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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

२६२ * कूर्मपुराण *


तस्मादज्ञानमूलो हि संसारः सर्वदेहिनाम्।
अज्ञानादन्यथा ज्ञानं तच्च प्रकृतिसङ्गतम् ॥ १६ ॥

नित्योदितः स्वयं ज्योतिः सर्वगः पुरुषः परः।
अहंकाराविवेकेन कर्ताहमिति मन्यते॥ १७॥

पश्यन्ति ऋषयोऽव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम्।
प्रधानं प्रकृतिं बुद्ध्वा कारणं ब्रह्मवादिनः ॥ १८ ॥

तेनायं संगतो ह्यात्मा कूटस्थोऽपि निरञ्जनः।
स्वात्मानमक्षरं ब्रह्म नावबुद्ध्येत तत्त्वतः ॥ १९ ॥
अनात्मन्यात्मविज्ञानं तस्माद् दुःखं तथेतरम्।
रागद्वेषादयो दोषाः सर्वे भ्रान्तिनिबन्धनाः॥ २०॥

कर्मण्यस्य भवेद् दोषः पुण्यापुण्यमिति स्थितिः।
तद्वशादेव सर्वेषां सर्वदेहसमुद्भवः॥ २१॥

नित्यः सर्वत्रगो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः।
एकः स भिद्यते शक्त्या मायया न स्वभावतः॥ २२॥
तस्मादद्वैतमेवाहुर्मुनयः परमार्थतः।
भेदो व्यक्तस्वभावेन सा च मायात्मसंश्रया॥ २३॥

यथा हि धूमसम्पर्कान्नाकाशो मलिनो भवेत्।
अन्तःकरणजैर्भावैरात्मा तद्वन्न लिप्यते ॥ २४ ॥

यथा स्वप्रभया भाति केवलः स्फटिकोऽमलः।
उपाधिहीनो विमलस्तथैवात्मा प्रकाशते ॥ २५ ॥

ज्ञानस्वरूपमेवाहुर्जगदेतद् विचक्षणाः।
अर्थस्वरूपमेवाज्ञाः पश्यन्त्यन्ये कुदृष्टयः॥ २६॥

कूटस्थो निर्गुणो व्यापी चैतन्यात्मा स्वभावतः।
दृश्यते ह्यर्थरूपेण पुरुषैर्भ्रान्तदृष्टिभिः ॥ २७॥


यह संसार सभी प्राणियोंके अज्ञानके कारण ही है। अज्ञानसे अन्यथा (विपरीत) ज्ञान होता है अर्थात् अज्ञानका नाश ज्ञानसे ही होता है और यह प्रकृतिसंगत (प्राणियोंके मूल स्वभावके सर्वथा अनुकूल शाश्वत शान्तिरूप) होता है॥ १४—१६॥

अहंकारसे उत्पन्न अविवेकके कारण स्वयं ज्योतिरूप, नित्य प्रकाशयुक्त सर्वव्यापी परम पुरुष अपनेको 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है। ब्रह्मवादी ऋषिगण प्रधान, प्रकृति और कारणको समझकर सत् एवं असत्-स्वरूप, अव्यक्त नित्यतत्त्वका साक्षात्कार करते हैं। कूटस्थ एवं निरञ्जन होते हुए भी यह आत्मा उस (प्रधान, प्रकृति आदि)-से संगत होकर स्वात्मस्वरूप अक्षर ब्रह्मका यथार्थरूपसे ज्ञान नहीं कर पाता॥ १७—१९॥

अनात्मतत्त्वमें आत्मविषयक विज्ञानसे ही दुःख होता है तथा इसी प्रकारकी भ्रान्तिके कारण ही राग, द्वेष आदि सभी दोष उत्पन्न होते हैं। इसके (भ्रान्त पुरुषके) कर्ममें ही दोष होता है, इसी कारण पाप-पुण्यकी स्थिति बनती है और उन कर्मोंके अनुसार ही सभी प्रकारके देहकी उत्पत्ति होती है। यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, कूटस्थ और दोषोंसे रहित है। यह अद्वितीय आत्मा मायारूप शक्तिके कारण भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है, स्वभावतः इसमें भेद नहीं है॥ २०—२२॥

इसी कारण मुनिजन आत्माको परमार्थतः अद्वैत ही कहते हैं। व्यक्त (महत्तत्त्व, अहंतत्त्व आदि)-के स्वभावसे जो भेद दिखलायी पड़ता है और यह भेद मूलतः माया (प्रकृति)-के कारण ही है तथा यह आत्मा (पुरुष)-के आश्रित होकर ही सब कुछ करती है। जैसे धुएँके सम्पर्कसे आकाश मलिन नहीं होता, वैसे ही अन्तःकरणसे उत्पन्न होनेवाले भावोंसे आत्मा लिप्त नहीं होता। जैसे अद्वितीय शुद्ध स्फटिक अपनी आभासे प्रकाशित होता है, वैसे ही उपाधियोंसे रहित निर्मल आत्मा (अपने ही प्रकाशसे) प्रकाशित होता है। विद्वान् लोग इस संसारको ज्ञानस्वरूप ही कहते हैं, परंतु दूसरे कुत्सित दृष्टि रखनेवाले अज्ञानी लोग इसे अर्थस्वरूप (विषयस्वरूप) मानते हैं॥ २३—२६॥

भ्रान्त दृष्टिवाले पुरुषोंके द्वारा स्वभावतः कूटस्थ, निर्गुण, सर्वव्यापी और चैतन्य आत्मा अर्थरूपसे ही देखा जाता है। जिस प्रकार शुद्ध स्फटिक गुञ्जा आदि

* अध्याय २ *२६३
यथा संलक्ष्यते रक्तः केवलः स्फटिको जनैः ।<br>रक्तिकाद्युपधानेन तद्वत् परमपूरुषः ॥ २८ ॥उपाधिके कारण लोगोंको लाल वर्णका-सा दिखलायी पड़ता है, वैसे ही परम पुरुष भी (मायाके द्वारा नाम-रूपात्मक उपाधियुक्त प्रतीत होनेके कारण अनेक रूपोंमें दिखलायी पड़ता) है। इस कारण मोक्षके अभिलाषियोंको अक्षर, शुद्ध, नित्य, सर्वव्यापी तथा अव्यय उस आत्माका श्रवण, मनन तथा उपासना करनी चाहिये। (जिससे माया (अज्ञान)-की निवृत्ति हो तथा शुद्ध आत्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त हो) योगीके मनमें जब सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला चैतन्य सदा प्रकाशित होता है, तब वह योगी बिना किसी व्यवधानके आत्मभाव प्राप्त कर लेता है ॥ २७-३० ॥
तस्मादात्माक्षरः शुद्धो नित्यः सर्वगतोऽव्ययः ।<br>उपासितव्यो मन्तव्यः श्रोतव्यश्च मुमुक्षुभिः ॥ २९ ॥
यदा मनसि चैतन्यं भाति सर्वत्रगं सदा ।<br>योगिनोऽव्यवधानेन तदा सम्पद्यते स्वयंम् ॥ ३० ॥
यदा सर्वाणि भूतानि स्वात्मन्येवाभिपश्यति ।<br>सर्वभूतेषु चात्मानं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३१ ॥(योगी) जब सभी प्राणियोंको अपनी आत्मामें अच्छी प्रकार स्थित देख लेता है और सभी प्राणियोंमें अपनेको स्थित देखता है, तब उसे ब्रह्मभावकी प्राप्ति हो जाती है। जब (योगी) समाधिकी अवस्थामें किसी भी प्राणीको (अपनेसे भिन्न) नहीं देखता (अर्थात् समस्त प्रपञ्चमें आत्मदर्शन करता है), तब वह उस परतत्त्वसे एकात्मभाव प्राप्त कर लेता है और अद्वितीय हो जाता है। उसके हृदयमें स्थित सभी कामनाएँ जब समाप्त हो जाती हैं तब वह पण्डित अमृतस्वरूप होकर (परम) कल्याण प्राप्त कर लेता है। (योगी) जब प्राणियोंके पार्थक्यको एक तत्त्वमें स्थित देखता है और उसी (तत्त्व)-से उनका विस्तार होना समझता है, तब उसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। जब वह परमार्थतः (सर्वत्र) केवल अद्वितीय आत्माको ही देखता है और सम्पूर्ण जगत्को मायामात्र समझता है, तब वह मुक्त हो जाता है ॥ ३१-३५ ॥
यदा सर्वाणि भूतानि समाधिस्थो न पश्यति ।<br>एकीभूतः परेणासौ तदा भवति केवलः ॥ ३२ ॥
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः ।<br>तदासावमृतीभूतः क्षेमं गच्छति पण्डितः ॥ ३३ ॥
यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।<br>तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ ३४ ॥
यदा पश्यति चात्मानं केवलं परमार्थतः ।<br>मायामात्रं जगत् कृत्स्नं तदा भवति निर्वृतः ॥ ३५ ॥
यदा जन्मजरादुःखव्याधीनामेकभेषजम् ।<br>केवलं ब्रह्मविज्ञानं जायतेऽसौ तदा शिवः ॥ ३६ ॥जब योगीको जन्म, जरा, दुःख और समस्त व्याधियोंके एकमात्र औषध अद्वितीय ब्रह्मका ज्ञान हो जाता है, तब वह शिवरूप हो जाता है। जिस प्रकार संसारमें नद एवं नदियाँ सागरके साथ एकरूपताको प्राप्त करती हैं, उसी प्रकार यह आत्मा (जीवात्मा) निष्कल अक्षर (ब्रह्म)-के साथ एकत्व प्राप्त करता है ॥ ३६-३७ ॥
यथा नदीनदा लोके सागरेणैकतां ययुः ।<br>तद्वदात्माक्षरेणासौ निष्कलेनैकतां व्रजेत् ॥ ३७ ॥
तस्माद् विज्ञानमेवास्ति न प्रपञ्चो न संसृतिः ।<br>अज्ञानेनावृतं लोको विज्ञानं तेन मुह्यति ॥ ३८ ॥इसलिये विज्ञानका ही अस्तित्व है, प्रपञ्च और संसरणशील संसारका अस्तित्व नहीं है। विज्ञान अज्ञानसे आवृत रहता है, इसीसे संसार (जीव) मोहमें पड़ता है। ज्ञान निर्मल, सूक्ष्म, निर्विकल्पक और अव्यय है, अज्ञानके अतिरिक्त जो कुछ है, वह विज्ञान है—ऐसा मेरा मत है। यह आप लोगोंको सांख्य नामक परमोत्तम ज्ञान बतलाया। यह सम्पूर्ण वेदान्तका सार है। इसमें चित्तकी एकाग्रता ही योग है ॥ ३८-४० ॥
तज्ज्ञानं निर्मलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं यदव्ययम् ।<br>अज्ञानमितरत् सर्वं विज्ञानमिति मे मतम् ॥ ३९ ॥
एतद् वः परमं सांख्यं भाषितं ज्ञानमुत्तमम् ।<br>सर्ववेदान्तसारं हि योगस्तत्रैकचित्तता ॥ ४० ॥

