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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
७४* कूर्मपुराण *
निर्यन्त्रा यन्त्रवाहस्था नन्दिनी भद्रकालिका।<br>आदित्यवर्णा कौमारी मयूरवरवाहिनी ॥ ११३ ॥<br>वृषासनगता गौरी महाकाली सुरार्चिता।<br>अदितिर्नियता रौद्री पद्मगर्भा विवाहना ॥ ११४ ॥<br>विरूपाक्षी लेलिहाना महापुरनिवासिनी।<br>महाफलानवद्याङ्गी कामपूरा विभावरी ॥ ११५ ॥<br>विचित्ररत्नमुकुटा प्रणतार्तिप्रभञ्जिनी।<br>कौशिकी कर्षणी रात्रिस्त्रिदशार्तिविनाशिनी ॥ ११६ ॥<br>बहुरूपा सुरूपा च विरूपा रूपवर्जिता।<br>भक्तार्तिशमनी भव्या भवभावविनाशिनी ॥ ११७ ॥<br>निर्गुणा नित्यविभवा निःसारा निरपत्रपा।<br>यशस्विनी सामगीतिर्भवाङ्गनिलयालया ॥ ११८ ॥<br>दीक्षा विद्याधरी दीप्ता महेन्द्रविनिपातिनी।<br>सर्वातिशायिनी विद्या सर्वसिद्धिप्रदायिनी ॥ ११९ ॥<br>सर्वेश्वरप्रिया तार्क्ष्या समुद्रान्तरवासिनी।<br>अकलङ्का निराधारा नित्यसिद्धा निरामया ॥ १२० ॥<br>कामधेनुर्बृहद्गर्भा धीमती मोहनाशिनी।<br>निःसङ्कल्पा निरातङ्का विनया विनयप्रदा ॥ १२१ ॥<br>ज्वालामालासहस्राढ्या देवदेवी मनोन्मनी।<br>महाभगवती दुर्गा वासुदेवसमुद्भवा ॥ १२२ ॥<br>महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी भक्तिगम्या परावरा।<br>ज्ञानज्ञेया जरातीता वेदान्तविषया गतिः ॥ १२३ ॥<br>दक्षिणा दहना दाह्या सर्वभूतनमस्कृता।<br>योगमाया विभावज्ञा महामाया महीयसी ॥ १२४ ॥<br><br>संध्या सर्वसमुद्भूतिर्ब्रह्मवृक्षाश्रयानतिः।<br>बीजाङ्कुरसमुद्भूतिर्महाशक्तिर्महामतिः ॥ १२५ ॥<br>ख्यातिः प्रज्ञा चितिः संवित् महाभोगीन्द्रशायिनी।<br>विकृतिः शांकरी शास्त्री गणगन्धर्वसेविता ॥ १२६ ॥<br>वैश्वानरी महाशाला देवसेना गुहप्रिया।<br>महारात्रिः शिवानन्दा शचीदुःस्वप्ननाशिनी ॥ १२७ ॥<br>इज्या पूज्या जगद्धात्री दुर्विज्ञेया सुरूपिणी।<br>गुहाम्बिका गुणोत्पत्तिर्महापीठा मरुत्सुता ॥ १२८ ॥<br>हव्यवाहान्तरागादिः हव्यवाहसमुद्भवा।<br>जगद्योनिर्जगन्माता जन्ममृत्युजरातिगा ॥ १२९ ॥<br>बुद्धिमाता बुद्धिमती पुरुषान्तरवासिनी।<br>तरस्विनी समाधिस्था त्रिनेत्रा दिविसंस्थिता ॥ १३० ॥निर्यन्त्रा, यन्त्रवाहस्था, नन्दिनी, भद्रकालिका, आदित्यवर्णा, कौमारी, मयूरवरवाहिनी, वृषासनगता, गौरी, महाकाली, सुरार्चिता, अदिति, नियता, रौद्री, पद्मगर्भा, विवाहना, विरूपाक्षी, लेलिहाना, महापुरनिवासिनी, महाफला, अनवद्याङ्गी, कामपूरा, विभावरी, विचित्ररत्नमुकुटा, प्रणतार्तिप्रभञ्जिनी, कौशिकी, कर्षणी, रात्रि, त्रिदशार्तिविनाशिनी, बहुरूपा, सुरूपा, विरूपा, रूपवर्जिता, भक्तार्तिशमनी, भव्या, भवभावविनाशिनी ॥ ११३—११७ ॥<br><br>निर्गुणा, नित्यविभवा, निःसारा, निरपत्रपा, यशस्विनी, सामगीति, भवाङ्गनिलयालया, दीक्षा, विद्याधरी, दीप्ता, महेन्द्रविनिपातिनी, सर्वातिशायिनी, विद्या, सर्वसिद्धिप्रदायिनी, सर्वेश्वरप्रिया, तार्क्ष्या, समुद्रान्तरवासिनी, अकलंका, निराधारा, नित्यसिद्धा, निरामया, कामधेनु, बृहद्गर्भा, धीमती, मोहनाशिनी, निःसङ्कल्पा, निरातङ्का, विनया, विनयप्रदा, ज्वालामालासहस्राढ्या, देवदेवी, मनोन्मनी, महाभगवती, दुर्गा, वासुदेवसमुद्भवा, महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी, भक्तिगम्या, परावरा, ज्ञानज्ञेया, जरातीता, वेदान्तविषया, गति, दक्षिणा, दहना, दाह्या, सर्वभूतनमस्कृता, योगमाया, विभावज्ञा, महामाया, महीयसी ॥ ११८—१२४ ॥<br><br>संध्या, सर्वसमुद्भूति, ब्रह्मवृक्षाश्रयानति, बीजाङ्कुरसमुद्भूति, महाशक्ति, महामति, ख्याति, प्रज्ञा, चिति, संवित्, महाभोगीन्द्रशायिनी, विकृति, शांकरी, शास्त्री, गणगन्धर्वसेविता, वैश्वानरी, महाशाला, देवसेना, गुहप्रिया, महारात्रि, शिवानन्दा, शची, दुःस्वप्ननाशिनी, इज्या, पूज्या, जगद्धात्री, दुर्विज्ञेया, सुरूपिणी, गुहाम्बिका, गुणोत्पत्ति, महापीठा, मरुत्सुता, हव्यवाहान्तरागादि, हव्यवाहसमुद्भवा, जगद्योनि, जगन्माता, जन्ममृत्युजरातिगा, बुद्धिमाता, बुद्धिमती, पुरुषान्तरवासिनी, तरस्विनी, समाधिस्था, त्रिनेत्रा, दिविसंस्थिता ॥ १२५—१३० ॥
* अध्याय ११ *७५
सर्वेन्द्रियमनोमाता सर्वभूतहृदिस्थिता।<br>संसारतारिणी विद्या ब्रह्मवादिमनोलया ॥ १३१ ॥<br>ब्रह्माणी बृहती ब्राह्मी ब्रह्मभूता भवारणिः।<br>हिरण्मयी महारात्रिः संसारपरिवर्तिका ॥ १३२ ॥<br>सुमालिनी सुरूपा च भाविनी तारिणी प्रभा।<br>उन्मीलनी सर्वसहा सर्वप्रत्ययसाक्षिणी ॥ १३३ ॥<br>सुसौम्या चन्द्रवदना ताण्डवासक्तमानसा।<br>सत्त्वशुद्धिकरी शुद्धिर्मलत्रयविनाशिनी ॥ १३४ ॥<br>जगत्प्रिया जगन्मूर्तिस्त्रिमूर्तिरमृताश्रया।<br>निराश्रया निराहारा निरङ्कुरवनोद्भवा ॥ १३५ ॥<br>चन्द्रहस्ता विचित्राङ्गी स्रग्विणी पद्मधारिणी।<br>परावरविधानज्ञा महापुरुषपूर्वजा ॥ १३६ ॥<br>विद्येश्वरप्रिया विद्या विद्युज्जिह्वा जितश्रमा।<br>विद्यामयी सहस्त्राक्षी सहस्रवदनात्मजा ॥ १३७ ॥सर्वेन्द्रियमनोमाता, सर्वभूतहृदिस्थिता, संसारतारिणी, विद्या, ब्रह्मवादिमनोलया, ब्रह्माणी, बृहती, ब्राह्मी, ब्रह्मभूता, भवारणि, हिरण्मयी, महारात्रि, संसारपरिवर्तिका, सुमालिनी, सुरूपा, भाविनी, तारिणी, प्रभा, उन्मीलनी, सर्वसहा, सर्वप्रत्ययसाक्षिणी, सुसौम्या, चन्द्रवदना, ताण्डवासक्तमानसा, सत्त्वशुद्धिकरी*, शुद्धि, मलत्रयविनाशिनी, जगत्प्रिया, जगन्मूर्ति, त्रिमूर्ति, अमृताश्रया, निराश्रया, निराहारा, निरङ्कुरवनोद्भवा, चन्द्रहस्ता, विचित्राङ्गी, स्रग्विणी, पद्मधारिणी, परावरविधानज्ञा, महापुरुषपूर्वजा, विद्येश्वरप्रिया, विद्या, विद्युज्जिह्वा, जितश्रमा, विद्यामयी, सहस्राक्षी, सहस्रवदनात्मजा ॥ १३१—१३७ ॥
सहस्ररश्मिः सत्त्वस्था महेश्वरपदाश्रया।<br>क्षालिनी सन्मयी व्याप्ता तैजसी पद्मबोधिका ॥ १३८ ॥<br>महामायाश्रया मान्या महादेवमनोरमा।<br>व्योमलक्ष्मीः सिंहस्था चेकितानामितप्रभा ॥ १३९ ॥<br>वीरेश्वरी विमानस्था विशोका शोकनाशिनी।<br>अनाहता कुण्डलिनी नलिनी पद्मवासिनी ॥ १४० ॥<br>सदानन्दा सदाकीर्तिः सर्वभूताश्रयस्थिता।<br>वाग्देवता ब्रह्मकला कलातीता कलारणिः ॥ १४१ ॥<br>ब्रह्मश्रीर्ब्रह्महृदया ब्रह्मविष्णुशिवप्रिया।<br>व्योमशक्तिः क्रियाशक्तिर्ज्ञानशक्तिः परागतिः ॥ १४२ ॥<br>क्षोभिका बन्धिका भेद्या भेदाभेदविवर्जिता।<br>अभिन्नाभिन्नसंस्थाना वंशिनी वंशहारिणी ॥ १४३ ॥<br>गुह्यशक्तिर्गुणातीता सर्वदा सर्वतोमुखी।<br>भगिनी भगवत्पत्नी सकला कालकारिणी ॥ १४४ ॥सहस्ररश्मि, सत्त्वस्था, महेश्वरपदाश्रया, क्षालिनी, सन्मयी, व्याप्ता, तैजसी, पद्मबोधिका, महामायाश्रया, मान्या, महादेवमनोरमा, व्योमलक्ष्मी, सिंहस्था, चेकिताना, अमितप्रभा, वीरेश्वरी, विमानस्था, विशोका, शोकनाशिनी, अनाहता, कुण्डलिनी, नलिनी, पद्मवासिनी, सदानन्दा, सदाकीर्ति, सर्वभूताश्रयस्थिता, वाग्देवता, ब्रह्मकला, कलातीता, कलारणि, ब्रह्मश्री, ब्रह्महृदया, ब्रह्मविष्णुशिवप्रिया, व्योमशक्ति, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति, परागति, क्षोभिका, बन्धिका, भेद्या, भेदाभेदविवर्जिता, अभिन्ना, अभिन्नसंस्थाना, वंशिनी, वंशहारिणी, गुह्यशक्ति, गुणातीता, सर्वदा, सर्वतोमुखी, भगिनी, भगवत्पत्नी, सकला, कालकारिणी ॥ १३८—१४४ ॥
सर्ववित् सर्वतोभद्रा गुह्यातीता गुहारणिः।<br>प्रक्रिया योगमाता च गङ्गा विश्वेश्वरेश्वरी ॥ १४५ ॥<br>कपिला कापिला कान्ता कनकाभा कलान्तरा।<br>पुण्या पुष्करिणी भोक्त्री पुरंदरपुरस्सरा ॥ १४६ ॥<br>पोषणी परमैश्वर्यभूतिदा भूतिभूषणा।<br>पञ्चब्रह्मसमुत्पत्तिः परमार्थार्थविग्रहा ॥ १४७ ॥<br>धर्मोदया भानुमती योगिज्ञेया मनोजवा।<br>मनोहरा मनोरक्षा तापसी वेदरूपिणी ॥ १४८ ॥सर्ववित्, सर्वतोभद्रा, गुह्यातीता, गुहारणि, प्रक्रिया, योगमाता, गङ्गा, विश्वेश्वरेश्वरी, कपिला, कापिला, कान्ता, कनकाभा, कलान्तरा, पुण्या, पुष्करिणी, भोक्त्री, पुरंदरपुरस्सरा, पोषणी, परमैश्वर्यभूतिदा, भूतिभूषणा, पञ्चब्रह्मसमुत्पत्ति, परमार्थार्थविग्रहा, धर्मोदया, भानुमती, योगिज्ञेया, मनोजवा, मनोहरा, मनोरक्षा, तापसी, वेदरूपिणी ॥ १४५—१४८ ॥

