम अध्याय में एक दूसरे स्थल पर अर्थशास्त्र को 'नयशास्त्र' नाम से भी अभिहित किया गया है।
संस्कृत-साहित्य का एक नाटक मुद्राराक्षस है, जिसके रचयिता विशाख-दत्त ६०० ई० के लगभग हुए। यह नाटक एक प्रकार से आचार्य कौटिल्य
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की आंशिक जीवनी है। मुद्राराक्षस से महामति कौटिल्य के अतुल व्यक्तित्व का परिचय प्राप्त किया जा सकता है।
विशाखदत्त के समकालीन कथाकार एवं काव्यशास्त्री आचार्य दण्डी ने कौटिलीय दण्डनीति के अध्ययन पर जोर दिया ही है, वरन् उस दण्डनीति के स्वरूप के सम्बन्ध में भी एक ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत किया है। दण्डी का कथन है कि 'आचार्य विष्णुगुप्त निर्मित उस दण्डनीति का अध्ययन करो, जिसको उन्होंने मौर्य ( चन्द्रगुप्त ) के लिये छः हजार श्लोकों में संक्षिप्त किया था। जो भी इस उत्तम ग्रन्थ को पढ़ेगा उसको उत्तम फल मिलेगा।' (अधीष्व तावद्दण्डनीतिम्। तदिदमिदानीमाचार्यविष्णुगुप्तेन मौर्यार्थे षड्भिः श्लोकसहस्रैः संक्षिप्ता। सैवेयमधीत्य सम्यगनुष्ठीयमानयथोक्तकार्यक्षमेति )।
कादम्बरी जैसे वृहत्कथा काव्य के निर्माता बाणभट्ट ( ७०० ई० ) ने कौटिल्य शास्त्र का उल्लेख तो किया है, किन्तु मालूम नहीं किस दृष्टि से उन्होंने उसको निकृष्ट शास्त्र की संज्ञा दी है। बाण का कथन है कि 'उन लोगों के लिये क्या कहा जाय जो अति नृशंस कार्य को उचित बताने वाले कौटिल्य के शास्त्र को प्रमाण मानते हैं'। ( किं वा तेषां सांप्रतं येषामतिनृशंसप्रायोपदेशे कौटिल्यशास्त्रप्रमाणम् ।
अर्थशास्त्र और उसकी परंपरा
बृहद् हिन्दू जाति के राजनीतिशास्त्र-विषयक साहित्य का निर्माण लगभग ६५० ई० पूर्व में हो चुका था। यह कल्पसूत्रों की रचना का समय था। कौटिलीय अर्थशास्त्र के सैकड़ों शब्दों में एवं उसकी लेखन-शैली पर कल्पसूत्रों की शब्दावली एवं उनकी रचना-शैली का प्रभाव स्पष्ट लक्षित होता है। ( प्रो० प्राणनाथ विद्यालंकार, कौटिल्य अर्थशास्त्र की प्रस्तावना )।
इससे प्रतीत होता है कि अर्थशास्त्र-विषयक ग्रन्थों का निर्माण कल्पसूत्रों ( ७०० ई० पू० ) के बाद और विशेष रूप से बौधायन-धर्मसूत्र ( ५०० ई० पू० ) के बाद होना आरम्भ हो गया था। बौद्ध-धर्म के प्राण-सर्वस्व जातक-ग्रन्थों का रचनाकाल तथागत बुद्ध से पूर्व अर्थात् लगभग ६०० ई० पू० बैठता है। इन जातकों के अध्ययन से स्पष्ट है कि उस समय तक अर्थशास्त्र को एक प्रमुख विज्ञान के रूप में परिगणित किया जाने लगा था। ( फासबोल जातक, जिल्द २, पृष्ठ ३०, ७४ )।
सूत्रकाल की समाप्ति ( २०० ई० पू० ) के लगभग अर्थशास्त्र एक प्रामाणिक शास्त्र के रूप में समाहित हो चुका था। सूत्र-ग्रन्थों में अर्थशास्त्र-विषयक चर्चाओं को देख कर उसकी मान्यता का सहसा अनुमान लगाया जा सकता है
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( आपस्तंब-धर्मसूत्र २, ५, १०, १४ ) । गृह्यसूत्र में तो आदित्य नामक एक अर्थशास्त्रविद् आचार्य का उल्लेख तक मिलता है ( आश्वलायन गृह्यसूत्र ३, १३, १६ )। महाभारत में हिन्दू राजनीतिशास्त्र का सिलसिलेवार इतिहास मिलता है और इस परंपरा के कतिपय प्राचीन आचार्यों की सूची भी उसमें उल्लिखित है ( महाभारत, शान्तिपर्व, अध्याय ५८, ५९ )।