२६४ * कूर्मपुराण *

योगात् सञ्जायते ज्ञानं ज्ञानाद् योगः प्रवर्तते ।<br>योगज्ञानाभियुक्तस्य नावाप्यं विद्यते क्वचित् ॥ ४१ ॥<br><br>यदेव योगिनो यान्ति सांख्यैस्तदधिगम्यते ।<br>एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स तत्त्ववित् ॥ ४२ ॥योगसे ज्ञान उत्पन्न होता है और ज्ञानसे योग प्रवर्तित (स्थिर) होता है। योग तथा ज्ञानसम्पन्न (पुरुष)-के लिये कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता। योगी जिसे प्राप्त करते हैं, सांख्यवेत्ताओंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। जो सांख्य और योगको एक ही समझता है, वह तत्त्वज्ञानी होता है ॥ ४१-४२ ॥
अन्ये च योगिनो विप्रा ऐश्वर्यासक्तचेतसः ।<br>मज्जन्ति तत्र तत्रैव न त्वात्मैषामिति श्रुतिः ॥ ४३ ॥<br><br>यत्तत् सर्वगतं दिव्यमैश्वर्यमचलं महत् ।<br>ज्ञानयोगाभियुक्तस्तु देहान्ते तदवाप्नुयात् ॥ ४४ ॥<br><br>एष आत्माहमव्यक्तो मायावी परमेश्वरः ।<br>कीर्तितः सर्ववेदेषु सर्वात्मा सर्वतोमुखः ॥ ४५ ॥विप्रो! ऐश्वर्य (आठ प्रकारकी सिद्धियों एवं अन्य वैभव आदि)-में आसक्तचित्त अन्य योगीजन उसीमें डूबे रहते हैं, अतएव उन्हें आत्मतत्त्व प्राप्त नहीं होता—ऐसा श्रुतिवचन है। जो सर्वव्यापी, दिव्य ऐश्वर्यरूप, अचल और महत् (सर्वश्रेष्ठ) है, उसे ज्ञान और योगसम्पन्न पुरुष देहान्त होनेपर प्राप्त करते हैं। सम्पूर्ण वेदोंमें सर्वात्मा, सर्वतोमुखके रूपमें प्रतिपादित, अव्यक्त, मायावी (मायाका अधिष्ठाता) तथा परमेश्वरस्वरूप मैं ही यह आत्मा हूँ ॥ ४३-४५ ॥
सर्वकामः सर्वरसः सर्वगन्धोऽजरोऽमरः ।<br>सर्वतः पाणिपादोऽहमन्तर्यामी सनातनः ॥ ४६ ॥<br><br>अपाणिपादो जवनो ग्रहीता हृदि संस्थितः ।<br>अचक्षुरपि पश्यामि तथाकर्णः शृणोम्यहम् ॥ ४७ ॥<br><br>वेदाहं सर्वमेवेदं न मां जानाति कश्चन ।<br>प्राहुर्महान्तं पुरुषं मामेकं तत्त्वदर्शिनः ॥ ४८ ॥<br><br>पश्यन्ति ऋषयो हेतुमात्मनः सूक्ष्मदर्शिनः ।<br>निर्गुणामलरूपस्य यत्तदैश्वर्यमुत्तमम् ॥ ४९ ॥<br><br>यन्न देवा विजानन्ति मोहिता मम मायया ।<br>वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं ब्रह्मवादिनः ॥ ५० ॥मैं अन्तर्यामी, सनातन, सर्वकाम, सर्वरस, सर्वगन्ध, अजर, अमर और सभी ओर हाथ-पैरवाला हूँ। हाथ और पैरके बिना भी मैं गति करने एवं ग्रहण करनेवाला हूँ। (सभी प्राणियोंके) हृदयमें स्थित हूँ। बिना नेत्रोंके भी देखता हूँ और बिना कानोंके भी मैं सुनता हूँ। मैं इस समस्त प्रपञ्चको जानता हूँ, परंतु मुझे कोई नहीं जानता। तत्त्वदर्शी लोग मुझे अद्वितीय महान् पुरुष कहते हैं। सूक्ष्मदर्शी ऋषि गुणरहित और विशुद्धरूप आत्माके हेतुस्वरूप उस श्रेष्ठ ऐश्वर्य (सर्वोत्कृष्ट ज्ञान)-का दर्शन (साक्षात्कार) करते हैं। ब्रह्मवादियो! मेरी मायासे मोहित होनेके कारण देवता भी जिस (तत्त्व)-को नहीं जानते उसे मैं कहता हूँ, आप लोग ध्यान लगाकर सुनें— ॥ ४६-५० ॥
नाहं प्रशास्ता सर्वस्य मायातीतः स्वभावतः ।<br>प्रेरयामि तथापीदं कारणं सूरयो विदुः ॥ ५१ ॥मायातीत मैं स्वभावतः सबका अनुशास्ता नहीं हूँ, तथापि इस जगत्को मैं प्रेरित करता हूँ, विद्वान् लोग इसका कारण जानते हैं (वह कारण अहैतुकी कृपा ही है।)।
यन्मे गुह्यतमं देहं सर्वगं तत्त्वदर्शिनः ।<br>प्रविष्टा मम सायुज्यं लभन्ते योगिनोऽव्ययम् ॥ ५२ ॥मेरा जो अत्यन्त गुह्यतम तथा सर्वव्यापी देह है, तत्त्वदर्शी योगीजन उसमें प्रविष्ट होते हैं और मेरे अविनाशी सायुज्य (नामक मोक्ष)-को प्राप्त करते हैं।
तेषां हि वशमापन्ना माया मे विश्वरूपिणी ।<br>लभन्ते परमां शुद्धिं निर्वाणं ते मया सह ॥ ५३ ॥मेरी विश्वरूपिणी माया उनके वशमें रहती है। वे मेरे साथ (मेरा सायुज्य प्राप्तकर) परम शुद्धि और निर्वाणको प्राप्त करते हैं।
* अध्याय ३ *२६५
न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि।<br>प्रसादान्मम योगीन्द्रा एतद् वेदानुशासनम्॥ ५४॥मेरी कृपासे सैकड़ों-करोड़ों कल्पोंमें भी उनका पुनर्जन्म नहीं होता। योगीन्द्रो! यह वेदोंका अनुशासन है॥ ५१—५४॥
नापुत्रशिष्ययोगिभ्यो दातव्यं ब्रह्मवादिभिः।<br>मदुक्तमेतद् विज्ञानं सांख्ययोगसमाश्रयम्॥ ५५॥ब्रह्मवादियोंको चाहिये कि वे मेरे द्वारा कहे गये इस सांख्य-योग-समन्वित विज्ञानको (अपने) पुत्र*, शिष्य एवं योगियोंके अतिरिक्त और किसी दूसरेको प्रदान न करें॥ ५५॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) दूसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ २॥


तीसरा अध्याय

अव्यक्त शिवतत्त्वसे सृष्टिका कथन, परमात्माके स्वरूपका वर्णन तथा प्रधान, पुरुष एवं महदादि तत्त्वोंसे सृष्टिका क्रम-वर्णन, शिवस्वरूपका निरूपण

ईश्वर उवाचईश्वरने कहा—
अव्यक्तादभवत् कालः प्रधानं पुरुषः परः।<br>तेभ्यः सर्वमिदं जातं तस्माद् ब्रह्ममयं जगत्॥ १॥<br><br>सर्वतः पाणिपादं तत् सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।<br>सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ २॥अव्यक्त (तत्त्व)-से काल, प्रधान तथा परम पुरुष उत्पन्न हुए। उन (कालादि)-से यह समस्त जगत् उत्पन्न हुआ, इसलिये यह जगत् ब्रह्ममय है। जिसके हाथ और पैरका प्रसार सर्वत्र है, जिसके नेत्र, मस्तक, मुख एवं कर्ण सर्वत्र वर्तमान हैं एवं जो समस्त (विश्व)-को आवृत्तकर स्थित है, वही (ब्रह्म) है॥ १-२॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।<br>सर्वाधारं सदानन्दमव्यक्तं द्वैतवर्जितम्॥ ३॥<br><br>सर्वोपमानरहितं प्रमाणातीतगोचरम्।<br>निर्विकल्पं निराभासं सर्वावासं परामृतम्॥ ४॥<br><br>अभिन्नं भिन्नसंस्थानं शाश्वतं ध्रुवमव्ययम्।<br>निर्गुणं परमं व्योम तज्ज्ञानं सूरयो विदुः॥ ५॥वह सभी इन्द्रियोंके गुणोंके आभासवाला है, अर्थात् सभी इन्द्रियोंके गुण उसमें प्रतीत होते हैं; किंतु सभी इन्द्रियोंसे रहित है। वह सभीका आधार है, सदा आनन्दस्वरूप, अव्यक्त और द्वैतसे रहित (अद्वैत तत्त्व) है। वह सभी उपमानोंसे रहित (निरुपमेय) इन्द्रियोंद्वारा प्रमाणोंसे ज्ञात न होने योग्य, निर्विकल्प, निराभास, सभीका आश्रय, परम अमृतस्वरूप, अभिन्न, भिन्नरूपसे स्थित (प्रतीत), शाश्वत, ध्रुव, अव्यय, निर्गुण और परम व्योमरूप है, उसे विद्वान् लोग जानते हैं॥ ३—५॥
स आत्मा सर्वभूतानां स बाह्याभ्यन्तरः परः।<br>सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः॥ ६॥<br><br>मया ततमिदं विश्वं जगद्व्यक्तमूर्तिना।<br>मत्स्थानि सर्वभूतानि यस्तं वेद स वेदवित्॥ ७॥<br><br>प्रधानं पुरुषं चैव तत्त्वद्वयमुदाहृतम्।<br>तयोरनादिरुद्दिष्टः कालः संयोजकः परः॥ ८॥वह सभी प्राणियोंका आत्मा है, वह बाहर-भीतर सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला परम तत्त्व है। मैं (भी) वही सर्वव्यापी, शान्त, ज्ञानात्मा परमेश्वर हूँ। मुझ अव्यक्त स्वरूपवालेके द्वारा ही इस विश्वका विस्तार हुआ है। सभी प्राणी मुझमें ही अवस्थित हैं, जो उसे जानता है, वह वेदज्ञ है प्रधान और पुरुष—ये ही दो तत्त्व कहे गये हैं। अनादि उत्कृष्ट कालको ही उन दोनोंका परम संयोजक कहा गया है॥ ६—८॥

* ब्रह्मवादीका पुत्र अनुशासित ही होगा, इसलिये पुत्रको ज्ञानका अधिकारी माना गया है।

२६६ * कूर्मपुराण *

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्रयमेतदनाद्यन्तमव्यक्ते समवस्थितम्।<br>तदात्मकं तदन्यत् स्यात् तद्रूपं मामकं विदुः॥ ९ ॥(प्रधान, पुरुष और काल—) ये तीनों तत्त्व अनादि, अन्तरहित, अव्यक्त (परम तत्त्व)-में स्थित हैं। वह (परम तत्त्व) तदात्मक (प्रधान आदिका प्रेरक होते हुए भी) तद्भिन्न (उनसे सर्वथा असंसृष्ट) है, वह (परम तत्त्व) मेरा ही रूप है, यह विद्वान् लोग ही जानते हैं।
महदाद्यं विशेषान्तं सम्प्रसूतेऽखिलं जगत्।<br>या सा प्रकृतिरुद्दिष्टा मोहिनी सर्वदेहिनाम्॥ १० ॥<br>पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते यः प्राकृतान् गुणान्।<br>अहंकारविमुक्तत्वात् प्रोच्यते पञ्चविंशकः॥ ११ ॥जो महत् (तत्त्व)-से लेकर विशेषपर्यन्त समस्त संसारको उत्पन्न करती है, वह सभी देहधारियोंको मोहित करनेवाली प्रकृति कही गयी है। जो प्रकृतिस्थ होकर प्रकृतिके गुणोंका उपभोग करता है, वह पुरुष है। अहंकार (अहं-तत्त्व)-से विमुक्त होनेके कारण वह पुरुष पचीसवाँ तत्त्व कहा गया है॥ ९—११॥
आद्यो विकारः प्रकृतेर्महानात्मेति कथ्यते।<br>विज्ञानशक्तिर्विज्ञाता ह्यहंकारस्तदुत्थितः॥ १२ ॥<br>एक एव महानात्मा सोऽहंकारोऽभिधीयते।<br>स जीवः सोऽन्तरात्मेति गीयते तत्त्वचिन्तकैः॥ १३ ॥प्रकृतिके प्रथम विकारको महान् आत्मा (महत्तत्त्व) कहते हैं। उस विज्ञानशक्तिसे सम्पन्न विज्ञाता ('अहम्' अर्थात् अभिमानका मूल कारण) अहंकार उत्पन्न होता है। वही एक महान्* आत्मा 'अहंकार' कहलाता है। तत्त्वचिन्तकोंके द्वारा वह 'जीव' तथा 'अन्तरात्मा' इस नामसे कहा गया है॥ १२-१३॥
तेन वेद्यते सर्वं सुखं दुःखं च जन्मसु।<br>स विज्ञानात्मकस्तस्य मनः स्यादुपकारकम्॥ १४ ॥<br>तेनाविवेकतस्तस्मात् संसारः पुरुषस्य तु।<br>स चाविवेकः प्रकृतौ सङ्गात् कालेन सोऽभवत्॥ १५ ॥<br>कालः सृजति भूतानि कालः संहरति प्रजाः।<br>सर्वे कालस्य वशगा न कालः कस्यचिद् वशे॥ १६ ॥जीवनमें उसीके द्वारा सुख एवं दुःख आदि सभीका अनुभव होता है। वह विज्ञानस्वरूप (विविध सांसारिक ज्ञानका मूल) है। उस (अहंकार)-का उपकारक मन है। उससे अविवेक उत्पन्न होता है और फिर उस अविवेकसे पुरुषका संसार बनता है। 'प्रकृति' से कालका सम्पर्क होनेसे वह अविवेक उत्पन्न होता है। काल ही प्राणियोंकी सृष्टि करता है और काल ही प्रजाओंका संहार करता है। सभी कालके वशीभूत हैं, काल किसीके वशमें नहीं है॥ १४–१६॥
सोऽन्तरा सर्वमेवेदं नियच्छति सनातनः।<br>प्रोच्यते भगवान् प्राणः सर्वज्ञः पुरुषोत्तमः॥ १७ ॥<br>सर्वेन्द्रियेभ्यः परमं मन आहुर्मनीषिणः।<br>मनसश्चाप्यहंकारमहंकारान्महान् परः॥ १८ ॥<br>महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुषः परः।<br>पुरुषाद् भगवान् प्राणस्तस्य सर्वमिदं जगत्॥ १९ ॥<br>प्राणात् परतरं व्योम व्योमातीतोऽग्निरीश्वरः।<br>सोऽहं सर्वत्रगः शान्तो ज्ञानात्मा परमेश्वरः।<br>नास्ति मत्तः परं भूतं मां विज्ञाय विमुच्यते॥ २० ॥वह सनातन (काल) अन्तःप्रविष्ट होकर इस सम्पूर्ण (विश्व)-का नियमन करता है। इस कालको भगवान् प्राण, सर्वज्ञ तथा पुरुषोत्तम कहा जाता है। मनीषियोंने मनको सभी इन्द्रियोंसे उत्कृष्ट एवं मनसे अधिक उत्कृष्ट अहंकारको और अहंकारसे उत्कृष्ट महान्को (महत्तत्त्व) बतलाया है। महत्से उत्कृष्ट अव्यक्त, अव्यक्तसे उत्कृष्ट पुरुष तथा पुरुषसे उत्कृष्ट भगवान् प्राण हैं। यह सम्पूर्ण संसार उसीसे है। प्राणसे परतर व्योम है और व्योमसे अतीत अग्नि ईश्वर है। मैं वही सर्वव्यापी, शान्त, ज्ञानस्वरूप परमेश्वर हूँ। मुझसे उत्कृष्ट और कोई तत्त्व नहीं है। मुझे जान लेनेसे मुक्ति हो जाती है॥ १७–२०॥

* सृष्टिमें अहंकारका महत्त्वपूर्ण स्थान होनेसे उसके लिये 'महान् आत्मा' यह लाक्षणिक प्रयोग है।