* सत्त्व (चित्त)।

७६* कूर्मपुराण *
वेदशक्तिर्वेदमाता वेदविद्याप्रकाशिनी ।<br>योगेश्वरेश्वरी माता महाशक्तिर्मनोमयी ॥ १४९ ॥<br>विश्वावस्था वियन्मूर्तिर्विद्युन्माला विहायसी ।<br>किंनरी सुरभी वन्द्या नन्दिनी नन्दिवल्लभा ॥ १५० ॥<br>भारती परमानन्दा परापरविभेदिका ।<br>सर्वप्रहरणोपेता काम्या कामेश्वरेश्वरी ॥ १५१ ॥<br>अचिन्त्याचिन्त्यविभवा हृल्लेखा कनकप्रभा ।<br>कूष्माण्डी धनरत्नाढ्या सुगन्धा गन्धदायिनी ॥ १५२ ॥<br>त्रिविक्रमपदोद्भूता धनुष्पाणिः शिवोदया ।<br>सुदुर्लभा धनाध्यक्षा धन्या पिङ्गललोचना ॥ १५३ ॥<br>शान्तिः प्रभावती दीप्तिः पङ्कजायतलोचना ।<br>आद्या हृत्कमलोद्भूता गवां माता रणप्रिया ॥ १५४ ॥<br>सत्क्रिया गिरिजा शुद्धा नित्यपुष्टा निरन्तरा ।<br>दुर्गा कात्यायनी चण्डी चर्चिका शान्तविग्रहा ॥ १५५ ॥<br>हिरण्यवर्णा रजनी जगद्यन्त्रप्रवर्तिका ।<br>मन्दराद्रिनिवासा च शारदा स्वर्णमालिनी ॥ १५६ ॥<br>रत्नमाला रत्नगर्भा पृथ्वी विश्वप्रमाथिनी ।<br>पद्मानना पद्मनिभा नित्यतुष्टामृतोद्भवा ॥ १५७ ॥<br>धुन्वती दुःप्रकम्प्या च सूर्यमाता दृषद्वती ।<br>महेन्द्रभगिनी मान्या वरेण्या वरदर्पिता ॥ १५८ ॥<br>कल्याणी कमला रामा पञ्चभूता वरप्रदा ।<br>वाच्या वरेश्वरी वन्द्या दुर्जया दुरतिक्रमा ॥ १५९ ॥<br>कालरात्रिमहावेगा वीरभद्रप्रिया हिता ।<br>भद्रकाली जगन्माता भक्तानां भद्रदायिनी ॥ १६० ॥<br>कराला पिङ्गलाकारा नामभेदामहामदा ।<br>यशस्विनी यशोदा च षडध्वपरिवर्तिका ॥ १६१ ॥<br>शङ्खिनी पद्मिनी सांख्या सांख्ययोगप्रवर्तिका ।<br>चैत्रा संवत्सरारूढा जगत्सम्पूरणीन्द्रजा ॥ १६२ ॥<br>शुम्भारिः खेचरी स्वस्था कम्बुग्रीवा कलिप्रिया ।<br>खगध्वजा खगारूढा परार्थ्या परमालिनी ॥ १६३ ॥<br>ऐश्वर्यवर्त्मनिलया विरक्ता गरुडासना ।<br>जयन्ती हृद्गुहा रम्या गह्वरेष्ठा गणाग्रणीः ॥ १६४ ॥<br>संकल्पसिद्धा साम्यस्था सर्वविज्ञानदायिनी ।<br>कलिकल्मषहन्त्री च गुह्योपनिषदुत्तमा ॥ १६५ ॥<br><br>निष्ठा दृष्टिः स्मृतिर्व्याप्तिः पुष्टिस्तुष्टिः क्रियावती ।<br>विश्वामरेश्वरेशाना भुक्तिर्मुक्तिः शिवामृता ॥ १६६ ॥वेदशक्ति, वेदमाता, वेदविद्याप्रकाशिनी, योगेश्वरेश्वरी, माता, महाशक्ति, मनोमयी, विश्वावस्था, वियन्मूर्ति, विद्युन्माला, विहायसी, किंनरी, सुरभी, वन्द्या, नन्दिनी, नन्दिवल्लभा, भारती, परमानन्दा, परापरविभेदिका, सर्वप्रहरणोपेता, काम्या, कामेश्वरेश्वरी ॥ १४९-१५१॥<br><br>अचिन्त्या, अचिन्त्यविभवा, हृल्लेखा, कनकप्रभा, कूष्माण्डी, धनरत्नाढ्या, सुगन्धा, गन्धदायिनी, त्रिविक्रमपदोद्भूता, धनुष्पाणि, शिवोदया, सुदुर्लभा, धनाध्यक्षा, धन्या, पिङ्गललोचना, शान्ति, प्रभावती, दीप्ति, पङ्कजायतलोचना, आद्या, हृत्कमलोद्भूता, गवां माता (गौओंकी माता), रणप्रिया, सत्क्रिया, गिरिजा, शुद्धा, नित्यपुष्टा, निरन्तरा, दुर्गा, कात्यायनी, चण्डी, चर्चिका, शान्तविग्रहा, हिरण्यवर्णा, रजनी, जगद्यन्त्रप्रवर्तिका, मन्दराद्रिनिवासा, शारदा, स्वर्णमालिनी, रत्नमाला, रत्नगर्भा, पृथ्वी, विश्वप्रमाथिनी, पद्मानना, पद्मनिभा, नित्यतुष्टा, अमृतोद्भवा, धुन्वती, दुःप्रकम्प्या, सूर्यमाता, दृषद्वती, महेन्द्रभगिनी, मान्या, वरेण्या, वरदर्पिता ॥ १५२-१५८॥<br><br>कल्याणी, कमला, रामा, पञ्चभूता, वरप्रदा, वाच्या, वरेश्वरी, वन्द्या, दुर्जया, दुरतिक्रमा, कालरात्रि, महावेगा, वीरभद्रप्रिया, हिता, भद्रकाली, जगन्माता, भक्तानां भद्रदायिनी (भक्तोंका कल्याण करनेवाली), कराला, पिङ्गलाकारा, नामभेदा, अमहामदा, यशस्विनी, यशोदा, षडध्वपरिवर्तिका, शङ्खिनी, पद्मिनी, सांख्या, सांख्ययोगप्रवर्तिका, चैत्रा, संवत्सरारूढा, जगत्सम्पूरणीन्द्रजा, शुम्भारि, खेचरी, स्वस्था, कम्बुग्रीवा, कलिप्रिया, खगध्वजा, खगारूढा, परार्थ्या, परमालिनी, ऐश्वर्यवर्त्मनिलया, विरक्ता, गरुडासना, जयन्ती, हृद्गुहा, रम्या, गह्वरेष्ठा, गणाग्रणी, संकल्पसिद्धा, साम्यस्था, सर्वविज्ञानदायिनी, कलिकल्मषहन्त्री, गुह्योपनिषत्, उत्तमा ॥ १५९-१६५॥<br><br>निष्ठा, दृष्टि, स्मृति, व्याप्ति, पुष्टि, तुष्टि, क्रियावती, विश्वामरेश्वरेशाना, भुक्ति, मुक्ति, शिवा, अमृता ॥ १६६॥
*अध्याय ११ *७७
लोहिता सर्पमाला च भीषणी वनमालिनी ।<br>अनन्तशयनानन्या नरनारायणोद्भवा ॥ १६७॥<br>नृसिंही दैत्यमथनी शङ्खचक्रगदाधरा ।<br>संकर्षणसमुत्पत्तिरम्बिकापादसंश्रया ॥ १६८॥<br>महाज्वाला महामूर्तिः सुमूर्तिः सर्वकामधुक् ।<br>सुप्रभा सुस्तना गौरी धर्मकामार्थमोक्षदा ॥ १६९॥<br>भ्रूमध्यनिलया पूर्वा पुराणपुरुषाणिः ।<br>महाविभूतिदा मध्या सरोजनयना समा ॥ १७०॥<br>अष्टादशभुजानाद्या नीलोत्पलदलप्रभा ।<br>सर्वशक्त्यासनाारूढा धर्माधर्मार्थवर्जिता ॥ १७१॥<br>वैराग्यज्ञाननिरता निरालोका निरिन्द्रिया ।<br>विचित्रगहनाधारा शाश्वतस्थानवासिनी ॥ १७२॥<br>स्थानेश्वरी निरानन्दा त्रिशूलवरधारिणी ।<br>अशेषदेवतामूर्तिर्देवता वरदेवता ।<br>गणाम्बिका गिरेः पुत्री निशुम्भविनिपातिनी ॥ १७३॥लोहिता, सर्पमाला, भीषणी, वनमालिनी अनन्तशयना, अनन्या, नरनारायणोद्भवा, नृसिंही, दैत्यमथनी, शङ्खचक्रगदाधरा, संकर्षणसमुत्पत्ति, अम्बिकापदसंश्रया, महाज्वाला, महामूर्ति, सुमूर्ति, सर्वकामधुक्, सुप्रभा, सुस्तना, गौरी, धर्मकामार्थमोक्षदा, भ्रूमध्यनिलया, पूर्वा, पुराणपुरुषाणि, महाविभूतिदा, मध्या, सरोजनयना, समा, अष्टादशभुजा, अनाद्या, नीलोत्पलदलप्रभा, सर्वशक्त्यासनाारूढा, धर्माधर्मार्थवर्जिता, वैराग्यज्ञाननिरता, निरलोका, निरिन्द्रिया, विचित्रगहनाधारा, शाश्वतस्थानवासिनी, स्थानेश्वरी, निरानन्दा, त्रिशूलवरधारिणी, अशेषदेवतामूर्ति, देवता, वरदेवता, गणाम्बिका, गिरेः पुत्री (गिरिपुत्री), निशुम्भविनिपातिनी ॥ १६७-१७३ ॥
अवर्णा वर्णरहिता निवर्णा बीजसम्भवा ।<br>अनन्तवर्णानन्यस्था शंकरी शान्तमानसा ॥ १७४॥<br>अगोत्रा गोमती गोप्त्री गुह्यरूपा गुणोत्तरा ।<br>गौर्गीर्गव्यप्रिया गौणी गणेशवरनमस्कृता ॥ १७५॥<br>सत्यमात्रा सत्यसंधा त्रिसंध्या संधिवर्जिता ।<br>सर्ववादाश्रया संख्या सांख्ययोगसमुद्भव ॥ १७६॥<br>असंख्येयाप्रमेयाख्या शून्या शुद्धकुलोद्भवा ।<br>बिन्दुनादसमुत्पत्तिः शम्भुवामा शशिप्रभा ॥ १७७॥<br>विसङ्गा भेदरहिता मनोज्ञा मधुसूदनी ।<br>महाश्रीः श्रीसमुत्पत्तिस्तमःपारेप्रतिष्ठिता ॥ १७८॥<br>त्रितत्त्वमाता त्रिविधा सुसूक्ष्मपदसंश्रया ।<br>शान्त्यतीता मलातीता निर्विकारा निराश्रया ॥ १७९॥<br>शिवाख्या चित्तनिलया शिवज्ञानस्वरूपिणी ।<br>दैत्यदानवनिर्मात्री काश्यपी कालकल्पिका ॥ १८०॥अवर्णा, वर्णरहिता, निवर्णा, बीजसम्भवा, अनन्तवर्णा, अनन्यस्था, शंकरी, शान्तमानसा, अगोत्रा, गोमती, गोप्त्री, गुह्यरूपा, गुणोत्तरा, गौः (गौ), गीः, गव्यप्रिया, गौणी, गणेश्वरनमस्कृता, सत्यमात्रा, सत्यसंधा, त्रिसंध्या, संधिवर्जिता, सर्ववादाश्रया, संख्या, सांख्ययोगसमुद्भवा, असंख्येया, अप्रमेयाख्या, शून्या, शुद्धकुलोद्भवा, बिन्दुनादसमुत्पत्ति, शम्भुवामा, शशिप्रभा, विसङ्गा, भेदरहिता, मनोज्ञा, मधुसूदनी, महाश्रीः (महाश्री) श्रीसमुत्पत्ति, तमःपारेप्रतिष्ठिता, त्रितत्त्वमाता, त्रिविधा, सुसूक्ष्मपदसंश्रया, शान्त्यतीता, मलातीता, निर्विकारा, निराश्रया, शिवाख्या, चित्तनिलया, शिवज्ञानस्वरूपिणी, दैत्यदानवनिर्मात्री, काश्यपी, कालकल्पिका ॥ १७४-१८० ॥
शास्त्रयोनिः क्रियामूर्तिश्चतुर्वर्गप्रदर्शिका ।<br>नारायणी नरोद्भूतिः कौमुदी लिङ्गधारिणी ॥ १८१॥<br>कामुकी ललिता भावा परापरविभूतिदा ।<br>परान्तजातमहिमा बडवा वामलोचना ॥ १८२॥<br>सुभद्रा देवकी सीता वेदवेदाङ्गपारगा ।<br>मनस्विनी मन्युमाता महामन्युसमुद्भवा ॥ १८३॥<br>अमृत्युरमृता स्वाहा पुरुहूता पुरुष्टुता ।<br>अशोच्या भिन्नविषया हिरण्यरजतप्रिया ॥ १८४॥शास्त्रयोनि, क्रियामूर्ति, चतुर्वर्गप्रदर्शिका, नारायणी, नरोद्भूति, कौमुदी, लिंगधारिणी, कामुकी, ललिता, भावा, परापरविभूतिदा, परान्तजातमहिमा, बडवा, वामलोचना, सुभद्रा, देवकी, सीता, वेदवेदाङ्गपारगा, मनस्विनी, मन्युमाता, महामन्युसमुद्भवा, अमृत्यु, अमृता, स्वाहा, पुरुहूता, पुरुष्टुता, अशोच्या, भिन्नविषया, हिरण्यरजतप्रिया ॥ १८१-१८४ ॥