अर्थशास्त्र की प्राचीन परम्परा का अध्ययन करते समय इस सम्बन्ध में एक बात जानने योग्य यह है कि आरम्भ में दण्डनीति और शासन-सम्बन्धी कार्यों का उल्लेख भी अर्थशास्त्र के लिए ही होता था, किन्तु कौटिल्य के बाद अर्थशास्त्र से केवल जनपद-सम्बन्धी कार्यों का ही विधान होने लगा था । अर्थ की व्याख्या करते हुए कौटिल्य ने लिखा है कि 'अर्थ का अभिप्राय है मनुष्यों की बस्ती, अर्थात् वह प्रदेश जिसमें मनुष्य बसते हों । अर्थशास्त्र उस शास्त्र को कहते हैं, जिसमें राज्य की प्राप्ति और उसके पालन के उपायों का वर्णन हो ।' ( अर्थशास्त्र, पृ० ७६५ ) । आचार्य उषण के राजनीतिशास्त्र-विषयक ग्रन्थ को दण्डनीतिशास्त्र ( विशाखदत्त : मुद्राराक्षस १।७ ) और आचार्य बृहस्पति के ग्रन्थ को अर्थशास्त्र ( वात्स्यायन : कामसूत्र १ ) इसी लिए कहा जाने लगा था । इसी परम्परा के अनुसार महाभारतकार ने भी प्रजापति के ग्रन्थ को राजशास्त्र कहकर स्मरण किया है (महाभारत, शांतिपर्व, अ०५९) । इसी प्रकार कौटिल्य के अर्थशास्त्र में जो ग्रन्थकार ऐतिहासिक व्यक्ति माने गये हैं, वे शांतिपर्व में देवी-विभूति तथा पौराणिक रूप में स्मरण किये गये हैं ( जायसवाल : हिन्दू-राजतन्त्र १, पृ० ६ का फुटनोट ) ।
समस्त पूर्ववर्ती आचार्य-परंपरा के सिद्धान्तों और उनकी वे कृतियाँ, जो कि सम्प्रति अनुपलब्ध हैं, उन सब का एक साथ निष्कर्ष हम कौटिल्य के अर्थशास्त्र में पाते हैं। कौटिल्य ने अपने पूर्ववर्ती लगभग अठारह-उन्नीस अर्थ-शास्त्रविद् आचार्यों का उल्लेख किया है; जिनसे विचार ग्रहण कर उन्होंने अपने अद्भुत ग्रन्थ का निर्माण किया। इस प्राचीन आचार्य-परंपरा के परिचय से ऐसा प्रतीत होता है कि अर्थशास्त्र का निर्माण बहुत पहले से होने लगा था और विभिन्न ग्रन्थों में आदर के साथ उल्लेख किया जाने लगा था, जिसकी व्यापक व्याख्या हम कौटिल्य के अर्थशास्त्र में पाते हैं।
ई० पूर्व ४०० के अनन्तर और ४०० के बीच में रचे गये धर्मशास्त्र-विषयक ग्रन्थों में सर्वत्र ही हमें अर्थशास्त्र की विस्तृत चर्चाएँ और प्राचीन अर्थशास्त्रियों के सिद्धान्तों का उल्लेख देखने को मिलता है। किन्तु ये सभी चर्चाएँ बिखरी हालत में उपलब्ध होती हैं। आचार्य कामन्दक ने ४०० ई० के लगभग एक
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पद्यमय ग्रन्थ नीतिसार लिखा, जो कि आचार्य शुक्र कृत शुक्रनीतिसार का संस्करण मात्र था और आधुनिक विद्वानों ने कामन्दकीय नीतिसार के उन उद्धरणों को, जिनको कि मध्ययुग के बाद वाले स्मृतिशास्त्र के टीकाकारों ने उद्धृत किया है, मिलान करने पर पता लगाया कि कामन्दक के नीतिसार का १७वीं शताब्दी के लगभग पुनः संस्करण हुआ।