  • अध्याय ४ * | २६७ ---|---
नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावरजङ्गमम्।<br>ऋते मामेकमव्यक्तं व्योमरूपं महेश्वरम्॥ २१॥<br><br>सोऽहं सृजामि सकलं संहरामि सदा जगत्।<br>मायी मायामयो देवः कालेन सह सङ्गतः॥ २२॥<br><br>मत्संनिधावेष कालः करोति सकलं जगत्।<br>नियोजयत्यनन्तात्मा ह्येतद् वेदानुशासनम्॥ २३॥इस संसारमें एकमात्र मुझ अव्यक्त, व्योमरूप महेश्वरको छोड़कर कोई भी स्थावर-जंगमात्मक तत्त्व नित्य नहीं है अर्थात् महेश्वरको छोड़कर सब कुछ अनित्य है। वही मैं मायावी तथा मायामय देव कालके संसर्गसे सम्पूर्ण (संसार)-की सदा सृष्टि करता हूँ और (फिर) संहार करता हूँ। मेरे सांनिध्यमें ही यह काल (तत्त्व) सम्पूर्ण जगत्‌की (सृष्टि) करता है। वेदका यह कथन है कि अनन्तात्मा ही उस (काल)-को (इस कार्यमें) नियोजित करता है॥ २१—२३॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) तृतीयोऽध्यायः॥ ३॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) तीसरा अध्याय समाप्त हुआ॥ ३॥


चौथा अध्याय

शिव-भक्तिका माहात्म्य, शिवोपासनाकी सुगमता, ज्ञानरूप शिवस्वरूपका वर्णन, शिवकी तीन प्रकारकी शक्तियोंका प्रतिपादन, शिवके परम तत्त्वका निरूपण

ईश्वर उवाचईश्वर बोले—
वक्ष्ये समाहिता यूयं शृणुध्वं ब्रह्मवादिनः।<br>माहात्म्यं देवदेवस्य येनेदं सम्प्रवर्तते॥ १॥हे ब्रह्मवादियो! आपलोग ध्यान लगाकर सुनें। जिससे यह सभी प्रवर्तित होता है, उस देवाधिदेवके माहात्म्यको मैं बताता हूँ॥ १॥
नाहं तपोभिर्विविधैर्न दानेन न चेज्यया।<br>शक्यो हि पुरुषैर्ज्ञातुमृते भक्तिमनुत्तमाम्॥ २॥मैं न तो विविध प्रकारके तपसे, न दानसे और न यज्ञोंसे ही जानने योग्य हूँ। बिना उत्तम भक्तिके मनुष्य मुझे जान नहीं सकता। सर्वत्र व्याप्त रहनेवाला मैं सभी भावोंके अन्तःमें प्रविष्ट रहता हूँ। परंतु मुनीश्वरो! मुझ सर्वसाक्षीको संसार जान नहीं पाता। जिसके भीतर यह सब प्रतिष्ठित है और जो परम तत्त्व सभीके अन्तःमें स्थित है, मैं वही धाता, विधाता, काल, अग्नि तथा सभी ओर मुखवाला हूँ। सभी मुनि, देवता, ब्रह्मा, मनु, इन्द्र और जो अत्यन्त तेजस्वी हैं, वे भी मुझे नहीं देख पाते॥ २—५॥
अहं हि सर्वभावानामन्तस्तिष्ठामि सर्वगः।<br>मां सर्वसाक्षिणं लोको न जानाति मुनीश्वराः॥ ३॥
यस्यान्तरा सर्वमिदं यो हि सर्वान्तरः परः।<br>सोऽहं धाता विधाता च कालोऽग्निर्विश्वतोमुखः॥ ४॥
न मां पश्यन्ति मुनयः सर्वेऽपि त्रिदिवौकसः।<br>ब्रह्मा च मनवः शक्रो ये चान्ये प्रथितौजसः॥ ५॥
गृणन्ति सततं वेदा मामेकं परमेश्वरम्।<br>यजन्ति विविधैरग्निं ब्राह्मणा वैदिकैर्मखैः॥ ६॥वेद मुझ अद्वितीय परमेश्वरकी निरन्तर स्तुति किया करते हैं। ब्राह्मण अनेक प्रकारके वैदिक यज्ञोंके द्वारा अग्निरूप मेरा यजन करते हैं। सभी लोक तथा लोकपितामह ब्रह्मा मुझे नमस्कार करते हैं। योगी जन सभी प्राणियोंके अधिपति (मुझ) ईश्वर देवका ध्यान करते हैं। सबकी आत्मा और सर्वव्यापी मैं ही सभी देवोंके शरीरोंको धारण कर सम्पूर्ण हवियोंका भोक्ता एवं सभी फलोंका प्रदाता हूँ॥ ६—८॥
सर्वे लोका नमस्यन्ति ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>ध्यायन्ति योगिनो देवं भूताधिपतिमीश्वरम्॥ ७॥
अहं हि सर्वहविषां भोक्ता चैव फलप्रदः।<br>सर्वदेवतनुर्भूत्वा सर्वात्मा सर्वसंस्थितः॥ ८॥

२६८ * कूर्मपुराण *

मां पश्यन्तीह विद्वांसो धार्मिका वेदवादिनः।<br>तेषां संनिहितो नित्यं ये भक्त्या मामुपासते॥ ९॥धार्मिक वेदनिष्ठ विद्वान् मेरा दर्शन करते हैं। जो भक्तिपूर्वक मेरी उपासना करते हैं, मैं नित्य उनके समीपमें रहता हूँ। धार्मिक ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य मेरी उपासना करते हैं। मैं उन्हें आनन्दस्वरूप परमपद नामक स्थान प्रदान करता हूँ॥ ९-१०॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या धार्मिका मामुपासते।<br>तेषां ददामि तत् स्थानमानन्दं परमं पदम्॥ १०॥<br>अन्येऽपि ये विकर्मस्थाः शूद्राद्या नीचजातयः।<br>भक्तिमन्तः प्रमुच्यन्ते कालेन मयि संगताः॥ ११॥अन्य भी जो विपरीत कर्म करनेके कारण शूद्र आदि निम्न जातियोंमें हैं, भक्तिपरायण होनेपर वे भी मुक्त हो जाते हैं और यथासमय मुझमें लीन हो जाते हैं। मेरे भक्त विनाशको प्राप्त नहीं होते, मेरे भक्त पापोंसे रहित हो जाते हैं। मैंने प्रारम्भमें ही यह प्रतिज्ञा कर रखी है कि मेरे भक्तका विनाश नहीं होता। जो उस (भक्त)-की निन्दा करता है, वह मूढ देवाधिदेव (शंकर)-की ही निन्दा करता है और जो उस (भक्त)-की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, (समझो कि) वह सदा मेरी ही पूजा करता है। मेरी आराधनाके लिये जो नियमपूर्वक पत्र, पुष्प, फल तथा जल मुझे प्रदान करता है, वह मेरा प्रिय भक्त है, ऐसा समझना चाहिये॥ ११-१४॥
न मद्भक्ता विनश्यन्ति मद्भक्ता वीतकल्मषाः।<br>आदावेतत् प्रतिज्ञातं न मे भक्तः प्रणश्यति॥ १२॥
यो वै निन्दति तं मूढो देवदेवं स निन्दति।<br>यो हि तं पूजयेद् भक्त्या स पूजयति मां सदा॥ १३॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं मदाराधनकारणात्।<br>यो मे ददाति नियतः स मे भक्तः प्रियो मतः॥ १४॥<br>अहं हि जगतामादौ ब्रह्माणं परमेष्ठिनम्।<br>विधाय दत्तवान् वेदानशेषानात्मनिःसृतान्॥ १५॥मैंने ही संसारकी सृष्टिके प्रारम्भमें परमेष्ठी ब्रह्माकी सृष्टिकर अपनेसे प्रादुर्भूत सम्पूर्ण वेदोंको उन्हें प्रदान किया। मैं ही सभी योगियोंका अव्यय गुरु, धार्मिक जनोंका रक्षक तथा वेदसे द्वेष रखनेवालोंको विनष्ट करनेवाला हूँ॥ १५-१६॥
अहमेव हि सर्वेषां योगिनां गुरुरव्ययः।<br>धार्मिकाणां च गोप्ताहं निहन्ता वेदविद्विषाम्॥ १६॥<br>अहं वै सर्वसंसारान्मोचको योगिनामिह।<br>संसारहेतुरेवाहं सर्वसंसारवर्जितः॥ १७॥मैं ही योगियोंको समस्त संसारसे मुक्त करनेवाला हूँ। मैं ही संसारका कारण और सम्पूर्ण संसारसे विवर्जित (असंसृष्ट) हूँ। मैं ही संहार करनेवाला और मैं ही सृष्टि तथा पालन करनेवाला मायावी हूँ। मेरी शक्ति माया है, वह संसारको मोहित करनेवाली है॥ १७-१८॥
अहमेव हि संहर्ता स्रष्टाहं परिपालकः।<br>मायावी मामिका शक्तिर्माया लोकविमोहिनी॥ १८॥<br>ममैव च परा शक्तिर्या सा विद्येति गीयते।<br>नाशयामि तया मायां योगिनां हृदि संस्थितः॥ १९॥मेरी ही जो पराशक्ति है, वह 'विद्या' इस नामसे कही जाती है। योगियोंके हृदयमें रहते हुए मैं उस मायाको नष्ट कर देता हूँ। सभी शक्तियोंका प्रवर्तन करनेवाला तथा निवर्तन करनेवाला मैं ही हूँ। मैं सभीका आधार और अमृतका आश्रय-स्थान हूँ। मुझमें अधिष्ठित और मेरी स्वरूपभूता जो सबके अन्तरमें स्थित अद्वितीय शक्ति है, वह ब्रह्माका रूप धारणकर विविध प्रकारके संसारकी सृष्टि करती है और जो मेरी दूसरी विपुल शक्ति है, वह अनन्त, जगन्नाथ, जगन्मय और नारायणका रूप धारणकर संसारकी स्थापना (पालन आदि कार्य) करती है॥ १९-२२॥
अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्तकनिवर्तकः।<br>आधारभूतः सर्वासां निधानममृतस्य च॥ २०॥
एका सर्वान्तरा शक्तिः करोति विविधं जगत्।<br>आस्थाय ब्रह्मणो रूपं मन्मयी मदधिष्ठिता॥ २१॥
अन्या च शक्तिर्विपुला संस्थापयति मे जगत्।<br>भूत्वा नारायणोऽनन्तो जगन्नाथो जगन्मयः॥ २२॥
* अध्याय ४ *२६९
तृतीया महती शक्तिर्निहन्ति सकलं जगत्।<br>तामसी मे समाख्याता कालाख्या रुद्ररूपिणी॥ २३॥<br>ध्यानेन मां प्रपश्यन्ति केचिज्ज्ञानेन चापरे।<br>अपरे भक्तियोगेन कर्मयोगेन चापरे॥ २४॥<br><br>सर्वेषामेव भक्तानामिष्टः प्रियतरो मम।<br>यो हि ज्ञानेन मां नित्यमाराधयति नान्यथा॥ २५॥<br><br>अन्ये च ये त्रयो भक्ता मदाराधनकाङ्क्षिणः।<br>तेऽपि मां प्राप्नुवन्त्येव नावर्तन्ते च वै पुनः॥ २६॥<br><br>मया ततमिदं कृत्स्नं प्रधानपुरुषात्मकम्।<br>मय्येव संस्थितं विश्वं मया सम्प्रेर्यते जगत्॥ २७॥मेरी तीसरी जो रुद्ररूपिणी काल नामक महती तामसी शक्ति है, वह समस्त जगत्का संहार करती है कुछ लोग ध्यानद्वारा, कुछ दूसरे लोग ज्ञानद्वारा, कुछ भक्तियोगके द्वारा और कुछ कर्मयोगके द्वारा मेरा दर्शन करते हैं। जो किसी अन्य प्रकारसे नहीं, अपितु केवल ज्ञानद्वारा नित्य मेरी आराधना करता है, वह सभी भक्तोंमें मुझे प्रिय है, प्रियतर है अर्थात् अत्यन्त प्रिय है। अन्य भी जो मेरी आराधना करनेके अभिलाषी तीन (प्रकारके) भक्त हैं, वे भी मुझे ही प्राप्त करते हैं और उनका पुनर्जन्म नहीं होता। मेरे द्वारा ही यह सम्पूर्ण प्रधान और पुरुषरूप संसार व्याप्त है। यह विश्व मुझमें ही स्थित है और मेरे द्वारा ही संसार प्रेरित किया जाता है॥ २३—२७॥
नाहं प्रेरयिता विप्राः परमं योगमाश्रितः।<br>प्रेरयामि जगत्कृत्स्नमेतद्यो वेद सोऽमृतः॥ २८॥<br><br>पश्याम्यशेषमेवेदं वर्तमानं स्वभावतः।<br>करोति कालो भगवान् महायोगेश्वरः स्वयंम्॥ २९॥<br><br>योगः सम्प्रोच्यते योगी माया शास्त्रेषु सूरिभिः।<br>योगेश्वरोऽसौ भगवान् महादेवो महान् प्रभुः॥ ३०॥हे विप्रो! परम योगमें ही सदा निरत रहनेवाला मैं प्रेरक नहीं हूँ, तथापि सम्पूर्ण जगत्को मैं प्रेरित करता हूँ, इस (रहस्य)-को जो जानता है, वह अमर हो जाता* है। अपने स्वभाववश प्रवर्तमान समस्त जगत्का मैं साक्षीमात्र हूँ। महायोगेश्वर भगवान् काल स्वयं ही (जगत्की सृष्टि) करते हैं। विद्वानोंने शास्त्रोंमें जिसे योग, योगी और माया कहा है, वह सब प्रभु महादेव भगवान् महायोगेश्वर ही हैं अर्थात् योगेश्वर महादेवमें ही यह सब कल्पित है॥ २८—३०॥
महत्त्वं सर्वतत्त्वानां परत्वात् परमेष्ठिनः।<br>प्रोच्यते भगवान् ब्रह्मा महान् ब्रह्ममयोऽमलः॥ ३१॥<br><br>यो मामेवं विजानाति महायोगेश्वरेश्वरम्।<br>सोऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥ ३२॥<br><br>सोऽहं प्रेरयिता देवः परमानन्दमाश्रितः।<br>नृत्यामि योगी सततं यस्तद् वेद स वेदवित्॥ ३३॥<br><br>इति गुह्यतमं ज्ञानं सर्ववेदेषु निश्चितम्।<br>प्रसन्नचेतसे देयं धार्मिकायाहिताग्नये॥ ३४॥परमेष्ठी सभी तत्त्वोंसे परे हैं अतः सभी तत्त्वोंका महत्त्व ही भगवान् ब्रह्माके रूपमें प्रसिद्ध है और ये भगवान् ब्रह्मा ब्रह्ममय एवं अमल हैं। जो मुझे ही महायोगेश्वरोंका भी ईश्वर समझता है, वह निर्विकल्प (समाधि)-योगसे युक्त होता है, इसमें संदेह नहीं। परमानन्दका आश्रयण करनेवाला वही मैं प्रेरित करनेवाला देवता हूँ। मैं योगी निरन्तर नृत्य करता (प्राणिमात्रके हृदयमें सदा विद्यमान) रहता हूँ, जो ऐसा जानता है वह वेदज्ञ है यह अत्यन्त गुह्य ज्ञान सभी वेदोंमें प्रतिष्ठित है। इसे प्रसन्नचित्त, धार्मिक तथा अग्निहोत्रीको प्रदान करना चाहिये॥ ३१—३४॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) चतुर्थोऽध्यायः॥४॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकृष्णपुराणसंहिताके उपविभागमें (ईश्वरगीताका) चौथा अध्याय समाप्त हुआ॥ ४॥