७८ * कूर्मपुराण *


| हिरण्या राजती हैमी हेमाभरणभूषिता।<br>विभ्राजमाना दुर्जेया ज्योतिष्टोमफलप्रदा ॥ १८५ ॥<br>महानिद्रासमुद्भूतिरनिद्रा सत्यदेवता।<br>दीर्घा ककुद्मिनी हृद्या शान्तिदा शान्तिवर्धिनी ॥ १८६ ॥<br>लक्ष्यादिशक्तिजननी शक्तिचक्रप्रवर्तिका।<br>त्रिशक्तिजननी जन्या षडूर्म्मिपरिवर्जिता ॥ १८७ ॥<br>सुधामा कर्मकरणी युगान्तदहनात्मिका।<br>संकर्षणी जगद्धात्री कामयोनिः किरीटिनी ॥ १८८ ॥<br>ऐन्द्री त्रैलोक्यनमिता वैष्णवी परमेश्वरी।<br>प्रद्युम्नदयिता दान्ता युग्मदृष्टिस्त्रिलोचना ॥ १८९ ॥<br>मदोत्कटा हंसगतिः प्रचण्डा चण्डविक्रमा।<br>वृषावेशा वियन्माता विन्ध्यपर्वतवासिनी ॥ १९० ॥<br>हिमवन्मेरुनिलया कैलासगिरिवासिनी।<br>चाणूरहन्तृतनया नीतिज्ञा कामरूपिणी ॥ १९१ ॥<br>वेदविद्याव्रतस्नाता धर्मशीलानिलाशना।<br>वीरभद्रप्रिया वीरा महाकालसमुद्भवा ॥ १९२ ॥<br>विद्याधरप्रिया सिद्धा विद्याधरनिराकृतिः।<br>आप्यायनी हरन्ती च पावनी पोषणी खिला ॥ १९३ ॥<br>मातृका मन्मथोद्भूता वारिजा वाहनप्रिया।<br>करीषिणी सुधावाणी वीणावादनतत्परा ॥ १९४ ॥<br>सेविता सेविका सेव्या सिनीवाली गरुत्मती।<br>अरुन्धती हिरण्याक्षी मृगाङ्का मानदायिनी ॥ १९५ ॥<br>वसुप्रदा वसुमती वसोर्धारा वसुंधरा।<br>धाराधरा वरारोहा वरावरसहस्रदा ॥ १९६ ॥<br>श्रीफला श्रीमती श्रीशा श्रीनिवासा शिवप्रिया।<br>श्रीधरा श्रीकरी कल्या श्रीधरार्धशरीरिणी ॥ १९७ ॥<br>अनन्तदृष्टिरक्षुद्रा धात्रीशा धनदप्रिया।<br>निहन्त्री दैत्यसङ्घानां सिंहिका सिंहवाहना ॥ १९८ ॥<br>सुषेणा चन्द्रनिलया सुकीर्तिश्छिन्नसंशया।<br>रसज्ञा रसदा रामा लेलिहानामृतस्रवा ॥ १९९ ॥<br>नित्योदिता स्वयंज्योतिरुत्सुका मृतजीवनी।<br>वज्रदण्डा वज्रजिह्वा वैदेही वज्रविग्रहा ॥ २०० ॥<br>मङ्गल्या मङ्गला माला मलिना मलहारिणी।<br>गान्धर्वी गारुडी चान्द्री कम्बलाश्वतरप्रिया ॥ २०१ ॥<br>सौदामिनी जनानन्दा भुकुटीकुटिलानना।<br>कर्णिकारकरा कक्ष्या कंसप्राणापहारिणी ॥ २०२ ॥<br>युगंधरा युगावर्ता त्रिसंध्या हर्षवर्धिनी।<br>प्रत्यक्षदेवता दिव्या दिव्यगन्धा दिवापरा ॥ २०३ ॥ | हिरण्या, राजती, हैमी, हेमाभरणभूषिता, विभ्राजमाना, दुर्जेया, ज्योतिष्टोमफलप्रदा, महानिद्रासमुद्भूति, अनिद्रा, सत्यदेवता, दीर्घा, ककुद्मिनी, हृद्या, शान्तिदा, शान्तिवर्धिनी, लक्ष्यादिशक्तिजननी, शक्तिचक्रप्रवर्तिका, त्रिशक्ति-जननी, जन्या, षडूर्म्मिपरिवर्जिता, सुधामा, कर्मकरणी, युगान्तदहनात्मिका, संकर्षणी, जगद्धात्री, कामयोनि, किरीटिनी, ऐन्द्री, त्रैलोक्यनमिता, वैष्णवी, परमेश्वरी, प्रद्युम्नदयिता, दान्ता, युग्मदृष्टि, त्रिलोचना ॥ १८५–१८९ ॥<br><br>मदोत्कटा, हंसगति, प्रचण्डा, चण्डविक्रमा, वृषावेशा, वियन्माता, विन्ध्यपर्वतवासिनी, हिमवन्मेरुनिलया, कैलासगिरिवासिनी, चाणूरहन्तृतनया, नीतिज्ञा, कामरूपिणी, वेदविद्याव्रतस्नाता, धर्मशीला, अनिलाशना, वीरभद्रप्रिया, वीरा, महाकालसमुद्भवा, विद्याधरप्रिया, सिद्धा, विद्याधरनिराकृति, आप्यायनी, हरन्ती, पावनी, पोषणी, खिला, मातृका, मन्मथोद्भूता, वारिजा, वाहनप्रिया, करीषिणी, सुधावाणी, वीणावादनतत्परा, सेविता, सेविका, सेव्या, सिनीवाली, गरुत्मती, अरुन्धती, हिरण्याक्षी, मृगाङ्का, मानदायिनी, वसुप्रदा, वसुमती, वसोर्धारा, वसुंधरा, धाराधरा, वरारोहा, वरावरसहस्रदा ॥ १९०–१९६ ॥<br><br>श्रीफला, श्रीमती, श्रीशा, श्रीनिवासा, शिवप्रिया, श्रीधरा, श्रीकरी, कल्या, श्रीधरार्धशरीरिणी, अनन्तदृष्टि, अक्षुद्रा, धात्रीशा, धनदप्रिया, दैत्यसंघानां निहन्त्री (दैत्यसंघनिहन्त्री), सिंहिका, सिंहवाहना, सुषेणा, चन्द्रनिलया, सुकीर्ति, छिन्नसंशया, रसज्ञा, रसदा, रामा, लेलिहाना, अमृतस्रवा, नित्योदिता, स्वयंज्योति, उत्सुका, मृतजीवनी, वज्रदण्डा, वज्रजिह्वा, वैदेही, वज्रविग्रहा, मङ्गल्या, मङ्गला, माला, मलिना, मलहारिणी, गान्धर्वी, गारुडी, चान्द्री, कम्बलाश्वतरप्रिया ॥ १९७–२०१ ॥<br><br>सौदामिनी, जनानन्दा, भुकुटीकुटिलानना, कर्णिकारकरा, कक्ष्या, कंसप्राणापहारिणी, युगंधरा, युगावर्ता, त्रिसंध्या, हर्षवर्धिनी, प्रत्यक्षदेवता, दिव्या, दिव्यगन्धा, दिवापरा ॥ २०२–२०३ ॥ |

* अध्याय ११ *७९
शक्रासनगता शाक्री साध्वी नारी शवासना।<br>इष्टा विशिष्टा शिष्टेष्टा शिष्टाशिष्टप्रपूजिता ॥ २०४ ॥<br>शतरूपा शतावर्ती विनता सुरभिः सुरा।<br>सुरेन्द्रमाता सुद्युम्ना सुषुम्ना सूर्यसंस्थिता ॥ २०५ ॥<br>समीक्ष्या सत्प्रतिष्ठा च निवृत्तिर्ज्ञानपारगा।<br>धर्मशास्त्रार्थकुशला धर्मज्ञा धर्मवाहना ॥ २०६ ॥शक्रासनगता, शाक्री, साध्वी, नारी, शवासना, इष्टा, विशिष्टा, शिष्टेष्टा, शिष्टाशिष्टप्रपूजिता, शतरूपा, शतावर्ता, विनता, सुरभि, सुरा, सुरेन्द्रमाता, सुद्युम्ना, सुषुम्ना, सूर्यसंस्थिता, समीक्ष्या, सत्प्रतिष्ठा, निवृत्ति, ज्ञानपारगा, धर्मशास्त्रार्थकुशला, धर्मज्ञा, धर्मवाहना ॥ २०४-२०६ ॥
धर्माधर्मविनिर्मात्री धार्मिकाणां शिवप्रदा।<br>धर्मशक्तिर्धर्ममयी विधर्मा विश्वधर्मिणी ॥ २०७ ॥<br>धर्मान्तरा धर्ममेघा धर्मपूर्वा धनावहा।<br>धर्मोपदेष्ट्री धर्मात्मा धर्मगम्या धराधरा ॥ २०८ ॥<br>कापाली शाकला मूर्तिः कला कलितविग्रहा।<br>सर्वशक्तिविनिर्मुक्ता सर्वशक्त्याश्रयाश्रया ॥ २०९ ॥<br>सर्वा सर्वेश्वरी सूक्ष्मा सुसूक्ष्मा ज्ञानरूपिणी।<br>प्रधानपुरुषेशेशा महादेवैकसाक्षिणी।<br>सदाशिवा वियन्मूर्तिर्विश्वमूर्तिरमूर्तिका ॥ २१० ॥धर्माधर्मविनिर्मात्री, धार्मिकाणां शिवप्रदा (धार्मिकोंका कल्याण करनेवाली), धर्मशक्ति, धर्ममयी, विधर्मा, विश्वधर्मिणी, धर्मान्तरा, धर्ममेघा, धर्मपूर्वा, धनावहा, धर्मोपदेष्ट्री, धर्मात्मा, धर्मगम्या, धराधरा, कापाली, शाकला, मूर्ति, कला, कलितविग्रहा, सर्वशक्तिविनिर्मुक्ता, सर्वशक्त्याश्रयाश्रया, सर्वा, सर्वेश्वरी, सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, ज्ञानरूपिणी, प्रधानपुरुषेशेशा, महादेवैकसाक्षिणी, सदाशिवा, वियन्मूर्ति, विश्वमूर्ति तथा अमूर्तिका—(के नामसे प्रसिद्ध) हैं॥ २०७-२१० ॥
एवं नाम्नां सहस्रेण स्तुत्वासौ हिमवान् गिरिः।<br>भूयः प्रणम्य भीतात्मा प्रोवाचेदं कृताञ्जलिः ॥ २११ ॥इस प्रकार हजार नामोंसे (देवीकी) स्तुति करके वे भयभीत हिमवान् पर्वत पुनः प्रणाम कर हाथ जोड़ते हुए इस प्रकार बोले— ॥ २११ ॥
यदेतदैश्वरं रूपं घोरं ते परमेश्वरि।<br>भीतोऽस्मि साम्प्रतं दृष्ट्वा रूपमन्यत् प्रदर्शय ॥ २१२ ॥हे परमेश्वरि ! यह जो आपका घोर ऐश्वर (विराट्)-रूप है, उसे देखकर मैं इस समय भयभीत हो गया हूँ, आप अपना दूसरा (सौम्य) रूप मुझे दिखायें। उस (हिमवान्) पर्वतके द्वारा ऐसा कहे जानेपर उन देवी पार्वती ने अपने उस विराट् रूपको समेटकर दूसरा (सौम्य) रूप उन्हें दिखलाया ॥ २१२-२१३ ॥
एवमुक्ताथ सा देवी तेन शैलेन पार्वती।<br>संहृत्य दर्शयामास स्वरूपमपरं पुनः ॥ २१३ ॥<br>नीलोत्पलदलप्रख्यं नीलोत्पलसुगन्धिकम्।<br>द्विनेत्रं द्विभुजं सौम्यं नीलालकविभूषितम् ॥ २१४ ॥(देवीका वह रूप) नीले कमलदलके समान (नीलवर्णवाला), नीलकमलके समान सुगन्धियुक्त, दो नेत्र एवं दो भुजावाला, सौम्य, नीले अलकोंसे विभूषित,
रक्तपादाम्बुजतलं सुरक्तकरपल्लवम्।<br>श्रीमद् विशालसंवृत्तललाटतिलकोज्ज्वलम् ॥ २१५ ॥रक्तकमलके समान चरणतलवाला, सुन्दर लाल पल्लवके समान हाथवाला, श्रीयुक्त (वह रूप) विशाल एवं प्रशस्त ललाटपर लगे तिलकसे प्रफुल्लित (था)। (उसके) सभी अङ्ग अत्यन्त कोमल, सुन्दर तथा भूषणोंसे आभूषित थे। (उन देवीने) स्वर्णनिर्मित विशाल मालाको अपने
भूषितं चारुसर्वाङ्गं भूषणैरतिकोमलम्।<br>दधानमुरसा मालां विशालां हेमनिर्मिताम् ॥ २१६ ॥वक्षःस्थलपर धारण कर रखा था। सुन्दर बिम्बफलके समान (रक्त) ओठ मन्द मधुर मुसकानयुक्त था। (चरणोंमें धारण किये) नूपुरोंसे ध्वनि निकल रही थी।
ईषत्स्मितं सुबिम्बोष्ठं नूपुरारावसंयुतम्।<br>प्रसन्नवदनं दिव्यमनन्तमहिमास्पदम् ॥ २१७ ॥(देवीका वह रूप) प्रसन्न मुखवाला तथा दिव्य एवं अनन्त महिमामें प्रतिष्ठित था ॥ २१४-२१७ ॥

८० * कूर्मपुराण *


| तदीदृशं समालोक्य स्वरूपं शैलसत्तमः।<br>भीतिं संत्यज्य हृष्टात्मा बभाषे परमेश्वरीम् ॥ २१८॥<br><br>हिमवानुवाच<br><br>अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं तपः।<br>यन्मे साक्षात्त्वमव्यक्ता प्रसन्ना दृष्टिगोचरा ॥ २१९ ॥<br><br>त्वया सृष्टं जगत् सर्वं प्रधानाद्यं त्वयि स्थितम्।<br>त्वय्येव लीयते देवि त्वमेव च परा गतिः ॥ २२० ॥<br><br>वदन्ति केचित् त्वामेव प्रकृतिं प्रकृतेः पराम्।<br>अपरे परमार्थज्ञाः शिवेति शिवसंश्रये ॥ २२१ ॥<br><br>त्वयि प्रधानं पुरुषो महान् ब्रह्मा तथेश्वरः।<br>अविद्या नियतिर्माया कलाद्याः शतशोऽभवन् ॥ २२२ ॥<br><br>त्वं हि सा परमा शक्तिरनन्ता परमेष्ठिनी।<br>सर्वभेदविनिर्मुक्ता सर्वभेदाश्रया निजा ॥ २२३ ॥<br><br>त्वामधिष्ठाय योगेशि महादेवो महेश्वरः।<br>प्रधानाद्यं जगत् कृत्स्नं करोति विकरोति च ॥ २२४॥<br><br>त्वयैव संगतो देवः स्वमानन्दं समश्नुते।<br>त्वमेव परमानन्दस्त्वमेवानन्ददायिनी ॥ २२५ ॥<br><br>त्वमक्षरं परं व्योम महज्ज्योतिर्निरञ्जनम्।<br>शिवं सर्वगतं सूक्ष्मं परं ब्रह्म सनातनम् ॥ २२६ ॥<br><br>त्वं शक्रः सर्वदेवानां ब्रह्मा ब्रह्मविदामसि।<br>वायुर्बलवतां देवि योगिनां त्वं कुमारकः ॥ २२७ ॥<br><br>ऋषीणां च वसिष्ठस्त्वं व्यासो वेदविदामसि।<br>सांख्यानां कपिलो देवो रुद्राणामसि शंकरः ॥ २२८ ॥<br><br>आदित्यानामुपेन्द्रस्त्वं वसूनां चैव पावकः।<br>वेदानां सामवेदस्त्वं गायत्री छन्दसामसि ॥ २२९ ॥<br><br>अध्यात्मविद्या विद्यानां गतीनां परमा गतिः।<br>माया त्वं सर्वशक्तीनां कालः कलयतामसि ॥ २३० ॥<br><br>ओङ्कारः सर्वगुह्यानां वर्णानां च द्विजोत्तमः।<br>आश्रमाणां च गार्हस्थ्यमीश्वराणां महेश्वरः ॥ २३१ ॥ | पर्वतश्रेष्ठ हिमवान् देवीके इस प्रकारके (सौम्य) स्वरूपको देखकर भयका परित्यागकर प्रसन्न-मन होकर परमेश्वरीसे कहने लगे— ॥ २१८॥<br><br>हिमवान् बोले—मेरा जन्म लेना आज सफल हो गया, आज मेरा तप सफल हो गया, जो मुझे अव्यक्तस्वरूपा आप प्रसन्न होकर दृष्टिगोचर हुई हैं। देवि ! आपके द्वारा सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि हुई है, आपमें प्रधानादि प्रतिष्ठित हैं और आपमें ही (वह सब) लीन भी हो जाता है। आप ही परम गति भी हैं। शिवके आश्रयमें रहनेवाली देवि ! कुछ लोग आपको ही प्रकृति तथा प्रकृतिसे परे कहते हैं और दूसरे परमार्थको जाननेवाले आपको शिवा कहते हैं। आपमें प्रधान, पुरुष, महान्, ब्रह्मा तथा ईश्वर (प्रतिष्ठित हैं)। (आपसे) अविद्या, नियति, माया और सैकड़ों कला आदिकी उत्पत्ति हुई है ॥ २१९–२२२ ॥<br><br>आप ही वह परमा शक्ति, अनन्ता और परमेष्ठिनी हैं। आप सभी भेदोंसे विनिर्मुक्त और सभी भेदोंके आश्रय एवं स्वयं प्रतिष्ठित हैं। हे योगेश्वरी ! आपमें ही अधिष्ठित होकर महादेव महेश्वर प्रधान आदि सम्पूर्ण जगत्की रचना करते हैं और फिर (उसका) संहार करते हैं। आपके ही संयोगसे महादेव स्वात्मानन्दका उपभोग करते हैं। आप ही परमानन्द (रूपा) और आप ही आनन्द प्रदान करनेवाली हैं। आप अक्षर, परमव्योम, महान् ज्योति, निरञ्जन, कल्याणरूप, सर्वगत, सूक्ष्म एवं सनातन परम ब्रह्म हैं। देवि ! आप सभी देवताओंमें इन्द्र (रूप) और ब्रह्मज्ञानियोंमें ब्रह्मा (रूप) हैं। (आप) बलवानोंमें वायु (रूप) तथा योगियोंमें कुमारक (सनत्कुमार) हैं ॥ २२३–२२७ ॥<br><br>आप ऋषियोंमें वसिष्ठ, वेदविदोंमें व्यास हैं। सांख्यशास्त्रके जाननेवालोंमें कपिलदेव तथा रुद्रोंमें शंकर हैं। आप आदित्योंमें उपेन्द्र (विष्णु) तथा वसुओंमें पावक हैं। वेदोंमें आप सामवेद तथा छन्दोंमें गायत्री छन्द हैं। विद्याओंमें अध्यात्मविद्या तथा गतियोंमें परम गति हैं। आप सभी शक्तियोंमें माया और संहार करनेवालोंमें काल (रूप) हैं। आप सभी गुह्योंमें ओंकार और वर्णोंमें द्विजोत्तम हैं। आश्रमोंमें गृहस्थाश्रम तथा ईश्वरोंमें महेश्वर हैं ॥ २२८–२३१ ॥ |