ईसा की छठीं और सातवीं शताब्दी में विरचित अग्नि और मत्स्य आदि पुराणों में भी यद्यपि अर्थशास्त्र सम्बन्धी चर्चाएँ और तत्सम्बन्धी कुछ आचार्यों के नाम उपलब्ध होते हैं, तथापि वे विशेष महत्त्व के नहीं हैं। नवम-दशम शताब्दी के दो ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं। पहिले अर्थशास्त्र विषयक ग्रन्थ बृहस्पतिसूत्र को डा० एफ० डब्ल्यू० थामस ने खोज कर सम्पादित एवं प्रकाशित किया। यह ग्रन्थ अपने मूलरूप में बहुत प्राचीन था, किन्तु जिस रूप में आज वह उपलब्ध है, वह नवम-दशम शताब्दी का पुनः संस्करण है। इसी प्रकार दूसरा ग्रन्थ दसवीं शताब्दी में विरचित सूत्रात्मक शैली का नीतिवाक्यामृत है, जिसके रचयिता का नाम सोमदेव था। यह सोमदेव कथासरित्सागर का रचयिता ११वीं शताब्दी के काश्मीर देशीय सोमदेव से पृथक् व्यक्ति था।
तदनन्तर १०वीं शताब्दी से लेकर १४वीं शताब्दी तक की कोई कृति उपलब्ध नहीं होती। अर्थशास्त्र विषयक ग्रंथों की निर्माण-परम्परा लगभग १८वीं शताब्दी तक पहुँचती है। अर्थशास्त्र का यह अन्तिम समय नितान्त अवनति का रहा है। १४वीं से १८वीं शताब्दी तक के ग्रन्थकारों में चन्द्रशेखर, मित्रमिश्र और नीलकंठ प्रमुख हैं, जिनके ग्रन्थों का नाम क्रमशः राजनीति रत्नाकर (जायसवाल, बिहार, उड़ीसा, रिसर्च सोसाइटी), वीरमित्रोदय (चौखम्बा संस्कृत सीरीज, वाराणसी से प्रकाशित) और राजनीतिमयूख (स्व० बा० गोविन्ददास, वाराणसी के पुस्तकालय में सुरक्षित) है। चन्द्रशेखर के ग्रंथ में दो अन्य अर्थशास्त्र-विषयक ग्रन्थों के नाम उद्धृत हैं, जिनमें से एक ग्रन्थ राजनीतिकल्पतरु के रचयिता का नाम लक्ष्मीधर और दूसरे विलुप्त नामक ग्रन्थकार का राजनीतिकाकामधेनु है।
इस प्रकार आचार्य कौटिल्य, उनका अर्थशास्त्र और उस परम्परा का आकण्ठ अध्ययन करने के पश्चात् हमें विदित होता है कि संस्कृत-साहित्य की अभिवृद्धि में अर्थशास्त्र का महत्त्वपूर्ण योग रहा है और आचार्य कौटिल्य काल्पनिक व्यक्ति न होकर एक युगविधायक महारथी के रूप में संस्कृत भाषा की महानताओं के साथ अजर एवं अमर हो चुके हैं।
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प्रस्तुत संस्करण
'कौटिलीय अर्थशास्त्र' के साथ डॉ० शाम शास्त्री और महामहोपाध्याय गणपति शास्त्री का नाम अमर है। डॉ० शाम शास्त्री का अंग्रेजी अनुवाद और म० म० गणपति शास्त्री का संस्कृतानुवाद इस विषय की सर्वांगीण, शोधपूर्ण और प्रामाणिक कृतियां हैं।
'कौटिलीय अर्थशास्त्र' का प्रस्तुत संस्करण म० म० गणपति शास्त्री के संस्करण पर आधारित है। स्व० शास्त्री जी ने 'अर्थशास्त्र' का गम्भीर अध्ययन करने के उपरान्त उसके मूल भाग को विषय और प्रसङ्ग के अनुसार अलग-अलग वर्गों, वाक्यों और वाक्यखण्डों में विभाजित किया है। उनकी यह स्वतन्त्र देन है।
प्रत्येक सूत्र के आगे संख्या डालने की अवैज्ञानिक पद्धति स्व० शास्त्री जी के संस्करण में नहीं अपनायी गयी है। बल्कि उन्होंने मूल पाठ के प्रत्येक पैराग्राफ को इस ढङ्ग से संयोजित किया है कि अर्थसङ्गति की दृष्टि से वह भग्नतया विच्छिन्न न होने पावे। डॉ० शाम शास्त्री का दृष्टिकोण भी यही रहा है।