* इसका आशय यह है कि महेश्वर प्रेरक होते हुए भी प्रेरणाकी आसक्तिसे सर्वथा रहित हैं। अहैतुकी कृपावश ही प्रेरक बनते हैं।

२७०* कूर्मपुराण *

पाँचवाँ अध्याय

ऋषियोंको दिव्य नृत्य करते हुए भगवान् शंकरका आकाशमें दर्शन, मुनियोंद्वारा महेश्वरकी भावपूर्ण स्तुति करना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
एतावदुक्त्वा भगवान् योगिनां परमेश्वरः।<br>ननर्त परमं भावमैश्वरं सम्प्रदर्शयन्॥ १॥<br>तं ते ददृशुरीशानं तेजसां परमं निधिम्।<br>नृत्यमानं महादेवं विष्णुना गगनेऽमले॥ २॥<br>यं विदुर्योगतत्त्वज्ञा योगिनो यतमानसाः।<br>तमीशं सर्वभूतानामाकाशे ददृशुः किल॥ ३॥<br>यस्य मायामयं सर्वं येनेदं प्रेर्यते जगत्।<br>नृत्यमानः स्वयं विप्रैर्विश्वेशः खलु दृश्यते॥ ४॥<br>यत्पादपङ्कजं स्मृत्वा पुरुषोऽज्ञानजं भयम्।<br>जहाति नृत्यमानं तं भूतेशं ददृशुः किल॥ ५॥इतना कहकर योगियोंके परमेश्वर भगवान् (शिव) परम ऐश्वर्यमय भाव प्रदर्शित करते हुए नृत्य करने लगे। उन मुनियोंने परम तेजोनिधि ईशान महादेवको विष्णुके साथ नृत्य करते हुए स्वच्छ आकाशमें देखा। योगके तत्त्वको जाननेवाले संयतचित्त योगी ही जिन्हें जान पाते हैं, उन सभी प्राणियोंके ईशको आकाशमें मुनियोंने देखा। यह (सम्पूर्ण जगत्) जिनकी मायासे निर्मित है और जिनके द्वारा यह जगत् प्रेरित होता है, उन साक्षात् विश्वेशको विप्रोंने नृत्य करते हुए देखा। जिनके चरण-कमलका स्मरण करके पुरुष अज्ञानसे उत्पन्न भयसे छुटकारा पा लेता है, उन्हीं भूतेशको मुनियोंने नृत्य करते हुए देखा॥ १-५॥
यं विनिद्रा जितश्वासाः शान्ता भक्तिसमन्विताः।<br>ज्योतिर्मयं प्रपश्यन्ति स योगी दृश्यते किल॥ ६॥<br>योऽज्ञानान्मोचयेत् क्षिप्रं प्रसन्नो भक्तवत्सलः।<br>तमेव मोचकं रुद्रमाकाशे ददृशुः परम्॥ ७॥<br>सहस्रशिरसं देवं सहस्रचरणाकृतिम्।<br>सहस्रबाहुं जटिलं चन्द्रार्धकृतशेखरम्॥ ८॥<br>वसानं चर्म वैयाघ्रं शूलासक्तमहाकरम्।<br>दण्डपाणिं त्रयीनेत्रं सूर्यसोमाग्निलोचनम्॥ ९॥<br>ब्रह्माण्डं तेजसा स्वेन सर्वमावृत्य च स्थितम्।<br>दंष्ट्राकरालं दुर्धर्षं सूर्यकोटिसमप्रभम्॥ १०॥<br>अण्डस्थं चाण्डबाह्यस्थं बाह्यमभ्यन्तरं परम्।<br>सृजन्तमनलज्वालं दहन्तमखिलं जगत्।<br>नृत्यन्तं ददृशुर्देवं विश्वकर्माणमीश्वरम्॥ ११॥निद्रारहित, श्वासजयी, शान्त और भक्तिपरायण लोग जिनके ज्योतिर्मय स्वरूपका दर्शन करते हैं, (विप्रजनोंको) वे ही योगी दिखलायी पड़े। जो भक्तवत्सल (देव) प्रसन्न होनेपर शीघ्र ही अज्ञानसे मुक्त कर देते हैं, उन्हीं मुक्त करनेवाले परम रुद्रको (उन्होंने) आकाशमें देखा। (ब्राह्मणोंने) हजारों सिरवाले, हजारों चरणोंकी आकृतिसे युक्त, हजारों बाहुवाले, जटायुक्त, अर्धचन्द्रको मस्तकपर धारण करनेवाले, व्याघ्रके चर्मको वस्त्ररूपमें धारण करनेवाले, महान् भुजामें त्रिशूल धारण करनेवाले, हाथमें दण्ड धारण किये, वेदत्रयीरूप तीन नेत्रवाले, सूर्य, चन्द्रमा और अग्निरूप नेत्रधारी, अपने तेजसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको आवृतकर स्थित हुए, भयंकर दाढ़ोंवाले, दुर्धर्ष, करोड़ों सूर्योंके समान आभावाले, अण्डके अंदर स्थित और अण्डके बाहर स्थित, परम (सर्वोत्कृष्ट), बाहर-भीतर सर्वत्र व्यास, अग्निज्वाला उत्पन्न करनेवाले और सम्पूर्ण जगत्को जलानेवाले विश्वकर्मा (समस्त कर्मोंके अधिष्ठाता) देवको नृत्य करते हुए देखा॥ ६-११॥
महादेवं महायोगं देवानापि दैवतम्।<br>पशूनां पतीमीशानं ज्योतिषां ज्योतिरव्ययम्॥ १२॥<br>पिनाकिनं विशालाक्षं भेषजं भवरोगिणाम्।<br>कालात्मानं कालकालं देवदेवं महेश्वरम्॥ १३॥ब्रह्मवादी मुनियोंने महादेव, महायोगस्वरूप, देवोंके भी देव, पशुपति ईशान, ज्योतियोंके भी अविनाश्र्वर ज्योतिःस्वरूप, पिनाकी, विशालाक्ष, भव-रोगियोंके औषध, कालात्मा, कालके भी काल, देवाधिदेव, महेश्वर,
* अध्याय ५ *२७१

| उमापतिं विरूपाक्षं योगानन्दमयं परम्।<br>ज्ञानवैराग्यनिलयं ज्ञानयोगं सनातनम्॥ १४॥<br>शाश्वतैश्वर्यविभवं धर्माधारं दुरासदम्।<br>महेन्द्रोपेन्द्रनमितं महर्षिगणवन्दितम्॥ १५॥<br>आधारं सर्वशक्तीनां महायोगेश्वरेश्वरम्।<br>योगिनां परमं ब्रह्म योगिनां योगवन्दितम्।<br>योगिनां हृदि तिष्ठन्तं योगमायासमावृतम्॥ १६॥<br>क्षणेन जगतो योनिं नारायणमनामयम्।<br>ईश्वरेणैकतापन्नमपश्यन् ब्रह्मवादिनः॥ १७॥<br>दृष्ट्वा तदैश्वरं रूपं रुद्रनारायणात्मकम्।<br>कृतार्थं मेनिरे सन्तः स्वात्मानं ब्रह्मवादिनः॥ १८॥<br>सनत्कुमारः सनको भृगुश्च<br>सनातनश्चैव सनन्दनश्च।<br>रुद्रोऽङ्गिरा वामदेवोऽथ शुक्नो<br>महर्षिरत्रिः कपिलो मरीचिः॥ १९॥<br>दृष्ट्वाथ रुद्रं जगदीशितारं<br>तं पद्मनाभाश्रितवामभागम्।<br>ध्यात्वा हृदिस्थं प्रणिपत्य मूर्ध्ना<br>बद्ध्वाञ्जलिं स्वेषु शिरःसु भूयः॥ २०॥<br>ओङ्कारमुच्चार्य विलोक्य देव-<br>मन्तःशरीरे निहितं गुहायाम्।<br>समस्तुवन् ब्रह्ममयैर्वचोभि-<br>रानन्दपूर्णायतमानसास्ते ॥ २१॥ | उमापति, विरूपाक्ष, परम योगानन्दमय, ज्ञान-वैराग्यके<br>निधान, सनातन ज्ञानयोग, शाश्वत ऐश्वर्य एवं विभवरूप,<br>धर्मके आधार, दुरासद (दुष्प्राप्य), महेन्द्र तथा उपेन्द्र<br>(विष्णु)-द्वारा नमस्कृत, महर्षिगणोंद्वारा वन्दित, सभी<br>शक्तियोंके आधार, महायोगेश्वरोंके भी ईश्वर, योगियोंके<br>परम ब्रह्म, योगियोंके योगद्वारा वन्दित, योगियोंके हृदयमें<br>स्थित, योगमायासे समावृत, जगत्के योनिरूप तथा<br>अनामय नारायणको क्षणमात्रमें ईश्वर अर्थात् शंकरके साथ<br>एकाकार होते हुए देखा॥ १२—१७॥<br>रुद्रके उस ऐश्वर्यमय नारायणात्मक रूपको देखकर<br>ब्रह्मवादी संतोंने अपने-आपको कृतार्थ माना। सनत्कुमार,<br>सनक, भृगु, सनातन, सनन्दन, रुद्र, अंगिरा, वामदेव,<br>शुक्र, महर्षि अत्रि, कपिल तथा मरीचि—इन ऋषियोंने<br>पद्मनाभ विष्णुको वामभागमें विराजित किये हुए उन<br>जगत्के नियामक रुद्रका दर्शन किया और हृदयमें<br>स्थित उनका ध्यान करके सिरसे विनयपूर्वक प्रणामकर<br>पुनः अपने मस्तकपर अञ्जलि बाँधकर प्रणाम<br>किया॥ १८–२०॥<br>ओंकारका उच्चारण करनेके उपरान्त अपने शरीरके<br>भीतर (हृदयरूपी) गुहामें निहित उन देवका दर्शन<br>करके आनन्दसे परिपूर्ण विस्तृत आत्मावाले वे (मुनिगण)<br>वैदिक मन्त्रोंके द्वारा (उन देवकी) स्तुति करने लगे॥ २१॥ | | <div align="center">मुनय ऊचुः</div>त्वामेकमीशं पुरुषं पुराणं<br>प्राणेश्वरं रुद्रमनन्तयोगम्।<br>नमाम सर्वे हृदि संनिविष्टं<br>प्रचेतसं ब्रह्ममयं पवित्रम्॥ २२॥<br>त्वां पश्यन्ति मुनयो ब्रह्मयोनिं<br>दान्ताः शान्ता विमलं रुक्मवर्णम्।<br>ध्यात्वात्मस्थमचलं स्वे शरीरे<br>कविं परेभ्यः परमं तत्परं च॥ २३॥<br>त्वत्तः प्रसूता जगतः प्रसूतिः<br>सर्वात्मभूस्त्वं परमाणुभूतः।<br>अणोरणीयान् महतो महीयां-<br>स्त्वामेव सर्वं प्रवदन्ति सन्तः॥ २४॥ | **मुनियोंने कहा—**आप एकमात्र ईश्वर, पुराणपुरुष,<br>प्राणेश्वर, अनन्त योगरूप, हृदयमें संनिविष्ट, प्रचेता,<br>पवित्र एवं ब्रह्ममय रुद्रको हम सभी प्रणाम करते हैं।<br>इन्द्रियोंका दमन करनेवाले तथा शान्त मुनिगण ध्यानके<br>द्वारा अपने ही शरीरमें अचल, निर्मल, स्वर्णके समान<br>वर्णवाले, ब्रह्मयोनि, उत्कृष्टसे भी अत्यन्त उत्कृष्ट<br>(प्राणिमात्रके हृदयमें विद्यमान) आप कविका दर्शन<br>करते हैं। संसारकी सृष्टि आपसे ही हुई है। आप<br>सभीके आत्मरूप और परम अणुरूप हैं। महापुरुष<br>आपको ही सब कुछ और सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म तथा<br>महान्‌से भी महान् कहते हैं॥ २२-२४॥ |