* अध्याय ११ * ८१


पुंसां त्वमेकः पुरुषः सर्वभूतहृदि स्थितः।<br>सर्वोपनिषदां देवि गुह्योपनिषदुच्यसे॥ २३२॥<br><br>ईशानश्चासि कल्पानां युगानां कृतमेव च।<br>आदित्यः सर्वमार्गाणां वाचां देवी सरस्वती॥ २३३॥<br><br>त्वं लक्ष्मीश्चारुरूपाणां विष्णुर्मायाविनामसि।<br>अरुन्धती सतीनां त्वं सुपर्णः पततामसि॥ २३४॥<br><br>सूक्तानां पौरुषं सूक्तं ज्येष्ठसाम च सामसु।<br>सावित्री चासि जप्यानां यजुषां शतरुद्रियम्॥ २३५॥पुरुषोंमें जो (उत्तम) पुरुष है और जो सभी प्राणियोंके हृदयमें रहनेवाला है, वह एकमात्र आप ही हैं। देवि! आप सभी उपनिषदोंमें गुह्योपनिषत् कही जाती हैं। कल्पोंमें आप ईशानकल्प हैं और युगोंमें सत्ययुग हैं। सभी भ्रमण करनेवालों (ग्रह-नक्षत्रों आदि)-में आदित्य (सूर्य) तथा वाणियोंमें सरस्वती देवी हैं। सुन्दर रूपवालोंमें आप लक्ष्मी और मायावियोंमें विष्णु हैं। आप पतिव्रताओंमें अरुन्धती तथा पक्षियोंमें गरुड हैं। आप सूक्तोंमें पुरुषसूक्त, सामगानोंमें ज्येष्ठ साम हैं। जपने योग्य मन्त्रोंमें सावित्री मन्त्र और यजुर्वेदके मन्त्रोंमें शतरुद्रिय आप ही हैं॥ २३२—२३५॥
पर्वतानां महामेरुरनन्तो भोगिनामसि।<br>सर्वेषां त्वं परं ब्रह्म तन्मयं सर्वमेव हि॥ २३६॥<br>रूपं तवाशेषकलाविहीन-<br>मगोचरं निर्मलमेकरूपम्।<br>अनादिमध्यान्तमनन्तमाद्यं<br>नमामि सत्यं तमसः परस्तात्॥ २३७॥<br>यदेव पश्यन्ति जगत्प्रसूतिं<br>वेदान्तविज्ञानविनिश्चिताsubार्थः ।<br>आनन्दमात्रं प्रणवाभिधानं<br>तदेव रूपं शरणं प्रपद्ये॥ २३८॥<br>अशेषभूतान्तरसंनिविष्टं<br>प्रधानपुंयोगवियोगहेतुम् ।<br>तेजोमयं जन्मविनाशहीनं<br>प्राणाभिधानं प्रणतोऽस्मि रूपम्॥ २३९॥आप पर्वतोंमें महामेरु और सर्पोंमें अनन्त (नाग) हैं। सभीमें आप परब्रह्म हैं, सब कुछ आपमें ही व्याप्त है। मैं आपके तमोगुणसे परे रहनेवाले उस सत्यरूपको नमस्कार करता हूँ जो समस्त कलाओंसे रहित, अगोचर, निर्मल, अद्वितीय, आदि, मध्य तथा अन्तरहित, अनन्त और आदिरूप हैं। वेदान्तरूपी विज्ञानके अर्थका निश्चय करनेवाले, जगत्के उत्पादक प्रणव नामवाले जिस अद्वितीय आनन्दका साक्षात्कार करते हैं, मैं उसी रूपकी शरण ग्रहण करता हूँ। (मैं) समस्त प्राणियोंके भीतर रहनेवाले, प्रधान और पुरुषके संयोग तथा वियोगके कारण, उत्पत्ति एवं विनाशसे रहित तथा तेजोमय उस प्राण नामवाले रूपको प्रणाम करता हूँ॥ २३६—२३९॥
आद्यन्तहीनं जगदात्मभूतं<br>विभिन्नसंस्थं प्रकृतेः परस्तात्।<br>कूटस्थमव्यक्तवपुस्तवैव<br>नमामि रूपं पुरुषाभिधानम्॥ २४०॥<br>सर्वाश्रयं सर्वजगद्विधानं<br>सर्वत्रगं जन्मविनाशहीनम् ।<br>सूक्ष्मं विचित्रं त्रिगुणं प्रधानं<br>नतोऽस्मि ते रूपमलुप्तभेदम्॥ २४१॥<br>आद्यं महत् ते पुरुषात्मरूपं<br>प्रकृत्यवस्थं त्रिगुणात्मबीजम्।<br>ऐश्वर्यविज्ञानविरागधर्मैः<br>समन्वितं देवि नतोऽस्मि रूपम्॥ २४२॥(मैं) आदि तथा अन्तसे रहित, संसारके आत्मारूप, अनेक रूपोंमें स्थित, प्रकृतिसे परे रहनेवाले, कूटस्थ एवं अव्यक्त शरीर धारण करनेवाले पुरुष नामक आपके रूपको नमस्कार करता हूँ। मैं सभीके आश्रयरूप, सम्पूर्ण संसारका विधान करनेवाले, सर्वत्र व्याप्त, जन्म और मरणसे रहित, सूक्ष्म, विचित्र, त्रिगुणात्मक, प्रधानस्वरूप तथा अलुप्त भेदवाले आपके रूपको प्रणाम करता हूँ। देवि! आपका जो आद्य, महान्, पुरुषात्मक रूप है, जो प्रकृतिमें अवस्थित है, त्रिगुणात्मक मूल बीजरूप है तथा ऐश्वर्य, विज्ञान और विराग-धर्मोंसे समन्वित है, मैं उसे नमस्कार करता हूँ॥ २४०—२४२॥
८२* कूर्मपुराण *
द्विसप्तलोकात्मकमम्बुसंस्थं<br>विचित्रभेदं पुरुषैकनाथम्।<br>अनन्तभूतैरधिवासितं ते<br>नतोऽस्मि रूपं जगदण्डसंज्ञम्॥ २४३॥<br>अशेषवेदात्मकमेकमाद्यं<br>स्वतेजसा पूरितलोकभेदम्।<br>त्रिकालहेतुं परमेष्ठिसंज्ञं<br>नमामि रूपं रविमण्डलस्थम्॥ २४४॥<br>सहस्रमूर्धानमनन्तशक्तिं<br>सहस्रबाहुं पुरुषं पुराणम्।<br>शयानमन्तःसलिले तथैव<br>नारायणाख्यं प्रणतोऽस्मि रूपम्॥ २४५॥<br>दंष्ट्राकरालं त्रिदशाभिवन्द्यं<br>युगान्तकालानलकल्परूपम् ।<br>अशेषभूताण्डविनाशहेतुं<br>नमामि रूपं तव कालसंज्ञम्॥ २४६॥चौदह लोकात्मक, जलमें अवस्थित, विचित्र भेदवाले, परम पुरुषको ही अपना स्वामी स्वीकार करनेवाले, अनन्त प्राणियोंके निवासस्थान, उस जगदण्ड (ब्रह्माण्ड)-संज्ञक आपके रूपको मैं नमस्कार करता हूँ। (मैं) समग्र वेदरूप, अद्वितीय, आदि, अपने तेजसे सम्पूर्ण संसारको व्याप्त करनेवाले, तीनों कालोंके कारण तथा सूर्यमण्डलमें प्रतिष्ठित परमेष्ठी नामवाले रूपको नमस्कार करता हूँ। जो हजारों सिरवाले हैं, अनन्त शक्ति-सम्पन्न हैं, हजारों हाथवाले हैं तथा जलके मध्यमें शयन करनेवाले हैं, मैं उन 'नारायण' नामसे प्रसिद्ध पुराणपुरुषके रूपको प्रणाम करता हूँ। (देवि!) आपका जो रूप भयंकर दाढ़वाला, देवताओंद्वारा सब प्रकारसे वन्दनीय, प्रलयकालीन अग्निके समान रूपवाला और सम्पूर्ण प्राणियोंके विनाशके लिये कारण-रूप है, मैं उस काल नामवाले रूपको नमस्कार करता हूँ॥ २४३-२४६॥
फणासहस्रेण विराजमानं<br>भोगीन्द्रमुख्यैरभिपूज्यमानम् ।<br>जनार्दनारूढतनुं प्रसुप्तं<br>नतोऽस्मि रूपं तव शेषसंज्ञम्॥ २४७॥<br><br>अव्याहतैश्वर्यमयुग्मनेत्रं<br>ब्रह्मामृतानन्दरसज्ञमेकम् ।<br>युगान्तशेषं दिवि नृत्यमानं<br>नतोऽस्मि रूपं तव रुद्रसंज्ञम्॥ २४८॥<br><br>प्रहीणशोकं विमलं पवित्रं<br>सुरासुरैरर्चितपादपद्मम् ।<br>सुकोमलं देवि विशालशुभ्रं<br>नमामि ते रूपमिदं नमामि॥ २४९॥(देवि!) मैं आपके शेष नामवाले उस रूपको प्रणाम करता हूँ, जो हजारों फणोंसे सुशोभित है, प्रधान-प्रधान नागराजोंसे पूजित है, जनार्दन नामसे शरीर धारण किये हुए है तथा प्रगाढ़ निद्रामें है। जिसका ऐश्वर्य अव्याहत (अबाधित) है, जिसके नेत्र विषम हैं, (जो तीन नेत्रोंसे युक्त है), जो ब्रह्मके अमृतरूपी आनन्द-रसको जाननेवाला है, अद्वितीय है, प्रलयकालमें स्थित रहनेवाला है और जो द्युलोकमें नृत्य करता रहता है (देवि!) मैं आपके उस रुद्र नामवाले रूपको प्रणाम करता हूँ। देवि! (मैं) शोकसे सर्वथा शून्य, निर्मल, पवित्र, देवताओं तथा असुरोंसे पूजित चरणकमलवाले आपके अत्यन्त कोमल, विशाल एवं उज्ज्वल इस रूपको नमस्कार करता हूँ, बार-बार नमस्कार करता हूँ।
ॐ नमस्ते महादेवि नमस्ते परमेश्वरि।<br>नमो भगवतीशानि शिवायै ते नमो नमः॥ २५०॥महादेवि! आपको नमस्कार है, परमेश्वरि! आपको नमस्कार है। भगवती ईशानीको नमस्कार है, कल्याणरूपिणी आपको बार-बार नमस्कार है॥ २४७-२५०॥
त्वन्मयोऽहं त्वदाधारस्त्वमेव च गतिर्मम।<br>त्वामेव शरणं यास्ये प्रसीद परमेश्वरि॥ २५१॥<br><br>मया नास्ति समो लोके देवो वा दानवोऽपि वा।<br>जगन्मातैव मत्पुत्री सम्भूता तपसा यतः॥ २५२॥मैं आपसे व्याप्त हूँ, आप मेरे आधार हैं और आप ही मेरी गति हैं। परमेश्वरि! मैं आपकी ही शरण ग्रहण करता हूँ, आप (मुझपर) प्रसन्न हों। मेरे समान संसारमें देवता या दानव कोई भी नहीं है, क्योंकि (मेरे) तपके कारण आप जगन्माता ही मेरी पुत्रीके रूपमें उत्पन्न हुई हैं॥ २५१-२५२॥
  • अध्याय ११ * ८३

एषा तवाम्बिका देवि किलाभूत् पितृकन्यका।<br>मेनाशेषजगन्मातुरहो पुण्यस्य गौरवम्॥ २५३॥<br><br>पाहि माममरेशानि मेनया सह सर्वदा।<br>नमामि तव पादाब्जं व्रजामि शरणं शिवाम्॥ २५४॥<br>अहो मे सुमहद् भाग्यं महादेवीसमागमात्।<br>आज्ञापय महादेवि किं करिष्यामि शंकरि॥ २५५॥<br><br>एतावदुक्त्वा वचनं तदा हिमगिरीश्वरः।<br>सम्प्रेक्षमाणो गिरिजां प्राञ्जलिः पार्श्वतोऽभवत्॥ २५६॥<br><br>अथ सा तस्य वचनं निशम्य जगतोऽरणिः।<br>सस्मितं प्राह पितरं स्मृत्वा पशुपतिं पतिम्॥ २५७॥<br>देव्युवाच<br>शृणुष्व चैतत् परमं गुह्यमीश्वरगोचरम्।<br>उपदेशं गिरिश्रेष्ठ सेवितं ब्रह्मवादिभिः॥ २५८॥<br><br>यन्मे साक्षात् परं रूपमैश्वरं दृष्टमद्भुतम्।<br>सर्वशक्तिसमायुक्तमनन्तं प्रेरकं परम्॥ २५९॥<br><br>शान्तः समाहितमना दम्भाहंकारवर्जितः।<br>तन्निष्ठस्तत्परो भूत्वा तदेव शरणं व्रज॥ २६०॥<br><br>भक्त्या त्वनन्यया तात मद्भावं परमाश्रितः।<br>सर्वयज्ञतपोदानैस्तदेवार्चय सर्वदा॥ २६१॥<br><br>तदेव मनसा पश्य तद् ध्यायस्व जपस्व च।<br>ममोपदेशात् संसारं नाशयामि तवानघ॥ २६२॥<br>अहं वै मत्परान् भक्तानैश्वरं योगमास्थितान्।<br>संसारसागरादस्मादुद्धराम्यचिरेण तु॥ २६३॥<br><br>ध्यानेन कर्मयोगेन भक्त्या ज्ञानेन चैव हि।<br>प्राप्याहं ते गिरिश्रेष्ठ नान्यथा कर्मकोटिभिः॥ २६४॥<br><br>श्रुतिस्मृत्युदितं सम्यक् कर्म वर्णाश्रमात्मकम्।<br>अध्यात्मज्ञानसहितं मुक्तये सततं कुरु॥ २६५॥<br><br>धर्मात् संजायते भक्तिर्भक्त्या सम्प्राप्यते परम्।<br>श्रुतिस्मृतिभ्यामुदितो धर्मो यज्ञादिको मतः॥ २६६॥देवि! ये पितरोंकी कन्या मेना सम्पूर्ण संसारकी मातास्वरूप आपकी माता हैं, अहो! पुण्यके गौरवका क्या कहना? अमरेशानि! आप मेनाके साथ मेरी सर्वदा रक्षा करें। मैं आपके चरणकमलोंमें नमस्कार करता हूँ और आप कल्याणकारिणीकी शरणमें हूँ॥ २५३-२५४॥<br><br>अहो! महादेवीके (मेरे घर) आ जानेसे मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य हुआ। महादेवि! शंकरि! आप मुझे आज्ञा दें कि मैं क्या करूँ? ऐसा वचन कहकर वह गिरिराज हिमालय गिरिजाको देखते हुए एवं हाथ जोड़ते हुए उनके पास खड़े हो गये। जगत्की अरणि (मूल कारण)-रूप उस देवीने उनका (हिमवान्‌का) वचन सुनकर अपने पति पशुपति (शंकर)-का स्मरणकर मधुर-मधुर मुसकराते हुए पिता (हिमवान्)-से कहा- ॥ २५५-२५७॥<br><br>देवी बोलीं- गिरिश्रेष्ठ! ब्रह्मवादियोंद्वारा सेवित केवल ईश्वरको ज्ञात इस परम गुह्य उपदेशको सुनो। मेरे जिस सर्वशक्तिसम्पन्न, अनन्त, परम प्रेरक, अद्भुत एवं ऐश्वर्यसम्पन्न रूपको तुमने देखा है, शान्त एवं एकाग्रमन होकर, दम्भ और अहंकारका सर्वथा परित्यागकर, अत्यन्त निष्ठा रखकर, तत्परायण हो उसी (रूप)-की शरण ग्रहण करो। तात! अनन्य भक्तिपूर्वक मेरे श्रेष्ठ भावका आश्रय ग्रहणकर, सभी यज्ञ, तप, दान (आदि साधनों)-के द्वारा सदा उसी (रूप)-की अर्चना करो। मेरे उपदेशको मानकर मनसे उसी (रूप)-को देखो, उसीका ध्यान करो और उसीका जप करो। अनघ! मैं तुम्हारे संसार (भवबन्धन)-को विनष्ट कर दूँगी॥ २५८-२६२॥<br><br>ऐश्वर-योगमें स्थित अपने भक्तोंका मैं इस संसार-सागरसे शीघ्र ही उद्धार कर देती हूँ। गिरिश्रेष्ठ! मैं ध्यान, कर्मयोग, भक्ति तथा ज्ञानके द्वारा ही तुम्हारे लिये प्राप्य हूँ, दूसरे करोड़ों कर्मोंके द्वारा मुझे प्राप्त नहीं किया जा सकता। श्रुति तथा स्मृति-शास्त्रोंमें जो सम्यक् वर्णाश्रमकर्म (धर्म) बतलाया गया है, मुक्ति-प्राप्तिके लिये अध्यात्मज्ञानयुक्त उस (कर्म)-का निरन्तर आचरण करो। धर्मसे भक्ति उत्पन्न होती है और भक्तिसे परम (तत्त्व) प्राप्त होता है। श्रुति एवं स्मृतिद्वारा प्रतिपादित यज्ञादि कर्मको धर्म कहा गया है॥ २६३-२६६॥