प्रस्तुत हिन्दी अनुवाद के प्रत्येक पैराग्राफ पर संख्या का उल्लेख इसलिये किया है कि नीचे उसका अनुवाद पढ़ने में सुगमता हो। अधिकरण, प्रकरण और अध्याय का जो क्रम सभी संस्करणों में है वही इस संस्करण में भी देखने को मिलेगा।
पुस्तक के अन्त में चाणक्य-सूत्रों को भी जोड़ दिया गया है। आचार्य कौटिल्य के नाम पर चाणक्य सूत्रों को जोड़ना ऐतिहासिक दृष्टि से यद्यपि असङ्गत है, किन्तु अध्येताओं की सुविधा के लिये उनका समावेश करना भी आवश्यक समझा गया है।
डॉ० शाम शास्त्री और म० म० गणपति शास्त्री के संस्करणों के अतिरिक्त उदयवीर शास्त्री के हिन्दी अनुवाद से भी मैंने सहायता ली है। इस हेतु इन सभी महानुभावों का मैं विशेष रूप से आभारी हूँ। श्रद्धेय श्री रामचंद्र झा के सत्परामर्शों के लिये मैं अनुगृहीत हूँ।
—वाचस्पति गैरोला
( १ ) विनयाधिकारिक : पहला अधिकरण
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विषय-सूची
( १ ) विनयाधिकारिक : पहला अधिकरण
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| प्रकरण और अधिकरण का निरूपण | १ |
| १ : विद्या-विषयक विचार : आन्वीक्षकी | ८ |
| २ : विद्या-विषयक विचार : त्रयी | १० |
| ३ : विद्या-विषयक विचार : वार्ता और दण्डनीति | १२ |
| ४ : वृद्धजनों की संगति | १४ |
| ५ : काम-क्रोधादि छह शत्रुओं का परित्याग | १६ |
| ६ : साधु स्वभाव राजा की जीवनचर्या | १८ |
| ७ : अमात्यों की नियुक्ति | २० |
| ८ : मन्त्री और पुरोहित की नियुक्ति | २३ |
| ९ : गुप्त उपायों से अमात्यों के आचरणों की परीक्षा | २५ |
| १० : गुप्तचरों की नियुक्ति ( स्थायी गुप्तचर ) | २९ |
| ११ : गुप्तचरों की नियुक्ति ( भ्रमणशील गुप्तचर ) | ३२ |
| १२ : अपने देश में कृत्य-अकृत्य पक्ष की सुरक्षा | ३७ |
| १३ : शत्रु-देश के कृत्य-अकृत्य पक्ष को मिलाना | ४० |
| १४ : मन्त्राधिकार | ४३ |
| १५ : सन्देश देकर राजदूतों को शत्रुदेश में भेजना | ४९ |
| १६ : राजपुत्रों से राजा की रक्षा | ५३ |
| १७ : नजरबन्द राजकुमार और राजा का पारस्परिक व्यवहार | ५८ |
| १८ : राजा के कार्य-व्यापार | ६१ |
| १९ : राज-भवन का निर्माण और राजा के कर्तव्य | ६५ |
| २० : आत्मरक्षा का प्रबन्ध | ६९ |
( २ ) अध्यक्षप्रचार : दूसरा अधिकरण
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १ : जनपदों की स्थापना | ७७ |
| २ : ऊसर भूमि को उपयोगी बनाने का विधान | ८२ |
| ३ : दुर्गों का निर्माण | ८५ |
| ४ : दुर्ग से सम्बन्धित राजभवनों तथा नगर के प्रमुख स्थानों का निर्माण | ९१ |
| ५ : कोष-गृह का निर्माण और कोषाध्यक्ष के कर्तव्य | ९५ |
( ७६ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| ६ : समाहर्त्ता का कर-संग्रह कार्य | ९९ |
| ७ : अक्षपटल में गाणनिक के कार्यों का निरूपण | १०३ |
| ८ : अध्यक्षों द्वारा गबन किये गये धन की पुनः प्राप्ति | १०९ |
| ९ : राजकीय उच्चाधिकारियों के चालचलन की परीक्षा | ११४ |
| १० : शासनाधिकार | ११६ |
| ११ : कोष में रखने योग्य रत्नों की परीक्षा | १२५ |