२७२ * कूर्मपुराण *


हिरण्यगर्भो जगदन्तरात्मा
त्वत्तोऽधिजातः पुरुषः पुराणः।
संजायमानो भवता विसृष्टो
यथाविधानं सकलं ससर्ज॥ २५॥

त्वत्तो वेदाः सकलाः सम्प्रसूता-
स्त्वय्येवान्ते संस्थितिं ते लभन्ते।
पश्यामस्त्वां जगतो हेतुभूतं
नृत्यन्तं स्वे हृदये संनिविष्टम्॥ २६॥

त्वयैवेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रं
मायावी त्वं जगतामेकनाथः।
नमामस्त्वां शरणं सम्प्रपन्ना
योगात्मानं चित्पतिं दिव्यनृत्यम्॥ २७॥

पश्यामस्त्वां परमाकाशमध्ये
नृत्यन्तं ते महिमानं स्मरामः।
सर्वात्मानं बहुधा संनिविष्टं
ब्रह्मानन्दमनुभूयानुभूय ॥ २८॥

जगत्के अन्तरात्मा-स्वरूप हिरण्यगर्भ पुराणपुरुष आपसे उत्पन्न हुए हैं। आपद्वारा उत्पन्न किये गये उस (पुराणपुरुष)-ने उत्पन्न होते ही यथाविधि सम्पूर्ण संसारकी सृष्टि की। आपसे ही सभी वेद उत्पन्न हुए हैं और अन्तमें आपमें ही वे स्थिति पाते हैं। हम अपने हृदयमें स्थित जगत्के कारणरूप आपको नृत्य करते हुए देख रहे हैं। आपके द्वारा ही इस ब्रह्मचक्रको चलाया जाता है, आप मायावी और जगत्के एकमात्र स्वामी हैं। हम दिव्य नृत्य करनेवाले आप योगात्मा चित्पतिकी शरणमें आये हैं, आपको हम नमस्कार करते हैं। परम आकाशके मध्यमें नृत्य कर रहे आपका हम दर्शन करते हैं और आपकी महिमाका स्मरण करते हैं। अनेक रूपोंमें स्थित सर्वात्मा ब्रह्मानन्दका हम बार-बार अनुभव कर रहे हैं॥ २५-२८॥


ॐकारस्ते वाचको मुक्तिबीजं
त्वमक्षरं प्रकृतौ गूढरूपम्।
तत्त्वां सत्यं प्रवदन्तीह सन्तः
स्वयम्प्रभं भवतो यत्प्रकाशम्॥ २९॥

स्तुवन्ति त्वां सततं सर्ववेदा
नमन्ति त्वामृषयः क्षीणदोषाः।
शान्तात्मानः सत्यसंधा वरिष्ठं
विशन्ति त्वां यतयो ब्रह्मनिष्ठाः॥ ३०॥

आपका वाचक ओङ्कार मुक्तिका बीज है, आप अक्षर तथा प्रकृतिमें गूढरूपसे स्थित हैं। इसीलिये संतजन आपको सत्यस्वरूप और आपके प्रकाशको स्वयं प्रकाशित बताते हैं। सभी वेद सतत आपकी स्तुति करते हैं। दोषरहित ऋषिगण आपको नमस्कार करते हैं तथा शान्त-चित्त, सत्यसंध ब्रह्मनिष्ठ यतिजन आप सर्वश्रेष्ठमें प्रवेश करते हैं॥ २९-३०॥


एको वेदो बहुशाखो ह्यनन्त-
स्त्वामेवैकं बोधयत्येकरूपम्।
वेद्यं त्वां शरणं ये प्रपन्ना-
स्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्॥ ३१॥

भवानीशोऽनादिमांस्तेजोराशि-
र्ब्रह्मा विश्वं परमेष्ठी वरिष्ठः।
स्वात्मानन्दमनुभूयाधिशेते
स्वयं ज्योतिरचलो नित्यमुक्तः॥ ३२॥

बहुत शाखाओंवाला एक अनन्त वेद आपके अद्वितीय एवं एकरूपका बोध कराता है। जो लोग जानने योग्य आपकी शरण ग्रहण करते हैं, उन्हींको शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, अन्य किसीको नहीं। आप ईश, अनादि, तेजोराशि, ब्रह्मा, विश्वरूप, परमेष्ठी और वरिष्ठ हैं। नित्य मुक्त और स्वयं ज्योतिरूप अचल (योगी) स्वात्मानन्दका अनुभव कर (आपमें) प्रविष्ट होते हैं॥ ३१-३२॥


एको रुद्रस्त्वं करोषीह विश्वं
त्वं पालयस्यखिलं विश्वरूपः।
त्वामेवान्ते निलयं विन्दतीदं
नमामस्त्वां शरणं सम्प्रपन्नाः॥ ३३॥

आप अद्वितीय रुद्र ही इस विश्वकी सृष्टि करते हैं। विश्वरूप आप सबका पालन करते हैं और यह (विश्व) अन्तमें आपमें ही विलीन हो जाता है। हम आपको नमस्कार करते हैं और आपके शरणागत हैं॥ ३३॥

* अध्याय ५ *२७३
त्वामेकमाहुः कविमेकरुद्रं<br>  प्राणं बृहन्तं हरिमग्निमीशम्।<br>इन्द्रं मृत्युमनिलं चेकितानं<br>  धातारमादित्यमनेकरूपम् ॥ ३४ ॥<br>त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं<br>  त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्।<br>त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता<br>  सनातनस्त्वं पुरुषोत्तमोऽसि ॥ ३५ ॥<br>त्वमेव विष्णुश्चतुराननस्त्वं<br>  त्वमेव रुद्रो भगवानधीशः।<br>त्वं विश्वनाभिः प्रकृतिः प्रतिष्ठा<br>  सर्वेश्वरस्त्वं परमेश्वरोऽसि ॥ ३६ ॥आपको अद्वितीय, कवि, एक रुद्र, प्राण, बृहत्, हरि, अग्नि, ईश, इन्द्र, मृत्यु, अनिल, चेकितान, धाता, आदित्य, और अनेकरूप कहा जाता है। आप अविनाशी और परम जानने योग्य हैं। आप ही इस विश्वके परम आश्रय हैं। आप अव्यय, शाश्वत धर्मरक्षक, सनातन और पुरुषोत्तम हैं। आप ही विष्णु और आप ही चतुर्मुख ब्रह्मा हैं। आप ही प्रधान स्वामी भगवान् रुद्र हैं। आप विश्वकी नाभि, प्रकृति, प्रतिष्ठा, सर्वेश्वर और परम ईश्वर हैं॥ ३४–३६॥
त्वामेकमाहुः पुरुषं पुराण-<br>  मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्।<br>चिन्मात्रमव्यक्तमचिन्त्यरूपं<br>  खं ब्रह्म शून्यं प्रकृतिं निर्गुणं च ॥ ३७ ॥<br>यदन्तरा सर्वमिदं विभाति<br>  यदव्ययं निर्मलमेकरूपम्।<br>किमप्यचिन्त्यं तव रूपमेतत्<br>  तदन्तरा यत्प्रतिभाति तत्त्वम् ॥ ३८ ॥आपको अद्वितीय, पुराणपुरुष, आदित्यके समान वर्णवाला, तमोगुणसे अतीत, चिन्मात्र, अव्यक्त, अचिन्त्यरूप, आकाश, ब्रह्म, शून्य, प्रकृति और निर्गुण कहते हैं। जिसके भीतर यह सम्पूर्ण (जगत्) प्रकाशित होता है तथा जो विकाररहित निर्मल और अद्वितीय रूप है, वह आपका रूप अचिन्त्य है और उसके भीतर समस्त तत्त्व प्रतीत होते हैं॥ ३७-३८॥
योगेश्वरं रुद्रमनन्तशक्तिं<br>  परायणं ब्रह्मतनुं पवित्रम्।<br>नमाम सर्वे शरणार्थिनस्त्वां<br>  प्रसीद भूताधिपते महेश ॥ ३९ ॥<br>त्वत्पादपद्मस्मरणादशेष-<br>  संसारबीजं विलयं प्रयाति।<br>मनो नियम्य प्रणिधाय कायं<br>  प्रसादयामो वयमेकमीशम् ॥ ४० ॥<br>नमो भवायास्तु भवोद्भवाय<br>  कालाय सर्वाय हराय तुभ्यम्।<br>नमोऽस्तु रुद्राय कपर्दिने ते<br>  नमोऽग्नये देव नमः शिवाय ॥ ४१ ॥<br><br>ततः स भगवान् देवः कपर्दी वृषवाहनः।<br>संहृत्य परमं रूपं प्रकृतिस्थोऽभवद् भवः ॥ ४२ ॥हम सभी योगेश्वर, अनन्तशक्ति रुद्र, उत्कृष्ट आश्रयस्वरूप पवित्र ब्रह्ममूर्ति (आप)-को नमस्कार करते हैं। भूतोंके अधिपति महेश! प्रसन्न होइये, हम आपकी शरणमें हैं। आपके चरणकमलका स्मरण करनेसे सम्पूर्ण संसारका बीज (अर्थात् कर्म) नष्ट हो जाता है। मनका नियमन कर, शरीरको संयमित कर हम सभी अद्वितीय ईश्वर आपको प्रसन्न करते हैं। भव, भवोद्भव, काल, सर्व तथा हर आपको नमस्कार है। जटाधारी आप रुद्रको नमस्कार है। अग्निरूप देव शिव! आपको नमस्कार है, इस प्रकार स्तुति करनेपर उन भगवान् कपर्दी वृषवाहन देव भवने (अपने उस) उत्कृष्ट (विराट्)-रूपको समेट लिया और वे अपनी प्रकृतिमें स्थित हो गये॥ ३९–४२॥
२७४* कूर्मपुराण *
ते भवं भूतभव्येशं पूर्ववत् समवस्थितम्।<br>दृष्ट्वा नारायणं देवं विस्मिता वाक्यमब्रुवन्॥ ४३ ॥मुनियोंने पहलेके समान स्थित भूतभव्येश भव और नारायणदेवको देखकर आश्चर्यचकित होकर यह वाक्य कहा— ॥ ४३ ॥
भगवन् भूतभव्येश गोवृषाङ्कितशासन।<br>दृष्ट्वा ते परमं रूपं निर्वृताः स्म सनातन॥ ४४ ॥भगवन्! भूतभव्येश! गोवृषाङ्कितशासन! सनातन! आपके परम रूपका दर्शन कर हमलोग संतुष्टचित्त हो गये हैं। आपकी कृपासे हम सभीको निर्मल, परात्पर, परमेश्वरस्वरूप आपकी अव्यभिचारिणी भक्ति उत्पन्न हुई है। शंकर! इस समय हमलोग आप परमेष्ठीके उस माहात्म्यको एवं जो नित्य यथार्थस्वरूप है (उसे) पुनः सुनना चाहते हैं॥ ४४–४६ ॥
भवत्प्रसादादमले परस्मिन् परमेश्वरे।<br>अस्माकं जायते भक्तिस्त्वय्येवाव्यभिचारिणी॥ ४५ ॥
इदानीं श्रोतुमिच्छामो माहात्म्यं तव शंकर।<br>भूयोऽपि तव यन्नित्यं याथात्म्यं परमेष्ठिनः॥ ४६ ॥
स तेषां वाक्यमाकर्ण्य योगिनां योगसिद्धिदः।<br>प्राह गम्भीरया वाचा समालोक्य च माधवम्॥ ४७ ॥योगसिद्धियोंको प्रदान करनेवाले उन्होंने (महेश्वरने) उन योगियोंका वचन सुनकर तथा विष्णुकी ओर देखकर गम्भीर वाणीमें कहा— ॥ ४७ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्‌साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५॥


छठा अध्याय

ईश्वर (शंकर)-द्वारा ऋषिगणोंको अपना सर्वव्यापी स्वरूप बतलाना तथा अपनी भगवत्ताका और इस ज्ञानसे मुक्तिकी प्राप्तिका निरूपण करना