८४ * कूर्मपुराण *

नान्यतो जायते धर्मो वेदाद् धर्मो हि निर्बभौ।<br>तस्मान्मुमुक्षुर्धर्मार्थी मद्रूपं वेदमाश्रयेत्॥ २६७॥<br><br>ममैवैषा परा शक्तिर्वेदसंज्ञा पुरातनी।<br>ऋग्यजुःसामरूपेण सर्गादौ सम्प्रवर्तते॥ २६८॥धर्म किसी अन्यसे उत्पन्न नहीं होता, वेदसे ही धर्म निर्गत है। इसलिये धर्मार्थी एवं मुमुक्षुको चाहिये कि मेरे स्वरूपभूत वेदका आश्रय ग्रहण करे। मेरी ही यह ‘वेद’ नामवाली पुरातन परा शक्ति ऋक्, यजुष् तथा सामवेदके रूपमें सृष्टिके आदिमें प्रवर्तित होती है॥ २६७-२६८॥
तेषामेव च गुप्त्यर्थं वेदानां भगवानजः।<br>ब्राह्मणादीन् ससर्जाथ स्वे स्वे कर्मण्ययोजयत्॥ २६९॥<br><br>ये न कुर्वन्ति तद् धर्मं तदर्थं ब्रह्मनिर्मितम्।<br>तेषामधस्तान्रकांस्तामिस्रादीनकल्पयत्॥ २७०॥<br><br>न च वेदाद् ऋते किञ्चिच्छास्त्रधर्मभिधायकम्।<br>योऽन्यत्र रमते सोऽसौ न सम्भाष्यो द्विजातिभिः॥ २७१॥<br><br>यानि शास्त्राणि दृश्यन्ते लोकेऽस्मिन् विविधानि तु।<br>श्रुतिस्मृतिविरुद्धानि निष्ठा तेषां हि तामसी॥ २७२॥<br><br>कापालं पञ्चरात्रं च यामलं वाममार्हतम्।<br>एवंविधानि चान्यानि मोहनार्थानि तानि तु॥ २७३॥<br><br>ये कुशास्त्राभियोगेन मोहयन्तीह मानवान्।<br>मया सृष्टानि शास्त्राणि मोहायैषां भवान्तरे॥ २७४॥उन्हीं वेदोंकी रक्षाके लिये भगवान् ब्रह्माने ब्राह्मणादिको उत्पन्न कर अपने-अपने कर्मोंमें लगाया। ब्रह्माद्वारा बनाये गये उस (वेदविहित वर्णाश्रम) धर्मका जो पालन नहीं करते हैं, उनके लिये (ब्रह्माने) नीचेके लोकोंमें स्थित तामिस्र आदि नरकोंको बनाया है। धर्मका विधान करनेवाले अथवा धर्मको बतलानेवाले वेदको छोड़कर और अन्य कोई शास्त्र नहीं हैं। जो (वेदाभ्यासके अतिरिक्त) अन्यत्र मन लगाते हैं, द्विजातियोंके द्वारा वे सम्भाषण करने योग्य नहीं हैं। इस संसारमें श्रुति एवं स्मृतिके विरुद्ध जो विविध शास्त्र देखे जाते हैं, निश्चय ही उनमें निष्ठा (विश्वास) रखना तमोगुणी (निष्ठा) है। जो कुत्सित शास्त्रोंके प्रभावको बतलाकर मनुष्योंको मोहित करते हैं, इस संसारमें उन लोगोंको मोहित करनेके लिये मैंने (ऐसे) शास्त्रोंको बनाया है॥ २६९-२७४॥
वेदार्थवित्तमैः कार्यं यत् स्मृतं कर्म वैदिकम्।<br>तत् प्रयत्नेन कुर्वन्ति मत्प्रियास्ते हि ये नराः॥ २७५॥<br><br>वर्णानामनुकम्पार्थं मन्नियोगाद् विराट् स्वयम्।<br>स्वायम्भुवो मनुर्धर्मान् मुनीनां पूर्वमुक्तवान्॥ २७६॥<br><br>श्रुत्वा चान्येऽपि मुनयस्तन्मुखाद् धर्ममुत्तमम्।<br>चक्रुर्धर्मप्रतिष्ठार्थं धर्मशास्त्राणि चैव हि॥ २७७॥<br><br>तेषु चान्तर्हितेष्वेवं युगान्तेषु महर्षयः।<br>ब्रह्मणो वचनात् तानि करिष्यन्ति युगे युगे॥ २७८॥वेदके अर्थको जाननेवाले श्रेष्ठ विद्वानोंके द्वारा जिस कर्मको वेदसम्मत कहा गया है वही (कर्म) करणीय है और जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक उस कर्मको करते हैं, वे मुझे प्रिय हैं। प्राचीन कालमें विराट् (पुरुष) स्वायम्भुव मनुने सभी वर्णोंपर अनुग्रह करनेके लिये मेरी ही आज्ञासे (भृगु आदि) मुनियोंसे धर्म (मनुस्मृति) कहा था। उनके मुखसे श्रेष्ठ धर्मका श्रवणकर अन्य मुनियोंने भी धर्मकी प्रतिष्ठाके लिये अन्य धर्मशास्त्रों (स्मृतियों)-की रचना की। प्रलयकालमें उनके (धर्मशास्त्रोंके) अन्तर्हित हो जानेपर प्रत्येक युगमें वे महर्षिगण ब्रह्माके कहनेपर पुनः उन शास्त्रोंकी रचना करते हैं॥ २७५-२७८॥
अष्टादश पुराणानि व्यासेन कथितानि तु।<br>नियोगाद् ब्रह्मणो राजंस्तेषु धर्मः प्रतिष्ठितः॥ २७९॥<br><br>अन्यान्युपपुराणानि तच्छिष्यैः कथितानि तु।<br>युगे युगेऽत्र सर्वेषां कर्ता वै धर्मशास्त्रवित्॥ २८०॥<br><br>शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्द एव च।<br>ज्योतिःशास्त्रं न्यायविद्या मीमांसा चोपबृंहणम्॥ २८१॥राजन्! ब्रह्माके आदेशसे व्यासजीने अठारह (महा-) पुराणोंको कहा है। उन (पुराणों)-में धर्म प्रतिष्ठित है। अन्य उपपुराण उन व्यासजीके शिष्योंद्वारा कहे गये हैं। यहाँ प्रत्येक युगमें इन सभी शास्त्रोंका कर्ता ही धर्मशास्त्रका ज्ञाता होता है। सत्तम! चार वेदोंसहित शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिषशास्त्र, न्यायविद्या, मीमांसा तथा उपबृंहण (इतिहास और पुराण)—॥ २७९-२८१॥
* अध्याय ११ *८५
एवं चतुर्दशैतानि विद्यास्थानानि सत्तम।<br>चतुर्वेदैः सहोक्तानि धर्मो नान्यत्र विद्यते॥ २८२॥<br>एवं पैतामहं धर्मं मनुव्यासादयः परम्।<br>स्थापयन्ति ममादेशाद् यावदाभूतसम्प्लवम्॥ २८३॥इस प्रकार ये चौदह विद्यास्थान कहे गये हैं। इनके अतिरिक्त अन्यत्र धर्म विद्यमान नहीं है॥ २८२॥<br>इस प्रकार मनु, व्यास आदि पितामह ब्रह्माके द्वारा निर्दिष्ट श्रेष्ठ धर्मको मेरे ही आदेशसे प्रलयकालपर्यन्त स्थापित करते हैं। ब्रह्माकी आयु पूर्ण हो जानेपर प्रलय-काल उपस्थित होनेपर वे सभी पुण्यात्मा (व्यासादि) ब्रह्माके साथ ही परम पदमें प्रवेश करते हैं॥ २८३-२८४॥
ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसंचरे।<br>परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम्॥ २८४॥<br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन धर्मार्थं वेदमाश्रयेत्।<br>धर्मेण सहितं ज्ञानं परं ब्रह्म प्रकाशयेत्॥ २८५॥इसलिये धर्मके (परिज्ञानके) लिये सभी प्रकारके प्रयत्नसे वेदका आश्रय ग्रहण करना चाहिये, (इससे) धर्मसहित ज्ञान और परम ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है॥ २८५॥
ये तु सङ्गान् परित्यज्य मामेव शरणं गताः।<br>उपासते सदा भक्त्या योगमैश्वरमास्थिताः॥ २८६॥जो सभी प्रकारकी आसक्तियोंका परित्याग कर अनन्यभावसे मेरी शरण ग्रहण कर लेते हैं, ईश्वर-सम्बन्धी योगमें स्थित होकर भक्तिपूर्वक सदा मेरी उपासना करते हैं, सभी प्राणियोंपर दया करते हैं, शान्त, जितेन्द्रिय, मात्सर्यरहित, मानरहित, बुद्धिमान् तपस्वी तथा व्रतपरायण हैं, मुझमें जिनका चित्त और प्राण लगा हुआ है, मेरे तत्त्व-वर्णनमें ही जो लगे हुए हैं ऐसे संन्यासी, गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा ब्रह्मचारी जो कोई भी हों, उन नित्य भक्तिमें लगे हुए भक्तोंके माया-तत्त्वसे उत्पन्न सम्पूर्ण अन्धकारका ज्ञानरूपी दीपकके द्वारा मैं अविलम्ब ही विनाश कर देती हूँ। अद्वितीय ज्ञानके द्वारा जिनके अन्धकारका भलीभाँति विनाश हो गया है ऐसे ही मत्परायण (भक्त) सदा आनन्दित रहते हैं और संसारमें बार-बार जन्म नहीं लेते॥ २८६-२९०॥
सर्वभूतदयावन्तः शान्ता दान्ता विमत्सराः।<br>अमानिनो बुद्धिमन्तस्तपसाः शंसितव्रताः॥ २८७॥
मच्चित्ता मद्गतप्राणा मज्ज्ञानकथने रताः।<br>संन्यासिनो गृहस्थाश्च वनस्था ब्रह्मचारिणः॥ २८८॥
तेषां नित्याभियुक्तानां मायातत्त्वसमुत्थितम्।<br>नाशयामि तमः कृत्स्नं ज्ञानदीपेन मा चिरात्॥ २८९॥
ते सुनिर्धूततमसो ज्ञानेनैकेन मन्मयाः।<br>सदानन्दास्तु संसारे न जायन्ते पुनः पुनः॥ २९०॥
तस्मात् सर्वप्रकारेण मद्भक्तो मत्परायणः।<br>मामेवार्चय सर्वत्र मेनया सह संगतः॥ २९१॥इसलिये सब प्रकारसे मेरे भक्त और मेरे परायण रहते हुए (तुम) मेनाके साथ सर्वत्र मेरी ही अर्चना करो। यदि तुम मेरे ऐश्वर्यसम्पन्न अव्यय-स्वरूपका ध्यान करनेमें असमर्थ हो तो मेरे आदिकालस्वरूप कलात्मक रूपकी शरण ग्रहण करो। तात! मेरा जो-जो भी रूप आपके मनको अभीष्ट हो, उसीमें निष्ठा रखो और उसीके परायण होकर उसकी ही आराधनामें संलग्न रहो॥ २९१-२९३॥
अशक्तो यदि मे ध्यातुमैश्वरं रूपमव्ययम्।<br>ततो मे सकलं रूपं कालाद्यं शरणं व्रज॥ २९२॥
यद् यत् स्वरूपं मे तात मनसो गोचरं भवेत्।<br>तन्निष्ठस्तत्परो भूत्वा तदर्चनपरो भव॥ २९३॥
यत्तु मे निष्कलं रूपं चिन्मात्रं केवलं शिवम्।<br>सर्वोपाधिविनिर्मुक्तमनन्तममृतं परम्॥ २९४॥मेरा जो कलारहित, चिन्मात्र, अद्वितीय, कल्याणकारी, सभी उपाधियोंसे सर्वथा मुक्त, अनन्त, अमर एवं परमरूप है, वह परमपद एकमात्र ज्ञानके द्वारा बड़े ही कष्टसे प्राप्त किया जाता है। ज्ञानका साक्षात्कार करनेवाले लोग मुझमें ही प्रवेश करते हैं॥ २९४-२९५॥
ज्ञानेनैकेन तल्लभ्यं क्लेशेन परमं पदम्।<br>ज्ञानमेव प्रपश्यन्तो मामेव प्रविशन्ति ते॥ २९५॥