| १२ : खान एवं खनिज पदार्थों की पहिचान और उनके विक्रय की व्यवस्था | १३६ |
| १३ : अक्षशाला में सुवर्णाध्यक्ष के कार्य | १४३ |
| १४ : राजकीय स्वर्णकारों के कर्तव्य | १५० |
| १५ : कोष्ठागार का अध्यक्ष | १५७ |
| १६ : पण्य का अध्यक्ष | १६४ |
| १७ : कुप्य का अध्यक्ष | १६७ |
| १८ : आयुधागार का अध्यक्ष | १७० |
| १९ : तौल और माप का अध्यक्ष | १७४ |
| २० : देश और काल का मान | १८० |
| २१ : शुल्क का अध्यक्ष | १८४ |
| २२ : कर-वसूली के नियम | १८९ |
| २३ : सूत-व्यवसाय का अध्यक्ष | १९२ |
| २४ : कृषि-विभाग का अध्यक्ष | १९५ |
| २५ : आबकारी विभाग का अध्यक्ष | २०० |
| २६ : वध-स्थान का अध्यक्ष | २०५ |
| २७ : वेश्यालयों का अध्यक्ष | २०७ |
| २८ : नौकाध्यक्ष | २१२ |
| २९ : पशुविभाग का अध्यक्ष | २१६ |
| ३० : अश्वविभाग का अध्यक्ष | २२२ |
| ३१ : गजशाला का अध्यक्ष | २२६ |
| ३२ : हाथियों की श्रेणियां तथा उनके कार्य | २३२ |
| ३३ : रथसेना तथा पैदल-सेना के अध्यक्षों और सेनापति के कार्यों का निरूपण | २३६ |
| ३४ : मुद्राविभाग और चारागाह विभाग के अध्यक्ष | २३९ |
| ३५ : समाहर्त्ता और गुप्तचरों के कार्यों का निरूपण | २४१ |
| ३६ : नागरिक के कार्य | २४५ |
( ३ ) धर्मस्थीय : तीसरा अधिकरण
( ७७ )
( ३ ) धर्मस्थीय : तीसरा अधिकरण
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १ : शर्तनामों का लेखन-प्रकार और तत्सम्बन्धी विवादों का निर्णय | २५५ |
| २ : विवाह-सम्बन्ध : (१) धर्म-विवाह : स्त्री का धन : स्त्री को पुनर्विवाह का अधिकार : पुरुष को पुनर्विवाह का अधिकार | २६१ |
| ३ : विवाह-सम्बन्ध : ( २ ) स्त्री की परवरिश : कठोर स्त्री के साथ व्यवहार : पति-पत्नी का द्वेष : पति-पत्नी का अतिचार : अतिचार पर प्रतिषेध | २६६ |
| ४ : विवाह-सम्बन्ध : (३) परिणीता का निष्पतन : पर पुरुष का अनुसरण : पुनर्विवाह की स्थिति | २७० |
| ५ : दाय-विभाग : उत्तराधिकार का सामान्य नियम | २७५ |
| ६ : दाय-विभाग : पैतृक क्रम से विशेषाधिकार | २७९ |
| ७ : दाय-विभाग : पुत्रक्रम से उत्तराधिकार | २८२ |
| ८ : वास्तुक : गृह-निर्माण | २८६ |
| ९ : वास्तुक : मकान बेचना : सीमा-विवाद : खेतों की सीमाएँ : मिश्रित विवाद : कर की छूट | २८९ |
| १० : वास्तुक : रास्तों का रोकना : गावों का बन्दोबस्त : चारागाहों का प्रबन्ध : सामूहिक कार्यों में शामिल न होने का मुआवजा | २९४ |
| ११ : ऋण लेना | २९९ |
| १२ : धरोहरसम्बन्धी नियम | ३०५ |
| १३ : दास और श्रमिक सम्बन्धी नियम | ३११ |
| १४ : मजदूरी के नियम और साझीदारी का हिस्सा | ३१६ |
| १५ : क्रय-विक्रय का बयाना | ३२० |
| १६ : दान किये हुये धन को न देना; अस्वामि-विक्रय, स्व-स्वामि-सम्बन्ध | ३२३ |
| १७ : साहस | ३२८ |
| १८ : वाक्पारुष्य | ३३१ |
| १९ : दण्डपारुष्य | ३३४ |
| २० : द्यूत-समाह्वय और प्रकीर्णक | ३३९ |
( ४ ) कण्टक-शोधन : चौथा अधिकरण
१ : शिल्पियों से प्रजा की रक्षा | ३४५ २ : व्यापारियों से प्रजा की रक्षा | ३५२ ३ : दैवी आपत्तियों से प्रजा की रक्षा के उपाय | ३५६