ईश्वर उवाच<br>शृणुध्वमृषयः सर्वे यथावत् परमेष्ठिनः।<br>वक्ष्यामीशस्य माहात्म्यं यत्तद्वेदविदो विदुः॥ १॥ईश्वरने कहा—हे ऋषिगणो! आप सभी सुनें। मैं परमेष्ठी ईशके उस माहात्म्यका यथावत् वर्णन कर रहा हूँ, जिसे वेदज्ञ लोग जानते हैं॥ १॥
सर्वलोकैकनिर्माता सर्वलोकैकरक्षिता।<br>सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वात्माहं सनातनः॥ २॥मैं सनातन सर्वात्मा सभी लोकोंका एकमात्र निर्माण करनेवाला, सभी लोकोंका एक अद्वितीय रक्षक और सभी लोकोंका एकमात्र संहार करनेवाला हूँ। सभी वस्तुओंका अन्तर्यामी पिता मैं ही हूँ। मध्य तथा अन्त सब कुछ मुझमें स्थित है, किंतु मैं सर्वत्र स्थित नहीं हूँ अर्थात् मेरी कोई सीमा नहीं है॥ २-३॥
सर्वेषामेव वस्तूनामन्तर्यामी पिता ह्यहम्।<br>मध्ये चान्तः स्थितं सर्वं नाहं सर्वत्र संस्थितः॥ ३॥
भवद्द्भिरद्भुतं दृष्टं यत्स्वरूपं तु मामकम्।<br>ममैषा ह्युपमा विप्रा मायया दर्शिता मया॥ ४॥विप्रो! आप लोगोंने मेरे जिस अद्भुत रूपको देखा है, वह केवल मेरी उपमा (प्रतीक) है, जिसे मैंने (अपनी) मायाद्वारा दिखलाया। मैं सभी पदार्थोंके भीतर स्थित (व्यास) रहते हुए सम्पूर्ण जगत्‌को प्रेरित करता हूँ। यह मेरी क्रियाशक्ति है। यह विश्व जिसके द्वारा चेष्टा करता है और जिसके स्वभावका अनुसरण करता है, कालरूप वही मैं सम्पूर्ण कलात्मक (अपने अंशरूप) जगत्‌को प्रेरित करता हूँ॥ ४–६॥
सर्वेषामेव भावानामान्तरा समवस्थितः।<br>प्रेरयामि जगत् कृत्स्नं क्रियाशक्तिरियं मम॥ ५॥
ययेदं चेष्टते विश्वं तत्स्वभावानुवर्ति च।<br>सोऽहं कालो जगत् कृत्स्नं प्रेरयामि कलात्मकम्॥ ६॥
  • अध्याय ६ * | २७५ ---|---

| एकांशेन जगत् कृत्स्नं करोमि मुनिपुंगवाः।<br>संहराम्येकरूपेण द्विधावस्था ममैव तु॥ ७ ॥<br><br>आदिमध्यान्तनिर्मुक्तो मायातत्त्वप्रवर्तकः।<br>क्षोभयामि च सर्गादौ प्रधानपुरुषावुभौ॥ ८ ॥<br><br>ताभ्यां संजायते विश्वं संयुक्ताभ्यां परस्परम्।<br>महदादिक्रमेणैव मम तेजो विजृम्भते॥ ९ ॥<br><br>यो हि सर्वजगत्साक्षी कालचक्रप्रवर्तकः।<br>हिरण्यगर्भो मार्तण्डः सोऽपि मद्देहसम्भवः॥ १० ॥<br><br>तस्मै दिव्यं स्वमैश्वर्यं ज्ञानयोगं सनातनम्।<br>दत्तवानात्मजान् वेदान् कल्पादौ चतुरो द्विजाः॥ ११ ॥<br><br>स मन्नियोगतो देवो ब्रह्मा मद्भावभावितः।<br>दिव्यं तन्मामकैश्वर्यं सर्वदा वहति स्वयम्॥ १२ ॥<br><br>स सर्वलोकनिर्माता मन्नियोगेन सर्ववित्।<br>भूत्वा चतुर्मुखः सर्गं सृजत्येवात्मसम्भवः॥ १३ ॥<br><br>योऽपि नारायणोऽनन्तो लोकानां प्रभवाव्ययः।<br>ममैव परमा मूर्तिः करोति परिपालनम्॥ १४ ॥<br><br>योऽन्तकः सर्वभूतानां रुद्रः कालात्मकः प्रभुः।<br>मदाज्ञयासौ सततं संहरिष्यति मे तनुः॥ १५ ॥<br><br>हव्यं वहति देवानां कव्यं कव्याशिनामपि।<br>पाकं च कुरुते वह्निः सोऽपि मच्छक्तिचोदितः॥ १६ ॥<br><br>भुक्तमाहारजातं च पचते तदहर्निशम्।<br>वैश्वानरोऽग्निर्भगवानीश्वरस्य नियोगतः॥ १७ ॥<br><br>योऽपि सर्वाम्भसां योनिर्वरुणो देवपुंगवः।<br>सोऽपि संजीवयेत् कृत्स्नमीशस्यैव नियोगतः॥ १८ ॥<br><br>योऽन्तस्तिष्ठति भूतानां बहिर्देवः प्रभञ्जनः।<br>मदाज्ञयासौ भूतानां शरीराणि बिभर्ति हि॥ १९ ॥<br><br>योऽपि संजीवनो नृणां देवानाममृताकरः।<br>सोमः स मन्नियोगेन चोदितः किल वर्तते॥ २० ॥ | मुनिश्रेष्ठो! मैं एक अंशसे सम्पूर्ण संसारकी रचना करता हूँ और दूसरे रूप (अंश)-से संहार करता हूँ—इस प्रकारकी ये दोनों अवस्थाएँ मेरी ही हैं। आदि, मध्य और अन्तरहित माया-तत्त्वका प्रवर्तन करनेवाला मैं सृष्टिके आरम्भमें प्रधान तथा पुरुष—दोनोंको क्षुब्ध (प्रेरित) करता हूँ। उन दोनोंके परस्पर संयोगसे विश्व उत्पन्न होता है। महत्-तत्त्वादिके क्रमसे मेरा ही तेज विस्तारको प्राप्त होता है। जो सारे संसारके साक्षी और कालचक्रको चलानेवाले हिरण्यगर्भ मार्तण्ड (सूर्य) हैं, वे भी मेरे ही शरीरसे उत्पन्न हुए हैं॥ ७-१०॥<br><br>द्विजो! कल्पके आदिमें मैंने ही उन्हें अपना दिव्य, ऐश्वर्यमय सनातन ज्ञानयोग और अपनेसे उत्पन्न चारों वेद प्रदान किये। वे मेरे भावसे भावित देव ब्रह्मा मेरे आदेशसे मेरे उस दिव्य ऐश्वर्यको स्वयं सदा वहन करते हैं। सभी लोकोंका निर्माण करनेवाले और सब कुछ जाननेवाले आत्मसम्भव (मुझसे ही उत्पन्न) वे (ब्रह्मा) मेरे निर्देशसे चार मुखवाले होकर सृष्टिकी रचना करते हैं। जो लोकोंको उत्पन्न करनेवाले अव्यय अनन्त नारायण हैं और जगत्का परिपालन करते हैं, वे भी मेरी ही परम मूर्ति हैं॥ ११-१४॥<br><br>सभी प्राणियोंका संहार करनेवाले जो प्रभु कालात्मक रुद्र हैं, वे मेरी ही आज्ञासे निरन्तर संहार करते रहते हैं, वे भी मेरी मूर्ति हैं॥ १५॥<br><br>जो देवताओंको हव्य (हवनीय द्रव्य) पहुँचाते हैं और कव्य ग्रहण करनेवाले पितरोंको कव्य पहुँचाते हैं तथा जो पाकमें (सब कुछ पचा लेनेमें) समर्थ हैं, वे अग्निदेव भी मेरी ही शक्तिसे प्रेरित होकर यह सब करते हैं। ईश्वर (शंकर)-के निर्देशसे ही भगवान् वैश्वानर अग्नि रात-दिन ग्रहण किये गये आहारको पचाते रहते हैं॥ १६-१७॥<br><br>सम्पूर्ण जलके मूल कारण जो देवश्रेष्ठ वरुण हैं, वे भी ईश्वरके ही निर्देशसे सम्पूर्ण विश्वको जीवन (जल) प्रदान करते हैं, जो प्राणियोंके भीतर और बाहर वर्तमान रहनेवाले वायुदेव हैं, वे भी मेरी आज्ञासे प्राणियोंके शरीरोंको धारण करते हैं। मनुष्योंको जीवित रखनेवाले जो देवताओंके अमृतके निधान सोमदेव (चन्द्रमा) हैं, वे भी मेरे ही निर्देशसे प्रेरित होकर कार्य करते हैं॥ १८—२०॥ |

२७६ * कूर्मपुराण *


यः स्वभासा जगत् कृत्स्नं प्रकाशयति सर्वदा।
सूर्यो वृष्टिं वितनुते शास्त्रेणैव स्वयम्भुवः॥ २१॥

योऽप्यशेषजगच्छास्ता शक्रः सर्वामरेश्वरः।
यज्वनां फलदो देवो वर्ततेऽसौ मदाज्ञया॥ २२॥

यः प्रशास्ता ह्यसाधूनां वर्तते नियमादिह।
यमो वैवस्वतो देवो देवदेवनियोगतः॥ २३॥

योऽपि सर्वधनाध्यक्षो धनानां सम्प्रदायकः।
सोऽपीश्वरनियोगेन कुबेरो वर्तते सदा॥ २४॥

यः सर्वरक्षसां नाथस्तामसानां फलप्रदः।
मन्नियोगादसौ देवो वर्तते निर्ऋतिः सदा॥ २५॥

वेतालगणभूतानां स्वामी भोगफलप्रदः।
ईशानः किल भक्तानां सोऽपि तिष्ठन्ममाज्ञया॥ २६॥

यो वामदेवोऽङ्गिरसः शिष्यो रुद्रगणाग्रणीः।
रक्षको योगिनां नित्यं वर्ततेऽसौ मदाज्ञया॥ २७॥

यश्च सर्वजगत्पूज्यो वर्तते विघ्नकारकः।
विनायको धर्मनेता सोऽपि मद्वचनात् किल॥ २८॥

योऽपि ब्रह्मविदां श्रेष्ठो देवसेनापतिः प्रभुः।
स्कन्दोऽसौ वर्तते नित्यं स्वयम्भूविधिचोदितः॥ २९॥

ये च प्रजानां पतयो मरीच्याद्या महर्षयः।
सृजन्ति विविधं लोकं परस्यैव नियोगतः॥ ३०॥

या च श्रीः सर्वभूतानां ददाति विपुलां श्रियम्।
पत्नी नारायणस्यासौ वर्तते मदनुग्रहात्॥ ३१॥

वाचं ददाति विपुलां या च देवी सरस्वती।
सापीश्वरनियोगेन चोदिता सम्प्रवर्तते॥ ३२॥

याशेषपुरुषान् घोरान्निरकात् तारयिष्यति।
सावित्री संस्मृता देवी देवाज्ञानुविधायिनी॥ ३३॥

पार्वती परमा देवी ब्रह्मविद्याप्रदायिनी।
यापि ध्याता विशेषेण सापि मद्वचनानुगा॥ ३४॥

योऽनन्तमहिमानन्तः शेषोऽशेषामरप्रभुः।
दधाति शिरसा लोकं सोऽपि देवनियोगतः॥ ३५॥


जो अपने प्रकाशसे सम्पूर्ण संसारको सदा प्रकाशित करते हैं, वे सूर्यदेव भी स्वयम्भू (ईश्वर)-की आज्ञासे वृष्टिका विस्तार करते हैं। जो सारे संसारके शासक, सभी देवताओंके ईश्वर तथा यज्ञ करनेवालोंको फल प्रदान करनेवाले इन्द्रदेव हैं, वे भी मेरी आज्ञासे प्रवृत्त होते हैं। जो दुष्टोंके शासक हैं और नियमके अनुसार व्यवहार करनेवाले विवस्वान्‌के पुत्र यमदेव हैं, वे भी देवाधिदेव (शंकर)-के निर्देशसे व्यवहार करते हैं। जो सभी प्रकारके सम्पत्तियोंके स्वामी और धन प्रदान करनेवाले कुबेर हैं, वे भी ईश्वरके नियोगसे ही सदा प्रवृत्त होते हैं। जो सभी राक्षसोंके स्वामी हैं तथा तमोगुणियोंको (अपने कर्मका) फल प्रदान करनेवाले हैं, वे निर्ऋतिदेव मेरे ही निर्देशसे सदा प्रवर्तित होते हैं॥ २१–२५॥

जो बेतालगणों और भूतोंके स्वामी और भक्तोंको भोगरूपी फल प्रदान करनेवाले ईशानदेव हैं, वे भी मेरी आज्ञामें स्थित रहते हैं। जो अङ्गिराके शिष्य, रुद्रदेवके गणोंमें अग्रगण्य और योगियोंके रक्षक हैं, वे वामदेव भी मेरी ही आज्ञाद्वारा नित्य व्यवहार करते हैं। जो सम्पूर्ण संसारके पूज्य, विघ्नकारक धर्मनेता विनायक हैं, वे भी मेरे आदेशसे चलते हैं। जो ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, देवोंके सेनापति स्वयम्भू प्रभु स्कन्द हैं, वे भी नित्य विधिकी प्रेरणासे प्रेरित होते हैं। जो प्रजाओंके पति मरीचि आदि महर्षि हैं, वे भी परात्पर (परमेश्वर)-की आज्ञासे ही विविध लोकोंकी सृष्टि करते हैं॥ २६–३०॥

जो सभी प्राणियोंकी श्री (शोभा) हैं और विपुल ऐश्वर्य प्रदान करती हैं, वे नारायणकी पत्नी (लक्ष्मी) मेरे ही अनुग्रहसे व्यवहार करती हैं। जो सरस्वतीदेवी विपुल वाणी प्रदान करती हैं, वे भी ईश्वरके नियोगसे प्रेरित होकर प्रवर्तित होती हैं। जो सभी पुरुषोंको घोर नरकोंसे तारनेवाली सावित्रीदेवी कही गयी हैं, वे भी देवकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाली हैं। ध्यान करनेपर ब्रह्मविद्याको प्रदान करनेवाली जो श्रेष्ठ पार्वती-देवी हैं, वे भी विशेषरूपसे मेरे ही वचनोंका पालन करती हैं॥ ३१–३४॥

अनन्त महिमावाले और सभी देवताओंके स्वामी जो अनन्त शेष हैं, वे भी देव (शंकर)-के निर्देशसे ही संसारको सिरपर धारण करते हैं॥ ३५॥