८६ * कूर्मपुराण *


तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥ २९६ ॥

मामाश्रित्य परं निर्वाणममलं पदम्।
प्राप्यते न हि राजेन्द्र ततो मां शरणं व्रज ॥ २९७ ॥

एकत्वेन पृथक्त्वेन तथा चोभयतोऽपि वा।
मामुपास्य महाराज ततो यास्यसि तत्पदम्॥ २९८ ॥

उसीमें (मेरे दिव्य रूपमें) बुद्धि रखनेवाले, उसीमें अपनेको लगानेवाले, उसीमें निष्ठा रखनेवाले तथा उसीके परायण और ज्ञानके द्वारा जिनके समस्त पाप विनष्ट हो गये हैं, वे सभी आवागमनके चक्रमें नहीं पड़ते अर्थात् मोक्षको प्राप्त करते हैं। राजेन्द्र! मेरी शरण ग्रहण किये बिना परम निर्वाण,निर्मल पद प्राप्त नहीं होता, इसलिये मेरी शरण ग्रहण करो। महाराज! द्वैत या अद्वैत अथवा दोनों ही रूपोंसे मेरी उपासना कर तुम्हें उस पदकी प्राप्ति हो जायगी ॥ २९६-२९८ ॥


मामाश्रित्य तत् तत्त्वं स्वभावविमलं शिवम्।
ज्ञायते न हि राजेन्द्र ततो मां शरणं व्रज ॥ २९९ ॥

तस्मात् त्वमक्षरं रूपं नित्यं चारूपमैश्वरम्।
आराध्य प्रयत्नेन ततो बन्धं प्रहास्यसि ॥ ३०० ॥

कर्मणा मनसा वाचा शिवं सर्वत्र सर्वदा।
समाराध्य भावेन ततो यास्यसि तत्पदम्॥ ३०१॥

न वै पश्यन्ति तत् तत्त्वं मोहिता मम मायया।
अनाद्यनन्तं परमं महेश्वरमजं शिवम्॥ ३०२ ॥

सर्वभूतात्मभूतस्थं सर्वाधारं निरञ्जनम्।
नित्यानन्दं निराभासं निर्गुणं तमसः परम् ॥ ३०३ ॥

अद्वैतमचलं ब्रह्म निष्कलं निष्प्रपञ्चकम्।
स्वसंवेद्यमवेद्यं तत् परे व्योम्नि व्यवस्थितम्॥ ३०४॥

हे राजेन्द्र! बिना मेरा आश्रय लिये स्वभावसे ही निर्मल, उस शिवतत्त्वको जाना नहीं जा सकता, अतः मेरी शरण ग्रहण करो। इसलिये तुम नित्य, अक्षरस्वरूप एवं रूपरहित ईश्वर (तत्त्व)-की प्रयत्नपूर्वक आराधना करो। इससे (तुम) बन्धनसे मुक्त हो जाओगे। मन, वाणी तथा कर्मसे बड़े ही भावसे सर्वत्र शिवकी आराधना करो, इससे (तुम) उस पदको प्राप्त करोगे। मेरी मायासे मोहित (प्राणी) उस अनादि, अनन्त, अजन्मा, कल्याणकारी, परम महेश्वर, सभी प्राणियोंके अन्तरमें निवास करनेवाले, सभीके आधार, निरञ्जन, नित्य आनन्दस्वरूप, निराभास, निर्गुण, अन्धकारसे परे, अद्वैत, अचल, कलारहित, निष्प्रपञ्च, स्वसंवेद्य, अज्ञेय तथा परमाकाशमें स्थित ब्रह्मसंज्ञक तत्त्वको नहीं जान पाते ॥ २९९-३०४ ॥


सूक्ष्मेण तमसा नित्यं वेष्टिता मम मायया।
संसारसागरे घोरे जायन्ते च पुनः पुनः ॥ ३०५ ॥

भक्त्या त्वनन्यया राजन् सम्यग् ज्ञानेन चैव हि।
अन्वेष्टव्यं हि तद् ब्रह्म जन्मबन्धन्निवृत्तये ॥ ३०६ ॥

अहंकारं च मात्सर्यं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
अधर्माभिनिवेशं च त्यक्त्वा वैराग्यमास्थितः ॥ ३०७ ॥

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
अन्वीक्ष्य चात्मनात्मानं ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ३०८ ॥

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा सर्वभूताभयप्रदः।
ऐश्वरीं परमां भक्तिं विन्देतानन्यगामिनीम् ॥ ३०९ ॥

वीक्षते तत् परं तत्त्वमैश्वरं ब्रह्मनिष्कलं।
सर्वसंसारनिर्मुक्तो ब्रह्मण्येवावतिष्ठते ॥ ३१० ॥

मेरी मायाद्वारा नित्य सूक्ष्म तमोगुणसे घिरे हुए प्राणी (इस) घोर संसारसागरमें बार-बार जन्म लेते हैं। राजन्! जन्मरूपी बन्धनकी निवृत्तिके लिये अनन्य भक्ति एवं सम्यक् ज्ञानके द्वारा उस ब्रह्मका अन्वेषण करना चाहिये। (राजन्! जो) अहंकार, मात्सर्य, काम, क्रोध, संग्रहकी प्रवृत्ति तथा अधर्माचरणमें रुचिका सर्वथा परित्याग कर अनासक्तभावमें स्थित रहते हैं और सभी प्राणियोंमें अपनेको एवं सभी प्राणियोंको अपनी अन्तरात्मामें स्थित देखते हैं, वे आत्माद्वारा अन्तरात्माका साक्षात्कार कर ब्रह्मको प्राप्त करनेके योग्य बन जाते हैं। सभी प्राणियोंको अभय प्रदान करनेवाले तथा प्रसन्न मनवाले ब्रह्ममें एकीभावसे स्थित, अनन्यगामिनी परम ईश्वरभक्तिको प्राप्त कर लेते हैं। वे उस ऐश्वर्ययुक्त निष्कल ब्रह्मतत्त्वका साक्षात् करते हैं और समस्त संसारसे अनासक्त होते हुए एकमात्र ब्रह्ममें ही प्रतिष्ठित हो जाते हैं॥ ३०५-३१०॥

* अध्याय ११ *८७
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठायां परस्य परमः शिवः।<br>अनन्तस्याव्ययस्यैकः स्वात्माधारो महेश्वरः॥ ३११॥<br><br>ज्ञानेन कर्मयोगेन भक्तियोगेन वा नृप।<br>सर्वसंसारमुक्त्यर्थमीश्वरं सततं श्रय॥ ३१२॥<br><br>एष गुह्योपदेशस्ते मया दत्तो गिरीश्वर।<br>अन्वीक्ष्य चैतदखिलं यथेष्टं कर्तुमर्हसि॥ ३१३॥<br><br>अहं वै याचिता देवैः संजाता परमेश्वरात्।<br>विनिन्द्य दक्षं पितरं महेश्वरविनिन्दकम्॥ ३१४॥<br><br>धर्मसंस्थापनार्थाय तवाराधनकारणात्।<br>मेनादेहसमुत्पन्ना त्वामेव पितरं श्रिता॥ ३१५॥<br><br>स त्वं नियोगाद् देवस्य ब्रह्मणः परमात्मनः।<br>प्रदास्यसे मां रुद्राय स्वयंवरसमागमे॥ ३१६॥<br><br>तत्सम्बन्धाच्च ते राजन् सर्वे देवाः सवासवाः।<br>त्वां नमस्यन्ति वै तात प्रसीदति च शंकरः॥ ३१७॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन मां विद्धीश्वरगोचराम्।<br>सम्पूज्य देवमीशानं शरण्यं शरणं व्रज॥ ३१८॥<br><br>स एवमुक्तो भगवान् देवदेव्या गिरीश्वरः।<br>प्रणम्य शिरसा देवीं प्राञ्जलिः पुनरब्रवीत्॥ ३१९॥ये अद्वितीय, अपनी आत्माके आश्रय महेश्वर परमशिव ही अनन्त तथा अव्यय पर ब्रह्मकी प्रतिष्ठा-रूप हैं। राजन्! ज्ञानयोग, कर्मयोग अथवा भक्तियोगके द्वारा समस्त संसारसे मुक्ति प्राप्त करनेके लिये निरन्तर ईश्वरका आश्रय ग्रहण करो। पर्वतराज हिमालय! मैंने यह गुह्य उपदेश तुम्हें प्रदान किया है, इस सम्पूर्ण उपदेशपर विचारकर तुम जैसा चाहो वैसा करो॥ ३११-३१३॥<br><br>महादेव शंकरकी निन्दा करनेवाले अपने पिता दक्षकी आलोचना कर देवताओंके द्वारा प्रार्थना करनेपर मैं परमेश्वरसे प्रादुर्भूत हुई हूँ। तुम्हारी आराधनाके कारण धर्मकी स्थापना करनेके लिये तुम्हें ही पिताके रूपमें आश्रय बनाकर मैं मेनाकी देहसे उत्पन्न हुई हूँ। आप परमात्मा ब्रह्मदेवके निर्देशसे स्वयंवरके समय मुझे रुद्रको प्रदान करेंगे। राजन्! तात! उस सम्बन्धके कारण इन्द्रसहित सभी देवता आपको नमस्कार करेंगे तथा भगवान् शंकर भी आपसे प्रसन्न होंगे। इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा मुझे ही ईश्वरकी विषयस्वरूपा (ईश्वरका सर्वस्व) समझो और शरण ग्रहण करने योग्य भगवान् शंकरकी पूजाकर उनकी शरणमें जाओ॥ ३१४-३१८॥<br><br>भगवान् महादेवकी देवी (शंकरपत्नी)-के द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर वे पर्वतराज हिमालय विनयपूर्वक प्रणामकर हाथ जोड़ते हुए पुनः महेश्वरीसे कहने लगे—महेशानि! आप मुझे परम माहेश्वर योगको विस्तारसे बतलाइये और ज्ञान तथा साधनोंसहित आत्मयोगको भी विस्तारपूर्वक बतलायें॥ ३१९-३२०॥
विस्तरेण महेशानि योगं माहेश्वरं परम्।<br>ज्ञानं चैवात्मनो योगं साधनानि प्रचक्ष्व मे॥ ३२०॥<br><br>तस्यैतत् परमं ज्ञानमात्मयोगमनुत्तमम्।<br>यथावद् व्याजहारेशा साधनानि च विस्तरात्॥ ३२१॥<br><br>निशम्य वदनाम्भोजाद् गिरीन्द्रो लोकपूजितः।<br>लोकमातुः परं ज्ञानं योगासक्तोऽभवत् पुनः॥ ३२२॥<br><br>प्रददौ च महेशाय पार्वतीं भाग्यगौरवात्।<br>नियोगाद् ब्रह्मणः साध्वीं देवानां चैव संनिधौ॥ ३२३॥<br><br>य इमं पठतेऽध्यायं देव्या माहात्म्यकीर्तनम्।<br>शिवस्य संनिधौ भक्त्या शुचिस्तद्भावभावितः॥ ३२४॥<br><br>सर्वपापविनिर्मुक्तो दिव्ययोगसमन्वितः।<br>उल्लङ्घ्य ब्रह्मणो लोकं देव्याः स्थानमवाप्नुयात्॥ ३२५॥(इसपर) भगवती पार्वतीने उन्हें वह परम ज्ञान, श्रेष्ठ आत्मयोग और उसकी प्राप्तिके साधनोंको भी विस्तारपूर्वक भलीभाँति बतलाया। जगज्जननीके मुखकमलसे परम ज्ञान सुनकर वे लोकपूजित पर्वतराज हिमालय पुनः योगमें आसक्त हो गये। (कालान्तरमें हिमालयने) ब्रह्माजीके आदेशसे देवताओंकी संनिधिमें (अपने) सौभाग्यकी अभिवृद्धि समझते हुए साध्वी पार्वतीको महेश्वरके लिये प्रदान किया॥ ३२१-३२३॥<br><br>जो व्यक्ति भगवान् शिवके सांनिध्यमें उनके भावसे भावित होकर पवित्रतापूर्वक देवीके माहात्म्यका वर्णन करनेवाले इस अध्यायका पाठ करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है और दिव्य योगसे समन्वित होकर ब्रह्मलोकको पारकर देवीके स्थानको प्राप्त करता है॥ ३२४-३२५॥

८८ * कूर्मपुराण *

यश्चैतत् पठते स्तोत्रं ब्राह्मणानां समीपतः ।<br>देव्याः समाहितमनाः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ३२६ ॥जो एकाग्रमनसे ब्राह्मणोंके समीपमें देवीके इस (सहस्रनाम) स्तोत्रका पाठ करता है, वह सभी पापोंसे विमुक्त हो जाता है ॥ ३२६ ॥
नाम्नामष्टसहस्रं तु देव्या यत् समुदीरितम् ।<br>ज्ञात्वार्कमण्डलगतां सम्भाव्य परमेश्वरीम् ॥ ३२७ ॥<br><br>अभ्यर्च्य गन्धपुष्पाद्यैर्भक्तियोगसमन्वितः ।<br>संस्मरन् परमं भावं देव्या माहेश्वरं परम् ॥ ३२८ ॥<br><br>अनन्यमानसो नित्यं जपेदामरणाद् द्विजः ।<br>सोऽन्तकाले स्मृतिं लब्ध्वा परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ३२९ ॥देवीका जो एक सहस्र आठ नामवाला स्तोत्र बतलाया गया है, उसे जानकर सूर्यमण्डलमें स्थित परमेश्वरीकी भावना करते हुए गन्ध, पुष्प आदिके द्वारा भक्तियोगपूर्वक उनकी अर्चना द्विजको करनी चाहिये और देवीके परम माहेश्वर श्रेष्ठ भावका अनन्य-मनसे मरणपर्यन्त स्मरण करते हुए इस उपदिष्ट एक हजार आठ नामोंका नित्य जप करना चाहिये। ऐसा करनेसे द्विज अन्त-समयमें (देवीकी) स्मृति प्राप्तकर परब्रह्मको प्राप्त करता है ॥ ३२७-३२९ ॥
अथवा जायते विप्रो ब्राह्मणानां कुले शुचौ ।<br>पूर्वसंस्कारमाहात्म्याद् ब्रह्मविद्यामवाप्य सः ॥ ३३० ॥<br><br>सम्प्राप्य योगं परमं दिव्यं तत् पारमेश्वरम् ।<br>शान्तः सर्वगतो भूत्वा शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ ३३१ ॥<br><br>प्रत्येकं चाथ नामानि जुहुयात् सवनत्रयम् ।<br>पूतनादिकृतैर्दोषैर्ग्रहदोषैश्च मुच्यते ॥ ३३२ ॥अथवा वह विप्र ब्राह्मणोंके पवित्र कुलमें उत्पन्न होता है और पूर्वजन्मके संस्कारोंके प्रभावसे वह ब्रह्मविद्याको प्राप्त करता है। परमेश्वर-सम्बन्धी उस परम दिव्य योगको प्राप्तकर वह शान्त तथा सर्वत्र व्याप्त होते हुए शिवसायुज्यको प्राप्त करता है। (जो व्यक्ति प्रातः, मध्याह्न तथा सायं—) तीनों समय देवीके प्रत्येक नामसे हवन करता है, वह पूतना आदिद्वारा उत्पन्न (अरिष्ट) दोषों तथा ग्रहोंके दोषोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ३३०-३३२॥
जपेद् वाहरहर्नित्यं संवत्सरमतन्द्रितः ।<br>श्रीकामः पार्वतीं देवीं पूजयित्वा विधानतः ॥ ३३३ ॥<br><br>सम्पूज्य पार्श्वतः शम्भुं त्रिनेत्रं भक्तिसंयुतः ।<br>लभते महतीं लक्ष्मीं महादेवप्रसादतः ॥ ३३४ ॥अथवा लक्ष्मीप्राप्तिकी इच्छा करनेवाला द्विज विधिपूर्वक देवीकी पूजाकर और उनके पार्श्वभाग (समीप)-में तीन नेत्रवाले भगवान् शंकरकी पूजा करता है तथा एक वर्षतक आलस्यरहित होकर प्रतिदिन निरन्तर (देवीके सहस्रनामका) जप करता है, वह महादेव भगवान् शंकरकी कृपासे महालक्ष्मीको प्राप्त करता है ॥ ३३३-३३४ ॥
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन जप्तव्यं हि द्विजातिभिः ।<br>सर्वपापापनोदार्थं देव्या नाम सहस्रकम् ॥ ३३५ ॥<br><br>प्रसङ्गात् कथितं विप्रा देव्या माहात्म्यमुत्तमम् ।<br>अतः परं प्रजासर्गं भृग्वादीनां निबोधत ॥ ३३६ ॥इसलिये द्विजातियोंको सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा सभी पापोंसे छुटकारा प्राप्त करनेके लिये देवीके सहस्रनामका जप करना चाहिये। विप्रो! मैंने प्रसङ्गवश देवीका उत्तम माहात्म्य आप लोगोंसे कहा। अब इसके बाद आपलोग भृगु आदि महर्षियोंकी प्रजासृष्टिको सुनें ॥ ३३५-३३६ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ११ ॥

* अध्याय १२ * <p align="right">८९</p>


बारहवाँ अध्याय

महर्षि भृगु, मरीचि, पुलस्त्य तथा अत्रि आदिद्वारा दक्ष-कन्याओंसे उत्पन्न संतान-परम्पराका वर्णन, उनचास अग्नियों, पितरों तथा गङ्गाके प्रादुर्भावका वर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले—
भृगोः ख्यात्यां समुत्पन्ना लक्ष्मीनारायणप्रिया।<br>देवौ धाताविधातारौ मेरोजामातरौ तथा॥ १ ॥<br>आयतिर्नियतिर्मेरोः कन्ये चैव महात्मनः।<br>धाताविधात्रोस्ते भार्ये तयोर्जातौ सुतावुभौ॥ २ ॥<br>प्राणश्चैव मृकण्डुश्च मार्कण्डेयो मृकण्डुतः।<br>तथा वेदशिरा नाम प्राणस्य द्युतिमान् सुतः॥ ३ ॥महर्षि भृगुकी 'ख्याति' नामक पत्नीसे नारायणकी पत्नी लक्ष्मी उत्पन्न हुईं तथा धाता एवं विधाता नामक दो देवता भी उनसे उत्पन्न हुए, जो मेरुके जामाता हुए। महात्मा मेरुकी आयति तथा नियति नामकी दो कन्याएँ थीं, वे क्रमशः धाता तथा विधाताकी पत्नियाँ थीं, उनसे दो पुत्र उत्पन्न हुए—प्राण और मृकण्डु। मृकण्डुसे मार्कण्डेय हुए तथा प्राणके कान्तिमान् वेदशिरा नामके पुत्र हुए॥ १-३॥
मरीचेरपि सम्भूतिः पौर्णमासमसूत।<br>कन्याचतुष्टयं चैव सर्वलक्षणसंयुतम्॥ ४ ॥<br>तुष्टिर्ज्येष्ठा तथा वृष्टिः कृष्टिश्चापचितिस्तथा।<br>विरजाः पर्वतश्चैव पौर्णमासस्य तौ सुतौ॥ ५ ॥महर्षि मरीचिके भी सम्भूति (नामक पत्नी)-ने सभी (शुभ) लक्षणोंसे सम्पन्न पौर्णमास नामक पुत्र और चार कन्याओंको उत्पन्न किया। सबसे बड़ी (कन्याका नाम) तुष्टि तथा अन्य तीन कन्याओंका नाम वृष्टि, कृष्टि और अपचिति था। पौर्णमासके विरजा तथा पर्वत नामके दो पुत्र थे॥ ४-५॥
क्षमा तु सुषुवे पुत्रान् पुलहस्य प्रजापतेः।<br>कर्दमं च वरीयांसं सहिष्णुं मुनिसत्तमम्॥ ६ ॥<br>तथैव च कनीयांसं तपोनिर्धूतकल्मषम्।<br>अनसूया तथैवात्रेर्जज्ञे पुत्रानकल्मषान्॥ ७ ॥<br>सोमं दुर्वाससं चैव दत्तात्रेयं च योगिनम्।<br>स्मृतिश्चाङ्गिरसः पुत्रीर्जज्ञे लक्षणसंयुताः॥ ८ ॥<br>सिनीवालीं कुहूं चैव राकामनुमतिं तथा।<br>प्रीत्यां पुलस्त्यो भगवान् दत्तात्रिमसृजत् प्रभुः॥ ९ ॥<br>पूर्वजन्मनि सोऽगस्त्यः स्मृतः स्वायम्भुवेऽन्तरे।<br>वेदबाहुं तथा कन्यां सन्नतिं नाम नामतः॥ १०॥प्रजापति पुलहकी पत्नी क्षमाने कर्दम, वरीयान् और उनसे छोटे सहिष्णु नामक श्रेष्ठ मुनिको जन्म दिया जो तपके कारण पाप-रहित थे। उसी प्रकार अत्रिकी पत्नी अनसूयाने चन्द्रमा, दुर्वासा और योगी दत्तात्रेय नामक पुण्यात्मा पुत्रोंको उत्पन्न किया। महर्षि अङ्गिराकी स्मृति नामक पत्नीने सिनीवाली, कुहू, राका तथा अनुमति (नामवाली) शुभलक्षणसम्पन्न (चार) पुत्रियोंको जन्म दिया। प्रभु भगवान् पुलस्त्यने (अपनी पत्नी) प्रीतिसे दत्तात्रि (नामक पुत्र)-को उत्पन्न किया। स्वायम्भुव मन्वन्तरके (अपने) पूर्वजन्ममें वे ही अगस्त्य नामसे प्रसिद्ध थे। (पुलस्त्यको प्रीतिसे) वेदबाहु (नामक एक अन्य पुत्र) और 'सन्नति' इस नामसे प्रसिद्ध (एक) कन्या थी॥ ६-१०॥
पुत्राणां षष्टिसहस्रं संततिः सुषुवे क्रतोः।<br>ते चोर्ध्वरेतसः सर्वे बालखिल्या इति स्मृताः॥ ११॥<br>वसिष्ठश्च तथोर्जायां सप्त पुत्रानजीजनत्।<br>कन्यां च पुण्डरीकाक्षां सर्वशोभासमन्विताम्॥ १२॥महर्षि क्रतुकी पत्नी संततिने साठ हजार पुत्रोंको जन्म दिया। वे सभी ऊर्ध्वरेता बालखिल्य इस नामसे प्रसिद्ध हुए। महर्षि वसिष्ठने ऊर्जा नामक पत्नीसे सात पुत्रों और कमलके समान नेत्रवाली तथा सभी प्रकारकी शोभाओंसे सम्पन्न एक कन्याको जन्म दिया॥ ११-१२॥
९०* कूर्मपुराण *
रजोह्यश्चोर्ध्वबाहुश्च सवनश्चानघस्तथा।<br>सुतपाः शुक्र इत्येते सप्त पुत्रा महौजसः॥ १३॥<br><br>योऽसौ रुद्रात्मको वह्निर्ब्रह्मणस्तनयो द्विजाः।<br>स्वाहा तस्मात् सुतान् लेभे त्रीनुदारान् महौजसः॥ १४॥<br><br>पावकः पवमानश्च शुचिरग्निश्च ते त्रयः।<br>निर्मथ्यः पवमानः स्याद् वैद्युतः पावकः स्मृतः॥ १५॥<br><br>यश्चासौ तपते सूर्यः शुचिरग्निस्त्वसौ स्मृतः।<br>तेषां तु संततावन्ये चत्वारिंशच्च पञ्च च॥ १६॥<br><br>पावकः पवमानश्च शुचिस्तेषां पिता च यः।<br>एते चैकोनपञ्चाशद् वह्नयः परिकीर्तिताः॥ १७॥<br><br>सर्वे तपस्विनः प्रोक्ताः सर्वे यज्ञेषु भागिनः।<br>रुद्रात्मकाः स्मृताः सर्वे त्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकाः॥ १८॥<br><br>अयज्वानश्च यज्वानः पितरो ब्रह्मणः स्मृताः।<br>अग्निष्वात्ता बर्हिषदो द्विधा तेषां व्यवस्थितिः॥ १९॥<br><br>तेभ्यः स्वधा सुतां जज्ञे मेनां वैतरणीं तथा।<br>ते उभे ब्रह्मवादिन्यौ योगिन्यौ मुनिसत्तमाः॥ २०॥<br><br>असूत मेना मैनाकं क्रौञ्चं तस्यानुजं तथा।<br>गङ्गा हिमवतो जज्ञे सर्वलोकैकपावनी॥ २१॥<br><br>स्वयोगाग्निबलाद् देवीं लेभे पुत्रीं महेश्वरीम्।<br>यथावत् कथितं पूर्वं देव्या माहात्म्यमुत्तमम्॥ २२॥<br><br>एषा दक्षस्य कन्यानां मयापत्यानुसंततिः।<br>व्याख्याता भवतामद्य मनोः सृष्टिं निबोधत॥ २३॥रज, ऊह, ऊर्ध्वबाहु, सवन, अनघ, सुतपा और शुक्र—(नामवाले) ये (वसिष्ठके) सात महान् ओजस्वी पुत्र थे। द्विजो! ब्रह्माका रुद्रस्वरूप जो वह वह्नि नामक पुत्र था, उससे स्वाहाने महातेजस्वी तीन उदार पुत्रोंको प्राप्त किया। वे तीनों पावक, पवमान तथा शुचि (नामवाले) अग्नि थे। मन्थनद्वारा उत्पन्न अग्निको पवमान और विद्युत्से सम्बद्ध अग्निको पावक कहा जाता है। जो यह सूर्य चमकता है वही शुचि अग्नि कहलाता है। उन (तीनों अग्नियों)—की पैंतालीस संतानें हुईं। (इस प्रकार) पावक, पवमान तथा शुचि (नामक तीन अग्नियाँ) और इन तीनोंके पिता (रुद्रात्मक अग्नि) एवं (उन तीनों अग्नियोंके पैंतालीस पुत्र) ये सभी मिलाकर उनचास अग्नियाँ कही गयी हैं। ये सभी (उनचास) तपस्वी कहे गये हैं, सभी यज्ञभागके अधिकारी हैं, रुद्रात्मक कहलाते हैं और सभी मस्तकपर त्रिपुण्ड्रके चिह्नसे अङ्कित रहते हैं॥ १३-१८॥<br><br>ब्रह्माके अग्निष्वात्त तथा बर्हिषद् नामक दो पुत्र कहे गये हैं जो पितर हैं। उनमें अयज्वा (यज्ञ न करनेवाले) तथा यज्वा (यज्ञ करनेवाले)-के रूपमें दो प्रकारकी व्यवस्था है। मुनिश्रेष्ठो! स्वधाने उनके द्वारा मेना और वैतरणी नामक दो पुत्रियोंको प्राप्त किया। वे दोनों ही ब्रह्मवादिनी और योगिनी थीं। मेनाने मैनाक और उसके अनुज क्रौञ्च (नामक पर्वत)-को जन्म दिया। हिमालयसे समस्त लोकोंको पवित्र करनेमें अद्वितीय गङ्गा उत्पन्न हुईं। (हिमालयने) अपनी योगाग्निके बलसे (उन) देवी महेश्वरीको पुत्री-रूपमें प्राप्त किया, जिन देवीके उत्तम माहात्म्यको भलीभाँति पहले बता दिया गया है॥ १९-२२॥<br><br>मैंने प्रजापति दक्षकी कन्याओंकी संतान-परम्पराका आप लोगोंसे वर्णन किया। अब आप (स्वायम्भुव) मनुकी सृष्टिका वर्णन सुनें॥ २३॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायां पूर्वविभागे द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके पूर्वविभागमें बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १२॥


* अध्याय १३ * | ९१


तेरहवाँ अध्याय

स्वायम्भुव मनुके वंशका वर्णन, चाक्षुष मनुकी उत्पत्ति, महाराज पृथुका आख्यान, पृथुका वंश-वर्णन, पृथुके पौत्र 'सुशील' का रोचक आख्यान, सुशीलको हिमालयके 'धर्मपद' नामक वनमें महापाशुपत श्वेताश्वतर मुनिके दर्शन तथा उनसे पाशुपत-व्रतका ग्रहण, दक्षके पूर्वजन्मका वृत्तान्त तथा पुनः दक्ष प्रजापतिके रूपमें आविर्भावकी कथा, दक्षद्वारा शंकरका अपमान, सतीद्वारा देह-त्याग तथा शंकरका दक्षको शाप


सूत उवाच
प्रियव्रतोत्तानपादौ मनोः स्वायम्भुवस्य तु।
धर्मज्ञौ सुमहावीर्यौ शतरूपा व्यजीजनत्॥ १ ॥

ततस्तूत्तानपादस्य ध्रुवो नाम सुतोऽभवत्।
भक्तो नारायणे देवे प्राप्तवान् स्थानमुत्तमम्॥ २ ॥

ध्रुवात् श्लिष्टं च भव्यं च भार्या शम्भुर्व्यजायत।
श्लिष्टेराधत्त सुच्छाया पञ्च पुत्रानकल्मषान्॥ ३ ॥

वसिष्ठवचनाद् देवी तपस्तप्त्वा सुदुश्चरम्।
आराध्य पुरुषं विष्णुं शालग्रामे जनार्दनम्॥ ४ ॥

रिपुं रिपुञ्जयं विप्रं वृकलं वृषतेजसम्।
नारायणपरान् शुद्धान् स्वधर्मपरिपालकान्॥ ५ ॥

**सूतजी बोले—**स्वायम्भुव मनुकी पत्नी शतरूपाने प्रियव्रत तथा उत्तानपाद नामवाले दो पुत्रोंको जन्म दिया, जो धर्मको जाननेवाले तथा महान् पराक्रमी थे। कालान्तरमें उत्तानपादका ध्रुव नामक पुत्र हुआ। भगवान् विष्णुके उस भक्तने उत्तम स्थान प्राप्त किया। ध्रुवकी शम्भुनामक पत्नीने श्लिष्ट तथा भव्य नामक पुत्रोंको जन्म दिया। श्लिष्टकी सुच्छाया नामक पत्नीने पाँच पुण्यात्मा पुत्रोंको उत्पन्न किया। महर्षि वसिष्ठके कथनानुसार सुच्छाया नामक देवीने अत्यन्त कठोर तप करके शालग्राममें जनार्दन पुरुष विष्णुकी आराधना कर रिपु, रिपुञ्जय, विप्र, वृकल तथा वृषतेजस् नामवाले पाँच पुत्रोंको जन्म दिया, जो नारायणमें अनन्य निष्ठा रखनेवाले, शुद्ध तथा अपने धर्मका विशेषरूपसे पालन करनेवाले थे॥ १—५॥