* अध्याय ६ * २७७

योऽग्निः संवर्तको नित्यं वडवारूपसंस्थितः।<br>पिबत्यखिलमम्भोधीमीश्वरस्य नियोगतः॥ ३६॥<br>ये चतुर्दश लोकेऽस्मिन् मनवः प्रथितौजसः।<br>पालयन्ति प्रजाः सर्वास्तेऽपि तस्य नियोगतः॥ ३७॥<br>आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्च तथाश्विनौ।<br>अन्याश्च देवताः सर्वा मच्छास्त्रेणैव धिष्ठिताः॥ ३८॥<br>गन्धर्वा गरुडा ऋक्षाः सिद्धाः साध्याश्च चारणाः।<br>यक्षरक्षःपिशाचाश्च स्थिताः शास्त्रे स्वयम्भुवः॥ ३९॥<br>कलाकाष्ठानिमेषाश्च मुहूर्ता दिवसाः क्षपाः।<br>ऋतवः पक्षमासाश्च स्थिताः शास्त्रे प्रजापतेः॥ ४०॥जो संवर्तक अग्नि नित्य वडवाके रूपमें स्थित हैं, वे भी ईश्वरकी आज्ञासे ही सम्पूर्ण समुद्रको पीते रहते हैं। इस संसारमें अत्यन्त तेजस्वी जो चौदह मनु हैं, वे सभी मुझ (ईश्वर)–के आदेशसे सभी प्रजाओंका पालन करते हैं। आदित्य, वसुगण, रुद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार तथा अन्य सभी देवता मेरी ही आज्ञामें प्रतिष्ठित हैं। गन्धर्व, गरुड, ऋक्ष, सिद्ध, साध्य, चारण, यक्ष, राक्षस तथा पिशाच—ये सभी स्वयम्भूकी आज्ञामें ही स्थित हैं। कला, काष्ठा, निमेष, मुहूर्त, दिन, रात, ऋतुएँ, पक्ष तथा मास—ये मुझ प्रजापति (शिव)–के शासनमें स्थित हैं॥ ३६—४०॥
युगमन्वन्तराण्येव मम तिष्ठन्ति शासने।<br>पराश्चैव परार्धाश्च कालभेदास्तथा परे॥ ४१॥<br>चतुर्विधानि भूतानि स्थावराणि चराणि च।<br>नियोगादेव वर्तन्ते देवस्य परमात्मनः॥ ४२॥<br>पातालानि च सर्वाणि भुवनानि च शासनात्।<br>ब्रह्माण्डानि च वर्तन्ते सर्वाण्येव स्वयम्भुवः॥ ४३॥<br>अतीतान्यप्यसंख्यानि ब्रह्माण्डानि ममाज्ञया।<br>प्रवृत्तानि पदार्थौघैः सहितानि समन्ततः॥ ४४॥<br>ब्रह्माण्डानि भविष्यन्ति सह वस्तुभिरात्मगैः।<br>वहिष्यन्ति सदैवाज्ञां परस्य परमात्मनः॥ ४५॥<br>भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।<br>भूतादिरादिप्रकृतिर्नियोगे मम वर्तते॥ ४६॥युग, मन्वन्तर, पर तथा परार्ध—ये सभी तथा अन्य कालके सभी भेद मेरे ही शासनमें स्थित रहते हैं। (स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज तथा जरायुज—ये) चार प्रकारके प्राणी और स्थावर–जंगमात्मक जगत् मुझ परमात्मा देवके निर्देशसे ही प्रवर्तित होते हैं। सभी पाताल और भुवन, सभी ब्रह्माण्ड स्वयम्भू परमेश्वरकी आज्ञासे प्रवर्तित हैं। बीते हुए भी जो पदार्थोंके समूहोंसहित असंख्य ब्रह्माण्ड थे, वे मेरी ही आज्ञासे सर्वत्र प्रवृत्त थे। आगे भी जो ब्रह्माण्ड होंगे, वे भी सदैव परात्पर परमात्माकी आज्ञाका आत्मगत (अपने अधीन) वस्तुओंके^१ द्वारा पालन करेंगे। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, भूतादि^२ (तामस अहंकार) और आदि प्रकृति—ये सभी मेरी आज्ञासे कार्य करते हैं॥ ४१—४६॥
याशेषजगतो योनिर्मोहिनी सर्वदेहिनाम्।<br>माया विवर्तते नित्यं सापीश्वरनियोगतः॥ ४७॥<br>यो वै देहभृतां देवः पुरुषः पठ्यते परः।<br>आत्मासौ वर्तते नित्यमीश्वरस्य नियोगतः॥ ४८॥जो सम्पूर्ण संसारकी योनि और सभी देहधारियोंको मोहित करनेवाली माया है, वह भी ईश्वरके निर्देशसे ही नित्य (विभिन्न रूपोंमें) विवर्तित होती रहती है। जो देहधारियोंके आत्मस्वरूप परात्पर पुरुष देव कहे जाते हैं, वे भी नित्य ईश्वरके नियोगसे ही कार्य करते हैं॥ ४७-४८॥
विधूय मोहकलिलं यया पश्यति तत् पदम्।<br>सापि विद्या महेशस्य नियोगवशवर्तिनी॥ ४९॥<br>बहुनात्र किमुक्तेन मम शक्त्यात्मकं जगत्।<br>मयैव प्रेर्यते कृत्स्नं मय्येव प्रलयं व्रजेत्॥ ५०॥जिसके द्वारा मोहरूपी कल्मषको धोकर उस परमपदका दर्शन होता है, वह विद्या भी महेशकी आज्ञाके वशमें रहनेवाली है। इस विषयमें और अधिक क्या कहा जाय, यह संसार मेरी ही शक्तिसे शक्तिमान् है। मेरे द्वारा ही सम्पूर्ण (जगत्) प्रेरित किया जाता है और मुझमें ही उसका लय भी हो जाता है॥ ४९-५०॥

१-अपने अधीन जो भी सामग्री होगी, उसमें पूर्ण समर्पणभावसे आज्ञापालन करना यहाँ अभिप्रेत है।
२-तामस अहंकारकी भूतादि संज्ञा सांख्यशास्त्रमें प्रसिद्ध है—‘भूतादेस्तन्मात्र........’। (सांख्यकारिका २५)

२७८ * कूर्मपुराण *

अहं हि भगवानीशः स्वयं ज्योतिः सनातनः ।<br>परमात्मा परं ब्रह्म मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते ॥ ५१ ॥मैं ही भगवान्, ईश, स्वयं प्रकाश, सनातन और परमात्मा परम ब्रह्म हूँ, मुझसे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है॥ ५१ ॥
इत्येतत् परमं ज्ञानं युष्माकं कथितं मया।<br>ज्ञात्वा विमुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥ ५२ ॥इस प्रकार यह परम ज्ञान मैंने आप लोगोंसे कहा, इसे जान लेनेसे प्राणी जन्म तथा संसारके बन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ ५२ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥ इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) छठा अध्याय समाप्त हुआ॥ ६॥


सातवाँ अध्याय

ईश्वर (शंकर)-द्वारा अपनी विभूतियोंका वर्णन तथा प्रकृति, महत् आदि चौबीस तत्त्वों, तीन गुणों एवं पशु, पाश और पशुपति आदिका विवेचन

ईश्वर उवाचईश्वर बोले—
शृणुध्वमृषयः सर्वे प्रभावं परमेष्ठिनः ।<br>यं ज्ञात्वा पुरुषो मुक्तो न संसारे पतेत् पुनः ॥ १ ॥ऋषियो! आप सभी परमेष्ठीके प्रभावको सुनें, जिसे जानकर पुरुष मुक्त हो जाता है और फिर संसारमें नहीं गिरता ॥ १ ॥
परात् परतरं ब्रह्म शाश्वतं निष्कलं ध्रुवम्।<br>नित्यानन्दं निर्विकल्पं तद्धाम परमं मम॥ २ ॥<br>अहं ब्रह्मविदां ब्रह्मा स्वयम्भूविश्वतोमुखः ।<br>मायाविनामहं देवः पुराणो हरिरव्ययः ॥ ३ ॥<br>योगिनामस्म्यहं शम्भुः स्त्रीणां देवी गिरीन्द्रजा।<br>आदित्यानामहं विष्णुर्वसूनामस्मि पावकः ॥ ४ ॥<br>रुद्राणां शंकरश्चाहं गरुडः पततामहम् ।<br>ऐरावतो गजेन्द्राणां रामः शस्त्रभृतामहम् ॥ ५ ॥जो परसे परतर, शाश्वत, निष्कल, ध्रुव, नित्यानन्द, निर्विकल्प ब्रह्म है, वह मेरा परम धाम है। मैं ब्रह्मज्ञानियोंमें सर्वतोमुख स्वयम्भू ब्रह्मा हूँ। मायावियोंमें मैं अव्यय पुराण देव हरि हूँ। योगियोंमें मैं शम्भु और स्त्रियोंमें गिरिराज पुत्री पार्वती हूँ। मैं (द्वादश) आदित्योंमें विष्णु तथा (अष्ट) वसुओंमें पावक हूँ। मैं रुद्रोंमें शंकर, उड़नेवाले पक्षियोंमें गरुड, गजेन्द्रोंमें ऐरावत तथा शस्त्रधारियोंमें परशुराम हूँ॥ २-५॥
ऋषीणां च वसिष्ठोऽहं देवानां च शतक्रतुः ।<br>शिल्पिनां विश्वकर्माहं प्रह्लादोऽस्म्यमरद्विषाम् ॥ ६ ॥<br>मुनीनामप्यहं व्यासो गणानां च विनायकः ।<br>वीराणां वीरभद्रोऽहं सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ ७ ॥<br>पर्वतानामहं मेरुर्नक्षत्राणां च चन्द्रमाः ।<br>वज्रं प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमस्म्यहम् ॥ ८ ॥<br>अनन्तो भोगिनां देवः सेनानीनां च पावकः ।<br>आश्रमाणां च गार्हस्थ्यमीश्वराणां महेश्वरः ॥ ९ ॥<br>महाकल्पश्च कल्पानां युगानां कृतमस्म्यहम् ।<br>कुबेरः सर्वयक्षाणां गणेशानां च वीरकः ॥ १० ॥ऋषियोंमें मैं वसिष्ठ, देवताओंमें इन्द्र, शिल्पियोंमें विश्वकर्मा और सुरद्वेषी राक्षसोंमें प्रह्लाद हूँ। मैं मुनियोंमें व्यास, गणोंमें विनायक, वीरोंमें वीरभद्र और सिद्धोंमें कपिल मुनि हूँ। मैं पर्वतोंमें सुमेरु, नक्षत्रोंमें चन्द्रमा, प्रहार करनेवाले शस्त्रोंमें वज्र और व्रतोंमें सत्य व्रत हूँ। मैं सर्पोंमें अनन्तदेव, सेनानियोंमें कार्तिकेय, आश्रमोंमें गृहस्थाश्रम और ईश्वरोंमें महेश्वर हूँ। मैं कल्पोंमें महाकल्प, युगोंमें सत्ययुग, सभी यक्षोंमें कुबेर और गणेश्वरोंमें वीरक हूँ॥ ६-१०॥
प्रजापतीनां दक्षोऽहं निर्ऋतिः सर्वरक्षसाम् ।<br>वायुर्बलवतामस्मि द्वीपानां पुष्करोऽस्म्यहम् ॥ ११ ॥मैं प्रजापतियोंमें दक्ष, सभी राक्षसोंमें निर्ऋति, बलवानोंमें वायु और द्वीपोंमें पुष्कर द्वीप हूँ॥ ११॥
  • अध्याय ७ * २७१