रिपोराधत्त बृहती चक्षुषं सर्वतेजसम्।
सोऽजीजनत् पुष्करिण्यां वैरिण्यां चाक्षुषं मनुम्।
प्रजापतेरात्मजायां वीरणस्य महात्मनः॥ ६ ॥

मनोरजायन्त दश नड्वलायां महौजसः।
कन्यायां सुमहावीर्या वैराजस्य प्रजापतेः॥ ७ ॥

ऊरुः पूरुः शतद्युम्नस्तपस्वी सत्यवाक् शुचिः।
अग्निष्टुदतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चाभिमन्युकः॥ ८ ॥

ऊरोरजनयत् पुत्रान् षडाग्नेयी महाबलान्।
अङ्गं सुमनसं स्वातिं क्रतुमङ्गिरसं शिवम्॥ ९ ॥

अङ्गाद् वेनोऽभवत् पश्चाद् वैन्यो वेनादजायत।
योऽसौ पृथुरिति ख्यातः प्रजापालो महाबलः॥ १० ॥

येन दुग्धा मही पूर्वं प्रजानां हितकारणात्।
नियोगाद् ब्रह्मणः सार्धं देवेन्द्रेण महौजसा॥ ११ ॥

रिपुकी पत्नी बृहतीने सब प्रकारके तेजोंसे सम्पन्न चक्षुष् (नामक पुत्र)-को जन्म दिया। उस चक्षुष्ने महात्मा वीरण प्रजापतिकी पुष्करिणी* नामवाली पुत्रीसे चाक्षुष मनुको जन्म दिया। अत्यन्त तेजस्वी (चाक्षुष) मनुके वैराज प्रजापतिकी कन्या नड्वलासे दस पुत्र उत्पन्न हुए, जो ऊरु, पूरु, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यवाक्, शुचि, अग्निष्टुत्, अतिरात्र, सुद्युम्न तथा अभिमन्युक (नामवाले) थे। ऊरुकी पत्नी आग्नेयीने अङ्ग, सुमनस्, स्वाति, क्रतु, अङ्गिरस् एवं शिव (नामवाले) महाबलशाली छः पुत्रोंको उत्पन्न किया। अङ्गसे वेन हुआ और फिर वेनसे वैन्य उत्पन्न हुए। प्रजापालक, महाबलवान् वे ही वैन्य पृथु नामसे विख्यात हुए। पूर्वकालमें उन्होंने प्रजाओंके कल्याणकी कामनासे ब्रह्माके आदेशसे महा-तेजस्वी देवराज इन्द्रके साथ (गोरूपा) पृथ्वीका दोहन किया था॥ ६—११॥


* यह पुष्करिणी प्रजापति वीरणकी पुत्री होनेसे वैरिणी भी कही जाती है।

९२ * कूर्मपुराण *


वेनपुत्रस्य वितते पुरा पैतामहे मखे।<br>सूतः पौराणिको जज्ञे मायारूपः स्वयं हरिः ॥ १२ ॥<br><br>प्रवक्ता सर्वशास्त्राणां धर्मज्ञो गुणवत्सलः ।<br>तं मां वित्त मुनिश्रेष्ठाः पूर्वोद्भूतं सनातनम् ॥ १३ ॥<br><br>अस्मिन् मन्वन्तर व्यासः कृष्णद्वैपायनः स्वयम्।<br>श्रावयामास मां प्रीत्या पुराणं पुरुषो हरिः ॥ १४ ॥<br><br>मदन्वये तु ये सूताः सम्भूता वेदवर्जिताः ।<br>तेषां पुराणवक्तृत्वं वृत्तिरासीदजाज्ञया ॥ १५ ॥प्राचीन कालमें वेनके पुत्र पृथुके पैतामह नामक यज्ञ करते समय मायारूपधारी साक्षात् विष्णु ही पौराणिक सूतके रूपमें उत्पन्न हुए। वे सभी शास्त्रोंके प्रवक्ता, धर्मको जाननेवाले तथा वात्सल्यगुणसे सम्पन्न थे। मुनिश्रेष्ठो! प्राचीन कालमें आविर्भूत वही सनातन (विष्णु) मुझे जानो। इस मन्वन्तरमें स्वयं कृष्णद्वैपायन व्यास नामक पुराणपुरुष विष्णुने प्रीतिपूर्वक मुझे पुराण सुनाया। मेरे वंशमें वेदवर्जित जो सूत उत्पन्न हुए, ब्रह्माकी आज्ञासे 'पुराणोंका प्रवचन करना' उनकी वृत्ति हुई ॥ १२–१५॥
स तु वैन्यः पृथुर्धीमान् सत्यसंधो जितेन्द्रियः ।<br>सार्वभौमो महातेजाः स्वधर्मपरिपालकः ॥ १६ ॥<br><br>तस्य बाल्यात् प्रभृत्येष भक्तिर्नारायणेऽभवत् ।<br>गोवर्धनगिरिं प्राप्य तपस्तेपे जितेन्द्रियः ॥ १७ ॥<br><br>तपसा भगवान् प्रीतः शङ्खचक्रगदाधरः ।<br>आगत्य देवो राजानं प्राह दामोदरः स्वयम् ॥ १८ ॥<br><br>धार्मिकौ रूपसम्पन्नौ सर्वशस्त्रभृतां वरौ ।<br>मत्प्रसादादसंदिग्धं पुत्रौ तव भविष्यतः ।<br>एवमुक्त्वा हृषीकेशः स्वकीयां प्रकृतिं गतः ॥ १९ ॥<br><br>वैन्योऽपि वेदविधिना निश्चलां भक्तिमुद्वहन्।<br>अपालयत् स्वकं राज्यं न्यायेन मधुसूदने ॥ २० ॥वेनके पुत्र वे पृथु बुद्धिमान्, सत्यसंकल्प, जितेन्द्रिय, सम्पूर्ण पृथ्वीके स्वामी, महान् तेजस्वी तथा अपने धर्मका पालन करनेवाले थे। उनकी बाल्यकालसे ही नारायणमें भक्ति थी। इन्द्रियजयी पृथुने गोवर्धन पर्वतपर जाकर तप किया। शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु तपस्यासे प्रसन्न हो गये। स्वयं भगवान् दामोदर (विष्णु)-ने उनके पास आकर कहा—मेरी कृपासे निश्चित ही तुम्हें सुन्दर रूपसे सम्पन्न, सभी शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ दो धर्मात्मा पुत्र होंगे। ऐसा कहकर भगवान् हृषीकेश अपने प्राकृतिक रूपमें स्थित हो गये (अपने धाम चले गये)। वैन्य (पृथु) भी भगवान् मधुसूदनमें वैदिक विधानसे निश्चल भक्ति रखते हुए न्यायपूर्वक अपने राज्यका पालन करने लगे ॥ १६–२०॥
अचिरादेव तन्वङ्गी भार्या तस्य शुचिस्मिता ।<br>शिखण्डिनं हविर्धानमन्तर्धाना व्यजायत ॥ २१ ॥<br><br>शिखण्डिनोऽभवत् पुत्रः सुशील इति विश्रुतः ।<br>धार्मिको रूपसम्पन्नो वेदवेदाङ्गपारगः ॥ २२ ॥<br><br>सोऽधीत्य विधिवद् वेदान् धर्मेण तपसि स्थितः ।<br>मतिं चक्रे भाग्ययोगात् संन्यासं प्रति धर्मवित् ॥ २३ ॥<br><br>स कृत्वा तीर्थसंसेवां स्वाध्याये तपसि स्थितः ।<br>जगाम हिमवत्पृष्ठं कदाचित् सिद्धसेवितम् ॥ २४ ॥<br><br>तत्र धर्मपदं नाम धर्मसिद्धिप्रदं वनम्।<br>अपश्यद् योगिनां गम्यमगम्यं ब्रह्मविद्विषाम् ॥ २५ ॥मधुर एवं पवित्र मुसकानवाली तथा कृश शरीरवाली उनकी पत्नी अन्तर्द्धानाने थोड़े ही समयमें शिखण्डी तथा हविर्धान नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया। शिखण्डीका पुत्र 'सुशील' नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह धार्मिक, रूपसम्पन्न तथा वेद-वेदाङ्गका पारगामी विद्वान् था। विधिपूर्वक वेदोंका अध्ययन कर वह धर्मपूर्वक तपस्यामें स्थित हुआ। भाग्ययोगसे उस धर्मज्ञने संन्यास ग्रहण करनेका विचार किया। वह तीर्थस्थानोंका सेवन करते हुए स्वाध्याय तथा तपस्यामें स्थित रहने लगा। एक बार वह सिद्धोंके द्वारा सेवित हिमालय पर्वतपर गया। वहाँ उसने धर्म एवं सिद्धिको प्रदान करनेवाले, योगियोंके लिये प्राप्य, किंतु ब्रह्मासे द्वेष करनेवालोंके लिये अप्राप्य धर्मपद नामक एक वनको देखा ॥ २१–२५ ॥
  • अध्याय १३ * | ९३ ---|--- तत्र मन्दाकिनी नाम सुपुण्या विमला नदी ।<br>पद्मोत्पलवनोपेता सिद्धाश्रमविभूषिता ॥ २६ ॥<br><br>स तस्या दक्षिणे तीरे मुनीन्द्रैर्यौगिभिर्वृतम् ।<br>सुपुण्यमाश्रमं रम्यमपश्यत् प्रीतिसंयुतः ॥ २७ ॥<br><br>मन्दाकिनीजले स्नात्वा संतर्प्य पितृदेवताः ।<br>अर्चयित्वा महादेवं पुष्पैः पद्मोत्पलादिभिः ॥ २८ ॥<br><br>ध्यात्वार्कसंस्थमीशानं शिरस्याधाय चाञ्जलिम् ।<br>सम्प्रेक्षमाणो भास्वन्तं तुष्टाव परमेश्वरम् ॥ २९ ॥<br><br>रुद्राध्यायेन गिरिशं रुद्रस्य चरितेन च ।<br>अन्यैश्च विविधैः स्तोत्रैः शाम्भवैर्वेदसम्भवैः ॥ ३० ॥ | वहाँ सिद्धोंके आश्रमसे सुशोभित तथा विभिन्न प्रकारके कमल-समूहोंसे सम्पन्न निर्मल जलवाली तथा पुण्य प्रदान करनेवाली मन्दाकिनी नामक एक नदी (प्रवाहित होती) थी। उसने प्रीतिपूर्वक उस मन्दाकिनी नदीके दक्षिण किनारेपर स्थित मुनीन्द्रों तथा योगियोंसे सेवित पुण्यदायी एक रमणीय आश्रम देखा। उसने मन्दाकिनीके जलमें स्नानकर देवस्वरूप पितरोंको (तर्पण आदिसे) संतृप्तकर विभिन्न वर्णके कमल आदि पुष्पोंके द्वारा भगवान् शंकरकी अर्चना की और सूर्यमण्डलमें स्थित भगवान् ईशानका ध्यानकर सिरसे हाथ जोड़ते हुए प्रकाशमान सूर्यका दर्शन करते हुए वह रुद्राष्टाध्यायी, रुद्रके चरित्र एवं और भी अनेक वेदवर्णित विविध प्रकारके शिव-सम्बन्धी स्तोत्रोंके द्वारा परमेश्वर गिरिशकी स्तुति करने लगा॥ २६-३० ॥ अथास्मिन्नन्तरेऽपश्यत् समायान्तं महामुनिम् ।<br>श्वेताश्वतरनामानं महापाशुपतोत्तमम् ॥ ३१ ॥<br><br>भस्मसंदिग्धसर्वाङ्गं कौपीनाच्छादनान्वितम् ।<br>तपसा कर्शितात्मानं शुक्लयज्ञोपवीतिनम् ॥ ३२ ॥<br><br>समाप्य संस्तवं शम्भोरानान्दास्राविलेक्षणः ।<br>ववन्दे शिरसा पादौ प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥ ३३ ॥ | इसी बीच उसने समस्त अङ्गोंमें भस्म लगाये हुए, कौपीन वस्त्रसे समन्वित, सफेद यज्ञोपवीत धारण किये हुए, तपस्याके द्वारा क्षीण शरीरवाले उत्तम महापाशुपत श्वेताश्वतर नामवाले महामुनिको समीपमें आते हुए देखा। नेत्रोंमें आनन्दाश्रु भरे हुए उसने भगवान् शंकरकी स्तुति समाप्त कर उनके चरणोंमें सिरसे प्रणाम किया और हाथ जोड़ते हुए यह वाक्य कहा— ॥ ३१-३३ ॥ धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मे साक्षान्मुनीश्वरः ।<br>योगीश्वरोऽद्य भगवान् दृष्टो योगविदां वरः ॥ ३४ ॥ | मैं धन्य हूँ, मैं अनुगृहीत हूँ, जो (आज) मुझे योगज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, मुनियोंके ईश्वर साक्षात् भगवान् योगीश्वरके दर्शन हुए। अहो! मेरा बड़ा ही सुन्दर भाग्य है। (आज) मेरे सभी तप सफल हो गये। अनघ! मैं क्या करूँ, आपका मैं शिष्य हूँ, आप मेरी रक्षा करें ॥ ३४-३५ ॥ अहो मे सुमहद्भाग्यं तपांसि सफ़लानि मे ।<br>किं करिष्यामि शिष्योऽहं तव मां पालयानघ ॥ ३५ ॥<br><br>सोऽनुगृह्याथ राजानं सुशीलं शीलसंयुतम् ।<br>शिष्यत्वे परिजग्राह तपसा क्षीणकल्मषम् ॥ ३६ ॥ | तपस्यासे जिसका सम्पूर्ण कल्मष नष्ट हो गया है, ऐसे उस निष्पाप एवं शीलसम्पन्न 'सुशील' नामवाले राजाके ऊपर अनुग्रह करके (शंकरने अपने) शिष्यरूपमें उसे ग्रहण किया। उन बुद्धिमान् (मुनि)-ने संन्यास-सम्बन्धी सम्पूर्ण विधि करवाकर उसे ईश्वर-सम्बन्धी ज्ञान तथा अपनी शाखाद्वारा विहित नियम और पशुरूपी जीवके पाश अर्थात् मायारूपी बन्धनसे मुक्त करनेवाला वह सम्पूर्ण वेदका सार प्रदान किया, साथ ही ब्रह्मा आदिके द्वारा सेवित 'अन्त्याश्रम' नामवाले आश्रमको भी प्रदान किया ॥ ३६-३८ ॥ सांन्यासिकं विधिं कृत्स्नं कारयित्वा विचक्षणः ।<br>ददौ तदैश्वरं ज्ञानं स्वशाखाविहितं व्रतम् ॥ ३७ ॥<br><br>अशेषवेदसारं तत् पशुपाशविमोचनम् ।<br>अन्त्याश्रममिति ख्यातं ब्रह्मादिभिरनुष्ठितम् ॥ ३८ ॥ |