| मृगेन्द्राणां च सिंहोऽहं यन्त्राणां धनुरेव च।<br>वेदानां सामवेदोऽहं यजुषां शतरुद्रियम्॥ १२॥<br>सावित्री सर्वजप्यानां गुह्यानां प्रणवोऽस्म्यहम्।<br>सूक्तानां पौरुषं सूक्तं ज्येष्ठसाम च सामसु॥ १३॥<br>सर्ववेदार्थविदुषां मनुः स्वायम्भुवोऽस्म्यहम्।<br>ब्रह्मावर्तस्तु देशानां क्षेत्राणामविमुक्तकम्॥ १४॥<br>विद्यानामात्मविद्याहं ज्ञानानामैश्वरं परम्।<br>भूतानामस्म्यहं व्योम सत्त्वानां मृत्युरेव च॥ १५॥<br>पाशानामस्म्यहं माया कालः कलयतामहम्।<br>गतीनां मुक्तिरेवाहं परेषां परमेश्वरः॥ १६॥<br>यच्चान्यदपि लोकेऽस्मिन् सत्त्वं तेजोबलाधिकम्।<br>तत्सर्वं प्रतिजानीध्वं मम तेजोविजृम्भितम्॥ १७॥<br>आत्मानः पशवः प्रोक्ताः सर्वे संसारवर्तिनः।<br>तेषां पतिरहं देवः स्मृतः पशुपतिर्बुधैः॥ १८॥<br>मायापाशेन बध्नामि पशूनेतान् स्वलीलया।<br>मामेव मोचकं प्राहुः पशूनां वेदवादिनः॥ १९॥<br>मायापाशेन बद्धानां मोचकोऽन्यो न विद्यते।<br>मामृते परमात्मानं भूताधिपतिमव्ययम्॥ २०॥<br>चतुर्विंशतितत्त्वानि माया कर्म गुणा इति।<br>एते पाशाः पशुपतेः क्लेशाश्च पशुबन्धनाः॥ २१॥<br>मनो बुद्धिरहंकारः खानिलाग्निजलानि भूः।<br>एता प्रकृतयस्त्वष्टौ विकाराश्च तथापरे॥ २२॥<br>श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा घ्राणं चैव तु पञ्चमम्।<br>पायूपस्थं करौ पादौ वाक् चैव दशमी मता॥ २३॥<br>शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च।<br>त्रयोविंशतिरेतानि तत्त्वानि प्राकृतानि तु॥ २४॥<br>चतुर्विंशकमव्यक्तं प्रधानं गुणलक्षणम्।<br>अनादिमध्यनिधनं कारणं जगतः परम्॥ २५॥<br>सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणत्रयमुदाहृतम्।<br>साम्यावस्थितिमेतेषामव्यक्तं प्रकृतिं विदुः॥ २६॥ | मैं मृगेन्द्रोंमें सिंह, यन्त्रोंमें धनुष, वेदोंमें सामवेद और यजुर्मन्त्रोंमें शतरुद्रिय हूँ, मैं जपनीय सभी मन्त्रोंमें सावित्री मन्त्र, गोपनीयोंमें प्रणव, (वैदिक) सूक्तोंमें पुरुषसूक्त, साममन्त्रोंमें ज्येष्ठसाम हूँ। मैं सभी वेदके अर्थको जाननेवाले विद्वानोंमें स्वायम्भुव मनु, देशोंमें ब्रह्मावर्त और क्षेत्रोंमें अविमुक्त (वाराणसी) क्षेत्र हूँ। मैं विद्याओंमें आत्मविद्या, ज्ञानोंमें परम ईश्वरीय ज्ञान, (पञ्च) भूतोंमें आकाश और सत्त्वोंमें मृत्यु¹ हूँ॥ १२–१५॥<br>मैं (बन्धनकारक) पाशोंमें माया, संहार करनेवालोंमें काल, गतियोंमें मुक्ति और उत्कृष्टोंमें परमेश्वर हूँ। इस संसारमें अन्य जो कुछ भी अधिक तेज और बलसे सम्पन्न सत्त्व पदार्थ हैं, उन सबको मेरे ही तेजसे सम्पन्न जानना चाहिये। संसारमें रहनेवाले सभी जीवोंको पशु² कहा गया है, मैं देव उनका पति (स्वामी) हूँ, इसलिये विद्वानोंद्वारा 'पशुपति' कहा जाता हूँ। मैं मायारूपी पाशके द्वारा अपनी लीलासे इन पशुओं (जीवों)-को बन्धनमें डालता हूँ। वेदज्ञ लोग मुझे ही पशुओंको मुक्त करनेवाला मोचक कहते हैं। मायाके पाशसे आबद्ध जीवोंको मुक्त करनेवाला मुझ भूतोंके अधिपति अव्यय परमात्माको छोड़कर अन्य कोई नहीं है॥ १६–२०॥<br>(प्रकृति-महत्-अहंकार आदि) चौबीस तत्त्व, माया, कर्म तथा गुण—ये पशुपतिके पाश और पशुओं (जीवों)-को बन्धनमें डालनेवाले क्लेश हैं। मन, बुद्धि, अहंकार, पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—ये आठ प्रकृति हैं और दूसरे सभी पदार्थ विकार या विकृति हैं। कान, त्वचा, नेत्र, जीभ तथा पाँचवीं नासिका, गुदा, जननेन्द्रिय, हाथ, पैर तथा दसवीं इन्द्रिय वाणी और शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध—ये तेईस तत्त्व प्राकृत अर्थात् प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले हैं॥ २१–२४॥<br>चौबीसवाँ तत्त्व अव्यक्त किंवा प्रधान है, वह गुणोंसे लक्षित होनेवाला आदि, मध्य तथा अन्तसे रहित और जगत्‌का परम कारण है। सत्त्व, रज और तम—ये तीन गुण कहे गये हैं। इन तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाको अव्यक्त प्रकृति जानना चाहिये॥ २५–२६॥ |


१-यहाँ मृत्युसे यमराज या धर्मराजको समझना चाहिये, जो प्राणीमात्रकी अन्तिम गतिके कारण एवं निर्णायक हैं।
२-अज्ञानसे आवृत होनेके कारण जीव पशु हैं।

२८० * कूर्मपुराण *


सत्त्वं ज्ञानं तमोऽज्ञानं रजो मिश्रमुदाहृतम्।
गुणानां बुद्धिवैषम्याद् वैषम्यं कवयो विदुः॥ २७॥

सत्त्वगुणको ज्ञानस्वरूप, तमोगुणको अज्ञानस्वरूप और रजोगुणको मिश्ररूप अर्थात् ज्ञान और अज्ञान दोनोंका मिश्रित रूप कहा गया है। बुद्धिकी विषमतासे गुणोंका भी वैषम्य होता है, ऐसा विद्वान् लोग कहते हैं॥ २७॥

धर्माधर्माविति प्रोक्तौ पाशौ द्वौ बन्धसंज्ञितौ।
मय्यर्पितानि कर्माणि निबन्धाय विमुक्तये॥ २८॥

अविद्यामस्मितां रागं द्वेषं चाभिनिवेशकम्।
क्लेशाख्यानचलान् प्राहुः पाशानात्मनिबन्धनान्॥ २९॥

एतेषामेव पाशानां माया कारणमुच्यते।
मूलप्रकृतिरव्यक्ता सा शक्तिर्मयि तिष्ठति॥ ३०॥

बन्ध नामवाले दो पाशोंको धर्म और अधर्म कहा गया है। मुझे अर्पित किये गये कर्म बन्धनसे मुक्तिके लिये होते हैं। आत्माका बन्धन करनेवाले अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश—इन क्लेश नामवाले पाँच अचल (दीर्घकालतक स्थायी-सा रहनेवाले) तत्त्वोंको पाश कहा गया है। मायाको इन (गाँठों) पाशोंका कारण कहा जाता है। अव्यक्त मूलप्रकृतिरूप शक्ति मुझमें प्रतिष्ठित रहती है॥ २८—३०॥

स एव मूलप्रकृतिः प्रधानं पुरुषोऽपि च।
विकारा महदादीनि देवदेवः सनातनः॥ ३१॥
स एव बन्धः स च बन्धकर्ता
स एव पाशः पशवः स एव।
स वेद सर्वं न च तस्य वेत्ता
तमाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ ३२॥

यह मूल प्रकृति, प्रधान, पुरुष, महत्, अहंकार आदि विकारयुक्त तत्त्व—ये सब देवाधिदेव सनातनके ही रूप हैं। यही (सनातन पुरुष) बन्धन है, यही बन्धनमें डालनेवाला है। यही पाश और यही पशु है। यही सब कुछ जानता है, परंतु इसे जाननेवाला कोई नहीं है। इसे ही आदि पुराणपुरुष कहा जाता है*॥ ३१-३२॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे (ईश्वरगीतासु) सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें (ईश्वरगीताका) सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७॥


आठवाँ अध्याय

महेश्वरका अद्वितीय परमेश्वरके रूपमें निरूपण, सांख्य-सिद्धान्तसे तत्त्वोंका सृष्टिक्रम, महेश्वरके छः अङ्ग, महेश्वरके स्वरूपके ज्ञानसे परमपदकी प्राप्ति

ईश्वर उवाच
अन्यद् गुह्यतमं ज्ञानं वक्ष्ये ब्राह्मणपुंगवाः।
येनासौ तरते जन्तुर्घोरं संसारसागरम्॥ १॥

ईश्वर बोले— श्रेष्ठ ब्राह्मणो! मैं दूसरे गुह्यतम ज्ञानको बताता हूँ, जिससे यह प्राणी घोर संसार-सागरको पार कर लेता है॥ १॥

अहं ब्रह्ममयः शान्तः शाश्वतो निर्मलोऽव्ययः।
एकाकी भगवानुक्तः केवलः परमेश्वरः॥ २॥

मम योनिर्महद् ब्रह्म तत्र गर्भं दधाम्यहम्।
मूलं मायाभिधानं तु ततो जातमिदं जगत्॥ ३॥

प्रधानं पुरुषो ह्यात्मा महान् भूतादिरेव च।
तन्मात्राणि महाभूतानीन्द्रियाणि च जज्ञिरे॥ ४॥

मैं ब्रह्ममय, शान्त, शाश्वत, निर्मल, अव्यय, एकाकी, अद्वितीय परमेश्वर तथा भगवान् कहलाता हूँ। महद्ब्रह्म मेरी योनिरूप है, मैं उसमें मूल माया नामक गर्भ धारण करता हूँ और उससे यह संसार उत्पन्न हुआ है। (उसीसे) प्रधान, पुरुष, आत्मा, महत्तत्त्व, भूतादि (तामस अहंकार), तन्मात्राएँ, पञ्चमहाभूत तथा इन्द्रियाँ उत्पन्न हुईं॥ २—४॥


* यहाँ बन्धन आदिको सनातनपुरुषमें कल्पितमात्र बताकर अद्वैतभावकी प्रतिष्ठा की गयी है।

* अध्याय ८ *

२८१

ततोऽण्डमभवद्धैमं सूर्यकोटिसमप्रभम्।<br>तस्मिन् जज्ञे महाब्रह्मा मच्छक्त्या चोपबृंहितः॥ ५ ॥तदनन्तर करोड़ों सूर्यके समान प्रकाशमान हिरण्मय अण्ड उत्पन्न हुआ। उस अण्डमें मेरी शक्तिसे उपबृंहित महाब्रह्मा उत्पन्न हुए। अन्य भी जो बहुतसे प्राणी हैं, वे सभी मेरे ही स्वरूप हैं। मेरी मायासे मोहित होनेके कारण वे पितामह-स्वरूपको नहीं देख पाते। सभी योनियोंमें जो मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उनकी योनि परा माया है और मुझे ही पितृस्वरूप विद्वान् लोग जानते हैं। इस प्रकार जो मुझे ही बीजरूप पितृस्वरूप प्रभु जानता है, वह सभी लोकोंमें धीर होता है और मोहको प्राप्त नहीं होता॥ ५-८॥
ये चान्ये बहवो जीवा मन्मयाः सर्व एव ते।<br>न मां पश्यन्ति पितरं मायया मम मोहिताः॥ ६ ॥
याश्च योनिषु सर्वासु सम्भवन्ति हि मूर्तयः।<br>तासां माया परा योनिर्मामेव पितरं विदुः॥ ७ ॥
यो मामेवं विजानाति बीजिनं पितरं प्रभुम्।<br>स धीरः सर्वलोकेषु न मोहमधिगच्छति॥ ८ ॥
ईशानः सर्वविद्यानां भूतानां परमेश्वरः।<br>ओङ्कारमूर्तिर्भगवानहं ब्रह्मा प्रजापतिः॥ ९ ॥मैं ही सभी विद्याओंका स्वामी, प्राणियोंका परम ईश्वर, ओङ्कारमूर्ति, प्रजापति भगवान् ब्रह्मा हूँ। जो पुरुष विनष्ट होनेवाले सभी (चराचर) भूतोंमें परमेश्वरको नाशरहित और समभावसे देखता है, वही यथार्थ देखता है। जो पुरुष सबमें समभावसे स्थित परमेश्वरको समानरूपसे देखता है, वह स्वयंद्वारा स्वयंको नष्ट नहीं करता; इस कारण वह परम गति प्राप्त करता है। सात सूक्ष्म तत्त्वों एवं छः अङ्गोंवाले महेश्वरको जानकर प्रधान तथा विनियोगको जाननेवाला परम ब्रह्मको प्राप्त करता है॥ ९-१२॥
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।<br>विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ १० ॥
समं पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।<br>न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥ ११ ॥
विदित्वा सप्त सूक्ष्माणि षडङ्गं च महेश्वरम्।<br>प्रधानविनियोगज्ञः परं ब्रह्माधिगच्छति॥ १२ ॥
सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः<br>स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः।<br>अनन्तशक्तिश्च विभोर्विदित्वा<br>षडाहुरङ्गानि महेश्वरस्य॥ १३॥सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादि ज्ञान, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त-शक्ति तथा अनन्तशक्ति—ये विभु महेश्वरके छः अङ्ग कहे गये हैं। पाँच तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध), मन और आत्मा—ये सात सूक्ष्म तत्त्व कहे गये हैं। जो हेतुरूप प्रकृति है, वह प्रधान है और उससे होनेवाले बन्धनको ही विनियोग कहा जाता है। प्रकृतिमें लीन रहनेवाली जो शक्ति है, उसे वेदोंमें ब्रह्मयोनि और कारणरूप कहा गया है। अद्वितीय, परमेष्ठी, परात्पर, सत्यरूप महेश्वर उसके पुरुष हैं॥ १३-१५॥
तन्मात्राणि मन आत्मा च तानि<br>सूक्ष्माण्याहुः सप्त तत्त्वात्मकानि।<br>या सा हेतुः प्रकृतेः सा प्रधानं<br>बन्धः प्रोक्तो विनियोगोऽपि तेन॥ १४॥
या सा शक्तिः प्रकृतौ लीनरूपा<br>वेदेषूक्ता कारणं ब्रह्मयोनिः।<br>तस्या एकः परमेष्ठी परस्ता-<br>न्महेश्वरः पुरुषः सत्यरूपः॥ १५॥
ब्रह्मा योगी परमात्मा महीयान्<br>व्योमव्यापी वेदवेद्यः पुराणः।<br>एको रुद्रो मृत्युरव्यक्तमेकं<br>बीजं विश्वं देव एकः स एव॥ १६॥वे ही अद्वितीय देव ब्रह्मा, योगी, परमात्मा, महीयान्, व्योमव्यापी, वेदोंद्वारा ज्ञात होने योग्य, पुराण, पुरुष अद्वितीय रुद्र, मृत्यु, अव्यक्त, एक बीज और विश्वरूप हैं॥ १६॥